मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की जब-तब न केवल विपक्षी दलों द्वारा ही तीखी आलोचना की जा रही है, बल्कि भाजपा के भीतर भी इस को लेकर सुगबुगाहट है। मंगलवार को नई दिल्ली में सपन्न हुई दो-दिवसीय भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी के सांसदों और सीनियर नेताओं ने अर्थव्यवस्था की सुस्ती और बेरोजगारी पर चिंता जाहिर की । प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन मैं इन पहलुओं की विस्तार से चर्चा की। सबसे ज्यादा चिंता आर्थिक सुस्ती को लेकर है। वैसे इस सुस्ती के “भ्रम“ को दूर करने के लिए मोदी सरकार और भाजपाई खासे चुस्त हैं। सुस्ती की वजह से रोजगार के अवसर घटे हैं। प्रधानमंत्री ने हर साल एक करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा कर रखा है। सरकार के तीन साल से ज्यादा का समय निकल चुका है मगर हर साल बमुश्किल 2 से 3 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है। लेबर ब्यूरो की रिपोर्ट के मुतबिक अप्रैल से दिसंबर 2016 के दौरान आठ प्रमुख सेक्टर्स मे सिर्फ 2.3 लाख लोगों को रोजगार मिला था। देश का आईटी सेक्टर भारी मंदी के दौर से गुजर रहा है। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खालिस देसी रोजगार नीति एवं डिजीटाइजेशन के कारण आईटी सेक्टर में रोजगार के अवसर सिकुड रहे हैं। ऑटोमेशन के कारण 2022 तक आईटी सेक्टर में 4, 800,00 जॉबस पर छंटनी का खतरा मंडरा रहा है। रोजगार से जुडी हैड हंटर इंडिया का आकलन है कि अगले तीन साल के दौरान भारत में हर साल दो लाख लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड सकता है। मैककिंसे एंड कंपनी का आकलन है कि आईटी सेक्टर्स की कंपनियों का लगभग 50 फीसदी स्टाफ अगले तीन-चार सालों में अप्रासंगिक हो जाएगा। इन हालात में बेरोजगार युवकों को प्रधानमंत्री से ही आस है। मगर नोटबंदी के कारण तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्था में व्याप्त सुस्ती अभी भी बरकरार है और 7.1 फीसदी की ग्रोथ 2016-17 की चौथी तिमाही में अब सिमट कर 6.1 फीसदी ही रह गई थी जबकि एक तिमाही पहले यह सात फीसदी थी। अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि अगर 7.1 फीसदी ग्रोथ रेट (2015-16) में रोजगार सृजन मात्र 1. 1 फीसदी के करीब था, तब 6 फीसदी ग्रोथ रेट में दस लाख लोगों को रोजगार मुहैया कराना नामुमकिन है। ताजा स्थिति से यही निष्कर्ष निकलता है कि “मोदी सरकार“ ने रोजगार के मामले में लोगों को “मुंगेरी लाल के हसीन सपने दिखाए हैं। भाजपा के वयोवृद्ध नेता एवं पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने मंगलवार को अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर तीखे प्रहार किए। पूर्व वितमंत्री का आरोप है कि जेटली ने “अर्थव्यवस्था का बेडा गर्क कर दिया है“। अर्थव्यवस्था की हालात बेहद खराब है। निजी निवेश गिर रहा है। कंस्ट्रक्शन और सर्विस सेक्टर में सुस्ती व्याप्त है। फैक्टरी उत्पादन सिकुड रहा है। कृषि में भारी संकट है। पहले नोटबंदी और फिर जीएसटी ने अर्थव्यवस्था को डूबो दिया है़। नव गठित आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य एवं नामचीन अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला ने भी माना है कि अर्थव्यवस्था में अविलंब सुधार की जरुरत है और अर्थव्यवस्था की सुस्ती के लिए ढांचागत समस्याएं जिम्मेदार हैं। भल्ला का सुझाव है कि अगर ग्रोथ को तेज करना है तो आरबीआई को ब्याज दरों में कम-से-कम एक फीसदी घटानी होगी। अधिकांश तटस्थ अर्थषास्त्री भी नोटबंदी को सुस्ती के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार मानते हैं । पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने भी नोटबंदी को अनावश्यक बताया है। मगर मोदी सरकार इस सच्चाई को मानने को तैयार नहीं है। सिन्हा की आलोचना के बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने सरकार का बचाव करते हुए कहा है कि चिंता की कोई बात नही है। पूरी दुनिया मानती है कि भारत तेजी से बढती अर्थव्यवस्था है मगर आंकडे इसकी गवाही नहीं देते हैं। मोदी सरकार को अपनी गलतियों को मानकर बेरोजगारी और सुस्ती हटाने को उच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।
गुरुवार, 28 सितंबर 2017
मंगलवार, 26 सितंबर 2017
बिजली योजना की कमजोर “लौ“
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लोगों को चौबीस घंटे निर्बाध बिजली मुहैया कराना पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा का प्रमुख वायदों मेंसे एक था। तब भाजपा ने वायदा किया था कि सत्ता में आते ही सौ दिन के भीतर हर गांव और मोहल्ले को 24 घंटे नियमित बिजली सप्लाई मुहैया कराई जाएगी। सत्ता में आने के बाद अब मोदी सरकार ने 2022 तक हर गांव को 24 घंटे नियमित बिजली सप्लाई का लक्ष्य रखा है। सोमवार को प्रधानमंत्री ने हर घर को बिजली देने का वायदा करते हुए “सौभाग्य“ योजना का ऐलान किया। इस योजना के तहत गरीबों को मुफ्त में बिजली के कनेक्शन दिए जाएंगे। “प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना“ के तहत 2019 तक देश के हर घर में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना पर 16,000 करोड रु खर्च होंगे। बिजली का आविष्कार हुए सवा सौ साल से ज्यादा हो चुके हैं और देश को आजाद हुए सात दशक मगर दुर्भाग्यवश भारत में चार करोड से अधिक लोगों के घरों में अभी भी बिजली नहीं है। दीन दयाल ग्राम ज्योति योजना पहले से ही गांवों में चल रही है। दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने संबोधन में 18,500 गांवों को तत्काल बिजली मुहैया कराने का वायदा किया था। मई 2017 तक 13,469 गांवों का विद्युतीकरण हो चुका था। 5000 से ज्यादा गांव अभी भी बचे हैं। बहरहाल, वायदे करना एक बात है मगर उन्हें पूरा करना दूसरी बात। देश में हर घर को बिजली के अलावा इसकी अबाधित सप्लाई ज्यादा जरुरी है। बिजली के उस बल्ब का क्या फायदा जो जले ही नहीं। बिजली का कनेक्शन मिलने के बाद भी नियमित सप्लाई मिले, भारत में इसकी कोई गारंटी नहीं है। 2015 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी के सहयोग से सेंटर ऑन एनर्जी, इन्वायरमेंट एंड वॉटर ने भारत में एनर्जी असेस पर पहली बार अध्ययन किया था। इसमें पाया गया कि उत्तर प्रदेश , बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश , ओडीशा और पश्चिम बंगाल के बिद्युतीकृत गांवों में 12 घंटे भी बिजली सप्लाई नहीं की जाती है। अध्ययन के अनुसार बिजली कनेक्शन के बावजूद भारत में बिजली की कोई गारंटी नहीं है। वैसे बिजली उत्पादन क्षमता के लिहाज से भारत दुनिया में पांचवा सबसे बडा देश है। बिजली उत्पादन में तीसरा बडा देश और खपत में दुनिया का चौथा। सितंबर, 2016 तक देश में 584,22 अरब यूनिट (बीयू) का उत्पादन किया जा रहा था। 2017 में 88. 5 जीडब्ल्यू (गीगा वाट) अथवा 85,500 मेगावाट बिजली उत्पादन का लक्ष्य है। सरकार का दावा था कि 2015 तक देश में बिजली का कोई संकट नहीं रहेगा और भारत पॉवर सरप्लस हो जाएगा। मगर इसके बावजूद लोगों को गर्मियों में भारी पॉवर कटस का सामना करना पडता है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि सरकार की कथनी और करनी में बहुत बडा अंतर रहता है। कागजों में 99.5 फीसदी गांवों का बिजलीकरण हो चुका है मगर सरकार के अपने ही आंकडों कहते हैं कि 20 फीसदी आबादी अभी भी बिजली से महरुम है। वातानुकूलित कमरो में बाबुओं द्वारा योजनाओं का प्रारुप और कार्यवन्यन का खाका तैयार किया जाता है मगर योजना से लाभान्वित होने वाले जन तक इसका पूरा लाभ पहुंचता ही नहीं है। मोदी सरकार के समक्ष भी यही बडी चुनौती है। सियासत के चेहरे-मोहरे बेशक बदल गए हों मगर योजना को अमली जामा देने वाली वही “भ्रष्ट “ नौकरशाही । मुखौटा बदलने से शरीर के विकार नहीं बदलते । सरकार ने 2022 तक सभी गांवों में शत-प्रतिशत बिजलीकरण और 24 घंटे नियमित बिजली सप्लाई की महत्वाकंाक्षी योजना तैयार की है। मगर जिस गति से अभी गांवों का बिजलीकरण हो रहा है, उससे लगता नहीं है कि मोदी सरकार अगले बीस साल में भी इस वायदे को पूरा कर पाएगी। सरकार देश में हर महीने लगभग दो लाख अथवा साल में 24 लाख गांवों का बिजलीकरण ही कर पा रही है जबकि अभी चार करोड से ज्यादा गांवों में बिजली नहीं है। वायदों को संजीदगी से पूरा करने के लिए जमीनी हकीकत की ठोंक-पीट कर परख भी जरुरी है।
झूठ फरेब पाकिस्तान की फितरत
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संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के ओजस्वी भाषण से तिलमिलाए पाकिस्तान ने झूठ-फरेब का सहारा लेकर अपनी जंग हंसाई करवाई है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पाकिस्तान पर तल्ख तंज कसते हुए कहा है,“ हम डाक्टर, वैज्ञानिक तैयार करते हैं, पाकिस्तान आतंकी“। हम गरीबी से लडते हैं, पाकिस्तान हमसे“। स्वराज के भाषण को जहां दुनिया भर में सराहा जा रहा है, वहीं पाकिस्तान में भी इस पर खटटी-मिठ्ठी प्रतिक्रियाएं हो रही हैं। इससे भनभनाया पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारतीय विदेश मंत्री की वजनदार दलीलों की काट तो कर नहीं पाया, बस कश्मीर का राग अलापता रहा। संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की स्थाई प्रतिनिधि मलीहा लोधी ने कश्मीर में महिलाओं और बच्चों पर भारत की कथित ज्यादतियों को प्रमाणित करने के लिए झूठ-फरेब का सहारा लिया और महासभा में गाजा की महिला की फोटो को कश्मीरी महिला बताकर अपनी ही भदद करवाई है। मोहतरमा मलीहा लोधी ने अपने भाषण में जिस महिला को कश्मीरी बताया , वह वास्तव में गाजा पट्टी की राव्या थी। मोहतरमा मलीहा इस फोटो के सहारे यह दर्शाने की कोशिश कर रही थी कि भारतीय सुरक्षा बल किस तरह पैलेट गोलियों का बेजा इस्तेमाल करके महिलाओं पर अत्याचार करते हैं। फोटो में महिला के चेहरे पर पैलेट गन के निशान थे। ट्वीटर पर पाकिस्तान मिशन यूएन अकांउट में शान से इस फोटो को पोस्ट करते हुए दावा किया गया “ पैलेट गैन से घायल कश्मीरी लडकी भारत का असली चेहरा है“। मोहतरमा मलीहा लोधी ने भी इस फोटो को रीटवीट किया। इस लडकी का चेहरा देखने पर एकदम स्पष्ट हो जाता है कि इसके नाक-नक्श महिलाओं से एकदम भिन्न है। गूगल पर सर्च किए जाने पर साफ हो गया