शुक्रवार, 27 जुलाई 2018

पाकिस्तान : ये कैसा “लोकतंत्र“

सात दशक से भी ज्यादा समय से तानाशाही (सैन्य शासन) और अर्ध लोकतंत्र के बीच झूल रहे पाकिस्तान में संसद (नेश नल असेंबली) और प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव में   इस  बार सेना का भारी दखल रहा है। पाकिस्तान में  70 सालों मेंसे अधिकतर समय सैन्य  शासन रहा है।  इस बार चुनाव की घोषणा से लेकर मतदान और मतगणना तक भारी धांधलियों और गडबडी के नजारे सामने आए हैं। पाकिस्तान की 342 सदस्यीय नेशनल असेंबली की 272 सीटों के लिए चुनाव कराए जाते हैं। बाकी 60 सीटें महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित है। भारतीय संसद की ही तरह पाकिस्तान में ऊपरी सदन सीनेट  सदस्यों को प्रांतीय असेंबलियों द्वारा चुना जाता है।  ताजा चुनाव परिणामों के अनुसार किक्रेटर से राजनीति में आए इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) 120  सीटें जीत कर प्रतिद्धद्धियों से कहीं आगे है। पूर्ण  बहुमत के लिए 137 सीटों की जरुरत है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज षरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग 61  सीटें लेकर पीटीआई से काफी पीछे हैं। पूर्व  प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पुत्र विलावल भुट्टो 40  सीटों पर आगे हैं। ताजा स्थिति में नवाज षरीफ और विलावल भुट्टो की पार्टी मिलकर भी इमरान खान की पार्टी का मुकाबला नहीं कर सकती। इमरान खान का प्रधानमंत्री बनना तय लग रहा है ।पाकिस्तान की सेना और इसकी बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई भी यही चाहती है। पाकिस्तान में सेना की   विशेष शक्तियों के कम होने के बाद से तख्ता पलट आसान नहीं रहा है, इसलिए सेना अपनी पसंद के प्रधानंमत्री को पदस्थ करने के लिए इस बार रात-दिन एक करती रही है। नवाज शरीफ और उनकी पार्टी सेना को फूटी आंख भी नहीं सुहाती है। सेना और आईएसआई का इमरान खान की पार्टी पीटीआई को खुला समर्थन रहा है। इमरान की पार्टी को मुंबई नरसंहार के मास्टरमाइंड और आतंकी संगठनों के सरगना हाफिज सईद का भी समर्थन है।  नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर रखने के लिए सेना और आईएसआई ने हर तरह के हथकंडे अपनाए। नवाज शरीफ के मामले की सुनवाई को तेज करते हुए चुनाव से पहलेे उन्हें जेल भेज दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र  हनीफ अब्बासी के नारकोटिक्स मामले की सुनवाई अगस्त  में होनी थी। मगर इसे  मतदान से चार दिन पहले  21 जुलाई को करवाकर उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इससे वे चुनाव से ही बाहर हो गए। मीडिया पर कडा पहरा लगा दिया गया। नवाज शरीफ के स्वदेश  लौटने पर लोगों के भारी हजूम ने उनका स्वागत किया। जगह-जगह विरोध -प्रदर्शन  हुए मगर मीडिया में एक शब्द भी नहीं छपा। पाकिस्तान के तटस्थ लोकप्रिय जियो टीवी चैनल को अप्रैल में बंद कर दिया गया था। बाद में जब खुला तो चैनल को  आत्म-सेंसर लगाने और सरकार की आवाज बनाने के लिए विवश  होना पडा। पाकिस्तान के प्रमुख समाचार पत्र “डान“ भी अछूता नही रहा है। मई से इसका वितरण बाधित किया जा रहा है। मतदान के दिन लगभग 10 से 15 प्रतिशत मतदाताओं को मतदान करने ही नहीं दिया गया। उम्मीदवारों के आग्रह के बावजूद मतदान का समय नहीं बढाया गया हालांकि मतदान केन्द्रों पर मतदातओं की लंबी कतारें थी। मतगणना रुक-रुक कराई  गई । पूरा चुनाव दहशत के माहौल में संपन्न हुआ है।  निष्पक्ष  और स्वतंत्र चुनाव ही लोकतंत्र की रीढ की हड्डी होती है। जिस तरह रीढ की हड्डी टूटने पर इंसान पंगु हो जाता है, उसी तरह निष्पक्ष  और भयमुक्त स्वंतत्र चुनाव के बगैर लोकतंत्र कोई मायने नहीं रखता। इमरान खान ने अपने पहले मीडिया इंटरव्यू में भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाया है मगर यह सब दिखावा है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने भारत के खिलाफ जहर उगलने में कोई कसर नहीं छोडी। पाकिस्तान में सेना और आईएसआई के रिमोट कंट्रोल से संचालित प्रधानमंत्री भारत के लिए सबसे बडा खतरा है।

गुरुवार, 26 जुलाई 2018

विरोध-प्रदर्शन मौलिक अधिकार है इसे कुचला नहीं जा सकता

दुनिया भर में आज तक जितने भी  शासन व्यवस्थाएं रही हैं, उनमें लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ  है। लोकतंत्र में वह मुक्त माहौल और स्वत्रंत्रता मौजूद है, जो मानव के सतत और समग्र विकास के लिए  अपरिहार्य है। भारत के संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्ट  उल्लेख है और इनमें  अभिव्यक्ति और लेखन की आजादी एवं  फ्रीडम ऑफ रिलीजन और फ्रीडम ऑफ एषोसिएषन एंड पीसफुल असेंबली भी  शामिल है। फ्रीडम ऑफ असेंबली के तहत देश  के हर नागरिक को  कहीं भी, कभी भी पीसफुल असेंबली का अधिकार है।  अमेरिका में नागरिकों को अपने हक के लिए  शांतिपूर्वक विरोध करने का पूरा अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट  व्यवस्था दी है कि “विरोध-प्रदर्शन  करना“ लोगों का मौलिक अधिकार है और इस पर निरंकुश  प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। शीर्ष  अदालत ने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और इंडिया गेट के समीप स्थित  बोट क्लब  पर विरोध प्रदर्शन  पर लगे प्रतिबंध  हटा लिए  है । दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर और बोट क्लब लंबे समय से विरोध-प्रदर्शन के स्थल रहे हैं। समाजसेवी अन्ना हजारे, पूर्व  सैनिकों और तमिल नाडु के किसानों ने अपनी-अपनी मांगों के समर्थन मेँ  जंतर-मंतर पर ही आंदोलन किए थे।  पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इस बिला पर जंतर-मंतर और बोट क्लब में विरोध-प्रदर्शन  पर प्रतिबंध लगा दिया था कि इनसे दिल्ली में  प्रदूषण  बढ रहा है। मजदूर किसान शक्ति संगठन, एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट जैसे संगठनों ने एनजीटी के इस आदेश  को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।  सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इन याचिकाओं पर व्यवस्था देते हुए दिल्ली पुलिस को इन स्थलों पर विरोध-प्रदर्शन के लिए नियम बनाने को कहा है। बोट क्लब  प्रदर्शनकारियों  की पहली पसंद रहा है। यह स्थल जंतर-मंतर से कहीं बडा है। 1988 में महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई में पांच लाख से ज्यादा किसानों ने दिल्ली को लगभग पंगु बना दिया था। किसान राशन-पानी, मंजियां, ट्रेक्टर और गाय-भैंस लेकर एक सप्ताह तक दिल्ली में डेरा डाले रहे। इस आंदोलन के बाद बोट क्लब में विरोध-प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था मगर 2011 मे इस प्रतिबंध को हटा लिया गया था। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि लोकतंत्र में प्रदूषण अथवा कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचल नहीं जा सकता। ऐसा सिर्फ  पुलिस स्टेट में ही होता है। वैसे भी कहते हैं कि सरकार अक्सर बहरी होती है और उसके कानों में ऊंची आवाजें ही सुनाई देती है। समाजसेवी अन्ना हजारे ने लोकपाल के लिए जंतर-मंतर पर आंदोलन किया, सरकार को लोकपाल बिल लाना पडा। यह बात दीगर है कि बिल पारित होने के पांच साल बाद और सुप्रीम कोर्ट  के दखल के  बावजूद अभी तक  लोकपाल की नियुक्त नहीं हो पाई है। जंतर-मंतर पर कई दिनों तक आंदोलन करने के बाद ही सरकार को पूर्व-सैनिकों की पेंशन संबंधी मागों पर विचार करने के लिए विवश  होना पडा। 2017 में तमिल नाडु के जंतर-मंतर पर किसानों के  आंदोलन के बाद ही राज्य सरकार जागी  और किसानों को सूखा राहत और ऋण माफी का पैकेज मिला था। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन सरकार को जगाने का एक सशक्त माध्यम है और इस अधिकार के बगैर लोकतंत्र  पुलिस स्टेट बन जाता है। वैसे,  संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ-साथ “ फंडामेंटल डयूटीज “ भी निर्दिश  हैं। 2013 में आर्टिकल 51-ए को संविधान (42) सशोधन, एक्ट  1976 में जोड दिया गया था। इसके तहत नागरिकों के लिए दस “फंडामेंटल डयूटीज “ को निभाना अनिवार्य है। इनमें “डयूटी टू वोट“, “ड्यूटी टू पे टैक्सिस“ और “ ड्यूटी   "ड्यूटी टू  रिजिस्ट इनजस्टिस" शामिल है।   अधिकार और जिम्मेदारियां एक ही सिक्के के दो पहलू हैं मगर हम अधिकारों के लिए तो लडते हैं मगर ड्यूटी निभाने से अक्सर बच निकलते हैं।

उन्मादी भीड को रोक पाएगा कानून?

भारत में उन्मादी भीड द्वारा  किसी की जान लेने की घटना की आग अभी ठंडी  भी नहीं हो पाती है कि दूसरी घटना के सामने आने से फिर माहौल गरमा जाता है। पिछले सप्ताह शुक्रवार को राजस्थान के अलवर जिले में उन्मादी भीड ने गो रक्षा के नाम पर एक व्यक्ति को पीट-पीट कर अधमरा कर दिया। पीडित अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित था। पुलिस ने उसे अस्पताल ले जाने में भारी कोताही बरती और जब तीन घंटे बाद उसे अस्पताल पहुंचा गया, तब तक उसने दम तोड दिया था। इससे पहल नंवबर 2017 में भी अलवर जिले में ही उन्मादी भीड ने  पशु  तस्करी केे संदेह में दो व्यक्तियों पर फायरिंग करके एक को मारा डाला और दूसरे की गंभीर रुप से घायल कर दिया था।  बुधवार को उत्तर प्रदेश  के हाथरस में उन्मादी भीड ने मृत भैंस को ले जा रहे चार व्यक्तियों पर हमला बोल दिया। आरोप था कि आरोपियों ने भैंस को जहर देकर मार डाला। आरोपियों में दो हिंदू और दो मुसलमान थे। पुलिस ने मौके पर पहुंच कर उन्मादी भीड से चारों को बचा लिया। उत्तर प्रदेश श  में भी भाजपा की सरकार है और राजस्थान में भी। लिंचिंग की ज्यादातर घटनाएं भाजपा षासित राज्यों में हो रही है। 2015 में हिमाचल प्रदेश  की  एक लिचिंग घटना को छोडकर बाकी सभी लिंचिंग  भाजपा शासित राज्यों में हुई है 2015 में हिमाचल में कांग्रेस सरकार थी।  2014 में मोदी सरकार के केन्द्र में सत्तारूढ होने के बाद से मॉब लिंचिंग के 63 हमले हो चुके हैं और सबसे ज्यादा 11 हमले 2017 में किए गए। अकेले भाजपा शासित झारखंड में 12 मई से 18 मई के बीच चार हमलों में उन्मादी भीड ने 9 लोगों को मार डाला। लिंचिंग की इन घटनाओं में मुस्लिम समुदाय के अलावा हिंदु दलितों को भी निशाना बनाया गया है। जुलाई, 2016 में गुजरात के उना तालुका में छह गो रक्षकों ने चार दलितों को कार में बांध कर नंगा किया और उनकी बुरी तरह से पीटा था। विदेशी  मीडिया लिंचिंग की इन घटनाओं को खूब उछाल रहा है। एक अखबार ने तो यहां तक लिखा है कि उत्तर भारत में गो-रक्षक गाय को बचाने के लिए अक्सर सडकों पर घूमते रहते हैं और उन्होंने खबरियों का नेटवर्क  भी बना रखा है। दिल्ली में ही 200 से ज्यादा गो-रक्षक समूह काम कर रहे हैं।  अमेरिका का मशहूर समाचार पत्र न्यूयार्क टाइम्स भाजपा को लिंचिंग की बढती घटनाओं के लिए दोषी  मानता है। विदेशी  मीडिया का यह भी आरोप है कि गो-रक्षक गोमाता को बचाने के नाम पर चांदी कूट रहे है और तस्करों से मोटा पैसा ऐंठ रहे हैं। एक अंग्रेजी समाचार पत्र की खोजी खबर में बताया गया था कि पंजाब में गो-रक्षक तस्करों से प्रति पशु  200 रु लेकर उन्हें जाने देते है। विद्धानों का मत है कि गो-रक्षा भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे का एक अहम हिस्सा है। इसी वजह  प्रधानमंत्री लिंचिंग की तो भर्त्सना करते हैं मगर मुस्लिम समुदाय के प्रति संवेदनाओं का एक शब्द भी नहीं बोलते हैं। इतना ही नहीं भाजपा के नेताओं में लिंचिग के अभियुक्तों को सम्मानित करने की होड लगी हुई हैं।  यही कारण है कि 2017 में सुप्रीम कोर्ट  की कडी  भर्त्सना और निर्देशों  के बावजूद लिंचिंग की घटनाएं कम नहीं हो रही है। सुप्रीम कोर्ट की सलाह के बाद केन्द्र ने इसी सप्ताह लिंचिंग पर अलग कानून बनाने के लिए उच्च स्तरीय कमेटी और मंत्रिमंडलीय उप- समिति गठित की है। मगर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या कानून उन्मादी भीड को रोक पाएगा ? विद्धानों का मत है कि  राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) का विशुद्ध हिंदुत्व सोसायटी का दर्शन  भी गो-रक्षकों को बल प्रदान करता है। इस  दर्शन  में समाज को सरकार से सुप्रीम माना  गया  है और सामाजिक मसलों को सामाजिक स्तर पर ही सुलझाया जाना चाहिए। बहरहाल, सभ्य और सुसंस्कृति समाज में कानून  सबसे बडा होता है।              


