तीन साल तक “बोतल में कैद“ रहने के बाद काले धन का जिन फिर बाहर आ गया है। ताजा जानकारी के अनुसार 2017 में स्विट्जरलैंड के बैंकों में जमा भारतीयों का पैसा ्50 फीसदी बढकर सात हजार करोड ( 1.01 स्विस फ्रेंक) पहुंच गया था। काले धन के खिलाफ सरकार की कार्रवाई के कारण पिछले तीन साल में स्विट्जरलैंड के बैंकों में पैसा जमा कराने का सिलसिला गिर रहा था। यह जानकारी क्योंकि स्विट्जरलैंड के सेंट्रल बैंक ( स्विट्जरलैंड नेशनल बैंक-एसएनबी) द्वारा जारी की गई है, इसलिए इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। सेंट्रल बैंक द्वारा जारी आंकडों के मुताबिक 2017 में स्विट्जरलैंड के सभी बैंकों में विदेशियों का पैसा 3 फीसदी बढकर 1.46 लाख करोड स्विस फ्रैंक अथवा 100 लाख करोड पहुंच गया था। भारतीयों ने व्यक्ति रुप से 3200 करोड रु, दूसरे बैंको के जरिए 1050 करोड रु और प्रतिभूति (सिक्योरिटीज) के मार्फत 2640 करोड रु जमा कराए हैं। स्विट्जरलैंड में करीब चार सौ बैंक हैं और इनमें यूबीएस और क्रेडिस सुइस सबसे बडे बैंक हैं। भारतीयों समेत विदेशों का अधिकतर पैसा इन दोनों बैंकों में जमा है। दुनिया में जितनी गोपनीयता स्विट्जरलैंड के बैंको में है, उतनी अन्य कहीं नहीं है। इसी वजह ज्यादातर विदेशी स्विस बैंकों को तरजीह देते हैं। स्विस बैंकों के गोपनीय खातों को “नंबर्ड अकांउट“ कहा जाता है। इन खातों को नाम की बजाए नंबर से ऑपरेट किया जाता है और संबंधित बैंक के शीर्ष अधिकारियों के अलावा किसी को भी इन खातों की भनक तक नहीं लगती है। गोपनीय खाते आसानी से नहीं मिलते हैं। केवल खास ग्राहकों को ही इन खातों की सुविधा दी जाती है। पकडे जाने के भय से अक्सर गोपनीय खाटाधारक चेक बुक और बैंक के क्रेडिट अथवा डेबिट कार्ड की सुविधा तक नहीं लेते हैं। इस स्थिति में स्विस बैंक के गोपनीय खातों को सुंघा तक नहीं जा सकता। अब तक यही माना जाता रहा है कि लोग अपना काला धन छिपाने के लिए स्विस बैंकों का इस्तेमाल करते हैं। ताजा जानकारी से मोदी सरकार की चिंता बढ सकती हैे। पिछले लोकसभा चुनाव के समय भाजपा ने सत्ता में आते ही विदेशों में जमा काले धन को सौ दिन के भीतर स्वदेश लाने का वायदा किया था। नवंबर, 2016 में मोदी सरकार ने अचानक नोटबंदी का फैसला लेकर 500 और 1000 रुपयों के पुराने नोट बंद करके 500 और 2000 के नए नोट जारी किए थे। तब यह दावा किया था कि नोटबंदी से काला धन बाहर आएगा मगर ऐसा नहीं हुआ। नोटबंदी पर किए गए लगभग सभी अध्ययन यही कहते हैं कि नोटबंदी से सिवा आम आदमी को असुविधा होने के कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। आरबीआई के अनुसार नोटबंदी के बाद 99 फीसदी 500 और 1000 के प्रतिबंधित नोट बैकों में वापस आ गए थे। इससे साफ था कि नोटबंदी से काले धन पर कोई असर नहीं पडा। इसके विपरीत नोटबंदी से पहले 2016 में स्विस बैंको में भारतीयों का जमा पैसा 45 घट चुका था। पिछले एक दशक के दौरान विदेशों में जमा भारतीयों के धन में काफी गिरावट आई है। 2006 में स्विस बैंकों में भारतीयों का 23 हजार करोड रुपए जमा था और 2017 में यह 7 हजार करोड रु ही रह गया था। जाहिर है भारत सरकार की सख्त कार्रवाई के कारण इसमें गिरावट आई है और इसका ज्यादा श्रेय मनमोहन सिंह सरकार को जाता है। काला धन भारत की ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए यब बहुत बडी सिरदर्द है। यूरोप मे काला धन जीडीपी का 4.45 फीसद है तो सब सहारन अफ्रीका में सबसे ज्यादा ्5.53 फीसद है। एशिया में यह सबसे कम जीडीपी का 3.75 फीसद है। नामचीन अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार के मुताबित काले धन के बगैर भारतीय अर्थव्यवस्था नौ फीसदी की ग्रोथ से आगे बढती। काश , ऐसा होता!
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