मंगलवार, 31 जनवरी 2017

Expectations From Budget 2017

पहली फरवरी को संसद में पेश   होने वाले बजट से इस बार देश  की जनता को पहले से काफी ज्यादा अपेक्षाएं है। पहली बार देश  का बजट 28 दिन पहले 1 फरवरी को पेश  हो रहा है। और पहली ही बार अलग से रेल बजट की बजाय इसे आम बजट में समाहित किया जा रहा है। और पहली ही बार नोटबंदी से कुंदित अर्थव्यवस्था को उठाने के लिए सरकारी निवेश  और बडी कर रियायतों की अविलंब दरकार है। वित्त मंत्री अरुण जेटली के समक्ष बजटीय घाटे (डेफ्सिट) को सकल घरेलू उत्पाद को साढे तीन फीसदी से नीचे रखने और मांग को उठाने के लिए करों में रियायतें देने के बीच संतुलन स्थापित करने की बडी चुनौती है। कर रियायतें दिए जाने से बजटीय घाटा तय लक्ष्य से ज्यादा बढ सकता है। नोटबंदी ने नगदी पर फल-फूल रही भारतीय अर्थव्यवस्था को काफी हद तक तहस-नहस किया है। नोटबंदी ने उधोग-धंधे, कारोबार, खेती-किसान और रोजगार पर खासा प्रभाव डाला है। अंतरराष्ट्रीय  रेटिंग एजेंसी मूडी का आकलन है कि नोटबंदी ने  भारत  की आर्थिक गतिविधियों  पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है और तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्था की रफ्तार को रोक दिया है। 8 नवंबर से पहले भारत का 7.6 फीसदी से ज्यादा का  ग्रोथ रेट चीन से कहीं ज्यादा था मगर नोटबंदी के बाद इसमें एक फीसदी की गिरावट आई है। अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा स्फीति (आईएमएफ) का ताजा आकलन है कि नोटबंदी के बाद ग्रोथ में चीन अब भारत से आगे निकल जाएगा। आईएमएफ ने भारत का ग्रोथ रेट 7.6 फीसदी से कम करके इसे 6.6 फीसदी रखा है।  दिसंबर में ऑटोमोबाइल सेक्टर की बिक्री में 16 साल की सबसे बडी गिरावट दर्ज  हुई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी (सीआईएमई) का आकलन है कि अगर कंज्युमर डिमांड को फौरन सक्रिय नहीं किया गया, तो अगले पांच साल तक ग्रोथ रेट 6 फीसदी से आगे नहीं बढ पाएगा। तथापि, मोदी सरकार के लिए अच्छी बात यह है कि सरकार के राजस्व में गिरावट नहीं आई है। इसके विपरीत  काले धन की एमनेस्टी स्कीम से सरकार को 60 हजार करोड रु से भी ज्यादा की कमाई हुई है। नोटबंदी के बाद से भी काली कमाई का जब्त किया जाना जारी है। ताजा आकलन के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष  में सरकार के राजस्व में जीडीपी के 0.5 फीसदी बराबर की वृद्धि की उम्मीद है। यह स्थिति सुखद है और इससे वित्त मंत्री के हाथ खुल सकते है। मांग को लिफ्ट करना वित्त मंत्री की पहली प्राथमिकता होगी और इसके लिए सार्वजनिक व्यय  को खासा बढाना पडेगा। इसके लिए वित्त मंत्री को बजटीय घाटा जीडीपी का तीन फीसदी तक लाने का लक्ष्य छोडना पड सकता है। अगर बजटीय घाटा 3.3 से 3.4 फीसदी के बीच तय किया जाता है, तो सरकार को लगभग चालीस हजार करोड रु सार्वजनिक व्यय के लिए अतिरिक्त मिल सकते हैं। बहरहाल, आम आदमी सरकार से सस्ते में दो वक्त का भरपूर भोजन और माकूल रोजगार की अपेक्षा रखता है। उसे और कोई रियायत नहीं चाहिए। मध्य वर्ग  को आयकर सीमा को पांच लाख तक बढाने की उम्मीद कर रहा है। महंगाई के इस जमाने में, खासकर महानगरों और बडे षहरों में परिवार की सभी जरुरी जरुरतों को पूरा करने  के लिए 5 लाख रु भी कम पडते हैं। नोटबंदी से पीडित उधोग-धंधों , कारोबारियों और व्यवसायियों को कर रियायतों के साथ-साथ  सस्ते कर्ज की भी दरकार है। भारत में कर्ज अभी भी अपेक्षाकृत महंगा है। कर्ज  सस्ता करना आरबीआई के हाथ में मगर बजट मे सरकारी बैंकों की कमजोर वित्तीय स्थिति के लिए ठोस कदम की झलक मिल सकती है।  मोदी सरकार डिजिटल पेमेंट को खासी तवज्जो दे रही है, इसलिए बजट में इसे प्रोत्साहित करने के लिए रियायतें दी जा सकती है। सीनियर सिटीजन्स मोदी सरकार से सर्वांगीण सामाजिक सुरक्षा की अपेक्षा रखते हैं और  यूनिवर्सल  इनकम स योजना इस दिशा में  बेहतर विकल्प हो सकता है।  देश  की महिलाओं को बस उनकी अस्मिता की रक्षा की गारंटी चाहिए। एक फरवरी के बजट में इन सब आकांक्षाओं के समावेश  की उम्मीद की जाती है।

सोमवार, 30 जनवरी 2017

Udate Punjabis To Have Big Say In Punjab Assembly Elections

पंजाब के बारे यह बात जगत प्रसिद्ध है कि अगर सडक पर चलते भी किसी पंजाबी को विदेश   जाने का न्यौता दिया जाए, तो वह फौरन तैयार हो जाएगा और अपना अब सब कुछ बेच-बाच कर आपके साथ चल देगा। इसी कारण दुनिया में सबसे ज्यादा प्रवासी  पंजाब से है।  दुनिया में सबसे ज्यादा 1.6 करोड (16 मिलियन) भारतीय अप्रवासियों मेंसे 1.2 करोड (12 मिलियन) पंजाबी हैं। एनआरआई आय में भी भारत  सबसे आगे है। 40 फीसदी एनआईआर आय से केरल देश  में सबसे आगे है जबकि 13 फीसदी  रेमिटेंसस के साथ पंजाब दूसरे स्थान पर है। पंजाब में विदेश  जाने के जनून की वजह से ही राज्य में “कबूतरबाजों“का  धंधा पनपा है।  विदेश  जाने के  “पंजाबी जनून“ का ख्याल करते हुए सत्तारूढ  शिरोमणि अकाली दल ने इस बार अपने चुनावी घोषणा पत्र (मेनिफेस्टो) में अमेरिका और कनाडा में एक लाख एकड जमीन खरीद कर किसानों को  वहां बसाने का वायदा तक किया है। पहली बार देश  के किसी राजनीतिक दल ने “ब्रेन  गेन  की बजाय ग्रेन ड्रेन“ का नारा बुलंद किया है। यह बात दीगर है कि अकाली दल का यह वायदा उसकी सहयोगी पार्टी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “ब्रेन गेन“ नारे से एकदम उलट है। अकालियों ने 2012 में मतदाताओं को लैपटॉप देने का वायदा किया था। पांच साल गुजर गए मगर अकाली सरकार इस वायदे को पूरा नहीं कर पाई। पंजाब के किसान अपने परिश्रम और देसी उपजाऊ खेती तकनीक के लिए पूरी दुनिया में जाने जाते है। जॉर्जिया समेत दुनिया के कई देशो  में पंजाब के किसानों ने जमीन खरीद कर स्थानीय कृषि  अर्थव्यवस्था में खासा योगदान दिया है। अफ्रीका के कई देश  पंजाब के किसानों को वहां आने का न्योता देते रहते हैं। अकालियों का यह चुनावी वायदा किसानों को आकर्षित  कर सकता है। बहरहाल, पंजाब के विकास में अप्रवासी पंजाबियों की बहुत बडी भूमिका रही है। अप्रवासियों ने पंजाब के दोआबा और मालवा बेल्ट का काया कल्प कर डाला है। अब तक अप्रवासी पंजाबी राज्य में 15,000 करोड रु से अधिक का निवेश  कर चुके हैं।  जगह-जगह अस्पताल, स्कूल और अन्य  शैक्षणिक संस्थाए खोली गईं हैं। गांव-गांव में अप्रवासी भारतीयों के आलीशान भवन और संस्थागत विकास क्षेत्र की आर्थिक सपन्नता की गवाह हैं। पंजाब का जनमानस मानता है कि राज्य का विकास कराने में सरकार से ज्यादा अप्रवासी पंजाबियों का हाथ है। इस बात के  दृष्टिगत   पंजाब में अप्रवासी पंजाबी किसी भी पार्टी के पक्ष में हवा बना सकते हैं।  पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार में इस बार अप्रवासी पंजाबी बढ-चढ कर भाग ले रहे हैं। आम आदमी पार्टी के पक्ष में चुनाव प्रचार के लिए हर रोज विदेशों   से अप्रवासी पंजाब आ रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने दस हजार अप्रवासियों को पंजाब में चुनाव प्रचार के लिए आमंत्रित किया है और इन मेंसे अधिकांश  पार्टी के लिए काम कर रहे हैं। पंजाब प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले साल अप्रैल में  अप्रवासी पंजाबियों से मिलकर अपने चुनाव प्रचार की  शुरूआत  की थी।  पंजाब के विधानसभा चुनाव कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों के लिए खासे अहम है। आम आदमी पार्टी की दिल्ली से बाहर कितनी  पकड है,  पंजाब के चुनाव  यह तय करेंगे। कांग्रेस का पूरे देश  में करीब-करीब सफाया हो चुका है। उत्तर भारत में अभी कांग्रेस हिमाचल प्रदेश  और उत्तराखंड में सत्ता में है।  उत्तराखंड में भी पंजाब के साथ चुनाव हो रहे है और विभिन्न चुनाव सर्वेक्षणो में वहां भाजपा का पलडा भारी बताया जा रहा है। वैसे भी इस पहाडी राज्य में अब तक कांग्रेस और भाजपा की बारी-बारी सरकार बनती रही है। हिमाचल प्रदेश  में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं और अगर कांग्रेस की पंजाब में सरकार बनती है, तो इसका सकारात्मक असर हिमाचल प्रदेश  के चुनाव पर पड सकता है। इतना तय  है कि इस बार पंजाब के चुनावी समर में अप्रवासी पंजाबियों की अहम भूमिका रहेगी।

