मंगलवार, 31 अक्टूबर 2017

फिजूल की बहस

देश  के समक्ष मुंह फैलाए खडे ज्वलंत मुद्दों को अगर सियासी चश्मे  से देखा-परखा जाए, तो इनका भटक जाना स्वभाविक है। कश्मीर  समस्या को लेकर पिछले सात दश कों से यही हो रहा है। सत्तारुढ दल हो या विपक्ष, सभी ने कश्मीर  समस्या को राजनीतिक चश्मे  से नापा है और निहित सियासी हितों के लिए भुनाया है। कश्मीर  के लिए इंटेलिजेंस ब्यूरो के पूर्व  निदेशक दिनेश्वर  शर्मा को वार्ताकार नियुक्त करने के एक सप्ताह के भीतर ही काग्रेस के वरिष्ठ  नेता  पी चिदंबरम और प्रधानमंत्री के बीच वाद-विवाद ने वार्ता  की पहल का माहौल बिगाड दिया है।  पी चिदंबरम का कथन है कि कश्मीर  आजादी नही, अलबत्ता स्वायत्तता मांग रहा है। इस बयान की भर्त्सना करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना है कि कांग्रेस पाकिस्तान की भाषा  बोल रही है जबकि पार्टी ने पूर्व गृह मंत्री के बयान से तुरंत किनारा कर लिया था। कांग्रेस में चिदंबरम को बेबाक नेता माना जाता है और  वे अक्सर कुछ-न-कुछ ऐसा कह देते हैं, जिससे भाजपा लाल-पीली हो जाती है। प्रधानमंत्री  अपनी जगह सही है। चिदंबरम को मौके की नजाकत समझनी चाहिए थी और उन्हें कश्मीर  में शांति  बहाली के लिए काम करना चाहिए। बहरहाल, चिदंबरम कश्मीर  के लिए जिस स्वायत्तता की मांग कर रहे हैं, वह सियासत की चाशनी  में सरोबर  है। तो क्या पूर्व  गूहमंत्री यह कह रहे हैं कि कश्मीर  को कोई स्वायत्तता नहीं मिली हुई है? अगर ऐसा है तो कांग्रेस अथवा संप्रग सरकार ने क कश्मीर  को मुंहमांगी स्वायतता क्यों नहीं दी? आजादी के बाद अब तक सात दशक में छह दशक तक कांग्रेस केन्द्र में सत्ता में रही है। चिदंबरम जी आप जब गूहमंत्री थे, तब कश्मीर  को और अधिक स्वायत्तता क्यों नहीं दी गई? समकालीन नेताओं का इस तरह का आचरण देश  के लिए अहितकारी है । सत्ता में रहते हुए जिन मुद्दों को वे दबा जाते हैं, सत्ता से बाहर आते ही उन्हें खूब उछालते हैं। कश्मीर  के हालात मात्र स्वायत्तता से नहीं, अलबता कुशासन से बिगडे हैं। और राज्य में कुशासन के लिए कांग्रेस ही नहीं, वर्तमान भाजपा-पीडीपी सरकार में भी जिम्मेदार है। सात दशक के कुशासन और लंबे समय से जारी हिंसा के माहौल ने  कश्मीर  के अवाम को बागी बना दिया है। और जैसे-जैसे समय गुजर रहा है, वैसे-वैसे हालात और बिगड रहे हैं। कश्मीर  को स्वायत्तता नहीं, बल्कि  शांति  और विकास की दरकार है। कश्मीर  को  पहले ही अन्य राज्यों की तुलना में खासी स्वायत्तता मिली हुई है। संविधान  के अनुच्छेद 370 में कश्मीर  को विशेष  राज्य का दर्जा और सर्वाधिक स्वायत्तता  मिली हुई है। यह अनुच्छेद संविधान का अभिन्न हिस्सा है। 35 ए के तहत राज्य सरकार को अपने स्थाई नागरिकों के लिए विशेष  सुविधा देने और उनका स्टेट्स तय करने की पॉवर है। अन्य किसी भी राज्य को न तो इस तरह की स्वायतता है और न ही अधिकार ।  35 ए की व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट  में पहले ही सुनवाई चल रही है। मूल संविधान में यह व्यवस्था नहीं है। इसे बाद में जोडा गया है। आजादी के बाद  भारत हिस्सा बनते ही  कश्मीर में पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी नेता सक्रिय हो गए थे और उतरोत्तर और ज्यादा सक्रिय होते गए। उन्हें सक्रिय रखने में केन्द्र और राज्य सरकार का भरपूर योगदान रहा  है। सरकार अलगाववादियों की  सुरक्षा व्यवस्था को चॉक-चौबंद करने के अलावा उनकी मेहमान नवाजी भी करती है। अलगाववादियों को पाकिस्तान समेत बाहरी मुल्कों से भी बराबर  भारी-भरकम वित्तीय मदद मिल रही है। इस सच्चाई से केन्द्र और राज्य सरकार अच्छी तरह वाकिफ है। चिदंबरम से पूछा जाना चाहिए कि संप्रग सरकार ने  देशद्रोही अलगाववादियों पर क्यों कार्रवाई नहीं की? पूरा देश  आज यही कहेगा कृपया  कश्मीर  पर खामख्वाह की राजनीति करके समस्या को और न उलझाएं। अशांत   घाटी को कश्मीर शांत  करने के लिए मिलकर सतत प्रयास करने की जरुरत है।       

सोमवार, 30 अक्टूबर 2017

असुरक्षित उपभोक्ता

भारत में उपभोक्ता संरक्षण कानून दुनिया का सबसे कमजोर माना जाता है। मौजूदा कानून से राहत मिलना तो दूर, उपभोक्ता की  अदालत का  चक्कर काटते-काटते जुतियां घिस जाती है। और अगर जैसे-तैसे  राहत मिल भी गई, अदालत की व्यवस्था को ठेंका दिखाया जाता है।  वीरवार को दिल्ली में  आयोजित वैश्विक  सम्मेलन मे प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में वैदिक काल से उपभोक्ता संरक्षण को प्राथमिकता दी जाती थी। अथर्ववेद में व्यापारियों को नाप-तोल के लिए बाकायदा संहिता का उल्लेख है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि संहिता के बावजूद भारत में कम तोलकर उपभोक्ताओं को चूना लगाने की कुप्रथा वैदिक काल से प्रचलित है और आज भी बदस्तूर जारी है। दूध वाले से लेकर रददी वाले, फल-सब्जी बिक्रेता, जिसे  भी मौका मिले, उपभोक्ता को चूना लगाने की फिराक में रहता है। पेट्रोल पंपों पर कम तेल देकर इस तरह से ठगी की जाती है कि उपभोक्ता को पता तक नहीं चलता। रसोई गैस सिलेंडर से गैस से रास्ते मे गैस चोरी कर ली जाती है। मिठाइयों में सरेआम मिलावट की जाती है। कीमतों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है।  मुनाफे की अधिकतम सीमा तय है और कीमतों को सार्वजनिक तौर पर लटकाना भी। फिर भी उपभोक्ता ठगा जाता है।  बेचारा उपभोक्ता लडे तो किस-किस से। सरकार ऐसा कानून क्यों नहीं बनाती जिससे उपभोक्ता को रोज-रोज की ठगी से निजात मिले? भारत में आजादी के चार दशक बाद 1986 में सरकार ने आनन-फानन में उपभोक्ता संरक्षण कानून बनाया था। इस कानून के कार्यन्वयन के लिए जिला स्तर से लेकर  राष्ट्रीय  स्तर तक उपभोक्ता अदालतों का गठन भी किया गया मगर यह व्यवस्था भी उपभोक्ता को समय बद्ध और त्वरित न्याय नहीं दे पाई। 2015 में संयुक्त राष्ट्र  संघ (यूएन) ने उपभोक्ता संरक्षण के लिए बाकायदा दिशा   निर्देश  जारी किए। इनमें उपभोक्ता संरक्षण को सरकार की पहली प्राथमिकता बताया गया है। इन दिशा -निर्दशों   के मुताबिक 1986 के उपभोक्ता संरक्षण कानून को और अधिक प्रभावषाली बनाने के लिए सरकार ने पहल की है। सरकार के “न्यू इंडिया”  के संकल्प में भी कडे उपभोक्ता संरक्षण कानून पर जोर दिया गया है। संशोधित कानून में गुमराह करने वाले विज्ञापन के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया जा रहा है। कानून के बावजूद देश  में उपभोक्ताओं को विज्ञापनों के जरिए धडल्ले से गुमराह किया जाता  है। ऐसे विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई के लिए बाकायदा  संस्था (एडवरटाइजमेंट काउंसिल ऑफ इंडिया) भी है मगर इससे भी गुमराह करने वाले  विज्ञापनों पर अकुंश  नहीं लग पाया है। भारत, चीन और अमेरिका इस समय उपभोक्ता वस्तुओं की सबसे बडी मार्केटस है। अमेरिका और चीन की तुलना में भारत अपेक्षाकृत काफी गरीब है मगर इसके बावजूद भी यह दुनिया की तीसरी बडी  एमरजिंग मार्केट है।  बॉस्टन कंसलटिंग ग्रुप  (बीसीजी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2025 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बडी मार्केट होगी। 2005 में भारत की 44 फीसदी आबादी गरीब थी और उसके पास मोबाइल तक नहीं था। 2016 मे यह घटकर 31 फीसदी रह गई है। 13 फीसदी आबादी आार्थिक सपन्नता की सीढियां पार कर चुकी है। 2005 में जगुआर, और लैंड रोवर्स  जैसी महंगी गाडियां खरीदने वालों की संख्या जहां 31 लाख थी, 2016 तक यह संख्या 65 लाख हो गई थी। बीसीजी के अनुसार 2025 तक महंगी गाडियां खरीदने वालों की संख्या 1 करोड 58 लाख तक पहुंच जाएगी। भारत में 65 फीसदी आबादी युवा (35 साल से कम) हैं और यह तबका उपभोक्ता वस्तुओं का सबसे बडा खरीदार है।  एक जमाना था भारत में विदेशी  वस्तुओं का जबरदस्त क्रेज्र था। मगर अब 60 फीसदी से ज्यादा लोग स्वदेशी  वस्तुओं को तरजीह देते हैं और उन्हें विदेशी  वस्तुओं से बेहतर मानते हैं। भारत में महिलाओं की भागीदारी भी उत्तरोतर बढ्ती जा रही है और यह तबका सबसे बडा उपभोक्ता है मगर सबसे ज्यादा ठगा भी जाता है। भारत में सख्त से सख्त उपभोक्ता कानून की अविलंब जरुरत हैं।    

शुक्रवार, 27 अक्टूबर 2017

मूल मुद्दों से भटकना

मशहूर  शायर फैज अहमद फैज का लोकप्रिय शेर है, “और भी गम है जमाने में मोहब्बत के सिवा, राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा“। दुनिया भर में  मोहब्बत के प्रतीक ताजमहल पर मौजूदा विवाद इस शेर को और ज्यादा प्रासंगिक करता है। जनसेवा सरकार और शासक दल के नुमाइंदों की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए मगर अफसोस समकालीन  शासक ऐसा करने की बजाए अनावश्यक  मुद्दों को उछाल कर जनता का ध्यान बंटाने में मशगूल रहते  हैं। जन समस्याओं का समय बद्ध निदान करने में विफल रहने पर मुद्दों से ध्यान हटाना तो कोई समकालीन सियासतदानों से सीखे। भगवा सरकार के सत्ता में आते ही ऐतहासिक प्रसंगों और धरोहरों को मिटाने के प्रयास किए जा रहे हैं। ताजमहल से लेकर टीपू सुल्तान की महत्ता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश  में दिमाग बुखार की महामारी से बच्चों के बेमौत मरने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। सौ दिन में राज्य की सभी सडकों को गड्डों से मुक्त करने का वायदा  छह माह में भी पूरा नहीं हो पाया है। पांच साल में पूरा हो जाएगा, इसकी भी उम्मीद कम ही है। मगर  उत्तर प्रदेश  में  धरोहरों को मिटाना योगी आदित्यनाथ सरकार की उच्च  प्राथमिकता  है।    सबसे पहले मुगल सराय रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर दीन दयाल उपाध्याय कर दिया। फिर ताजमहल को महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की अधिकृत सूची  से हटा दिया गया । और अब भाजपा के बडबोले विधायक संगीत सोम ने ताजमहल को “भारतीय संस्कृति पर धब्बा“ बताकर बडा बवाल खडा कर दिया है। बवाल बढने पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को स्पष्टीकरण  देने के लिए आगे आकर कहना पडा कि ताजमहल तो मोहब्बत का मेमिसाल स्मारक है। वीरवार को योगी आदित्यनाथ ने ताज महल में झाडू लगाकर “स्वच्छता अभियान“ का आगाज भी किया।  ताज महल में पहली बार “जय श्री रामः के नारे भी गूंजे। योगी ने ताज महल को लगभग चार सौ करोड रु की सौगात भी दी। अभी ताजमहल विवाद की आग ठंडी भी हुई नहीं कि  राष्ट्रपति  राम नाथ कोविंद के बंगलुरु में संबोधन पर भी सवाल खडे किए जा रहे हैं।  राष्ट्रपति  कोविंद ने बुधवार को कर्नाटक विधानसभा के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए टीपू सुल्तान की तारीफ की।  टीपू सुल्तान को महान योद्धा बताते हुए राश्ट्रपति ने कहा है उन्होंने अग्रेजों से लडते हुए वीरगति प्राप्त की थी। उन्होंने यह भी कहा कि टीपू सुल्तान ने ंमैसूृर रॉकेट को विकसित करने में अहम योगदान दिया था। इसी रॉकेट के बाद यूरोप ने इसका इस्तेमाल किया। राष्ट्रपति के कथन भाजपा की मुस्लिम विरोधी मानसिकता के माफिक नहीं है, इसलिए पार्टी ने फौरन कह दिया राष्ट्रपति के मुंह में शब्द डाले गए। भाजपा टीपू सुल्तान को क्रूर शासक बता रही है। केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगडे तो टीपू सुल्तान को बलात्कारी और हत्यारा करार दे चुके हैं। उनके इस बयान पर खासा बवाल मचा हुआ है। कर्नाटक सरकार 10 नंवबर को टीपू सुल्तान जयंती मना रही है। भाजपा इसका मुखर विरोध कर रही है। बहरहाल, खोखले और थोथे मुद्दों को उछाल कर चुनाव तो जीते जा सकते हैं मगर जन समस्याएं हल नहीं की जा सकती। और अगर जन समस्याओं का समयबद्ध समाधान नहीं निकाला जाता, जनता दंडित करने का मादा भी रखती है। निसंदेह, उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ताजमहल जाकर विवाद को ठंडा करने का काम किया है। मगर आलोचकों के इस कथन में वजन है कि योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सबसे पहले पार्टी के उन लोगों के मन-मष्तिष्क  को भी स्वच्छ करना चाहिए, जो वैमनस्य और नफरत फैलाने का कोई अवसर नहीं चूकते। देश  की 60 फीसदी आबादी दो वक्त की रोजी-रोटी के लिए जूझ रही है। इन लोगों को रोजगार और जन सुविधाओं की दरकार है और  गौण मुद्दे उछालना, अवाम के जले पर नमक छिडकने जैसा है। 

