शनिवार, 30 जनवरी 2016

कांग्रेस के बुरे दिन

                  कांग्रेस के बुरे दिन

देश  की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस बुरे दौर से गुजरी रही है। पहले लोकसभा चुनाव और फिर विधानसभा चुनावों में करारी पराजय से कांग्रेस अभी तक उभर नहीं पाई थी कि केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी पर घूसखोरी के आरोपों से पार्टी की खासी किरकिरी हो रही है। पार्टी का जनाधार पहले ही सिकुड कर कुछ राज्यों तक सिमट कर रह गया है। उत्तर प्रदेश , पश्चिम  बंगाल और तमिल नाडु जैसे बडे राज्यों में तो कांग्रेस का वर्चस्व तक नहीं है। मध्य प्रदेश  और गुजरात में भाजपा काग्रेस को लंबे समय से सत्ता से बाहर रखे हुए है और ओडीशा  में बीजू जनता दल का दबदबा है। बिहार में कांग्रेस नीतिश  कुमार का पल्लू  पकड़कर जैसे-तैसे अपना वजूद बचा पाई है।  महाराष्ट्र  देश  का एकमात्र बडा राज्य था, जहां कांग्रेस शरद पवार की राश्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के साथ सता में थे मगर यह राज्य भी पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथ से फिसल गया। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश  में पार्टी के बागियों ने भाजपा के साथ मिलकर कांग्रेस की लुटिया डूबो दी और  कांग्रेस सता से बाहर हो गई। और अब केरल भी कांग्रेस के हाथ से फिसल रहा है। केरल के मुख्यमंत्री ओमन चांडी सोलर घोटाले में उलझे हुए हैं और विपक्ष सडकों पर प्रदर्शन  करके कांग्रेस नीत गठबंधन सरकार के नाको दम किए हुए हैं।  चांडी से पहले हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले में फंसे हुए हैं। अप्रैल में केरल विधानसभा के लिए चुनाव कराए जाने हैं। सोलर स्कैम के आरोपी मुख्यमंत्री ओमन चांडी  को शुक्रवार को उच्च न्यायालय से थोडी राहत तो मिली मगर इससे चांडी की छवि निखरने से रही। त्रिशुर  स्थित अदालत ने वीरवार को मुख्यमंत्री के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश  जारी किए थे। जाहिर है अदालत को मामले में प्रथम दृश्ट्या “दाल में कुछ काला“ नजर आया होगा, इसीलिए मामले का संज्ञान लिया गया । केरल उच्च न्यायालय ने फिलहाल दो माह के लिए अदालती आदेश  पर रोक लगा दी है।  सौर्य उर्जा घोटाले में  मुख्यमंत्री ओमन चांडी  पर 7 करोड की घूस मांगने का आरोप  है। घोटाले की मुख्य आरोपी सरिता नायर ने वीरवार को फिर आरोप लगाया कि वे मुख्यमंत्री के विश्वास  पात्र को 1 करोड 90 लाख दे भी चुकी है। सरिता नायर न्यायिक आयोग के समक्ष भी यही आरोप दोहरा चुकी है। चांडी भी न्यायिक आयोग के समक्ष पेष हो चुके हैं। चांडी  बतौर मुख्यमंत्री न्यायिक आयोग के समक्ष पेश  होने वाले पहले मुख्यमंत्री हैं। सोलर स्केम का पर्दाफाश  2013 में हुआ था। सोलर एनर्जी नाम की एक फर्जी कंपनी ने मुख्यमंत्री से निकटता का हवाला देकर निवेशकों और लोगों से सोलर पावर यूनिट्स लगाने और उन्हें बिजनेस पार्टनर बनाने का लालच देकर 70 करोड रु से ज्यादा इक्ठठे किए थे। सरिता नायर अपने सहयोगी  के साथ इस फर्जी कंपनी की मुख्य कर्ताधर्ता  थी। मीडिया में सुर्खियां बटोरने और विश्वश्नीयता  हासिल करने के लिए कंपनी ने राज्य की प्रमुख हस्तियों को “वर्जिन अर्थ गोल्डन फीदर एनवारमेंटल अवार्ड“ भी बांटे मगर जल्द ही इस स्केम का पर्दाफाश  हो गया। इस पर मुख्यमंत्री ओमान चांडी के निजी सहायक और सरिता नायर समेत पांच लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। सरकार ने घोटाले की जांच के लिए उच्च न्यायालय के सेवा निवृत जज की अध्यक्षता में न्यायिक आयोग का गठन कर रखा है।  चांडी के खिलाफ एफआईआर दर्ज  कराने के निचली अदालती आदेश  पर भले ही  उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है मगर विपक्ष इसे चुनाव में जोर-शोर  से उछालेगा। केरल में हर पांच साल बाद सरकार के बदलने की रिवायत रही है।  इस बार कांग्रेस नीत यूडीएफ की सरकार है तो अगली बार माकपा नीत वामपंथी द्लों की सरकार का सत्ता में आना तय माना जा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में हालांकि कांग्रेस नीत यूडीएफ ने 20 मेंसे 12 सीटें जीती थीं मगर तब से अब तक परिस्थतियां काफी बदल गईं है। चांडी पर सोलर स्केम में कथित घूस लेने के आरोपों सेे पार्टी को और ज्यादा नुकसान उठाना पड सकता है।

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

चार दिन की चांदनी,,,,



एक लोकप्रिय जुमला है,“ चार दिन की चांदनी, फिर अंधेरी रात“। यह जुमला भारत में सुरक्षा प्रबंधों को लेकर एकदम मौजूं होता है। गणतंत्र दिवस पर इस बार राजधानी दिल्ली समेत पूरे देश  में सुरक्षा का इस कद्र तंगडा बंदोबस्त किया गया था कि परिंदा भी पर नहीं मार सकता था। भारी सुरक्षा प्रबंधों को देखकर ऐसा लगता था कि आतंकी जैसे हमला करने ही वाले हैं और खुफिया एजेंसियों को इस बारे वे पहले ही आगाह कर चुके हैं। गणतंत्र दिवस और स्वत्रंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर सुरक्षा के तगडे इंतजाम किए जाना देश  की जरुरत है और ऐसा काफी पहले से होता रहा है। राष्ट्रपति , प्रधानमंत्री समेत देश  की अति वशिष्ट  हस्तियां और विदेशी  मेहमान राष्ट्रीय समारोहों में शरीक होते हैं, इसलिए सुरक्षा का तगडा इंतजाम किया जाता है। बस अंतर इतना है कि पिछले कुछ समय से भारत में फैलाए जा रहे पाकिस्तान प्रायोजित आंतक के कारण अब सुरक्षा और ज्यादा कडी कर दी गई है। मगर सवाल यह है कि सुरक्षा के इंतजाम खास समारोहों तक ही सीमित क्यों हैं? और   अति विषिश्ठ हस्तियों की ही सुरक्षा क्यों? आम आदमी की सुरक्षा क्यों नही़?  बडे तो बडे बच्चे भी इस सच्चाई को जानते हैं कि आतंकी और देशद्रोही हमले करने से पहले न तो किसी को कानो-कान खबर लगने देंगे और नही ही वे इतने नासमझ है कि महत्वपूर्ण  आयोजनों के समय कडी सुरक्षा व्यवस्था के बीच आतंकी हमले करने का दुस्साहस करेंगें। 1984 से पठानकोट हमले तक कुल मिलाकर अब तक  65 बडे आतंकी हमले हो चुके हैं और इनमें 1926 लोग मारे जा चुके हैं मगर 15 अगस्त, 2004 में असम के धमेजा स्कूल हमले को छोडकर आज तक कोई भी आतंकी हमला महत्वपूर्ण आयोजन के दौरान नहीं हुआ है। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि संसद पर हुए हमले को छोडकर आतंकियों ने ऐसे जगहों पर हमले किए जहां सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम नहीं थे। संसद पर हमले का मकसद भारत सरकार को यह जताना था कि आतंकी कहीं भी हमला कर सकते हैं। हर बार सुरक्षा एजेंसियां  राष्ट्रीय समारोहों पर भारी बंदोबस्त की  सफलता  पर  अक्सर इतराती रहती हैं। इस बार गणतंत्र दिवस पर फुलप्रूफ सुरक्षा प्रबंधों पर भी सरकार और सुरक्षा एजेंसियां काफी इतरा रहीं हैं मगर सच यह है कि देश  की सुरक्षा एजेंसियां आम आदमी की रक्षा करने में न तो संजीदा है और न ही वे इस बात की चिंता करती हैं। सुरक्षा एजेंसियों का ज्यादातर समय और फोर्स  अति वशिष्ठ  हस्तियों की सुरक्षा में ही लग जाता   हैं। आंकडे बताते हैं कि देश  के हर वीवीआईपी की सुरक्षा के लिए कम-से-कम तीन सुरक्षाकर्मी है जबकि 761 आम आदमियों के लिए मात्र  एक पुलिसकर्मी है। पंजाब में पुलिस सिर्फ  वीवीआईपी की सुरक्षा तक ही सीमित होकर रह गई है। इस राज्य में हर वीवीआईपी के लिए पांच पुलिसकर्मी हैं। अति  वशिष्ठ व्यक्तियों के लिए सुरक्षा प्रबंधों का आलम यह है कि सरकार के अपने मानदंडों से लगभग 16, 000 अधिक पुलिसकर्मी भद्र लोगों की सेवा में तैनात किए गए हैं।  इन आंकडों से पता चलता है कि देश  में आतंकी हमलों से आम आदमी कितना महफूज हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी सरकार से इस बात की जवाब तलबी कर चुका है कि मुकेश  अंबानी  जैैसे रईस के लिए सरकारी सुरक्षा व्यवस्था क्यों मुहैया कराई जा रही है जबकि वे  अपनी सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम करने में पूरी तरह से समर्थ  हैं। सरकार ने मुकेश  अंबानी के लिए “जेड“ सिक्योरिटी कवर मुहैया करा रखा है। यहां तक कि श्रद्धा चिट फंड स्केम के आरोपी मातंग सिंह को भी “जेड“ सुरक्षा कवच दिया गया है। बात आतंकी हमले को लेकर हो या सामान्य स्थिति की, सुरक्षा को लेकर सरकार की धारणा अति वशिष्ठ लोगों  तक ही सीमित है। इसीलिए, जब कभी 26/11 जैसा आतंकी हमला होता है, न तो खुफिया एजेंसियों को इसकी भनक लगती है और न ही सुरक्षा एजेंसियां निर्दोष लोगों को बचा पाती हैं।