बुधवार, 25 जनवरी 2017

बैंकिंग स्कैम बनाम एनपीए

विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस को कर्जा देने में गडबड-घोटाले के लिए सरकारी बैंक आईडीबीआई के पूर्व चेयरमैन समेत आठ लोगों की गिरफ्तारी से देश में  भ्रष्ट   बैंकिंग व्यवस्था का भांडा फूटा है।  आईडीबीआई बैंक और किंगफिशर के बीच 950 करोड के फर्जी ऋण लेनदेन को लेकर सीबीआई ने यह कार्रवाई की है। आईडीबीआई के पूर्व चेयरमैन के अलावा बैंक के तीन पूर्व  सीनियर  अधिकारियों को भी गिरफ्तार किया गया है। इन सब से सीबीआई ने कडी पूछताछ की थी। बंद पडी किंगफिशर एयरलाइंस के पूर्व  चीफ फाइनेषियल ऑफिसर समेत चार पूर्व अधिकारियों को भी सीबीआई ने हिरासत में लिया है। विभिन्न बैंकों को किंगफिशर के मालिक विजय माल्या से 9000 करोड रु के ऋण की वसूली करनी है। बंगलुरु स्थित  कर्जा  वसूली प्राधिकरण (डैट रिक्वरी ट्रिब्यूनल) ने गत 19 जनवरी को स्टैट बैंक की अगुआई वाले कंसर्टोरियम को अपने 6203 करोड रु का ऋण 11 फीसदी ब्याज समेत विजय माल्या और उनकी कंपनियों की चल-अचल संपतियां बेचकर वसूलने के लिए अधिकृत किया था। इसके बाद सीबीआई ने अपनी कार्रवाई  की। इस पूरे लेनदेन में आईडीबीआई के तत्कालीन चैयरमैन की भी सक्रिय भूमिका रही है। किंगफिशर को आईडीबीआई ने 2009 में जब 950 करोड रु का ऋण दिया था, तब तक कंपनी का दिवाला निकल  चुका था। 2009 में किगफिशर ने 1600 करोड रु का  शुद्ध घाटा दिखाया था। रेड बैंलेस  शीट के बावजूद आईडीबीआई  द्धारा  किंगफिशर को 950 करोड रु का कर्जा  देना  साफ  बताता है कि “पूरी की पूरी दाल काली थी“। बैंकों के ऋण मानदंडों के अनुसार जिस कंपनी की बैंलेस  शीट  रेड हो, उसे कर्जा  नहीं दिया जाता। इतने बडे ऋण के लिए उम्दा क्रेडिट रेंटिंग की दरकार होती है और 2009 में किंगफिशर की क्रेडिट रेटिंग काफी कम थी। जाहिर है इस मामले में भारी गडबड-घोटाला हुआ है। सीबीआई को लगता है कि विजय माल्या  ने 950 करोड रु के ऋण को किंगफिशर को घाटे से उभारने की बजाय निजी उपयोग के लिए इस्तेमाल किया था। और इस फर्जी ऋण मामले में आईडीबीआई के अधिकारियों की मुठ्ठी भी गर्म  की गई थी। यह सच्चाई जगजाहिर है कि बगैर घूस लिए समकालीन भारत में अपना  रिश्तेदार  भी काम नहीं करता है। बहरहाल, आईडीबीआई प्रकरण  बेंकों में फैले व्यापक  भरष्टाचार  समुद्र में एक पानी की बूंद के बराबर है। नॉन-वाइबल (जिनके चलने की कोई उम्मीद नहीं) प्रोजेक्टस को घूस लेकर ऋण देते-देते देश  के कई सरकारी बैंक  दिवाला होने की कगार पर हैं।  सितंबर 2008 में बैंकों की 53,917 करोड रु की एनपीए बढते-बढते सितंबर, 2015 तक 3,41,641 करोड रु तक पहुंच गई थी। और 31 मार्च, 2016 तक देश  में बैकों की गैर निष्पादित  संपत्तियां  (एनपीए) 5,94,929 करोड रु का आंकडा पार कर चुकी थी। और 90 फीसदी एनपीए सरकारी बैंकों से संबधित है। महज तीन माह में बैंकों की एनपीए में दो लाख करोड रु की वृद्धि हैरतअंगेज है जबकि आरबीआई ने बैंकों को ऋण उगाही में तेजी लाने को कहा था। आरबीआई ने बेंकों को मार्च 2017 तक तमाम एनपीए को क्लीयर करने का लक्ष्य दे रखा है। मगर एनपीए को जीरो करना तो दूर, बैंकों की  गैर  निष्पादित  संपत्तियां उत्तरोतर बढती ही जा रही हैं। स्मरण रहे कि 2008 से 2012 के बीच अमेरिका में अत्याधिक एनपीए के कारण 446 छोटे-बडे बैंक बंद कर दिए गए थे। इस बात में कोई वजन नहीं है कि एनपीए बैंकों के कमजोर वित्तीय आधार का  ध्योतक  नहीं है। अंतरराष्ट्रीय  रेटिंग एजेंसी मूडी का आकलन है कि एनपीए के कारण भारतीय बैंको का केपिटल बेस कमजोर हुआ है और इसे सुधारने की जरुरत है। मगर जब तक बैंकों को  भ्रष्ट  व्यवस्था से मुक्त नहीं किया जाता, इसमें सुधार की कोई गुजाइंश  नहीं है। आईडीबीआई बैंक में माल्या स्कैम इस बात का ताजा प्रमाण है।    


मंगलवार, 24 जनवरी 2017

Union Budget To Be On Time

यूनियन बजट पहली फरवरी को ही पेश  किया जाएगा। पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के दृष्टिगत  मतदाताओँ  को लुभाने की आशंका के कारण  सुप्रीम कोर्ट ने बजट को मतदान पूरा होने तक टालने की याचना को अस्वीकार कर दिया है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि बजट को टालने का कोई औचित्य नहीं है। कोर्ट ने साथ में यह भी कहा है कि केंद्र सरकार इस बात को सुनिष्चिित करे कि बजट में  मतदाताओं को लुभाने वाले फैसले न हों। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि एक फरवरी को पेश  होने वाले बजट में मतदाताओं को लुभाने के लिए रियायतें दी जा सकती हैं। चार फरवरी से पांच विधानसभाओं के लिए वोट डालने की प्रकिया  शुरु हो जाएगी और यह 8 मार्च  तक चलेगी। चुनाव के  कारण  पांच राज्यों में आचार संहिता लागू है और निर्वाचन आयोग के दिशा -निर्देश  अनुसार आचार संहिता लागू होने के बाद न तो केद्र और न ही संबंधित राज्य कोई भी नीतिगत फैसले ले सकता है और न ही ऐसी  घोषणाएं कर सकते हैं जिनसे मतदाताओं को लुभाया जा सके। याचिका में इस स्थिति का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट से बजट को मतदान पूरा होने तक स्थगित करने की याचना की गई थी। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि केंद्र के बजट का राज्यों के चुनावों से कोई सरोकार नहीं है। पूरे साल चुनाव होते रहते हैं और इनसे केंद्र सरकार का कामकाज रुक नहीं सकता। कोर्ट  ने आचार संहिता के उल्लघंन की दलील भी नहीं मानी। कोर्ट  ने व्यवस्था दी है कि बजट एक फरवरी को ही पेश  किया जाए।  देश  की सभी विपक्षी पार्टियां भी बजट को मतदान पूरा होने तक स्थगित करने की मांग कर रही है। विपक्षी दलों का कथन है कि चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड तैयार करने के लिए जरुरी है कि चुनाव लडने वाले सभी प्रत्याषियों और राजनीतिक दलों को बराबर का मौका मिले। आचार संहिता के लागू रहने तक बजट को स्थगित करने के लिए  विपक्षी दलों का डेलेगेशन पांच जनवरी को निर्वाचन आयोग से भी मिला था और आयोग को 2012 की मिसाल दी है। तब संप्रग सरकार ने भाजपा समेत विपक्षी दलों की मांग पर केन्द्रीय बजट 28 फरवरी की बजाय मतदान सपन्न होने के बाद 16 मार्च को पेश  किया था। विपक्ष का कथन है कि अगर संप्रग सरकार विपक्ष की मांग को तवज्जो दे सकती है, तो मोदी सरकार क्यों नहीं? विपक्ष के इस कथन में काफी वजन है। निर्वाचन  आयोग ने केबिनेट सचिवालय से 2012 को लेकर पूरी स्थिति का ब्यौरा मांगा है। आयोग ने सोमवार  इस मामले में  केंद्र सरकार से कहा है  कि बजट में  पांच राज्यों के लिए कोई  नई  स्कीम  नहीं होनी चाहिए  । देश  में पहली बार एक फरवरी को बजट पेश  हो रहा है। अब तक बजट को 28 फरवरी (माह के आखिरी दिन) को पेश  करने की रिवायत थी। इसके अलावा मोदी सरकार ने 91 साल की परंपरा तोडते हुए रेल बजट को आम बजट में ही समाहित करने का फैसला लिया है। इस बार अलग से रेल बजट पेश  नहीं होगा और यह आम बजट का ही हिस्सा होगा। बहरहाल, केन्द्रीय बजट तय समय पर ही पेश  होना चाहिए। केन्द्रीय बजट में देश  की आर्थिक-सामाजिक प्रगति का रोडमैप, जनाकांक्षाएं और विकास की दिशा  और दशा  झलकती है। विभिन्न राज्यों के आम बजट की अपेक्षा केन्द्रीय बजट का पूरे देश  को बेसब्री से इंतजार रहता है। विदेश  रक्षा, रेल यातायात, आयकर जैसे कई ऐसे विभाग हैं, जिन पर राज्यों का कोई अधिकार नहीं है। और इनसे जुडे बजट प्रावधानों पर सबकी नजर रहती है। इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता है कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के खातिर बाकी 24 राज्यों और सात केंद्र  शासित क्षेत्रों की जनता को नियमित केन्द्रीय बजट से वंचित नहीं किया जा सकता ? बजट को राजनीति का विषय  नहीं बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट  और चुनाव आयोग की व्यवस्था के बाद अब बजट पर राजनीति खत्म हो जानी चाहिए।  

रविवार, 22 जनवरी 2017

Why Can't Govt Ensure Children Safety:

उत्तर प्रदेश  के एटा जिले  में वीरवार सुबह का दुखद स्कूली बस हादसा बताता है कि देश  में कायदे-कानून का कितना सम्मान किया जाता है।  देश  के भविष्य  को संवारने वाली शैक्षणिक संस्थाएं अगर नियमों का उल्लघंन करने लग जाएं, तो देश  कैसे चलेगा? एटा जिले के स्कूलों में सर्दी की छुट्टियां  थी और प्रशासन ने 20 जनवरी तक  जिले के सभी स्कूलों को बंद रखने के आदेश  दे रखे  थे। इसके बावजूद जेएम विद्यानिकेतन   नाम का स्कूल खुला था और दुर्घटनाग्रस्त बस सुबह कंपकंपाती ठंड में बच्चों को  स्कूल  ले जा रही थी। घने कोहरे में बस ट्रक से टकरा गई। इस हादसे में 12 बच्चों की दर्दनाक मौत हो गई और 30 से ज्यादा बच्चे बुुरी तरह से घायल हो गए। हैरानी इस बात की है कि 27 सीटर बस में 40 से ज्यादा बच्चे ठूंसे गए थे। प्रशासन ने स्कूल की मान्यता रदद करने के आदेश  दिए हैं।  और अक्सर यही होता है। सरकार तब जागती है जब हादसा हो जाता है।  आदेशों   के बावजूद स्कूल का खुला रहना  प्रशासन की सरासर लापरवाही उजागर करता है। प्रशासन के आदेशों की अनुपालना न करने वाले स्कूलों के खिलाफ फौरन कार्रवाई की जानी चाहिए। स्कूली बसों के लिए न केवल राज्यों की सरकारों ने,  अलबत्ता सुप्रीम कोर्ट ने भी  स्पष्ट  दिशा निर्देश  (गाइडलाइंस) जारी कर रखे हैं। इनके मुताबिक स्कूली बसों में ओवरलोडिंग तो कतई नहीं की जा सकती। इसके बावजूद भी पूरे देश  में स्कूली बसों और बच्चों को ढोने वाले विभिन्न वाहनों में  बच्चों को भेड-बकरियों की तरह ठूस कर ढोया जाता है। हर सुबह स्कूल खुलने से पहले और दोपहर को स्कूल बंद होने के बाद सडकों पर बच्चों से खचाखच भरे ऑटो-रिक्षा, रिक्षा अथवा बसों को देखा जा सकता है। पूरे देश  में  यही नजारा नजर आता है। मगर प्रशासन और पुलिस मूक  दर्शक   बना रहता है। इसके ठीक विपरीत उच्च शैक्षणिक सस्थाओं की बसों में न तो छात्रों को स्कूली बच्चों की तरह ठूंस- ठूंस कर भरा जाता है और न ही इनके चालक ओवर स्पीड से वाहनों को दौडाते हैं। यही वजह है कि उच्च षैक्षणिक संस्थाओं की बसों का सफर स्कूली बच्चों की बसों से कहीं ज्यादा सुरक्षित होता है। केन्द्रीय भूतल यातायात की रिपोर्ट के अनुसार 2015 के दौरान सडक दुर्घटनाओं में  2916 बच्चों की मौत के साथ  उत्तर प्रदेश  देश  में पहले स्थान पर था। इस हिसाब से राज्य में हर रोज 7 बच्चे सडक दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं। यह चिंताजनक स्थिति है। फरवरी 2016 में चंडीगढ कमीशन पर प्रोटेक्शन ऑफ़  चाइल्ड राइटस द्वारा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में दायर  रिपोर्ट में बताया गया था कि देश  के सबसे खूबसूरत शहर  चंडीगढ़ में 50 फीसदी से भी ज्यादा स्कूली बसें बच्चों के लिए सुरक्षित नहीं थी। कमीशन ने चंडीगढ स्कूलों की कुल 800 बसों मेंसे 600 का पैना निरीक्षण किया था। इस निरीक्षण में पाया गया था कि अधिकतर बसों में एमरजेंसी दरवाजा तक नहीं था जबकि ऐसा करना अनिवार्य  था। स्कूली बसों के पास न तो परमिट थे और न ही नियमानुसार बस स्टाफ की वेरीफिकेशन करवाई गई थी। पांच स्कूली बसो में गर्भ निरोधक विधियां बरामद हुई थी। अधिकतर बसों में जीपीएस सिस्टम भी नहीं थे जबकि नियमानुसार जीपीएस लगाना लाजिमी है। इस रिपोर्ट  पर उच्च न्यायालय ने स्कूलों को कडी फटकार लगाई थी। 2016 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश  की राजधानी लखनऊ में स्कूल ट्रांसपोर्ट बच्चों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित है। यह निष्कर्ष  तीन  दिन चले सुरक्षा अभियान के बाद निकाला गया था। बंगलौर में कुछ समय पहले स्कूली ट्रांसपोर्ट पर किए गए एक सर्वेक्षण का  निष्कर्ष  था कि सरकारी बसें स्कूली बच्चों के लिए निजी स्कूली बसों से कहीं ज्यादा सुरक्षित हैं मगर स्कूल सरकारी की बजाय निजी बसों को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं। बहरहाल, बच्चे देश  का  भविष्य होते  हैं और इन्हें उज्ज्वल रखना हम सब का कर्तव्य है। इस मामले में पेरेंटस समेत सब को आगे आना चाहिए।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