मंगलवार, 24 जुलाई 2018

राहुल गांधी और महागठबंधन

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहले की अपेक्षा अब ज्यादा आत्म-विश्वासी  और परिपक्व नजर आ रहे हैं। गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद से उनमें यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। उनकी बातों में वजन न भी हों, तो भी वे अपनी बात को  बडी  शिद्दत से पेश  करते हैं। उनकी सामरिक रणनीति कहीं ज्यादा असरदार साबित हो रही है।  पिछले सप्ताह लोकसभा में अविश्वास  प्रस्ताव पर उनका भाषण, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को “झप्पी“ और फिर अपने सहयोगी सांसद को आंख मारने की  धृष्टता , यह सब इसी रणनीति का हिस्सा था।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा दोनों ही इस रणनीति में उलझ कर रह गए। हमेशा   की तरह प्रधानमंत्री का भाषण ज्यादा ओजस्वी था मगर राहुल गांधी का आक्रामक अंदाज और “झप्पी“ ने सारी सुर्खियां बटोर लीं। कांग्रेस अब  आश्वस्त  लगती  है कि “भारत का पप्पू“ राजनीति की अग्नि परीक्षा में अव्वल अंकों से पास हो गया है। सहयोगी दलों ने  भी राहुल गांधी के लोकसभा के भाषण की जमकर तारीफ की है। उनके भाषण से भूकंप तो नहीं आया और न ही  प्रधानमंत्री को लोकसभा छोडनी पडी मगर उनके आरोपों से भाजपा बैकफुट पर आ गई और प्रधानमंत्री को विस्तार से जवाब देने पडे। राफेल डील को उछाल कर राहुल गांधी ने भाजपा से हिसाब चुकता कर दिया। अविश्वास  प्रस्ताव का मूल मकसद भी देश -दुनिया को भाजपा सरकार की “कारगुजारी“ का चिठ्ठा पढना था। राहुल गांधी के भाषण का ही असर था कि फ्रांस को राफेल डील पर फौरन  स्पष्टीकरण  देना पडा। और राहुल गांधी की “झप्पी“ का ही कमाल है कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों को अभी भी सफाई देनी पड रही है।  कांग्रेस और उसके सहयोगी दल यह बात अच्छी तरह जानते थे कि उनके पास सरकार के खिलाफ  अविश्वास  प्रस्ताव पारित करवाने के लिए बहुमत नहीं है। लोकसभा चुनाव से मात्र दस माह पहले सरकार गिराना मकसद था भी नहीं। सरकार को सेंसर करने के अलावा विपक्षी एकता की परीक्षा लेना भी कमसद था। अविश्वास  प्रस्ताव से यह तो साफ हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों का महागंठबधन बनाना मुश्किल  जरुर है मगर असंभव नहीं है। अविश्वास   प्रस्ताव के पक्ष में डाले गए 126 वोट इसी ओर इशारा करते है़ं। कांग्रेस के 48 और तेदपा के 16 के अलावा अधिकांश  विपक्षी दलों ने अविश्वास   प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाले । बहरहाल, समय गंवाए बगैर कांग्रेस अध्यक्ष ने महागठबंधन को लीड करने के लिए पोजिशनिंग करनी  शुरु कर दी है। रविवार को पार्टी की सर्वोच्च डिसीजन-मेकिंग बॉडी कांग्रेस  वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में इसकी झलक दिखाई दी।  सीडब्ल्यूसी ने पार्टी अध्यक्ष को किसी भी दल के साथ गठबंधन की पूरी छूट दे दी है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट  कर दिया है कि राहुल गांधी ही पार्टी की ओर से गठबंधन के फेस होंगे। राहुल गांधी की असली चुनौती भी यहीं से  शुरु होती है। बसपा सुप्रीमो  सुश्री मायावती, पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार अभी भी राहुल गांधी को गठबंधन का नेता मानने को तैयार नहीं है। बहुजन समाज पार्टी भाजपा और कांग्रेस के बाद देश  की तीसरी सबसे बडी पार्टी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा हालांकि एक भी सीट नहीं जीत पाई मगर भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा वोट बसपा को ही मिले थे।  उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव में बसपा को 22 फीसदी वोट मिले थे। बसपा-सपा के साथ महागठबंधन के बगैर  उतर प्रदेश  की 80 सीटों पर भाजपा को चुनौती नहीं दी जा सकती।  ममता बनर्जी  के बगैर पष्चिम बंगाल की 42 सीटों पर वाम दलों का सहयोग का  भी काम नहीं आएगा।  इस साल के अंत में होने वाले मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ के विधानसभा चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए बहुत मायने रखते हैं। अगर कांग्रेस इन तीनोॅ राज्यों में स्पष्ट  बहुमत हासिल कर लेती है, राहुल गांधी  का दावा और पुख्ता हो सकता है।       

सोमवार, 23 जुलाई 2018

जीएसटी का फंडा

जीएसटी (गुडस और सर्विसिस) काउंसिल ने एक बार फिर आम लोगों को बडी राहत दी है। शनिवार को कांउसिल की बैठक में 88 वस्तुओं पर जीएसटी कम कर दिया गया या हटा दिया। अब तक तीन बार जीएसटी रेट घटाए जा चुके हैं। 10 नवंबर, 2017 को 211 वस्तुओं पर से जीएसटी कम किया था और इन मेंसे 177 वस्तुओं को 28 फीसदी से 18 फीसदी टैक्स स्लैब में लाया गया था। इस साल 18 जनवरी को 29 वस्तुओं पर जीएसटी कम कर दिया गया था। ताजा राहत से अब तक 328 वस्तुओं और सेवाओं पर से जीएसटी कम किया जा चुका है। शनिवार को सैनिटरी  पैड और राखी को जीएसटी से पूरी तरह से मुक्त कर दिया गया है। सैनिटरी पैड पर अभी 12 फीसदी जीएसटी लगाया जाता है। महिलाएं इसका मुखर विरोध कर रही थी।  सैनिटरी पैड पर जीएसटी के विरोध में जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) की एक छात्रा ने दिल्ली हाई कोर्ट  में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया है कि अगर काजल,  बिंदी, सिंदूर और कंडोम जैसी चीजों को जीएसटी से मुक्त रखा ज सकता है, तो सैनिटरी पैड को क्यों नहीं? इस याचिका पर पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने  31 सदस्यीय जीएसटी काउंसिल में एक भी महिला के नहीं होने पर हैरानी जताई थी। हाई कोर्ट  ने यह भी कहा था कि महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड जैसी जरुरी वस्तु पर जीएसटी लगाने का कोई औचित्य नहीं है।  सैनिटरी पैड  पर जीएसटी को लेकर बंबई हाईकोर्ट  में भी सुनवाई चल रही है। केन्द्र सरकार की अपील पर मामला दिल्ली हाई कोर्ट  से सुप्रीम कोर्ट  को ट्रांसफर कर दिया गया था और कोर्ट  ने इस पर स्टे लगा दिया था। महिलाओं से जुडे संगठनों का तर्क  है कि सैनिटरी पैड महिलाओं के लिए जीवनरक्षक दवा की तरह है। शहरों में 78 फीसदी और ग्रामीण क्षेत्रों में 48.5 फीसदी  महिलाओं सैनिटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं.। बहरहाल, भारत में  चार दरों के कारण जीएसटी  आम आदमी  के पल्ले नहीं पड रहा है। एक हजार से भी ज्यादा वस्तुएं और सेवाएं हैं और किस वस्तु पर कितना जीएसटी है, इसे याद रखना आम तो क्या खास के बूते की बात नहीं है। चार-चार दरों की स्थिति में ंउपभोक्ताओं को आसानी से चूना लगाया जा सकता है। प्रॉफिट मार्जिन और प्राइस लिस्ट  डिसप्ले का मामला  ही लिया जाए।   नियमानुसार, किस वस्तु अथवा सेवा पर कितना अधिक्तम प्रॉफिट लिया जान चाहिए, इसकी बाकायदा सीमा तय है। मगर व्यापारी इस नियम के बावजूद मनमाना प्रॉफिट वसूलते हैं। परचून और फल-सब्जियों की दुकानों पर रेट लिस्ट लगाना अनिवार्य  है मगर इसका भी संजीदगी से पालन नहीं किया जाता। खरीदारी के अधिकतर मामलों में बिल लिया या दिया ही  नहीं जाता। इस स्थिति में कितना जीएसटी वसूला जा रहा है, इसका अनुमान लगाना भी मुमकिन नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी  सिंगापुर की ही तरह जीएसटी की एक दर के पक्ष में है मगर सरकार यह कहकर इस मांग को खारिज करती रही है कि भारत की स्थिति सिंगापुर जैसी नहीं है जहां लोगों की पेइंग क्षमता में ज्यादा अंतर नहीं है मगर भारत में बहुत बडा अंतर है। सरकार के अपने ही स्टैंड में अकसर विरोधाभास होता है। सैनिटरी पैड को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने पर सरकार का तर्क था कि इससे छोटी कंपनियों पर बुरा असर पडेगा और बाजाार चीनी उत्पादों से भर जाएगा। बहरहाल, आए दिन जीएसटी रेट घटाने से अच्छा है कि एक या दो दरें लगाईं जाएं और पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। 

रविवार, 22 जुलाई 2018

सात दशक में एक अदद सडक भी नहीं मिली

सडकें हिमाचल प्रदेश  की जीवन रेखा है। सडक नहीं तो जीना  दुश्वार  हो जाता है। मगर बाबुओं को यह बात समझ में नहीं आती है। और दुखद स्थिति यह है कि स्वंय को “विकास पुरुष “ कहने वाले नेता भी नौकरशाही के समक्ष बेबस है। दस साल से ज्यादा समय से हम अपने गांव नावी के लिए सडक मार्ग  से जोडने के लिए जूझ रहे हैं। यह गांव  शिमला ग्रामीण हलके में पडता है। पिछली बार मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह इस हलके के नुमाइंदे थे और अब  उनके पुत्र विक्रमादित्य इस हलके से चुने गए हैं। दस साल गुजर गए हैं मगर इस सडक को लेकर बाबुओं की फाइलों में ऑब्जेक्शन दर   ऑब्जेक्शन    लग रहे हैं। 2008 में हमने अपने पैसे से चार किलोमीटर कच्ची का निर्माण किया था। गांववालों मे जमीन दी। मगर इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ। सरकार ने आगे के गांच को जोडकर एक योजना तो बनाई है मगर यह कागजों की धूल फांक रही है। वीरभद्र सिंह अक्सर कहते कि विकास कार्य  के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं मगर उन्होंने पांच साल गुजार लिए न तो कभी इस गांव का दौरा किया और न ही इस सडक के  लिए कुछ किया। कई चिठ्ठियां लिखीं। जवाब तक नहीं आया। एक बार दो साल बाद एक चिठठी आई जिसके टॉप पर लिखा था “ दस दिन के भीतर  शिकायतों का समाधान“ और इस  चिठठी में लिखा था, मामला अगली कार्रवाई के लिए प्रेषित किया जा रहा है।  आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आजादी के सात दशक बाद भी नावी गांव को सडक तक नहीं मिल पाई है। लोग तो यही कहेंगे लानत है ऐसी आजादी पर और ऐसी सरकार पर जो सात दशकों में भी सडक की सुविधा नहीं दे पाए ?  नई सरकार को भी छह महीने से ज्यादा का समय हो  गया है मगर फाइल तक नहीं हिली। लोगों को यह बात कब समझ में आएगी कि सरकार बदलने से कुछ नहीं होगा। सचिवालय और विधानसभा में सीटों की अदला-बदली सिस्टम को नहीं बदल सकती। वही नौकरशाही और वही लालफीताशाही। जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बन गए और अब वीरभद्र सिंह की जगह  सुरक्षाकर्मियों और बाबुओं ने इन्हे  घेर लिया है। आम आदमी अब वीरभद्र से आसानी  से मिल सकता है, जयराम से नहीं।  मुख्यमंत्री वही करेंगे और सुनेगें जो उनके नौकरशाह सलाहकार कहेंगे। कर्ज  लेकर पांच साल गुजार लेंगे। और कर्ज  में डुबे बेहाल राज्य को अगली सरकार के लिए छोड देंगे। साहिब सिंह वर्मा  जब नब्बे के दशक में दिल्ली के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने खुद नौकरशाही के इशारों पर काम करने की  विवशता स्वीकारी की थी। नौकरशाह कितने ताकतवर होते है जनाब अरविंद केजरीवाल इसके भुगतभोगी है। सिस्टम में बदलाव एक पार्टी की सरकार को नकार और दूसरी को  चुनकर नहीं होगा। समकालीन राजनीति में सभी दल एक ही थैली के चटटे-बट्टे हैं। सिस्टम को ही बदलना होगा , वरना जलते-भुनते, पिसते रहिएगा।

जख्मों पर नमक छिडकना

कठुआ बलात्कार मामले के  डिंफेस वकील को जम्मू-कश्मीर  सरकार द्वारा एडिशनल एडवोकेट जनरल बनाए जाने से आतंकी हिंसा से पीडित राज्य में सियासत गरमा गई है। इस साल अप्रैल में जम्मू के कठुआ में 8 वर्षीय  मासूम बालिका की कई दिनों तक बलात्कार किए जाने के बाद  नृशंस हत्या कर दी गई थी। बलात्कार मामले में आरोपी के वकील को सरकारी ओहदा दिए जाने से राजनीतिक दलों को सियासी रोटियां सेंकने का अवसर मिल गया है। एक तरह से यह पीडित परिजनों के जख्मों पर नमक छिडकने जैसा है।  भाजपा द्वारा महबूबा मुफ्ती की सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद 19 जून, 2018 को राज्य में राज्यपाल  शासन लगा दिया गया था। सरकार के ताजा फैसले की सबसे तीखी नुक्ताचीनी पूर्व  मुख्यमंत्री और भाजपा की सहयोगी रही महबूबा मुफ्ती ने की है। ज्यादातर  लोग  मेहबूबा के  इस  ट्वीट   सहमत  होंगे  कि अंतरराष्ट्रीय  न्याय दिवस के एक दिन बाद बलात्कार अभियुक्त के वकील को एडिनशनल एडवोकेट जनरल नियुक्त करने से देश  में रेप कल्चर को ही बढावा मिलेगा। पीडीपी-भाजपा सरकार के अपदस्थ हो जाने के बाद राज्य सरकार  ने सरकारी वकीलों की नई नियुक्तियां की है। इसी क्रम में 19 जुलाई को जम्मू-कष्मीर हाई कोर्ट  के जम्मू विंग 16 वकीलों को   एडिषनल एडवोकेट जनरल (एएजी)  लगाया गया है। कठुआ बलात्कार मामले में अभियुक्त के वकील को भी बतौर एएजी नियुक्त किया गया है। विपक्षी दलों ने इस नियुक्त पर खासा बवाल खडा किया है।  आम परिस्थितियों में किसी वकील को सरकारी वकील बनाने पर कोई बवाल खडा नहीं होता है। हर सरकार अथवा प्रषासन सरकारी मामलों की पैरवी के लिए  अपनी पसंद के वकीलों को नियुक्त करती है और यह प्रशासन का विशेषाधिकार भी है। वकीलों को अभियुक्तों की पैरवी करना भी नैसर्गिक न्याय का हिस्सा है और किसी वकील को इस बिला पर प्रताडित नहीं किया जा सकता है कि वह बलात्कार के आरोपी की पैरवी करता रहा है। इस तरह की स्थिति में त्वरित न्याय प्रकिया बाधित हो सकती है। मगर एक सच यह भी है कि वकीलों ने बालिकाओं के बलात्कार जैसे अमानवीय अपराध के अभियुक्तों का मुकदमा न लडने का साहस भी दिखाया है। तीन दिन पहले चैन्नई के वकीलों ने 11 वर्षीय  मूक -बघिर बालिका के बलात्कार के आरोपियों की  कोर्ट परिसर में पिटाई कर दी थी। मद्रास हाईकोर्ट बार एशोसिएश न ने बाकायदा प्रस्ताव पारित करके अपने सदस्यों को आरोपियों की पैरवी नहीं करने के निर्देश  दिएहैं। निर्भय गैंग रेप मामले में भी दिल्ली की साकेत कोर्ट के वकीलों ने आरोपियों का बॉयकॉट  किया था और 2500 वकीलों मेंसे किसी ने भी बलात्कार के आरोपियों की पैरवी नहीं की। कठुआ बलात्कार मामला उतना ही जघन्य और अमानवीय है जितने निर्भय और चैन्नई मूक-बघिर बलात्कार मामले। सच यह है कि कठुआ बलात्कार मामले में पीडित परिवार को न्याय मांगने की बजाए राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम चरम पर रहा है। आठ साल की बालिका के बलात्कार को भी राज्य के कटटरपंथी  संगठनों ने साम्प्रदायिक रंगत देने में कोई कसर नहीं छोडी। यहां तक कि भाजपा के दो मंत्रियों समेत भगवा संगठनों के नेताओं ने बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में  रैलियां तक की। कठुआ मामले की संवेदनशीलता का ख्याल करते हुए सुप्रीम कोर्ट  को इसकी सुनवाई राज्य से बाहर पंजाब के पठानकोट में शिफ्ट करनी पडी। शीर्ष  अदालत इस केस की सुनवाई को खुद मॉनिटर कर रही है।  बलात्कार जैसे संवेदनशील  मामले में राजनीतिक रोटियां सेंकना बेहद दुखद है। ठीक उसी तरह जैसे संविधान के अनुच्छेद 370 को राजनीतिक फायदे के लिए भुनाना । सत्ता से बाहर आते ही जम्मू में भाजपाइयों ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की मांग फिर से उठानी  शुरु कर दी है। इससे जम्मू-कश्मीर  में हिंसा और ज्यादा भडक सकती है और अलगाववादी ताकतों को बल मिल सकता है। कश्मीर  में  जिस तरह से  हालात बिगडते जा रहे हैं, उसके दृष्टिगत  फिरकू मांगों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।  राजनीतिक हित  राष्ट्र  हित से ज्यादा अहम नहीं हो सकते हैं। 

