शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

Reservation Killing The Talent

                                                    आरक्षण का जिन्न

सर्वोच्च न्यायालय ने इस सप्ताह कुछ अहम फैसले सुनाए हैं। मंगलवार को न्यायालय ने  केन्द्र और राज्यों की सरकारों को निर्देश  दिए हैं कि मेडिकल के सुपर स्पेशलिस्ट कोर्सेस  में आरक्षण को फौरन बंद किया जाए। न्यायालय को शिकायतें मिलीं थीं कि कुछ राज्यों द्वारा सुपर  स्पेशलिस्ट मेडिकल कोर्सेस में भी  आरक्षण दिया जा रहा है। आंध्र प्रदेश , तेलगांना और तमिल नाडु में   स्पेशलिस्ट मेडिकल कोर्सेस की एडमिशन में स्थानीय उम्मीदवारों को आरक्षण दिए जाने के खिलाफ एमबीबीएस डॉक्टरों ने सुप्रीम कोर्ट से गुहार लाई थी। न्यायालय का कहना है कि उच्च  शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण ने प्रतिभा को मार डाला है। यह किसी भी सूरत में देशहित में नहीं है। आम  आदमी भी यही मानता है। सियासी नेता अपने राजनीतिक स्वार्थों की खातिर प्रतिभा का गला घोंट रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले ने फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि महत्वपूर्ण  मामलों में भी सियासी दल देशहित को नजरांदाज करके सिर्फ “वोट“ की राजनीति कर रहे हैं। राज्यों की सरकारों को इस बात की कोई परवाह नहीं है कि देश -प्रदेश  का हित प्रतिभा को बढाने में  है न कि प्रतिभा को दबाने में। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र और राज्यों को  स्पष्ट  निर्देष दिए हैं कि सुपर  स्पेशलिस्ट  कोर्सेस की एडमिशन में मेरिट को ही आधार माना जाए। न्यायालय के इस फैसले से अब देश  को योग्यतम  सुपर  स्पेशलिस्ट  डाक्टर्स  मिलने की उम्मीद की जा सकती है। बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने एक और अहम फैसले में दीपावली पर रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक पटाखें फोडने पर लगाए गए प्रतिबंध को और ज्यादा बढाने से साफ मना कर दिया। न्यायालय ने कहा वह लोगों से यह नहीं कह सकता कि पटाखें नहीं चलाएं अथवा कहीं और चलाएं। इस तरह के आदेश  क्योंकि लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है, इसलिए न्यायालय ने यह व्यवस्था दी। सुप्रीम कोर्ट  2005 में पटाखे फोडने के लिए गाइडलाइंस जारी कर चुका है। अब यह काम सरकार का है कि इन गाइडलाइंस पर सख्ती से अमल करवाया जाए। जाहिर है कार्यपालिका का काम न्यायपालिका नहीं कर सकती। अगर आदेशों पर अमल भी न्यायपालिका को ही करवाना है, तो कार्यपालिका की कोई बुकत नहीं रह जाएगा। वैसे भी न्यायपालिका पिछले कुछ समय से काफी सक्रिय है और ऐसे कई मामलों में न्यायपालिका को दखल देना पडा है, जो कार्यपालिका को करने थे। उदाहरण के लिए, वाहन चलाते समय सीट बेल्ट लगाना  कानूनन अनिवार्य  है और इसका सख्ती से पालन करवाना  प्रशासन  और पुलिस का काम है। इसी तरह वाहनों में पूरी तरह से काली फिल्में लगाना भी गैर-कानूनी है। पुलिस और प्रशासन तो इसे रोक नहीं पाई, अततः सर्वोच्च न्यायालय को दखल देना पडा। कुछ समय के लिए इस पर रोक लगाई भी गई मगर अब फिर वही पुराना ढर्रा चल पडा है। वाहनों पर लाल और नीली बत्ती लगाकर और सायरन बजाते लोगों पर रौब झाडना देश  में सियासी लोगों का शौक   है।  सुप्रीम कोर्ट  ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है। मगर इस पर भी आज तक संजीदगी से अमल न हो पाया है। अभी भी ऐरा-गैरा लाल बती लगाकर और सायरन बजाते सरेआम घूमते हैं। और खुदा-न-खास्ता पुलिस के हत्थे चढ भी जाएं, घूस देकर फौरन छूट जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय संसद और विधानसभाओं को आपराधिक पृष्टभूमि  वाले नेताओं से मुक्त करने के लिए भी व्यवस्था दे चुका है मगर इससे भी सियासी दलों के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है। देश की सबसे बडी त्रासदी यही है कि कायदे-कानून को लागू करने वाले इस कद्र भ्रष्ट  हो चुके हैं लि कानून हर मुकाम पर बौना और लाचार नजर आता है। देश  की कार्यपालिका बहुत पहले अपनी विश्वसनीयता   खो चुकी है। संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही को धडल्ले से बाधित किया जा रहा है और  कानून बनने के बावजूद आपराधिक पृश्ठभूमि वाले नेता संसद और विधाासभाओं में चुनकर आ रहे हैं, इससे उतरोतर विधायिका की विश्वसनीयता   में भी गिरावट आ रही है।  इन हालात में न्यायपालिका की सक्रियता भी देश  को गर्त में जाने से नहीं बचा सकती है।

गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

Shame: Delhi Police Acting Like BJPSena

             
दिल्ली स्थित केरल सरकार के गेस्ट हाउस में मंगलवार को पुलिस का छापा बेहद निंदनीय है।  हिंदू सेना नाम के संगठन की केरल हाउस में गोमांस परोसने की  शिकायत पर  दिल्ली पुलिस ने ”आव देखा, न ताव”,  सरकारी गेस्ट हाउस पर कमर्शियल   होटल की तरह छापा मार दिया। केरल भवन के प्रबंधकों तक को सूचित नहीं किया गया। दिल्ली पुलिस के इस कथन में कोई वजन नहीं है कि किसी अप्रिय घटना के दृष्टिगत  यह कार्रवाई की गई। केरल भवन के रसोई घर में जाकर यह देखना कि क्या पकाया और सर्व  किया जा रहा है,पुलिस का काम नहीं है। अगर अप्रिय घटना टालना ही पुलिस का मकसद था, तो प्रबंधकों को विश्वास  में लेकर कार्रवाई की जा सकती थी। जाहिर है पुलिस का मकसद कानून-व्यवस्था को बनाए रखना नहीं था। केरल भवन ही नहीं, पूर्वोतर राज्यों के अन्य भवनों में भी “बीफ ( भैंस का मांस) मेन्यू में  शामिल किया जाता है और सालों से ऐसा हो रहा है। बुधवार को केरल भवन में “भैंस के मीट“ वाले व्यंजन 45 मिनट में खत्म हो गए। इन व्यंजनों को खाने वालों का केरल भवन में तांता लगा रहा। यह सब दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का नतीजा  है। मंगलवार को पहले केरल भवन ने “ बीफ“ को मेन्यू से हटा दिया था मगर बाद में इसे फिर शामिल कर लिया गया। इस स्थिति में दिल्ली पुलिस ने छापा मारकर सिर्फ  अपनी जगहंसाई की है। दिल्ली पुलिस चूंकि केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है, इसलिए इस मामले ने सियास रंग ले लिया है। केरल में कांग्रेस की सरकार है, इसीलिए पुलिस ने केरल भवन में छापामार कार्रवाई की। भाजपा शासित राज्य के दिल्ली स्थित भवन में पुलिस इस तरह की कार्रवाई का दुसाहस नहीं करती। कांग्रेस शासन में अगर दिल्ली पुलिस इस तरह की कार्रवाई करती, तो भाजपा  सिर पर आसमान उठा लेती। दिल्ली पुलिस  के मुखर आलोचक मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इन आरोपों को बल मिलता है कि दिल्ली पुलिस “भाजपा सेना की तरह“ काम कर रही है। देेेश  की राजधानी होने के कारण दिल्ली में हर राज्य का अपना-अपना गेस्ट हाउस है और इनमें राज्य सरकार के वरिष्ठ  अधिकार भी में बैठते हैं। इन हालात में दिल्ली पुलिस की कार्रवाई को एहतिहातन  नहीं माना जा सकता। इससे यह आशंका भी बलवित होती है कि केन्द्र के इशारे पर दिल्ली पुलिस राज्य भवन से मुख्यमंत्री को भी गिरफ्तार करवा सकती है। हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के संदर्भ में यह आशंका जाहिर की जा सकती है।  बतौर केन्द्रीय इस्पात मंत्री  कथित घूस लेने और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में  सीबीआई उनकी गिरफ्तारी की फिराक में है। सीबीआई  शिमला स्थित मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर छापा मार चुकी है। सीबीआई की इस कार्रवाई के समय वीरभद्र सिंह अपनी पुत्री के विवाह के सिलसिले में दिल्ली में थे। पहले शिमला में मुख्यमंत्री के आवास पर सीबीआई की कार्रवाई और अब दिल्ली में मात्र गोमांस परोसे जाने पर पुलिस की छापेमारी से यही संकेत मिलते हैं कि मोदी सरकार “बदले की भावना“ से काम कर रही है। राज्यों के दिल्ली स्थित भवनों में कौन-कौन से व्यंजन पकाएं जाएं, यह तय करना संबंधित भवन के प्रबंधक का काम है। भगवा संगठनों को इस बात से कोई सरोकार नहीं होना चाहिए और न ही पुलिस को। देश  के संविधान में हर नागरिक को अपनी पसंद का खाना (वह गोमांस ही क्यों न हो), पहनना और जीवनयापन करने का प्रदत अधिकार है। भगवा संगठन इन अधिकारों को चुनौती देकर देश  के संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रहार करने की हिमाकत कर रहे हैं। इस तरह की हरकतें करके भगवा संगठन अपना असली “नादिरषाही“ चेहरा भी बेनकाब कर रहे हैं। मोदी सरकार के केन्द्र में सत्ता में आने पर अल्पसंख्यक पहले ही सहमे हुए थे। हाल ही की घटनाओं से अल्पसंख्यकों में दहश त व्याप्त है। इस तरह की हरकतें देश  की अखंडता को कमजोर करती हैं।  हाल ही की घटनाएं दर्शा  रही हैं कि सरकार का भगवा ब्रिगेड पर कोई नियंत्रण नहीं है। मोदी सरकार को अविलंब इसे रोकना होगा।

बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

A Huge Symbolism From Geeta's Story

                                                 पाक से आई  गीता का संदेश    

आठ साल की कच्ची उमर में भारत से पाकिस्तान जा रही ट्रेन में एक गूंगी-बहरी लडकी सरहद लांघ कर उस पार  चली जाती है। इस बेनाम बच्ची को कराची स्थित इधी फाउंडेश न के सुपुर्द  किया जाता है।  15 साल तक यह फाउंडेशन सगी संतान की तरह इस लडकी का  हिंदू विधि-विधान से परवरिश करती है। वह भारत से आई थी, इसलिए उसका नाम गीता रखा जाता है। यह कोई “बजरंगी भाईजान“ की तरह फिल्मी कहानी नहीं है, बल्कि हकीकत है। फर्क  सिर्फ“ इतना है कि "बजरंगी भाईजान" में भारतीय परिवार अपनी संतान की तरह पाकिस्तानी बालिका का लालन-पालन करता है। गीता के मामले में पाकिस्तान ऐसा करता है। इसके केवल एक ही मायने है। भारत और पाकिस्तान के बीच आज भी “आपसी भाईचारे और सदभाव“ का माहौल बरकरार है और दोनों देशों  के कट्टरपंथी लाख कोशिशों  के बावजूद सात दशक में भी इस भाईचारे को खत्म नहीं कर पाए हैं।   सोमवार को 23 साल की गीता को जब स्वदेश  भारत लाया गया तब देश  में व्याप्त माहौल साफ-साफ कह रहा था कि भारत और पाकिस्तान में “भरत मिलाप“ संभव है। गीता को भारत को सौंपने के बावजूद इधी फाउंडेशन ने गीता से जुडे रहने का संकल्प दोहराया है। फाउंडेशन का कहना है कि सरहदें अतंरंग रिश्तों  को अलग नहीं कर सकती। यही एक सच है जो भारत और पाकिस्तान की अवाम को आज भी आपस में जोडे हुए है। दोनों मुल्कों के सियासी और कट्टरपंथी नेता अवाम को बांटने की कितनी भी कोशिश कर लें , सदियों के भाईचारे को खत्म नहीं किया जा सकता है। गीता के मामले ने इस सच्चाई का अहसास कराया है कि  भारत और पाकिस्तान आपस में लड-झगडने की बजाय प्रेमपूर्वक साथ-साथ रह सकते हैं। सरहद पर छोटी-मोटी झडपों और कश्मीर  जैसे द्धिपक्षीय मसलों को सौहार्दपूर्ण  संबंधों के आडे नहीं आने देना चाहिए। हर परिवार में अक्सर छोटी-मोटी बातों पर  नोंक-झोंक होती रहती है मगर इसका यह कतई मतलब नहीं है कि इनसे परिवार ही टूट जाए। इस बात में दो राय नहीं है कि दिल्ली में मोदी सरकार के आने के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंध बिगडे हैं और दोनों देशों  के कट्टरपंथी माहौल को और अधिक बिगाडने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। मगर पूरी दुनिया में यही हो रहा है। कटटरपंथी और अलगाववादी हर मुल्क को छिन्न-बिन करने में लगे है। कट्टरपंथियों ने समूचे मध्य-पूर्व  एशिया  को युद्ध की भठ्ठी में झोंक रखा है। सीरिया और  इराक भीषण  गृह युद्ध की चपेट  में है। सीरिया से अब तक (अप्रैल 2015 तक) 40 लाख से ज्यादा लोग पलायन कर चुके हैं और दो लाख के करीब लोग गृह युद्ध में मारे जा चुके हैं। इस्लामिक स्टेट और इराकी सेना के बीच जारी युद्ध ने इस मुल्क को तहस-नहस कर डाला है। और इराक में युद्ध विभीशिका नब्बे के दशक से सदाम हुसैन की हकूमत के खिलाफ अमेरिका और उसके मित्र देशों  के आक्रमण से लेकर आज तक बदस्तूर जारी है। 1975 से 1990 के बीच गृह युद्ध से पीडित लेबनान में 12 लाख लोग मारे गए थे। 1989 के तैफ करार के बावजूद शिया-मुसलमानों में झडपें आज भी जारी है। दरअसल, पूरा अरब  शिया-सुन्नी मुसलमानों के बीच वर्चस्व की जंग है और यह आगे भी जारी रहेगा। पाकिस्तान के आंतरिक हालात भी सामान्य नहीं है। उत्तर-पश्चिम  पाकिस्तान (वजीरिस्तान) में 2004 से सेना और तालिबान एवं  अलगाववादी संगठनों के बीच भीषण  युद्ध जारी है।  शिया और सुन्नी मुस्लमानों के बीच जारी टकराव में 1987 से अब तक छह हजार से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। बिगडते आंतरिक हालात से ध्यान बंटाने के लिए पाकिस्तान जब-तब भारत से युद्ध करने और कश्मीर  मुद्दे को उछालता रहता है। पाकिस्तान को गीता के मामले से सबक लेना चाहिए। भारत में “गीतोपदेष “ का अपना महत्व है और पाकिस्तान भी इस सच्चाई को बखूबी जानता है। संयोगवश,  पाकिस्तान में गीता के नामकरण और कराची में उसके भारतीय लालन-पालन में भी गीतोपदेश  का मर्म  छिपा है। इसे यूंही जाया नहीं किया जाना चाहिए। इस मर्म  की पृश्ठभूमि भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को मधुर बनाने के काम आ सकती है।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

