शुक्रवार, 31 मार्च 2017

भारतीयों के खिलाफ हिंसा

लंदन में ब्रितानवी संसद परिसर के निकट आतंकी हमले की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि अमेरिका और आस्ट्रेलिया में नस्लीय हिंसा थमे नहीं थम रही है। अविश्वास  और नस्लीय घृणा के इस माहौल से  फिर विश्व  स्तब्ध है। अमेरिका और आास्ट्रेलिया की ताजा घटनाओं ने विकसित देशों  के मूलवासियों में व्याप्त असुरक्षा और नस्लीय मानसिकता को फिर उजागर किया है। रविवार अलसुबह अमेरिका में ओहियो राज्य के सिनसिन्नाटी शहर के एक नाइट क्लब  में दो बंदूकधारी ने अंधाधुंध फायरिंग की और इसमें एक व्यक्ति  मारा गया  और 14 लोग घायल हो गए। आए दिन  अमेरिका में हिंसक घटनाएं हो रही हैं । डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति  बनने के बाद हिंसक घटनाओं में और ज्यादा इजाफा हुआ है। आस्ट्रेलिया में पांच लोगों ने एक भारतीय पर यह कहते हुए हमला किया कि उन्हें भारतीयों की उपस्थित जरा भी पसंद नहीं है। भारतीय मूल के लोगों के लिए अमेरिका, इंग्लैंड, कनॉडा और आस्ट्रेलिया पहली पसंद रहे हैं। इन देशों  की अर्थव्यवस्था को समृद्ध करने में भारतीय मूल के लोगों की बडी भूमिका रही है।  डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव प्रचार के दौरान भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए माना था कि अमेरिका अर्थव्यवस्था में इंडियन ऑरिजन के लोगों का महत्वपूर्ण योगदान  है। आस्ट्रेलिया के मौजूदा प्रधानमंत्री टॉनी एबोट और पूर्व  प्रधानमंत्री जुलिया गिलार्ड भी भारतीय मूल के लोगों की अहम भूमिका की तारीफ कर चुके हैं। यही स्थिति कनॉडा और इंग्लैंड की ही है। दुनिया की सबसे बडी स्पेस एजेंसी नासा में तीस प्रतिशत वैज्ञानिक भारतीय मूल के हैं। सिलिकॉन वैेली में भारतीय एक्सपर्ट्स  का दबदबा है और दुनिया की बडी कंपनियां बराबर भारतीय विशेषज्ञों  को पहली प्राथमिकता देती हैं। सिलिकॉन वेली का तो यहां तक आकलन है कि  चीन ने भारतीय प्रतिभा की उपेक्षा करके बहुत बडी गलती की है। अमेरिका, कनॉडा, आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों  की तरक्की की प्रमुख वजह भी यही है कि इन देशों  ने भावनाओं की जगह व्यावहारिकता को ज्यादा प्राथमिकता दी है। तथापि पिछले कुछ समय से विकसित देशों  की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ  में जो ठहराव आया है और जिस तरह से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर कम हुए हैं, इससे इन मुल्कों में असंतोष  और बाहरी लोगों के प्रति आक्रोश   बढा है। स्थानीय लोग विदेशों  से आने वाले लोगों को हर छोटी-बडी समस्या के लिए जिम्मेदार मानते हैं। इराक और सीरिया की आईएसआईएस और  अल-कायदा जैसे  खूंखार आतंकी संगठनों की नापाक हरकतों ने अमेरिका और यूरोप के लोगों को और ज्यादा असुरक्षित कर रखा है। इन सब घटनाओं ने सियासी नेताओं के लिए भी स्वार्थी राजनीति की पौध तैयार की ही। राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप ही नहीं फ्रांस समेत यूरोप के कई मुल्कों  में चरमपंथी नेता “स्थानीय बनाम बाहरी“ को और ज्यादा हवा दे रहे हैं। बहरहाल, कहते हैं जैसे नदी के बहाव को कोई नहीं रोक सकता, वैसे ही प्रतिभा की धमक  को भी कोई नकार नहीं सकता,। अमेरिका और आस्ट्रेलिया में चरमपंथी भारतीय प्रतिभा को नहीं रोक सकते। हिंसा किसी समस्या का हल नहीं है।  इसी हिंसा ने पूरे मध्य-पूर्व एशिया को लगभग तबाह कर दिया है। सीरिया, यमन और इराक भीषण गुह युद्ध में जलकर बर्बाद हो चुका है। अमेरिका और  ऑस्ट्रेलिया  में सिरफिरे लोग निर्दोष  लोगों को गोलियों से भून कर और नस्लीय हिंसा फैला कर वही सब कर रहे हैं जो आईएसआईएस, अल-कायदा और  लश्कर  जैसी आतंकी संगठन कर रहे हैं। फिर उनमें और आतंकियों में अंतर ही क्या है?           

आधार का ”आधार”

आधार पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था से एक बार फिर असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई है। शीर्ष अदालत कह रही है कि आधार कार्ड को स्रकारी योजनाओं और कामों के लिए अनिवार्य  नहीं बनाया जा सकता। मगर केन्द्र सरकार आधार को अनिवार्य करने पर आमादा है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि सरकार की विभिन्न कल्याणकारी  योजनाओं से लाभान्वित होने के लिए आधार को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। न्यायालय का कहना है कि आधार कार्ड नहीं होने के कारण सरकारी योजनाओं का पात्र लोगों को लाभ नहीं दिया जाना उनके प्रति अन्याय है। मगर न्यायालय ने यह भी कहा है कि बैंक खाते खोलने जैसे कार्यों के लिए आधार कार्ड की अनिवार्यता को वह रोक नहीं सकती पर वह सरकार को देश  के नागरिकों पर इसे थोपने भी नहीं देगी। न्यायालय ने माना कि इस मामले को सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ को सौंपे जाने की जरुरत है पर फिलहाल यह मुमकिन नहीं है। न्यायालय इस पर बाद में विचार करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को स्मरण कराया है कि आधार को अनिवार्य करके वह देश  की शीर्ष  अदालत के आदेशों  की अवहेलना कर रही है। अब तक तीन बार सुप्रीम कोर्ट व्यवस्था दे चुकी है कि आधार को सरकार योजनाओं के लिए स्वैच्छिक होना चाहिए, अनिवार्य नहीं। अगस्त 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट  व्यवस्था दी थी कि सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए  आधार कार्ड अनिवार्य नहीं होगा। न्यायालय की व्यवस्था के अनुसार सरकार से जुडे कामों और कल्याणकार योजनाओं के लिए आधार कार्ड के अलावा और भी द्स्तावेज दिए जा सकते हैं। मगर अक्टूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंध को निरस्त करते हुए मनरेगा, पेंशन स्कीमों, भविष्य  निधि , प्रधानमंत्री जन-धन योजना और इस तरह की कल्याणकारी योजनाओं के लिए आधार के स्वैच्छिक प्रयोग की अनुमति दे दी । अब सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था से फिर अगस्त 2015 जैसी स्थिति हो गई है। केन्द्र सरकार ने हालांकि स्पष्ट  किया है कि किसी भी पात्र व्यक्ति को  आधार कार्ड  के बगैर सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित नहीं किया जाएगा। तथापि, सवाल यह है कि सरकार आधार कार्ड  को अनिवार्य करने पर क्यों अडी हुई है? आधार कार्ड बनाने वाली यूनिक आईडेंटिफिकेशन ऑथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईडीएआई) का गठन संप्रग सरकार ने 2009 में किया था और अब कांग्रेस भी आधार कार्ड की अनिवार्यता पर सवाल उठा रही है।  आधार कार्ड की अनिवार्यता के आलोचकों का कहना है कि यूआईडीएआई आधार कार्ड के नाम पर नागरिको की निजता (प्राइवेट लाइफ) में दखल दे रही है। देश  के नागरिकों के फिंगरप्रिंट लेने के लिए बाकायदा  संसद की अनुमति की जरुरत होती है मगर आधार कार्ड मामले में ऐसा नहीं किया गया। आधार कार्ड के लिए यूआईडीएआई द्वारा एकत्रित की जा रही बायोमैट्रिक जानकारी सिटीजंस की निजता में दखल है या नहीं, यह मामला सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ही तय कर सकती है। और ताजा स्थिति में यह तय करना बेहद जरुरी है। बहरहाल, आधार कार्ड का मूल मकसद भारतवासियों को 12 डिजिट का यूनिक आईडेंटिफिकेशन नंबर देकर हर नागरिक की पहचान को कानूनी वैधता देना है। मगर आधार कार्ड देश  के नागरिक होने का प्रमाण नही है और न ही इससे स्थायी नागरिकता मिल सकती है। इस बात के दृष्टिगत  आलोचक कह रहें हैं कि फिर इस कार्ड  का क्या फायदा? बहरहाल,आधार दुनिया का विशालताम अनूठा आईडी कार्यक्रम है। 28 फरवरी, 2017 तक इसके तहत 1123 खरब लोग पंजीकृत हो चुके हैं और 18 वर्ष   से अधिक आयु वाले 99 फीसदी आबादी को आधार कार्ड दिया जा चुका है। इस स्थिति के दृष्टिगत , इस मामले में अब स्थिति स्पश्ट हो जानी चाहिए।

सोमवार, 27 मार्च 2017

पिछडों का पॉवरफुल आयोग

मोदी सरकार ने पिछडे वर्गों के लिए  अनुसूचित जाति एवं जनजातियों की तरह नया आयोग गठित करके देश की करीब 41 फीसदी आबादी को राहत दी है। पिछडे तबके लंबे समय से  राष्ट्रीय  अनुसूचित जाति आयोग (एनसीएससी) एवं अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) की तरह संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग की मांग कर रहे थे।  नेशनल सेंफ्ल सर्वे आर्गेनाइगेशन के अनुसार भारत में पिछडे वर्गों की 40.94 फीसदी आबादी है। इसकी तुलना में अनुसूचित जातियों की आबादी 19.59 फीसदी और  जनजातियों की 8.63 फीसदी आबादी है। पिछडे तबकों को अब तक इस बात का मलाल रहा है कि अगर 28 फीसदी आबादी  के लिए  संवैधानिक दर्जा प्राप्त दो अलग-अलग  आयोग बनाए जा सकते हैं तो  41 फीसदी आबादी के लिए कम-से-कम एक सर्व शक्तिमान आयोग क्यों नहीं ?  सरकार ने पिछडे तबकों के लिए भी   राष्ट्रीय  आयोग (नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लासिस -एनसीबीसी) स्थापित कर रखा है मगर इस आयोग को  राष्टीय अनुसूचित  जाति अथवा जनजाति आयोग जैसी पॉवर नहीं है। एनसीबीसी की पॉवर पिछडे तबकों को सूची में शामिल करने अथवा बाहर करने तक ही सीमित है। पिछडे तबकों की  शिकायतों और उनके निपटान की पावर इस आयोग के पास नहीं थी। यह पॉ़वर राष्ट्रीय  अनुसूचित  जाति आयोग को दी गई है और अब तक पिछडे तबकों की  शिकायतों का निपटान भी यही (एनसीएससी) आयोग करता है। फरवरी 2004 में अनुसूचित जनजातियों के लिए अलग से आयोग बनाए जाने के बाद पिछडे तबकों के लिए भी इसी तरह के सर्वशक्तिमान आयोग की मांग ने और जोर पकड लिया था। संप्रग सरकार इस मांग को टालती रही है। सरकार को नए आयोग का संवैधानिक दर्जा संसद से पारित करवाना पडेगा और संविधान में संशोधन करना पडेगा। सरकार ने एक महत्वपूर्णं संशोधन भी किया है। पिछडे तबकों की सूची में किसी वर्ग  को  शामिल करने अथवा निकालने की पॉवर  संसद के हवाले करके सरकार ने खामख्वाह की राजनीतिक आलोचना से बचने का रास्ता निकाला है।  अभी तक पिछडा आयोग की सिफारिश  पर सरकार अपने स्तर पर यह काम किया करती थी और इस तरह के फैसले को राजनीतिक रंगत दी जाती है। जाटों की आरक्षण संबंधी मांगों को पूरा करना नए आयोग के समक्ष सबसे बडी चुनौती होगी। माना जा रहा है कि हरियाणा में जाटों के मौजूदा आरक्षण आंदोलन को सामने रखकर सरकार ने नए आयोग का बनाने का फैसला लिया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री से वार्ता  के बाद जाटों ने दो सप्ताह के लिए फिलहाल अपना आंदोलन स्थगित  कर रखा है। मोदी सरकार ने 41 फीसदी आबादी के लिए संवैधानिक दर्जा प्राप्त आयोग का गठन करने के फैसले के बाद अब देष की 70 फीसदी आबादी की आरक्षण की मांग पूरी हो जाएगी। इसके बाद  देश  की मात्र 30 फीसदी अगडों की आबादी आरक्षण अथवा इस तरह की सुविधा से वंचित रह जाएगी। केन्द्र में सत्ता में आने से पहले तक भाजपा जात-पात अथवा धार्मिक आधार की बजाए आर्थिक आधार पर आरक्षण की पुरजोर वकालत करती रही है और आरक्षण को वोट केचिंग हथियार बताती रही है। सरकार के ताजा फैसले से अगडों का उदवेलित होना स्वभाविक है। 30 फीसदी अगडों के कमजोर लोगों को आरक्षण के लाभ से वंचित क्यों किया जाए और 70 फीसदी पिछडों, अनुसूचित एवं जनजातियों  के आर्थिक रुप से संपन्न लोगों को आरक्षण का लाभ क्यों दिया जाए? विभिन्न अध्ययन इस बात के गवाह हैं कि पिछडे, अनुसूचित एवं जनजातियों के कमजोर एव गरीब परिवार को इस बात का ज्ञान भी नहीं है कि उन्हें नौकरियों एवं शैक्षणिक  संस्थाओं में आरक्षण दिया जाता है। मोदी सरकार के फैसला लोकलुभाना ज्यादा लगता है, व्यवहारिक कम।
   

