लोकतंत्र में निष्पक्ष , निर्भीक एवं स्वतंत्र चुनाव के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड का होना अवश्यंभावी माना जाता है। चुनाव लड रहे सभी राजनीतिक दलों को भी वही सुविधा मिलनी चाहिए जो सत्तारूढ दल को उपलब्ध होती है। और सरकारी खहाने को लुटाने की कतई अनुमति नहीं होनी चाहिए। सरकारी खजाने को लूटाकर सता पाना लोकतंत्र को कमजोर कर रहा है। भारत में सत्तारूढ दल को प्रतिद्धंद्धी दलों की तुलना में ज्यादा एडवांटेज मिलती है। चुनाव समीप आए नहीं, सत्तारुढ दल सरकारी खजाने को लुटाने में कोई कसर नहीं छोडते हैं। इसी साल के अंत में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधानसभा के चुनाव होने हैं। गुजरात विधानसभा की टर्म 20 जनवरी, 2018 और हिमाचल प्रदेश विधानसभा की टर्म 7 जनवरी, 2018 को खत्म हो रही है। अगले साल 2018 के शुरू में पूर्वोतर नगालैंड, मेघालय विधानसभा के चुनाव होने हैं, फिर कर्नाटक विधानसभा के। नगालैंड, त्रिपुरा और मेघालय विधानसभा की टर्म मार्च 2018 और कर्नाटक विधानसभा की मई, 2018 में ख्त्म हो रही है। अगले साल के उत्तरार्ध में राजस्थान, मध्य प्रदेश , छतीसगढ और मिज़ोरम विधानसभाओं के चुनाव कराए जाने हैं। मिजोरम विधानसभा की टर्म दिसंबर 2018 को राजस्थान, मध्य प्रदेश एव़ं छतीसगढ विधनसभाओं की टर्म जनवरी 2019 में ख्त्म हो रही है। इस हिसाब से अगला पूरा साल विधानसभा चुनाव कराते ही बीत जाएगा। साल 2017 भी कमोवेश विधानसभा चुनाव कराने में ही चला जाएगा। इस साल के शुरु में पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश , मणिपुर और गोवा विधानसभाओं के चुनाव कराए गए थे और अब गुजरात और हिमाचल पदेश में चुनाव कराए जाने हैं। मई, 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं। एक के बाद दूसरे चुनाव कराने से न केवल निर्वाचन आयोग और सरकारी मशीनरी पर, अलबत्ता देश के वित्तीय संसाधनों पर भी खामख्वाह का बोझ पड रहा है। देश में मतदाताओं को रिझाने की राजनीतिक दलों की रिवायत ने विभिन्न राज्यों की माली हालत खस्ता करके रख दी है। चुनाव की बेला पर बडी-बडी परियोजनाओं और उदार वित्तीय पैकेज देने की रिवायत है मगर चुनाव होते ही इस तरह की उदार वित्तीय सहायता अता-पता तक नहीं मिलता है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राज्य के लिए 1.25 खरब करोड की विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा की थी। इसमें 54,713 करोड रु राष्ट्रीय राज मार्ग के लिए थे। इस विशाल राशि के अलावा 13,820 करोड रु प्रधानमंत्री सडक योजना के तहत आवंटित किए गए थे। इस तरह बिहार को राष्ट्रीय राज मार्ग के लिए ही तब 68,533 करोड रु आवंटित थे। इस हिसाब से राज्य के राष्ट्रीय राज मार्ग अब तक चकाचक हो जाने चाहिए थे मगर ऐसा नही हुआ है। विधानसभा चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पडा था और नीतिश कुमार-लालू यादव का महागठबंधन सत्ता में आया था। इसलिए यह पैकेज राज्य को नहीं मिला। निष्कर्ष यह है कि सत्ता पाने के लिए सरकारी खजाने का इस्तेमाल किया जाता है। मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान यात्रा के दौरान एक दिन में 15,100 करोड रु की परियोजनाओं का शिलान्यास किया। जाहिर है यह सब अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को सामने रखकर राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है। हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी सत्तारूढ दल मतदाताओं को लुभाने के लिए दोनों हाथों से सरकारी खजाना लुटा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश की माली हालत बेहद खराब है। सरकार को अपने रोजमर्रा के खर्चें पूरा करने के लिए भी कर्जा लेना पड रहा है। विधानसभा चुनाव की बेला पर पंजाब और उतर प्रदेश की तत्कालीन सरकारों ने भी मतदाताओं को रिझाने के लिए खुले हाथ से खजाना लुटाया था। पंजाब की वित्तीय हालात इस कद्र खराब थी कि अकाली-भाजपा सरकार जमीन-जायदाद बेच कर अपने खर्चे पूरे कर रही थी। यह सब कानूनन बंद होना चाहिए और चुनाव में लेवल प्लेइंग फील्ड सुनिश्चित होनी चाहिए।
गुरुवार, 31 अगस्त 2017
बुधवार, 30 अगस्त 2017
स्वंयभू बाबा, धर्मभीरु लोग
Posted on 8:13 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत ने सामाजिक क्षेत्र में भी वाकई तरक्की की है। कुछ साल पहले तक पश्चिम में भारत की छवि “सपेरों“ के देश वाली हुआ करती थी। और अब भारत को “बाबाओं और स्वयंभू विधाताओं“ के देस के रुप में जाना जाता है। यह तरक्की ही है। बाबाओं के महलनुमा आश्रम, विशाल डेरे और “मायावी“ ठिकाने देश के कोने-कोने में पाए जाते हैंं। भारत की धर्मभीरु एवं अंधविश्वासी जनता बरबस इन “स्वंयभू विधाताओं की ओर खींची चली आती है। प्राचीन काल से ही भारत में गुरुओं की आराधना का चलन रहा है। पहले परम ज्ञानी ऋषि -मुनि हुआ करते थे और अब विशुद्ध कारोबारी । हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के सर्वेसर्वा गुरमीत राम रहीम का मामला इस बात की ताजा मिसाल है कि धर्मभीरु भारत के लोगों की आस्था और रूढिवादी भावनाओं पर किस तरह से बिजनेस साम्राज्य खडा किया जाता है। और भक्तों की आस्था को किस तरह जानवरों की तरह कुचला जाता है। खुद को राम रहीम और इंसा बताने वाले इस बाबा के अपने सिनेमा, होटल, स्कूल-कालेज, फार्म हाउसिस, ब्रांड तक हैं। बाबा फिल्मे बनाकर उनमें नायक का किरदार भी निभाता है। उसके पांच करोड से ज्यादा भक्तजन बाबा की इन अदाओं पर जी-जान से इस कद्र फिदा हैं कि उसके “मायावी“ महल मे बहन-बेट्टियों से बलात्कार किए जाने के बावजूद कोई भी अपनी जुबान तक नहीं खोलता। इस तरह का जघन्य कृत्य करने वाला गुरमीत राम रहीम पहला बाबा नहीं है। बरसों से यह सिलसिला जारी है। स्वंयभू “भगवान“ बापू आसाराम बलात्कार के आरोप में जेल की हवा खा रहे है। बाप तो बाप आसाराम के बेटे नारायण साईं को भी बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया जा चुका है। हाल ही में केरल के कोलाम आश्रम में स्वंयभू बाबा हरि स्वामी उर्फ गंगानन्द थिथेपथा पर एक छात्रा से पांच साल तक बलात्कार करने का मामला सामने आया था। मई, 2009 में केरल की एक अदालत ने स्वामी अमृत चैतन्य को तीन नाबालिग लडकियों से बलात्कार करने के संगीन अपराध में सोलह साल की जेल की सजा दी थी। अगस्त, 1997 में तिरुचिरापल्ली की अदालत ने स्वामी परमानंद को नाबालिग लडकियों का यौन शोषण करने के लिए जेल भेज दिया था। अप्रैल, 2016 में मुंबई की एक अदालत ने बाबा मेंहदी कासिम को चार बहनों से छल-कपट करके बलात्कार करने के आरोप में उमर कैद की सजा सुनाई थी। 2010 में बंगलुरु के निकट एक आश्रम के संचालक स्वामी नित्यानंद पर तमिल नाडु की एक अभिनेत्री के साथ मौज-मस्ती करते हुए पकडा गया था। बहरहाल, इन सब घटनाओं के बावजूद बाबाओं और स्वंयभू विधाताओं पर से लोगों की आस्था कम नहीं हुई है। और यह सवाल अभी भी प्रासंगिक बना हुआ है कि आखिर ऐसे क्या कारण हैं कि बदनामी के बावजूद अनुयायियों को बाबाओं में आस्था टूटती नहीं है। भारत में राजनीतिक और सामााजिक नेतृत्व आम आदमी की सामाजिक-धार्मिक आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए हैं। जात-पात, ऊंच नीच का भेदभाव, आार्थिक समानता और सामाजिक, प्रशासनिक अन्याय से पीडित अवाम को बाबाओं, आश्रमों और डेरों में त्वरित सामाजिक-आर्थिक न्याय मिलता है और इसी वजह पीडित लोग बाबाओं की शरण में जाते हैं। डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी अभी भी जोर देकर कहते हैं कि “पिता गुरमीत राम रहीम ने उन्हें अच्छी शिक्षा दी है, रहन-सहन, नैतिक दायित्व सिखाया है और इंसानियत का पाठ पढाया है। डेेरा के अनुयायी गुरमीत राम रहीम को पिता से संबोध्ति करते हैं। समाज क्या मांगता है, बाबा लोग और धार्मिक गुरु यह बात अच्छी तरह जानते हैं। स्पष्ट है कि जो दायित्व राजनीतिक और सामाजिक नेतृत्व को निभाने चाहिए थे, वह आश्रम और डेरे निभा रहे हैं। राजनीतिक नेताओ ने बाबाओं कौ लोकप्रियता को अपनी रजनीतिक स्वार्थ के लिए खूब भुनाया है और आश्रमों और डेरों ने सियासी नेताओं का भरपूर इस्तेमाल किया है। इस अपवित्र गठजोड ने सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाया है। डेरा प्रेमियों की हिंसा भी इसी निहित स्वार्थी गठजोड का नतीजा है।
मंगलवार, 29 अगस्त 2017
डोकलाम विवाद का अंत !