The Interview Sans Recruitment in Central Govt

                            साक्षात्कार बगैर चयन


केन्द्र सरकार में छोटे पदों की साक्षात्कार आधारित भर्ती को खत्म करने का फैसला क्रांतिकारी साबित हो सकता हैं बशर्ते इस पर संजीदगी से अमल किया जाए।  देश  में गरीब और असहाय तबकों को वास्तव में सरकारी नौकरी की सबसे ज्यादा जरुरत है।  प्रधानमंत्री ने रविवार को “मन की बात“ कार्यक्रम में इस आशय की घोषणा की। इस साल स्वत्रंतता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री ने संकेत दिए थे कि कुछ क्षेत्रों में घूसखोरी घर  कर गई  है और सरकारी नौकरियों में भर्ती की मौजूदा प्रकिया इन क्षेत्रों में प्रमुख है। प्रधानमंत्री के अनुसार भर्ती की आड में गरीब और छोटे तबके दलालों के हाथों लूटे जा रहे हैं। नौकरी पाने के लिए जरुरतमंद जैसे-तैसे पैसा जुटाकर दलाल को देता है मगर उसे न नौकरी मिलती है और न ही पैसा वापस मिलता है। यह बात सौ फीसदी सच है कि दुनिया में ऐसा कोई भी मनोविज्ञान नहीं है, जिसके बलबूते दो-एक मिनट में उम्मीदवार की योग्यता परखी जा सके। जाहिर है साक्षात्कार की आड में बेरोजगारों से खेल किया जा रहा है। इस चयन प्रकिया  में सिफारिश  और भाई-भतीजावाद का भी बोलबाला रहता है। बहरहाल, पहली जनवरी 2016 से केन्द्र सरकार के ग्रुप  ”बी“, ”सी“ और ”डी” श्रेणी के कर्मचारियों की भर्ती बगैर साक्षात्कार के ही की जाएगी। केन्द्र में हर साल इन श्रेणियों के एक लाख से ज्यादा पद भरे जाते हैं। निसंदेह, सरकार के इस फैसले से सरकारी नौकरियों की भर्ती में पारदर्शिता  और निष्पक्षता  आ सकती है। मगर सवाल यह है कि भीषण बेरोजगारी, गला काट प्रतियोगिता और सिफारिश  के इस जमाने में बगैर साक्षात्कार के योग्य उम्मीदवारों का निष्पक्ष  चयन कैसे सुनिश्चित  किया जाएगा? सरकार ने अभी तक साक्षात्कार रहित भर्ती की प्रकिया स्पष्ट नहीं  की है।  दिल्ली पुलिस ने हाल ही में सब-इंसपेटर्स  और ग्रुप सी के पदों के लिए बगैर साक्षात्कार के ही भर्ती के आदेश जारी किए हैं मगर  प्रक्रिया क्या होगी , यह अभी तक तय नहीं है । पुलिस एवं सुरक्षा बलों में बगैर साक्षात्कार के भर्ती करना सरल है क्योंकि इन महकमों में  शारीरिक योग्यता को ज्यादा महत्व दिया जाता है और इस मामले में किसी तरह के पक्षपात की कोई गुजांइश  नहीं रहती  है। मगर मिनिस्टिरियल और अन्य छोटे पदों की भर्ती में चयन प्रकिया तय करने में खासी दिक्कतें खडी हो सकती हैं। क्या चयन प्रकिया लिखित परीक्षा पर आधारित होगी अथवा शैक्षणिक योग्यता की मेरिट पर?  लिखित परीक्षा पर आधारित चयन प्रकिया से परीक्षाएं पास कराने  की गारंटी देने वाली कमर्शियल दुकानें शुरू  हो जाएंगी और गरीब फिर बाहर हो जाएगा। और अगर शैक्षणिक योग्यता को चयन का आधार बनाया जाता है तो भी पात्र  लोगों से अन्याय हो सकता है। न्यूनतम स्नातक योग्यता वाले पद पर पीएचडी,एम,एमफिल उम्मीदवारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में स्नातक की कोई अहमियत नहीं रह जाती है। ऐसे में गरीब स्नातक पास उम्मीदवार पिछड जाएगा। बढती बेरोजगारी के इस जमाने में चपरासी और लिपिक पदों के लिए  पीएचडी उम्मीदवारों द्वारा आवेदन करना आम है। सितंबर में उत्तर प्रदेश  सरकार में 365 चपरासी के पदों के लिए लगभग 23 लाख उम्मीदवारों ने आवेदन किया और इनमें कई पीएचडी, एमबीए और एम टैक डिग्री होल्डर थे। हर राज्य में यही हाल है। कुछ साल पहले मेडिकल और इंजीनियरिंग की एडमिशन बगैर पीएमटी के विशुद्ध मेरिट पर होती थी। सियासी लोगों को यह पद्धति रास नहीं आई क्योंकि इसके तहत पक्षपात अथवा हेराफेरी की कोई गुजाइंश  ही नहीं थी और यह पद्धति ग्रामीण एवं पिछडे तबकों के भी माफिक थे। दरअसल, सिफारिश  और भाई-भतीजावाद समकालीन सियासत की सबसे बडी फितरत है। यहां तक कि चुनावों में पार्टी के टिकटों का वितरण भी सिफारिश  और भाई-भतीजावाद को सामने रखकर किया जाता है।बीजेपी भी इससे अछूती नहीं है।  साक्षात्कार बगैर भर्ती में भी इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि यह सिफारिश  और भाई-भतीजावाद से मुक्त रहेगी। राज्यों में साक्षात्कार बगैर भर्ती प्रकिया लागू होने से “ अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड“ (एसएसएसएसबी) सफेद हाथी बन जाएंगे। इन बोर्डों का अधिकतर काम साक्षात्कार से भर्ती करना है।

रविवार, 25 अक्टूबर 2015

Simmering Punjab Needs a United Face

Punjab is again simmering. The last few days  have been  anger-ridden and volatile. The anger expressed by a large section of Sikhs is the  manifestation of  failure of religious leaders and weakening of the institutions. It may be too naive to blame the recent happenings like desecration of holy books or the pardon to Sirsa based  Dera Saucha Sauda chief Gurmit Ram Rahim Insan  by the Sikh clergy. There is an impression that chief minister Badal played a leading role in making five priests to pardon Dera Saucha Sauda chief for an desecration act, yet  The anger was building up right from the day the political leadership failed to honour the poll promises. Its not only the state govt being run by Father-son duo of Badal clan for the last two decades but also the SGPC- the highest religious body of Sikhs. Punjab chief minister Prakash Singh Badal wields considerable influence over SGPC and despite an elected body, all office-bearers including President Avtar Singh Makkar, by and large, are his protege much to the chagrin of radicals. The dominance of Badal in SGPC  is so deep-rooted that Congress made all out efforts to upstage him but  could never succeed. Even radicals have not succeeded in dislodging Badal's dominance in SGPC. This politico-religious dominance of Badal  is the main reason behind the alienation of a large section of Sikhs. Its the replay of eighties when the Sikhs' alienation with contemporary politico-religious  leadership  led to the rise of militancy. Sikhs are known word over as brave  but resilience. The wounds of operation blue star haven't been healed as yet. The economy is in shamble with huge public debt.  Unemployment is rampant all over the state with corruption burgeoning to new heights. The guaranteed employment under MNREGA has been gulped down by corrupt bureaucracy. State government welfare schemes of pensions for senior citizens or marriages of poor girls are poorly mismanaged . Bihar and Madhya Pradesh have registered  much faster growth than Punjab. Bihar registered 11 percent growth; Uttar Pradesh in the same period registered 6.9 percent.  There is virtually a process of de-industrialisation. Of 127 textile processing units in 1990, Amritsar is left with only 20 now. The Sowing of two commercial crops of Rice and Wheat, one after another  has caused soil erosion. The water table has gone down. Use of pesticides has resulted not only in pollution but escalating diseases like asthma, cancer, Hepatitis C. Alcohol and drug abuse has become a curse. Rich have too much money and nothing to do. The poor, on the other hand, are even unable to marry their daughters (dowry menace) and unable to pay debts. The result is a spate of suicides. Despite all this, the business of father and son duo have flourished. It is said that state policies are drafted to serve the interests of ruling clan. All these developments have led to alienation of people, especially young from  mainstream to militancy. Pro-Khalistani leaders are still active on foreign soils. Intelligence reports suggest that  over 300 militants belonging to separatist groups like Babbar Khalsa International (BKI), Khalistan Commando Force, Khalistan Zindabad Force, etc are operating from Germany, Pakistan, France, Switzerland, Britain and Denmark. Joint efforts of BKI and LeT enabled, the militants to receive training in Pakistan through various routes – Nepal, Malyasia and Thailand. The recent incidents of desecration were, ostensibly, aimed at fueling the anger. What is surprising is that despite a huge state and central intelligence agencies network, such anti-national acts are occurring repeatedly. Recent happenings have also led to sharp polarization. The pardon to  Dera Saucha Sauda chief has led to a tense stand-off between "Panj Pyaras" and high priests. And if this issue is not resolved at the earliest, the situation could be worse. As of now Punjab is sitting on a valcano.  If we want to handle the situation, it has to be done  unitedly. But big question is: Can power hungry leaders come together? 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