Akhilesh Yadav No Nitish Kuman, Can't Repeat Bihar "Grand Alliance"

उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव समाजवादी पार्टी और उसके चुनाव चिंह साइकिल को अपने  पक्ष में कर लेने के बाद अब बिहार की तरह “ महागठबंधन“ बनाने में जुट गए हैं। कांग्रेस अखिलेश  के महागठबंधन“ में  शामिल हो भी गई है  मगर अजित सिंह का  राष्ट्रीय  लोक दल भी इसमें आते-आते  पीछे हट गया  है। समाजवादी पार्टी की टूट से चिंतित युवा मुख्यमंत्री कांग्रेस और राष्ट्रीय लोक दल के अलावा नीतिश  कुमार की जनता दल (यू), शरद पवार की राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (राकांपा), तृणमूल कांग्रेस और पीस पार्टी जैसे राजनीतिक दलों को भी अपने “महागबंधन“ में  शामिल करना चाहते है।  इन दलों का उत्तर प्रदेश  में कोई जनाधार नहीं है  और इन दलों को दो-एक सीट देकर आसानी से मनाया जा सकता है। पर अगर  नीतिश  कुमार, ममता बनर्जी और  शरद पवार जैसे बडे नेता  “महागबंधन“ के लिए प्रचार करते हैं , तो चुनावी बयार अखिलेष के पक्ष में बह सकती हैं। अभी सीटों के बंटवारे को अंतिम रुप देना बाकी है। मुख्य समस्या कांग्रेस को लेकर है। कांग्रेस को 80 से 90 सीटें दी जा सकती है और पार्टी इस पर मान भी जाएगी। कांग्रेस के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का प्रश्न  है।  अखिलेश  राष्ट्रीय लोक दल को ज्यादा-से-ज्यादा 20 सीटें देना  चाहते हैं मगर  अजित सिंह इतने पर तैयार नहीं थे  । तथापि, सच यह हे की  अखिलेश कूड़ा ही अजित सिंह से चुनावी गठबंधन से पीछे हट । समाजवादी पार्टी के 224 मौजूदा विधायक और 2012 के विधानसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रहने वाले 90 उम्मीदवारों को भी एडजस्ट करना है। इस स्थिति में रास्ता यह निकाला गया है कि 15 से 20 सपा उम्मीदवार कांग्रेस के टिकट पर लड सकते हैं।  बिहार जैसा महागठबंधन बनाकर अखिलेश  भाजपा को ठीक वैसी ही चुनौती देना चाहते हैं, जैसे नीतिश  कुमार ने बिहार विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरन्द्र मोदी की लोकप्रियता को दी थी। लोकसभा चुनाव की “मोदी लहर“ बिहार विधान सभा चुनाव तक लुप्तप्राय हो चुकी थी। नीतिश , लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस के एक मंच पर आने से बिहार में गठबंधन कामयाब रहा था।  तथापि अखिलेश  के लिए सबसे बडी चूनौती यह है कि चुनाव सिर पर हैं और अभी गठ्बंधन की पूरी रुपरेखा भी तैयार नहीं है। भाजपा और  बहुजन समाज पार्टी का राज्य में सांगठनिक ढांचा खासा मजबूत है। भाजपा के पास पार्टी के अलावा  राष्ट्रीय  स्वंय सेवक का समर्पित सांगठनिक समर्थन अलग से है। अखिलेश  यादव के पास इतना समय नहीं है कि वे महागठबंधन को जमीनी स्तर तक ले जाए। वुनाव जीतने के लिए कार्यकर्ताओं के बीच तगडे समन्वय की दरकार होती है। बीस दिन में अखिलेश  महागठबंधन के बीच यह समन्वय स्थापित कर पाएंगे, इस पर संदेह है।  महागठबंधन बनाना जितना चुनौतीपूर्ण है, उसे सफल बनाना उसे कहीं ज्यादा कठिन । अखिलेश  के लिए इस समय  बिहार की तरह महागठबंधन को कामयाब बनाना बहुत बडी चुनौती है।  बिहार की स्थिति उत्तर प्रदेष से काफी भिन्न थी। बिहार में विधानसभा चुनाव से चार माह पहले “महागठबंधन“ बन चुका था और सभी घटकों में सीटों का बंटवारा भी हो चुका था। इस स्थिति के चलते वहां कार्यकर्ताओं में चुनाव तक माकूल समन्वय भी स्थापित हो चुका था। महागठबंधन की पहली रैली में लालू यादव की पार्टी के कार्यकर्ताओं से पूछा गया था कि अगर उनकी पार्टी की सीट जनता दल (यू) को चली गई तो वे क्या करेंगे़? इस पर राजद कार्यकर्ताओं का जबाव था कि जिसको भी टिकट मिलेगा सभी उसके लिए पूरे मन से प्रचार करेगे। उत्तर प्रदेश  में इस तरह का समन्वय संभव नहीं लगता है।  पश्चिम  उत्तर प्रदेश  में जाटों और मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक  मनमुटाव जगजाहिर है।  राष्ट्रीय  लोकदल का जाटों में खासा जनाधार है और समाजवादी पार्टी का मुसलमानों में। इसी सच्चाई के कारण    अखिलेश को अजित सिंह का साथ लेने से पीछे हटना पड़ा।   महागठबंधन में और भी कई विसंगतिया है और इन्हें दूर करना आसान नहीं है। इस स्थिति के मद्देनजर  उत्तर प्रदेष में महागठबंधन के जमीनी स्तर पर सफल होने के आसार  कम ही नहर आ रहे हैं।

बुधवार, 18 जनवरी 2017

Navjot Singh Sidhu's Home Coming

चुनावी बयार किस ओर बह रही है, फिजाओं की नजाकत और दीवारों पर लिखी इबादत इस बात को साफ-साफ बयां कर देती हैं। काफी समय तक ईधर-उधर भटकने के बाद कांग्रेस में शामिल हुए क्रिकेटर से राजनीति में आए नवजोत सिंह सिद्धू का मंगलवार को अमृतसर में विशाल रोडशो  भी  स्पष्ट  कह रहा है “ पंजाब में चुनावी बयार किस ओर बह रही है “। कांग्रेस में  शामिल होने के बाद  नवजोत सिंह सिद्धू  6 माह बाद अमृतसर लौटे और “घर वापसी“ पर लोगों ने उनका जबरदस्त स्वागत किया।  सिद्धू  के काफिले को एयरपोर्ट से स्वर्ण मंदिर (गोल्डन टेंपल) तक की 11 किमी दूरी को तय करने में 6 घंटे से भी अधिक का समय लग गया। लोगों में इस कद्र उत्साह था कि अपने पति का बेसब्री से इंतजार कर रही श्रीमती नवजोत कौर सिद्धू को भी उनसे मिलने घंटों लग गए। रास्ते में सिद्धू को “आम आदमी पार्टी“ का प्रत्याशी  भी चुनाव प्रचार करते मिला मगर अमृतसर ईस्ट से कांग्रेस प्रत्याषी के विशाल  काफिले के समक्ष यह भी बौना नजर आया। पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए 4 फरवरी को वोट डाले जाने है। मतदान से पहले कांग्रेस नेताओं की जनसभाओं में भारी भीड जुट रही है। नवजोत सिंह सिद्धू की अपनी लोकप्रियता है और उन्हें  स्पष्टवादी  और खरी-खरी सुनाने के लिए जाना जाता है। उनका  शायराना अंदाज, हाजिर जबावी और आलोचकों की चुटकियां लेने की कला सिद्धू को औरो से कहीं अलग बना देती है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सिद्धू कांग्रेस के लिए पंजाब में वरदान साबित हो सकते हैं। सिद्धू ने यह कहकर कांग्रेस का मान बढाया है कि “ वे तो जन्मजात कांग्रेसी हैं“।  बहरहाल, कांग्रेस इस बार पंजाब में सत्ता में आने के लिए कोई कसर नहीं छोड रही है। पंजाब में कांग्रेस को इस बार सत्तारूढ  शिरोमणि अकाली दल -भाजपा  गठबंधन के साथ-साथ आम आदमी पार्टी से भी कडी चुनौती मिल रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री एवं आप के  राष्ट्रीय   संयोजक अरविंद केजरीवाल काफी पहले से पंजाब में प्रचार कर रहे हैं और उनकी जनसभाओं में जुटी भीड भी इस बात के संकेत हैं कि कांग्रेस को आप से भी मुकाबला करना पड रहा है। तिकोना मुकाबला और उस पर एंटी इंकूबेंसी लहर  अमूमन सत्तारूढ दल के खिलाफ काम करता है। कांग्रेस के पंजाब में अपने पक्के वोट हैं। लोकसभा चुनाव के दौरान भी इस वोट बैंक में मोदी लहर सेंध नहीं लगा पाई थी। अमूमनम हर चुनाव में “ 10 से 15 फीसदी“ स्विंग वोट ही चुनाव नतीजे तय करते  है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के उम्मीदवार और प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री प्रकाश  सिंह बादल के खिलाफ लंबी  और सांसद रवनीत बिट्टू को उप मुख्यमंत्री सुखबीर बादल के खिलाफ जलालाबद हलके  से उतार कर बडा दांव खेला है। यह अकालियों को घेरने की सटीक नीति है। चुनाव बयार सत्तारूढ गठबंधन के पक्ष में नही बह रही है, मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री की जनसभाओं में विरोध के स्वर उठना इस बात के संकेत है।  शिरोमणि अकाली दल के पास राज्य में पिता-पुत्र बादल दो ही स्टार प्रचारक है और इन दोनों को उनके हलकों में घेरे रखना कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अकाली-भाजपा के लिए प्रचार करेंगे तो सही मगर विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव जैसी “मोदी लहर“ नही दिख रही है। प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं और सबसे ज्यादा लोकप्रिय भी। लोकसभा चुनाव में अमृतसर लोकसभाई हलके से भाजपा के कद्दावर नेता अरुण जेटली को मोदी लहर के बावजूद एक लाख से भी ज्यादा मतों से हराना कैप्टन की लोकप्रियता का प्रंमाण है। उस समय  शिअद अध्यक्ष एवं उप मुखयमंत्री सुखबीर बादल ने कैप्टन की जमानत जब्त कराने का दावा कर अपनी जगहंसाई की थी। इतना तय है कि कैप्टन वयोवृद्ध अकाली नेता को लंबी में जबरदस्त चुनौती देंगें।  