कि फोटो कश्मीरी महिला की नहीं, अलबत्ता गाजा पट्टी की राव्या है। इस तस्वीर को मशहूर फोटोग्राफर हेडी लेवाइन ने जुलाई, 2014 में गाजा पट्टी में खींचा था। हेडी को गाजा पट्टी की उम्दा तस्वीरों के लिए कई अवार्ड भी मिल चुके हैं। इस तस्वीर को ब्रिटेन के समाचार पत्र गाार्जियन ने अपनी फोटो गैलरी में भी जगह दे रखी है। अखबार ने बाकायदा इस फोटो को शीर्षक देकर बताया है कि “गाजा पट्टी की महिला राव्या इसराइल के हमले में घायल होकर अस्पताल में भर्ती है“। अब सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात कहने के लिए पाकिस्तान की स्थाई प्रतिनिधि को झूठ का सहारा क्यों लेना पडा जबकि वे अच्छी तरह जानती थी कि इंटरनेट के युग में देर-सबेर उनका यह झूठ-फरेब अततः पकडा जाएगा? उन्होंने ं अपने देश की जंगहंसाई करवाकर क्या हासिल कर लिया़? मोहतरमा मलीहा लोधी की इस हरकत से भारतीय विदेश मंत्री के कथन और भी अधिक प्रासंगिक कर दिए हैं। पाकिस्तान वाकई सिर्फ और सिर्फ भारत को नीचा दिखाना चाहता है और इसके लिए वह किसी भी हद तक जा सकता है। पाकिस्तान और उसके नुमाइंदों की इस तरह की बेजा हरकतों से किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए। इस्लामाबाद आज तक यही कर रहा है। शिमला और लाहौर संधि में कश्मीर समस्या को द्धिपक्षीय वार्ता से हल करने की बात मानने के बावजूद पाकिस्तान बार-बार इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालने से बाज नही आ रहा है। भारत को अशान्त रख्ने के लिए उसने आतंकी संगठन तक पाल रखे हैं। जैसा कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कहा है,“ जिन के घर शीशे के होते हैं, वे दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते“। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि पाकिस्तानी सेना पाक अधिकृत कश्मीर , बलूचिस्तान और सिंध में महिलाओं और बच्चों पर किस कदर अमानवीय अत्यावार कर रही है। बीबीसी ने अपनी खोजपूर्ण रिपोर्ट में बताया है कि किस तरह पाकिस्तान बलूचिस्तान में महिलाओं पर जुल्म-दर-जुल्म ढा रहा है और इसके बावजूद महिलाएं सिर उठाकर कहती हैं, “ यह बलूचिस्तान है, पाकिस्तान नहीं“। यही पाकिस्तान का असली चेहरा है।
बीस साल लटका है महिला आरक्षण बिल
Posted on 6:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चुनाव समीप आते ही सियासी दलों को मतदाताओं के हितों की गंभीर चिंता होने लगती है। लोकसभा चुनाव को अभी डेढ साल से ज्यादा का वक्त है मगर चुनावी बिसात अभी से बिछाई जा रही है। वीरवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर महिला आरक्षण बिल को पारित करवाने का आग्रह किया । चिठ्ठी मे कहा गया है, “आपके पास लोकसभा में बहुमत है, महिला आरक्षण बिल आसानी से पारित हो सकता है। राज्यसभा में इस बिल पर कांगेस आपका समर्थन करेगी“। भाजपा ने इस पर तंज कसते हुए कहा,“ पहले आप अपने सहयोगी दलों से तो पूछ ले“। दरअसल, संप्रग में षामिल लालू प्रसाद यादव का राश्ट्रीय जनता दल और संप्रग सरकार को बाहर से समर्थन देने वाली समाजवादी पार्टी महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने के सख्त खिलाफ है। देष के सियासी दलों के दोहरे आचरण की विडबंना है कि राजनीतिक दलों को पंचायतों और स्वायत निकाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने में कोई समस्या नहीं है मगर संसद और विधानसभाओ में आरक्षण पर सख्त ऐतराज है। महिला आरक्षण बिल को संसद में लटके इस 12 सितंबर को पूरे 20 साल हो गए हैं। इस लिहाज से देखा जाए तो इस बिल की जीएसटी बिल से भी कहीं ज्यादा दुर्गति हो रही है। 1996 में एचडी देवगौडा सरकार ने महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण देने के लिए बिल लाया था। यह बिल लोकसभा में आज तक पारित नही हो पाया मगर 2010 में राज्यसभा ने इस बिल को अपनी स्वीकृति दे रखी है। बिल के निरस्त होने पर अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने इसे 1998 में फिर से लोकसभा में पेष किया था मगर तब लालू प्रसाद की पार्टी राजद ने बिल को छीन कर इसके टुकडे-टुकडे करके फाड डाला था। 1999, 2002 और 2003 में वाजपेयी सरकार ने महिला आरक्षण बिल को संसद में पेष किया मगर तीनों बार बिल पारित नहीं हो सका। 2008 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार ने इस बिल को राज्यसभा में पेष किया और मार्च, 2010 में राज्यसभा ने इसे पारित भी कर दिया। मगर लोकसभा ने इस बिल को आज तक पारित नहीं किया है। और अब जब लोकसभा चुनाव समीप आ रहे हैं, सतारूढ भाजपा के साथ कांग्रेस को भी महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में 33 फीसदी आरक्षण की याद आ रही है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि कांग्रेस अब लग रहा है, मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल को जल्द ही संसद में पेष कर सकती है। महिलाओं पर मोदी सरकार विषेश ध्यान दे रही है। उज्जवला स्कीम के अलावा तीन तलाक पर सरकार के मुस्लिम महिला फ्रेंडली स्टैंड से अल्पसंख्यक महिलाओं की सहानुभूति मोदी सरकार के प्रति बढी है। कांग्रेस के लिए यह और भी बडी चिंता का विशय है। कांग्रेस की राश्ट्रीय अध्यक्ष होते हुए भी पार्टी महिला आरक्षण बिल को लोकसभा में पारित नहीं करवा पाई हालांकि सोनिया गांधी, सुशमा स्वराज और माकपा की वृंदा कारत ने हाथ में हाथ डालकर बिल के समर्थन में महिलाओं की एकता का प्रदर्षन भी किया था। सोनिया गांधी द्वारा इस मुद्दे को प्रकाष में लाने का मूल मकसद यही है कि अगर लोकसभा में बिल पारित हो जाता है, तो इसका कुछ श्रेय कंाग्रेस भी ले सक्ती है। मोदी सरकार को महिला आरक्षण बिल को संसद से पारित करवाने में कोई दिक्क्त नही आएगी। बिल के कट्टर विरोधी राजद का विरोध अब अप्रासंगिक हो गया है। समाजवादी पार्टी दो फाड हो चुकी है और अखिलेष यादव इस बिल के पक्ष में कांग्रेस के साथ जाएंगे। राजग में हाल में षामिल हुई जनता दल (यू) ने भी बिल का विरोध वापस ले लिया है। इस स्थिति में मोदी सरकार अगर संसद से बिल पारित करवा लेती है, तो यह उसकी बहुुत बडी उपलब्धि होगी।
शुक्रवार, 22 सितंबर 2017
India Need To Learn From Mexico
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मंगलवार को भूकंप ने मेक्सिको सिटी को हिला कर रख दिया। 7.1 तीव्रता वाले भूकंप से 237 लोग मारे गए , 1900 से अधिक जख्मी हुए और सैंकडों इमारतें जमीदोंज हो गई हैं। इसे इतफाक ही कहा जाए कि मेक्सिको सिटी के लोग मंगलवार को 32 साल पहले ठीक इसी दिन 1985 में आए प्रलयकारी भूकंप की बरसी मना रहे थे और भूकंप का कैसे सामना किया जाए, इसकी मॉक ड्रिल की जा रही थी। 1985 के भूकप में 45,000 के करीब लोग मारे गए थे और 30,000 से ज्यादा घायल हुए थे। तब भूकंप ने मेक्सिको सिटी में भारी तबाही मचाई थी। दो सप्ताह पहले 8 सितंबर् को भी मेक्सिको के दक्षिण-पूर्व कियापास इलाके में 8.2 तीव्रता का भूकंप आया था और इस त्रासदी में कम-से-कम 100 लोग मारे गए थे। इस भूकंप को सदी का सबसे तीव्र माना गया था। कियापास को भूकंप की दृष्टि से मेक्सिको का सबसे संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। मेक्सिको घोडे की नाल सरीखे पैसेफिक रिंग आफ फायर में स्थित है। इस क्षेत्र का बाहरी किनारा प्रशांत महासागर से शुरु होता है। यह क्षेत्र एशिया के पूर्वी तट से अमेरिका के पश्चिम तट तक फैला हुआ है। दुनिया के 90 फीसदी भूकंप इसी इलाके मे आते हैं और इनमें 80 फीसदी खासे तीव्रता वाले होते हैं। मेक्सिको के अलावा जापान, इकवाडोर, चिली, अमेरिका, कनाडा समेत कई लातीनी अमेरिकी देश पैसेफिक रिंग आफ फायर में पडते हैं। भू-विज्ञानियों के अनुसार प्रशांत महासागर के नीचे जमीन के अंदर कई तरह की टेक्टोनिक प्लेटें है जो अक्सर आपस में टकराने से उर्जा पैदा करती है और इससे भूंकप आते हैं। बहरहाल, बार-बार भूकप से पीडित देशों ने इस प्राकृतिक आपदा से सुरक्षित रहने के तौर-तरीके अपना लिए हैं। मैक्सिको ने भी 1985 की भूकंप त्रासदी से सीख लेकर इससे निपटने के पुख्ता तौर-तरीके अपनाए और इसके सकारात्मक परिणाम सामने आए। मेक्सिको में हर भवन का भूकंप रोधी निर्माण कानूनन अनिवार्य है। 1985 में भूकंप से तबाह हुए मेक्सिको सिटी का काया कल्प किया गया है। पुरानी इमारतों को भूकंप रोधी बनाया गया है। दूर-संचार व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया गया और प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए संकट मोचन व्यवस्था तैयार की गई। भूकंप की चेतावनी देने वाले अलार्म लगाए गए हैं। यह बात दीगर है कि मंगलवार को अलार्म बजा ही नहीं या भूचाल में इसकी आवाज सुनाई नहीं दी। इन सब प्रबंधों के कारण ही 2012 और मंगलवार को आए भूकंप से जान-माल का उतना नुकसान नहीं हुआ, जितना 1985 में हुआ था। भारत को मेक्सिको से सीख लेनी चाहिए। भारत की तरह मेक्सिको में भी घूसखोरी का बोलबाला है और दलाल, घूसखोर नौकरशाही और सियासी नेताओं का मजबूत गठजोड सार्वजनिक योजनाओं का अधिकांश पैसा बीच में भी हडप जाता है। मेेक्सिको में नशीले पदार्थों का कारोबार चरम पर है। इसी कारण अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मैक्सिको के साथ अपनी सीमा पर वॉल बनाना चाहते है। तथापि, मेक्सिको ने भूकंप से बचने के लिए कारगर उपाय किए हैं। भारत में कई क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से काफी संवेदनशील है। राजधानी दिल्ली के अलावा, उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर को अति संवेदनशील माना गया है। उतर भारत में औसतन हर दिन भूकंप के तीन झटके महसूस किए जाते हैं। दिल्ली, शिमला, धर्मशाला समेत उत्तर भारत के कई शहर तबाही के मुहाने पर खडे हैं। शिमला का बेतरतीब निर्माण इस क्षेत्र में भूकंप की दृष्टि से सबसे संवेदनशील बताया गया है। भू-वैज्ञानियोँ ने हिमालय की तलहटी में बसे क्षेत्रों में उच्च तीव्रता वाले भूकंप की चेतावनी दे रखी है। अप्रैल, 2015 में नेपाल में आए भूकंप को भी इसी कडी का सिला माना जा रहा है। निसंदेह, भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा को टाला नहीं जा सकता मगर इससे होने वाले जानमाल के नुकसान को जरुर कम किया जा सकता है। समय रहते संभल जाने में ही लोगों की भलाई है।
गुरुवार, 21 सितंबर 2017
क्या पाक भी बनेगा उत्तर कोरिया?