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

Shameful Display of Politics of "Aaya Ram, Gaya Ram"

                                            “आया राम, गया राम“ की राजनीति 


पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश  में दल-बदल से  सरकार के अल्पमत में आने के बाद राजनीतिक अस्थिरता के चलते  राष्ट्र्पति  शासन लगाए जाने से कांग्रेस का तिलमिला स्वभाविक है। कहते  हैं " जैसी बिजाई , वैसी कटाई" । दो-तिहाई बहुमत से चुने जाने के बावजूद राज्य में सरकार का गिरना और संवैधानिक संकट उत्पन्न होना  साफ -साफ बताता  है कि अरुणाचल प्रदेश  में आज भी दल-बदल का रोग लोकतंत्र को दीमक की तरह चाट रहा है।  कांग्रेस ने  2014 में  पांच विधायकों का दल-बदल करवाकर जो  फसल बोई  थी , अब वही काट रही  है ।  60 सदस्यीय विधानसभा के लिए 2014 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 42 सीटें जीती थीं। बाद में पीपीए के पांच विधायक भी कांग्रेस में ही  शामिल हो गए थे। इससे कांग्रेस के पास दो-तिहाई से भी अधिक बहुमत था मगर फिर भी दो साल से भी कम समय में सरकार गिर गई। दिसंबर 2015 में कांग्रेस के 21 विधायक बागी हो गए और इससे नबाम टूकी सरकार अल्पमत में आ गई। बहुमत के लिए सरकार को 31 विधायकों के समर्थन की जरुरत है मगर कांग्रेस के पास 27 विधायकों का ही समर्थन था।  पिछले एक माह से राज्य में राजनीतिक अस्थिरता व्याप्त थी। बागी विधायकों ने 11 सदस्यीय भाजपा से मिलकर नया मुख्यमंत्री चुनकर और विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास  प्रस्ताव पारित करके संवैधानिक संकट खडा कर दिया था। राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने 9 दिसंबर को एकाएक घटनाक्रम में राज्य विधानसभा का सत्र 16 दिसंबर को बुला लिया जबकि पहले इसे सरकार की सिफारिश  पर 24 जनवरी को बुलाया गया था। जाहिर है यह सब कांग्रेस सरकार को गिराने की मंशा  से किया गया था। इस पर सरकार ने विधानसभा को ही सील कर दिया। बागी विधायकों ने विधानसभा उपाध्यक्ष की अध्यक्षता मे कम्युनिटी हॉल में सत्र आयोजित करके कैलिखो पॉल को नया मुख्यमंत्री चुन लिया पर गुवाहटी उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। उच्च न्यायालय ने राज्यपाल की विधानसभा सत्र को पहले बुलाने की आलोचना करते हुए इसे गैर-संवैधानिक कदम बताया। 14 जनवरी को उच्च न्यायालय ने राज्यपाल द्वारा दिसंबर में बुलाए गए दो दिन के सत्र को ही अवैध घोषित कर दिया। इसके बाद राज्यपाल ने 15 मिनट के भीतर रिपोर्ट  तैयार करके  केन्द्र से राज्य में राष्ट्रपति  शासन लगाने की सिफारिश  की। गत रविवार को मोदी मंत्रिमंडल द्वारा  राष्ट्रपति  से अरुणाचल प्रदेश  में संवैधानिक संकट का हवाला देकर  राज्य में  राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट  में है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपाल से वह फाइल भी मांगी है जिसमें 15 मिनट में   राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश  की गई थी। इस बात में दो राय नहीं है कि गुवाहटी उच्च न्यायालय की व्यवस्था के बाद राज्य में संवैधानिक संकट खडा हो गया था। कांग्रेस सरकार बनाने की जोड-तोड में लगी  हुई थी और 11 सदस्यीय भाजपा 21 दल-बदलू विधायकों के साथ सरकार बनाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। कांग्रेस के दल-बदलुओं के साथ मिलकर सरकार बनाना या इस तरह की सरकार को बाहर से समर्थन देने पर भाजपा की खासी किरकिरी होती। इस स्थिति में कांग्रेस के इन आरोपों को बल मिलता कि मोदी सरकार कांग्रेस सरकारों को अस्थिर करने में लगी हुई है। बहरहाल, 1990 के बाद से अरुणाचल प्रदेश  में “आया राम, गया राम“ (दल बदल) की राजनीति का बोलबाला रहा है और राज्य के नेताओं में केन्द्र में सतारूढ दल के साथ जाने की रिवायत रही है।  2003 में भी कांग्रेस के वरिष्ठ  नेता गेंगांग अपांग ने 34 विधायकों के साथ पार्टी से बगावत करके तत्कालीन मुख्यमंत्री मुकुट मिथी को पदच्युत कर दिया था। अपांग अब भाजपा में है। अरुणाचल प्रदेश  में  राष्ट्रपति शासन  बेहतर विकल्प है। दल-बदल से बनाई गई सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकती। यह बात बेहद दुखद है कि दल-बदल निरोधी  कानून के बावजूद देश  में अभी भी “आया राम, गया राम“ का बोलबाला है।  अरुणाचल चीन की सीमा से लगता संवेदनशील पहाडी राज्य है और चीन की इस राज्य पर बराबर नजर रहती है। राज्य की सामरिक संवेदनशीलता के मद्देनजर  सियासी दलों का कर्तव्य बनता है कि वे दल-बदल को निरुत्साहित करके अरुणाचल में राजनीतिक स्थिरता लाने में मदद करें।

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

US President Elections: Will Trump Prove to Be 'Modi" Of US?

There is an striking similarities between aggressive campaigning by US Republican presidential front-runner   Donald Trump and the pre-parliament polls BJP prime ministerial candidate  Narendra Modi. For one thing, both relied on their radical conservative image- Modi rapped in saffron color and Trump in "racism' gonna.  Most of Indians won't like Trump and would bat for democratic Hillary Clinton, despite her "simian traits". Trump is successful business magnate, billionaire, socialite,  television personality, and  so on. His career, branding efforts, personal life, wealth, and outspoken manner have helped make him very well-known. But he is also a  'tongue-in-cheek' kind of man with "convenient conscience". Earlier,  he didn't care to vote even in primaries  but now after a year of campaigning he is over confident and seeking votes on anti-Muslim and anti-migrant planks. So much so that the other day he boasted "his supporters would vote for him even if he shoots people". All said and done, he is a smart guy and understands  the psyche of  World most  powerful nation voters. The spread  of world wide terrorism has  deeply dented the mind of people.  And like Indian, most of US ab-original nationals have started feeling alienated from immigrants. Undoubtedly, US is a country of immigrants and the native American now count for minority.  The US  Native Americans are people whose pre-Columbian ancestors were indigenous to the lands within the nation's modern boundaries. These peoples were composed of numerous distinct tribes, bands, and ethnic groups, and many of these groups survive intact today as sovereign nations. After the terror 9/11 terror attack on World Trade Center, the native Americans have started asserting their identity. As the epic-center of terrorism is rooted in Islamic countries, Muslims are now being cornered out in most of Western Countries. US is not an exception. Bizman  Trump  has seen writings on wall and he has started  invoking the racist 'black vs white' . Whites ( constitute the majority, with 77.35% of the population as of 2014. White Americans are people of the United States who are considered or reported as White. The United States Census Bureau defines White people as those "having origins in any of the original peoples of Europe, the Middle East, or North Africa. Trump is targeting the whites as majority of them are Republican party supporters while most of the "Blacks" are solidly behind Democratic party. Trump racial stance is aimed at polarsing majority  votes, the same way Modi and his saffron party did in India during  Lok Sabha elections. That's why he has called for complete ban on entry of Muslims in US. Despite,  his party not endorsing his stand, he is still sticking to it. His business acumen  guides him to invoke racism at a time White Americans are in deep identity crisis. Now, question is can US voters also swayed away by radicalism as were Indian voters in 2014. US voters are more educated and their past voting pattern doesn't suggest they will. But the way Trump has gained popularity in the last few months and  reached  close to Democratic party  front-runner Hillary Clinton, it speaks for paradoxes of US voters. In India, even BJP poll strategists didn't expect a two-third majority for Modi- an feat even a tall BJP leader AB Vajpayee couldn't achieve, but it did happen. BJP anti-Muslim stance did it as voters were polarized. Will it be replicated in US?  

