सोलह साल तक अनशन पर रहना कोई आसान काम नहीं है। मणिपुर की 44 साल की इरोम शर्मिला ने “लगभग“ असंभव“ को संभव कर दिखाया है। पर इतने लंबे समय से जिस प्रकल्प के लिए शर्मिला भूखी-प्यासी और अपनों से दूर रही, उसे पूरा न होते देख थक-हार कर अब मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता ने अनशन तोडने का ऐलान किया है। मंगलवार को इंफाल में इरोमा की पेशी थी। इस दौरान उन्होंने पत्रकारोॅ से कहा, “ अब मैं थक चुकी हूं,। सोलह साल से “अफ्सपा- सशस्त्र सेना स्पेशल पावर्स एक्ट- के खिलाफ अकेले लड रही हूं, किसी सत्ता , राजनीतिक शक्ति और समर्थन के बगैर। अब शादी कर घर बसाना चाहती हैं और चुनाव भी लडना चाहती हूं“। मणिपुर में पंजाब, उत्तर प्रदेश के साथ 2017 के शुरु में विधानसभा चुनाव होने हैं। 9 अगस्त को इरोम अपना उपवास तोड देंगी। ”आयरन लेडी” नाम से विख्यात इरोमा ने 2000 में अनशन शुरु किया था। नवंबर, 2000 को इंफाल के निकट मलोमा बस स्टैंड में बस का इंतजार कर रहे दस लोगों को खडे-खडे गोलियों से भून दिया गया था। तब इस नरसंहार के लिए असम राइफल्स के जवानों को दोषी ठहराया गया था। मृतकों में 62 साल की वृद्ध महिला और राष्ट्रीय वीरता पुरुस्कार (नेशनल ब्रेवरी अवार्ड) विजेता 18 वर्षीय सिनम चंद्रामणि भी शामिल थी। इस घटना ने इरोमा को इतना उद्वलेति किया कि उन्होंने अफ्सपा हटाने के लिए तुरंत अनशन शुरु कर दिया। सरकार कई साल से उन्हें नाक में टयूब डालकर जबरन खिला रही है, ताकि वह जिंदा रह सके। इसके बावजूद लगभग 3500 दिनों तक इरोम भूखी-प्यासी रही है। दुनिया की सबसे लंबी भूख हडताल का रिकार्ड भी उनके नाम है। 2014 में एमएसएन ने इरोमा को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ”विमेन आइकॉन आफ इंडिया” चुना था। एमनेस्टी इंटनेशनल शर्मिला को विवेकी कैदी ( प्रिजन ऑफ कांसियस) घोषित कर चुकी है। मणिपुर की राजधानी इंफाल का जवाहर लाल नेहरु अस्पताल का एक वार्ड उनकी जेल है, जहां कई साल से सरकार ने उन्हें रखा है। दरअसल, बार-बार आत्महत्या की कोशिश करने के लिए उन्हें गिरफ्तार और रिहा किया जाता रहा है। यह सिला कई सालों से चल रहा है। 16 साल तक अनशन करने के बावजूद इरोमा द्वारा शुरु किया गया संघर्ष अभी अधूरा है और देश की अवाम के लिए कई सवाल छोड गया है। शर्मिला ने मणिपुर में अफ्सपा के खिलाफ जो लडाई लडी है, वही मांग कश्मीर और पूर्वोतर के अन्य राज्य भी कर रहे हैं। हिंसा और अलगाववाद से पीडित मणिपुर समेत पूर्वोतर के सात राज्यों में अमन-चैन बनाए रखने के लिए केन्द्र ने लगभग छह दशक से सषस्त्र सेना स्पेशल पावर्स एक्ट (अफ्सपा) लगा रखा है। 1958 में पारित इस एक्ट के तहत सेना को इन राज्यों में किसी को भी गिरफ्तार करने, तलाशी लेने और कहीं भी रेड करने के विशेष अधिकार दिए गए हैं। आतंकी घटनाएं बढने पर 1983 में अफ्सपा को पंजाब और चंडीगढ में लागू किया गया था मगर अमन-चैन लौटते ही 1997 मे इसे राज्य से उठा लिया गया था। 1990 से जम्मू-कष्मीर में भी अफ्सपा लागू है और अब इस राज्य के अधिकतर सियासी नेता और अवाम इसे हटाने की मांग कर रहे हैं। पूर्वोतर और जम्मू-कश्मीर में अफ्सपा लागू रहने और सेना की तैनाती के बावजूद निर्दोष लोगों के मारे जाने की वारदातें कम नहीं हुई है। अनुमान है पूर्वोतर राज्यों में अब तक आतंकी हिंसा में 50,000 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। मणिपुर में ही पांच हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इस स्थिति के मद्देनजर पूर्वोतर में अफ्सपा ज्यादा प्रभावी नजर नहीं आ रहा है। इसके विपरीत अफ्सपा से जनमानस राष्ट्रीय मुख्यधारा से दूर होता जा रहा है। शर्मिला का संघर्ष जाया नहीं जाएगा। देर-सबेर पंजाब की तरह मणिपुर समेत पूर्वोतर में भी अफ्सपा के लिफ्ट होने की उम्मीद की जा सकती है।
गुरुवार, 28 जुलाई 2016
षर्मिला का अधूरा व्रत
Posted on 8:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सोलह साल तक अनशन पर रहना कोई आसान काम नहीं है। मणिपुर की 44 साल की इरोम शर्मिला ने “लगभग“ असंभव“ को संभव कर दिखाया है। पर इतने लंबे समय से जिस प्रकल्प के लिए शर्मिला भूखी-प्यासी और अपनों से दूर रही, उसे पूरा न होते देख थक-हार कर अब मणिपुर की सामाजिक कार्यकर्ता ने अनशन तोडने का ऐलान किया है। मंगलवार को इंफाल में इरोमा की पेशी थी। इस दौरान उन्होंने पत्रकारोॅ से कहा, “ अब मैं थक चुकी हूं,। सोलह साल से “अफ्सपा- सशस्त्र सेना स्पेशल पावर्स एक्ट- के खिलाफ अकेले लड रही हूं, किसी सत्ता , राजनीतिक शक्ति और समर्थन के बगैर। अब शादी कर घर बसाना चाहती हैं और चुनाव भी लडना चाहती हूं“। मणिपुर में पंजाब, उत्तर प्रदेश के साथ 2017 के शुरु में विधानसभा चुनाव होने हैं। 9 अगस्त को इरोम अपना उपवास तोड देंगी। ”आयरन लेडी” नाम से विख्यात इरोमा ने 2000 में अनशन शुरु किया था। नवंबर, 2000 को इंफाल के निकट मलोमा बस स्टैंड में बस का इंतजार कर रहे दस लोगों को खडे-खडे गोलियों से भून दिया गया था। तब इस नरसंहार के लिए असम राइफल्स के जवानों को दोषी ठहराया गया था। मृतकों में 62 साल की वृद्ध महिला और राष्ट्रीय वीरता पुरुस्कार (नेशनल ब्रेवरी अवार्ड) विजेता 18 वर्षीय सिनम चंद्रामणि भी शामिल थी। इस घटना ने इरोमा को इतना उद्वलेति किया कि उन्होंने अफ्सपा हटाने के लिए तुरंत अनशन शुरु कर दिया। सरकार कई साल से उन्हें नाक में टयूब डालकर जबरन खिला रही है, ताकि वह जिंदा रह सके। इसके बावजूद लगभग 3500 दिनों तक इरोम भूखी-प्यासी रही है। दुनिया की सबसे लंबी भूख हडताल का रिकार्ड भी उनके नाम है। 2014 में एमएसएन ने इरोमा को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ”विमेन आइकॉन आफ इंडिया” चुना था। एमनेस्टी इंटनेशनल शर्मिला को विवेकी कैदी ( प्रिजन ऑफ कांसियस) घोषित कर चुकी है। मणिपुर की राजधानी इंफाल का जवाहर लाल नेहरु अस्पताल का एक वार्ड उनकी जेल है, जहां कई साल से सरकार ने उन्हें रखा है। दरअसल, बार-बार आत्महत्या की कोशिश करने के लिए उन्हें गिरफ्तार और रिहा किया जाता रहा है। यह सिला कई सालों से चल रहा है। 16 साल तक अनशन करने के बावजूद इरोमा द्वारा शुरु किया गया संघर्ष अभी अधूरा है और देश की अवाम के लिए कई सवाल छोड गया है। शर्मिला ने मणिपुर में अफ्सपा के खिलाफ जो लडाई लडी है, वही मांग कश्मीर और पूर्वोतर के अन्य राज्य भी कर रहे हैं। हिंसा और अलगाववाद से पीडित मणिपुर समेत पूर्वोतर के सात राज्यों में अमन-चैन बनाए रखने के लिए केन्द्र ने लगभग छह दशक से सषस्त्र सेना स्पेशल पावर्स एक्ट (अफ्सपा) लगा रखा है। 1958 में पारित इस एक्ट के तहत सेना को इन राज्यों में किसी को भी गिरफ्तार करने, तलाशी लेने और कहीं भी रेड करने के विशेष अधिकार दिए गए हैं। आतंकी घटनाएं बढने पर 1983 में अफ्सपा को पंजाब और चंडीगढ में लागू किया गया था मगर अमन-चैन लौटते ही 1997 मे इसे राज्य से उठा लिया गया था। 1990 से जम्मू-कष्मीर में भी अफ्सपा लागू है और अब इस राज्य के अधिकतर सियासी नेता और अवाम इसे हटाने की मांग कर रहे हैं। पूर्वोतर और जम्मू-कश्मीर में अफ्सपा लागू रहने और सेना की तैनाती के बावजूद निर्दोष लोगों के मारे जाने की वारदातें कम नहीं हुई है। अनुमान है पूर्वोतर राज्यों में अब तक आतंकी हिंसा में 50,000 से ज्यादा निर्दोष लोग मारे जा चुके हैं। मणिपुर में ही पांच हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। इस स्थिति के मद्देनजर पूर्वोतर में अफ्सपा ज्यादा प्रभावी नजर नहीं आ रहा है। इसके विपरीत अफ्सपा से जनमानस राष्ट्रीय मुख्यधारा से दूर होता जा रहा है। शर्मिला का संघर्ष जाया नहीं जाएगा। देर-सबेर पंजाब की तरह मणिपुर समेत पूर्वोतर में भी अफ्सपा के लिफ्ट होने की उम्मीद की जा सकती है।
बुधवार, 27 जुलाई 2016
अरे भाई यह कैसा न्याय !
