मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

Outdated Recruitment System Needs Drastic Changes

नकल करके परीक्षा उर्तीण करना देश  में  शिक्षा के गिरते स्तर का  |¨rd  है, तो धांधली करके नौकरी पा लेना इसकी इंतहा है। रविवार को सेना भर्ती परीक्षा का पर्चा लीक हो जाने से  पश्चिम  भारत के छह केन्द्रों पर परीक्षा रद्द करनी पडी। 18 “मुन्नाभाइयों“ को गिरफ्तार किया गया। लगभग 350 परीक्षार्थियों से पूछताछ की गई। सेना के विभिन्न पदों की भर्ती के लिए रविवार को पूरे देश  में 52 केन्द्रों पर परीक्षा आयोजित की गई थी। परीक्षा  शुरु होने से पहले महाराष्ट्र  पुलिस को परीक्षा का पर्चा लीक होने की सूचना मिली थी । इस पर कई जगह छापे मारे गए और पर्चा  लीक करने के लिए एक कोचिंग सेंटर संचालक और कुछ पूर्व सैनिकों को पर्चे समेत रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया गया। सेना ने छह केन्द्रों की परीक्षाए रद्द कर दी हैं। जांच के बाद कुछ और केन्द्रों की परीक्षाए भी रद्द की जा सकती हैं। जिन प्ररीक्षार्थियों ने इस टेस्ट के लिए कडी मेहनत की थी, उन्हें  चंद “मुन्नाभाइयों“ के कारण खामख्वाह हताश  होना पडेगा।  इस प्रकरण ने परीक्षा से जुडी खामियों को फिर उजागर किया है।  भ्रष्ट  के कारण सिविल परीक्षा का पर्चा लीक होना तो समझ में आता है मगर सेना भर्ती के प्रश्न  पत्रों का लीक होना चिंता का विषय है। इतना तो तय है कि बगैर अंदरुनी सांठगांठ  के पर्जा लीक होना संभव नहीं है। इसके यह अभिप्राय निकलते हैं कि दाखिलों और भर्ती के अवैध धंधे की जडें इस कद्र फैल गई हैं कि अब सेना भर्ती को भी इसने अपनी चपेट में ले लिया है। इस प्रकरण में गिरफ्तार “दलालों“ से पूछताछ  में  पता चला है कि प्रत्येक प्रत्याशी  से चार से पांच लाख रु वसूलने जाने थे। जाहिर है इस रकम मेंसे दलालों के अलावा सेना भर्ती बोर्ड  से जुडे सूत्रों को भी उनका हिस्सा दिया जाना था। पुलिस को संदेह है कि पर्चा प्रिटिंग प्रैस अथवा  प्रश्न पत्र वितरण केद्र से लीक किया गया है। बहरहाल, धन अथवा रसूख के बल पर होनहार और मेहनती छात्रों एवं युवाओं के भविष्य से  खिलवाड करने वाली गतिविधियां देश  की जडों को खोखला कर रही है। छात्र और युवा देश  का निर्माण करते हैं और अगर निर्माण की बुनियाद ही कच्ची हो तो भवन का ढहना तय है। सेना की भर्ती में किसी भी तरह की जरा सी कोताही देश  के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। प्रतिभा की बजाय धन के बल पर सेना में भर्ती होने वाले सीमा के प्रहरी नहीं बन सकते। ऐसे लोग देश  की सुरक्षा से भी समझौता कर सकते हैं। सच कहा जाए तो परीक्षा पर आधारित मौजूदा भर्ती पद्धति में ही खोट है। रविवार को सेना में जिन पदों के लिए भर्ती की जानी थी, उनमें सोल्जर कलर्क, स्ट्रांगमैन तथा सोल्जर ट्रेड्समैन शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मौजूदा परीक्षा पद्धति में परीक्षार्थी की प्रतिभा का सही-सही आकलन करने की जगह उसे किताबी ज्ञान को ज्यादा तरजीह दी जाती है। स्कूल अथवा कॉलेजों मे भी  परीक्षाओं से उसकी प्रतिभा का आकलन किया जाता है। और इन परीक्षाओं में उर्तीण होने अथवा अव्वल आने के लिए परीक्षार्थी का ज्ञान पुस्तकों तक ही सीमित रह जाता है। स्कूल और कालेज के बाद किसी परीक्षार्थी की फिर से परीक्षा  क्यों ली जाए? और अगर मूल परीक्षा के बाद भर्ती अथवा दाखिले के लिए अभ्यर्थी को फिर परीक्षा देनी पडे, तो ऐसी व्यवस्था का क्या औचित्य जो बार-बार अभ्यर्थी की परीक्षा देने के लिए विवश  करे? आजादी के बाद शुरु में विश्वविधालय  अथवा बोर्ड  की परीक्षा के आधार पर साक्षात्कार लेकर मेरिट पर दाखिले अथवा भर्ती की जाती थी। जैसे-जैसे देश  आगे बढता गया, इस पद्धति को नकार दिया गया। मौजूदा दाखिला और भर्ती पद्धति ने  भ्रष्ट  तौर-तरीकों और पूरी व्यवस्था के व्यापारीकरण को ही बढाया है। इसे बदलने की जरुरत है।     

सोमवार, 27 फ़रवरी 2017

BMC Results Indicate Which Way Winds Are Blowing

देश  परिवर्तन के नए दौर से गुजर रहा है। इस दौर में राजनीतिक  आउटलुक , भाषा  और संपर्क-संवाद के तौर-तरीकों में काबिलेगौर बदलाव लगभग हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। भारतीय मतदाता अब काफी सयाना हो गया है। उसे लोक-लुभावने वायदों के चुनावी अस्त्रों से मूर्ख नहीं बनाया जा सकता और न ही गपोडशंखी बातों से। नागनाथ और सांपनाथ के बीच का अंतर उसे भली-भांति मालूम है। नवंबर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नोटबंदी किए जाने के बाद से अब तक सपन्न हुए सभी निकाय चुनावों में भाजपा को प्रचंड जनादेश  मिलना यही  दर्शाता  है। चंडीगढ नगर निगम चुनाव हों या ओडीशा  और महाराष्ट्र  निकाय चुनाव, भाजपा ने हर जगह शानदार जीत दर्ज  की है। महाराष्ट्र  के ताजा निकाय चुनाव में शिवसेना की बैशाखी छोडकर अपने बूते चुनाव लड कर 10 मेंसे 8 में भाजपा  शिवसेना को पीछे छोड सबसे बडी पार्टी बनकर उभरी है। ग्रेटर मुंबई महानगर पालिका चुनाव में इस बार भाजपा ने अकेले चुनाव लडा और 232 में 82 सीटें जीतकर  शिवसेना की बराबरी की है।  शिवसेना को 84 सीटें मिली है। पिछली बार भाजपा मात्र 31 सीटें जीत पाई थीं। मुंबई को  शिवसेना का गढ माना जाता है और  शिवसेना के साथ-साथ राज ठाकरे की महाराष्ट्र  नवनिर्माण सेना (एमएनएस) भी इसी मुगालते में थीं कि मुंबई में ठाकरे परिवार के समक्ष कोई नहीं टिक सकता। भाजपा ने  शिवसेना और एमएनएस का यह भ्रम भी तोड दिया। इससे पहले भाजपा ने विधानसभा चुनाव भी अकेले अपने दम पर लडा था, और स्पष्ट  बहुमत के करीब पहुंचकर अपनी सरकार बना  ली हालांकि  शिवसेना इसमें  शामिल है। सबसे ज्यादा दुर्गति कांग्रेस की हुई है। लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी लगातार हार का मुंह देख रही है। मुबंई महानगर पालिका के चुनाव में भाजपा और  शिवसेना के अलग-अलग चुनाव लडने से  कांग्रेस को उम्मीद थी, उसे वोटों के बंटवारे का लाभ मिलेगा मगर ऐसा होना तो दीगर रहा, उसे मात्र 31 सीटें मिली हैं। पिछली बार 2012 में कांग्रेस ने 51  और 2007 में 75  सीटें जींती थी।  शरद पवार की  राष्ट्रीय  कांग्रेस पार्टी (राकांपा) को मात्र 9 सीटें मिली हैं। बीएमसी चुनाव में एंटी-इंकूबेंसी फेक्टर भी नहीं चला। पिछले दो दशक से बीएमसी पर भाजपा- शिवसेना का कब्जा रहा है। सडकों पर बडे-बडे गड्ढों, लंबे-लंबे  ट्रैफिक जाम और मलेरिया का प्रकोप मुंबई को बीस साल सताता रहा है मगर इसके बावजूद भी मुंबईवासियों ने भाजपा और  शिवसेना को ही चुना। यही स्थिति चंडीगढ नगर निगम चुनाव में सामने आई। नोटबंदी के बाद  चुनाव परिणामों का  निष्कर्ष   यही निकलता है कि जनता को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बातों पर विपक्षी नेताओं से कहीं ज्यादा भरोसा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का मोदी के खिलाफ आग उगलना भी मतदाताओं को कतई पसंद नहीं आया है। कांगेस यह बात भूल गई है कि सतहर और अस्सी के दशक में जब भाजपाई समेत विपक्ष इंदिरा गांधी के खिलाफ जितनी ज्यादा आग उगलते, वे मतदाताओं की उतनी ही ज्यादा प्रिय हो जाती थीं। पीडित और दुर्बल के प्रति भारतीय जनमानस की हमेशा  से गहरी सहानुभूति रही है। जनमानस में प्रधानमंत्री मोदी की छवि आज भी “चाय बेचने वाली“ ही है। नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष और बुद्धिजीवियों की प्रखर आलोचना के बावजूद जनता इसे धनाढय वर्ग और काले धन के खिलाफ जनहित की कार्रवाई मान रही है। ठीक उसी तरह, जिस तरह साठ और सतहर के दशक में इंदिरा गांधी की बैंको के राष्ट्रीयकरण  की कार्रवाई को आम जनता ने पूंजीपतियों के खिलाफ बडी कार्रवाई माना था। आम आदमी आंकडों और तथ्यों के मायाजाल को नहीं समझता। बहरहाल, महाराष्ट्र  निकाय चुनाव के ताजा परिणाम साफ-साफ बता रहे हैं कि चुनावी बयार किस ओर बह रही है। इन चुनाव परिणामों से इस बात का भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में चुनावी बयार किस ओर बह रही है़?

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

No End To The Dirty Spell of Intolerance

छात्र नीति में दक्षिणपंथी और वामपंथी संगठनों के बीच वैचारिक मतभेद समझ में आते हैं मगर इसमें हिंसा और असहिष्णुता  का घालमेल बेहद खतरनाक है। छात्र देश  का भविष्य  होते हैं और अगर वे अध्ययन  काल से ही हिंसा और असहिष्णुता  सेे ग्रस्त हो जाए , तो देश  का संकटग्रस्त हो जाना  निश्चित है ।  दिल्ली यूनिवर्सिटी के रामजस कॉलेज में बुधवार को छात्रों के दो गुटों के बीच  हुई हिंसक झडप देश  में बढती असहिष्णुता को  दर्शाती  है। बुधवार को  जवाहर लाल यूनिवर्सिटी (जेएनयू) के दो छात्रों को रामजस कॉलेज में होने वाले सेमिनार में आमंत्रित किया गया था। दोनों छात्र वामपंथी छात्र संगठन आइसा से सम्बद्ध है। इन दोनो छात्रों को बुलाए जाने से क्षुब्ध भगवा पार्टी के छात्र संगठन अखिल भारतीय विधार्थी परिषद (एवीबीपी)  ने हंगामा खडा कर दिया। जिस जगह सेमिनार हो रहा था, उस पर  बाहर से ताला जड दिया गया और आमंत्रितों पर पत्थर फेंके गए।  एवीबीपी से सम्बद्ध छात्रों को   इस बात का गुस्सा था कि सेमिनार में जेएनयू के उन छात्रों को आमंत्रित किया गया था,  जिनपर पिछले साल  “देशद्रोह“ के आरोप लगे थे और इस पर उन्हें जेल में भी जाना पडा था। एवीबीपी छात्रों के गुस्से के  मद्देनजर   कॉलेज प्रबंध ने जेएनयू के छात्रों को भेजा निमंत्रण वापस ले लिया। इससे भडके आइसा से सम्बद्ध छात्रों और कुछ  शिक्षकों ने विरोध प्रदर्शन  निकाला और इस दौरान प्रतिद्धंद्धी गुटों में दो बार हिसंक झडप हो गई। इन झडपों में पुलिसकर्मियों और पत्रकारों समेत कई लोग घायल हो गए। पुलिस ने एवीबीपी  प्रदर्शनकारियों  को समझाने की कोशिश  भी की कि आइसा  के पास प्रदर्शन  के लिए परमिशन है, इसलिए उन्हें हट जाना चाहिए। इस पर एवीबीपी प्रदर्शनकारियों   की पुलिस से ही तनातनी हो गई। इस प्रकरण को लेकर वामपंथी छात्र संगठनों का आरोप है कि  पुलिस एवीबीपी की मदद कर रही थी। दिल्ली पुलिस पर अक्सर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।  इससे खफा माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने रामजस कॉलेज प्रकरण को “स्टेट मशीनरी प्रायोजित  असहिष्णुता  करार दिया है। सेमिनार में किसे  बुलाना है और किसे नहीं, यह फैसला आयोजकों का होता है। इसमें छात्र संगठनों को ऐतराज नहीं होना चाहिए। मगर एवीबीपी यह बात मानने को तैयार नहीं है।  दिल्ली में वामपंथी और अखिल भारतीय परिषद के अपने-अपने किले हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी पर बीच-बीच में कांग्रेस से सम्बद्ध एनएसयूआई ( नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया) को छोडकर बराबर अखिल भारतीय विधार्थी परिषद का कब्जा रहा है और वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपा के कई शीर्ष  इसी यूनिवर्सिटी के प्रॉक्डट हैं। पिछले साल अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली मे “आप“ की उपस्थित दर्ज  करवाने की कोशिश  की थी  मगर उन्हें भी मुह की खानी पडी। दूसरी ओर, जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी पर एक-आध बार को छोडकर हमेशा  वामपंथी दलों से सम्बद्ध छात्रों का दबदबा रहा है और सीता राम येचुरी समेत कई ख्यातिप्राप्त  शिक्षाविद, नौकरशाह जेनयू के छात्र रहे हैं। न तो आज तक वाममंथी छात्र संगठन दिल्ली यूनिवर्सिटी पर अपना परचम लहरा पाएं हैं और न ही एबीवीपी जेएनयू में अपनी उपस्थिति दर्ज करा पाई है। निष्कर्ष  यह है कि जेएनयू वाम विचारधारा की नर्सरी है, तो दिल्ली यूनिवर्सिटी में दक्षिणपंथी एवं वामपंथी विरोधी विचारधारा का बोलबाला है। यही झगडे की असली वजह है। जेएनयू में दक्षिणपंथियों की उपस्थित वाम छात्र संगठनों को फूटी आंख नही सुहाती और  एवीबीपी दिल्ली यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा की काट की हर संभव कोशिश  करती रहती है। यही मानसिकता छात्रों के बीच बढ्ते तनाव की असली वजह है। पिछले साल जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार और पांच अन्य छात्रों पर देशद्रोह का मामला दर्ज करवाने में दक्षिणपंथी छात्रों का हाथ रहा है। बहरहाल, यूनिवर्सिटी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, विचारों की आजादी  और सहिष्णुता  का स्तंभ होती है। और  शिक्षा के मंदिर में हर आस्था को आने की छूट होती है। दुखद बात यह है कि भाजपा और उससे सम्बद्ध संगठन इससे सहमत होते नही लगते हैं।

गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

“देर आए, दुरुस्त आए“

 बहुत पुरानी लोकप्रिय कहावत है “ देर आए, दुरुस्त आए“।  आतंकी हाफिज सईद के मामले में पाकिस्तान के ताजा रुख पर यह कहावत एकदम चरितार्थ होती है। पाकिस्तान को अब जाकर पता चला है कि हाफिज सईद आतंकी है और  उसके लिए भी बडा खतरा है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने माना है कि आतंकी का कोई धर्म  नही होता है।  आतंकी  मुस्लिम या हिंदू नहीं होता, वह सिर्फ  आतंकी होता है। हाल ही में पाकिस्तान ने सईद हाफिज को लेकर कुछ कडे कदम उठाए हैं, जिनके लिए भारत लंबे समय से इस्लामाबाद पर दबाव डाल रहा था। लगभग एक माह पहले 30 जनवरी को पाकिस्तान सरकार ने हाफिज सईद  को नजरबंद किया। फिर उसे आतंकियों की सूची में  शामिल किया गया। और एक दिन पहले हाफिज सईद और उसके कारिंदों के सभी 44 हथियारों के लाइसेंस रदद कर दिए गए  । इन कदमों से भारत को भी लग रहा है कि पाकिस्तान अब आतंकी  सईद के खिलाफ ठोस कार्रवाई  करने को विवश  हो  रहा है। हाफिज सईद  मुंबई के 26/11 (2008)  आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड है। मुंबई में 26 नवंबर से 29 तक तीन तक जारी नर संहार में 164 निर्दोष  लोग मारे गए थे और  308 घायल हुए थे। भारत के पास इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि 26/11 का आतंकी हमला हाफिज सईद ने अपने कारिदों से करवाया था। भारत ने  पाकिस्तान को इस बात के पुख्ता सबूत भी दिए थे मगर इस्लामाबाद मानता ही नहीं था। और अब जब पाकिस्तान ने अधिकृत तौर पर माना है कि हाफिज सईद आतंकी है और पाकिस्तान समाज के लिए भी खतरा है, उस पर ठोस कार्रवाई बनती है। पाकिस्तान के ताजा कदम से लग रहा है कि इसके लिए जमीन तैयार की जा रही है। तथापि, यह इतना आसान नहीं  है। पाकिस्तान के धार्मिक और कटटरपंथियों  के साथ-साथ  राजनेताओं ने भी रक्षा मंत्री  के इस बयान की तीखी आलोचना की है और खवाजा पर आरोप लगाया है कि वे भारत की जुबान बोल रहे हैं। वैसे भी पाकिस्तान के राजनेता देश  के बाहर आतंक पर पाक दामन साबित करने के लिए अक्सर विवादास्पद वक्तव्य देते रहते हैं।। मगर स्वदेश  लौटते ही उनकी जुबान फिर पलट जाती है। पाकिस्तान की सत्ता में सेना का खासा दखल है और सेना कटटरपंथियों और धर्मगुरुओं की मददगार है।  बगैर सेना की मदद के आतंकी संगठनों पर कार्रवाई करना सहज नहीं है। बहरहाल, भारत को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए कि पाकिस्तान ने भारत को खुश  करने के लिए  आतंकी हाफिज सईद के खिलाफ कार्रवाई की है। दरअसल, अमेरिका में कटटरपंथी डोनाल्ड ट्रंप के  राष्ट्रपति  चुने जाने के बाद से पाकिस्तान खासा डरा हुआ है। मुंबई आतंकी हमले मे 6 अमेरिकी के मारे जाने से क्षुब्ध अमेरिका ने भी हाफिज सईद पर 1 करोड डॉलर का इनाम  घोषित  कर रखा है। कहते हैं लोहे को लोहा ही काटता है।  राष्ट्रपति  ट्रंप ने पदभार संभालते ही ईरान, इराक, सीरिया और  लीबिया समेत सात  मुस्लिम देशों  से अमेरिकी को आवाजाही बंद कर दी । ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तान को भी सात मुस्लिम देशों  की तरह प्रतिबंधित करने की धमकी दे रखी है। हाल ही में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के  पूर्व उच्च अधिकारी केविन हल्बर्ट ने पाकिस्तान को पूरी दुनिया के लिए सबसे खतरनाक देश  बताया है। हल्बर्ट का आकलन है कि नाकाम अर्थव्यवस्था, न्युक्लियर वेपन्स और तेजी से पनप रहे आतंक के कारण पाकिस्तान दुनिया के लिए खतरा बनता जा रहा है। देर से ही सही पर आतंकी सईद के खिलाफ  कार्रवाई से भारत और  पाकिस्तान के बीच संबंधों में व्याप्त  शिथिलता कुछ हद तक दूर हो सकती है और द्धिपक्षीय वार्ता के द्धार खुल सकते हैं। दो पडोसी ज्यादा देर तक एल-दूसरे से पीठ फेर कर नही रह सकते। बडी-से-बडी समस्या का हल भी  बातचीत से निकल आता है।



Not A Language of Vikas Purush

उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव प्रचार में अब तक का उग्र राजनीतिक विचार-विमर्श स्थापित  मर्यादाओं को लांघ रहा है। शीर्ष   नेताओं द्वारा  तीखी  भाषा  में एक-दूसरे पर व्यक्तिगत लांछन लगाना और निर्वाचन आयोग की आचार संहिता तक का उल्लघंन करना समकालीन भारतीय राजनीति का वीभत्स चेहरा उजागर करता है। लोकतंत्र में असहमति और विरोध को तर्कों के माध्यम से व्यक्त किया जाना चाहिए,  असभ्य भाषा  में नहीं। “गुजरात में गद्दों के लिए प्रचार“ न करें, “बसपा बहनजी संपत्ति पार्टी बन गई है “ अथवा “मोदी नेगटिव दलित मैन हैं“ जैसी भाषा को कतई  शालीन नहीं कहा जा सकता। मोदी देश  के  प्रधानमंत्री हैं। अखिलेश  यादव देश  के सबसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री। दोनों ही संवैधानिक पद पर आसीन है। इस नाते दोनों से मर्यादित और  शालीन भाषा की उम्मीद की जाती है। चुनाव प्रचार का यह कतई मतलब नहीं है कि संवैधानिक पद पर आसीन महापुरुष  अपनी मर्यादा ही भूल जाएं। नरेन्द्र मोदी को “ विकास पुरुष  कहा जाता है और वे देश  की करोडों जनाकांक्षाएं को पूरा करने की अग्नि परीक्षा से गुजर रहे हैं। अखिलेश  यादव युवाओं के रोल मॉडल हैं। उन पर युवाओं की आकॉक्षाओं और अपेक्षाएं पर खरा उतरने की जिम्मेदारी है। सुश्री मायावती देश  की निर्बल, शोसित  और दलितों के लिए ”नई आशा  की किरण” हैं। वे महिलाओं के लिए आगे बढने की प्रेरणा भी हैं। मगर “अमर्यादित“ आचरण अथवा असभ्य  भाषा  किसी भी “आदर्श  “ राजनीतिक नेता को  शोभा  नहीं देती है। समकालीन नेताओं को याद रखना चाहिए कि यही वही देश  है जिसमें जवाहर लाल नेहरु और राम मनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने उच्च आदर्श  स्थापित किए थे।  वैचारिक स्तर पर एक-दूसरे के कट्टर विरोधी होते हुए भी नेहरु और लोहिया ने कभी असभ्य भाषा  का प्रयोग नहीं किया। पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कभी मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। वाजपेयी के  भाषण  इतन ओजस्वी होते कि पार्टी के घुर विरोधी भी उन्हें  सुनने आते।  यह बेहद दुखद है कि उत्तर प्रदेश  के मौजूदा  चुनावी समर में आपत्तिजनक वक्तव्यों का सैलाब सा आ गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फतेहपुर की चुनावी रैली में श्मशान   और कब्रस्तान का उल्लेख करते हुए समाजवादी पार्टी पर तंज कसा तो अखिलेश  यादव ने “बिग बी की गुजरात पर्यटन के विज्ञापन” से मोदी को जवाब दिया। इस तरह की असभ्य भाषा  का प्रयोग करके देश  के नेता केवल मीडिया के माध्यम से सनसनी फैला रहे हैं। और मीडिया भी नमक-मिर्च लगाकर इसे प्रकाशित करने में कोई कसर नहीं छोड रहा है। इस तरह के चुनाव प्रचार से  राजनीतिक दलों को कोई बडा लाभ नही मिल रहा है। देश  के आंचलिक क्षेत्रों की जनता ऊल-जलूल तर्कों को समझती ही नहीं है। वह भावनाओं में बहकर अपना निर्णय लेती है। प्रधानमंत्री मतदाताओं की इस मानसिकता को बखूबी जानते हैं और इसीलिए उन्होंने फतेहपुर में बिजली की अनियमित सप्लाई के साथ-साथ  श्मशान  घाट और क्रबस्तान जैसे संवेदनशील विषयों का उल्लेख किया।  सवाल यह है कि क्या यह चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नही है? काग्रेस ने इस पर निर्वाचन आयोग से  शिकायत करने का फैसला लिया है।  भाजपा उत्तर प्रदेश  में मतदाताओं का धु्रवीकरण कराने की हरचंद कोशिश  कर रही है। और इस मामले में मायावती भी पीछे नहीं है। वे अपनी चुनाव सभाओं में खुलकर धर्म  और जात-पात के नाम पर वोट मांग रही है। इस मामले में कोई भी पीछे नहीं है। प्रत्याशियों का चयन भी इसी आधार पर हुआ है। लोकतंत्र का तकाजा है कि चुनावों को तर्कों और ठोस मुद्दों पर लडा जाना चाहिए। समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों ने हालांकि विकास को अपने चुनाव प्रचार का प्रमुख मुददा बना रखा है मगर चुनावी रैलियों में मंच पर पहुंचते ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर  शुरु हो जाता है। अभी चुनाव प्रचार के चार चरण बाकी हैं और अगर चुनावी भाषणों का अमर्यादित सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो माहौल और अधिक तल्ख हो सकता है। इससे कानून-व्यवस्था भी बिगड सकती है।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

