शुक्रवार, 29 जून 2018

कमजोर रुपए की भूल-भुलैया

अमरीकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच  गया है। वीरवार , 28 जून 2018, को  रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले  69.10 तक चला  गया था। आरबीआई  के दखल से सत्र के बीच में इसमें थोडा सुधार आया और डॉलर के मुकाबले रुपया 68.95 के भाव पर टिका । इससे पहले 28 अगस्त 2013 को रुपया डॉलर के मुकाबले  68.80 का न्यूनतम स्तर छू चुका है। 24 नवंबर 2016 को एक डॉलर 68.86 रुपए के बराबर था। मई 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के समय रुपया डॉलर के मुकाबले 60 के आसपास था। फिलहाल, राहत की बात यह है कि सरकार के पास पर्याप्त मुद्रा है। 15 जून को सरकार का विदेशी  मुद्रा भंडार 410.07 अरब डॉलर था। बैंक और आयातकों की बढती डॉलर  मांग  अंतरराष्ट्रीय  बाजार में महंग  क्रूड  और मौजूदा व्यापार युद्ध से भारतीयमहंगी  रुपए पर ही नहीं, अधिकांश कर्रेंसीज़ पर दबाव पड रहा है। मंगलवार कौ आरबीआई  द्वारा  जारी  फाइनेंसियल  स्टैबिलिटी रिपोर्ट से भी बाजार फिसला है और इससे कमोडिटी मार्केट पर असर पडा है। इस रिपोर्ट  में कहा गया है कि सरकारी बैंकों की हालत और खराब हो सकती है और उनका एनपीए 13 फीसदी को भी पार कर सकता है।  डॉलर की तुलना में महंगे रुपए का सीधा असर विदेशों  में अध्ययन करने वाले छात्रों पर  पडता है। रुपया जितना महंगा   होगा  उनकी विदेशी  पढाई का खर्चा भी उतना ही बढेगा । इससे सबसे ज्यादा वे  छात्र प्रभावित होते हैं जो छात्रवृति अथवा लोन लेकर विदेश  पढने जाते हैं। रुप्ए की कमजोरी से विदेशी  यात्रा भी   होती  है। महंगे   डॉलर से  विदेशी  यात्रा पर जाने वाले  भारतीयों को खर्चा और ज्यादा बढ जाता है। इससे उन यात्रियों पर अतिरिक्त बौझ पडता है,  जिनका  बजट सीमित होता  है। सबसे बडा असर क्रूड  आयात पर पडता है। भारत तेल आयात करने वाला दुनिया का तीसरा बडा मुल्क है और इस मामले में वह चीन से भी आगे  निकल चुका है। इस साल जनवरी में भारत हर रोज 4.93 मिलियन बैरल ;बीपीडीद्ध क्रूड का आयात कर रहा था और फरवरी में यह 5.27 मिलियन बीपीडी तक पहुंच चुका  एक साल पहले भारत का क्रूड आयात 280,000 बीपीडी था। यानी एक साल में भारत का क्रूड  आयात दोगुने से भी ज्यादा हो चुका है। इस साल ;2018 मैं  देश की  फ्यूल डिमांड 6.1 फीसदी बढने का अनुमान है। जाहिर है ज्यादा फ्यूल खरीदने के लिए और ज्यादा विदेशी  मुद्रा की जरुरत पडेगी । और महंगे क्रूड से देश  में महंगा   फ्यूल बिकेगा और इससे महंगा ई बढेगी । ज्यादा से ज्यादा विदेशी  मुद्रा कमाने के लिए भारत को अपना निर्यात बढाने की जरुरत है। आयात की तुलना में निर्यात अभी भी काफी कम है। 2017-18 के दीरान भारत का निर्यात 302.8 अरब डॉलर था और आयात 459.7 अरब डॉलर। नतीजतन 156.9 अरब डॉलर का विदेशी  व्यापार का शुद्ध  घाटा ।   2016-17 में 275.8 अरब डॉलर के निर्यात की तुलना में 384.4 अरब का आयात था जिससे देश  को 108.6  अरब डॉलर का  घाटा  उठाना पडा। रेमिटेंस  काफी हद तक इस व्यापार  घाटे  को पूरा कर रहा है। भारत दुनिया में सबसे ज्यादा  रेमिटनेस पाने वाला मुल्क है। ;2017 में देश  में    65 अरब डॉलर  रेमिंटेंस  आया था। 2015 में भारत में 68.9 अरब डॉलर रेमिटेंस आया था। बहरहालए इस साल रुपए का लगातार  कमजोर होना चिंता का विषय  है। इस साल अब तक डॉलर के मुकाबले रुपया 7 फीसदी फिसल चुका है।  पिछले साल डॉलर के मुकाबले रुपया 5.96 फीसदी मजबूत हुआ था.। क्रूड  की सप्लाई बढने के बावजूद इसकी कीमतें बढ रही है। अगर यह सिलसिला जारी रहा तो रुपया और कमजोर हो सकता है। कूृड की खरीद डॉलर में की जाती है। कीमतें बढने से डॉलर की मांग  बढती रहेगी  और रुपया कमजोर होता  रहेगा । भारत  के लिए यह सुखद स्थिति नहीं है। 

गुरुवार, 28 जून 2018

अमरनाथ यात्रा और हिज्बुल का बयान

 दक्षिण हिमालय में 3,880 मीटर (12,756 फुट) ऊंचाई पर  स्थित अमरनाथ पवित्र गुफा की तीर्थ यात्रा बुधवार को  शुरु  हो  गई। लगभग तीन हजार ( 2,995) तीर्थयात्रियों  का पहला जत्था बुधवार की अलसुबह साठ दिन की यात्रा   लिए रवाना हो  गया। पहले जत्थे में 520 महिलाएं  और    21 बच्चे भी  शामिल हैं । अमरनाथ गुफा पहुंचने के दो रास्ते हैं।  पहलगाम का परंपरागत रास्ता 36 किलोमीटर लंबा  तो  है मगर ज्यादा चढाई वाला नहीं है। बाल्टल वाला 12 किल¨मीटर रास्ता छोटा जरुर है मगर इसमें खडी  चढाई है। अपनी सुविधानुसार तीर्थयात्री दोनों  रास्तों  से  गुफा जाते हैं। इस बार पहले जत्थे  के  1,904 तीर्थयात्रियों  ने पहलगाम वाला रास्ता चुना है  और  1,091  बाल्टल  होकर अपनी तीर्थयात्रा पूरी करेंगे। इसके  अलावा हेलीकाॅप्टर से भी गुफा  की यात्रा की जा सकती है। 26 अगस्त रक्षाबंधन के  दिन यात्रा का समापन  होगा। देश  भर से तीर्थयात्री अमरनाथा की यात्रा पर जाते हैं । जम्मू-कश्मीर  सरकार  के  लिए यह तीर्थयात्रा प्रतिष्ठा  का  प्रश्न  है। पिछले साल  2.60 लाख तीर्थयात्रियों  ने अमरनाथ गुफा के  दर्शन  किए थे। राज्यपाल इस यात्रा के  प्रमुख संरक्षक है और  इस बार क्योंकि जम्मू-कश्मीर  में राज्यपाल शासन है, लिहाजा राज्यपाल एनएन  वोहरा इस तीर्थयात्रा को  चाक-चौबंद  करने  में कोई कसर नहीं छोड़  रहे हैं। नब्बे के  दशक से  हिन्दुओं  की इस तीर्थ  यात्रा पर भी आतंक का साया मंडराता रहा है। पिछले साल आतंकियों  ने तीर्थयात्रियों   से भरी बस पर हमला करके  सात यात्रियों की हत्या कर दी थी। 2016 में आंतकी हमले की आशंका  के  कारण अमरनाथ यात्रा  को  स्थगित करना पडा था। आतंकी  संगठनों  की धमकियों  की  के दृष्टिगत  1991 से 1995 तक अमरनाथ यात्रा  को रद्द  करा  दिया गया था।   आतंकी संगठनों द्वारा  तीर्थयात्रा  के  समय हिंसा नहीं फैलाने के  आश्वासन   पर 1996 में यात्रा शुरू तो   हुई मगर  मौसम  ने ऐसी तबाही मचाई कि 242 तीर्थ यात्रियों  की मौत  हो  गई।  2000 में आतंकियों ने पहलगाम के  बेस कैंप पर हमला करके  32  की हत्या कर दी। इनमें  7 मुसलमान नागरिक  और  तीन सुरक्षाकर्मी थे। 2001 में आतंकियों ने तीर्थयात्रियों के  बेस कैंप पर ग्रैनेड  फेंककर 13 को ¨ मार डाला। इनमें 3 महिलाएं थी। 2002 में लश्कर के  आतंकियों ने  दो  कैंप¨ पर हमला करके  11 तीर्थयात्रियों  की हत्या कर दी थी। बार-बार आतंकी हमलों  के  बावजूद तीर्थयात्रियों  की आस्था जरा भी डगमगाई नहीं है  और  अमरनाथ गुफा के दर्शन   करने वाले श्रद्धालुओं  की संख्या उतरोत्तर बढती जा रही है। 1989 में जहां 12,000 तीर्थयात्री अमरनाथ की पवित्र यात्रा पर गए थे  वहीं 2007 में यह संख्या  4 लाख क¨ भी पार कर गई थी। 2012 में रिकार्ड  6 लाख 22 हजार तीर्थयात्रियों  ने अमरनाथ गुफा के  दर्शन  किए थे।  इस बार सरकार ने भारी सुरक्षा बंद¨बस्त किए हैंे। तीर्थयात्रियों  की सुरक्षा के  लिए चालीस हजार सुरक्षा कर्मी तैनात किए गए हैं और  रास्तों  की कडी  चौकसी  के  लिए सौ  से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं।  हिन्दुओं  में अमरनाथ की पवित्र गुफा के  प्रति प्रगाढ आस्था है। भृगु ऋषि  ने सबसे पहले अमरनाथ गुफा के  शिवलिंग को  खो ज निकाला था। कश्मीरी  विद्धान कल्हण के  ग्रंथ राजतरंगिणी के  अनुसार मुगल  शासक  औरगंजेब  ने जब हिन्दुओं  लोग को ¨ मुस्लमान बनाने  के  लिए तरह-तरह के  जुल्म ढाए थे, तब  लोग अमरनाथ गुफा की शरण में आए थे  और  भगवान  ने श्रद्धालुओं  को  रास्ता दिखाया था। और  भी कई मान्यताएं  हैं मगर सच्ची आस्था के  लिए किसी भी मान्यता अथवा विवरण की जरुरत नहीं होती है। हिजबुल के  स्थानीय कमांडर का मंगलवार का  बयान काबिलेगौर  है कि उनका संगठन अमरनाथ तीर्थयात्रियों  के ¨ निशाना नहीं बना रहा है। इससे चरमपंथी हिजबुल के   नरम पडने की उम्मीद की जा सकती है। मगर सबसे बडी समस्या यह है कि कश्मीर  में आज कितने  आतंकी संगठन है, खुद आतंकी नही जानते हैं। इस स्थिति में दो -एक संगठन की आवाज  कोई मायने नहीं रखती। 