Posted on 8:08 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अठारह साल तक अदालतों के चक्कर काटने के बाद आखिर बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान हिरण शिकार के आरोपों से बरी हो ही गए। राजस्थान हाई कोर्ट ने सोमवार को उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया है। कहते हैं “रोग और अभियोग“ बडों-बडों को भी पस्त कर देता है। 1998 में फिल्म “हम साथ-साथ हैं“ की शूटिंग के दौरान जोधपुर स्थित घोडा फार्म हाउस और भवाद गांव में सलमान खान पर काले हिरण के शिकार करने के आरोप थे और दो मामलों में वे प्रमुख आरोपी थे। अधीनस्थ अदालत ने इन मामलों में सलमान खान को क्रमषं पांच साल और एक साल की सजा सुनाई थी। इसके विरुद्ध सलमान खान ने राजस्थान हाई कोर्ट में अपील कर रखी थी। न्यायालय ने सुनवाई पूरी करते हुए इस साल 16 मार्च और 13 मई को फैसला सुरक्षित रखा था। सोमवार को न्यायालय ने सलमान खान को दोनों मामलो में दोषमुक्त कर दिया। सलमान खान पर अभी भी कांकाणी हिरण शिकार और अवैध रुप से हथियार रखने का मामला चल रहा है। सलमान खान का अदालती संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। बिश्नोई समाज ने इस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का ऐलान किया है। काला हिरण इस समाज के लिए गाय की तरह पूजनीय हे ओर बिश्नोई महिलाएं उन्हें अपना दूध तक पिलाती हैं । सलमान खान को हाई कोर्ट से यह दूसरी बडी राहत है। इससे पहले बंबई हाई कोर्ट ने सलमान खान को 2002 के चर्चित “हिट एंड रन” मामले में भी बरी कर दिया था जबकि सेशन कोर्ट ने इस मामले में उन्हें पांच साल की कैद की सजा सुनाई थी। इस मामले में सलमान खान पर सितंबर 27, 2002 को देर रात शराब के नशे में अपनी टोयटा लैंड क्रूजर कार से एक आदमी को कुचलने और चार अन्य को गंभीर रुप से घायल करने के आरोप थे। 15 दिसंबर, 2015 को सुनाए गए फैसले में बंबई हाई कोर्ट (मुंबई स्थित हाई कोर्ट को अभी भी बंबई हाई कोर्ट ही कहा जाता है) ने सलमान खान को सभी आरोपों से बरी कर दिया। महाराष्ट्र सरकार तक ने हाई कोर्ट के इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में “विकृत“ बताया है। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर कर रखी है। इसी माह (पांच जुलाई को) सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली है। बहरहाल, ताजा फैसले ने आम आदमी की इस धारणा को फिर बलवित कर दिया है कि रसूखदार और बडे लोग कानूनी पेचदगियों का फायदा उठाकर अक्सर बच निकलते हैं और गरीब निर्दोष होते हुए भी फंस जाता है। बुंबई हाई कोर्ट के फेसले पर भी सोशल मीडिया में कडी प्रतिकिताएं व्यक्त की गईं थी और आशंका जाहिर की गई थी कि सलमान खान का रुतबा और पैसा उन्हें बचाने में कामयाब हो रहा है। ताजा फैसले पर भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएं आ रही है। दरअसल, भारत में कानून आज भी आम आदमी के जरा भी पक्ष में नही है। अदालतें दलीलों और वकीलों से चलती हैं और इस बिला पर फैसले भी सुनाए जाते हैं। सलमान खान के मामले में भी यही कहा जा सकता है। दोनो मामलों में देश के नामी गिरामी वकील उनके मुकदमे लड रहे हैं और वादी इस मामले में उनकी बराबरी कर ही नहीं सकते। अदालतें सबूतों पर फैसले सुनाती हैं और वकील यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि सबूतों को नष्ट करके आसानी से खूनी को भी निर्दोष साबित किया जा सकता है। राजस्थान के हिरण शिकार मामले में बचाव पक्ष के वकील ने कोर्ट में साबित कर दिया कि इस घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। सलमान खान के वकीलों ने न्यायालय में यह भी साबित कर दिया कि सलमान खान की एयरगन से काले हिरण का शिकार नहीं किया जा सकता। सलमान के वकीलों ने और भी कई दलीलें दी जिन्हें अदालत ने मान लिया। अक्सर पाया गया हे कि न्यायालय में सरकारी वकील रसूखदार अभियुक्तों के वकीलों के आगे बौने साबित होते हैं। अब तक यही होता रहा है।
मंगलवार, 26 जुलाई 2016
भारत-चीन संबंधों में कटुता
Posted on 9:06 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत-चीन संबंधों में कटुता
न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप (एनएसजी) में भारत की एंट्री का चीन द्वारा मुखर विरोध किए जाने के बाद से दोनों मुल्को के बीच कटुता बढी है। मगर इतनी भी नहीं कि पाकिस्स्तान की तरह बातचीत का सिलसिला बंद हो जाए। चीन सफल कूटनीतिज्ञ है और इस समय साउथ चाइना समुद्र विवाद में उसे भारत के साथ की जरुरत है। नई दिल्ली द्वारा चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिन्हुआ के तीन पत्रकारों का वीजा बढाने से चीन खफा है और ड्रेगन ने भारत को इस कार्रवाई के गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी है। मगर यह सब हवाई बातें है। चीन के प्रमुख समाचार पत्र का आरोप है कि भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप पर बीजिंग के स्टैंड से चिढा हुआ है और उसने अपनी खीज मिटाने का नजला पत्रकारों पर गिराया है। चीन में मीडिया पर सरकार का कडा नियंत्रण है और वहां के समाचार पत्र वही लिखते हैं , जो सरकार द्वारा उनसे लिखने के लिए कहा जाता है। भारत ने चीन की सरकारी एजेंसी सिन्हुआ के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख और मुंबई स्थित दो संवाददाताओं को देश निकाला दिया है । इन तीनों पर खुफिया एजेंसियां कडी नजर रखे हुए थीं। भारत सरकार का कहना है तीनों पत्रकार पत्रकारिता के अलावा भी “बहुत कुछ कर रहे थे“। तीनों का वीजा जनवरी में समाप्त हो गया था और अब से उन्हें एक-एक माह के लिए बढाया जा रहा था। सरकार ने जुलाई के बाद तीनों का वीजा बढाने से इंकार कर दिया है। इस स्थिति में तीनों को जुलाई के बाद स्वदेश लौटना होगा। चीन का तर्क है कि भारत गौण मुद्दे को खामख्वाह “राई का पहाड“ बना रहा है। न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री का चीनी विरोध सिद्धातों पर आधारित है। चीन समेत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनपीटी) का हर सदस्य परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है मगर भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए है। इसी बिला पर चीन एनएसजी में भारत की एंट्री का विरोध कर रहा है। चीन के इस दावे में दम भी है। भारत के साथ-साथ पाकिस्तान ने भी एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और भारत की देखादेखी उसने भी एनपीटी मे एंट्री के लिए आवेदन कर रखा है। भारत का एनपीटी में विरोध चीन की भले ही कूटनीतिज्ञ चाल हो, मगर इस मामले में नई दिल्ली का पक्ष कमजोर लगता है। भारत की ताजा कार्रवाई के प्रतिक्रिया स्वरुप चीन भी कुछ भारतीय पत्रकारों को स्वदेश भेज सकता है। इससे ज्यादा इस मामले में और कुछ होने से रहा। भारत इस समय चौतरफा दुश्मनों घिरा है। भारत की सीमाएं सात देशों के साथ लगती है और इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार से भारत में जबरदस्त घुसपैठ हो रही है। पाकिस्तान से इस समय संबंध बेहद खराब हैं। जम्मू-कश्मीर में हालिया हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने पर पाकिस्तान कश्मीर को हथियाने के “मुंगेरी लाल के सपने“ देख रहा है और हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकी भारत के साथ जंग लडने की बातें कर रहे है़ं। पाकिस्तान में सेना और सेना में आईएसआई का खासा दखल है। हाफिज सईद आईएसआई का कारिंदा है और अगर वह जंग की बातें करता है, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। बहरहाल, सुखद स्थिति यह है कि 1980 के बाद भारत और चीन के बीच संबंध मधुर हुए हैं और पुरानी कडवाहट भुलाकर दोनों देश आगे बढे हैं। 2008 के बाद चीन, भारत का सबसे बडा व्यापारिक पार्टनर है और दोनों देशों में सैन्य और सामरिक सहयोग भी बढा है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन के राश्ट्रपति शी जिनपिंग भारत का दौरा कर चुके हैं और मोदी चीन का। चीन के समाचार पत्रों ने भी इस बात का उल्लेख किया है। चीनी मीडिया का आकलन भी यही है कि पहले की अपेक्षा द्धिपक्षीय संबंध सुधरे हैं और छोटी-मोटी घटनाएं इन संबंधों को बिगाड नहीं सकते।