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017

मोदी सरकार की सौगात

गुजरात और हिमाचल प्रदेश  के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार ने देश  को महत्वाकांक्षी भारतमाला परियोजना  की सौगात दी है। इस परियोजना के तहत अगले पांच साल के दौरान सात लाख करोड रु के निवेश  से लगभग 83,000 किलोमीटर लंबी सडकों का निर्माण किया जाएगा। सरकार का मकसद माल की ढुलाई में तेजी लाना है और साथ ही भारी भरकम निवेश  से देहातों में रोजगार के अवसर  सृजित करना है। सरकार पांच साल के लक्ष्य को लेकर चल रही है जबकि उसके मौजूदा कार्यकाल का दो साल से भी कम समय बचा है। जाहिर है मोदी सरकार यह मान कर चली रही है कि देश  की जनता-जनार्दन प्रधानमंत्री को कम-से-कम एक अवसर और देगी। सडकों का जाल बिछानेे के अलावा सरकार ने बढते एनपीए से जूझ रहे सरकारी बैकों में जान फूंकने और आर्थिक गतिविधियों को गति देने के लिए 2.11 लाख करोड रु का कैपिटलाइजेशन प्लान भी मंजूर किया है। सरकार  की  इस पहल का फौरन असर देखने को मिला। बुधवार को  शेयर मार्केट में तेजी व्याप्त रही और बैकों के  शेयर्स में जबरदस्त उछाल आया। देश  के अग्रणी सरकारी बैंक एसबीआई के शेयरों में सबसे अधिक 28 फीसदी की तेजी दर्ज  हुई। अंतरराष्ट्रीय  रेटिंग एजेंसियों-फिंच और मूडीज ने भी सरकार की इस पहल को अर्थव्यवस्था की ग्रोथ के अनुकुल बताया है। निसंदेह, नोटबंदी और जीएसटी की बिसंगतियों से त्रस्त भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अविलंब संजीवनी बुटि की दरकार है। बुधवार को जारी एक सर्वेक्षण का आकलन है कि मार्च 2018 को समाप्त होने वाले वित्तीय साल 2017-18 के दौरान भारत की  ग्रोथ 6.7 ही रहेगी। यह ग्रोथ रेट चार साल में न्यूनतम है। सर्वेक्षण का आकलन है कि नोटबंदी के बाद जीएसटी के लागू होने से आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड गई हैं और मांग भी अभी तक दबी हुई है। कॉर्पोरेट जगत के तिमाही रिजल्टस भी मंदी  के ही संकेत दे रहे हैं। इन सब का असर रोजगार सृजन पर पडा है। सरकार सार्वजनिक तौर पर भले ही इस सच्च्चाई को न माने मगर आर्थिक मंदी और बढती बेरोजगारी के साथ-साथ महंगाई ने  आम आदमी को परेशान कर रखा है।  आरबीआई की मौद्रिक नीति तय करने वाली समिति ने  भी माना है कि मुद्रास्फीति का खतरा अभी भी बना हुआ है और इसीलिए आरबीआई ने ब्याज दरों को यथावत रखा है।  भारतमाला परियोजना  और  बैकों की कैपिटलाइजेशन प्लान से सरकार के बजटीय घाटे में खासा इजाफा हो सकता है। इससे घाटे को चार फीसदी से नीचे रखने का लक्ष्य भी अधूरा रह सकता है। सरकारी बैंकों के  रिकैपिटलाइजेशन के साथ डेट मार्केट को भी प्रोत्साहित करने की जरुरत है। बैंकों का  रिकैपिटलाइजेशन बैड लोन्स की इंताह   को दर्शाता  है।  बढते एनपीए से तहस-नहस  सरकारी बैंकों को नगदी देकर सरकार आर्थिक गतिििव्धयों को बढावा देना चाहती है। यह बात दीगर है कि  रिकैपिटलाइजेशन से बैड लोन्स और बढ सकते हैं। बैकों को   रिकैपिटलाइज करने के अलावा सरकार के पास और भी पुख्ता विकल्प थे। प्राइवेट बैंकों की तरह सरकारी बैंक भी बाजार से पूंजी जुटा सकते हैं। सरकार ऐसा कर सकती थी। इससे बैंकों को अपने पांव पर खडा होने का अवसर भी मिलता । बैकों के बैड लोन्स को सरकारी खजाने से भरा जाए, यह आम आदमी के हित में नहीं है। एक और विकल्प यह हो सकता है कि सरकारी बैंकों को दीर्घ कालीन बेल-इन बांड्स जारी करने की अनुमति दी जाए। बाद में जरुरत पडने पर इन्हें इक्विटी में बदला जा सकता है। बहरहाल, सुस्त पडी आर्थिक गतिविधियों को गति देने की जरुरत है और मोदी सरकार ने देर से ही सही, उपयुक्त कदम उठाया है। भारत का ग्रोथ रेट अभी भी चीन से थोडा ही कम है। आर्थिक गतिविधियों को गति देकर हम अगले वित्तीय साल में चीन को फिर पछाड सकते हैं।

बुधवार, 25 अक्टूबर 2017

वार्ता पर किससे ?

 आतंकवाद और अलगाववाद की भीषण आग में झुलस रहे  कश्मीर  पर  बातचीत की  पहल स्वागत योग्य है। मोदी सरकार ने खुफिया ब्यूरो के पूर्व  निदेशक दिनेश्वर शर्मा  को वार्ताकार नियुक्त किया है। इस पहल के अगले ही दिन मंगलवार को  राष्ट्रीय  सुरक्षा एजेंसी (एनआईए) ने कश्मीर  में आतंक और हत्या के प्रमुख साजिशकर्ता  और आतंकी संगठन हिजबुल के सरगना सैयद सलाहुदीन के पुत्र सैयद साहिद यूसुफ को टेरर फंडिग के मामले में गिरफ्तार करा लिया  । यूसुफ  को पहले भी गिरफ्तार किया जा चुका है।  यूसुफ जम्मू-कश्मीर  सरकार में कृषि  महकमे का कर्मचारी है। युसुफ के अलावा उसके तीन भाई और एक बहन भी राज्य सरकार के मुलाजिम है। आतंकी  सलाहुद्दीन के चार पुत्र और दो पुत्रियां है। चारों पुत्र और एक पुत्री सरकारी नौकरियों में है। यानी एक पुत्री को छोडकर पूरे  परिवार को सरकारी रोजगार मिला हुआ है।  कश्मीर  में आतंक और अलगाववाद के प्रमुख सरगना  सैयद सलाहुद्दीन के पूरे परिवार को सरकारी नीकरी मिलना राज्य के हालात बयां करता है। आजादी के बाद सात  दशकों में जम्मू-कश्मीर  में सियासी नेताओं और अलगाववादी ही फलते-फूलते रहे हैं। आम कश्मीर  बस मेहनत्-मजदूरी करके अपना पेट पालता रहा है। कश्मीर  के हस्तकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों की देश  में ही नहीं विदेशों  में भी धूम है।  आतंक और  अलगाववाद ने उनका रोजगार भी छीन लिया है।  अलगाववादी खाते भारत की हैं मगर  पाकिस्तान के लिए काम करते हैं।  सैयद सलाहुद्दीन परिवार इस बात की सबसे बडी मिसाल है। बाप पाकिस्तान से भारत को अस्थिर करने की साजिश  रचने में मशगूल है और परिवार  ककश्मीर   सरकार के मुलाजिम बनकर मलाई चाट रहा  है। यूसुफ को गिरफ्तार करके सरकार ने यह संकेत दिए हैं कि अलगाावादियों से कोई बातचीत नहीं की जा सकती। सत्ता में आने के तीन साल बाद मोदी सरकार की  कश्मीर  नीति में बदलाव देखा जा सकता है। अब तक मोदी सरकार कश्मीर  पर सख्त रुख अपनाए हुए थी और आतंक और अलगाववाद को सैन्य कार्रवाई से शान्त  करने की पक्षधर थी। तीन साल के दौरान कश्मीर  घाटी में बेताहाशा  खून बह चुका है। बंदूक और गोली किसी भी समस्या का कोई हल नहीं है। इतिहास इस बात का गवाह है कि विद्रोह और स्वायत्तता की आवाज को जितनी सख्ती से दबाया जाता है, उतनी ही तेजी से यह और ज्यादा फूटती है। कश्मीर  समस्या पर अटल बिहारी वाजपेयी की नीति पर लौट आने का संकेत प्रधानमंत्री स्वाधीनता दिवस के संबोधन में दे चुके थे। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि राष्ट्रीय  मुख्य धारा से भटके लोगों को गोली और गाली की बजाए गले लगाने की जरुरत है। वार्ताकार तो नियुक्त को गया है मगर  सबसे बडा सवाल है कि वार्ता किससे की जाएगी। अलगाववादी और पाकिस्तान से वार्ता  किए बगैर  कश्मीर  में किसी भी वार्ता  की कोई प्रासंगिकता नहीं बनती है। अब तक कश्मीर  को लेकर कई वार्ताकार नियुक्त किए जा चुके हैं मगर कोई भी वार्ता सफल नहीं हो पाई है। 2001 में केन्द्र सरकार ने केसी पंत को वार्ताकार बनाया था मगर 2002 में इस पहल को बिना किसी नतीजे के बंद कर दिया गया। इसके बाद राम जेठमलानी और एनएन वोहरा कमेटी बनाई गई मगर ये भी कुछ नहीं कर पाईं। फिर सात साल बाद 2010 में संप्रग सरकार ने वरिष्ठ  पत्रकार दिलीप पडंगावकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समीति बनाई। राधा कुमार और एमएम अंसारी इसके सदस्य थे।  इस समिति ने केन्द्र सरकार को अपनी रिपोर्ट भी दी थी मगर इस रिपोर्ट  को जमीन निगल गई या आसमान खा गया, इसका आज तक पता नहीं चल पाया। और अब फिर सात साल बाद मोदी सरकार ने आईबी के पूर्व  निदेशक को वार्ताकार नियुक्त तो किया है मगर पुलिस अधिकारी की विश्वसनीयता   दिलीप पडंगावकर समिति से बढकर नहीं हो सकती। मोदी सरकार अलगाववादियों से वार्ता  करने के लिए तैयार नहीं है और अलगाववादी प्रधानमंत्री के सिवा किसी से भी वार्ता के लिए राजी नहीं है। फिर  वार्ता किससे ?

मंगलवार, 24 अक्टूबर 2017

Dynastic Politics Is Congress's Necessity

जिस तरह राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है, और न ही स्थायी  दुश्मन , उसी तरह  भारत में राजनीतिक दलों की  कोई स्थाई आचार संहिता नही है। बदलाव के अथवा राजनीतिक अवसरवादिता के नाम पर अपने ही बनाए नियम तोडने में सियासी दल सबसे आगे रहते हैं। वामपंथी दलों को छोडकर देश  का कोई भी राजनीतिक दल वंशवाद को पोषित करने के मामले में पीछे नहीं है। सबसे बुरा हाल तो ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का है। आजादी के बाद विगत सात दशकों में कांग्रेस में नेहरु और  प्रांतीय  दिग्गज नेताओं के वंशजों ्का ही वर्चस्व रहा है। राष्ट्रीय  स्तर पर अगर नेहरु के वंशजों का वर्चस्व रहा है तो क्षेत्रीय स्तर पर  प्रांतीय कांग्रेसियों के वंशजों का। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान  केलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में माना था कि कांग्रेस में वंशवाद का बोलबाला है और इससे पार्टी को कुछ नुकसान हुआ है।  मगर उनका यह भी  कहना था कि अन्य राजनीतिक दल भी इस मामले में दूध के धुले नहीं हैं। यह बात सभी जानते हैं कि दो गलत काम मिलकर भी सही नहीं हो सकते। कांग्रेस की मौजूदा हालात के लिए काफी हद तक यही वंशवाद वाली मानसिकता जिम्मेदार है। कांग्रेस ने कभी अपने  कर्मठ कार्यकर्ताओं की कद्र नहीं की। पार्टी में आम कार्यकर्ता को जनसभाओं के मंच सजाने-संवारने से  ज्यादा कोई तवज्जो नहीं दी गई है। पार्टी के टिकटों का आवटन बडे नेताओं के परिजनों अथवा उनकी सिफारिश  पर किया जाता है। वंशवाद ने कांग्रेस में लोकतांत्रिक नुमाइंदगी पनपने ही नहीं दी। इस वंशवाद को कम करने के लिए कांग्रेस ने ”एक परिवार, एक टिकट” का नियम बना रखा है मगर हिमाचल प्रदेश  के दो दिग्गज नेताओं के लिए इस नियम को कूडेदान में फेंक दिया गया है। हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पुत्र  और सीनियर  नेता ठाकुर कौल सिंह की  पुत्री को टिकट देकर पार्टी ने अपने ही  नियम  का मखौल उडाया है। वीरभद्र और कौल सिंह दोनों ही पार्टी के टिकट पर चुनाव लड रहे हैं। इतना ही नहीं पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष की सिफारिश  पर उनके पुत्र को पाटी का उम्मीदवार बनाया है। एक और हलके में भी पिता की जगह पुत्र को टिकट दिया गया है। यानी पार्टी में वंशवाद चरम पर है। पार्टी में आम कार्यकर्ता  बडे बेताओं के ंवंशजों के सामने एकदम बौने  हो जाते हैं।   काग्रेस मे वंशवाद के पनपने की सबसे बडी वजह है कि  इसका शीर्ष   नेतृत्व खुद वंशवाद की उपज है। जाहिर है इस स्थिति में पार्टी को वंशवाद रोकने में न तो कोई रुचि है और न ही इच्छा शक्ति। नामचीन अर्थशास्त्री मैंकर आल्सन ने वंशवाद को लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक बताया है। उनका आकलन है कि वंशवाद की राजनीति डाकुओं की तरह व्यवस्था की लूट-खसोट करती है। वंशवादी नेताओं के पास सभी साधन उपलब्ध होते हैं और ऐसे लोग व्यवस्थित तरीके से लंबे समय तक व्यवस्था को अपने नियंत्रण में रखने के लिए काम करते हैं।़ इस तरह की व्यवस्था लोकतंत्र के लिए बेहद घातक सिद्ध होती है। इस मामले में फिलीपीन्स की मिसाल दी जाती है। 1987 में लोकतंत्र की बहाली के बाद आज तक इस मुल्क के 60 फीसदी जन प्रतिनिधि (हाउस ऑफ रेेप्रेजेंटेटिव ) वंशवादी है। इसके कारण इस देश में गरीबी, भुखमरी और आर्थिक असमानता कम होने की बजाए और बढी है। देश  का युवा नशे  की गिरफ्त में है। और अब सरकार को नशे  के खिलाफ मुहिम चलानी पड रही है। 2015 में ब्राजील में स्थानीय निकाओं  (म्युनिसिपैलटी) पर किए गए अध्ययन में पाया गया था कि  वंशवादी नेताओं के वर्चस्व वाली  म्युनिसिपैलटीज का पूंजीगत व्यय गैर-वंशवादी से कहीं अधिक था। कांग्रेस ही नहीं, अन्य राजनीतिक दल भी वंशवाद को बढावा देकर देश  की कोई सेवा नहीं कर रहे हैं। समय और  राष्ट्रहित  का तकाजा है कि वंशवाद का जड से उन्मूलन किया जाए।

सोमवार, 23 अक्टूबर 2017

ये कैसी दिवाली ?