BJP Ministers Need to Learn How To Conduct Themselves

                                    मर्यादा में रहना सीखें मंत्री

भारतीय जनता पार्टी के मंत्री और नेता उल-जलूल बयानबाजी करके पार्टी और मोदी सरकार दोनों की छवि खराब करने मे कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। भाजपाइयों का गोमांस  (बीफ) पर विवादास्पद बयान देने का सिलसिला  अभी भी नहीं था कि विदेश  राज्यमंत्री एवं पूर्व  सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने असंवेदनशील एवं “गैर-जिम्मेदारां“ बयान दागकर पार्टी को  शर्मसार कर दिया है। जनरल सिंह ने फरीदाबाद में दलित परिवार के दो मासूमों को जलाए जाने की दुखद घटना की तुलना “कुत्ते“ से की है। सरकार को बचाने के चक्कर में जनरल वीके सिंह ने “ कोई कुत्ते को पत्थर मारता है, तो सरकार जिम्मेदार नहीं“ जैसे मर्यादाहीन शब्द बाणों  से  सामुदायिक सदभाव को छिन-बीन कर  दिया है। जनरल वीके सिंह दलितों की “कुत्तों“ से तुलना करने पर ही नहीं रुके। उन्होंने खबर लिखने वाले पत्रकार को पागलखाने में भर्ती कराने की बात कहकर मामले को और ज्यादा बिगाड दिया। जनरल इस बात के लिए खफा थे कि दो अलग-अलग संदर्भों को जोडकर पत्रकार ने मतलब निकाला कि उन्होंने “ दलितों को कुत्ता“ कहा।  जनरल वीके सिंह से इस तरह की शब्दावली की कतई उम्मीद नहीं थी। जनरल सिंह बेहद सम्मानित सैन्य अधिकार रह चुके हैं। सेना के अनुशासन और तहजीब की हर जगह मिसाल दी जाती है। इसके क्या अभिप्राय निकाले जाएं। क्या राजनीति में आते ही सम्मानित महानुभाव मर्यादा और तहजीब भूल जाते हैं? फरीदाबाद में दो मासूमों को जिंदा जला देने की घटना से पूरा देश  स्तब्ध है।  इसकी जितनी भर्त्सना की जाए, उतनी कम है। ऐसे में हरियाणा राज्य से संबंधित जनरल वीके सिंह द्वारा अनर्गल बात कहना पीडित परिवार के जख्मों पर नमक छिडकने से भी ज्यादा कष्टदायक  है। उच्चस्थ पद पर आसीन व्यक्ति इतना असंवेदनशील  कैसे हो सकता है। जनरल सिंह अब अपने इस कथन पर लाख सफाई  दे मगर उनके इस बयान से पार्टी की ही नहीं, सम्मानित सैन्य अधिकारी की छवि को भी जबरदस्त ठेस पहुंची है। जनरल सिंह के बयान से पार्टी बचाव मुद्रा में आ गई है। भाजपाइयों के विवादास्पद बयान से विपक्ष को यह कहना का मौका मिल रहा है कि पार्टी मुसलमान और दलित विरोधी है। इस मामले में केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को शुक्रवार  को कहना पडा कि मंत्रियों को स्वंय इस बात का ख्याल रखना चाहिए कि उन्हें कब और कहां क्या कहना है और क्या नही। विवादास्पद बयान देकर वे यह कहकर बच नहीं सकते कि उनके कथन को तोड-मरोड कर पेश  किया गया। भाजपा की सबसे बडी समस्या भी यही है कि पार्टी अपने नेताओं की बेलगाम एवं विवादास्पद बयानबाजी को रोक नहीं पा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कई बार भाजपाइयों की विवादास्पद बयानबाजी पर अपनी नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं। इसके बावजूद भाजपा नेता इससे बेपरवाह होकर आए दिन विवादास्पद बयान दाग देते हैं। जनरल सिंह के बयान से एक दिन पहले केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरन रिजिजू उतर भारतीयों पर नस्लीय बयान दागकर सरकार और पार्टी को  शर्मसार कर चुके हैं। केन्द्रीय  गृह राज्यमंत्री का कहना है कि उत्तर भारत के लोग कायदे-कानून तोडने और ऐसा करके शेखी बघारने में गर्व  महसूस करते हैं। केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अगर सभी उतर भारतीयों को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हों, तो उनके विवेक पर सवालिया निशान उठना  स्वभाविक है। भाजपाइयों के विवादास्पद कथनों को मर्यादा की कसौटी पर परखें, तो यही निष्कर्ष  निकलता है कि केन्द्र में डेढ साल से सत्तारूढ होने के बावजूद भाजपा के  मंत्रीं और लॉमेकर्स संवैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन  और मान-मर्यादा का पालन करना सीख नहीं पाए हैं। भाजपाइयों का अमर्यादित आचरण पार्टी की लुटिया डूबो सकता है। भाजपा के  शीर्ष   नेतृत्व को इस मामले में गंभीरता से सोचने की जरुरत है।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

The "Panj Pyaras" And SGPC

                                               पंच प्यारों का निलबंन

सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था षिरोमणि गुरुद्धारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और अकाल तख्त के पंच प्यारों के बीच का टकराव राज्य में किसी भी सूरत में कौम के हित में नहीं है। एसजीपीसी के इतिहास में पहली बार बुधवार को पंच प्यारों ने सिंह साहिबानों को तलब करने की हिमाकत की। पंच प्यारों की इस कार्रवाई से क्षुब्ध  अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी गुरबचन सिंह, तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार ज्ञानी गुरुमुख सिंह, तख्त श्री पटना साहिब के ज्त्थेदार ज्ञानी इकबाल सिंह, तख्त श्री केसरगढ़ साहिब के जत्थेदार ज्ञानी मल्ल सिंह और तख्त श्री हजूर साहिब के जत्थेदार ज्ञानी राम सिंह ने शाम  होते- होते पंज प्यारों को ही उनके पदों से निलंबित कर दिया। एसजीपीसी के इतिहास में ऐसा भी पहली बार हुआ है। पंच प्यारों को एसजीपीसी द्वारा डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम इसां को माफी दिया जाना रास नहीं आया है। इसी का स्पष्टीकरण  लेने के लिए “पंच प्यारों“ ने सिंह साहिबानों को 23 अक्टूबर को तलब किया है। सिंह साहिबानों का कथन है कि “पंच प्यारों“ को उनके खिलाफ कार्रवाई करने का कोई अधिकार नही है और न ही ऐसी कोई परंपरा है। एसजीपीसी में पंजाब के मुख्यमंत्री की पार्टी  शिरोमणि अकाली दल का बोलबाला है और सिखों की इस धार्मिक संस्था पर बादल की जबरदस्त पकड है। पांचों सिंह साहिबानों को  शिरोमणि गुरुद्धारा प्रबंधक कमेटी द्वारा नियुक्त किया जाता है। एसजीपीसी पर क्योंकि बादल का वर्चस्व है, इसलिए पांचों सिंह साहिबानों की नियुक्ति में अकाली दल का खासा दखल रहता है। इस स्थिति का ख्याल करते हुए एसजीपीसी को धार्मिक कम, राजनीतिक संस्था ज्यादा माना जाता है। इसीलिए गरमपंथी एसजीपीसी को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं और इस पर कब्जा करने की फिराक में रहते है। गरमपंथियों का मानना है कि डेरामुखी को माफी दिलवाने में मुख्यमंत्री बादल ने अहम भूमिका निभाई है। एसजीपीसी वही करती है जैसा बादल उससे करवाना चाहते हैं। माना जा रहा है कि इसी बात के दृष्टिगत  गरमपंथियों और सिख विद्धानों के दबाव में “पंच प्यारों“ ने सिंह साहिबानों को तलब करने का असाधारण निर्णय लिया। सिखों में “पंच प्यारों“ के प्रति एसजीपीसी से कहीं ज्यादा गहरी आस्था है। खालसा पंथ की नींव रखते समय गुरु गोबिंद सिंह ने “पंच प्यारों“ को नियुक्त करने की परंपरा शुरु की थी। पंच प्यारों को कौम का सरक्षक माना जाता है। पंजाब के हर गांव में आज भी “पंच प्यारों“ को नियुक्त करने की परंपरा है।  “पंच प्यारों“ का विशेष  महत्व है। गुरु गोबिंद सिंह द्वारा नियुक्त “पंच प्यारों की अपनी-अपनी अहम भूमिका रही है। भाई दया सिंह दया और अनुकंपा के प्रतीक थे। भाई धर्म  सिंह- धर्म  और सच्चाई के, भाई हिम्मत सिंह साहस के, भाई मोहकम सिंह अनुशासन एवं परिश्रम और भाई साहिब सिंह सरदारी एवं संप्रभुता के प्रतीक थे। यही परंपरा आज भी बरकरार है और मौजूदा “पंच प्यारों“ से भी सिख पंथ यही उम्मीद रखता है। गुरु ने “पंच प्यारों“ की नियुक्ति में पंथ के सभी वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व दिया था और पांच प्यारों में तीन तत्कालीन पिछडी जाति के थे। मौजूदा एसजीपीसी ने यह सब ध्वस्त कर डाला है। महजबी सिखों को एसजीपीसी से बाहर रखा गया है। बहरहाल, अकाल तख्त और “पंच प्यारों“ के बीच का टकराव राज्य के हित में नहीं है। पवित्र ग्रंथ को अपवित्र करने की घटना से राज्य उबल रहा है।   अस्सी के दशक में संत जरनेल सिंह भिंडरावाले की अगुवाई वाले गरमपंथियों और एसजीपीसी के बीच भी इसी तरह के मुद्दों पर टकराव शुरु हुआ था। यह टकराव बाद में बढते-बढते राज्य को अलगाववाद और आतंक के मार्ग  पर ले गया था। सिख बहादुर कौम है और किसी भी तरह के त्याग के लिए हमेषा तत्पर रहती है, उसकी इसी खासियत का  देश  के दुश्मन  फायदा उठाते रहे हैं और आगे भी उठा सकते हैं। सिखों को इस बात का ख्याल रखना होगा।  

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

A Year of "Khattar-nak" in Haryana

              खट्टर सरकार का खट्टा -मीठा एक साल



हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का एक साल का कार्यकाल “ठोस काम“ की बजाय विवादों में ज्यादा घिरा रहा है। विवाद-दर-विवाद में उलझी खट्टर सरकार का आलम यह है कि एक साल का कार्यकाल पूरा करने से चंद रोज पहले मुख्यमंत्री को “बीफ“ पर  बयान देने के लिए प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय  अध्यक्ष से डांट खानी पडी है। इस घटना से पता चलता है कि राज्य में पहली बार अपने बूते सत्तारूढ हुई भाजपा सरकार की दिशा  और दशा  क्या है। मुख्यमंत्री संवैधानिक पद है और देश  का संविधान “धर्मनिरपेक्ष“ है, “धर्मसापेक्ष नहीं। संविधान में देश  के हर नागरिक को अपना धर्म चुनने और उसी मुताबिक खान-पान तय करने का अधिकार है। और अगर संवैधानिक पद पर आसीन मुख्यमंत्री  कहे कि मुसलमानों को भारत में रहने के लिए गोमांस का सेवन बंद करना पडेगा, यह उनकी मान-मर्यादा के विपरीत ही नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लघंन है। मगर खट्टर ही क्यों, उनके मंत्रिमंडल सहयोगी भी विवादास्पद बयान देने में पीछे नहीं रहे हैं। कृषि  मंत्री ओपी धनखड आत्महत्याओं पर विवादास्पद बयान देकर   किसानों की नाराजगी मोल ले चुके हैं। शिक्षा मंत्री राम बिलास शर्मा देश  के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु पर विवादस्पद बयान देकर पार्टी और सरकार को सांसत में डाल चुके हैं। स्वास्थय मंत्री अनिल विज के तो कहने ही क्या? आए दिन बेबाक बयानबाजी  करने के अलावा विज जासूसी का आरोप लगाकर अपनी ही सरकार का चिठ्ठा खोल चुके हैं। मंत्री गण ही नहीं, कुरुक्षेत्र के सांसद राज कुमार सैनी और करनाल के सांसद अश्विन  चोपडा जब-तब विवादास्पद बयान जारी करके सरकार और पार्टी की मिट्टी पलीत कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री राव बीरेन्द्र सिंह भी “सत्य  वचन“ बोलकर खट्टर सरकार की खाट खडी करने में लगे हुए हैं। पिछले एक साल के दौरान यही होता रहा है। शीर्ष  नेता एक-दूसरे की टांग खींच रहे हैं और राष्ट्रीय  स्वंय सेवक को खुश  करने के लिए कट्टरपंथी बातें करके राज्य के सांप्रदायिक माहौल पर प्रहार कर रहे हैं। जनता से चुनाव के समय किए गए वायदे तो पूरे नहीं किए जा रहे हैं, अलबत्ता भगवा एजेंडे पर संजीदगी से काम चल रहा है। राज्य में  शिक्षा के भगवाकरण के लिए खट्टर सरकार ने  राष्ट्रीय स्वंय सेवक (आरएसएस) से जुडे दीनानाथ बत्रा को नई “शिक्षा नीति“ तैयार करने का जिम्मा सौंपा गया है और योग गुरु बाबा रामदेव को ब्रांड एम्बेसडर बनाया गया है। भगवत गीता के  श्लोकों   और योगा को स्कूली पाठ्यक्रम में  शामिल किया गया है। पूरे साल भगवा एजेंडे पर काम होता रहा है। नतीजतन, राज्य में दलितों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के मामले बढे हैं। दबंगों ने सोमवार की आधी रात को देश की  राजधानी दिल्ली से सटे फरीदाबद के सनपेड गांव में दलित परिवार के दो मासूमों को जिंदा जला डाला। इस जघन्य हत्याकांड पर पूरे देश  में थू-थू हो रही है और इससे राज्य का नाम खराब हुआ है। मुख्यमंत्री  मनोहर लाल खटटर लंबे समय तक आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में आरएसएस की अहम भूमिका रही है। इस बात के द्दृष्टिगत् स्वभाविक है कि भगवा एजेंडे को लागू करना  खट्टर सरकार की पहली प्राथमिक है। बहरहाल, एक बात के लिए खट्टर सरकार की तारीफ की जानी चाहिए। भ्रष्टाचार  पर उसकी जीरो टोलरेंस की नीति रंग दिखा रही है। आधार से जुडे बायोमैट्रिक अटेडेंस सिस्ट्म के भी सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। फाइलों की ई-ट्रेकिंग से बेलगाम नौकरशाही की कार्यशैली में सुधार आया है। सरकारी नौकरियों की भर्तियों में साक्षात्कार के अंक घटाकर सरकार ने भाई-भतीजावाद को कम करने और पारदर्शिता  लाने का प्रयास किया है। और भी कुछ अच्छे काम हुए हैं। मगर कहते हैं एक बुरा काम सौ अच्छे कामों पर पानी फेर देता है। खट्टर सरकार को इन बातों का ख्याल रखना होगा। जनता भाजपा सरकार से बदलाव और अच्छे दिन की उम्मीद करती है।    

