शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2018

कंगाली में सौगात

हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को सत्ता में आए करीब एक साल होने जा रहा है। सरकार की माली हालात बेहद खराब है मगर जयराम सरकार रोजमर्रा का खर्चा चलाने और लोक-लुभावने वायदे पूरे करने के लिए भी उधारी ले  रही है। हाल ही में  सरकार ने 500 करोड की उधारी लेकर इसमेंसे 200 करोड रु सरकारी कर्मचारियों और पेंशनधारियों को बतौर दीवाली तोहफा बांट दिए  हैं । कर्मचारियों और पेंशनरों को़ उनका देय जारी करना अच्छी बात है मगर दीवाली का तोहफा कमाई से दिया जाना चाहिए, उधारी लेकर नहीं। उधारी के पैसे से दीवाली के तोहफे नहीं बांटे जाते। सरकार कब तक उधारी लेकर जनता को मूर्ख बनाती रहेगी। एक साल से भी कम समय में जयराम सरकार 2000 करोड रु के ऋण ले चुकी है। साल-दर-साल हिमाचल प्रदेश  की जनता पर सरकारी कर्ज  का बोझ बढता जा रहा है। अब तक सरकार 48,000 करोड रु का कर्जा उठा चुकी है। राज्य सरकार इस वित्तीय साल में 4500 करोड रु का कर्जा ले सकती है। कर्मचारियों और पेंशनरों को महंगाई भता देने के लिए सरकार के पास माकूल वित्तीय साधन नहीं है और इसके लिए उसे बार-बार कर्जा  लेने पड रहा है।  अपने “चहेतों को रेवडियां बांटने की गर्ज  से सरकार  घाटे में चल रहे उपक्रमों का बोझ ढोए जा रही है। कर्मचारियों को  महंगाई भत्ता देने के लिए भी  अगर सरकार को उधार लेना पडा तो साफ है सरकार के पास विकास के लिए वित्तीय संसाधन नहीं है।  कुशल वित्तीय प्रबंध का तकाजा है कि सरकार नौकरशाही की छंटनी (डाउनसाइज) करे, घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों को बंद करे। भाजपा जब विपक्ष में थी, यही सुझाव देती थी। मगर ऐसा करने की बजाए जयराम सरकार ने सरकारी उपक्रमों में राजनीतिक नियुक्तियां करके खजाने पर और ज्यादा बोझ डाला है। पिछले कुछ सालों से हर सरकार यही करती रही है।  ऐसा वित्तीय  प्रबंध ज्यादा देर तक  तो चल नहीं सकता  और  इससे  साफ  जाहिर है कि जयराम सरकार  भी वक्त गुजार रही है।

सोमवार, 22 अक्टूबर 2018

नाम बदलने से कुछ नहीं होगा!