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

Akhilesh Yadav Wins First Bout Over Father Mulayam

समाजवार्टी के चुनाव चिंह को लेकर निर्वाचन आयोग का फैसला अखिलेश  यादव के पक्ष में गया है और साइकिल  चुनाव चिंह उनके नेतृत्व वाली पार्टी को मिल गया है। पिता मुलायम सिंह यादव से “बागी“ हुए पुत्र  की यह बहुत बडी जीत है। दोनों ही पक्ष समाजवादी पार्टी के चुनाव चिंह “साइकिल पर दावा कर रहे थे। मुलायम सिंह यादव और उनके समर्थकों के लिए यह जोरदार झटका है।  आयोग ने अपने फैसले में कहा है कि उपलब्ध दस्तावेजों से साफ कि अखिलेश  यादव ही असली समाजवादी पार्टी है और अधिकतर विधायकों और पार्टी कार्यकर्ताओं  का उन्हें भरपूर समर्थनन है। वैसे निर्वाचन आयोग ने पहली बार दो पक्षों के बीच विवाद की स्थिति में  चुनाव चिंह को फ्रीज नहीं किया है। अब तक निर्वाचन आयोग किसी पार्टी के दो फाड होने की स्थिति में चुनाव चिंह को फ्रीज करता रहा है। देश  की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस  अब तक दो बार दो फाड होकर अपना चुनाव चिंह खो  चुकी है। 1969 में कांग्रेस के दो फाड होने पर निर्वाचन आयोग ने पार्टी के चुनाव चिंह “ हल जोतते दो बैलों की जोडी“ को फ्रीज कर दिया था। तब इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस (आई- इंदिरा) को गाय और बछडे का चुनाव चिंह मिला था। इसी चुनाव चिंह पर इंदिरा कांग्रेस को 1971 में प्रचंड बहुमत भी मिला था। मगर आपातकाल की विपरीत परिस्थितियों के कारण 1977 होते-होते इंदिरा कांग्रेस को अपना चुनाव फिर बदलना पडा। अब तक इंदिरा कांग्रेस पार्टी फिर दो फाड  हो चुकी थी और यह चुनाव चिंह भी जब्त किया जा चुका था। इस बार इंदिरा कांग्रेस ने हाथ को अपना चुनाव चिंह चुना। इस चुनाव चिंह को चुनने की पृष्ठभूमि  भी काफी दिलचस्प है। चुनाव चिंह का चयन करने के लिए पार्टी द्वारा नियुक्त कांग्रेस नेता सरदार बूटा सिंह यह तय नहीं कर पा रहे थे कि कौनसा चुनाव चिंह चुना जाए। तब निर्वाचन आयोग ने इंदिरा कांग्रेस के समक्ष हाथी, साइकिल और  पंजा  के तीन विकल्प दिए थे मगर बूटा सिंह तय नहीं कर पा रहे थे कौनसा चिंह लिया जाए। वे इंदिरा गांधी से सलाह लेने चाहते थे।  इंदिरा गांधी उस समय आंध्र प्रदेश  में थी। निर्वाचन आयोग ने बूटा सिंह को चुनाव चिंह चुनने के लिए अगली सुबह तक का समय दिया  था और  स्पष्ट  कर दिया था कि अगर इस दौरान  बूटा सिंह कोई फैसला नहीं ले पाए, तो इंदिरा कांग्रेस को बगैर चुनाव चिंह के ही लडना पडेगा। इस पर इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने निर्वाचन आयोग के कार्यालय पर खूब हंगामा किया था और अंत में कांग्रेस को पंजा चुनाव चिंह दिया गया। तब कांग्रेस  नेताओं को हाथी अथवा साइकिल की अपेक्षा पंजा ज्यादा उपयोगी लगा था। हाथी अब बहुजन समाज पार्टी का और साइकिल समाजवादी पार्टी का चुनाव चिंह है। अखिलेश  यादव के लिए यह बहुत बडी बात है कि जो काम इदिरा गांधी नहीं कर पाई, उन्होंने वह कर दिखाया। पार्टी की टूट की स्थिति में अधिकांश  विधायकों, सांसदों और कार्यकर्ताओं को अपने साथ जोडना बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य है। मुलायम सिंह लंबे समय से राजनीति में है और इस दौरान उन्होंने कई राजनीतिक फ्रंट बनाए और तोडे मगर उनका उत्तर प्रदेश  में पिछडे तबकों एवं मुसलमानों के जनाधार में कोई भी सेंध नहीं लगा पाया। अखिलेश  यादव ने चुनाव अखाडे का पहला दंगल तो पिता से जीत लिया है मगर अभी भी उनके समक्ष कई चुनौतियां है। सबसे बडी चुनौती पिता के जनाधार में सेंध लगाने की है। मुलायम सिंह ने  अखिलेश  पर मुसलमानों की उपेक्षा का आरोप लगाकर साफ कर दिया है कि पिता अपने जनाधार को आसानी से खिसकने नहीं देंगे। कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर अखिलेश  कुछ हद तक मतों के विभाजन को रोक सकते हैं मगर सबसे बडा सवाल है कि अल्पसंख्यक भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए अखिलेश  का साथ देते हैं अथवा मायावती का। कांग्रेस पर अभी तक राज्य के अल्पसंख्यकों को भरोसा नहीं है।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

Nobody Can Replace Mahatma Gandhi, Not Even Modi

 आजादी के बाद पंजाब में चरखे को लेकर एक लोकगीत लंबे समय तक घर-घर गाया जाता था। इस लोकगीत के बोल हैं “ दे चरखे नू गेढ, लोड नहीं तोप दी”, तेरे बम नू चलने नहीं देना गांधी दे चरखे ने“। साढा देश  आजाद कराया, गांधी दे चरखे ने“। इस गीत से महात्मा गांधी और उनके चरखे की सार्वभौमिक महता का पता चलता है। चरखा  स्वतंत्रता आंदोलन में   देश  भक्ति और स्वदेशी  आंदोलन का प्रतीक था। इसमें महात्मा गांधी का सामाजिक और आर्थिक दर्शन  निहित है। और चरखा आज भी भारत के करोडों कामगारों, शिल्पकारों और बुनकरों की आकांक्षाओं का प्रतीक है।  मगर इस बार भाजपा और मोदी सरकार ने महात्मा गांधी और उनके चरखे को ही विवाद का विषय  बना दिया है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर और डायरी से  राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की जगह चरखा कातते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फोटो लगाकर महात्मा गांधी की तोहीन की गई है। सोशल मीडिया पर इसकी जमकर आलोचना हो रही है।  महात्मा गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता। और ट्वीटर पर यह प्रतिक्रिया एकदम सामयिक और प्रासंगिक है कि कैलेंडर में चरखा कातने से प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी महात्मा गांधी नहीं बन सकते। इस मामले में विवाद बढते देख भाजपा और केन्द्र सरकार ने स्पष्टीकरण  दिया है कि खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर और डायरी में महात्मा गांधी की ही फोटो हो, ऐसा कोई नियम नहीं है। 1996, 2002, 2005, 2011, 2012 एवं 2013 में भी खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर में महात्मा गांधी की फोटो नहीं थी। मगर कहते हैं दो गलतियां मिलकर भी सही नहीं हो सकती।  भाजपा का स्पष्टीकरण  है कि प्रधानमंत्री मोदी युवाओं के आदर्श  हैं और प्रधानमंत्री द्वारा खादी को लोकप्रिय बनाने से इसकी बिक्री में पिछले दो साल में 34 फीसदी का इजाफा हुआ है। कांग्रेस के 50 साल के  शासन में खादी उत्पाद 2 से 5 फीसदी तक सीमित थी। भाजपा के इस कथन ने जले पर नमक छिडकने का काम किया है। महात्मा गांधी खादी के ब्रांड एबैसडर नहीं है कि और न ही खादी एवं ग्रमोद्योग आयोग आब तक बिक्री बढाने के लिए चरखा कातते हुए उनकी फोटो का इस्तेमाल करता रहा है। देश  के प्रधानमंत्री  को भी  खादी की बिक्री बढाने के लिए  ब्रॉड एम्बैसडर नहीं बनाया जाना चाहिए। महात्मा गांधी ने चरखे के महत्व पर प्रकाश  डालते हुए कहा था “ चरखे का मत्हव इसके कातने तक ही सीमित नहीं है। कातना तपस्या है और इसमें सादगी, आत्म-निर्भरता, आपसी प्रेम और मानवीयता निहित है। यह अमीर और गरीब, पूंजी और श्रम के बीच सेतु का काम करता है“। चरखे और खादी उत्पाद की प्रांसगिकता आज भी वही है जो आजादी से पहले थी। गांधी जी के पोते तुषार  गांधी ने प्रधानमंत्री पर तंज कसते  हुए कहा है कि “ तस्वीर पर चरखा कातने से मोदी महात्मा गांधी नहीं बन सकते। बापू खुद के वस्त्र भी चरखे से कातते और उन्हें ही पहनते । मोदी न तो नियमित रुप से चरखा कातते हैं और न ही अपने काते हुए वस्त्र पहनते हैं। विपक्ष का सवाल है कि इस स्थिति में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के कैंलेडर में  प्रधानमंत्री मोदी को चरखा कातते हुए दिखाने का क्या अभिप्राय है़?  बहरहाल, भाजपा प्रवक्ता सविता पात्रा ने  स्पष्ट  किया है “ गांधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता और कोई भी उनके बारे ऐसा नहीं सोच रहा है। वो हमारे दिल में है और हमारे कामों में उनके आदर्श  दिखते हैं“। इससे देश  को आश्वस्त  हो जाना चहिए। मगर कांग्रेस इस मामले को ऐसे उछाल रही है जैसे महात्मा गांधी और चरखे पर केवल उसकी बपौती हो। कांग्रेस का आरोप है कि आरएसएस ने पहले महात्मा गांधी और उनके विचारों को मारा और अब भाजपा चरखा और महात्मा पर मोदी को लगाकर  राष्ट्रपिता का नामोनिशान   को मिटाना चाहती है।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2017