Posted on 7:03 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लगातार मिसाइल परीक्षण कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गंभीर चुनौती देते-देते उत्तर कोरिया का तानाशाह किम जोंग उन रोके भी नहीं रुक रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ प्रतिबंध-दर-प्रतिबंध और अमेरिका धमकी-दर- धमकी दे रहा है और उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षण लगातार जारी हैं। हर धमकी और प्रतिबंध के बाद तानाशाह किम जोंग उन और ज्यादा आक्रामक होता जा रहा है। यह सिला लंबे समय से जारी है और इससे न केवल कोरियाई प्रायद्धीप, अलबत्ता पूरी दुनिया में हडकंप मचा हुआ है। उत्तर कोरिया की हर मिसाइल परीक्षण के साथ ग्लोबल स्टॉक मार्केट में भूचाल सा आ जाता है और शेयर औंधे मुंह लुढक जाते हैं। कोरियाई प्रायद्धीप पहले भी युद्ध की विभीषिका झेल चुका है। 1950 में किम जोंग उन के दादा किम इल सुंग ने दक्षिण कोरिया पर हमला किया था। तब अमेरिका ने दक्षिण कोरिया का साथ दिया था और चीन ने उत्तर कोरिया का। रुस ने भी उत्तर कोरिया का ही साथ दिया था। यह संघर्ष तीन साल तक जारी रहा और 27 जुलाई, 1953 तक युद्ध विराम होते-होते जान-माल का भारी नुकसान हो चुका था। तीन साल के बाद युद्ध के समाप्त होने पर पूरे कोरियाई प्रायद्धीप मे सिर्फ तबाही नजर आती थी। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए का आकलन था कि इस युद्ध में लाखों लोग मारे गए थे, एक लाख से ज्यादा बच्चे अनाथ हो गए थे और एक करोड से अधिक लोगो को विस्थापित होना पडा था। उत्तर कोरिया की राजधानी व्योंगयांग पूरी तरह से ध्वस्त हो गई थी । राजधानी में एक भी इमारत सही सलामत नहीं बची थी। युद्ध विराम तो हो गया मगर दोनो देशों मे कोई शांति संधि नहीं हुई। दोनो को एक-दूसरे से दूर रखने के लिए विसैन्यीकृत (डिमिलिटराइज्ड) क्षेत्र जरुर बनाया गया मगर आज यही दुनिया में हथियारों से लैस सबसे बडा क्षेत्र है। शांति संधि नहीं होने के कारण तकनीकी तौर दोनों देश पिछले 64 साल से तनावपूर्ण माहौल में एक-दूसरे का सामना कर रहे हैं। और बडी ताकतों ने कोरियाई प्रायद्धीप में अपनी-अपनी उपस्थिति दर्ज कर माहौल को और ज्यादा बिगाड रखा है। पचास के दशक और 2017 की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है। उत्तर कोरिया परमाणु बमों और मिसाइलों से बडी न्यूक्लियर पॉवर बन चुका है। उत्तर कोरिया के पास 60 लाख की सेना है और यह दुनिया की चौथी सबसे बडी सेना है। इसी माह के शुरु में उत्तर कोरिया ने इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल का परीक्षण कर दावा किया कि यह मिसाइल अमेरिका के अलास्का तक हमला करने मे सक्षम है। उत्तर कोरिया अपनी जिद पर अडा है और अमेरिका अपनी। राष्ट्रपति ट्रंप ने एक दिन पहले ही धमकी दी है कि उत्तर कोरिया को पूर तरह से तबाह करने का समय आ गया है। रक्षा विशेषज्ञो का कहना है कि अगर युद्ध हुआ तो उत्तर कोरिया दक्षिण कोरिया पर चंद मिनटों में मिसाइलें दाग कर तबाही मचा सकती है। चंद सैकंडों में करोडों लोगों को सुरक्षित ठिकानों में ले जाना कतई मुमकिन नहीं है। बहरहाल, उत्तर कोरिया को परमाणु बम तकनीक पाकिस्तान से स्मगल की गई है और किम जोंग उन को न्यूक्लियर पॉवर बनाने में पाकिस्तान की अहम भूमिका है। भारत के लिए यह स्थिति खतरनाक है। चीन, पाकिस्तान का भी जिगरी दोस्त है और उत्तर कोरिया का भी। चीन की विस्तारवादी नीति से भारत को कहीं ज्यादा बडा खतरा है। पाकिस्तान इस मामले में चीन का खुलकर समर्थन कर रहा है। भारत इस समय चौतरफा दुश्मनों से घिरा हुआ है। नेपाल, म्यांमार और श्री लंका अब चीन के ज्यादा करीब हैं और चीन इन मुल्कों की हर तरह से मदद कर रहा है। अगर खुदा-ना-खास्ता पाकिस्तान में भी किम जोंग उन जैसा तानाशाह सत्ता में आता है, तो भारत को भी कोरियाई प्रायद्धीप जैसे तनावपूर्ण माहौल का सामना करना पड सकता है। युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है और यह सिर्फ भारी तबाही लाता है।
बुधवार, 20 सितंबर 2017
रोहिंग्या शरणार्थियों से खतरा ?
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शाहिर लुधियानवी की एक पुरानी गजल है,“ रहने को घर नहीं, सारा जहान हमारा“। दुनिया भर में शरणार्थियों की यही स्थिति है। सुरक्षित ठिकाना ढूंढते- ढूंढते शरणार्थी दुनिया भर की खाक छानते फिरते हैं मगर हर जगह उन्हें दुत्कारा जाता है। रणार्थियों से भारत परेशान है। यूरोप तो और ज्यादा परेशान है और अब अमेरिका भी। भारत में बसे और निरंतर पलायन कर रहे रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों का मामला देश की शीर्ष अदालत पहुंच चुका है। सोमवार को मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रोहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों को देश की सुरक्षा के लिए सबसे बडा खतरा बताया है। सरकार ने भारत आ रहे रोहिंग्या शरणार्थियों को शरण देने से साफ मना कर दिया है। सरकार के इस स्टैंड से तीस-चालीस साल से भारत में बसे रोंहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों पर भी वापस धकेले जाने का खतरा मंडरा रहा है। भारत में रोंहिंग्या मुसलमान 1980 और 1990 से रह रहे हैं। 1980 में भारत में आए रोंहिंग्या मुसलमानों को देश में बसे लगभग चार दशक हो चुके हैं। इस स्थिति में अगर रोंहिंग्या मुसलमानों को देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाता है तो इसकी जिम्मेदारी सरकार और सुरक्षा एजेंसिंयों पर भी आती है। सुरक्षा एजेंसियों ने उन रोंहिंग्या मुसलमानों पर नजर क्यों नहीं रखी जो भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं? रोंहिंग्या मुसलमान अधिकतर जम्मू, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के आस-पास इलाकों में रहते हैं। दरअसल सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता रोंहिंग्या मुसलमानों का आतंकी चेहरा है। म्यांमार ने भी रोंहिंग्या पर आतंकी हमलों में संलिप्त होने का आरोप लगाया है। इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने कुछ समय पहले यह दावा किया था कि दक्षिण एशिया में उसके आतंकी काफी सक्रिय हैं। आईएस के इन सदस्यों के बांग्लादेश -म्यांमार में मौजूद होने के संकेत दिए गए थे। रक्षा विशेषज्ञों का आकलन है कि आईएस की जडें रोंहिंग्या मुसलमानों में हो सकती हैं। बांग्लादेश में आतंकी हमलों ने इस बात की पुष्टि की है। रोहिंग्या की अराकन रक्षा सेना का प्रमुख कमांडर कराची में पैदा हुआ था। सऊदी अरब में शिक्षा-दीक्षा लेने के बाद वह आईएस के दक्षिण एशिया संगठन का संचालन पर रहा है। रोहिंग्या अराकन रक्षा सेना भी इसी का हिस्सा है। बहरहाल, भारत ने हमेशा शरणार्थियो का स्वागत किया है हालांकि नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र की किसी भी शरणार्थी संधि पर हस्ताक्षर नहीं करा रखें हैं। 1980 और 1990 के दषक में भारत ने रोंहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों का खुले दिल से स्वागत किया था मगर तब स्थिति और थी। इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठन का कोई वजूद नहीं था। निसंदेह, आईएस अथवा अल कायदा जैसे आतंकी संगठन बांग्ला देश और म्यांमार से आ रहे रोंहिंग्या मुसलमान शरणार्थियों में अपनी जडें जमा रहे हैं, मगर इसमें उन रोंहिंग्या मुसलमानों का क्या दोष जो तीस-चालीस साल से भारत में रह रहे हैं। किसी भी व्यक्ति को इस बिला पर आतंकी करार नहीं दिया जा सकता कि वह मुसलमान है। तथापि, इस सच्चाई को नकारा नही जा सकता कि अगर शांतिप्रिय म्यांमर रोंहिंग्या मुसलमानों को बसाने के लिए तैयार नहीं है, फिर भारत उन्हें क्यों बसाए? रोंहिंग्या मुसलमान श रणार्थियो को लेकर भारत की नीति पहली बार स्पष्ट दिखाई दे रही है। मोदी सरकार किसी भी स्थिति में रोंहिंग्या मुसलमान शरणार्थियो को बसाने के लिए तैयार नही है। रोंहिंग्या शरणार्थियों पर बांग्लादेश और म्यांमार में भी तनातनी चल रही है। म्यांमार चीन के ज्यादा करीब है, इसलिए चीन से मध्यस्था के लिए कहा गया है। म्यांमार और चीन की दोस्ती भी एक अहम पहलू है। रोंहिंग्या शरणार्थियों का मुद्दा अब अंतरराष्ट्रीय बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार संस्था ने रोंहिंग्या शरणार्थियों को शरण न देने की भारत की नीति की कडी आलोचना की है। भारत को इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रखने की जरुरत है।
मंगलवार, 19 सितंबर 2017
बांधों का अर्थषास्त्र
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पर्यावरण प्रेमियों के मुखर विरोध और तकनीकी अडचनों के बावजूद अततः सरदार सरोवर परियोजना ने मूर्त रुप ले ही लिया। रविवार को सरदार सरोवर बांध का लोकार्पण कर प्रधानमंत्री ने गुजरात को पानी की बडी सौगात दी है। 1946 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सूखाग्रस्त दक्षिण गुजरात को निश्चित सिंचाई सुविधा मुहैया कराने के लिए नर्मदा नदी पर बांध की परिकल्पना की थी। 5 अप्रैल, 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने इस बांध की आधारशिला रखी थी। 1979 में इस परियोजना पर काम शुरु हुआ और 17 अप्रैल, 2017 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस परियोजना का लोकार्पण करके नेहरु-पटेल के सपने को साकार किया है। मूलतः गुजरात के नयागांव में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर ग्रेवटी बांध बनाया गया है। नर्मदा नदी पर कुल मिलाकर तीस बांध बनने हैं और सरदार सरोवर इनमें सबसे बडा है। गुजरात के अलावा मध्य प्रदेश , महाराष्ट्र और राजस्थान भी इस परियोजना से बिजली और पानी से लाभान्वित हो रहे हैं। पिछले सात दशक से ज्यादा समय में सरदार सरोवर बांध परियोजना की राह में तरह-तरह के अवरोधक खडे किए गए। प्रधानमंत्री ने रविवार को इन अवरोधकों का उल्लेख भी किया। उन्होंने यह कहकर इस बांध के विरोधियों पर तंज भी कसा,“ मेरे पास उन सब का कच्चा चिठ्ठा है, जो आज तक इस परियोजना के खिलाफ साजिश रच रहे थे“। नर्मदा परियोजना स्वतंत्र भारत की सबसे विवादस्पद परियोजना रही है। तकनीकी और कानूनी पेचदगियों के कारण यह परियोजना लंबे समय तक लटकी रही। सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई को लेकर लंबी अदालती लडाई लडी गई। अततः, 2014 को नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण़ (नर्मदा कंट्रोल ऑथॉरिटी) ने बांध की ऊंचाई