खिलाडियों की बोली

क्रिकेट के सबसे बडे कुंभ इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के सीजन-10 के लिए सोमवार को बंगलुरु में खिलाडियों की बोली लगाई गईं। 29 विदेशियों समेत कुल 66 खिलाडियों की नीलामी हुई। नीलामी में 39 भारतीय 25.25 करोड रु में  और 29 विदेशी खिलाडी 67.4 करोड रु में बिके। इंग्लैंड के दो खिलाडी सबसे महंगे बिके जबकि वे पूरा  सीजन भी नहीं खेलेंगे। इसके बावजूद आईपीएल में पहली बार  शामिल होने वाले  इंग्लैंड के आल-राउंडर बेन स्टोक्स सबसे मंहगे 14.5 करोड रु में बिके। इंग्लैंड के ही टाइमल मिल्स 12 करोड रु में बिके। दो करोड रु से अधिक की कीमत पर बिकने वाले 18 खिलाडियों में सिर्फ 6 भारतीय हैं। नीलामी में सबसे ज्यादा 17.2 करोड रु की बोली राइजिंग पुणे सुपरजाइंटस की टीम ने लगाई। पहली बार आईपीएल की नीलामी में आईसीसी के एसोसिएट देशों  के खिलाडियों को  शामिल किया गया। इसी कारण  पहली बार अफगानिस्तान के दो खिलाडी मोहम्मद नबी और राशिद खान को खरीदा गया। अफगानिस्तान के गेंदबाज  रशीद  खान को चार करोड रु में खरीदा गया।  इस बार आईपीएल में चौंकाने वाली बोलियां लगी। भारत के गैदबाज इशांत शर्मा   और इरफान पठान को कोई खरीदार नहीं मिला। पिछले सीजन में  इशांत शर्मा  को  राइजिंग पुणे सुपरजाइंटस ने 3.8 करोड रु में खरीदा था। तमिल नाडु के गरीब मजदूर का बेटा थंगरासू नटराजन तीन करोड रु में बिका। 25 वर्षीय  बाए हाथ के तेज गेंदबाज है। कमाल की बात यह है कि नटराजन की बेस प्राइज मात्र दस लाख रु थी।  नटराजन को किंग्स इलेवन पंजाब ने खरीदा। टीम के मेंटर  वीरेन्द्र सहवाग नटराजन को बेहतरीन गेंदबाज बता चुके हैं।  नटराजन की 140 किलोमीटर रफ्तार की स्ट्रेट सीम पोजिशन वाली “यार्कर“ को खेलना बेहद  मुश्किल  है। सहवाग ने इसीलिए उन्हें चुना है। इंग्लैंड के टाइमल मिल्स की बेस प्राइस 50 लाख रु थी मगर उन्हें 12 करोड रु में खरीदा गया। अफगानिस्तान के रशीद  खान की 50 लाख रु की बेस प्राइस की तुलना में चार करोड रु में खरीदा गया। दस लाख की बेस प्राइस वाले गुरुगन  आश्विन  एक करोड में बिके। इन बोलियां से साफ पता चलता है कि खरीदार फ्रेंचाइजी खिलाडी की जीत की क्षमता को खासा तरजीह दे रहे हैं। इसीलिए  इशांत शर्मा  की जगह तमिल नाडु के  थंगरासू नटराजन  को ज्यादा उपयोगी माना गया। आईपीएल 5 अप्रैल से शुरु होगा और 21 मई को खत्म होगा। पूरे 47 दिन तक 60 मैच खेल जाएंगे। मैच फिक्सिंग के आरोपों और पूर्व चेयरमैन ललित मोदी की विवादस्पद भूमिका से दागदार होने के बावजूद आईपीएल पूरी दुनिया में बेहद लोकप्रिय है। और यह खेल अंतरराष्ट्रीय  सीमाएं तोड कर मुल्कों को आपस में जोडने का काम कर रहा है। सोमवार को अफगानिस्तान के दो खिलाडियों का आईपीएल में चयन से पूरा देश  भारत के प्रति कृतज्ञ नजर आया। अफगानिस्तान की दो मुख्य एजेंसियां- खामा और पॉजाक- द्वारा इस खबर को ब्रेक करते और अफगानिस्तान क्रिकेट बोर्ड  के अधिकृत फेसबुक पेज में पोस्ट होते ही  शेयर, लाइक और कमेंट का तांता लग गया। अफगानी  हिंदुस्तान-अफगानिस्तान दोस्ती जिंदाबाद बोलने लगे।  अकेला पाकिस्तान ऐसा देश  है जिसे आईपीएल से दूर रखा गया है। इसके लिए आतंक को पालने वाली पाकिस्तान सरकार खुद जिम्मेदार है। दुनिया का कोई भी देश  पाकिस्तान में क्रिकेट खेलने के लिए तैयार नहीं है। आईपीएल जैसे कमर्शियल  आयोजन ने भारत में खेल और खिलाडियों को सम्मान और ईनाम के नए-नए आयाम उपलब्ध  कराए हैं। क्रिकेट खिलाडियों के अलावा अब हॉकी, बैडमिंटन, रैसलिंग और कब्बडी के खिलाडियों को भी ऊंचे दामों में खरीदा जा रहा है। इससे इन खेलों को खासा प्रोत्साहन मिल रहा है। रेसलिंग में प्रो-स्पोर्टिफाई की पहल पर प्रो-रेसलिंग लीग ने  पहलवानों को नए आयाम प्रदान किए हैं। देश में खेल और खिलाडियों को बुलदियों पर ले जाने के लिए आईपीएल,  प्रो-रेसलिंग लीग जैसे आयोजन निहायत जरुरी  है।

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

Delhi Bomb Blast : Judgement Sprinkles Salt On Victims' Wounds

विगत वीरवार को दिल्ली बम ब्लास्ट मामले में अदालत के फैसले से 12 साल बाद पीडित परिवारों के नासूर फिर हरे हो गए। दीपावली से ठीक दो दिन पहले 29 अक्टूबर, 2005 को देश  की राजधानी दिल्ली में आतंकियों ने तीन जगह बम फोडे। इन बम विस्फोटों में 67 लोग मारे गए और 210 जख्मी हो गए थे। दुनिया में किसी भी मुल्क का कानून 67 निर्दोष  लोगों की हत्या करने वालों को मौत की ही सजा देगा। मगर अदालती फैसले साक्ष्यों और सबूतों पर दिए जाते हैं और उन्हें जुटाने की जिम्म्मेदारी अभियोजन पक्ष (प्रॉसिक्यूषन एजेंसी) पर होती है।  देश  का अभियोजन पक्ष इतना कमजोर है कि हमेशा  की तरह इस बार आतंकियों के खिलाफ भी अदालत में ठोस सबूत  पेश नहीं कर पाए। ठोस सबूतों और पुख्ता साक्ष्यों के अभाव में अदालत ने आरोपी तारिक अहमद डार  को 10 साल की सजा सुनाई और दो अन्य आरोपियों को साफ बरी कर दिया। बम विस्फोटों के प्रमुख आरोपी डार को 10 साल की सजा  निर्दोष  लोगों की  हत्या  करने के लिए नहीं मिली है, अलबत्ता गैर-कानूनी गतिविधियों में संलिप्त होने के लिए सुनाई गई है। बाकी दो आरोपियों को अदालत ने सभी आरोपों से बरी कर दिया है।  यानी  तीनो आरोपियों  को अदालत  ने  बम फोड़ने  और  निर्दोषों की हत्या  से साफ  बरी करा दिया है।.12 साल से जेल में बंद डार भी बरी हो जाएगा, क्योंकि अदालत ने उसे 10 साल की सजा सुनाई है।  तीनों आरोपी  कश्मीर  घाटी से हैं, इस स्थिति के  दृष्टिगत  हिंसा और अलगाववाद में जल रही घाटी में आतंक फैलाने वालों को और ज्यादा  शह मिल सकती है। कानून अगर निर्दोष  लोगों के हत्यारों को भी सजा नहीं दे पाए, तो पीडितों के साथ-साथ जनमानस का निराश  होना स्वभाविक है।  इस तरह की व्यवस्था से सिर्फ  अपराध ही बढ़ेगा । 12 साल से पीडित परिवार यह उम्मीद लगाए हुए थे कि 67 लोगों की हत्या के लिए जिम्मेदार आतंकियों को मौत की सजा मिलेगी। आरोपियों का साफ बरी हो जाना पीडित परिवारों के जख्मों पर नमक छिडकना जैसा है। और आरोपियों का हंसते हुए अदालत से बाहर निकलना पीडितों को और ज्यादा आहत कर रहा है।  दिल्ली बम ब्लास्ट में पुलिस की खासी किरकिरी हुई है। सबूतों और साक्ष्यों के अभाव में अदालत द्वारा दो आरोपियों को पूरी तरह से बरी किए जाने से पुलिस की जांच पर ही संदेह होने लगता है। आतंकियों के खिलाफ इतना कमजोर अभियोजन पक्ष संभवतय आज तक सामने नही आया। अदालत ने अपनी 147 पृष्ठीय   फैसले में अभियोजन पक्ष की खामियों और पुलिस की लचर जांच पर प्रकाश  डालते हुए कहा है कि जांच से लगता नहीं है कि पुलिस वास्तव मे गंभीर थी। 365 साक्ष्यों के बावजूद आरोपी साफ बच निकलें, इससे यही निष्कर्ष निकलता  है कि दिल्ली पुलिस ने मामले पर खासी लीपा-पोती की है। अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए उन लोगों को पकडा है, जो बम विस्फोट में संलिप्त ही नहीं थे। मामले में एक आरोपी श्रीनगर निवासी मोहम्मद रफीक  शाह ने रिहाई के बाद एक चैनल्स से बातचीत मे कहा भी है कि उन्हें अपनी बेगुनाही को लेकर अदालत पर पूरा भरोसा था। शाह  श्रीनगर यूनिवर्सिटी में इस्लामिक स्ट्डीज में स्नाकोतर की पढाई कर रहे थे, जब उन्हें दिल्ली बम विस्फोटके आरोप में गिरफ्तार किया गया। दिल्ली में बम विस्फोट के समय शाह  श्रीनगर यूनिवर्सिटी में थे और पुलिस को इस बात के सबूत भी दिए गए। मगर वह नहीं मानी और  शाह को गिरफतार  कर जेल में ठूंस दिया गया। उन्होंने जेल में रहकर पढाई की। शाह की तरह  कश्मीर  के कई युवक दिल्ली की  तिहाड जेल में बंद हैं। पुलिस की इस तरह की बर्बरता के कारण ही  कश्मीर  सुलग रहा है। एक तरफ आतंक के पीडित हैं, जिन्हें न्याय चाहिए और दूसरी तरफ ऐसे युवक हैं, जो  पुलिस की कमजोर कार्यशैली से पीडित हैं। इस तरह की व्यवस्था से जनमानस का पुलिस और अभियोजन पर बचा-खुचा भरोसा भी जाता रहेगा।


शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

Loyalty Matters More In Contemporary Indian Politics

तमिल नाडु में शशिकला के वफादार ईके पलनीसामी द्वारा वीरवार को मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने के साथ ही राज्य में व्याप्त  अनिश्चितता  ख़त्म  हो गई है। वीरवार सुबह राज्यपाल से मुलाकात में  पलनीसामी ने सरकार बनाने का दावा पेश  किया। इस पर राज्यपाल ने उन्हे सरकार बनाने का न्यौता दिया। उनके प्रतिद्धंद्धी और तीन बार  मुख्यमंत्री रहे ओ पनीरसेल्वम  विधायकों का समर्थन नहीं जुटा पाए और सरकार बनाने की दौड में पिछड गए।  पलनीसामी के साथ 31 मंत्रियों  ने  भी  शपथ ली है।  पलनीसामी को 15 दिन के भीतर विधानसभा में अपना बहुमत साबित करना होगा। लोकतंत्र में शक्ति परीक्षण का यही एकमात्र  विश्वसनीय  तरीका है। पलनीसामी को  शशिकला की वफादारी का फल मिला है। शशिकला से बगावत के कारण इस बार जयललिता के वफादार पनीरसेल्वम पिछड गए। समकालीन भारतीय राजनीतिक दलों में  शीर्ष  नेता के प्रति वफादारी अन्य बातों से कहीं ज्यादा मायने रखती है। ऐसा भारत में ही संभव है कि 25 साल की दोस्ती से मुख्यमंत्री का पद भी हाथों-हाथ मिल जाए। जयललिता की करीबी  शशिकला मुख्यमंत्री बन गईं होती अगर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में जेल की सजा नहीं सुनाई होती। इसे भाग्य की विडवंना ही कहा जाएगा कि  शशिकला मुख्यमंत्री बनते-बनते अब जेल पहुंच गईं और चार साल तक वहां आम कैदी की तरह सश्रम काम करेंगी। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को  शशिकला, उनकी ननद इलावरसी और भतीजे वीके सुधाकरण को चार-चार साल  कैद की सजा दी। अदालत ने जेल में  शशिकला को क्लास ए श्रेणी की सुविधा देने की मांग भी ठुकरा दी। उन्हें चार साल जेल में आम कैदी की तरह काटने पडेंगे। दस साल तक  शशिकला चुनाव नहीं लड सकती मगर इसके बाद वे फिर विधायकों के समर्थन से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो सकती हैं। जेल जाने से पहले  शशिकला ने इस बात के पुख्ता प्रबंध किए कि पार्टी और सरकार पर उनकी मजबूत पकड बनी रहे। अपने वफादार पलनीसामी को मुख्यमंत्री बनाने के साथ-साथ शशिकला ने अपने दो  रिश्तेदारों  को एआईएडीएमके का पदाधिकारी नियुक्त किया। इनमेंसे एक को पार्टी का डिप्टी जनरल सैक्टरी नियुक्त किया है। वे वही  शख्स हैं जिन्हें 2011 में जयललिता ने पार्टी से ही निकाल दिया था।  पलनीसामी मुख्यमंत्री तो होंगे मगर पार्टी की शशिकला बॉस बनी रहेंगी  और  रिश्तेदार उनके बाद पार्टी के अगले बॉस होंगे। इससे साफ है कि  शशिकला  जेल से रिमोट कंट्रोल के जरिए पार्टी और सरकार चलाएंगी। मुख्यमंत्री पलनीसामी को अपना कोई ठोस जनाधार नहीं है। वे 1996 और 2006 में दो बार विधानसभा और एक बार 2004 में लोकसभा का चुनाव हार चुके है मगर जयललिता और शशिकला के वफादार रहे हैं। उनकी वफादारी का प्रमाण इस बात से मिलता है कि 2011 और 2016 के बीच जयललिता ने कई मंत्रियों को हटाया मगर पलनीसामी बने रहे। उन पर कई बार  करप्शन  के आरोप लग चुके हैं और हर बार शशिकला ने उन्हें मुसीबत से उभरा है। मगर शशिकला के लिए जेल से पार्टी और सरकार को चलना इतना आसान नहीं होगा। पनीरसेल्वम के अलावा उनके  उनके प्रमुख प्रतिद्धंद्धी उनके कैंप में लगातार सेंध लगाने की कोशिश करते रहेंगे। पनीरसेल्वम की तरफ से वरिष्ठ  नेता सांसद वी मैत्रेयन ने वीरवार को निर्वाचन आयोग से  शिकायत की है कि शशिकला को पार्टी के संविधान अनुसार जनरल सैक्टरी नहीं चुना गया है। पार्टी संविधान के अनुसार जनरल सैक्टरी को प्राथमिक सदस्यों द्वारा चुना जाना चाहिए। शशिकला को जनरल काउंसिल ने चुना है। पनीरसेल्वम कैंप  शशिकला को चौतरफा घेरना चाहते हैं। तथापि जमीनी सच्चाई यह है कि  पनीरसेल्वम और उनके समर्थक  पार्टी से बाहर रह कर  ज्यादा देर तक टिक नहीं सकते। पार्टी के भीतर रहकर, वे ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। एआईएडीएमके को सता में बनाए रखने और प्रतिद्धंद्धी द्रमुक से मुकाबला करने के लिए जयललिता सरीखी नेता की जरुरत है। यही बात शशिकला के पक्ष में जाती है। संभावना यही है कि देर-सबेर पनीरसेल्वम और उनके समर्थक पार्टी में लौट आएंगे।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

Indian Space Scientists' Unprecedented Milestone

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेषन- इसरो) ने एक साथ 104 सैटेलाइटस का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण (लांच) कर नया इतिहास रचा है। बुधवार को इसरो ने आंध्र प्रदेश  के श्रीहरिकोटा से एक साथ 104 सैटेलाइटस लांच करके नया विश्व  रिकार्ड भी बनाया है। 18 मिनट के अंतराल में सभी 104 सैटेलाइटस को प्रक्षेपित कर लिया ग्या। अब तक एक साथ 37 सैटेलाइटस छोडने का रिकार्ड रुस के नाम था। रुस ने 2014 में यह कीर्तिमान स्थापित किया था। इससे पहले इसरो ने 2016 में एक साथ अंतरिक्ष में 20 सैटेलाइटस भेजे थे। इन 104 सैटलाइटस में केवल 3 भारत के हैं । बाकी 101 अमेरिका, स्विटजरलैंड इसराइल, नीदरलैंड और कजाख्स्तान के हैं। 96 सैटेलाइट्स अकेले अमेरिका के हैं। बाकी देशों  की एक-एक।  भारत के तीन सैटेलाइटस में एक का वजन 760 किलोग्राम और अन्य दो का 19-19 किलोग्राम था। भारतीय मिशन के पास अपने तीन सैटेलाइटस के अलावा 600 किलोग्राम और क्षमता थी। इसीलिए, इसरो ने अन्य देशों  के सैटेलाइटस भेजने का निर्णय लिया। इससे भारत को लगभग 100 करोड रु की आय हुई है। इस तरह मिशन का आधा खर्चा  विदेशी  सैटेलाइटस को भेजने से पूरा हो गया है। अंतरिक्ष स्पेस मिशन ऐसा क्षेत्र है, जिसमें भारत विकसित देशों  से भी  आगे है और अमरिका भी उसका लोहा मानता है। बुधवार को अमेरिका और इसराइल के सैटेलाइटस भेजकर इसरो ने न केवल रिकॉर्ड  बनाया, अलबत्ता सैटेलाइटस प्रक्षपेण बाजार में अपना सिक्का भी जमाया है। अब तक भारत अंतरिक्ष में 29 देशों  के 79 सैटेलाइटस प्रपेक्षित कर चुका है। इसमें गूगल और एयरबेस जैसी विशाल कंपनियो के सैटेलाइट भी  शामिल है। इससे पता चलता है कि पूरी दुनिया सैटेलाइट प्रक्षपेण में भारत पर कितना भरोसा करती  है। सैटेलाइट प्रक्षेपण में कम लागत की वजह से भारत इस क्षेत्र में बडा प्लेयर बनकर उभरा है। अमेरिका की तुलना में भारत से सैटेलाइटस भेजने का खर्च 60 फीसदी तक कम है।   भारत मात्र एक-तिहाई खर्च पर किसी भी सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजने में सक्षम है। इसलिए, सैटेलाइट प्रक्षेपण के लिए भारत पहली पसंद है। भारत में लेबर सस्ती है, इसलिए लागत भी कम है। तथापि अंतरराष्ट्रीय  सैटेलाइट प्रक्षेपण बाजार में छोटे उपग्रहो का बहुत कम हिस्सा है। भारत को अगर इस बाजार  से कमाई करनी है तो उसे बडे सैटेलाइटस को प्रक्षेपित करने की क्षमता बढानी होगी।  इस मामले में चीन हमसे कहीं आगे है। भारत के पास इस समय केवल 5 सैटेलाइटस लांच करने की क्षमता है। चीन के पास 20 मिशन लांच करने की क्षमता है। भारत की तुलना में चीन अंतरिक्ष अभियान पर 250 फीसदी ज्यादा खर्च कर रहा है। बहरहाल, सीमित बजट और क्षमता के बावजूद भारत और चीन में कडा मुकाबला है और भारत छोटे उपग्रह लांच करने में चीन से आगे है। साधनों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1981 में भारतीय अंतरिक्ष साइंस संस्था को अपनी छठी सैटेलाइट एपल को पैलोड तक बैलगाडी  मे ले जाना पडा था। इससे पहले कम लागत में मंगल ग्रह पर “मंगलयान“ की सफल कामयाबी पर भी भारतीय वैज्ञानिक नासा में अपना लोहा मनवा चुके हैं। मंगलयान पर भारत ने मात्र 450 करोड रु खर्च  किए थे जबकि अमेरिका के मैवन पर ही इससे दस गुना ज्यादा खर्च  हुआ था। सबसे बडी उपलब्धि यह है कि मंगलयान एक ही प्रयास में मंगल पर सफलतापूर्वक पहुंच गया था। अमेरिका की नासा भी यह कीर्तिमान स्थापित नहीं कर पाया है। मंगल के बाद अब इसरो सूरज, षुक्र और जुपिटर पर भी अपनी उपस्थिति दर्ज  करने की तैयारी में है। इसरो मंगल और चंद्रमा (मून) पर फिर से उपग्रह भेज रहा है। एक साथ 104 सैटेलाइटस सफलतापूर्वक प्रक्षेपित करने के लिए  देशवासियों को भारतीय वैज्ञानिकों की इस उल्लेखनीय  उपलब्धि पर गर्व है और उन्हें कोटि-कोटि नमन करते हैं।

बुधवार, 15 फ़रवरी 2017

A lesson To Munnabhais

प्रोफेशनल कोर्सों  के आखिले  में भारी गोलमाल के लिए लंबे समय से देश भर में चर्चित व्यापामं (मध्य प्रदेश  व्यावसायिक परीक्षा मंडल) स्कैम में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से “मुन्नाभाईयों“ को सबक मिल जाना चाहिए। इस फैसले ने स्पष्ट  जता दिया है कि कानून की आंखों में धूल झोॅककर और धन-बल से डिग्रियां नहीं ली जा सकती। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश  में एमबीबीएस कर रहे 634 छात्रों के दाखिले ही रदद कर दिए। 2008 से 2012 के दौरान मध्य प्रदेश  के विभिन्न मेडिकल कालेजों में नकल करके दाखिला लेकर एमबीबीएस कर रहे 634 छात्रों को अब डिग्री नहीं मिलेगी। इन छात्रों मेंसे लगभग 200 छात्र एमबीबीएस कर चुके चुके हैं और कुछ इंटर्नशिप कर रहे हैं।  सुप्रीम कोर्ट ने  टिप्पणी की है कि पहली कक्षा के बच्चे को भी नकल करने का अंजाम समझ में आता है। फिर प्रोफेशनल कोर्स में दाखिला लेने वाले  इस अंजाम से नादान थे, इस पर  विश्वास  नहीं होता। अदालत का कहना था कि सभी आरोपी छात्रों को अच्छी तरह पता था कि मैरिट पर इन्हें दाखिला नहीं  मिलेगा, इसलिए इन्होंने नकल का सहारा लिया। मध्य प्रदेश  सरकार ने एमबीबीएस और  इंजीनियरिंग  जैसे व्यावसायिक कोर्सों में दाखिले और सरकारी नौकरियों मे इनकी भर्ती  के लिए मध्य प्रदेश  व्यवसायिक परीक्षा मंडल गठित कर रखा है। मध्य प्रदेश  में  व्यावसायिक कोर्सों के सभी दाखिले और भर्तियां व्यापमं के माध्यम से ही की जाती हैं। 2013 मे खुलासा हुआ था कि व्यापमं द्वारा ली जा रही मेडिकल परीक्षा में बडे पैमाने पर नकल करवाई जा रही है। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा था। जांच पर 2008 से 2013 के बीच 634 छात्रों को नकल करके दाखिला लेने के लिए दोषी  पाया गया। व्यापमं की परीक्षाओ और भर्ती  में नकल और धांधलियों के आरोप 1990 से ही लग रहे थे। 2000 में इस मामले में पहली प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज भी की गई मगर इसके बावजूद सरकार नही जागी। 2007-08 की ऑडिट रिपोर्टे में व्यापमं में व्याप्त धांधलियों का पहली बार पता चला। इंदौर के एक एक्टिविस्ट ने जनहित याचिका में मामले की जांच की मांग की। इस पर सरकार ने जांच कमेटी गठित की। जाच हुई और धांधलियों का खुलासा हुआ। 2013 में इंदौर पुलिस द्वारा 20 लोगों की गिरफ्तारी पर इस घोटाले का भांडा फूटा। पकडे गए इन लोगों ने पुलिस को बताया कि 2009 की व्यापमं परीक्षा  में इन्होंने मूल परीक्षार्थियों की जगह परीक्षा दी थी। इसके बाद गिरोह का सरगना पकड गया। पूछताछ में पूर्व शिक्षा मंत्री समेत कई सियासी नेताओं, नीकरशाहों और व्यापमं के कर्मचारियों की मिलीभगत से चल रहे परीक्षा घोटाले का अनावरण हुआ। भारी-भरकम रकम लेकर ऐसे नकली परीक्षार्थी तैयार किए जाते, जो पहले व्यापमं अथवा अन्य परीक्षा उर्तीण कर  चुके होते । व्यापमं के  भ्रष्ट   कर्मचारियों की मदद से एडमिट कार्ड  के फोटो तक बदल दिए जाते। पैसे लेकर परीक्षा में जमकर नकल करवाई जाती। जांच में पता चला कि व्यापम की पूरी परीक्षा व्यवस्था में भारी गोलमाल किया जा रहा था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इस घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपी। सीबीआई ने अपनी रिपोर्ट में व्यापक स्तर पर परीक्षा घोटाले की  पुष्टि  की। व्यापमं  मामले से जुडे 40 लोगों की अब तक मौत हो चुकी है। आरोप है कि इनमें काफी वे लोग हैं, जो इस घोटाले के गवाह थे। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी छात्रों की माफी की तमाम दलीलें दर किनारे करते हुए कहा है कि  उच्च चरित्र और सुदृढ नैतिक मूल्यों से ही मजबूत  राष्ट्र  का निर्माण किया जा सकता है, मुन्न्नाबाईयों से नहीं। अभी भी देश  की मेडिकल  शिक्षा में भारी खोट है। व्यावसयिक सिक्षा का व्यापारीकरण करके सरकार ने निजी मेडिकल कॉलेजों को “मुनाभाई“ तैयार करने की खुली छूट दे रखी है। केपिटेशन फीस देकर मेडिकल अथवा व्यावसायिक कालेजों में दखिला लेना भी व्यापमं घोटाले जैसा ही है। व्यापमं स्कैम ने परीक्षा लेने वाली सरकारी संस्थाओं की  विश्वसनीयता  पर भी सवाल खडा किया है। नकल से दाखिले करवाने वाली परीक्षा संस्थाओं पर कौन  भरोसा  करेगा?