न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप (एनएसजी) में भारत की एंट्री का चीन द्वारा मुखर विरोध किए जाने के बाद से दोनों मुल्को के बीच कटुता बढी है। मगर इतनी भी नहीं कि पाकिस्स्तान की तरह बातचीत का सिलसिला बंद हो जाए। चीन सफल कूटनीतिज्ञ है और इस समय साउथ चाइना समुद्र विवाद में उसे भारत के साथ की जरुरत है। नई दिल्ली द्वारा चीन की सरकारी समाचार एजेंसी सिन्हुआ के तीन पत्रकारों का वीजा बढाने से चीन खफा है और ड्रेगन ने भारत को इस कार्रवाई के गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी है। मगर यह सब हवाई बातें है। चीन के प्रमुख समाचार पत्र का आरोप है कि भारत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप पर बीजिंग के स्टैंड से चिढा हुआ है और उसने अपनी खीज मिटाने का नजला पत्रकारों पर गिराया है। चीन में मीडिया पर सरकार का कडा नियंत्रण है और वहां के समाचार पत्र वही लिखते हैं , जो सरकार द्वारा उनसे लिखने के लिए कहा जाता है। भारत ने चीन की सरकारी एजेंसी सिन्हुआ के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख और मुंबई स्थित दो संवाददाताओं को देश निकाला दिया है । इन तीनों पर खुफिया एजेंसियां कडी नजर रखे हुए थीं। भारत सरकार का कहना है तीनों पत्रकार पत्रकारिता के अलावा भी “बहुत कुछ कर रहे थे“। तीनों का वीजा जनवरी में समाप्त हो गया था और अब से उन्हें एक-एक माह के लिए बढाया जा रहा था। सरकार ने जुलाई के बाद तीनों का वीजा बढाने से इंकार कर दिया है। इस स्थिति में तीनों को जुलाई के बाद स्वदेश लौटना होगा। चीन का तर्क है कि भारत गौण मुद्दे को खामख्वाह “राई का पहाड“ बना रहा है। न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप में भारत की एंट्री का चीनी विरोध सिद्धातों पर आधारित है। चीन समेत न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनपीटी) का हर सदस्य परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर कर चुका है मगर भारत ने एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए है। इसी बिला पर चीन एनएसजी में भारत की एंट्री का विरोध कर रहा है। चीन के इस दावे में दम भी है। भारत के साथ-साथ पाकिस्तान ने भी एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं और भारत की देखादेखी उसने भी एनपीटी मे एंट्री के लिए आवेदन कर रखा है। भारत का एनपीटी में विरोध चीन की भले ही कूटनीतिज्ञ चाल हो, मगर इस मामले में नई दिल्ली का पक्ष कमजोर लगता है। भारत की ताजा कार्रवाई के प्रतिक्रिया स्वरुप चीन भी कुछ भारतीय पत्रकारों को स्वदेश भेज सकता है। इससे ज्यादा इस मामले में और कुछ होने से रहा। भारत इस समय चौतरफा दुश्मनों घिरा है। भारत की सीमाएं सात देशों के साथ लगती है और इनमें पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार से भारत में जबरदस्त घुसपैठ हो रही है। पाकिस्तान से इस समय संबंध बेहद खराब हैं। जम्मू-कश्मीर में हालिया हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने पर पाकिस्तान कश्मीर को हथियाने के “मुंगेरी लाल के सपने“ देख रहा है और हाफिज सईद जैसे खूंखार आतंकी भारत के साथ जंग लडने की बातें कर रहे है़ं। पाकिस्तान में सेना और सेना में आईएसआई का खासा दखल है। हाफिज सईद आईएसआई का कारिंदा है और अगर वह जंग की बातें करता है, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। बहरहाल, सुखद स्थिति यह है कि 1980 के बाद भारत और चीन के बीच संबंध मधुर हुए हैं और पुरानी कडवाहट भुलाकर दोनों देश आगे बढे हैं। 2008 के बाद चीन, भारत का सबसे बडा व्यापारिक पार्टनर है और दोनों देशों में सैन्य और सामरिक सहयोग भी बढा है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद चीन के राश्ट्रपति शी जिनपिंग भारत का दौरा कर चुके हैं और मोदी चीन का। चीन के समाचार पत्रों ने भी इस बात का उल्लेख किया है। चीनी मीडिया का आकलन भी यही है कि पहले की अपेक्षा द्धिपक्षीय संबंध सुधरे हैं और छोटी-मोटी घटनाएं इन संबंधों को बिगाड नहीं सकते।
रविवार, 17 जुलाई 2016
शीला दीक्षित की लोकप्रियता
Posted on 11:52 am by mnfaindia.blogspot.com/
कांग्रेस की कार्यशैली भी विचित्र है। जिस शीला दीक्षित को तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहने के बावजूद 2015 में डंप कर दिया गया था और विधानसभा चुनाव में प्रचार के काबिल भी नहीं समझा गया था, उन्हीं को पार्टी अब सिर-आंखों पर बिठा रही है। काग्रेस ने 78 वर्षीय शीला दीक्षित को देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार नामित किया है। शीला उत्तर प्रदेश की बहू है और पंजाब की बेटी। पंजाब में जन्मी शीला दीक्षित उत्तर प्रदेश के अग्रणी ब्राहृाण परिवार में ब्याही गई हैं। उनके ससुर पदम विभूषण उमा शंकर दीक्षित केद्र में मंत्री और कर्नाटक एव पश्चिम बंगाल के राज्यपाल रह चुके हैं। शीला दीक्षित उमा शंकर के आईएएस बेटे विनोद दीक्षित की पत्नी है। शीला का बेटा संदीप दीक्षित दिल्ली से सांसद है। कांग्रेस को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के अग्रणी ब्राहृाण परिवार की बहू सताइस साल से सत्ता से बेदखल हुई पार्टी को बहुमत दिला सकती है। उत्तर प्रदेश में लगभग दस फीसदी ब्राहृाण मतदाता हैं । बहुजन समाज पार्टी के दलित और जमजवादी पार्टी के पिछडा-अल्पसंख्यक गणित में बंटे राज्य में दस फीसदी वोट खासे मायने रखते हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में सुश्री मायावती की बसपा ने टिकट वितरण में ब्राहृाणों को खासी तव्वजो दी थी और इसका पार्टी को फल भी मिला था। बसपा को पहली बार विधानसभा में पूर्ण बहुमत मिला था। तब विधानसभा चुनाव के बाद कराए गए सर्वेक्षण से पता चला था कि हालांकि पूए राज्य में मात्र 17 फीसदी बाहृाणों ने ही बसपा को वोट डाले थे मगर जिन हलको में बसपा ने ब्राहृाण उम्मीदवार उतारे थे, वहां बडी संख्या में ब्राहृाण मतदाताओं ने बसपा उम्मीदवारों के पक्ष में वोट डाले थे और अधिकतर जीते भी थे। 2009 के लोकसभा चुनाव में ब्राहृाण मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया और तब पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 मेंसे 21 सीटें जीतीं थी और सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक दल को पांच सीटें मिली थीं। 2004 के लोकसभा चुनाव में काग्रेस उत्तर प्रदेश में मात्र 9 सीटें जीत पाईं थी। 1984 के बाद कांग्रेस का यह श्रेष्ठ प्रदर्शन था। वैसे उत्तर प्रदेश में ब्राहृाण भाजपा का साथ देते रहे है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में अधिकतर ब्राहृाण भाजपा के साथ थे। तदुपरांत उनका भाजपा से मोह भंग हो गया। भाजपा में ब्राहृाण नेता मुरली मनोहर जोशी और कलराज मिश्र की अपेक्षा ठाकुर नेता राजनाथ सिंह को कहीं ज्यादा अहमियत दी गई है। राज्य के ब्राहृाणों को ठाकुरों की दबंगी फूटी आंख भी नहीं सुहाती है। बहरहाल, चुनाव गणित यही साबित करता है कि उत्तर प्रदेश में सत्ता हासिल करनी है तो वोट केचिंग समीकरण बैठाने ही पडेंगें। इसी सियासी विवशता के कारण कांग्रेस ने युवा प्रियंका गांधी वाड्रा की बजाए 78 वर्षीय शीला दीक्षित को ज्यादा बेहतर माना है। पार्टी ने ठाकुर मतदाताओं को लुभाने के लिए संजय सिंह को चुनाव प्रचार अभियान का प्रमुख बनाया है और अल्पसंख्यकों के वोट में सेंध लगाने के लिए राज बब्बर को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया है। एक जमाना था जब कांग्रेस का दलित वोटों पर एकाधिकार हुआ करता था मगर बहुजन समाज पार्टी के उभरने से कांग्रेस का यह वोट भी जाता रहा । अल्पसंख्यक और पिछडे आज भी मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी के साथ हैं। भाजपा द्वारा मतदाताओं का धु्रवीकरण कराए जाने की स्थिति में अल्पसंख्यक पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के साथ खडे हो जाते हैं। इस स्थिति में अल्पसंख्यकों को लगता है कि काग्रेस की बनिस्बत सपा सत्ता के ज्यादा करीब है। कांग्रेस ने चुनावी गणित का जमा-नफा करके समीकरण बैठा तो लिए हैं मगर इससे उत्तर प्रदेश में पार्टी का बंटाधार नहीं हो पाएगा। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पार्टी के स्थानीय वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर “पैराशूटी“ किरण बेदी को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाया था। मगर यह प्रयोग सफल नहीं हुआ। उतर प्रदेश कांग्रेस लगभग मरणासन्न की स्थिति में है। पार्टी में जान फूकने के लिए लोक लुभावने करिश्माई नेता की दरकार है। शीला दीक्षित इस फ्रेम में फिट हो पाएंगी, कांग्रेस के लिए अब भी यही बडी चुनौती है।
शुक्रवार, 15 जुलाई 2016
शैतानी आयतें