बुधवार, 27 जून 2018

महिलाओं के लिए असुरक्षित भारत

दुनिया की प्राचीनतम एवं समृद्धतम् सभ्यताओं में षुमार भारत में  महिलाओं को जितना आदर और सम्मान दिया जाना चाहिए, समकालीन इंडिया में उनका उससे कहीं ज्यादा सामाजिक और षारीरिक षोशण किया जा रहा है। जो समाज अपनी मां-बहन की कद्र नहीं करता है, वहां प्रगति और खुषाहली के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। एक अंतरराश्ट्रीय समाचार एजेंसी द्वारा मंगलवार को जारी रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे असुरक्षित मुल्क बताया गया है। दुखद स्थिति यह है कि महिलाओं के लिए भारत गृह युद्ध में जल रहे अफगानिस्तान, सीरिया और सोमालिया  से भी ज्यादा असुरक्षित है। सात साल पहले 2011 में भारत इस मामले में चौथे पायदान पर था मगर राजधानी दिल्ली में “निर्भय“ जैसे सामूहिक बलात्कार और बच्चियों से जघन्य रेप के बढते मामलों के बावजूद  महिलाओं के लिए सुरक्षित भारत की दिषा में कोई कारगर कदम नहीं उठाए गए। इस वजह भारत पहले पायदान पर आ गया है। दुनिया में सबसे तेज गति से आगे बढती अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष टकनॉलॉजी के लीडर और अपनी समृद्ध सभ्यता पर इतराने वाले भारत के लिए यह स्थिति बेहद षर्मनाक है। जिस देष में मां को षक्ति और जगत जननी का दर्जा  दिया जाता हो, वहां महिलाओं का सामाजिक तिरस्कार हो, उन्हें भोग की वस्तु समझ कर उनका सामूहिक बलात्कार किया जाए और बेटी को बोझ समझकर गर्भ  में ही मार दिया जाए, वहां महिलाओं की सुरक्षा के लिए युद्ध स्तर से भी अधिक सषस्कत करने की जरुरत है। भारत में हर घंटे चार महिलाओं से बलात्कार किया जाता है। 2007 से 2016 के दौरान भारत में महिलाओं से बलात्कार के मामलों में 83 फीसदी  का इजाफा हुआ था। महिलाओं का षारीरिक षोशण करना तो जैसे पुरुश प्रधान भारत के रग-रग में समाया हुआ है। पिछली षताब्दी तक धर्म षास्त्रों में प्रचलित “ढोल, गंवार, क्षुद्र, पषु और नारी, सभी ताडन के अधिकारी“ को स्कूल-कॉलेजों  में पढाया जाता था। इंसान की पषु से तुलना करने वाली इस तरह के अपमानजनक जुमलों को   भले ही आधुनिक भारत अस्वीकार कर चुका है मगर पुरुशों में आज  भी यही मानसिकता व्याप्त है।  देष में षादी-ब्याह तो जैसे महिला से षारीरिक संबंध बनाने का लाइसेंस है। महिला की इच्छा या अनुमति की कोई जरुरत नहीं समझी जाती। बीमारी की अवस्था में भी विवाहिता को अपने पति की सेक्स भूख को तृप्त करना पडता है। बचपन से लडकियों को पाठ पढाया जाता है कि पति को संतुश्ट रखना उसका धर्म होता है। समाज के सारे कायदे-कानून महिलाओं के लिए हैं।  देष के लिए यह कडुवा सच और भी षर्मनाक है कि  भारत महिलाओं की तस्करी में भी पीछे नहीं है और इस मामले में लीबिया और म्यांमार की बराबरी कर रहा है। ऋग वैद को छोडकर भारत में वैदिक काल से ही महिलाओं का सामाजिक षोशण षुरु हो गया था। कालांतर में बाल विवाह, सती प्रथा और बहु-पत्नी (पोलीगेमी) ने महिलाओं की स्थिति बद से बदतर कर दी। कानूनन अपराध होने के बावजूद ग्रामीण भारत और कमजोर तबकों में बाल विवाह और बहुपत्नी जैसी कुप्रथा आज भी जारी है। आजादी के सात दषक और महिला सषक्तिकरण के बावजूद भारत में महिलाओं की भागीदारी संतोशजनक नहीं है। महिलाओं को रोजगार मुहेया कराने के मामले में भी भारत फिसड्डी रहा है। वर्ल्ड बैंक द्वारा 2017 में जारी रिपोर्टे के अनुसार महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में भारत  131 मुल्कों में 120वें पायदान पर है। भारत की सर्वसिस और इंडस्ट्रीज में महिलाओं की मात्रा बीस फीसदी भागीदारी है हालांकि चालीस फीसदी महिलाएं स्नातक पास हैं। चिंताजनक स्थिति यह है कि 2005 के बाद से महिलाओं की  सर्विस और इंडस्ट्रीज  में भागीदारी उतरोत्तर कम होती जा रहा है। महिलाओं की भागीदारी बढने से देष के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कम-से-कम एक फीसदी का इजाफा हो सकता है। महिलाएं देष की अस्मिता होती हैं और अपनी अस्मिता का अपमान करने  वाला कोई भी राश्ट्र सभ्य नहीं हो सकता।

   
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मंगलवार, 26 जून 2018

आपात काल के कडवे अनुभव

 1975 के आपात काल (इमरेजेंसी) के कडवे अनुभव चार दशक से भी अधिक समय गुजर जाने के बाद आज भी चुभते हैं। पत्रकारिता में नौसिखिया होने के कारण कई बातें आसानी से हमारे  पल्ले नहीं पडती थी। तब मैं सहपाठी नवीन  शर्मा  और हमसे वरिष्ठ   सीता राम खजूरिया के साथ  शिमला से प्रकाशित  दैनिक समाचार पत्र में काम करता था। हिप्र  यूनिवर्सिटी  से अर्थशास्त्र में एमफिल की पढाई भी कर रहा था। 26 जून की सुबह समाचार पत्रों की सुर्खियों में छपा  देश  में इमरजेंसी लग गई है और विपक्षी दलों के शीर्ष   नेताओं को गिरफ्तार किया जा रहा है। हमारा समाचार पत्र निकल चुका था और हम इस खबर को मिस कर गए थे। सुबह कॉफी हाउस का माहौल एकदम बदल चुका था। तब  शिमला में माल रोड स्थित कॉफी हाउस पत्रकारों और नेताओं की बैठक हुआ करती थी और सारी ताजा सूचनाएं वहां मिल जाती। उस दिन पहली बार लगा लोग एकाएक सहमे-सहमे से  हैं। हमें अभी इमरजेंसी की भयावहता का अंदाजा नहीं था मगर यह सूचना मिल चुकी थी कि  शांता कुमार, दौलत राम चौहान समेत जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) और राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ के शीर्ष   नेता गिरफ्तार हो चुके थे और अन्य नेताओं की धर-पकड जारी थी । अब समझ में आया कि लोग-बाग क्यों सहमे हुए हैं। अपरांह दफ्तर पहुंचे तब पता चला आपात काल क्या होता है। आजाद भारत मेें पले- पाले  मुझे तब समझ में आया मेरी माता  को कितना मानसिक क्लेश  झेलना पडा होगा। पिताजी स्वत्रंतता सेनानी थे। आए दिन गिरफ्तारियां देते। आपातकाल के साथ ही सेंसरशिप लग चुकी  था। दफ्तर में सरकारी नुमाइंदे (लोक संपर्ककर्मी) धमक चुके थे और बता रहे थे क्या छापा जाए और क्या नहीं। इस मामले वे खुद बेहद कन्फूज्ड थे। कभी कहते इसे छापो, फिर कहते इसे मत छापो। संपादकीय अखबार की आत्मा होती है और अगर इसे निकाल दिया जाए तो अखबार बेजान हो जाता है।  इसे  भी उन्हें  दिखाओ। दो-एक दिन भारी दुविधा में गुजरे और फिर निर्णय लिया गया जब सब कुछ सेंसर ही होना है तो क्यों न  सरकारी विज्ञप्तियां ही छापी जाएं। एजेजियों में आपातकाल से पहले वाली दनदनाती खबरें आनी बंद हो गई थी । नतीजतन, अखबार बंद होने की कगार पर पहुंच गया। इस दौरान सीआईडी का एक आदमी मुझसे मिलने भी आया  और खंगालने  लगा कि क्या  मैं आनंद मार्ग  से संबंधित हूं। आनंद मार्ग  पर अब तक प्रतिबंध लग चुका था।  मैैं सन्न रह गया। मेरा आनंद मार्ग से दूर-दूर का कोई संबंध नहीं था। मैने पूछा आपको कैसे पता चला मैं आनन्द मार्गी हूं। सीआईडी कर्मी बोला आनंद मार्गी की डायरी में आपका नाम दर्ज  है। यह भी कोई बात हुई कि डायरी में मेरा नाम मिलने से मैं आनंद मार्गी हो गया। पत्रकार होने के नाते मेरा नाम कई संगठनों की डायरी में हो सकता है। तब मुझे नेक सलाह दी गई कि इमरजेंसी में वाद -विवाद के लिए कोई जगह नहीं होती है, बस सरकार का डंडा चलता है। काफी समय तक  अपनी  गिरफ़तारी  का इन्तजार करता  रहा पर बच गयाहै।  एम फिल के लिए हमें विष्वविधालय के तत्कालीन कुलपति डाक्टर आर के सिंह ने प्रेरित किया था। डाक्टर सिंह वास्तव में महान शि क्षक थे। अक्सर चुपचाप किसी भी क्लास में बैठकर  प्रोफेसर्स  के  शिक्षण का जायजा लेते। कैंपस में मंडराते छात्रों के पास जा-जा कर उन्हें लाइब्रेरी में पढने की नेक सलाह देते।  गरीब छात्रों की हर तरह से मदद करते। शैक्षणिक जगत में उनका बडा सम्मान था। मुझे एक बार इंटरब्यू के लिए अहमदाबाद के इंडियन इंस्टीटयूट ऑफ मेंनेजमेंट (आईआईएम) जाना था। पहली बार अहमदाबाद जा रहा था, इसलिए मुझे रहने की चिंता सता रही थी। मैने डाक्टर सिंह से अपनी दुविधा बताई। उन्होंने तुरंत आईआईएम के डीन के नाम चिठ्ठी लिखी और मेरे रहने की कैंपस में ही व्यवस्था हो गई। इंटरव्यू में आए अन्य  अभ्यर्थियों  को इस बात पर बडी हैरानी हुई थी। आपातकाल में डाक्टर सिंह को चलता कर दिया गया और उनकी एक ब्यूरोक्रेट को नियुक्त किया गया। डाक्टर सिंह ने हम सब से वायदा किया था कि एमफिल करते ही हम सब की आसानी से नौकरी लग जाएगी, तब एचपीयू एमफिल षुरु करने वाली देष की एकमात्र दूसरी यूनिवर्सिटी थी। मैं पहले ही अटैंपट में पास हो गया मगर डाक्टर सिंह नहीं थे और मैं अध्यापक नहीं बन सका। आपातकाल में संजय गांधी की तूती बोलती थी। इमरजेंसी में ही हिमाचल के निर्माता डाक्टर वाई एस परमार को पद छोडना पडा था। उन्होंने संजय गांधी की नाराजगी मोल ले थी।   परिवार नियोजन के साथ-साथ लोगों पर बहुत ज्यादतियां हो रही थी मगर किसी की मजाल नहीं थी, इन्हें छापे। जैसे ही इमरजेंसी खत्म हुई अखबारों में इन ज्यादतियों की बाढ आ गई। इसके बाद तो इतिहास बना। पूरे उत्तर भारत से कांग्रेस का सुपडा साफ हो गया। उत्तर प्रदेश  की 85 की 85 सीटें  कांग्रेस हार गई। मगर कहते हैं इतिहास खुद को दोहराता है। आपातकाल और सेंसरशिप  का सबसे मुखर विरोध भाजपा की पूर्वज जनसंघ नेताओं ने किया था। इसी  आपातकाल की वजह से जनसंघ लुप्त हो गई  और  भाजपा का जन्म हुआ। अब उसी भाजपा के राज में असहिष्णुता  चरम पर है। 




   



बेमेल गठबंधन तो टूटना ही था!

देष के मुस्लिम बहुल आबादी वाले जम्मू-कष्मीर में देर-सबेर राज्यपाल षासन लगना तय था। तीन साल तीन माह से सत्तारूढ पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूटने के बाद राज्य में राज्यपाल षासन लगा दिया गया है। राज्य संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत जम्मू-कष्मीर में राज्यप्ाल षासन लगाया जाता है। देष के अन्य राज्यों में राश्ट्रीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राश्ट्रपति षासन लगाया जाता हे़। पिछले चालीस साल में जम्मू-कष्मीर में आठवीं बार और राज्यपाल एनएन वोहरा के रहते चौथी बार राज्यपाल षासन लगाया गया है। वोहरा 2008 से लगातार जम्मू-कष्मीर के राज्यपाल हैं। इस दौरान चार मुख्यमंत्री- गुलाम नबी आजाद, उमर अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद और महबूबा मुफती- आ-जा चुके हैं। लगभग साढे तीन साल पहले दिसंबर 2014 को संपन्न हुए विधान सभा चुनाव में त्रिषंकू विधानसभा के  बाद दो सबसे बडी राजनीतिक पार्टियों को सरकार बनाने के लिए एक “वर्किंग“ गठबंधन बनाने में ही तीन माह लग गए थे। और जब मार्च, 2015 को जैसे-तैसे बेमेल पीडीपी-भाजपा सरकार बनी, उसी दिन से इस पर अनिष्चितता के बादल मंडराने लग पडे थे। पीडीपी को जम्मू-कष्मीर में अलगाववादियों और चरमपंथियों का करीबी माना जाता है और उसका राजनीतिक एजेंडा भाजपा से एकदम अलग और विपरीत है। दोनों पार्टियों ने विधानसभा चुनाव अलग-अलग लडे थे और एक-दूसरे पर जमकर प्रहार किए थे। पीडीपी जम्मू-कष्मीर को संविधान की धारा (आर्टिक्ल) 370 के तहत मिले विषेश दर्जे को और मजबूत करने के पक्षधर है और भाजपा इसकी घुर विरोधी है। जम्मू-कष्मीर को मिले विषेश संवैधानिक दर्जे को निरस्त करने के लिए भाजपा की पूर्व जनसंघ के संस्थापक डाक्टर ष्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1953 में अपने प्राण तक न्यौछावर कर दिए थे। भाजपा आज भी धारा 370 को निरस्त करने की जबरदस्त पक्षधर है। पीडीपी से गठबंधन तोडने की असली वजह भी यही है कि चरमपंथियों की करीबी पार्टी से सत्ता का सुख भोगने के कारण जम्मू रीजन में भाजपा का जनाधार खिसक रहा था। चुनाव के समय भाजपा को हिदुंत्व का एजेंडा याद आता है। मतदाताओं का धुव्रीकरण कराने के लिए इस एजेंडा को पूरी तरह अपनाना भाजपा की सामरिक विवषता है। जम्मू-कष्मीर  में चरमपंथी “पीडीपी“ के साथ सत्ता में रहकर भाजपा किस मुंह से मतदाताओं के समक्ष जाती?  राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ का भी द्बाव पड रहा था।  पीडीपी-भाजपा गठबंधन तो टूटना ही था। बहरहाल,जम्ंमू-कष्मीर में राज्यपाल षासन से सुरक्षा बलों को आतंकियों से निपटने में आडे आ रही राजनीतिक अडचनें कम हो सकती है। पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती के दबाव पर मोदी सरकार को राज्य में आतंकियों के खिलाफ चलाए जा रहे “ऑपरेषन ऑल आउट“ को रमजान माह के लिए रोकना पडा था। इससे राज्य में पवित्र रमजान माह में आतंक का नंगा नाच तो थमा नहीं, अलबत्ता सुरक्षा बलों पर हमले जरुर बढे। अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए पीडीपी के नेता अक्सर अलगाववादियों और चरमपंथियों की जुबानी बोलते रहे हैं और सुरक्षा बलों का मनोबल तोड्ने में कोई कसर नहीं छोडते हैं। जम्मू-कष्मीर में उतरोत्तर लोकतांत्रिक  और प्रषासनिक  व्यवस्था निश्क्रिय होती जा रही है। संविधान की  धारा् 370 के तहत विषेश दर्जा मिलने, केन्द्र से उदार पैकेज-दर-पैकेज, खुद का संविधान, अधिनियम और झंडा होने के बावजूद राज्य में न तो वंाछित तरक्की हो पाई है और न ही अमन-चैन कायम हो पाया है। अषांत कष्मीर घाटी ने राज्य के दो अन्य क्षेत्रों जम्मू और लद्दाख के तीव्रगामी विकास में भी रोडे अटकाए हैं। भाजपा ने जम्मू-कष्मीर में चरमपंथियों और अलगवादियों की प्रबल समर्थक पीडीपी के साथ सरकार साझा करके अपनी सत्ता लोलुपता को दर्षाया है। त्रिषंकू विधानसभा के गठन पर राज्य में राज्यपाल षासन लोकप्रिय सरकार की जगह ज्यादा प्रासंगिक साबित होता। राज्यपाल षासन में सुरक्षा बलों पर किसी तरह का कोई द्बाव नहीं होता है। यही तो भाजपा चाहती है। फिर तीन साल क्यों गंवाए?