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

Tamil Nadu Crisis Must End

तमिल नाडु में व्याप्त सियासी संकट अब खत्म हो जाना चाहिए। छह फरवरी को मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम और उनके मंत्रिमंडल के इस्तीफे के बाद पार्टी की महामंत्री को विधायक दल के नेता चुने जाने से  शशिकला के शपथ ग्रहण को टाले जाने से राज्य में  अनिश्चतिता  व्याप्त है। राज्यपाल, आय से अधिक संपत्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले आने के बाद ही मुख्यमंत्री की  शपथ को लेकर  कोई फैसला लेना चाहते हैं। संवैधानिक तौर पर राज्यपाल का यह फैसला एकदम सही है। मंगलवार  को सुप्रीम कोर्ट  द्धारा   शशिकला  को आय के ज्ञात स्त्रोतों  से अधिक संपत्ति जोडने के मामले में  सजा सुनाए जाने से उनका सफर यहीं  खत्म  हो गया  है ।  शशिकला ए.बी.ए. दस साल तक  चुनाव नहीं लड़ सकती है ।   उन्हें चार साल जेल में रहना पडेगा।   पिछले साल जून से सुप्रीम कोर्ट  में फैसला सुरक्षित है।  शाशिकला इस मामले में  पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के साथ प्रमुख आरोपी है। सितंबर, 2014 में बंगलुरु की विषेश अदालत ने इसी मामले में जयललिता,  शशिकला और उनके दो  रिश्तेदार  को चार-चार साल की कैद और 100 करोड रु के जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस मामले में जयललिता और  शशिकला जेल में भी रहना पडा था। तब अपनी जगह  अम्मा ने पन्नीरसेल्वम को मुख्यमंत्री बनाया था। जून 2015 में कर्नाटक हाई कोर्ट  ने जयललिता और शशिकला समेत सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। हाई कोर्ट के इस फैसले को कर्नाटक सरकार, द्रमुक और भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। शशिकला के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करने वाले कार्यवाहक मुख्यमंत्री  पन्नीरसेल्वम की सारी उम्मीदें भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिकी हुई  थी । इस समय एआईएडीएमके के अधिकांष विधायकों का समर्थन  शशिकला  के साथ है हालांकि एक-दुक्के पन्नीरसेल्वम के पक्ष में मगर पार्टी के अधिकांष कर्यकर्ता  शशिकला के खिलाफ हैं। सोमवार को  शशिकला ने फिर अपनी ताकत दिखाई और बागी पन्नीरसेल्वम पर तंज कसते हुए कहा“ हमने पन्नीरसेल्वम जैसे हजार देखें हैं, मैं डरती नहीं हूं“। सोमवार को ही पुलिस ने मद्रास हाई कोर्ट (हाई कोर्ट का नामकरण नहीं बदला है) को सूचित किया कि शशिकला ने किसी भी विधायक को नजरबंद नहीं कर रखा है। सभी अपनी मर्जी से रिसॉर्ट में ठहरे हुए हैं। पन्नीरसेल्वम ने ही हाई कोर्ट में विधायकों को  शशिकला की कैद से मुक्त कराने की याचिका दायर की थी। बहरहाल, शशिकला को जयललिता की “राजनीतिक विरासत“ संभालने से रोकने में  पन्नीरसेल्वम  समर्थ  नहीं लग रहे हैं। तीन बार मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के बावजूद पनीरसेल्बम अपना राजनीतिक कद नहीं बढा पाए। जयाललिता के रह्ते ऐसा करना संभव ही नहीं था।  234 सदस्यीय विधानसभा में एआईएडीएमके के 129 विधायक  शशिकला के साथ हैं। सोमवार को शशिकला ने इन सब विधायकों को पत्रकारों के समक्ष पेश  भी किया। बहरहाल, यह बात हैरतअंगेज है कि स्वेच्छा से मुख्यमंत्री पद त्यागने और विधायक दल की बैठक में स्वंय  शशिकला का नाम प्रस्तावित करने के बाद अचानक पन्नीरसेल्वम ने पलटी क्यों मारी? जाहिर है इसके पीछे कोई बडी ताकत है। दक्षिण भारत में पन्नीरसेवम के माध्यम से एक और राज्य पर अपना भगवा झंडा गाडने का  केन्द्र में सतारूढ भाजपा को सुनहरा मौका हाथ लगा है। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि  सुप्रीम कोर्ट का फैसला  शशिकला के खिलाफ जाने के बावजूद पन्नीरसेल्वम का पलडा भारी नहीं पड सकता। विधायक पन्नीरसेल्वम के पक्ष में पलटी मारेंगें, इसकी उम्मीद कम है। शशिकला आसानी से हार मानने वाली नहीं है। एआईएमडीएमके में व्यक्तिगत  निष्ठा  और अवसरवादिता को ज्तादा महत्व है। अगर खुद मुख्यमंत्री नही बन सकती, वे जयललिता की तरह अपने पार्टी के किसी वफादार को अपना उतराधिकारी चुन सकती हैं। पार्टी के विधायकों पर उनकी मजबूत पकड है और बागी पन्नीरसेल्वम को कद छोटा करने मे  शशिकला कोई कसर नहीं छोडेंगी।  सुप्रीम कोर्ट का फैसला आते ही  शशिकला  ने बिना समय गवाएं  अपना उत्तराधिकारी चुन लिया।  सपुरमे कूट के फैसले के बाद भी  तमिल नाडु में राजनीतिक उथल-पुथल जारी रह सकती है।  

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

Political Slugfest Undermining Indian Democracy

 समकालीन सियासी नेता  अभद्र और अमर्यादित छींटाकशी  को विरोधियों पर आक्रमण करने का अचूक अस्त्र मानते हैं, भले ही इससे पद अथवा संस्था की गरिमा को गहरी चोट पहुंचे। एलडर हाउस राज्यसभा में पूर्व  प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन को लेकर  प्रधानमंत्री  की टिप्पणी से कांग्रेस आग-बबूला है। बुधवार को राज्यसभा में  राष्ट्रपति  के अभिभाषण पर चर्चा  के जवाब में  प्रधानमंत्री ने मनमोहन सिंह पर जब “बाथरुम में  रेनकोट में नहाने की कला में माहिर है“ तंज कसा, सदन में खासा हंगामा बरपा। हालात इस कद्र बिगड गए कि सभापति को उठकर जाना पडा। वीरवार को भी कांग्रेस ने सदन के भीतर और बाहर खूब हंगामा किया। सबसे दुखद स्थिति सभापति उप-राष्ट्रपति  हमीद अंसारी पर पक्ष और विपक्ष द्धारा  पक्षपात के आरोप लगाने से पैदा हुई। सत्ता पक्ष का आरोप था कि उनके (हमीद अंसारी) रहते सदन का माहौल नकारात्मक बना हुआ है। यह बेहद गंभीर आरोप है और इससे उप राष्ट्रपति  (राज्यसभा सभापति) का आहत होना स्वभाविक है। विपक्ष ने भी उन पर पक्षपात का आरोप लगाया। सभापति पर पक्ष और विपक्ष के इन आरोपों से एलडर हाउस की गरिमा कम हुई है। राज्यसभा ही नहीं नेताओं के अभद्र और अप्रिय बयानों से प्रधानमंत्री और अन्य शीर्ष  पदों की गरिमा को भी चोट पहुंची है और इससे लोकतंत्र ही कमजोर हो रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हों अथवा नरेन्द्र मोदी, वह किसी पार्टी विशेष  का नहीं, पूरे देश  का होता है । भारत में प्रधानमंत्री पूरे बहुमत से जनता द्धारा  चुना जाता है और उनका अपमान पूरे देश  का अपमान है। डाक्टर मनमोहन सिंह बेहद शालीन, भद्र और प्रबुद्ध सियासी नेता हैं। बतौर प्रधानमंत्री उनकी कार्यशैली में न तो किसी तरह की उग्रता थी और न ही कोई अहं। उन्होंने कभी भी पद की गरिमा और स्थापित मर्यादाओं की सीमा नहीं लांघी। इसीलिए कांग्रेस उनको लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनषील है। मगर सवाल यह है कि प्रधानमंत्री ने डाक्टर मनमोहन सिंह पर ऐसी कौनसी अभद्र टिप्पणी कर दी जो कांग्रेस को बुरी तरह से चुभ गई। “बाथरुम में रेनकोट की कला“ को किसी भी तरह से अभद्र  शब्दावली नहीं माना जा सकता। दरअसल, इसमें छिपे तंज ने कांग्रेस को कहीं ज्यादा आहत किया है। काग्रेस को संप्रग सरकार  के समय में हुए घोटालों का दंश  आज भी सता रहा है। लोकतंत्र में अपने विरोधियों पर  शालीनता से आक्रमण करने की छूट होती है। राहुल गांधी समेत कांग्रेस नेता प्रधानमंत्री मोदी पर कई बार अभद्र  टिप्णियां  कर चुके हैं। राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर “खुन की दलाली“ जैसे संगीन आरोप लगा चुके हैं। देश  का बच्चा-बच्चा यह बात कहेगा कि प्रधानमंत्री के लिए  इस तरह की  शब्दावली का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। टवीटर पर राहुल की इस  शब्दावली की लोगों ने कडी भर्त्सना की थी और “राहुल ग्रो  अप“ का सुझाव दिया था।  तथापि प्रधानमंत्री और कुछ शीर्ष नेताओं  को छोडकर भाजपाई बदजुबानी और असहिष्णुता  के लिए जाने जाते हैं। इसी कारण भाजपाइयों के बयान से विपक्ष जरुरत से ज्यादा जल-भुन जाता है। चुनाव के समय तो भाजपाइयों की जुबानी और ज्यादा फिसल जाती है।  शुक्रवार को प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश  के बिजनौर की चुनाव रैली में फिर राहुल गांधी पर तंज कसते हुए कहा, “कांग्रेस के एक नेता (राहुल गांधी की ओर इशारा) की बचकानी हरकतों को लेकर  गूगल  पर इतने चुटकलें हैं कि  शायद ही किसी अन्य सियासी नेता पर इतने चुटकलें होंगे़। वे ऐसी हरकतें करते हैं कि कांग्रेस नेता भी उनसे दस फीट की दूरी पर रहना पसंद करते हैं“। कांग्रेस इस बयान पर भी भडक सकती है मगर इस तरह की तंज भरी  शब्दावली अभद्र और मर्यादाहीन नहीं कही जा सकती। बहरहाल, लोकतंत्र मूल्यों एवं स्वस्थ परंपराओं के निर्वहन से फलता-फूलता है। स्वस्थ मूल्यों, मर्यादाओं और परंपराओं की सीमाओ को  स्पष्टतय  परिभाषित  नहीं किया जा सकता। सियासी पार्टियों और राजनेताओं को स्वंय इन मर्यादाओ और परंपराओं की सीमाओं  को तय और परिस्थापित करना होगा।