Posted on 7:21 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत और चीन ने डोकलाम विवाद को कूटनीतिज्ञ प्रयासों से सुलझा लिया है। लगभग तीन महीने से भारत और चीन के बीच डोकलाम को लेकर जबरदस्त तनाव बना हुआ था। भूटान के डोकलाम पठार की विवादित जमीन पर चीन द्वारा सडक निर्माण का भारत ने कडा विरोध करते हुए विवादित क्षेत्र में अपनी सेना तैनात कर दी थी। लगभग तीन माह से भारत और चीन की सेनाएं डोकलाम में आामने-सामने खडी हैं। इस दौरान चीन ने कई बार भारत को युद्ध की गीदड भभकियां भी दीं। 1962 के भयावह युद्ध की कडवीं यादें भी दिलाईं। मगर भारत अपने स्टैंड से टस-से-मस नहीं हुआ। चीन अब तक इस बात पर अडा हुआ था कि भारत पहले डोकलाम से सेना हटाए, उसके बाद ही बातचीत होगी। अतंतः, चीन को झुकना पडा और अब इस बात पर सहमति बनी है कि दोनों देश डोकलाम के विवादित क्षेत्र से अपनी-अपनी सेनाए हटा लेंगे। सोमवार को भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस समझौते की जानकारी दी। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने भी इसकी पुष्टि की है हालांकि अपनी नाक बचाने के लिए यह भी कहा है कि वह डोकलाम मे पेट्रोलिंग बदस्तूर जारी रखेगा। कुछ दिन पहले भी चीन ने अपनी सेना डेढ सौ मीटर पीछे हटाने की पेशकश थी मगर भारत चीनी सेना के अढाई सौ मीटर पीछे हटने पर अडा हुआ था। इसीलिए, तब बात नहीं बनी मगर बीजिंग और नई दिल्ली के बीच कूटनीतिज्ञ प्रयाास जारी रहे। कहते हैं कूटनीतिज्ञ में ऐसी स्थिति पैदा की जाती हैं कि संबंधित पक्ष को एक-एक कदम आगे बढाए।ताजा समझौते तहत दोनों देश एक -एक कड़ा आगे बड़े हैं. चीन को इस बात की शिकायत रही है कि भारत ने डोकलाम विवाद पर कूटनीति तौर पर प्रयास किए बिना ही डोकलाम में सीधे अपनी सेना भेज दी। भारत का कहना है कि चीन विवादित क्षेत्र में सडक का निर्माण कर रहा था, इसलिए उसे ऐसा करना पडा। चीन का दावा है कि भारत को इस सडक निर्माण की बाकायदा सूचना दी गई थी मगर तब भारत ने कूटनीति तौर पर इसका संज्ञान हीं नहीं लिया। बहरहाल, डोकलाम विवाद सुलझाए जाने से सीमा पर तनाव खत्म होगा और दोनों देशों पर युद्ध के जो बादल मंडरा रहे थे, फिलहाल छंट गए हैं। मगर चीन की विस्तारवादी भूख का ख्याल करते हुए उस पर भरोसा नही किया जा सकता। भारत और चीन ब्रिक्स, चीन और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइाजेश न जैसे मंचों पर बार-बार साथ-साथ बैठते हैं। अगले महीने सितंबर के पहले सप्ताह (3 से 5 सितंबर) चीन के जियामेन में ब्रिक्स सम्मेलन हो रहा है। भारत की मौजूदगी के बगैर इस सम्मलेन की कोई अहमियत नहीं रह जाती है। इसी संभावना के दृष्टिगत चीन डोकलाम विवाद को ब्रिक्स सम्मलेन से पहले सुलझा लेना चाहता था। डोकलाम मूल रुप से भूटान का क्षेत्र है और तिब्बत की तरह विस्तारवादी चीन की नजर इस क्षेत्र को हथियाने पर भी टिकी हुई हैं। डोकलाम में सडक बनाने से चीन के लिए भारत के पूर्वोतर राज्य में घुसपैठ करना भी आसान हो जाएगा। चीन की यह सामरिक विवषता हो सकती है। थल सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने भी माना है कि चीन के साथ डोकलाम जैसे विवाद आगे भी जारी रह सकते हैं। डोकलाम के विवादित क्षेत्र में चीन सडक बनाने से पीछे नहीं हट सकता। चीन 1890 में ब्रितानवी सरकार के साथ हुई संधि का हवाला देते हुए अभी भी डोकलाम क्षेत्र को अपना इलाका बता रहा है। भूटान चीन के इस दावे को मानने को तैयार नहीं है। बहरहाल, डोकलाम विवाद के कूटनीति बातचीत से हल होने से भारत की प्रतिष्ठा में खासा इजाफा हुआ है। भारत शुरु से ही इस विवाद के बातचीत से शान्तिपूर्वक हल का पक्षधर रहा है जबकि चीन डराने-धमकाने पर उतर आया था। भारत के पक्ष में बोलने पर चीन ने जापान तक को भी धमकाया था। अतंतः, सत्यमेव जयते।
सोमवार, 28 अगस्त 2017
हिंसा का नंगा नाच
Posted on 8:27 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सडकों पर हिंसा का नंगा नाच। सभी शैक्षणिक संस्थाएं बंद । सरकारी दफतर, मार्केट और व्यापारिक संस्थान भी बंद। न बसें चलीं और न ही रेल सेवाएं। व्यस्ततम सडकें भी सूनसान और मार्केट्स भी। गुंडागर्दी से भयभीत घरों में दुबके लोग। असुरक्षा का भय इतना कि जान बचाने के लिए घर-बार छोड सुरक्षित स्थानों के लिए लोगों का पलायन। यह नजारा हिंसा और आतंक से पीडित कश्मीर घाटी का नहीं है, अलबत्ता गत शुक्रवार को हरयाणा के खुबसूरत शहर पंचकूला का था । सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा के पांच करोड से भी अधिक भक्तों के “भगवान“ गुरमीत राम रहीम इंसा को अदालत द्वारा दोषी पाए जाने से क्षुब्ध डेरा प्रेमियों ने शुक्रवार को आगजनी और हिंसा का जो तांडव मचाया, उस पर:“राम“ और “रहीम“ की आत्मा भी रोती होगी। अदालत का फैसला आने के फौरन बाद मात्र चार घंटे की आगजनी और हिंसा में 25 लोगों कौ मौत हो चुकी थी, दो सौ से ज्यादा घायल हो चुके थे। पंजाब के बरनाला में टेलिफोन एक्सचेंज को आग लगा दी गई। बठिंडा में पावर स्टेशन को फूक दिया गया। मलोट में रेलवे स्टेशन जला दिया गया। मानसा में आयकर विभाग में तोड-फोड की गई। कई जगह कर्फ्यू लगा दिया गया है। डेरा प्रेमियों ने सबसे ज्यादा भडास मीडियाकर्मियों पर निकाली। किसी की बहन से बलात्कार किए जाने पर लोग-बाग सडकों पर उतर आते हैं। मगर डेरा प्रेमियों को न्यायपालिका में भी विश्वास नहीं है। डेरा की ओर से जारी विज्ञप्ति में कहा गया है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। अदालत ने डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को दो महिला अनुयायियों का यौन उत्पीडन करने के लिए दोषी पाया है। अगले सोमवार को उन्हें सजा सुनाई जाएगी। नियमानुसार, अदालत द्वारा दोषी पाए जाने पर मुजरिम को फौरन हिरासत में लेकर जेल भेज दिया जाता है। डेरामुखी को भी फैसले आने के बाद हिरासत में ले लिया गया और उन्हें कडी सुरक्षा में रखा गया है। 15 साल की सुनवाई के बाद पिछले सप्ताह ही पंचकूला स्थित अदालत ने फैसला सुनाने के लिए 25 अगस्त की तारीख मुकरर्र की थी। अदालत का फैसला आने के बाद डेरा प्रेमियो द्वारा उपद्रव मचाने की भी पूरी-पूरी आशंका थी। इसी आशंका के मद्देनजर राज्य सरकार ने पंचकूला में काफी पहले से धारा 144 लगा दी गई थी। इसके बावजूद हजारों की संख्या में डेरा प्रेमी पंचकूला में तीन दिन से डेरा डाले हुए थे जबकि धारा 144 लागू होने पर पांच से ज्यादा लोग जमा नहीं हो सकते हैं। प्रशासन की अकुशलता से क्षुब्ध पंजाब और हरयाणा हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए पुलिस के डीजीपी को बर्खास्त करने की बात कही है। 1948 में शाह मस्ताना ने डेरा सच्चा सौदा की नींव रखी थी। 1990 में गुरमीत सिंह ने गद्दी संभाली और तब से डेरा सच्चा और विवाद का चोला-दामन का साथ रहा है। 1998 में बेगू गांव के एक बच्चे की डेरा के वाहन की चपेट में आने से मौत हो गई थी। तब खबर छापने वाले अखबार को डेरा समर्थकों ने धमकाया था। इस पर डेरा को माफी मांगनी पडी थी। 2002 में डेरा प्रबंधन समिति के सदस्य रहे कुरुक्षेत्र के रणजीत सिंह का कत्ल कर दिया गया था और आरोप डेरा सच्चा सौदा पर लगे थे। 2002 में ही डेरा की एक साध्वी ने डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर यौण शोषण का आरोप लगाया था। 2002 में ही सिरसा के पत्रकार रामचन्द्र छत्रपति की डेरा के खिलाफ लिखने पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। 2007 में डेरामुखी ने गुरु गोविंद सिंह की वेशभूषा धारण कर सिखों से सीधा टकराव मोल लिया था। और भी कई मामले हैं जिन्हें लेकर डेरा विवादों में रहा है। बहरहाल, डेरा प्रेमियों के हिंसक उपद्रव ने एक बार फिर राज्य सरकार की किरकिरी हुई है।एक बार फिर न्यायपालिका मदद को आगे आई। हाई कोर्ट ने डेरा प्रमियों के उपद्रव से हुए नुकसान की भरपाई डेरा की संपत्ति बेचकर वसूलने के आदेश दिए हैं।
शुक्रवार, 25 अगस्त 2017
निजता का मौलिक अधिकार
Posted on 7:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
निजता (प्राइवेसी) पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला अवाम के लिए बहुत बडी सौगात है। देश की शीर्ष अदालत ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। वीरवार को सुप्रीम कोर्ट की नौ-जजों वाली संवैधानिक पीठ ने सर्वसम्मति से व्यवस्था दी है कि निजता संविधान के अनुच्छेद के तहत प्रदत जीने के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रतता के अधिकार का अहम हिस्सा है। और निजता के इस संवैधानिक आधार को कोई भी ताकत नागरिक से छीन नहीं सकती है। सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था से मोदी सरकार को झटका लगा है। ष अदालत के ताजा फैसले से यह भी स्पष्ट है कि निजता का अधिकार सरकार की जागीर नहीं है। तथापि, सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि निजता का अधिकार संपूर्ण (एब्सोल्यूट) नहीं है और विशेष परिस्थितियों में राज्य कुछ हद तक इस पर रोक लगा सकता है। सरकार भी यह कह रही है कि निजता के अधिकार को संपूर्ण नही माना जा सकता हालांकि मोदी सरकार निजता को मौलिक अधिकार ही मानती है। सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था से यह भी साफ है कि निजता के अधिकार भले ही संपूर्ण (एब्सोल्यूट) नहीं हैं मगर नागरिक के जीने और व्यक्तिगत स्वत्रंतता के मौलिक अधिकार अपने आप में सम्पूर्ण हैैंं और सरकार नागरिक के इस अधिकार को छीन नहीं सकती। माननीय जजों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जीने और निजी स्वतंत्रता के अधिकार को एक-दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते हैं। ये वे अधिकार् हैं जो मानव के गरिमापूर्ण अस्तित्व के अभिन्न अंग हैं। संविधान में इन्हें बाकायदा मान्यता दी गई है। मानव के जीने के अधिकार में काफी सारी बातें हैं, जिन्हें किसी भी सूरत में किसी के साथ साझा नहीं किया जा सकता। निजता से जुडी बातें हर आदमी बखूबी जानता है मगर वह दूसरे से साझा नहीं करता। किसी से यह नहीं पूछा जा सकता कि बैडरुम में क्या होता है जबकि यह बात हर बालिग-नाबालिग जानता है। आयकर अधिकारी अपने विशेष अधिकारों का इस्तेमाल करके किसी बैंक अकांउट को भले ही खंगाल ले, पर खाताधारक से पूछे जाने पर वह इसका जबाव नहीं देगा। परिवार को आगे बढाने, बीवी-बच्चों के लालन-पालन, शिक्षा और सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए जो कुछ भी जरुरी है, वह सब निजता में आता है। निजता के अधिकार का मामला सरकार द्वारा आधार कार्ड को सरकारी स्कीमों का लाभ लेने, बैंक खाता खोलने, पैन कार्ड बनवाने, टिकट बुकिंग और कालेज एडमिषन के प्रबेश तक के लिए अनिवार्य किए जाने से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। देश में एक बडे तबके का मानना है कि सरकार आधार कार्ड की आड मे लोगों की निजता में सेंध लगा रही है। आधार कार्ड के लिए स्थायी घर का पता और उसका प्रमाण अनिवार्य है मगर सरकार आज तक इस बात का संतोषजनक जबाव नहीं दे पाई है कि बेघर लोग किस तरह से यह प्रमाण ला पाएंगे। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साढे चार लाख परिवार बेघर हैं और इनकी जनसंख्या 18 लाख के करीब है। आंकडे यह भी बताते हैं कि बेघरों की आबादी में पिछले छह साल में इजाफा हुआ है। इससे साफ है कि इन बेघर परिवारों का न तो आधार कार्ड बना है और न ही इन्हें सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है जबकि इन लोगों को सरकारी सहायता की सबसे ज्यादा जरुरत है। बहरहाल, निजता के अधिकार की ताजा व्याख्या से आधार कार्ड की अनिवार्यता, बीफ पर प्रतिबंध और समलैंगिक संबंधों जैसे विवादस्पद मुद्दों पर असर पड सकता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा आधार की अनिवार्यता को खारिज किए जाने के बावजूद सरकार इसे हर तरह की सेवाओं के लिए अनिवार्य करने पर आमादा है। देश में क्या खाए जाए और क्या नहीं, यह भी निजता के अधिकार का मामला है। सरकार का इसमें दखल निजता के अधिकारों का हनन है। भगवा पार्टी प्रत्यक्ष जैसे-तैसे हिंदू ऐजेंडे को अमल में ला रही है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले इसमें अडंगा डाल सकता है।
गुरुवार, 24 अगस्त 2017
World Leader America Shamed In Afghanistan