Posted on 7:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कुरान में शैतान को अल्लाह और मोहम्मद से ज्यादा चालाक बताया गया है क्योंकि शैतान कहीं अधिक कुटिल होता है। मगर शैतान इंसानियत को लहू-लुहान करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकता । वह किसी भी हाल में अल्लाह और पैगम्बर नहीं बन सकता । यही बात शैतानी पाकिस्तानी पर सटीक बैठती है। भारत के आंतरिक मामले में दखल देना तो पाकिस्तान की फितरत बन गई है। पडोस में अमन-चैन से रहने की बजाय शैतानी पाकिस्तान, खुद भी आतंक की आग में झुलस रहा है और भारत को भी इसकी लपटों से जलाने की हर संभव कोशिश कर रहा है। भारत पडोसी धर्म निभाने की लाख कोशिश कर ले, पाकिस्तानी अपनी शैतानी फितरतों से बाज आने से रहा। आतंकी हिंसा में झुलस रही कश्मीर घाटी में “आग में पेट्रोल“ डालने की मंशा से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने शु क्रवार को केबिनेट की विषेश बैठक बुलाई और 19 जुलाई को "ब्लैक डे " मनाने का इ ऐलान कर डाला। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बुरहान वानी की मौत पर अफसोस जाहिर करते हुए कहा था कि “उन्हें इस समाचार से गहरा सदमा पहुंचा है“। नवाज शरीफ के इस वक्तव्य से साफ है कि पाकिस्तान कश्मीर में आतंक का नंगा नाच करा रहा है और आतंक फैलाने वाले उसके ही “भाडे के ट्ट्टू हैं। बुरहान वानी भी पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रहा था। वह हिजबुल का कमांडर था और इस आतंकी संगठन को पाकिस्तान की सेना और उसकी ”खुफिया” एजेंसी आईएसआई का खुला समर्थन है। पाकिस्तान ने कश्मीर का मुद्दा फिर सयुंक्त राष्ट्र संघ में उठाया और इस पर भारत ने उसे खरी-खोटी भी सुनाई। सयुंक्त राष्ट्र भारत के स्थाई प्रतिनिधि सैयद अकबरुद्यीन ने पाकिस्तान को “ आतंक का मोहल्ला“ बताते हुए कहा कि आतंक इस देश की स्टेट पॉलिसी है और आतंक फैलाना इसका धर्म। पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंच पर बार-बार कश्मीर में जनमत संग्रह कराने की मागं करता है। भारत और पाकिस्तान के बीच अब तक जितनी भी संधियां या समझोते हुए है, सभी में कश्मीर समस्या को आपस में बातचीत करके सुलझाने पर सहमति हो रखी है। मगर पाकिस्तान संधि के फौरन बाद पलट जाता है। निसंदेह, कश्मीर के हालात सामान्य नहीं है और घाटी की अमन पसंद अवाम पर अलगाववादी और पाकिस्तानी पिठ्ठू ंहिंसक माहौल थोप रहे हैं। पर्यटन मेहनतकश कश्मीरियों की रोजी-रोटी का प्रमुख साधन है मगर हिंसा के माहौल में अवाम की कमाई का एकमात्र जरिया भी जाता रहा है। इन दिनों घाटी में प्रर्यटन सीजन चल रहा था मगर अलगाववादियों ने हिंसा का तांडव फैलाकर, इसे बर्बाद कर दिया। और जो तत्व लोगों की रोजी-रोटी ही छीन ले, वे अवाम के सबसे बडे दुश्मन । पाकिस्तान कश्मीर में अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आएगा और न ही इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने से पीछे हटेगा। इस जमीनी सच्चाई का ख्याल करते हुए ही भारत को अपनी रणनीति तय करनी होगी। जम्मू-कश्मीर से आतंकियों का जड से सफाया करना भारत की पहली प्राथमिकता है और सरकार इस दिशा में काम भी कर रही है मगर सियासी हित इसमें आडे आ रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंक को जड से मिटाने के लिए अवाम का भरपूर सहयोग जरुरी है। जब तक आतंकियों को स्थानीय लोगों का समर्थन रहेगा, सुरक्षा बलों को बडी सफलता नहीं मिल पाएगी। बुरहान नवी के मामले ने फिर यह बात साफ कर दी है। कश्मीर को केन्द्र से उदार वित्तीय मदद मिलती रही है मगर यह पांच फीसदी भी पात्र आदमी तक नहीं पहुंचती है। भरष्ट नौकरशाही और बिचौलिए बीच में ही इसे हजम कर जाते हैं। इसलिए, सरकार को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि केन्द्र से भेजी गई सौ फीसदी मदद पात्र तक पहुंचे। राज्य में बडे पैमाने पर रोजगार का सृजन करने की जरुरत है ताकि युवाओं को बुरहान वानी बनने से रोका जा सके। सरकार अगर कश्मीर की अवाम का दिल जीत लेने में कामयाब हो जाती है तो पाकिस्तान को भाव दिखाने की गुजांइश ही नहीं रहेगी। शैतान का उसकी आयतों से ही खात्मा किया जा सकता है।
गुरुवार, 14 जुलाई 2016
जोर का झटका
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सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश में “भाजपा द्वारा प्रायोजित“ दल-बद्लुओं की सरकार को अवैध करार देकर मोदी सरकार को तगडा झटका दिया है। न्यायालय ने अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन को भी असंवैधानिक बताया है। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले से न केवल लोकतंत्र मजबूत हुआ है, अलबत्ता केन्द्र में सत्ताधारी दल को इस बात के लिए चेताया है कि न्यायपालिका संवैधानिक पावर्स का बेजा इस्तेमाल नहीं होने देगी। उत्तराखंड के बाद फिर अरुणाचल प्रदेश के मामले में मोदी सरकार की खासी किरकिरी हुई है और दोनों ही राज्यों के राज्यपालों की जगहंसाई हुई है। देश को कथित कांग्रेस मुक्त करने के चक्र में भाजपा खुद असंवैधानिक कुचक्र में उलझ कर रह गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा द्वारा पिछले साल दिसंबर के बाद लिए गए सभी फैसले निरस्त कर दिए हैं और राज्य में 15 दिसंबर से पहले की स्थिति बहाल करने के आदेश दिए हैं। यानी अरुणाचल्ल प्रदेश में अब दल-बदलुओं की जगह नाबाम टुकी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पदस्थ हो जाएगी। कंग्रेस के लिए यह बहुत बडी राहत है। अरुणाचल प्रदेश में पिछले साल उस समय राजनीति संकट खडा हो गया था, जब कांग्रेस के 47 मेंसे 21 विधायकों ने मुख्यमंत्री नाबाम टुकी को हटाने की मांग की थी। कांग्रेस हाई कमान ने जब इस मांग को मानने से इंकार कर दिया, बागी विधायकों ने पार्टी छोड दी और कालिखो पुल को अपना नेता चुन लिया। इसके बाद काफी राजनीतिक उठा-पटक हुई। राज्यपाल राजखोवा ने विधानसभा सत्र को जनवरी माह में बुलाने की अपनी ही अधिसूचना को निरस्त कर दिया और सत्र पहले बुला लिया। संविधान में राज्यपाल को ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है। विधानसभा का सत्र केवल मंत्रिमंडल की सिफारिश पर बुलाया जा सकता है। बागियों ने भाजपा के साथ मिलकर कम्युनिटी हॉल में विधान सभा सत्र आयोजित कर विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया गया। बाद में गुवाहटी उच्च न्यायालय ने बागियों की इस कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। उच्च न्यायालय ने सत्र बुलाने की राज्यपाल की कार्रवाई को भी असंवैधानिक बताया था। मगर समकालीन विषुद्ध राजनीतिक “राज्यपालों“ को न्यायपालिका की फटकार से भी कोई फर्क नहीं पडता है। केन्द्र ने राजनीतिक अस्थिरता का हवाला देकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। राज्यपाल राजखोवा ने 15 मिनट के भीतर अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश की थी। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में इस बात का संज्ञान भी लिया था और संबंधित फाइल तलब की थी। सर्वोच्च न्यायालय राज्य में सराकर बनाने की प्रकिया पर रोक हटाए जाने के बाद 19 फरवरी को राज्यपाल राजखोवा ने दल-बदलुओ के नेता कालिखो पुल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई और 11 सदस्यीय भाजपा ने सरकार का साथ दिया। जाहिर है अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार को अपदस्थ करने में भाजपा की प्रमुख भूमिका रही है। वैसे कांग्रेस भी इस मामले में दूध की धुली नही है। 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 60 मेंसे 42 सीटें जीतीं थी और बाद में पीपीए के पांच विधायकों को दल-बदल करवाकर दो-तिहाई बहुमत हासिल कर लिया था। इसके बावजूद भी सरकार गिर गई। अरुणाचल प्रदेश में दल-बदल का खेल काफी पहले से जारी है। 2003 में कांग्रेस के वरिष्ठ गेगांग अपांग ने 34 विधायकों को साथ लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुट मिथि का तख्ता पलट दिया था। अपांग अब भाजपा में है। निसंदेह, अरुणाचल प्रदेश पर न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक और अभूतपूर्व है। उतराखंड के बाद न्यायपालिका का यह दूसरा ऐतिहासिक फैसला है और दल-बदलुओं को बडी नसीहत। तथापि कांग्रेस के लिए अरुणाचल में राह आसान नहीं है। सरकार बहुमत के बल पर बनती -गिरती है। मुख्यंमत्री टुकी के पास फिलहाल बहुमत नहीं है। उन्हें बहुमत जुटाना होगा। दल-बदलू विधायकों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। पद के भूखे दल-बदलू आराम से नहीं बेठेगें और राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी। मध्यावधि विधानसभा चुनाव ही एकमात्र विकल्प नजर आ रहां है।
बुधवार, 13 जुलाई 2016
आरएसएस और मुस्लिम
Posted on 8:04 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश में कटटर दक्षिणपंथी विचारधारा और हिंदुत्व की संरक्षक राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) और मुस्लिम समुदाय के बीच संवाद के प्रयास शुरु होना काबिलेगौर घटना है। और इससे भी बडी सुखद घटना यह है कि सुन्नी उलेमा काउंसिल के सदस्यों ने खुद पहल करके राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत से मिलने का समय मांगा । इन दिनों उत्तर प्रदेश के कानपुर में संघ के प्रांतीय प्रचारकों की सालाना बैठक चल रही है। इसी बैठक के सिलसिले में मोहन भागवत भी कानपुर में है। सुन्नी उलेमा काउंसिल के सदस्य ने भागवत से कानपुर में मिलने का समय मांगा था। मगर उन्हें भागवत से मिलने का समय नहीं दिया गया। इसलिए, काउंसिल के सदस्यों ने आरएसएस प्रमुख को चिठ्ठी लिखकर कुछ सवाल पूछे हैं और एक अहम सवाल यह है कि “ संघ मुसलमानों से कैसा राष्ट्रप्रेम चाहता है? संभवतय, आरएसएस प्रमुख इस अप्रत्याशित मुलाकात और सवालों के लिए तैयार नहीं थे, इसीलिए मुस्लिम नेताओं को मिलने का समय नहीं दिया गया? उलेमा काउसिल ने और भी कई सवाल उठाए है और सब का लब्बोलुआब यही है कि संघ को देश के मुस्लिम समुदाय के संदर्भ में अपना दृष्टिकोण और हिन्दुत्व की परिभाषा सुस्पष्ट करनी चाहिए। सुन्नी उलेमा काउंसिल की इस पहल का मकसद कुछ भी हो मगर एक बात साफ है कि अगर संघ में देश के मुसलमानों को स्पेस दी जाती है, तो वे इस पर विचार कर सकते हैं। और इस मार्ग में सबसे बडा रोडा संघ और उसके