India on 67th Republic Day: Where Do We Stand

                                      67 वर्षीय  भारतीय  गणतंत्र

मंगलवार को भारतीय गणतंत्र 67 साल का हो जाएगा। फिरंगी  शासन से आजाद होने के लगभग दो साल बाद 26 जनवरी, 1950 को भारत दुनिया का सबसे बडा लोकतांत्रिक गणतंत्र बना। संविधान निर्माताओं ने भारत के लिए संप्रभुता, समाजवादी, धर्भनिरपेक्षता एवं लोकतांत्रिक गणतंत्र का रास्ता चुना और यही हमारे स्वत्रंत्रता सेनानियों और वीर पुरुशों का सपना भी था। संविधान में हर देशवासी के लिए समानता, न्यायप्रिय व्यवस्था, स्वत्रंत्रता और एक जैसी बिरादरी (फ्रेर्टनिटी) सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा था। और इस व्यवस्था को लागू करना समकालीन सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है।  66 साल इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए पर्याप्त समय होता है। मगर 66 साल का लेखा-जोखा हमें काफी निराश  करता है।  66 साल में  अगर देशवासियों को  अपने गणतंत्र दिवस पर आतंक से डर-डर कर रहना पडे, लोगों को पीने के लिए शु द्ध पेयजल, बेहतर स्वास्थ्य और स्तरीय शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसना पडे, बुद्धिजीवियों को भी सहिष्णुता  का सबक सीखना पडे, पूंजीपतियों का  शोषण सहना पडे और धर्म के नाम पर राजनीति करनी पडे तो ऐसे गणतंत्र की कामयाबी पर शक-शुबह होना स्वभाविक है। मात्र 66 साल में ही भारत समाजवादी बनते-बनते पूंजीवादी व्यवस्था का गुलाम हो गया है। उदारीकरण की आड में समूचे समाजवादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया गया है। नतीजतन, आज भारत सरकार इतनी समृद्ध नहीं है, जितने मुकेश  अंबानी जैसे पूंजीपति हैं। सरकार को अपने कर्मचारियों को नए वेतनमान लागू करने के लिए सौ बार सोचना पडता है मगर बडे औद्योगिक घराने अपने कर्मचारियों को मुंहमांगा वेतन और भत्ते देते हैं। पूंजीपति  इतने समृद्ध हैं कि अपनी पत्नी को  सुविधा सपन्न  250 करोड की कीमत का हवाई जहाज बतौर गिफ्ट देने में समर्थ हैं  मगर आम आदमी एक साडी देने की औकात भी न रखता है । असमानता इतनी कि देश  के समृद्धतम नागरिक मुकेश  अंबानी मुंबई में 1500 अरब रु के आलीशान भवन में रहते हैं मगर गरीब को उसी शहर में सिर छिपाने तक की जगह भी नसीब नहीं है।  न्याय व्यवस्था इतनी महंगी कि साधन सपन्न को अदालत में बचाने के लिए वकीलों की फौज पेश  हो जाती है मगर आम आदमी एक अदद वकील की फीस भी बमुश्किल  चुकाने की हैसियत रखता है। निसंदेह, 66 साल में  देश  ने आर्थिक तरक्की की है मगर आम आदमी को इसकी भारी कीमत चुकानी पडी है। आम आदमी के पास तसल्लीबख्श   गुजारा करने के लिए भी पैसा नहीं है मगर धन्ना सेठों के पास इतना पैसा कि देश के बैंक भी कम पड गए  । 66 साल में भारत में काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था बखूबी फली-फूली है और देश  से  टैक्स चुराकर पूंजीपतियों और कर चोरों ने अथाह धन विदेशी  बैंकों में जमा कर रखा है। सत्तारूढ दल भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव के दौरान बार-बार इस बात का खुलासा किया था कि विदेशी  बैंकों में भारत के पूंजीपतियों का इतना काला धन जमा है कि इसे स्वदेश  लाने पर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रु जमा हो सकते हैं। ये आंकडे बढा-चढा कर पेश  किए गए हों, मगर इस बात में अक्षरश: सच्चाई है कि विदेशी  बैंकों में भारत का अथाह काला धन जमा है। असमान आर्थिक उन्नति और खुशाहली से कोई भी गणतंत्र स्वस्थ नहीं बन सकता और न ही समग्र सामाजिक समृद्धि के बगैर आर्थिक तरक्की के कोई मायने रह जाते हैं। जिस गणतंत्र में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश न करने दिया जाए, उनकी सरेआम अस्मत लूट ली जाए, उनसे हर क्षेत्र में भेदभाव किया जाए, गरीबों को बंधुआ बनाकर रखा जाए, कानून का हर मुकाम पर अपमान किया जाए,  ऐसा गणतंत्र किस काम का?  इतना सब होने पर भी हमें भविष्य  के प्रति आशावादी होना चाहिए । युवा भारत की सोच और कार्यशैली  मौजूदा पीढी से एकदम भिन्न हैं। और यही हमारी अमूल्य संपत्ति है। 2030 तक भारत दुनिया का सबसे युवा देश  बन जाएगा और उसके पास दुनिया में मानव उर्जा का सबसे बडा भंडार होगा। युवा वर्ग ही भारतीय गणतंत्र को रुढिवादी, संकीर्णता और साम्प्रदायिक के जहर से मुक्त करके इसे सफलता के उच्च पायेदान पर ले जा सकता है।


रविवार, 24 जनवरी 2016

Stand Up And Fight Against Injustice

Its matter of grave concern that  India is still a medieval mindset driven country despite nearly seven decades of democratic republic. We refuse  to discard outdated ethos and  swear by our so called rich past. I still fail to understand how our past is rich while we have been under colonial  feudal rules for long time. As we celebrate 67th Republic day on Tuesday, its disgusting to find the hypocrisy and narcissism overriding our mindset. The arrest of stand-up comedian Kiku Sharda is a case in point. Kiku was arrested twice for mimicking Dera Sacha Sauda leader Gurmit Ram Rahim as if it was a serious crime. An simple mimicry act was made out to be a grave law and order problem. There was not a whisper of protest. There were some voices of concern  in media. Even, the fellow comedian Kapil Sharma just extended an olive branch asking Kiku to " forget and forgive'. Kapil was smart enough to read writings on wall. The anticlimax to writers, artist and great thinkers' protest could be working on Kapil and his collaborator's  mind. Putting up brave faces on "intolerance" by returning the "Govt Awards" (read union minister  Nitin Gadkari statement on Asha Parekh), most of them are now courting Modi govt overtures, notwithstanding the "intolerance" has grown more severe. Apart from the arrest of Kuki Sharda, the unceremonious exit of Bollywood "Mr Perfect" Aamir Khan from Modi Govt orchestra "Incredible India" and bashing of public outbursts  on  "intolerance" (Karan Johar, the latest victim)  underlie all this. Our leaders  spur on public platforms  accusing each-other of becoming more intolerant. But, in reality all leaders are averse to criticism. BJP had to suspend its MP Kirti Azad for criticising  finance minister Arun Jaitley. And take it for granted, if someone speaks a word or two against Prie Minister Modi's policies, he will thrown out of party at once. In Congress, Sonia Gandhi and Rahul Gandhi are sacrosanct and and even a slightest word of caution can lead to expulsion. The scenario is no different in Madame Mayawati monopolized  BSP and Mulayam Singh Yadav family hold Samajwadi Party ( wonder if a family owned party could have a socialist face) and so are regional parties like Akali Dal And Shiv Sena.   The mute public outcry against arrest of Kiku Sharda  is understandable. He is a small hard-toiling actor, not  to the stature of Salman Khan or Aamir Khan.  If Salman Khan would have been arrested, Mumbai and other parts of India would have gone in flames. That's the impact of our colonial and feudal past. We still adore erstwhile Rajas and Maharajas and consider "Angrejon ka rule kahin behtar thaa (British rule was far better). Mimicry is a great art and humanize the contemporary society.  The comic as clown, jester, harlequin, mimic is  essential to the logic of power.Sometimes it is only the comic that can remind the king of the idiocy of power. Remember the historical character of Birbal in Akbar Kingdom.  Chaplinsque comedy had  Hitler cut to size. Mahatma  Gandhi ha great admiration for comic and cartoon. Laughter is the tonic for health mindset and  herein lies  a beautiful cybernetic wisdom to the arrangement of dissent We are a strange country, democratic by intent but feudal in purpose. And it is this mindset that India is being pushed back despite strong economic fundamentals.  The arrest of Kiku Sharda has to be seen in the backdrop of new threat to Indian democratic set-up. We must stand up.  