121.92 मीटर (400 फीट) से बढाकर 138.68 (455 फीट) और फिर 17 जून 2017 को बांध की ऊंचाई इसकी पूरी क्षमता तक बढा दी। इस परियोजना से गुजरात के सूखागग्रस्त कच्छा और सौराष्ट्र की 18,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा की खेती को निश्चित सिंचाई की सुविधा मुहैया होगी। तथापि, इस परियोजना के आलोचकों का कहना है कि इस परियोजना की लागत की तुलना में उतना फायदा नहीं हो रहा है, जितना होना चाहिए था। अब तक इस परियोजना पर अनुमानन पचास हजार करोड रु के करीब खर्चा हो चुका है और इतना ही पैसा अभी इसे पूरा करने में और लगेगा। इस परियोजना से जिन सूखाग्रस्त क्षेत्रों को पानी मिलना चाहिए था, उन्हें मिला ही नहीं। जिन इलाकों को सिंचाई की सुविधा मिल रही है, वहां पहले से ही माकूल पानी है। इस परियोजना से 50,000 से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं। लगभग दस हजार मछुआरों की आजीविका चली गई है। परियोजना के लागत-लाभ (कॉस्ट-बेनेफिट्स) के आकलन बाद ही सबसे पहले जापान ने सरदार सरोवर बांध से अपने हाथ खींच लिए थे। जापान को जैसे ही पता चला कि परियोजना से पचास हजार से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं, वह इसे वित्तीय मदद देने से पीछे हट गया। 1992 में वर्ल्ड बैंक के आकलन में भी यही पाया गया था कि इस परियोजना से नुकसान अधिक, फायदे कम हो रहे हैं। इसलिए वर्ल्ड बैंक ने भी नर्मदा परियोजना पर निवेश करने से मना कर दिया। 1993-94 में केन्द्र सरकार ने भी इस परियोजना का स्वतंत्र आकलन करवाया था। तब भी यही पाया गया था कि इस परियोजना पर जितना निवेश किया जा रहा है, उसकी तुलना में बहुत कम परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। इस आकलन में भी परियोजना को विफल बताया गया था। परियोजना से कच्छ और सौराष्ट्र को उतना फायदा नहीं हो रहा है, जितना बताया जा रहा है। नर्मदा नदी करीब-करीब खत्म हो गई है। काफी विस्थापित परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। देश का सबसे बडा दुर्भाग्य यही है कि अधिकतर मामलों में समग्र जनहित अथवा राष्ट्रहित की बजाए राजनीतिक हित ज्यादा मायने रखते हैं।
121.92 मीटर (400 फीट) से बढाकर 138.68 (455 फीट) और फिर 17 जून 2017 को बांध की ऊंचाई इसकी पूरी क्षमता तक बढा दी। इस परियोजना से गुजरात के सूखागग्रस्त कच्छा और सौराष्ट्र की 18,000 वर्ग किलोमीटर से ज्यादा की खेती को निश्चित सिंचाई की सुविधा मुहैया होगी। तथापि, इस परियोजना के आलोचकों का कहना है कि इस परियोजना की लागत की तुलना में उतना फायदा नहीं हो रहा है, जितना होना चाहिए था। अब तक इस परियोजना पर अनुमानन पचास हजार करोड रु के करीब खर्चा हो चुका है और इतना ही पैसा अभी इसे पूरा करने में और लगेगा। इस परियोजना से जिन सूखाग्रस्त क्षेत्रों को पानी मिलना चाहिए था, उन्हें मिला ही नहीं। जिन इलाकों को सिंचाई की सुविधा मिल रही है, वहां पहले से ही माकूल पानी है। इस परियोजना से 50,000 से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं। लगभग दस हजार मछुआरों की आजीविका चली गई है। परियोजना के लागत-लाभ (कॉस्ट-बेनेफिट्स) के आकलन बाद ही सबसे पहले जापान ने सरदार सरोवर बांध से अपने हाथ खींच लिए थे। जापान को जैसे ही पता चला कि परियोजना से पचास हजार से ज्यादा परिवार विस्थापित हो रहे हैं, वह इसे वित्तीय मदद देने से पीछे हट गया। 1992 में वर्ल्ड बैंक के आकलन में भी यही पाया गया था कि इस परियोजना से नुकसान अधिक, फायदे कम हो रहे हैं। इसलिए वर्ल्ड बैंक ने भी नर्मदा परियोजना पर निवेश करने से मना कर दिया। 1993-94 में केन्द्र सरकार ने भी इस परियोजना का स्वतंत्र आकलन करवाया था। तब भी यही पाया गया था कि इस परियोजना पर जितना निवेश किया जा रहा है, उसकी तुलना में बहुत कम परिवार लाभान्वित हो रहे हैं। इस आकलन में भी परियोजना को विफल बताया गया था। परियोजना से कच्छ और सौराष्ट्र को उतना फायदा नहीं हो रहा है, जितना बताया जा रहा है। नर्मदा नदी करीब-करीब खत्म हो गई है। काफी विस्थापित परिवारों का पुनर्वास नहीं हुआ है। देश का सबसे बडा दुर्भाग्य यही है कि अधिकतर मामलों में समग्र जनहित अथवा राष्ट्रहित की बजाए राजनीतिक हित ज्यादा मायने रखते हैं।
सोमवार, 18 सितंबर 2017
जापानी रंग में रंगा गुजरात
Posted on 7:36 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच मैत्रीपूर्ण ंसंबंधों और सामरिक-आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है। शिंजो आबे के स्वागत के लिए पूरा गुजरात जापानमय हो गया । शिंजो अहमदाबाद में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट का उदघाटन करने के लिए विशेष तौर पर गुजरात आए थे। उनके स्वागत के लिए अहमदाबाद में सडकों को मखमल की तरह सजाया गया। जापानी अतिथियों की आवभगत के लिए खान-पान की विषेश व्यवस्था की गई और कई नए ठिकाने सामने आए। ऑटोमोबाइल उधोग और इससे जुडी अनेक परियोजनाओं ने गुजरात का कायाकल्प किया है। हर तरफ परिवर्तन की लहर चल रही है। नई-नई चीजें सामने आ रही हैं और काफी कुछ बदल रहा है। बदलाव की इस प्रकिया में जापान की झलक भी गुजरात में नजर आ रही हैं। ऑटोमोबाइल उधोग में काम करने के लिए बहुत सारे जापानी गुजरात में हैं और इसीलिए जापानी व्यंजनों की लोकप्रियता भी बढी है। साणंद के निकट एक होटल ने तो अपना नाम तक बदल डाला। इस साल फरवरी में होटल ”कृश्ण लीला“ से बदलकर “ला टोक्यो“ हो गया और व्यजनों का अपना पूरा मैन्यू ही बदल डाला। इससे पता चलता है कि गुजरात में जापान के सहयोग से विकास की बयार बह रही है। प्रधानमंत्री षिंजो आबे ने न केवल बुलेट ट्रैन प्रोजेक्ट का ही उदघाटन किया बल्कि इस परियोजना के लिए नाम मात्र के ब्याज पर पचास साल के लिए 88,000 करोड रु का ऋण भी दिया है। 1.10 लाख करोड रु की लागत से बनने वाली बुलेट ट्रेन परियोजना 2022 में पूरी होगी। इस ट्रेन के षुरु होने से अहमदाबाद-मुंबई के बीच 508 किलोमोटर लंबी यात्रा दो घंटे में पूरी कर ली जाएगी। षिंजो आबे के प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत और जापान के संबंध और प्रगाढ हुए हैं। अहमदाबाद यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री षिंजो और मोदी ने खुली जीप में आठ किलोमीटर लंबा रोड षो भी किया। षिंजो ने भारत और जापान की दोस्ती को दो सागरों का संगम बताकर अपनी यात्रा से इसे और मजबूती दी है। बुलेट ट्रेन परियोजना के अलावा षिंजो और मोदी के बीच एषिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडॉर पर भी चर्चा हुई। भारत और जापान दोनों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण परियोजना है और इसे चीन के ”वन बेल्ट, वन रोड” का तोड बता जा रहा है। चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना से भारत और जापान दोनों ही चिंतित है। चीन के सरकारी मुख समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ने अपने लेख में माना है कि जापान के समक्ष एषिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडॉर का प्रस्ताव रखकर भारत, चीन के ”वन बेल्ट, वन रोड” की काट कर रहा है। 40 अरब डॉलर की एषिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडॉर परियोजना का प्रमुख मकसद अफ्रीकी देषों के विकास में भागीदार बनना है। इस परियोजना में जापान तीस अरब डॉलर का निवेष करेगा और भारत दो अरब डॉलर देगा। इस धन से अफ्रीका में स्थानीय सामुदायिक परियोजनाओं के माध्यम से इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया जाएगा। चीन ने पिछले कुछ समय से अफ्रीका में अपना प्रभुत्व बढाकर भारत और जापान दोनों को कूटनीतिक चुनौती दी है। भारत और जापान दोनों चीन की तरह खुद को विकासषील पॉवर के रुप में दिखाना चाहते हैं। चीन का वनवेल्ट, वन प्रोजेक्ट वैष्विक स्तर की योजना है और इसके माध्यम से चीन ने यूरोप से मध्य-पूर्व और अफ्रीका तक निवेष और आधारभूत ढांचे का विस्तृत रोडमैप तैयार कर रखा है। भारत और जापान मिलकर एक अलग मॉडल तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं। भारत और जापान में सामरिक-आर्थिक सहयोग काफी हद तक चीन की विस्तारवादी भूख को रोक सकता है। भारत-जापान सहयोग से चीन पहले ही तिलमिलाया हुआ है। जापानी प्रधानमंत्री की ताजा भारत यात्रा से चीन और बौखला गया है। भारत और जापान के बीच इस गहरी दोस्ती की “जय“।
शुक्रवार, 15 सितंबर 2017
जनता को लूटने का सिला