परिवार का कट्टरवादी दृष्टिकोण और विचारधारा है। भारत की सवा सौ करोड की आबादी में 18 फीसदी के करीब मुसलमान है और इनमें अधिकतर शिया और सुन्नी हैं। माना जाता है कि ईरान के बाद शिया मुसलमानों की सबसे बडी आबादी भारत में है। लेकिन सुन्नी मुसलमानों की आबादी भी कम नहीं है। बहरहाल, मुस्लिम समुदाय का राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की प्रांतीय बैठक के दौरान आरएसएस प्रमुख से मुलाकात करने की पहल से माना जा सकता है कि देश का मुस्लिम उतरोत्तर संघ और भगवा संगठनों के प्रति जो भ्रातियां पाले हुए है, उन्हें दूर करने के लिए वह तैयार है। अब गेंद संघ के पाले में है। संघ को भी मुस्लिम नेताओं से संवाद करने की पहल करनी चाहिए। मुसलमान भारत के अभिन्न अंग है और इसी तथ्य के मद्देनजर संविधान निर्माताओं ने देश के लिए धर्म सापेक्ष (पाकिस्तान) की बजाय धर्म निरपेक्ष का मार्ग चुना था। आरएसएस को भले ही इस संवैधानिक व्यवस्था पर ऐतराज हो मगर संघ इस सच्चाई से भी भलि-भांति परिचित है कि भारत पाकिस्तान की तरह धर्म सापेक्ष नहीं बन सकता । और इसी सच्चाई के दृष्टिगत 2002 में तत्कालीन संघ प्रमुख केएस सुदर्शन की पहल पर “मुस्लिम राष्ट्रीय मंच“ का गठ्न भी किया गया था। मुस्लिम समुदाय में आरएसएस के प्रति फैलाई गई भ्रांतियों को दूर करना और दोनों समुदाय के बीच की दूरी को पाटना इस मंच का प्रमुख मकसद था। मगर गोदरा कांड और गुजरात दंगों से मंच के प्रयास पर पानी फिर गया। अब यह मंच योगा के माध्यम से मुस्लिम समुदाय तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है। 2015 में मंच ने “योगा और इस्लाम“ नाम से एक पुस्तक भी निकाली थी। इस मंच की पहल पर ही योगा से सूर्य नमस्कार पर नरम रुख अपनाया गया था। बहरहाल, संघ को भी अब बाबा आदम के जमाने की मानसिकता से बाहर निकलना चाहिए। धर्म निरपेक्ष देश मे हर सामाजिक संगठन को धर्म की जगह राष्ट्रीयता पर फोक्स करना चाहिए। भारत हिंदु, मुसलमान, ईसाई सभी का मुल्क है और यहां धर्म की जगह देश के प्रति निष्ठा सर्वोपरि होनी चाहिए। संघ को भी इस मामले में अपनी प्राथमिकता को बदलना होगी । भारत, भारतीयों का देश है और इसमें हिन्दु, मुस्लिम, सिख, ईसाई सभी बराबर हैं। अगर हम दंगे-फसाद और असहिष्णुता को छोडकर मिलकर देश को आगे बढाएं, तो भारत 2050 तक दुनिया का सबसे ताकतवर बन जाएगा। तब तक पूरी दुनिया में हिन्दुओं और भारतीय मुस्लमानों की आबादी में भी सबसे विशाल होगी।
मंगलवार, 12 जुलाई 2016
Burning Kashmir Underscores Utter Failure Of Indian Govt Policy
Posted on 8:06 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सुरक्षा बलों द्वारा जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी आतंकी संगठन हिजबुल के पोस्टर बॉय बाइस वर्षीय खूंखार आतंकी बुरहान वानी को मार गिराने के बाद पूरी घाटी हिंसा और विरोध प्रदर्शन में सुलग रही है। कश्मीर के ताजा हालात इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि घाटी मे हवा राष्ट्रीय मुख्यधारा के पक्ष में नहीं है। सुरक्षा बलों ने किसी निर्दोष को नहीं, बल्कि खूंखार आतंकी को मार गिराया है। पिछले कई माह से वानी सोशल मीडिया पर धडल्ले से सैन्य पोशाक में अपनी और अन्य आतंकियों की फोटो पोस्ट करता और बडी शान से अपनी और अपने गिरोह की आतंकी हरकतों की डींगें हांकता। इसी वजह उसे आतंकी संगठ्न हिजबुल का पोस्टर बॉय भी कहा गया। सेना के हाथों मारे जाने पर मीडिया में उसकी जो फोटो प्रकाशित हुई है, उससे ऐसा लग रहा था जैसे कोई आतंकी नहीं, अलबत्ता सैनिक मारा गया हो। इस तरह की कुछ बातें हैं, जो कश्मीर में हालात को और ज्यादा बिगाड रहे हैं। आतंकी को मारना कोई अपराध नहीं है। मगर बुरहान वानी की मौत पर पूरी कश्मीर घाटी ऐसे उबल रही है जैसे कोई आतंकी नहीं, देशभक्त मारा गया हो। और जमीनी सच्चाई भी यही है। घाटी में अलगाववादी और पाकिस्तानी पिठ्ठू बुरहानी और उस जैसे आतकी की मौत को “ शहादत“ के रुप में पेश कर रहे हैं और अवाम भी कमोवेश यही मान रहा है। बुरहानी न तो कोई देशभक्त था और न ही बडा नेता। आतंक का चोला पहनकर और खून-खराबा करके कोई देशभक्त या फाइटर नहीं बन जाता। दुखद स्थिति यह है कि कश्मीर घाटी में पाकिस्तान के पिठ्ठू अवाम को गुमराह करने में सफल रहे हैं और राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीतिक दल अलगाववादियों को अलग-थलग करने में पूरी तरह से विफल । कश्मीर के अधिकतर युवा सेना में भर्ती होने की बजाए आतंकी संगठनों की ओर ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं। अलगाववादी और आतंकी संगठन युवाओं को आसानी से गुमराह कर लेते हैं क्योंकि स्थानीय और राष्ट्रवादी नेता खुद पद और पैसे के पीछे भागते हैं। और यही वजह है कि सियासी नेताओं पर स्थानीय लोगों का जरा भी भरोसा नहीं रह गया है और वे पूरी तरह से नकार दिए गए हैं। जब कभी भी कश्मीर घाटी में हिंसा भडकती है, अलगाववादी और पाकिस्तानी समर्थक स्थिति का खूब फायदा उठाते हैं। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। घाटी की अवाम में सुरक्षा बलों के प्रति इतनी घृणा है कि लोग-बाग सेनिकों और पुलिसकर्मियों को देखते ही पत्थर फेंकते हैं। पत्थरबाजी के लिए राज्य सरकार ने कई लोगों को जेल में भी ठूंसा और मुकदमे चलाए मगर यह सिलसिला थमा नहीं। वानी के मौत से पहले ईद पर राज्य सरकार ने 634 पत्थरबाजों के खिलाफ 103 मुकदमे वापस ले लिए थे। अब वही लोग फिर से सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी कर रहे हैं। कश्मीर की अवाम घाटी में सेना की तैनाती के सख्त खिलाफ रही है। सेना की उपस्थिति को कश्मीरी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में बेवजह का दखल मानते हैं। लंबे समय से घाटी में सेना तैनात है। उस पर सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियन (एएफएसपीए) के तहत सुरक्षा बलों को किसी के घर में तलाषी लेने अथवा किसी को गिरफ्तार करने के अधिकार मिलने से इनका बेजा इस्तेमाल होना स्वभाविक है। नतीजतन, सुरक्षा बलों पर जब-तब यौन उत्पीडन अथवा हत्या के आरोप लगते रहे हैं। कश्मीर घाटी के ताजा हालात से एक बात तो साफ है कि अवाम मेनस्ट्रीम से दूर होती जा रही है और स्थानीय नेता और सरकार पूरी तरह से विफल हो चुकी हैॅ। केन्द्र से भारी वित्तीय मदद के बावजूद अवाम का राष्ट्रीय मुख्य धारा से पूरी तरह से नहीं जुड पाई है। यह स्थिति देश की अखंडता के लिए ठीक नहीं है। अब समय आ गया है कि कष्मीर को लेकर केन्द्र और सभी राजनीतिक दलों को मिल-बैठ कर कारगर नीति बनानी चाहिए।
सोमवार, 11 जुलाई 2016
मोदी की अफ्रीकी यात्रा
Posted on 5:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अफ्रीकी दौरा कई मायनों में अर्थपूर्ण है। पहली बार संभवतय दाल खरीद किसी प्रधानमंत्री की विदेशी यात्रा का प्रमुख ऐजेंडा रहा है। भारत में दाल की आसमान छूती कीमतों के कारण प्रधानमंत्री का चिंतित होना स्वभाविक है। इसीलिए प्रधानमंत्री पांच दिन की यात्रा के दौरान सबसे पहले मोजाम्बिक पहुंचे और लंबे समय के लिए अफ्रीकी दाल खरीदने का समझौता किया। 34 बाद मोदी अफ्रीकी देश मोजाम्बिका के दौरे पर जाने वाले पहले प्रधानमंत्री है। वीरवार को भारत और मोजाम्बिक के बीच तीन समझौते हुए और दाल खरीद इनमेंसे प्रमुख है। पिछले महीने केन्द्र सरकार ने मोजाम्बिक से एक लाख टन दालें खरीदने का मार्ग प्रशस्त किया था। सरकार ने 2020-2021 तक मोजाम्बिक से दो लाख टन दालें खरीदने का लक्ष्य रखा है। इसी मकसद से भारत मोजाम्बिक को दालों का उत्पादन बढाने में तकनीकी मदद भी करेगा। वीरवार को इस आशय का करार भी हुआ। भारत मोजाम्बिक को तूर (पीजन पीइज) की दाल उगाने में भी मदद करेगा। मोजाम्बिक की यात्रा के बाद शुक्रवार को प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। दस साल बाद भारतीय प्रधानमंत्री दक्षिण अफ्रीका की यात्रा करेंगे। इन दस साल में दोनों देशॉ में काफी कुछ बदल गया है। दस साल पहले दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स में नहीं था और तब भारत की तरह यह देश भी रंगभेद से उभर कर तेजी से आगे बढ रहा था। इसी वजह 2010 में नाइजीरिया की बजाए दक्षिण अफ्रीका को ब्रिक्स में शामिल कर लिया गया। नाइजीरिया दक्षिण अफ्रीका से कहीं बढा है और अफ्रीकी महाद्धीप का बेहतर नुमाइंदगी कर सकता है मगर इस देश के घरेलू हालात ठीक नहीं है और उसका ग्रोथ रेट भी दक्षिण अफ्रीका से काफी कम है। यद्यपि भारत की तरह अब दक्षिण अफ्रीका भी ब्रिक्स का सदस्य है मगर उसकी अर्थव्यवस्था भी भारत की तरह सुस्त पडी है। दक्षिण अफ्रीका भारत के ज्यादा करीब है और भारत के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध भी है। इंडियन नेशनल कांग्रेस (आईएनसी) और अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) में काफी कुछ समानता है। भारत में कांग्रेस की तरह अब दक्षिण अफ्रीका की एएनसी का जलवा भी लुप्तप्राय हो रहा है। एएनसी भी भरष्टाचार की मारी है। भारत की अपेक्षा दक्षिण अफ्रीका ज्यादा युवा है। इसकी 65.2 फीसदी आबादी 16 से 64 साल की आयु वालों की हैं। लगभग तीस फीसदी के करीब 15 साल अथवा इससे कम उमर के हैं। मात्र 4.6 फीसदी 65 साल से ज्यादा उमर के लोग हैं। इसकी तुलना में भारत में साठ साल से ज्यादा आयु वालों की आबादी 2006 से 2050 के बीच 270 फीसदी बढ जाएगी। भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच मधुर संबंधों के बावजूद कुछ अप्रिय ऐतिहासिक घटनाएं आडे आती हैं। महात्मा गांधी को स्वराज की प्रेरणा भी दक्षिण अफ्रीका से ही मिली थी। रंगभेद के चलते महात्मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका में अपमानित किया गया था। दक्षिण अफ्रीका में लंबे समय तक रंगभेद रहा है। इसी रंगभेद का परिणाम है कि दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम में आज भी स श्वेत खिलाडी कहीं ज्यादा नजर आते हैं। 