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

Boiling Punjab: Political Leaders Need to Learn From Past

                                                      उबलता पंजाब

पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर  13 अक्टूबर को कोटकपूरा से   शुरु हुआ बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। सोमवार को हालांकि बवाल काफी हद तक शांत होता नजर आया मगर गरमपंथी अभी भी बवाल को तूल देने पर आमादा हैं। बंद के कारण एक सप्ताह से अधिक समय से स्कूल-कॉलेज बंद पडे हैं। कारोबार भी खासा प्रभावित हुआ है। सोमवार को संत समाज के राज्य के हर जिले में सडकों को तीन घंटे के लिए जाम रखने के फैसले से लोगों को काफी राहत मिली। जनता को हो रही परेशांनियों के  दृष्टिगत  सिख तालमेल कमेटी ने दिन में सुबह 10 बजे से 1 बजे तक तीन घंटे के लिए सडकें जाम रखने का निर्णय लिया था। तीन हिस्सों में बंटे आंदोलनकारी सिख संगठन  इस फैसले पर पूरी तरह से अमल नहीं कर पाए। जालंधर में पूरे दिन सडकें जाम रहीं। सिमरजीत सिह मान की अगुवाई वाले  गरमपंथी अकाली दल (अमृतसर) और  भाई मोहकम सिंह के यूनाइटेड अकाल दल  पूरे दिन के बंद  के पक्ष में है। दमदमी साहिब के पूर्व  जत्थेदार ज्ञानी केवल सिंह, संत  पंथप्रीत सिंह तथा भाई रंजीत सिंह ढडरिया की अगुवाई वाला गुट तीन घंटे जाम  के पक्ष में है। इस गुट को सत्ताधारी  शिरोमणि अकाली दल का समर्थक माना जाता है। दरअसल, राज्य के गरमपंथियों को गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर उठे बवाल में अपने सियासी मकसद पूरा करने का सुनहरा मौका नजर आ रहा है। पूरा मामला गु्ररु ग्रंथ साहिब की बेअदबी का न होकर सियासी बन गया है। बादल समर्थक पीछे हट गए हैं मगर गरमपंथी इस मौके को भुनाने की फिराक में है। गरमपंथी लंबे समय तक आतंक की पीडा झेल चुके पंजाब को अशांत करने की कई बार नाकाम कोशिशें  कर चुके हैं मगर सफल नहीं हो पाए हैं। इस बार उन्हें लगता है कि  गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर उठे बवाल को वे लंबा खींच सकते हैं। यह बात दीगर है कि जनता को परेशानी में डालकर आज तक कोई भी आंदोलन कामयाब नहीं हुआ है। बहरहाल, मौजूदा बवाल को लेकर आम आदमी के मन-मष्तिस्क में   यह सवाल  उठना स्वभाविक है कि आखिर वे कौन लोग हैं,  जो पंजाब में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की हिमाकत कर रहे हैं। पुलिस ने सोमवार को बेअदबी के लिए एक महिला समेत दो लोगों को गिरफ्तार किया है।  फरीदकोट   बरगडी में  गुरुग्रंथ  साहिब की  बेअदबी का मामला भी  सुलझा लिया  गया है। दो भाईयों को गिरफ़्तार किया गया है।   पुलिस का दावा है कि  इस  बवाल में विदेशी साजिश की "बू " आ रही है। इतना तो तय है कि बेअदबी करने वाले पंजाब के हितैशी नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाष सिंह बादल के इन आरोपों में काफी वजन है कि पूरा मामला सरकार के खिलाफ साजिष का हिस्सा है। निहित स्वार्थी सियासी लोग राज्य को अशांत करके शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार को नकारा साबित करना चाहते हैं। मौजूदा स्थिति यही बता रही है। लगभग 100 गांवों की पंचायतों ने अकाली नेताओं का बहिष्कार  करने और उन्हें गांवों में प्रवेश  नहीं देने का फैसला लिया है। सियासी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।  चार दशक पहले कांग्रेस ने पंजाब में शिरोमणि अकाली दल को मात देने के लिए संत जरनेल सिंह भिंडरावाले को आगे किया था। मगर बाद में हालात कांग्रेस के हाथ से इस कद्र फिसल गए कि इंदिरा गांधी सरकार को 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार की मदद से भिंडरावाले से निपटना पडा।  इस त्रासदी को सिख आज तक भूल नहीं पाए हैं।  इससे पहले अमृतसर में निरंकारियों और सिखों के बीच हुए खूनी संघर्ष   में 13 लोग मारे गए थे। 1982 में अकाली दल के आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को लागू करवाने के लिए “धर्म  युद्ध मोर्चा  शुरु किया गया था। इस आंदोलन को दबाने के लिए भी तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने बल का इस्तेमाल किया था । लगभग तीन माह के अंतराल में 30,000 से ज्यादा सिखों को गिरफ्तार किया गया था। मौजूदा स्थिति कुछ-कुछ उन परिस्थितियों का स्मरण करा रही है।  पाकिस्तान ने अशांत पंजाब को और अशांत करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा । पंजाब के सभी सियासी दलों को पिछली घटनाओं से सबक लेना चाहिए। पाकिस्तान आज भी खालिस्तानी समर्थकों की पीठ थपथपा रहा है और मौका मिलते ही वह पंजाब को फिर अशांत  कर सकता है। पंजाब के फिर से आतंक की आग में झुलसने से उसकी अर्थव्यवस्था तहस-नहस हो सकती है।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

MNREGA: World's Largest Employment Guarantee Program Need Close Monitoring

दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी रोजगार सुरक्षा योजना-मनरेगा- अपने मूल मकसद को संजीदगी से हासिल नहीं कर पा रही है। ग्रामीण सुधार और हर परिवार को साल में कम-से-कम सौ दिन का रोजगार मुहैया कराने के मकसद से शुरु की गई इस योजना को भी  भ्रष्टाचार  का घुन लग चुका है। अप्रैल, 2006 को नरेगा ( नेशनल रूरल रोजगार गारंटी एक्ट) के नाम से देश  के 200 जिलों में इस योजना को  शुरु किया गया था। अप्रैल, 2008 से इस योजना को पूरे देश में लागू किया गया  और इसका नाम बदल कर महात्मा गांधी  नेशनल रूरल रोजगार गारंटी एक्ट (मनरेगा) रखा गया। इस एक्ट के तहत देश  में पहली बार ग्रामीण क्षेत्रों में “रोजगार का हक“ प्रदान किया गया और हर परिवार के एक सदस्य को सौ दिन के रोजगार की गारंटी दी गई।  पूरी दुनिया  में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संप्रग सरकार द्वारा शुरु की गई इस योजना को सराहा गया। वर्ल्ड बैंक ने 2014 में मनरेगा को “ग्रामीण क्षेत्रों के समग्र विकास का स्तंभ“ बताया है। मोदी सरकार ने भी इस योजना को जारी रखा है। 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा जारी समीक्षा रिपोर्ट  में बताया गया है कि इस योजना के तहत 1200 करोड लोगों को रोजगार दिया जा चुका है और तब  तक मनरेगा पर 1 लाख 10 हजार करोड खर्च  किया जा चुका था। मनरेगा के अलावा दुनिया में कहीं भी इतनी बडी योजना नहीं है।   मनरेगा की दो प्रमुख विशेषताएं हैं। योजना के तहत विकास कार्यों को पंचायत द्वारा कार्यान्वनित किया जाता है। ठेकेदारों को मनरेगा से दूर रखा गया है। मनरेगा के तहत बाढ, सूखे और अन्य आपदाओं से निपटने  और इंफरास्ट्रक्चर से जुडे  के कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जाती है। मनरेगा के कार्यन्वयन और प्रबंधन के लिए पुख्ता नियम बनाए गए हैं।  विकास कार्यों के लिए बाकायदा दिशा -निर्देश  तय हैं और कार्यन्वयन की मांनिटरिंग तथा मूल्यांकन के लिए भी संहिता बनाई गई है।  महाराष्ट्र  देश  का पहला ऐसा राज्य है जहां सतहर के दशक में ही रोजगार गारंटी योजना शुरु की गई थी। तब मराठवाडा और विदर्भ  में लगातार सूखे की स्थिति से लोगों के भूखों मरने की नौबत आ गई थी। महाराष्ट्र की तत्कालीन वसंतराव नाइक सरकार ने पहली बार रोजगार गारंटी योजना शुरू  की और इससे सूखा पीडितों को खासी राहत मिली।  बाद में योजना आयोग ने इस योजना को अपनाकर इसे पूरे देश  में लागू किया। तब से देश  में रोजगार के नाम पर कई योजनाएं चलाईं गई। इनमें फूड फॉर वर्क प्रोग्राम“, “जवाहर रोजगार योजना“, “इम्पलॉयमेंट एसोयोरेंस स्कीम“, “जवाहर ग्रामीण समृद्धि योजना“, और “सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना“ प्रमुख है। इन सभी योजानाओं का मकसद भी ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर सृजित करना था। मगर इन सभी योजनाओं के कार्यन्वयन में भयंकर खामियां रही हैं और बडे पैमाने पर फैले  भ्रष्टाचार  ने   इन रोजगार योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचने ही नहीं दिया। 1973 से 2004 के दरम्यान शुरु की गई विभिन्न योजनाओं पर तीन लाख करोड रु से ज्यादा का व्यय हो चुका है मगर इस दौरान गरीब रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वालों की संख्या बढी है, घटी नहीं है। सवाल उठता है कि रोजगार गारंटी योजनाओं का पैसा आखिर गया कहां ?  योजना आयोग (मौजूदा नीति आयोग) द्वारा करवाए गए मूल्यांकन में पाया गया है कि  नौकरशाही-ठेकेदारों के भ्रष्ट गठजोड ने ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकांश  योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंचने ही नहीं दिया।  पूर्व  प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सार्वजनिक तौर पर माना था कि विकास की योजनाओं का 90 फीसदी पैसा बिचौलियों द्वारा बीच में हजम कर दिया जाता है। देश  का प्रधानमंत्री अगर यह बात कहता है तो इससे सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकारी योजनाओं का क्या हश्र होता है। पिछले अनुभव से सीख लेकर मनरेगा को फुलप्रूफ बनाया गया है मगर इतना सब किए जाने के बावजूद भ्रष्टाचार   ने इस योजना को भी जकड लिया है। दुखद स्थिति यह है कि मनरेगा जैसी रोजगार योजनाओं से भ्रष्टाचार   निचले स्तर तक पांव पसार चुका है। यधपि मनरेगा कार्यों  में ठेकेदारों को बाहर रखा गया है पर पंचायत पदाधिकारी खुद ठेकेदार बनकर कार्य  कर रहे हैं। वैसे भी ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायत के अधिकतर पदाधिकारी अब तक ठेकेदारी का काम करते रहे हैं। मनरेगा को इन सब बातों से बचना होगा।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

The Saffron Terror: A threat to National Integration

One shouldn't be surprised over saffron terror on "beef". A deadly pattern with a common motive from Uttar Pradesh Dadri to a remote  Paccchad in Himachal Pradesh. is quite discernible. Everywhere, from Kashmir to Karntaka, saffron terror is  more conspicuous after Modi govt came to power at Delhi. As feared, it was bound to surface.  Saffron party leaders are doctrined in neologism- the acts of violence motivated by Hindu nationalism.  Its a "theocratic" state of mind  to reinforce the Hindutva on non-Hindus in India.  The acts are  perpetrated by members of  right-wig Hindu nationalist Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) and Abhinav Bharat. The term comes from the symbolic use made of the saffron color by the Hindu nationalist organisations They want to rule India by terrorizing citizens to accept "saffron agenda'. As such, they pride themselves speaking against Muslims for advocating Hindutva.  Sadly, for saffron leaders Hindutva means observing such petty things like cow protection, building Ram Temple, conversion of  minorities into Hindu religion and so on. Not surprisingly, the other day  Haryana chief minister Manohar Lal Khattar Hindutva spoke loudly advising Muslims to shun beef eating if they wanted to live in India unmindful of his allegiance to constitution of India that bars constitutional posts from invoking communal utterances.  The first known  "Saffron Terror"  was seen  in the  aftermath of  September 2008 Malegoan bomb blast in the predominantly Muslim town of Maharashtra. Police arrested members of a Hindu terrorist cell allegedly involved in Malegaon blast. As early as August 2010,  the then Home  Minister, P. Chidambaram had warned of "Saffron terror".  Since then, it has been surfacing  nakedly across the country. The recent killing of a leading liberal writer in Karnatka and subsequent threats to some others are the blatant manifestation of saffron terror. The lynching of a Muslim in Dadri for alleged beef eating and another man in Himachal for cow smuggling are also the manifestation  of same design. The lack of institutional resistance has helped saffron terror  to spread unabated. In a raft of terror cases that emerged in the 2000s and implicated Hindu extremists, state responses followed a familiar pattern, of denial, cover-up and delay. As they swung into action after each blast, state agencies seemed to operate on the assumption that terror, by definition, has a Muslim face, is propelled by jihadist agendas and must be “anti-national”. Malegaon, 2006, Samjhauta Express, 2007, Mecca Masjid, 2007, Ajmer Sharif, 2007, and again Malegaon, 2008, all tell the same story ‒ Muslims rounded up and arrested in a reflex reaction, fingers pointed at terror outfits like the Lashkar-e-Toiba and Jaish-e-Mohammed, and then the appearance of an amended list of suspects, mostly Hindu.  Rohini Salian, special public prosecutor in the 2008 Malegaon blast case, was reported as saying soon after the Bharatiya Janata Party-led government came to power last year, she was instructed by the National Investigation Agency to “go soft” on Hindu extremists accused in the case. This month, just as the case was to come up for a regular hearing before the Supreme Court, she was reportedly told another advocate would appear for the proceedings. The message, Salian says, was that state agencies did not want “favourable orders”. Investigation and prosecution both are short of commitment.  Moreover,  police force and intelligence agencies  have few Muslim personnel. In the 2006 blast in Nanded, which killed two people suspected of making bombs for a Hindutva terror network, the Central Bureau of Investigations diluted the charges, initially framed under the Unlawful Activities Prevention Act, and the terror trail went cold as initial leads were allegedly not followed up  .Apparantly,  law enforcement agencies take political briefings  when dealing with saffron terror. And politically, there has been a curious reticence about it, starting with a refusal to recognise the phenomenon at all. It was not until 2008, when the Maharashtra anti-terrorism squad chief, the late Hemant Karkare, launched investigations in the Malegaon blast case, that “saffron terror” became part of an accepted lexicon. Political reactions to Hindutva ranged from ambivalence to denial even in the past.  Now that saffron govt led by RSS pracharak Narendra Modi rules the nation, reticence over saffron terror is more discernible. If not let saffron party sack the likes of Khattar, Mahesh Sharma.