पुराना जुमला है, “ नाम में क्या रखा है“। भगवा पार्टी कहेगी“ जनाब बहुत कुछ रखा है“। और अगर नाम, उपनाम इतिहास से जुडे हों और  तो बहुत कुछ। इतिहास धर्म या आस्था का फर्क नहीं जानता। जो भी सच और षास्वत है, इतिहास में दर्ज  है। भगवा पार्टी के लाख चाहने पर भी इतिहास को बदला नहीं जा सकता। मगर भगवा पार्टी  है  कि  इतिहास को भी अपनी सुविधानुसार बदल रही है ।  भगवा संगठनों को मुसलमानों से सख्त नफरत है, इसलिए भाजपा बाबरी मसजिद से लेकर, मुगलसराय और इलाहाबाद का नाम मिटाने पर “अटल“ हैं।  शिमला का नाम बदल कर  श्यामला  रखना भगवा पार्टी का ताज प्रकल्प है। पहले  शिमला का नाम सिमला  हुआ करता था। आजादी के बाद स्वदेशी   सरकार ने इसका नाम सिमला की जगह  शिमला रख दिया था। अब जयराम ठाकुर सरकार षिमला की जगह “श्यामला “ रखने पर विचार कर रही है हालांकि मुख्यमंत्री ने नामकरण की गेंद  जनता के पाले में डाल दी है। इतिहास में अठारहवीं षताब्दी तक  शिमला में जाखू  के आस-पास थोडी बहुत आबादी हुआ करती थी। बाकी का क्षेत्र वनाच्छादित हुआ करता था। मगर नाम सिमला ही था। यह नामकरण “श्यामला “ देवी पर रखा गया था। श्यामला  को “काली“ का अवतार माना जाता है। 1806 में नेपाली  शासक भीमसेन थापा ने  इस  वनाच्छादित  क्षेत्र पर हमला बोलकर इसे अपने कब्जे में कर लिया था। 1814-16 के बीच नेपाली  शासक और ईस्ट इंडिया कंपनी में युद्ध के फलस्वरुप 2 दिसंबर, 1815 को  सुगौली संधि हुई थी। इस संधि के अनुसार नेपाल के अधीन का एक  तिहाई  हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के हवाले कर दिया गया और इसमें कुमाऊं, गढवाल, तराई क्षेत्र और  सिमला भी  शामिल था। 1819 में हिल स्टेटस के पॉलिटिक्ल एजेंट लेफटिनेंट रॉस ने  शिमला में पहला लकडी का घर बनाया था। तीन साल बाद 1822 में  रॉस के उतराधिकारी नौकरशाह चार्ल्स प्रैट कनेडी ने  शिमला में पहला पक्का  भवन बनाया था। कनैडी हाउस के नाम से यह भवन आज भी हिमाचल विधानसभा भवन के बगल में विराजमान है। 1827 में भारत के गवर्नर जनरल लार्ड विलियम एमहर्स्ट जब पहली बार  शिमला आए तो  कनेडी हाउस में ही ठहरे थे। उनके लिए  शिमला में मौजूदा रिज से जाखू तक तीन मील लंबी सडक का निर्माण भी किया गया और इस पर एक पुल भी बनाया गया था। 1830 में फिरंगियों ने पटियाल और क्योंथल रियासत से काफी बडा हिस्सा ले लिया और शिमला को बसाना  शुरु कर दिया। नतीजतन,  शिमला की आबादी  1830 में  30 से बढते-बढते  1881 में 1141 तक पहुंच गई थी। फिर  शिमला ईस्ट इंडिया कंपनी की  ग्रीष्मकालीन  राजधानी बन गई।  शिमला में बिजली सप्लाई के लिए नॉटी खड्ड पर चाबा में पॉवर प्रोजेक्ट लगाया गया और गुम्मा से पानी लिफ्ट किया गया। 1903 में 806 पुलों का निर्माण कर और  103 सुरंगें खोदकर कालका- शिमला रेलवे लाइन बनाई गई। स्वदेशी  सरकार आज तक इस रेल लाइन को बॉड गेज नहीं कर पाई है। फिरंगियों ने  शिमला में गोर्तो  कैसल, बन्तोय कैसल, वाइसरीगल लॉज जैसी  एतिहासिक भवनों का निर्माणकिया है।  शिमला का नाम भर बदलने से फिरंगी षासन की कडवी यादें भुलाई नहीं जा सकती। इतिहास से सीखने की जरुरत है। फिरंगियों ने  शिमला के लिए जो कुछ किया है, स्वदेशी  सरकारें उसकी सानी नहीं  कर सकती। नाम बदलने से कुछ नहीं होगा।  बदलना है तो “ सडी -गली  शासन व्यवस्था को बदलें।  सरकार  की   कार्यशैली  बदलें और  शासक की बजाए  असल में जनसेवक बनें।

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

बेहद निराशाजनक

देश  में कुछ हालिया घटनाएं बेहद निराशाजनक है। सबरीमाला में महिलाओ के प्रवेश  को लेकर जो कुछ हो रहा है, उससे पूरी दुनिया में भारत की खिल्ली उडाई जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश  के बावजूद कटटरपंथी महिलाओं को  सबरीमाला मंदिर में प्रवेश  नहीं  होने  दे रहे हैं।  शुक्रवार को  मुख्य पुजारी द्वारा महिलाओं के प्रवेश  की स्थिति मे मंदिर को बंद करने की धमकी के बाद एक पत्रकार समेत दो महिलाओं को भारी सुरक्षा के बावजूद मंदिर में प्रवेश  किए बगैर लौटना पडा। इतना ही नहीं मंदिर में प्रवेश  करने का साहस जुटाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता  रेहना फातिमा के कोच्चि स्थित घर पर हमले भी किए गए। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा महिलाओं को मंदिर प्रवेश  नहीं देने पर साथ-साथ हैं। भगवान अयप्पा के इस मंदिर में सदियों से महिलाओं का प्रवेश  इस बिला पर वर्जित है क्योंकि  अयप्पा  ब्रह्मचारी थे। श्रद्धालु लुंगी पहनकर अयप्पा के  दर्शन  करने सबरीमाला मंदिर आते हैं और कई दिन तक  ब्रह्मचर्य  का पालन करते हैं।  लेकिन बहुत कम लोगों को मालुम है कि सबरीमाला आने से साठ किलोमीटर पहले एक छोटे से कस्बा है जहां वावर नाम की एक मस्जिद है और सबरीमाला आने वाले तीर्थयात्री इस मस्जिद में परिक्रमा करते हैं। पिछले पांच सौ सालों से यह यह परंपरा जारी है। इस बात के  दृष्टिगत यह बात अजीब लगती है कि सबरीमाला मंदिर में आज भी महिलाओ के प्रवेश  को लेकर कांग्रेस समेत सभी कटटरपंथी  संवेदनशील   हैं।  जिस तरह से राजनीतिक दल इस मामले में कूद पडे हैं, उससे साफ है कि यह मामला भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण की तरह  धर्मिक कम राजनीतिक ज्यादा है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही इस मामले को हवा देकर राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। इस मामले ने महिलाओं को सशक्त करने के राजनीतिक आडंबर की कलई भी खोल दी है। न्यायपालिका का  सम्मान करने से कहीं ज्यादा राजनीतिक दलों को अपने वोट बैंक की परवाह रहती है।