योग का अंतरराश्ट्रीय जलवा

 योग विज्ञान को देष.विदेष में और ज्यादा लोकप्रिय और प्रासंगिक बनाने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बहुत बडा हाथ है। मोदी की पहल पर 2014 में संयुक्त राश्ट्र संघ ने  21 जून को अंतरराश्ट्रीय योग दिवस घोशित किया था। 2015 से लगातार इस दिन को अंतरराश्ट्रीय योग दिवस के रुप में मनाया जा रहा है।  21 जून क्योंकि धरती का सबसे बडा दिन होता हैए इसलिए इस दिन योग दिवस मनाने की अहमियत और ज्यादा बढ जाती है। देष का प्रधानमंत्री अगर लोगों की संगत में खुद योगासन करेए तो आम आदमी का भी इसके प्रति आकर्शित होना तय है। पिछले चार साल से मोदी हर साल योग दिवस में षरीक हो रहे हैं। वीरवार को प्रधानमंत्री ने देहरादून में वन अनुसंधान केन्द्र के मैदान में पचास हजार लोगों संग योगासन किए। अंतरराश्ट्रीय योग दिवस पर देहरादून से दक्षिण कोरिया के डबलिन तक योग ने अपनी छटा बिखेरी। भारतीय सैनिकों  में थलए वायु और नभ में आसन लगाए। वायु सेना के सैनिकों ने पद्रह हजार फीट ऊंचाई से पैराषूट की सहायता से बायु में ंयोग की मुद्राएं कर देष की स्मृद्धि का संदेष दिया। भारत तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों ने 12 हजार से 18 हजार ऊंची चोटियों पर योगासन कर और अरुणाचल प्रदेष की दिगारू नदी के पानी में खडे होकर भ्रामरी योगासन किए। केरल के कोचि तट पर तैनात नौसेना के जंगी जहाज आईएनएस जमुना पर नौसैनिकों ने योगसान किए। पूर्वी नौसेना के सबमेरीन स्टाफ ने बिषाखापट्ट््नम  में बंगाल की खाडी में तेणानत जंगी जहाज आईएनएस विराट और अमेरिकी हवाई क्षेत्र में तैनात युद्धपोत सहयाद्री के नौसैनिकों ने योगासन किए। प्ूरे देष में वीरवार को हर जगह यही जज्बा दिखाई दिया। प्रचलित कहावत एश्एनऐपल ए डेए कीपस डाक्टर अयेश् की ही तरह अब श्हर रोज योगए दूर रहे रोगश् ज्यादा लोकप्रिय् है। अमेरिका में कैंसर और हार्ट अटैक के बाद सबसे ज्यादा रोगी मानसिक तनाव के मामले सामने आते हैं और 33 फीसदी से भी ज्यादा हैल्थ बजट इस पर खर्च  किया जाता है। दुनिया में हर साल तेरह खरब डॉलर से ज्यादा हैल्थ पर खर्च कियात् जा रहा है और 2040 तक यह बढकर 18ण्28 खरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। 2016 में हैल्थकेयर उत्पादों पर 32ण्8 अरब डॉलर खर्च किए गए थे और 2022 तक यह  220ण्3 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। ब्यूटी पर ही हर साल 22 अरब डालर खर्च किए जाते हैं और हर महिला औसतन साल में 15ए000 डॉलर ब्यूटी प्रॉड्क्ट पर खर्च  करती है। इन सब भारी भरकम खचर्ोंं को  योगासन करके काफी हद तक बचाया जा सकता है और इस विषाल राषि को दुनिया से भुखमरी हटाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि योगासन करने वाले ज्यादा तंदुरुस्त रहते हैं और योग न करने वालों से 40 से 60 फीसदी कम खर्च  कर प्रति व्यक्ति 2360 डालर की बचत करते हैं। एलोपैथी दवाओं के नियमित इस्तेमाल से षरीर में प्रतिरोधक क्षमता लगातार गिरती है मगर इसके विपरीत योग उत्तक्षरोतर इस क्षमता को बढाता है।  क्या यह सब काफी नहीं हैघ्  मेडिकल की ही तरह योग भी साइंस है और हर रोग का योगासन से निदान किया जा सकता है। यहां तक कि कैंसरओं और हार्ट अटैक जैसे जानलेवा रोगों का भी योग से उपचार किया जा सकता है। अमेरिका के एक वैज्ञानिक ने लंबे समय तक अनुसंधान करके योगासन की वैज्ञानिक उपयोगिता को प्रमाणित किया है। योग को प्रोत्साहित करके प्रधानमंरी मोदी ने वास्तव में देष को पाष्चत्य की नकल करने वालों से बचाया है। महान भारत के लिए प्रधानमंत्री का यह बडा उपहार है।

Friend Turned Foe

                                 

पैसे का लालच सगे-से-सगे रिष्ते में भी दरार डाल देता है। पैसे क¢ लिए भाई-भाई एक-दूसरे क¢ खून क¢ प्यासे ह¨ जाते हैं, इसक¢ सामने द¨स्ती क्या चीज है? अ©र  अब इसी पैसे क¨ लेकर भारत अ©र अमेरिका में साल¨ं पुराने संबंध¨ं में दरार पड गई है। अमेरिकी राश्ट्रपति ड¨नाल्ड ट्रंप द्वारा इस्पात अ©र एल्यूमिनियम पर टैरिफ बढाने से क्षुब्ध भारत ने पलटकर बादाम, अखर¨ट अ©र दाल¨ं समेत  29 अमेरिकी उत्पाद¨ं पर सीमा षुल्क (कस्टम ड्यूटी) बढा दी है। इससे अमेरिका क¨ 23.5 कर¨ड डालर का नुकसान ह¨गा।  अमेरिका द्वारा इस्पात अ©र एल्यूमिनियम पर टैरिफ बढाने से भारत क¨ 29. 24 कर¨ड डाॅलर का अतिरिक्त ब¨झ उठाना पडेगा। पिछले कुछ साल¨ं में भारत अ©र अमेरिका क¢ बीच कार¨बार निरंतर बढता जा रहा है। 2014 में भारत अ©र अमेरिका क¢ बीच 104 अरब डाॅलर का व्यापार हुआ था। 2016  में यह बढ्कर 114 अरब डाॅलर पहुंच गया था। प्रधान मंत्री की अमेरिका यात्रा क¢ समय इस कार¨बार क¨ 500 अरब डाॅलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था।  ्इस साल जनवरी-अप्रैल क¢ द©रान भारत ने अमेरिका क¨ 309.18 मिलियन डाॅलर क¢ इस्पात अ©र इसक¢ उत्पाद निर्यात किए थे। अमेरिका क¢ कुल इस्पात आयात में भारत का मात्र द¨ फीसदी हिस्सा है।  एभ्ल्यूमिनियम का निर्यात त¨ इससे भी कम है। म¨दी सरकार ने पिछले माह अमेरिका से भारत से निर्यात किए जाने वाले इस्पात, एल्यूमिनियम क¨ टैरिफ बढ¨तरी से बाहर रखने का आग्रह किया था, मगर ट्रंप नहीं माने। नतीजतन, भारत क¨ भी पलटवार करना पडा। टैरिफ बढने से हालाकि न त¨ अमेरिका अ©र न ही भारत क¨ बहुत ज्यादा असर पडेगा, मगर ट्रंप क¢ इस कदम से रिष्त¨ं में जरुर खटास आई है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था ने हाल ही में मजबूती क¢ संक¢त दिए हैं। इससे राश्ट्रपति ट्रंप का गरुर सातवें आसमान पर है। अमेरिका में अमेरिकिय¨ं क¢ लिए अ©र ज्यादा र¨जगार क¢ अवसर जुटाने क¢ लिए ट्रंप अंतरराश्ट्रीय कंपनिय¨ं क¨ अमेरिका में फ¢क्टरी उत्पादन क¢ लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। इसीलिए, वे कभी चीन से उलझ जाते है, कभी यूर¨पियन यूनियन त¨ कभी कनाडा अ©र मैक्सिक¨, रुस या  भ्ंाारत से। अमेरिका क¨ महान बनाने क¢ बहाने ट्रंप पेरिस जलवायु संधि क¨ मानने से मुकर गए, नाफ्टा व्यापार समझ¨ते क¨ निरस्त करने पर आमादा हैं अ©र जी-20 से लेकर जी-7 की बैठ्क¨ं में अपनी “दादागिरी“ दिखाते फिरते हैं।  नाफ्टा व्यापार समझ©ता दुनिया की सबसे बडी कार¨बारी डील है। अमेरिका-कनाडा सीमा से हर र¨ज द¨ अरब डाॅलर से अधिक कार¨बार की आवाजाही ह¨ती है। इस कार¨बार से अमेरिका अ©र कनाडा द¨न¨ं क¨ फायदा ह¨ रहा है मगर राश्ट्रपति ट्रंप क¨ लगता है इससे कनाडा ज्यादा कमा रहा है। इसी बात क¢ दृश्टिगत अमेरिकी राश्ट्रपति नाफ्टा में जबरदस्त म¨ल-त¨ल कर रहे हें। ट्रंप मूलतः कार¨बारी है अ©र कार¨बारी स©दे कैसे अपने पक्ष में किहीए जाते हैं, वे इस कला में माहिर है। ट्रंप यह बात बखूबी जानते हैं कि देर-सबेर कनाडा क¨ उनकी डील माननी ही पडेगी। यही व्यापारिक नीति वे भारत क¢ साथ भी अपना रहे हैं। भारत, अमेरिका क¨ 46 अरब डाॅलर का निर्यात करता है अ©र  अमेरिका से 21.7 अरब डाॅलर का आयात करता है। विषुद्ध कार¨बारी ट्रंप क¨ यह स©दा भी हजम नहीं ह¨ रहा है अ©र वे इस व्यापार घाटे क¨ पाटना चाहते हंै। विष्व व्यापार संगठन की षतर्¨ं क¢ तहत अमेरिका इस तरह से टैरिफ नहीं बढा सकता है। मुक्त व्यापार क¢ लिए एक सीमा से ज्यादा टैरिफ अवर¨धक खडे नहीं किए जा सकते।  इसी वजह भारत अमेरिका क¨ विष्व व्यापार क¢ पंचाट में खींच ले गया है। इससे पहले भी बराक अ¨बामा क¢ राश्ट्रपति काल में भी भारत स¨लर पैनल मैन्युफ¢क्चरर क¨ सब्सिडी देने क¢ मामले में विष्व व्यापार संगठन क¢ पंचाट ले गया था। बहरहाल, ट्रंप की संरक्षणवादी नीतिय¨ं ने वैष्विक अर्थव्यवस्था क¨ संकट में डाल दिया है अ©र द¨स्ती दुष्मनी में बदलती जा रही है।



















































































