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद दिवाली की रात देश  की राजधानी दिल्ली और उसके समीपवर्ती  शहरों (एनसीआर्) में प्रदूषण के स्तर में अपेक्षाकृत बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आई है। दिल्ली और  एनसीआर क्षेत्र में प्रदूषण  कम करने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की ब्रिकी पर रोक लगा दी थी। मगर देश  की  शीर्ष  अदालत की इस पहल का भी  कोई बडा असर नहीं हुआ है। दिल्ली और एनसीआर  में  लोगों ने दिवाली पर   जमकर आतिशबाजी की। अनुमान है दिवाली के रोज दिल्ली और आसपास के शहरों में एक अरब टन की आतिशबाजी की गई।  सेंटर पॉल्यूशन बोर्ड एयर क्वालिटी इंडेक्स के अनुसार पटाखों की ब्रिकी पर रोक के बावजूद दिल्ली में इस दिवाली की रात  एयर क्वालिटी इंडेक्स 319 था। पिछले साल दिवाली की रात यह इंडेक्स 431 था। पिछले साल की तुलना में यह भले ही कम है मगर अभी भी खतरनाक स्तर पर है। 300 से 400 के बीच एयर क्वालिटी इंडेक्स को खतरनाक माना जाता है और 400 से ऊपर तो बेहद खतरनाक। प्रदूषण बोर्ड  के आंकडों अनुसार दिल्ली में वीरवार को  शाम छह तक प्रदूषण काफी कम था मगर मगर रात 11 बजे तक यह बहुर बढ गया था। दिवाली की रात को सबसे ज्यादा पटाखे फोडे जाते हैं। दिवाली की अगली सुबह दिल्ली के विभिन्न पॉल्यूशन कंट्रोल सेंटर्स  पर पर्टिकुलेट मैटर-पीएम (हवा में धूुल-कण की मात्रा) भी दस गुना ज्यादा पाई गई है। दिल्ली और एनसीआर में पटाखों की ब्रिकी पर प्रतिबंध था, पटाखों को फोडने पर नहीं। इसी वजह दिल्ली और एनसीआर में प्रदूषण के स्तर में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आ पाई है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश  में कहा था कि पटाखों की ब्रिकी पर प्रतिबंध लगाने का मकसद ये देखना है कि इससे दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण पर क्या फर्क  पडता है? दिल्ली और एनसीआर में  शुक्रवार को सुबह आसमान में प्रदूशण भरी धूल साफ देखी जा सकती थी। दिल्ली ही नहीं देश  के अन्य शहरों का भी यही हाल रहा। चेन्नई में वीरवार की रात पॉल्यूशन का स्तर अन्य दिनों की तुलना में बहुत ज्यादा था। तमिल नाडु पॉल्यूशन बोर्ड  के आंकडों अनुसार चेन्नई के विभिन्न सथानो पर  पर्टिकुलेट मैटर-पीएम का स्तर 597 से 777 के बीच था जबकि अन्य दिनों  यह 200 के आसपास रहता है।  बहरहाल, दिवाली रोशनी और उजाला फैलाने का पर्व है, जीवन को अंधकारमय बनाने का नहीं। और पटाखे फोडकर हवा में जहर घोलना और प्रदूषण फैलाकर लोगों के जीवन को अंधकारमय बनाना, यह कैसा त्यौहार है। हैल्थ और पॉल्यूशन पर लानसेट की ताजा रिपोर्ट  में बताया गया है कि भारत में हर साल वायु प्रदूषण से सबसे अधिक लोग मर रहे हैं। 2015 में दुनिया में 6.5 मिलियन लोग प्रदूषित वायु और आग लगने के कारण मारे गए थे। इनमेंसे  2.5 मिलियन मौतें  अकेले भारत मे हुई थी। चीन में 1.8 मिलियन लोग वायु-अग्नि प्रदूषण से मारे गए थे। वर्ल्ड  बैंक का आकलन है कि प्रदूषण और गरीबी का चोली-दामन का साथ है। गरीब देशों  में प्रदूषण से सबसे अधिक मौतें हो रही हैं और इन देशों  में दुनिया की सबसे तेज गति से बढती अर्थव्यवस्थाएं भारत और चीन भी शामिल हैं।  वर्ल्ड  बैंक ने साफ शब्दों में कहा है कि प्रदूषण को कम करना हर देश  की प्रमुख जिम्मेदारी है। दिल्ली में प्रदूषण के लिए पटाखों के अलावा और भी कई कारण है। और सबसे ज्यादा प्रदूषण डीजल वाले वाहन फैलाते है़। बढते प्रदूषण को रोकने के लिए  दुनिया  बिजली से चलने वाली कारों  की ओर तेज से बढ रही है। चीन ने 2022 के बाद  पूरे देश  को पेट्रोल-डीजल कारों पर प्रतिबंधित कर इलेक्ट्रिकल कारों के प्रयोग को अनिवार्य  कर दिया है। भारत, इस मामले मे अभी बहुत पीछे है। यह बात बेहद दुखद है कि भारतीय जनमानस प्रदूषण फैलाकर खुद ही अपने फेफडों में जहर घोल रहा है। न्यायपालिका और सरकार के अलावा लोगों को प्रदूषण रोकने के लिए खुद ही पहल करनी पडेगी।  ।   

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2017

पंजाब, हरियाणा को पीछे छोडा

चंडीगढ  ने पेट्रोल-डीजल पर वैट में पांच फीसदी की कटौती करके पंजाब और हरियाणा को पीछे छोड दिया है। ताजा कटौती से चंडीगढ में पेट्रोल और डीजल 2 रु प्रति लीटर सस्ता हो जाएगा। पंजाब और हरियाणा ने अभी पेट्रोल-डीजल पर वैट को कम नहीं किया है, इस स्थिति में चंडीगढ में डीजल इन दोनों राज्यों से सस्ता बिकेगा। डीजल में पंजाब में 17.29 फीसदी तो हरियाणा  में 17.22 वैट है। चंडीगढ में डीजल पर सबसे कम 9.68 फीसदी वैट है। पंजाब में पेट्रोल पर रीजन में सबसे अधिक 36.04 फीसदी वैट वसूला जाता है। हरियाणा में 26.25 फीसदी, दिल्ली और हिमाचल प्रदेश में  पेट्रोल पर 27 फीसदी वैट वसूला जाता है। लेकिन पंजाब से कहीं ज्यादा महाराष्ट्र  में पेट्रोल पर 46.52 फीसदी वैट है तो मुंबई में तो पूरे राज्य से अलग सबसे अधिक 47.64 वैट है। आंध्र प्रदेश  में पेट्रोल पर 38.82 फीसदी और मध्य प्रदेश  में 38.79 फीसदी वैट वसूला जा रहा है। हरियाणा, मध्य प्रदेश  और महाराष्ट्र  में भाजपा की सरकार है और आंध्र प्रदेश  में भाजपा के सहयोगी दल तेलगु देशम की सरकार है। केन्द्र ने चार अक्टूबर को पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज शुल्क को दो रु प्रति लीटर की कटौती की थी। इस कटौती से केन्द्र सरकार को 26,000 करोड रु के राजस्व का नुकसान उठाना पडा। केन्द्र ने राज्यों से भी वैट में पांच फीसदी कटौती करने को कहा है। 29 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दलो्ं की सरकारे हैं मगर अभी  अभी तक केवल तीन राज्यों-महाराष्ट्र , गुजरात और हिमाचल प्रदेश - ने ही वैट में कटौती की है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश  में विधान सभा चुनाव सिर पर हैं, इसीलिए वैट में कटौती की गई है। पडोसी गुजरात की वजह से महाराष्ट्र  को पेट्रोल-डीजल पर वैट कम करने के लिए बाध्य होना पडा। इस लिहाज से चंडीगढ प्रशासन पहला ऐसी प्रशासनिक क्षेत्र है जिसने वास्तव में वैट में 5 फीसदी कटौती की है। चंडीगढ के ताजा फैसले से अब पंजाब और हरियाणा को भी वैट कम करने के लिए बाध्य होना पड सकता है। पंजाब को महंगे फ्यूल के कारण सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है। चंडीगढ के अलावा हिमाचल प्रदेश  भी पेट्रोल-डीजल पर वैट में कटौती कर चुका है। पेट्रोल-डीजल पर रीजन मे सबसे ज्यादा वैट लगाकर पंजाब को पहले ही इसका खमियाजा भुगतना पड रहा है। आंकडे बताते हैं कि पंजाब में पेट्रोल-डीजल की बिक्री राष्ट्रीय  औसत से काफी कम है।  माहवार प्रति पेट्रोल पंप पेट्रोल-डीजल की 173 किलोलीटर राष्ट्रीय  औसत बिक्री की तुलना में पंजाब में यह औसत मात्र 123 किलोलीटर है जबकि पंजाब को पेट्रोल-डीजल की खपत में मामले में बडी मार्केट माना जाता है। पंजाब की तुलना में हरियाणा में माहवार प्रति पेट्रोल पंप 180 किलोलीटर है। चंडीगढ में यह औसत 380 किलोळीटर प्रति पंप है। देश  में सबसे ज्यादा 3380 पेट्रोल पंप  पंजाब में है और हरियाणा में 2726 पंप हैं। इसके बावजूद भी पंजाब में पेट्रोल-डीजल की कम खपत से साफ है कि महंगे पेट्रोल-डीजल ने राज्य का ज्यादा नुकसान किया है। पंजाब पेट्रोल पंप डीलर्स  एसोसिएशन का भी यही आकलन है कि पंजाब में पडोसी राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा वैट वसूला जा रहा है। महंगे पेट्रोल-डीजल के कारण पंजाब के हरियाणा, हिमाचल प्रदेश , राजस्थान और चंडीगढ से सटे क्षेत्रों में स्थित पेट्रोल पंपों को खासा नुकसान उठाना पड रहा है।़ पंजाब के मुकाबले पडोसी राज्यों में पेट्रोल-डीजल सस्ता बिकता है। पंजाब और हरियाणा दोनों कृषि  प्रधान देश  है और देश  का अन्न भंडार भरने में इन राज्यों का  बहुत बडा योगदान है। पंजाब में लगभग 40 फीसदी डीजल की खपत कृषि  सेक्टर द्वारा की जाती है। यही स्थिति हरियाणा में है। महंगे डीजल से कृषि  उत्पाद की लागत भी बढ जाती है और इससे किसानों का मार्जिन कम होता जा रहा है। पंजाब और हरियाणा सरकार को इन पहलुओं पर संजीदगी से विचार करना चाहिए। देश  का अन्नदाता खुशाहल है तो पूरा देश  समृद्ध है। अन्यथा सारा विकास बेकार चला जाएगा।    

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

नक्सलियों से वार्ता?

सीमाओं पर  दुश्मनों की  विस्तारवादी भूख से निपटने के साथ-साथ सरकार को देश के भीतर अलगाववाद और नक्सलवाद की उत्तरोतर बढती समस्या से भी जूझना पड रहा है। नक्सल समस्या अलगाववाद से अधिक भयावह है।   दुश्मनों की  उनके भाडे के टटुओं से लडना आसान है मगर समाज और स्थापित व्यवस्था से बागी हुए अपने ही लोगों के हिंसक संघर्ष  को  दबाना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। इस सदी की सबसे बडी विडंबना यही है कि पूरी दुनिया को भुखमरी और  गरीबी से लडने की बजाए आतंक और हिंसा से जूझना पड रहा है।  जिन दुलर्भ संसाधनों को भुखमरी और गरीबी हटाने पर खर्च किया चाहिए , उन्हें कानून-व्यवस्था पर खर्च  करना पड रहा है। साठ के दशक में  पश्चिम  बंगाल से  शुरु हुआ नक्सलवाद 2017 तक देश  के 14 राज्तों में अपने पांव पसार चुका है और लगभग 80 जिलों में नक्सली संघर्ष   अपने पांव जमा चुका है। 110 अन्य जिलों में नक्सलियों का प्रभाव बढता जा रहा है। आंध प्रदेश , बिहार और झारखंड के अधिकांश  आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में नक्सलियों का खासा जनाधार है । देश  के एक अग्रणी अंग्रेजी समाचार पत्र द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार आंध्र प्रदेश  के 58 फीसदी लोग नक्सलियों को औरों से बेहतर मानते हैं।  नक्सल समस्या मूलतः मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ  सशत्र ( आर्मेड)   संघर्ष   है और इसे चलाने वाले माओवादी जनशक्ति से व्यवस्था को बदलने के लिए कटिबद्ध है। इस स्थिति में सबसे बडा सवाल यही है कि क्या व्यवस्था को बदलने के लिए कटिबद्ध माओवादी अपने लक्ष्य को हासिल किए बगैर वार्ता  के लिए राजी होंगे और अगर बातचीत के लिए तैयार हैं तो इसका स्वरुप क्या होगा? गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सलियों से सशर्त  बातचीत की पेशकश  की है। झारखंड की राजधानी रांची में नक्सली समस्या का जायजा लेते समय गृहमंत्री ने कहा है कि अगर नक्सली हिंसा छोड दें तो उनसे बातचीत हो सकती है। गृहमंत्री की इस पेशकश  के कोई मायने नहीं है क्योंकि नक्सली हिंसा का मार्ग  छोडने को तैयार है।  आर्म्ड स्ट्रगल माओवादियों का मूलमंत्र है और यही सबसे बडा अंतर है जो उन्हें अन्य वामपंथियों से अलग पहचान देता है। वामपंथी किसान, मजदूर और आम आदमी के  शांतिपूर्ण  संघर्ष से व्यवस्था  बदलना चाहते हैं मगर माओवादी आर्म्ड स्ट्रगल   से। इसीलिए, भारत में वामपंथी दलों और माओवादियों के रास्ते एकदम  अलग-अलग हैं। जनवरी 2005 में आंध्र प्रदेश  सरकार और माओवादियों के बीच बातचीत हुई थी मगर यह बेनतीजा रही। तब माओवादियों ने जेल में बंद नक्सलियों की रिहाई और भूमि के पुर्नावंटन (रिडिस्ट्रिब्यूशन) की मांग रखी थी मगर सरकार इसके लिए भी तैयार नहीं थी।  इसके बाद से नक्सली किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं है। नक्सल पीडित बिहार, झारखंड और आंध्र प्रदेश  तीनों राज्यों में इस समय भाजपा अथवा उसके सहयोगी दलों की सरकार है और माओवादी दक्षिणपंथी और उसके सहयोगी दलों को  शोषण  व्यवस्था का सबसे  बडा प्रतीक मानते हैं। नक्सलियों से बातचीत की पेशकश  से पहले पक्की जमीन तैयार की जानी चाहिए। माओवादियों का आदिवासी और भूमिहीनों में पक्का जनाधार है। सरकार की वन नीति से आदिवासियों की रोजी-रोटी छीनी गई है।  माओवादियों का मानना है की सरकार के भूमि सुधार कानून  जमींदारों और सांमतियों के हितों को पोषित करते हैं। जब तक भूमिहीनों और आदिवासियों को बसाने के लिए क्रांतिकारी भूमि सुधार कानून नहीं बनाए जाते, तब तक माओवादी बातचीत के लिए आगे नहीं आएंगें। और अगर सरकार से वार्ता के लिए तैयार होते भी हैं, तो फिर वहीं मांगें दोहराएंगे और सरकार इसके लिए राजी नही होगी। इस स्थिति में नक्सलियों से किसी भी तरह की बातचीत की पेशकश  केवल सुर्खियां बटोरने वाली ही साबित होंगी। सरकार वाकई ही अगर नक्सलियों से बातचीत चाहती है, तो इसके लिए पहले  जमीन तैयार करनी पडेगी।