शनिवार, 23 जनवरी 2016

यूनिवर्सिटीज को राजनीति का अखाडा न बनाएं

हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी (एससीयू) में दलित छात्र की आत्महत्या पर तगडी राजनीति हो रही है।  छात्र रोहित वेमूला चकवर्ती की खुदकुशी  के लिए जिम्मेदार मूल कारणों  को पीछे छोडकर राजनीतिक दल दलित बनाम गैर दलित की आड में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पर निशाना साधे हुए हैं। इस समय हैदराबाद यूनिवर्सिटी पूरी तरह से राजनीति का अखाडा बनी हुई है। हर रोज सियासी नेता हैदराबाद पहुंचकर यूनिवर्सिटी के माहौल को बिगाडने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और बंडारू दत्तात्रेय से इस्तीफा मांगा जा रहा है।   वीरवार को दिल्ली के मुख्य मंत्री अरविंद केजरीवाल ने हैदराबाद पहुंचकर अनशनकारी छात्रों और रोहित वेमूला के परिजनों से मुलाकात कर भाजपा को आडे हाथ लिया। इससे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, माकपा सचिव सीताराम येचुरी, भाकपा नेता डी राजा और सुधाकर रेड्डी समेत कई नेता हैदराबाद का दौरा कर चुके हैं। सात छात्र भूख हडताल पर हैं। सोमवार (25 जनवरी) को  छात्रों की संयुक्त संघर्ष  समिति ने “चलो हैदराबाद यूनिवर्सिटी“ का आहवान किया है। यूनिवर्सिटी में पीएचडी कर रहे छात्र रोहित वेमूला ने अपने निलबंन से हताश  होकर पिछले सप्ताहं खुदकुशी  कर ली थी। रोहित समेत पीएचडी कर रहे पांच छात्रों को कथित राजनीति करने के लिए 17 दिसंबर को यूनिवर्सिटी से स्थाई तौर पर निलंबित कर दिया गया था। इन सब पर आरोप था कि वे अंबेडकर स्टुडेंटस एसोसिएषन (एएसए) की आड में दलित राजनीति कर रहे हैं। पूरा मामला सियासी लग रहा है। कहते हैं “जिसकी लाठी, उसी की भैंस“। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन है, इसलिए इसमें केन्द्र सरकार का खासा दखल है। अगस्त, 2015 के बाद के घटनाक्रम साफ बता रहे हैं कि भाजपा से संबद्ध अखिल भारतीय परिशद (एवीबीपी) का विरोध करने के लिए ही रोहित और उनके साथियों को निशाना बनाया गया। रोहित वेमूला ने पीएचडी करने के लिए 2012 में हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में दाखिल लिया था। अप्रैल, 2014 से रोहित को सीएसआईआर (काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च) से 25,000 रु की फेलोशिप  मिल रही थी।  पिछले साल 5 अगस्त को रोहित और उनके चार साथियों के खिलाफ जांच बिठाई गई और इसके दो दिन बाद रोहित और उनके साथियों ने एवीबीपी  के नेता की पिटाई कर दी। इस घटनाक्रम के बाद से रोहित और उनके साथियों की प्रताडना शुरू  हो गई। यूनिवर्सिटी ने रोहित की फेलोशिप रोक दी । 17 अगस्त को सिकंदराबाद के सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने मानव संसाधन मंत्री को चिठठी लिखकर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की । उनकी इस  चिठठी  का असर भी हुआ। सितंबर में रोहित और उनके साथियों को यूनिवर्सिटी से निलंबित कर दिया गया और दिसंबर 17 को इस फैसले पर यूनिवर्सिटी की निर्णायक बॉडी ने भी मुहर लगा दी। इसके बाद रोहित और उनके साथियों को 3 जनवरी को हास्टल खाली करना पडा। पांचों ने कैंपस में तंबू गाडकर अनशन शुरु कर दिया। रोहित आर्थिक तंगी नहीं झेल पाया और हास्टल से बाहर आने के 12 दिन बाद उसने खुदकुशी  कर ली। खुदकुशी  से कुछ दिन पहले रोहित ने यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को व्यंग्यात्मक चिठठी लिखकर दलित छात्रों के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन को तभी संभल जाना चाहिए था। पर क्या करते अधिकारियों ने अपनी आंखों पर राजनीतिक पक्षपात की काली पट्टी जो बांध रखी थी। रोहित की मौत के बाद प्रशासन हरकत में आया तो सही मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। हर बार यही होता है। प्रशासन “सांप  निकल जाने के बाद लाठियां पीटता  है“ मगर इससे सांप को मारा नहीं जा सकता। यूनिवर्सिटी प्रशासन तट्स्थ होकर अपनी जिम्मेदारी निभाता, तो एक होनहार छात्र और गरीब मां के बुढापे के एकमात्र सहारे को बचाया जा सकता था। इस दुखद घटनाक्रम से यही सीख मिलती है कि यूनिवर्सिटी को राजनीति का अखाडा नहीं बनाया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

“आतंक“ पीडित पाकिस्तानी

                               “आतंक“ पीडित पाकिस्तानी

 तालिबान ने उत्तर-पश्चिम  पाकिस्तान में  यूनिवर्सिटी पर हमला करके नवाज शरीफ सरकार और सेना को फिर जता दिया है कि आतंक का कोई दीन-ईमान नहीं होता। और न ही आतंकियों को “गुड“ और “बैड“ में बांटा जा सकता है। जेहादी सिर्फ  आतंकी होता है और वह सिर्फ हिंसा फैलाना जानता है।  आतंकी इंसानियत के सबसे बडी दुश्मन  हैं और उनके मददगार आतंकियों से भी बडे हैवान। आतंकियों ने पाकिस्तान को यह भी जता दिया है कि वे जब और जहां चाहे हमला कर सकते हॅै और सैन्य कार्रवाई तालिबानी आतंक को रोक नहीं सकती।  पेशावर  आर्मी स्कूल हमले के लगभग एक साल बाद ताजा हमले ने पाकिस्तान की आतंक-विरोधी रणनीति की भी पोल खोल दी है। पाकिस्तान आर्मी लंबे समय से तालिबान और  आतंकियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कर रही है। तालिबानी आतंकियों ने  बुधवार को खैबर पख्तूनख्वाह में  बाचा खान यूनिवर्सिटी में घुसकर तीस छात्रों को गोलियों से भून डाला। हमले में 50 से ज्यादा को गंभीर रुप से जख्मी हो गए। हमले के समय मुशा यरा सुनने के लिए 3000 छात्र और लगभग 600  शायर यूनिवर्सिटी में उपस्थित थे। आतंकी सुबह यूनिवर्सिटी में दाखिल हुए और आते ही छात्रों और प्रोफसरों पर अंधाधुंध फायरिंग  शुरु कर दी।  बाचा खाना पाकिस्तान की सबसे बडी यूनिवर्सिटी है और फ्रंटियर गांधी के नाम से विख्यात खान अब्दुल गफ्फार खान (बादशाह खान) के नाम पर खोली गई है। गांधीवादी गफ्फार खान की आजादी में अग्रणी भूमिका रही है। बुधवार को उनकी पुण्य तिथि के उपलक्ष्य में मुशायरा आयोजित किया गया था। हमले के लिए जिम्मेदार आतंकी संगठन ने बाद में दावा किया कि 2014 में पेशावर  आर्मी स्कूल पर हमले के दौरान मारे गए “आतंकी लडाकों“ का बदला लेने के लिए यह हमला किया गया। 2014 में आतंकियों ने पेशावर स्थित आर्मी स्कूल पर हमले करके 141 से अधिक छात्रों और अध्यापकों को गोलियों से भून डाला था। कहावत है, “ जाके पांव न फटी विवाई, सो क्या जाने पीर पिराई“। पेशावर हमले के लगभग एक साल बाद ताजा हमले से पाकिस्तान सरकार और अवाम सकते में है। पाकिस्तान को अब समझ में आया कि आतंक की आग में किस तरह वह भी भस्म हो सकता है। और पाकिस्तान को इस बात का भी अहसास होना चाहिए कि जेहादी कभी भी “गुड“ नहीं हो सकता। उसक न केवल चेहरा ही विकृत होता है, बल्कि मंसूबे भी। अपने निहित स्वार्थी हितों की खातिर पाकिस्तान जेहादियों में गुड ( पाकिस्तान के लिए भारत में आतंक फैलाने वाले) और बैड (सुरक्षा एजेंसियों पर हमला करने वाले) तलाशता रहा है। स्कूली और यूनिवर्सिटी के छात्रों को निशाना बनाकर पाकिस्तानी आतंकी सरकार और अवाम पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना चाहते हैं। ताजा हमले ने पाकिस्तान सरकार के इस दावे की कलई खोल दी है कि सेना ने जेहाद्दी उग्रवाद की कमर तोड दी है। सच यह है कि सेना आतंकियों के ठिकानों पर बमों और टैंकों से हमला तो कर सकती है मगर उनके स्थानीय नेटवर्क को तहस-नहस नहीं कर सकती। और जब तक जेहादियों का स्थानीय लोगों में फैला नेटवर्क  नहीं टूटता, तब तक सैन्य कार्रवाई से आतंकियों को नेस्तनाबूद नहीं किया जा सकता। इस स्थिति में पाकिस्तान को अपनी मौजूदा सेना आधारित आतंक विरोधी (काउंटरटेररिज्म स्ट्रेटेजी) रणनीति पर फिर से गौर करने की जरुरत  है।  काउंटरटेररिज्म ऑपरेशन को सेना के हवाले करने की नीति कारगर साबित नहीं हुई है। पाकिस्तान में 1958 से ही सेना बेहद ताकतवर है और जैसे-जैसे सेना का दखल बढता गया स्थानीय सिविल प्रशासन नकारा होता गया। 2008 में सैनिक  शासक जनरल परवेज मुशर्रफ के पदच्युत होने के बाद  यद्यपि पाकिस्तान में चुनी हुई लोकप्रिय सरकार है मगर अभी भी सेना का प्रशासन में खासा दखल है और माना जाता है कि सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता।  पाकिस्तान के मित्र देशों  को उसे समझाने की जरुरत है कि बंदूक की नोक पर विद्रोह को दबाया नहीं जा सकता। अलबत्ता इससे यह और ज्यादा भडकता है। अमन-चैन सुनिश्चित  करने के लिए सरकार को भी  शांति और धैर्य से काम करना पडता है। पाकिस्तान को अब तो समझ जाना चाहिए कि पडोसी के घर आग लगाकर उसकी लौ में वह खुद भी भस्म हो सकता है।    

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

No Lesson Learnt From Malta Tragedy

                                कब तक ?