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह और दक्षिण अफ्रीका के राश्ट्रपति ठाबो म्बेकि के बीच जो अहम समझौते हुए थे, उन मेंसे अधिकतर पर अमल ही न हो पाया । टाटा स्टील ने दक्षिण अफ्रीका के नियोटेल से अपना हाथ खींच लिया है। भारतीय एयरटेल का एमटीएन से करार सिरे नहीं चढा है। दक्षिण अफ्रीकी का पहला नेशनल बैंक भारत में आज तक पांव नहीं रख पाया है। दोनों देशों के संबंधों में आज वह गरमी नहीं है, जो पहले हुआ करती थी। इसकी प्रमुख वजह है दक्षिण अफ्रीका का चीन के प्रति लगाव। समकालीन पूरा अफ्रीका महाद्धीप चीन के ज्यादा निकट है। भारत ने अब तक अफ्रीका को ज्यादा तरजीह नहीं दी थी। प्रधानमंत्री की मौजूदा यात्रा से यह खाई कुछ हद तक पाटी जा सकती है।
रविवार, 10 जुलाई 2016
अब पारित हो जाएगा जीएसटी बिल
Posted on 5:28 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लंबे समय से राज्य सभा की धूल चाट रहे गुडस एंड सर्विसिस बिल (जीएसटी) को अब हर हाल में पारित हो जाना चाहिए। और संभावना यही है कि मॉनसून सत्र में यह बिल राज्यसभा से पारित हो जाएगा। देश इस वजह से पहले ही काफी नुकसान झेल चुका है और इसके लिए कांग्रेस की खामख्वाह की जिद्द जिम्मेदार है। देश हित से जुडे अहम मामलों को सियासी हितों के लिए नहीं भुनाया जाना चाहिए, यह बात देश की सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी से ज्यादा और कौन जानता है? देश को फिरंगियों के शासन से आजाद कराने में काग्रेस पार्टी की अहम भूमिका रही है और पार्टी इस पर अक्सर इतराती भी रहती है। पर अब कांग्रेस यह बात कैसे भूल गई है कि जीएसटी जैसे अहम बिल को संसद में पारित होने से रोकना और इसकी राह में रोडे अटकाना कतई राष्ट्रहित में नहीं है। इससे सत्तारूढ भाजपा का कोई नुकसान नहीं हुआ है। अगर नुकसान हुआ है तो देश की अर्थव्यवस्था का। जीएसटी से पूरे देश में एक समान कर व्यवस्था लागू होनी है और इससे सकल घरेलू उत्पादन में डेढ से दो फीसदी का इजाफा हो सकता है। जनमानस सवाल कर सकता है कि जीएसटी को राज्यसभा से पारित नहीं होने देने से देश को इतना बडा नुकसान कराकर काग्रेस को क्या मिला? कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाल के अनुसार पार्टी जीएसटी का विरोध नहीं कर रही है क्योंकि इस बिल की परिकल्पना कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने ही की थी। मगर कांग्रेस की इस बात में कोई दम नहीं है। लोकसभा मई, 2015 में इस बिल को ध्वनि मत से पारित कर चुकी है। तब कांग्रेस ने बिल पर सरकार का समर्थन करने की बजाय सदन का ही बॉयकॉट कर दिया था। यह विरोध ही तो था। इसके बाद से बिल राज्यसभा में अटका पडा है। राज्यसभा में बिल को पारित करवाने के लिए मोदी सरकार के पास अब तक आवश्यवक बहुमत नहीं था। इस बिल को राज्यसभा से पारित कराने के लिए मोदी सरकार को कांग्रेस के समर्थन की जरुरत थी मगर पार्टी ने ऐडी-चोटी का जोर लगाकर इसे पारित नहीं होने दिया। अब जबकि ताजा हालात में कांग्रेस को लग रहा है कि जीएसटी बिल संसद के मॉनसून सत्र में पारित हो जाएगा, पार्टी के सुर बदल गए हैं। बहरहाल, कांग्रेस अब अगर राज्यसभा में सरकार का समर्थन न भी करे, तो भी जीएसटी बिल आसानी से पारित हो सकता है। हाल ही में सपन्न राज्यसभा चुनाव की 58 सीटों मेंसे भाजपा नीत राजग ने 23 सीटों पर विजय प्राप्त की है और इस गठबंधन को 12 सीटों का फायदा हुआ है और कांग्रेस को 6 का नुकसान। इस स्थिति में क्षेत्रीय दलों के सहयोग से सरकार जीएसटी बिल को राज्यसभा में आसानी से पारित करवा सकती है। कांग्रेस के लिए यही बेहतर होगा कि अपनी बची-खुची लाज बचाने की खातिर पार्टी जीएसटी बिल पर सरकार से सहयोग करे। एक अप्रैल, 2016 से तो जीएसटी लागू नहीं हो सका, अब कम-से-कम अगले साल से तो हर हाल में इसे लागू हो जाना चाहिए। संवैधानिक संशोधन बिल होने की वजह से इसे संसद के दो-तिहाई बहुमत के अलावा कम-से-कम पचास फीसदी विधानसभाओं द्वारा पारित करना भी अनिवार्य है। इसके बाद ही इस बिल को राष्ट्रपति की सहमति मिल सकती है ओर यह कानून बन सकता है। इस प्रकिया में कुछ समय लग सकता है। बहरहाल, जीएसटी के लागू होने से पूरे देश में अलग-अलग कर की जगह एक समान एक ही कर लागू होगा। इस समय कुल मिलाकर सोलह कर लगाए जाते हैं और इससे न केवल गुडस और सर्विसिस महंगी हो जाती हैं, अलबत्ता व्यापारियों और उत्पादकों को सौ तरह की औपचारिकताओं से निपटना पडता है। जीएसटी के तहत जीरो रेंटिग (इनपुट शुल्क में राहत) और ज्यादा प्रभावी हो जाएगी। बहुकर और बहु रिटर्न फाइलिंग खत्म हो जाएगी और कर व्यवस्था पारदर्शी बन जाएगी। और भी कई फायदें होंगे जिससे देश में उत्पादन बढेगा। इससे सरकार का राजस्व भी बढेगा। कुछ राज्यों की यह आशंका निर्मूल है कि जीएसटी से राज्य की वित्तीय स्वायतता कम होगी। वित्तीय स्वायतता कर लगाने से नहीं, बल्कि आय बढने से मिलती है। जीएसटी के प्रभावी होने पर हर राज्य को ज्यादा राजस्व मिलेगा।
गुरुवार, 7 जुलाई 2016
मंत्रिमंडल फेरबदल
Posted on 6:58 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को अपने मंत्रिमंडल से कुछ को बाहर करके और नए एवं युवाओं को शामिल करके “एक तीर से कई निशाने“ साधे हैं। प्रधानमंत्री ने फेरबदल से पहले कहा था कि वे मंत्रिमंडल का विस्तार कर रहे हैं, फेरबदल नहीं। मगर उन्होंने भारी फेरबदल किया। पांच मंत्रियों को बाहर का रास्ता दिखाया गया है। 19 नए चेहरे शामिल किए गए हैं और सब-के-सब अनजान चेहरे हैं। “विवादों की रानी“ और पार्टी कौ पोस्टर गर्ल मानी जाने वाली स्मृति ईरानी से मानव संसाधन मंत्रालय छीन लिया गया है और उन्हें गैर-महत्वपूर्ण कपडा उधोग (टेक्स्टाइल) मंत्रालय में भेजा गया है। भाजपा में “मिस्टर संयत और कूल“ प्रकाश जावेडकर को मानव संसाधन मंत्रालय सौंपा गया है। स्मृति ईरानी शिक्षा का भगवाकरण करने में काफी सुस्त रही हैं। भाजपा की जननी राष्ट्रीय स्वंय सेवक को भगवाकरण की जल्दी है। स्मृति की शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी अक्सर सवाल उठाए जाते रहे हैं। मानव संसाधन मंत्रालय के तहत यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन, सेंट्रल यूनिवर्सिटीज जैसे कई बड़े और प्रतिष्ठित संस्थान आते हैं। जाहिर है इस मंत्रालय को उच्च शिक्षित और अनुभवी मंत्री की दरकार है। स्मृति ईरानी कुछ ज्यादा ही जोश दिखा रही थी और अक्सर विवादों में उलझी रहती थीं। बहरहाल, प्रकाश जावेडकर शिक्षा के भगवाकरण में तेजी ला सकते हैं। पार्टी के वयोवृद्ध नेता यशवंत सिंहा के पुत्र जयंत सिन्हा को वित्त मंत्रालय से बाहर करके मोदी ने सीनियर सिन्हा के पर कतरे हैं। यशवंत सिन्हा पिछले कुछ समय स बागी तेवर अपनाए हुए हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य अपना दल की बागी नेता अनुप्रिया पटेल को मंत्रिमंडल में शामिल करने पर हुआ है। मोदी ने ताकतवर सहयोगी दल शिवसेना और अकाली दल को दरकिनार कर कम वजनदार अपना दल को ज्यादा तरजीह दी है । साफ है पंजाब की जगह उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए कहीं ज्यादा अहम है । अनुप्रिया उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर से पहली बार अपना दल की सांसद बनी हैं। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में अपना दल से गठबंधन कर रखा था। लोकसभा चुनाव के बाद पिछले साल अनुप्रिया पटेल को उनकी माताश्री और पार्टी की संचालक कृष्णा पटेल ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए अपना दल से निष्कासित कर दिया था। इससे पार्टी दो फाड हो गई मगर पार्टी का बडा तबका कृष्णा पटेल के साथ ही रहा। 2009 में अपना दल के संस्थापक और अनुप्रिया पटेल के पिता का सडक दुर्घटना में निधन हो जाने के बाद मां-बेटी पार्टी को चला रही थी। अनुप्रिया को मंत्रिमंडल में शामिल कर भाजपा ने हालांकि “माताश्री“ कृष्णा पटेल की नाराजगी मोल ले ली है मगर यही भाजपा की रणनीति भी है। अनुप्रिया युवा हैं और तेज-तर्रार भी। वे कुर्मी समुदाय से हैं और इस समुदाय का बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति में खासा वर्चस्व है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार भी कुर्मी समुदाय से हैं और भाजपा को नीतिश को चुनौती देने के लिए एक युवा चेहरे की दरकार थी। अनुप्रिया में भाजपा यह संभावना तलाश रही है। देर-सबेर अनुप्रिया का भाजपा में शामिल होना तय है। प्रधानमंत्री ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को सामने रखकर नए चेहरे शामिल किए हैं। 2017 के शुरू में उत्तर प्रदेश , पंजाब और उत्तराखंड के चुनाव होने हैं और साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेश के। इसीलिए उत्तर प्रदेश को खासी तरजीह दी गई है और जातीय समीकरण का खास ख्याल रखा गया है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से उत्साहित भाजपा उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी स्पष्ट बहुमत हासिल करने के प्रति आशान्वित है। मंत्रिमंडल फेरबदल से पहले प्रधानमंत्री ने बाकायदा हर मंत्री के कामकाज का जायजा लिया। कुछ चेहरों को बाहर निकालने और कुछ के विभाग बदलने की यह सोची-समझी रणनीति थी। कुल मिलाकर मंत्रिमंडल फेरबदल से मोदी ने पार्टी के भीतर राजनीतिक समीकरण को नई दिशा दी है। मंत्रियों को भी स्पष्ट संदेश दिया गया है कि जिनकी परफॉरमेंस संतोषजनक नहीं होगी, उन्हें इसका खमियाजा भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
