रविवार, 22 जुलाई 2018

जख्मों पर नमक छिडकना

कठुआ बलात्कार मामले के  डिंफेस वकील को जम्मू-कश्मीर  सरकार द्वारा एडिशनल एडवोकेट जनरल बनाए जाने से आतंकी हिंसा से पीडित राज्य में सियासत गरमा गई है। इस साल अप्रैल में जम्मू के कठुआ में 8 वर्षीय  मासूम बालिका की कई दिनों तक बलात्कार किए जाने के बाद  नृशंस हत्या कर दी गई थी। बलात्कार मामले में आरोपी के वकील को सरकारी ओहदा दिए जाने से राजनीतिक दलों को सियासी रोटियां सेंकने का अवसर मिल गया है। एक तरह से यह पीडित परिजनों के जख्मों पर नमक छिडकने जैसा है।  भाजपा द्वारा महबूबा मुफ्ती की सरकार से समर्थन वापस लेने के बाद 19 जून, 2018 को राज्य में राज्यपाल  शासन लगा दिया गया था। सरकार के ताजा फैसले की सबसे तीखी नुक्ताचीनी पूर्व  मुख्यमंत्री और भाजपा की सहयोगी रही महबूबा मुफ्ती ने की है। ज्यादातर  लोग  मेहबूबा के  इस  ट्वीट   सहमत  होंगे  कि अंतरराष्ट्रीय  न्याय दिवस के एक दिन बाद बलात्कार अभियुक्त के वकील को एडिनशनल एडवोकेट जनरल नियुक्त करने से देश  में रेप कल्चर को ही बढावा मिलेगा। पीडीपी-भाजपा सरकार के अपदस्थ हो जाने के बाद राज्य सरकार  ने सरकारी वकीलों की नई नियुक्तियां की है। इसी क्रम में 19 जुलाई को जम्मू-कष्मीर हाई कोर्ट  के जम्मू विंग 16 वकीलों को   एडिषनल एडवोकेट जनरल (एएजी)  लगाया गया है। कठुआ बलात्कार मामले में अभियुक्त के वकील को भी बतौर एएजी नियुक्त किया गया है। विपक्षी दलों ने इस नियुक्त पर खासा बवाल खडा किया है।  आम परिस्थितियों में किसी वकील को सरकारी वकील बनाने पर कोई बवाल खडा नहीं होता है। हर सरकार अथवा प्रषासन सरकारी मामलों की पैरवी के लिए  अपनी पसंद के वकीलों को नियुक्त करती है और यह प्रशासन का विशेषाधिकार भी है। वकीलों को अभियुक्तों की पैरवी करना भी नैसर्गिक न्याय का हिस्सा है और किसी वकील को इस बिला पर प्रताडित नहीं किया जा सकता है कि वह बलात्कार के आरोपी की पैरवी करता रहा है। इस तरह की स्थिति में त्वरित न्याय प्रकिया बाधित हो सकती है। मगर एक सच यह भी है कि वकीलों ने बालिकाओं के बलात्कार जैसे अमानवीय अपराध के अभियुक्तों का मुकदमा न लडने का साहस भी दिखाया है। तीन दिन पहले चैन्नई के वकीलों ने 11 वर्षीय  मूक -बघिर बालिका के बलात्कार के आरोपियों की  कोर्ट परिसर में पिटाई कर दी थी। मद्रास हाईकोर्ट बार एशोसिएश न ने बाकायदा प्रस्ताव पारित करके अपने सदस्यों को आरोपियों की पैरवी नहीं करने के निर्देश  दिएहैं। निर्भय गैंग रेप मामले में भी दिल्ली की साकेत कोर्ट के वकीलों ने आरोपियों का बॉयकॉट  किया था और 2500 वकीलों मेंसे किसी ने भी बलात्कार के आरोपियों की पैरवी नहीं की। कठुआ बलात्कार मामला उतना ही जघन्य और अमानवीय है जितने निर्भय और चैन्नई मूक-बघिर बलात्कार मामले। सच यह है कि कठुआ बलात्कार मामले में पीडित परिवार को न्याय मांगने की बजाए राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम चरम पर रहा है। आठ साल की बालिका के बलात्कार को भी राज्य के कटटरपंथी  संगठनों ने साम्प्रदायिक रंगत देने में कोई कसर नहीं छोडी। यहां तक कि भाजपा के दो मंत्रियों समेत भगवा संगठनों के नेताओं ने बलात्कार के आरोपियों के पक्ष में  रैलियां तक की। कठुआ मामले की संवेदनशीलता का ख्याल करते हुए सुप्रीम कोर्ट  को इसकी सुनवाई राज्य से बाहर पंजाब के पठानकोट में शिफ्ट करनी पडी। शीर्ष  अदालत इस केस की सुनवाई को खुद मॉनिटर कर रही है।  बलात्कार जैसे संवेदनशील  मामले में राजनीतिक रोटियां सेंकना बेहद दुखद है। ठीक उसी तरह जैसे संविधान के अनुच्छेद 370 को राजनीतिक फायदे के लिए भुनाना । सत्ता से बाहर आते ही जम्मू में भाजपाइयों ने अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की मांग फिर से उठानी  शुरु कर दी है। इससे जम्मू-कश्मीर  में हिंसा और ज्यादा भडक सकती है और अलगाववादी ताकतों को बल मिल सकता है। कश्मीर  में  जिस तरह से  हालात बिगडते जा रहे हैं, उसके दृष्टिगत  फिरकू मांगों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए।  राजनीतिक हित  राष्ट्र  हित से ज्यादा अहम नहीं हो सकते हैं।