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तेल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय गिरावट के बावजूद भारत में पेट्रोल और डीजल का अप्रत्याशित ऊंचे दामों पर बिकना आम आदमी के “बुरे दिन“ लाने जैसा है। तीन साल में अच्छे दिन लाने का वायदा करते-करते सरकार ने भारी करों का बोझ लाद कर आम आदमी की कमर ही तोड दी है। तीन साल में पेट्रोल और डीजल के दाम उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। बुधवार को मुंबई में पेट्रोल 79.48 रु और दिल्ली में 70.38 रु प्रति लीटर बिक रहा था। इससे पहले अगस्त, 2014 में मुबंई में पेट्रोल 80.60 रु और दिल्ली में 72. 51 रु प्रति लीटर के उच्चतम स्तर पर बिका था। मगर 2014 और 2017 में बहुत बडा अंतर है। 2014 में कच्चे तेल (क्रूड) की अंतरराष्ट्रीय कीमत 6291.91 रु प्रति बैरल थी। अब यह घटकर 3392.90 रु प्रति बैरल रह गई है। तीन साल मे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 46 फीसदी की गिरावट आई है मगर इस दौरान देश में पेट्रोल और डीजल में अनुपातिक गिरावट नहीं आई । पूरी दुनिया में 2013 के बाद से पेट्रोल और डीजल ं 56 फीसदी सस्ता हुआ है मगर भारत में सस्ता होने तो दीगर रहा, दामों में लगातार इजाफा हो रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट के बावजूद देश में पेट्रोल की कीमतें 60 रु लीटर से नीचे नहीं आई जबकि इस दौरान तेल की अंतरराश्ट्रीय कीमत 103 डालर प्रति बैरल से गिरकर 35 डालर प्रति डालर पर आ चुकी थी। सरकार का तर्क है कि अमेरिका में हार्वे-इरमा तूफान के कारण तेल उत्पादन प्रभावित हुआ है और कीमतों में 15 फीसदी का इजाफा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल 18 फीसदी और डीजल 20 फीसदी महंगा हुआ है। सितंबर में भारत को कच्चे तेल के दाम सिर्फ पांच फीसदी ज्यादा देने पडे थे। सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढना अथवा उत्पादन में गिरावट का असली कारण नही है। पेट्रोल और डीजल के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि के लिए सरकार की “ राजस्व भूख“ जिम्मेदार है। पिछले तीन साल में केन्द्र सरकार एक दर्जन से अधिक बार पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी बढा चुकी है। नवंबर 2014 और् जनवरी 2016 के दरम्यान ही सरकार नौ बार एक्साइज डयूटी बढा चुकी है हालांकि इस दौरान तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों मे 46 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। अगस्त 2014 में पेट्रोल पर प्रति लीटर एक्साइज डयूटी 9,48 थी। 2017 में यह बढते- बढते 21.48 रु प्रति लीटर हो गई। यानी तीन साल में 126 फीसदी की वृद्धि। अगस्त 2014 में डीजल पर एक्साइज 3.56 रु प्रति लीटर थी मगर इस समय यह 17,33 फीसदी है। यानी 387 फीसदी का इजाफा। एक्साइज ड्यूटी के अलावा पेट्रोल और डीजल पर राज्यों द्वारा अलग से वैट वसूला जा रहा है। इस समय दिल्ली में पेट्रोल पर 14.96 रु और डीजल पर 8,67 प्रति लीटर वैट वसूला जा रहा है। पंजाब में पेट्रोल पर 37.5 फीसदी और डीजल पर 17.29 फीसदी वैट वसूला जा रहा है। दुनिया के किसी भी देश में पेट्रोल और डीजल पर इतनी भारी-भरकम कर वसूले नहीं जाते हैं। पडोसी पाकिस्तान में भी पेट्रोल और डीजल भारत से कहीं ज्यादा सस्ता है। 2014 में 57 रु प्रति लीटर की तुलना में इसा साल अगस्त में वहां पेट्रोल के दाम 41.06 लीटर रु थे। पेट्रोल की मूल लागत 26.86 रु और डीजल 26 रु प्रति लीटर है। बाकी सब सरकार, आयल कंपनियों और डीलर्स का मुनाफा है। 16 जून से पेट्रोल-डीजल के रोजाना दाम तय हो रहे हैं। तब से पेट्रोल के दाम प्रति लीटर पाच रु बढ चुके है और सरकार जनता से 1.15 लाख करोड रु वसूल चुकी है। मोटी कमाई करने के लिए ही पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखा गया है। केन्द्र एक्साइज डयूटी बढाकर पैसे कमाती रहेगी, राज्य वैट लगाकर। अपने शाही खर्चे पूरा करने के लिए टैक्स-दर-टैक्स लगाकर जनता को लूटने का सिला बंद हो जाना चाहिए। अगर सरकार अच्छे दिन नहीं ला सकती, बुरे दिन लाने से तो बचे।
गुरुवार, 14 सितंबर 2017
राहुल गांधी बनाम स्मृति ईरानी
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अमेरिका के बर्कले स्थित केलिफोर्निया विष्वविधालय में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के भाषण पर भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया अपेक्षित थी। राहुल गांधी को टोक-टोक कर शर्मसार करना भाजपा की सामरिक रणनीति है। राहुल ने भाजपा पर आरोप भी लगाया है कि “ वो तो दिन भर मेरे बारे में दुर्भावना फैलाते हैं“। लेकिन इस बार भाजपा गलत ट्रेक पर है। पहली बार पहले से एकदम अलग राहुल गांधी पूर्वाग्रहों से मुक्त, आत्मविश्वास से भरपूर संयत और संतुलित नजर आए। उन्होंने पहले से लिखी स्क्रिप्ट नहीं पढी, अलबता बर्कले में राहुल गांधी ने ”वंशवाद, अहंकारी कांग्रेस से लेकर नोटबंदी और कश्मीर समस्या तक हर सवाल का खुलकर जवाब दिया। इसके कई कारण हो सकते हैं। अमेरिका में बॉस्टन, फ्लोरिडा जैसे शहरों में काफी दिनों से रुकने और सैम पित्रोदा, शशि थरुर और मिलिंद देवडा जैसे पेशेवर टीम ने राहुल गांधी में आत्मविष्वास भरा है। और यह सब भाजपा के राहुल गांधी को “भला-बुरा“ कहने वाली टीम को अच्छा नहीं लगा। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने फौरन कह दिया राहुल ने विदेशी धरती पर “वंशवाद“ पर बोलकर देश का अपमान किया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यहां तक कह दिया, “देश में तो उनकी कोई सुनता नहीं, इसलिए विदेशों में भाषण झाड रहे हैं। स्मृति ईरानी को चर्चा में रहने की आदत है और राहुल गांधी के खिलाफ बोलना उनका पेटेंट बन गया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने स्मृति ईरानी को अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लडाया था। वे हार गईं मगर इसके बावजूद उन्हें केन्द्र में मंत्री और मानव संसाधन जैसे अहम मंत्रालय का प्रभारी बनाया गया। बाद में उनसे यह मंत्रालय छीन लिया गया और उन्हें कपडा मंत्रालय दिया गया। वैंकेया नाडू के उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति चुने जाने के बाद स्मृति ईरानी को सूचना और प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार मिला है। भाजपा में स्मृति ईरानी का अपना अलग रुतबा है। उनका परिवार लंबे समय से राष्ट्रीय स्वंय सेवक से जुडा हुआ है। आरएसएस और भाजपा के शीर्ष नेताओं के प्रोत्साहन पर ईरानी राहुल गांधी को निशाने पर लेती रही हैं। इसीलिए, मैडम ईरानी राहुल गांधी के खिलाफ बोलने में एक पल का विलंब नहीं करती। निसंदेह, स्मृति ईरानी प्रखर वक्ता है और उन्हें भाजपा का उभरता “ फीमेल फेस“ माना जाता है। अभी सुषमा स्वराज को यह जगह मिली हुई है। वे आज भी भाजपा का “दमकता“ फीमेल फेस है़ं। भाजपा स्मृति ईरानी को सुषमा के विकल्प तौर पर कल्टीवेट कर रही है। सुषमा की ही तरह सुहाग का सिंदूर और माथे पर बडी सी बिंदिया स्मृति ईरानी का सार्वजनिक मंचों पर खास अंदाज है। बतौर ग्रांड ओल्ड पार्टी (जीओपी) के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को विदेश में क्या बोलना है और कैसे बोलना है, यह उनका विशेषाधिकार है। इसके लिए उन्हें प्रतिद्धंदी दलों से सीख लेने की जरुरत नहीं है। मगर विरोधियों की इस बात में दम है कि वंशवाद भारत में ही नहीं, अमेरिका में भी है। पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश और बिल क्लिंटन परिवार इसकी मिसाल है। और अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस रेस में शामिल होने की पर है। ट्रप पुत्री इवांका ट्रप को अपना उतराधिकारी बनाने में काफी संजीदा दिख रहे हैं। राहुल अमेरिका में अगर स्थानीय राजनीतिक दलों के वंशवाद का उल्लेख करते तो उनका भाषण और ज्यादा वजनदार होता। तथापि, कांग्रेस को इस बात से खुश होना चाहिए कि भाजपाई राहुल गांधी के खिलाफ आग उगल कर उन्हें और ज्यादा प्रासंगिक बना रहे हैं। इंदिरा गांधी के समय तत्कालीन विपक्ष जितनी आग उनके खिलाफ उगलते, वे उतनी ही ज्यादा लोकप्रिय होती गईं। और यही बात राहुल गांधी के मामले में प्रासंगिक हैं। राहुल का भाष ण सारगर्भित था या नहीं, इसका फैसला जनता को करने दिया जाए। लोकतंत्र में हर आदमी को अपनी बात, अपने सलीके और सोच के मुताबिक कहने की पूरी आजादी है। इस पर तल्ख टीका-टिप्पणी करना असहिष्णुता ही है।
Crisi Of Ideal Leadership
Posted on 6:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
ऋषि -मुनियों और तपस्वियों की पावन धरती पर समकालीन मायावी बाबाओं के आश्रमों और डेरों के भ्रमजाल से भोले-भाले लोगों को बचाना समाज की जिम्मेदारी है। हर बार की तरह इस बार भी देश का राजनीतिक नेतृत्व इस मामले में सबसे पीछे है। राजनीतिक दलों को जनकल्याण की बजाए वोट की राजनीति कहीं ज्यादा प्रिय है। महंतों की संस्था अखिल भारतीय अखाडा परिषद ने चौदह स्वयंभू बाबाओं की काली सूची जारी करके नेक काम किया है। इस काली सूची में बलात्कार के आरोप में जेल में बंद आसाराम बापू और सिरसा डेरा सच्चा सौदा के संचालक गुरमीत राम रहीम इंसा के अलावा राधे मां भी शामिल है। भारतीय अखाडा परिषद ने जनता का भी आहवान किया है कि लोगों को मायावी बाबाओं के कारनामों से सतर्क रहना चाहिए। अखाडा परिषद ने सरकार से स्वंयभू बाबाओं के काले कारनामों को रोकने के लिए माकूल कानून बनाने का भी अनुरोध किया है। तथापि, इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि करोडों लोगों की धार्मिक भावनाओं को कायदे-कानून में बांध कर नहीं रखा जा सकता। देश में पहले से विश्वसनीय न्याय प्रकिया मौजूद है। बाबाओं के मायावी जाल को तोडने के लिए सामाजिक सजगता और आत्म-नियंत्रण की जरुरत होती है। महज कानून बनाए जाने से अपराध रुकते नहीं है। भारत का अवाम इंटरनेट के युग में भी धर भीरु है और छोटी से समस्या को स्वंय ढूंढने की बजाए तत्काल इसका फौरी हल चाहता है। बुरे समय के लिए अपनी गलतियों की जगह ग्रहों को जिम्मेदार ठहराता है। स्वास्थय संबंधी समस्यायों का हल पूजा-पाठ और झाड-फूंक में तलाशता है। विशुद्ध व्यक्तिगत एवं पारिवारिक कष्टों के निवारण के लिए “दिव्य शक्ति“ की पनाह ली जाती है। और अलौकिक शक्तियों का स्वांग रचाने वाले ढोंगी बाबा इन सब मान्यताओं और विवशताओं का भरपृर फायदा उठाते हैं। भारत में आज भी भेड चाल की रीत है। गंभीर से गंभीर मसले पर तत्कालिक प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है और थोडे समय बाद इसे पूरी तरह से भुला दिया जाता है। अब सिरसा डेरे के संचालक गुरमीत राम रहीम का मामला ही ले लीजिए। सीबीआई कोर्ट द्वारा राम रहीम को बलात्कार के अपराध में जेल की सजा सुनाने के बाद से मीडिया ने उसकी बखिया उधेड कर रख दी है। जबकि सिरसा का एक स्थानीय अखबार लंबे समय से डेरे के काले कारनामों का भंाडाफोड कर रहा था। 