मौजूदा लोकसभा (16वीं) के अंतिम मानसून सत्र में प्रधानमंत्री ने सहयोग मांगा था मगर विपक्ष ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करके अपने “असहयोगी“ रुख की बानगी प्रस्तुत की है। प्रधानमंत्री ने संसद का सत्र शुरु होने से ठीक पहले सदन की कार्यवाही सुचारु रुप से चलाने के लिए विपक्ष से हाथ जोडकर सहयोग मांगा था। अविश्वास प्रस्ताव पेश करने वाली तेलुगू देशम पार्टी (तेदपा) और कांग्रेस यह बात अच्छी तरह जानती है कि उनके पास सरकार को गिराने के लिए दूर-दूर तक पर्याप्त समर्थन नहीं है मगर इसके बावजूद पहली बार लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हो गया है। शुक्रवार को सदन में इस पर चर्चा होगी और जरुरत पडी तो वोटिंग भी। इस साल मार्च में भी तेदपा और वाम दलों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था मगर लोकसभा में लगातार भारी हंगामे के बीच प्रस्ताव दब कर रह गया। नियमानुसार लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए कम-से-कम 50 सदस्य की जरुरत होती है और इस प्रस्ताव को पेष करते समय अधय्क्ष को 50 सदस्यों के समर्थन का भरोसा होना चाहिए। हंगामे की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता। अविश्वास प्रस्ताव लाने वाला तेलुगू देशम पार्टी इस साल मार्च में आंध्र प्रदेश को स्पेशल पैकेज नहीं मिलने से क्षुब्ध होकर राजग छोड दिया था। वैसे आंध्र प्रदेश को अगर स्पेशल पैकेज मिल जाए, तो चंद्रबाबू नायडूु फिर से राजग में शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस आंध्र प्रदेश में तेदपा की प्रमुख प्रतिद्धंद्धी है जबकि भाजपा उसकी राज्य में भी सहयोगी पार्टी रही है। कांग्रेस समेत प्रतिद्धद्धियों को पछाडने के लिए ही चंद्रबाबू नायडू राज्य के लिए स्पेशल पैकेज की मांग कर रहे हैं। उन्हें भाजपा सरकार से काफी उम्मीदें भी थी मगर जब उन्हें लगा मोदी सरकार से कुछ मिलने वाला नहीं है, उनके पास राजग से बाहर आने के सिवा कोई चारा नहीं था। इतना तो तय है कि समूचा विपक्ष एकजुट हो जाए तो भी अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की कोई संभावना नहीं है। 545 सदस्यीय लोकसभा में इस समय 9 सीटें खाली है़ और इस समय 536 सदस्य हैं। इस हिसाब से सरकार के खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव पारित करवाने के लिए कम-से-कम 269 सांसदों का समर्थन चाहिए। विपक्ष का पूरा कुनबा जोडकर भी संप्रग के 64 और अन्य दलों के 157 समेत 221 सदस्य का ही समर्थन है। लोकसभा में तीसरी सबसे बडी पार्टी अन्नाद्रमुक के 37 सदस्य विपक्ष का साथ देंगे, इस पर संदेह है। भाजपा के लोकसभा में 272 सांसद है और सहयोगी दलों को मिलाकर 311 सद्स्य। इस गणित के दृष्टिगत स्पष्ट है कि अविश्वास प्रस्ताव पारित होने से रहा। फिर इसे पेश करने का क्या औचित्य है? यह जरुरी नहीं है कि अविश्वास प्रस्ताव सरकार गिराने के मकसद से ही पेश किया जाए। प्रख्यात अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर के अनुसार सरकार की मौजूदा नीतियों कार्यक्रमों और कार्यशैली में अगर जनता का विश्वास न हो तो अविश्वास प्रस्ताव से इसे प्रमुखता से सामने लाया जा सकता है। भारत में भी विपक्ष इसी मकसद से इसे लोकसभा में पेश करती रही है। अविश्वास प्रस्ताव राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता। आजादी के लगभग 15 साल बाद 1963 में पहली बार लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। सबसे ज्यादा 15 प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ पेश किए गए हैं। 1993 में नरसिम्हा राव सरकार अविष्वास प्रस्ताव से गिरते-गिरते बच गई थी। तब उनकी सरकार पर झारखंड मुक्ति मोर्चे के सांसदों के समर्थन खरीदने के आरोप लगे थे। 1999 में एक वोट से हारने पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को अपद्स्थ होना पडा था। भारतीय संसद के इतिहास में यह सबसे रोमांचक क्षण थे। 1996 में विश्वास मत प्रस्ताव पर मत विभाजन से पह्ले ही वाजपेयी सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। क्या इस बार इतिहास स्वंय को दोहरा पाएगा?
शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
मांगा सहयोग, मिला “अविश्वास'
Posted on 6:34 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मौजूदा लोकसभा (16वीं) के अंतिम मानसून सत्र में प्रधानमंत्री ने सहयोग मांगा था मगर विपक्ष ने सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करके अपने “असहयोगी“ रुख की बानगी प्रस्तुत की है। प्रधानमंत्री ने संसद का सत्र शुरु होने से ठीक पहले सदन की कार्यवाही सुचारु रुप से चलाने के लिए विपक्ष से हाथ जोडकर सहयोग मांगा था। अविश्वास प्रस्ताव पेश करने वाली तेलुगू देशम पार्टी (तेदपा) और कांग्रेस यह बात अच्छी तरह जानती है कि उनके पास सरकार को गिराने के लिए दूर-दूर तक पर्याप्त समर्थन नहीं है मगर इसके बावजूद पहली बार लोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश हो गया है। शुक्रवार को सदन में इस पर चर्चा होगी और जरुरत पडी तो वोटिंग भी। इस साल मार्च में भी तेदपा और वाम दलों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया था मगर लोकसभा में लगातार भारी हंगामे के बीच प्रस्ताव दब कर रह गया। नियमानुसार लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश करने के लिए कम-से-कम 50 सदस्य की जरुरत होती है और इस प्रस्ताव को पेष करते समय अधय्क्ष को 50 सदस्यों के समर्थन का भरोसा होना चाहिए। हंगामे की स्थिति में अविश्वास प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया जा सकता। अविश्वास प्रस्ताव लाने वाला तेलुगू देशम पार्टी इस साल मार्च में आंध्र प्रदेश को स्पेशल पैकेज नहीं मिलने से क्षुब्ध होकर राजग छोड दिया था। वैसे आंध्र प्रदेश को अगर स्पेशल पैकेज मिल जाए, तो चंद्रबाबू नायडूु फिर से राजग में शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस आंध्र प्रदेश में तेदपा की प्रमुख प्रतिद्धंद्धी है जबकि भाजपा उसकी राज्य में भी सहयोगी पार्टी रही है। कांग्रेस समेत प्रतिद्धद्धियों को पछाडने के लिए ही चंद्रबाबू नायडू राज्य के लिए स्पेशल पैकेज की मांग कर रहे हैं। उन्हें भाजपा सरकार से काफी उम्मीदें भी थी मगर जब उन्हें लगा मोदी सरकार से कुछ मिलने वाला नहीं है, उनके पास राजग से बाहर आने के सिवा कोई चारा नहीं था। इतना तो तय है कि समूचा विपक्ष एकजुट हो जाए तो भी अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की कोई संभावना नहीं है। 545 सदस्यीय लोकसभा में इस समय 9 सीटें खाली है़ और इस समय 536 सदस्य हैं। इस हिसाब से सरकार के खिलाफ अविष्वास प्रस्ताव पारित करवाने के लिए कम-से-कम 269 सांसदों का समर्थन चाहिए। विपक्ष का पूरा कुनबा जोडकर भी संप्रग के 64 और अन्य दलों के 157 समेत 221 सदस्य का ही समर्थन है। लोकसभा में तीसरी सबसे बडी पार्टी अन्नाद्रमुक के 37 सदस्य विपक्ष का साथ देंगे, इस पर संदेह है। भाजपा के लोकसभा में 272 सांसद है और सहयोगी दलों को मिलाकर 311 सद्स्य। इस गणित के दृष्टिगत स्पष्ट है कि अविश्वास प्रस्ताव पारित होने से रहा। फिर इसे पेश करने का क्या औचित्य है? यह जरुरी नहीं है कि अविश्वास प्रस्ताव सरकार गिराने के मकसद से ही पेश किया जाए। प्रख्यात अमेरिकी लेखक आर्थर मिलर के अनुसार सरकार की मौजूदा नीतियों कार्यक्रमों और कार्यशैली में अगर जनता का विश्वास न हो तो अविश्वास प्रस्ताव से इसे प्रमुखता से सामने लाया जा सकता है। भारत में भी विपक्ष इसी मकसद से इसे लोकसभा में पेश करती रही है। अविश्वास प्रस्ताव राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सकता। आजादी के लगभग 15 साल बाद 1963 में पहली बार लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था। सबसे ज्यादा 15 प्रस्ताव इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ पेश किए गए हैं। 1993 में नरसिम्हा राव सरकार अविष्वास प्रस्ताव से गिरते-गिरते बच गई थी। तब उनकी सरकार पर झारखंड मुक्ति मोर्चे के सांसदों के समर्थन खरीदने के आरोप लगे थे। 1999 में एक वोट से हारने पर अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को अपद्स्थ होना पडा था। भारतीय संसद के इतिहास में यह सबसे रोमांचक क्षण थे। 1996 में विश्वास मत प्रस्ताव पर मत विभाजन से पह्ले ही वाजपेयी सरकार ने इस्तीफा दे दिया था। क्या इस बार इतिहास स्वंय को दोहरा पाएगा?