बुधवार, 6 जुलाई 2016
इतिहास से सबक लें
Posted on 8:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आम आदमी पार्टी के साथ इन दिनों सब कुछ बुरा ही हो रहा है। एक रोज आप के विधायक को महिला से बदसलूकी के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है, जैसे पूरे देश में ऐसा करने वाले वह एकमात्र नेता हैं। अगले दिन आप के विधायक पर पंजाब के एक कस्बे में कुरान की बेअदबी के लिए मामला दर्ज किया जाता है। इस घटना की स्याही सूखी भी नहीं थी कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजेन्द्र कुमार को पचास करोड के कथित घपले में सीबीआई द्वारा गिरफ्तार कर लिया जाता है। कुमार के खिलाफ सबूत जुटाने के लिए सीबीआई पिछले साल दिसंबर में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके दफ्तर को भी खंगाल चुकी है। इस पर भी खासा हंगामा हुआ था। इस पर सीबीआई की विशेष अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय को सीबीआई के जांच अधिकारी के खिलाफ न्यायालय की अवमानना चलाने का संदर्भ भी भेजा था। अदालत ने तब सीबीआई को इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि जांच एजेंसी कानून के दायरे में काम नहीं कर रही है। सीबीआई अदालत में कुमार के खिलाफ घूसखोरी का एक भी सबूत पेश नहीं कर पाई थी। पूरी दुनिया जानती है कि सीबीआई पिंजरे में कैद सरकारी तोता है और यह एजेंसी वही करती है, जो उसे करने के लिए कहा जाता है। यही सीबीआई हिमाचल प्रदेश मे मुख्यमंत्री का सरकारी और निजी निवास भी खंगाल चुकी है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत पाने के बाद अब आम आदमी पार्टी ने पंजाब का रुख किया है। लोकसभा चुनाव में आप ने पंजाब में तेरह मेंसे चार सीटें जीती थी जबकि पूरे देश में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली थी। पंजाब में जनवरी-फरवरी 2017 में विधानसभा चुनाव होने है। आम आदमी पार्टी पंजाब में सत्तारूढ शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को कडी चुनौती पेश कर रही है और यही बात मोदी सरकार पचा नहीं पा रही है। पिछले दस साल से पंजाब में शिअद-भाजपा गठबंधन सत्ता में है। इस स्थिति के दृष्टिगत सत्तारूढ गठबंधन के खिलाफ एंटी इंकूबेंसी फेक्टर सक्रिय हो सकता है। इससे आप को फायदा हो सकता है। पंजाब में काग्रेस भी लंबे समय तक सत्ता में रही है। इसलिए मतदाता विकल्प की तलाश में है। इसी बात से भयभीत सत्तारूढ गठबंधन और कांग्रेस दोनों के आक्रमण का केन्द्रबिंदु आम आदमी पार्टी है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार का परफॉरमेंस अपेक्षाकृत बेहतर रही है। आम आदमी को मुफ्त में पानी मिल रहा है और आधे दाम पर बिजली। पेयजल के संकट से काफी हद तक निजात मिली है। घूसखोरी भी काफी कम हुआ है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन के करप्ट शासन से जनता आजिज आ चुकी है। भ्रष्टाचार मुक्त शासन आम आदमी पार्टी का सबसे बडा चुनावी वायदा है। कहते हैं कि साफ छवि ईमानदार आदमी की दुखदी रग होती है। ईमानदार को बेइमान साबित कर दो वह कहीं का नहीं रहेगा। अरविंद केजरीवाल को तो भ्रष्टाचार में फंसा नहीं सकते, इसलिए उनके प्रधान सचिव को ही धर लिया गया। सौ बार झूठ बोला जाए तो अन्तोगत्वा वह सच मान लिया जाता है। मोदी सरकार ने भी यही रणनीति अपनाई है। राजेन्द्र कुमार की गिरफ्तारी से जनता में यह संदेश तो गया ही है कि अरविंद केजरीवाल भी दूध के धुले नहीं है। केजरीवाल की तरह राजेन्द्र कुमार भी आईआईटी के पूर्व छात्र हैं और इसी वजह मुख्यमंत्री ने उन्हें अपना प्रधान सचिव चुना था। कुमार दोषी हैं या नहीं, इस बात का फैसला अदालत करेगी। मगर एक सच्चाई यह भी है कि कलियुग में भी अंत में हमेशा सच्चाई की जीत होती है। भाजपा के नई पीढी के नेता भले ही न जानते हों मगर वयोवृद्ध नेता यह बात भली-भांति जानते हैं कि आपतकाल में इंदिरा गांधी सरकार ने भी यही किया था जो मोदी सरकार अब कर रही है। नेताओं को झूठे मामलों में फंसाकर कुछ भी हासिल नहीं होता है। जनता सब जानती है और समय आने पर दंडित भी करती है। भाजपा को दिल्ली विधानसभा चुनाव की शर्मनाक पराजय से कुछ तो सबक लेना चाहिए।
मंगलवार, 5 जुलाई 2016
यूनिफॉर्म सिविल कोड
Posted on 7:16 pm by mnfaindia.blogspot.com/
समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) पर मोदी सरकार की ताजा पहल से सियासी हलकों और अल्पसंख्यकों में हडकंप मच गया है। उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मोदी सरकार की इस पहल को ”सियासी तुरुप चाल” के रुप में देखा जा रहा है। तथापि, मोदी सरकार की यह पहल वास्तव में भाजपा के “हिंदू एजेंडे“ को लागू करने का ही हिस्सा है। मोदी सरकार शिक्षा का “भगवाकरण“ तो कर ही रही है, अब समान नागरिक संहिता को लागू करने के मामले में भी सरकार संजीदा नजर आ रही है। जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाली संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 370 को निरस्त करना, शिक्षा का भगवाकरण करना और पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करना भाजपा के “हिंदू“ एजेंडे का प्रमुख हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर में भाजपा अनुच्छेद 370 की जबरदस्त पैरवीकार पीडीपी के साथ सत्ता का सुख भोग रही है, इसलिए फिलहाल यह यह मांग ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। जम्मू-कश्मीर के चुनाव को देखते हुए लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद समान नागरिक संहिता का मुद्दा जानबूझकर नहीं उठाया गया क्योंकि तब इससे भाजपा को विधानसभा चुनावों में नुकसान हो सकता था। इसी कारण न तो महाराष्ट्र और न ही बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान समान नागरिक संहिता का मुद्दा प्रमुख रुप से उठाया गया। मगर अब उत्तर प्रदेश में अगले साल के शुरु में होने वाले विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत मतदाताओं का धु्रवीकरण कराने के लिए समान नागरिक संहिता का मुददा उछाला गया है। सरकार के इस स्पष्टीकरण में कोई दम नहीं है कि समान नागरिक संहिता पर व्यापक चर्चा की मंशा से लॉ पैनल से रिपोर्ट मांगी गई है। 18 जुलाई से संसद का मॉनसून सत्र शुरु हो रहा है और सरकार यह बात बखूबी जानती है कि सत्र से कुछ समय पहले समान नागरिक संहिता का मुददा उठाए जाने से संसद में खासा हंगामा हो सकता है। यह जानते हुए भी इस मुद्दे को आगे लाने से साफ है कि मोदी सरकार “एक तीर से दो निशाने“ साध रही है। मुद्दा उछलने से मोदी सरकार को समान नागरिक संहिता पर जनमानस का फीडबैक मिल सकता है और उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मतदाताओं का धु्रवीकरण भी हो सकता है। समान नागरिक संहिता का मामला बेदह संवेदनशील है और इस मामले के प्रति मुसलमानों और उनके वोट बटोरने वाले सियासी दलों को खासी आपति है। और अगर समान नागरिक संहिता का मुद्दा भगवा पार्टी द्वारा उठाया जाता है, तो मुस्लिम समुदाय और ज्यादा भडक जाता है। हुआ भी ऐसा ही। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने फौरन तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मोदी सरकार की इस पहल को सिरे से खारिज कर दिया है। कांग्रेस समेत विपक्षी दल भी इस मामले पर लाल-पीले हो रहे हैं। देश में इस समय अल्पसंख्यकों के लिए शादी-विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार के मामले में पर्सनल लॉ लागू होता है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में तीन बार तलाक कहने से पत्नी से वैवाहिक संबंध विच्छेद करने की व्यवस्था का खुद प्रगतिषील मुसलमान विरोध करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट व्यवस्था है कि देश में समान नागरिक संहिता लागू की जाएगी। इसके बावजूद भी देश में समान नागरिक संहिता लागू नहीं की जा सकी। मुसलमानों के कडे विरोध के कारण समान नागरिक संहिता को टाल दिया गया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी गया। भाजपा के एक नेता ने समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के लिए याचिका दायर की थी। 2015 में कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए समान नागरिक संहिता लागू करना या ना करना केन्द्र सरकार के विवेक पर छोड दिया था। भाजपा का शुरू से स्टैंड रहा है कि संविधान में स्पष्ट व्यवस्था का पालन किया जाना चाहिए। इस मामले में भाजपा सही है मगर समान नागरिक संहिता लागू करने का यह सही समय नही है। मौजूदा असहिष्णु माहौल और समकालीन उत्तेजनापूर्ण अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के मद्देनजर समान नागरिक संहिता को लागू करना देश हित में नहीं है। संवेदनशील मुद्दों को सियासी हितों के लिए नहीं भुनाया जाना चाहिए।