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2015

Wedding Ceremony: Outdated Rituals Need Recast

                                           
Relatives. friends and well-wishers: A ton of thanks for attending the auspicious wedding ceremony of my son. Sadly, we have missed some of you. Its really painful to find that some were out to settle old scores. Never mind, its a part of life. We are god-fearing people. At the slightest ignominious  happenings, we get tense and fearful . I ran into some bad period prior to my son's marriage. My wife fractured her left angle and remained immobile during the ceremony. It was interpreted as a bad omen. There were some happenings on the bride side too. All these made us fearful.  Nothing bad happened. All went as per our wishes. The wedding ceremony is most important social dispensation  in  our diverse society. Indian society  offers astounding variety in virtually every aspect of social life. Diversities of ethnic, linguistic, regional, economic, religious, class, and caste groups crosscut. Differences between north India and south India are particularly significant, especially in systems of marriage. The rapidly occurring changes affecting various regions and socioeconomic groups in disparate ways. Yet, amid the complexities of Indian life, widely accepted  social rituals enhance social harmony and order.Willingly or unwillingly, Hindus  have to follow, rituals, customs and traditions still religiously practised by us notwithstanding that  they eat up your money, time and energy.  Nevertheless, Hindu is a way of  disciplined social life not a stereo type as used by saffron elements.  Hinduism is both a civilization and a conglomerate of religions, with neither a beginning, a founder, nor a central authority, hierarchy, nor organization. India has one of the strongest  institution of marriage, not found elsewhere. The ceremonial rituals strengthen the institution of marriage. And these rituals are followed to lay a strong foundation of nuptial knot. Hindus have sought to idealize and sanctify the institution of marriage as no other civil society has done. Conjugal fidelity is regarded as the supreme virtue of a woman and it is this character that has protected the Hindu race and Hindu religion down the ages. It is with this end in view that so much stress has been laid to practize strictest rituals.Marriage is one of the most important institutions of human society. It has been variously defined by sociologists as well as by legal luminaries. Marriage  signifies the ceremony or event by means of which the common intention of a man and a woman to marry is publicly contracted that is to say, acknowledged and announced as is the case in India. We may like or not but, marriage But having regard to contemporary busy life, we need to cut short these rituals to save time and money. These rituals and customs were cast to fit ancient nomadic and subsequent agricultural society. Modern society is running fast and social mooring is the biggest causality. Let  us recast the rituals that suit our time. 

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

High Court Ruling on Article 370: Setback to Saffron Party

            अनुच्छेद 370ः भाजपा को झटका 



जम्मू-कश्मीर  को विशेष  दर्जा देने वाली संवैधानिक व्यवस्था  पर  उच्च न्यायालय के अहम फैसले से  अनुच्छेद 370 का मुखर  विरोध करने वालों को करारा झटका लगा है। उच्च न्यायालय की व्यवस्था के बाद इस अनुच्छेद का विरोध करना भगवा पार्टी को महंगा पड सकता है। मगर लाख टके का सवाल यह है कि भाजपा क्या अनुच्छेद 370 का विरोध करना छोड देगी? उच्च न्यायालय ने स्पष्ट  कर दिया है कि अनुच्छेद 370 स्थायी संवैधानिक व्यवस्था है, लिहाजा इसे न तो हटाया जा सकता है और न ही निरस्त किया जा सकता है।  अनुच्छेद 370 को भले ही संविधान के “अस्थायी, परिवर्तित और विशेष  प्रावधान“ वाले भाग 21 में रखा गया है, मगर इसके बावजूद यह संविधान में स्थायी तौर पर शामिल है। इसे निरस्त करने का अधिकार केवल संवैधानिक सभा (कांस्टिटयूनल असेंबली) को था मगर 1957 में भंग होने से पहले असेंबली ने राष्ट्र्पति  से इस अनुच्छेद को भंग करने की कोई सिफारिश  नहीं की थी। अब इस अनुच्छेद को निरस्त नहीं किया जा सकता है। यानी देश  की संसद भी इसे निरस्त नहीं कर सकती है। भाजपा जम्मू में बार-बार यही कहती रही है कि संसद में दो-तिहाई बहुमत मिलते ही वह अनुच्छेद 370 को निरस्त कर देगी। उच्च न्यायालय के मुताबिक संविधान का अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर  के लिए लागू कायदे-कानूनों और 1954 के बाद राज्य विधानसभा द्वारा पारित कानूनों को संरक्षण प्रदान करता है। उच्च न्यायालय ने फैसले में उन परिस्थितियों का भी उल्लेख किया है जिनके तहत आजादी मिलने पर तत्कालीन  जम्मू-कश्मीर रियासत का विलय भारत के साथ किया गया था। न्यायालय ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर रियासत ने अन्य रियासतों की तरह भारत के साथ स्वतः विलय नहीं किया था। विलय के समय राज्य के मुसलमान बहुल क्षेत्र को बनाए रखना तय हुआ था।  भारत में मुसलमान बहुल आबादी वाला यह एकमात्र राज्य है। जम्मू-कश्मीर की संप्रभुता सीमित है, इसीलिए इसे विशेष  दर्जा  दिया गया। जम्मू-कश्मीर को विशेष  दर्जा  देने की एक खास वजह भी है। विलय के समय इस रियासत का शासक हिंदू था मगर आबादी  मुसलमानों की ज्यादा थी। विलय के समय मुसलमानों को इस बात की आशंका थी कि हिंदू बहुल देश  में विलय के बाद उतरोत्तर जम्मू-कश्मीर में भी अन्य प्रांतों के हिंदू स्थायी तौर पर बस सकते हैं। इससे अन्तोगत्वा मुसलमान राज्य में अल्पसंख्यंक हो सकते हैं। मुसलमानों की यह आशंका बेजा नही थी। इसी बात का ख्याल करते हुए जम्मू-कश्मीर को संवैधानिक विशेष  दर्जा  दिया गया।  हिंदुवादी तत्कालीन जनसंघ और अब भाजपा को यह बात गवारा नहीं है। भाजपा शुरु से अनुच्छेद 370 का इसलिए मुखर विरोध कर रही है क्योंकि मुसलमान बहुल राज्य में उसकी दाल गलने से रही। भाजपा को आज भी मुसलमान विरोधी माना जाता है। और पार्टी के भगवा नेता आए दिन मुसलमान विरोधी आग उगल कर पार्टी के इस चरित्र  को सार्वजनिक तौर पर उजागर करने में कोई कसर भी नहीं छोडते है।  पिछले साल विधानसभा चुनाव के समय भी भाजपा ने जम्मू संभाग में स्थानीय नेताओं ने अनुच्छेद 370 को हटाने का मुद्दा उछाला था हालांकि पार्टी ने अधिकृत तौर पर इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। नतीजतन, विधानसभा चुनाव में भाजपा को जहां जम्मू में भारी जनादेश  मिला, वहीं कश्मीर  और जम्मू संभाग की मुसलमान बहुल हलकों में पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली।  कश्मीर घाटी के  कई हलकों में तो भाजपा प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई। बहरहाल, जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का विरोध करना भगवा पार्टी की सामरिक विवशता है। यही एक मुद्दा है जिसके बलबूते जम्मू में अब तक भगवा पार्टी अपना जनाधार संभाले हुए है। अगर भाजपा अनुच्छेद 370 का विरोध करना छोड देती है, तो जम्मू में भी पार्टी का जनाधार खिसक सकता है। भगवा पार्टी ऐसा कभी नहीं होने देगी। न्याय का तकाजा तो यही है कि भगवा पार्टी उच्च न्यायालय के फैसले के बाद अनुच्छेद 370 का विरोध करना छोड दे मगर पार्टी ऐसा करेगी, इस पर संदेह है।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

Can An MP Appear in Advertisement? Is it not a Profit?

Imagine how saffron party would react if Congress president Sonia Gandhi or for that matter Vice-President Rahul Gandhi, both member of parliament appear in  an advertisement. BJP would have made the Gandhi's life miserable by crying hoarse and take the issue to the street. That's what they did in 2006 when Sonia Gandhi had to resign as chairperson of the National Advisory Council. Being a member of parliament, she was barred from holding an office of profit. Under rule, an MP can't hold an office of profit. BJP members had objected to Sonia Gandhi holding an office of profit. It was then argued that the post of chairperson of the National Advisory Council was an office of profit. Big B MP wife Jaya Bachchan had to face  expulsion from the Rajya Sabha, because she was also the chairperson of the Uttar Pradesh Film Development Council, deemed an office of profit. The reference to Sonia Gandhi and Jaya Bachchan is being invoked to drive home a point as to  whether can an Member of Parliament  work in an advertisement ? The point is pertinent as  BJP MP from Chandigarh Kirron Kher is appearing in an advertisement forYog Guru Baba Ramdev product.  Article 102 (1)(A) of the Indian Constitution bars an MP or an MLA from holding any office of profit under the Government of India or in any state other than an office declared by the Parliament by law.  However,  phrase 'office of profit' is ambiguous. Its not clear whether by appearing  in advertisement, an MP invokes penalty under Article 102(1)(A). But by its very implications, an  office of profit means a position that brings to the person holding it some financial gain, or advantage, or benefit. It may be an office or place of profit if it carries some remuneration, financial advantage, benefit etc. The amount of such profit is immaterial. Under the given situation, Kirron Kher  as an MP is much better positioned to benefit from appearing in advertisements than she was as an actor. It may be that  the advertisement might have been shot before Kirron Kher was elected as member of parliament. However, it doesn't matter. Its broadcast is more important and using an MP in an advertisement is too bad even otherwise.  Members of Parliament in India draw salary  and allowances from state exchequer and as such thy are treated public servants. Under law, public servants can't drive any other monetary benefits than the ones he is drawing from state exchequer. As such, by appearing in an advertisement, an pure commercial activity- MP Kirron Kher is as guilty of penalty under law as was Sonia Gandhi and   Jaya Bachchan. The problem with BJP is that it suffers from the syndrome of "convenient consciousness". BJP  dodges such issues when it comes to the party members but resorts to all sort of hue and cry when others are involved. Being an MP, Madame Kher is expected to be abreast of rules and regulations. Ignorance of law is no bliss for her.

I

The Saffron Attempts to Balkanize India ?