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

Just Six Days Jail for 59 Killing Like Sprinkling Salt On Wounds

भारतीय इतिहास के सबसे भीशणतम उपहार सिनेमा अग्निकांड के मामले में 20 साल बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला पीडित परिवारों के घावों पर नमक छिडकने जैसा है। दिल्ली के मशहूर ग्रीन पार्क स्थित अंसल बंधुओं के उपहार सिनेमा के बाहर बार्डर फिल्म का आधा जला हुआ पोस्टर, मृतकों के जूते-चप्पल और बैग आज भी इस हादसे के गवाह हैं। 1997 में जब यह हादसा हुआ, तब उपहार सिनेमा में “बार्डर“ फिल्म दिखाई जा रही थी। सुप्रीम  कोर्ट ने 59 लोगों की मौत के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार अंसल बंधुओं को एक-एक साल की सजा सुनाई है। यानी हर मौत के लिए सिर्फ छह दिन की सजा। छोटे भाई गोपाल अंसल चार महीने की सजा पहले ही काट चुके हैं, इसलिए अब उन्हें आठ माह ही जेल में रहना पडेगा। 77 वर्षीय  सुशील  अंसल की वृद्धावस्था का ख्याल करते हुए उन्हें कोई सजा नही दी गई है। वे पहले ही एक साल की सजा काट चुके हैं, इसलिए इसे ध्यान में रखा गया है। करीब 20 साल पहले 13 जून, 1997 को राजधानी दिल्ली के नामी ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में भीषण आग लगने से 59 लोग मारे गए थे और भगदड में 103 घायल हो गए थे। उपहार सिनेमा  अग्निकांड में न्यायपालिका की अलग-अलग फैसले आए हैं। अदालत ने उपहार अग्निकांड के मृतकों के परिजनों को लगभग 40 करोड रु का मुआवजा दिया था। भारत में सिविल मुआवजे के इतिहास में अदालत के इस फैसले को मीलपत्थर माना गया है। निचली अदालत ने अंसल बंधुओं को दो-दो साल की सजा सुनाई  थी। बाद में दिल्ली हाई कोर्ट ने सजा को घटाकर एक साल कर दिया। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले पर मुहर लगाते हुए सजा को आगे बढाने की बजाय अंसल बंधुओं पर 30-30 करोड रु का जुर्माना लगाया। उपहार सिनेमा अग्निकांड को लेकर सीबीआई, लॉ कमीशन, नरेश  कुमार कमेटी, दिल्ली अग्निशमन विभाग और डिप्टी कमिशनर आँफ पुलिस (डीसीपी) की अलग-अलग रिपोर्टस का निकर्ष   था कि उपहार सिमेमाघर में सुरक्षा को लेकर भारी चूक हुई थी। हादसे के समय सिनेमा घर में एमरजेंसी, फुट और एक्जिट  लाइटस तक नहीं थी जबकि नियमानुसार ऐसा करना अनिवार्य  था। पब्लिक एनाउंसमेंट सिस्टम तक नही था, इस कारण आग लगने के बारे सिनेमा देख रहे लोगों को सूचित तक नहीं किया जा सका।  उपहार सिनेमाघर प्रबंधन  द्धारा  अवैध एक्सटेंशन किए जाने और अतिरिक्त सीटें लगाए जाने से बाहर जाने के मुक्त रास्ते तक बंद हो चुके थे। हद इस बात की थी कि बाहर जाने के बचे दोनों रास्तों पर भी  ताले जडे हुए थे। सिनेमाघर का जो स्पेस खुला रखा जाना था, वहां दुकानें खोल रखीं थी। डीवीए ट्रांसफोर्म को अवैध रुप से लगाया गया था और सुरक्षा के कोई उपाय नहीं थे। इन सब कारणों से ही सिनेमाघर में 59 लोगों को घुट-घुट कर मरना पडा और इसके लिए सिनेमा मालिक अंसल बंधु जिम्मेदार थे। देश  में कायदे-कानून का सरेआम उल्लघंन करना और इन्हें तोडना-मरोडना रसूखदारों के  बाएं  हाथ का खेल है। उपहार सिनेमा अग्निकांड मामले की सुनवाई के दौरान अदालत से दस्तावेज तक गायब कर दिए गए। 2003 में इस मामले के सरकारी वकील ने अदालत को बताया था कि चार्जशीट के साथ दायर महत्वपूर्ण दस्तावेज  अदालत के रिकार्ड से गायब हैं और कुछ दस्तावेंजों से छेडखानी करके उन्हें बेकार कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सोशल मीडिया में भी तीखी प्रतिकियाएं आई हैं। इस बात में दो राय नहीं है कि न्यायपालिका में अभी भी आम आदमी को नैसर्गिक न्याय मिलना आसान नहीं है। साक्ष्यों और  प्रॉसिक्यूशन  पर निर्भर भारतीय न्यायिक व्यवस्था न केवल समय खपाऊ और महंगी है, अलबत्ता साधन संपन्न तबकों के पक्ष में है। साक्ष्यों को बरगलाना अथवा खरीद कर अपने पक्ष में कर लेना और  दुर्बल प्रॉसिक्यूशन आधारित   न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। इस व्यवस्था में आम आदमी के लिए बहुत कम स्पेस है।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

आम आदमी को निराषा

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने बुधवार को ब्याज को सस्ता न करके आम आदमी को निराश  किया है। नोटबंदी के बाद मंदी से पीडित अर्थव्यवस्था को उभारने के लिए मांग को लिफ्ट करना अपरिहार्य है और इसके लिए कर्ज को सस्ता करने की दरकार थी। ताजा मौद्रिक नीति की घोषणा से पहले इंटरनेशनल  एजेंसियों के सर्वेक्षणों में अधिकांश  अर्थशास्त्री  ब्याज  दरों  में 0.25 फीसदी  कटौती की उम्मीद कर रहे थे। ब्याज दरों में  0.25 फीसदी की कटौती से देश  में कर्ज  छह साल के न्यूनतम स्तर पर आ जाता और बाजार में अतिरिक्त नगदी आने से मांग उठती।  अभी बेंचमार्क रेपो रेट 6.25 फीसदी है और आरबीआई ने दूसरी बार ब्याज दरों को यथावत रखा है। आरबीआई का अपना आकलन है कि चालू वित्तीय साल मे ग्रॉसं वैल्यू एडेड ग्रोथ (जीएवी) 7.1 फीसदी से घटकर 6.9 फीसदी ही रहेगी और यह और नीचे भी गिर सकती है। इसके बावजूद आरबीआई को उम्मीद है कि अगले वित्तीय साल (2017-18) के दौरान  ग्रॉसं वैल्यू एडेड ग्रोथ में तेजी आएगी और जीएवी ग्रोथ 7.4 फीसदी के करीब रहेगी। ब्याज को यथावत रखने के लिए आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल ने  तीन कारण गिनाए हैं। पहला अहम कारण यह कि अंतरराष्ट्रीय  स्तर में भारी अनिशिचितता  व्याप्त है और तेल की कीमतों में भारी उथल-पुथल हो रही है। कमोडिटी के घटते-बढते दाम से मुद्रा-स्फीति का सही-सही आकलन नहीं किया जा सकता। पटेल ने तीसरा कारण यह गिनाया कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था और महंगाई पर सम्रग प्रभाव अभी देखा जाना बाकी है। इस पर आरबीआई पैनी नजर रख रही है। आरबीआई की मौद्रिक नीति राजनीतिक  चश्मे  से तय नहीं की जाती। मोदी सरकार ने ब्याज दरें तय करने के लिए छह सदस्यीय समिति बना रखी है। समिति ने सर्वसम्मति से ब्याज दरों को यथावत रखने का फैसला लिया। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री द्वारा सस्ते कर्ज की वकालत के बावजूद भी कर्ज  सस्ता नहीं किया जना आरबीआई की स्वायतता  दर्शाता  है हालांकि वित्त मंत्री ने बजटीय घाटे को तय सीमा में रखकर सस्ते कर्ज का मार्ग प्रशस्त किया है। आरबीआई इस सच्चाई से भी बखूबी परिचित है कि नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। नोटबंदी के कारण एक झटके में मोदी सरकार ने 87 फीसदी नगदी को सोख लिया और नकदी पर निर्भर अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। नतीजतन, चालू साल का ग्रोथ रेट 7.9 से गिरकर 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है। यह बहुत बडी गिरावट है और इसे रोकने के लिए अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढाने की जरुरत है। आरबीआई, लगता है अंतरराष्ट्रीय  घटनाओं से कुछ ज्यादा ही चिंतित है। निसंदेह, तेल की कीमते लगातार बढने से भारत में मुद्रा-स्फीति में अप्रत्याशित उछाल आ सकता है, मगर सरकार तेल की घरेलू कीमतों को नियंत्रित रख सकती है। तेल की कीमतें जब लगातार गिर रहीं थीं, सरकार ने फ्यूल पर कई बार एक्साइज डयूटी बढाकर जमकर कमाई की। तब यह कहा गया था कि अगर तेल कीमतें बढती हैं, तो सरकार एक्साइज डयूटी को कम करके मुद्रा स्फीति का आयात नहीं होने देगी। सरकार के पास अभी यह विकल्प है। आरबीआई माने या न माने मगर बाजार में, खासकर ग्रमीण क्षेत्रों में नगदी का अभी संकट बना हुआ है। रेपो रेट में मात्र 0.25 फीसदी कटौती से ही बाजार में बीस हजार करोड की अतिरिक्त नगदी आ जाती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने खुद इस बात की वकालत की थी कि ब्याज में 0.25 फीसदी कटौती से अर्थव्यवस्था को पर्याप्त नगदी मिल सकती है । बहरहाल, ब्याज दरें यथावत रखकर  आरबीआई ने मौद्रिक नीति में बदलाव के संकेत दिए हैं। अभी तक आरबीआई उदार  ब्याज दरों वाली (इंटरेस्ट इजिंग साइकल) नीति अपनाता रहा है मगर आगे से आरबीआई तट्स्थ नीति पर जोर देगा। इसका मतलब है कि आरबीआई  अर्थव्यवस्था  की दशा   और दिशा   देखकर मौद्रिक नीति तय करेगा। इस बार भी यही किया गया है।

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

Nailing Sahara Group

सुप्रीम कोर्ट ने गरीब और कमजोर तबकों के निवेशकों से पैसा लेकर उन्हें “बेसहारा“ करने के दोषी   सहारा  समूह  को फिर तगडा झटका दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट  ने सहारा की पुणे स्थित प्रतिष्ठित  एंबी वैली टाउनषिप को निवेशकों के 14,000 करोड रु समय पर जमा नहीं कराने के लिए जब्त कर लिया। एंबी वैली की मौजूदा मार्केट वैल्यू  39,000 करोड रु है। यह टाउनशिप  कोर्ट  के पास तब तक जब्त रहेगी, जब तक सहारा 14, 000 करोड रु की देनदारी के लिए इतने ही मूल्यों की अचल चल-अचल संपति की सूची अदालत में दाखिल नहीं कर लेता। इसके लिए कोर्ट  ने सहारा को दो सप्ताह का समय दिया है। अदालत ने यह भी  स्पष्ट  कर दिया कि सहारा को फुटकर पैसे देने की बजाए 14,000 करोड रु  एकमुश्त  जमा करने होंगे। सहारा अब तक 11,000 करोड रु अदालत में जमा करा चुका है। सहारा को 17,400 करोड रु के मूल धन के अलावा पूरी रकम (25,000 करोड से अधिक) पर 15 फीसदी ब्याज भी चुकाना है। सोमवार को सहारा द्वारा 600 करोड रु जमा कराने पर सहारा प्रमुख सुब्रत राय की पैरोल दो सप्ताह और बढा दी  गई है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख को देखते हुए सहारा को जल्द से जल्द  एकमुश्त 14,000 करोड रु जमा कराने होंगे, वरना अदालत उनकी एंबी वैली समेत अन्य चल-अचल संपति को कुर्क कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती की वजह से ही लगभग साढे तीन करोड गरीब और कमजोर तबको की गाढी खून-पसीने की कमाई की अदायगी की जा रही है। सहारा ने निवेशकों के पैसे दबाने में कोई कसर नहीं छोडी थी। कायदे-कानून में व्याप्त खामियों का भरपूर फायदा उठाया गया। पूंजी मार्केट को नियंत्रित करने वाली सेबी तक को धत्ता दिया गया। सुप्रीम कोर्ट को गुमराह करने की भी कोशिश  की गई। फर्जी दस्तावेज तैयार कर यह प्रमाणित करने का प्रयास  की गया  कि निवेशको का सारा पैसा लौटा दिया गया है। मगर देश  की  शीर्ष कोर्ट  और सेबी में  यह प्रमाणित नहीं किया जा सका। 14 फरवरी, 2014 को   अदालत ने सहारा प्रमुख सुब्रत राय को तिहाड जेल भेज दिया और दो साल तक उन्हें जेल में रहना पडा। मई, 2016 से सुब्रत राय पेरोल पर जेल से बाहर हैं। और अगर 27 फरवरी तक पूरी रकम अदा नहीं की गई, तो सहारा प्रमुख को फिर जेल जाना पड सकता है।  सहारा इंडिया रीयल इस्टेट एवं सहारा हाउसिंग ने ओसीएफडी (ऑप्शनल  फुली कंनवर्टीबल डेबेंचरस)  के मार्फत  गरीब और कमजोर तबकों के निवेशकों से 17 ,000 करोड रु से भी अधिक एकत्रित किए हैं। गरीब और कमजोर निवेशकों को पूंजी बाजार की कोई जानकारी नहीं होती है, इसलिए इन निवेशकों से लूट-खसोट करना आसान था। सहारा लिस्टिड कंपनी नहीं थी, इसलिए वह सेबी के दायरे से बाहर थी। तथापि ओसीएफडी पूंजी बाजार के दायरे में था, सेबी ने नवंबर, 2010 में सहारा प्रमुख सुब्रत राय और उनकी दोनों कंपनियों पर पब्लिक से धन जुटाने पर प्रतिबंध लगा दिया और सहारा द्वारा जारी  ओसीएफडी को अवैध बताया। अब तक सहारा की दोनों की कंपनियां 17,000 करोड रु से ज्यादा इकठ्ठा कर चुकी थी। जून 2011 मे सेबी ने सहारा को निवेशकों का 17,400 करोड फौरन लुटाने के निर्देश  दिए। अक्टूबर, 2011 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त सेबी एपलैट प्राधिकरण ने सहारा को निवेशकों के 17,400  करोड़  रु 15 फीसदी ब्याज के साथ लौटाने के आदेश   दिए। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और अगस्त 2012 को   अदालत ने सहारा को निवेशकों का 25,000 करोड रु ( ब्याज समेत ) फौरन लुटाने को कहा। तब से मामला सुप्रीम कोर्ट  में है और सहरा फुटकर  किश्तों  में निवेशकों का पैसा लौटा रहा है। सहारा प्रकरण देश  में बेहिसाब पांव  पसार रही गैर बैंकिग कंपनियों की लूट-खसोट का आइना है। दो दिन पहले नोएडा में पुलिस ने निवशकों से ऑनलाइन  3700 करोड रु लूटने के मामले का पर्दाफाश  हुआ है। इस मामले में प्रशासन और रेगुलेटर्स  को  काफी  पहले से पता था मगर कोई कार्रवाई नहीं की  गई। यही देश  का सबसे बडा दुर्भाग्य है।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