विदेश  में पैसा कमाने का जनून पंजाब के युवाओं को मौत के आगोश  में धकेल रहा है। पंजाब के लोगों में विदेश  जाने का जनून इस कद्र सवार है कि अगर आप  राह चलते भी किसी पंजाबी को बाहर  जाने का न्यौता दें ,  तो वह  बगैर किसी बात की परवाह किए फौरन अपना सब कुछ बेच-बाच कर आपके के साथ चल पडेगा।  पंजाब के  इस जनून का फायदा उठाकर  लोभी दलालं और कबूतरबाज भोले-भाले युवाओं को आसानी से फांस लेते हैं। हैरानी इस बात की है कि राज्य सरकार ने 19 साल पहले की मालटा त्रासदी से भी कोई सबक नहीं सीखा और अब 25 युआवों को फिर  मौत के आगोश  में जाना पडा है।  25 दिसंबर, 1996 को मालटा में  अप्रवासी से लदी नाव के  भू-मध्य सागर में पलट जाने से पंजाब के 170 लोग डूब कर मारे गए थे। 18-फीट लंबी इस नाव में अप्रवासियो को भेड-बकरियों की तरह ठूंस- ठूंस कर लादा गया था जिस वजह यह पलट गई। और अब इस माह की 10 तारीख को मध्य अमेरिका के पनामा के निकट आप्रवासियों को अवैध तौर पर अमेरिका ले जा रही नाव के डूब जाने से पंजाब के 25 युवाओं की मौत हो गई। वही परिस्थितियां, वही लोग और वैसी ही त्रासदी। 19 साल में कुछ नहीं बदला। मृतकों में अधिकतर 20-22 साल के युवा हैं।  पनामा नाव दुर्घटना में जीवत बचे जालंधर के भोगपुर गांव निवासी ने परिजनों से अपनी सलामती के बारे सूचित किया, तब जाकर  इस त्रासदी का पता चला। इसके बाद  सरकार को होश  आया। और होश  भी क्या आया, कार्रवााई बयानबाजी तक सीमित है। अमेरिका जाने के लिए इन युवाओं द्वारा ट्रैवल एजेंटों को 10 से 25 लाख रु दिए गए और इसके लिए हमेशा  की तरह कई परिवारों को अपनी जमीन तक बेचनी पडी। पिछले कई सालों से यह सिलसिला जारी है। दलाल और कबूतरबाज विदेश  भेजने की आड में फर्जी कागजात बनाकर लोगों को अवैध तरीके से भेजते हैं और अंत में ऐसे लोगों को या तो जेल की सजा काटनी पडती है या मालटा अथवा पनामा जैसी  त्रासदी  का शिकार होना पडता है। राज्य सरकार आज तक इस समस्या का कोई पुख्ता हल नहीं ढूंढ पाई है। सरकार कनूतरबाजों की ठगी रोकने के लिए कितनी संजीदा है, इसका पता इस बात से चलता है कि मालटा त्रासदी के 19 साल बाद भी राज्य सरकार 29 आरोपियों के खिलाफ आज तक चार्जशीट  तक तैयार नहीं कर पाई है। 2012 में राज्य सरकार ने जन दबाव में कबूतरबाजी रोकने के लिए कानून भी बनाया था मगर इस पर आज तक गंभीरता से अमल नहीं हो पाया है। मालटा त्रासदी के आरोपी कबूतरबाज धडल्ले से अपना अवैध कारोबार चला रहे हैं। सरकार की इस उदासीनता से त्रासदी के पीडित परिवारों के जख्म समय के साथ-साथ और गहरे होते जा रहे हैं। राज्य सरकार की ही तरह केन्द्र सरकार को भी कबूतरबाजी को रोकने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मीडिया में मामला उछाले जाने पर कुछ समय के लिए मगरमच्छी आंसू बहाकर इतिश्री कर ली जाती है। केन्द्र सरकार 2014 से  इराक में लापता 39 पंजाबी युवाओं का आज तक कोई पता नहीं लगा पाई है। सियासी दलों को मामलों को सुलझाने की बजाय इनमें अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में ज्यादा दिलचस्पी रहती है। मालटा त्रासदी में पंजाब के सभी दलों ने जमकर राजनीतिक रोटियां सेंकी मगर पीडित परिजनों को राहत पहुंचाने में कोई आगे नहीं आया। यही स्थिति पनामा त्रासदी के पीडित परिवारों की है। सतारूढ अकाली दल और विपक्षी दल इस त्रासदी का राजनीतिक लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोडेंगे मगर कबूतरबाजी को रोकने के लिए कुछ नहीं करेगें। इस समस्या का हल मिल-जुल कर निकाला जा सकता है पर समकालीन सियासी दलों को हल निकालने से कहीं ज्यादा निहित राजनीतिक स्वार्थ पूरा करने की पडी रहती है। आखिर, यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा?

बुधवार, 20 जनवरी 2016

Can India Fight Back Another Douse of Recession

दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था चीन का बराबर सुस्ताना मंदी के स्पष्ट  संकेत दे रहा है। 2015 में चीन की अर्थव्यवस्था की ग्रोथ पच्चीस साल में सबसे कम 6.8 फीसदी रही है और चौथी तिमाही की ग्रोथ तो और भी कम 6.8 फीसदी रही है। बीता साल चीन के लिए किसी भी सूरत में अच्छा  नहीं रहा है।  शेयर बाजार के क्रेश  होने से भारी संख्या में निवेशकों के पलायन से कारण केपिटल का जबरदस्त आउटफ्लो दर्ज  हुआ और युवान के अवमूल्यन ने चीन की अर्थव्यवस्था को और कमजोर कर डाला। इन सब बातों ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है और  2016 में मंदी के प्रतिकूल  परिणामों  से सहमी हुई है। चीन के स्लोडाउन और कमोडिटी मार्केट में मंदी के  दृष्टिगत   मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय  मुद्राकोष  को 2016 के लिए  चीन की ग्रोथ का आकलन संशोधित करना पडा। अब आईएमएफ का अनुमान है कि 2016 में चीन की ग्रोथ 2015 से भी कम 6.3 फीसदी के आस-पास रहेगी। चीन द्वारा जारी आंकडों के अनुसार दिसंबर में औद्योगिक उत्पादन अपेक्षा से कहीं कम 5.9 फीसदी  की दर से बडा है जबकि पॉवर और इस्पात के उत्पादन में दशकों बाद पहली बार  गिरावट आई है। चीन इस समय दुनिया का अग्रणी इस्पात उत्पादक है और भारत को कडी टक्कर दे रहा है। कोयला उत्पादन लगातार दूसरे साल फिर गिरा है। इससे दो बातें साफ है। पहली यह कि चीन की अर्थव्यवस्था अब स्लोडाउन से बुरी तरह ग्रस्त है और दूसरी बात यह कि चीन भी उतरोत्तर कंज्यूमर उन्मुख ग्रोथ की ओर अग्रसर है। इन आंकडों से यही संकेत मिल रहे हैं कि स्थिति काफी खराब है। निवेशकों का विश्वास  डोल रहा  है और रिटेल  निवेशक  चीन  के शेयर बाजार से मुंह फेर  चुके  हैं ।  अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स  शिथिल पड चुके है। इससे साफ लग रहा   है कि चीन के स्लोडाउन का असर पूरी  वैश्विक  अर्थव्यवस्था पर पड सकता है। तथापि, राहत की बात यह है कि चीन में ग्रोथ के आंकडे इतने भी निराशाजनक नहीं है और अगर ग्रोथ के लिए माकूल माहौल मिलता है तो स्थिति संभल भी सकती है। मंगलवार को चीन की स्टॉक मार्केट में कुछ सुधार देखा गया। मंगलवार को शंघाई कम्पोजिट में 3.22 फीसदी का उछाल आया। हांगकांग के हैंग सेंग सूचकांक में  2.07 फीसदी और जापान के निक्की-225 में 0.55 फीसदी का उछाल दर्ज हुआ। भारत के शेयर बाजार में भी तीन दिन की मंदी के बाद तेजी व्याप्त रही और सेंसेक्स में 1.21 फीसदी और निफ्टी में 1,14 फीसदी की तेजी आई। पिछले एक माह (दिसंबर, 2015) में यह सबसे बडा उछाल है। देश  के सबसे बडे औद्योगिक समूह रिलायंस इंडस्ट्रीज ने तीसरी तिमाही में 7290 करोड रु का नेट रिकार्ड लाभांश  अर्जित करके भारतीय अर्थव्यवस्था के मजबूत फंडामेंटल्स के संकेत दिए हैं। यूरोप भले ही भीषण मंदी की चपेट में है मगर फिलहाल भारत पर मंदी का असर नजर नहीं आ रहा है। इसके उलट भारत  के लिए चीन की मंदी से अपने निर्यात को बढाने का सुअवसर है। 1980 के बाद से चीन लगातार भारत को ग्रोथ में पछाडता रहा है और इस समय चीन की अर्थव्यवस्था भारत से पांच गुना बडी 10 खरब डॉलर की हो चुकी है। 2015 में पहली बार ग्रोथ में भारत ने चीन को पीछे छोडा है और अंतरराष्ट्रीय  वित्तीय संस्थाओं का आकलन है कि भारत 2030 तक चीन की बराबरी करने में सक्षम हो जाएगा। इसी बात के मद्देनजर  नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिया का कहना है कि भारत निर्यात में भी चीन  को पीछे छोड सकता है। लागत बढने और एजिंग लेबर फोर्स सेे चीन का निर्यात उतरोतर महंगा होता जा रहा है और अब तक चीन को जो तुलानात्मक (कम्पेरेटिव ) एडवांटेज थी, वह खत्म होती जा रही है। भारत की यंग लेबर- फोर्स  और लेबर-सेंविग टकनॉलॉजी निर्यात में चीन को मात दे सकती है। इससे भारत की ग्रोथ दर और तेज हो सकती है। सिर्फ जलवायु परिवर्तन ही भारत की ग्रोथ को रोक सकता है। भारत की  अर्थव्यवस्था   इतनी मजबूत तो है कि वह 2008 की  तरह   मंदी के असर को झेल सकती है । 