मंगलवार, 17 अक्टूबर 2017

गुरदासपुर से दिल्ली तक

पंजाब में गुरदासपुर लोकसभाई सीट के उप-चुनाव में  काग्रेस की तगडी जीत से पार्टी के शीर्ष  नेता भी फूले नहीं समा रहे हैं। अमूमन, अपवाद को छोडकर उप-चुनाव में सत्तारूढ दल के उम्मीदवार के जीतने की परंपरा रही है। पंजाब में इसी साल के शुरु में कांग्रेस भारी बहुमत से विधानसभा चुनाव में अपना परचम लहरा चुकी है। मतदाताओं का सरकार से “हनीमून“ अभी चल रहा है। राज्य में अमरेन्द्र सिंह सरकार ने किसानों के कर्ज  माफी समेत कई लोक-लुभावने फैसले भी लिए हैं। सरकार की अब तक परफोर्मेंस भी काफी संतोषजनक रही है। इन हालात में कांग्रेस को हरा पाना शिअद-भाजपा गठबंधन के बूते की बात नहीं थी।  मगर कांग्रेस प्रत्याशी  सुनील झाखड की भाजपा के प्रत्याशी  पर दो लाख मतों के भारी अंतर से जीत वाकई ही अप्रत्याशित है। आज तक कांग्रेस इस सीट से कभी भी इतने भारी मतों के अंतर से जीत नहीं दर्ज  कर पाई थी। इतना ही नही “कांग्रेस के पक्ष में बही चुनावी बयार“ में  आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की जमानत तक जब्त हो गई। गुरदासपुर लोकसभाई उपचुनाव के नतीजों ने दीवारों पर साफ साफ इबादत लिख दी है कि ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का जलवा अभी भी कायम है, भले ही यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चली 2014 की लहर में कुछ समय के लिए दब गया था। नव निर्वाचित सांसद सुनील झाखड के इस आकलन  को नकारा नहीं जा सकता कि  गुरदासपुर हो या   दिल्ली यूनिवर्सिटी के   छात्र संघ चुनाव  या पंजाब  और राजस्थान यूनिवर्सिटी के चुनाव , कांग्रेस और इससे संबंद्ध एनएसयूआई की जीत से साफ संकेत है कि चुनावी बयार कांग्रेस के पक्ष में बह रही है। तथापि दिल्ली अभी काफी दूर है और पंजाब की एक लोकसभाई सीट और छात्र संघों के चुनाव से दिल्ली तक का सफर तय नहीं किया जा सकता। इसके लिए कांग्रेस को तरह-तरह के पापड बेलने पडेंगे। नवंबर-दिसंबर में हिमाचल प्रदेश  और गुजरात के विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा की दशा   और दिशा   तय करेंगे। गुजरात में 15 साल से भाजपा सत्ता में है और हिमाचल प्रदेश  में कांग्रेस पांच साल से सत्ता में है। राज्य के मुख्यमंत्री  वीरभद्र सिंह के लिए अपनी लोकप्रियता दिखाने का यह अंतिम अवसर है।  छह बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके वीरभद्र सिंह आज तक पार्टी को लगातार दूसरी बार बहुमत नहीं दिला पाए हैं। इसके विपरीत गुजरात में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्य में भाजपा को लगातार तीन बार भारी बहुमत से सत्ता में ला चुके हैं। गुजरात काग्रेस के लिए बडी चुनौती है और पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी राज्य के फतेह करने के लिए दिन-रात एक कर रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी ने गुजरात के कारोबारियों की कमर तोडकर रख दी है। कारोबारी अब तक भाजपा के पक्के समर्थक रहे हैं मगर इस बार यह तबका भाजपा से क्षुब्ध लग रहा है। बेरोजगारी से युवा परेषान है और  दलितों  और अल्पसंख्यकों पर हो रहे  गौरक्षकों के जुल्म से ये तबके भी भाजपा से छिटक रहे हैं। भाजपा को सबसे बडी चुनौती हार्दिक पटेल, दलित और ओबीसी फ्रंट से है। अगर ये तीनों फ्रंट भाजपा के खिलाफ जाते हैं, तो पार्टी को चुनाव में खासी परेशानी हो सकती है। पहली बार भाजपा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गुजरात में फ्रंट फुट की जगह बैक फुट पर खेलते नजर आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को गुजरात के चुनाव प्रचार में झोंकना यही संदेश  दे रहा है कि भाजपा को प्रधानमंत्री  के अलावा भी लोकप्रिय चेहरों की दरकार है। बहरहाल, गुरदासपुर की जीत से हिमाचल प्रदेश  और गुजरात के कांग्रेस कार्यकर्ताओं का  मनोबल बढना स्वभाविक है। गुजरात में भाजपा अभी से “मोदी के गौरव“ की बात कर रही है। प्रधानमंत्री सोमवार को गुजरात के चुनावी दौरे पर थे और इस दौरान उन्होंनें कांग्रेस को जी भर कोसा मगर प्रमुख मुद्दों का बहुत कम उल्लेख किया। इससे चुनावी बयार का कुछ-कुछ अनुमान लगाया जा सकता है।       

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

Questionable Election Announcement ?

निर्वाचन आयोग द्वारा वीरवार को हिमाचल प्रदेश   के साथ ही गुजरात  विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं किए जाने से कई सवाल खडे हो गए हैं। कांग्रेस को इसमें “दाल में कुछ काला“ नजर आ रहा है और जिस तरह से अंतिम समय में गुजरात की  घोषणा को रोका गया, उसमें  “कुछ-न-कुछ काला“ तो है।  वीरवार को सुबह सरकारी विज्ञप्ति तक में यह कहा गया था कि  शाम चार बजे निर्वाचन आयोग हिमाचल प्रदेश  और गुजरात विधानसभा चुनाव का ऐलान करेगा। मगर चार बजे तक गुजरात निर्वाचन आयोग की घोषणा से गायब हो चुका था। निर्वाचन आयोग ने हिमाचल प्रदेश  विधानसभा चुनाव के लिए एक दिन के मतदान की घोषणा के साथ बस इतना कहा कि गुजरात विधनसभा के चुनाव 18 दिसंबर तक करा लिए जाएंगे। इसी वजह हिमाचल प्रदेश  विधानसभा चुनाव की वोटों की गिनती 18 दिसंबर को ही की जाएगी। हिमाचल प्रदेश  और गुजरात विधानसभा की  अवधि जनवरी में समाप्त हो रही है। 2012 में निर्वाचन आयोग ने चार अक्टूबर को दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव की एक साथ घोषणा की थी। चुनाव की घोषणा होते ही तुरंत प्रभाव से आचार संहिता लागू हो जाती है। निर्वाचन आयोग द्वारा आखिरी क्षणों में गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा नहीं किए जाने के कारण राज्य में चुनाव आचार संहिता लागू नहीं होगी। इस स्थिति मे गुजरात सरकार तब तक लोक-लुभावने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है जब तक निर्वाचन आयोग चुनाव की घोषणा नही कर लेता। निष्पक्ष  और स्वतंत्र चुनाव के लिए लेवल प्लेइंग फील्ड बेहद  जरुरी है। हिमाचल में सत्ता की प्रबल दावेदार भाजपा कांग्रेस सरकार के  लोक-लुभावने फैसलों की तीखी आलोचना कर रही है और चुनाव आचार संहिता की तल्खी से प्रतीक्षा कर रही थी। गुजरात में भाजपा सरकार के लोक-लुभावने फैसलें कांग्रेस को चुभ रहे हैं और इन्हें रोकने के लिए पार्टी को चुनाव आचार संहिता की प्रतीक्षा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 16 अक्टूबर के प्रस्तावित गुजरात दौरे के  दृष्टिगत   गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा आखिरी समय रोकी गई। प्रधानमंत्री इस दौरे के दौरान गुजरात के लोगों को चुनावी सौगात दे सकते हैं। निर्वाचन आयोग के ताजा स्टैंड से “पक्षपात“ की बू आ रही है और पहली बार ऐसा लग रहा है कि निर्वाचन आयोग भी दबाव में काम करता है। अगर ऐसा है तो आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इन आरोपों में वजन है कि देश  में मतदान मशीनों  में भी गडबडी की जा सकती है। राजनीतिक दबाव में कुछ भी किया जा सकता है। आज तक निर्वाचन आयोग की  विश्वसनीयता  पर कोई आंच नहीं आई है मगर पहली बार देश  के जनमानस को भी लग रहा है कि निर्वाचन आयोग ने गुजरात संबंधी फैसला दबाव में लिया है। गुजरात विधानसभा चुनाव की घोषणा रोकने के लिए निर्वाचन आयोग के इस  स्पष्टीकरण  में कोई वजन नहीं है कि चुनाव घोषणा के बाद संबंधित राज्य में 45 दिन के भीतर मतदान कराना लाजिमी है। 2012 में निर्वाचन आयोग ने चार अक्टूबर को गुजरात और हिमाचल प्रदेश  विधानसभा चुनाव की एक साथ घोषणा की थी मगर गुजरात में साठ दिन से भी अधिक अवधि बाद 13 और 17 दिसंबर को चुनाव कराए  गए थे। वैसे हिमाचल प्रदेश  में 15 नवंबर से पहले विधानसभा चुनाव कराना निर्वाचन आयोग की सामरिक विवशता है। हिमाचल प्रदेश  के ऊंचाई वाले इलाके नवंबर में  भारी हिमपात के कारण बंद हो जाते हैं। सर्दी में विधानसभा चुनाव कराए जाने की सूरत में  विगत में इन हलकों में मई-जून में चुनाव कराए जाते थे मगर तब तक नई सरकार पदस्थ हो चुकी होती है और इसका सत्तारुढ दल को फायदा मिलता रहा है। बहरहाल, निर्वाचन आयोग की यही सामरिक विवशता हो सकती है पर अगर 2012 में 4 अक्टूबर को हिमाचल और गुजरात चुनाव घोषणा एक साथ की जा सकती है, तो 2017 में 12 अक्टूबर को क्यों नही? 

शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

किसने मारा आरुषि को ़?

अपनी  इकलौती बेटी की हत्या के लिए सीबीआई अदालत  द्वारा दोषी  ठहराए गए नोएडा के डेंटल सर्जन तलवार दंपती को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बरी कर दिया है। सीबीआई कोर्ट नेे तलवार दंपत्ति को परिस्थिति जान्य साक्ष्यों के आधार पर हत्या का दोषी  माना था।  दिल्ली से सटे नोएडा में डेंटिस्ट दंपत्ति राजेश  और नुपुर तलवार की 13 साल की बेटी आरुषि की  15 मई, 2008 की रात को बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। इस बच्ची का गला रेता गया था। एक दिन बाद नौकर हेमराज का  शव तलवार दंपत्ति के पडोसी की  छत से बरामद हुआ था। इस हत्याकांड की जांच में कई मोड आए। नोएडा पुलिस की शुरुआती जांच में नौकरों को हत्या के लिए जिम्मेदार  माना गया। फिर कहा गया पिता राजेश  तलवार ने आरुषि  और हेमराज को आपत्तिजनक हालात में देखा था, इसीलिए गुस्से में हत्या कर दी। जांच सीबीआई के सुपुर्द  की गई और केन्द्रीय जांच एजेंसी ने 30 माह बाद ठोस साक्ष्य नहीं मिलने के कारण अपनी क्लोजर रिपोर्ट  पेश  कर दी। मामला सुप्रीम कोर्ट  पहुंचा और सीबीआई को फिर से जांच के आदेश  दिए गए। और फिर सीबीआई की जांच पर  अदालत ने 2013 को  परिस्थिति जान्य साक्ष्यों  पर तलवार दंपति को अपनी बेटी की हत्या का दोषी  माना और आरुषि  के पिता राजेश  और माता नुपुर तलवार को उम्र कैद की सजा सुनाई । तब से दोनों गाजियाबाद के निकट डासना  जेल में सजा काट रहे हैं। अब  हाई कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बेटी की हत्या के आरोपों से मुक्त कर दिया है। मां-बाप के लिए अपनी संतान की हत्या के लिए दोषी ठहराए जाने से बडी सजा हो ही नहीं सकती। हाई कोर्ट  ने तलवार दंपति को भले ही हत्या के आरोप से मुक्त कर दिया हो मगर सवाल अभी भी जस का तस है कि आरुषि  और हेमराज की हत्या किसने की थी और क्यों? आरुषि  हत्याकांड ने न केवल दिल्ली-नोएडा, अलबत्ता पूरे देश  की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था। भला कोई माता-पिता अपनी इकलौती संतान का खून करने की सोच भी कैसे सकते  हैं ? आरुषि  हत्याकांड पर फिल्म तक बन चुकी है और किताबें तक लिखी जा चुकी हैं मगर ह्त्या का रहस्य आज भी बरकरार है । इस हत्याकांड  ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि सीबीआई जांच में ऐसी कोई विलक्षणता नही है जिससे  इसकी  विश्वनीयता औरों से अलग नजर आए। आरुषि  हत्याकंाड को छोड भी दें, तो भी सीबीआई अभी तक ऐसा कोई करिश्मा  नहीं दिखा पाई है। हिमाचल प्रदेश  के कोटखाई गुडिया बलात्कार एवं हत्या कांड में सीबीआई को बार-बार हाई कोर्ट  की फटकार सुननी पड रही है। तीन माह से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी सीबीआई हाई कोर्ट में स्टेट्स रिपोर्ट  तक पेश  नहीं कर पाई है। भारत में प्रॉसिक्यूशन एजेंसियों की जांच पर जब-तब सवाल उठते रहे हैं। आरुषि मामले में  जांच में भी कई खामियां थी हैं। एक किताब में इन सब का विस्तार से खुलासा किया गया है। अदालत में सीबीआई ने कहा था कि आरुषि  की हत्या पिता राजेश  ने गोल्फ स्टिक से की थी मगर यह बात बच्चा भी बता देगा कि स्टिक से गला नहीं रेता जाता। अगर राजेश  तलवार दोषी  थे, फिर मामले की क्लोजर रिपोर्ट  क्यों पेश  की गई?  सीबीआई ने 143 गवाहों की सूची पेश  की थी मगर अदालत में सिर्फ  39 ही पेश  किए। सीबीआई जांच में और भी कई खामियां हैं जिनका मुआयना करने के बाद स्पष्ट  हो जाता है कि इस ह्त्याकांड की न तो गहनता से तफ्तीश  की गई थी और न ही पूरी संजीदगी से। सीबीआई आज तक जिस तरह मामले-दर-मामले की जांच कर रही है, उससे अदालत की यह टिप्पणी सौ फीसदी सही प्रासंगिक होती है कि यह एजेंसी “पिंजरे में बंद सरकारी तोता है“। बहरहाल, देश  की अंतरात्मा को यह सवाल बराबर  कचोटता रहेगा कि 13 वर्षीय  आरुषि  को किसने मारा ?   