(बे)सहारा डायरी

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा डायरी पर स्पष्ट  व्यवस्था देकर  शीर्ष  पदों पर आसीन लोगों को बेवजह के अदालती पचडों से राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को भी झटका लगा है। राहुल गांधी ने सहारा डायरी के पन्नों में निहित आरोपों  पर संसद में भूंकप लाने की बडी-बडी बातें की थी। देश  में  शीर्ष पदों  पर आसीन लोगों पर ऊल-जलूल आरोप लगाकर अदालत का वक्त जाया करने की तो जैसे रिवायत हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने सहारा डायरी मामले में साफ  शब्दों में कहा है कि बेबुनियाद और कच्चे आरोपों  (लूज शीट्स)  के आधार पर  शीर्ष  पद पर आसीन किसी भी व्यक्ति के खिलाफ जांच नहीं बिठाई जा सकती। बुधवार को सहारा डायरी को आधार बनाकर इस मामले जांच की मांग को लेकर न्यायालय में दायर याचिका को खारिज करते  हुए न्यायालय ने फैसला सुनाया कि  जांच के लिए इस मामले में पर्याप्त सबूतों की कमी है । अदालत ने कहा “ कच्चे आरोपों को आधार बनाकर जांच करवाना गलत परंपरा होगी“। सहारा डायरी को आधार बनाकर वकील और स्वराज इंडिया के संस्थापक प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से मामले की जांच करवाने की मांग की थी। रोचक तथ्य यह है कि  सुप्रीम  कोर्ट  ने जैन हवाला डायरीज मामले में एकदम अलग व्यवस्था दी थी। तब देष की शीर्ष  अदालत का कहना था कि जब कभी भी  शासकीय लोगों के खिलाफ अवैध  पैसा लेने के मामले सामने आते हैं, ऐसे मामलों की अविलंब  निष्पक्ष  जांच कराई जानी चाहिए। आयकर विभाग के छापों में बरामद सहारा डायरी के पन्नों में 2013-14 के दौरान छह माह के अंतराल में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई सियासी नेताओं को करोडों रु की घूस देने का दावा किया गया था। डायरी में दर्ज एंट्री में कहा गया था कि 30 अक्टूबर, 2013 और 29 नवंबर, 2013 के बीच चार बार  पैसे का लेनदेन हुआ था और डायरी में इनकी  स्पष्ट  एंट्रीज दर्ज थी।  डायरी में नरेद्र मोदी के अलावा मध्य प्रदेश  के मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री रमण सिंह और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री  शीला दीक्षित का भी नाम  दर्ज है। शीला दीक्षित का नाम आने से कांग्रेस के आक्रमण की बची-खुची  विश्वसनीयता   भी जाती रही है। सहारा डायरी की काफी हद तक 1996 की जैन हवाला डायरीज से अलौकिक समानता दिखती है। 1996 में हवाला कारोबारी जैन बंधु (सुरेद्र जैन और उनके भाई) की डायरीज  सीबीआई के हाथ लग गई थी और इन डायरियों में दर्ज एंटरीज के बाहर आने पर सियासी भूचाल आ गया था। जैन बंधुओं की डायरीज से खुलासा हुआ था कि हवाला कारोबारियों ने भाजपा के वरिष्ठ  नेता लाल कृश्ण आडवाणी, मदन लाल खुराना, कांग्रेस के  वरिष्ठ नेता  माधवराव सिंधिया, बलराम झाखड, वीसी  शुक्ला, पी   शिव शंकर और आरिफ मोहम्मद खां समेत कई नेताओं को अवैध रुप से पैसा दिया था। तब निचली अदालत ने सीबीआई को आरोपी सियासी नेताओं के खिलाफ मुकदमा दायर करने के निर्देश  दिए थे मगर ऊपरी अदालत ने इस फैसले को निरस्त कर दिया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और  शीर्ष  अदालत ने व्यवस्था दी थी कि सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों से जुडे मामलों की हर हाल में जांच होनी ही चाहिए। मगर दो दशक बाद  सर्वोच्च न्यायालय  इस फैसले से इतफाक नहीं रखाा है। बहरहाल, सहारा डायरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो व्यवस्था दी है, उससे  शीर्ष  पदों पर आसीन लोगों को राहत मिली है। आरोप लगाना आसान है मगर उन्हें साबित करना बेहद  मुश्किल। निजी क्षेत्र की कंपनी की डायरी के पन्नों  को पुख्ता सबूत नहीं माना जा सकता। मगर लोकतंत्र का ही तकाजा है कि शीर्ष पदों  पर आसीन व्यक्तियों के दामन पर छींटें लगते है तो उन्हे  साफ किया जाना चाहिए।  

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

Adverse Impact Of Demonetization Clearly Visible Now

नोटबंदी के दुष्परिणाम  अब सामने आने लग पडे हैं। सरकार के बडे-बडे दावों के बावजूद  जमीनी  सच्चाई यह  है कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था को तगडा झटका लगा है। ऑटोमोबाइल सेक्टर में  दिसंबर माह में वाहनों की बिक्री में पिछले 16 साल की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई है। हाउसिंग सेक्टर का तो और भी बुरा हाल  है। नोटबंदी से अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में देश  के 8 बडे शहरों में हाउसिंग की मांग में 44 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई है। दिल्ली-नेशनल केपिटल रीजन (एनसीआर) को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पडा है। और-तो-और  हाउसिंग सेक्टर में बिंदास माने जाने वाला बगलुरु भी इस मंदी से बच नहीं पाया है। दिसंबर में फैक्ट्री उत्पादन में भी खासी गिरावट आई है। सर्विस सेक्टर भी सिकुडा है।  बुधवार को  विश्व  बैंक ने भारत की 2016-17 की ग्रोथ रेट को 7.6 फीसदी से घटाकर 7 फीसदी तय की है। हालांकि यह ग्रोथ रेट चीन  के ग्रोथ रेट से थोडी ज्यादा मगर कुछ अंतरराष्ट्रीय एजेंसीज  का आकलन है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो अगली तिमाही (जनवरी-मार्च) के परिणाम आने पर ग्रोथ  और भी गिर सकती है और इसके साढे छह फीसदी से कम हो सकती है। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह पहले ही कह चुके हैं कि नोटबंदी से  देश  के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है। मनमोहन सिंह अंतरराष्ट्रीय  ख्यातिप्राप्त अर्थशास्त्री हैं और उनकी बात को “राजनीतिक बयानबाजी“ कहकर हल्के में नहीं लिया जा सकता। नोबल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने डाक्टर मनमोहन सिंह के आकलन से सहमति जताते हुए नोटबंदी को निरंकुश  कार्रवाई बताया है। उनका कहना है कि  “विश्वास “ ही भारतीय अर्थव्यवस्था का मूलमंत्र है और इसी  विश्वास  यह तेजी से आगे बढ रही है। सरकार ने इस भरोसे को तोडा है। लोगों का बैंकों पर से भरोसा उठ गया है। देश  के केन्द्रीय बैंक आरबीआई की  क्रेडिबिलिटी  भी जाती रही है। अभी तक मौद्रिक मामलों पर आरबीआई सरकार को सलाह दिया करती थी मगर पहली बार मोदी सरकार ने आरबीआई को नोटबंदी पर अपना फैसला थोपा है। सरकार की करंसी से भी लोगों का  विश्वास  उठ चुका है। देश  की गृहणियों को नोटबंदी ने सबसे ज्यादा झकझोर कर रख दिया है। भारत में गृहणियों कों “ बुरे वक्त अथवा विपदा“ के लिए  रसोई के मर्तबान या आटे-दाल के डिब्बे में   पाई-पाई  बचा कर रखने की आदत है मगर नोटबंदी ने उनके इस भरोसे को भी तोड दिया है। काले धन को नंगा करने के लिए गृहणियों को अपनी जमा-पूंजी को गंवाना पडे, ऐसी कार्रवाई का क्या फायदा? दुनिया के किसी भी देश  में न तो लोगों को बैंकों में जमा अपनी पूंजी को निकालने से रोका जाता है, और न ही पैसा निकालने की सीमा तय की जाती है।  न केवल भारत में, अलबता अमेरिका, फ्रांस और जर्मन में भी  नगदी का खासा प्रचलन है। पूर्व वितमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ  नेता पी चिदंबरम का आकलन है कि जीडीपी में एक फीसदी की गिरावट से देश  को डेढ लाख करोड रु के बराबर का नुकसान उठाना पडता है। और इसका सीधा असर घटते रोजगार और आय पर पडता है। आमदन गिरेगी तो मांग भी कम होगी और इससे अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पडता है। अधिकतर अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी ने  वैश्विक  मंदी में भी तेजी से आगे बढ रही भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज ग्रोथ पर ब्रेक लगा दी है और अब इसे रफ्तार पकडने में समय लग सकता है। तो क्या वाकई ही देश  को अभी नोटबंदी के बाद नवंबर-दिसंबर जैसे बुरे दिन झेलने पडेंगे? जिस तरह से रोजगार के अवसर घटे हैं, किसानों को फल-सब्जियों के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं, ग्रामीण अंचलों में पूरा लेन-देन रुक सा गया है, यह सब यही संकेत दे रहा है कि बुरा वक्त अभी टला नहीं है।

बुधवार, 11 जनवरी 2017

Not Condemnation But BSF Jawan Complaint Needs Consideration

सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के जवान कौ फेसबुक पर खाने की घटिया क्वालिटी की   शिकायत से देश -विदेश  में बवाल मच गया है। बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव की यह  शिकायत पूरी दुनिया में मीडिया और सोशल मीडिया पर सुर्खियों में है और पाकिस्तान में इसका खूब मजाक उडा जा रहा है।  शिकायतकर्ता  जवान ने सोमवार रात को फेसबुक पर अपना मोबाइल भी डाला है। बीएसएफ जवान ने फेसबुक पर अपनी  शिकायत में जली हुए परौंठे और पानी जैसी पीली दाल की फोटो डाली है। केन्द्रीय गृह मंत्री ने इस  शिकायत पर जाँच  बैठा दी है और  शिकायत करने वाले जवान का तबादला कर दिया है। जवान की  शिकायत से क्षुब्ध बीएसएफ ने  स्पष्टीकरण  दिया है कि “तेज बहादुर यादव का अतीत  शिकायत भरा रहा है। करियर के  शुरु में उन्हें नियमित काउसिंलिंग की जरुरत पडती थी। लगातार  शराब पीने, बगैर इजाजत के गायब रहने और सीनियर अफसरों से दुर्व्यवहार करने के उन पर आरोप लगते रहे हैं“। सीमा सुरक्षा बल की जिस यूनिट में तेज बहादुर तैनात था, वह सेना के अधीन काम कर रही थी और इस यूनिट का राशन सेना से ही आ रहा था। बहरहाल, सोशल मीडिया और टीवी चैनल्स पर सवाल किया जा रहा है कि अगर जवान पर  शराब पीने, बगैर अनुमति के गायब रहने और अफसरों से बुरा सलूक करने के संगीन आरोप थे, तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई़? अनुशासनहीन जवान को बीएसएफ क्यों सहन करती रही़? जाहिर है बीएसएफ अब अपनी छवि को बचाने के लिए जवान के खराब सर्विस रिकार्ड का हवाला देकर अपना पल्लू झाड रही है। पूर्व सैन्य अधिकारी इस बात से  सहमत  नहीं  है कि सीमा सुरक्षा बल में डाइट को लेकर इस तरह की खामी हो सकती है। सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान समेत सैनिकों की डाइट को लेकर एक फुलप्रूफ सिस्टम है और खाने की क्वालिटी की बार-बार जांच की जाती है। इसके अलावा हर सैनिक की  शिकायत निपटान के लिए भी एक पूरी पद्धति है और जवान की शिकायत का तुरंत निपटान किया जाता है। तथापि  इतना फूलप्रूफ सस्ते होने के बावजूद अगर सीमा सुरक्षा बल जवान ने  शिकायत  की हे  तो इसे  टाला नहीं जा सकता। जवान यादव ने फेसबुक पर जो फोटो पोस्ट किए हैं, उनमें अगर जरा भी सच्चाई है तो मुद्दा बेहद गंभीर हैं। सेना के राशन सप्लाई में गडबडी की अक्सर  शिकायतें सामने आती रही हैं।  कैग ने अपनी  रिपोर्ट में खराब खाने का हवाला दिया है । 2011 में राशन के गोलमाल के लिए ले, जनरल स्तर के अधिकारी को जनरल कोर्ट  मार्शल  ने तीन साल की कडी कैद की सजा दी थी। 2008 में सियाचीन में तैनात सेनिकों के लिए आवंटित राशन को कथित रुप से ब्लैक में बेचने के लिए 3 अफसरों समेत 13 सैनिकों को जांच में दोषी पाया गया था।  आर्मी के एक अध्ययन से यह बात भी सामने आई है कि सेना के लॉजिस्टीक में व्याप्त कई खामियों से सैनिकों की जान खामख्वाह खतरे में पड जाती है। मंगलवार को एक अग्रणी समाचार पत्र में प्रकाशित खबर में बयाया गया है कि अध्ययन में सेना की 50 खामियों को उजागर किया गया है। इनमें  शारीरिक कवच (बॉडी आर्मर), नाइट विजन गियर और त्रुटिपूर्ण ईंधन भडारण जैसी कमियां  शामिल है। इस रिपोर्ट में सतर्क किया गया है कि अगर  सेना ने अपनी अग्रिम चौकियों (फॉरवर्ड बेसिस ) में ईंधन भडारण (फ्यूल स्टोरेज) को और ज्यादा सुरक्षित नहीं किया तो हजारों जवानों की सुरक्षा खतरे में पड सकती है। उडी में 14 सैनिक इसलिए जिंदा जल कर मारे गए थे क्योंकि उनके टैंट एकदम फ्यूल डंप के साथ सटे थे। हालांकि  रिपोर्ट से बीएसएफ जवान के आरोपों से कोई वास्ता नहीं है मगर यह भी सच्चाई है कि सेना इन दिनों तरह-तरह की लॉजिस्टिक समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे समय में जवान की डाइट संबंधी  शिकायत का फौरन निपटान होना चाहिए।