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

Polythene free India

पॉलीथिन प्रतिबंध को संजीदगी से लागू करने में पंजाब और हरियाणा काफी पीछे है जबकि पडोसी हिमाचल प्रदेष इस मामले में पूरे देश  में अग्रणी है। हिमाचल प्रदेश  ने पहली बार जनवरी 1999 में ही  रिसाइक्लिड प्लास्टिक से बने रंगीन पॉलीथिन कैरी बैग्स पर   प्रतिबंध लगा दिया था।  अक्टूबर 2009 से हिमाचल प्रदेश  में पॉलीथिन का प्रयोग पूरी तरह से प्रतिबंधित है और तब से यह पहाडी राज्य देश  का ऐसा पहला राज्य बन गया है,  जहां पॉलीथिन के प्रतिबंध को कडाई से लागू किया जा रहा है। दुर्भाग्यवश , पंजाब और हरियाणा इस प्रतिबंध को सख्ती से लागू नहीं कर पाया है। यह बात बेहद शर्मनाक है कि पॉलीथीन के प्रतिबंध को सख्ती से लागू करवाने के लिए भी नेशनल  ग्रीन ट्रिब्यूनल को दखल देना पडे। पॉलीथिन पर प्रतिबंध के लिए  पंजाब में 2005 को  कानून बना दिया गया था मगर राज्य सरकार इसे हिमाचल की तरह लागू नहीं पर पाई। हरियाणा में 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसी लाल ने पॉलिथिन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का ऐलान किया था मगर इस पर संजीदगी से अमल नहीं हो पाया। हरियाणा में 2010 से पॉलीथिन  कैरी बैग्स के उत्पादन, वितरण और इस्तेमाल पर प्रतिबंध है मगर इसके बावजूद  राज्य में धडल्ले से पॉलिथिन बैग्स का उत्पादन, वितरण और इस्तेमाल हो रहा है। इसी स्थिति के कारण  नेशनल  ग्रीन ट्रिब्यूनल को पंजाब और हरियाणा को नोटिस तक जारी करना पडा है। पूरी दुनिया में इस समय रिसाइकिल्ड प्लास्टिक के इस्तेमाल के खिलाफ जबरदस्त मुहिम जारी है। चीन, जर्मनी, इटली, जापान, दक्षिण अफ्रीका, स्वीडन, दक्षिण कोरिया समेत 25 देश  प्लास्टिक के इस्तेमाल को पूरी तरह प्रतिबंधित कर चुके हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश  के अलावा, पश्चिम  बंगाल, पंजाब, राज्स्थान, गोवा, हरियाणा, उतराखंड और दिल्ली  में पॉलिथीन और प्लास्टिक बैग्स पर प्रतिबंध तो है मगर हिमाचल प्रदेश  की तरह इस का कडाई से पालन नहीं हो रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञो  के अनुसार 30 माइक्रोन से कम वजन वाला प्लास्टिक बैग 300 साल तक भी आसानी से गलता नहीं है और इस कारण क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी- कार्बन, कलोरीन और फ्लोरीन) का उत्सर्जन होता है। हवा में इसके मिश्रण से प्रदूषण  बढता है। अनुमान है कि 1950 से पृथ्वी पर जमा हुए करोडो टन प्लास्टिक को गलते-गलते हजारों साल लग सकते  हैं मगर तब तक प्रदूषण  के कारण सांस लेना भी दुर्भर हो  जाएगा। ताजा अध्ययन ने साफ कर दिया है कि ग्लोबल वार्मिंग के लिए कार्बन डायक्साइड नहीं, बल्कि सीएफसी प्रमुख रुप से जिम्मेदार है।  प्लास्टिक के कारण ही 1999 में बांग्लादेश  की राजधानी ढाका का सीवरेज सिस्टम बोल गया था। इस घटना से सीख लेते हुए बांग्ला देश  सरकार ने 2002 में प्लास्टिक के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। 2002 में ही आयरलैंड ने प्लास्टिक बैग्स के इस्तेमाल को रोकने के लिए सुपरमार्केट प्लास्टिक बैग्स पर 15 यूरो-सेंट का शुल्क लगा दिया। आयरलैंड के इस कदम से देश  में प्लास्टिक बैग्स का इस्तेमाल 90 फीसदी तक गिर गया। 2003 में दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने भी पतले पॉलीथिन बैग्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। चीन में 2008 में पूरे देश  में मुफ्त में प्लास्टिक बैग्स देना बंद कर दिया गया। सरकार ने इसके प्रयोग पर शुल्क लगा दिया और 0.025 एमएम से कम वजन के पॉलीथिन बैग्स को प्रतिबंधित कर दिया गया। यूरोप के अधिकतर देशों  में प्लास्टिक बैग्स के निर्माण में कौनसा प्लास्टिक प्रयोग किया गया है, यह बताना कानूनन अनिवार्य है। इसका मकसद रिसाइक्लिड प्लास्टिक के प्रयोग को रोकना है। अमेरिका में प्लास्टिक के प्रयोग से हर साल 75 अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हो रहा है। इसी तरह प्लास्टिक से निर्मित चीजों के प्रयोग से दुनिया की अमूल्य समुद्र जलीय संपदा को हर साल 13 अरब डॉलर का नुकसान हो रहा है। भारत को भी प्लास्टिक के अंधाधुध प्रयोग से भारी नुकसान हो रहा है। इस पर पूरे देश  में अविलंब प्रतिबंध लगना चाहिए। अगर चीन ऐसा कर सकता है तो भारत क्यों नहीं। हर बात के लिए अदालत अथवा प्राधिकरण को ही क्यों दखल देना पडता है ? 