गुरुवार, 12 अक्टूबर 2017

“बनिया“ है सरकार

उपनिवेशवादी व्यवस्था से मुक्ति के बाद भारतीय जनमानस को स्वदेशी  सरकार से  कल्यायणकारी (वेल्फेयर स्टेट) सुशासन की उम्मीद थी मगर ऐसा नहीं हुआ। सच यह है कि ऐसा मुमकिन भी नही है। सरकार तो सरकार है, फिर चाहे वह रजवाडों की हो, फिरंगियों की या स्वदेशी । सरकार के अपने “शाही“  खर्चे होते हैं और इन्हें जनता पर कर लादकर ही पूरा किया जा सकता है। मगर वेल्फेयर स्टेट उपनिवेशवादी और रजवाडाशाही व्यवस्था से एकदम भिन्न होनी चाहिए और उसका कर ढांचा प्रगतिशील। यानी ऐसी कर व्यवस्था जिससे उत्पादन और रोजगार को बराबर बढावा मिलता रहे। भारत में कर व्यवस्था में सुधार के लिए पहले वैट का विकल्प तैयार किया गया और अब जीएसटी लागू किया गया है। जनता पर करों का बोझ कम करने और उत्पादन को बढाने के लिए इन व्यवस्थाओं को लागू किया गया। फिलहाल ऐसा कुछ भी नही हो पाया है। जीएसटी भी लागू हो चुका है और वैट अपनी जगह बरकरार है। इस दोहरी व्यवस्था से अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान पहुंचा है। ताजा आंकडों के मुताबिक अप्रैल-जून तिमाही में ग्रोथ रेट गिर कर 5.7 ही रह गया था और जुलाई-सितंबर की तिमाही में भी इसमें अप्रत्याशित इजाफे के कोई आसार नहीं है। सितंबर में खुदरा महंगाई 3.60 फीसदी को पार कर गई थी जबकि अगस्त में यह 3.36 फीसदी थी हालांकि अभी भी यह आरबीआई के चार फीसदी के मानदंड से नीचे है। आरबीआई ने खुदरा महंगाई को चार फीसदी से नीचे रखने का लक्ष्य तय कर रखा है और अपनी मौद्रिक नीति को भी इसी अनुकूल ढाला जा रहा है। अभी त्यौहारी सीजन शुरु हुआ है और दिसबंर तिमाही में महंगाई के बढने के आसार हैं। महंगे डीजल का  महंगाईको बढाने में अहम योगदान है। डीजल के दाम बढने से माल भाडा फौरन बढ जाता है और इससे चीजों के दामों में उछाल आता है। जुलाई से सितंबर के दौरान डीजल के दामों मे 5ं.50 से 6 रु प्रति लीटर का इजाफा हो चुका है। सितंबर में डीजल के दाम तीन साल के उच्च स्तर पर प थे जबकि अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल की कीमतें नरम पडी हुईं है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों के निर्धारण में केन्द्रीय आबकारी  शुल्क और राज्यों के वैट की बडी भूमिका है। कीमतों में 50 फीसदी से भी अधिक  शुल्क है और इन्हें कम करते हुए सरकार के हाथ-पांव फूल जाते हैं। देश  में हर वस्तु पर जीएसटी लागू है मगर पेट्रोल-डीजल को इससे बाहर रखा गया है ताकि केन्द्र और राज्य अपनी जेब भरती रहें। 2014 से डीजल की अंतरराष्ट्रीय  कीमतों में मात्र 2 से 3 रु का इजाफा हुआ है मगर 2015 से डीजल पारा एक्साइज  शुल्क 13.47 रु प्रति लीटर बढाया  जा चुका  है। इसी तरह वैट मे भी पिछले तीन साल में 30 फीसदी से ज्यादा इजाफा हो चुका है। जनता के तीखे मिजाज को भांपते हुए मोदी सरकार ने 4 अक्टूबर को पेट्रोल-डीजल पर आबकारी शुल्क में प्रति लीटर 2 रु की छूट देते हुए और ज्यादा राहत देने का ठीकरा राज्यों पर फोड दिया और उनसे वैट कम करने को कहा। अब तक केवल तीन राज्य भाजपा शासित गुजरात और महाराष्ट्र  और कांग्रेस  शासित हिमाचल ने पेट्रोल -डीजल पर वैट में कटौती की है। गुजरात और हिमाचल में विधानसभा चुनाव सन्निकट हैं, इसलिए इन राज्यों को ऐसा करना पडा।  इस महाराष्ट्र  को  पडोसी गुजरात के कारण   वैट कम  करना पड़ा जबकि 18 राज्यों में भाजपा की ही सरकारें हैं। बहरहाल, पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाने के बाद कींमतों में भारी गिरावट आएगी, ऐसी कोई संभावना नहीं है। न तो केन्द्र और न ही राज्य पेट्रोल-डीजल से आने वाले राजस्व में मामूली से गिरावट के लिए तैयार है। सरकार भी उसी विशुद्ध स्वदेशी  “बनिए“ की तरह है जो ग्राहकों (जनता) से ज्यादा से ज्यादा ऐंठने की मानसिकता रखता है।                       

बुधवार, 11 अक्टूबर 2017

पटाखों के बगैर भी दीपावली

दिल्ली और उसके आसपास के शहरों (एनसीआर) में दीपावली पर पटाखों की बिक्री पर  सुप्रीम कोर्ट की रोक से अधिकतर लोग नाखुश  हो सकते हैं मगर  प्रदूषण से मुक्ति के लिए यह जरुरी भी है। कोर्ट  ने दीपावली के दौरान पटाखों से फैलने वाले प्रदूषण को देखते हुए यह प्रतिबंध लगाया है। कोर्ट  ने अपनी व्यवस्था में कहा है कि वह इस बात का पता लगाना चाहता है कि पटाखों के बगैर दिल्ली और उसके आसपास के  शहरों में प्रदूषण का स्तर कितना रहता है। हर साल दीपावली के बाद दिल्ली में प्रदूषण बेहद खतरनाक स्तर को पार कर जाता है। पिछले साल दीपावली के अगले दिन दिल्ली में प्रदूषण का स्तर अन्य दिनों के मुकाबले 42 गुना ज्यादा था। 2015 में दिल्ली में दीपावली के बाद प्रदूषण  का स्तर सुरक्षित लेवल से छह गुना  ज्यादा था।  इससे दिल्ली और आसपास के शहरों के लोगों, खासकर बच्चों और बुजुर्गों, की सेहत पर बहुत बुरा असर पड रहा है। कोर्ट  के ताजा फैसले का रोचक पहलू यह है कि दीपावली के दौरान पटाखे फोडने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। लोग-बाग बाहर से पटाखे खरीदकर या पहले से खरीदे  पटाखे फोड सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने एक माह पहले 12 सितंबर को दिल्ली तथा उसके आसपास के शहरों में पटाखों की ब्रिकी पर लगा प्रतिबंध उठा दिया था। कोर्ट  के ताजा फैसले से पटाखा बिक्रेताओं की रोजी-रोटी पर बहुत बुरा असर पड सकता है। पिछले महीने प्रतिबंध के हटते ही पटाखा बिक्रेताओं ने त्योहारी सीजन के लिए पर्याप्त स्टॉक जमा कर लिया था। 12 सितंबर तक ही दिल्ली में 50 लाख टन पटाखों का स्टॉक था। प्रतिबंध हटते ही काफी ज्यादा स्टॉक जमा हो चुका है। इस स्थिति में देश  की शीर्ष  अदालत की चिंता वाजिब है। 2015 में दिल्ली के तीन बच्चों ने अपने परिजनों के जरिए बढते प्रदूषण के खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट मे याचिका दायर कर “खुली हवा में सांस लेने“ का अपना अधिकार मांगा था। देश  का संविधान बच्चों को खुली हवा में सांस लेने का अधिकार देता है मगर दिल्ली में प्रदूषण का स्तर बहुत ज्यादा है और इससे उनका यह अधिकार छीना जा रहा है। बच्चों की याचिका पर पिछले साल 11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों की ब्रिकी पर रोक लगा दी थी मगर इस साल 12 सितंबर को इसमें छूट दी गई। इस छूट के खिलाफ तीनों बच्चे फिर सुप्रीम कोर्ट  पहुंचे और सोमवार को फिर प्रतिबंध लगा दिया गया। पटाखा बिक्रेता भी कोर्ट से राहत की मांग कर सकते हैं। बहरहाल, अब समय आ गया है कि लोगों को इस बात पर विचार करना चाहिए कि सेहत ज्यादा मूल्यवान है या पटाखे फोडकर क्षण भंगुर  संतुष्टि । समय के साथ-साथ हर चीज का महत्व और प्रासंगिकता बदल जाती है। जो बातें प्राचीन भारत अथवा बैलगाडी के युग में प्रासंगिक थी, जरुरी नही है कि वे आज भी वैसी ही मह्त्वपूर्ण  हों। बढ्ती आबादी, शहरीकरण और वाहनों की संख्या ने हमारी जीवनशैली और सामयिक परिवेश  को बहुत ज्यादा बदल डाला है। समय की मांग है कि त्यौहारों पर पटाखे फोडने की रीत को छोड दिया जाए। पटाखों पर पानी की तरह पैसा बहाने की क्या जरुरत? देश  इस मामले में पहले भी पहल कर चुका है। होली पर अब जहरीले रंगों की जगह इको फ्रंडली रंगों का प्रचलन बढा है। फिर प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों से मुक्त दीपावली क्यों नही?ं़ इसके लिए तमिल नाडु के इरोड गांवों से सीख ली जा सकती है। 1996 में पक्षी विहार की स्थापना के बाद से इरोड के 8 गांव ने आज तक पटाखे नहीं फोडे ताकि हवा साफ-सुथरी रहे और पक्षियों के मुक्त आवागमन में कोई खलल न पडे। अगर तमिल नाडु के गांववाले मिसाल पेश  कर सकते हैं, तो दिल्ली और एनसीआर के लोग भी ऐसा कर सकते हैं। सिर्फ  दृढ निश्चय   और इच्छा शक्ति की दरकार है। दीपावली रोशनी से अंधकार को मिटाने का पर्व  है, प्रदूषण फैलाकर जीवन को अंधकारमय करने का जरिया नहीं है। 

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

“विकास पागल हो गया है“

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ महीनों से गुजरात पर “विकास पागल हो गया है“ हैशटैग से जबरदस्त अभियान चलाया जा रहा है। भाजपा इससे बेहद परेशान है। इससे पता चलता है कि गुजरात में भाजपा के समक्ष आने वाले विधान सभा चुनाव मेँ कितनी चुनौतियां हैं। पिछली बार सोशल मीडिया की बदौलत ही गुजरात में भाजपा को तगडे वोट मिले थे।  राज्य में चुनाव सरगरर्मियां चरम पर है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने सौराष्ट्र , दक्षिण और मध्य गुजरात और वडनगर का पिछले सप्ताहांत  में तूफानी दौरा किया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी  सौराष्ट्र  का दौरा कर चुके हैं और सोमवार को वे फिर से मध्य गुजरात के दौरे पर है। इस बार कांग्रेस प्रचार की खास बाद यह है कि अल्पसंख्यकों का  तुष्टिकरण करने  की बजाए वह सॉफ्ट  हिंदुत्त्व पर जोर दे रही है। इसी लक्ष्य से राहुल गांधी रास्ते में पडने वाले हर मंदिर जा रहे हैं। पिछले दौरे में राहुल ने द्धारका और चोटिला मंदिर में पूजा-अर्चना की थी। इस बार राहुल का फागवेल मंदिर जाने का कार्यक्रम है। नरेन्द्र मोदी ने 2002 में फागवेल मंदिर से ही अपना चुनाव प्रचार  शुरु किया था। राज्य में 22 सालों से भारतीय जनता पार्टी  सत्तारुढ  है। गुजरात में 22 सालों में पहली बार भाजपा को कांग्रेस के अलावा हार्दिक पटेल के अनामत आंदोलन और ओबीसी मंच एवं दलित नेता जिग्नेश  मेवाणी के मंच से चुनौती मिल रही है। और पहली ही बार ऐसा होगा कि विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी राज्य की सियासत और राजकाज में  शामिल नहीं है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा ने आनंदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री बनाया था मगर वे पार्टी नेतृत्व के मानदंडों पर खरी नहीं उतर पाईं। उनकी जगह विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया है मगर उनमें भी नरेन्द्र मोदी जैसा स्पार्क  नहीं है। इस बार भाजपा के समक्ष कई चुनौतियां है। अब तक भाजपा का समर्थक रहा  पटेल समुदाय हार्दिक पटेल के आंदोलन के कारण भाजपा से छिटक चुका है। राज्य में करीबी 12 फीसदी पटेलों की आबादी है और यह समुदाय कांग्रेस की ओर आकर्षित  हो रहा है। कांग्रेस ने हार्दिक पटेल के 9 समर्थकों को पार्टी टिकट देने का प्रस्ताव किया है। हार्दिक 20 सीटें मांग रहे हैं। भाजपा को सबसे ज्यादा  परेशानी अल्पेश  ठाकुर के ओबीसी मंच और दलित मंच से  हो सकती है। राज्य की 78 आबादी ओबीसी, दलित और अनूसूचित जाति की है। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि ओबीसी समुदाय पटेलों को  आरक्षण देने के सख्त खिलाफ है।  अल्पेश  ठाकुर की अगुवाई में  ओबीसी मंच का गठन भी इसी मकसद से किया गया है।  अल्पेश  ठाकुर ओबीसी, दलितों और जन जातियों को एक मंच पर लाने की भरसक कोशिश  कर रहे हैं। वे किस ओर जाएंगे, फिलहाल यह स्पष्ट  नहीं है मगर इतना तय है कि वे हार्दिक पटेल के साथ नहीं जाएंगे और अगर कांग्रेस हार्दिक से चुनावी गठजोड करती है तो  ओबीसी  भाजपा का साथ देंगे। वैसे ओबीसी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ रहे हैं। संसद के मानसून सत्र के दौरान काग्रेस और विपक्ष के भारी विरोध के बावजूद ओबीसी बिल पारित नहीं हो पाया था। इस बिल के पारित होने से नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ल्ड  क्लासिस को संवैधानिक दर्जा  मिल जाता। अब भाजपा गुजरात और हिमाचल में इस मुद्दे को उछाल कर कांग्रेस को ओबीसी विरोधी बता रही है। भाजपा की सबसे बडी चिंता बेरोजगारी को लेकर है। नोटबंदी, जीएसटी और रेरा के लागू होने से गुजरात में विकास की गति रुकी है और रोजगार के अवसर कम हुए हैं। इसी स्थिति को सामने रखकर प्रधानमंत्री ने अपने गुजरात दौरे में “इस बार दीवाली“ पहले आ गई है“ कहकर जीएसटी का उल्लेख किया। पार्टी अध्यक्ष अमित ह के पुत्र जय शाह को लेकर उठा ताजा विवाद भाजपा पर भारी पड सकता है। इस बार के विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह इतनी आसानी नहीं होगी जितनी पहले हुआ करती थी।       