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

लंदन पर आतंकी हमला

बुधवार (22 मार्च) को इग्लैंड की राजधानी लंदन में एक आतंकी ने पांच  निर्दोष  लोगों को मारा डाला और 40 से अधिक लोगों को घायल  कर दिया। जुलाई, 2005 के बाद लंदन में यह सबसे बडा हमला है। तब चार आतंकियों ने लंदन की भूमिगत रेल सेवाओं में और टावस्टॉक स्कवायर में एक बस में श्रृंखलाबद्ध बम फोडे थे।   7/7 के इन आत्मघाती आतंकी हमले में 55 लोग मारे गए थे।  बुधवार को हमलावर ने अपरान्ह  टेम्स नदी के वेस्टमिंस्टर ब्रिज पर तेजी से कार दौडाकर दो लोगो को मार डाला और कई अन्य को घायल कर दिया। इसके बाद अनियंत्रित कार संसद परिसर के बार की रेलिंग से जा टकराई। हाथ में चाकू लिए आतंकी कार से बाहर निकला और संसद में घुसने की कोशिश  की।  रोके जाने पर हमलावर ने एक पुलिसकर्मी को चाकू घोंप दिया जिसकी मौत हो गई। इसके बाद हथियार बंद पुलिसवालों ने हमलावर को गोली मार दी। घायलों में समारोह से लौट रहे तीन पुलिसकर्मी भी हैं जो  वेस्टमिंस्टर ब्रिज पर पैदल चल रहे थे। घायलों मे ही दक्षिण कोरिया के पांच और रोमानिया के दो पर्यटक, लंकाशायर यूनिवर्सिटी के चार छात्र और फ्रांस से लंदन घूमने आए तीन स्कूली बच्चे भी हैं। इस हमले के एक दिन बाद अभी तक हमलावर आतंकी की पहचान नहीं हो पाई है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीजा मे तक को भी आतंकी हमलावर की पूरी जानकारी नहीं है। कहा जा रहा है कि आतंकी हमलावर एशियाई मूल का ब्रिटेन का नागरिक है।  कुछ साल पहले देश  की खुफिया एजेंसी ने उसकी  पृष्ठभूमि  को खंगाला था मगर वर्तमान में उस पर खुफिया नजरें नहीं थी। इससे साफ जाहिर है कि पुलिस को हमलावर की आईडेंटी का पता है मगर उसे सार्वजनिक नहीं किया  गया । जाहिर है यह सब हमलावर के समूचे नेटवर्क  कीधड-पकड के दृश्टिगत किया जा रहा है। देर  रात उसकी पहचान को  जाहिर किया गया। वीरवार को पुलिस ने बर्मिघम, लंदन और कुछ अन्य जगहों पर छापेमारी करके आठ लोगों को हिरासत में लिया है। प्रधानमंत्री मे के अनुसार हमलावार अकेला ही था और इस बात के कोई कारण नजर नहीं आ रहे हैं कि और आतंकी हमले भी हो सकते हैं। पुलिस इस हमले को आईएस से भी जोडकर देख रही है। ब्रिटेन में आतंकी हमले कोई नई बात नहीं है। इस श शताबदी में अब तक 15 से भी ज्यादा बडे हमले हो चुके हैं। पिछले साल (2016)  16 जून को लेबर पार्टी की सांसद जो कॉक्स को कटटरवादियों ने वेस्ट  यॉकशायर के ब्रिस्टल में दिन-दहाडे मार डाला। हमलावर “ब्रिटेन फर्स्ट“ चिल्ला रहा था। कॉक्स की मदद करने आए 77-वर्षीय  वृद्ध को भी बुरी तरह से जख्मी किया गया। अदालत ने इस हमले को “आतंकी “ घटना बताया है। 2015 में लेटोनस्टोन ट्यूब स्टेशन पर 29 वर्षीय  युवक ने ब्रेड काटने के काम आने वाले चाकू से तीन लोगों को बुरी तरह जख्मी कर डाला। हमलावर चाकू लहराकर  अन्य यात्रियों को यह कहकर डरा रहा था , “यह मेरे सीरियाई मुस्लिम बंधुओं  के लिए है। अभी तो और खून बहेगा“। मई, 2013 में दो इस्लामिक आतंकियों ने एक ब्रिटिश  सैनिक को गोलियों  से भून डाला। उसी साल अप्रैल में यूक्रेन के एक कट्टरफ्ंथी छात्र ने  बर्मिघम के एक नागरिक को मार डाला और पूछताछ में माना कि वह नस्लीय युद्ध  शुरु करना चाहता है । बाद में इसी छात्र ने तीन बार मस्जिदों पर बम फोडे। पावलो लैपशिन नाम के इस आतंकी को बाद में अदालत ने 40 की कैद की सजा सुनाई है। बुधवार के हमले ने लंदन की सुरक्षा व्यवस्था को फिर तार-तार कर दिया है। पुलिस ने माना है कि लंदन पर आतंकी हमलों की आशंका कहीं ज्यादा है। इस मामले में भारत ब्रिटेन की मदद कर सकता है। भारत को आतंकियों से निपटने का लंबा अनुभव है।

        

गुरुवार, 23 मार्च 2017

Ayodhya Tangle Can't Be Solved Without Court Intervention

इसे संयोग कहा जाए या उत्तर प्रदेश  के नए मुख्यमंत्री पर “राम लला“ की कृपा, योगी आदित्यनाथ के  पदभार संभालते ही सुप्रीम कोर्ट  ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में दोनों पक्षों से समझौते का रास्ता निकालने को कहा है। मंगलवार को छह साल बाद भारी व्यस्तताओं के बावजूद अदालत ने समय निकालकर भाजपा के वरिष्ठ  नेता सुब्रह्रमण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई की और संबंधित पक्षों को बीच का रास्ता निकालने की सलाह दी। मुख्य न्यायाधीष जस्टिस जेएस खेहर ने कहा “ थोडा दीजिए, थोडा लीजिए और इसे सुलझाने की कोशिश  कीजिए“। अदालत का कहना  था कि धार्मिक भावनाओं से जुडे संवेदनशील  मसलों को मिल-बैठ कर सुलझाया जाना चाहिए“। अदालत को इनमें तभी दखल देना चाहिए जब संबंधित पक्ष इसे सुलझा न सके“। अदालत ने समझौते के लिए 31 तक का समय दिया है। सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह ने सालों  से लंबित पडे मामले को फिर हवा दे दी है। यह नेक नसीहत ठीक उसी समय आई है जब सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि 1992 में बाबरी मस्जिद को ढ्हाने के लिए भाजपा के वरिष्ठ  नेता लाल कृश्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी  और उमा भारती दोषी  है या नहीं। बुधवार को अदालत को इस मामले में फैसला सुनाना था पर न्यायाधीश   आर नरीमन के उपलब्ध नहीं होने के कारण यह वीरवार तक स्थगित कर दिया गया। जस्टिस नरीमन ने तीन मार्च को ही बाबरी मस्जिद मामले की सुनवाई में विलंब पर  असंतोष  व्यक्त किया था। यह रोचकपूर्ण स्थिति है कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट को बाबरी मस्जिद के ढहाने के लिए दोषियों को सजा मुकरर्र करनी होगी तो दूसरी तरफ राम मंदिर- बाबरी मस्जिद विवाद सुलझाने में मध्यस्था की पहल करनी होगी। बहरहाल, बाबरी मस्जिद विवाद समझौते अथवा बातचीत से हल किए जाने की नाममात्र भी गुंजाइश  नहीं दिख रही है। दरअसल, राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामला धार्मिक भावनाओं से जुडा नहीं है, इस सच्चाई से सुप्रीम कोर्ट भी परिचित है। किसी सम्प्रदाय की आस्था के प्रतीक को ढहाना और उसे वोट के लिए भुनाना विशुद्ध राजनीति है। भाजपा के वयोवृद्ध नेता खुद इस बात को मान चुके हैं कि राम मंदिर के लिए जो आंदोलन उन्होंने चलाया था, वह धार्मिक नहीं, अलबता राजनीतिक था। इसीलिए  इस मसले का आज तक हल नहीं हो पाया है ।  दो पक्षों के बीच किसी तरह के समझौते के लिए यह जरुरी है कि कलह के  मूल बिंदू पर  स्पष्ट   सहमति हो। मगर बाबरी मस्जिद- राम मंदिर मामले में मूल बिंदू पर ही सहमति नहीं है। मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि बाबरी मस्जिद में स्थानीय प्रशासन की मदद से देवी-देवताओं की मूर्तियां 1949  में चुपके से अंधेरे में रख कर इसे विवादित बना दिया गया था। चार दशक बाद  1992 में बाबरी मस्जिद को ही ढहा दिया गया था। जिस जमीन को लेकर विवाद चल रहा है, वह अब मलबे में तब्दील हो चुकी है और इस जगह “राम लला“ का काम अस्थायी मंदिर बनाया गया है । इसी जगह “राम भक्तों“ ने भव्य राम मंदिर बनाने का संकल्प ले रखा है। भाजपा और आरएसएस से जुडे संगठन चाहते हैं कि बाबरी मस्जिद को किसी दूसरी जगह बनाया जाए और मुस्लिम समुदाय विवादित स्थल को राम मंदिर बनाने के लिए छोड दे। मुस्लिम इसके लिए कतई तैयार नहीं है। वस्तुस्थिति  यह है कि समझौते के लिए न तो माहौल  है और न ही जमीन तैयार की गई है। अगर समझौते के लिए मालिकाना हक को आधार माना जाता है, हिंदुओं के साथ न्याय की गारंटी नहीं है और अगर “थोडा लीजिए, थोडा दीजिए“ पर समझौत होता है, तो मुस्लिम समुदाय संतुष्ट  नहीं होगा। अततंः अदालत को ही इस विवाद को सुलझाना पडेगा।