शनिवार, 16 जनवरी 2016

प्रतिभा का पलायन

                                   प्रतिभा का पलायन

दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था भारत से प्रतिभा का लगातार पलायन (ब्रेन-डेन) देश  की सबसे बडी त्रासदी है। इससे बडी त्रासदी और कुछ हो ही नहीं सकती। ब्रेन-ड्रेन से देश  की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा असर पडता है। ब्रेन-ड्रेन से भारत को कितना नुकसान हुआ है, इसका आकलन लगाना कठिन  है मगर अमेरिका और यूरोप को समृद्ध करने में भारतीय प्रतिभाओं का अच्छा-खासा योगदान रहा  है। ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि 2003 से 2013 के दौरान एक दशक में अमेरिका में काम कर रहे वैज्ञानिकं-इंजीनियरों में  57 फीसदी एशिया मूल के हैं। इतना ही नहीं एशिया मूल के 29 लाख  60 हजार वैज्ञानिकं-इंजीनियरों मेंसे साढे नौ लाख भारतीय मूल के हैं। अमेरिका के अक्कौंटिबिलिटी ऑफिस (जीओए) की रिपोर्ट  के अनुसार 2000-2009 के दौरान अमेरिका में एच-1  बी वीजा पाने वाले  हाइली स्किल्ड  वर्कर्स  मेंसे 47 फीसदी भारतीय मूल के थे। 2004 में अमेरिका आए 71,290 विषेशज्ञ डाक्टर्स ( फिजिसियंस) मेंसे 62 फीसदी भारतीय थे और इसी साल 32 फीसदी इंडियन फिजिसियंस इग्लैंड चले गए थे। इग्लैंड के  हाईली स्क्लिड माग्ररेंट प्रोग्राम के तहत 40 फीसदी से ज्यादा भारतीय हैं।  अमेरिका में कार्यरत 70 फीसदी डाक्टर भारतीय मूल के हैं। दुनिया की सबसे बडी स्पेस साइंस एजेंसी “नासा“ में काम कर रहे 40 फीसदी वैज्ञानिक भारतीय मूल के हैं। आस्ट्रेलिया में रोजगार की तलाश  में आने वाले प्रवासियों में 50 फीसदी भारतीय होते हैं। भारत के पास हाईली स्क्लिड प्रतिभाओं का विशाल  खजाना है। इसीलिए, भारत   विकसित देशॉ  और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को हाईली स्क्ल्डि वर्कर्स  सप्लाई करने वाला सबसे बडा देश  है। 2026 तक आबादी में भारत चीन को भी पीछे छोड देगा। 2020 तक  82 करोड युवाओं की आबादी के साथ भारत के पास दुनिया की सबसे ज्यादा युवा शक्ति होगी। भारत में हर साल 35 लाख स्नातक और स्नातकोत्तर प्रतिभाएं तैयार हो रही हैं।  इन आंकडों से यही निष्कर्ष   निकलता है कि भारत से प्रतिभा का जबरदस्त पलायन हो रहा है। यही वजह है कि देश  के देहातों और दूर-सदूर क्षेत्रों में डाक्टरों की भारी कमी है। उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाना अच्छी बात है मगर स्वदेश  में उच्च अध्ययन करके सिर्फ  पैसा कमाने और बेहतर -सुख-सुविधाओं के मोह में विदेश  जाना “देशद्रोह“ जैसा है। जिस देश  और समाज ने आपको लाड-प्यार से पाल-पोस कर काबिल इंसान बनाया है, उसकी सेवा की बजाय  मोह-माया की खातिर उसे छोड दिया जाए, यह भी कोई  इंसानियत है?  अब सवाल यह है कि प्रतिभा के पलायन, विशेषतय डाक्टर्स और वैज्ञानियों  को , कैसे रोका जाए, जिनकी सेवाएं की देश  को हमेशा  जरुरत रहती है? नीति आयोग का आकलन है कि भारत में स्वास्थय सेवाएं और बेहतर बनाने के लिए कम-से-कम 6 लाख डाक्टरों की अविलंब जरुरत है और देश  में मौजूदा मेडिकल कालेजों की क्षमता भी इसे पूरा नहीं कर स्कती। डाक्टरों की कमी के कारण पिछले तीन दशकों से देश  में स्वास्थय सेवाओं का स्तर लगातार नीचे गिर रहा है। भारत के पास इस समय 9.36 लाख डाक्टर और लगभग 16.75 लाख नर्से हैं। विभिन्न मेडिकल कालेजों से हर साल 50,000 डाक्टर बाहर आ रहे हैं।  मगर इन मेंसे 40 फीसदी से ज्यादा बाहर चले जाते हैं। देश  जनमानस को समग्र स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने में अभी भी काफी पीछे है।  विश्व स्वास्थय  संगठन (डब्लयूएचओ) के मानदंडों के अनुसार एक हजार की आबादी के लिए कम-से-कम एक डाक्टर तो होना ही चाहिए। भारत में 1700 लोगों के लिए भी बमुश्किल  एक डाक्टर है। विदेशॉ  में पैसा और बेहतर सुविधाएं ही प्रतिभा पलायन के लिए अकेले जिम्मेदार नहीं है। प्रशासनिक सेवाओं का राजनीतिकरण, भाई-भतीजावाद, पक्षपात और भ्रष्ट्र  तंत्र प्रतिभा को कहीं ज्यादा पलायन के लिए विवश  करता है। मोदी सरकार को इसे रोकना होगा।

शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

Big Relief to Farmers

                                                          किसानों को बडी राहत

मोदी सरकार की ताजा फसल बीमा योजना कर्ज में डूबे और प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह टूट चुके किसान के लिए बहुत बडी राहत है।  दो साल  से किसानों को लगातार बेमौसमी बारिश  अथवा सूखे का प्रकोप झेलना पड रहा है। पिछले साल बेमौसमी बारिश  और ओलावृष्टि  से रबी की फसल करीब-करीब पूरी तरह नष्ट  हो गई थी। फिर बरसात में कम पानी बरसने से खरीफ की फसल सूख गई और इस बार भी सर्दी में गर्म मौसम ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। इन हालात में नई फसल बीमा योजना किसानों के लिए आशा  की नई किरण साबित हो सकती है। मौजूदा बीमा योजनाए किसानों को ज्यादा राहत नहीं दे सकी हैं। केन्द्र सरकार ने बुधवार को लोहडी (उत्तर भारत का त्योहार) , पोंगल (दक्षिण भारत)  एवं बीहू (पूर्वोतर का त्योहार)  के दिन किसानों को “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना“ की सौगात दी । नई फसल बीमा योजना अगले वित्तीय साल से लागू होगी। इस बीमा योजना के तहत किसानों को खरीफ की फसल के लिए कुल बीमा राशि  का 2 फीसदी, रबी की फसल के लिए 1.5 फीसदी और तिलहन, कपास जैसी कमर्शियल  फसल के लिए 5 फीसदी का प्रीमियम अदा करना होगा।   प्रत्येक सीजन में केवल एक ही प्रीमियम लिया जाएगा।  बाकी का प्रीमियम केन्द्र और संबंधित राज्य की सरकार चुकता करेगी। प्रीमियम की कोई अधिकतम सीमा भी निर्धारित नहीं की गई है। किसानों को बगैर किसी कटौती के बीमा की पूरी रकम की अदायगी की जाएगी। फसल के नुकसान का आकलन भी आधुनिक तौर-तरीकों से किया जाएगा। प्राकृतिक आपदा में बाढ, ओलावृष्टि   और फसलोत्तर (पोस्ट-हार्वेस्ट) नुकसान को भी  शामिल किया गया है। इससे किसानों को खासी राहत मिली है। पिछले कुछ समय से ओलावृष्टि   से भी रबी की फसल को खासा नुकसान हो रहा था। केन्द्र सरकार को  “प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना“ लागू करने के लिए 8,000 करोड का अतिरिक्त खर्चा वहन करना पडेगा। लंबे समय से यह सुझाव दिया जा रहा था कि किसानों को सब्सिडी अथवा ऋण माफी जैसी योजना की बजाय निश्चित (अस्सुरेड़)  सिंचाई सुविधाएं और कारगर फसल बीमा योजना का लाभ दिया जाना चाहिए। निश्चित  सिंचाई सुविधाएं मिलने से किसानों को मौसमी बारिश  पर निर्भर नहीं रहना पडेगा। देश  में अभी भी लगभग 54 फीसदी क्रॉप एरिया  निश्चित  सिंचाई से वंचित है। देष में क्योंकि 70 फीसदी बारिश  जून से सितंबर के मध्य होती है, इसलिए अक्टूबर से मई के बीच बोई जानी फसल बगैर निश्चित  सिंचाई सुविधा के अभाव में अक्सर सूख जाती है। सिंचाई सुविधाएं नहीं होने से महाराष्ट्र  का विदर्भ क्षेत्र कई सालों से सूखे की चपेट में है। साल-दर-साल फसल बर्बाद होने से पीडित किसान   आत्महत्या करने पर विवश  हो रहे हैं। देश  में किसानों द्वारा आत्महत्या के सबसे ज्यादा मामले भी विदर्भ  में ही सामने आए हैं। फसल बीमा योजना के लागू होने से किसानों द्वारा आत्महत्याओं के मामले कम हो सकते हैं बशर्ते इस योजना पर मुस्तैदी से अमल हो। अक्सर यह देखा गया है को बीमा कंपनियां मुनाफे के लिए बीमा राशि  देने में या तो अनावश्यक  विलंब करती हैं या औपचारिकताओं की कमी की आड में दावे खारिज कर देती हैं । फसल बीमा योजाना में नुकसान आकलन की प्रकिया में भी हेर-फेर की गुजाइंश  हो सकती है और “भ्रष्ट  “ लोग इसका फायदा उठाकर किसानों का शोषण  कर सकते हैं।  एआईसी (एग्रीकल्चर इंसोरेंस कंपनी ऑफ इंडिया)  के माध्यम से लागू की जा रही मौजूदा ऊंचे प्रीमियर वाली राष्ट्रीय  कृषि  बीमा योजना और संशोधित कृषि  बीमा योजना ज्यादा कारगर साबित नहीं हो पाई है हालांकि इन बीमा योजनाओं के तहत क्लेम सरकार तय करती है। नई योजना में सरकार इस जिम्मेदारी से मुक्त हो गई है। नई योजना के तहत बीमा राशि  के क्लेम का 25 फीसदी  सीधे बीमाकर्ता (इंसुरेड) के खाते में जमा किए जाने के प्रावधान से किसानों का शोषण  कम हो सकता है।  एक राज्य में केवल एक बीमा कंपनी के जिम्मे इस योजना लागू करने का प्रावधान मुनाफा कमाने वाली बीमा कंपनियों को इससे दूर रख सकता है।  बहरहाल, लगातार प्राकृतिक आपदा से बेहाल किसान को फौरी नहीं, स्थाई राहत की जरुरत है। और अगर इस बार भी उसे माकूल राहत नहीं मिली तो उसका फसल बीमा योजना से भरोसा ही उठ जाएगा।