                                                     देश की अखंडता पर चोट 

केन्द्र में मोदी सरकार के सत्ता में आने से जैसे पूरे देश  में भाजपाइयों को कुछ भी करने की खुली  छूट मिल गई है।  आए दिन  ऊट-पटांग के काम, ऊल-जलूल की बयानबाजी और धमकियां यही दर्शाती  हैं। वीरवार को जम्मू-कश्मीर  विधानसभा में भाजपा विधायकों ने निर्दलीय विधायक की पिटाई कर दी। सिर्फ  इसलिए कि निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद  ने एक दिन पहले श्रीनगर स्थित विधायक सदन में “बीफ पार्टी“ दी थी। भाजपा विधायक इस  बात से क्षुब्ध थे। वीरवार को विधानसभा की कार्यवाही  शुरु होने से पहले भाजपा विधायक राजीव शर्मा  ने पहले रशीद  को थप्पड मारा और फिर सात विधायकों ने उनसे धक्का-मुक्की की। यह सब सदन के भीतर हुआ। इस घटना पर शर्मिंदा होने की बजाय भाजपा विधायकों ने धमकी दी कि “ यदि किसी ने गोमाता का अपमान किया, हम आगे भी ऐसा ही करेंगें“। यानी गोमाता के नाम पर भाजपाई कुछ भी कर सकते हैं। पिछले कुछ दिनों से गोमांस पर प्रतिबंध लगाकर जबरदस्त सियासी खेल खेला जा रहा है। भाजपा  शासित राज्यों में जैन समुदाय को खुश  करने के लिए सरकार ने हाल ही में गोमांस पर प्रतिबंध भी लगा रखा है।  यांनी देश  में किसी नागरिक  को क्या नहीं खाना चाहिए और क्या नहीं पहनना चाहिए, यह सब भगवा पार्टी से पूछ कर करना चाहिए। इतना ही नहीं विद्धानों को भी वही लिखना चाहिए जो भगवा पार्टी के समर्थक चाहते हैं। साफ-साफ शब्दों में कहा जाए तो भारत के  नागरिकों को भगवा पार्टी की इच्छानुसार जीना चाहिए। और अगर कोई ऐसा नहीं कर सकता है तो भगवा पार्टी के समर्थक कहते हैं उसे पाकिस्तान चले जाना चाहिए। भगवा पार्टी का वश  चले तो भारत में वही रह सकता है जो उनके मुताबिक जिए और मरे। केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद से भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों की  अब तक की कार्यशैली का यही संदेश दे रही  है। यानी जिस बात का भय था, वही हो रहा है। विशुद्ध हिंदुवादी राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ की उपज दक्षिणपंथी भाजपा को मुसलमान विरोधी माना जाता है और भाजपाइयों ने अपनी कारस्तानियों से यही सिद्ध भी किया है। मुसलमान  सदियों से गोमांस का सेवन करते हैं। मुसलमान ही नहीं ईसाई भी गोमांस खाते हैं। यूरोप में गोमांस काफी लोकप्रिय है। पश्चिम  देशों में गाय को दूध के अलावा मांस के लिए भी पाला जाता है। यूरोप में अगर दुधारु पशु  कम दूध देने लगे तो उसे अनुत्पादक मानकर मांस के लिए इस्तेमाल किया जाता है। हर धर्म  और समाज का अपना खान-पान होता है। और कई मामलों में एक समाज का खान-पान दूसरे का विरोधीभासी भी हो सकता है। इसका यह कतई मतलब नहीं कि हम दूसरों पर अपने खान-पान और तौर-तरीके थोपें । दुनिया में भारत और नेपाल के सिवा किसी भी देश  में हिंदू नहीं बसते हैं। तो क्या  भाजपाई पूरी दुनिया में गोमांस सेवन को रोक लेंगे?  इस मामले में भाजपाइयों का आचरण भी दोगला है। कई भाजपाई खुद मांसाहारी हैं। आरएसएस से लंबे समय से जुडे एक नेता ने खुलासा किया है कि दो सरसंघ संचालक मांसाहारी रह चुके हैं। ताजा रिपोर्ट  के अनुसार भाजपा के गोभक्त विधायक संगीत सोम ने 2009 में अलीगढ में मांस का प्रोसेसिंग प्लांट लगाने के लिए  जमीन खरीदी थी और इसमें उनके साथ एक मुसलमान पार्टनर थे। वानिकी विशेषज्ञों का मानना है कि गाय के प्रति भारत में गहरी आस्था ने वनों को खासा नुकसान हो रहा है। इसकी प्रमुख वजह है कि भारत में दुधारु नहीं रहने पर भी गाय को पाला-पोसा जाता है। भारत में अनुपात्दक दुधारु पषुओं की आबादी अन्य देषों की तुलना में कहीं ज्यादा है। इससे चारे के लिए वनों और ग्रीन कवर को खासा नुकसान हो रहा है। भारत में सडकों, चरागाहों और गली-मोहल्ले में गाय को पाला-पोसा जाता है। निसंदेह, गाय भारतीय में हिंदू समाज का अहम हिस्सा है। गाय को गोमाता का दर्जा देकर हिंदुओं की आस्था का सम्मान भी किया जाता है। मगर यह भी सत्य है कि गाय को पलने के लिए सडकों और सार्वजनिक स्थलों पर छोडकर हम कोई बडा धर्म का काम नहीं कर रहे हैं। सच यह है कि पूरा मुद्दा सियासी है। भाजपाई धर्म के ठेकेदार बनकर सियासी हितों की खातिर हिंदू मतदाताओं के धु्रवीकरण के लिए ही कभी राम मंदिर तो कभी गोमता की रक्षा का मुद्दा उछालते  हैं। इससे देश  की अखंडता को कितना नुकसान हो रहा है, इससे उन्हें कोई सरोकर नहीं है। यह स्थिति कतई देश  के हित में नहीं है।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

Dadri Lynching: Mr. Modi, Stop Hatemongers of Your Party

                                               राजनीति का गंदा खेल

उत्तर प्रदेश  में  दादरी कांड पर पीडित परिवार के जख्मों पर महलम-पट्टी करने की बजाय सियासी दल सिर्फ  सियासत का खेल रहे हैं। 28 सितंबर की रात को दादरी के निकटवर्ती बिसहाडा गांव में एक मुस्लिम परिवार के  गोमांस सेवन की अफवाह पर कुछ लोगों ने 52-वर्षीय  मोहम्मद इखलाक की हत्या कर दी थी और उसके 22 वर्षीय   पुत्र को गंभीर रुप से जख्मी कर दिया था। बिसहाडा हत्याकांड से देश  में सांप्रदायिक सोहार्द की नाजुकता का पता चलता है।  मंदिर परिसर के पीए (पब्लिक अनाउसमेंट) सिस्टम से  सार्वजनिक अफवाह फैलाई जाती  है कि गांव के इखलाक परिवार ने गौहत्या करके ईद पर गोमांस का सेवन किया। इस अफवाह से क्षुब्ध कुछ लोग इखलाक परिवार के घर पर हमला कर देते हैं। मोहम्मद इखलाक को पीट-पीट कर मार दिया जाता है। उसके पुत्र को गंभीर रुप से घायल कर दिया जाता है। इखलाक की 82-वर्षीय वृद्ध मां और पत्नी को भी बख्शा  नहीं गया। पीडित परिवार के हिंदू पडोसी ने बीच-बचाव करने की बहुत कोशिश  की मगर वह इखलाक को बचा नहीं पाया। 70 साल से इखलाक परिवार बिसहाडा गांव में रह रहा है मगर कथित हिंदु धर्म  के कथित ठेकेदारों ने इस बात का भी लिहाज नहीं किया। हमलावरों में सात भाजपा के कार्यकर्ता  थे। हत्याकांड के अगले दिन पुलिस ने स्थानीय भाजपा नेता के पुत्र को गिरफ्तार कर लिया।  पुलिस  द्वारा  मंदिर के पुजारी को हिरासत में लेकर पूछताछ किए जाने पर पता चला कि गौमांस सेवन की अफवाह फैलाने के लिए दो युवकों ने पुजारी पर दबाव डाला गया था। बिसहाडा हत्याकांड की विस्तृत तफ्तीश  से स्पष्ट  होता है कि यह हत्याकांड सुनियोजित था। तब से इस हत्याकांड पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है। सियासी नेताओं को आगे-पीछे तो गांवों का दौरा करने का समय नहीं मिलता है मगर बिसहाडा जैसा कांड होते ही वे दौडे-दौडे चले आते हैं। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर उत्तर प्रदेश  के मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल बिसहाडा आकर पीडित परिवार से मुलाकात कर चुके हैं। गांव के लोग सियासी  नेताओं के दौरे से आजिज आ चुके हैं।  सियासी नेताओं के लगातार दौरे से परेशान बिसहाडा के लोग सियासी नेताओं का गांव नहीं आने का कई बार आहवान कर चुके हैं।  बुधवार को विश्व  हिंदू परिषद  नेता साध्वी प्राची को गांव में आने नहीं दिया गया। सियासी नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए गांव  आकर सांप्रदायिक सौहार्द  को बिगाड रहे हैं। हैरानी इस बात पर है कि  राष्ट्र्पति  प्रणब मुखर्जी द्वारा इस दुखद कांड पर गहरी चिंता व्यक्त किए जाने तक प्रधानमंत्री ने इस प्रकरण पर एक शब्द नहीं बोला। बुधवार को राष्ट्र्पति ने बिसाहडा का नाम लिए बगैर देश  में आए दिन हो रही हत्याओं पर चिंता जताकर  भाजपा नीत राजग सरकार की अंर्तात्मा को झकझोर कर रख दिया। नतीजतन, वीरवार को प्रधानमंत्री ने बिहार चुनाव रैली में राश्ट्रपति की नेक सलाह पर चलने का आहवान किया। राष्ट्र्पति ने  जनमानस से देश  की  “सांस्कृतिक विविधता“, सहिष्णुता  और बहुलता का सम्मान करने का आहवान किया है। तथापि, कट्टरवादियों को इन सब बातों का कोई असर नहीं होता है। सच्चाई यह है कि भगवा पार्टी के कार्यकर्ता केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार के सत्ता में आने के बाद बेखौफ हो गए हैं। कर्नाटक में कट्टरपंथी सरेआम और सार्वजनिक तौर पर उदार विचारधारी विद्धानों को धमका रहे हैं। इस साल अगस्त में कन्नड के विख्यात लेखक और विद्धान डाक्टर एमएम कलबर्गी की हत्या कर दी गई थी। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार के बावजूद कट्टरपंथियों को कानून तक भय नहीं है। राजपूत बहुल बिसहेडा गांव में अभी भी सांप्रदायिक तनाव बना हुआ है। पीडित परिवार को दिल्ली लाया जा चुका है। इससे गांव में नेताओं के दौरे बंद हो सकते हैं। बहरहाल, बिसहाडा गांव को नेताओं के दौरों की बजाय सांप्रदायिक सौहर्द  कायम करने की जरुरत है।   

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

Aam Aadami Party Turns Power And Money Hungry

                                                       सत्ता की भूख

दिल्ली में विधायकों के वेतन और भत्ते लगभग चार गुना बढाने के प्रस्ताव ने आम आदमी पार्टी की कलई खोल दी है। वित्तीय संसाधनों के संकट से जूझ रही दिल्ली विधानसभा की इस दरियादिली पर तीखी प्रतिक्रियाएं आना स्वभाविक है।  भाजपा  और कांग्रेस दोनों ने प्रस्तावित वृद्धि का मुखर विरोध किया है। और अगर दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने विधायकों की वेतन-भत्ते वृद्धि संबंधी सिफारिशें  मान ली, तो यही माना जाएगा कि आम आदमी पार्टी भी सत्ता और सुविधाओं की भूखी है। दिल्ली विधानसभा अध्यक्ष द्वारा गठित तीन सदस्यीय समिति ने दिल्ली के विधायकों के वेतन एवं भत्तों में भारी वृद्धि की सिफारिश  की है।  और  वृद्धि भी कम नहीं, बल्कि चार गुना से ज्यादा सुझाई गई है। विधायकों को इस समय दस हजार रु का मासिक  बेसिक वेतन मिलता है। समिति ने इसे बढाकर पचास हजार रु कर दिया है। हलका भत्ता 18,000 से बढाकर 50,000 रु और वाहन भत्ता 6,000 से बढाकर 30,000 रु मासिक सुझाया गया है। अभी दिल्ली के विधायकों को वेतन-भत्ते मिलाकर 88,000 रु मिला करते हैं। समिति की सिफारिश  के बाद यह बढकर 2.10 लाख रु हो जाएंगे।  और भी कई भत्ते बढाए गए हैं। वाहन खरीदने के लिए अब 12 लाख रु तक का ऋण मिलेगा। पहले अधिकतम चार लाख रु मिला करते थे। 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में 67 सदस्य आम आदमी पार्टी के हैं। यानी आप के सदस्यों की  मौंजा  ही  मौंजा हो जायेगी । वैसे पूर्व  विधायकों की पेंशन भी दोगुना बढा दी गई है। इसके अलावा पहले कार्यकाल के बाद हर साल पर एक हजार की पेंशन  वृद्धि दी गई है। यानी चार बार विधायक रहने पर मासिक तीस हजार की पेंशन मिला करेगी। सितंबर 2011 में शीला  दीक्षित सरकार ने विधायकों के वेतन-भत्तों में सौ फीसदी  वृद्धि की थी। अब मूल वेतन में चार सौ फीसदी  वृद्धि से चार साल में पांच सौ फीसदी से ज्यादा का इजाफा अत्याधिक माना जा रहा है। आम आदमी पार्टी विधान सभा चुनाव से पहले सादगी और आम आदमी की तरह गुजर-बसर करने का दावा करती रही है। मगर सत्ता में आते ही केजरीवाल सरकार को भी औरों की तरह सुविधाओं और शान -ए-शौकत की हवा लग गई है। विपक्ष के इन आरोपों में काफी वजन है कि केजरीवाल सरकार की कथनी और करनी में भारी अंतर है। इस साल फरवरी में विधान सभा में प्रचंड बहुमत मिलने के बाद से आम आदमी पार्टी सिवा बिखरने के कुछ भी ठोस नहीं कर पाई है। राष्ट्रीय  स्तर पर आप बहुत पहले टूट चुकी है।  ”इंडिया अंगेस्ट  करप्शन “ के जमाने से केजरीवाल के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले नामचीन वकील  प्रशांत  भूषण  को दिल्ली चुनाव के तुरंत बाद केजरीवाल ने योगेन्द्र यादव के साथ पार्टी से बाहर कर दिया। महाराष्ट्र  यूनिट  को भंग कर दिया गया है और पंजाब में पार्टी पूरी तरह से बिखर चुकी है। पार्टी के चार सांसदों मेंसे दो को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है। लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को  पंजाब में ही एकमात्र सफलता मिली थी और इस राज्य से चार सांसद चुने गए थे। पंजाब में भारी जनसमर्थन मिलने के बावजूद बगावत ने  पार्टी को तहस-नहस कर दिया है। हिमाचल प्रदेश  में पार्टी की लुटिया बनने से पहले ही डूब चुकी थी। केजरीवाल के गृह राज्य हरियाणा में भी पार्टी का नाममात्र का अस्तित्व रह गया है। सबसे अहम बात यह है कि अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी ने  जो विश्वास  व्यक्त किया था, वह काफी हद तक काफूर हो चुका है। केजरीवाल और उनकी पार्टी को जनमानस ने औरों से अलग माना था। समकालीन  विश्वासघाती  , घाघ और काइंया नेताओं की जमात में  केजरीवाल की कार्यशैली में आम आदमी को उम्मीद की किरण नजर आई थी। वे औरो से अलग लग रहे थे पर विधानसभा चुनाव के बाद उनकी कार्यशैली में एकदम बदलाव आ गया है। केजरीवाल भी वही परंपरागत नेताओं की जमात में शामिल हो गए हैं। 1977 की तरह एक बार फिर आंदोलन से उपजे नेताओं ने जनता को निराश  किया है।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

Where Are We Going: Saffron Agenda Will Take Us to Nowhere

                                          कहां जा रहे हैं हम ?