बुधवार, 22 मार्च 2017

Why Not To Ban Jailed Leaders From Contesting Elections

सजायाफ्ता नेताओं पर चुनाव लडने से ताउम्र पाबंदी लगाने की निर्वाचन आयोग की सिफारिश  पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए और इसके लिए अविलंब  कानून बनाने की जरुरत है। सर्वोच्च  न्यायालय ने जुलाई 2013 में ही अपने फैसले में सजायाफ्ता नेताओं की संसद अथवा विधानसभा की सदस्यता को अविलंब समाप्त कर दिया था। अदालत ने सजा के खिलाफ अपील करने का हक देने वाले  जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के सब-सेक्शन  (4) को ही निरस्त कर दिया था। इस  सेक्शन  के तहत सजायाफ्ता नेताओं को सजा के खिलाफ अपील का हक प्राप्त था। इसी कानून के निरस्त होने पर राष्ट्रीय  जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव चुनाव नहीं लड पा रहे हैं। लालू प्रसाद यादव को  2013 में चारा घोटाले में पांच साल की कैद की सजा सुनाई गई थी। सजायाफ्ता होने के बावजूद लालू प्रसाद आज भी बिहार में किंगमेकर बने हुए हैं। निर्वाचन आयोग ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा है कि वह संगीन आपराधिक मामलों में सजा पा चुके नेताओं के चुनाव लडने पर ताउम्र पाबंदी चाहता है। सुप्रीम कोर्ट की 2013  व्यवस्था की मूल भावना भी यही है कि सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव लडने पर पूृर्ण पाबंदी होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश , सुप्रीम कोर्ट  के पास कानून बनाने का अधिकार नहीं है । यह अधिकार देश  की संसद के पास है । देश  के सियासतदान राजनीति को आपराधिक तत्वों से मुक्त करने की बडी-बडी बातें तो करते हैं मगर  अमल में इन्ही तत्वों को सर आंखों पर बैठाते हैं। इसका ताजा  उदाहरण बहुजन समाज पार्टी है। बसपा ने उत्तर प्रदेश  के कुख्यात माफिया डॉन मुख्त्यार असारी को विधानसभा चुनाव से ठीक पहले पार्टी में  शामिल कर लिया जबकि 2010 में सुश्री मायावती ने आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त होने के लिए उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया था। आपराधिक  पृष्ठभूमि वाले नेताओं को लेकर लगभग यही मनोस्थिति अन्य सियासी दलों की भी है। लगभग हर राजनीतिक पार्टी के एक तिहाई नेताओं पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। मौजूदा (सोलहवीं) लोकसभा के 34  फीसदी सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज  हैं। 2009 में 30 फीसदी और 2004 में  24 सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इन आंकडों से साफ है कि आपराधिक   पृष्ठभूमि वाले नेताओं की संख्या उत्तरोतर बढती ही जा रही है। दुखद स्थिति यह है कि साफ-सुथरी छवि वाले उम्मीदवारों की अपेक्षा आपराधिक पृष्ठभूमि  वालों के चुनाव जीतने की पचास फीसदी ज्यादा संभावना रहती है। राजनीतिक दल चूंकि उम्मीदवार  का चयन इसी आधार पर करते हैं, इसलिए आपराधिक  पृश्ठभूमि वालों को तरजीह दी जाती है। कानूनन, उनके चुनाव लडने पर रोक नहीं होने के कारण राजनीतिक दल आपराधिक  पृश्ठभूमि वालों  को हाथों-हाथ उम्मीदवार  बनाते हैं। इसी जमीनी सच्चाई के  दृष्टिगत  निर्वाचन आयोग के ताजा सुझाव पर कानून बनाना अपरिहार्य है। 2013  में सुप्रीम कोर्ट  ने साफ कहा था कि  जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के 1, 2 और 3 के तहत सजायाफ्ता नेताओं की संसद अथवा विधानसभा की सदस्यता को तुरंत निरस्त करने की व्यवस्था है मगर सियासतदानों ने सेक्शन  4 को जोडकर इस व्यवस्था  को  निष्क्रिय   कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट  के अनुसार संविधान की 101()3 (ए) और 190 (3) (ए) के तहत  संसद को सजायाफ्ता सदस्य की सदस्यता के निलंबन के लिए विधायिका व्यवस्था करने का कोई अधिकार नहीं है। निष्कर्ष  यह है कि अगर देश  की संसद  संविधान का दुरुपयोग करके सजायाफ्ता सदस्यों को कानून सुरक्षा कवच दे सकती है तो उन्हें चुनाव लडने से प्रतिबंधित करने के लिए कानून क्यों नहीं बना सकती। मोदी सरकार अगर अपने स्वच्छ सरकार के वायदे के प्रति वाकई ही संजीदा है तो सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव लडने पर तुरंत रोक लगानी चाहिए।

मंगलवार, 21 मार्च 2017

The King Of Uttar Pradsh: Yogi Adityanath

पूृरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की जय-जयकार हो रही है। ऐसा लोकतंत्र में ही संभव है कि  घर-बार छोडकर सन्यासी बने महंत योगी आदित्यनाथ दुनिया के पांचवे सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री बन जाएं। पांच बार लोकसभा के लिए चुने गए हैं और अब सीधे देश  के सबसे बडे प्रांत के मुख्यमंत्री। उनके मुख्यमंत्री बनने से पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। पाकिस्तान बुरी तरह से तिलमिलाया हुआ है और इस  मुल्क के हर अग्रणी अखबार में योगी आदित्यनाथ को मुस्लिम विरोधी और कट्ट्रपंथी हिंदू बताकर भारत के मुसलमानों को डराया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ भाजपा के फायरब्रांड  और हार्डलाइनर लीडर  हैं। मुसलमानो के खिलाफ जमकर आग उगलते  हैं। विदेशी  मीडिया ने भी टिप्पणी की  है कि योगी आदित्यनाथ अमेरिकी  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के मुस्लिम विरोधी बयानों और मुसलमानों की अमेरिका में एंट्री प्रतिबंध करने की जमकर तारीफ करते रहे हैं। इसके क्या अभिप्राय निकाले जाएं? क्या योगी आदित्यनाथ भी ट्रंप की तरह मुसलमान विरोधी दृष्टिकोण  अपनाएंगे और अमेरिका की ही तरह योगी की युवा वाहिनी अथवा उनके समर्थक अल्पसंख्यको के खिलाफ आग उगलेंगे़? वैसे आंकडे इस बात के गवाह हैं कि जब-जब भी भाजपा सत्ता में आई है, सांप्रदायिक तनाव कम हुआ है और सदभाव बडा है हालांकि कटटरपंथी मुस्लिम नेता माहौल को खराब करने  की हरचंद प्रयास  करते रहे हैं। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही उनके खिलाफ जिस तरह का प्रदूषित प्रचार किया जा रहा है, ठीक उसी तरह 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ भी “जहर” उगला गया था।  सच यह है कि मोदी सरकार के अढाई साल के  शासन में जितने सुरक्षित मुस्लिम समुदाय रहा है, उससे पहले ऐसा कभी नहीं था। किसी पार्टी विशेष  के सत्ता में आने से देश  के अल्पसंख्यक असुरक्षित हो जाएं, इस बात में कोई वजन नहीं है। ऐसा प्रचार करके राजनीतिक दल अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे हैं। सरकार और  शासन संविधान से चलता है, किसी पार्टी के  हिंदू  अथवा मुसलमान विरोधी एजेंडे से नहीं। भाजपा का फायरब्रांड  और हार्डलाइनर भगवावस्त्रधारी पहली बार मुख्यमंत्री नहीं बना है। इससे पहले भगवा वस्त्रधारी  सुश्री उमा भारती मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं है और उनके  शासन में राज्य के मुसलमानों को कोई परेशानी नहीं हुई। बहरहाल, योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश  जैसे विशाल राज्य की कमान दिए जाने से भाजपा ने  स्पष्ट  कर दिया है कि पार्टी अपने  “हिदुं एजेंडे“ को संजीदगी से कार्यन्वित कर रही है। इससे यह भी साफ है कि पार्टी की राजनीति में अगर लॉग इन “ डवलपमेंट“ है, तो पासवर्ड “हिन्दुत्व“ है। पार्टी की प्रमुख पहचान क्योंकि   “हिन्दुत्व“ में है, इसलिए योगी आदित्यनाथ, उमा भारती, मनोहर लाल खट्टर और सर्बानंद सोनेवाल सरीखे नेताओं के लिए विशेष स्थान है।  यह कोई नई बात नहीं है। भाजपा विकास की बातें करतीं है मगर उसका पूरा फोक्स हिन्दुत्व पर रहता है। और इसी मकसद से सबसे पहले  शिक्षा के साथ-साथ जनमानस की जीवनशैली का भी भगवाकरण किया जा रहा है। उतर प्रदेश  को हिन्दुत्व एजेंडे की प्रयोगशाला बनाने के पीछे भाजपा का मिशन 2019 और मिशन गुजरात भी काम कर रहा है। इस साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश  के चुनाव होने है। गुजरात मे भाजपा ने 150 सीटें हासिल करना का लक्ष्य रखा है और इसमें भी “हिन्दुत्व“ एजेंडे की प्रमुख भूमिका रहेगी। बहरहाल, योगी आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी नहीं बन सकते। उनके पास न तो मोदी जैसी सोच है और नही वैसा प्रशासनिक अनुभव। उत्तर प्रदेश  में सुशासन लाना बेहद चुनौतीपूर्ण है और इसे पूरे देश  पर शासन करने से ज्यादा कठिन माना जाता है। योगी आदित्यनाथ, इस कसौटी पर कैसे खरे उतरते हैं, समय ही इसका जवाब देगा।

सोमवार, 20 मार्च 2017

खिलता कमल, कमजोर होता हाथ

नवोदित कमल का खिलना और जीओपी (ग्रांड ओल्ड पार्टी-कांग्रेस) का लगातार पिछडते रहना समकालीन राजनीति के अहम पहलू हैं। इन दोनों की राजनीतिक प्रासंगिकता को नकारा नहीं जा सकता। विधानसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित भाजपा ने जहां मिशन 2019 लांच कर दिया है, कांग्रेस अभी तक  2014 लोकसभा चुनाव की हार से भी उभर नहीं पाई है। आजादी से पहले और बाद देश  की सियासत में  कांग्रेस  की अहम भूमिका रही है मगर इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस सियासत में लगातार पिछडती रही है। और अब हालात यह हो गई है कि ग्रांड ओल्ड पार्टी सिमटते- सिमटते  चार राज्यों (पंजाब, हिमाचल प्रदेश , मेघालय और कर्नाटक) और केन्द्र  शासित पुडुचेरी तक सीमित होकर रह हई है। कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश  में इस साल के विधान सभा चुनाव होने जा रहे हैं। कांग्रेस इन दोनों राज्यों में फिर सत्ता में लौट आएगी, इस पर  संदेह है। हिमाचल में 1985 के बाद से अब तक कोई भी पार्टी दोबारा सता  में नहीं आ पाई है।  1984 में  इंदिरा गांधी की हत्या पर उपजी सहानुभूति लहर से मिले  प्रचंड जनादेश  के बाद से 2014 लोकसभा चुनाव तक कांग्रेस को अपने बूते स्पष्ट  बहुमत नहीं मिल पाया है। इसके विपरीत अस्सी के दशक में अस्तित्व में आई भारतीय जनता पार्टी साल-दर-साल आगे बढती गई है।  1984 में भाजपा को मात्र 7.74 फीसदी वोट और दो सीटें मिलीं थी और कांग्रेस को 49.10 फीसदी और 404 सीटें।  2014 आते-आते स्थिति यह हो गई कि जीओपी कांग्रेस 8.1 फीसदी वोट और 44 सीटें में सिमट  कर रह गई। इसके विपरीत भाजपा नीत राजग को 38.5 फीसदी वोट से 282 सीटें मिलीं। भाजपा  31 फीसदी मतदाताओं की पसंद रही है। इन आंकडों से  स्पष्ट   है कांग्रेस का जनाधार टूटा है और उसका मुस्लिम-दलित-कबालियों की पार्टी वाला तिलिस्म बुरी तरह से बिखर चुका है। न तो दलित और कबायली और न ही मुस्लिम अब कांग्रेस के  पक्के वोटर हैं। हाल ही सपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इस बात के प्रमाण है। पंजाब को छोडकर, अन्य किसी भी राज्य में इन वर्गों ने पहले की तरह कांग्रेस को वोट नहीं डाले। पंजाब में कांग्रेस को नहीं, शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन के खिलाफ  दलितों ने वोट डाले हैं। इन चुनाव ने बसपा  दलितों  और समाजवादी पार्टी  मुसलमानों की  पार्टी वाला तिलिस्म भी तोड दिया है। मणिपुर जैसे पूर्वोतर राज्य में भाजपा को कांग्रेस की 28 की तुलना में 23 सीटों मिलना साफ दर्शाता  है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता अब पूर्वोतर राज्यों में भी बढती जा रही है। असम भाजपा की झोली में पहले ही आ चुका था। अरुणाचल प्रदेश  में कांग्रेस को दल-बदलु ले डूबे और अब पूर्वोतर में अकेला मेघालय कांग्रेस के पास बचा है। यह राज्य भी किसी भी समय कांग्रेस के हाथ से फिसल सकता है। बहरहाल, भाजपा का कांग्रेस मुक्त मिशन रंग लाता नजर  आ रहा है। इस साल अगर हिमाचल और कर्नाटक भी कांग्रेस के हाथ से निकल गया तो जीओपी पंजाब तक सिमट कर रह जाएगी । देश  के लिए यह बेहद दुखद स्थिति होगी। कांग्रेस को दक्षिणपंथी भाजपा और वामपंथियों  के बीच वाली पार्टी माना जाता है। देश  में कट्टरवादी  राजनीति को संतुलित करने के लिए कांग्रेस का मजबूत होना जरुरी है। इसके लिए कांग्रेस को अपना चोला बदलना होगा। कांग्रेस को एक परिवार पर आश्रित रहने की बजाए लोकप्रिय वैकल्पिक  नेतृत्व तैयार करना होगा।

शुक्रवार, 17 मार्च 2017

सेहतमंद भारत ?