चीन के आर्थिक उप-निवेशवादी मंसूबे

इतिहास इस बात का गवाह है कि आर्थिक उपनिवेशवाद के जरिए दुनिया में समृद्ध मुल्कों ने गरीब देशों  को अपना गुलाम बनाकर उ\\न पर लंबे समय तक  शासन किया है। व्यापार की आड में गरीब को गुलाम बनाना दुनिया का दस्तूर रहा है। फिरंगियों ने ब्रिटिश  ईस्ट इंडिया कंपनी के जरिए बृहद भारत को गुलाम बना लिया था। अठारवीं शताब्दी के शुरु में मुगल  शासकों ने ईस्ट इंडिया कंपनी को सभी तरह के सीमा  शुल्कों से छूट देकर भारत की गुलामी की नींव रख दी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी ने सुरक्षा के नाम पर अपनी सेना खडी करके उपनिवेशवादी  मंसूबों को अंजाम दिया। अततः 1857 के विद्रोह के साथ ही भारत फिरंगियों का गुलाम बन गया। सोहलवीं और सतारवीं शताब्दी की विस्तारवादी भूख  इक्कसवीं  शताब्दी में भी बदस्तूर जारी है और चीन इसमें सबसे आगे है। चीन ने अफ्रीका में निवेशकों, साहूकारों, बिल्डरों, व्यापारियों, श्रमिकों और न जाने किन.किन उपनिवेशवादी तरीकों से भारी घुसपैठ कर ली है। 55 मुल्कों की अफ्रीकी यूनियन का मुख्यालय का निर्माण करना हो तो चीन की मदद। सूखा या भुखमरी हो तो भी चीनी मदद। अफ्रीकी मुल्कों की माली हालात इतनी पतली है कि यूनियन मुख्यालय को बनाने के लिए पचपन देश  दो सौ मिलियन डॉलर नहीं जुटा पाए और इसके लिए चीन के आगे  हाथ फैलाने पडे। अफ्रीकी मुल्क जिबुती ने पिछले दो साल में चीन के एक्जिम बैंक से भारी उधार लिया है जिससे उसका बाहरी कर्जा सकल घरेलू उत्पाद का 50 से बढकर 80 फीसदी पहुंच गया है और वह दिन दूर नहीं है जब यह मुल्क दिवाला होकर चीन की शरण  में जाने के लिए विवश  हो जाएगा। जिबुती जैसे और भी कई अफ्रीकी देश  हैं, जिन्हें उदार वित्तीय सहयता देकर चीन ने अपना मुरीद (गुलाम) बना लिया है। एशिया और अफ्रीका के मुल्कों को वन बेल्टए वन रोड परियोजना से जोडकर चीन अपने विस्तारवादी मंसूबों को बखूबी अंजाम दे रहा है। तीन खरब डॉलर  से भी ज्यादा निवेश   की इस परियोजना से चीन आधारभूत ढांचा खडा करके  सेंट्रल  एशिया, मध्य.पूर्व  एशिया  और ंमध्य.पूर्व में अपना दबदबा बढाना चाहता है। इस परियोजना के तहत चीन भागीदार मुल्कों को भारी कर्जा  मुहैया करा रहा है। सेंटर फॉर ग्लोबल डवलपमेंट की ताजा रिपोर्ट  के अनुसार वन बेल्टए वन रोड में  शामिल आठ देश  चीन के भारी कर्ज के बोझ तले (डैट ट्रेप)  दबे हुए  हैं और इससे बाहर निकलना इनके लिए आसान नहीं है। इन मुल्कों में पाकिस्तान, मालदीव के अलावा मंगोलिया, तजाकिस्तान, किर्गीस्तान, लाओस, मोन्टेनेग्रो और जिबूती  शामिल है। और जल्द ही अफगानिस्तान भी इनमें  शामिल हो सकता है। चीन सोची.समझी रणनीति के तहत ऐसे मुल्कों को इस परियोजना में  शामिल कर रहा है जो अपेक्षाकृत गरीब हैं और जिनसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। वन बेल्ट, वन रोड में  शामिल होने वाले देशों  को इस बात का जरा भी गुमान नहीं है कि चीन के ट्रेप में फंसकर किस तरह उनकी प्रगति पर विपरीत असर पड सकता है।  कर्जा  नहीं लौटाने की स्थिति में संबंधित देश  को पूरा प्रोजेक्ट  चीन के सुपुर्द करना पड सकता है। वैसे भी वन बेल्टए वन रोड की  शर्तें पूरी तरह चीन के पक्ष में है। पिछले साल श्रीलंका को  एक अरब डॉलर से ज्यादा का कर्जा नहीं लौटाने पर अपना हम्बनटोटा पोर्ट  चीन को सौंपना पडा था। सबसे पतली हालत पाकिस्तान की है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को लेकर इस्लामाबाद का चालीस साल का संमझौता है। इसके तहत 40 साल तक चीन को इस पोर्ट की कमाई का 91 फीसदी हिस्सा मिलता रहेगा। पाकिस्तान को मात्र 9 फीसदी हिस्सा ही मिलेगा। पाकिस्तान इस ' बनियागिरी' से भी खुश  है,  भले ही इससे इस्लामाबाद चीन का आर्थिक कॉलोनी बनने की ओर अग्रसर हो रहा है। इसी आशंका से नेपाल चीन के भारी दबाव के बावजूद वन बेल्ट, वन रोड में भागीदार बनने से बच रहा है। बहरहाल, चीन के इन मंसूबों से भारत को सचेत रहने की जरुरत है।ं



बुधवार, 20 जून 2018

चीन का नया पैंतरा

चीन ने डोकलाम विवााद की आड लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच त्रिपक्षीय वार्ता का सुझाव देकर नया पैंतरा फेंका है। चीन के भारत में अंबेसडर लुओ झाओहुई ने सोमवार को दिल्ली में एक संगोश्ठी में यह सुझाव दिया। श्रीमान लुओ झाओहुई का कहना है कि भारत और चीन को आपसी सहयोग का दायरा और व्यापक करके पाकिस्तान को भी इसमें षामिल करना चाहिए। भारत और पाकिस्तान 2017 से षंघाई सहयोग संगठन में पहले ही एक साथ हैं।  लुओ झाओहुई के अनुसार अगर चीन, रुस और मंगोलिया त्रिपक्षीय वार्ता  कर सकते हैं तो  भारत, पाकिस्तान और चीन क्यों नहीं? चीन यह बात भली-भांति भारत को पाकिस्तान के साथ विवाद सुलझाने में किसी तीसरे पक्ष का दखल कतई स्वीकार नहीं है। अमेरिका भी कई बार भारत और पाकिस्तान के बीच दखल की पेषकष कर चुका है मगर भारत ने इसे हर बार खारिज कर दिया।  षंघाई सहयोग संगठन मूलतः   आर्थिक और सैन्य सहयोग का अंतरराश्ट्रीय मंच है और इसमें द्धिपक्षीय विवादास्पद मुद्दों के लिए कोई जगह नहीं है। पाकिस्तान और भारत का कष्मीर को लेकर विभाजनोपरांत का विवाद है। पूरा कष्मीर भारत का अभिन्न अंग है  मगर इसका काफी बडा हिस्सा पाकिस्तान ने हथिया रखा है। चीन, पाकिस्तान के अनन्य मित्र होने का दम भरता तो है मगर इसके पीछे इसकी विस्तारवादी मंषा काम कर रही है। चीन पर विष्वास करना खतरनाक साबित हो सकता है। हिंदी-चीनी भाई-भाई कहते-कहते 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया था। इस हमले के फलस्वरुप चीन ने पष्चिम सेक्टर के लद्दाख में अक्साई चिन का लगभग 35,000 वर्ग किलोमीतटर क्षेत्र हथिया लिया था और तब से भारत का यह क्षेत्र चीन के कब्जे में है। भारत के जख्मों पर नमक छिडकते हुए पाकिस्तान ने 1963 में अपने अधिकृत कष्मीर की षक्सगाम घाटी का लगभग पांच हजार वर्ग मील इलाका चीन के सुपुर्द कर दिया था। चीन लंबे समय से अरुणाचल प्रदेष के तंवाग इलाके पर अपना हक जता रहा है।  1962 में चीन ने तंवाग पर कब्जा कर लिया था मगर यह इलबताका मैकमोहन लाइन के अंदर पडने के कारण चीन ने इसे खाली कर दिया था। चीन हालांकि  मैकमोहन लाइन को नहीं मानता है मगर इसके बावजूद अंतरराश्ट्रीय द्बाव में उसने यह इलाका खाली कर दिया था। तवांग सामरिक रुप से भारत और चीन दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इसके पष्चिम में भूटान और पूर्व में तिब्बत है। चीन, भारत को अक्साई चिन के बदले में कई बार तवांग मांग चुका है मगर भारत हर बार इस तरह की सौदेबाजी से बचता रहा है। पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर की ग्लिगित-बल्तिस्तान पर भी चीन की नजर है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियार इस इलाके से गुजरता है। भारत इस गलियारे का भी मुखर विरोधी है और इसके गिलगित-बल्तिस्तान से गुजरने क्षुब्ध है। यह इलाका बृह्द कष्मीर का हिस्सा है। पिछले माह (मई मे)ं पाकिस्तान ने गिलगित बल्त्स्तिान को पाकिस्तान का पांचवा प्रषासनिक क्षेत्र बनाने के लिए गिलगित-बल्तिस्तान आर्डर 2018 पारित किया था। भारत ने इस पर कडी आपत्ति जताई थी और  चीन ने कहनह्ा था कि यह मामला दो पडोसी मुल्कों के बीच का है और वह इसमें दखल  नही देगा। तब चीन ने कष्मीर समस्या को भारत और पाकिस्तान के बीचतान “ऐतिहासिक बैगेज“ बताते हुए इसे द्धिपक्षीय वातचीत के जरिए सुलझाए जाने की उम्मीद जताई थी। पाकिस्तान और भारत के बीच कष्मीर और आतंकी हिंसा में पाकिस्तानी की सक्रिय भूमिका के अलावा कुछ बहुत ज्यादा बचा नहीं है और जब तक इन दोनों मसलों का तसल्लीबख्ष हल नहीं निकलता है, दोनों के बीच सहयोग की कोई गुजाइंष नहीं है। 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन की कडुवाहट इतनी तल्ख है कि तीसरे पक्ष के लिए इसका अनुमान लगाना भी असंभव है। चीन की विस्तारवादी चीन और फितरती पाकिस्तान  पर तो वैसे ही भरोसा नहीं किया जा सकता।

मंगलवार, 19 जून 2018

अमेरिकी राष्ट्रपति का ट्रम्प कार्ड

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का “अमेरिका फॉर अमेरिकन“ प्रेम  वैश्विक  अर्थव्यवस्था पर भारी पडता जा रहा है। अमेरिका को अमेरिकियों के लिए सुरक्षित करने के चक्कर में ट्रंप ऐसे फेसले ले रहे हैं, जिनसे उसके मित्र देश  भी  प्रेशर  में आ गए हैं। ट्रम्प ने स्वदेशी  कंपनियों को बढावा देने के लिए  इस्पात और एल्यूमिलियम के आयात पर टैरिफ बढा दिया है। इन दोनों धातुओं से सुई से लेकर विमान- अंतरिक्ष यान तक हजारों उत्पाद बनते हैं। अमेरिका इस्पात आयात करने वाला दुनिया का सबसे बडा मुल्क है। 2017 में अमेरिका ने 34.6 मिलियन मीट्रिक टन इस्पात का आयात किया था। 2016 मे दुनिया में कुल आयातित इस्पात का आठ फीसदी अमेरिका के हिस्से में था। 2014 में अमेरिका ने रिकार्ड 40.3 मीलियन मीट्रिक टन इस्पात का आयात किया था। अमेरिका चीन और भारत  समेत  85 मुल्कों से इस्पात का आयात करता है। सबसे ज्यादा आयात कनाडा, मेक्सिको  और दक्षिण कोरिया से किया जाता है। 2009 ंसेडी  2017 के दौरान अमेरिका के इस्पात आयात में 134 फीसदी का इजाफा हुआ  और इस्पात ट्रेड घाटा बढकर 327 फीसदी पहुंच गया था। इसी तरह 2017 में अमेरिका ने  130 मुल्कों से 23.4 अरब डॉलर मूल्य का  एल्यूमिलियम आयात किया था। 2013 की तुलना में यहं 49.3ः फीसदी ज्यादा था। अमेरिका दुनिया में सबसे ज्यादा विकसित और आर्थिक रुप से सपन्न  देश   है। अमेरिका को अगर छींक भी आती है तो पूरी दुनिया को जुकाम हो जाता है। अमेरिका को महान बनाने का सपना दिखाने वाले ट्रंप को यह बात गवारा नही ंहै कि उनका देश  इस्पात और  एल्यूमिलियम जैसी महत्वपूर्ण धातुमुल्कों ओं के लिए दूसरे मुल्कों पर निर्भर रहे। अमेरिका में इस्पात और एल्यूमिलियम के उत्पादन को बढाने के मकसद  ट्रंप ने इनके आयात पर टैरिफ लगाया है। ट्रंप चाहते हैं कि विदेशी   इस्पात निर्माता अमेरिका में उधोग लगाएं और स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया कराए। शुक्रवार को ट्रंप ने चीन से आयात किए जा रहे 1100 उत्पादों पर भी 50 अरब डॉलर का टैरिफ थोप दिया । चीन ने भी बदले में अमेरिकी तेल और ऑटोमोबाइल पर टैरिफ लगा  दिया है। चीन और अमेरिका दुनिया में इलेक्ट्रिक और पेट्रोल-डीजल चालित कार खरीदने वाले सबसे बडे मुल्क हैं। अमेरिका की कई बडी कंपनियां चीन अमित में इलेक्ट्रिक कारों की फैक्ट्रियां स्थापित कर चुकी हें। ताजा टैरिफ से इन कंपनियों को नुकसान उठाना पड सकता है। बहरहाल,ट्रंप के ताजा फैसले से पूरी दुनिया में खलबली मच गई है। इस्पात और  एल्यूमिलियम पर  टैरिफ बढने से सबसे ज्यादा नुकसान अमेरिका के  मित्र   मुल्कों को उठाना पड सकता है। अमेरिका का ज्यादातर इस्पात और एल्यूमिलियम का व्यापार कनाडा, मेक्सिको, दक्षिण कोरिया, जर्मन, फ्रांस जैसे मित्र देशों  से है। ट्रंप के फेसले से भारत  समेत लगभग दो सौ मुल्क प्रभावित हो रहे हें। भारत ने भी 30 अमेरिकी आयातित उत्पादों पर टैरिफ लगा दिया है। भारत हर साल अमेरिका को 1.2 अरब डॉलर का इस्पात और एल्यूमिलियम का निर्यात करता है। कनाडा और मेक्सिको भी अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ लगाने की तैयारी में है। इस्पात और  एल्यूमिलियम  पर टैरिफ लागू होते ही दुनिया भर की बंदरगाहों और एयर टर्मनलों पर कमर्शियल  गतिविधियां में अप्रत्याशित  गिरावट आई है। जर्मन से  मेक्सिको , दक्षिण कोरिया-जापान तक आर्डर कैंसिल किए जा रहे हैं। फैक्टरी उत्पादन घटने से कामगारों पर छंटनी का खतरा मंडरा रहा है। वैश्विक  अर्थव्यवस्था हाल ही में मंदी से उभर कर पटरी पर लौट रही थी मगर ट्रंप महाशय ने ऐसा झटका दिया है कि बडे से बडे मुल्क भी सकते में है। दुनिया अभी उत्तर कोरिया-अमेरिका तनाव से उभर नहीं पाई थी कि वैश्विक   ट्रेड वार का खतरा मंडराने लग पडा है। अभी तक ट्रेड वार चीन और अमेरिका तक ही सीमित था, अब पृूरी दुनिया इसकी चपेट में आ गई है। अमेरिका को भी इसके भयंकर परिणाम भुगतने पड सकते हैं।   