जगतप्रसिद्ध ऐतिहासिक धार्मिक नगर वाराणसी में सोमवार को साधुओं की प्रतिकार रैली के दौरान भडकी हिंसा से देश  स्तब्ध है। ऋशि-मुनियों और तपस्वियों की तपोभूमि में साधु-संतों की रैली में हिंसा का भडकना शुभ संकेत नहीं है। उपद्रवियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को लाठिया भांजनी पडी, अश्रू गैस और रबर बुलेट का इस्तेमाल करना पडा। यहां तक कि पांच थाना क्षेत्रों में कफर्यू  लगाना पडा। उपद्रव के 13 दिन पहले भी पुलिस को लाठीचार्ज  करना पडा था। सोमवार की प्रतिकार रैली इसी  लाठीचार्ज  के विरोध में निकाली गई थी। और यह सब इसलिए क्योंकि प्रशासन ने 21 सितंबर को गंगा में मूर्ति विसर्जन नहीं करने दी थी। हाई कोर्ट ने मूर्ति विर्सजन पर रोक लगा दी थी। इस रोक के बावजूद साधु-संत 23 सितंबर को मूर्ति विसर्जन  पर अडे रहे। इस पर पुलिस ने लाठियों से साधु-संतों को जमकर पीटा था । सोमवार की प्रतिकार रैली में देश  भर के साधु-संतों के अलावा साध्वी प्राची भी शरीक हुई। साध्वी ने ऐलान किया कि जब तक राज्य के मुख्यमंत्री अखिलेष यादव लाठीचार्ज के लिए साधु-संतों से माफी नहीं मांगते हैं, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।  उत्तर प्रदेश  में समाजवादी पार्टी की सरकार है और अधिकांश  साधु-संत भारतीय जनता पार्टी के साथ हैं। साधु-संतों का आरोप है कि यह सब समाजवादी पार्टी सरकार का किया-धरा है। समाजवादी पार्टी को मुसलमानों का खैर-खवाह माना जाता है। भगवा पार्टी भाजपा हिंदुओं की संरक्षक है।  यानी पूरा मामला सियासी है। भगवा पार्टी मुसलमानों के खिलाफ आग उगल कर मतदाताओं का ध्रुवीकरण  कराने की फिराक में है। सवा साल बाद जनवरी-फरवरी 2017 में उत्तर प्रदेश  में विधानसभा चुनाव कराए जाने हैं।  भगवा पार्टी मुसलमानों के खिलाफ आग उगल कर मतदाताओं का ध्रुवीकरण  कराना  चाहती है। इसी ध्रुवीकरण ने भाजपा को लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत दिया था। चुनाव नजदीक आते ही भगवा पार्टी और राष्ट्रीय  स्वंय सेवक से सम्बद्ध विश्व   हिन्दू  परिषद और बजरंग दल जैसे संगठन के वर्कर सक्रिय हो जाते हैं और मुसलमानों के खिलाफ आग उगलना  शुरु कर देते हैं। लोकसभा चुनाव से पहले यही सिलसिला देखा गया था। अगस्त सितंबर 2013 में उत्तर प्रदेश  के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगे फूटे थे। इन दंगों में 42 मुसलमान और 20 हिंदू मारे गए थे। तब बीस साल में पहली बार राज्य में सांप्रदायिक दंगे फूटने पर सेना को तैनात करना पडा था। भाजपा विधायक संगीत सोम को मुजफ्फरनगर दंगों में आरोपी भी बनाया गया था।  2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा मुजफ्फरनगर जिले की सभी सीटें जीत गई थीं और समाजवादी पार्टी को मुंह की खानी पडी थी। हाल ही में उतर राज्य के दिल्ली से सटे दादरी में एक मुसलमान की गौमांस खाने के संदेह पर उग्र लोगों ने हत्या कर दी थी। इस हत्या में भी भाजपा के सात नेताओं का नाम आया है। मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी संगीत सोम ने दादरी हत्याकांड पर फिर विवादित बयान दिया है और इसके लिए उन पर कार्रवाई भी की जा सकती है। केन्द्र में भाजपा सरकार के आने के बाद से  भगवाकरण के निरंतर प्रयास हो रहे हैं। लोगों को क्या पहनाना है, खाना है, पढना अथवा देखना है, इस पर बंदिशें लगाईं जा रही हैं। भाजपा नीत सरकार चाहती है हम वही पढें और देखें जो मोदी सरकार हमें पढाना अथवा दिखाना चाहती है। इसी संदर्भ में देश  के बुद्धिजीवियों का मानना है कि प्रधानमंत्री का आकाशवाणी पर “मन की बात“ कार्यक्रम का मूल प्रयोजन भी यही है। साधु-संतों का आंदोलित होना हमारी सभ्यता के खिलाफ है। साधु-संत षांति और भाईचारे का अलख जगाते हैं। भारतीय समाज सहिष्णुता  की मजबूत नींव पर टिका है। इसे किसी भी सूरत में ध्वस्त नहीं किया जा सकता।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015

Truckers' Strike: Why Should Public Suffer?

                                                            जनता क्यों भुगते खामियाजा?


हडताल करके जनमानस को परेशान करना देश  में आम बात हो गई है। किसी को इस बात की चिंता नही है कि इससे देश  को कितना नुकसान हो रहा है। न्यायपालिका कई बार हडताल को अवैध बता चुकी है मगर इसका भी कोई असर नहीं पडा है। पिछले पांच दिन से  ट्रांसपोर्टर्स   देशव्यापी हडताल पर है। इससे देश  के विभिन्न भागों में फल-सब्जियां महंगी हो गई हैं हालांकि  ट्रक ऑपरेटर्स  ने सब्जियों, दूध और दवाओं की ढुलाई को  हडताल से बाहर रखा है। अब हडताली  ट्रांसपोर्टर्स ने धमकी दी है कि अगर जल्द उनकी मांगें नहीं मानी गई तो दूध, सब्जी और दवाओं की  ढुलाई भी रोक दी जाएगी। ऑल इंडिया मोटर्स  ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (एआईएमटीसी) के आहवान पर जारी इस हडताल से अब तक  ट्रांसपोर्टर्स को 7500 करोड रु का नुकसान हो चुका है। हडताल से अर्थव्यवस्था को 50,000 करोड रु से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। जैसे-जैसे हडताल जारी रहेगी, नुकसान बढता जाएगा। एआईएमटीसी का दावा है कि 90 लाख ट्रक और 50 लाख बस ऑपरेटर्स  उसके सदस्य हैं और सभी हडताल पर हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश  और चंडीगढ के लगभग दो लाख ट्रक इस हडताल में शामिल है। हडताल से लुधियाना के स्क्रैप डीलर्स  का हजारों टन स्क्रैप  ढुलाई नहीं होने से रुका पडा है। पानीपत के हैडलूम निर्यातकों पर आर्डर रदद होने का  खतरा मंडरा रहा है।  अगर हडताल दो-एक दिन में खत्म नहीं हो जाती, रीजन के उद्योग बंद हो सकते हैं।  सबसे ज्यादा नुकसान लुधियाना और जालंधर के उधोगों को हो रहा है। लुधियाना से होजरी, हैंडटूल्स, साइकिल और ऑटो पार्टस का निर्यात रुका पडा है। हडताल की वजह टोल टैक्स व्यवस्था है।   ट्रांसपोर्टर्स (एआईएमटीसी) इस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग कर रहे है़।  एआईएमटीसी का आरोप है कि टोल टैक्स व्यवस्था से उन्हें प्रताडित किया जा रहा है।  ट्रांसपोर्टर्स की इस शिकायत को दूर करने के लिए सरकार ने दिसंबर से ई-टोल टैक्स व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया है। पर  ट्रांसपोर्टर्स को यह भी स्वीकार नहीं है। उनकी मांग है कि टोल-टैक्स को पूरी तरह खत्म करके रोड टैक्स की तरह इसे भी एकमुश्त  वसूला जाए।  सरकार कहती है कि यह मुमकिन नहीं है। देश  में करीब 325 टोल हैं और इनमेंसे 50 फीसदी निजी सेक्टर ने अपना पैसा लगाकर बनवा रखे हैं। निजी क्षेत्र ने इन टोलस को इस षर्त पर बनाया था कि बाद में टोल टैक्स एकत्र करके वे अपना पैसा वसूल कर लेंगे। इस स्थिति में मौजूदा टोल व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता है। अगर ऐसा किया जाता है तो सरकार को टोल बनवाने वालों को भारी हर्जाना देना पड सकता है। बहरहाल, स्थिति विकट है। सरकार की अपनी विवशता है, इसीलिए शनिवार को दोनों पक्षों में वार्ता किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई। वैसे ट्रांसपोर्टर्स की इस मांग में वजन है कि रोड टैक्स की तरह टोल टैक्स भी एकमुश्त एकत्र किया जाना चाहिए। इससे न केवल सरकार, अलबत्ता ट्रक ऑपरेर्टस को भी तरह-तरह के झंझटों से मुक्ति मिल सकती है। एकत्रित टोल टैक्स से सरकार निजी क्षेत्र का निवेश  लौटा सकती है। एक और विकल्प यह है कि ट्रांसपोर्टर्स को टोल टैक्स  में  शामिल किया जा सकता है। 90 लाख सदस्य वाले  एआईएमटीसी के लिए यह काम मुश्किल  नहीं है। वैसे भी देश  में टोल टैक्स व्यवस्था आम जनता पर भारी पड रही है। अपने वाहन में सफर करने वालों को सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। चंडीगढ से पठानकोट-जम्मू तक के निजी वाहन से आने-जाने पर छह सौ रु से ज्यादा का टोल टैक्स देना पडता है। यह आम आदमी की लूट-खसोट की पराकाष्ठा  है। किसी भी देश  में इस तरह अपने वाहन में सफर करने वालों का शोषण  नहीं किया जाता। सरकार को ट्रक ऑपरेटर्स  से वातचीत करके हडताल को तुरंत खत्म कराना चाहिए। लोगों को बार-बार हडताल का खामियाजा क्यों भुगतना पडता है।   

रविवार, 4 अक्टूबर 2015

Hats off to Govt Doctors and Para-medical Staff

Hats off to doctors and para-medical staff working in govt-run hospitals. They work under tremendous pressure. Yet they look cheerful, docile and  are very helpful.  A visit to any govt run hospitals is horrible. You find stream of patients and it looks as if the entire city has fallen ill. As the govt run hospitals are meant for poor and lower middle class, the rush is very heavy.  The WHO report says the incidence of sickness is more frequent among lower class as they are more prone to diseases. Even the chemist shops run inside hospitals' premises face huge rush. Media places govt run hospitals  more negatively than  private ones. So govt run hospitals don't carry good image despite the fact they serve without any incentive and are subjected to political pressure.  I didn't carry good opinion about govt run hospitals for obvious reasons. But my opinion was changed after my wife was admitted  in govt hospital sector 16.  She had broken her ankle and had to be operated. My son wasn't prepared to admit her in govt hospital as he wasn't sure of prompt services. But my fraternity advised me to get her admitted in sector 16 general hospital. Despite heavy rush of patients, my wife was attended very well. Doctors looked after to their best. She was diagnosed with high sugar, doctors looked more worried than the patient and did their best to control her blood sugar before she was  were treated Now, his opinion is  completely  changed . He has rated the  hospital as one of the best in the region . Must admit, I was prejudiced. Govt hospitals aren't that bad. Despite working on contractual assignment, the conduct of para-medical staff, especially nurses are too good. We need to change our perception. 