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

ये अडंगे क्यों

सरकार को नोटबंदी के बाद से देश  को  कैशलैस बनाने की जितनी जल्दी है, बैंकों की मुनाफाखोरी की लत इस पर उतनी ही तेजी से  पानी फेर रही है। डिजिटल इंडिया में आधुनिक साहूकारों (बैंकों) को भारत के विशाल मध्यम तबकों से मुनाफा कमाने का स्वर्णिम अवसर नजर आ रहा है। वस्तुतः, उदारीकरण पर फल -फूल रही पूंजीवाद व्यवस्था में भी बैंक  अगर मोटा मुनाफा नहीं कमा पाएं, तो उन्हें ऐसा मौका दोबारा नहीं मिलेगा। इसी मौके का फायदा उठाते हुए बैंकों ने नोटबंदी के कारण उपजे संकट के समय कार्ड स्वाइप पर ट्रांसजेक्शन  चार्जेज लेने  शुरु कर दिए हैं जबकि सरकार ने फिलहाल किसी भी तरह के  शुल्क लेने से बैंकों को सख्त मना कर रखा है। बैंकों की इस मनमानी से क्षुब्ध देश  भर के पेट्रोल फीलिंग पंपों ने पहले तो रविवार रात से कार्ड स्वाइप करके फ्यूल बेचने पर मना कर दिया। सरकार के समझाने-बुझाने पर जैसे-तैसे डीलर्स नरम पडे और 13 जनवरी तक कार्ड स्वाइप की सुविधा जारी रखने पर मान गए। अब ताजा सूचना है कि सरकार ने डीलरों को कार्ड स्वाइप से पेट्रोल-डीजल की बिक्री बदस्तूर जारी रखने पर मना लिया है। डिजिटल पेमेंट से पेट्रोल पंपों पर पहले भी फ्यूल खरीदा जाता था और इस तरह की ट्रांसजेक्शन  पर कोई  शुल्क नहीं लगाया जाता था। इसके विपरीत कई बैंक ग्राहकों को डिजिटल पेमेंट से फ्यूल खरीदने के लिए तरह-तरह के प्रभोलन देते थे मगर नोटबंदी के बाद से बैकों के मुंह पर पानी आ गया है। अर्थव्यवस्था को कैशलैस बनाने के लिए सरकार को सबसे पहले उन सभी बाधाओं को दूर करना होगा, जो डिजिटल लेनदेन को हत्तोसाहित करती हैं। और सबसे बडी बाधा देश  में सदियो से जारी नगदी लेनदेन का प्रचलन है। देश  में अभी भी मात्र 5 फीसदी लोग डिजिटेल पेमेंट करते हैं और 95 फीसदी लोग, जिनके पास एटीएम कार्ड  है, अपने कार्ड  को एटीएम से नगदी निकालने के लिए प्रयोग करते हैं। देश  की 45 फीसदी आबादी असंगठित है और इस तबके का बैंक खाता तक नहीं है। इनका सारा लेनदेन नगदी पर चलता है। आंकडें यह भी बताते हैं कि देश  में कुल मिलाकर 3.85 करोड के करीब छोटे और सीमांत कारोबारी हैं और 21,000 के करीब असंगठित मंडियां। इन सब में सारा कारोबार कैश  में चलता है। और आंकडों से ही पता चलता है कि फास्ट मूविंग कंज्युमर गुडस (एफएमसीजी) की 93 फीसदी बिक्री  करियाना स्टोर्स  के मार्फत की जाती है और अधिकांश  लेनदेन कैश  में किया जाता है। किसानों को मंडियों में उपज के दाम भी नगदी में मिलते हैं और बीज-खाद भी नगदी में खरीदी जाती है। इन हालात में देश  को कैशलैस बनाने में अगर एक सदी नहीं तो कई साल अवश्य  लग सकते है। अगर बैंक इसी तरह हर ट्रांस्जेक्शन  पर  शुल्क लगाना  शुरु कर देंगे तो भला लोग डिजीटल पेमेंट की ओर क्यों कर जाएंगे। देहातों में बनिया भी बगैर  शुल्क के उधार में सामान बेचता है। बैंकिंग व्यवस्था को चॉक-चौबंद करने के अलावा सरकार को लोगों की पुलिसिंग का काम भी बंद करना होगा। नोटबंदी के बाद से देश  में वित्तीय आपातकाल जैसा माहौल है। लोग-बाग अब बैंको में पैसा जमा करने से भी डर रहे है। आयकर विभाग की ताजा कवायद से डर का माहौल और बढा है। आयकर विभाग ने बैंकों से अप्रैल, 2016 से 8 नवंबर तक बचत खातों में जमा नगदी की सारी जानकारी तलब की है। देश  के विभिन्न बैंकों में 44 करोड बैंक खाते हैं। इन खातों को खंगालना आसान नही है। नोटबंदी से देश  को कितना फायदा हुआ, यह चर्चा का विषय  हो सकता है मगर मौजूदा स्थिति में लोगों का बैंकिंग व्यवस्था पर से भरोसा उठ सकता है। डिजिटल इंडिया के लिए यह बात कतई  शुभ नहीं है।

शनिवार, 7 जनवरी 2017

और वे सोए-सोए चले गए

ओम पुरी को अपनी मौत का आभास हो गया था। महान सिने और रंगमंच कलाकार ने  2015 में बीसीसी को एक साक्षात्कार में कहा था, “सोए-सोए चल देंगे“। आपको पता चलेगा कि ओमपुरी का कल सुबह 7 बज कर 22 मिनट पर निधन हो गया“। और ठीक ऐसा ही हुआ। शुक्रवार 6 जनवरी को सुबह करीब साढे सात बजे उनका दिल का दौरा पडने से निधन हो गया। जिंदादिल ओम पुरी मौत से कुछ घंटे पहले अपनी आने वाली फिल्म “रामभजन जिंदाबाद“ के लिए  शूट कर रहे थे। देर रात तक दोस्तों से बतियाते रहे और फिर ऐसे सोए कि दोबारा नहीं उठे। ओमपुरी गजब के कलाकार थे और उन्हें जो भी किरदार दिया जाता, उसे एकदम जीवंत बना देते। ओम पुरी ने अदाकारी का एक नया अध्याय लिखा ।  आर्ट  सिनेमा को सफल बनाने में ओम पुरी, नसीरुद्यीन शाह और शबाना आजमी की अहम भूमिका रही है।  भाग्य की विडंबना देखिए कि जिस बॉलीवुड ने शुरु में उनके चेहरे और आवाज का मजाक उडाया, वही बाद में इनसे  सबसे अधिक लाभान्वित हुआ । उन्होंने 100 से ज्यादा हिंदी और 20 हॉलीवुड फिल्मों में काम किया। मशहुर ब्रितानवी निदेशक रिचर्ड  एटनबरो की फिल्म “गांधी“ में ओम पुरी ने महज तीन मिनट का किरदार निभाया था मगर इस अदने से किरदार को उन्होंने इस कद्र जीवंत बना दिया कि फिल्म के अहम किरदार तक उनके सामने बौने लगे। “अर्ध सत्य“ और “आरोहण“ में लाजबाव अभिनय के लिए ओम पुरी को “ बेस्ट एक्टर“ के नेशनल अवार्ड  से नवाजा गया था। सरकार ने उन्हें पद्मम श्री   से भी नवाजा  और उन्हें आर्डर ऑफ ब्रिटिश अम्पायर भी मिला ।  1999 में बनी अंग्रेजी बजट फिल्म “ईस्ट इज ईस्ट“ से उहें अंतरराष्ट्रीय  पहचान मिली । इस फिल्म में ओम पुरी ने पाकिस्तानी का किरदार निभाया था। ओम पुरी हर तरह का किरदार निभाने में निपुण थे। कॉमेडी में भी उनकी कोई सानी नहीं थी। उनकी “जानो भी दो यारो“ आज भी  श्रेष्ठ   कॉमोडी फिल्म मानी जाती है। मूलतः हरियाणा के अंबाला में जन्मे ओम पुरी का बचपन तंगी में बीता मगर उहें शुरु से थियेटर से बेहद लगाव था। इसी लगाव के कारण वे अंबाला से चंडीगढ आ गए और एक वकील के मुंशी  बन गए। पर थियेटर के प्रति लगाव के कारण ही ओम पुरी ने वकील की मुशीगिरी छोड दी। चंडीगढ में उनके नाटक का मंचन होना था। इसके लिए उन्हें तीन दिन का अवकाश  चाहिए था मगर वकील छुट्टी देने से साफ मुकर गए। इस पर ओम पुरी ने नौकरी को ही लात मार दी। उनके साथियों को जब इस बात का पता चला कि ओम पुरी की नौकरी छूट गई है, उन्होंने प्रिसिंपल से बात की। जैसे-तैसे ओम पुरी को लैब सहायक की नौकरी मिल गई। और इसके बाद ओम पुरी ने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में नौकरी  की और रंगमंच के दांव-पेंच भी सीखे। ओम पुरी साफगोई और स्पष्टवादी  थे, इसलिए कई बार उनकी बातों का गलत अर्थ निकाला जाता। सर्जिकल स्ट्राइक पर उनके बयान “ उन्हें आर्मी में भर्ती होने के लिए किसने कहा था, और किसने हथियार उठाने को कहा था“ पर खासा बवाल मचा और उन पर मामला भी दर्ज  हुआ। बाद में उन्हें इस पर माफी मांगनी पडी। सफलता ने उनके कदम चूमे पर उनका पारिवारिक जीवन उथल-पुथल भरा रहा। उन्होंने दो शादियां की मगर दोनों टूट गईं। उनकी दूसरी पत्नी नंदिता पुरी ने अपनी पुस्तक में ओम पुरी की निजी जिंदगी को लेकर कुछ ऐसी बातें सार्वजनिक की, जिससे उनके जीवन में भूचाल सा आ गया । इसका उन्होंने बहुत बुरा माना । अपने पुत्र ईशान से उन्हें बेहद लगाव था मगर उन्हें इस बात का अफसोस था कि उन्हें बेटे से मिलने नहीं दिया जाता। कलाकार कभी नहीं मरता क्योंकि उनकी कला हमेशा  जिंदा रहती है। ओम पुरी के निधन से भारतीय सिनेमा में जो  शून्य आया है, उसे भरना आसान नहीं है।    

शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

समाजवादी दंगल

हतोऊत्साहित अमेरिका के लोकप्रिय  राजनीतिक थ्रिलर “हाउस ऑफ कार्डस“ का एक प्रचलित फिकरा है,“ दाहिने से हाथ मिलाओ मगर बाएं में हथियार रखो ( शेक विथ युअर राइट हैंड, बट होल्ड ए रॉक विथ लेफ्ट)। उत्तर प्रदेश  की  समाजवादी पार्टी में पुत्र  द्धारा  पिता के तख्त पलट पर यह फिकरा एकदम सटीक बैठता है। एक दिन पिता मुलायम सिंह यादव अपने पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव को पार्टी से निकाल देते हैं। अगले ही दिन बाप-बेटे के बीच सुलह होती है और अखिलेश  का  निष्कासन  रदद कर दिया जाता है मगर तभी एंटी-क्लाइमेक्सः पुत्र अखिलेश  यादव पिता मुलायम सिंह को पार्टी अध्यक्ष पद से हटा कर खुद पार्टी अध्यक्ष बन जाते हैं। बालीवुड मसाला फिल्म के लिए यह उम्दा स्क्रिप्ट है। हिंदुस्तान की राजनीति में ऐसे कई रोचक किस्से दर्ज  हैं मगर समाजवादी पार्टी की ताजा नौटंकी कई मायनों में विलक्षण है। अखिलेश ने सैनिक स्कूल में पढाई की है, इसलिए उनसे कडे अनुशासन की उम्मीद की जाती है मगर इस बार उन्होंने परिवार का अनुशासन तोडा है। पिता और अपने राजनीतिक गुरु  का तख्त पलट करके राजनीति में नया अध्याय लिखा है। मुलायम सिंह ने “पुत्र मोह“ को छोडकर लक्ष्मण का साथ दिया। राजनीति में ऐसी मिसाल नहीं मिलती।  मुलायम सिंह को राजनीति कौशल का लंबा-चौडा अनुभव है। उन्होंने ने कई राजनीतिक फ्रंट बनाए और गिराए भी। तीन बार उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और एक बार देश  के रक्षा मंत्री (1996-98)। प्रधानमंत्री बनने की दिल्ली ख्वाहिश  है और इसी मकसद से उत्तर प्रदेश  को अपने पुत्र अखिलेश  के सुपुर्द करके खुद  राष्ट्रीय   राजनीति में पूरी तरह से जुट गए। अखाडे के पहलवान भी रह-चुके है और दंगल का हर दांव बखूबी जानते हैं। फिर भी पुत्र ने पिता को राजनीतिक दंगल में ऐसी पटखनी दी कि विरोधियों की सिट्टी-पिट्टी  गुम हो गई। अखिलेश  यादव को राजनीति में आए ज्यादा समय नहीं हुआ है और उनके पिता ही उनके राजनीतिक गुरु हैं।  उन्होंने राजनीति के सारे दांव-पेंच  पिता से सीखे हैं। पिता मुलायम सिंह ने उन्हें मुख्यमंत्री तो बना दिया मगर स्वतंत्र रुप से काम नहीं कर दिया। अखिलेश  को सचिव तक को बदलने अथवा नियुक्त करने की आजादी नहीं थी। पिता बात-बात पर टोकते और सार्वजनिक मंच पर भी जलील करते। बेचारे अखिलेश  खून का घूंट पीकर रह जाते।  चाचा शिवपाल यादव मुलायम के मुखबिर की तरह काम करते और मुख्यमंत्री के हर कदम पर पैनी नजर रखते। 2014 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की  शर्मनाक हार  ने मुख्यमंत्री की स्थिति को और भी दयनीय बना दिया। मगर कहावत है,“ गुरु गुड, चेला शक्कर“।  अखिलेश  यादव ने यह साबित कर दिया है। बार-बार अपमानित किए जाने से आजिज आकर अखिलेश  ने विधायकों और संगठन पर अपनी मजबूत पकड बनाई। माफिया डॉन मुख्तार अंसारी जैसे आपराधिक तत्वों का  समाजवादी पार्टी में विलय का मुखर विरोध करके और गुडें-मव्वालियों से दूरी बनाकर अखिलेश   युवाओं के हीरो बन गए। पार्टी के अधिकांश  कार्यकर्ता भी युवा हैं। इसलिए अखिलेश युवाओं के चहेते बन गए। लोकसभा चुनाव के बाद से अखिलेश  ने राज्य में विकास की गंगा बहाने की हरचंद कोशिश की। ताजा सर्वेक्षण भी यह कहते हैं कि राज्य की जनता अखिलेश  को बतौर मुख्यमंत्री  प्रतिद्धद्धियों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय मानती है। तथापि उनके मार्ग में कई बाधाएं हैं। राज्य में विधानसभा चुनाव की तिथियां घोशित हो चुकी हैं। 11 फरवरी से 403 सीटों के लिए 7 चरणों में मतदान होना है। और अभी अखिलेश  के पास पार्टी का चुनाव चिंह तक नहीं है। अगर इस पर दोनों पक्षों में खींचतान जारी रहती है तो चुनाव चिंह जब्त हो सकता है। राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता। न कोई स्थायी मित्र और न ही  दुश्मन । अभी भी बाप-बेटे में सुलह की कोशिशें  जारी हैं। चुनाव के मद्देनजर  अखिलेश  के लिए अपने पिता का आशीर्वाद लेकर चलना ही बेहतर रहेगा। समाजवादियों के वोट विभाजित होने से विरोधियों को ही फायदा होगा।  

गुरुवार, 5 जनवरी 2017

सुन,,, सुन, चुन,,, चुन

पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। ठीक एक माह बाद 4 फरवरी को पंजाब और गोवा में वोट डाले जाएंगे। उत्तर प्रदेश  में  सात  चरणों का मतदान होगा और यह 11 फरवरी से  शुरु होकर 8 मार्च तक चलेगा। उत्तराखंड में 15 फरवरी को और पूर्वोतर राज्य मणिपुर की 60 सीटों के लिए 4 और 8 मार्च को वोट डाले जाएंगे। मतगणना 11 मार्च को होगी। इस तरह पंजाब और गोवा को मतदान के बाद चुनाव परिणाम के लिए लंबा ३४ दिन तक का इंतजार करना पडेगा। 2012 में भी पंजाब को चुनाव परिणाम के लिए लंबा इंतजार करना पडा था। तब 30 जनवरी को मतदान हुआ था और मतगणना 6 मार्च को हुई थी। चुनाव की घोषणा होते ही पांचों राज्यों में तत्काल प्रभाव से आचार संहिता लागू हो गई है। सोमवार को ही सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव में जाति, धर्म और भाषा  के नाम पर वोट मागने पर प्रतिबंध लगा दिया था। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव इस बात का गवाह भी बनेंगे कि राजनीतिक दल देश  की सर्वोच्च अदालत के इस फैसले का कितना सम्मान करते हैं। देश का हर बडा-छोटा राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चयन ही जाति और धर्म के आधार करता है। हिंदू बहुल हलके में हिंदू और मुस्लिम बहुल में मुसलमान प्रत्याशी  ही उतारा जाता है। लगभग हर राजनीतिक दल संप्रदाय के नाम पर चुनाव में मतदाताओं का  ध्रुवीकरण  कराने की फिराक में रहता है। पंजाब और गोवा में धर्म के नाम पर खुल कर वोट मांगे जाते हैं। गोवा में ईसाईयों की आबादी 25 फीसदी है और 66 फीसदी हिंदू हैं।  इस राज्य में चुनाव हिंदू बनाम ईसाई के मुद्दों पर लडा जाता है। गोवा की महाराष्ट्रवादी  गोमांतक पार्टी (एमजीपी) का वर्चस्व ही हिंदुत्व पर टिका है और अभी यह पार्टी भाजपा सरकार का समर्थन कर रही है। बुधवार को चुनाव की घोषणा होते ही एमजीपी ने अपना समर्थन वापस ले लिया। पार्टी का पुराना स्टैंड है कि आचार संहिता लागू होने के बाद सरकार का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए। 1961 में पुर्तगाल के उपनिवेशवादी  शासन से आजाद होने के बाद  गोमांतक पार्टी हिंदू मतदाताओं का  ध्रुवीकरण  कराकर   कांग्रेस को पछाड कर सता में आई और 1979 तक लगातार चुनाव जीती रही। भाजपा के गोवा के राजनीतिक परिदृ्श्य  पर उभरने से गोवा में सबसे ज्यादा नुकसान एमजीपी को हुआ है। यही स्थिति पंजाब में है। पंजाब में  शिरोमणि अकाली दल का वजूद ही धार्मिक मुद्दों (पंथक एजेंडा) पर टिका हुआ  है। बृहद पंजाब को तोडकर पंजाबी सूबे का गठन  करवाना भी अकालियों की इसी राजनीति का हिस्सा था। अकालियों के साथ-साथ पंजाब में भाजपा भी चुनाव में खुलकर धर्म और भाषा  का सहारा लेती है। अकाली सिखों का प्रतिनिधित्व करते हैं और भाजपा हिंदुओं का। इसी बिला पर दोनों मिलकर चुनाव लडते हैॅ। बहरहाल, नोटबंदी के बाद पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। भाजपा इस बात से फूली नहीं समा रही है कि नोट्बंदी पर आम आदमी प्रधानमंत्री के साथ है। हाल ही में सपन्न चंडीगढ नगर निगम चुनाव में भाजपा को प्रचंड जनादेश  मिला था । हालांकि चंडीगढ के चुनाव परिणाम पंजाब के ग्रामीण मतदाताओॅ के रूझान नहीं माने जा सकते  मगर इस चुनाव से  शहरी मतदाताओं के रुझान का कुछ हद तक पता चल जाता है। लोकसभा चुनाव के दौरान “मोदी लहर“ के बावजूद पंजाब के शहरी मतदाताओं ने भाजपा का साथ नहीं दिया था। शहरी मतदाता अकाली दल-भाजपा के “भ्रष्ट   शासन” से खासे खफा थे। कांग्रेस की शहरी मतदाताओं पर नजर है और जब कभी भी शहरी मतदाताओं ने कांग्रेस का साथ दिया वह सत्ता में आई है।  पंजाब के देहाती क्षेत्रों में किसानों का दबदबा है। नोटबंदी के किसान खासा परेशान हुआ है।  पांच राज्य के चुनाव में यह पूरी तरह से साफ हो जाएगी कि नोटबंदी से देश  का जनमानस कितना संतुष्ट  है या खफा।

बुधवार, 4 जनवरी 2017

अब क्या करेंगे सियासी दल

उत्तर प्रदेश  और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की बेला पर सुप्रीम कोर्ट द्धारा  धर्म और जात-पात के नाम पर   वोट मांगना प्रतिबंधित किए जाने से देश  के राजनीतिक दलों की नींद उड गई है। भारत में राजनीतिक दल न केवल धर्म और जात-पात के नाम पर धडल्ले से वोट मांगते हैं, अलबत्ता उम्मीदवारों का चयन भी इसी आधार  पर करते  हैँ । कुछ राजनीतिक दलों का गठन ही जात-पात और धर्म के नाम पर हुआ है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में  स्पष्ट  व्यवस्था दी है कि कोई भी दल और प्रत्याशी   धर्म, जाति और भाशा के नाम पर वोट मांगता है  तो निर्वाचन आयोग उसका चुनाव अवैध घोषित कर सकता है। देश  की शीर्ष  अदालत ने यह भी स्पष्ट  कर दिया है कि पार्टी या प्रत्याशी  ही नहीं, उनके समर्थक नेता, एजेंट और धर्मिक नेता भी अगर ऐसा करते हैं, तो चुनाव गैर-कानूनी माना जाएगा। जन प्रतिनिधि कानून की धारा 123 (3) की व्याख्या करते हुए कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने कहा है कि कानून में  स्पष्ट  व्यवस्था है कि धर्म अथवा जाति के नाम पर वोट नहीं मांगे जा सकते और इस स्थिति में निर्वाचन आयोग को चुनाव  रद्द करने का पूरा हक है।  जन प्रतिनिधि कानून की  1969 में भी कोर्ट  ने व्याख्या की थी मगर तब यह व्यवस्था दी गई थी कि केवल उम्मीदवार अपनी जाति और ध्रर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता। यानी उनके समर्थक और पार्टी ऐसा कर सकती है।  राजनीतिक दलों ने इसका खूब फायदा उठाया। ताजा फैसले का दायरा काफी व्यापक किया गया है और अब चुनाव में धर्म  और जाति के नाम पर वोट  मांगने पर राजनीतिक दल सौ बार सोचेंगे। उम्मीदवार के समर्थक और प्रचार करने वाले नेता जाति और धर्म का खुलकर सहारा लेते रहे हैं। पंजाब में  शिरोमणि अकाली दल तो सार्वजनिक तौर पर धर्म और राजनीति (पीरी और मीरी)  का खुलेआम घालमेल करता है। अकाली दल के वयोवृ्रद्ध नेता और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश  सिंह बादल ने हाल में फिर कहा था कि “सिखी में धर्म और राजनीति“ साथ-साथ  चलती है। पंजाब के सियासी नेता इन दिनों धर्मिक गुरुओं का समर्थन लेने के लिए डेरों के चक्कर लगा रहे हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष ने कुछ दिन पहले अमृतसर के निकट ब्यास में स्थित राधा स्वामी डेरे में  रात बिताई थी और इस प्रवास का मकसद राधा स्वामी भक्तों का समर्थन हासिल करना  ही था। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा जाति और धर की आड में हर चुनाव में मतदाताओं का जाति और धर्म (हिंदु) के नाम पर ध्रुवीकरण  करने में कोई कसर नहीं छोडती है। इस मामले में बहुजन समाज पार्टी सबसे आगे है। उसका वर्चस्व ही जाति पर टिका हुआ है। सुप्रीम कोर्ट  के फैसले  के बावजूद सुश्री मायावती ने मंगलवार को लखनऊ की रैली में खुलकर धर्म  और जाति के नाम पर वोट मांगे। भारत में उम्मीदवारों का चयन भी जाति और धर्म के आधार पर ही किया जाता है। सांसद   ओवैसी की आल इंडिया मसलिस-ए-इतिहादुल मुसलमीन (एआईएमआईएम) का वजूद भी सांप्रदायिकता पर टिका है। ओवैसी किसी भी सार्वजनिक मंच से धर्म का इस्तेमाल करने से नहीं चुकते और खुद को मुसलमानों का सबसे बडा पैरवीकार बताते नहीं अघाते हैं। देश में जाति आधारित राजनीति की गहरी पैठ है और 80 फीसदी से भी ज्यादा उम्मीदवारों का जाति या धर्म के आधार पर चयन किया जाता है। पंजाब में  शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी अब तक जितने भी उम्मीदवार विधान सभा चुनाव के लिए उतार चुके हैं, उनमेंसे 90 फीसदी जाति और धर्म के आधार पर चुने गए हैं।  इन हालात में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करना निर्वााचन आयोग के लिए आसान नहीं है। देश  में सियासी नेता कानून का तोड निकालने में माहिर है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