रविवार, 17 जून 2018

जम्मू-कश्मीर पर यूएन की रिपोर्ट

जम्मू-कश्मीर  संयुक्त राष्ट्र  (यूएन) की रिपोर्ट  से भारत का क्षुव्ध होना और पाकिस्तान और घाटी के अलगाववादी नेताओं  का बल्लियां उछलना स्वभाविक है। यही तो वे चाहते थे। भारत को बिखंडित करना अलगाववादियों का एकमात्र मकसद है। पूरी दुनिया  इस सच्चाई को जानती  है कि आतंक को कौन पाल-पोस रहा है और मानवाधिकारों का उल्लघंन कहां हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र  संघ के मानवाधिकार आयोग ने जिस दिन (वीरवार) अपनी रिपोर्ट  जारी की, उसी रोज जम्मू-कश्मीर  में  वरिष्ठ  पत्रकार शुजात बुखारी की दिन-दहाडे निर्मम हत्या कर दी गई और एक जवान को अगवा कर लिया गया। और यह वाक्या  पवित्र रमजान माह के समाप्त होने के एक दिन पहले हुआ। सरकार ने रमजान माह के दौरान एक माह के लिए आतंकियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर रोक लगा रखी है। इसके बावजूद राज्य में आतंकी हिंसा नहीं रुकी है। यून  की रिपोर्ट  में आतंकी हिंसा का कोई उल्लेख नहीं है। इसके विपरीत संयुक्त राष्ट्र  द्वारा चिंहित और प्रतिबंधित संगठनों को “हथियारबंद“ समूह और  आतंकियों के सरगनाओं को “ चरमपंथी लीडर्स“ कहा गया है।  प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के लीडर्स  को “चरमपंथी“ कहना संयुक्त राष्ट्र  की अपनी नीति के खिलाफ है और यूएन खुद आतंक के खिलाफ लडाई का ऐलान कर चुका है। इस हिसाब  से तो खूंखार आतंकी संगठन आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) भी “हथियारबंद समूह“ होना चाहिए और इसके सरगना “चरमपंथी लीडर्स“। निर्दोष  लोगों की हत्या करने और खुन-खराबा करने वाले सभी समूह अथवा संगठन मानव के सबसे बडे दुश्मन  हैं और उन्हें एक ही चश्मे  से आंका जाना चाहिए। यून की रिपोर्ट  की इन आंकडों पर कैसे विश्वास  किया जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर  में जुलाई 2016 से 2018 के बीच सुरक्षा बलों के हाथों  130 से 145 लोग  लोग मारे गए जबकि आतंकियों (रिपोर्ट  में चरमपंथी) ने 20 लोगों को मार गिराया। जाहिर है इस रिपोर्ट में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए आतंकियों को भी शामिल किया गया है। इस रिपोर्ट में हालांकि यह भी कहा गया है कि दोनों तरफ (भारत प्रशासित और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर )  मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है मगर इसमें भारत पर कहीं ज्यादा फोक्स किया गया है। रिपोर्टे में जम्मू-कश्मीर  में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंक का कोई उल्लेख नहीं है। 2017 में संयुक्त राष्ट्र  की इकॉनोमिक, सोश \ल एंड कल्चर राइटस समिति ने पाकिस्तान में शिक्षा अधिकारों के घोर उल्लघंन  पर कडी फटकार लगाई थी। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में मानवाधिकारों का उल्लंघन यूएन के मानवाधिकार समिति को नजर नहीं आया। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीरी  नेता लगातार वहां सेना के अत्याचारों और मानवाधिकारों के घोर उल्लघंन की शिकायतें  करते रहते हैं। यूएन की रिपोर्ट  में भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर  में सेना की भारी तैनाती पर सवाल उठाए गए हैं मगर पाकिस्तान अधिकृत-कश्मीर  में सेना की तैनाती की कोई चर्चा  नहीं की गई है। इन सब बातों के दृष्टिगत  पाकिस्तान अगर इस “एक तरफा“ रिपोर्ट  का स्वागत करता है तो इसमें कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए। आतंक को पालने-पोसने के लिए अंतरराष्ट्रीय  दबाव झेल रहे पाकिस्तान के लिए यह रिपोर्ट “राम बाण“ साबित हो सकता है। पाकिस्तान अब पूरी दुनिया में ढिंढोरा पीटेगा कि उसके यहां से कहीं ज्यादा मानवाधिकारों का उल्लघंन भारत में हो रहा है। पाकिस्तान में जुलाई में नेशनल असेंबली (संसद) के चुनाव हो रहे हैं और  सत्ताधरी दल  यूएन की रिपोर्ट  को राजनीतिक तौर पर भुना सकता है। मानवाधिकारों के उल्लघंन की आड में नेतागिरी चमकाने का काम अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियां और उनके कर्ताधर्ता बखूबी जानते है। संयुक्त राष्ट्र  जैसी वैश्विक  संस्था को हर हाल में निष्पक्ष  होना चाहिए और इसे किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए।  जम्मू-कश्मीर  में रमजान के पवित्र माह में आतंकियों द्वारा किया जा रहा खून-खराबा अगर यूएन की समिति को नजर नहीं आता है, तो इसकी विश्वसनीयता  पर ही सवाल उठता है़ ?

शुक्रवार, 15 जून 2018

शिलांग के सिखों का दर्द

जर, जोरु और जमीन इंसान के लिए पूरी कायनात  में सबसे ज्यादा प्रिय होती है और अगर इन पर संकट के बादल मंडराने लगे, तो वह मरने-मारने पर आमादा हो जाता है। इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा पडा है। इसे इंसान की बदकिस्मती ही कहा जाएगा कि अक्सर उसे अपनी अलग पहचान के लिए ताउम्र संघर्ष  करना पडता है।  पूर्वोतर राज्य मेघालय की राजधानी शिलांग  में पिछले डेढ सौ साल से भी ज्यादा समय से बसे दलित (महजबी) सिखों को आज भी अपनी पहचान के लिए लडना पड रहा है। पिछले सप्ताह शिलांग  में राज्य के सबसे बडे समुदाय  “खासी“ और दलित सिखों के बीच जो कुछ भी हुआ  उसकी पृष्ठभूमि  में जर और जमीन की अहम भूमिका है । इस साम्प्रदायिक हिंसा की पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी।  स्थानीय खासी समुदाय के लिए यह सच कोई मायने नहीं रखता है कि शिलांग  में दलित सिख  डेढ सौ साल से भी ज्यादा समय से रह रहे हैं और उनका भी इस राज्य में रमने-बसने का उतना ही अधिकार है, जितना कबायलियों का। इसके बावजूद भी अगर शिलांग  में बसे दलित सिखों को “बाहरी“ माना जाए, तो भारत की “विविधता में एकता“ और संववैधानिक अधिकारों पर सवाल उठना स्वभाविक है। हर राज्य जम्मू-कश्मीर  जैसा बन जाए, तो भारत का संघीय ढांचा  ही तहस-नहस हो जाएगा। वोट की राजनीति भारत पर बहुत भारी पड रही है।  1979 में मेघालय में बंगाली मूल के लोगों को पलायन के लिए विवश  किया गया। 1987 में नेपाली मूल के लोगों को निशाना बनाया गया और फिर 1991-92 में “बिहारियों“ को पलायन के लिए डराया-धमकाया गया। और अब दलित सिखों को टारगेट बनाया गया है। केन्द्र  और राज्य  सरकार समस्या का स्थाई हल निकालने की बजाए अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रही है। मेघालय की कुल  3,211,474 आबादी मेंसे 1,411,775 (लगभग आधी) खासी सनुदाय से है और कोई भी राजनीतिक दल इस समुदाय को नाराज करने की हिमाकत नहीं कर सकता । शिलांग  के समाचार पत्रों ने इस बात को सुर्खियों में प्रकाशित  किया है कि स्थानीय लोगों की पिटाई कर कोई भी “बाहरी“ बच नहीं सकता। शिलांग  में पनपी साम्प्रदायिक हिंसा के लिए इस अफवाह को जिम्मेदार माना जा रहा है कि सिखों ने खासी समुदाय के युवकों को पिटा और इस हिंसा में एक की मौत हो गई जबकि यह मामूली सा क्षणिक झगडा था। एक सिख चालक ने अपना वाहन उस जगह खडा कर दिया, जहां स्थानीय खासी समुदाय की युवतियां पानी भर रही थी। इस पर दोनों पक्षों में तू-तू, मैं-मैं हो गई। बढते-बढते झगडे ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया और प्रशसन को क्षेत्र में कफर्यू लगाना पडा। एक सप्ताह से ज्यादा समय गुजर गया है, तनाव आज भी कायम है। शिलांग के मौलांग घाट में करीब दो एकड के दायरे में पंजाबी कॉलोनी बसी है। डेढ सौ साल से भी पहले फिरंगियों  ने पंजाब के मह्जबी सिखों को यहां लाया और बसाया था। इस बस्ती को आज भी “दलित“ बस्ती और पंजाबी लेन के नाम से जाना जाता है। फिरंगियों ने इस जमीन का पट्टा यहां बसे सिखों के नाम पर दिया था। तब से यह व्यवस्था जारी है। पिछले सप्ताह की हिंसक घटनाओं के बाद  खासी समुदाय से संबंधित लोग दलित सिखों को यहां से शिफ्ट करने की फिर से मांग उठा रहे हैं। सिख किसी भी स्थिति में अपनी जर और जमीन छोडने को तैयार नहीं है।  मौलांग घाट शिलांग  में सबसे पॉश   इलाके पुलिस बाजार के बाद दूसरा बडा कमर्शियल  एरिया माना जाता है। इस कारण इस पर सबकी नजर है। इसी बात को सामने रखकर पंजाबी बस्ती को यहां से बदलने की साजिश  की जा रही है। सिख सर  उठाकर जीने वाली कौम है। शिलांग  के दलित सिखों को इस बात का दुख है कि फिरंगियों ने उन्हें बसाया मगर आजाद भारत उन्हें उजाडने की फिराक में है।

बुधवार, 13 जून 2018

ट्रंप-किम मुलाकात और लच्छेदार बातें

अगर लफ्फाजी से अंतरराष्ट्रीय   मसले सुलझ सकते  तो  मंगलवार को ही  अमेरिका और  उत्तर  कोरिया के बीच रिश्तों  पर छाया घना कोहरा छंट गया होता । मगर शब्दों  का जाल बुनकर कूटनीति के नौसिखिए को  बेवकूफ बनाया जा सकता है,  दुनिया को  नहीं। पूरी दुनिया की पैनी नजर मंगलवार को  अमेरिकी राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप  और  उत्तर को¨रिया के  तानाशाह किम.जाॅग उन की सिंगापुर  शिखर वार्ता  के  परिणाम  पर टिकी थी । मंगलवार को ¨  शिखर वार्ता की पहली कडी में ट्रंप और  किम ने गर्मजोशी  से एक.दूसरे से हाथ मिलाए, मुस्कारते हुए तस्वीरें खिंचवाई , 45 मिनट  'दुभाषिए ¨ के  अलावा एकांत में बगैर  सहायकों  के  गुफ्तगू की और  पत्रकारों  को  संबोधित  किया और अंत मैं  एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया। एक महत्वांकाक्षी दस्तावेज पर भी हस्ताक्षर भी  किए गए। ट्रंप ने इस दस्तावेज  के पत्रकारों   को  दर्शन जरूर करवाए  मगर  मसौदा  जारी नहीं किया।  पहली बार  की मुलाकात  के  लिए यह पर्याप्त था। इतिहास की रचना  हो  चुकी थी। परमाणु निरस्त्रीकरण पर अभी कुछ ठोस  तो  नहीं कहा गया  है मगर इसके  प्रति प्रतिबद्धता जताई गई है। तीन महीने पहले तक एक.दूसरे को  बर्बाद करने की धमकिया देने और  वजन से वजनदारी अपशब्द  कहने वाले दो  मिसाइल पाॅवर सपन्न राष्ट्राध्यक्ष  अगर गले मिलते  हैं  तो  यह न केवल ऐतिहासिक घटना है, अलबत्ता  दो ¨ शत्रु  देशों  के  बीच द्धिपक्षीय संबंधों  के नए अध्याय की  शुरुआत भी है। इस शिखर वार्ता  से चीन का आशंकित होना भी स्वभाविक है। कोरियाई  प्रायद्धीप में अगर शांन्ति कायम हो   जाए तो  देर.सबेर चीन और  अमेरिका जैसे बडे  मुल्कों  की  दादागिरी  खराष्ट्रपति त्म हो  जाएगी। अमेरिका , चीन ऐसा हरगिज नहीं  होने देंगे। छोटे अगर लडना. झगडना छोड़  दें तो  दादागिरी करने वाले कहां जाएंगे?  किम से मुलाकात  के  बाद अमेरिकी  ट्रंप  को  अहसास हुआ है कि उत्तर कोरिया के  तानाशाह ¨ अति  प्रतिभाशाली हैं और  अपने देश  से बहुत प्यार करते हैं "। किम को पागल  बताने वाले ट्रंप से इतनी तारीफ सुनने के  बाद उत्तर को रिया के  तानाशाह जरुर अभिभूत  हुए होंगे । अभी तक इस मुलाकात पर जो  कुछ भी कहा गया हैए वह सब अमेरिकी राष्ट्रपति  ट्रंप ने ही कहा है। ट्रप  ने यह भी दावा किया है कि उतर कोरिया ने परमाणु निरस्त्रीकरण का वायदा किया है मगर उत्तर कोरिया की तरफ से अभी कुछ नहीं कहा गया है। अमेरिका उत्तर कोरिया  पर मानवाधिकार्रों के  घोर उाल्लंघन के   गंभीर  आरोप लगाता रहा है। अमेनेस्टी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय  संस्थाएं भी इस तरह के  आरोप  लगा चुकी हैं। सिंगापुर वार्ता  में   इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा गया है और  न ही अमेरिका ने इसे शिद्दत से उठाया है। किम पर अपने परिजन समेत आलोचकों  और  प्रतिद्धद्धियों  को  रास्ते से हटाने  के  आरोप   हैं। उन्होंने अपने सगे  चाचा तक को मरवा डाला  शिखर वार्ता  से एक दिन पहले सोमवार  को  अमेरिकी विदेश  मंत्री माइक  पोम्पियो  ने परमाणु  निरस्त्रीकरण की स्थिति में  उत्तर कोरिया  को व्यापक परमाणु सुरक्षा कचच  मुहेया कराने की पेशकश  की है। अमेरिका से संबंध सुधरने पर  उत्तर  कोरिया का  ज्यादा फायदा  है।  कोई भी देश  कितना भी ताकतवर क्यों  न हो, वह  अकेला रहकर तरक्की नहीं कर सकता।   सिंगापुर वार्ता  के  बाद उत्तर  कोरिया पर लगे प्रतिबंध  हट सकते हैं। इससे उत्तर कोरिया में विदेशी    निवेश  के  द्धार  खुल सकते हैं। कोरियाई प्रायद्धीप में तनाव कम होने पर उत्तर कोरिया के  तानाशाह किम अपना पूरा ध्यान अर्थव्यवस्था को  सुधारने पर लगा सकते हैं। पडोसी दक्षिण,  उत्तर  कोरिया से ज्यादा विकसित और  तकनीक सपन्न है। उत्तर कोरिया की अवाम अपेक्षाकृत उतनी संपन्न नहीं है,  जितने दक्षिंण के  ¨लोग हैं।  किम की  परमाणु सशस्त्रीकरण की जिद ने पूरी दुनिया को  युद्ध की जद में ले लिया था। सिंगापुर वार्ता इस तनाव को  कम कर सकती है।