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

क्षेत्रीय दल की प्रासंगिकता

राश्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय नेताओं की  तुलना मे रीजनल स्तर के दल राज्य हित में बेहतर काम करते हैं। राश्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय नेताओं को स्वतंत्र् निर्णय लेने की अपेक्षाकृत उतनी छूट नहीं होती जितनी चेत्रीय दलों के नेताओं को। डाक्टर आई एस परमार से लेकर वीरभद्र सिंह षाता कुमार, प्रेम कुमार धूमल से लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर सार्वजनिक तौर पर भले ही न मानें, मगर ये सभी इस पीडा को झेल चुके हैं अथवा झेल रहे हैं। छोटे से छोटे फैसले के लिए हाई कमान की मजूरी के लिए दिल्ली दौडना और फिर महीनों तक आला कमान के फैसले का इंतजार में हाथ मलते रहना। दिल्ली में  वातानुकूलित कमरों में बैठकर  क्षेत्रीय हितों को सर्व करना तो दूर, इनकी सही-सही पहचान तक नहीं की जा सकती। कांग्रेस नेहरु परिवार के हिमाचल प्रदेष के प्रति उदार रवैए पर बहुत इतराती है मगर हिमाचल को जम्मू-कष्मीर की तुलना में बहुत कम उदार सहायता मिलती रही है। हिमाचल निर्माता डाक्टर परमार नेहरु परिवार के करीब थे,इसके बावजूद उन्हें हिमाचल के बृह्द और स्वतंत्र स्वरुप के लिए काफी मषक्कत करनी पडी। आजादी के बाद से हिमाचल प्रदेष को पूर्वोतर भारत और जम्मू-कष्मीर की तरह  उदार केन्द्रीय सहायता नहीं मिल पाई। इस राज्य के षांतिप्रिय लोगों के धैर्य और देषभक्ति की बार-बार परीक्षा ली गई। बच्चा जब तक रोता नहीं है, मां भी उसे दूध नहीं पिलाती। मेरा मानना है कि हिमाचल को राश्ट्रीय परिपेक्ष्य में इसलिए तवज्जो नहीं दी गई कि यहां से लोकसभा की चार सीटें है, अलबता इसलिए कि यह प्रदेष अपेक्षाकृत षांातमय रहा है और इस प्रदेष के लोगों में वह क्षेत्रीय जज्बा नहीं है जो कष्मीर, पंजाब अथवा पूर्वोतर राज्यों में है।  70 के दषक में  हिमाचल में लोकराज पार्टी नाम का एक क्षेत्रीय दल हुआ करता था। ठाकुर सेन नेगी इसके नेता थे। नेगी कबायली  किन्नौर जिले स सबंधित हिमाचल के पहले मुख्य सचिव बने। जमीन से जुडे हुए नेता थे और किन्नौर जिले में उनका खासा दबदबा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डाक्टर परमार के घुर विरोधी। एक बार डाक्टर परमार को चुनौती दी थी कि “ंमैं तो मुख्यमंत्री बन सकता हूं मगर आप मुख्य सचिव नहीं बन सकते। मगर विपक्ष का नेता होते भी ठेठ नौकरषाह ही रह गए। ताउम्र अविवाहित रहे। सुबह दस बजे तैयार होकर विधानसभा परिसर स्थित अपने दफ्तर पहुंच जाते, दिन में घर से बना खाना वहीं खाते और थोडी देर के लिए जरुर सुस्ताते। पांच बजे नहीं कि घर लौट जाते। फिर खास को छोड्कर किसी से नहीं मिलते। उनकी यह कार्यषैली उन्हे किन्नौर से बाहरं लोकप्रिय नेता नहीं बन पाई। नेगी की तुलना में पार्टी के एक और नेता हीरा सिंह पाल ज्यादा लोकप्रिय थे मगर वे भी अपने हलके से बाहर नहीं निकल पाए। मेरा इस पार्टी से इतना नाता था कि तब में पार्टी के साप्ताहिक मुखपत्र में नौकरी करता था। अक्सर मुझे पार्टी की बैठकों में कवरेज के लिए बुलाया जाता। तब तो मुझे अहसास नहीं हुआ मगर बाद में लगा इस पार्टी में अन्य दलों से कही ज्यादा स्वंत्रतता थी। हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा  होती और हर सदस्य को बोलने का पूरा-पूरा अवसर दिया जाता। पार्टी का राजनीतिक दर्षन भी कांग्रेस से बेहतर था। इस पार्टी को सत्ता में आने का मौका मिलता तो हिमाचल की तस्वीर कुछ और होती। बहरहाल, बाद में पार्टी बिखर गई। तब से आज तक हिमाचल में कोई क्षेेत्रीय दल नहीं उभर पाया। राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने हिमाचल में अपना जनाधार तेजी से फैलाया है। हिमाचल में हिंदुओं का बोलबाला है और इस राज्य को देवभूमि कहा जाता है, आरएसएस के फ्रेमवर्क में हिमाचल की यह छवि एकदम फिट बैठती है। और यह जनाधार किसी चेत्रीय दल को उभरने ही नहीं देगा। हां, कालांतर में अगर कांग्रेस टूटती है, तो क्षत्रप पनप सकते हैं। बहरहाल, देवभूमि के लिए आज भी क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है। इससे  क्षेत्रीय नेताओं की बार-बार की दिल्ली दौड से निजात मिल जाएगी और हर फैसले के लिए हाई कमान पर निर्भरता भी खत्म हो जाएगी। हरियाणा में बंसीलाल की क्षेत्रीय पार्टी की सरकार में जितना विकास हुआ, उतना आज तक कभी नहीं हुआ।  अकाली दल सरकार पंजाब को और ज्यादा खुषाहल बना सकती थी अगर अकाली निजी हितों से ज्यादा क्षेत्रीय हितों को तरजीह देते।        

The Relevance Of Regional Party In a Hill Sate Of Himachal Pradesh

राष्ट्रीय  स्तर के राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय नेताओं की  तुलना मे रीजनल स्तर के दल राज्य हित में बेहतर काम करते हैं। राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय नेताओं को स्वतंत्र् निर्णय लेने की अपेक्षाकृत उतनी छूट नहीं होती जितनी क्षेत्रीय दलों के नेताओं को। डाक्टर वाई एस परमार से लेकर वीरभद्र सिंह, शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल से लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर सार्वजनिक तौर पर भले ही न मानें, मगर ये सभी इस पीडा को झेल चुके हैं अथवा झेल रहे हैं। छोटे से छोटे फैसले के लिए हाई कमान की मजूरी के लिए दिल्ली दौडना और फिर महीनों तक आला कमान  फैसले के  इंतजार में हाथ मलते रहना। दिल्ली  का दखल इतना कि  प्रियंका   को  सीलिंग से कहीं ज्यादा  जमीन  खरीदने  की  रातोंरात परमिशन दे दी जाती मगर आमा हिमाचली का आग्रह ठुकरा दिया जाता।   दिल्ली में  वातानुकूलित कमरों में बैठकर  क्षेत्रीय हितों को सर्व करना तो दूर, इनकी सही-सही पहचान तक नहीं की जा सकती। कांग्रेस नेहरु परिवार के हिमाचल प्रदेश  के प्रति उदार रवैए पर बहुत इतराती है मगर हिमाचल को जम्मू-कश्मीर  की तुलना में बहुत कम उदार सहायता मिलती रही है। हिमाचल निर्माता डाक्टर परमार नेहरु परिवार के करीब थे, इसके बावजूद उन्हें हिमाचल के बृह्द और स्वतंत्र स्वरुप के लिए काफी मषक्कत करनी पडी थी । आजादी के बाद से हिमाचल प्रदेश  को पूर्वोतर भारत और जम्मू-कश्मीर  की तरह  उदार केन्द्रीय सहायता नहीं मिल पाई। इस राज्य के षांतिप्रिय लोगों के धैर्य और देशभक्ति की बार-बार परीक्षा ली गई। बच्चा जब तक रोता नहीं है, मां भी उसे दूध नहीं पिलाती। मेरा मानना है कि हिमाचल को राष्ट्रीय  परिपेक्ष्य में इसलिए तवज्जो नहीं दी गई कि यहां से लोकसभा की मात्र चार सीटें है, अलबता इसलिए कि यह  प्रदेश  राष्ट्रीय मुख्यधारा  मैं  जी-जान से जुटा  रहा है और इस प्रदेश  के लोगों में वह क्षेत्रीय जज्बा नहीं है जो कश्मीर , पंजाब अथवा पूर्वोतर राज्यों में है।  70 के दशक में  हिमाचल में लोकराज पार्टी नाम का एक क्षेत्रीय दल हुआ करता था। यहाँ पार्टी  स्थानीय  मुद्दों  पर फोकस्ड  रही है ।  ठाकुर सेन नेगी इसके नेता थे। नेगी कबायली  किन्नौर जिले से  सबंधित हिमाचल के पहले मुख्य सचिव बने। जमीन से जुडे हुए  अफसर  थे और किन्नौर जिले में उनका खासा दबदबा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डाक्टर परमार के घुर विरोधी। उनका मानना था की कॉग्रेस के नेता अपने सियासी हित साधने   को  ज्यादा  प्राथमिकता  देते  हैं । एक बार उन्होंने डाक्टर परमार को चुनौती दी थी कि “ंमैं तो मुख्यमंत्री बन सकता हूं मगर आप मुख्य सचिव नहीं बन सकते"। मगर विपक्ष का नेता होते भी ठेठ नौकरशाह ही रह गए। ताउम्र अविवाहित रहे। सुबह दस बजे तैयार होकर विधानसभा परिसर स्थित अपने दफ्तर पहुंच जाते, दिन में घर से बना खाना वहीं खाते और थोडी देर के लिए जरुर सुस्ताते। पांच बजे नहीं कि घर लौट जाते। फिर खास को छोड्कर किसी से नहीं मिलते। उनकी यह कार्यशैली उन्हे किन्नौर से बाहरं लोकप्रिय नेता नहीं बना  पाई। नेगी की तुलना में पार्टी के एक और नेता हीरा सिंह पाल ज्यादा लोकप्रिय थे मगर वे भी अपने हलके से बाहर नहीं निकल पाए। मेरा इस पार्टी से इतना नाता था कि तब में पार्टी के साप्ताहिक मुखपत्र में नौकरी करता था। अक्सर मुझे पार्टी की बैठकों में कवरेज के लिए बुलाया जाता। तब तो मुझे अहसास नहीं हुआ मगर बाद में लगा इस पार्टी में अन्य दलों से कही ज्यादा स्वंत्रतता थी। हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा  होती और हर सदस्य को बोलने का पूरा-पूरा अवसर दिया जाता। पार्टी का राजनीतिक  दर्शन  भी कांग्रेस से बेहतर था। इस पार्टी को सत्ता में आने का मौका मिलता तो हिमाचल की तस्वीर कुछ और होती। बहरहाल, बाद में पार्टी बिखर गई। तब से आज तक हिमाचल में कोई क्षेेत्रीय दल नहीं उभर पाया। राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ ने हिमाचल में अपना जनाधार तेजी से फैलाया है। हिमाचल में हिंदुओं का बोलबाला है और इस राज्य को देवभूमि कहा जाता है, आरएसएस के फ्रेमवर्क में हिमाचल की यह छवि एकदम फिट बैठती है। और यह जनाधार किसी क्षेत्रीय दल को उभरने ही नहीं देगा। हां, कालांतर में अगर कांग्रेस टूटती है, तो क्षत्रप पनप सकते हैं। बहरहाल, देवभूमि के लिए आज भी क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है। इससे  क्षेत्रीय नेताओं की बार-बार की दिल्ली दौड से निजात मिल जाएगी और हर फैसले के लिए हाई कमान पर निर्भरता भी खत्म हो जाएगी। हरियाणा में बंसीलाल की क्षेत्रीय पार्टी की सरकार में जितना विकास हुआ, उतना आज तक कभी नहीं हुआ।  अकाली दल सरकार पंजाब को और ज्यादा खुशाहल बना सकती थी अगर अकाली निजी हितों से ज्यादा क्षेत्रीय हितों को तरजीह देते।        

मांगा सहयोग, मिला “अविश्वास'


मौजूदा लोकसभा (16वीं) के अंतिम  मानसून सत्र में प्रधानमंत्री ने सहयोग मांगा था मगर विपक्ष ने सरकार के खिलाफ अविश्वास  प्रस्ताव पेश  करके अपने “असहयोगी“ रुख की बानगी प्रस्तुत की है। प्रधानमंत्री ने संसद का सत्र शुरु होने से ठीक पहले सदन की कार्यवाही सुचारु रुप से चलाने के लिए विपक्ष से हाथ जोडकर सहयोग मांगा था। अविश्वास  प्रस्ताव पेश  करने वाली तेलुगू देशम पार्टी (तेदपा) और कांग्रेस यह बात अच्छी तरह जानती है कि  उनके पास सरकार को गिराने के लिए दूर-दूर तक पर्याप्त समर्थन नहीं है मगर इसके बावजूद पहली बार लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास  प्रस्ताव पेश   हो  गया है। शुक्रवार को सदन में इस पर चर्चा होगी और जरुरत पडी तो वोटिंग भी। इस साल मार्च में भी तेदपा और वाम दलों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था मगर लोकसभा में लगातार भारी हंगामे के बीच प्रस्ताव दब कर रह गया। नियमानुसार लोकसभा में अविश्वास  प्रस्ताव पेश  करने के लिए कम-से-कम 50 सदस्य की जरुरत होती है और इस प्रस्ताव को पेष करते समय अधय्क्ष को 50 सदस्यों के समर्थन का भरोसा होना चाहिए। हंगामे की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता।  अविश्वास प्रस्ताव लाने वाला  तेलुगू देशम पार्टी इस साल मार्च  में आंध्र प्रदेश  को स्पेशल  पैकेज नहीं मिलने से क्षुब्ध होकर राजग छोड दिया था। वैसे आंध्र प्रदेश  को अगर  स्पेशल  पैकेज मिल जाए, तो  चंद्रबाबू नायडूु फिर से राजग में  शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस आंध्र प्रदेश  में तेदपा की प्रमुख प्रतिद्धंद्धी है जबकि भाजपा उसकी राज्य में भी सहयोगी पार्टी रही है। कांग्रेस समेत प्रतिद्धद्धियों को पछाडने के लिए ही चंद्रबाबू नायडू राज्य के लिए  स्पेशल  पैकेज की मांग कर रहे हैं। उन्हें भाजपा सरकार से काफी उम्मीदें भी थी मगर जब उन्हें लगा मोदी सरकार से कुछ मिलने वाला नहीं है, उनके पास राजग से बाहर आने के सिवा कोई चारा नहीं था। इतना तो तय है कि समूचा विपक्ष एकजुट हो  जाए तो भी  अविश्वास  प्रस्ताव पारित होने की कोई संभावना  नहीं  है। 545 सदस्यीय लोकसभा में इस समय 9 सीटें खाली है़ और इस समय 536 सदस्य हैं। इस हिसाब से सरकार के खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव पारित करवाने के लिए कम-से-कम 269 सांसदों का समर्थन चाहिए। विपक्ष का पूरा कुनबा जोडकर भी संप्रग के 64 और अन्य दलों के 157 समेत 221 सदस्य का ही समर्थन है। लोकसभा में तीसरी सबसे बडी पार्टी अन्नाद्रमुक के 37 सदस्य विपक्ष का साथ देंगे, इस पर संदेह है। भाजपा के लोकसभा में 272 सांसद है और सहयोगी दलों को मिलाकर 311 सद्स्य। इस गणित के दृष्टिगत  स्पष्ट  है कि अविश्वास प्रस्ताव पारित होने से रहा। फिर इसे पेश  करने का क्या औचित्य है? यह जरुरी नहीं है कि अविश्वास  प्रस्ताव सरकार गिराने के मकसद से ही पेश  किया जाए। प्रख्यात अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर के अनुसार सरकार की मौजूदा नीतियों कार्यक्रमों और कार्यशैली में अगर जनता का विश्वास  न हो तो अविश्वास  प्रस्ताव से इसे प्रमुखता से सामने लाया जा सकता है। भारत में भी विपक्ष इसी मकसद से इसे लोकसभा में पेश  करती रही है। अविश्वास प्रस्ताव राज्यसभा में पेश  नहीं किया जा सकता। आजादी के लगभग 15 साल बाद 1963 में पहली बार लोकसभा में अविश्वास  प्रस्ताव पेश  किया था। सबसे ज्यादा 15 प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ पेश  किए गए हैं। 1993 में नरसिम्हा राव सरकार अविष्वास प्रस्ताव से गिरते-गिरते बच गई थी। तब उनकी सरकार पर झारखंड मुक्ति मोर्चे के सांसदों के समर्थन खरीदने के आरोप लगे थे।  1999 में एक वोट से हारने पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को अपद्स्थ होना पडा था। भारतीय संसद के इतिहास में यह सबसे रोमांचक क्षण थे। 1996 में विश्वास  मत प्रस्ताव पर मत विभाजन से पह्ले ही वाजपेयी सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। क्या इस बार इतिहास स्वंय को दोहरा पाएगा?   

