बुधवार, 18 जुलाई 2018

रिश्तों की मिठास

फेसबुक पर भक्ति भाई का मुस्कराता चेहरा देखकर दिल बाग-बाग हो गया। भाभी  के अकस्मात निधन के बाद जिस तरह से भक्ति भाई ने खुद को संभाला , वह अनुकर्णीय है। भाभी जी बेहद मिलनसार और मृदभाषी  थी्। भक्ति भाई की ही तरह कठिन से कठिन समय में मुस्कराते रहना भाभी का स्वभाव था। उनका मुस्कराता चेहरा आज भी उनकी याद दिलाता है । दिल्ली में  पले और  शिक्षा ग्रहण करने के  बावजूद एकदम सरल और  निश्छल  । मुझे इस बात का शेष जीवन भर अफसोस रहेगा कि मैं अंतिम समय भाभी का आशीर्वाद  नहीं ले पाया। पिछली बार ओम प्रकाश  की बेटी के ब्याह पर मुलाकात हुई थी और भाभी ने मुझसे शिकायत की थी कि अब पहले जैसा मिलना-जुलना क्यों नहीं रहा। 90 में  शिमला क्या छोडा, दोबारा 2003-2004 में कुछ समय के लिए  लौट पाया। भास्कर ने मेरी  शिमला में  पोस्टिंग  की थी। मगर काम की व्यस्तता से रिश्तेदारों  से ज्यादा मिलना-जुलना नहीं हो पाया। परिवार चंडीगढ ही था, इसलिए जब भी थोडा वक्त मिलता, परिवार से मिलने वहां चला जाता।  भाभी की ही तरह हंसते रहना भक्ति भाई की  शक्ति रही है। दोनों एक-दूसरे के लिए बने थे।  हम बचपन से साथ-साथ रहे। एक साथ रहते, खाते-पीते और घूमते-फिरते। ताई जी को जब कभी भक्ति भाई को ढूंढना होता, हमारे घर पर आवाज लगाते। मेरा घर, भक्ति मुख्य गांव से हटकर  थोडा फासले पर स्थिति था।  यूनिवर्सिटी  तक की पढाई साथ-साथ की। मैं और ओम प्रकाष (भक्ति के छोटे भाई) एमए और बाद में एम.फिल के छात्र थे, भक्ति भाई इवनिंग में कानून की पढाई करते। दिन को नौकरी करते।  यूनिवर्सिटी की पढाई के लिए मुझे भक्ति भाई ने बहुत बडा सहारा दिया। उनकी सहायता के बगैर मैं पढाई नहीं कर पाता।  तब भी मैं अखबार की  नौकरी करता, मगर बीच-बीच में नौकरी चली जाती , तब भक्ति भाई हाथ थामते। मेरा कोई सगा बडा भाई नहीं है मगर भक्ति भाई ने मुझे कभी इस कमी को खलने नहीं दिया। मेरी छोटी बहन स्वरुपा से भक्ति भाई और भाभी को बडा लगाव था। स्वरुपा की कम उम्र में निधन ने हम सब को तोड कर रख दिया था। जीवन संघर्ष   का दूसरा पर्याय है। सुख-दुख, आते जाते रहते है मगर इनसे जीना छोड नहीं जा सकता। समय सबसे बडा हीलर है और गहरे से गहरे जख्म को भी भर देता है। बचपन के वो दिन बहुत याद आते हैं जब मैं, भक्ति भाई और ओम प्रकाश  हर समय साथ-साथ रहते।  छोटा शिमला के डिक्सी लॉज, जहां हमारा निवास था, से बहुत सी यादें जुडी हैं। बरसात में छत से लगातार पानी टपकने के बावजूद हम तौनों इसे खुब इंजॉय करते। स्टोव में मिट्टी का तेल (घासलेट) खत्म हो जाने पर हमें भूखा रहना पडता मगर जरा भी बुरा नहीं लगता। हम तीनो साथ-साथ हों तो कोई भी कठिन परिस्थिति हमें विचलित नहीं करती। काश , वे दिन फीर लौट आते! भक्ति भाई की दीर्घ आयु की हार्दिक कामना।