Posted on 6:42 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लंबे समय तक अमेरिकी सेना की तैनाती के बावजूद तालिबानी आतंक से जूह रहे अफगानिस्तान में शांति बहाली के दूर-दूर तक कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। लाख कोशिशों के बावजूद अफगानिस्तान में अमन-चैन स्थापित करने के प्रयास सिरे नहीं चढ रहे हैं। तालिबान और पाकिस्तान को अलग-थलग किए बिना अफगानिस्तान में शांति बहाली नही हो सकती और अमेरिका 15 साल की लंबी अवधि में यह नहीं कर पाया है। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना की मौजूदगी तालिबान को फूटी आंख नहीं सुहाती है। आतंकियों का यह संगठन अमेरिकी सेना को अफगानिस्तान से वापस बुलाए बिना बातचीत के लिए कतई तैयार नहीं है। अमेरिका किसी भी सूरत से अफगानिस्तान से अपनी सेना हटाने पर राजी नहीं है। वाशिंगटन इस जमीनी सच्चाई से बखूबी परिचित है कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना के हटते ही तालिबान पाकिस्तान की मदद से फिर तख्ता पलट की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क की भरपूर नदद करके आग में घी डालने का काम कर रहा है। अमेरिका की बार-बार की चेतावनी के बावजूद पाकिस्तान आतंकियों की मदद करने से बाज नहीं आ रहा है। एक तरफ तालिबानी और हक्कानी आतंकियों को उकसा कर, तो दूसरी तरफ कश्मीर में लश्कर और हिजबुल आतंकियों की मदद कर पाकिस्तान क्षेत्र में आतंक का नंगा ताडंव करवा रहा है। यह बात दीगर है कि दूसरों के घर आग लगाते-लगाते पाकिस्तान खुद बुरी तरह से आतंक की आग में झुलस रहा है। अफगानिस्तान में जारी आतंकी संघर्ष में अब तक न तो तालिबान जीत पाया और न ही पाकिस्तान को सामरिक तौर पर जरा भी कोई एडवांटेज मिली है। इसके विपरीत अमेरिका समेत पूरी दुनिया में उसकी छवि काफी खराब हुई है और उसे आतंकी देश का तमगा दिया जा रहा है। 1973 में राजशाही के खत्म होते ही अफगानिस्तान में आतंक, तख्ता पलट और विदेशी सेनाओं का दखल बदस्तूर जारी है। पिछले 15 साल से अफगानिस्तान अमेरिका की मदद से मुल्क में अमन-चैन कायम करके विकास को तेज करने की हर संभव प्रयास कर रहा है। अफगानिस्तान की सरकार कुछ हद तक इसमें सफल भी रही है। मगर अमेरिकी सेना के रहते हुए भी अफगानिस्तान में शांति कायम नहीं हो पाई है। नतीजतन, अगर थोडा-बहुत विकास हो भी रहा है, आतंक की आग में वह भी भस्म हो रहा है। अफगानिस्तान सरकार की यही सबसे बडी विफलता भी है और चुनौती भी। अफगानिस्तान अगर फलता-फूलता है तो इससे पाकिस्तान को तुरंत मिर्जी लग जाती है। और वह अफगानिस्तान में तालिबानी और हक्कानी नेटवर्क को उकसा कर काबुल के प्रयास पर पानी फेरने में लगा हुआ है। पूरी दुनिया को आज भी इस बात पर नजर है कि आखिर अफगानिस्तान समस्या का राजनीतिक हल कब निकल पाएगा? अमेरिका की अफगानिस्तान नीति अब तक तालिबान पर केन्द्रित रही है। अमेरिकी नीतिकारों को लगता था कि तालिबान को हराकर या तालिबानियों को पाकिस्तान में धकेल कर अफगानिस्तान मे शांति बहाल हो जाएगा मगर ऐसा नहीं हुआ है। पाकिस्तान की भरपूर मदद से तालिबान और ज्यादा मजबूत हुआ है। इसीलिए अमेरिका अब पाकिस्तान पर दबाव डाल रहा है कि वह तालिबान की मदद करना बंद करे और अगर ऐसा नहीं करता है तो उसे दी जा रही सैन्य मदद बंद कर दी जाएगी। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनते ही अफगानिस्तन पर नई अमेरिकी नीति की उम्मीद की जा रही है। ट्रप के सलाहकारों का मानना है कि तालिबान को पाकिस्तान मदद को काटे बिना इस आतंकी संगठन का खात्मा मुमकिन नहीं है। अमेरिका की ताजा अफगानिसतान नीति में पाकिस्तान से संचालित तालिबानी कमांडरों को वहां से खदेडने और तालिबान को दी जा रही मदद को बंद करने पर जोर दिया जा रहा है। अमेरिका अब अपगानिस्तान में भारत की और सक्रिय भूमिका पर जोर दे रहा है। भारत को पाकिस्तान के आतंकी चेहरे को पहचानने और नापाक मंसूबों को नेस्तानाबूद करने का ज्यादा अनुभव है।
बुधवार, 23 अगस्त 2017
तलाक, तलाक,,, तलाक निरस्त
Posted on 6:34 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सुप्रीम कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को असंवैधानिक करार देकर इस पर तुरंत प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया है। आजादी के 70 बाद ही सही, अतंत:, भारत की मुस्लिम महिलाओं को अन्यायपूर्ण सामंती रिवायत से मुक्ति मिल ही गई । सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने 3-2 के बहुमत से तीन बार तलाक कहकर वैवाहिक ंसंबंधों को विच्छेद करने की जुबानी रिवायत गैर-कानूनी बताते हुए इसे तुरंत ख्त्म करने के आदेश दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अगर इस्लामिक देशों में तीन तलाक पर प्रतिबंध है तो लोकतांत्रिक भारत में क्यों नही? 15 अप्रैल, 2015 को उत्तराखंड की काशीपुर निवासी शायरा बानो नाम की महिला को उसके पति ने चिठ्ठी में तीन बार तलाक कहकर छोड दिया था। इस पर शायरा बानो को सामाजिक-आर्थिक के साथ-साथ भारी मानसिक प्रताडना से जूझना पडा था। शायरा बानो ने फरवरी 2016 में तीन तलाक, हलाला और बहु-पत्नी प्रथा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी । शीर्ष अदालत ने 11 से 18 मई तक इस मामले में लगातार सुनवाई की थी। शायरा ने अपनी याचिका में कहा था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का हिस्सा है और न ही आस्था का। शायरा ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि उसमें भी तीन तलाक को गुनाह बताया गया है। तीन तलाक की विवादित रिवायत पर सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग धर्मों से संबंधित पांच जजो की पीठ गठित की थी। सुनवाई करने वाले जस्टिस कुरियन जोसेफ ईसाई हैं, आरएफ नरीमन पारसी, अब्ब्दुल नजीर मुस्लिम, यूयू ललित हिंदू और चीफ जस्टिस जेएस खेहर सिख हैं। जस्टिस अब्ब्दुल नजीर ने बहुमत के खिलाफ तीन तलाक पर व्यवस्था दी है। चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने अपने फैसले में कहा है कि सभी राजनीतिक दलों को अपने मतभेदों को भुलाकर छह महीने के अंदर तीन तलाक पर कानून बनाना चाहिए । एक प्रश्न अवाम को बार-बार खाए जा रहा है कि अगर पाकिस्तान और सउदी अरब जैसे कट्टर मुस्लिम मुल्कों में भी तीन तलाक की रिवायत पर प्रतिबंध है, तो भारत में इस सामंती प्रथा को बंद क्यों नहीं किया गया ? इस्लाम की चार विचारधाराओं में हनफी प्रमुख है। भारत में हनफी धारा मानने वालों का बहुमत है और हनफी धारा को मानने वाले मुसलमान तीन बार तलाक को गलत नहीं मानते हैं। हनफी धारा में एक ही सांस में तीन बार तलाक को वैध माना गया है। बाकी तीन धाराओं में अलग अलग समय में कुछ अंतराल के बाद तीन बार तलाक कहने के बाद ही तलाक वैध माना जाता है। इस्लामिक विद्धानों का भी मत है कि एक सांस में तीन बार तलाक कहना कुरान के खिलाफ है। कुरान के सुराह बकरा में एक सांस में तीन बार तलाक को मुकद्दस किताब के खिलाफ बताया गया है। मुस्लिम समाज में हलाला नाम की एक और सामंती प्रथा है। इस प्रथा के तहत अगर कोई आदमी तलाक देने के बाद अपनी पत्नी से फिर निकाह करना चाहता है तो महिला को किसी दूसरे मर्द से शादी करनी पडती है। फिर यह महिला खुले अथवा तलाक से अलग हो जाने पर अपने पहले पति से निकाह कर सकती है। शायरा ने इस प्रथा को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। वैसे यह प्रथा अब खत्म होती जा रही है। संवैधामिक पीठ ने हलाला पर कुछ नहीं कहा है। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले पर मुस्लिम समाज और नेताओं की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आई हैं। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि मुस्लिम महिलाओं को अभी भी लंबी लडाई लडनी पडेगी। भारत में कानून अथवा अदालती फैसले का कितना सम्मान किया जाता है, इस सच्चाई को सभी जानते हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड पहले ही तीन तलाक को गैर-कानूनी बता चुका है। इसके बावजूद भी तीन तलाक की रिवायत रुकी नहीं है। तथापि, 1986 के मुस्लिम वूमेन एक्ट ( प्रोटेक्शन ऑफ राइटस ऑन डाइवोर्स) की तरह तीन तलाक को रोकने के लिए संसद को कानून बनाने की जरुरत है।
मंगलवार, 22 अगस्त 2017
खटौली रेल हादसा
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एक और रेल हादसा और 23 यात्रियों की मौत। मोदी सरकार के तीन साल के शासन में 27 रेल दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और इनमें 259 लोग बेमौत मारे जा चुके है। और पिछले पांच साल में हुई 586 रेल दुर्घटनाओं मेंसे 53 फीसदी हादसे रेल डिब्बों के पटरियों से उतरने ( ड्रिरेलमेंट) के कारण हुए हैं। शनिवार को उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरागर के पास खटौली के निकट एक और रेल हादसा हुआ । इसमें 23 लोग मारे गए और 203 गंभीर रुप से घायल हो गए। हरिद्धार से पुरी जा रही उत्कल एक्सप्रैस के चौदह डिब्बे ट्रैक के क्षतिग्रस्त होने की वजह से पटरी से उतर गए। शुक्र है समीपवर्ती गांव के लोग तत्काल घायलों की मदद के लिए आगे आए और कई जानें बच गईं। प्रारंभिक जांच में पाया गया है कि पटरी के दाएं किनारे को मरम्मत के लिए हैक्सा ब्लेड से काटा गया था और इसे आनन-फानन में जोडा गया था। मरम्मत कर रहे रेलकर्मियों ( परमानेंट वे इंस्पेक्टर्स-पीड्ब्लयूआई) ने काम ख्तम करने से पहले ट्रैक जांयट की फिश प्लेटस और नटस एंड बोल्टस को कसा तक नहीं। इसकी वजह से सौ किलोमीटर की रफ्तार से भाग रही ट्रैन के डिब्बे जैसे ही इस फ्टरी से गुजरे, यह बिखर गई और चौदह डिब्बे दुर्घटनाग्रस्त हो गए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रेलवे का मेंटेनेंस स्टाफ अक्सर बगैर सूचना दिए और आनन-फानन में रेल पटरियों की मरम्मत करता है। यानी रेलवेकर्मी रेल यात्रियों की जान जोखिम में डालने का काम अक्सर करते रहते हैं। इससे ज्यादा गैर-जिमेदाराना काम हो ही नहीं सकता। सरकार ने मामले की गंभीरता भांपते हुए चार अधिकारियों को तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया है और तीन को जबरन छुट्टी पर भेज दिया है। उत्तरी रेलवे के चीफ ट्रैक इंजीनियर का तबादला कर दिया गयाा है। उत्तर प्रदेष में एक साल में यह दूसरी बडी रेल दुर्घटना है। पिछले साल (2016) 20 नवंबर को उत्तर प्रदेश में कानपुर के पुखरांया में रेल डिब्बों के पटरियों से उतरने के कारण बहुत बडा हादसा हुआ था और इसमें 150 से ज्यादा यात्री मारे गए थे। इस साल 22 जनवरी को आंध्र प्रदेश के विजयनगरम जिले में हीराखंड एक्सप्रैस के आठ डिब्बे पटरी से उतर गए थे और इस हादसे में 39 लोग माए गए थे। रेल दुर्घटना होते ही सरकार जांच कमेटी बैठाकर हादसों को टालने के लिए बडे-बडे दावे करती है। फिर हादसा होता है और पुनः वही रटे-रटाए बोल बाहर आते हैं।। मगर रेल हादसे नही टलते हैं। इस साल बजट में रेलवे सेफ्टी के लिए “रेलवे संरक्षण कोष “ स्थापित किया गया है और इसके लिए एक लाख करोड रु का आवंटन किया गया है। इस कोष का प्रमुख मकसद देश में रेल पटरियों को को चुस्त-दुरुस्त बनाना है। रेलवे मंत्रालय की रिपोर्ट में बताया गया है कि देश में 87 फीसदी से भी अधिक रेल दुर्घटनाएं मानवीय चूक से होती हैं और रेल पटरियों का उचित रख-रखाव इसमें प्रमुख है। पिछले साल दुनिया में हुई कुल रेल दुर्घटनाओं मेंसे प्रदंह फीसदी भारत में हुईं थी। भारत में रेल गाडियां अपनी क्षमता से 16 फीसदी अधिक यात्रियों का बोझ वहन करती हैं। और कई बार क्षमता से अधिक यात्री भार भी दुर्घटना का कारण बनता है। भारतीय रेलवे हर रोज 16,000 से भी अधिक रेल गाडियों का संचालन करती हैं और इनमें दो करोड के करीब यात्री सफर करते हैं। निसंदेह, यात्रियों की इतनी विशाल संख्या का रात-दिन के सफर में पूरा ख्याल रखना और यात्रा को सुरक्षित और सुविधाजनक बनाना आसान नहीं है। देश में रेल का इफंरास्ट्रक्चर आज भी फिरंगी के जमाने जैसा है। इसमें कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं किए गए हें । सरकार सुधार की बडी-बडी बातें तो करती हैं, पर उन पर संजीदगी से अमल नहीं हो पाता है। जनता हर बार यही पूछती है“ आखिर कब आएंगे रेल यात्रियों के अच्छे दिन“।
सोमवार, 21 अगस्त 2017
राजनीतिक सुचिता !