15 साल पहले जब डेरे के गुंडों ने दिन-दहाडे अखबार के संचालक और संपादक की हत्या कर दी, तब कोई कुछ नहीं बोला। 2002 में सिरसा डेरे की एक साध्वी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष को चिठ्ठी लिखकर डेरा के संचालक गुरमीत राम रहीम पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। तब भी इन आरोपों की गहनता से जांच नही की गई। इसी चिठ्ठी पर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने प्रथम दृष्टया गुरमीत राम रहीम को यौन शोषण का दोषी माना था। इसके बावजूद सिरसा डेरे के भक्तों की आस्था नहीं डोली और पांच करोड से ज्यादा भक्त उसके पीछे भागते रहे। इससे ज्यादा सामाजिक त्रासदी क्या हो सकती है कि करोडों लोगों की आस्था का स्थल मां-बेटियों के यौन शोषण का अडडा बना रहे और भक्तजनों को इसके भनक तक न लगे। और सबसे बडी त्रासदी यह है कि यौन शोषण और ह्त्याओं के आरोपों से घिरे रहने के बावजूद गुरमीत राम रहीम को सियासी नेताओं ने सिर-आंखों पर बिठाए रखा और उसके आशीर्वाद के लिए कतार में खडे रहते । इससे पहले “बलात्कार“ के आरोपी आसाराम और उसके पुत्र नारायण साईं के मामले में भी यही हुआ है। तो क्या हम मान लें कि हमारी आत्मा की आवाज मर चुकी है़़? समय रहते हम क्यों सजग और सचेत नहीं हो पाते? यह स्थिति यही दर्शाती है कि देश में आदर्शवादी नेतृत्व का भारी संकट है़।
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मंगलवार, 12 सितंबर 2017
The Labour Pain Of GST
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बुजुर्गों का कहना है,“ कष्ट के बगैर कोई सुख नहीं (नो गेन विदआउट पैन )“। देश में एक समान कर व्यवस्था- गुडस एंड सर्विसेज टैक्स के लागू होने के बाद से यही कुछ हो रहा है। अब तक इससे कष्ट (पैन) ज्यादा गेन कम हो रहा है। आम उपभोक्ता को कीमतों में कोई राहत मिली हो, इसके कोई स्पष्ट संकेत नहीं है। व्यापारियों को नई कर व्यवस्था से अलग से जूझना पड रहा है। अर्थव्यवस्था में सुस्ती व्याप्त है और फिलहाल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में जीएसटी से वृद्धि के भी कोई संकेत नहीं है। शराब और तंबाकू कर-दर-कर लगाने का सबसे बडा जरिया है। सरकार जितना मर्जी कर का बोझ डाल दे, शराब पीने और तबाकू का सेवन करने वालों पर इसका कोई असर नहीं पडता है और न ही कभी महंगी शराब, तबांकू उत्पाद को लेकर जनता सडक पर उतरती है। और अब कार उधोग को भी टैक्स रुपी दूध देने वाली गाय में शा मिल कर लिया गया है। जीएसटी परिषद ने शनिवार को मिड साइज कारों पर दो फीसदी, बडी कारों पर 5 फीसदी और एसयूवी पर 7 फीसदी सेस बढा दिया है। कम कीमतों वाली कारों को बख्श दिया गया है। लक्जरी कारों पर 28 फीसदी जीएसटी के अलावा 15 फीसदी सेस पहले से लागू है। ताजा कर वृद्धि से ऑडी क्यू7 अब 3.5 लाख महंगी हो जाएगी। टाटा इनोवा भी 65,000 हजार रु महंगी हो जाएगी। जीएसटी परिषद कारों पर अधिकतम दस फीसदी सेस लगाने के लिए अधिकृत है। यानी अभी आठ फीसदी सेस और लगाया जा सकता है और इसे चरणबद्ध तरीके से बढाया जाएगा। कराधान सिंद्धात का तकाजा है कि दुधारु गाय से ज्यादा से ज्यादा दूहने में कोई हर्ज नही होता है। कराधान सिद्धांत का यह भी तकाजा है कि अमीरों और धनाढ्य वर्ग पर अधिकाधिक कर लगाकर इस धन को गरीबों के कल्याण पर खर्च किया जाए। इसे आर्थिक असमानता कम होगी। मगर कराधान सिद्धांत यह भी कहता है कि कर व्यवस्था प्रगतिशील होनी चाहिए और इससे बचत और उत्पादन दोनों को ही भरपूर प्रोत्साहन मिलना चाहिए। कार उत्पादकों ने ताजा वृद्धि पर अपना असंतोष जताया है। ऑटोमोबाइल उधोग पहले ही संकट से जूझ रहा है। खासकर कमर्शियल वाहन मंदी से पीडित है। इस साल मई माह में कमर्शियल वाहनों की बिक्री में 33 फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। कारों की बिक्री में हालाँकि अभी भी 10 से 12 की वृद्धि जारी है मगर कार उत्पादकों का कहना है कि अगर सरकार की उधोग के प्रति तदर्थ नीति जारी रही तो कमर्शियल वाहनो की तरह कार उधोग भी मंदी की चपेट में आ सकता है। भारत में कार उत्पादन दुनिया का सबसे तेजी से आगे बढता उधोग है। अग्रणी कार उत्पादक पिछले 18 माह में बार-बार बदलते नियमों और करों से परेशा न है। इससे भारत में नए निवेश लाने में विलंब हो सकता है। छोटा और मझौला व्यापारी वर्ग भी जीएसटी से खासा परेशान है। रिटर्न फाइल करने की जटिल प्रकिया और करों के अलग-अलग स्लैब छोटे व्यापारियों के पल्ले नहीं पड रहे हैं। व्यापारी भारतीय जनता पार्टी के साथ लंबे समय से जुडे हुए हैं और वे पार्टी का सबसे पक्का जनाधार माना जाते हैं। मगर पहले नोटबंदी और उसके फौरन बाद जीएसटी के कारण व्यापारियों को पार्टी से ही खासी नाराजगी है। नोटबंदी ने व्यापारियों की कमर तोड दी थी और अब जीएसटी ने रही-सही कसर पूरी कर दी है। कनाडा, आस्ट्रेªलिया, जापान, मलेशिया और सिंगापुर को भी शुरु-शुरु में जीएसटी जैसी व्यवस्था लागू करने पर तरह-तरह की दिक्क्तों का सामना करना पडा था। भारत आबादी के लिहाज से इन मुल्कों से कई बडा है। इसलिए देश में जीएसटी को लेकर समस्याएं भी ज्यादा है। जीएसटी से अगर जनता को तकलीफ हो रही है, तो सरकार को इन्हें अविलंब दूर करना चाहिए। ऐसी व्यवस्था किस काम की, जिससे लोगों को हलकान होना पडे।
सोमवार, 11 सितंबर 2017
देरी से मिला न्याय ?
Posted on 7:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पुरानी कहावत है, न्याय देर से मिले तो वह न्याय नहीं (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड)। भारत में न्याय प्रकिया इतनी जटिल और समय खपाऊ वाली है कि न्याय मिलने तक वादी की सारी उम्मीदें ही मर जाती हैं। 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट मामले में 24 साल बाद टाडा अदालत का दूसरा फैसला आया है। अदालत ने 257 निर्दोश लोगों के संहार के प्रमुख आरोपी अबु सलेम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दो दोशियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। मामले के प्रमुख साजिषकर्ता दाउद इब्राहिम, छोटा षकील और टाइगर मेमन समेत 33 आरोपी अभी भी फरार हैं। इसी मामले में टाइगर मेमन के भाई याकूब मेमन को 30 जुलाई, 2015 को फांसी दी गई थी। टाडा की अदालत ने याकूब मेमन को मुंबई बम ब्लास्ट के प्रमुख साजिषकर्ताओं को धन और हथियार मुहैया कराने का दोशी पाया था और उसे फांसी की सजा सुनाई थी। अबु सलेम चालाक निकला और कानून की जद से बचने के नरसंहार को अंजाम देने के बाद अपनी गर्लफ्रेंड के साथ विदेष भाग गया था। दाउद इब्राहिम के दाहिने हाथ छोटा षकील को अबु सलेम का मेंटर माना जाता है। भारत से विदेष भगाने के लिए भी छोटा षकील ने ही अबु सलेम की मदद की थी। माफिया सरगना छोटा षकील इतना धूर्त और काइंया है कि उसी ने अपने जानी दुष्मन छोटा राजन को पुलिस से इंडोनेषिया में पकडवाया था। मगर पुलिस आज तक उसे पकड नहीं पाई है। भारत सरकार को पुर्तगाल से भगौडे अबु सलेम का प्रत्यर्पण करने के लिए भी खासी मषक्कत करनी पडी थी। 2006 में अबु सलेम का प्रत्यर्पण करने के लिए भारत को पुर्तगाल को इस बात का आष्वासन देना पडा था कि उसे फांसी नहीं दी जाएगी। पुर्तगाल दुनिया के उन देषों में षुमार है जहां फांसी की सजा अमानवीय मानी जाती है और इस पर प्रतिबंध है। टाडा अदालत ने सरकार की इस अंडरटेकिंग का सम्मान रखा है हालांकि पुर्तगाल के सुप्रीम कोर्ट ने अबु सलेम की करार तोडने की अर्जी पर व्यवस्था दी थी कि भारत क्योंकि संप्रभु राश्ट्र है, इसलिए उसके कानून में दखल नहीं दिया जा सकता। अबु सलेम को प्रदीप जैन हत्याकांड में भी आजीवन कारावास की सजा हो चुकी है। आजीवन कारावास याफ्ता मुजरिम को जीवन के अंत (मृत्यु) तक कारावास में ही रहना पडता है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही व्यवस्था दे चुका है कि आजीवन कारावास की स्थिति में मुजरिम को जिंदा रहने तक जेल में ही रहना पडेगा। भारत की न्याय प्रकिया के अनुसार अबु सलेम और अन्य दोशी सजा के खिलाफ पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं। इस स्थिति में यह मामला और लंबा खींच सकता है। 257 लोगों के हत्यारों की सजा का मामला जितना लंबा चलेगा, नर संहार से पीडित परिवारों के जख्म उतने ही हरे होते जाएंगे। लंबी अदालती सुनवाई और मीडिया की सुर्खियां प्रभावित परिवारों को अपने प्रियजनों के खोने का दुख भुलाए नहीं भूलने देती और उन्हें चैन की नींद सोने नहीं देती। और अगर समय पर न्याय नहीं मिले तो जख्म नासूर बन जाते हैं। बहरहाल, 26/11 मुंबई नर संहार के पाकिस्तानी साजिषकर्ताओं को पकडना तो दीगर रहा, पुलिस आज तक 1993 में श्रृंखलाबद्ध 13 बम विस्फोट करवाने वाले दाउद इब्राहिम एंड कंपनी को पकड नहीं पाई है। इन्हें भी छोडिए, भारत सरकार आज तक टी सीरीज के मालिक गुलषन कुमार के प्रमुख ह्त्यारों को आज तक नहीं पकड पाई है। सरकार आईपीएल स्कैम के आरोपी ललित मोदी और बैकों के नौ ह्जार करोड रु से ज्यादा का कर्जा डकार गए विजय माल्या तक को भी पकड नहीं पाई है। यह कैसा कानून है कि अपराध करके विदेष भाग जाओं ओर मजे करो और अगर पकडे भी गए तो कडे दंड से बच जाओ़। इस तरह की कानूनी खामियों से अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं।
शुक्रवार, 8 सितंबर 2017
नहीं सुधरेगा पाकिस्तान !
