मंगलवार, 24 जुलाई 2018

राहुल गांधी और महागठबंधन

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहले की अपेक्षा अब ज्यादा आत्म-विश्वासी  और परिपक्व नजर आ रहे हैं। गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद से उनमें यह बदलाव साफ देखा जा सकता है। उनकी बातों में वजन न भी हों, तो भी वे अपनी बात को  बडी  शिद्दत से पेश  करते हैं। उनकी सामरिक रणनीति कहीं ज्यादा असरदार साबित हो रही है।  पिछले सप्ताह लोकसभा में अविश्वास  प्रस्ताव पर उनका भाषण, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को “झप्पी“ और फिर अपने सहयोगी सांसद को आंख मारने की  धृष्टता , यह सब इसी रणनीति का हिस्सा था।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा दोनों ही इस रणनीति में उलझ कर रह गए। हमेशा   की तरह प्रधानमंत्री का भाषण ज्यादा ओजस्वी था मगर राहुल गांधी का आक्रामक अंदाज और “झप्पी“ ने सारी सुर्खियां बटोर लीं। कांग्रेस अब  आश्वस्त  लगती  है कि “भारत का पप्पू“ राजनीति की अग्नि परीक्षा में अव्वल अंकों से पास हो गया है। सहयोगी दलों ने  भी राहुल गांधी के लोकसभा के भाषण की जमकर तारीफ की है। उनके भाषण से भूकंप तो नहीं आया और न ही  प्रधानमंत्री को लोकसभा छोडनी पडी मगर उनके आरोपों से भाजपा बैकफुट पर आ गई और प्रधानमंत्री को विस्तार से जवाब देने पडे। राफेल डील को उछाल कर राहुल गांधी ने भाजपा से हिसाब चुकता कर दिया। अविश्वास  प्रस्ताव का मूल मकसद भी देश -दुनिया को भाजपा सरकार की “कारगुजारी“ का चिठ्ठा पढना था। राहुल गांधी के भाषण का ही असर था कि फ्रांस को राफेल डील पर फौरन  स्पष्टीकरण  देना पडा। और राहुल गांधी की “झप्पी“ का ही कमाल है कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों को अभी भी सफाई देनी पड रही है।  कांग्रेस और उसके सहयोगी दल यह बात अच्छी तरह जानते थे कि उनके पास सरकार के खिलाफ  अविश्वास  प्रस्ताव पारित करवाने के लिए बहुमत नहीं है। लोकसभा चुनाव से मात्र दस माह पहले सरकार गिराना मकसद था भी नहीं। सरकार को सेंसर करने के अलावा विपक्षी एकता की परीक्षा लेना भी कमसद था। अविश्वास  प्रस्ताव से यह तो साफ हो गया है कि अगले लोकसभा चुनाव के लिए विपक्षी दलों का महागंठबधन बनाना मुश्किल  जरुर है मगर असंभव नहीं है। अविश्वास   प्रस्ताव के पक्ष में डाले गए 126 वोट इसी ओर इशारा करते है़ं। कांग्रेस के 48 और तेदपा के 16 के अलावा अधिकांश  विपक्षी दलों ने अविश्वास   प्रस्ताव के पक्ष में वोट डाले । बहरहाल, समय गंवाए बगैर कांग्रेस अध्यक्ष ने महागठबंधन को लीड करने के लिए पोजिशनिंग करनी  शुरु कर दी है। रविवार को पार्टी की सर्वोच्च डिसीजन-मेकिंग बॉडी कांग्रेस  वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की बैठक में इसकी झलक दिखाई दी।  सीडब्ल्यूसी ने पार्टी अध्यक्ष को किसी भी दल के साथ गठबंधन की पूरी छूट दे दी है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट  कर दिया है कि राहुल गांधी ही पार्टी की ओर से गठबंधन के फेस होंगे। राहुल गांधी की असली चुनौती भी यहीं से  शुरु होती है। बसपा सुप्रीमो  सुश्री मायावती, पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राकांपा अध्यक्ष शरद पवार अभी भी राहुल गांधी को गठबंधन का नेता मानने को तैयार नहीं है। बहुजन समाज पार्टी भाजपा और कांग्रेस के बाद देश  की तीसरी सबसे बडी पार्टी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा हालांकि एक भी सीट नहीं जीत पाई मगर भाजपा और कांग्रेस के बाद सबसे ज्यादा वोट बसपा को ही मिले थे।  उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव में बसपा को 22 फीसदी वोट मिले थे। बसपा-सपा के साथ महागठबंधन के बगैर  उतर प्रदेश  की 80 सीटों पर भाजपा को चुनौती नहीं दी जा सकती।  ममता बनर्जी  के बगैर पष्चिम बंगाल की 42 सीटों पर वाम दलों का सहयोग का  भी काम नहीं आएगा।  इस साल के अंत में होने वाले मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ के विधानसभा चुनाव कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए बहुत मायने रखते हैं। अगर कांग्रेस इन तीनोॅ राज्यों में स्पष्ट  बहुमत हासिल कर लेती है, राहुल गांधी  का दावा और पुख्ता हो सकता है।