देश  के हर स्कूल में “हैेल्थ इज वैल्थ“ पर निबंध लिखवाया कर यह संदेश  दिया जाता है कि मानव के जीवन में “तंदुरुस्ती“ अनमोल है। स्वस्थ षरीर,  स्वस्थ सोच और स्वस्थ आचरण किसी भी देश  को दुनिया की जन्नत बना देता है। और जिस देश  के लोग स्वस्थ नहीं हैं, वह रहने के काबिल ही नहीं माना जाता। संयुक्त राष्ट्र  द्वारा स्थापित मानदंडों के अनुसार स्वीडन, सिंगापुर और आइसलैंड दुनिया के सबसे ज्यादा सेहतमंद देश  हैं। भारत की रैंकिग काफी पीछे है और वह 180 देशों में 103वें पायदान पर है। हैल्थ और विकास का चोली दामन का साथ है। तेज विकास के तब तक कोई मायने नहीं जब तह यह लोगों के जीवन को खुशाहल और सेहतमंद नहीं बना पाए। आजादी के बाद से सरकार गाहे-बगाहे  राष्ट्रीय  हैल्थ पॉलिसी बनाती रही है मगर यह ज्यादा कारगर साबित नहीं हुई है। आजादी के सात दशक बाद भी देश  के नामी सरकारी अस्पतालों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। दिल्ली के सबसे बडे  प्रतिष्ठाशाली  अस्पताल “एम्स“ में न्यूरो-सर्जरी के जनरल वार्ड  में एडमिशन के लिए एक साल से अधिक समय तक का इंतजार करना पडता है। यहां तक कि प्राइवेट वार्ड के लिए ही कम-से-कम छह महीने का इंतजार करना पडता है। देश  के सरकारी अस्पतालों  में आज भी  एक हजार रोगियों के लिए मात्र एक बैड उपलब्ध की सुविधा तक उपलब्ध  नहीं है । नतीजतन, उपचारधीन बडे अस्पतालों के बाहर खुले आकाश  अथवा बरामदों में अपना इलाज करवाने को विवश  हैं। सवा सौ करोड से अधिक आबादी के लिए कुल मिलकर 35,416 सरकारी अस्पतालों में 13,76,013 बैड है़ं। भारत की 68 फीसदी ग्रामीण आबादी के लिए दो फीसदी भी डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं। इसी कारण 70 फीसदी ग्रामीण भी प्राइवेट अस्पताल जाना पसंद करते हैं और 63 फीसदी परिवार सरकारी अस्पताल जाते ही नहीं। देश  में इस समय 460 मेडिकल कॉलेज हैं और इनमें हर साल 63,985 डाक्टर तैयार किए जाते हैं। इसके बावजूद भी  देहातों में काम कर रहे मात्र 18.8 फीसदी डाक्टरों के पास मान्यता प्राप्त डिग्री है और ज्यादातर “ नीम-हकीम, खतरे में जान“ वाले कथित  डाक्टर  हैं। 2016 में  विश्व  स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचऔ) की रिपोर्ट में भारत में उपल्ब्ध स्वास्थय से जुडी बुनियादी सुविधाओं पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। इसमें कहा गया है कि भारत स्वास्थय क्षेत्र  में चीन से काफी पीछे है। एक लाख आबादी के लिए भारत में  80 डाक्टर हैं, चीन में 130। इसी तरह भारत में एक लाख आबादी के लिए 61 नर्सें और दाइयां हैं तो चीन में 96। इन आंकडों से यही निश्कर्श निकलता है कि देश  भले ही अंतरिक्ष विज्ञान में चीन से आगे निकल गया  हो और उसकी ग्रोथ भी तेज हो पर अगर जनमानस को बुनियादी सुविधाएं हीं नहीं मिले । ऐसी उन्नति किस काम की? मोदी सरकार ने बुधवार को 15 साल बाद राष्ट्रीय   हैल्थ पॉलिसी का जो खाका तैयार किया है, उसमें ऐसा कुछ भी क्रांतिकारी नजर नहीं आ रहा है, जिससे गरीब और कमजोर तबकों को अविलंब त्वरित स्वास्थय सुविधाएं मिलनी सुनिष्चिित हो पाएं। इससे पहले भी बाबुओं ने वातानुकूलित कमरों में बैठकर कई बार राश्ट्रीय हैल्थ पॉलिसी  का खाका तैयार किया है मगर आम जनता को आज भी लंबी कतारों में लगकर उपचार के लिए घंटों इंतजार करने पडता है।  देश  की  70 फीसदी जनता को त्वरित और समयबद्ध स्वास्थय सेवाएं मुहैया कराने का खाका पंचायतों और सबसे निचले स्तर में तैयार किया जाना चाहिए। प्राइवेट अस्पतालों में महंगे से महंगा उपचार कराने वाले बाबु गरीबों और कमजोर तबकों की स्वास्थ्य जरुरतों को ग्राह्य नहीं कर सकते। दुर्भाग्यवश ,  जनता द्वारा चुने गए नुमाइदें लॉमेकर बनते ही गरीब और जरुरतमंदों  को भूल जाते हैं। जब तक यह मानसिकता नहीं बदलेगी,  वातानुकूलित कमरो में तैयार की गई नीतियां कागजी ही साबित होंगी।

गुरुवार, 16 मार्च 2017

“लहर किसी की, जीता कोई और“

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह से मुंह की खाने के बाद “ इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम)“ को दोष  देना “खिसयानी बिल्ली खंबा नोचे“ वाली बात है। इस बात पर बालक भी हंस देगा कि वोटिंग मशीन  में हेर-फेर करके चुनाव नतीजों को बदला जा सकता है। आज तक दुनिया के किसी भी देश मैं यह बात साबित नहीं  हो पाई है  कि  “ इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन " में गड़बड़ी की  जा सकती है। पहले बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख सुश्री मायावती और अब आम आदमी पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में पार्टी की हार के लिए ईवीएम को दोषी  ठहराया है। बुधवार को केजरीवाल ने इस बात पर हैरानी व्यक्त की कि पंजाब में चुनावी बयार  तो आम आदमी पार्टी  के पक्ष मे थी मगर जीत गई कांग्रेस।  यह कैसे हुआ, इसकी जांच होनी चाहिए। केजरीवाल कहते हैं “लोग भले ही मेरा मजाक उडाएं और मुझे ट्रॉल भी किया जाएगा मगर मेरे पास इस बात के प्रमाण हैं कि पंजाब में “आप“ को रोकने के लिए गहरी साजिश  रची गई“। कई लोगों ने उनकी पार्टी को वोट दिए मगर उन्हें काउंट नहीं किया गया। अपनी बात को पुख्ता करने के लिए “आप“ प्रमुख ने सुप्रीम कोर्ट  का सहारा लेते हुए कहा कि अदालत ने भी कहा है कि ईवीएम फूल प्रूफ नहीं है। इससे पहले बसपा प्रमुख मायावती भी आरोप लगा चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश  में वोटिंग मशीनों से छेडछाड की गई। वोटिंग मशीनों ने भाजपा के सिवा किसी भी दूसरी पार्टी के मतों को स्वीकार ही नहीं किया अथवा मशीनों से छेडछाड करके अन्य दलों के वोट भी भाजपा के पक्ष में चले गए। सुश्री मायावती ने मुस्लिम बहुल हलकों का हवाला देते हुए कहा है कि मुसलमानों के वोट भाजपा के पक्ष में जाएं, तो स्पष्ट  है कि वोटिंग मशीनों से छेडछाड की गई है। बहरहाल, अरविंद केजरीवाल और मायावती की इन अनर्गल बातों से देश  की  निष्पक्ष  और स्वतंत्र चुनाव प्रकिया की जगहंसाई हो रही है। भारत का निर्वाचन आयोग और इसकी  निष्पक्ष  एवं स्वतंत्र चुनाव प्रकिया का पूरी दुनिया में सम्मान किया जाता है। केजरीवाल से सवाल किया जा सकता है कि अगर पंजाब में चुनाव में हेर-फेर किया गया है तो  शिरोमणि अकाली दल क्यों नहीं जीता? इसी तरह अगर उत्तर प्रदेश  में भी वोटिंग मषीनों में हेर-फेर हुआ है तो बहनजी की पार्टी को समाजवादी पार्टी के लगभग  21.8 फीसदी वोट से भी ज्यादा 22.2 फीसदी वोट क्यों मिले? इससे यह  निष्कर्ष  भी निकाला जा सकता है कि अगर उत्तर प्रदेश  में बसपा और सपा ने मिलकर चुनाव लडा होता, तो भाजपा के 39.7 फीसदी से कहीं ज्यादा 44 फीसदी वोट के बलबूते दोनों को भगवा पार्टी से भी ज्यादा प्रचंड बहुमत मिलता। बहुदलीय चुनाव व्यवस्था की यही विसंगति है कि इसमें नाममात्र के अंतर से भी प्रचंड बहुमत मिल जाता है।  केजरीवाल की इस बात में वजन है कि आप का वोट  शेयर अकालियो को चला गया, इसलिए कांग्रेस जीत गई। पंजाब में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस को सत्ता में लाने और  शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन को हराने में बहुत बडी भूमिका निभाई है। पंजाब में कांग्रेस को इस बार  पिछले विधानसभा चुनाव के 39.92 से भी कम  38.5 फीसदी वोट मिले मगर सीटें कहीं ज्यादा। इसकी प्रमुख वजह है कि  शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के अधिकांश  वोट  आम आदमी पार्टी के पक्ष में चले गए। इस चुनाव में अकाली दल-भाजपा को 25.2 फीसदी और आप को 23.7 फीसदी वोट मिले हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 34,59 और उसके सहयोगी दल भाजपा को  7.12 फीसदी वोट मिलेे थे। आप तब चुनाव मैदान में नही थी और बादल परिवार के बगावती नेता मनप्रीत बादल की पीपुल्स पार्टी ऑफ पंजाब केजरीवाल की तरह अकाली दल -भाजपा का कुछ भी बिगाड नहीं पाई थी। केजरीवाल की पार्टी को भले ही पंजाब में  स्पष्ट  बहुमत न मिला हो मगर उन्होंने वह कर दिखाया है, जो पंजाब के स्थानीय नेता भी नहीं कर पाए। और यह सब निष्पक्ष  और स्वतंत्र चुनाव के कारण ही संभव हो पाया है।









      