Posted on 7:16 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ के आतंकियों पर ताजा बयान से भारत को इतराने की जरुरत नहीं है। अंतरराष्ट्रीय सहानुभूति प्राप्त करने और दुनिया को यह दिखाने के लिए यह बयान जारी किया गया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ ने माना है कि लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को पाल-पोसकर अपने ही पांव पर कुल्हाडी चला रहा है। आतंकी संगठनों की सरपरस्ती से पाकिस्तान को पूरी दुनिया में फजीहत झेलनी पड रही है। पाक विदेश मंत्री का यह भी कहना है कि सरकार को अविलंब आतंकी संगठनों पर नकेल डालनी चाहिए। अगर ऐसा नही किया गया तो पाकिस्तान अलग-थलग पड जाएगा। शुक्र है पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने माना तो सही कि उसकी सरजमीं से लश्कर-ए-तैयबा और जैेश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन फल-फूल रहे हैं और सरकार बाकायदा आतंकियों को चारा डाल रही है। अब तक तो इस्लामाबाद इस बात से ही मुकर रहा था कि लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे संगठन आतंकी है और पाकिस्तान उन्हें पाल-पोस रहा है। पाकिस्तान विदेश मंत्री का यह बयान चीन के शियामेन में सपन्न ब्रिक्स सम्मेलन द्वारा जारी घोषणा पत्र के दो दिन बाद आया है। ब्रिक्स घोषणा पत्र में लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे दस आतंकी संगठनों को शांति के लिए बहुत बडा खतरा बताया गया है और इनके खिलाफ कडी कार्रवाई करने को कहा गया है। ब्रिक्स के अलावा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी पाकिस्तान को कई बार चेता चुके हैं कि वह आतंकी संगठनों को पालने-पोसने से बाज आए। चीन ने ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान, लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का घोषणा पत्र में शामिल नहीं होने देने के लिए खूब हाथ-पांव मारे थे मगर इस बार उसकी नहीं चली। पिछले साल गोवा में सपन्न ब्रिक्स सम्मेलन में चीन लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का नाम घोषणा पत्र से बाहर रखने में सफल रहा था। ब्रिक्स के घोषणा पत्र में क्योंकि राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भी सहमति और हस्ताक्षर है, इस स्थिति के दृष्टिगत चीन के लिए अब लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का बचाव करना मुश्किल हो जाएगा। चीन अब तक लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे पाकिस्तानी संगठनों को आत्की बताने से बच रहा था। इसीलिए पाकिस्तान अब लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई की बात उछाल रहा है। पाकिस्तान की किसी भी बात पर विश्वास नहीं किया जा सकता। दुनिया को दिखाने के लिए पाकिस्तान भले ही लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई करने का आडंबर करे मगर अमल में वह कुछ नहीं करेगा। 1993 मुंबई बम हमले के मास्टरमाइंड ग्लोबल टेर्रिस्ट डॉन दाउद इबाहिम को पाकिस्तान जिस तरह से शरण दिए हुए है, उससे पाकिस्तान की बदनीयत का पता चलता है। दाउद मुंबई में 257 लोगों की हत्याओं के लिए वांछित है। वीरवार को 24 साल बाद इस मामले में अदालत का फैसला आया है मगर हमले के प्रमुख साजिशकर्ता दाउद आज भी कानून की जद से बाहर है। दाउद के प्रमुख गुर्गे अबु सलेम को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है जबकि दो आरोपियों को मृत्यु दंड दिया गया है। पुर्तगाल से संधि के तहत अबु सलेम फांसी से बच गया। भारत को अबु सलेम को पुर्तगाल से पत्यर्पण करने के लिए वहां की सरकार को सलेम को फांसी की सजा न देने का वायदा करना पडा था। पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने भी माना है कि दाउ द इब्राहिम पाकिस्तान में ही है मगर वह यह सूचना भारत के साथ साझा करने के लिए कतई तैयार नहीं है। दाउद तो क्या पाकिस्तान अपने पडोसी भारत से किसी भी तरह का सहयोग करने के लिए तैयार नहीं है। कहते हैं, “ कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं होती“। पाकिस्तान भी कुत्ते की पूंछ की तरह है। आतंक को पालना-पोसना और चारा डालना उसकी सामरिक विवशता है। ब्रिक्स, भारत, अमेरिका समेत दुनिया लाख कोशिश कर ले, पाकिस्तान अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आएगा। भारत को इसी सच्चाई के साथ अपनी कूटनीति बनानी होगी।
गुरुवार, 7 सितंबर 2017
गोली से निर्भीक आवाज नहीं मरती
Posted on 6:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/
एक और निर्भीक आवाज को दबा दिया गया। कन्नड भाषा की अग्रणी लेखक एव “लंकेश ” पत्रिका की संपादक गौरी लंकेश की मंगलवार को उनके घर के सामने गोली मार कर हत्या कर दी गई। गौरी की हत्या समृद्ध भारतीय भाषा और बेबाकी की ह्त्या है। इससे भाषा और गरीब हो गई है। समकालीन समाज एक और साहसी और निर्भीक आवाज को सुरक्षित नहीं रख पाया। गौरी की नृशंस हत्या पर किसी ने सटीक प्रतिक्रिया व्यक्त की है, “एक और सनसनीखेज हत्या। सनसनी अब इन हत्याओं से नहीं होती है क्योंकि हम इन हत्याओं का इंतजार कर रहे होते हैं“। गौरी का तो हर दिन ही सनसनी होता था । “ मौत जो कत्ल की श क्ल में आई एक लंबी प्रतीक्षा थी। आश्चर्य इस बात का है कि वे अब तक कैसे बच रही?“? इस बात पर वाकई ही हैरानी होती है है कि समकालीन असहिष्णुता के माहौल में निर्भीक और सच्ची आवाजें कैसे खुद को सुरक्षित रख पा रहे हैं। कन्नड भाषा के पारखी एम एम कलबुर्गी की निर्मम ह्त्या के बाद से ही गौरी लंकेश का अब तक बचे रहना ही बडी बात है। 30 अगस्त, 2015 को कर्नाटक राज्य के धारवाड जिले में अग्रणी लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद से नरेन्द्र दाभोलकर और गोविंद पानसरे की जमात के लोगों का सुरक्षित रहना वाकई हैरानी की बात है। इस पर किसी ने प्रतिक्रिया की है कि इससे हर वह लेखक खुद से सवाल कर रहा होगा,“क्या मेरी लेखनी का कोई असर नही“ं़? यह तल्ख प्रतिक्रिया देश में व्याप्त मौजूदा माहौल को बया करती है। गौरी लंकेश की नहीं अलबता अभिव्यक्ति, असमहमति और रचनात्मक आलोचना की हत्या हुई है। हर पत्रकार और लेखक की हत्या से देश , समाज और भाषा गरीब हो जाती है। गौरी लंबे समय से कन्नड भाषा के पाठकों को सचेत कर रही थी कि कर्नाटक भी दूसरा गुजरात बनने की राह पर है। गौरी यह भी कर रही थी भारतीय समाज को अन्याय और ह्त्याओं की आदत सी पड गई है। उसकी आत्मा ही बीमार हो गई हैं। धर्म और समाज के ठेकेदारों को यह सब रास नहीं आ रहा था। सच यह है कि धर्म के ठेकेदारो को तो प्रगतिशील विचारधारा और सकारात्मक आलोचना कभी रास नहीं आई है। गौरी अल्पसंख्यकों, रोहिंग्या मुसलमानों और नक्सली कहे जाने वाले आम आदमी की आवाज बलुंद कर रही थी। वे इन सभी को इज्जत की जिंदगी की पक्षधर थी। गौरी उस व्यक्ति की पैरवी कर रही थी, जिसके खून का प्यासा हर “ राष्ट्रवादी “ है। अपने बारे नकारात्मक न सुनने का आदी “राष्ट्रवादी “ अगर “निर्भीक“ आवाज को गोली से मारे डाले, इसमें आश्चर्य की क्या बात है? एक-न-एक दिन यह तो होना ही था। कलबुर्गी के साथ भी यही हुआ और दाभोलकर और पानसरे के साथ भी। सत्ता के मठाधीशों को इस तरह की निर्भीक आवाज न तो समझ में आती हे और न ही भाती है। गौरी को लगातार धमकियां मिल रही थी मगर लेखक और अभिव्यक्ति का प्रतीक पत्रकार भला धमकियों से कहां डरता है। गौरी जैसे=जैसे निर्भीक आवाज को बुलंद करती गईं, राश्ट्रवादियों का हाथ जेब में रखी पिस्तौल पर बरबस चला जाता। अतंतः, मंगलवार को गोली पिस्तौल बाहर निकल ही गई। गौरी अगर “विकास पुरुष “, जलवायु परिवर्तन अथवा नोटबंदी के पक्ष में लिखती तो कुछ दिन और जी सकती थी। उन्हें खुद अपना ख्याल रखना चाहिए था मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और सच्चाई के उस रास्ते को चुना जिस के हर कदम पर मौत का सामना होता है। गौरी अपने पीछे एक बहुत बडा शून्य छोड गई हैं। उनकी ह्त्या पर देश भर में आक्रोश जाहिर करना, न्यूज चैन्ल्स और मीडिया में चर्चा करना उनके प्रति सच्ची श्रदांजलि नही है। इन सब में कोई न कोई स्वार्थ नजर आ रहा है। अगर गौरी को सच्ची श्रदांजलि देनी ही है तो उनके अधूरे काम को पूरा करें और निर्भीक और स्वतंत्र आवाज को बुलंद करें।
बुधवार, 6 सितंबर 2017
एक और कूटनीति कामयाबी
Posted on 6:25 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चीन के शियामेन में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा पत्र में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों का नाम लिया जाना भारत की बहुत बडी कूटनीतिज्ञ सफलता है। चीन की ना-नुकर के बावजूद सोमवार को जारी ब्रिक्स घोषणा पत्र में पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठन लश्कर -ए-तैयबा और जैश -ए, मोहम्मद समेत दुनिया के दस आतंकी संगठनों का मानवता के लिए सबसे बडा खतरा बताया है। गोवा में भारत को भले ही यह सफलता नहीं मिली थी, अब शियामेन में मिल गई है। घोषणा पत्र में जिन दस आतंकी संगठनों का जिक्र है, उन मेंसे चार पाकिस्तान में हैं। घोषणा पत्र पर भारत के प्रधानमंत्री मोदी के साथ-साथ चीन, भारत, रुस और दक्षिण अफ्रीका के र राष्ट्रपति हस्ताक्षर हैं। पांचों देश ब्रिक्स के सदस्य हैं। यह संगठन दुनिया की तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्थाओं का ताकतवर संगठन है। चीन ने ब्रिक्स में पाकिस्तान और आतंकवाद को न लाने की भरसक कोशिश भी की। चीन कतई नहीं चाहता था कि भारत चीन की धरती पर आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में पाकिस्तान के खिलाफ आतंकवाद का मुद्दा उठाए। सम्मेलन से पहले चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था, “पाकिस्तान में आतंक-निरोधी मुद्दों पर भारत की भारत की कुछ चिंताएं हैं मगर यह ब्रिक्स सम्मेलन में उठाने का विषय नहीं है“। पिछले साल उडी हमले के बाद गोवा में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में चीन पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठनों के नाम घोषणा पत्र से बाहर रखने में कामयाब रहा था। मगर इस बार चीन में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भारत पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को शामिल करवाने में सफल रहा है। घोषणा पत्र में 17 जगह आतंकवाद का उल्लेख है और ब्रिक्स ने इससे लडने के लिए सहयोग तंत्र विकसित करने पर जोर दिया है। ब्रिक्स के घोषणा पत्र में आतंकी संगठनों का नाम लिए जाने से पाकिस्तान