Rise Of Sasikala: Democracy Given A Severe Blow

ऐसा केवल भारत में ही हो सकता है और दक्षिण भारत के राज्य तमिल नाडु में तो सौ फीसदी हो सकता है। कभी चुनाव नहीं लडा, न कभी पंचायत या पार्षद  बनी और न ही कभी एमएलए अथवा एमपी। फिर भी शशिकला कला ( पूरा नाम विवेकानंदन किश्नावेनी  शशिकला) सीधे तमिल नाडु की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने जा रही है। रविवार को  एआईएडिएमके के विधायकों ने  शशिकला को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुना।  तीन बार के “स्टैंड बाई“ मुख्यमंत्री पनीरसेल्वम ने खुद उनका नाम प्रस्तावित किया। पूर्व  मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके लीडर जयललिता की सबसे विश्वास  पात्र  शशिकला को “चिनम्मा“ के नाम से जाना जाता है। “चिनम्या“ का अभिप्राय  होता है“ छोटी बहन“ और इसलिए पार्टी के विधायकों ने  शशिकला को अम्मा (जयललिता) की राजनीतिक विरासत का उत्तराधिकारी चुना है। विधायकों पर शशिकला की जबरदस्त पकड रही है क्योंकि टिकट बांटने में उनका बहुत बडा हाथ था। इसीलिए, अम्मा के निधन के तुरंत बाद से शशिकला को जयललिता का उत्तराधिकारी बनाने के लिए जमीन तैयार की जाने लग पडी थी। और इसमें शशिकला के पति एम नटराजन की बहुत बडी भूमिका है। नटराजन को तमिल नाडु का चाणक्य माना जाता है। नटराजन एआईएडीएमक केे तब प्रचार सचिव थे, जब एमजी रामचद्रन (एमजीआर) राज्य के मुख्यमंत्री थे। एमजीआर को जयललिता का मेंटर माना जाता है। नटराजन ने ही अपनी पत्नी शशिकला  की जयललिता से मुलाकात करवाई थी और पत्नी को जयललिता का करीबी बनाना उनकी “चाणक्य“ नीति का हिस्सा था। एमजीआर के निधन के बाद जब जयललिता पार्टी में जगह बनाने के लिए जूझ रही थी, उस समय नटराजन ने उनकी काफी मदद की थी। यह बात दीगर है कि बाद में जयललिता और नटराजन के रिश्तों  में दरार आ गई थी। जयललिता के निधन के बाद से पार्टी में एक तरह का खालीपन आ गया था। पार्टी को अम्मा जैसे चमत्कारी शख्सियत की जरुरत थे। पनीरसेल्वम इस फ्रेम में फिट नहीं हो रहे थे। पनीरसेल्वम के अलावा पार्टी में दूसरा कोई भी ऐसा नेता नहीं है, जब पार्टी को लीड कर सके। यही जमीनी स्थिति पार्टी को शशिकला की ओर ले गई अथवा ऐसे हालात तैयार किए गए। तथापि, सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा है कि अगर शशिकला इतनी काबिल थी, तो अम्मा ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी क्यों नहीं बनाया? शशिकला कभी पार्टी की सांसद अथवा एमएलए भी नही रही। इसके विपरीत 2011 में जयललिता ने शशिकला और उनके सभी नातों-रिश्तेदरों  को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाया था। यहां तक कि जया ने  शशिकला से गोद लिए पुत्र को भी बेदखल कर दिया था। तब जयाललिता का आरोप था कि शशिकला और उनके परिजनों ने उनके खिलाफ षंडयंत्र रचा है। एआईएडीएमके के अधिकांश  कार्यकर्ता शशिकला को अम्मा का उतराधिकारी चुने जाने पर खुश  नहीं है। कार्यकर्ता जयललिता की भतीजी दीपा जयकुमार को जयललिता का उत्तराधिकारी बनाने के पक्ष में है। पिछले साल सितंबर में जब जयललिता अस्पताल में भर्ती थी, तभी से पार्टी कार्यकर्ता दीपा के घर के बाहर तंबू गाडकर उन्हें राजनीति में उतरने की मांग कर रहे थे। हाल ही में दीपा ने राजनीति में प्रवेश  भी किया है और खुद को जयललिता का उतराधिकारी बताया है। इससे एआईएडीएमके के भीतर बगावत के सुर उठ सकते हैं। शशिकला  अम्मा नहीं बन सकती और न ही उनमें जयललिता जैसा स्पार्क है। तमिल नाडु में सिनेमा का राजनीति में जबरदस्त दखल रहा है। एमजीआर और जयललिता दोनों एक जमाने में तमिल सिनेमा के शीर्ष  कलाकर रहे हैं ओर इसी वजह उनकी लोगों में पकड भी थी। द्रमुक नेता और पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि भी तमिल सिनेमा से जुडे रहे हैं। शशिकला  सिनेमा से नहीं है। तमिल नाडु में शशिकला  भले ही जीत गई हों, मगर लोकतंत्र हार गया है।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2017

How Long Nation Suffer From Weak Prosecution

एयरसेल-मेक्सिस डील मामले में पूर्व केन्द्रीय संचार मंत्री दयानिधि मारन को अदालत   द्धारा  भ्रष्ट्राचर  के आरोपों से बरी किए जाने  से  सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय को  जबरदस्त झटका  लगा है। 743 करोड के इस घोटाले में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय के  सबूतों से अदालत संतुष्ट  नहीं थी। अदालत ने प्रर्याप्त सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। देश  की  शीर्ष  जांच एजेंसियां भी अगर आरोपियों के खिलाफ प्रर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाए, तो निचले स्तर से क्या उम्मीद की जा सकती है? दयानिधि मारन  न केवल रसूकदार सियासी परिवार से हैं, अलबत्ता साधन सपन्न भी है। मारन तमिल नाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एवं द्रमुक नेता करुणानिधि के पौत्र हैं। उनके पिता मुरासोली मारन भी द्रमुक के कददावर नेता थे। दयानिधि मारन के साथ, उनके भाई कलानिधि मारन और अन्य आरोपियों को भी बरी कर दिया है। कलानिधि मारन दक्षिण भारत के टीवी  चैनल “सन“ के मालिक है। दयानिधि मारन पर 2006 में 743 करोड रु के एयरसेल-मेक्सिस डील में कथित घूस लेने और मनीलांड्रिंग के आरोप थे।  इसके अलावा मारन पर अपने भाई सन टीवी को बीएसएनएल के 343 अवैध  कनेक्शन  देने के भी आरोप थे। 2जी स्पेक्ट्रम में करुणानिधि की बेटी सांसद कनिमोझी और पूर्व  संचार ए राजा को भी जेल हो चुकी है। दोनों पर अभी भी मुकदमा चल रहा है।  इस मामले में राजा को 15 महीने जेल में रहना पडा था। मारन बंधुओं के बरी होने से सीबीआई की जांच पडताल पर फिर सवालिया निषान लग गया है। भारत में प्रोसिक्यूशन मशीनरी इस कद्र निकम्मी, पक्षपाती और भ्रष्ट  हैं  कि अक्सर रसूकदार लोग सबूतों के अभाव में अदालत से छूट जाते हैं। 2जी स्कैम में सीबीआई के पूर्व  निदेशक रणजीत सिंहा की भूमिका भी संदिग्ध रही है। उन पर आरोप हैं कि सीबीआई निदेशक रहते हुए भी वे 2जी स्कैम के आरोपियों से अपने आवास  पर मुलाकात करते थे। पुलिस को उनके सरकारी आवास पर सुरक्षा कर्मियों की डायरी से  2जी स्कैम से जुडे लोगों की आवाजाही के सबूत मिले थे। सुप्रीम कोर्ट ने हालिया सीबीआई को इस मामले में अपने ही पूर्व  बॉस की जांच के आदेश  दिए हैं। इस प्रकरण से देश  की प्रॉसिक्युशन एजेंसिंयों की कार्यशैली का पता चलता है। सीबीआई  अदालत द्धारा  दयानिधि मारन और अन्य आरोपियों को बरी  किए जाने से अब इस बात की भी संभावना है कि कनिमोझी और ए राजा भी बरी हो जाएंगे। न्यायपालिका सबूतों पर अपने फैसले सुनाती है और सबूत एकत्र करना प्रोसिक्यूशन एजेसियों का काम है। देश  में प्रोसिक्यूशन एजेसियों में न केवल  भ्रष्टाचार  व्याप्त है, अलबत्ता वे सरकार के इशारे  पर अथवा राजनीतिक चश्मे  से जांच करती हैं। मारन ही नहीं, पिछले साल अक्टूबर में सीबीआई कोर्ट द्वारा कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को  40 करोड के घूसकांड मे क्लीन चिट दी गई थी। येदियुरप्पा  अब भाजपा के कर्नाटक प्रदेशाध्यक्ष हैं। इस मामले में भी प्रासिक्यूशन  येदियुरप्पा के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं जुटा पाया। सबूतों के अभाव में सियासी नेताओं के अदालत से बाइज्जत बरी होने के और भी कई मामले है। इशरत जहां फर्जी मुठभेड मामले में सीबीआई  भाजपा अध्यक्ष अमित  शाह को कलीन चिट दे चुकी है। अमित  शाह तब गुजरात के गृहमंत्री थे। महाराष्ट्र  की महिला एवं बाल कल्याण मंत्री पंकज मुंडे को दिसंबर 2016 में एंटी करप्शन  ब्यूरो (एसीबी) ने “चिक्की“ मामले में क्लीन चिट दी गई। पंकज मुंडे पर स्कूली बच्चों के वर्दी के 203 करोड  घोटाले में अनियमितताएं बरतने के आरोप थे। यह बात जगजाहिर है कि सरकार के अधीन काम कर रहा एसीबी अपने ही मंत्री के खिलाफ पुख्ता सबूत जुटाने की हिमाकत नहीं  कर सकता । देश  मे प्रासिक्यूशन  की यही त्रासदी है। एक तो “कंगाली, उस पर आटा गीला“।  करप्शन  में गले तक आकंठ पुलिस से  निष्पक्ष  जांच की उम्मीद नहीं की जा सकती। और जब तक प्रासिक्यूश न पर्याप्त एवं ठोस सबूत जुटाने के प्रति समर्पित नहीं हो जाता, रसूकदार आरोपी इसी  तरह अदालत से बरी होते रहेंगे।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