बुधवार, 15 मार्च 2017

प्रचड़ जनादेश पर ज्यादा न इतराएं

दार्शनिक  एचएल मेनकेन के अनुसार “लोकतंत्र की बुराइयों का उपचार अधिक लोकतंत्र  है“। केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार के लिए यह नसीहत मौजूदा परिवेश  में प्रासंगिक लगती है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत के 'नशे ' में चूर मोदी सरकार ने गोवा और मणिपुर में भी अपनी सरकार को स्थापित करने के लिए एडी-चोटी का जोर लगा दिया है। इन दोनो राज्यों में कांग्रेस सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी है और भाजपा दूसरे नंबर पर है। लोकतंत्र  का तकाजा है कि सबसे बडी पार्टी को  पहले सरकार बनाने का न्यौता मिलना चाहिए और राजभवन में बहुमत की परीक्षा करने की बजाए इसका फैसला विधानसभा में होना चाहिए। मगर गोवा और मणिपुर में इस स्थापित परंपरा का निर्वहन नहीं किया गया। लगभग ऐसी ही स्थिति हिमाचल प्रदेश  में 1982 के विधानसभा चुनाव के बाद त्रिशंकू जनादेश  से उत्पन्न हुई थी। कांग्रेस और भाजपा को लगभग बराबर की सीटें मिलीं थी और छह निर्दलीय का समर्थन निर्णायक बना हुआ था। दोनों ही दल निर्दलियों के समर्थन का दावा कर रहे थे। राज्यपाल के लिए यह तय कर पाना बेहद मुश्किल  था कि निर्दलीय विधायकों का समर्थन किस पार्टी को है। इस स्थिति में राज्यपाल ने निवृतमान भाजपा सरकार को सरकार बनाने का न्यौता दिया और पार्टी द्वारा सरकार का दावा पेश  नहीं करने के बाद ही कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए आंमत्रित किया गया। तब केन्द्र में इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार थी। गोवा और मणिपुर दोनों राज्यों में कांग्रेस को भाजपा से कुछ ज्यादा सीटें मिलीं हैं। अब तक त्रिशंकू जनादेष की स्थिति में सबसे बडी पार्टी को पहले सरकार बनाने का न्यौता दिए जाने की परंपरा रही है। चालीस सदस्यीय गोवा विधानसभा में कांग्रेस को 17,  भाजपा को 13  सीटें मिलीं है। यानी कांग्रेस को स्पष्ट  बहुमत के लिए चार विधायकों का समर्थन चाहिए था और भाजपा को आठ। इसके बावजूद कांग्रेस को सरकार बनाने का अवसर तक नहीं दिया जाना वाकई स्थापित लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। यही स्थिति मणिपुर में है। इस पूर्वोतर राज्य में साठ सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस को 28 और भाजपा को 23 सीटें मिलीं हैं। मणिपुर में कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए तीन और भाजपा को आठ विधायकों के मदद की दरकार थी। भाजपा ने गोवा की तरह मणिपुर में भी तत्काल अन्य दलों का समर्थन जुटाकर सरकार बनाने का दावा पेश  किया। पार्टी को दोनों राज्यों में सरकार बनाने का हाथों-हाथ न्यौता भी मिल गया। हैरानी इस बात की  है कि भाजपा नेतृत्व ने दो छोटे राज्यों में मुख्यमंत्री प्रत्याशी  घोषित करने में जरा भी विलंब नहीं किया जबकि उत्तर प्रदेश  और उतराखंड में अभी तक मुख्यमंत्री का फैसला नहीं हो पाया है। बहरहाल, राजनीतिक अखाडे में भाजपा, कांग्रेस से कहीं ज्यादा दाव-पेंच वाली साबित हुई। कांग्रेस के इतने बुरे दिन चल रहे हैं कि वह गोवा और मणिपुर जैसे छोटे राज्यों को भी संभाल नहीं पा रही है। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने  पार्टी के इस फटेहाल स्थिति की ओर इशारा भी किया। कांग्रेस द्वारा गोवा में भाजपा सरकार की ताजपोशी  के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट  ने पार्टी की इस बात के लिए खिंचाई की कि अगर कांग्रेस के पास बहुमत था तो वह सबसे पहले राज्यपाल के पास क्यों नहीं पहुंची। और अगर न्याय नहीं मिला तो पार्टी ने धरना क्यों नहीं दिया? सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कांग्रेस प्रबंधन के दिवालिएपन को उजागर करती है। पार्टी ने राज्यपाल को विधायकों की सूची तक नहीं सौंपी। इससे यही निष्कर्ष  निकलता है कि कांग्रेस ने सरकार बनाने के लिए निर्धारित औपचारिकताएं तक नहीं निभाई। सुप्रीम कोर्ट  ने भी यही कहा है कि अगर कांग्रेस  ने ऐसा किया होता तो अदालत को निर्णय लेने में आसानीं होती। तथापि, लोकतंत्र में स्थापित परंपराओं का सम्मान सत्ता लोलुपता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। गोवा और मणिपुर में  परंपराओं का निर्वहन नहीं किया गया है।

मंगलवार, 14 मार्च 2017

ऐसे एक्जिट पोल का क्या लाभ ?

कहते हैं “दूध का जला, छाछ को फंूक-फूंक कर पीता है“। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव पर किए गए एक्जिट पोल के अलग-अलग नतीजे इस कहावत को चरितार्थ करते हैं। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनाव के एक्जिट पोल निश्कर्शों ने इनकी विष्वसनीयता को खासा झटका दिया था। और अब ताजा एक्जिट पोल के अलग-अलग  निष्कर्ष  इनकी प्रासंगिकता पर ही सवाल खडा कर रहे हैं। एक्जिट पोल सही भी पाए गए हैं और गलत भी। पर सच्चाई यह है कि अधिकतर गलत साबित हुए हैं।  और  इस बार भी पूरी तरह से गलत साबित हुए।  2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के पक्ष में बह रही प्रचंड लहर की  एक्जिट पोल करने वालों को भनक तक नहीं लग पाई थी। इसी तरह बिहार विधानसभा चुनाव में नीतिश  कुमार-लालू प्रसाद यादव के गठबंधन की लहर भी एक्जिट पोल में नही दिखी थी। बिहार और दिल्ली के चुनाव परिणामों में एक्जिट पोल की पोल-पट्टी बुरी तरह से खुल गई थी। वीरवार ( 9 मार्च) को जारी विभिन्न एक्जिट पोल के नतीजों में इतना बडा अंतर था  कि इन पर नजर डालकर जनमानस भ्रमित हो रहा है। मसलन, उतर प्रदेश  में कोई एक्जिट पोल भाजपा को प्रचंड बहुमत दे रहा था  , तो अन्य  उत्तर प्रदेष में त्रिशंकू विधनसभा बता रहे थे । नतीजे एकदम  उलट निकले । भाजपा को  इतना प्रचंड बहुमत मिला जिसकी पार्टी ने भी कल्पना नहीं की थी ।जितने एक्जिट पोल, उतने ही अलग-अलग नतीजे। इसके क्या मायने लगाए जाएं? वैसे एक्जिट पोल भारत में ही नहीं अमेरिका जैसे अति साक्षर और जागरुक देश  में भी गलत साबित हुए हैं। 2016 में सपन्न अमेरिकी राष्ट्रपति  चुनाव के सारे एक्जिट और ओपिनियन पोल गलत साबित हुए हैं।  शुरु से आखिरी तक सभी ओपिनियन पोल डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन की जीत को  निश्चित बता  रहे थे मगर नतीजा एकदम  उलटा  निकला। ओपिनियन पोल मे  शुरु से आखिर तक हिलेरी से काफी पिछडे बताए गए रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप भारी अंतर से जीते। भारत की अपेक्षा अमेरिका में ओपिनियन पोल की तकनीक कहीं ज्यादा सटीक है और सैंपल चयन और  निष्कर्ष  को कई बार जांचे  परखे  जाते  हैं । अमेरिका की तरह भारत में एक्जिट अथवा ओपिनियन पोल की विधि एक जैसी है मगर लोगों के मनोविज्ञान में बहुत ज्यादा अंतर है। अमेरिका के सैंपल्स में एकरुपता है मगर भारत में विविधता।  अगर सैंपल का चयन सही भी है, अमेरीकी और यूरोप के तरह लोगों में  स्पष्ट  और बेबाक बात करने अथवा  निष्पक्ष  रखने  की प्रवृति नहीं है। भारत में ऐसा  नहीं हैं । लोग बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ और।  भारत में यह मनोविज्ञान काम करता है। विषेषज्ञों  के अनुसार एक्जिट पोल के  निष्कर्ष  तभी सही निकलते है जब सैंपल साइज पूरी तरह से सभी वर्गों की नुमाइंदगी करता हो। भारत में सैंकडों  उपजातियां और विविध संस्कृतियां हैं। इन सभी के लिए सही नुमाएंदगी वाले   सैंपल का चयन आसान नहीं है। वेरिएबल का भी पूरी तरह से ख्याल रखना पडता है। वोट को सीटों में परिवर्तित करने का फॉर्मूला भी एकदम सटीक होना चाहिए। इसले अलावा और भी कई मानदंड हैं, जिन पर  पूरी तरह से खरा उतरने से ही सही  निष्कर्ष   निकल सकता है। अमूमन, मतदाता अथवा सैंपल मतदान को लेकर अंदर की बात बाहर नहीं निकालता। इसी तरह सुबह वोट करने वाली की मानसिकता , दोपहर और  शाम को वोट करने वाले से एकदम भिन्न होती है। इस स्थिति में सुबह वाला सैंपल, दोपहर अथवा  शाम की नुमाइंदगी नहीं कर सकता। अमेरिका जैसे विकसित देश  में मार्जिन ऑफ एरर को कम-से-कम करने के लिए हर चुनाव क्षेत्र में न्यूनतम  बीस हजार सैंपल आवश्यक  माने जाते हैं। मगर भारत में सैंपल की विविधता का ख्याल किया जाए तो यहां एक लाख सैंपल भी कम पड जाएंगे। विभिन्न एक्जिट पोल के अलग-अलग नतीजों की  पृष्ठभूमि  में यही सब कारण हैं।

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

थका देने वाला चुनाव?

बुधवार (आठ मार्च) को मतदान का आखिरी चरण पूरा होते ही पांच राज्यों  में चार फरवरी से  शुरु हुआ थका देने वाले  चुनाव सपन्न हो  गए । 11 मार्च  को  वोटों की गिनती के बाद चुनाव प्रकिया पूरी हो जाएगी। देश  के सबसे बडे राज्य की 403 सीटों के लिए सात चरण में मतदान कराया गया। पंजाब की  117 और उत्तराखंड की 70  सीटों के लिए एक दिन का मतदान कराया गया। उत्तर प्रदेश  में 11 फरवरी को पहले चरण का  और 8 मार्च को अंतिम चरण का मतदान हुआ। इस तरह मतदान लगभग पूरे महीने चला। उतर प्रदेश  के चुनाव सबसे मह्त्वपूर्ण  माने जा रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनाव में बुरी तरह से मुंह की खाने के बाद इन चुनाव में प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा  भी दाव पर है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए भी उत्तर प्रदेश  समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव बेहद अहम। उत्तर प्रदेश  के चुनाव प्रचार सियासी दलों के लिए कितने अहम हैं,  इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  अपने लोकसभाई हलके वाराणसी में ही  लगातार तीन दिन तक चुनाव रैलियां करते रहे। प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश  में चार फरवरी को मेरठ में चुनावी सभा संबोधित करके चुनाव प्रचार की  शुरुआत करके कुल मिलाकर 23 चुनाव रैलियां की। सबसे ज्यादा चुनाव रैलियां समाजवादी पार्टी के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव ने की हैं। मुख्यमंत्री ने  36 दिनों में 221 चुनाव सभाओं को संबोधित किया। इस दौरान राजनीतिक दलों ने उग्र प्रचार किया। एक-दूसरे पर जमकर हमला किया। निर्वाचन आयोग की सख्त आचार संहिता के बावजूद सियासी दलों ने खुलकर धर्म और जात-पात के नाम पर वोट मांगे। बहरहाल, देश  में अब इस बात पर भी बहस हो रही है कि क्या चुनाव प्रकिया को इतना लंबा खींचना आवश्यक  है। पांच  राज्यों की  690 विधानसभाई सीटों के लिए चार जनवरी से ग्यारह मार्च तक लंबी चुनाव प्रकिया चली। लगभग अढाई महीने की अवधि में सरकार के नाम पर कोई काम न हो, यह कैसा लोकतंत्र? पंजाब और गोवा में एक महीने से भी ज्यादा समय तक ऐसी सरकार सत्ता में रहेगी जिसके पास जनादेश  नहीं है। अगर इन दोनों राज्यों में सत्तारूढ दल को बहुमत नहीं मिलता है, तो एक महीने से अधिक समय तक ऐसी सरकार का सत्ता में रहना जनादेश  का अपमान है। चार जनवरी को पांच विधानसभाओं के चुनाव की घोषणा होते ही इन राज्यों में आचार संहिता लागू हो गई और इसके बाद ग्यारह मार्च तक कोई नीतिगत फैसले नहीं लिया जा सका। पंजाब और गोवा को एक महीने से भी ज्यादा समय तक नतीजों का इंतजार करना पड रहा है। इन दोनों राज्यों में चार फरवरी को मतदान सपन्न हुआ था। उतराखंड में 15 फरवरी को मतदान हो चुका है। पंजाब की 117 सीटों और उत्तराखंड की 70 सीटों के लिए  अगर एक दिन में मतदान कराया जा सकता है, तो फिर उत्तर प्रदेश  की  403 सीटों के लिए भी तीन या चार चरण का मतदान कराया जा सकता है। निर्वाचन आयोग का तर्क है कि उत्तर प्रदेश  जैसे विशाल और संवेदनशील राज्य में मतदान को लंबा खींचना  लॉजिस्टिक दृष्टि  से अपरिहार्य  है।  निर्वाचन आयोग का यह कथन मैन्युअल मतपत्रों के जमाने में तो माना जा सकता हे मगर आज के इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन उन्मुख मतदान के दौर में सात चरण का चुनाव भारी लगता है। उन राज्यों के लोगों को क्यों सजा दी जाए जो चार फरवरी को मतदान कर चुके है़? लोकतंत्र में  मतदान की भांति  मतगणना भी उतनी ही महत्वपूर्ण  होतीे हैं। मतदान और मतगणना में अधिक फासला देर-सबेर कई तरह की समस्याएं खडी कर सकता है।  एक माह से ज्यादा समय तक एवीएम मशीनों (मतपेट्टियों) की सुरक्षा बंदोबस्त  मतदान केन्द्रों पर सुरक्षा इंतजाओं से ज्यादा चुनौतीपूर्ण  है। इंटरनेट के जमाने में लोगों को लंबा इंतजार करने की आदत नहीं रह गई है। निर्वाचन आयोग और सरकार को इस मामले पर विचार-विमर्श  करना चाहिए।  