शनिवार, 9 जून 2018

आरसएस को राष्ट्रीयता का पाठ

भारतीय जनता पार्टी की “ जननी“  राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के नागपुर स्थित मुख्यालय में पूर्व राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने वीरवार को स्वंयसेवकों को राष्ट्रीयता को जो पाठ पढाया, वह उस महान हस्ती के राजनीतिक दर्शन   का निचोड था, जिससे भगवा संगठन अब तक नफरत करते रहे हैं। पूर्व  राष्ट्रपति  ने अपने भाषण में भले ही जवाहर लाल नेहरु का बार-बार उल्लेख नहीं किया पर उनके भाषण में नेहरु की पुस्तक ”दी डिसकवरी ऑफ इडिया“ वाले भारत की छवि और विरासत समाहित थी। पूर्व राष्ट्रपति के भाषण की शुरुआत ही राष्ट्र , राष्ट्रवाद  और राष्ट्रप्रेम से हुई और उन्होने जोर देकर कहा कि तीनों एक दूसरे से अंतरंग रुप से जुडे हुए हैं और इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। प्रणब “दा“ ने शब्दकोश से ”राष्ट्र -नेशन“ की परिभाषा  भी पढकर सुनाई। ठोस तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित भारत के तार्किक इतिहास के पन्नों को भी उलटा-पलटा और स्वंयसेवकों को समझाया कि संघ का हिंदू मिथकों से भरा इतिहास काल्पनिक है। दुनिया का सारा वैभव,  ज्ञान और प्रोन्नत विज्ञान भारत में ही था, प्राचीन भारत में विमान उडते थे, प्लास्टिक सर्जरी होती थी और महाभारत काल में इटरनेट था और मिसाइलें  भी थी, यह सब काल्पनिक इतिहास का हिस्सा है। भारत  प्राचीन काल से “वसुधैव कुटुबंभम“ वाला देश  रहा है। इस देश  में सात बडे धर्म  हैं, 122 से ज्यादा भाषाएं हैं और 1600 से ज्यादा “बोलियां “ बोली जाती हैं। इसके बावजूद सब मिल-जुल कर एक व्यवस्था, एक पहचान और एक झंडे के तले रहते हें। ऐसे देश  का एक धर्म  और राष्ट्रीयता  हो सकती। उन्होंने साफ-साफ शब्दों में कहा कि  भारत में मिथकों, नफरत और अस के लिए कोई जगह नहीं है।  जाहिर है  पूर्व  राष्ट्रपति  की ये सब बातें आरएसएस के “एक धर्म  और राष्ट्रीयता “ के एकदम विपरीत हैं। आरएसएस की सोच  एकदम अलग है। संघ हिंदू संस्कृति (एक धर्म) को  भारतीयता (राष्ट्रीयता  ) की पहचान मानता है। हिंदू धर्म  और संस्कृति की रक्षा करना हर भारतीय का परम कर्तव्य है। संघ इसी लक्ष्य को सामने रखकर काम कर रहा है। पूर्व राष्ट्रपति ने आरएसएस के सम्मेलन में जो कुछ भी कहा, वह संघ की सोच से एकदम भिन्न है। ऐसे में सवाल उठता है कि आरएसएस ने कांग्रेस से संबद्ध रहे प्रणब मुखर्जी को अपने सम्मेलन में क्यों बुलाया? संघ यह बात तो अच्छी तरह जानता था कि प्रणब मुखर्जी आरएसएस के सम्मेलन में खालिस हिंदुत्व वाली बातें तो कहेंगे नहीं और कहीं न कहीं गांधी, नेहरु का जिक्र करेंगे ही। प्रणब मुखर्जी जैसे मंझे हुए नेता से बेबाक भाषण की ही उम्मीद थी । वैसे प्रणब मुखर्जी की नागपुर यात्रा को लेकर कांग्रेस और अन्य गैर-भाजपाई दलों के साथ-साथ भाजपाइयों में भी खासी उत्सुकता थी। मीडिया ने भी इस यात्रा को खूब उछाला। कॉग्रेस को इस बात का डर था कि कहीं प्रणब मुखर्जी संघ के सम्मेलन में  इस बात पर न फटकारें की पार्टी ने उन्हें दो बार प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया । मुखर्जी राहुल गांधी के भी आलोचक रहे हैं। भाजपाइयों को लंबे समय तक कांग्रेसी रहे प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय की यात्रा को लेकर उत्सुकता थी। और गैर-भाजपाई, गैर कांगेसी दलों को विपक्षी एकता के इस नाजुक समय में एक वयोवृद्ध उदारवादी हस्ती का संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का डर सता रहा था। इस यात्रा के कई अर्थ  निकाले जा सकते थे। आरएसएस ने  प्रणब मुखर्जी को सम्मेलन में बुलाकर यह साबित करने की कोशिश  की है कि कांग्रेस में एक परिवार को छोडकर पूरी पार्टी आरएसएस विरोधी नहीं है। आरएसएस ने गैर-संघी को अपने दीक्षांत समारोह में बुलाकर उदारता का परिचय दिया है। गांधी और नेहरु को खारिज करने वाला संघ अगर प्रणब मुखर्जी जैसे दिग्गज नेता को बुलाकर उनके विचारों को साझा करता है तो असहिष्णुता  के दौर में यह बडी बात है।

शुक्रवार, 8 जून 2018

महंगा कर्ज और कुप्रबंध

साढे चार साल में पहली रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने नीतिगत ब्याज दरें (रेपो रेट) बढाई हैं। बुधवार को आरबीआई ने रेपो और रिवर्स रेपो रेट में 0.25 फीसदी करके बैकों को ब्याज दरें बढाने का रास्ता साफ कर दिया। पिछली बार जनवरी 2014 में आरबीआई ने नीतिगत ब्याज दरें बढाई थी। जनवरी 2016 में रेपो रेट 8 फीसदी था और 2018 में ताजा वृद्धि से पहले यह 6 फीसदी तक कम किया जा चुका था। यानी साढे सार साल में 2 फीसदी की कमी। मोदी सरकार के राज में पहली बार ब्याज दरें बढी हैं।  रेपो रेट बढने से क्योंकि अब बैंकों को आरबीआई से कर्जा  लेने पर ज्यादा ब्याज चुकाना पडेगा, जाहिर है बैंक इसका बोझ ग्राहकों को पास ऑन कर देंगे। भारत में बैंक इतने स्मार्ट है कि रेपो रेट बढते ही वे कर्जदारों पर ब्याज वृद्धि का बोझ डालने में जरा भी विलंब नहीं करते  हैं । मगर जब ब्याज दरें गिरती हैं, बैंक ब्याज घटाने में अरुचि दिखाते हैं। साढे चार साल में आरबीआई रेपो रेट में दो फीसदी की कमी कर चुका है मगर इसकी तुलना में बेंकों ने ग्राहकों को अधिकतम 1.5 फीसदी का लाभ दिया है। दुनिया के कई देशों  की तुलना में भारत में कर्ज  अपेक्षाकृत महंगा है।  2008 की  वैश्विक  मंदी तक भारत में कर्ज  अपेक्षाकृत सस्ता था और देश  में आवास निर्माण बुलदियों पर था। भारत के लिए सुखद स्थिति यह रही कि अर्थव्यवस्था इसकी चपेट में नहीं आई मगर रियल्टी सेक्टर तब से आज तक मंदी से उभर नहीं पाया है। चार साल में कर्ज अपेक्षाकृत सस्ता रहने के बावजूद रियल्टी सेक्टर मंदी से नहीं उभर पाया है। अंतरराष्ट्रीय   बाजार में लगातार बढती तेल की कीमतों से चिंतित आरबीआई को मुद्रा-स्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढाने  पडी हैं। बेलगाम महंगाई को नियंत्रित रखना आज भी देश  के मौद्रिक नीति निर्धारकों की प्रमुख प्राथमिकता है। मोदी सरकार के चार साल में संप्रग सरकार  की तुलना में महंगाई अपेक्षाकृत नियंत्रण में रही है। इसके लिए मोदी सरकार की नीतियों अथवा आरबीआई की मौद्रिक नीति के साथ-साथ 2014 के बाद से सस्ता तेल की भी अहम भूमिका रही है। सस्ते तेल का फायदा लोगों को तो नहीं मिला मगर सरकार ने जब-तब उत्पाद  शुल्क बढाकर जमकर राजस्व कमाया है। चिंता की बात यह है कि देषश  में विदेशी  निवेश  का इनफ्लो लगातार गिर रहा है। ताजा रिपोर्ट  के अनुसार, 2017 में भारत में विदेशी  निवेश  गिरगर 40 अरब डॉलर ही रह गया था। 2016 में भारत में 44 अरब डॉलर विदेशी  निवेश  आया था। इस दौरान एफडीआई आउटफ्लो दोगुना से ज्यादा बढकर 11 आरब डॉलर तक पहुंच गया था। 2017 मे ग्लोबल एफडीआई में भी 23 फीसदी की गिरावट आई है। 2017 में यह 1.43 लाख करोड रु ही रह गया था ।2016 में ग्लोबल एफडीआई 1.83 लाख करोड रु था। भारत समेत विकासशील देशों  के लिए यह चिंता का विषय है। लोगों के लिए राहत की बात यह है कि आरबीआई ने महानगरों में सस्ते कर्ज (प्रायोरिटी सेक्टर लैंडिग)  की सीमा 28 लाख  से बढाकर 35 लाख कर दी है और गैर-महानगरीय शहरों में  20 से 25 लाख कर दी है। आरबीआई के इस फैसले से “अपने घर“ का सपना देखने वालों को राहत मिलेगी। सरकारी बैकों का वित्तीय कुप्रबंध और  भ्रष्ट  कार्यशैली तीव्र ग्रोथ को ग्रहण लगा रहा है। सरकार ने 20  राष्ट्रीयकृत  बैकों के लिए हाल ही में 88,000 करोड रु दिए हैं। बेंकों की पुनर्पं्ूजीकरण योजना के तहत अगले दो साल में  2.1 लाख करोड रु का निवेश  करने का प्रस्ताव है। इस बात की पूरी संभावना है कि बेंकों की बढते एनपीए के दृष्टिगत यह विशाल राशि  भी डूब जाएगी। इससे कहीं ज्यादा बेहतर है कि सरकार इस राशि  को सस्ता कर्ज देने के लिए मुहैया कराए। इससे ग्रोथ को गति मिल सकती है।   