गुरुवार, 19 जुलाई 2018

लिंचिंगः पैशाची मानसिकता


लोकतंत्र के स्तंभ भारत में कभी गोरक्षा तो कभी चाइल्ड किडनैंपिंग और कभी यौन हिंसा से गुस्साई भीड को किसी की हत्या करने की छूट नहीं दी सकती। जिस देश  में “अहिंसा परमो धर्म“ का पालन किया जाता रहा हो और दुनिया  जिस देश को  शांति  और अहिंसा के संदेशवाहक  गौतम बुद्ध, महावीर और महात्मा गांधी की कर्मभूमि मानती हो, उस देश  में  पैशाची मानसिकता के लिए कोई जगह नहीं हो सकती। फिर ऐसा क्यों हो रहा है जिससे पूरी दुनिया में हमारा सिर शर्म  से झुक रहा है। देश  की शीर्ष  अदालत भी लिंचिग की बढती घटनाओं से विचलित है। कोई भी धर्म और समाज  गोरक्षा के लिए इंसान की हत्या करने की अनुमति नहीं देता है। भीडतंत्र की पैशाची मानसिकता को देश  का कानून रौंदने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हिंसा का वातावरण देश में सामुदायिक सदभाव और  भाईचारे को तहस-नहस कर देगा। सभ्य समाज  सामाजिक विद्धेष  और साम्प्रदायिकता को जरा भी  बर्दाश्त  नहीं कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को लिंचिंग की कडी भर्त्सना करते हुए केन्द्र और राज्यों की सरकार को साफ-साफ शब्दों में कहा है कि इसे रोकना सरकार का दायित्व है। लिचिंग जैसी  पैशाची  हिंसा को  कानून-व्यवस्था का मामला बताकर सरकार अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से भाग नही सकती । भारत में हर नागरिक को सम्मान से जीने का अधिकार है और कोई भी दूसरा व्यक्ति इसे छीन नहीं सकता। कोर्ट  ने लिंचिंग रोकने के लिए दिशा -निर्देश  जारी करते हुए राज्यों को इन्हें लागू करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। साथ ही केन्द्र से कहा है कि  लिंचिंग के दोषियों को सख्त-से-सख्त सजा देने के लिए कानून बनाने की पहल भी होनी चाहिए। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में फिलहाल लिंचिंग जैस संगीन अपराध के लिए कोई स्पष्ट  प्रावधान नहीं है। कोडिफाइड लॉ नहीं होने से दोषी बच निकलते  हैं। सीआरपीसी (क्रिमिनल प्रोसिजर कोड) की धारा 223ए के तहत दोषियों पर मामला दर्ज तो किया जा सकता है मगर यह अपर्याप्त साबित हुआ है।  बहरहाल, सबसे बडा सवाल यह है कि कानून और व्यवस्था को अपने हाथ में लेने वाले और गो रक्षा के नाम पर इंसान की हत्या करने वाले “ उपद्रवियों“ को क्या  सरकार रोक पाएगी? मंगलवार को सुप्रीप कोर्ट  के दिशा -निर्देश  के महज तीन घंटे बाद भाजपा  शासित झारखंड में भगवा कार्यकर्ताओं ने 80 वर्षीय  आर्य समाज के नेता स्वामी अग्निवेश  की लातों, घूंसों से पिटाई के बाद उन पर ईंट और पत्थर तक फेंके। इस देष में असहिश्णुता ने सारी हदें पार कर ली है। मंगलवार को ही एक न्यूज चैनल के लाइव कार्यक्रम में एक ंमौलवी ने महिला पैनेलिस्ट वकील से मारपीट तक कर डाली। दो दिन पहले (14 जुलाई को)  कर्नाटक में बिदर जिले के मुरकी गांव में भीड ने एक युवक को बच्चा चोर समझ कर मार डाला। पीडित मदद के लिए चिल्लाता रहा मगर भीड के सामने पुलिस भी उसकी मदद नहीं कर पाई। इंडियास्पेंड कंटेंट के अनुसार 2010 से 2017 के बीच हुए 63 लिंचिंग मामलों में 80 फीसदी से अधिक मुसलमानों को निषाना बनाया गया है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से लिचिंग के मामले बढे हैं और इन 63 मामलों मेंसे आधे से ज्यादा भाजपा षासित राज्यों से संबंधित हैं। लिंचिंग में मारे गए 28 लोगों में 24 मुस्लिम समुदाय से हैं। लिंचिंग की 54 फीसदी घटनाएं अफवाहों पर आधारित थी। एमनेस्टी इंटरनेश ल की ताजा रिपोर्ट  के अनुसार 2018 के पहके छह माह में सबसे ज्यादा हैट क्राइम के 100 मामले  उत्तर प्रदेश  और उसके बाद गुजरात में सामने आए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी लिंचिंग की कडे शब्दों में भर्त्सना कर चुके हैं मगर उपद्रवी किसी की सुनने को तैयार नहीं है। इन उपद्रवियों से निपटने के लिए सख्त कानून बनाने की जरुरत है।   

बुधवार, 18 जुलाई 2018

रिश्तों की मिठास

फेसबुक पर भक्ति भाई का मुस्कराता चेहरा देखकर दिल बाग-बाग हो गया। भाभी  के अकस्मात निधन के बाद जिस तरह से भक्ति भाई ने खुद को संभाला , वह अनुकर्णीय है। भाभी जी बेहद मिलनसार और मृदभाषी  थी्। भक्ति भाई की ही तरह कठिन से कठिन समय में मुस्कराते रहना भाभी का स्वभाव था। उनका मुस्कराता चेहरा आज भी उनकी याद दिलाता है । दिल्ली में  पले और  शिक्षा ग्रहण करने के  बावजूद एकदम सरल और  निश्छल  । मुझे इस बात का शेष जीवन भर अफसोस रहेगा कि मैं अंतिम समय भाभी का आशीर्वाद  नहीं ले पाया। पिछली बार ओम प्रकाश  की बेटी के ब्याह पर मुलाकात हुई थी और भाभी ने मुझसे शिकायत की थी कि अब पहले जैसा मिलना-जुलना क्यों नहीं रहा। 90 में  शिमला क्या छोडा, दोबारा 2003-2004 में कुछ समय के लिए  लौट पाया। भास्कर ने मेरी  शिमला में  पोस्टिंग  की थी। मगर काम की व्यस्तता से रिश्तेदारों  से ज्यादा मिलना-जुलना नहीं हो पाया। परिवार चंडीगढ ही था, इसलिए जब भी थोडा वक्त मिलता, परिवार से मिलने वहां चला जाता।  भाभी की ही तरह हंसते रहना भक्ति भाई की  शक्ति रही है। दोनों एक-दूसरे के लिए बने थे।  हम बचपन से साथ-साथ रहे। एक साथ रहते, खाते-पीते और घूमते-फिरते। ताई जी को जब कभी भक्ति भाई को ढूंढना होता, हमारे घर पर आवाज लगाते। मेरा घर, भक्ति मुख्य गांव से हटकर  थोडा फासले पर स्थिति था।  यूनिवर्सिटी  तक की पढाई साथ-साथ की। मैं और ओम प्रकाष (भक्ति के छोटे भाई) एमए और बाद में एम.फिल के छात्र थे, भक्ति भाई इवनिंग में कानून की पढाई करते। दिन को नौकरी करते।  यूनिवर्सिटी की पढाई के लिए मुझे भक्ति भाई ने बहुत बडा सहारा दिया। उनकी सहायता के बगैर मैं पढाई नहीं कर पाता।  तब भी मैं अखबार की  नौकरी करता, मगर बीच-बीच में नौकरी चली जाती , तब भक्ति भाई हाथ थामते। मेरा कोई सगा बडा भाई नहीं है मगर भक्ति भाई ने मुझे कभी इस कमी को खलने नहीं दिया। मेरी छोटी बहन स्वरुपा से भक्ति भाई और भाभी को बडा लगाव था। स्वरुपा की कम उम्र में निधन ने हम सब को तोड कर रख दिया था। जीवन संघर्ष   का दूसरा पर्याय है। सुख-दुख, आते जाते रहते है मगर इनसे जीना छोड नहीं जा सकता। समय सबसे बडा हीलर है और गहरे से गहरे जख्म को भी भर देता है। बचपन के वो दिन बहुत याद आते हैं जब मैं, भक्ति भाई और ओम प्रकाश  हर समय साथ-साथ रहते।  छोटा शिमला के डिक्सी लॉज, जहां हमारा निवास था, से बहुत सी यादें जुडी हैं। बरसात में छत से लगातार पानी टपकने के बावजूद हम तौनों इसे खुब इंजॉय करते। स्टोव में मिट्टी का तेल (घासलेट) खत्म हो जाने पर हमें भूखा रहना पडता मगर जरा भी बुरा नहीं लगता। हम तीनो साथ-साथ हों तो कोई भी कठिन परिस्थिति हमें विचलित नहीं करती। काश , वे दिन फीर लौट आते! भक्ति भाई की दीर्घ आयु की हार्दिक कामना।

सिखों से अमानवीय बर्ताव

अमेरिका के ओरेगॉन प्रांत की जेल में बंद 53 भारतीय अप्रवासियों से खूंखार अपराधियों जैसा सलूक  दुनिया के सबसे ताकतवर और लोकतांत्रिक मुल्क को षोभा नहीं देता है। इन मेंसे अधिकतर सिख हैं और इनका कसूर इतना भर है कि उन्होंने अमेरिका में  शरण लेने के लिए गैर-कानूनी तरीके से प्रवेश  किया है। इन कैदियों को चारों पहर (24 घंटे) जंजीरों में जकडकर रखा जा रहा है। खाना भी जंजीरों में बांध  कर दिया जा रहा है। अधिकांश  कैदियों की आयु 18 से 25 साल है। पंजाब में विदेश  जाकर पैसा कमाने का जनून है। विदेश  जाने के लिए लोग-बाग अपनी जमीन जायदाद तक बेच देते हैं। अमेरिका में गैर कानूनी प्रवेश   कोई संगीन अपराध नहीं है। फेडेरल लॉ के तहत पहली बार अमेरिका के आव्रजन नियमों के तहत गैर-कानूनी तरीके (इंप्रॉपर एंट्री) पर ज्यादा से ज्यादा जुर्माना अथवा छह माह की कैद या दोनों की सजा दी जाती है। निर्वासन (डिपोर्टेशन) के बाद  दूसरी बार गैर-कानूनी तरीके से प्रवेश  पर दो साल की कैद और जुर्माने की सजा का प्रावधान  है।  अमेरिकी कानून में इस तरह के अपराध लो-लेवल के माने जाते हैं। ओरेगॉन की जेल में बंद सिख तो अभी सजायाफ्ता भी नहीं है। उनसे  खूनी, कातिल अथवा बलात्कारी जैसे अपराधियों सरीखा बर्ताव सरासर मानवाधिकारों का उल्लंघन है। पूरी दुनिया को मानवाधिकारों की रक्षा का पाठ पढाने वाला अमेरिका खुद अक्सर  इनका घोर उल्लंघन करता है। ओरेगॉन की जेल में बंद अप्रवासियों से अमानवीय व्यवहार ताजा मिसाल है। कैदियों से कैसा सलूक किया जाना चाहिए, इसके लिए संयुक्त राष्ट्र  ने न्यूनतम स्टैंटर्ड  रूल्स बना रखे हैं और इनके तहत किसी भी कैदी से अमानवीय व्यवहार नहीं किया जा सकता। कैदी के आत्म सम्मान की रक्षा करना और उसकी समुचित देखभाल करन हर  प्रशासन की जिम्मेदारी है। इंटरनेशनल ह्यूमन राइटस स्टैंटर्ड (इंटरनेशनल कॉवेनेंट ऑन सिविल एंड पॉलिटिक्ल राइटस) में साफ तौर कहा गया है कि जेल में बंद कैदियों से अमानवीय सलूक नहीं किया जा सकता। अमेरिका समेत 76 मुल्क 1976 से इन नियमों का पालन कर रहे हैं। इन सब के बावजूद  अमेरिका के  ओरेगॉन जैसे प्रगतिशील राज्य में मानवाधिकारों का उल्लघंन  इस मुल्क के लिए बेहद शर्मनाक है। वैसे डोनाल्ड ट्रंप के  राष्ट्रपति  बनने के बाद से अमेरिका में अश्वेतों  और अप्रवासियों के प्रति “नफरत, भेदभाव और असहिषुणता “ का माहौल पनपा है। ट्रंप का वश  चले तो वे किसी भी अप्रवासी को  अमेरिका में आने ही न दें।  अमेरिका को अमेरीकियों के लिए संरक्षित रखना ट्रंप का लक्ष्य है। इसी सनक में उन्होंने बार्डर्  पर सख्ती करके इसी साल दो हजार से ज्यादा अप्रवासी बच्चों को उनके मां-बाप से अलग कर दिया था। इससे अधिक और कोई अमानवीय कदम हो ही नहीं सकता।  ट्रंप के इस कदम का अमेरिकी  सिविल राइटस बॉ्डी ने भी मुखर विरोध किया था। ट्रंप  को यह बात भी अखर रही है कि बाहरी मुल्कों से आकर अप्रवासी अमेरिका का राशन-पानी (सरकारी सुविधाएं)  खा-पी रहे हैं। इसीलिए ट्रंप प्रशासन ऐसी आवज्रन नीति बनाने की तैयारी कर रहा है, जिसके तहत उन लोगों को अमेरिका में आने की अनुमति ही न दी जाए जो सरकारी सुविधाओं के लिए इस मुल्क की ओर रुख करते हैं। 2016 में 3.83 लाख अप्रवासियों को अमेरिका की पक्की नागरिकता मिली थी। इसके अलावा विदेशों  में रह रहे 6.20 लाख लोगों ने भी अमेरिकी नागरिकता दी गई थी। आप्रवासियों का भारी संख्या में अमेरिका आना ट्रंप प्रशासन को जरा रास नहीं आ रहा है। ट्रंप को लगता है कि अगर अप्रावसियों का आना-जाना इसी तरह झ्सी तरह जारी रहा, उनका “अमेरिका बनाम  अमेरिकन“ वाला नारा पिट जाएगा। इसी आशंका से किसी भी अप्रवासी को अमेरिका मे घुसते ही जेल में बंद किया जा रहा है और जेल में बंद करके अमानवीय सलूक से उन्हें हतोत्साहित किया जा रहा है।