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भारत में सियासी दलों की मानसिकता “खुद मियां फजीहत, औरों को नसीहत“ जैसी है। आम आदमी के लिए सख्त कायदे-कानून मगर जब बात अपने पर आए तो कायदे-कानून हवा हो जाते हैं। राइट टू इन्फॉर्मेशन का मामला ही ले लीजिए। पूरे देश में आरटीआई लागू है मगर राजनीतिक दलों पर यह कानून लागू नहीं होता है। सरकार ने सत्ता में आते ही काले धन के खात्मे के लिए कई कदम उठाए हैं मगर राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को पारदर्शी बनाने के लिए अभी तक कोई कायदे-कानून नहीं हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॅार्म्स की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2012-2013 और 2015-16 के दौरान चार वर्षों में काँपोरेटस और व्यवसायी घरानों ने राजनीतिक दलों को 956.77 करोड रु चंदे के रुप में दिए और इसमें सबसे ज्यादा 705.81 करोड भारतीय जनता पार्टी को दिए गए। यह कुल चंदे का लगभग 90 फीसदी बनता है। राजनीतिक दलों ने यह चंदा मतदाताओं को रिझाने, जरुरत पडने पर विधायकों की खरीद-फरोख्त करने और राजनीतिक जोड-तोड के लिए इस्तेमाल किया । राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों को चुनाव लडने के लिए भी धन से मदद करते हैं । काँपोरेटस और व्यवसायी घरानें फोक्ट में राजनीतिक दलों को चंदा देने से रहे। “इस हाथ लेे, उस हाथ दे ” की तर्ज पर चंदा देने वाले राजनीतिक दलों से बदले में काफी कुछ वसूल कर लेते हैं। विडवंना यह है कि आम आदमी को तो अपनी कमाई के एक-एक पैसे का पूरा हिसाब आयकर विभाग को देना पडता है, मगर राजनीतिक दलों को चंदे का कोई हिसाब-किताब नहीं देना पडता और न ही आयकर चुकाना पडता है। भाजपा ने राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाने का वायदा कर रखा है और भगवा पार्टी अक्सर राजनीतिक सुचिता की बात भी करती है मगर सत्ता में आने के तीन साल बीत जाने के बावजूद चुनाव सुधार के लिए संजीदा प्रयास नहीं किए गए हैं। भारत में राजनीतिक दलों के वित्तीय प्रबंध के तीन अहम बिंदू हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण हैः राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों को मिल रहा बेहिसाबी चंदा जिससे उनकी राजनीति फलती-फूलती है। दूसरा महत्वपूर्ण बिंदू हैः चंदा किसने दिया, कितना दिया और यह कहां खर्च किया गया, इसका राजनीतिक दलों को कानूनन कोई रिकॉर्ड नहीं रखना पडता है। देश में हर छोटे-बडे व्यवसायी, कारोबारी, संस्था, उधोग का ऑडिट अनिवार्य है मगर राजनीतिक दलों के लिए नहीं। राजनीतिक चंदे का यह तीसरा महत्वपूर्ण बिंदू है। केन्द्रीय सूचना आयोग (सेंट्रल इन्फॉर्मेशन कमीशन) ने कुछ समय पहले व्यवस्था दी थी कि राजनीतिक दलों पर भी आरटीआई लागू होता है। पर सरकार ने सीआईसी की इस महत्वपूर्ण व्यवस्था का तोड भी निकाल लिया। इस साल संसद के बजट सत्र में राजनीतिक चंदे को व्यवस्थित करने के लिए लोकसभा में फाइनेंस बिल पारित किया गया। फाइनेंस बिल को क्योंकि राज्तसभा से पारित करबाने की जरुरत नहीं पडती, इसलिए सरकार ने बडी चतुराई से इसे लोकसभा से पारित करवा लिया। इसके माध्यम से सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले नगद चंदे की सीमा 20,000 से घटाकर 2,000 रु तय की है और बिल में “चुनावी बांड“ का विकल्प भी दिया गया है। बांड को बैंकों से खरीदकर राजनीतिक दलों को इस वैध माध्यम से चंदा दिया जा सकता हैं। यही दो बिंदू इस बिल की सबसे बडी खासियत है। सरकार ने आखिरी समय में बिल में दो संशोधन जोडे। पहले सशोधन में कॉर्पोरेट घराने और व्यवसायियों पर चंदा देने की जो सीमा थी, वह हटाई दी गई है। दूसरे संशोधन में कारोबारियों को प्रॉफिट एंड लॉस स्टेटमेंट में राजनीतिक चंदे का जो उल्लेख करना पडता था, अब उन्हे ऐसा नही करना पडेगा। राजनीतिक दलों को आरटीआई में लाने और उनके वित्तीय प्रबंध को पारदर्शी बनाने का इस निल में कोई जिक्र नहीं था। बिल आराम से पारित भी हो गया है, विपक्ष ने कोई चूं तक नहीं की। इससे पता चलता है कि राजनीतिक दल काले धन को खत्म करने के प्रति कितने संजीदा है।
शुक्रवार, 18 अगस्त 2017
पहाडी राज्यों को राहत
Posted on 6:20 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पहाडी राज्यों के लिए जीएसटी व्यवस्था में भी टैक्स छूट को अगले दस साल तक बढाए जाने से पूर्वोतर और जम्मू-कष्मीर को बडी राहत मिली है। औद्योगिकरण में अपेक्षाकृत पिछडे पहाडी राज्यो को सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, और आयकर में छूट दी जाती है। पूर्वोतर असम, मेघालय, नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश , मणिपुर, त्रिपुरा और सिक्किम में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी राहत सुविधा की मियाद 31 मार्च 2017 को खत्म हो चुकी है। जम्मू-कष्मीर में सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी राहत छूट की मियाद 2020 तक है। केन्द्र सरकार के ताजा पैकेज से पूर्वोतर राज्यों में 31 मार्च 2017 तक स्थापित की गई औद्योगिक यूनिटस को अगले दस साल यानी 2027 तक यह छूट मिलती रहेगी। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में स्थापित किए गए उद्योगों को ताजा रियायत का कोई बहुत फायदा मिलने वाला नहीं है। केन्द्र सरकार ने मार्च, 2010 में ही हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड को दी जारी रही रियायतें बंद कर दी थी। औद्योगिकरण को बढाने के मकसद से केन्द्र सरकार पहाडी राज्यों को विशेष रियायतें देती हैं। इनमें सेंट्रल एक्साइज ड्यूटीे में 8 से 12 फीसदी छूट, पांच साल के लिए आयकर में सौ फीसदी छूट और अधिकतम तीस लाख रु तक प्रोजेक्ट लागत की 15 फीसदी नगद सब्सिडी शामिल है। इन रियायतों से पहाडी राज्यों के औद्योगिकरण में वास्तव में तेजी आई है। रियायतों के कारण ही हिमाचल प्रदेश का पंजाब की सीमा से सटा बद्दी-बरोटीवाला, नालागढ (बीबीएन) आज एशिया का अग्रणी दवा उत्पादक क्षेत्र बन चुका है। इस क्षेत्र में सालाना 35,000 करोड रु से भी अधिक की दवाओं का उत्पादन किया जा रहा है और दो सौ से ज्यादा देशों को 150 बल्क ड्रग का निर्यात किया जाता है। बद्दी-बरोटीवाला, नालागढ क्षेत्र में अब तक 15,300 करोड रु से भी अधिक निवेश से 2,202 उधोग स्थापित किए जा चुके हैं और इनसे 73,392 लोगों को रोजगार मिला हुआ है। और यह सब 2003 में केन्द्र की दस साल की रियायतों के कारण संभव हो पाया है। मगर पडोसी राज्यों के सख्त विरोध के कारण हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए दिए जा रहे विशेष औद्योगिक पैकेज को 2010 में ही समाप्त कर लिया गया था जबकि पैकेज 2013 तक के लिए दिया गया था । इससे, इन राज्यों के औद्योगिकरण को धक्का लगा है । पैकेज समाप्त किए जाने के कारण हिमाचल प्रदेश में चालीस फीसदी उधोग भी 2010 में ही स्थापित किए गए। नियमानुसार, 2010 में स्थापित किए जाने वाले उधोगों को दस साल तक रियायतें जारी रहेगी। 2013 में केन्द्र सरकार ने हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के लिए अधिकतम तीस लाख रु तक की 15 फीसदी सब्सिडी वाली रियायत तो बहाल करदी मगर आयकर और सेंट्रल एक्साइज ड्यूटीे में आठ फीसदी छूट को बहाल नहीं किया गया। हिमाचल और उत्तराखंड जैसे कठिन भोगोलिक स्थिति वाले राज्यों में उधोग लगाना और उन्हें चलाना इतना आसान नहीं है जितना मैदानी क्षेत्रों में। पहाडी राज्यों को जब-तब प्राकृतिक कहर का सामना करना पडता है और उत्पाद की लागत भी यहां मैदानी क्षेत्रों से कहीं ज्यादा है। कदम-कदम पर तरह-तरह की बाधाएं हैं। इन हालात में पूर्वोतर राज्यों और जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश और उत्तरखंड के लिए भी विशेष औद्योगिक पैकेज की निहायत जरुरत है। हिमाचल प्रदेश के मामले में राहत वाली बात यह है कि रियायतें बंद होने के बावजूद राज्य में निवेश प्रवाह में ज्यादा फर्क नहीं पडा है। तथापि बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ के उधोगों में जीएसटी को लेकर खासी शं काएं हैं। 2010 से पहले स्थापित किए गए जो उधोग जीएसटी के तहत सेंट्रल एक्साइज ड्युटी में रियायत के पात्र हैं, उन्हे खासी समस्याओं का सामना करना पड रहा है। मौजूदा नीति के तहत 58 फीसदी एक्साइज ड्यूटी की रिइंबस्मेंट केन्द्र सरकार को करनी है तो 42 फीसदी राज्य सरकार को। इस प्रकिया में खासा समय जाया हो सकता है। जीएसटी से यह प्रकिया और भी जटिल हो सकती है।
गुरुवार, 17 अगस्त 2017
नए भारत का सपना
Posted on 7:14 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस बार स्वतंत्रता दिवस पर देशवासियों से नए भारत (न्यू इंडिया) के निर्माण का वायदा किया है। ऐसा भारत जहां हर छोटे-बडे, अमीर-गरीब, युवा-उम्रदराज, हर महिला और पुरुष की आकांक्षाएं पूरी हों और उन्हें खुशाहल जीवन का भरपूर सुख मिले। 71वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रधानमंत्री ने “ नए भारत“ के इस वायदे को पूरा करने के लिए 2022 की समय सीमा तय की है। इससे पहले प्रधानमंत्री ने “भारत छोडो“ आंदोलन की 75वीं वर्शगांठ पर भी देषवासियों से अगले पांच साल में भारत छोडो आंदोलन के जज्बे से काम करते हुए “भारत जोडो” का आहवान किया था। देश का प्रधानमंत्री अगर “नए भारत“ के निर्माण का वायदा करता है, तो करोडों लोगों की उम्मीदों को पंख लगना स्वभाविक है। पर सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री अगले पांच साल में इस संकल्प को पूरा कर पाएंगें या यह वायदा भी “ सौ दिन में काला धन स्वदेश लाने“, देश में आतंक फैलाने वाले पाकिस्तान को मुंहतोड जवाब देने और “ अच्छे दिन“ लाने के वायदे जैसे ही साबित होंगे? निसंदेह, मोदी सरकार ने नोटबंदी और बेनामी संपत्ति कानून को सख्ती से लागू किया है और काली कमाई करने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं और इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। महंगाई भी पहले की अपेक्षा कम हुई है। अगर अच्छे दिन नहीं आए, तो आम आदमी के इतने बुरे दिन भी नहीं है। इन सब तथ्यों से प्रधानमंत्री के संकल्प को बल मिल रहा है। जमीनी सच्चाई भी “नए भारत” के निर्माण के माकूल है। भारत इस समय दुनिया का युवातम मुल्क है और उसके पास युवा शक्ति का अथाह भंडार है। देश की 65 फीसदी आबादी 35 वर्ष से कम आयु वालों की है। चीन समेत दुनिया का कोई भी मुल्क इस मामले में भारत का प्रतिद्धंद्धी तक नही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश (आईएमएफ) का आकलन है कि भारत इस समय दुनिया की तेजी से आगे बढती एकमात्र अर्थव्यवस्था है। अगले दो वर्षों में भारत की विकास दर 7.2 और 7.7 के आसपास रहेगी। विकास की यह दर चीन और अन्य ब्रिक्स मुल्कों से काफी ज्यादा है। पीडब्ल्यूसी (प्राइसवाटरहाउकूपर्स) का आकलन है कि मौजूदा विकास दर से 2025 तक भाात 15.7 खरब डालर जीडीपी के साथ दुनिया की चौथी सबसे बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगी। 