रविवार, 8 अक्टूबर 2017

समय रहते सचेत जाएं

आसा राम बापू से लेकर,  गणेशनन्द थिर्थपादा उर्फ  श्री हरि, महेन्द्र गिरी, स्वामी नित्या नंद, हरियाणा के रामपाल और  सिरसा डेरे के गुरमीत राम रहीम तक सलाखों के पीछे पहुंचने के बावजूद “स्वंयभू“ बाबाओं का मायावी संसार  फैलता ही जा रहा है। भारत में  “स्वंयभू“ बाबाओं“ की घृणित और असामाजिक हरकतों का आलम यह है कि सांसारिक भोग-विलास में संलिप्त स्वंभू “गॉड“ रिश्तोँ  की मर्यादाओं तक का सम्मान नही करते हैं मगर उनके करोडों भक्त इस पर भी उनमें गहरी आस्था जताते हैं़। सिरसा डेरे के संचालक गुरमीत राम रहीम और उनकी कथित दत्तक पुत्री के बीच मर्यादाहीन संबंधो ने तो सारी हदें ही पार कर दी थीं। यह बात खुद दत्तक पुत्री के पति कह रहे हैं। पहले भी कहते थे मगर किसी ने उनकी नहीं सुनी। केरल के थिरुवनंतपुरम  में लगातार यौन शोषण से आजिज आ चुकी 23 वर्षीय  युवती द्वारा बलात्कारी  स्वामी  गणेशानन्द थिर्थपादा  का जनानांग काट कर उससे सजा देना  यौन  शोषण  की पराकाष्ठा  उजागर करता है। दिल्ली पुलिस अधिकारी की विवादित राधे मां की अनन्य भक्ति के समक्ष वर्दी और कुर्सी की मर्यादा भी फीकी पड गई। सियासी नेताओ के वरदहस्त से मायावी बाबाओं संसार खूब फलता-फूलता है। 2013 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने  संत  शोभन सरकार के कहने पर गढा हुआ सोना मिलने की आस में 19वीं शताब्दी के राव राम बख्श  सिंह के महल की खुदाई करवा डाली मगर सोना नहीं मिला। संत को सपना आया था कि महल के किसी हिस्से में सोने का खजाना दबा पडा है। इससे सरकार की खासी किरकिरी हुई थी। याद करें कुछ  समय पहले पूरे देश  को सालों से इराक में लापता 39 भारतीय युवकों के मामले में जलालत का सामना करना पडा। सरकार बार-बार कहती रही सभी 39 युवक मोसुल के निकट बंदूश  जेल में बंद है जबकि मीडिया ने वहां जाकर खुलासा किया कि जेल तो कबकि खंडहर बन चुकी है। सरकार साधन संपन्न है मगर फिर भी वस्तु स्थिति का पता नहीं लगा सकी जबकि इसके मंत्री-संतरी इन युवकों का पता लगाने कई बार इराक जा चुके थे।तमाम रुकावटों के बावजूद मीडिया ने एक बारगी में ही वस्तु स्थिति का पता लगा लिया। हरियाणा का मीडिया भी काफी पहले से सिरसा डेरे की असामाजिक गतिविधियों का भांडा फोड रहा था। इसके लिए सिरसा के एक पत्रकार को अपनी जान भी गंवानी पडी। इसके बावजूद मीडिया डरा नहीं और डेरे की समाज और कानून विरोधी हरकतों का पर्दाफाश  करता रहा।  सिरसा डेरे के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को अपनी शिष्याओं  से बलात्कार के लिए सजायाफ्ता होने के बाद अब नित नए राज-दर-राज खुल रहे है। ताजा सूचना है कि प्रवर्तन निदेशालय को सिरसा डेरे से संबंधित एक हार्ड  डिस्क मिली है। इसमें गुरमीत राम रहीम के हवाला कारोबार के प्रमाण मिले हैं। भारत में पुलिस और जांच एजेसिंयों की कार्यशैली बेहद कमजोर है और  विश्वनिययता  नाम की तो कोई चीज है ही नहीं। समूचा जांच तंत्र सियासी नेताओं की अंगुलियों पर नाचता है। यही कारण है कि “भगौडी“ हनीप्रीत इंसा न्यूज चैनल को तो मिल जाती है मगर पुलिस को नहीं। भारतीय समाज और व्यवस्था को समय रहते सचेत रहने की आदत नहीं है। हर छोटी-बडी तात्कालिक घटना के प्रति हमारी प्रतिक्रिया “सांप निकल गया, हम लाठी पीटते रह गए“ जैसी होती है। न तो पीछे देखते हैं और न ही आगे। पहले भारत को “सपेरों का देश “ माना जाता था, अब मायावी बाबाओं का। धर्मभीरु भारतीय जनमानस की “ चमत्कारों“ और दैवीय शक्ति में गहरी आस्था है।  कष्टोँ  और मुसीबतों से हताश  जनमानस  इनके निवारण के लिए “चमत्कारों“ का सहारा लेता है। केरल की युवती भी इसी चमत्कार की आस में बाबा की हवस का  शिकार बनी। आसाराम, राम पाल और गुरमीत राम रहीम की साध्वी और साधिकाएं भी इसी “चमत्कार“ की चकाचौंध में अपना सर्वस्व गंवा बैठी। आखिर यह सिला कब तक चलता रहेगा। डिजिटेलाइजेशन और ग्लोबल विलेज के जमाने में यह सब कानूनन प्रतिबंधित होना चाहिए।       





     समय रहते सचेत जाएं
आसा राम बापू से लेकर,  गणेषनन्द थिर्थपादा उर्फ  श्री हरि, महेन्द्र गिरी, स्वामी नित्या नंद, हरियाणा के रामपाल और  सिरसा डेरे के गुरमीत राम रहीम तक सलाखों के पीछे पहुंचने के बावजूद “स्वंयभू“ बाबाओं का मायावी संसार  फैलता ही जा रहा है। भारत में  “स्वंयभू“ बाबाओं“ की घृणित और असामाजिक हरकतों का आलम यह है कि सांसारिक भोग-विलास में संलिप्त स्वंभू “गॉड“ रिष्तों की मर्यादाओं तक का सम्मान नही करते हैं मगर उनके करोडों भक्त इस पर भी उनमें गहरी आस्था जताते हैं़। सिरसा डेरे के संचालक गुरमीत राम रहीम और उनकी कथित दत्तक पुत्री के बीच मर्यादाहीन संबंधो ने तो सारी हदें ही पार कर दी थीं। यह बात खुद दत्तक पुत्री के पति कह रहे हैं। पहले भी कहते थे मगर किसी ने उनकी नहीं सुनी। केरल के थिरुवनंतपुरम  में लगातार यौन षोशण से आजिज आ चुकी 23 वर्शीय युवती द्वारा बलात्कारी  स्वामी  गणेषनन्द थिर्थपादा  का जनानांग काट कर उससे सजा देना  षोशण की पराकाश्ठा उजागर करता है। दिल्ली पुलिस अधिकारी की विवादित राधे मां की अनन्य भक्ति के समक्ष वर्दी और कुर्सी की मर्यादा भी फीकी पड गई। सियासी नेताओ के वरदहस्त से मायावी बाबाओं संसार खूब फलता-फूलता है। 2013 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने  संत षोभन सरकार के कहने पर गढा हुआ सोना मिलने की आस में 19वीं षताब्दी के राव राम बख्ष सिंह के महल की खुदाई करवा डाली मगर सोना नहीं मिला। संत को सपना आया था कि महल के किसी हिस्से में सोने का खजाना दबा पडा है। इससे सरकार की खासी किरकिरी हुई थी। याद करें कुछ  समय पहले पूरे देष को सालों से इराक में लापता 39 भारतीय युवकों के मामले में जलालत का सामना करना पडा। सरकार बार-बार कहती रही सभी 39 युवक मोसुल के निकट बंदूष जेल में बंद है जबकि मीडिया ने वहां जाकर खुलासा किया कि जेल तो कबकि खंडहर बन चुकी है। सरकार साधन संपन्न है मगर फिर भी वस्तु स्थिति का पता नहीं लगा सकी जबकि इसके मंत्री-संतरी इन युवकों का पता लगाने कई बार इराक जा चुके थे। तमाम रुकावटों के बावजूद मीडिया ने एक बारगी में ही वस्तु स्थिति का पता लगा लिया। हरियाणा का मीडिया भी काफी पहले से सिरसा डेरे की असामाजिक गतिविधियों का भांडा फोड रहा था। इसके लिए सिरसा के एक पत्रकार को अपनी जान भी गंवानी पडी। इसके बावजूद मीडिया डरा नहीं और डेरे की समाज और कानून विरोधी हरकतों का पर्दाफाष करता रहा।  सिरसा डेरे के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को षिश्याओं से बलात्कार के लिए सजायाफ्ता होने के बाद अब नित नए राज-दर-राज खुल रहे है। ताजा सूचना है कि प्रवर्तन निदेषालय को सिरसा डेरे से संबंधित एक हार्ड  डिस्क मिली है। इसमें गुरमीत राम रहीम के हवाला कारोबार के प्रमाण मिले हैं। भारत में पुलिस और जांच एजेसिंयों की कार्यषैली बेहद कमजोर है और विष्वनीयता नाम की तो कोई चीज है ही नहीं। समूचा जांच तंत्र सियासी नेताओं की अंगुलियों पर नाचता है। यही कारण है कि “भगौडी“ हनीप्रीत इंसा न्यूज चैनल को तो मिल जाती है मगर पुलिस को नहीं। भारतीय समाज और व्यवस्था को समय रहते सचेत रहने की आदत नहीं है। हर छोटी-बडी तात्कालिक घटना के प्रति हमारी प्रतिक्रिया “सांप निकल गया, हम लाठी पीटते रह गए“ जैसी होती है। न तो पीछे देखते हैं और न ही आगे। पहले भारत को “सपेरों का देष“ माना जाता था, अब मायावी बाबाओं का। धर्मभीरु भारतीय जनमानस की “ चमत्कारों“ और दैवीय षक्ति में गहरी आस्था है।  कश्टों और मुसीबतों से हताष जनमानस  इनके निवारण के लिए “चमत्कारों“ का सहारा लेता है। केरल की युवती भी इसी चमत्कार की आस में बाबा की हवस का षिकार बनी। आसाराम, राम पाल और गुरमीत राम रहीम की साध्वी और साधिकाएं भी इसी “चमत्कार“ की चकाचौंध में अपना सर्वस्व गंवा बैठी। आखिर यह सिला कब तक चलता रहेगा। डिजिटेलाइजेषन और ग्लोबल विलेज के जमाने में यह सब कानूनन प्रतिबंधित होना चाहिए।         







     समय रहते सचेत जाएं
आसा राम बापू से लेकर,  गणेषनन्द थिर्थपादा उर्फ  श्री हरि, महेन्द्र गिरी, स्वामी नित्या नंद, हरियाणा के रामपाल और  सिरसा डेरे के गुरमीत राम रहीम तक सलाखों के पीछे पहुंचने के बावजूद “स्वंयभू“ बाबाओं का मायावी संसार  फैलता ही जा रहा है। भारत में  “स्वंयभू“ बाबाओं“ की घृणित और असामाजिक हरकतों का आलम यह है कि सांसारिक भोग-विलास में संलिप्त स्वंभू “गॉड“ रिष्तों की मर्यादाओं तक का सम्मान नही करते हैं मगर उनके करोडों भक्त इस पर भी उनमें गहरी आस्था जताते हैं़। सिरसा डेरे के संचालक गुरमीत राम रहीम और उनकी कथित दत्तक पुत्री के बीच मर्यादाहीन संबंधो ने तो सारी हदें ही पार कर दी थीं। यह बात खुद दत्तक पुत्री के पति कह रहे हैं। पहले भी कहते थे मगर किसी ने उनकी नहीं सुनी। केरल के थिरुवनंतपुरम  में लगातार यौन षोशण से आजिज आ चुकी 23 वर्शीय युवती द्वारा बलात्कारी  स्वामी  गणेषनन्द थिर्थपादा  का जनानांग काट कर उससे सजा देना  षोशण की पराकाश्ठा उजागर करता है। दिल्ली पुलिस अधिकारी की विवादित राधे मां की अनन्य भक्ति के समक्ष वर्दी और कुर्सी की मर्यादा भी फीकी पड गई। सियासी नेताओ के वरदहस्त से मायावी बाबाओं संसार खूब फलता-फूलता है। 2013 में तत्कालीन संप्रग सरकार ने  संत षोभन सरकार के कहने पर गढा हुआ सोना मिलने की आस में 19वीं षताब्दी के राव राम बख्ष सिंह के महल की खुदाई करवा डाली मगर सोना नहीं मिला। संत को सपना आया था कि महल के किसी हिस्से में सोने का खजाना दबा पडा है। इससे सरकार की खासी किरकिरी हुई थी। याद करें कुछ  समय पहले पूरे देष को सालों से इराक में लापता 39 भारतीय युवकों के मामले में जलालत का सामना करना पडा। सरकार बार-बार कहती रही सभी 39 युवक मोसुल के निकट बंदूष जेल में बंद है जबकि मीडिया ने वहां जाकर खुलासा किया कि जेल तो कबकि खंडहर बन चुकी है। सरकार साधन संपन्न है मगर फिर भी वस्तु स्थिति का पता नहीं लगा सकी जबकि इसके मंत्री-संतरी इन युवकों का पता लगाने कई बार इराक जा चुके थे। तमाम रुकावटों के बावजूद मीडिया ने एक बारगी में ही वस्तु स्थिति का पता लगा लिया। हरियाणा का मीडिया भी काफी पहले से सिरसा डेरे की असामाजिक गतिविधियों का भांडा फोड रहा था। इसके लिए सिरसा के एक पत्रकार को अपनी जान भी गंवानी पडी। इसके बावजूद मीडिया डरा नहीं और डेरे की समाज और कानून विरोधी हरकतों का पर्दाफाष करता रहा।  सिरसा डेरे के प्रमुख गुरमीत राम रहीम को षिश्याओं से बलात्कार के लिए सजायाफ्ता होने के बाद अब नित नए राज-दर-राज खुल रहे है। ताजा सूचना है कि प्रवर्तन निदेषालय को सिरसा डेरे से संबंधित एक हार्ड  डिस्क मिली है। इसमें गुरमीत राम रहीम के हवाला कारोबार के प्रमाण मिले हैं। भारत में पुलिस और जांच एजेसिंयों की कार्यषैली बेहद कमजोर है और विष्वनीयता नाम की तो कोई चीज है ही नहीं। समूचा जांच तंत्र सियासी नेताओं की अंगुलियों पर नाचता है। यही कारण है कि “भगौडी“ हनीप्रीत इंसा न्यूज चैनल को तो मिल जाती है मगर पुलिस को नहीं। भारतीय समाज और व्यवस्था को समय रहते सचेत रहने की आदत नहीं है। हर छोटी-बडी तात्कालिक घटना के प्रति हमारी प्रतिक्रिया “सांप निकल गया, हम लाठी पीटते रह गए“ जैसी होती है। न तो पीछे देखते हैं और न ही आगे। पहले भारत को “सपेरों का देष“ माना जाता था, अब मायावी बाबाओं का। धर्मभीरु भारतीय जनमानस की “ चमत्कारों“ और दैवीय षक्ति में गहरी आस्था है।  कश्टों और मुसीबतों से हताष जनमानस  इनके निवारण के लिए “चमत्कारों“ का सहारा लेता है। केरल की युवती भी इसी चमत्कार की आस में बाबा की हवस का षिकार बनी। आसाराम, राम पाल और गुरमीत राम रहीम की साध्वी और साधिकाएं भी इसी “चमत्कार“ की चकाचौंध में अपना सर्वस्व गंवा बैठी। आखिर यह सिला कब तक चलता रहेगा। डिजिटेलाइजेषन और ग्लोबल विलेज के जमाने में यह सब कानूनन प्रतिबंधित होना चाहिए।         











शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

Is PM Modi Leading India's Second Worst Govt?