भाजपा के  राष्ट्रीय  प्रवक्ता संविद पात्रा का यह बयान बेहद हास्यास्पद है कि उनकी पार्टी को बदनाम करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पाकिस्तान के साथ साजिश  कर रहे हैं। सरकार भारत की जनता चुनती है, पाकिस्तानी अवाम की इसमें कोई रोल नहीं है। इस तरह के ऊल-जलूल  बयान देकर भाजपा अपनी कमजोरियां ही उजागर करती है। कांग्रेस को पाकिस्तान के साथ जोडकर भाजपा जनता को अब और मूर्ख नहीं बना सकती।

हिमाचल में जयराम ठाकुर सरकार ने पार्टी नेताओं को भारी घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों में लाभ के पद देकर कर्ज  में आकंठ डूबे प्रदेश  का  बड़ा  अहित किया है। इस समय प्रदेश  की जो माली हालात है, उसका ख्याल करते हुए घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों पर अतिरिक्त बोझ डालने की बजाए, उन्हें स्वाबलंबी बनाया जाना चाहिए। नब्बे के बाद से राज्य में हर सरकार उधारी लेकर काम चला रही है। जयराम ठाकुर सरकार के सत्ता में आए लगभग एक साल होने जा रहा है मगर राज्य की वित्तीय स्थिति सुधारने की दिशा  में कोई कारगर उपाय नहीं किए गए हैं। सिर्फ  घोषणाएं की जा रही है। मौजूदा सरकार की भी लगभग वही कार्यशैली है, जो वीरभद्र सिंह सरकार की थी।     

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

खोजी पत्रकारिता करोगे तो होंगे बर्बाद !

बुलगारिया की खोजी महिला पत्रकार विक्टोरिया मिनिरोवा की बलात्कार के बाद जघन्य हत्या और सऊदी अरब के नामी मत्रकार जमाल खाशोज्जी का दूतावास से लापता हो जाने की घटनाएं जितनी दुखद हैं, उससे कहीं ज्यादा निदनीय हैं। जमाल खाशोज्जी दो अक्टूबर से तुर्की से लापता हैं। वे तुर्की स्थित अपने मुल्क सऊदी अरब के वाणिज्य  दूतावास से कुछ अहम दस्तावेज लेने गए थे मगर वापस नहीं लौटे। उनकी मंगेतर हदीजे जेनगीज दूतावास के बाहर घंटों जमाल का इंतजार कर्ती  ही  रह गई । तुर्की सरकार का आरोप है कि दूतावास के भीतर ही जमाल का कत्ल कर दिया गया। सऊदी सरकार कह रही है कि जमाल अपना काम खत्म करके लौट गए थे। आखिर जमाल कहा चले गए़ उन्हें जमीन निगल गई या आसमान खा गया? उनकी मंगेतर यह सवाल कर रही है। तमाम परिस्थितियांपरक साक्ष्य यही साबित कर रहे हैं कि   जमाल खाशोज्जी को दूतावास के अंदर ही निपटा दिया गया है।  वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने अंतिम लेख में जमाली ने यमन में सऊदी अरब के दखल की मुखर आलोचना की थी। जमाल जब तक सऊदी अरब के  शाही परिवार (शासक)  के समर्थक थे, आराम से गुजर-बसर कर रहे थे। मगर जैसे ही उन्होंने  शाही परिवार के खिलाफ लिखना  शुरु किया, उन्हें तरह-तरह से प्रताडित किया गया  । 2003 में जमाली एक अखबार के संपादक बने मगर उन्हें  शाही परिवार के खिलाफ लिखने के लिए दो माह में नौकरी से निकाल दिया गया। इसके बाद उनका देश  छोडना और फिर लौटना बदस्तूर जारी रहा। 2012 में जमाली को  अरब न्यूज चैनल का प्रमुख बनाया गया, इस चैनल को अल जजीरा का प्रतिद्धंद्धी माना  गया । बहरीन स्थित इस चैनल के  शुरु होने के पहले ही दिन एक प्रमुख विपक्षी नेता को आमंत्रित किए जाने पर इसे चौबीस घंटे में बंद कर दिया गया। 2017 में जमाल सऊदी अरब छोडकर अमेरिका चले गए और उन्होंने वहां  वाशिंगटन पोस्ट के लिए लिखना  शुरु कर दिया, उनके हर लेख में सऊदी अरब के शाही परिवार, खासकर क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की नीतियों की मुखर आलोचना हुआ करती। इन सब परिस्थियों से साफ जाहिर है कि जमाल को निर्भीक पत्रकारिता की कीमत चुकानी पडी है।  विक्टोरिया मिनिरोवा को खोजी पत्रकार बनने की सजा मिली है।  विक्टोरिया  यूरोपियन यूनियन फंड में हो रहे गोलमाल का लगातार भांडा फोड रही थी। संक्षेप में उदारवादी यूरोप हो या कटटरपंथी मध्य-पूर्व  या भारत समेत एशिया, खोजी पत्रकारों का जीवन हमेशा  खतरे में  रहा है। 2018 में अब तक 43 पत्रकार मारे जा चुके हैं।  155 पत्रकारों को जेल में ठूंस दिया गया। खोजी पत्रकारिता से क्षुब्ध अमेरिकी  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप  तो  पत्रकारों को समाज का सबसे बडा  "दुश्मन"  मानते  हैं । निष्कर्ष   यह है कि खोजी अथवा निर्भीक पत्रकार बनोगे तो होंगे बर्बाद, सरकारी पत्रकार बनोगो तो होंगे आबाद।  

बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

अधिकारी या गुंडे-मव्वाली

कांगडा जिले के जयसिंहपुर में मेरे करीबी परिचित राम स्वरुप दीक्षित इस बात से बेहद परेशान है कि दशहरा उत्सव मनाने के लिए स्थानीय प्रशासन उनसे जबरी चंदा  वसूली कर रहा है। लगभग चार  दशक  से वे जयसिंहपुर में निजी स्कूल चला  रहे हैं मगर आज तक ऐसा कभी नहीं हुआ कि एसडीएम स्तर का अधिकारी चंदा वसूलने के लिए धमकी पर उतर आए। स्कूल चलाना है तो चंदा देना ही पडेगा। आज तक चंदा देते रहे हैं। सत्तर के दशक में पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ से एम एससी करने के बाद चाहते तो किस कॉलेज अथवा स्कूल में नौकरी कर सुकून की जिंदगी  बसर कर लेते। मगर  दीक्षित जी  पर  अपने क्षेत्र में  शिक्षा की अलख जगाने का जनून सवार था। उस समय क्षेत्र में स्कूलों का अभाव था। इसीलिए उन्होंने छोटे स्तर पर स्कूल खोला। और चार दशक बाद भी वहीं के वहीं है। अब बडी उमर में जाकर उन्हें इस बात का अहसास हो रहा है कि समय बदल चुका है और गला काट प्रतिस्पर्धा के जमाने में आदर्श   और मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं।  शिक्षा का पूरी तरह से व्यापारीकरण (व्यवसायीकरण से कन्फ्यूज मत करें) हो चुका है और स्कूल , कॉलेजिज और यूनिवर्सिटीज  अब  केवलमात्र मुनाफा कमाने के लिए चलाए जाते हैं। भद्र पुरुषों  के लिए इस फार्मेट में कोई जगह नहीं है। इन सब के बावजूद दीक्षित जी डटे हुए हैं और अपने उसूल और मकसद को छोडने को तैयार नहीं है। जयसिंहपुर में   दशहरा धूमधाम से मनाया जाता है और चंगर क्षेत्र के लिए इसका  खासा मह्त्व भी है। हर स्थानीय निवासी  इसकी सफलता के लिए अपनी क्षमता से योगदान देता रहा है।  दीक्षित जी भी हर साल दशहरे के लिए चंदा देते रहे हैं मगर अपनी क्षमता से। चंदा अपनी क्षमता के अनुसार ही दिया जाता है। प्रशासन को जबरी चंदा वसूलने का कोई अधिकारी नहीं है। वसूली गुंडे-मवाली करते हैं। दीक्षित जी ही नहीं, हर आत्म-सम्मानी व्यक्ति को चंदे की जबरन वसूली पर गुस्सा आएगा। सरकारी अफसर जनसेवक होता है और उसे इसी मानसिकता से काम करना चाहिए। दुख इस बात का है कि आजादी के सात दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद नौकरशाही फिरंगियों जैसी मानसिकता पाले हुए है़। जनता को अपने ओहदे और पॉवर से चकाचौंध करना और अक्सर डराना-धमकाना आज भी बदस्तूर जारी है। जयसिंहपुर का यह वाक्या भी इसी मानसिकता की उपज है। जयराम ठाकुर जी आपकी सरकार को कुछ तो बडा सोचना चाहिए।