गुरुवार, 7 जून 2018

लुका-छिपी का खेल

लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा के सहयोगी दलों ने भगवा पार्टी को आइना दिखाना  शुरु कर दिया हैं। भाजपा राष्ट्रीय  अध्यक्ष अमित शाह की  शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे की मुलाकात से पहले ही  सेना ने 2019 में लोकसभा चुनाव अकेले लडने का ऐलान कर डाला। बुधवार देर सायं अमित  शाह की उद्धव ठाकरे से मुलाकात को लेकर  शिवसेना के मुख पत्र में मोदी सरकार की कार्यशैली  और भाजपा  के सहयोगी  दलों के राजनीतिक  प्रबंध पर तल्ख टिप्प्पणी की गई है। मुखपत्र के संपादकीय में लिखा गया है,“ पेट्रोल-डीजल के दाम बढे हुए हैं और किसान सडक पर है। इसके बावजूद भाजपा चुनाव जीतना चाहती है। जिस तरह से भाजपा ने साम, दाम, दंड, भेद के जरिए पालघाट (महाराश्ट्र की लोकसभा सीट) का चुनाव जीता, उसी तरह भाजपा किसानों की हडताल को खत्म करना चाहती है।  चुनाव जितने की  शाह की जिद को हम सलाम करते हैं“।  मई में हुए उपचुनाव में महाराष्ट्र  की पालघाट लोकसभाई सीट और नगालैंड की सोल सीट भाजपा ने जीती है। शिवसेना का यह भी आरोप है कि हालिया उप-चुनावों में मिली करारी हार के बाद भाजपा को सहयोगी दलों की याद आई है मगर अब बहुत देर हो चुकी है। महाराष्ट्र  से लोकसभा की 48 सीटें हैं और इस राज्य में  शिवसेना के सहयोग के बगैर भाजपा के लिए 2014 लोकसभा चुनाव बराबर सीटें ला पाना खासा  मुश्किल हो  सकता है ।  2014 में भाजपा ने  महाराष्ट्र  में शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लडा था और  41 सीटें जीती थी। भाजपा ने 24 सीटों पर चुनाव लडा था और 23 सीटें उसके खाते में आईं थी। शिवसेना  ने 20 सीटों पर अपने प्रत्याशी  खडे किए थे और उसके खाते में 18 सीटें आईं थी। मगर विधानसभा चुनाव के समय 25 साल का  भाजपा-शिवसेना  गठबंधन टूट गया था  और दोनों दलों ने अलग-अलग चुनाव लडा।  इसका दोनों को खमियाजा भी भुगतना पडा। भाजपा ने 262 सीटों पर चुनाव लडा मगर 122 सीटें ही जीत पाई। शिवसेना  ने 282 सीटों पर प्रत्याशी  खडे किए मगर मात्र 62 ही जीत पाई।  288 सदस्यीय  महाराष्ट्र  विधानसभा में  स्पष्ट  बहुमत के लिए 144 सीटों की जरुरत है।  भाजपा को 31.15 फीसदी और शिवसेना  को 19.90 फीसदी वोट मिले थे। दोनों दल अगर मिलकर चुनाव लडते, दो-तिहाई बहुमत आसानी से मिल सकता था। अलग-अलग लडे, इसलिए किसी को स्पष्ट  बहुमत तक नहीं मिल पाया। 2014 में भाजपा-शिवसेना   ने मिलकर लोकसभा चुनाव लडा था और 47.9 फीसदी वोट हासिल कर भी विधानसभा से कहीं ज्यादा सीटें जीती थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र  (48), उत्तर प्रदेश (80) बिहार (40) और  पश्चिम  बंगाल की 42 सीटों की अहम भूमिका रहेगी । यानी 543 मेंसे 210 सांसद  तो इन चार राज्यों से  आएंगे। जिस किसी दल अथवा गठबंधन को इन चार राज्यों में ज्यादा से ज्यादा सीटें मिलेगी, वही दिल्ली की गद्दी पर काबिज होगा। उत्तर प्रदेश  और महाराष्ट्र  ने 2014 में भाजपा नीत राजग को सत्ता में लाने में प्रमुख भूमिका अदा की थी। 2014 में भाजपा नीत राजग ने इन दोनों राज्यों से 122 सीटें जीती थी । केन्द्र में फिर से सत्ता में आने के लिए भाजपा को  शिवसेना  का सहयोग उतना ही जरुरी है जितना उत्तर प्रदेश  को 2014 की तरह फतेह करना। मगर चुनावी बयार भाजपा के पक्ष में बहती नजर नहीं आ रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक हुए 27 लोकसभा उपचुनाव मेंसे सिर्फ 6 सीटें ही जीत पाई है। अमूमन, उपचुनाव में सत्तारूढ दल की जीत तय मानी जाती है मगर उत्तर प्रदेश  में भाजपा एक के बाद दूसरा लोकसभा चुनाव हार रही है, उसका ख्याल करते हुए लगता नहीं है कि भाजपा का 2014 वाला “विजय अभियान“ जारी रह पाएगा। भाजपा को इस सच्चाई को गले लगाना ही पडेगा कि  जमाना गठबंधन की राजनीति का है और अगर 2019 में फिर से सत्ता में आना है, तो छोटे-बडे हर सहयोगी दल को साथ लेकर चलना ही पडेगा।


बुधवार, 6 जून 2018

“मोदीकेयर से मोदीवेल्फेयर“

लोकसभा चुनाव के लिए  करीब एक साल का समय पडा है मगर केन्द्र और 21 राज्यों में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी ने अभी से कमर कस ली है। भाजपा राष्ट्रीय  अध्यक्ष देश  की प्रभावशाली हस्तियों से मिलकर मोदी सरकार की परर्फोमेंस का  फीडबैक ले रहे हैं तो सभी मंत्रियों-पार्टी सांसदों को जन-जन से संपर्क  करने को कहा गया है। उधर, सरकार ने कामगारों, वृद्धों, महिलाओ और उपेक्षित तबकों के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना का मसौदा तैयार किया  है। 2019 के लोकसभा चुनाव तक समाज के हर तबके को पटाना भाजपा का लक्ष्य है। इस साल के बजट में सरकार ने नेशनल हैल्थ प्रोटेक्शन  स्कीम (एनएचपीएस) लागू करने की घोषणा की थी। दुनिया की सबसे बडी स्वास्थ्य योजना माने जाने वाली एनएचपीएस के तहत आर्थिक तौर पर कमजोर 50 करोड लोगों के लिए प्रति परिवार 5 लाख का बीमा कराया जाएगा । इस साल अक्टूबर से इस योजना को लागू  किया जा रहा है। इस योजना के तहत पात्र लोगों को बीमारी की स्थिति में सरकारी अथवा निजी अस्पतालों में उपचार का खर्चा बीमा राशि  से अदा  किया जाएगा । योजना पर हर साल लगभग 10 हजार से 12 हजार करोड रु का खर्चा  आएगा। केन्द्र 60 फीसदी और 40 फीसदी का खर्चा  राज्यों को वहन करना पडेगा। और अब मोदी सरकार एक और वेल्फेयर योजना  शुरु करने जा रही है। इस योजना के तहत वृद्धावस्था पेंशन , स्वास्थ्य बीमा और प्रसूति लाभ देने का प्रस्ताव है। इस योजना का लक्ष्य भी 50 करोड लोगों को लाभान्वित करना है। सरकार इस बात को भी मानती है कि देश के 11 करोड वृद्धों के लिए सामाजिक सुरक्षा की जरुरत है। इन मेंसे मात्र 35 फीसदी को पेंशन मिल रही है  है। बाकी 65 फीसदी परिवार पर आश्रित हैं। बेहतर स्वास्थय सुविधाओं के कारण देश  में जीवन प्रत्याशा  (लाइफ  एक्सपेक्टेंसी ) भी बढी है मगर इस अनुपात में सामाजिक सुरक्षा का दायरा नहीं बढा है। राज्यों की सरकार ने वृद्धाओं को पेंशन तो दी है मगर, यह इतनी कम है कि इससे दो दिन  तक भी गुजर-बसर नही हो सकती।  अगर देश  के सांसदों और विधायकों को केवल एक टर्म  पूरी करने पर भी पेंशन मिल सकती है, तो उस आम आदमी को क्यों नहीं जिसका प्रतिनिधि बनकर सांसद अथवा विधायक सामाजिक सुरक्षा का हकदार बन जाता है।  भारत में अभी भी सामाजिक सुरक्षा पर जीडीपी का 2 फीसदी से भी कम खर्च  किया जाता है। अमेरिका अपने बजट का 24 फीसदी ओर चीन लगभग 12 फीसदी बजट सामाजिक सुरक्षा पर खर्च करता है। बहरहाल, चुनावी मकसद से ही सही, मोदी सरकार का कमजोर और असहाय तबकों के लिए सामाजिक सुरक्षा मुहैया कराने का प्रस्ताव स्वागत योग्य है। निसंदेह, यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था। सरकार को इस बात का अहसास होना चाहिए कि जन प्रतिनिधियों से कहीं ज्यादा आर्थिक रुप से कमजोर तबकों को  सामाजिक सुरक्षा की जरुरत है। मोदी सरकार की स्वास्थय बीमा योजना के साथ-साथ अगर लोगों को और व्यापक सामाजिक सुरक्षा मिलती है, इसमें आम आदमी की ही भलाई है। जनता बडी सयानी है और सब जानती है।       

मंगलवार, 5 जून 2018

कश्मीर: जन्नत से “नर्क“ की ओर

 एक जमाने में जन्नत माने जाने वाली  खूबसूरत  कश्मीर  घाटी अब “नर्क“ से भी बदतर बन गई है। हिंसक हमले, मुठभेड, प्रदर्शन  और कर्फ्यू तो घाटी की राजमर्रा की बात बन चुकी है। सुरक्षाकर्मियों पर पत्थर फेंक आतंकियों की  सहायता  करना अलगाववादियों की फितरत है। सुरक्षाकर्मियो को देखते ही पत्थर बरसाए जाते हैं। ऐसा सिर्फ  भारत में ही हो सकता है। चीन और पाकिस्तान में अगर सैनिकों पर पत्थर फैंके जाते, तो दोषियों को कडी से कडी सजा मिलती। अलवाववादियों और पत्थरबाजों को पालने -पोसने और पुचकारने का काम भारत में ही हो सकता है, चीन-पाकिस्तान में नहीं। आए रोज की हिंसक वारदातों और फिर कर्फ्यू लगने से बच्चों की पढाई पर बहुत बुरा असर पडा है। स्थानीय पर्यटन और उधोग-धंधे चौपट हो गए हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो सालों के दौरान कश्मीर घाटी में स्कूल और कॉलेजिज 60 फीसदी से भी ज्यादा कार्य दिवस पर बंद रहे हैं। इस साल स्थिति मे कोई सुधार नहीं आया है। स्थानीय लोगों को सुरक्षा मु्हैया कराना तो दीगर रहा, सुरक्षाकर्मियों को अपनी जान बचाना भी  मुश्किल  हो रहा है। सुरक्षाकर्मियो पर अब ग्रेनडों से हमला किया जा रहा है। सोमवार को कश्मीर के आतंक पीडित शोपियां जिले में ग्रेनेड हमलों में 4 पुलिसकर्मी और 12 नागरिक घायल हो गए। शनिवार को आतंकियों ने श्रीनगर में अलग-अलग स्थानों पर ग्रेनेड फेंककर 4 जवान और 6 लोगों को जख्मी कर दिया था। शुक्रवार जुमे की रोज श्रीनगर में केन्द्रीय रिजर्व  पुलिस (सीआरपीएफ) की जीप की चपेट में आने से एक युवक की मौत हो गई थी और दो अन्य गंभीर रुप से घायल हो गए थे। भीड द्वारा  सीआरपीएफ वाहन पर हिंसक आक्रमण के बाद यह हादसा पेश  आया। रमजान माह होने के कारण सरकार ने संघर्ष   विराम की घोषणा कर रखी है। इस दौरान सुरक्षाकर्मी  अपनी तरफ से गोलीबारी नहीं करते हैं और “ऑपरेशन ऑल आउट“ को फिलहाल स्थगित किया गया है। मगर इस संघर्ष  विराम से घाटी में अमन-चैन तो लौटा नहीं मगर आतंकियों को खूब आजादी मिली हुई है। रिपोर्ट के अनुसार मई माह में कश्मीर में 20 युवा आतंकी संगठनों में भर्ती हुए है। यह सिला इस माह भी बद्स्तूर जारी है। दो दिन पहले राज्य के आईपीएस कॉडर के एक पुलिस अधिकारी का यूनानी डॉक्टर भाई आतंकी संगठन में शामिल हो गया । इस साल अब तक 80 कश्मीरी  आतंकी सगठनों में भर्ती हो चुके है। पिछले साल 126 युवा आतंकी बने थे। 2010 के बाद यह सबसे बडी संख्या थी। सेना ने माना है कि  कश्मीर में सक्रिय 250 आतंकियों मेंसे 120 स्थानीय आतंकी दक्षिण कश्मीर में डेरा जमाए हुए हैं। सेना सीमाओं की सुरक्षा कर सकती है, दुश्मनों  के दांत खट्टे कर सकती है, आतंकियों से लड सकती है मगर युवाओं को आतंकी बनने से नहीं रोक सकती। यह काम सियासी नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी है मगर सियासी नेता हैं कि अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने और सत्ता का सुख भोगने में मशगूल हैं। लोगों का दुख-दर्द  बांटने से उन्हें कोई सरोकार नहीं है।  जम्मू-कश्मीर में सतारूढ  पीडीपी-भाजपा सरकार इस बात की मिसाल है। दोनों राजनीतिक दल वैचारिक और सामरिक तौर पर एक-दूसरे से कोसों दूर है। महबूबा मुफ्ती की अगुवाई वाली पार्टी अजगाववादियों के करीब है और लगातार बातचीत में उन्हें शामिल करने की पैरवी करती है। पीडीपी की पहल पर ही केन्द्र सरकार रमजान माह में संघर्ष  विराम पर सहमत हुई है। सहयोगी भाजपा इससे उलट अलगाववादियों से सख्ती से निपटने और अलगाववादियों के  “ तुष्टिकरण' के सख्त खिलाफ है। दो विपरीत दिशाएं सता में रहकर भी नहीं मिल सकती। इससे सिर्फ  अराजकता ही पनपती है। कश्मीर में यही हो रहा है। बहरहाल, सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती यही है कि युवाओं को आतंकी संगठनों में  शामिल होने से कैसे रोका जाए और उन्हें सेना अथवा पुलिस में भर्ती होने के लिए कैसे प्रेरित किया जाए?