तमाम चिंताओं और आलोचना के बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को बुधवार को अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत पर देश वासियों को आश्वस्त  क्यों   करना पडा ? और उनके स्पष्टीकरण से क्या राष्ट्र  वास्तव  में आश्वस्त हुआ है ।  प्रधानमंत्री ने आलोचकों को करारा जबाव देते हुए इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती पहली बार नहीं आई है। इससे पहले कई बार ऐसा हो चुका है मगर कुछ लोग हैं जिन्हें रात को तब तक चैन की नींद नहीं आती, जब तक वे निराशाजनक बातें न कर लें। प्रधानमंत्री का इशारा पार्टी के भीतर और बाहर उन लोगों की ओर था, जो अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के लिए नोटबंदी और जीएसटी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने माना है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में गिरावट आई है मगर स्थिति नियंत्रण में है। आंकडों के जरिए प्रधानमंत्री ने देश  को भरोसा दिलाने की कोशिश  की कि नोटबंदी के बाद जीडीपी और नगदी का अनुपात 9 फीसदी तक पहुंच गया है। यह इस बात का संकेत है कि सिस्टम में पर्याप्त नगदी है और सतत निवेश  हो रहा है। निवेश  होता रहे तो रोजगार के अवसर बढते हैं। सुस्ती का सबसे ज्यादा असर रोजगार पर पडता है। रोजगार में अगर गिरावट आती है तो आय कम होती है और इससे मांग घटती है। मांग कम होने से विकास दर गिरती है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा है कि इस समय निवेश  उच्च स्तर पर है  और सरकार का राजस्व घाटा नियंत्रण में है। तथापि, इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि पहले नोटबंदी और अब  जीएसटी के कारण  अर्थव्यवस्था में चिंताजनक गिरावट आई है और इसी वजह पार्टी के भीतर भी इसकी सुगबुगाहट  शुरु हो गई है। सबसे पहले भाजपा के वरिष्ठ  नेता डाक्टर सुब्रमण्यम स्वामी अर्थव्यवस्था की स्थिति पर चिंता जाहिर कर चुके हैं़। फिर पूर्व वित्त मंत्री एवं पार्टी के वयोवृद्ध नेता यशवंत सिन्हा ने विस्तृत लेख में अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर गहरी चिंता जाहिर की है। और दो दिन पहले पूर्व  केन्द्रीय मंत्री अरुण शौरी र ने नोटबंदी को “अब तक की सबसे बडी मनी लॉड्रिंग स्कीम“ बताया है। इससे पहले कि नोटबंदी और जीएसटी को लेकर देश  में आर्थिक और राजनीतिक संकट खडा हो जाए, प्रधानमंत्री को इन फैसलों  का खुलकर बचाव करना पडा। मगर सच्चाई ज्यादा देर तक छिप नहीं सकती। नोटबंदी और जीएसटी से अर्थववस्था को खासा नुकसान हुआ है, इसे नकारा नहीं जा सकता। अभी तक अर्थव्यवस्था की हालत पर जो भी आंकडे आ रहे हैं, वे संगठित क्षेत्र के हैं और इससे पूरी तस्वीर स्पष्ट  नहीं  होती है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 45 फीसदी हिस्सेदारी  असंगठित क्षेत्र की है और अगर इसमें गिरावट आती है, तो जीडीपी के ग्रोथ खासी प्रभावित होती है । नोटबंदी पर सरकारी क्षेत्र के सबसे बडे  स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब, हरियाणा एवं दिल्ली (पीएचडी) चैंबर ऑफ कामर्स और ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरिग एसोसिएशन  के सर्वेक्षणों में नोटबंदी से 60 से 80 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया गया था। इस गिरावट में ऐसे कई कारक हैं, जिनका दीर्घकालीन असर होता है। इन हालत में जीडीपी की वृद्धि में गिरावट आना तय है। 2017 की पहली तिमाही अप्रैल-जून के दौरान भारत की विकास दर तीन साल के न्यूनतम मात्र 5.7 फीसदी  थी।  इसीलिए अधिकतर अंतरराष्ट्रीय  संस्थाएं भी भारत की जीडीपी में  अप्रत्याशित  गिरावट की संभावनाएं जता रही हैं। अंतरराष्ट्रीय  रेटिंग एजेंसी फिंच ने इस साल की विकास दर को 7.4 से घटाकर 6.9 फीसदी कर दी है। लेकिन इस रेटिंग एजेंसी का यह भी कहना है कि नोटबंदी और जीएसटी का नकारात्मक प्रभाव जल्द ही लुप्त हो जाएगा। सबसे ज्यादा चिंता मंहगाई दर को लेकर है। महंगाई के मौजूदा आंकडों में सर्विस सेक्टर को  शामिल नहीं किया जाता है जबकि सबसे ज्यादा असर इसी सेक्टर पर पडता है। इस स्थिति के  मद्देनजर   मंहगाई दर भी कमतर आंकी गई है जबकि यह 6 फीसदी से ज्यादा हो सकती है। संक्षेप में अगर जीडीपी की ग्रोथ कम हो और मंहगाई बढ रही हो, तो आम आदमी का परेशान होना तय है। 

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

भारत के लिए खतरनाक वन बेल्ट, वन रोड

अमेरिका ने चीन के महत्वाकांक्षी “वन वेल्ट, वन रोड“ पर भारत की चिंताओं को साझा करते हुए इसका मुखर विरोध करके नई दिल्ली का पक्ष मजबूत किया है। अमेरिका के रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने माना है कि  चीन का “वन वेल्ट, वन रोड-ओबोर“ (इकनॉमिक कॉरिडर) विवादित  गिलगित-बल्तिस्तान से गुजरता है और किसी को भी किसी मुल्क की संप्रभुता में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पिछले सप्ताह भारत की यात्रा पर थे । ट्रंप प्रशासन के दौरान यह केबिनेट स्तरीय पहला दौरा था। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से सामरिक मुद्दों पर विस्तृत चर्चा  की। चर्चा  के दौरान चीन-पाकिस्तान  आर्थिक गलियारे  (इकनॉमिक कॉरिडर)  का मुददा भी उठा। भारत के साथ-साथ  “वन वेल्ट, वन रोड“ अमेरिका के लिए ज्यादा खतरनाक है।  “वन वेल्ट, वन रोड“ के माध्यम से चीन अपने  महाद्धीपीय (कॉन्टिनेंटल) और समुद्री (मैरीटाइम) हितों को सुरक्षित  कर यूरोएशिया में अपनी उपस्थिति बढाना चाहता है ताकि इस क्षेत्र के अपार प्राकृतिक साधनों का दोहण किया जा सके। अमेरिका को यह स्थिति कतई स्वीकार नहीं है और चीन की यूरोएशिया में उपस्थिति अमेरिकी हितों पर प्रहार कर सकती है। दक्षिण चीन सागर में बीजिंग पहले ही अमेरिका के सामने दीवार बनकर खडा है। अमेरिका, फिलीपींस, विएतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, बू्रनेई और ताइवान के भारी विरोध के बावजूद  चीन इस क्षेत्र पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कर चुका है और अमेरिका को कडी चुनौती दे रहा है।   दक्षिण चीन सागर के रास्ते हर साल 5 खरब यूएस डॉलर का कारोबार होता है। चीन इस पर नियंत्रण चाहता है जबकि अमेरिका समेत दुनिया के अधिकतर देश  इसे व्यापार के लिए मुक्त क्षेत्र बनाना चाहते है। इसी मकसद से अक्सर अमेरिका और अन्य देश  यहां स्वतंत्र नेविगेशन ऑपरेशन भी चलाते हैं। अपनी विस्तारवादी भूख को मिटाने के लिए चीन ने 2014 में  “वन वेल्ट, वन रोड“ प्रोजेक्ट को शुरु किया था। इस परियोजना के तहत चीन अगले कुछ सालों में 68 देशों  में इंफरास्ट्रक्चर  विकसित करने पर तीन खरब डालर का निवेश  करेगा। मूलतः इस  महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट  का मकसद पुराने जमाने के सिल्क रुट को पुर्नजीवित करना है। चीन में 220 से 280 एडी के  हान साम्राज्य को स्वर्णिम माना जाता है। हान साम्राज्य के दौरान सेंट्रल और साउथ एशिया  के कारंवा मार्गों से चीन का व्यापार अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप तक दूर-दूर तक फैला हुआ था। चीन-पाकिस्तान  इकनॉमिक कॉरिडर भी इसी का हिस्सा है। इस साल मई में चीन ने भारत को भी इस कॉरिडर में शामिल होने  का न्यौता दिया था मगर भारत ने इसे अस्वीकार कर दिया। भारत ने  शुरु से  इस आर्थिक गलियारे का मुखर विरोध किया है। यह गलियारा  कश्मीर  के विवादित गिलगित-बल्तिस्तान क्षेत्र से गुजरता है और भारत का इस क्षेत्र पर पुख्ता दावा है।  यह क्षेत्र कश्मीर  का अंतरंग हिस्सा है। आजादी से पहले  गिलगित-बल्तिस्तान कश्मीर  रियासत में हुआ करता था मगर 1948 में रियासतों के विलय के समय पाकिस्तान ने धोखे से इसे हथिया लिया था। भारत-चीन युद्ध के फौरन बाद 1963 में   पाकिस्तान ने  गिलगित-बल्तिस्तान का लगभग 5000 से 8000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को भेंट कर दिया था।  यह क्षेत्र मूलतः शिया  बहुल है मगर 1970 में पाकिस्तान द्वारा सुन्नी मुसलमानों को इस क्षेत्र में स्थाई तौर पर बसाने के बाद से  गिलगित-बल्तिस्तान का डेमोग्राफिक स्वरुप ही बदल गया  है। पूरी दुनिया को लगता है कि  कश्मीर  समस्या भारत अधिकृत क्षेत्र तक सीमित है और गिलगित-बल्तिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा है। चीन को दिया गया क्षेत्र भी विवादित है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बनने के बाद भारत का दावा और कमजोर हो सकता है। चीन के वन बेल्ट, वन रोड की काट के लिए हालांकि भारत ने जापान के साथ हाथ मिलाकर अलग से “ सिल्क रुट“ बनाने की तैयारी कर रहा है मगर इससे चीन की विस्तारवादी नीति को ज्यादा फर्क  नहीं पडेगा। हां, अमेरिका का ताजा स्टैंड चीन पर दबाव डालने के लिए भारत की हौसला अफजाई जरुर है।

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

कनाडा फतेह

सिखों ने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन किया है। पंजाब के बरनाला से संबंधित 38-वर्षीय  दस्तारधारी जगमीत सिंह ने कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी (एनडीपी) का अध्यक्ष चुने जाने पर इतिहास में नया अध्याय लिखा है। श्वेत  आबादी बहुल वाले कनाडा में, किसी अश्वेत  और वह भी अल्पसंख्यक सिख का प्रमुख सियासी पार्टी का अध्यक्ष चुना जाना वाकई ही बहुत बडी उपलब्धि है। रविवार को सपन्न हुए चुनाव में जगमीत सिंह को सबसे अधिक 54 फीसदी वोट मिले जबकि उनकी तीन अन्य प्रतिद्धंद्धी उनसे काफी पीछे थे। वे टॉम मुलकैर का स्थान लेंगे।  2012 के चुनाव में मुलकैर को भी इतने वोट नहीं मिले थे, जितने इस बार जगमीत सिंह को मिले हैं। जगमीत सिंह को पंजाब के चरमपंथियों का समर्थक माना जाता है, इसलिए 2013 में संप्रग सरकार ने उन्हें भारत आने के लिए वीजा तक नहीं दिया था। 1984 के सिख दंगों पर जगमीत सिंह कनाडा की संसद में भारत सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव  लाए थे। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार इस पर उनसे नाराज थी। इसके बाद भी जगमीत ने सिख दंगों पर भारत सरकार के खिलाफ आग उगलने वाले बयान जारी रखे। जगमीत सिंह 2019 के संसदीय चुनाव में एनडीपी का नेतृत्व करेंगे और पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। कनाडा के सियासी इतिहास में पहली बार  भारतीय मूल का सिख  किसी प्रमुख पार्टी का  प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होगा।   न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी  कनाडा की तीसरी सबसे बडी पार्टी है।  338 सदस्यीय फेडेरल संसद में एनडीपी के 44 सांसद हैं। 1961 में कनैडियम लेबर कांग्रेस और कॉओपरेटिव कॉमनवैल्थ फेडेरेशन के विलय पर एनडीपी अस्तित्व में आई थी। 2003 से 2011 तक जैक लेटन के नेतृत्व में एनडीपी का स्वर्णिम समय माना जाता है। 2011 के चुनाव में पार्टी ने सबसे ज्यादा 103 सीटें जीतकर संसद में अधिकृत विपक्ष का दर्जा  हासिल किया था।  अलबर्टा और ब्रिटिश  कोलंबिया प्रातों में अभी एनडीपी की सरकार है। इससे पहले ओन्टरियो, नोवा स्कोटिया, मैनिटोबा और सस्केचेवान प्रांतों में भी एनडीपी की सरकारें पदस्थ रह चुकी हैं। 2004 और 2011 के दौरान एनडीपी ने अल्पमत की लिबरल एवं कंजरवेटिव सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। श्वेत  आबादी बहुल होने के बावजूद कनाडा मूलतः बहु-नसलीय देश  है और नस्ली आबादी की चुनाव में निर्णायक भूमिका रहती है। पार्टी अध्यक्ष पद के चुनाव में जगमीत सिंह को युवाओं और एथेनिक मतदाताओं का खासा समर्थन मिला है। तथापि, जगमीत सिंह के प्रधानंमंत्री बनने की राह में कई अवरोध खडे हैं। 2011 में  लोकप्रिय नेता  जैक लेटन के निधन के बाद से एनडीपी का ग्राफ काफी गिरा है। पार्टी को लोकप्रियता शीर्ष   पर ले जाना उनकी सबसे बडी चुनौती है। जगमीत अभी फेडेरल पार्लियामेंट के सदस्य भी नहीं है और उन्हें संसद में प्रवेश  के लिए चुनाव भी लडना पडेगा। जगमीत सिंह युवा और नस्लीय मतदाताओं में काफी लोकप्रिय हैं। 2015 के संसदीय चुनाव मे प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल पार्टी की जीत में युवाओं और एथैनिक मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। 2019 के संसदीय चुनाव में ट्रूडो की लिबरल पार्टी के अलावा कंजरवेटिव और एनडीपी को सत्ता का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है।  प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की लिबरल  मध्यमार्गी पार्टी (लेफ्ट ऑफ सेंटर) है और कंजरवेटिव दक्षिणपंथी। जगमीत सिंह की  एनडीपी को वाम मध्यमार्गी माना जाता है। कनाडा की लगभग 21 फीसदी आबादी बाहरी है। करीब 30 फीसदी युवा हैं। 80 फीसदी आबादी श्वेत  है और यह संख्या अमेरिका से कहीं ज्यादा है। मगर अमेरिका से एकदम अलग कनाडा के लोग श्वेत  और अश्वेत  में भेदभाव नहीं करते और बहु-नस्लीय समाज में गहरी आस्था रखते हैं। अगस्त माह में किए गए एक अध्ययन के अनुसार अमेरिका के 41 फीसदी की तुलना में कनाडा के 21 फीसदी लोग ही अपनी  श्वेत   नस्ल का दंभ भरते हैं। जगमीत सिंह के लिए यह सुखद खबर है। इससे उनकी प्रधानमंत्री पद की राह आसान हो सकती है।   