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

जब भारतीय खिलाड़ियों के पास जूते तक नहीं थे

अब तक के सबसे रोमांचक रहे फुटबाल के “महापर्व“ फीफा वर्ल्ड कप का रविवार को रंगारंग समापन हो गया। 24 दिन के मुकाबलों में 160 गोल दागे गए।  बीस साल बाद फ्रांस दूसरी बार विजेता बना। 2018 से पहले फ्रांस ने 1998 में पहली बार फीफा वर्ल्ड कप जीता था । फाइनल में फ्रांस ने क्रोशिया को हराया। लगभग इक्तालीस लाख (41.7 लाख) आबादी वाले क्रोशिया ने फाइनल में पहुंच कर भारत और चीन  जैसे विशाल आबादी वाले मुल्कों को जताया है कि जनून और कडी मेहनत से कुछ भी असंभव नहीं है। सवा सौ करोड की आबादी वाला भारत तो आज तक फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालिफाई तक नहीं कर पाया है। 1950 के  फीफा वर्ल्ड कप में बाई डिफाल्ट क्वालिफाई तो किया था, मगर भारत ने खेलने से इंकार कर दिया था। भारतीय खिलाडियों के पास खेलने के लिए फुटबाल के जूते तक नहीं थे और आयोजकों ने भारत को नंगे पांव खेलने की अनुमति नहीं दी थी। इससे पहले 1948 में  लंदन में आयोजित ओलंपिक में भारत की टीम ने फ्रांस के खिलाफ नंगे पांव खेलकर भी कमाल का  प्रदर्शन  किया था। खेल के 70वें मिनट तक भारत फ्रांस से 1-1 की बराबरी पर था मगर बाद में इस मैच को 2-1 से हार गया था। उस समय फ्रांस भले ही मैच जीत गया था मगर भारत ने  फैंस  का दिल जीत लिया था। रविवार को क्रोशिया का प्रदर्शन भी उम्दा रहा है। किस्मत ने क्रोशिया का साथ नहीं दिया। पूरे खेल में ज्यादातर समय बॉल क्रोशियाई खिलाडियों के कब्जे में रही, गोल के कई प्रयास किए मगर सफल नहीं हो पाए। एक गोल क्रोषियाई खिलाडी के हैडर से हो गया और एक और गोल वीएआर ( वीडियो असिसटैंट रेफरी) पैनल्टी की बदौलत। पहली बार इस कप के फाइनल में वीएआर का इस्तेमाल हुआ। बहरहाल, समूचा 2018 फीफा वर्ल्ड कप  दर्शकों  को भारी उलट-फेर से रोमांचित करता रहा। चार बार का  फीफा वर्ल्ड कप विजेता इटली इस बार क्वालिफाई तक नहीं कर पाया। 2014 का  फीफा वर्ल्ड कप विजेता जर्मनी नॅाक आउट स्टेज में ही बाहर हो गया। जर्मन चार बार विजेता और चार ही बार रनर्स-अप रह चुका है। 33 साल बाद पहले ही मैच में जर्मनी को मेक्सिको ने चित कर दिया। पांच बार का विश्व  कप विजेता ब्राजील सेमी-फाइनल में ही बाहर हो गया। दो बार का  वर्ल्ड कप चैंपयिन उरुग्वे भी सेमीफाइनल तक पहुंच नहीं पाया।  मात्र तीन लाख की आबादी वाले आइसलैंड ने पहले ही मैच में दो बार के  फीफा वर्ल्ड कप विजेता अर्जेटीना को ड्रा पर रोक कर बडा उलट-फेर कर दिया। फ्रांस के कोच दिदेए दिशों  बतौर खिलाडी और बतौर कोच  वर्ल्ड कप जीतने वाले तीसरे शख्सियत है़। 1998 में फ्रांस ने जब  वर्ल्ड कप जीता था,   तब दिदेए दिशों   टीम में  शामिल थे। टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा 16 गोल करने वाले बेल्जियम ने पहली बार कांस्य पदक जीता है। सेनेगल को सबसे ज्यादा येलो कार्ड  दिखाने जाने के कारण  वर्ल्ड कप से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।  रुस में आयोजित 2018 के  फीफा वर्ल्ड कप अब तक बेहतरीन आयोजन रहा है। फीफा अध्यक्ष गियानी इन्फैंटिनो  ने रुस की मेजबानी को अब तक की सर्वश्रेष्ठ बताया  है। इंग्लैंड और यूरोपियन यूनियन के दबाब के बावजूद 2018 वर्ल्ड कप में स्टेडियम  दर्शकों  से  98 फीसदी भरे रहे। इस आयोजन पर 14 अरब डॉलर से ज्यादा का खर्चा  आया है। ट्रुर्नामेंट की कुल  प्राइज मनी  2700 करोड रुपए थी। कप विजेता फ्रांस को 256 करोड रु , क्रोशिया को 189 करोड रु और बेल्जियम को 169 करोड रु मिले हैं। अगला  वर्ल्ड कप 2022 में कतर में होगा और यह मुल्क लंबे समय से इसकी तैयारियों में जुटा हुआ है। 2002 के बाद पहली बार एशिया में  वर्ल्ड कप का आयोजन हो रहा है।                 

सोमवार, 16 जुलाई 2018

कल्पेश याज्ञनिकः एक और बलि

 हिंदी दैनिक भास्कर  समाचार पत्र के समूह संपादक कल्पेश  याज्ञनिक की दुखद और अकास्मिक निधन से हिंदी पत्रकारिता को अपूर्णिय क्षति पहुंची है। एक और पत्रकार  ब्राडिंग के अत्याधिक बोझ में दब कर शहीद हो गया। समकालीन मीडिया में पत्रकारिता बस ब्राडिंग मात्र रह गई है। समाचार पत्रों की ब्राडिंग ही पत्रकारिता के मानदंड तय करती है। और बेचारा पत्रकार इस ब्राडिंग के चक्कर में पिस रहा है। भास्कर में टॉप मैनेजमेंट का सीधा फंडा हैः अखबार को हर जगह (प्रकाशन केन्द्र) और हर हाल में  नंबर बनना है। और जो कोई भी इसमें पिछड गया, वह ग्रुप  में भी पिछड गया। भास्कर में रहते हुए कल्पेश  याज्ञनिक से मेरा ज्यादा परिचय तो नहीं था, मगर मैं उनका कॉलम नियमित पढता। ओजस्वी लेखनी के मालिक थे। धडल्ले से लिखते। उनका साप्ताहिक कॉलम “असंभव के विरुद्ध“ काफी लोकप्रिय था और बहुत ज्यादा पढा जाता।  याज्ञनिक अंतर्मुखी थे और सहयोगियों से भी कम ही मिलते-जुलते थे। काम से मतलब रखते और खबरों की दुनिया में डूबे रहते। उनकी मौत हृदयाघात से हुई  अथवा गिरने से, इस पर रहस्य बना हुआ है। मगर, एक बात मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूं कि वे आत्महत्या नहीं कर सकते, जैसा कि कुछ पत्रकार कह रहे है़। याज्ञनिक भास्कर के इंदौर संस्करण से जुडे थे और यह संस्करण इस समाचार पत्र के सबसे प्रतिष्ठित  संस्करणों मेंसे है। एक जमाने में श्रवण गर्ग  इस संस्करण के संपादक हुआ करते थे और उनकी छाप आज भी इस संस्करण पर है। श्रवण गर्ग हीं उन्हें भास्कर में लाए थे। मैं यह बात दावे के साथ कह सकता हूं कि श्रवण गर्ग  के साथ काम करने वाला सहयोगी कमजोर हो ही नही सकता। श्रवण गर्ग जितने सख्त थे, उतने ही प्रोफेशनल भी। मैने उनसे बहुत कुछ सीखा है। श्रवण गर्ग के बाद ही कल्पेश  याज्ञनिक भास्कर के समूह संपादक बने। भास्कर बेहद प्रोफेशनल अखबार है और    इसमें सिर्फ  वही पत्रकार फल-फूल सकते हैं, जो अत्याधिक परिश्रमी और प्रतिभाशाली हो। छोटे-मोटे पत्रकार तो ग्रुप  में टिक ही नहीं सकते। काम का ही नहीं, अलबत्ता प्रतिस्पर्धा  का बहुत ज्यादा प्रैशर रहता है। पिछले दो दशक में इस समूह ने दिन दोगुनी, रात चौगुनी तरक्की की है। नब्बे के दशक में जब मैने लोकमत ज्वाइन किया था, भास्कर मध्य प्रदेश  तक ही सीमित था और राज्य का नवभारत इससे ज्यादा लोकप्रिय था। भास्कर का अंगेजी अखबार नेशनल मेल एकदम फिस्सडी और नवभारत के  एमपी क्रॉनोनिक्ल से बहुत पिछडा हुआ था। मगर पहले राजस्थान और फिर चंडीगढ ने भास्कर को बुलदियों तक पहुंचा दिया। काम का अत्याधिक प्रैशर हट्टे-कटटे को भी हिला देता है। मानव के शरीर में दिल सबसे नाजुक होता है और इसके किसी भी तरह का ज्यादा दबाव झेलने की भी एक सीमा होती है। याद करें  पिछली सदी (1997) में वरिष्ठ  पत्रकार सुरेन्द्र प्रताप सिंह भी इसी दबाव के  शिकार हुए थे। और भी कई पत्रकार इसके  कार हो चुके है़ं। पत्रकार पीसते रहेंगे और यह सिलसिला चलता रहेगा।                     

शनिवार, 14 जुलाई 2018

दहेज लोभी, सावधान !

बारातियों की  शाही मेजबानी करना और  शादी-ब्याह पर दिल खोलकर खर्च करना, भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। गरीब से गरीब परिवार भी  शादी-ब्याह पर अपनी हैसियत से ज्यादा ही खर्च  करता है। इसके लिए भले ही उसे कर्जा  लेना पडे। इस परंपरा ने जिन कुृरीतियों को जन्म दिया, उन पर समाज का कभी  ध्यान नहीं गया। मगर अब देश  की  शीर्ष  अदालत ने सरकार को सलाह दी है कि  शादी-ब्याह में होने वाले खर्चे का हिसाब-किताब रखा जाना चाहिए और इसे अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस तरह का कानून  दहेज के लेन-देन और  प्रताडना को रोकने में मददगार साबित होगा। वर  और वधु दोनों पक्षों को शादी से जुडे सभी खर्चों का ब्यौरा मैरिज ऑफिस के पास जमा कराना अनिवार्य  होना चाहिए। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने एक और क्रांतिकारी सलाह दी है कि  शादी पर होने वाले तय खर्च का कुछ हिस्सा पत्नी के नाम बैंक खाते में भी जमा किया जाए ताकि जरुरत पडने पर इसका इस्तेमाल किया जा सके। सामाजिक कुरीतियां भारतीय संस्कृति के उज्जवल पक्ष को कमजोर करती रही हैं और इसके लिए  दुनिया में भारत का उपहास भी होता रहा है। निसंदेह, दहेज प्रताडना जैसी अमानवीय घटना को रोकने के लिए सख्त से सख्त उपाय करने की  जरुरत है। दहेज मांगना और देना कानूनन अपराध होने के बावजूद अभी इस पर पूरी तरह से लगाम नहीं लग पाई। आए दिन, बहू-बेटियों को दहेज के लिए प्रताडित किया जाता है, जलाया जाता है या घर से निकाल दिया जाता है। इंडियन नेशनल क्राइम रिकार्डस  ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार भारत में हर दिन औसतन 21 महिलाओं को दहेज के लिए जलाया जाता है या उनकी हत्या कर दी जाती है मगर मात्र 35 फीसदी दोषियों को सजा मिल पाती है।  2015 में देश  में 7,634  महिलाओं की दहेज के लिए हत्या कर दी गई थी। देश  की राजधानी दिल्ली में पिछले पांच साल के दौरान 725 महिलाओं को दहेज के लिए मार दिया गया। 2016 में दिल्ली में दहेज प्रताडना की  3,877  शिकायतें दर्ज  करवाई गईं थी। इन सब आंकडों से पता चलता है कि देश  की राजधानी में ही महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं? महिलाओं के लिए लड रही स्वंयसेवी संस्थाओं का आकलन है कि  अधिकतर दहेज हत्या के मामले दबा दिए जाते हैं, इसलिए दहेज से संबंधित हत्याएं काफी ज्यादा हैं। भारत  में दहेज के खिलाफ सख्त कानून के लिए भी महिलाओं को आजादी के बाद 15 साल तक इंतजार करना पडा। 1961 में दहेज के खिलाफ पहली बार दहेज़ उन्मूलन  एक्ट बना मगर इससे कोई बहुत ज्यादा फर्क  नहीं पडा। दहेज निरोधी कानून के तहत  शादी के बदले दहेज मांगना और देना अपराध करार दिया गया मगर इसमें एक बहुत बडी खामी भी रह गई। उपहार में दी गई चीजों को दहेज नहीं माना गया। जमीनी सच्चाई यह है कि देश  में दहेज मांगा नहीं जाता बल्कि अधिकतर मामलों में बेटियों को स्वेच्छा से दिया जाता  है। इसके पीछे मूल भावना यह  थी कि भारत में पुश्तैनी  संपत्ति में बेटी का कोई हक नहीं होता था, इसलिए उन्हें उपहार में दहेज दिया जाता था। कालांतर में इसका दुरुपयोग होने लग पडा और दहेज विवाहित महिलाओं के लिए श्राप बन गया। 1983 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए में संशोधन किया गया और फिर 2005 में प्रोटेक्शन  ऑफ वूमैन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट बनाया गया। इनका मकसद विवाहित महिलाओं को दहेज प्रताडना से बचाना था मगर इनसे भी दहेज प्रताडना थमी नहीं है। दहेज के लिए महिलाओं का जलाया जाना और महिलाओं से बलात्कार के बढते मामलों ने देश  की छवि को काफी खराब किया है।  सुप्रीम कोर्ट  की सलाह मानकर  अविलंब शादी-ब्याह के खर्चों का हिसाब-किताब अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे दहेज लोभी बेनकाब होंगे और उन्हें कुछ तो शर्म आएगी।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

फ्रांस से बड़े तो बन गए, मगर अभी साउथ कोरिया से छोटे हैं

भारत की अर्थव्यवस्था 2017 में फ्रांस को पछाड कर दुनिया की छठी विशाल अर्थव्यवस्था बन गई है। और जल्द ही इंग्लैंड को पछाड कर भारत पांचवी बडी  अर्थव्यवस्था बन जाएगी।  इंग्लैंड से इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था मात्र 25 अरब डालर पीछे है। अगले साल तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद मौजूदा 2.59 खरब डॉलर से बढकर इंग्लैंड के 2.62 खरब डॉलर को पार कर जाएगा। अगले दस साल में (2028) तक भारत जर्मनी और जापान को भी पछाड कर तीसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। जापान 4.87 खरब डॉलर के साथ तीसरे और जर्मनी 3.67 खरब डॉलर के साथ चौथे स्थान पर है। भारत, रुस और बाज्रील को पहले ही पीछे छोड चुका है। मगर इन उपलब्धियों से हमे ज्यादा इतराने की जरुरत नहीं है। जिस देश  के पास सवा सौ करोड उत्पादक हाथ  (लोग) हों,  उसका सवा आठ करोड आबादी वाले मुल्क जर्मन, 12.68 आबादी वाले जापान, 5.30 करोड आबादी वाले इंग्लैड और साढे छह करोड की आबादी वाले फ्रांस से मुकाबला नहीं है। भारत का असली मुकाबला चीन से है। आबादी के लिहाज से भारत, चीन से थोडा पीछे है और जिस रफ्तार से भारत में आबादी बढ रही है, वह जल्द ही चीन को भी पीछे छोड देगा। लेकिन भारत अभी चीन से काफी पीछे है। 2.59 खरब डॉलर की भारतीय अर्थव्यवस्था 12.23 खरब डॉलर वाली चीनी अर्थव्यवस्था के समक्ष बौनी लगती है। 19.39 खरब डॉलर वाली अमेरिकी अभी दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था है। इस समय  चीन को “ऐजिंग”  और भारत को दुनिया की युवातम  अर्थव्यवस्था“ माना जाता  है। भारत में 600 मिलियन युवा हैं और वह इस वर्कफोर्स की बदौलत तेजी से आगे बढ सकता है।  चीन की 16 फीसदी से ज्यादा आबादी बुढी हो चुकी है। अगर किसी मुल्क की दस पीसदी से अधिक आबादी 60 साल से ज्यादा आयु को हो, तो उसे “ऐजिंग' अर्थ व्यवस्था माना जाता है। इसके बावजूद  लंदन स्थित सेंटर फॉर इकॉनॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च  (सीईबीआर) का आकलन है कि 2032 तक चीन अमेरिका को पछाड कर दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। दूसरी ओर भारत तब तक दुनिया की तीसरी बडी अर्थव्यवस्था होगी, लेकिन इसी संस्था (सीईबीआर) का आकलन है कि इस सदी के दूसरे उतरार्ध (2075 तक)  में भारत, चीन को पछाड कर दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। यानी भारत को दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था बनने के लिए अभी पचास साल से भी ज्यादा इंतजार करना पडेगा। तथापि, भारत को अगर जल्द से जल्द नंबर वन बनना है, उसे दक्षिण कोरिया जैसे छोटे से मुल्क से काफी कुछ सीखने की जरुरत है। दक्षिण कोरिया भारत से एक साल बाद 1948 में गुलामी की बैडियों से आजाद हुआ था। आजादी के बाद पांच साल तक यह मुल्क पडोसी उत्तर कोरिया से भीषण युद्ध में उलझा रहा और इसकी अर्थव्यवस्था करीब-करीब तबाह हो चुकी थी। मगर आज यही देश  उन्नत तकनीक में पश्चिम  के विकसित मुल्कों को भी टक्कर दे रहा है। निर्यात में दक्षिण कोरिया, चीन से भी आगे है और उसकी अर्थव्यवस्था भी निर्यात से ही फल-फूल रही है। पूरी दुनिया को मोबाइल फोन, कारें, कम्प्यूटर्स  और अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पाद बेचकर दक्षिण कोरिया ने अपनी दक्षता का लोहा मनवाया है।  आर्थिक उदारीकरण के बाद दक्षिण कोरिया के कई कंज्युमर गुडस भारत में   मल्टीनेशनल  कंपनियां को भी मात दे रहे हैं। पांच करोड से भी कम आबादी वाले दक्षिण कोरियाई के जादुई विकास गाथा का व्याख्यान करते हुए  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को नोएडा में कहा, “ भारत में शायद ही ऐसी कोई मिडिल क्लास घर होगा, जहां कम-से-कम एक कोरियाई प्रॉडक्ट न हो। भारत को भी इसी जादुई विकास की दरकार है और इसके लिए कोरियाई लोगों जैसा जनून अपनाने की जरुरत है। ऐसा करने के लिए देश  को सांप्रदायिकता, असहिष्णुता   और जात-पात से ऊपर उठना होगा।