सोमवार, 4 जुलाई 2016
आरबीआई गवर्नर का कार्यकाल
Posted on 2:17 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर का कार्यकाल तीन साल ही क्यों? जबकि अब तक हर गवर्नर का औसतन कार्यकाल पांच साल का रहा है आरबीआई के गवर्नर रघुराम राजन ने यह सवाल उठाया है। उनका कहना है कि आरबीआई के गवर्नर का कार्यकाल कम-से-कम चार साल तो होना ही चाहिए। राजन की इस बात में काफी वजन है मगर चार साल ही क्यों, आरबीआई का कार्यकाल पांच साल क्यों नहीं। केन्द्र में सरकार के साथ ही आरबीआई गवर्नर की नियुक्ति होनी चाहिए। यह व्यवस्था कहीं ज्यादा व्यावहारिक नजर आती है। तीन साल का कार्यकाल वाकई ही मौद्रिक नीति को संजीदगी से लागू करने के लिए नाकाफी है। वैश्विक स्तर पर भी लंबे कार्यकाल का चलन है। अमेरिका में फेडेरल रिजर्व के अध्यक्ष का कार्यकाल चार साल का है। रघुराम राजन भी अमेरिकी सेंट्रल बैंक चेयर के कार्यकाल का हवाला दे रहे थे। भारतीय संसदीय प्रणाली की तरह भारतीय रिजर्व बैंक भी इग्लैंड के सेट्रंल बैंक ऑफ की तर्ज पर स्थापित किया गया है। बैंक ऑफ इग्लैंड के गवर्नर का कार्यकाल भी 1694 से लेकर 1913 तक तीन साल का हुआ करता था। मगर सर मोंटागू कोलिट नॉर्मन अपवाद रहे हैं। वे 1920 से 1944 तक चौबीस साल बैंक ऑफ इग्लैंड के गर्वनर रह चुके हैं। अमेरिकी फेडरेल रिजर्व की स्थापना 1913 में हुई थी और अब तक इसके 15 अध्यक्ष नामित हो चुके हैं। भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना 1935 में हुई थी। अब तक इसके 23 गवर्नर रह चुके हैं। जाहिर है अमेरिकी फेडरेल रिजर्व में आरबीआई की अपेक्षा अधिक स्थायित्व है। अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रखना आरबीआई की प्रमुख जिम्मेदारी है और यह काम आसान नहीं है। इस बात के मद्देनजर रघुराम राजन की इस बात में दम है कि आरबीआई गवर्नर का कार्यकाल चार साल का होना चाहिए। मगर एक साल का कार्यकाल बढ जाने से कोई ज्यादा फर्क नही पडने वाला है। अंमूमन, आरबीआई के गर्वनर को एक्स्टेंशन देकर पांच साल और इससे ज्यादा का कार्यकाल दिया जाता है। अब तक यही परंपरा रही है। 1991 में उदारीकरण लागू होने के बाद आरबीआई के 25 साल के इतिहास में रघुराम राजन पहले ऐसे गवर्नर हैं, जिन्हें एक्स्टेशन नहीं दी गई है। राजन से पहले एस वैकेंटरमन (1990 . 1992) को भी एक्सटेंशन नहीं दी गई थी। इसकी वजह तत्कालीन हर्षद मेहता प्रतिभूति घोटाला था मगर राजन के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं है। वैकेंटरमन के पहले आरएन मल्होत्रा का पांच साल कार्यकाल रहा और वैकेंटरमन के उतराधिकारी सी रंगाराजन ने भी पांच साल का कार्यकाल पूरा किया। अर्थशास्त्री बिमल जालन 1997 से 2003 तक छह साल आरबीआई के गवर्नर रहे और उसके बाद वाईवी रेड्डी को भी पांच साल का कार्यकाल दिया गया। राजन से पहले डी सुब्बाराव का कार्यकाल भी पांच साल का था। इन तथ्यों से स्पष्ट है राजन राजनीतिक प्रतिशोध के शिकार हुए हैं। रघुराम राजन का कार्यकाल इस सितंबर को खत्म हो रहा है। उन्हें संप्रग सरकार ने नियुक्त किया था, इसलिए भाजपाई उनके पीछे पडे हुए थे। राजन विख्यात अर्थशास्त्री है और उनकी आरबीआई के गवर्नर पद पर नियुक्ति से देश को फायदा हुआ है। राजन के चले जाने से न तो आरबीआई को कोई फर्क पडेगा और न ही मोदी सरकार को, मगर एक अस्वस्थ परंपरा जरुर कायम हुई है। देश के लिए यह बात बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि समकालीन सियासतदान प्रतिभा की अपेक्षा राजनीतिक प्रतिबद्धता और चाटुकारिता को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। सत्ता में आते ही हर सियासी दल अपने आदमियों को “एडजस्ट“ करने की फिराक में रहता है। इस क्रम में प्रतिभा का गला घोंट दिया जाता हे। केन्द्र में सत्तारूढ मौजूदा भाजपा अब वही कर रही है जिन बातों के लिए वह कांग्रेस को कोसा करती थी। अहम पदों पर सियासी नियुक्तियां राजनीतिक हितों को तो पूरा कर सकती है मगर राष्ट्रहित नहीं। राष्ट्रहित को सबसे ऊपर रखने की कसमें खाने वाले भाजपाई अब कहां हैं?
बाबुओं में असंतोष क्यों!
Posted on 2:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मोदौ सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों को सातवे वेत्तन आयोग की सिफारिशों के अनुरुप 23 फीसदी वेतन वृद्धि दिए जाने के बावजूद “बाबु“ खुश नहीं है। सरकार ने गत बुधवार को आयोग की सिफारिशें मानते हुए इसे पहली जनवरी 2016 से लागू करने का फैसला लिया। आयोग ने अपनी सिफारिशों में सभी वर्ग के केन्द्रीय कर्मचारियों को कम-से-कम 23.5 फीसदी वेतन वृद्धि थी। ताजा फैसले से 47 लाख कर्मचारियों और 53 लाख पेंशनभोगियों को फायदा होगा। अब केन्द्रीय कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 18, 000 रु और अधिकतम 2,50,000 रु मासिक हो जाएगा। अभी न्यूनतम वेतन 7,000 और अधिकतम 90,000 है। पेंशनभोगियों को 24 फीसदी वृद्धि दी गई है। गै्रच्युटी की सीमा दस लाख से बढाकर बीस लाख कर दी गई है। इस वृद्धि के अलावा यह भी प्रावधान किया गया है कि डीए के पचास फीसदी बढते ही ग्रैच्युटी में भी 25 फीसदी की बढोतरी होगी। कुल मिलाकर बेसिक में अढाई गुना और समर्ग (टोटल) सैलरी में 23.5 फीसदी वृद्धि हुई है मगर कर्मचारी इससे भी संतुष्ट नहीं है। केन्द्रीय कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि को इस बिला पर ठुकरा दिया है कि 70 साल में यह सबसे कम वृद्धि है जबकि सात दशक के दौरान कर्मचारियों के वेतन में 327 गुना वृद्धि हो चुकी है। नए वेतनमान अगस्त माह से लागू हो सकते हैं। कर्मचारियों का एक जनवरी, 2016 से अब तक के एरियर का भुगतान भी इसी साल कर दिया जाएगा। केन्द्र सरकार को हर साल 85, 000 करोड रु का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पडेगा। सरकार को एरियर बतौर 94,775 करोड रु देने पडेंगे। यानी सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए केन्द्र सरकार को इस वित्तीय वर्ष में 1,79,775 करोड रु जुटाने पडेंगे। इसमेंसे अगर एरियर नगद भुगतान नहीं किया जाता है तो भी सरकार को इस साल कर्मचारियों को एक लाख करोड रु से ज्यादा का नगद भुगतान करना पडेगा। केन्द्रीय कर्मचारियो के अलावा विभिन्न राज्यों को भी अपने कर्मचारियों को केन्द्र की तर्ज पर वेतन वृद्धि देनी होगी। देश के कई राज्य केन्द्र के वेतनमान को लागू करते हैं। छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के कारण देश के 21 राज्यों की वित्तीय स्थिति काफी डांवडोल हो गई थी और 2000 के बाद कडे वित्तीय अनुशासन का जो लाभ मिला था, वह चुटकियों में मलियामेट हो गया था। छठे वेतन आयोग से पहले राज्यों के कुल बजट का 30 से 45 फीसदी बजट कर्मचारियों के वेतन और पेंशन पर खर्च हो रहा था। इसके बाद यह बढकर 60 फीसदी तक पहुंच गया और अब सात्तवें वेतन आयोग को लागू करने पर यह और बढ जाएगा। पंजाब और हिमाचल की वित्तीय स्थिति तो और भी दयनीय हो सकती है। इन दोनों राज्यों की माली हालत इतनी खराब है कि और ज्यादा वेतन वृद्धि देने पर वेतन-पेंशन देने के भी लाले पड सकते हैं। बहरहाल, केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को मिलने वाले लगभग एक लाख करोड रु से बाजार में उपभोग वस्तुओं (कंज्यूमर गुडस) की मांग बढेगी। अनुमान है कि लगभग 45000 करोड रु सीधे बाजार में आएंगे जबकि करीब तीस हजार करोड रु की बचत होगी। इस विशाल राशि मेंसे सरकार को बतौर टैक्स लगभग 14, 000 करोड रु वापस मिल जाएंगे। मध्यम वर्ग में कार, टीवी, फ्रिज जैसी कंज्यूमर डयूरेबल चीजों को लेने की क्रेज होती है। बाजार में इतनी बडी राशि के आने से टीवी और फ्रिज जैसे कंज्यूमर डयूरेबल गुडस की मांग बढ सकती है। इससे कंज्यूमर डयूरेबल इंडस्ट्री में 15 फीसदी की ग्रोथ हो सकती है। ऑटोमोबाइल में बीस फीसदी ग्रोथ हो सकती है। सबसे ज्यादा फायदा मंदी से पीडित रियल्टी सेक्टर को हो सकता है। बाजार में नगदी आने से इस सेक्टर की सुस्ती कम हो सकती है। बाजार मे और ज्यादा पैसा आने से महंगाई भी बढ सकती है और अनुमान है मुद्रा-स्फीति में डेढ से दो फीसदी का उछाल आ सकता है। आम आदमी को इसके लिए तैयार रहना चाहिए।
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