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

Where Is Clean India

आजादी के सात दशक बाद भी भारत  का खुले में  शौच -मुक्त न होना वाकई ही दुखद है। देश  के लिए यह सौभाग्य की बात है कि प्रधानमंत्री ने स्वच्छता मिशन को घर-घर पहुंचाने का बीडा उठाया है। 2014 में प्रधानमंत्री का पदभार ग्रहण करने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गांधी जयंती पर “स्वच्छ भारत“ मिशन का शुभारंभ किया था। तीन साल बाद 2017 में इसके सुखद परिणाम देखे जा सकते हैं। इन तीन साल में देश  को भले ही पूरी तरह से “ खुले में शौच -मुक्त“ की समस्या से निजात नहीं मिल पाई है, मगर अवाम की सोच में बडा बदलाव जरुर आया है। खासकर, महिलाओं में इसके प्रति जागरुकता और इसे सफल बनाने का दृढ निश्चय   पनपा है। इसीलिए, देश  में आए दिन किसी युवती द्वारा शौचालयरहित परिवार में ब्याह न करने, शादी  के लिए घर में शौचालय बनाने की  शर्त  रखने के समाचार सुनने को मिल रहे हैं। दो दिन पहले बिहार में एक विवाहिता द्वारा शौचालय के लिए अपने ससुर को थाने में घसीटने का समाचार प्रकाशित हुआ था । इससे पता चलता है कि देश  को स्वच्छ रखने के प्रति लोगों की सोच में अब कितना बदलाव आया है। मगर अभी  काफी  कुछ करना बाकी है । स्वच्छता मिशन के तीन साल पूरे होने पर सोमवार को प्रधानमंत्री ने कहा  “हजार गांधी, लाख मोदी और मुख्यमंत्री“ भी भारत को तब तक खुले में शौच   मुक्त नहीं कर सकते जब तक  125 करोड भारतवासी खुद इसका बीडा न उठा लें। देश  को एकदम चका-चक  स्वच्छ बनाने के लिए हर देशवासी को अपनी सोच बदलनी होगी और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या बनाना होगा। इसके लिए हमें विदेशियों से सीखने की भी जरुरत है। क्या कभी किसी सभ्य समाज  अथवा विकसित मुल्कों के  नागरिक को सडक पर केले का छिलका, वेस्ट या गंदगी फेंकते देखा है? स्वच्छता के प्रति  पश्चिम  के लोग इतने सजग और संजीदा होते हैं कि वेस्ट फेंकने के लिए सडक पर दूर तक कूडादान (डस्टबिन) की तलाश  करेंगे और  कूडा इसमें ही डालेंगे। बीबीसी की एक रिपोर्ट  में कहा गया है  कि भारत की 49.8 फीसदी आबादी खुले में शौच  करती है। केवल  46.9 फीसदी आबादी के पास शौचाालय की सुविधा और मात्र  3.2 फीसदी लोग ही पब्लिक  शौचालय का इस्तेमाल करते हैं। भारत में लोगो के पास मोबाइल है मगर शौचालय सुविधा नहीं। यह स्थिति बेहद दुखद है।  स्वच्छता प्रगति और स्मृद्धि का प्रतीक है और स्वच्छता को अपनी दिनचर्या नहीं बनाने वाला समाज और उसके घटक प्रगति के बावजूद पिछडे ही माने जाएंगे। भारत में आज भी यह सोच व्याप्त है कि साफ-सफाई  किसी और की जिम्मेदारी है। घर के भीतर “मां“ की और घर के बाहर सफाई कर्मियों की। बीच सडक थूकना अथवा गंद्गी फेंकना, अपने घर की गंदगी को बाहर नाली अथवा सडक पर फेंक देना और  खुले में सोच करना तो जैसे भारत में हर नागरिक का जन्म   सिद्ध अधिकार है। इसी मानसिकता को दूर करने के लिए  राष्ट्रपिता   महात्मा गांधी ने “स्वच्छता को अपनी दिनचर्या का अहम हिस्सा बना रखा था। वे और उनके सहयोगी खुद अपने शौचालय की साफ-सफाई करते और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा देते। साफ-सफाई के लिए दूसरों पर आश्रित रहना सभ्य समाज की मान्यताओं के खिलाफ है। गांधी जी का मानना था कि भारत में  आंचलिक क्षेत्रों में ही नहीं, अलबता शहरी क्षेत्रों की मलीन और संकरी बस्तियों को भी स्वच्छ रखना निहायत अरुरी है। घर-बार, आस-पडोस स्वच्छ रहेगा तो देष भी सेहतमंद और रोग मुक्त रहेगा। दुनिया में आधे से ज्यादा रोगों के लिए गंदगी और इसमें पलने-बढने वाले मच्छर जिम्मेदार है।  आजादी के सात दशक बाद भी देश  से गंदगी  जनित रोगों का उन्मूलन नहीं किया जा सका है, जबकि सरकार इनके उन्मूलन पर अरबों रुपए खर्च  कर चुकी है। प्रधानमंत्री मोदी स्वच्छता के प्रति लोगों की सोच में बदलाव लाने के लिए काबिलेतारीफ हैं। मगर उनका यह मिशन तभी पूरा होगा जब देश  का हर नागरिक स्वच्छता अपनी दिन-चर्या  का अहम हिस्सा बनाए।

सोमवार, 2 अक्टूबर 2017

भेडिया आया,,,,,,

पुरान जमाने में बच्चों को अक्सर ”भेडिया आया,,,, भेडिया आया” की कहानी सुनाई जाती थी। इस कहानी का निचोड था कि एक गडरिया कैसे अक्सर भेडिया आया,,,  चिल्ला-चिल्ला कर  गांव के लोगों को मूर्ख  बनाया करता था। मगर जिस दिन वास्तव में भेडिया आया और गडरिया  उसी अंदाज में मदद के लिए चिल्लाया, कोई भी यह सोच कर उसकी मदद करने नहीं आया कि हमेशा   की तरह इस बार भी वह लोगों को मूर्ख बनाया रहा है। कोरियाई प्रायद्धीप में “ अमेरिका और उत्तर कोरिया“ के बीच जारी “ युद्ध की सनक“ भी ”भेडिया आया” कहानी की तरह लगती है।  उत्तर कोरिया मिसाइलें दागने से बाज नहीं आ रहा है और बडी ताकतें   प्योंगयांग  को धमकाने से। इस साल फरवरी से अब तक  उत्तर कोरिया 22 मिसाइलें दाग चुका है और 15 परमाणु परीक्षण कर चुका है। जुलाई के पहले सप्ताह उत्तर कोरिया ने पहली बार इंटरकॉटिनेन्टल बैलिस्टिक मिसाइल का सफल परीक्षण भी किया था।  यह सिला लंबे समय से जारी है। हर मिसाइल  परीक्षण के बाद अमेरिका उत्तर कोरिया को धमकाता है और युद्धकी धमकी दी जाती है। पूरी दुनिया इस जमीनी सच्चाई को जानती है इस बार परंपरागत युद्ध की जगह परमाणु हथियारों का इस्तेमाल होगा और इस तरह का युद्ध पूरी दुनिया में भारी तबाही ला सकता है। अमेरिका कितना भी ताकतवर क्यों न हो, वह भी परमाणु हथियारों की जद से बच नहीं सकता। अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच युद्ध ं कोरियाई प्रायद्धीप (दक्षिण कोरिया, जापान) तक ही सीमित नहीं रहेगा। चीन और रुस भी इसमें  शामिल हो सकते हैं।  रुस ने आज तक युद्ध में हमशा   अमेरिकी हमले से पीडित का साथ दिया है। सीरिया में असली लडाई  राष्ट्रपति  बसद अल-असाद और बागियों के बीच नहीं,  अलबत्ता अमेरिका और रुस के मध्य है। चीन की उत्तर कोरिया से सुरक्षा संधि है। इसके तहत  उत्तर कोरिया पर अगर कोई भी देश  पहले आक्रमण करता है तो चीन हर हाल  में उसका साथ देगा। चीन और उत्तर कोरिया को भाई-भाई माना जाता है। द्धितीय विश्व  युद्ध के बाद जब कोरिया जापान के उपनिवेशवाद से आजाद हुआ था तो यह दो भागों में बंट गया था। दक्षिण पर अमेरिकी सेनाओं का कब्जा था, इसलिए वह उसके साथ हो लिया। उत्तर कोरिया के पहले नेता किम इल सुंग चीन में पैदा हुए थे, वहीं पले-पढे और धारा प्रवाह चीनी भाषा  बोलते थे। उन्होने  चीन को चुना और साम्यवाद का रास्ता अपनाया। तथापि चीन और उत्तर कोरिया के मौजूदा  शासक किम जोंग उन के बीच वैसे मधुर रिश्ते  नहीं है, जैसे उनके दादा के समय में हुआ करते थे। किम जोंग उन को आज  तक चीन आने का न्यौता तक नहीं दिया गया है। चीन किम जोंग उन से इस बात के लिए भी नाराज है कि बार-बार मना करने के बावजूद  उत्तर कोरिया  परमाणु  परीक्षण से बाज नहीं आ रहा है। इसीलिए चीन ने अब संजीदगी से संयुक्त राष्ट्र  द्वारा लगाए प्रतिबंध लगाने शुरु कर दिए हैं। पिछले सप्ताह चीन ने उत्तर कोरिया को  निर्यात की जा रही ऑयल सप्लाई रोक दी थी और वीरवार को चीन ने प्योंगयंाग से बिजनेस करने पर प्रतिबंध लगा दिया। उत्तर कोरिया का 90 फीसदी कारोबार चीन से किया जाता है। इन प्रतिबंधों से चीन  किम जोंग उन को नकेल डालना चाहता है। मगर इस बार मुकाबला दो “सनकी“ शासकों के बीच है। सनकी कुछ भी कर सकते हैं। पर्यावरण  विशेषज्ञों  का आकलन है कि  युद्ध में परमाणू  हथियारों के इस्तेमाल से धरती के तापमान में 10 डिग्री सेल्सियस अथवा 18 डिग्री फॉरेनहाइट की गिरावट आ सकती है। इससे यूरोप और अमेरिका और अधिक ठंडा हो जाएगा और मौजूदा चक्री फसलों पर इसका बहुत बुरा असर पडेगा। परमाणु युद्ध के और भी घातक परिणाम होंगें जिनकी कल्पना तक नहीं की जा सकती।  भेडिया कब आएगा, और आएगा भी या नहीं,  यह देखना अभी बाकी है।   

पाकिस्तान का नया पैंतरा

पाकिस्तान को अब याद आया है कि “ आतंक की आग से खेलते-खेलते वह खुद भी बुरी तरह से जल चुका है“ और अब आतंकी उसके गले में लिपटा वह सांप है जो उसे ही डस रहा है।  पाकिस्तान के विदेश   मंत्री ख्वाजा आसिफ ने माना है कि जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकी संगठन अब मुल्क के लिए बोझ बन गए हैं और इनसे मुल्क पीछा छुडाना चाहते हैं। न्यूयार्क में एशिया सोसायटी के एक कार्यक्रम में आसिफ ने कहा कि “पाकिस्तान में ऐसे लोग हैं जो मुल्क और क्षेत्र के लिए संकट बन सकते हैं। ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तान में आतंकी संगठनों के फलने-फूलने के लिए अमेरिका को दोषी  ठहराया है। अमेरिका पर पलटवार करते हुए पाकिस्तान के विदेश  मंत्री ने स्मरण कराया कि अस्सी के दशक में सोवियत संघ के खिलाफ अमेरिका ने पाकिस्तान का जमकर इस्तेमाल किया था। और तब पाकिस्तान के आतंकी अमेरिका के हीरो हुआ करते थे । उन्हें व्हाईट हाउस  में खिलाया-पिलाया जाता था। इस स्थिति में  लश्कर  -ए-तैयबा, हक्कानी नेटवर्क  और जमात-उद-दावा जैसे आतंकी संगठनों के लिए पाकिस्तान के अकेले दोषी  नहीं माना जा सकता। संक्षेप में पाकिस्तान के विदेश  मंत्री के कहने का तात्पर्य यह है कि पाकिस्तान में अस्सी के दशक से आतंकी संगठनों को पाला-पोसा जा रहा है।  पाकिस्तान में चार साल बाद पहली बार विदेश  मंत्री बनाया गया है। नवाज  शरीफ की सरकार में कोई फुल टाइम विदेश  मंत्री नहीं था। शरीफ के उत्तराधिकारी  शाहिद खाकन अब्बासी द्वारा ख्वाजा आसिफ को विदेश  मंत्री बनाकर विदेश  नीति को और कारगर और सशक्त बनाया जा रहा है। आतंक के मामले में विदेशों  में पाकिस्तान की जो फजीहत हो रही है, पाकिस्तान उसमें सुधार लाना चाहता है। संयुक्त  राष्ट्र  संघ  में पाकिस्तान द्वारा  कश्मीरी  महिला की जगह गाजा पट्टी की महिला दिखाए जाने और भारत की विदेश  मंत्री सुशमा स्वराज द्वारा आतंक पर आईना दिखाए जाने से इस्लामाबाद की खासी भद्द हो चुकी है। इन सब बातों के  मद्देनजर   ही पाकिस्तान के विदेश  मंत्री अब आतंकियों के लिए अमेरिका पर दोष  मढ कर अपनी छवि को सुधारने का प्रयास कर रहे हैं। पाकिस्तानी सत्ता गलियारों में अब इस सच्चाई को माना जा रहा है कि पिछले 15-20 सालों में पाकिस्तान को तालिबान और अल-कायदा को लेकर बहुत नुकसान उठाना पडा है और अब इस्लामिक स्टेट ने सर उठाना  शुरु कर दिया है। इन आतंकी संगठनों के लिए तो अमेरिका को दोषी  नहीं ठहराया जा सकता। भारत के खिलाफ आतंक को प्रायोजित करने के कारण भी पाकिस्तान को खासा नुकसान उठाना पड रहा है। इस मामले में चीन भी लंबे समय तक उसका बचाव नहीं कर पाएगा। इन हालात में पाकिस्तान को लग रहा है कि अगर समय रहते आपने घर को व्यवस्थित नहीं किया गया तो बहुत देर हो जाएगी। यही सब भांप कर पाकिस्तान ने अपनी विदेश  नीति में बदलाव किया है। पाकिस्तान का आतंक  के प्रति क्या रवैया रहता है, पूरी दुनिया की इस पर नजर है।  भारत और अफगानिस्तान में पाकिस्तानी आतंकी संगठनों की बढती संलिप्तता पर भी दुनिया की पैनी नजर है। पाकिस्तान भले ही दुनिया को दिखाने के लिए यह दावा करे कि सरकार ने जमात-उद-दावा पर प्रतिबंध लगा रखा है और सईद हाफिज को दरकिनार किया गया है  मगर सच्चाई यह है कि सईद हाफिज सरेआम भारत के खिलाफ आग उगलता है। सईद हाफिज एक नए राजनीतिक दल बनाने की फिराक में भी है। और अगर ऐसा होता है तो भारत के लिए यह बहुत बडा खतरा होगा। बहरहाल, पाकिस्तान के नेता देश  के बाहर जो बातें कहते हैं, स्वदेश  लौटते ही उनसे पलट जाते हैं। अपनी छवि सुधारने के लिए विदेश  नीति में बदलाव करने से बहुत ज्यादा हासिल नहीं किया जा सकता। कथनी से ज्यादा करनी बोलती है।