रविवार, 3 जून 2018

महात्मा गांधी और आधी बाल्टी पानी

देश  में पेयजल के भीषण संकट के  मद्देनजर   यह  प्रश्न  प्रासंगिक है कि अगर  राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी आज हमारे बीच होते, तो इस संकट से कैसे निपटते़? इस संबंध में  गुजरात में आज भी बापू को लेकर यह प्रसंग बताया जाता है। एक बार महात्मा गांधी  नहाने के लिए  साबरमती नदी से बाल्टी में पानी भर रहे थे। उन्होंने आधी बाल्टी ही भरी और आश्रम को चल दिए। पास से गुजर रहे व्यक्ति ने कौतूहलवश  बापू से पूछ ही लिया कि उन्होंने आधी बाल्टी क्यों भरी जबकि नदी में प्रर्याप्त पानी है। महात्मा गांधी का जवाब था, “ मुझे नहाने के लिए आधी बाल्टी की ही जरुरत है। फिर मैं ज्यादा पानी क्यों इस्तेमाल करूं। नदी के पानी पर सबका बराबर का हक है। बेशक साबरमती में प्रर्याप्त पानी है मगर इसे व्यर्थ  में बहाना गलत है“। राष्ट्रपिता  दूरदर्शी  थे और उन्हें इस बात का अहसास था,  देर-सबेर भारत में पेयजल का संकट होगा। इसलिए वे हमेशा  पानी बचाने पर जोर देते। मेरे पिताश्री ने भी मुझे महात्मा गांधी को लेकर एक रोचक प्रसंग सुनाया था। महात्मा गांधी के शिमला प्रवास के दौरान पिताश्री उनके साथ थे। एक बार पिताश्री से नल थोडा से खुला रह गया। इस पर उन्हें बापू से  डांट खानी पडी। गांधी ने उन्हें समझया था  की बूंद -बूंद  पानी   बचाकर  ही    भविष्य के संकट से निपटा जा सकता है । पिताजी  ने यह बात  गांठ में   बांध  ली  और ताउम्र आधी बाल्टी से ही नहाते रहे ।  दुनिया  में  3 फीसदी ही ताजा पानी है और इसमें कोई इजाफा नहीं हो रहा है। मगर आबादी के बेताहाशा  बढने से पानी की खपत दिन-ब-दिन, साल-दर-साल बढ रही है। इसका एकमात्र उपाय यही है कि हम बूंद-बूंद पानी बचाएं। महात्मा गांधी के आदर्शों   पर चलने  की कसमेँ  खानेवाले नेताओं की इससे सीख लेनी चाहिए।            

शनिवार, 2 जून 2018

टूट रहा है मोदी का तिलिस्म?

पूर्व से  पश्चिम,  उत्तर से दक्षिण भारत की चार लोकसभाई और 11 विधानसभाई हलकों के लिए हुए ताजा चुनाव  नतीजों कीे दीवारों पर लिखी इबादत साफ पढी  जा सकती है। इंदिरा गांधी का जमाना हो या नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता, एकजुट विपक्ष सत्तारूढ दल पर हमेशा  भारी पडता है। चुनावी  आंकड़े  उठा  कर देख लें,  सत्तारूढ़  दल से  कहीं ज्यादा  विपक्ष के पक्ष  वोट पड़ते रहें हैं । यह बात दीगर है कि चुनाव  समय की  एकजुटता की आयु ज्यादा लंबी नहीं होती है और सत्ता का सुख भोगते-भोगते बिखर जाती है। एकजुट विपक्ष ने उत्तर प्रदेश  के कैराना और महाराष्ट्र की  गोंदिया-भंडारा सीट को भाजपा से छीन कर 2019 के लोकसभा चुनाव की पटकथा लिख दी है। कैराना में उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की  प्रतिष्ठा  भी दांव पर थी। प्रधानमंत्री ने कैराना के साथ लगते बागपत में बडी रैलियां की। आधे-अधूरे एक्सप्रैस का उदघाटन कर रोड शो  तक किया। मतदाताओं को लुभाने के हर संभव प्रयास किए गए। मगर मतदाताओं को लुभा नहीं पाए।  महाराष्ट्र  के पालघर और नगालैंड की सोल सीट पर भाजपा और सहयोगी पार्टी की जीत भी उत्तर प्रदेश  में मिली करारी हार के जख्म सहला नहीं सकती। दो माह पहले उत्तर प्रदेश  में गोरखपुर और फुलपुर चुनाव में एकजुट विपक्ष से हारी भगवा पार्टी ने कैराना उपचुनाव मैं पूरी ताकत झोंक  दी  थी । मगर कैराना में भी भाजपा अपनी प्रतिष्ठा  बचा नहीं पाई। इस बार भी एकजुट विपक्ष ने भाजपा विजय के रथ पर सवार नहीं होने दिया। कैराना में विपक्ष की साझा और  राष्ट्रीय  लोकदल की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने चर्चित पूर्व सांसद हुकुम सिंह की बेटी को भारी मतों के अंतर से पराजित किया है। यह सीट हुकुम सिंह के निधन से खाली हुई थी और  भाजपा को पूर्व  सांसद की बेटी मृगांका सिंह के पक्ष में सहानभूति लहर की  उम्मीद थी। कैराना पष्चिम उत्तर प्रदेश  में है और 2014 के लोकसभा चुनाव में इस क्षेत्र में भाजपा मतदाताओं का धु्रवीकरण कराने में सफल रही थी। इससे पहले 2013 में  पश्चिम  उत्तर प्रदेश  साम्प्रदायिक हिंसा से पीडित रहा है। भाजपा के लिए यह बात और भी शर्मनाक है कि पार्टी इस लोकसभाई हलके में पडती नूरपुर विधानसभा सीट तक नहीं जीत पाई। यह सीट समाजवादी पार्टी ने जीती है। बिहार में भाजपा की संगत नीतिश  कुमार को ले डूबी है और वहां जोकीहट विधानसभा सीट लालू यादव की राजद ने भाजपा-जद(यू) गठबंधन से छीन ली है। झारखंड में सतारूढ भाजपा राज्य की दोनों  विधानसभा सीटों पर झारखंड मुक्ति मोर्चे से हार गई है। संक्षेप में लोकसभा से लगभग एक साल पहले का चुनाव परिदृश्य   भाजपा के पक्ष में नजर नहीं आ रहा है और एक साल में स्थिति बद से बदतर हो सकती है। उत्तर प्रदेश  में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से भाजपा एक भी चुनाव नहीं जीत पाई है। दिल्ली में पॉवर का रास्ता उत्तर प्रदेश  होकर जाता है। 2014 में भाजपा को केन्द्र में सत्तारूढ कराने के लिए उत्तर प्रदेश  ने अहम भूमिका निभाई थी। उत्तर प्रदेश  में  21.2 फीसदी दलित हैं और 19.6 मुसलमान है। पश्चिम  उत्तर प्रदेश  में मुसलमान की आबादी अन्य क्षेत्रों से कहीं ज्यादा है और 15 फीसदी जाट है़। क्षेत्र के जाट चौधरी चरण सिंह के समय से  राष्ट्रीय   लोक दल के  परंपरागत समर्थक है। इस बार कैराना में जाट (लोकदल), दलित (मायावती) और मुसलमान (समाजवादी पार्टी) ने मिलकर भाजपा के  ध्रुवीकरण  को मात दे दी। अगर विपक्ष 2019 में भी इसी तरह एकजुट रहा, तो भाजपा का देश  के सबसे बडे राज्य में सुपडा साफ हो सकता है। ठीक उसी तरह जिस तरह 2014 में समाजवादी, बसपा और कांग्रेस-रालोद ने अलग-अलग चुनाव लड एक दूसरे के वोट काट कर अपना ही सुपडा साफ करवाया था। “दूध का जला, छाछ फूंक-फूंक कर पीता है। 2019 के लोकसभा चुनाव में गैर-भाजपाई दल अगर इसी गणित पर काम करें तो भाजपा को कडी चुनौती दे सकते हैं।                       

शुक्रवार, 1 जून 2018

प्रधानमंत्री का इंडोनेशिया दौरा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इंडोनेशिया दौरे पर भारत से ज्यादा चीन को चिंता सताए जा रही है। सामरिक विषय हो या कारोबार, बीजिंग, नई दिल्ली पर पैनी नजर रखता ही है। भारत की हर कूटनीति पहल पर चीन की त्वरित प्रतिकिया रहती ही है। यह कूटनीति का अहम हिस्सा है।  इंडोनेशिया दुनिया का एकमात्र ऐसा मुस्लिम देश  है जहां हिंदू संस्कृति का आज भी प्रभुत्व है। अपनी साझी संस्कृति के लिए यह मुल्क पूरी दुनिया में जाना जाता है। इंडोनेशियाई का बाली द्धीप हिंदू बहुसंख्यक है। इसी बात के  दृष्टिगत  प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान बाली और उत्तराखंड को “सहोदर राज्य“ बनाने की घोषणा भी की गई है। दोनों देशों  में काफी सांस्कृतिक समानताएं हैं। रामायण और महाभारत को इंडोनेशिया में उतनी ही शिद्धत से पवित्र ग्रंथ माना जाता है जितना भारत में। इतना ही नहीं अगर रामायण और महाभारत का उल्लेख होता है, तो इंडोनेशियाई कहेंगे “ ये तो हमारे ग्रंथ हैं“। इंडोनेशियाई की रामायण और महाभारत में प्रसंग भले ही भिन्न हो पर कथानक एक जैसा है।  समानताएं् इतनी कि इंडोनेशिया की भाषा , इतिहास और मिथकों में भी हिंदू और बौद्ध धर्म  का असर है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और इंडोनेशिया के  राष्ट्रपति  जोको विडोडो की पतंगबाजी  वीरवार को मीडिया में सुर्खियों मे छाई रहीं। पतंगबाजी भारत और इंडोनेशिया के बीच सदियों पुराने सौहार्दपूर्ण  संबंधों का प्रतीक है।  भारत की ही तरह इंडोनेशिया भी आतंक से पीडित है। 2002 मे बाली में हुई बमबारी और तदुपंरात के आतंकी हमलों ने इंडोनेशिया को हिला कर रख दिया है। हालिया में चर्चों  पर  आतंकी हमलों ने देश  को दहला दिया था। भारत की ही तरह धार्मिक कट्टरवाद इंडोनेशिया  की सामाजिक विविधता को खोखला  कर रहा है। प्रधानमंत्री के दौरे के दौरान इन सब मुद्दों पर चर्चा हुई है और दोनों मुल्कों ने एक-दूसरे का हाथ बंटाने का संकल्प दोहराया है। प्रधानमंत्री वीरवार को अपना इंडोनेशियाई दौरा पूरा करके सिंगापुर पहुंच गए हैं। दोनों देशों  के बीच  15 करारों में सुमात्रा द्धीप के संबाग और भारत के अंडेमान द्धीप  के बीच सामरिक सहयोग पर फिर से सहमति बनी है। सुमात्रा का सबांग वही क्षेत्र है जिस पर चीन को कडा ऐतराज है। दरअसल, सबांग मलक्का स्ट्रेट के रास्ते दुनिया को समुद्री रास्ते से जोडता है और  यह छह मेंसे एक महत्वपूर्ण  समुद्री पतला मार्ग  है।  चीन के लिए यह काफी स्ट्रेटेटिजक क्षेत्र है क्योंकि इसी क्षेत्र से तेल की आवाजाही होती है। चीन मलक्का स्ट्रेट को काफी इस्तेमाल करता है। भारत का इस क्षेत्र में प्रवेष चीन को जरा भी गवारा नहीं है। हिंद-प्रशांत  महासागर में चीन की बढती पैठ से इंडोनेशिया  काफी चिंतित है और उसने 2014-15 से ही इस मामले में भारत से सहयोग करना  शुरु कर दिया था। तब से वह भारत के करीब आने के लिए तडप रहा था।  जकार्ता ने संबाग में  भारत को आर्थिक और सैन्य सहायता भी पहुंचाई है। इंडोनेशिया ने भारत को  सबांग  में निवेश  की अनुमति भी दे दी है। चीन इस पर लाल-पीला हो रहा है। चीन ने भारत को चेताया भी है कि  सबांग  द्धीप तक सैन्य पहुंच से नई दिल्ली प्रत्यक्ष तौर पर चीन से सामरिक प्रतिस्पर्धा में आ जाएगा। लेकिन यह भी सच है कि भारत, चीन के साथ सैन्य प्रतिस्पर्धा में नहीं आना चाहेगा। चीन को भारत द्वारा दक्षिण-पूर्व एषिया में बंदरगाहों के निर्माण में निवेश  करने पर कोई ऐतराज नहीं है और वह इसका स्वागत करता है। इन बंदरगाहों का अगर भारत सैन्य इस्तेमाल करता है, तो उस पर चीन को सख्त ऐतराज है। इससे पूरे क्षेत्र में तनाव ही बढेगा। भारत भी ऐसा नहीं चाहेगा। प्रधानंमत्री की मौजूदा इंडोनेशिया, सिंगापुर और मलेशिया की यात्रा भारत के लिए तो सामरिक तौर पर महत्वपूर्ण है ही, चीन पर भी इसका असर पडना तय है।