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

Work For Mahatma Gandhi Ideals

                                                          बापू के गुण अपनाएं




राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी की 146वीं जयंती पर शुक्रवार को हमने वही किया जो हम साल-दर-साल कर रहें हैं। हर साल की तरह इस बार भी देश  में जगह-जगह उन्हें स्मरण किया गया। राजघाट जाकर प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने बापू को नमन किया और उन्हें अपना सबसे बडा प्रेरणा स्त्रोत बताया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी भी राजघाट गईं और महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि दी। पूरे देश  में यही क्रम चलता रहा। बस इससे ज्यादा कुछ नहीं। आजादी के बाद से आज तक यही हो रहा है। साल में दो बार गांधी जयंती दो अक्टूबर और उनकी पुण्य तिथि 30 जनवरी को हम राष्ट्रपिता  को याद करते हैं। उनके सिद्धांतो पर चलने की कसमें खाते हैं और फिर सारे साल उन्हें भूल जाते हैं। पिछले साल गांधी जयंती पर प्रधानमंत्री ने देशव्यापी “स्वच्छता अभियान“  शुरु किया था। “स्वच्छ भारत“ महात्मा गांधी का सपना था। पिछले साल जब “स्वच्छ भारत“ शुरु किया गया था, तब बापू के इस सपने को साकार करने का संकल्प लिया गया था। एक साल में यह संकल्प रफूचक्कर हो गया है। जगह-जगह फैली गंदगी इस अभियान के हश्र को बयां करती है। देश  के सबसे “खुबसूरत शहर“ चंडीगढ तक को सरकार स्वच्छ नहीं बना पाई जबकि यह काम इतना कठिन  नहीं था। चंडीगढ के पडोसी पंचकूला में इस अभियान का कोई नामोनिशान तक नहीं है। इस बार प्रधानमंत्री गांधी जयंती पर बिहार में चुनावी जनसभाओं को संबोधित करने में व्यस्त रहे। वहां प्रधानमंत्री ने “पर्यावरण“ को गांधी से जोडकर एक नया संकल्प लिया। पिछले साल शुरु किए गए “स्वच्छ अभियान“ की समीक्षा तक नहीं की गई।  टवीटर पर प्रधानमंत्री ने लोगों से इस अभियान को सफल बनाने का आहवान करके इतिश्री कर ली। सच कहा जाए तो आजादी के बाद से आज तक राष्ट्रपिता  मात्र  “वोट भुनाने“ का जरिया बनकर रह गए हैं। लंबे समय तक कांग्रेस ने बापू को “वोट“ के लिए भुनाया और अब भाजपा महात्मा के नाम को भुना रही है। दिल्ली के वरिश्ठ भाजपा नेता विजय गोयल ने तो हद ही कर दी है। अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महात्मा गांधी से तुलना की है। महात्मा गांधी साधारण  शख्सियत नहीं थे। वे महामानव थे। हम सब उनके समक्ष बौने नजर आते है। वे सत्ता से कोसों दूर थे। अपने जमाने में उनकी सोच सबसे अलग थी। महात्मा गांधी ने वह कर दिखाया जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते।  अहिंसक आंदोलनों से महाशक्तिशाली ब्रिटिश  साम्राज्य को परास्त करने की मिसाल इतिहास में ढूंढे नहीं मिलती है।  महात्मा गांधी सबसे अलग थे।  उनकी कोई सानी नहीं कर सकता। एक जमाने में दक्षिणपंथी जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) महात्मा गांधी से घृणा करती  थी  और उन्हें देश  की ज्वलंत समस्याओं का मूल कारण मानते थे। मगर भाजपा के नए अवतार में अस्सी के दशक में पार्टी को महात्मा गांधी याद आए और भाजपा ने “गांधीवादी समाजवाद“ को भुनाने की कोशिश  की। अब गांधी के उन कार्यक्रमों को अपनाया जा रहा है, जिन्हें कांग्रेस पहले ही भुना चुकी है। भाजपा का “स्वदेशी  नारा“ भी महात्मा गांधी के “स्वदेशी  आंदोलन “ की नकल है। पिछले  सात दशक से यही सिलसिला चल रहा है। महात्मा गांधी सियासी नेताओं के लिए कितने अहम है, इसका पता इस बात से चलता है कि महात्मा गांधी को आज तक “राष्ट्रपिता  “ के अधिकृत सम्मान से नवाजा तक नहीं गया है। भारत को आज महात्मा गांधी के दिखाए मार्ग पर चलने की सख्त जरुरत है। सत्य, सादगी, अहिंसा और सहिष्णुता   में बापू का अटल विश्वास  था। उनके सपनों के भारत का निर्माण करने के लिए इन्हीं गुणों को अपनाने की जरुरत है। यही बापू के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015

Need For Fast-track Justice

                                            त्वरित न्याय की दरकार

निर्दोष  लोगों के हत्यारों को सजा-ए-मौत ही मिलनी चाहिए। यही न्याय का तकाजा है। मुंबई की अदालत ने  2006 के मुंबई ट्रेन ब्लास्ट के पांच अभियुक्तों को सजा-ए-मौत दी है। सजा-ए-मौत से  हत्यारों को  कडा मैसेज  जाता है।  देर से सही मगर हादसे के शिकार लोगों के परिजनों के जख्मों पर मलहम-पट्टी हुई है। निर्दोष  लोगों की हत्या करने से बडा कोई जघन्य अपराध नहीं हो सकता।  मुंबई लोकल ट्रेन में 11 जुलाई 2006 को 11 मिनट के अंतराल में सात श्रृंखलाबद्ध धमाके कराकर आतंकियों ने 209 लोगों की हत्या की थी। इस हादसे में 700 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। बम धमाके प्रैशर कुकर का इस्तेमाल करके किए गए। हत्यारों का मकसद आतंक फैलाकर बदला लेना था। इस नरसंहार के लिए पुलिस ने लश्कर  के कथित कमांडर आजम चीमा उर्फ “बाबाजी“ समेत 13 लोगों को अभियुक्त बनाया था। चीमा आज तक पुलिस के हाथ नईं आया है। आतंकियों ने बाद में खुद माना था कि  श्रृंखलाबद्ध विस्फोट कराने में 16 लोगों का हाथ था। विस्फोट के 36 घंटों के भीतर पुलिस ने लगभग 350 लोगों को पूछताछ के लिए गिरफ्तार किया था। बाद में 12 को छोडकर सभी को रिहा कर दिया गया था। अदालत ने पांच प्रमुख अभियुक्तों  को फांसी की सजा सुनाई और सात को हत्यारों की मदद के लिए उम्र कैद। इस मामले की सुनवाई में भी नौ साल लग गए। नौ साल बहुत लंबा समय होता है। इस दौरान हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों पर क्या गुजरी , नैसर्गिक न्याय भी उसकी भरपाई नहीं कर सकता। आतंक फैलाने वाले शैतान से भी बढकर होते हैं। शैतान को भी कभी-न-कभी अपने किए पर पछतावा होता है मगर आतंकी तो शैतान को भी मात दे गए हैं। बुधवार को अदालत लाए जाने पर अभियुक्त का व्यवहार एकदम ऐसा था मानो 209 की  हत्या करके उन्होंने “महान“ कार्य  किया हो। पांचों आरोपियों को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था। हत्यारे यह बात भली-भांति जानते हैं कि देश  की न्याय प्रकिया के तहत फांसी का फंदा आने तक लंबा समय लग सकता है। देश  की न्याय प्रकिया समय खपाऊ और अनावश्यक  रुप से जटिल है। माना हर अभियुक्त तब तक निर्दोष  है, जब तक उसका अपराध साबित नहीं हो जाता। मगर मुंबई नर संहार जैसे ( 26/11 हो या 11/2006) मामलों में त्वरित (फास्टट्रेक) न्याय होना चाहिए। न्याय प्रकिया की पेचदगियों का आतंकी बखूबी फायदा उठा रहे हैं। न्याय में विलंब से अपराधियों और आतंकियों के होसले  बुलंद हो रहे है़। सच यह है कि निर्दोष  लोगों की हत्या करने वाले और आतंक फैलाने वाले इस समय देश  के सबसे बडे दुश्मन है। आतंकियों से निपटना सरकार के लिए खासी सिरदर्द  साबित हो रही है। कश्मीर  से लेकर पूर्वोतर तक पडोसी मुल्कों की मदद से  आतंकियों का बडा नेटवर्क है। इसे नेस्तनाबूद करना सरकार के लिए सबसे बडी चुनौती है।  आतंकी हत्यारों को जल्द से जल्द सजा देकर, इस जाल को कुछ हद तक तोडा जा सकता है। आतंकियों की हरकतों के लिए देश  को बहुत बडी कीमत चुकानी पड रही है। आतंकियों द्वारा 1984 से अब तक करवाए गए 59 बम बिस्फोटों में 1889 निर्दोष  लोगों की जानें जा चुकी हैं। मगर इन विस्फोटों के लिए दोषी  अधिकांश  आतंकी पुलिस के हाथ तक नहीं आए हैं। इससे यह संदेश  जाता है कि देश  के दुश्मन आतंकी जब चाहें और जहां चाहें निर्दोष  लोगों को मार सकते हैं। और अगर त्वरित सजा  का  डर  न रहे, तो आतंकी घटनाएं बढना स्वभाविक है। न्याय त्वरित होना चाहिए।

गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015

No Excuse: Please Don't Disturb the Peace and Harmony of Punjab

                cl cgkuk pkfg,


xjeiaFkh laxBu  iatkc esa veu&pSu d¨ fcxkMus d¢ fy, cl e©d¢ dh ryk‘k esa jgrs gSaA fljlk fLFkr Msjk lPpk l©nk Áeq[k xqjehr jke jghe d¨ flag lkfgcku }kjk ekQh fn, tkus d¢ QSlys ls xjeiafFk;¨a d¨ v‘kkafr QSykus dk volj fey x;k gSA eaxyokj d¨  f‘kj¨ef.k xq#}kjk Áca/kd desVh ¼,lthihlh½ us fljlk Msjk Áeq[k d¨ vdky r[r d¢ QSlys dk vuqe¨nu dj jgs Fks] xjeiaFkh ckgj foj¨/k Án‘kZu dj jgs FksA fljlk d¢ Msjk lPpk l©nk Áeq[k xqjehr us 2007 esa xq# x¨fcan flag dk ckuk /kkj.k djd¢ fl[k¨a d¨ [kQk dj fn;k FkkA fl[k vius xq#v¨a dk jRrh Hkj d¢ fookn ls fryfeyk tkrs gSaA  bl Ádj.k us fl[k¨a v¨j Msjk lPpk l©nk leFkZd¨a d¢ laca/k¨a d¨ rukoiw.kZ  cuk fn;k FkkA bld¢ ckn Msjk leFkZd¨a v©j fl[k¨a d¢ chp tc&rc fgalkRed >Misa ‘kq# g¨ xÃaA   tqykà 2007 esa Msjk Áeq[k ij ?kkrd geyk  fd;k x;k exj os cky&cky cp x,A Qjojh] 2008 esa Msjk Áeq[k d¢ dkfQys ij fQj tkuysok geyk fd;k x;kA bl geys esa 11 y¨x ?kk;y g¨ x,A twu 2008 eqacà d¢ ,d lekj¨g esa Msjk leFkZd¨a v©j xjeiaFkh fl[k¨a d¢ e/; gqà fgald >Mi¨a esa ,d fl[k ekjk x;kA  bl ekeys esa fljlk dh vnkyr esa  Msjk Áeq[k ij eqdnek Hkh pyk;k x;k exj U;k;ky; us bls [kkfjt dj fn;kA ekeys dh xaHkhjrk d¨ ns[krs gq, Msjk Áeq[k us fl[k¨a d¢ /kkÆed usrkv¨a ls dà ckj ekQh Hkh ekaxhA Msjk Áeq[k d¨ ekQh fn, tkus d¢ fy, /kkÆed laxBu¨a dk lk>k ny flag lkfgcku¨a ls Hkh feykA ekQh ;kpuk  ij flag lkfgcku¨a d¢ larq“V g¨us ij vrar% 24 flracj d¨ vdky r[r us Msjk Áeq[k dh ekQh Lohdkj dj yh v©j mUgsa Xkq# x¨fcan flag dk ckuk iguus d¢ dfFkr n¨“k ls eqDr dj fn;kA vdky r[r fl[k¨a dh pwafd lo¨ZPp laLFkk gS] blfy, ,lthihlh us flag lkfgcku¨a d¢ QSlys dk gh vuqe¨nu fd;kA  iatkc esa  ‘kkafr cuk, j[kus d¢ fy, ;g t#jh Hkh FkkA oSls Hkh Msjk Áeq[k us d¨Ã laxhu vijk/k ugha fd;k FkkA mUgsa ekQh nsdj flag lkfgcku¨a us ijaijk dk ogu fd;k gSA dà ekey¨a esa fooknkXkzLr jgus d¢ ckotwn fljlk fLFkr Msjk lPpk l©nk us tufgr d¢ dà usd dke fd, gSaA jDrpki ¼cYM ÁS‘kj½] e/kqesg v©j d¨ysLVj  LØhfuax esa Msjk us mEnk dke fd;k gS v©j fxuht cqd dk fjdkMZ  cuk;k gSA  LoPNrk vfHk;ku esa c<&p< dj Hkkx fy;k gSA iatkc esa Hkh dà lkekftd ifj;¨tuk,a pykÃa gSaA iatkc us yacs le; rd vkrad dk na‘k >syk gS v©j bl n©jku jkT; dh vFkZO;oLFkk d¨ t¨ uqdlku igqapk gS] mldh Hkjikà vkt rd ugha g¨ ikà gSA vkrad d¢ yacs n©j us Qyrs&Qwyrs [kq‘kkgy jkT; d¨ dtZnkj cuk fn;k gSA  [kkfyLrku leFkZd xjeiaFkh laxBu iatkc d¢ ekg©y d¨ cjkcj v‘kkar cuk, j[kuk pkgrs gSaA bld¢ fy, mUgsa lhek ikj ls ‘kg Hkh feyrh gSA Msjk Áeq[k Ádj.k ls [kkfyLrkfu;¨a d¨ /kkÆed mUekn QSykus dk t¨ volj feyk Fkk] vdky r[r d¢ ekQhukes d¢ ckn vc og Hkh tkrk jgk gSA ysfdu ekeyk vHkh ‘kkar ugha gqvk gSA Msjk Áeq[k d¨ ekQh fn, tkus d¢ QSlys d¢ foj¨/k dk [;ky djrs gq, vdky r[r d¢ tRFksnkj Kkuh xqjcpu flag us vius gh QSlys ij iquÆopkj d¢ fy, ,Mokbtjh iSuy dk xBu fd;k gSA bl iSuy esa fu“i{k ,oa fo)ku fl[k¨a d¨ ukekafdr fd;k tk,xkA blls xjeiafFk;¨a d¨ ekeys d¨ Toyar j[kus dk ,d v©j volj fey x;k gSA cgjgky] iatkc vc v©j T;knk v‘kkafr cnkZ‘r ugha dj ldrkA ceqf‘dy jkT; esa veu&pSu cuk gqvk gSA bls fcxkMus dk nqLlkgl djus oky¨a d¨ turk [kqn eqagr¨M tcko nsxhA