गुरुवार, 12 जुलाई 2018

चंडीगढ़ किसका? पिट चुका है यह मुद्दा

किसी शायर ने दो भाईयों के  प्रगाढ़  रिश्तों  क्या खूब कहा है,“ पल-पल से बनता है एहसास, एहसास से बनता है विश्वास ,  विश्वास  से बनते हैं  रिश्ते , रिश्तों से बनता है कोई खास“। काश  पिछले पांच दशक से भी ज्यादा समय से चंडीगढ और  पानी के लिए झगडे रहे पंजाब और हरियाणा के सियासी नेता इस रिश्ते  के मर्म को समझ पाते! पंजाब, हरियाणा का बडा भाई है और एक जमाने में संयुक्त पंजाब का हिस्सा रहे हरियाणा को पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने का पूरा हक है। मगर हर बडा भाई मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं होता। अपने हिस्से की एक इंच जमीन छोडना तो दीगर रहा, बडा भाई पंजाब, छोटे भाई हरियाणा को एक बूंद पानी तक देने को तैयार नहीं है। 1966 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद से संपत्ति के बंटवारे का मसला उतरोत्तर जटिल होता चला गया। 52 साल के लंबे अरसे के बावजूद  केन्द्र भी इस मसले को सुलझा नहीं पाया।  और अब चंडीगढ और नदियों का पानी इस कद्र राजनीतिक रंगत ले चुका है कि इसके सुलझने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है। मंगलवार को इसकी बानगी भी मिली। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने चंडीगढ, पंचकूला और मोहाली के समग्र और एकीकृत विकास के लिए समर्पित (डेडिकेटिड) बोर्ड अथवा प्राधिकरण (ऑथॉरिटी) गठित करने की मांग पर पंजाब भडक गया है और इसे फौरन खारिज कर दिया है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने जोर देकर कहा चंडीगढ पर सिर्फ पंजाब का ही हक है। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया है कि दुनिया में पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसकी अपनी स्वतंत्र राजधानी नहीं है। मुख्यमंत्री के इस बयान में पंजाब का दर्द  छिपा है। इस बात में वजन है कि राज्य बनने के बाद हरियाणा अपनी अलग राजधानी बना सकता था। पंजाब के लिए  चंडीगढ राजधानी से कहीं ज्यादा प्रतिष्ठा  का मुद्दा बन चुका है। 2016 में केन्द्र ने चंडीगढ के लिए पहला स्वतंत्र प्रशासक नियुक्त करने का फैसला लिया था और केजे अलफोन्स को उप-राज्यपाल (एलजी) के बराबर का दर्जा देकर  प्रशासक बनाने की घोषणा तक हो चुकी थी। मगर तब पंजाब ने इसका इतना मुखर विरोध किया कि केन्द्र को इसे वापस लेना पडा। 1984 के बाद से पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ के राज्यपाल रहे हैं। पंजाब ने केन्द्र सरकार के इस फैसले में “राजनीतिक चाल की बू“ सुंघ ली । चंडीगढ के लोग इसे केद्र प्रशासित रखने के पक्ष में है और केन्द्र की यह पहल इसी नजरिए से देखी गई थी। चंडीगढ को लेकर पंजाब इतना संवेदनशील है कि एक छोटी से नियुक्ति पर भी राज्य के सियासी नेता मुखर हो जाते हैं। इस मामले में सारे मतभेद भुलाकर सभी राजनीतिक एक आवाज बुलंद करते हैं।  चंडीगढ में अफसरों की तैनातौ को लेकर भी पंजाब लगातार 60ः 40 (पंजाब 60, हरियाणा 40) की रेशो  को लागू करने पर जोर देता रहा है। ज़रा सा ऊपर  नीचे  पंजाब तिलमिला उठता है। चंडीगढ़ प्रशासन   में  60ः 40 का यह फार्मूला  चंडीगढ में पंजाब के हक को पुख्ता करता है। आजादी से बृहद  पंजाब (पाकिस्तान वाला पंजाब भी) की राजधानी लाहौर हुआ करती थी। लाहौर पाकिस्तान में चला गया, इसलिए संयुक्त पंजाब के लिए एक नई राजधानी बनानी पडी और  तत्कालीन पंजाब राज्य के मध्य स्थित चंडीगढ को नई राजधानी बनाया गया। इसे विडबंना ही कहा जाए कि पंजाब को जल्द ही नई राजधानी से भी महरुम होना पडा। संयुक्त पंजाब, तीन भागों में बंट गया। पहाडी क्षेत्र हिमाचल चले गए। हिंदी भाषी  हरियाणा को मिल गए और चंडीगढ संयुक्त राजधानी बन गया।  पंजाब पटियाला से अमृतसर तक 50362 वर्ग किलोमीटर (हिमाचल से भी छोटा) तक सिमट कर रह गया। पंजाब का यही दर्द है कि वह बार-बार का विभाजन सहने की स्थिति में नहीं है मगर जमीनी सच्चाई यह भी कि 52 साल में हालात बहुत बदल गए हैं। चंडीगढ को पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी बनाए रखने में सभी पक्षों की भलाई है।


बुधवार, 11 जुलाई 2018

अभी भी भटक रहा है न्याय

बलात्कार करने वाले दरिंदों के लिए अविलंब फांसी के सिवा और कोई भी सजा  मानवता का  अपमान है। इस पर अगर जनमत संग्रह  कराया जाए तो सौ फीसदी लोग यही कहेंगे कि बलात्कारियों को फौरन फांसी से भी ज्यादा सख्त सजा दी जानी चाहिए। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट  ने “निर्भया“ के बलात्कारियों की पुनर्विचार (रिवीजन) याचिका खारिज करते हुए तीनों दरिंदों की फांसी सजा  की सजा बरकरार रखी है। चौथे बलात्कारी ने  पुनर्विचार (रिवीजन) याचिका दायर नहीं की थी। और संभावना है तीन बलात्करियों की याचिका खारिज होने के बाद अब चौथा बलात्कारी सुप्रौम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए। इससे लगता है निर्भया को न्याय अभी नहीं मिला है। जब तक दरिंदों को फांसी नहीं होगी, न्याय भटकता  रहेगा।   न्याय में विलंब के लिए देश  में कानून को  तोडना, मरोडना आम बात है। भारत की न्यायिक व्यवस्था की यही सबसे बडी कमजोरी है।  16 दिसंबर, 2012 की रात दिल्ली में 23 वर्षीय  युवती  से चलती बस में  छह दरिंदों ने सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसे मरने के लिए सडक पर फेंक दिया था। बहशियों की इस दरिंदगी ने पूरे देश  की आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। इसके बाद देश  में बलात्कार से संबंधित कानून को और सख्त बनाया गया और बलात्कारियों को फांसी की सजा का प्रावधान किया गया। इस मामले में ट्रायल कोर्ट  13 दिसंबर, 2013 को चारों बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई। पांचवा बलात्कार नाबालिग था, इसलिए उस पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड  में अलग से मुकदमा चला और उसे तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेज दिया गया। छठे अभियुक्त ने तिहाड जेल में आत्महत्या कर ली थी। ट्रायल कोर्ट  के बाद दिल्ली हाई कोर्ट ने भी चारों की फांसी की सजा बरकरार रखी। 2014 में सुप्रीम कोर्ट में तीन अभियुक्तों द्वारा पुनर्विचार याचिका दायर किए जाने पर  शीर्ष  अदालत ने फांसी की सजा पर रोक लगा दी। मई, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी ट्रायल और हाई कोर्ट की बलात्कारियों की फांसी की सजा बरकरार रखी। इसके बावजूद बलात्कारी फांसी से बचते रहे। तीन अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में रिवीजन पिटीषन दायर कर दी। सोमवार को दरिदों की यह चाल भी विफल हो गई। लेकिन अभी भी इन दरिंदों के पास फांसी से लटकने के रास्ते हैं। तीनों सुप्रीम कोर्ट में  क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकते हैं। 2002 में सुप्रीम कोर्ट ने रुपा अषोक बनाम आशिक  हर्रा  के मामले में  क्यूरेटिव याचिका का विकल्प दिया था।  पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के बाद न्यायपालिका से न्याय पाने का यह अंतिम मौका होता है। इस याचिका पर फैसला आने के बाद ही फांसी के अभियुक्त  राष्ट्रपति  से अंतिम गुहार लगा सकते हैं। वैसे अगर  क्यूरेटिव याचिका से पहले वौथे अभियुक्त ने सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका दायर कर दी और यह एडमिट हो गई, तो फांसी की सजा और लंबी लटक सकती है। भारत में नैसर्गिक न्याय की यह प्रकिया निर्दोशों  को कम, दरिंदों के लिए ज्यादा मददगार साबित हो रही है। माना की न्याय कीे आंखों पर  निष्पक्षता  की पट्टी बंधी होती है और यह मार्मिक भावनाओं में भी नहीं बहता है। मगर ऐसी न्याय प्रकिया की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वभाविक है जो दरिंदों के लिए फांसी जैसी सख्त सजा टालने में मददगार सबित हो। निर्भया मामले में ट्रायल कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक सभी अदालतों ने दरिदों को  फांसी की सजा सुनाई तो है मगर सजा लंबी कानूनी प्रकिया में उलझ कर रह गई है। इसी लंबी कानून प्रकिया के कारण ही सख्त सजा के बावजूद बलात्कार के मामलों में कोई गिरावट नहीं आ रही है। इसके विपरीत निर्भया मामले के बाद से बच्चियों से बलात्कार के मामले बढे हैं। अब समय आ गया है कि देष में बलात्कारियों के लिए त्वरित सजा का कानून बनाया जाए।

मंगलवार, 10 जुलाई 2018

भगोडों के सुरक्षित चरागाह

बेशर्मी की भी हद होती है मगर  बैंकों का दस हजार करोड रु से ज्यादा के कर्जदार  शराब कारोबारी विजय माल्या ने सारी हदें पार कर दी है। ब्रिटेन की अदालत से पिछले सप्ताह भारतीय बेंकों को कर्जदार विजय माल्या की ब्रिटिश  संपत्ति जब्त करने की छूट मिलने के बाद भी उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ा  है। रविवार को माल्या ने यह कहकर भारत और बैंकों को चिढाया है कि ब्रिटिश  अचल संपत्ति उनके नाम है ही नहीं। ब्रिटेन में उनके दो आलीशान भवन है और दोनों ही परिवार के नाम है। इस स्थिति में जाहिर है अदालत से संपत्ति जब्त करने की छूट  मिलने के बावजूद   बेंकों के हाथ कुछ ज्यादा लगने वाला नहीं है। बकौल माल्या उनके नाम कुछ पुरानी कारें और ज्वैलरी है, जिन्हें  वे खुद बैंकों को सौपने को तैयार हैं। माल्या के इन बयानों में उनकी बदनीयति साफ झलकती है। बैंको  का पैसा डकार कर ब्रिटेन में ऐश -ए-आराम की उन्होंने पहले से ही तैयारी कर रखी थी। इसीलिए, उन्होंने अपनी संपत्ति परिवार (पुत्र और माता) के नाम कर रखी है। अगर माल्या की नीयत साफ होती, तो वे इन संपतियों को बेचकर बैंकों का कर्ज  चुकाते। अगर  सहारा परिवार ऐसा कर सकता है तो माल्या क्यों नहीं? सहारा को अपना न्यूयार्क स्थित भव्य होटल बढती देनदारी चुकाने के लिए बेचना पडा। भारत सरकार विजय माल्या के प्रत्यर्पण की हर संभव कोशिश  कर रही है।  माल्या भारत नहीं लौटने के लिए खुद को ब्रिटिश  नागरिक और अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) बताते हैं। इसी माह के अंत में (31 जुलाई) को लंदन की अदालत में विजय माल्या के प्रत्यर्पण संबंधी मामले की अंतिम सुनवाई है और सितंबर में इस मामले में अदालत का फैसला आ सकता है। कोर्ट  के ताजा फैसले के  दृष्टिगत   माल्या के  प्रत्यर्पण की उम्मीदें बढी हैं। भगोडों के लिए  ब्रिटेन सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है। ब्रिटेन के उदार कानून भगोडों के मददगार हैं। ब्रिटेन  में यूरोपियन कन्वेशन ऑफ ह्यूमन राइटस लागू है। इसके तहत अगर  प्रत्यर्पण के पीछे राजनीतिक कारण, अथवा प्रताडना की  मंशा   या मौत की सजा नजर आती है, तो   कोर्ट प्रत्यर्पण की अनुमति नहीं देगा। भारत अथबा दुनिया के अन्य देशों  के भगोडे इसी उदार कानून का फायदा उठाते है। भारत और ब्रिटेन के बीच 1993 से  प्रत्यर्पण संधि है मगर इन 25 सालों में अब तक केवल एक भगोडे का  प्रत्यर्पण हो पाया है। और इस एकमात्र भगोडे का  प्रत्यर्पण करने में 23 साल लग गए।  19 अक्टूबर 2016 में कत्ल के एक आरोपी को पहली बार ब्रिटेन से भारत लाया गया। 2017 के अंत तक भारत की 43 मुल्कों से साथ  प्रत्यर्पण संधि है और 9 के साथ इस तरह की व्यवस्था है। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मन, फ्रांस, रुस, यूएई, सउदी अरब समेत पडोसी बांग्लादेश  और नेपाल भी  शामिल हैं। मगर चीन और पाकिस्तान के साथ ऐसी कोई संधिं नहीं है। पिछले डेढ दशक  के  दौरान भारत मात्र 65 भगोडों को वापस ला पाया  है। भारत को इस समय 24 मुल्कों से 121 भगोडे के प्रत्यर्पण का इंतजार है। इनमें  भारत का 40 हजार करोड रु हडप गए 31 भगोडे भी  शामिल है। ब्रिटेन से इस समय 17 भगोडे के  प्रत्यर्पण की प्रकिया जारी है।  इनमें आर्थिक अपराधी विजय माल्या ही नहीं, बल्कि गुलशन कुमार हत्याकांड के प्रमुख आरोपी संगीतकार नदी सैफी और ललित मोदी भी  शामिल हैं ।  जिस तरह आसानी से अपराधी विदेष भाग रहे हैं, उससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि ऐसी  प्रत्यर्पण संधि का क्या औचित्य जिसके तहत अपराधियों को विदशों से प्रत्यर्पण  करने में  पसीने छूट जाएं  । उदार नियमों के कारण ही भारत से अपराधी विदेश  भाग कर ऐश -ए -आराम कर रहे हैं। दुनिया मे जिस तेजी से आर्थिक अपराध बढ रहे है,  उसके मद्देनजर  सभी मुल्कों को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि अपराधियों का फौरन  प्रत्यर्पण  हो और उन्हें सजा मिले।           

रविवार, 8 जुलाई 2018

The End of An Era

वयोवृद्ध पत्रकार जे एन साधु के निधन के साथ  ही निर्भीक पत्रकारिता के एक स्वर्णिम युग का अंत  हो गया हो। साधु   खोजी और  निर्भोक पत्रकारिता के स्तंभ थे। 60 और 70 के दशक खोजी और निर्भीक  पत्रकारिता का दौर था और पत्रकार तब  मिशनरीज हुआ करते थे। अखबार लोकतंत्र के विशु द्ध चौथे स्तंभ।  कमर्शियल ब्रांडिंग  तब  पत्रकारिता   कोसों दूर थी ।70 के दशक में  शिमला में बमुश्किल आध दर्जन  पत्रकार हुआ करते थे और जेएन साधु, पीएन शर्मा, सीएल भारद्वाज, एसएस बनियाल, विद्या प्रकाश  प्रभाकर और युवा उभरते पत्रकार प्रकाश  लोहमी। प्रकाश  लोहमी तो सर्वव्यापी है। कहीं भी फिट हो जाता है।  खोजी और निर्भीक पत्रकारिता के लिए जिस सपार्क और जज्बे की जरुरत होती है, जेएन साधु उसके प्रतीक थे। उन्हें अखबार भी वैसा ही मिला था। इंडियन एक्सप्रेस खोजी पत्रकारिता का प्लेटफॉर्म  रहा है। साधु साहब इस अखबार के 35 साल तक आदर्श   नुमाइंदे थे।  पत्रकारों को दाना डालने की सियासी नेताओं की फितरत होती है मगर वे इस जाल मे नहीं फंसे। बडा से बडा सियासी नेता उनकी निर्भीक कलम से खौफ खाता था। 70 के दशक में हिमाचल में “वन माफिया“ बेलगाम हुआ करता था और यह सियासी समर्थन से खूब फल-फूल रहा था। साधु साहब ने इसका भांडाफोड करने में कोई कसर नहीं छोडी। मूलतः कश्मीरी  थे मगर  शिमला से ऐसे जुडे कि  यहीं के होकर रह गए। रिटायरमेंट के बाद दक्षिण के एक अग्रेंजी अखबार से जुडे रहे। उनकी साप्ताहिक डायरी इस अखबार में छपती थी और जब भी छपती प्रैस रुम आकर मुझे और केएस तोमर को पढवाते। तोमर  इसे “ पिस्डु“ (लघु लेख) बताकर साधु साहब को छेडा करते । उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। हमेशा  सहयोगियों और युवा पत्रकारों को प्रेरित करते रहे। सियासी नेताओं के चापलूसी वाले लेख अथवा खबरें उन्हें जरा भी पसंद नहीं थे और मुंह पर इसकी आलोचना किया करते थ। उनकी लेखनी में जितनी प्रखरता थी, स्वभाव में उतनी ही सरलता। पीएन शर्मा  को उनकी “रंगीन तबियत“ के लिए अक्सर छेडा करते और हम इसे खूब इंजॉय करते। अस्सी के दशक में मैने जब समाचार एजेंसी “मनफा“ शुरु की, साधु साहब ने हमारी खबरों और लेखो् को खूब सराहा और मुझे कई बार   टिप्स  भी दिए। जेएन साधु के निधन से निर्भीक पत्रकारिता ने एक नायाब हीरा खोया है। हिमाचल में पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया है।        