गुरुवार, 9 मार्च 2017

आईएस का खौफ

मंगलवार (सात मार्च) को मध्य प्रदेश  और उत्तर प्रदेश  में आतंक से जुडी तीन घटनाओं ने देश  को फिर झकझोर डाला है। मंगलवार सुबह भोपाल-उज्जैन पैसेंजर ट्रेन में दो धमाके हुए और इसमें दस यात्री जख्मी हो गए। दोनों बम निम्न तीव्रता क्षमता के थे, इस वजह नुकसान ज्यादा नहीं हुआ।  इस आतंकी हमले के कुछ घंटों बाद तेलगांना पुलिस ने आतंकियों के नाम और उनके संभावित ठिकानों की सूचना फ्लैश  कर दी और उनके कानपुर, लखनऊ औतर उन्नाव में छिपे होने की आशंका जताई। पुलिस फौरन हरकत में आई और कानुपुर से तीन, उन्नाव से दो और इटावा से एक आतंकी को गिरफ्तार कर लिया गया। इन गिरफ्तारियों से पुलिस को पता चला कि एक आतंकी राजधानी लखनऊ के एक घर में छिपा हुआ है। पुलिस उसे पकडने पहुंची मगर वह मुकाबला करता रहा। लगभग नौ घंटे की मुठभेड के बाद  वह मारा गया। उसके पास से 8 गन और 600 गोलियां बरामद हुईं हैं। आतंकी सैफुल्लाह के घर से आईएसआईएस का फ्लैग और साहित्य भी बरामद हुआ है।  पुलिस ने इस आतंकी को जिंदा पकडने का हरसंभव प्रयास किया मगर वह इसमें कामयाब नहीं हुई। उसके दो साथियों की तलाश  जारी है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि मंगलवार की आतंकी घटनाओं के लिए अरब के दुर्दांत आतंकी संगठन आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया)  को जिम्मेदार माना जा रहा है। आतंकी सैफुल्लाह आईएसआईएस के खुरासान मोड्यूल से जुडा हुआ बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि कथित खुरासान मोड्यूल से  भारत के 13 आतंकी जुडे हुए है। इन मेंसे छह  पकडे जा चुके हैं। एक मारा जा चुका है और छह अभी फरार हैं। आतंकियों ने भोपाल-उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट की तस्वीरें सीरिया में अपने आकाओं को भी भेजी है। खुफिया एजेंसियों की सूचनाओं के अनुसार आईएसआईएस ने दावा किया है कि  भोपाल-उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट  तो मात्र ट्रेलर था। इसके बाद और घातक बम विस्फोट किए जा सकते हैं। भारत में आईएसआईएस का यह पहला हमला है। पुलिस का कहना है कि आतंकियों ने इंटरनेट से बम बनाना सीखा था। इसलिए अभी तक आतंकी निम्न तीव्रता (लो-इन्टंेस्टि) का बम बना पाए थे। भोपाल-उज्जैन में भी लो-इन्टंेस्टि के बम प्लांट किए गए थे। इसी कारण जान-माल का ज्यादा नुकसान नहीं हुआ। बुधवार को पुलिस ने  स्पष्टीकरण  दिया कि कथित खुरासान मोड्यूल और इसके मेंबर सीधे तौर पर  आईएसआईएस के संपर्क में नहीं हैं, बल्कि इंटरनेट से प्रेरित होकर खुद आईएस के मेंबर बने है और ये घर  बैठेै (होम ग्रोन, सेल्फ रेडिक्लाइजाइड) ही आईएसआईएस के स्वंयभू सदस्य हैं। खुद ही बम बनाने और घातक हथियारों को चलाने का प्रषिक्षण लिया और वित्तीय स्त्रोत भी खुद ही  जुटाए ।  भोपाल-उज्जैन ट्रेन ब्लास्ट पुलिस की इस बात की गवाई देता है। रक्षा  विशेषज्ञ  भी यह बात को मानते हैं कि  आईएसआईएस जैसा दुर्दांत आतंकी संगठन को अगर भारत में आतंकी हमला कराना ही था, तो वह निम्न तीव्रता वाले बमों से हमला नहीं करवाता। बहरहाल, युवकों का घर बैठे इंटरनेट से प्रेरित होकर आतंकी बन जाना और देश  में हिंसा फैलाने की प्रवृति बेहद खतरनाक है। यह कोई नई बात नहीं है। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता और सामाजिक अन्याय इसके लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। देश  को आजाद हुए सात दशक हो गए हैं मगर इस दौरान बेरोजगारी बढी है। अमीर और गरीब के बीच की खाई और चौडी होती जा रही है। देश  में बेरोजगारी जितनी ज्यादा बढेगी, युवाओं में उतनी ही ज्यादा हताशा  पनपेगी और वे राष्ट्रीय  मुख्यधारा से  अलग होते जाएंगे। पंजाब इस पीडा को झेल चुका है और अब  कश्मीर  भी इस मर्ज से पीडित है, पूर्वोतर भारत तो सालों से  इस मकडजाल में उलझा हुआ है। सच कहा जाए तो  आईएसआईएस, लश्कर , अल-कायदा जैसे आतंकी संगठन भारत की अखंडता के लिए इतना बडा खतरा नहीं है, जितनी बेरोजगारी, आर्थिक विषमता और सामाजिक अन्याय से उपजी समस्याएं। सरकार को इनका अविलंब हल निकालना पडेगा।

बुधवार, 8 मार्च 2017

Pak Ex-Security Adviser Has No Locus Standi !

पुरानी कहावत है “बेशर्म के सिर में पेड उगने पर, वह खुशी   से उछलता  हुआ  बोला " अच्छा हुआ छांव तो मिलेगी“। पाकिस्तान सरकार के  राष्ट्रीय  सुरक्षा  सलाहकार रहे मुहम्मद अली दुर्रानी के  2008 के  मुंबई नर संहार पर ताजा वक्तव्य को लेकर पाकिस्तान की नीयत और सीरत भी इस कहावत जैसी ही है। मुंबई नर संहार हो या पठानकोट या उडी आतंकी हमला, भारत  द्धारा   ठोस प्रमाण दिए जाने के बावजूद पाकिस्तान बहाना-दर- बहाने लगाकर आतंकियों पर कार्रवाई टालता रहा है। और उसके इस रवैए को देखकर यही  निष्कर्ष   निकाला जा सकता है कि  हाफिज सईद और मसूद अजहर अगर खुद भी कहे कि भारत पर आतंकी हमले उन्होंने ही करवाए हैं, पाकिस्तान तब भी नहीं मानेगा । दुर्रानी के ताजा वक्तव्य की कोई ज्यादा प्रासंगिकता नहीं है। दुर्रानी यही बात मुंबई हमले के तुरंत बाद 2009 में भी कह चुके हैं। पाकिस्तान ने न तो तब इसे गंभीरता से लिया था और न ही अब इस पर कोई ध्यान देगा। इसके विपरीत पाकिस्तानी फिर वही रटा-रटाया आरोप लगाएंगे कि दुर्रानी भारत की जुबान बोल रहें  हैं । 2009 में  पाकिस्तान ने दुर्रानी के वक्तव्य पर कार्रवाई करने की बजाए उन्हें  राष्ट्रीय  सुरक्षा सलाहकार  पद से ही हटा दिया था।  भारत लाख प्रमाण दे मगर पाकिस्तान इन्हें मानने से रहा। दुर्रानी ने क्योंकि यह मत दिल्ली में रक्षा अनुसंधान और रक्षा  विश्लेषण  संस्थान के संबोधन के दौरान जाहिर किया है, लिहाजा इस स्थिति के दृष्टिगत  इसे बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। पाकिस्तान के सियासतदान अक्सर जो बातें देश  के बाहर जाकर करते हैं, स्वदेश  लौटते ही  पलटी मार जाते  हैं। निसंदेह, दुर्रानी के वक्तव्य मुंबई हमले के मास्टरमाइंड जमात-उद-दावा और लश्कर -ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद  और पठानकोट आतंकी हमले के मास्टरमाइंड की घेराबंदी के लिए भारत के काम आ सकता है। इसके साथ ही जमीनी सच्चाई यह है भी कि  अमेरिका के दबाव में आकर पाकिस्तान छोटी-मोटी कार्रवाई कर भी ले, इस्लामाबाद हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी सरगनाओं को कडी सजा देने का दुस्साहस नहीं कर सकता। हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकी सरगना  इस सच्चाई से भली-भांति वाकिफ है। हाफिज सईद हालांकि इस समय नजरबंद है । पाकिस्तान का अवाम भी मानता है कि यह कोई सजा नहीं है। फर्क  सिर्फ  इतना है कि अब उन्हे जेल में मुफ्त में बरियानी मिल रही है। तथापि, दुर्रानी का यह वक्तव्य चीन को आइना दिखाने के काम आ सकता है। चीन अपनी वीटो पॉवर इस्तेमाल करके मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र  द्वारा प्रतिबंधित आतंकी घोषित नहीं होने दे रहा है। चीन इस बात के लिए ठोस प्रमाण मांग रहा है। भारत द्वारा दिए गए सबूतों को पाकिस्तान की तरह चीन भी नहीं मानता है। पर  दुर्रानी के वक्तव्य को चीन आसानी से खारिज नहीं कर सकता। मुंबई हमले में मसूद अजहर का भी हाथ बताया जाता है। दो जनवरी, 2016 को पठानकोट आतंकी हमले का मास्टरमाइंड भी मसूद अजहर ही है। भारत की  राष्ट्रीय  जांच एजेंसी (एनआईए) ने बाकायदा मसूद अजहर को हमले का सरगना नामित कर रखा है। बहरहाल, दुर्रानी का यह कथन काबिलेगौर है कि आतंकी हमलों में पाकिस्तान सरकार का कोई हाथ नहीं है। सवाल यह है कि अगर आतंकी हमलों में पाकिस्तान का हाथ नहीं है तो इस्लामाबाद हाफिज सईद और मसूद अजहर और उनके आतंकी संगठनों को प्रतिबंधित क्यों नहीं करता? दुर्रानी के इस कथन के यह मतलब भी निकाले जा सकते हैं कि पूर्व सुरक्षा  राष्ट्रीय  सलाहकार दिल्ली आकर पाकिस्तान सरकार की पैरवी कर रहे हैं। बहरहाल, इस सारे घटनाक्रम का सुखद पहलू यह है कि आतंक की भीषण आग में बुरी से झुलस रहे पाकिस्तान को कहीं-न-कहीं इस सच्चाई का अहसास हो रहा है कि भारत के साथ वार्ता सिलसिला जारी रहना चाहिए। इससे उम्मीद बंधती है कि देर-सबेर पाकिस्तान हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे दुर्दांत भारत विरोधी आतंकियों पर नकेल कस सकता है।