2050 तक भारत का सकल घरेलू उत्पाद 44.1खरब डालर को भी पार कर जाएगा। तब भारत 34.1 खरब डालर वाली अमेरिकी अर्थव्यवस्था से भी बडा बन जाएगा । इन आंकडों से भारतीय अर्थव्यवस्था में मौजूद बेशुमार क्षमताओं की झलक मिलती है। मगर तीव्र विकास के तब तक कोई मायने नहीं जब तक देश का सबसे कमजोर और पिछडा आदमी भी विकास से समग्र तौर पर लाभान्वित न हो पाए। इसके लिए इन्कलूसिव ग्रोथ अपरिहार्य है। पिछले कई सालों से सरकार इन्कलुसिव ग्रोथ की बात तो कर रही है मगर इसे संजीदगी से लागू नहीं किया जा सका है। देश में हर साल पहले भी सूखा पडता है और फिर बरसात में भारी पानी बरसने के कारण बाढ आती है। इससे खडी फसलों को खासा नुकसान पहुंचता है। देष के समक्ष इस तरह की कई चुनौतियां हैं जिनका हर साल आम आदमी का साबका पडता है मगर आजादी के सात दषक में भी इन सम्स्याओं का समाधान नहीं हो पाया है। हर नागरिक को स्वास्थय सुविधा मुहैया कराना और स्वच्छता दूसरी बडी चुनौती है। इनसे देष आज भी जूझ रहा है। प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान का अच्छा असर पडा है मगर स्वास्थय क्षेत्र में देष अभी काफी पीछे है। षहर हो या गांव चौबीस घंटे बिजली सप्लाई और घर-घर में षुद्ध पीने का पानी आज तक मुहैया नहीं हो पाया है। मोदी सरकार ने चौबीस घंटे की बुजली सप्लाई का वायदा कर रखा है। तीन साल में भी यह पूरा नहीं हो पाया है। गरीबी, भुखमरी, सामाजिक-आर्थिक असमानता जस की तस है। नए भारत को इन विसंगतियो से मुक्त होना चाहिए।
बुधवार, 16 अगस्त 2017
आजादी के 70 साल
Posted on 6:31 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आजादी के 70 साल पूरे होने पर हमें आत्म मंथन और आत्म चिंतन करने की जरुरत है। निसंदेह, हमें पीछे मुडकर देखने की बजाए आगे की ओर देखना चाहिए। लेकिन भारतीय संस्कृति और सभ्यता हमें पुरानी गलतियों से सबक लेकर उन्हें न दोहराने की सीख भी देती है। तथापि, देश में गलती-दर-गलती कर उस पर पर्दा डालने की रिवायत है, गलतियों से सीख लेनी की नहीं। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में आक्सीजन न मिलने की वजह से 64 बच्चों की दर्दनाक मौत का मामला इस बात की ताजा मिसाल है। इस समाचार के ब्रेक होते ही उत्तर प्रदेश सरकार की पहली त्वरित प्रतिक्रिया थी कि राज्य में दिमागी बुखार की महामारी कई सालों से है और अक्सर इससे ऐसी मौतें होती ही रहती है। इससे ज्यादा संवेदनहीनता और क्या हो सकती है? देश के सबसे बडे राज्य में मासूम बच्चे समय पर आक्सीजन नहीं मिलने से बेमौत मारे जाते हैं मगर सत्ताधारियों की इसकी जरा भी परवाह नही हें। और जो लोग संवेदना जता रहे हैं, उनका मकसद त्रासदी से पीडित परिवारों का द्ख-दर्द बांटने की बजाए सियासी हित साधना कहीं ज्यादा है। दुनिया में अपनी जान से अधिक प्रिय संतान को खोने से बडा और कोई दर्द नहीं हो सकता। सरकार ने 64 बच्चों की ंमौत के लिए केवल मात्र संबंधित मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल को जिम्मेदार माना है। उत्तर प्रदेश और बिहार में दिमागी बुखार (इन्सेफाइलेटिस) का सबसे ज्यादा प्रकोप है जबकि साठ के दशक से ही इस महामारी के खिलाफ अभियान षुरु किया जा चुका था, इसके लिए हर साल करोडों रुपए का बजट आवंटित किया जाता है। उत्तर प्रदेश का गोरखपुर क्षेत्र दिमागी बुखार के प्रकोप से सबसे अधिक पीडित है। पिछले चार दशको में 20,000 से भी अधिक लोग इन्सेफाइलेटिस के कारण मारे जा चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बतौर सांसद बराबर इस समस्या को संसद में उठाते रहे हैं। अगर आजादी के सात दशक बाद भी देश अपने बच्चों को दिमाग बुखार से सुरक्षित नही कर पाए, तो सात दशक की आजादी की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्वभाविक है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि अगर सरकार की वर्षगांठ पर 3000 करोड रु और योग दिवस पर 500 करोड रु खर्च किए जा सकते हैं तो अस्पताल में जीवनदायक आक्सीजन सप्लाई के लिए साठ-सतहर लाख की पेमेंट की अविलंब व्यवस्था क्यों नहीं की जा सकती? सात दशक की आजादी के बाद इस तरह के और भी कई सवाल हैं। प्रधानमंत्री ने 15 अगस्त को अपने भाषण को और अधिक जमीनी बनाने के लिए देशवासियों से कुछ सुझाव मां थे जिनके जवाब में उन्हें लोगों ने उनसे पूछा है कि सरकार ने जनसंख्या पर नियंत्रण पाने के लिए चीन की तरह कानून क्यों नहीं बनाया? बेतहाषा बढती जनसंख्या देष की सबसे ज्वलंत समस्या है। आजादी के सात दषक में भी हम जनसंख्या वृद्धि को रोक नहीं पाए हैं। ताजा आकलन के मुताबिक भारत 2022 में जनसंख्या में चीन से भी आगे निकल जाएगा। प्रधानमंत्री से यह भी पूछा गया है कि देष भ्रश्टाचार से कब मुक्त होगा? विस्फोटक जनसंख्या अगर् देष की प्रगति और खुषाहली को ग्रहण लगा रही है, तो भ्रश्टाचार दीमक की तरह अर्थव्यवस्था को चाट रहा है। आजादी के सात दषक बाद भी भ्रश्टाचार भयावह रुप से देष के सामने खडा है। बहरहाल, देष ने सात दषकों मे खासी तरक्की की है। भारत स्पेस विज्ञान का लीडर है। दुनिया की पांचवी बडी सैन्य षक्ति है और चीन भी उससे रंजिष करता है। दुनिया की सबसे तेज बढती अर्थव्यवस्था है और युवातम प्रतिभा वाला सबसे बडा देष। और यह सब सियासी नेताओं के कारण नहीं, अलबत्ता वैज्ञानिकों, मेहनतकष किसानों, कामगारों, प्रतिभाओं और आम आदमी की बदौलत है। आजादी के 70 साल पर लख-लख बधाईयां।
सोमवार, 14 अगस्त 2017
चीनियों को मिर्ची क्यों लगी?
Posted on 7:09 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत और चीन के बीच डोकलाम सीमा विवाद हल कूटनीतिज्ञ् प्रयासों से निकल सकता है। डोकलाम को लेकर हालांकि चीन को भारत के स्टैंड से मिर्ची लगी हुई है मगर बीजिंग गीदडभभकियां देने के अलावा और कुछ कर भी नहीं सकता । सामरिक हालात उसके पक्ष में नहीं हैं। इसीलिए, चीन ने भारत को अपने सैनिक सौ मीटर पीछे हटाने की पेशकश करके विवाद को सुलझाने के प्रति लचीला रुख दिखाया है। भारत ने इस पेशकश को नहीं माना है और चीन से अपने सैनिक अढाई सौ मीटर पीछे हटाने को कहा है। चीन ने ऐसा करने से मना कर दिया है। इससे विवाद को खत्म करने के कूटनीति प्रयास को फिलहाल झटका लगा है मगर दोनों देशों के बीच देर-सबेर इस बात पर सहमति बनने की संभावना बनी हुई है। इस बीच एक और सकारात्मक संकेत चीनी नौसेना ने दिए हैं। चीनी नौसेना के एक अधिकारी ने कहा है कि भारतीय नौसेना के साथ उसका कोई विवाद नहीं है और दक्षिण चीन सागर में अब तक भारत का स्टैंड सकारात्मक रहा है। विशाल भारतीय महाद्धीप को ड्रग और अवैध हथियारों के समुद्री तस्करों से मुक्त कराने में चीनी नीसेना, भारतीय नौसेना से सक्रिय योगदान की उम्मीद रखती है। डोकलाम सीमा विवाद पर तनावपूर्ण माहौल के मद्देनजर चीनी नौसेना का यह बयान काफी महत्वपूर्ण है। वैसे चीनी सेना के साथ-साथ वहां की अवाम डोकलाम विवाद को लेकर भारत से क्षुब्ध है। चीनी मीडिया के एकतरफा प्रायोजित प्रचार से चीन के लोगों को यही गलतफहमी है कि सारा विवाद भारत ने खडा कर रखा है और चीन की इसमें कोई भूमिका नहीं है। चीन में भारत जैसी “अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता“ नहीं है और वहां जनता को वही पढाया और बताया जाता है जो कम्युनिस्ट सरकार चाहती है। तथापि सोशल मीडिया से चीन का यह परिदृष्य काफी बदला है हालांकि इस पर भी वहां कडे प्रतिबंध हैं। चीन के सिचुआन क्षेत्र में आठ अगस्त को आए 7.1 तीव्रता वाले भूंकप पर प्रधानमंत्री की संवेदनाओं को भी लोगों ने डोकलाम विवाद से जोडा है और तल्ख प्रतिक्रियाएं व्यक्त की हैं। इस त्रासदी में कम-से-कम 20 लोग मारे गए और 430से ज्यादा घायल हुए हैं। अधिकतर लोगों ने मोदी से डोकलाम विवाद पर ध्यान देने की नसीहत दी है और कहा कि इसका हल ही पीडित परिवारों के प्रति सच्ची संवेदना होगी। डोकलाम विवाद को बातचीत से सुलझाना चीन की सामरिक विवशता है। डोकलाम से कहीं ज्यादा चीन के लिए दक्षिण चीन सागर मायने रखता है। यह क्षेत्र न केवल तेल और गैस से समृद्ध है, अलबता सामरिक दृष्टि से भी अहम है। दुनिया का आधे से ज्यादा मर्चेंट ट्रेड का आवागमन भी इसी क्षेत्र से होता है और वैश्विक एक तिहाई समुद्री ट्रैफिक भी इसी सागर से गुजरता है। भारतीय उपमहाद्धीप से मल्लाका जलडमरुमध्य के रास्ते पूर्वी एशिया के लिए बडी मात्रा में तेल निर्यात भी बरास्ता दक्षिण चीन सागर रुट से ही किया जाता है। इस निर्यात का आयतन स्वेज नहर के रास्ते से तीन गुना और पनामा नहर से पंद्रह गुना ज्यादा है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि चीन के लिए दक्षिण चीन सागर का कितना महत्व है। चीन उत्तर कोरिया और अमेरिका के बीच जारी मिसाइल मल्ल युद्ध में भी बुरी तरह से उलझा हुआ है। चीन, उत्तर कोरिया का सबसे बडा मित्र है और दोनों के बीच सैन्य सहयोग संधि है। अमेरिका अगर पहले आक्रमण करता है तो सैन्य सहयोग संधि के मुताबिक चीन को उत्तर कोरिया का साथ देना होगा। यानी चीन को अमेरिका से भी युद्ध करना होगा। कोरियाई प्रायद्धीप में हालात डोकलाम से कही ज्यादा खराब हैं और वहां कभी भी युद्ध छिड सकता है। चीन के लिए एक साथ अमेरिका और भारत से युद्ध करना आसान नहीं है। बहरहाल, चीन और भारत में बातचीत और कूटनीतिज्ञ प्रयास ही डोकलाम विवाद का एकमात्र हल है।
शुक्रवार, 11 अगस्त 2017
“भारत छोडो“ आज भी प्रासंगिक