2017 का दंगल शुरू

सुप्रीम कोर्ट  ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुुराग ठाकुर और सचिव अजय  शिर्के को पद से हटाकर लोढा समिति  की  सिफारिशें  न मानने वालों को सख्त संदेश  भेजा है। देश  की  शीर्ष  अदालत केे  स्पष्ट  निर्देशों  के बावजूद बीसीसीआई अध्यक्ष दुनिया की सबसे धनाढ्य किर्केट संस्था में सुधार लाने पर अब तक किंतु-परंतु कर रहे थे। कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को कई मौके दिए मगर  लोढा समिति  की  सिफारिशें को अक्षरश  लागू करना तो दूर, बीसीसीआई ने इन्हें आंशिक रुप से भी संजीदगी से लागू नहीं किया। भारत और इंग्लैंड के बीच 15 जनवरी से शुरु हो रही एक दिवसीय मैंचों की श्रृंखला बाधित न हो, इसलिए कोर्ट ने सबसे सीनियर उपाध्यक्ष  को बीसीसीआई का कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया है। बीसीसीआई के ज्वांइट सेक्ट्री को सेक्ट्री अजय  शिर्के का भी कार्यभार दिया गया है। सप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में  साफ  कहा है कि  15 जनवरी से  शुरु हो रही भारत-इंग्लैंड एक दिवसीय श्रृंखला में कोई रुकावट नहीं आएगी। तथापि 15 जनवरी को पुणे में होने वाले पहले एक ओडीआई में रुकावट डाली जा सकती है। अजय  शिर्के पुणे से हैं और अगर ताजा हालात के  दृष्टिगत  महाराष्ट्र  क्रिकेट संघ  मैच न कराने का जोखिम उठा ले तो मैच को तत्काल  रिशेड्यूल  करना संभव नही होगा। इस मैच के टिकट बिकने  शुरु हो चुके हैं। अनुराग ठाकुर  की  मुश्किलें  अभी यहीं खत्म नहीं हुई हैं। उन पर सुप्रीम कोर्टं में झूठा हलफनामा दायर करने का आरोप है और अदालत उन्हें झूठे साक्ष्य (परजरी) के अपराध में जेल भी भेज सकती है। अनुराग ठाकुर ने अंतरराष्ट्रीय   क्रिकेट संघ (आईसीसी) की ओर सुप्रीम कोर्ट  में झूठा हलफनामा दायर कर दावा किया था कि आईसीसी लोढा कमेटी की सिफारिशों  को बीसीसीआई के कार्यं में दखल मानती है जबकि आईसीसी अध्यक्ष  शंशांक  मनोहर ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। अनुराग ठाकुर की इस झूठे हलफनामे से पता चलता है कि देश  के सियासी नेता अपने फायदे के लिए देश  की शीर्ष  अदालत तक को गुमराह करने में भी हिचकते नहीं हैं। अनुराग ठाकुर केन्द्र में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी के सांसद है। वे भारतीय युवा मोर्चे के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आए दिन देश  में सुधारों की बात करते हैं और वे संजीदगी से हर क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने के लिए प्रयत्नशील भी हैं। फिर उनकी ही पार्टी के सांसद बीसीसीआई में सुधार लाने के लिए  लोढा समिति  की सिफारिशों  को क्यों लागू नहीं कर पाए? लोढा कमेटी की सिफारिशों  में 70 साल से ज्यादा उमर के लोगों को बीसीसीआई से बाहर रखने और एक व्यक्ति के दो-दो पद संभालने पर रोक लगाना प्रमुख हैं। अनुराग ठाकुर बीसीसीआई अध्यक्ष के अलावा लंबे समय से हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं और वे अपनी जमीन से जुडा रहना चाहते है। लोढा कमेटी ने एक स्टेट, एक वोट की सिफारिश  भी कर रखी है। इस प्रावधान के लागू होने से कई पदाधिकारी  बीसीसीआई में पदस्थ नहीं हो सकते।  लोढा कमेटी बीसीसीआई को आरटीआई एक्ट के तहत लाना चाहती है। कोई भी बीसीसीआई पदाधिकारी लगातार दो बार  से ज्यादा पद पर नहीं रह सकता। मंत्री अथवा नौकरशाह भी बीसीसीआई में नहीं रह सकता। लोढा समिति की सिफारिशें अक्षरश  लागू किए जाने की स्थिति में बीसीसीआई को सियासी नेताओं के कब्जे से मुक्त किया जा सकता है और जाने माने क्रिकेट खिलाडियों के लिए मार्ग  प्रशस्त हो सकता है। यही सुप्रीम कोर्ट  भी चाहता है और देश  के क्रिकेट प्रेमी भी। सियासी नेताओं और नौकरशाहों ने जिस तरह से बीसीसीआई समेत खेल संगठनों को राजनीति का अखाडा बना रखा है, लोढा कमेटी की सिफारिशें उन्हें इससे मुक्ति दिला सकती है। 2017 का दंगल शुरु हो चुका है। 1 जनवरी को समाजवादी बेटे ने पिता को पार्टी से बेदखल कर दिया, और अब 2 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग ठाकुर को हटाया दिया है।          
                   

सोमवार, 2 जनवरी 2017

Goodbye 2016: A year We Can't Forget

वर्ष  2016  पूरी दुनिया में भुलाए नहीं भुलाया जा सकेगा। इसलिए नहीं कि 2016 अब तक का सबसे गर्म वर्ष  था। और इसलिए भी नहीं कि 2016 में एक जमाने में पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन छोडने का ऐतिहासिक फैसला लिया और इस वजह तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कैमरुन को इस्तीफा देना पडा। और न ही यह वर्ष  अमेरिका के अरबपति कारोबारी और राजनीति में नौसिखिया माने जाते रहे डोनाल्ड ट्रंप की  प्रेजिडेंट  पद चुनाव में अभूतपूर्व जीत के लिए युगों तक याद रखा जाएगा। दुनिया में  इस तरह की विशेष  घटनाएं साल-दर-साल होती रहती है। मगर एक अदना सा आतंकी संगठन पृथ्वी के ताकतवर देशों  में भी दहशत फैलाए, ऐसी मिसाल इतिहास में नहीं मिलती है। वर्ष  2016 इस्लामिक स्टेट के खूंखार और अमानवीय आतंक के लिए इतिहास में दर्ज रहेगा। न्यूयार्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार सीरिया और इराक के बाहर ही इस्लामिक स्टेट के आतंकी हमलों में  पिछले साल (2016 ) 1200 से ज्यादा लोग मारे गए  और इनमें अधिकतर पश्चिम  देशों   के लोग  शामिल है। चार जनवरी, 2016 से लीबिया से  शुरु हुआ हत्याओं का सिलसिला ववर्षांत  तक बदस्तूर जारी है। जुलाई में फ्रांस के नाइस शहर में आईएस आतंकियों ने ट्रक को भीड पर चढाकर 86 निर्दोष  लोगों को मार डाला और इस हमले में 434 से ज्यादा घायल हो गए थे। मार्च में बेल्जियम और यूरोपियन यूनियन की राजधानी ब्रिसेल्स  में इस्लामिक स्टेट आतंकियों के हमलों में 32 निर्दोष  लोग मारे गए थे। यूएस टुडे की रिपोर्ट के अनुसार  2016 में हर रोज एक से ज्यादा आतंकी हमले होते रहे है। आतंकियों से हर छोटा-बडा डरा हुआ है और इसके खिलाफ एकजुट होने की बातें करता है मगर अमल में कुछ नहीं किया जाता। संभवतय, इसी वजह अमेरिका के मशहूर विचारक नॉम चौमस्की का कहना है कि “ हर कोई आतंक को रोकने के लिए चिंतित है, ठीक है। बहुत ही आसान तरीका है, इसमें भाग लेना बंद करो“ मगर मानवता के दुश्मन  आंकियों से ऐसी कतई उम्मीद नहीं की जा सकती। 2016 में भारत को आतंक का भारी खामियाजा भुगतना पडा है। इस साल की  शुरुआत ही पठानकोट  हमले से हुई। इस बीच हिजबुल के आतंकी कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने और उडी हमले के बाद भाातीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक से पाकिस्तान कुछ सहमा तो सही मगर  कश्मीर  घाटी में आतंक का तांडव पुरे साल जारी रहा। आतंक के अलावा वर्ष  2016  नोटबंदी और इससे उपजे नगदी संकट के लिए भी जाना जाएगा। दुनिया में  शायद ही ऐसी मिसाल मिलती है कि अपने ही पैसा लेने के लोगों को कतार में खडे-खडे अपने प्राण गंवाने पडे। और देश  में पहली बार ऐसा हुआ है कि  लोगों को  बैंकों से  अपना पैसा निकालने के लिए भी तरसना पडे। राजनीतिक फ्रंट पर साल के अंत में दो ऐसी विलक्षण घटनाएं हुईं है जो अपने आप में अद्धितीय है। 30 दिसंबर को दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उनकी ही पार्टी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री अखिलेश  तादव को उनके पिता और समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह ने पार्टी से छह साल के लिए निकाल दिया । पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री पेमा खांडू को भी उनकी पीपल्स पार्टी ने निष्कासित करा दिया।  पेमा खांडू पहले कांग्रेस मे थे मगर फिर 42 विधायकों के साथ बगावत करके भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने थे। अरुणाचल प्रदेश दल-बदल की राजनीति के लिए जाना जाता है। उत्तर प्रदेश  में अखिलेश  यादव के निष्कासन   से समाजवादी पार्टी करीब-करीब दोफाड हो चुकी है। सत्ता के लिए बेटे का बाप  अथवा बाप के बेटे से बागी हो जाना समकालीन भारतीय राजनीति के पतन की पराकाष्ठा  दर्शाता  है।