मंगलवार, 7 मार्च 2017

Racial Slurs Can Undermine U.S Growth

अमेरिका में मात्र दस दिन के भीतर तीन भारतीयों पर नस्लीय हमले  दुनिया के सबसे ताकतवर देश   में  नस्लीय जहर की उग्रता को बयां करती है। नस्लीय मुद्दों पर चुनाव जीतकर  राष्ट्रपति  बने डोनाल्ड ट्रंप के शासन में यह तो होना ही था।  राष्ट्रपति चुनाव के दौरान खरबपति व्यापारी ट्रंप ने अपना पूरा चुनाव  श्वेत  बनाम अश्वेत  और “अमेरिकी बनाम अप्रवासी“ जैसे नस्लीय मुद्दों पर लडा। उन्होंने अप्रवासियों और मुस्लिम समुदाय के खिलाफ खूब आग उगली। इसका खासा  असर उनके  श्वेत  समर्थकों पर भी  पडा और अपने नेता की तरह वे भी नस्लीय जहर उगल रहे हैं । यही कारण है कि ट्रंप के चुनाव जीत जाने के बाद  अश्वेत  और मुस्लिम अभी भी  राष्ट्रपति  के खिलाफ पूरे अमेरिकी गणराज्य में जगह-जगह  प्रदर्शन  कर रहे हैं।  ट्रंप के समर्थक भी राष्ट्रपति के समर्थन में सडकों पर उतर आए हैं। इससे ता हिसंक घटनाएं बढ रही  हैं । दो दिन पहले शनिवार को केलिफोर्निया के बरकली  में  ट्रंप  समर्थकों और विरोधियों में हिंसक झडपें हुई। वोट के लिए  ट्रंप ने मुसलमानों को आतंकी बताते हुए अमेरिका में मुस्लिम समुदाय की एंट्री को फौरन प्रतिबंधित करने का वायदा  किया था  । राष्ट्रपति   बनते ही डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान, इराक और  सीरिया समेत सात देशों  के लोगों की अमेरिका में एंट्री पर प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिका में बसे भारतीय समेत  अधिकतर एशियाई  और विकासशील मुल्कों के लोग परंपरागत डेमोक्रटिक पार्टी के समर्थक रहे हैं मगर इस बार चुनाव प्रचार में हिंदू, सिख और मुसलमानों ने ट्रंप के समर्थन में खुलकर हिस्सा लिया।  भगवा पार्टी के समर्थकों ने न केवल अमेरिका में बल्कि भारत में भी ट्रंप के प्रति अपनी निष्ठां  जाहिर की। तथापि, पिछले दस दिनो की हिंसक घटनाओं ने अमेरिका में बसे भारतीयो का ट्रंप के प्रति मोह डोल रहा है। दस दिन में तीन भारतीयों को नस्लीय नफरत का  शिकार होना पडा है। इन हमलों में एक भारतीय इंजीनियर  को मार डाला  गया । एक व्यापारी पर घातक हमला किया गया और  शुक्रवार को एक सिख को निशाना बनाया गया। तीनों वारदातों के हमलावर श्वेत  थे और हर बार हमलावर “ अपने देश  वापस जाओ (गो बैक टू युअर कंट्री) चिल्ला रहे थे। अमेरिका में नस्लीय हमले पहले भी होते रहे हैं और “श्वेत  बनाम अश्वेत “ की संकीर्ण  मानसिकता वहां  खासी बलवती रही है। मगर ट्रंप के  राष्ट्रपति  बनने के बाद नस्लीय हमलों पर काफी इजाफा हुआ है। मुसलिम महिलाओं के हिजाब उतार लेना, उन्हें अपमानित करना और  अश्वेतों  के बच्चों का स्कूल से निकाला जाना अथवा उन्हें दाखिला न देना, वाणिज्य और व्यापारिक संस्थाओं में  अश्वेतों से बदसलूकी करना  और दीवारों पर नसलीय टिप्पणियां अब आम बात हो गई है। अमेरिका मूलतः बहुनस्लीय राष्ट्र  है और इससे आगे बढाने और दुनिया का सबसे श शक्तिशाली मुल्क बनाने में में अश्वेतों  और अप्रवासियों का बहुत बडा योगदान है। अप्रवासियों ने भी अमेरिका को बहुत कुछ दिया है। 2011 में प्रकाशि त एक रिपोर्ट  के अनुसार अमेरिका में नए स्मॉल बिजनेस का 28 फीसदी वर्क फोर्स अप्रवासियों का है। सिलिकॉन वैली में 2006 से 2016 की अवधि में नए स्टार्ट-अप चालीस फीसदी टैक कंपनियों में कम-से-कम एक डायरेक्टर गैर-अमेरिकी था । केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन अनुसार यूएस नागरिको के लिए जारी अंतरराष्ट्रीय  वैध पेंटेट का एक-तिहाई अप्रवासियों को दिया गया है। अमेरिका में श्वेत  और अश्वेत  के बीच आर्थिक असमानता आज भी बहुत ज्यादा है। 2013 में अमेरिका में प्रति  श्वेत   (पर केपिटा) वैल्थ 134,200 डॉलर थी तो अश्वेत  की 11,000 डॉलर और हिस्पैनिक की मात्र 7000 डॉलर। 1995 में यह असमानता काफी कम थी। यानी असमानता उतरोतर बढती ही जा रही है। इन आंकडों से यह पता चलता है कि अमेरिका में  श्वेतों  और  अश्वेतों  से कोई खतरा नहीं है मगर अप्रवासियों को श्वेत  खतरा मानते है। 2016  में छह करोड अप्रवासी अमेरिका मे रह रहे थे। श्वेतों  का लगता है कि अप्रवासियों से उन पर खामख्वाह का बोझ पड रहा है। बढती आतंकी घटनाओं ने  श्वेतों  को  और ज्यादा असुरक्षित कर दिया है। ताजा नस्लीय हमले इसी असुरक्षा का परिणाम है।

सोमवार, 6 मार्च 2017

दिल्ली से चंडीगढ तक आग

दिल्ली यूनिवर्सिटी में भाजपा के छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (एबीविपी) और वामपंथी  आल इंडिया स्टूडेंटस एसोसिएशन (आइसा) के बीच के वैचारिक जंग की आग अब चंडीगढ तक फैल गई है। ठीक दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज कैंपस की ही तरह पंजाब यूनिवर्सिटी चडीगढ में भी पिछले पांच दिन से स्टूडेंटस फॉर सोसाइटी (एसएफएस) और एवीबीपी के बीच सेमिनार में उदार विचारधारी सामाजिक कार्यकर्ता  सीमा आजाद को आमंत्रित करने पर “ जंग" छिडी हुई है। इस सेमिनार में शहीद भगत सिंह के भतीजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह जैसे प्रमुख वक्ताओं को भी आमंत्रित किया गया है । एवीबीपी सीमा आजाद का पुरजोर विरोध कर रही है और एसफएस उन्हें सेमिनार में बुलाने पर आमादा हैं। एसएफएस का कथन है कि यूनिवर्सिटी मुक्त विचारों का मंच होता है जहां हर गंभीर मुद्दे और मसलों पर खुलकर बहस होनी चाहिए। मगर आरएसएस-भाजपा से सम्बद्ध एववीबीपी इससे सहमत नहीं है। शुक्रवार को एवीबीपी ने सीमा आजाद को पीयू में प्रवेश  नहीं करने दिया हालांकि बाद  में  फ़िल्मी  स्टाइल में उन वे  कैंपस में आई  और भाषण देकर चली गई ।  इसके विरोध में वाइस चासंलर के दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे एसएफएस नेता को पुलिस को हिरासत में लेना पडा।  भाजपा की ही तरह एवीबीपी के लिए वे लोग और बुद्धिजीवी  फूटी आंख नहीं सुहाते जो उनकी विचारधारा से मेल नहीं खाते है। वह फिर चाहे दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा गुरमेहर कौर हो या चंडीगढ के एसएफएस लीडर दनमप्रीत। 22 फरवरी को दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में जो कुछ हुआ वह बेहद  शर्मनाक है। और इससे भी अधिक  शर्मनाक  कारगिल शहीद की बेटी गुरमेहर कौर की ट्रॉलिग है। गुरमेहर ने “ मैं एवीबीपी से नहीं डरती“ वीडियो जारी क्या किया, बीस  वर्षीय  डीयू छात्रा को "देशद्रोही और प्रदूषित जहरीला दिमाग' बताने की संघ और भाजपाइयों में होड सी लग गई।  केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू से लेकर हरियाणा के स्वास्थय मंत्री अनिल विज तक, भाजपा नेता  इस कद्र गुरमेहर के पीछे लठ्ठ लेकर पड गए कि शहीद की बेटी को दिल्ली छोडकर अपने शहर जालंधर लौटना पडा। छात्रा को बलात्कार तक की धमकी दी गई। इससे ज्यादा शर्मनाक और क्या हो सकता है? किसी  भी  सभ्य समाज में इस तरह की घटना को सहन नहीं किया जा सकता। यह असहिष्णुता  की पराकाष्ठा   है। भाजपा और भगवा संगठन से जुडे लोग जन गोलबंदी करने में माहिर है। बोलने और मुखर प्रचार करने मैं उनकी कोई सानी नहीं है।  अपने विचारों के लिए हर जगह, हर वक्त  खुलकर बोलने की उन्हें पूरी आजादी चाहिए मगर जो लोग उनके विचारों से सहमत न हों, उन्हें नहीं बोलने देने की भी भगवाधारियों को खुली छूट चाहिए। भगवाधारियों के लिए “अभिव्यक्ति की आजादी“ के मायने भी इसी सांचे में ढले हुए हैं। जो लोग उनके विचारों से सहमत हैं, वे सब सच्चे देषभक्त हैं और असहमति व्यक्त करने वाली सभी “देशद्रोही। और  इन सब को पाकिस्तान भेज देना जाना चाहिए। अपने विरोधियों के लिए पाकिस्तान चले जाने को कहना संघ-भाजपाइयों का तकिया कलाम बन चुका है। लोकसभा चुनाव के दौरान भी भाजपाई उन सभी लोगों को “पाकिस्तान चले जाने को कहते“ जो तत्कालीन भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की आलोचना करते।  आजादी से लेकर अब तक गत सात दशकों में लाख बार इस बात पर बल दिया जाता रहा है कि  असहिष्णुता से किसी भी समस्या का हल नहीं निकलता। लोकत्रंत्र में वाद-विवाद , तर्क-वितर्क, बहस-मुहासिब और पक्ष-विपक्ष के आदर-सम्मान से ही समस्याओं का हल निकाला जाता है। अपने विचार दूसरों पर थोपना और दूसरों के विचारों का अनादर करना लोकत्रंत्र को कमजोर करता है। राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने वीरवार को फिर कहा कि “ असहिष्णुता“ के लिए भारत में कोई जगह नही है। यूनिवर्सिटी ही ऐसी उपयुकत जगह है जहां छात्रों को वैचारिक मतभेदों और ज्वलंत मुद्दों का  वाद-विवाद और तर्क-वितर्क  से हल निकालने की कला सिखाई जानी चाहिए। दुखद स्थिति यह है कि ऐसा करने की बजाए देश  के सियासतदान  छात्रों के दिल-दिमाग को प्रदूषित कर रहें हैं।


शुक्रवार, 3 मार्च 2017

For God Sake, Please Stop " Achche Din", We Don't Want Anymore

मार्च का महीना नौकरी-पेशा  लोगों के लिए कर और बचत से जुडी चुनौतियां लेकर आता है। आयकर से बचने के लिए अनिवार्य बचत करनी पडती है और पाई-पाई जोडनी पडती है। उस पर अगर रोज-मर्रा की चींजें महंगी हो जाएं, तो जीना मुहाल हो जाता है।  पहली मार्च से नॉन सब्सिडी वाली रसोई गैस के दाम प्रति सिलेंडर 86 रु बढने से मोदी सरकार ने लोगों को महंगाई की  कांटेभरी  सौगात दी है। इतना ही नहीं बेकों ने ग्राहकों की लूट-खसोट और ज्यादा बढा दी है। बडे और रसूखदार कर्जदारों पर तो बैंको का कोई वश  चलता नहीं है, इसलिए छोटे और असहाय ग्राहकों को  शुल्क-दर-शुल्क लगाकर लूटा जा रहा है। ताजा सूचना के मुताबकि बैकों ने हर माह चार से ज्यादा  ट्रांसक्शन  करने पर प्रति निकासी अथवा डेपोजिट पर 150 रु का  शुल्क लेना तय किया है। एचडीएफसी बैंक ने तो यह  शुल्क वसूलना भी  शुरु कर दिया है। सरकार ने तो हद ही कर दी है। रसोई गैस के इतिहास में मोदी सरकार ने बुधवार को गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम में आज तक की सबसे बडी वृद्धि की । दो साल में यह लगातार चौथी वृद्धि है। अक्टूबर, 2015 में चंडीगढ-पंचकूला में  गैर सब्सिडी वाले सिलेंडर के दाम 507 रु थे और  पहली मार्च  को इसके दाम 768 रु हो गए हैं। यानी  दो सौ फीसदी से भी ज्यादा बढोतरी। लगातार दाम बढाए जाने से उन लोगों को बहुत बुरा लग रहा है, जिन्होंने प्रधानमंत्री के आहवान पर स्वेच्छा से एलपीजी सब्सिडी त्यागी  है। सरकार के अपने आंकडे इस बात के गवाह हैं कि अभी भी धनाढय वर्ग  एलपीजी सबसिडी ले रहा है और इनमें सांसद और विधायक भी  शामिल हैं। इमानदारी से सरकार को कर देने वाले लोगों को अक्सर यह  शिकायत रहती है कि उनके साथ हमेशा  अन्याय होता है। एलपीजी और बैंक लेन-देन के अलावा इस तरह की और भी कई सेवाएं है जिन पर सर्विस टैक्स लगाकर आम आदमी पर बोझ डाला गया है। कार इन्सुरेंस में थर्ड पार्टी के रेट बढा दिए गए हैं और सर्विस टैक्स भी। इससे इन्सुरेंस महगी हो गई है। बजट में मोदी सरकार ने आयकर की जो अधिकतम 12,500 रु की राहत दी है, उससे कहीं ज्यादा वह वापस ले रही है। सर्विस अथवा इस तरह के टैक्स अथवा जरुरी वस्तुओं  के दाम बढने का सबसे ज्यादा  खामियाजा  आम आदमी को भुगतना पडता है जिसकी आय उस अनुपात में नहीं बढती जिस अनुपात में महंगाई। पिछले तीन सालों में खाद्यान्न के दामों मे लगातार वृद्धि हो रही है। आम आदमी का पेट भरने वाली दालों की कीमतें उतरोत्तर बढती ही जा रही है। मूंग, तुअर और उडद जैसी महंगी दालें आम आदमी की पहुंच से बाहर हो गई हैं। नोटबंदी से बेंकों की  विश्वसनीयता  पहले गिर चुकी है। अब रही सही कसर बैंको  के लगातार बढते शुल्कों ने पूरी कर दी है। भला यह भी कोई बात हुई कि सरकार आपको बैंक से अपना ही पैसा निकालने न दें और बैंक  इसके लिए आपसे  शुल्क वसूले। डीटीएल इंडिया को प्रोत्साहित करने का यहाँ कोई तरीका नहीं  है इस पर सोशल मीडिया में तंज कसा गया है कि “जो भी बैंक ट्रांसक्शन  और महंगे एलपीजी सिलेंडर की नुक्ताचीनी करेगा, उसे देश द्रोही करार दिया जाएगा“। महंगाई डायन की तरह होती है जो किसी को नहीं  बख्शती । प्रधानमंत्री ने लोगों से अच्छे दिन लाने का वायदा कर रखा है। मोदी सरकार को सत्ता में आए तीन साल होने जा रहे हैं, अच्छे दिन की परछाई भी तक नजर नहीं आ रही है। लोगों को अभी भी मोदी पर भरोसा है। हाल ही में सपन्न निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव परिणाम यही  दर्शाते  हैं। मगर मध्य वर्ग का धैर्य जबाव दे रहा है। सोशल मीडिया पर यह प्रतिक्रिया“ हमें और अच्छे दिन नहीं चाहिए। बस रोक दो “अच्छे दिन”। हम ऐसे ही ठीक हैं“, इस बात का प्रमाण है।