Save Punjab

पंजाब के बठिंडा जिले के मौड मंडी में  मंगलवार को कांग्रेस प्रत्याशी  की चुनाव जनसभा में  बम विस्फोट लंबे समय तक आतंक से पीडित रहे राज्य के लिए अशुभ संकेत है। इस  विस्फोट  में तीन बच्चों समेत 6 लोग मारे गए और 9 की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई है। विस्फोट में दो बमों का प्रयोग किया गया था। पुलिस के मुताबिक गनीमत है दूसरा बम पूरी तरह से फट नहीं पाया, वरना काफी ज्यादा लोग ह्ताहत हो सकते थे। पुलिस को मौके से मिले कुकर में छर्रेनुमा सामान मिला है। पुलिस के साथ-साथ चुनाव आयोग को भी पूरा विष्वास है कि यह आतंकी हमला था और मौके पर मिले प्रमाण इसी ओर इशारा करते हैं। कहते हैं “तूफान आने से पहले मरघट जैसी  शांति होती है“। चार फरवरी को होने वाले मतदान से मात्र चार दिन पहले कांग्रेस  प्रत्याशी  हरमंदर जस्सी की चुनावी सभा में आतंकी हमला आने वाले “तूफान” के  स्पष्ट  संकेत है। कांग्रेस प्रत्याशी  हरमंदर जस्सी को पहले जैड सिक्योरिटी मिली हुई है। जस्सी सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम इंसा के समधी हैं और डेरा-सिख विवाद के कारण उन्हें जैड सिक्योरिटी मिली हुई थी। इसमें एक वुलेट प्रूफ गाडी और 20 सुरक्षा कर्मी होते हैं। मगर जिस रोज उनकी जनसभा में आतंकी हमला हुआ, उससे कुछ समय पहले उनकी वुलेट प्रूफ गाडी खराब हो गई थी और उसे मरम्मत के लिए चंडीगढ भेजा गया था।     जस्सी का पूरा परिवार निशाने पर है। इस हमले के एक दिन बाद बुधवार को डेरा मुखी ने विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा को अपना समर्थन देने का ऐलान किया जबकि उनके समधी जस्सी कांग्रेस के प्रत्याशी  हैं। 2007 के विधानसभा चुनाव में सिरसा डेरा ने कांग्रेस का खुला समर्थन किया था। 2012 के चुनाव  में डेरा सच्चा सौदा किसी भी दल के समर्थन में खुलकर नहीं आया था । पंजाब में सिरसा डेरे के काफी समर्थक है। इसी बात के  दृष्टिगत  सभी दल डेरा मुखी से मिलकर उनसे समर्थन मांग चुके हैं। पिछले षुक्रवार 27 जनवरी को पंजाब प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष डेरा मुखी से मिले थे। बहरहाल, मौड मंडी हमले से सरकार और पुलिस प्रशासन को अत्याधिक चौकस रहने की जरुरत है।  वीरवार को चुनाव प्रचार  खत्म हो गया और प्रत्याशियों और उनके समर्थकों का पूरा जोर घर-घर जाकर वोट मांगने पर रहेगा। मतदान की पूर्व  संध्या पर मतदाताओं को लुभाने के लिए शराब और अन्य प्रलोभन बांटे जाते है़। चुनाव प्रचार के दौरान चुनाव आयोग लाखों पेट्ट्यिां शराब , हेरोइन और अन्य नशीले पर्दाथ  पकडे जा चुके हैं। भारी मात्रा में नकदी भी पकडी जा चुकी है। चुनाव के समय नशेडियों में नशी  की सप्लाई के कूपन तक बांटे जाते हैं। ये सब हथकंडे मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं।  नशा  पंजाब को बुरी तरह से खाए जा रहा है। आतंक के बाद पंजाब के सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था  पर सबसे घातक वार भी नशे  ने किया है। देश  की कुल नशीली पदार्थों की 60 फीसदी सप्लाई अकेले पंजाब में की जाती है। पंजाब के ग्रामीण चेत्रों का 70 फीसदी युवा नशे  की चपेट में है।  कैग की रिपोर्ट  में भी खुलासा किया गया था कि 2005 से 2011 के दौरान पांच सलों में  पंजाब  में शराब की खपत में 60 फीसदी का इजाफा हुआ था। नशे  ने लाखों परिवार को तबाही की कगार पर लाकर खडा कर दिया है। मौजूदा अकाली-भाजपा सरकार ने दस सालों में नशे  के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। यही स्थिति पंजाब के लिए सबसे बडा खतरा है। नशे  में डूबा व्यक्ति किसी भी हद तक जा सकता है। देशद्रोही ताकतें यही चाहती है। पंजाब को अगर बचाना है, तो  राज्य को नशे  से अविलंब मुक्ति दिलानी होगी। पंजाब का जनादेश  यही तय करेगा।

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017

ग्रोथ उन्मुख बजट

“क्लीन इंडिया, शाइन इंडिया“ वित्त मंत्री अरुण जेटली के इस साल के बजट का मूल मंत्र रहा है। नोटबंदी के प्रतिकूल असर को पाटने के लिए वित्तीय  वर्ष   2017-18 में वित्त मंत्री ने मांग को उठाने, बजट घाटे को बांध कर रखने और जनाकाक्षांओं को पूरा करने के हरसंभव प्रयास किए हैं। वित्त मंत्री के अनुसार बजट में अमेरिकी फेडरल नीति से घटते विदेशी  निवेश , प्रोटेक्शनिज़्म,  भारतीय कंपनियों को संभावित खतरा और तेल की बढ्ती कीमतों से दरपेश  चुनौतियों को सामने रखा गया है। 2017-18 में बजटीय घाटे को 3.2 फीसदी रख कर वित्त मंत्री ने कुशल वित्तीय प्रबंध का परिचय दिया है। मुद्रा स्फीति को नियंत्रित रखने के लिए यह जरुरी है। देश  के लाखों युवको को तुरंत रोजगार की दरकार है। नोटबंदी ने रोजगार के अवसरों को खासा संकुचित किया है।  वित्त मंत्री ने भले ही राज धर्मं का पालन करते हुए नोटबंदी की तारीफ की है, मगर बजट की “दिशा  और दशा ” साफ-साफ कहती है कि विमुद्रीकरण का अर्थव्य्वस्था पर बुरा असर पडा है। इसके लिए सार्वजनिक व्यय को ज्यादा से ज्यादा बढाने की अविलंब जरुरत थी। इसे समझते हुए वित मंत्री ने देश  में सडकों, हवाई अडडों और रेल लाइनों के नेटवर्क को सुदृढ और विस्तृत करने के लिए 59 खरब डॉलर के निवेश  का प्रस्ताव किया है। मनरेगा का बजट 38500 करोड रु से बढाकर 50,000 करोड रु किया गया है। इसके तहत 10 लाख तालाब बनाने का लक्ष्य रखा गया है। इतने भारी-भरकम निवेश  से  निश्चित  तौर पर रोजगार के अधिकाधिक अवसर सृजित होंगे। व्यवस्था को क्लीन करने के लिए मोदी सरकार के सतत प्रयास उसकी सबसे बडी उपलब्धि है। काले धन के खिलाफ मुहिम को जारी रखते हुए वित्त मंत्री ने तीन लाख रु से ज्यादा की नगदी के लेन-देन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है। इससे व्यवस्था को क्लीन करने और डिजिटल पेमेंट को प्रोत्साहित करने में मदद मिलेगी। राजनीतिक चंदे  पर भी लगाम लगाई  गई है।अर्थव्यवस्था से काला धन बाहर निकालना सरकार की प्राथमिकता है।  जो लोग अब तक नगदी देकर काली कमाई से प्रापॅर्टी और वाहन खरीदते रहे हैं, वे अब ऐसा नहीं कर पाएंगे। वित्त मंत्री ने इस बात का भी पूरा ख्याल रखा है कि चैक बाउंस की समय खपाऊ अदालती प्रकिया को और आसान् और सटीक बनाया जाए। कारोबारी चैक में पेमेंट करने से इसलिए गुुरेज करते हैं कि चैक बाउंस होने की स्थिति में उन्हें लंबी अदालती प्रकिया से गुजरना पडता है। कराधान का सिद्धांत है कि कर  प्रगतिशील होना चाहिए और “गरीब को राहत और अमीर पर आफत“ आयकर का मूलमंत्र होना चाहिए। कर दरों  को बढाने की बजाय, इसका दायरा बढाना ज्यादा कारगर होता है। इसी  सिद्धान्त  पर चलते हुए वित्त मंत्री ने आयकर में कुछ छूट दी है। तीन लाख रु सालाना तक की आय को आयकर से मुक्त रखा गया है। 5 लाख रु तक की आय पर कर 10 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी करके वित्त मंत्री ने कर दायरे  को बढाया है। इससे जो लोग आयकर चुकाने में आगे नहीं आते हैं, उन्हें मामूली सा आयकर देकर आगे आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। पिछले साल केवल 3.70 करोड ने आयकर रिटर्न भरा था। इनमेंसे मात्र 76 लाख ऐसे है, जिन्होंने अपमी आय 10 लाख से ज्यादा दिखाई है जबकि पिछले साल दो करोड भारतीय लाखों खर्च करके विदेशों  में सैर-सपाटे पर गए थे। 5 लाख तक कर घटाकर वित्त मंत्री को उम्मीद है कि मामूली सा कर (लगभग 2500 रु) चुका कर ज्यादा से ज्यादा लोग आयकर चुकाएंगें।  50 लाख से 1 करोड रु की आय वालों पर सरजार्ज  लगाया गया है। बजट में कुल मिलाकर  बीस हजार करोड रु की राहत दी गई है। बजट ग्रोथ उन्मुख है और वित्त मंत्री की यह शायरी “नई दुनिया हे, नया दौर है, नई है उमंग; कुछ थे पहले के तरीके, कुछ है आज के ढंग; रोशनी आके जब टकराई है, तो काले धन को बदलना पडा है अपना रंग“ इसका  निचोड है।ं
   

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

ट्रंप का पाक “ट्रंप कार्ड“

अमेरिका के नए  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप की एक घुडकी से पाकिस्तान सहम गया है। आनन-फानन में नवाज शरीफ सरकार ने 2008 के मुंबई नर संहार के साजिशकर्ता जमात-उद-दावा एवं लश्कर   प्रमुख हाफिज सईद को घर में नजरबंद कर दिया है। भारत के साथ-साथ अमेरिका भी सईद को मुंबई नरसंहार का मास्टरमाइंड मानता है और उस पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है। अमेरिका ने 2012 में छह नागरिकों की हत्या के लिए हाफिज सईद पर दस मिलियन डॉलर का इनाम घोषित  कर रखा है। आतंकी सईद और उनके आतंकी संगठनों पर प्रतिबंध लग भी जाता मगर चीन बार-बार संयुक्त राष्ट्र  संघ  में इस मामले में अडंगा अडाता रहा है। चीन को पाकिस्तान के साथ वहां के आतंकी संगठन भी प्रिय है। चीन भारत को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं चूकता है। तथापि, आतंक के खिलाफ पाकिस्तान को वैश्विक  लड़ाई  में  शामिल कराने के लिए राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के पास ऐसा “ट्रंप कार्ड“ है जिससे पाकिस्तान को  शांति के मार्ग पर चलने के सिवा कोई विकल्प नहीं रह जाएगा। यह आम धारणा है कि अगर अमेरिका को छींक भी आ जाए, तो पूरी दुनिया को जुकाम हो जाता है। और अगर राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप हो, तो कहने ही क्या। शपथ ग्रहण करते ही ट्रंप ने सात मुस्लिम देशों  के लोगों की अमेरिका में एंट्री पर रोक लगा दी । मेक्सिको के साथ लगती अमेरिकी सीमा पर दीवार खडी करने के आदेश  जारी कर दिए । चुनाव के दौरान दोनों ट्रंप के प्रमुख वायदे थे। इन फैसलों से पूरी दुनिया मे हडकंप मच गया है। बुद्धिजीवी, कलाकार, सियासी नेता और आम नागरिग सभी  ट्रंप के खिलाफ अमेरिका समेत पूरी दुनिया में जगह-जगह प्रदर्शन  कर रहे है। मंगलवार को अमेरिकी संसद के निचले सदन में एच1-बी वीजा होल्डर्स  का वेतन दोगुना करने संबंधी बिल पेश  होते ही भारत की पांच शीर्ष  कंपनियों के  शेयर मुंह  गिर गए और एक घंटे में इनकी  50,000 करोड रु की  मार्केट वैल्यू स्वाह हो गई।  ट्रंप अपने फैसलों पर अडिग हैं हालांकि ग्रीन कार्ड होल्डरों की मुक्त एंट्री पर प्रस्तावित प्रतिबंध लगाने के उनके फैसले को भारी विरोध के बाद व्हाइट हाउस को वापस लेना पडा था। सोमवार को व्हाइट हाउस ने चेताया था कि सात मुस्लिम मुल्को  की तर्ज पर  पाकिस्तानियों की अमेरिका में एंट्री पर विचार किया जा रहा है। पाकिस्तान के लिए उसके नागरिकों की अमेरिका में एंट्री प्रतिबंधित करना उसके लिए शर्म की बात होगी। यही राष्ट्रपति  का “ट्रंप कार्ड“ है। इसका तुरंत असर भी हुआ और दिन ढलते-ढलते नवाज सरकार ने हाफिज सईद को नजरबंद कर लिया। बहरहाल, आतंकी सईद को नजरबदी महज ड्रामा है।  ट्विटर पर यह प्रतिक्रिया “ हाफिज सईद को घर में नजरबंद किया गया है, यानी अब चिकन बिरयानी की होम डिलीवरी की जाएगी“, हाफिज सईद की नजरबंदी की प्रासंगिकता को दर्शाती  है।  मुंबई नरसंहार में 174 निर्दोष  लोगो के हत्यारे के लिए नजरबंदी सजा नहीं सम्मान है। पाकिस्तान में भी इसे नाटक ही बताया जा रहा है। हाफिज को लाहौर की उसी मस्जिद में नजरबंद रखा गया है, जहां से वह भारत के खिलाफ आतंकी वारदातों की साजिश  रचा करता है। जमात-उद-दावा एवं लश्कर  के सुरक्षा गार्डस बाहर पहरा दे रहे हैं। पुलिस का पहरा सिर्फ दिखावे को है। हाफिज इससे पहले भी समय-समय पर नजरबंद किया जा चुका है। दिसंबर, 2001 में भारतीय संसद पर हमले को लेकर भी सईद को हिरासत में लिया गया था मगर मार्च 2002 में रिहा कर दिया गया। इसके बाद अक्टूबर 2002 में फिर उसे नजरबंद रखा गया था। इसके बावजूद हाफिज सईद ने 2008 में मुंबई नर संहार की साजिश  रची। भारत सरकार भी हाफिज सईद की नजरबंदी को महज ड्रामा मान रही है। भारत यूएनएससी के नियम 1267 के तहत सभी आतंकी संगठनों, उनकी संपत्तियों और उनसे जुडे आतंकियों के खिलाफ सख्त  एक्शन  की मांग कर रहा है। आतंकी सरगने के खिलाफ नजरबंदी की कार्रवाई कोई सख्त  एक्शन  नहीं है।