शनिवार, 7 जुलाई 2018

न्यूनतम समर्थन मूल्य मेँ वृद्धि : चुनावी फसल काटने की सियासी चाल

खरीफ फसलों का न्यूनतम  समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत  के मुकाबले डेढ गुना बढाने का मोदी सरकार का फैसला  क्या वाकई  ही  किसानों  को बड़ी राहत  है  या चुनावी फसल काटने की सियासी  चाल  । किसान लंबे समय  से  स्वामीनाथन  द्वारा  रेकमेंडेड  सी-2ः वेटेड एवरेज कॉस्ट पर निर्धारित करने की मांग कर रहे हैं  मगर हर सरकार एटू प्लस एफएल  फॉर्मूले से एमएसपी  तय कर रही है । महंगे कर्ज और बढती लागत के बोझ ने देश  के किसानों, खासकर  लघु और सीमांत (दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले) की कमर तोड रखी है। भारत में 80 फीसदी किसान के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। देश  का अन्नदाता माने जाने वाले पंजाब में 70 फीसदी लघु और सीमांत किसान हैं।  उपज के वाजिब दाम नहीं मिलने से 80 फीसदी किसानों को गुजर-बसर के भी लाले पड जाते हैं। किसानों की सबसे बडी त्रासदी  साहूकारों से लिया गया महंगा कर्ज होता है। गांव-गांव सरकारी बैंकों के बावजूद 60 फीसदी से भी ज्यादा किसान आज भी फसली कर्ज केे लिए साहूकारों और आढतियों पर आश्रित है। बैंकों की लंबी -चौडी औपचारिकताएं आम किसान  तो क्या, पढे-लिखे आदमी के पल्ले भी नहीं पडती है। किसानों की बढती कर्जदारी पर  केन्द्रीय कृषि  मंत्रालय की समिति का आकलन है कि पंजाब और हरियाणा के अधिकतर लघु और सीमांत किसान फसली कर्ज  के लिए अभी भी आढतियों पर  निर्भर है। पंजाब में मात्र 4.71 और हरयाणा में  5.67 बैंको से कर्ज  लेते हैं। 35 से 40 फीसदी किसान सहकारी बैंको से कर्ज लेते हैं। बाकी 60 फीसदी किसान कर्ज  के लिए आढतियों की  शरण में जाते हैं। और आढतियों का कर्ज इतना महंगा (20 से 30 फीसदी फ्लैट) होता है कि कर्जदार किसानों को अपनी फसल औने-पौने दाम पर आढती को ही बेचनी पडती है। किसान आढती के ऋण ट्रैप से ताउम्र बाहर नहीं निकल पाता।  आढत और किसान के बीच कानून के  मुताबिक  लिखा पढी नहीं होती, इसलिए कानून भी किसानों की मदद नहीं कर पाता। एक रिपोर्ट केे अनुसार पंजाब का 60 फीसदी और हरयाणा का 45 फीसदी किसान सदियों से अपने हर तरह के कर्ज के लिए आढती पर निर्भर है और बाप-दादा का कर्ज  भी चुका रहा है। यही  व्यथा  देश  के अन्य भागों के किसानों की है। महाराष्ट्र  में विदर्भ के किसान तो इससे भी बदतर हालात हैं। एक बार साहूकार के जाल में फंस गए, तो चाह कर भी वह इससे बाहर नहीं निकल पाता।  इन 60 फीसदी किसानों का क्या जो आढतियों के चक्कर में फंसे हुए हैं और न्यूनतम सर्मथन मूल्य से लाभान्वित नहीं हो रहे हैं। आढती न्यूनतम समर्थन  मूल्य पर खरीद  नहीं करता और अगर करता है तो फसल की क्वालिटी (नमी आदि) में ंमीनमेख निकाल कर कम दाम देने का रास्ता निकाल लेता है। बहरहाल, सरकार का किसानों को डेढ गुना एमएसपी की सौगात चुनावी फसल काटने का प्रयास है। इस साल के अंत में मध्य प्रदेश , राजस्थान और  छतीसगढ में विधानसभा चुनाव होने है और अगले साल मई में लोकसभा चुनाव। जाहिर है सरकार का यह लोक-लुभावना फैसला चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में किसानों की आय को पांच साल में दो गुना करने क वायदा किया था। मगर सत्ता में आते ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि एमएसपी को लागत 50 फीसदी बढाना  नहीं है क्योंकि  इससे से खाधान्न बाजार में अफरा तफरी मच जाएगी। सरकार का फसल की लागत आंकने का फार्मूला भी त्रुटिपूर्ण है। एाएसपी सी-2ः वेटेड एवरेज कॉस्ट पर निर्धारित किए जाने की बजाए  एटू प्लस एफएल  पर आधारित है। इस फार्मूले में जमीन की रेंटल कॉस्ट को  शामिल नहीं किया जाता है। किसान लंबे समय से  सी-2 फार्मूला आधारित लागत पर एमएसपी की मांग कर रहे हैं। सरकार के ताजा फैसले से किसानों का भला होता या नहीं पर क्रूड की लगातार बढती कीमतों के साथ महंगा खाद्यान्न महंगाई को और बढा सकता है।  सरकार की चुनावी फसल काटने की सियासी चाल  देश  पर हमेशा  भारी पडती है। 

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

दिल्लीः लोकतंत्र की जीत

दिल्ली में चुनी हुई सरकार और उप-राज्यपाल के बीच पॉवर्स  के बंटवारे को लेकर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या के बाद  उम्मीद थी कि झगडा हमेशा  के लिए  खत्म  जाएगा। मगर हालात बता रहे हैं कि  खींचतान अभी भी जारी है। दिल्ली की नौकरशाही को चुनी हुई सरकार की बजाए उप-राज्यपाल के हुक्म बजाना ज्यादा पसंद है, और केन्द्र सरकार दिल्ली पर अपना रिमोट कंट्रोल छोडने को तैयार नहीं है। इसे देश  का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि केन्द्र की चुनी हुई सरकार दिल्ली की चुनी हुई सरकार के काम में अडंगा लगाने  मैं  कोई कसर नहीं छोड रही है।  बुधवार को सुप्रीम कोर्ट  ने  स्पष्ट  व्यवस्था दी कि दिल्ली भले ही केन्द्र  शासित क्षेत्र है मगर यहां चुनी हुई सरकार ही सुप्रीम है और उप-राज्यपाल मंत्रिमंडल की राय मानने के लिए बाध्य है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट  किया है कि चुनी हुई सरकार के काम में किसी भी तरह की दखलांदजी नही होनी चाहिए। अदालत की यह व्याख्या भी महत्वपूर्ण है कि दिल्ली में उप-राज्यपाल पूर्ण प्रशासक नहीं है और न ही उनके पास कोई स्वतंत्र अधिकार है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में व्यवस्था दी थी कि दिल्ली में उप-राज्यपाल प्रशासनिक प्रमुख हैं।  संविधान के तहत प्रदत पॉवर्स  के अनुसार दिल्ली में उप-राज्यपाल का काम सरकार के फैसलों पर अडंगा लगाने नहीं है, अलबत्ता उसका सहयोग करना और सलाह-,मश्विरा  देना है।  अदालत  की यह व्याख्या भी काबिलेगौर है कि लोकतंत्र मे न तो निरंकुश  (एब्सॉल्युटिज्म) शासन के लिए और  न ही अराजकता (अनार्की) के लिए कोई जगह है। अदालत ने  दिल्ली में जमीन, कानून व्यवस्था और पुलिस को दिल्ली सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया है। दिल्ली में चुनी हुई सरकार और उप-राज्यपाल को लेकर बुनियादी संदेहजनक बिंदुओं पर देश  की शीर्ष  अदालत की 535 पृष्ठों  की व्याख्या का निचोड   यह है कि सरकार और उप-राज्यपाल को मिलकर काम करना चाहिए। मगर इस फैसले के बाद दोनों पक्ष (आप बनाम भाजपा) जिस तरह से फैसले को अपनी-अपनी जीत और दूसरे की हार बता रहे हैं, उससे साफ है कि मामला अभी  शांत  नहीं हुआ है। अदालत का फैसला  हार या जीत के रुप नहीं देखा जाना चाहिए। न्यायपालिका संविधान में प्रदत पॉवर्स और अधिकारों की  निष्पक्ष  व्याख्या करती है। मगर यह बात बेहद दुखद है कि राजनीतिक दल न्यायपालिका  के फेसलों का भी “ राजनीतिक“  चश्मे  से आकलन करते हैं।  फैसले की भावना को देखा जाए तो  टॉप   कोर्ट  ने केन्द्र (एलजी) और दिल्ली में सत्तारुढ केजरीवाल सरकार को आइना दिखाया है। फैसले में केजरीवाल सरकार की कार्यशैली के लिए अनार्की का संबोधन एक तरह से आप सरकार के लिए नसीहत है। सरकार में रहकर धरने और प्रदर्शन  अराजकता ही है और चुनी हुई सरकार के कामकाज में अडंगा अडाना निरंकुशता। सुप्रीम कोर्ट  ने सरकार बनाम उप-राज्यपाल की शक्तियों की  व्याख्या करके यह भी स्पष्ट  किया है कि सरकार को हर मामले में एलजी की स्वीकृति लेने की जरुरत नहीं है। उप-राज्यपाल को हर फैसले से अवगत कराना ही पर्याप्त है। बहरहाल, दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने की संभावनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने पानी फेर दिया है। अदालत ने साफ व्यवस्था दी है कि दिल्ली की परिस्थितियां अन्य राज्यों से भिन्न है। इस स्थिति के दृष्टिगत इसे पूृर्ण राज्य का दर्जा  नहीं मिल सकता। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से केन्द्र और राज्यों के बीच संबंधों को नए आयाम मिले हैं और इससे देश  का संघीय ढांचा  और  मजबूत  होगा। दिल्ली के अलावा पुडुचेरी में भी सरकार और उप-राज्यपाल के बीव जबरदस्त मनमुटाव है। दरअसल, केन्द्र और दिल्ली, पुडुचेरी में अलग-अलग दलों की सरकार पदस्थ होने की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है। एक जमाने में भाजपा कांग्रेस पर संघीय ढांचे को  कमजोर करने का आरोप लगाती रही है। अब खुद वही काम कर रही है।

गुरुवार, 5 जुलाई 2018

बनीखेत

मां ने मेरी चंबा कितनी दूर””” हिमाचल के सुदूर में स्थित  चंबा का यह लोकगीत पहाडों की पीडा बयां करता है। चंबा  जिले की नैसर्गिक खूबसूरती देश -विदेश  में मशहूर है।हाल ही में मुझे बनीखेत में कुछ दिन रहने का सौभाग्य मिला। बनीखेत मषहूर पर्यटक स्थल डलहौजी के  सैटलाइट कस्बा बनकर उभरा है। पर्यटक सीजन में डलहौजी के भीड-भडाके से बचने के लिए पर्यटक बनीखेत में रहना पसंद करते हैं। इससे बनीखेत का बेतरतीब विकास हो रहा है। जगह-जगह होटल और गेस्ट हाउसिस बनाए जा रहे हैं। पहाडों की यही सबसे बडी त्रासदी है। छोटे-छोटे गांव से लोग षहर आ रहे हैं और बडे गांव भी षहर बनते जा रहे हैं। गांव की जरुरत भी छोटी होती है और वह उसी हिसाब से जरुरतों को पूरी कर लेता है। मगर गांव का षहर बनना,  शहरीकरण की जरुरतों को पूरा नहीं कर पाता। यहीं से समस्या-दर-समस्या बढती जाती है। और बनीखेत भी  शहरीकरण की समस्याओं से जूझ रहा है।  इसे चंबा जिले का प्रवेश  द्धार  माना जाता है। चंबा जिले में एंट्री के लिए बनीखेत  में टैक्स चुकाना पडताा है। 70 के दशक में जब में पहली बार चंबा गया था, तब बनीखेत एक छोटा सा खूबसूरत गांव था। शहरीकरण की कोई समस्या नहीं थी। अपनी जरुरतों  खुद  पूरी कर रहा था। मगर पांच दशक  बाद बनीखेत स्लम जैसा दिखता है। सीवरेज नहीं   होने से नालियां ब्लॉक रहती है और कस्बे का सारा कचरा नालों में फेंका जा रहा है। सडकों पर जगह-जगह गड्ढे हैं और बेतरतीब ट्रैफिक। कस्बे की अंदरुनी सडक में एक तरफा ट्रैफिक का नियम में मगर कोई भी इसका पालन नहीं करता। पुलिस कहीं नजर नहीं आती। जहां खाली जगह मिली, शराबी बहां अड्डा जमा लेते हैं। गर्मियों में लोगों पीने के पानी के लिए जुझना पडता है, बरसात में कीचड और फीलों से।  इस कस्बे की हालात देखकर लगता नहीं है कि किसी ने इसके विकास पर गंभीरता से ध्यान दिया होगा। जो थोडा-बहुत विकास नजर आता है, उसका श्रेय एनएचपीसी को जाता है। चमेरा हाइडल प्रोजेक्ट निर्माण के समय एनएचपीसी ने बनीखेत में रिहायशी  बस्ती बसाई और क्स्बे में विकास के कुछ काम किए। स्थानीय लोग आज भी इसे याद करते है़। बनिखेत को आज भी योजनाबद्ध विकास की दरकार है।       

जिंदगी भर रुलाती बरसात !