गुरुवार, 2 मार्च 2017

India's Growth Rate Intact: Head Scratching Economists And Critics

क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वाकई जादुई प्रतिभा रखते हैं? हर बार मोदी कुछ ऐसा कर दिखाते हैं कि पूरी दुनिया स्तब्ध रह जाती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को पहली बार अपन बूतेे  स्पष्ट  बहुमत दिलाकर मोदी ने पूरी दुनिया को हैरत में डाल दिया था। नवंबर में एकाएक नोटबंदी करके आर्थिक जगत को हिला कर रख दिया था। हाल ही में भारत ने एक साथ 104 सैटेलाइट लांच कर  विश्व  रिकार्ड बनाया है। भारत के इस कीर्तिमान से समूचा  विश्व  स्तब्ध है। अमेरिकी  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के नेशनल इंटेलीजेंस डायरेक्टर नॉमिनी डैन कोट ने सार्वजनिक तौर पर माना है कि वे भारत की इस उपलब्धि से स्तब्ध हैं और अमेरिका को इससे सीख लेनी चाहिए। अब नोटबंदी के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था की चीन से भी तेज ग्रोथ ने साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की कोई  सानी नहीं है। नोबल विजेता अमर्त्य सेन समेत पूरी दुनिया के अर्थशास्त्री गला फाड-फाड कर कह रहे थे कि प्रधानमंत्री के इस कदम से  भारतीय अर्थव्यवस्था में जबरदस्त शिथिलता आएगी। मगर मंगलवार को केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) द्वारा जारी आंकडों ने आलोचकों को सिर खुजलाने के लिए विवश  कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बुधवार को एक चुनावी सभा में नामी अर्थशास्त्री  अमर्त्य सेन पर यह कहकर पलटवार किया कि कडी मेहनत हार्वड से कहीं ज्यादा शक्तिशाली होती है।  अमर्त्य सेन नोटबंदी के सबसे बडे आलोचक रहे हैं। सीएसओ की रिपोर्ट में बताया गया है कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के दौरान भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की ग्रोथ 7 फीसदी से भी अधिक रही है। हालांकि यह इससे पिछली तिमाही (जुलाई से सितंबर) की 7.4 फीसदी ग्रोथ से कम है मगर चीन की 6.8 फीसदी से ज्यादा है। इसका मतलब है कि नोटबंदी से जीडीपी ग्रोंथ पर कोई ज्यादा प्रतिकूल असर नही पडा है। अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियों और नामी अर्थशास्त्रियों का आकलन था कि नोटबंदी से अक्टूबर-दिसंबर तिमाही की ग्रोथ 5.5 से 6.5 फीसदी ही रह पाएगी। अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  ने पिछले सप्ताह ही कहा था कि भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.6 रहेगी और अगले साल तक कहीं जाकर यह सात फीसदी से आगे निकल पाएगी। सुखद  बात यह है की अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में कृषि , खनन और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर्स ने तेज ग्रोथ दर्ज की है। कृषि  सेक्टर में छह फीसदी की वृद्धि हुई है। जुलाई-सितंबर तिमाही में यह 3.3 फीसदी थी। मैन्युफेक्चरिंग में पिछली तिमाही की 7.1 फीसदी ग्रोथ की तुलना में इस तिमाही में 8.3 फीसदी वृद्धि दर्ज हुई है। खनन में ग्रोथ रेट पिछली तिमाही की माइनस 1.5 से बढकर इस बार यह 7.5 फीसदी हो गई है। नोटबंदी के बावजूद तेज ग्रोथ के कई कारण है। सबसे बडा कारण है कि अक्टूबर-दिसंबर तिमाही के दौरान देश  की खपत में कोई   ज्यादा गिरावट नहीं आई। सरकारी खपत बढने से यह संभव हुआ। सितंबर तिमाही की 15 फीसदी खपत की अपेक्षा दिसंबर में यह 17 फीसदी रही है। दूसरा प्रमुख कारण है पूंजी निर्माण (कैपिटल फॉरमेषन)। तीन तिमाही तक लगातार घटने के बाद दिसंबर तिमाही में इसमें आधा फीसदी इजाफा हुआ है। नोटबंदी के बावजूद दिसंबर तिमाही की निजी खपत (प्राइवेट  कंजम्पशन ) में ज्यादा गिरावट नहीं आई है। सितंबर तिमाही में यह 7.6 फीसदी बढी तो दिसंबर तिमाही में  7.2 फीसदी यानी मात्र 0.4 फीसदी कम। इन सब कारणों से यह निष्कर्ष   निकलता है कि मोदी सरकार ने नोटबंदी के दौरान ग्रोथ पर प्रतिकूल असर डालने वाले कारकों का पूरा-पूरा ख्याल रखा। इससे यह भी पता चलता है कि नोटबंदी  का निष्पक्ष आकलन करने की बजाय  अर्थशास्त्री राजनीतिक निष्ठाओं   में बंटे हुए हैं। दक्षिणपंथी नोटबंदी की पैरवी कर रहे हैं तो वामपंथी इसका इसलिए विरोध कर रहे थे क्योंकि यह कदम दक्षिणपंथी सरकार का था। निसंदेह, नोटबंदी दीर्घकालीन में अच्छे परिणाम लाएंगे और अगर अल्पावधि में ग्रोथ बरकरार रहती है, तो प्रधानमंत्री वाकई बधाई के पात्र हैं। बेशक, अंतरराष्ट्रीय  एजेंसीज  और अर्थशास्त्रियों का अभी भी आकलन है कि अगली तिमाही में नोटबंदी का ग्रोथ पर ज्यादा प्रतिकूल असर पडेगा।

बुधवार, 1 मार्च 2017

Indian Students Are Now More Deeply Rooted In Politics Than Studies

लोकतंत्र में अगर यह भावना सर्वोपरि हो जाए कि पूरी दुनिया हमारी मर्जी से चले और बाकी सब खत्म हो जाएं, तो  समझ लो इसका पतन  शुरु हो गया है। देश  की राजधानी दिल्ली यूनिवसर्सिटी के रामजस कॉलेज में दो छात्र संगठनों के विवाद के मामले में यही हो रहा है।  अलग-अलग विचारधाराओं से जुडे छात्र चाहते हैं कि उच्च शिक्षा के मंदिर में सब कुछ उनकी मर्जी से चले। मूल मुद्दा पीछे छूट गया है और विवाद ने पूरी तरह से राजनीतिक रंगत अख्तियार कर ली है। और अब यह दक्षिणपंथी बनाम वामपंथी विचारधारा का  शीत युद्ध बन गया है। रामजस कालेज के एक सेमिनार में जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के छात्र को आमंत्रित करना इस विवाद की जड है। दिल्ली यूनिवर्सिटी दक्षिणपंथी भाजपा से सम्बद्ध अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (एबीवीपी) का गढ है और जेएनयू वामपंथी दलों से सम्बद्ध छात्र संगठओं का । एबीवीपी के गढ में  वामपंथी  का आमंत्रित किया जाना भगवा छात्र संगठन को जरा नहीं सुहायां। एबीवीपी का आरोप था कि जिन दो छात्रों को आमंत्रित किया गया उन पर देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है,  इसलिए सेमिनार स्थल की तालाबंदी  की गई और विरोध प्रदर्शन  किया गया। जबाव में वामपंथी छात्र सडक पर उतर आए और दोनों में जबरदस्त जूतम-पैजार हो गई और अब तक जारी है। सोमवार को एवीबीपी ने “तिरंगा यात्रा“ निकाल कर धमकी दी कि अगर प्रशासन ने “देशद्रोहियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई नहीं कि तो यह छात्र संगठन उन्हें सजा देगा। मंगलवार को दिन में वामपंथी छात्रों (आइसा)  ने जलूस निकाला तो  शाम को कांग्रेस से सम्बंद्ध एनएसयूआई ने मशाल जलूस निकाला। इससे माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो रहा है। इस विवाद में कारगिल युद्ध के  शहीद की बेटी को भी बेवजह निशाना बनाया गया। एवीबीपी के खिलाफ आवाज उठाने का दुस्साहस करने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा गुरमेहर कौर को कई दिग्गजों ने सोशल मीडिया में निशाने  पर लिया है। क्रिकेटर वीरेन्द्र सहवाग और पहलवान योगेश्वर  दत्त ने तल्ख टिप्पणियां की हैं। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने भी छात्रा को निशाने पर लेते हुए पूछा है कि इस लडकी का दिमाग कौन गंदा कर रहा है। इस पर कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष  तिवारी ने यहां तक कह दिया कि इस भद्र पुरुष  को संसद में भी नहीं होना चाहिए मगर दुर्भाग्य है कि यह सब सरकार की तरफ से हो रहा है। रिजिजू की टिप्पणी से क्षुब्ध जाने-माने फिल्मकार जावेद अख्तर ने तंज कसा है कि मंत्रीजी आपका दिमाग किसने गंदा किया मुझे पता है। कर्नाटक के भाजपा सांसद ने तो यह कहकर हद ही कर दी कि माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम ने भी अपने पिता का सहारा नहीं लिया।  दिल्ली के मुख्यमंत्री  अरविंद केजरीवाल ने वामपंथी छात्र संगठनों का पक्ष लेते हुए एवीबीपी की “गुंडागर्दी“ के खिलाफ कार्रवाई की मंग की है।  ट्रोलिंग से क्षुब्ध  शहीद की बेटी का संघर्ष  का मादा टूट गया और मंगलवार को छात्रा गुरमेहर ने मार्च से किनारा कर लिया । एवीबीपी और भगवा संगठनों ने इस विवाद को  राष्ट्रवाद  बनाम अभिव्यक्ति की  स्वतंत्रता का मुद्दा बना लिया है। एवीबीपी और भगवा संगठनों का आरोप है कि जेएनयू देशद्रोही गतिविधियों का अडडा बन चुका है जबकि वामपंथियों का कथन है कि यूनिवर्सिटी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मुक्त आचार-विचारों का स्थल होती है। इस मामले में इग्लैंड की आॉक्सफोर्ड और कैंम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की मिसाल दी जा रही है। भारत की आजादी पर इन नामी यूनिवर्सिटीज में खुलकर विचार व्यक्त किए जाते थे। तथापि इन आरोपों में वजन है कि  यूनिवर्सिटीज को देशद्रोह गतिविधियों का अडडा नहीं बनाया जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यह कतई मतलब नहीं कि इसका देशद्रोही अभिव्यक्ति के लिए दुरुपयोग किया जाए। यह सुनिश्चित  करने के लिए जरुरी है कि यूनिवर्सिटीज को राजनीतिक दलों का अखाडा नहीं बनाया जाए।