Posted on 7:38 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत छोडो आंदोलन के 75 साल पूरा होने पर बुधवार को संसद में आयोजित विशेष चर्चा की गरिमा से ही अनुमान लगाया जा सकता है हम आज कहां खडे हैं। इस आंदोलन ने भारत में अंतिम सांसे ले रही फिरंगी सरकार के कफन में अंतिम कीलें ठोंकी थी। 1942 में भारत छोडो आंदोलन की शुरुआत करते हुए महात्मा गांधी ने “ करेगें या मरेगें“ का आहवान किया था और इसका इतना जबरदस्त प्रभाव हुआ था कि फिरंगियों ने अविलंब भारत से अपना बोरिया-बिस्तर समेटना शुरु कर दिया था। 1947 में भारत को आजादी मिलने में “ भारत छोडो आंदोलन“ का अहम योगदान रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 1942 से 1947 के पांच साल की अहमियता पर जोर डालते हुए देसवासियों का आहवान किया है कि अगले पांच साल भी 1942 से 1947 के जज्बे वाले होने चाहिए। और भारत छोडो आंदोलन के 75 साल बाद जो हालात हैं, उसके मद्देनजर वाकई ही देश को इस तरह के आंदोलन की सख्त दरकार है। बडी पुरानी कहावत है,“ यथा राजा, तथा प्रजा“। यह कहावत सामंती व्यवस्था में प्रासंगिक थी। लोकतंत्र में “यथा प्रजा, तथा राजा“ वाली कहावत चरितार्थ होती है। देश के मौजूदा हालात के लिए समकालीन नेताओं को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। अगर भगवा पार्टी के कुछ लोग असहिष्णु हो गए है तो लोग-बाग उनसे भी ज्यादा असहिष्णु है। बात-बात पर लडना और अपनी गलती न मानकर दूसरे पर दोषारोपण करना हमारी फितरत है। राष्ट्रीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाकर अपनी संपत्ति बनाना, हमारी आदत बन चुकी है। वैसे इमानदार बने रहने का नाटक करेगें, मगर मौका हाथ लगे तो बेइमानी करने से भी नहीं चूकेंगे। आजादी के सात दशक बाद इतिहास को बदलने की कोशिश की जा रही है। संस्थानों तक के नाम बदले जा रहे हैं। संविधान से छेडछाड करने की पृष्ठभूमि बनाई जा रहा है। सरदार पटेल, भगत सिंह और बीआर अंबेडकर किसके हैं, इस पर बहस की जा रही है। भारत छोडो आंदोलन का श्रेय लेने की होड़ लगी हुई है। मगर इतिहास को बदला नहीं जा सकता और कुछ अध्याय हटा देने से ऐतहासिक घटनाओं को मिटाया नहीं जा सकता। समकालीन युवा पीढी को शायद इस बात का ज्ञान नहीं है कि “भारत छोडो आंदोलन“ और स्वधीनता आंदोलन में राष्ट्रीय स्वंय सेवक की कोई भूमिका नहीं रही है। इतिहास को तोड-मरोड पेश करने के बावजूद वस्तु स्थिति को बदला नहीं जा सकता। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि 1925 सेे .2000 तक “ स्वत्रंतता आंदोलन“ को राजनीतिक लडाई मानने वाले राष्ट्रीय स्वंय सेवक से जुडे लोग भारत छोडो आंदोलन के 75 साल बाद देश के तीन शीर्ष पदों पर पदस्थ हैं। आजाद भारत ने वास्तव में राष्ट्रीय स्वंय सेवक को बुलंदियों तक पहुंचाया है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस सच्चाई को स्वीकारा भी है। इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक की आजादी के बाद राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका रही है। प्राकृतिक आपदाओं और आपतकाल में पीडितों की मदद करने में राष्ट्रीय स्वंय सेवकों का अहम योगदान रहा है। और इस सच्च्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता है कि भारत छोडो आंदोलन और स्वधीनता आंदोलन में देश के कमजोर तबकों की भागीदारी में जो फासला रह गया था, आजाद भारत ने उसे काफी हद तक दूर कर दिया है। फासलें आज भी हैं मगर आजादी से पहले से एकदम अलग हैं। भारत छोडो आंदोलन के दौरान हिंदू और मुसलमानों में इतना फासला नहीं था जितना आज है। भारत छोडो आंदोलन के समय का राष्ट्रवाद भले ही हमारा अधिकृत राष्ट्रवाद बन गया हो, मगर 1942-47 के समय स्वंत्रतता सेनानियों और अवाम में जो जज्बा था, वैसा आज ढंूढे भी नहीं मिलता है। समकालीन भारत को, निसंदेह, भारत छोडो जैसे आंदोलन की जरुरत है। मौजूदा अविश्वास और असहिष्णुता का मौजूदा माहौल देश के सर्वागीण विकास में बडी रुकावट डाल रहा है।
गुरुवार, 10 अगस्त 2017
विचारणीय सुझाव
Posted on 7:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले को लेकर उत्तर प्रदेश के शिया मुस्लिम सेंट्रल वक्फ बोर्ड का सुझाव काबिलेगौर है। इसी सप्ताह 11 अगस्त से सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई होनी है। शिया वक्फ बोर्ड ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करते हुए सुझाव दिया है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को विवादित 2.77 एकड स्थल से हटकर किसी मुस्लिम बहुल आबादी वाले स्थान पर बनाया जा सकता है। बोर्ड के अनुसार 70 साल से दो समुदायों के बीच जारी विवाद का यही एकमात्र सर्वमान्य हल हो सकता है। बोर्ड ने अयोध्या विवाद के अविलंब सर्वमान्य हल के लिए सुप्रीम कोर्ट के सेवा निवृत जज की अगुवाई में हाई-पॉवर्ड न्यायिक-राजनीतिक पैनल गठित करने का सुझाव दिया है। इसके अलावा बोर्ड का कहना है कि मामले के सर्वमान्य हल के लिए एक कमेटी का गठन भी किया जाए। इस कमेटी में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के मामले की सुनवाई कर चुके दो सेवानिवृत जज, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री का नुमाइंदा और संबंधित पक्षों के प्रतिनिधि शामिल किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट इन सुझावों को 11 अगस्त से मामले की सुनवाई करने वाली तीन सदस्यीय बेंच के हवाले कर सकता है। शिया वक्फ बोर्ड के ताजा स्टैंड से अयोध्या विवाद के सर्वमान्य हल की उम्मीद की जा सकती है मगर प्रतिद्धंद्धी सुन्नी मुस्लिम वक्फ बोर्ड शिया बोर्ड के इस सुझाव से सहमत होगा, इस पर संदेह है। सतही तौर पर शिया वक्फ बोर्ड के सुझाव प्रतिद्धंद्धी सुन्नी मुस्लिम समुदाय को घेरने की रणनीति नजर आ रही है। शिया बोर्ड ने सुन्नी वक्फ बोर्ड की चुटकी लेते हुए अदालत से आग्रह किया है कि “कठमुल्लों, धार्मिक उन्मादों और शांतिपूर्ण सर्वमान्य हल के “कट्टर दुश्मन “ प्रतिद्धंद्धी सुन्नी वक्फ बोर्ड को मामले से बाहर रखा जाए। भारत में सुन्नी मुसलमानों की आबादी शिया से कहीं ज्यादा है और बाबरी मस्जिद समेत अधिकांश मस्जिदों पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का ही आधिपत्य है। तथापि, पहली बार देश में किसी धार्मिक संगठन ने विवादित मामले को हल करने के लिए विचारणीय सुझाव दिए हैं। सुन्नी बोर्ड के लिए भी इन सुझावों की काट करना आसान नहीं होगा। मगर मामले में सुन्नी वक्फ बोर्ड को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित जमीन का हकदार बताया है, इस स्थिति में सुन्नी वक्फ बोर्ड को दरकिनार भी नहीं किया जा सकता। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मामला 2010 से सुप्रीम कोर्ट में है। सितंबर, 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने विवादित 2.77 एकड जमीन को राम लला, निर्मोही अखाडा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर हिस्सों में बांटा था। इस फैसले से शिया बोर्ड को जबरदस्त धक्का लगा था। 1945 से शिया और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बाबरी मस्जिद के स्वामित्व को लेकर अदालती लडाई जारी है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले के बाद शिया वक्फ बोर्ड का बाबरी मस्जिद पर दावा खारिज हो चुका है मगर शिया बोर्ड ने अन्य संबंधित पक्षों के साथ उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ फौरन सुप्रीम कोर्ट की शरण में चले गए। तब से इस मामले की सुनवाई लटक-लटक कर चल रही है। पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जल्द सुनवाई के लिए 11 अगस्त निर्धारित की है। बहरहाल, कोई भी पक्ष विवादित जमीन से अपना हक छोडने को तैयार नहीं है और राम मंदिर और मस्जिद साथ-साथ बन नहीं सकती। शिया वक्फ बोर्ड की इस दलील में वजन है कि मस्जिद और मंदिर के साथ-साथ बनाए जाने से दोनो समुदायों को खासी परेशानी हो सकती है। शिया बोर्ड ने सर्वमान्य हल की दिशा में सकारात्मक सुझाव दिए हैं बशर्ते अन्य संबंधित पक्ष भी इसी तरह अपना अडियल रवैया त्यागकर एक-दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करें। अयोध्या में विवादित भूखंड को लेकर अदालत के बाहर संबंधित पक्षों के बीच समझौता ही एकमात्र सर्वमान्य हल हो सकता है। धार्मिक विवाद सर्वमान्य हल से ही सुलझाए सकते हैं।
बुधवार, 9 अगस्त 2017
पटेल बनाम शाह
Posted on 8:40 pm by mnfaindia.blogspot.com/
राज्यसभा की नौ सीटों के लिए आठ अगस्त को हुए चुनाव में गुजरात की एक सीट पर पूरे देश की नजरें टिकी हुई है। और यह सीट है कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल की। इस सीट पर मुकाबला इस कद्र कांटेदार है कि कांग्रेस और भाजपा में एक-एक वोट के लिए मारी-मारी हुई है। नतीजतन, देर शाम तक भी इस सीट के परिणाम घोषित नहीं हो पाए थे। पार्टी प्रत्याशी की नैया पार लगाते-लगाते कांग्रेस की सांसें फूल गईं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल पार्टी में सोनिया और राहुल के बाद तीसरे नंबर के नेता माने जाते है। कांग्रेस में उनकी मर्जी के बगैर पत्ता भी हिलता नहीं है। कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को कांग्रेस अध्यक्ष से मिलने के लिए उनकी अनुमति लेनी पडती है। अहमद पटेल ने इस बार गुजरात से पांचवी बार बतौर कांग्रेस प्रत्याशी राज्यसभा चुनाव लडा। आज तक उन्होंने इतना कडा और कांटेदार मुकाबला नहीं देखा जितना इस बार उन्हें झेलना पडा। भाजपा ने उनकी एक समय निश्चित मानी जाने वाली जीत को बेहद कांटेदार बना दिया। गुजरात से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए मंगलवार को चुनाव हुए। राज्यसभा सदस्य विधानसभा सदस्यों द्वारा चुना जाता है। गुजरात में 181 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 57 सदस्य थे। छह विधायक पार्टी छोड गए। इससे कांग्रेस की सदस्य संख्या 51 रह गई है। इनमें बागी नेता शंकर सिंह वघेला और उनके पुत्र महेन्द्र सिंह भी है़। कुछ और विधायक वघेला समर्थक हैं और इन सभी ने राजपूत के पक्ष में कॅास वोटिंग की है। अहमद पटेल आसानी से जीत जाते अगर भाजपा ने कांग्रेस के बागी हुए पार्टी के मुख्य सचेतक बलवंत सिंह राजपूत को अपना तीसरा उम्मीदवार न बनाया होता। इसीलिए अहमद पटेल का चुनाव दिलचस्प हो गया। जीत के लिए प्रत्येक प्रत्याशी को फर्स्ट पेफरेंस के 45-45 वोट की दरकार थी। भाजपा के दोनों प्रत्याशी - राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी- की जीत सुनिश्चित करने के बाद भाजपा ने अपने 31 सरप्लस वोट तीसरे उम्मीदवार राजपूत को स्थानातंरित कर दिए और उन्हें जीत के लिए 14 सदस्यों के समर्थन की जरुरत थी। इन वोटों को हासिल करने के लिए भाजपा ने कांग्रेस में सेंधमारी की। राजपूत कांग्रेस से बगावती शंकर सिंह वघेला के करीबी माने जाते हैं और भाजपा ने भी इसी बिला पर उन्हें अपना तीसरा प्रत्याशी बनाया था। इस स्थिति में वघेला की भूमिका निर्णायक मानी गई। वघेला ने मंगलवार को वोट डालने के बाद ऐलान कर दिया कि अहमद पटेल की हार तय है। वघेला कांग्रेस नेतृत्व से इसलिए नाराज हैं क्योंकि पार्टी ने उन्हें पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की तरह गुजरात में कांग्रेस का मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने से इंकार कर दिया। बहरहाल, गुजरात में इस बार राज्यसभा चुनाव खासा विवादित रहा है। कांग्रेस ने अपने सदस्यों को पोचिंग से बचाने के लिए क्या कुछ नहीं किया। अपने 43 विधायकों को मंगलवार तक पहले बंगलुरु और बाद में आनन्द में छिपाकर रखा । मंगलवार को वोटिंग के बाद कांग्रेस ने अपने दो विधायकों की वोट को लेकर भारी बवाल खडा किया। राज्यसभा में मतदान करने के बाद संबंधित विधायक द्वारा अपने वोट को पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाने की परंपरा है। कांग्रेस के दो विधायकों ने अपना वोट कांग्रेस एजेंट को भी दिखाया और भाजपा को भी। क्रॉस वोटिंग से क्षुब्ध कांग्रेस शिकायत लेकर निर्वाचन आयोग तक चली गई। पीछे-पीछे भाजपा भी पहुंच् गई। बहरहाल, जीत कांग्रेस की होती है या भाजपा की, पर इतना तय है कि इस प्रक्ररण ने लोकतंत्र की जंगहंसाई करवाई है।
क्या फर्क है गिलानी और मूसा में ?