इस साल (2018) भारत में 17 दिन पहले आई मॉनसून आते ही अपना रौद्र रुप दिखा रही है। मंगलवार को समूचे उत्तर भारत में जमकर पानी बरसा। बुधवार को भी भारी बरसात जारी रही और उत्तराखंड मे स्थिति भयावह बनी हुई है। एक माह पहले बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे षिमला में सोमवार-मंगलवार को इतनी बारिष हुई कि 68 साल पुराना रिकॉर्ड ही टूट गया। 24 घंटों में षिमला में 118.6 मिमी (4.66 इंच) पानी बरसा। पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण  मंदिर परिसर में बाढ का पानी घुस आया। गुरु की नगरी में 77 मिमी बारिष रिकॉर्ड  की गई। लगातार बारिष ने बाढ के पुख्ता प्रबंध के सरकारी दावों की कलई खोल दी है। हर साल बरसात से पहले पुख्ता बाढ प्रबंधों का दावा किया जाता है मगर ज्यादा पानी बरसते ही तमाम दावे धराषायी हो जाते हैं। देष में हर साल औसतन  300 से 650 मिमी (11.8 से 25.6 इंच) पानी बरसता है और पूरा  जल प्रंबध- जलाषयों से भूमिगत जल -  बरसात के पानी पर आश्रित है। देष में सिंचित कृशि क्षेत्र का 60 फीसदी और ग्रामीण और षहरी क्षेत्रों की पेयजल सप्लाई का 80 फीसदी भूमिगत जल पर निर्भर है। इस स्थिति के दृश्टिगत बरसाती पानी देष के जल प्रबंध के लिए बेहद जरुरी है। मगर बाढ के पानी से हो रहे जलभराव को रोकने के लिए इसके निकासी की सटीक व्यवस्था भी उतने ही जरुरी है। छोटे षहरों की दुर्दषा तो दीगर रही, चंडीगढ जैसे आधुनिक षहर में भी समुचित निकासी नहीं होने के कारण ज्यादा बरसात होते ही सडकों पर पानी भर जाता है। बाढ की रोकथाम के लिए 14वें वित्त आयोग ने पांच साल के लिए करीब 9 अरब डालर आवंटित कर रखे हैं। इसके बावजूद देष में बाढ रोकने के पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाए हैं। वैसे 70 और 80 दषक की तुलना में से होने वाले नुकसान में कमी आई है। 70 के दषक में देष को बाढ से जीडीपी का 0.86 फीसदी नुकसान था, इस समय यह घटकर 0.01 फीसदी ही रह गया है। इन आंकडों से पता चलता है कि पचास साल में कुछ तो हुआ है।  भारत में बरसात का पानी ही जल के प्रमुख स्त्रोतों को रिचार्ज  करता है। मगर साल-दर- साल देष को बाढ से जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड रहा है। सिंयुक्त राश्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार भारत को बाढ से हर साल 7 अरब डॉलर से भी ज्यादा का नुकसान उठाना पड रहा है। हिमाचल, उत्तराखंड और पूर्वोतर के पहाडी राज्यों को बाढ का ज्यादा खमियाजा भुगतना पडता है।  2011 से 2013 के बीच बाढ से  हिमाचल प्रदेष को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.86 फीसदी के बराबर का नुकसान उठाना पडा था। अरुणाचल प्रदेष को 2011 से 2014 के बीच बाढ से सबसे ज्यादा जीडीपी का 10 फीसदी नुकसान उठाना पडा था। इस दौरान बाढ से सिक्किम को 1.7 फीसदी और मेघालय को अपनी जीडीपी का 1.5 फीसदी के बराबर का नुकसान हुआ था। बहरहाल, बरसाती पानी का बेहतर प्रबंध देष के सामने सबसे बडी चुनौती है। बरसाती  पानी को संजोकर रखना और बाढ के पानी को भूमिगत जल स्तर को बढाने के वास्ते इस्तेमाल करने के लिए बृहद योजना की दरकार है। भारत में कुओं, तालाबों  और जलाषयों जैसे स्त्रोतों में पानी को संरक्षित जरने की पुरानी परंपरा है मगर भूमिगत जल स्तर लगातार गिरने से अधिकतर पंरपरागत जल स्त्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। इसके लिए वृक्षों का बेदर्दी से कटान भी काफी हद तक जिम्मेदार है। वृक्ष पानी को संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते है। वक्त-बेवक्त बरसात का रौद्र रुप  इसी का नतीजा है। समय रहते संभलने में ही देष की भलाई है।   

बुधवार, 4 जुलाई 2018

लोकपाल पर लंगडी चाल ?

केन्द्र में भाजपा नीत राजग की सरकार हो अथवा कांग्रेस नीत संप्रग सरकार,  भ्रष्ट  व्यवस्था को नकेल डालने के प्रयासों को पूरी संजीदगी से लागू करने से हर सरकार बचती रही है। 2011 में समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके समर्थकों  को लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए जितनी जद्दोजेहद करनी पडी थी, उससे कही ज्यादा मशक्कत समाज सुधारकों  को लोकपाल की नियुक्ति के लिए करनी पड रही है। 2011 के आंदोलन की बदौलत अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री तक बन गए हैं मगर अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है जबकि  लोकपाल बिल संसद में  2013 में ही पारित हो चुका है।  11 राज्यो में भी लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई गै।  और दुखद स्थिति यह है कि लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए भी देश  की  शीर्ष  अदालत सुप्रीम कोर्ट को ही बार-बार निर्देश  देने पड रहे हैं। नामी वकील  प्रशांत  भूषण की एनजीओ “कॉमन काज“ 2014 से  लोकपाल की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड रही है। कॉमन काज ने न्यायालय के निर्देश  के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति नहीं करने के लिए केन्द्र सरकार के खिलाफ अवमानना कार्यवाही के लिए याचिका दायर कर रखी है।  सोमवार को इसी याचिका की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को लोकपाल की नियुक्ति कब की जा रही है, इसकी संपूर्ण जानकारी दस दिन के भीतर देने के निर्देश  दिए। अप्रैल, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को विपक्ष के नेता की जगह किसी नामचीन विधिवेता नामजद करने का मार्ग  प्रषस्त कर दिया था। दरअसल, लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्य न्यायाधीष के अलावा विपक्ष का नेता भी नामजद है। मौजूदा लोकसभा में विपक्ष का कोई अधिकृत नेता नहीं है। विपक्ष का अधिकृत नेता बनने के लिए संबंधित विपक्षी दल के पास लोकसभा की कुल 545 सदस्यों का कम-से-कम  10 फीसदी होना अनिवार्य है। मौजूदा लोकसभा में सबसे बडी पार्टी कांग्रेस के पास 44 सदस्य हैं और यह 10 फीसदी की अनिवार्यता को पूरी नहीं करती है। इसीलिए, कांग्रेस को अधिकृत विपक्षी दल नेता का दर्जा  नहीं मिल पाया है।  लोकपाल की नियुक्ति टालने के लिए  केन्द्र सरकार को अच्छा बहाना मिल गया था मगर सुप्रीप कोर्ट ने 2017 में साफ कर दिया था कि विपक्ष का अधिकृत नेता नहीं होने का बहाना बना कर लोकपाल की नियुक्ति टाली नहीं जा सकती। सरकार ने दस फीसदी की अनिवार्यता हटाने के लिए संषोधन का प्रस्ताव किया  तो  है मगर यह अभी संसद में लटका पडा है। इस स्थिति के  दृष्टिगत  न्यायालय ने ही सुझाव दिया था कि अधिकृत विपक्ष नेता नहीं होने  की स्थिति में किसी विधिवेता को नियुक्त किया जा सकता है। सरकार ने इसमें भी एक साल लगा   दिए। इस साल मई में केन्द्र ने न्यायालय को बताया कि नामचीन विधि विषेशज्ञ मुकुल रोहतगी को लोकपाल नियुक्ति पैनल का सदस्य बनाया गया है मगर इसके बावजूद अभी तक पैनल की बैठक नहीं हो पाई है। 2011 में अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन को भाजपा का भी समर्थन था और तब भगवा पार्टी अविलंब लोकपाल की नियुक्ति की सबसे बडी पैरवीकार थी। 2014 के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में भी भाजपा ने लोकपाल की अविलंब नियुक्ति का वायदा किया था। यह बात पूरी दुनिया जानती है कि राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। चुनावी वायदों का क्या है, जितनी तेजी से किए जाते हैं, उतनी ही जल्दी भूला दिए जाते हैं मगर आज भी कुछ सच्चे एवं समर्पित नागरिक हैं, जो  देश  को गर्त में जाने से बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे है। इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत ही नहीं, दुनिया का हर मुल्क ऐसे ही लोगों के समर्पण, दमखम और सच्ची  निष्ठा  से ही फलता-फूलता है।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

अफ्गानिस्तान में सिखों की त्रासदी

मुसलमान बहुल, खासकर आतंक से पीडित मुल्कों में  सिखों का रहना-बसना कितना खतरनाक है, अफ्गानिस्तान  के जलालाबाद की ताजा घटना इसे उजागर करती है। सफर करे तो मौत का तांडव, शवों का अंतिम संस्कार तो मौत का खौफ। रविवार को आतंक पीडित  अफ्गानिस्तान  के पूर्वी प्रांत जलालाबाद में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने सिखों से भरी बस पर हमला करके बीस लोगों को मार गिराया। ये सभी लोग अफ्गानिस्तान के   राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने बस से जा रहे थे।  राष्ट्रपति गनी इन दिनों नंगरहार प्रांत के दो दिवसीय  दौरे पर आए हुए हैं। हमले से कुछ देर पहले ही वे जलालाबाद में थे। मरने वालों में सिख लीडर अवतार सिंह खालसा भी हैं। खालसा को हिंदू और सिख का अग्रणी नुमाइंदा माना जाता था। वे इस साल अक्टूबर में होने वाले संसदीय चुनाव लडने की योजना बना रहे थे। अफ्गानिस्तान के प्रमुख सिख नेता की हत्या से सिख समुदाय क्षुब्ध हैं।  अफ्गानिस्तान में सदियों से हजारों सिख रह रहे हैं और अधिकांश  कारोबार के सिलसिले में इस मुल्क में आकर बसे हैं। इस समय सबसे ज्यादा सिख जलालाबाद में रह रहे हैं।  पिछले बीस सालों से आतंक से लगातार पीडित होने के कारण काफी सिख अफ्गानिस्तान छोडकर जा चुके है। अस्सी के दशक में अफ्गानिस्तान की राजधानी काबुल में ही 20,000 से ज्यादा सिख थे मगर अधिकांश  1992 में गृह युद्ध शुरु होते ही यहां से अन्यत्र चले गए । अस्सी के दशक मे काबुल में 8 गुरुद्धारे हुआ करते थे मगर आतंक फेलाने वाले हैवानों ने “गुरु के पवित्र स्थान “को  भी  नहीं बख्षा और 7 को ध्वस्त कर डाला। अब केवल कार्त परवान का मुख्य गुरुद्वारा बचा है। काबुल में बचे अधिकतर सिख इसके आसपास ही रह रहे हैं। जलालाबाद में 2001 में लगभग  100 सिख परिवार के 700 लोग थे मगर अब 300 ही बचे हैं। इस शहर में दो गुरुद्वारे हैं और इनमेंसे एक को गुरु नानक देव जी के समय बनाया गया था। अफ्गानिस्तान में सिखों की कितनी आबादी है, इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं है मगर सिख नेताओं के अनुसार नब्बे के गृह युद्ध से पहले अफ्गानिस्तान में करीब 50, 000 सिख थे। 2013 में यह संख्या 800 ही रह गई थी। इसमेंसे अब केवल 300 परिवार काबुल में रह रहे थे। पूरे अफ्गानिस्तान में अब 3,000 सिख ही रह गए हैं।  अफ्गानिस्तान के सिख स्थानीय  पश्तो  बोलते  हैं और सदियों से यहां रह रहे हैं।  सिख कई बार अफ्गानिस्तान संसद के लिए भी चुने जा चुके हैं।  जय सिंह फनी पहले  सिख नेता थे, जो सत्तर के दशक में अफ्गान संसद के लिए निर्दलीय उम्मीदवार बतौर चुने गए थे। फनी के बहनोई गजेन्द्र सिंह सफारी अफगानिस्तान संसद जाने वाले दूसरे सिख नेता थे। मगर  अफगानिस्तान में लगातार अशांति  बने रहने के कारण बाद में उन्होंने सपरिवार इंग्लैंड में राजनीतिक शरण ले थी। अफ्गानी सिख महिला सामाजिक कार्यकर्ता  और पेशे  से डाक्टर अनारकली कौर भी अहिंसा और सहिष्णुता  के लिए सम्मानित हो चुकी हैं और संसद के लिए भी चुनी जा चुकी हैं। 2013 से संसद की एक-एक सीट हिंदू और सिखों के लिए आरक्षित है। इन सब बातों से आतंकियों का कोई सरोकार नहीं है। अफ्गानिस्तान में सिखों पर तरह-तरह के जुल्म ढाए जा रहे है। सिखों की धार्मिक मान्यताओं तक को नकारा जा रहा है। मृतकों को जलाने की परंपरा को रोका जा रहा है। 2003 में अफ्गानिस्तान की एक सिख महिला  का अंतिम संस्कार रोक दिया गया। शव को अंतिम संस्कार के लिए पाकिस्तान ले जाना पडा था । काबुल में सिखों से श्मशान  घाट तक  को छीन लिया गया है। 2007 में स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने शव  को जलाने पर सिखों की  पिटाई तक की गई । इतना सब होने पर सदियों से यहां बसे सिख परिवार अपना “मुल्क“ छोडने को तैयार नही है।

सोमवार, 2 जुलाई 2018

फिर बाहर आया काले धन का जिन

तीन साल तक “बोतल में कैद“ रहने के बाद काले धन का जिन फिर बाहर आ गया है। ताजा जानकारी के अनुसार  2017 में  स्विट्जरलैंड के बैंकों में जमा   भारतीयों का पैसा ्50 फीसदी बढकर सात हजार करोड ( 1.01 स्विस फ्रेंक) पहुंच गया था। काले धन के खिलाफ  सरकार की कार्रवाई के कारण पिछले तीन साल में  स्विट्जरलैंड के बैंकों में पैसा जमा कराने का सिलसिला  गिर रहा था। यह जानकारी क्योंकि स्विट्जरलैंड  के सेंट्रल बैंक ( स्विट्जरलैंड नेशनल बैंक-एसएनबी) द्वारा जारी की गई है, इसलिए इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। सेंट्रल बैंक द्वारा जारी आंकडों के मुताबिक 2017 में स्विट्जरलैंड के सभी बैंकों में विदेशियों का पैसा 3 फीसदी बढकर  1.46 लाख करोड स्विस फ्रैंक अथवा 100 लाख करोड पहुंच गया था। भारतीयों ने व्यक्ति रुप से 3200 करोड रु, दूसरे बैंको के जरिए 1050 करोड रु और प्रतिभूति (सिक्योरिटीज) के मार्फत 2640 करोड रु जमा कराए हैं। स्विट्जरलैंड में करीब चार सौ बैंक हैं और इनमें यूबीएस और क्रेडिस सुइस  सबसे बडे बैंक हैं। भारतीयों समेत विदेशों  का अधिकतर पैसा इन दोनों बैंकों में जमा है। दुनिया में जितनी गोपनीयता  स्विट्जरलैंड के बैंको में है, उतनी अन्य कहीं नहीं है। इसी वजह ज्यादातर विदेशी  स्विस बैंकों को तरजीह देते हैं। स्विस बैंकों के गोपनीय खातों को “नंबर्ड अकांउट“ कहा जाता है। इन खातों को नाम की बजाए नंबर से ऑपरेट किया जाता है और संबंधित बैंक के शीर्ष  अधिकारियों के अलावा किसी को भी इन खातों की भनक तक नहीं लगती है। गोपनीय खाते आसानी से नहीं मिलते हैं। केवल खास ग्राहकों को ही इन खातों की सुविधा दी जाती है। पकडे जाने के भय से अक्सर गोपनीय खाटाधारक चेक बुक और बैंक के क्रेडिट अथवा डेबिट कार्ड की सुविधा तक नहीं लेते हैं। इस स्थिति में स्विस बैंक के गोपनीय खातों को सुंघा तक नहीं जा सकता। अब तक यही माना जाता रहा है कि लोग अपना काला धन छिपाने के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल करते हैं। ताजा जानकारी से मोदी सरकार की चिंता बढ सकती हैे। पिछले लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने सत्ता में आते  ही विदेशों   में जमा काले धन को सौ दिन के भीतर स्वदेश  लाने का वायदा किया था। नवंबर, 2016 में मोदी सरकार ने अचानक नोटबंदी का फैसला लेकर 500 और 1000 रुपयों के पुराने नोट बंद करके  500 और 2000 के नए नोट जारी किए थे। तब यह दावा किया था कि नोटबंदी से काला धन बाहर आएगा मगर ऐसा नहीं हुआ। नोटबंदी पर किए गए लगभग सभी अध्ययन यही कहते हैं कि नोटबंदी से सिवा आम आदमी को असुविधा होने के कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। आरबीआई के अनुसार नोटबंदी के बाद 99 फीसदी 500 और 1000 के प्रतिबंधित नोट बैकों में वापस आ गए थे। इससे साफ था कि नोटबंदी से काले धन पर कोई असर नहीं पडा। इसके विपरीत नोटबंदी से पहले  2016 में स्विस बैंको में भारतीयों का जमा पैसा 45 घट चुका था। पिछले एक दशक के दौरान   विदेशों  में जमा भारतीयों के धन में काफी गिरावट आई है। 2006 में स्विस बैंकों में भारतीयों का 23 हजार करोड रुपए जमा था और  2017 में यह 7 हजार करोड रु ही रह गया था। जाहिर है भारत सरकार की सख्त कार्रवाई के कारण इसमें गिरावट आई है और इसका ज्यादा श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को जाता है। काला धन भारत की ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए यब बहुत बडी सिरदर्द है। यूरोप मे काला धन जीडीपी का 4.45 फीसद है तो सब सहारन अफ्रीका में सबसे ज्यादा ्5.53 फीसद है। एशिया में यह सबसे कम जीडीपी का 3.75 फीसद है। नामचीन अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबित काले धन के बगैर भारतीय अर्थव्यवस्था नौ फीसदी की ग्रोथ से आगे बढती। काश , ऐसा होता!