के असली चेहरे का भी दुनिया के सामने भंाडाफोड हुआ है। इससे इन आतंकी संगठनों के खिलाफ साझी कार्रवाई करने में भी मदद मिलेगी। मंगलवार को राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच डोकलाम विवाद के बाद पहली बार सकारात्मक बातचीत भी हुई। एक घंटे से ज्यादा समय तक चली इस बातचीत में दोनों नेताओं ने द्धिपक्षीय संबंधों को और मजबूत बनाने का संकल्प दोहराया है। डोकलाम सीमा विवाद के कारण भारत और चीन के संबंध तल्ख हो गए थे मगर इस विवाद को भी कूटनीति प्रयासों से सुलझा किया गया। भारत और चीन के बीच इस बात पर पहले से ही सहमति है कि दोनों पडोसी अपने मतभेदों को किसी भी सूरत में तनाव मं नहीं बदलने देंगे। डोकलाम विवाद का हल इस बात का प्रमाण है कि सीमा विवाद पर तल्खी के बावजूद एशिया के दोनों ताकतवर देश द्धिपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए लगातार प्रयासरत हैं। इस साल जून में अस्ताना में जिनपिंग और मोदी के बीच हुई बातचीत में इस बात पर सहमति बनी थी कि भारत और चीन के बीच मतभेद हो सकते हैं मगर दोनों इसे तनाव का रुप नहीं लेने देंगे। मंगलवार को शियामेन में भी जिनपिंग और मोदी के बीच फिर से इस बात पर सहमति बनी। भारत और चीन इस जमीनी सच्चाई को जानते हैं कि पडोसी होने के साथ-साथ दोनों के बीच मतभेद होना स्वभाविक है मगर शान्ति के लिए यह लाजिमी है कि मतभेदों को आपसी संवाद और बातचीत से सम्मानजनक तरीके से सुलझा जाए। जिनपिंग-मोदी इस बात पर भी सहमत हैं कि सोहार्दपूर्ण रिश्तों के लिए सीमा पर शांति बनी रहनी चाहिए और इसके लिए दोनों देशो के बीच लगातार संवाद की जरुरत है। इसे बढाना होगा। भारत और चीन के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को प्रगाढ करने के लिए ब्रिक्स और संयुक्त आर्थिक मंचों पर लगातार बातचीत की जरुरत है। उतर कोरिया और दक्षिण चीन सागर को लेकर व्याप्त मौजूदा तनाव में चीन को भारत के साथ की जरुरत है। चीन-पाकिस्तान की दोस्ती भारत और बीजिंग के बीच संबंधों के आडे नहीं आनी चाहिए।
मंगलवार, 5 सितंबर 2017
मंत्रिंमंडल विस्तार और राजग
Posted on 6:06 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लोकसभा चुनाव से पौने दो साल पहले रविवार को किए गए केन्द्रीय मंत्रिमंडल विस्तार ने भाजपा की समकालीन राजनीति के कुछ संवेदनशील पहलुओं को उजागर किया है। इस विस्तार ने केन्द्र में सत्तारूढ राजग की प्रासंगिकता पर भी सवाल खडा कर दिया है। ताजा विस्तार में राजग में शामिल सहयोगी दलों का दरकिनार किया जाना काबिलेगौर है। राजग में नए-नए शामिल हुए नीतिश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) को नुमाइंदगी न मिलना सामरिक विवशता माना जा सकता है मगर शिवसेना की उपेक्षा के साफ-साफ संकेत हैं कि 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अकेले ही लडना चाहती है। गठबंधन की राजनीति भाजपा को खासा नुकसान कर रही है। सहयोगी दलों की खडमस्तियां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता पर भी भारी पड रही है। पंजाब विधानसभा चुनाव इसका प्रमाण है। शिरोमणी अकाली दल के साथ मिलकर लडने का नतीजा पार्टी को भारी कीमत देकर चुकाना पडी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता के बावजूद इस चुनाव में भाजपा पंजाब में मात्र तीन सीटें जीत पाई हैं। ताजा मंत्रिमंडल विस्तार में अपनी उपेक्षा से क्षुब्ध शिवसेना नेता संजय राउत ने तो यहां तक कह दिया है कि एनडीए तो अब लगभग मर चुका है। मोदी मंत्रिमंडल में अभी भी कुछ जगह बची है और सहयोगी दलों को अभी भी उम्मीद है कि अगला विस्तार उनके लिए किया जा सकता है। विस्तार का सबसे अहम पहलू है भाजपा की फायरब्रंाड नेता उमा भारती का मंत्रिमंडल में बने रहना। पहले माना जा रहा था कि राजीव प्रताप रूडी की तरह असंतोषजनक परफॉरमेंस के लिए उमा भारती की भी मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी जाएगी, मगर ऐसा नहीं हुआ। उमा भारती का विभाग जरुर बदला गया है। मंत्रिमंडल विस्तार में शामिल न होकर उमा भारती ने अपने तरीके से विभाग बदलने के प्रति नाराजगी भी जताई है। साध्वी उमा भारती का मंत्रिमंडल में बने रहना “सर्व शक्तिमान“ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीमाओं को भी उजागर करता है। धारा प्रवाह “गीता प्रवचन“ के लिए ख्यातिप्राप्त उमा भारती राष्ट्रीय स्वंय सेवक की बेहद लाडली है। भाजपा के सीनियर नेताओं में उमा भारती को हिन्दुत्व का दमकता मुखौटा माना जाता है। वे बाबरी मस्जिद को ढहाने के मामले भी नामजद है। रामजन्म भूमि आंदोलन में भी उन्होंने बढ-चढ कर भाग लिया था। 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा को मध्य प्रदेष विधानसभा में प्रचंड तीन-चौथाई बहुमत मिला था और वे राज्य की मुख्यंमंत्री बनी थीं। अगस्त 2004 में हुबली दंगे मामले में उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट निकलने पर उहें पद छोडना पडा था। तुनकमिजाजी उनकी कमजोरी है। इसी वजह 2004 में पार्टी के लाल कृष्ण आडवानी की मौजूदगी में उमा भारती ने वरिष्ठ नेताओं को खरी-खोटी सुनाई और बैठक छोडकर चली गईं। इस पर अनुशासनहीनता के लिए उन्हें 2005 में पार्टी से ही निकाल दिया गया। सुश्री भारती ने अपनी अलग पार्टी बनाई और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा नेताओं की जमकर छीछालेदारी की। मोदी को तब उन्हें “विनाश पुरुष “ तक कहा था। छह साल बाद 2011 में उमा भारती भाजपा में लौट आईं। प्रधानमंत्री मोदी के बारे यह बात जगजाहिर है कि वे अपने विरोधियों को कभी नहीं भूलते हैं मगर प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें उमा भारती को अपने मंत्रिमंडल में शामिल करना पडा और इस बार उन्हें ना चाहते हुए भी साध्वी का मंत्री पद यथावत रखना पडा। इस प्रकरण से पता चलता है कि नरेन्द्र मोदी भाजपा में उतने भी सर्व शक्तिमान नहीं हैं जितने माने जाते हैं। तथापि निर्मला सीतारमन को रक्षा मंत्री बनाना और 9 मेंसे 4 अनुभवी पूर्व नौकरशाहों को मंत्रिमंडल में शामिल करना प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक है। पहली बार देश को फुल टाइम महिला रक्षा ंमंत्री मिली है। रविवार के मंत्रिमंडल विस्तार का एक ही संदेश है“ परफॉरम और पेरिश “। नए मंत्रियों को भी प्रधानमंत्री ने यही संदेश दिया है। देश के लिए यह बहुत अच्छी बात है कि मंत्रियों का आकलन उनके कामकाज से किया जा रहा है।
शुक्रवार, 1 सितंबर 2017
नोटबंदी से क्या मिला ?
Posted on 8:26 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार की नोट्बंदी से आखिर देश को क्या मिला? नोटबंदी पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) की रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल नवंबर में बंद किए गए पांच सौ और एक हजार के 99 फीसदी नोट बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 15.44 लाख करोड मेंसे 15.28 लाख करोड रुपए बैंकों के पास जमा किए जा चुके हैं। मात्र 16,000 करोड रु वापस नहीं आए हैं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 1000 रु के 8.9 करोड रु वापस नहीं लौटे हैं। इन आंकडों से यह निष्कर्ष निकलता है कि काले धन को बाहर निकालने का नोटबंदी का मूल मकसद पूरी तरह से हासिल नहीं किया जा सका है। 15.44 लाख करोड रु मेंसे जो 16,000 करोड वापस नहीं किए गए, उसे काला धन माना जा सकता है। सरकार ने वीरवार को सफाई दी कि नोटबंदी के बाद 10 लाख लोगों ने जो 2.89 लाख करोड रु जमा किए हैं, उसकी जांच की जा रही है। इन आंकडों के बलबूते सरकार यह जताने का प्रयास कर रही है कि 10 लाख लोगों द्वारा जमा लिए गए 2.89 लाख करोड रु काला धन हो सकता है। आरबीआई की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि नोटबंदी “खोदा पहाड, निकली चुहिया“ साबित हुई है। आरबीआई और एसबीआई (स्टेट बैंक ऑफ इंडिया) रिसर्च रिपोर्ट का ही आकलन है कि नोटबंदी से आरबीआई और सरकार को जबरदस्त नुकसान हुआ है। आरबीआई को दो हजार और पांच सौ के नए नोट छापने के लिए ही 8000 करोड रु खर्च करने पडे हैं। एसबीबी के अनुसार आरबीआई को सीजनोरेज (मुद्रा स्फीति कर) का भी खासा नुकसान उठाना पडा है। सरकार भले ही कहे कि 15.44 लाख करोड रु बाहर निकालने के लिए 8000 करोड रु बहुत बडी लागत नहीं है, पर सवाल यह है कि अगर इन नोटों को सिस्टम में वापस ही लाना था, फिर नोटबंदी का क्या फायदा? और उस नुकसान का क्या जो नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को उठाना पडा। आम आदमी को अपना ही पैसा बैंकों से निकालने के लिए सात सप्ताह से ज्यादा समय तक दिन भर कतार में खडे रहने पडा। इस दौरान 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई। लगभग तीन महीने तक छोटे-बडे कारोबार बंद पडे रहे। नोटबंदी के तुरंत बाद नवंबर-दिसंबर में एफएमसीजी (फॉस्ट मूविंग कंज्युमर गुडस) की ग्रोथ में 1 से 1.5 फीसदी की गिरावट आई । अमूमन, इस सेक्टर की ग्रोथ को सबसे ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है। पिछले साल दिसंबर में सबसे बडे दो-पहिया वाहन उत्पादक हीरो मोटरकॉर्प का उत्पादन एक तिहाई ही रह गया था। परचेजिंग मैनेजर सर्वे के मुताबिक मैन्युफेक्चरिंग उत्पादन में अप्रत्याशित गिरावट देखी गई । कंपनियों का इन्वेस्टमेंट प्रपोजल 2.4 खरब रु से गिरकर 1,25 खरब ही रह गया । इससे कॉर्पोरेट क्रेडिट ग्रोथ 30 साल के न्यूनतम स्तर पर था। नतीजतन, जनवरी-मार्च 2017 तिमाही में भारत की विकास दर 6.1 फीसदी ही रह गई थी जबकि एक साल पहले इसी तिमाही में यह 7.1 फीसदी थी। इस साल अप्रैल-जून की तिमाही में विकास दर 5.7 फीसदी ही रह गई थी जबकि एक साल पहले इसी तिमाही में यह 7.9 फीसदी थी। विकास दर में यह अप्रत्याशित गिरावट नोटबंदी के कारण आई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनामी का आकलन था कि 50 दिन की नोटबंदी से देश को 1.28 लाख करोड रु और कंपनियों को 61500 करोड रु का नुकसान हुआ है। मगर सियासतदानों को क्या फर्क पडता है। नोटबंदी से सौ से ज्यादा लोग मारे गए, तो क्या हुआ! जिस देश में सर्पदंश से हर साल 4,000 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं, खसरे से हर दूसरे सेंकेड एक बच्चे की मौत हो जाती है, दिमागी बुखार से हर साल साठ हजार से ज्यादा बच्चे कालग्रस्त हो जाते हैं, हर सेकेंड एक बालक भूख से बिलख-बिलख कर मर जाता है, वहंा नोटबंदी से चंद लोग मारे जाएं तो क्या हुआ। धन्य है सरकार !
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