मुसलमान बहुल, खासकर आतंक से पीडित मुल्कों में सिखों का रहना-बसना कितना खतरनाक है, अफ्गानिस्तान के जलालाबाद की ताजा घटना इसे उजागर करती है। सफर करे तो मौत का तांडव, शवों का अंतिम संस्कार तो मौत का खौफ। रविवार को आतंक पीडित अफ्गानिस्तान के पूर्वी प्रांत जलालाबाद में इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने सिखों से भरी बस पर हमला करके बीस लोगों को मार गिराया। ये सभी लोग अफ्गानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी से मिलने बस से जा रहे थे। राष्ट्रपति गनी इन दिनों नंगरहार प्रांत के दो दिवसीय दौरे पर आए हुए हैं। हमले से कुछ देर पहले ही वे जलालाबाद में थे। मरने वालों में सिख लीडर अवतार सिंह खालसा भी हैं। खालसा को हिंदू और सिख का अग्रणी नुमाइंदा माना जाता था। वे इस साल अक्टूबर में होने वाले संसदीय चुनाव लडने की योजना बना रहे थे। अफ्गानिस्तान के प्रमुख सिख नेता की हत्या से सिख समुदाय क्षुब्ध हैं। अफ्गानिस्तान में सदियों से हजारों सिख रह रहे हैं और अधिकांश कारोबार के सिलसिले में इस मुल्क में आकर बसे हैं। इस समय सबसे ज्यादा सिख जलालाबाद में रह रहे हैं। पिछले बीस सालों से आतंक से लगातार पीडित होने के कारण काफी सिख अफ्गानिस्तान छोडकर जा चुके है। अस्सी के दशक में अफ्गानिस्तान की राजधानी काबुल में ही 20,000 से ज्यादा सिख थे मगर अधिकांश 1992 में गृह युद्ध शुरु होते ही यहां से अन्यत्र चले गए । अस्सी के दशक मे काबुल में 8 गुरुद्धारे हुआ करते थे मगर आतंक फेलाने वाले हैवानों ने “गुरु के पवित्र स्थान “को भी नहीं बख्षा और 7 को ध्वस्त कर डाला। अब केवल कार्त परवान का मुख्य गुरुद्वारा बचा है। काबुल में बचे अधिकतर सिख इसके आसपास ही रह रहे हैं। जलालाबाद में 2001 में लगभग 100 सिख परिवार के 700 लोग थे मगर अब 300 ही बचे हैं। इस शहर में दो गुरुद्वारे हैं और इनमेंसे एक को गुरु नानक देव जी के समय बनाया गया था। अफ्गानिस्तान में सिखों की कितनी आबादी है, इसकी कोई पुख्ता जानकारी तो नहीं है मगर सिख नेताओं के अनुसार नब्बे के गृह युद्ध से पहले अफ्गानिस्तान में करीब 50, 000 सिख थे। 2013 में यह संख्या 800 ही रह गई थी। इसमेंसे अब केवल 300 परिवार काबुल में रह रहे थे। पूरे अफ्गानिस्तान में अब 3,000 सिख ही रह गए हैं। अफ्गानिस्तान के सिख स्थानीय पश्तो बोलते हैं और सदियों से यहां रह रहे हैं। सिख कई बार अफ्गानिस्तान संसद के लिए भी चुने जा चुके हैं। जय सिंह फनी पहले सिख नेता थे, जो सत्तर के दशक में अफ्गान संसद के लिए निर्दलीय उम्मीदवार बतौर चुने गए थे। फनी के बहनोई गजेन्द्र सिंह सफारी अफगानिस्तान संसद जाने वाले दूसरे सिख नेता थे। मगर अफगानिस्तान में लगातार अशांति बने रहने के कारण बाद में उन्होंने सपरिवार इंग्लैंड में राजनीतिक शरण ले थी। अफ्गानी सिख महिला सामाजिक कार्यकर्ता और पेशे से डाक्टर अनारकली कौर भी अहिंसा और सहिष्णुता के लिए सम्मानित हो चुकी हैं और संसद के लिए भी चुनी जा चुकी हैं। 2013 से संसद की एक-एक सीट हिंदू और सिखों के लिए आरक्षित है। इन सब बातों से आतंकियों का कोई सरोकार नहीं है। अफ्गानिस्तान में सिखों पर तरह-तरह के जुल्म ढाए जा रहे है। सिखों की धार्मिक मान्यताओं तक को नकारा जा रहा है। मृतकों को जलाने की परंपरा को रोका जा रहा है। 2003 में अफ्गानिस्तान की एक सिख महिला का अंतिम संस्कार रोक दिया गया। शव को अंतिम संस्कार के लिए पाकिस्तान ले जाना पडा था । काबुल में सिखों से श्मशान घाट तक को छीन लिया गया है। 2007 में स्थानीय मुस्लिम समुदाय ने शव को जलाने पर सिखों की पिटाई तक की गई । इतना सब होने पर सदियों से यहां बसे सिख परिवार अपना “मुल्क“ छोडने को तैयार नही है।
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