Posted on 8:32 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी नेताओं की अथाह संपत्ति को लेकर सनसनीखेज खुलासों से राज्य की अवाम को अब तो सतर्क हो जाना चाहिए। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र होगा जहां सरेआम राष्ट्र विरोधी गतिविधियों में संलिप्त अलगाववादियों को सरकार पाल-पोस रही हो। अलगाववादी कश्मीरी नेताओं की निष्ठा को लेकर पूरी दुनिया जानती है कि वे खाते भारत का हैं मगर गीत पाकिस्तान के गाते हैं। कश्मीर के अलगाववादी नेताओं और पाकिस्तानी आतंकियों में जरा भी अंतर नहीं है। सच कहा जाए तो अलगाववादी नेताओं को भी आतंकी ही कहा जाना चाहिए । दोनों मे अंतर बस इतना है कि आतंकियों को केवल पाकिस्तान से ही मदद मिलती है, मगर अलगाववादी नेताओं को पाकिस्तान के साथ-साथ भारत से भी भरपूर मदद मिलती है। कश्मीर घाटी में आजादी के बाद से ही अलगाववाद और पाकिस्तान में विलय के पक्षधरों का तबका सक्रिय रहा है।और समकालीन सरकार ने इन्हें रोकने की बजाए, शह दी है। कश्मीर भारत का एकमात्र मुस्लिम बहुल आबादी वाला राज्य है। इसी पृष्ठभूमि के कारण जम्मू-कश्मीर को संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा दिया गया है। इतना विशेष कि जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की जगह राज्यपाल शासन लगता है और वहां राज्य विधानमंडल की स्वीकृति के बगैर कोई कानून लागू नहीं होता है। देश के किसी भी अन्य राज्य को ऐसा विशेष दर्जा नहीं मिला है। यह संवैधानिक व्यवस्था कश्मीर के मुस्लिम बहुल आबादी को बरकरार रखने के लिए की गई थी। आजादी के बाद राज्यों के विलय के समय कश्मीर की अवाम को आशंका थी कि हिंदू बहुल राष्ट्र में शामिल होने पर अतोगत्वा कश्मीर भी हिंदू बहुल आबादी वाला राज्य बन जाएगा। राज्य की मुस्लिम अवाम की इस आशंका को दूर करने के लिए संविधान में 35-ए की व्यवस्था की गई थी। इसके तहत कश्मीर में बाहर का आदमी न तो संपति खरीद सकती है और न ही यहां स्थायी तौर पर बस सकता है। 35-ए के तहत राज्य विधानसभा को “स्थायी नागरिकों“ की मिलने वाली सुविधाओं को तय करए का अधिकार भी दिया गया है। भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को शुरु से ही इस व्यवस्था पर सख्त ऐतराज रहा है और वह इसका मुखर विरोध करती रही है। यहां तक कि भाजपा की पूर्वज जनसंघ के संस्थापक शयामा प्रसाद मुखर्जी ने अनुच्छेद 370 के खिलाफ लडते-लडते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। तब से भाजपा अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त करने की मांग कर रही है और हर चुनाव में यह उसका प्रमुख मुद्दा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र मे भी इस मुद्दे का उल्लेख था हालांकि इसी साल ( 2014) के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुददे पर चुप्पी साध ली थी। बाद में कुर्सी की खातिर भाजपा ने कश्मीर में अनुच्छेद 370 और अलगाववादीयों से बातचीत की प्रबल समर्थक पीडीपी के साथ मिलकर सरकार भी बना ली। कश्मीर में राजनीतिक दलों के परम “सत्ता प्रेम” की वजह से ही राज्य में लोकप्रिय आवाज करीब-करीब मृतप्राय हो चुकी है। बहरहाल, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि भाजपा का अनुच्छेद 370 विरोध कश्मीरी अवाम को और ज्यादा सशंक्ति कर रहा है। भाजपाइयों द्वारा बार-बार अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त करने की मांग और हालिया घटनाएं कश्मीर में अलगाववादियों को अवाम को भारत के खिलाफ भडकाने में मददगार हो रही हैं। कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को भी कहना पडा कि अगर 35-ए के साथ छेडछाड की गई तो घाटी में हालात और ज्यादा खराब हो सकते हैं। बहरहाल, कश्मीर के अलगावादी नेताओं को सलाखों के पीछे भेजने से घाटी में कोई खास हलचल नहीं होगी मगर 35-ए और अनुच्छेद 370 के साथ छेडछाड करने के गभीर परिणाम हो सकते हैं।
सोमवार, 7 अगस्त 2017
नोटा का ”फंडा“
Posted on 6:52 pm by mnfaindia.blogspot.com/
राज्यसभा चुनाव में नोटा (नन ऑफ दी अबॉव ऑप्शन ) के विकल्प पर सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था से कांग्रेस के साथ अन्य दलों को भी झटका लग सकता है। कांग्रेस द्वारा दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को साफ-साफ कहा कि राज्यसभा चुनाव में नोटा के विकल्प मे कोई खोट नहीं है। न्यायालय ने कांग्रेस को तीन साल बाद नोटा के विकल्प का विरोध करने पर फटकार भी लगाई है। मामले की सुनवाई कर रही खंडपीठ ने कहा कि निर्वाचन आयोग ने जनवरी 2014 में नोटा संबंधी अधिसूचना जारी की थी और कांग्रेस को तब इसके विरोध की जरुरत नहीं पडी। अब क्यों? दरअसल, गुजरात से राज्यसभा की तीन सीटों के लिए आठ अगस्त को मतदान होना है। राज्यसभा चुनाव संबंधी अधिसूचना में यह भी कहा गया कि मतदान में भी विधायकों को नोटा का विकल्प दिया जाएगा। अभी तक राज्यसभा चुनाव में इस विकल्प की जरुरत ही नहीं पडी थी। अमूमन, राज्यसभा के चुनाव में विधायक पार्टी उम्मीदवार को ही वोट डालते रहे हैं। और मतदान खुले में किया जाता है। गुजरात में नोटा के विकल्प से कांग्रेस का लाल-पीना स्वभाविक है। कांग्रेस को इस बात का डर है कि पार्टी छोड गए छह विधायक उसके व्हिप का उल्लघंन कर सकते हैं और इससे उसके उम्मीदवार अहमद पटेल की जीत की संभावना पर असर पड सकता है। गुजरात में राज्यसभा चुनाव की घोषणा होते ही कांग्रेस के दिग्गज नेता शंकर सिंह वघेला ने पार्टी छोड दी और उनके साथ पांच अन्य विधायक भी पार्टी छोड चुके हैं। इससे 182-सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस की सदस्य संख्या घटकर 51 ही रह गई है। कांग्रेस ने अहमद पटेल को पांच वी बार अपना उम्मीदवार बनाया है। पटेल के चुनाव को चुनौतीपूर्ण बनाने के लिए भाजपा ने कांग्रेस छोडकर बाहर आए बलवंत सिंह राजपूत को अपना तीसरा उम्मीदवार बनाया है। राजपूत ने जैसे ही कांग्रेस छोड दी, भाजपा ने तुरंत उन्हें अपना तीसरा उम्मीदवार बना लिया। राजपूत कांग्रेस के मुख्य सचेतक भी थे। राजपूत के तीसरी सीट के लिए चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस के लिए मुश्किलें खडी हो गई हैं। भाजपा अपने सरप्लस वोट राजपुत के पक्ष में डलवा सकती है और नोटा के विकल्प से कांग्रेस का खेल बिगाड सकती है। इसीलिए कांग्रेस ने नोटा के विकल्प को रुकवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण ली मगर यहां से भी पार्टी को निराशा ही हाथ लगी। भाजपा कौ पोचिंग से भयभीत कांग्रेस ने अपने 44 विधायकों को कर्नाटक के एक रिजार्ट में छिपा लिया मगर केन्द्र के लंबे हाथों ने यहां भी काग्रेस का पीछा नहीं छोडा। आयकर अधिकारियों ने रिजार्ट पर छापा मार कर इसके मालिक और कर्नाटक के उर्जा मंत्री को ही घेर लिया। गुजरात में अहमद पटेल को धूल चटवाकर भाजपा कांग्रेस को और कमजोर करना चाहती है। अहमद पटेल न केवल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव हैं, अलबत्ता कांग्रेस में राहुल गांधी के बाद उनका ही सिक्का चलता है। पटेल इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के साथ भी काम कर चुके और उन्हें राजनीतिक जोड-तोड का लंबा अनुभव है। अहमद पटेल की पराजय से कांग्रेस में सोनिया और राहुल गांधी की स्थिति और कमजोर हो सकती है। गुजरात में वघेला प्रकरण से राहुल गांधी के नेतृत्व के खिलाफ पहले ही बगावत के सुर उठ रहे हैं। इस साल के अंत में हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविन्द्र सिंह सुक्खू खेमों में बुरी तरह से बंटी हुई हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं को इस बात का मलाल है कि चुनाव सिर पर होने के बावजूद राहुल गांधी इस मामले को संभाल नहीं पाए हैं। और अगर गुजरात के राज्यसभा चुनाव में काग्रेस हार गई तो हिमाचल प्रदेश में भी बगावत हो सकती है। बहरहाल, नोटा का मामला इतना अहम नहीं है जितना कांग्रेस नेतृत्व के राजनीतिक प्रबंध की लगातार विफलता। अहमद पटेल की पराजय इसे और तल्ख बना सकती है।
शुक्रवार, 4 अगस्त 2017
विदेश नीति की अग्नि परीक्षा
Posted on 7:20 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पाकिस्तान और चीन के बीच की गहरी मित्रता और नई दिल्ली के साथ दोनों के तल्ख संबंध इस समय भारत की सुरक्षा के लिए सबसे बडा खतरा है। पाकिस्तान चीन से अपनी गहरी दोस्ती पर खूब इतरा रहा है और चीन से गहरे संबंधों का हवाला देकर भारत को जब-तब आंखें भी दिखाता है। पाक सेनाध्यक्ष जनरल कमर जावेद बाजवा ने गत सोमवार को कश्मीर समस्या और न्यूक्लियर सप्लाई (एनएसजी) पर पाकिस्तान का भरपूर साथ देने के लिए चीन का गहरा आभार व्यक्त किया। पाकिस्तान में प्रधानमंत्री-सेनाध्यक्ष से लेकर आतंकी संगठनों के मुखिया तक सब-के-सब चीन की दोस्ती पर खूब इतराते हैं। चीन भी इस बात का बखूबी फायदा उठा रहा है। संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया जैश के मुखिया मसूद अजहर और लश्कर के संस्थापक और जमैत-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद को आतंकी मानता है मगर चीन है कि खूंखार आतंकियों को भी देशभक्त बताकर भारत के जख्मों पर नमक छिडक रहा है। इस बार भी चीन ने जैश प्रमुख मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र में आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव को रोक दिया। मसूद अजहर पठानकोट आतंकी हमले का मुख्य आरोपी है और भारत में सबसे अधिक आतंकी वारदातों के लिए वांछित है। बहरहाल, पाकिस्तान के साथ-साथ इस समय भारत, चीन के साथ भी सिक्क्मि में डोकलाम सीमा विवाद को लेकर युद्ध के मुहाने पर है। 16 जून, 2017 को चीन जब डोंग लांग (डोकलाम) में विवादित जमीन पर सडक बनाने की तैयारी में था, भारतीय सैनिकों ने उसे रोक दिया। तब से लगभग साढे तीन सौ भारतीय सैनिक इस क्षेत्र में डटे हुए हैं। चीन इस बात का विरोध कर रहा है और भारत से इस विवादित जमीन से सैनिकों को हटाने के लिए कह रहा है। बुधवार को चीन ने दावा किया कि भारत ने डोकलाम से अपने काफी सैनिक हटा लिए हैं और अब वहां चालीस के करीब ही भारतीय सैनिक हैं। भारत ने चीन के इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अभी भी डोकलाम में 350 भारतीय सैनिक पिछले छह सप्ताह से डटे हुए हैं। दो दिन पहले ही चीन ने भारत को फिर धमकी दी थी कि वह डोकलाम से अपने सैनिक हटा ले वरना गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहे। और भारत ने जब सैनिक नहीं हटाए, चीन ने दुनिया को दिखााने के लिए झूठमूठ कह दिया कि भारत उसकी धमकी के आगे झुक गया और उसने डोकलाम से अपने सैनिक हटा लिए हैं । दरअसल, चीन इस बार खुद भारत से डरा हुआ है। डोकलाम सीमा विवाद पर भारत ने जिस तरह से कडा रुख अखित्यार कर रखा है और भूटान की संप्रभुता की रक्षा के लिए भुटान का साथ दे रहा है, उससे चीन घबरा गया है। डोकलाम से पीछे हटने का मतलब है चीन की विस्तारवादी भूख के आगे समर्पण कर देना। डोकलाम ट्राईजंक्शन भारत, चीन और भूटान के बीच स्थित छोटा सा पठार है। यह क्षेत्र सामरिक दृश्टि से बेहद संवेदनशील है और तिब्बत स्वायत क्षेत्र के यबांग काउंटी और भूटान की हाई घाटी वैली के करीब स्थित है। डोकलाम तिब्बत को भारत से जोडता है। 1890 में चीन और ब्रिटिश सरकार के बीच संधि के अनुसार इस क्षेत्र को चीनी व्यापार के लिए खोला गया था। 1988 और 1998 में भूटान और चीन के बीच लिखित समझौते हुए थे कि दोनों देश डोकलाम में यथास्थिति और शान्ति बनाए रखेंगे। अब चीन का कहना है कि भारत चीन और भूटान के बीच के मामले में खामख्वाह अपनी टांग अडा रहा है। मौजूदा तनावपूर्ण स्थिति के मद्देनजर इतन तय है कि चीन इस विवाादित क्षेत्र में भारत की उपस्थिति को किसी भी सूरत में सहन नहीं करेगा। अगर डोकलाम विवाद बातचीत से नहीं सुलझा तो संभवतय अक्टूबर-नवंबर में चीन भारत पर हमला कर सकता है। इस बार भारत दो तरफा घिरा हुआ है। भारत इसे कैसे टालता है, मोदी सरकार की विदेश नीति की यही सबसे बडी अग्नि परीक्षा है।
गुरुवार, 3 अगस्त 2017
जरा सी राहत काफी नहीं
Posted on 7:05 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को रेपो रेट में 0.25 फीसदी कटौती करके इस साल पहली बार कर्जदारों को कुछ तो राहत दी है। लगभग दस माह पहले अक्टूबर, 2016 में आरबीआई ने रेपो रेट में इतनी ही कटौती की थी। ताजा कटौती से रेपो रेट 6.25 फीसदी से घटकर 6 फीसदी पर आ गया है। ग्रोथ को तेज करने के लिए रिजर्व बैंक ने यह कदम उठाया है। रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से होम, कार और बिजनेस लोन सस्ता होने की उम्मीद की जा सकती है बशर्ते बैंक सस्ते ब्याज का लाभ ग्राहकों तक पहुंचाएं। अब तक का अनुभव यह कहता है कि रेपो रेट बढते ही बैंक ब्याज बढाने में जरा भी देर नहीं करते मगर रेपो रेट में कटौती का फायदा ग्राहकों तक पहुंचाने में, जब तक संभव हो, आनाकानी करते हैं। आरबीआई ने इस बार रिवर्स रेपो रेट और बैंक रेट में भी 0.25 फीसदी की कटौती की है। ताजा कटौती से रिवर्स रेपो रेट 5.75 फीसदी और बैंक रेट 6.25 फीसदी पर आ गए हैं। अभी रिवर्स रेपो रेट 6 फीसदी और बैंक रेट 6.50 फीसदी है। रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों से बांड्स और सरकारी प्रतिभूतियों की खरीद करता है। आरबीआई द्वारा बैंकों को उनकी जमा रा पर अदा किए जाने वाली ब्याज दर को रिवर्स रेपो रेट कहते हैं। बैंकों को आरबीआई द्वारा दिए जाने वाले कर्ज और एडंवासिस पर जो ब्याज लिया जात है, वह बैंक रेट होता है। ब्याज दरों में ताजा कटौतियों से देष में 2010 जैसी सस्ते कर्ज की स्थिति लौट सकती है। जिस तरह रेपो रेट की ऊंची दर बाजार से नगदी (लिक्विडिटी) को सोख लेती है, उसी तरह ब्याज दरों में कटौती से बाजार में अतिरिक्त नगदी उपलब्ध होती है। रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से बाजार में एकमुष्त बीस हजार करोड रु की अतिरिक्त नगदी मिलती है। इससे पहले ब्याज दरों को यथावत रख आरबीआई महंगाई को तीन फीसदी के आस-पास लाने का प्रयास करता रहा है और केन्द्रीय बैंक इस लक्ष्य को हासिल करने में सफल भी रहा है। जून में खुदरा महंगाई न्यूनतम 1.54 फीसदी के स्तर पर थी। इसी कारण आरबीआई को ब्याज दरों में कटौती करनी पडी। बुधवार को जारी मौद्रिक नीति में आरबीआई ने आषंका व्यक्त की है कि अगले साल के अंत तक खुदरा महंगाई फिर चार फीसदी तक पहुंच सकती है। किसानों की कर्ज माफी और कर्मचारियों को नए वेतन आयोग की सिफारिषों के अनुरुप बढा हुआ वेतन महंगाई को बढा सकता है। इस साल के अंत में गुजरात और हिमाचल प्रदेष और अगले साल 2018 में राज्स्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेष, छतीसगढ, नगाालैंड, त्रिपुरा और मेघालय में विधानसभा चुनाव होने हैं। और फिर मई 2019 में लोकसभा मे आम चुनाव। इन राज्यों और लोकसभा चुनाव के दृश्टिगत केन्द्र और राज्यों की सरकारें किसानों को कर्ज माफी की सौगात दे सकती है। उत्तर प्रदेष, महाराश्ट्र, पंजाब और कर्नाटक पहल ही किसानों के कर्ज माफी की घोशणा कर चुके हैं। किसानों के ऋण माफी पर किए गए अध्ययन में बताया गया है कि मई 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव तक देष में किसानों के कर्ज माफी की राषि 2,57,000 करोड रु अथवा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो फीसदी तक पहुंच सकती है। इसके अलावा 2018 में आठ राज्यों के विधानसभा और 2019 में लोकसभा चुनाव में काले धन के प्रवाह से कीमतों पर दबाव पडना तय है। चुनावों से पहले विभिन्न राज्य अपने कर्मचारियों को नए वेतनमान की सौगात दे सकते हैं। ये सब कारक महंगाई बढाने के लिए काफी है़ं। अगर ऐसा हुआ तो महंगाई पर नियंत्रण पाने के आरबीआई के प्रयासों पर पानी फिर सकता है। आरबीआई की यही सबसे बडी चिंता है। बाजार में बैंकों की लिक्विडीटी को तो सोखा जा सकता है, मगर महंगाई बढाने वाले समकालीन षासकों के लोक-लुभावने वायदों को कैसे रोका जाए?
बुधवार, 2 अगस्त 2017
बंटवारे से भी गहरे जख्म
Posted on 7:16 pm by mnfaindia.blogspot.com/
1947 के बंटवारे के जख्म इतने गहरे और पीडादायक नहीं है, जितने आधुनिक भारत को जात-पात, हिन्दू-मुसलमान, उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम में बांटने वाली सियासत के घाव । 1947 में दोनों तरफ दुख और त्रासदी का जो मंजर देखा गया था, कालान्तर में उसे तो भुलाया जा सकता है मगर आजादी के बाद सत्तहर साल के दौरान सियासी नेताओं ने देश को जिस तरह से जात-पात, महजबी और क्षेत्रवाद में बांटा है, उस नुकसान की भरपाई शायद हीं की जा सकती है। जिस तरह आजादी से पहले अखंड भारत के दो सबसे बडे सूबों-पंजाब और बंगाल- को महजबी आबादी के आधार पर बांटा गया था, ठीक उसी तरह देश के कई सूबों को आज सियासी दल “वोट“ की खातिर बांट रहे हैं। अगले सप्ताह भारत अपनी आजादी की सत्तरवीं सालगिरह मनाने जा रहा है। इसी बीच देश की संसद के भीतर और बाहर “ मॉब लींचिग“ पर चर्चा हो रही है। असहिष्णुता की इंतहा हो गई है। गो रक्षा के नाम पर अल्पसंख्यकों का सरेआम उत्पीडन किया जा रहा है। राष्ट्रवाद को तोते की तरह रटाया जा रहा है और इतिहास को तोड-मरोड कर उसके भगवाकरण के प्रयास किए जा रहे हैं। इतना ही नहीं देश में लोकतंत्र की जडों में “ साम्प्रदायिकता ” का तेजाब डालकर इन्हें खोखला किया जा रहा है। आजादी की सत्तरवीं वर्षगांठ पर देश में जो हालात हैं, उन पर करीब 114 पूर्व सैन्य अधिकारियों ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर गहरी चिंता व्यक्त की है। इससे पहले इसी साल जून माह में 65 रिटायर आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों ने भी प्रधानमंत्री से देश में व्याप्त असहिष्णुता और बढते विजिलेटिज्म पर गहरी चिंता जाहिर की थी। ताजा पत्र में भारतीय सशस्त्र सेनाओं से रिटायर सैनिकों ने हिंदुत्व की रक्षा करने वालों के बर्बरतापूर्ण एवं कायराना हमलों की कडी भर्त्सना करते हुए मौजूदा डरावनी और नफरतभरी स्थिति पर गहरी निराशा व्यक्त की है। पत्र में इस बात पर भी चिंता व्यक्त की गई है कि मौजूदा परिवेश में बुद्धिजीवियों, पत्रकारों, सिविल राइटस ग्रुप और अभिव्यक्ति की स्वत्रंत्रता को भी बख्शा नहीं जा रहा है। पूर्व सैनिकों के अनुसार मौजूदा हालात से देश की सशस्त्र सेनाओं और संविधान को भी गहरा धक्का लगा है। भारतीय सशस्त्र सेना “ अनेकता में एकता“ पर भरोसा करती है और अगर इसका पालन नहीं किया गया तो सशस्त्र सेना का मनोबल भी टूटता है। भगवा संगठनों के समर्थक भले ही इन राष्ट्रीय सरोकारों को हल्के में नकार दें मगर देश के समक्ष जो ज्वलंत चुनौतियां हैं, उन्हे सिरे से नकारा नहीं जा सकता। सोमवार को संसद में “मॉब लींचिग“ पर चर्चा के दौरान सांसदों ने मौजूदा स्थिति का कोई हल ढूंढने की बजाय एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए। संविधान में जिन मूल्यों और सिद्धांतों का स्पष्ट उल्लेख है, उन का सम्मान नहीं किया जा रहा है। इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि केन्द्र में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हिन्दुत्व और गो रक्षा की आड में दलितों और मुसलमानों पर अत्याचार बढे हैं। खासकर भाजपा शासित मध्यप्रदेश और झारखंड में “मॉब लींचिग“ के मामलों में खासा इजाफा हुआ है। 2015 में दादरी लीचिंग के बाद से इस तरह की घटनाओं में बढोतरी हुई है। अब तक तीस से अधिक लोग “मॉब लीचिंग“ में मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री की बार-बार चेतावनी के बावजूद “मॉब लीचिंग“ की घटनाओं में कोई कमी नहीं आई है। संसद में सोमवार को सरकार ने “मॉब लीचिंग“ की घटनाओं से यह कहकर अपना पल्ला झाड लिया कि कानून एवं व्यवस्था राज्यों का मामला है। देश की यही सबसे बडी समस्या है। अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडकर दूसरे के सर मढ देना और समस्या से भागना सियासी दलों की फितरत है। भारत इस समय चौतरफा दुश्मनो से घिरा हुआ है। केद्र में भगवा पार्टी की सरकार आने के बाद से खतरा और बढा है। सरकार को सतर्क रहने की जरुरत है।
मंगलवार, 1 अगस्त 2017
भूकंपः डरें नहीं, सामना करें
Posted on 7:49 pm by mnfaindia.blogspot.com/
बेफिक्री और लापरवाही इंसान की फितरत होती है। और कुदरत की बार-बार चेतावनी के बावजूद इससे अनजान बने रहने उसकी सबसे बडी भूल। यही वजह है कि भूकंप को लेकर बार-बार चेताए जाने के बावजूद तबाही के मुहाने पर पहुंचे हिमालय के अधिकांश शहर मजाल है कि अपनी गलतियों से कोई सबक लें। नेशनल सेंटर फॉर सीस्मोलॉजी की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की राजधानी दिल्ली, हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और ”सिटी ब्यूटीफुल“ चंडीगढ समेत 29 शहर भूकंप की दृष्टि से अति संवेदनशील हैं। इन शहरों में तीन करोड से भी ज्यादा की आबादी बसती है। भूकंप का तेज झटका आने पर इन शहरों में भारी तबाही हो सकती है। इनमें अधिकांश शहर हिमालयन क्षेत्र में स्थित है। हिमालय को भूकंप की दृष्टि से दुनिया में अति संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। यह पहली बार नहीं है कि भूकंप को लेकर इस कद्र भयावह चेतावनी दी गई हो। इससे पहले कई बार इस तरह की चेतावनी दी जा चुकी है और भूकंप से भारी तबाही भी हो चुकी है। 25 अप्रैल, 2015 को हिमालय की तलहटी में बसे नेपाल में 8.1 (रिक्टर स्केल) की तीव्रता वाले भूकंप से राजधानी काठमांडू और आसपास के कई क्षेत्रों में भारी तबाही हुई थी। इसमें 9000 से अधिक लोग मारे गए और 22000 के करीब गंभीर रुप से जख्मी हुए थे। इस भूकंप के झटके भारत, चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी महसूस किए गए थे और इन देशों मे दो सौ से अधिक लोग मारे गए थे। भूकंप से काठमांडू स्थित विश्व धरोहर 18वीं शताब्दी की धरहरा मीनार पूरी तरह ध्वस्त हो गई थी। बहरहाल, उन्नत प्रोद्योगिकी और विज्ञान के जमाने में भी भूकंप की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती है। दुनिया में हर रोज 50 से 55 और लगभग बीस हजार सालाना भूकंप आते हैं । इनमें साल में एक-आध की ही तीव्रता आठ से ज्यादा होती है। साल में 15 के लगभग भूकंपों की तीव्रता 7 और 7.9 के बीच रहती है। जनवरी, 2001 मे गुजरात में 7.7 तीव्रता वाले भूकंप में बीस हजार से अधिक लोग मारे गए थे और कई शहर ध्वस्त हो गए थे। आठ से अधिक तीव्रता वाला भूकंप तो 7 और 7.9 तीव्रता वाले से तीस गुना अधिक शक्तिशाली होता है। अधिकाश भूकंप की तीव्रता 2 से 2.9 के बीच रहती है। इसीलिए दुनिया सही-सलामत बची हुई है। वैज्ञानिकों का भी मानना है कि कम तीव्रता वाले भूकंप यूनाटेडिट स्टेट्स जियोजिक्ल सर्वे की नजरों से भी छूट जाते हैं। अनुमानत, साल में 2 से 2.9 तीव्रता वाले 13 लाख भूंकप आते हैं। भूकंप निरंतर भूगर्भीय प्रकिया है और धरती की संरचना का अभिन्न हिस्सा है। पूरी धरती बारह टैक्टोनिक प्लेटों पर स्थित है और उसके नीचे तरल पदार्थ लावा है। टैक्टोनिक प्लेटें इसी लावे पर तैर रहीं हैं और इनके टकराने से जो उर्जा रिलीज होती है, उसके कारण भूकंप आते है। इन्हें किसी भी सूरत में टाला नहीं जा सकता। लेकिन भूकंप से जानमाल के नुकसान को जरुर टाला जा सकता है। और इसके लिए भूकंप-रोधी भवन निर्माण तकनीक अपनाने की जरुरत है। बेतरतीब निर्माण, कमजोर बुनियादी ढांचा और आर्किटेक्चर खामियों के कारण नेपाल और गुजरात के भूकंप से ज्यादा नुकसान हुआ था। हिमालय की तलहटियों में बसी आबादी के लिए भूकंप रोधी भवन निर्माण की दरकार है। पुराने जमाने में हिमालय के क्षेत्रों में धज्जी शैली वाले भवनों का निर्माण किया जाता है। भूकंप आने पर धज्जी शैली में बने भवन आसानी से ध्वस्त नहीं होते थे और अगर ढहते भी तो बहुत ज्यादा नुकसान नहीं होता था क्योंकि इनमें प्रत्युक्त साम्रगी हल्की होती थी। आधुनिक कंकरीट भवन निर्माण शैली में ईंट, सीमेंट और सरिये का इस्तेमाल किया जाता है और यह अपेक्षाकृत भारी होता है। भूकंप रोधी भवन निर्माण की इस प्राकृतिक कहर से बचने का एकमात्र विकल्प है। पुराने भवनों को भी रेट्रोफिटिंग से भूकंप रोधी बनाया जा सकता है।
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