गुरुवार, 14 जनवरी 2016

Khaddor Saheb By-polls: Curtian Raiser to Punjab Assembly Elections

पंजाब में खडूर साहिब विधानसभा सीट के उप-चुनाव की तारीख घोशित होने से राज्य में राजनीतिक माहौल गर्मा गया है। तरनतारन जिले की यह सीट पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रमनजीत सिंह सिक्की ने जीती थी। अक्टूबर, 2015 में कांग्रेस के विधायक रमनजीत सिंह ने खडूर साहिब हलके के बाथ गांव में गुरु ग्रंथ साहिब को अपवित्र करने की घटना के विरोध में विधानसभा से इस्तीफा दे दिया था। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा सिक्की का इस्तीफा स्वीकार होने पर  18 नवंबर को इस सीट को खाली घोषित किया गया और तभी से उप-चुनाव कराने की प्रकिया  शुरु हो गई। खडूर साहिब सीट पर 13 फरवरी को वोट डाले जाएंगे और 16 फरवरी को मतगणना की जाएगी। एक साल बाद पंजाब विधानसभा के चुनाव कराए जाने है। इस बात के  मद्देनजर , खडूर साहिब उप-चुनाव विधानसभा चुनाव के कर्टन रेजर माने जा रहे हैं। उप चुनाव में न केवल सतारूढ गठबंधन शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी  की प्रतिष्ठा  दांव पर है, बल्कि  उप-चुनाव के नतीजे यह भी बताएंगे कि कांग्रेस और “आप“ कितने पानी में है। कांग्रेस के लिए खडूर साहिब उप-चुनाव दो कारणों से भी अहम है। पहला और प्रमुख कारण यह है कि यह सीट कांग्रेस के पास थी। इस स्थिति में इस सीट को बरकरार रखना कांग्रेस के लिए नाक बचाने का सवाल है। पटियाला उप-चुनाव को छोडकर शिरोमणि अकाली दल आज तक कोई विधानसभा उपचुनाव नहीं हारा है। पिछले साल (अप्रैल, 2015) विधानसभा उपचुनाव में अकाली दल ने धूरी विधानसभा सीट भी कांग्रेस से छीन ली थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में धूरी हलके से कांग्रेस के अरविंद खन्ना जीते थे मगर जनवरी 2015 में खन्ना ने विधानसभा सदस्यता छोड दी थी।  अरविंद खन्ना कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के करीबी हैं। शिरोमणि अकाली दल मोगा और तलवंडी साबो सीटों के उप-चुनाव में भी  कांग्रेस को धूल चटा चुका है । दूसरे, पंजाब प्रदेश  कांग्रेस कमेटी और कांग्रेस विधायक दल नेता  पद दोनों पर हाल ही में बेहतर चुनाव परिणामों के लिए बदलाव किया गया है। इस स्थिति में नव-नियुक्त प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरेन्द्र सिंह और कांग्रेस विधायक दल के नेता चरणजीत सिंह चन्नी के लिए खडूर साहिब कडी अग्नि परीक्षा है। सत्तारूढ शिरोमणि अकाली दल इस सीट को जीतने के लिए ऐडी-चोटी का जोर लगाएगा। लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब सीट शिरोमणि अकाली दल के रणजीत सिंह ब्रहृपुरा ने एक लाख मतों के अंतर से जीतीे थी और खडूर साहिब में भी अकाली दल को लीड मिली थी।  2009 के लोकसभा चुनाव में भी यह सीट शिरोमणि अकाली दल ने ही जीती थी। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने लगभग 3000 मतों के अंतर से  शिरोमणि अकाली दल से यह सीट जीती थी। तब  रणजीत सिंह ब्रहृपुरा ही अकाली दल के उम्मीदवार थे। इन हालात में कांग्रेस के लिए यह सीट निकालना आसान नहीं होगा। निसंदेह, कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के पंजाब  की कमान संभालने के कारण कांगेस इस बार बेहतर स्थिति में है। कैप्टन ने मोदी लहर के बावजूद अमृतसर लोकसभा सीट पर भाजपा के दिग्गज नेता अरुण जेटली को एक लाख से भी ज्यादा मतों के अंतर से हराया था। यही नहीं, पटियाला विधानसभा सीट के उप चुनाव में   पुरजोर कोशिशों   के बावजूद  अकाली दल कांग्रेस को परास्त नहीं कर पाया था। इस सीट पर अमरेन्द्र सिंह की पत्नी एवं पूर्व विदेश  राज्य मंत्री परनीत कौर जीतीं थी। वस्तुतः, विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस उपचुनावों में केवल यही सीट जीत पाई थी और वह भी कैप्टन अमरेन्द्र सिंह की बदौलत। प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के नेतृत्व में यह पहला उपचुनाव  है। इसलिए, कांग्रेस इस चुनाव को जीतने में कोई कसर नहीं छोडेगी। इस उपचुनाव में कांग्रेस की “एकता“ का भी पता चल जाएगा। कैप्टन इस बार सब को साथ लेकर पार्टी को मजबूत करने का संकल्प दोहरा चुके है़। जीत और हार इतने मायने नहीं  रखती  जितनी हार-जीत के मतों का अंतर। खडूर साहिब के नतीजे सियासी दलों के बीच प्रस्तावित गठबंधन भी तय करेंगे। इस उप-चुनाव से पहले मनप्रीत बादल की पार्टी का कांग्रेस में विलय हो सकता है।  अमूमन,  उपचुनाव में  स्थानीय मुद्दे हॉवी रहते हैं और एंटी-इंकूबेंसी  निष्क्रिय  रहता   है। कहते हैं “सफलता से बडा कुछ भी नहीं (नथिंग स्क्सीडस लाइक स्क्सेस)“। कांग्रेस के प्रांतीय नेताओं को इस उपचुनाव में यह साबित करना होगा।

बुधवार, 13 जनवरी 2016

Indo-Pak Dialogue Should Go On

                                                    बातचीत जारी रहे

पठानकोट स्थित भारतीय वायु सेना के एयरबेस पर 2 नए साल के दूसरे ही दिन आतंकी हमले से भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता के द्वार फिर बंद होने की कगार पर हैं। इसी सप्ताह के अंत में 15 जनवरी को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में दोनों देशों  के बीच वार्ता प्रस्तावित है।  पठानकोट हमले से आठ दिन पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रुस से लौटते समय अचानक लाहौर में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात करके जो पहल की थी, आतंकियों ने उस पर पानी फेर दिया। भारत विरोधी तत्व का मकसद वार्ता को विफल करना ही था। जब कभी भी भारत और पाकिस्तान के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयास किए जाते हैं, पाकिस्तान में भारत विरोधी तत्व इसे विफल करने में कोई कसर नहीं छोडते। इस बार भी यही हुआ हालांकि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पठानकोट हमले के लिए दोषी आतंकियों के पाकिस्तानी आकाओं को पकडने के लिए पहले की अपेक्षा अपेक्षाकृत अधिक संजीदा लग रहे  हैं। नवाज शरीफ ने प्रधानमंत्री मोदी को कडी कार्रवाई का भरोसा  दिया है। इसी क्रम में उन्होंने संयुक्त जांच टीम का गठन भी किया है जिसमें सेना और  खुफिया एजेंसी आईएसआई को भी  शामिल किया गया है। सोमवार को इस टीम ने पठानकोट हमले के साजिशकर्ताओं की धड-पकड के लिए बहावलपुर, गुजरांवाला, झेलम समेत कई जगह छापे भी मारे और कुछ लोगों को  गिरफ्तार भी किया। ताजा घटनाक्रम के दृष्टिगत  पाकिस्तान की नेकनीयति पर  शक नहीं किया जा सकता। मंगलवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी पाकिस्तान के प्रति कुछ नरम दिखे जबकि सोमवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने यह कहकर “जिम्होंने ने हमें दर्द दिया है, उन्हें भी दर्द महसूस कराएंगे“, पाकिस्तान को कडी चेतावनी दी थी। गृहमंत्री राजनाथ सिंह का कहना है कि पाकिस्तान ने भारत सरकार को पठानकोट हमले के पाकिस्तानी सूत्रधारों के खिलाफ कडी कार्रवाई का आश्वाशन  दिया है। इसलिए उस पर अविश्वास  करने का कोई कारण नहीं है। मगर सच्चाई यह भी है कि पाकिस्तान भारत में आतंकी हमलों के पाकिस्तानी सूत्रधारों के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में गिरगिट की तरह रंग बदलता रहा है। मुंबई के 26/11 हमले  का  मास्टरमाइंड हाफिज सईद आज भी सरेआम पाकिस्तान में भारत के खिलाफ आग उगल रहा है। भारत हाफिज के मुंबई आतंकी हमले का मास्टरमाइंड होने के पुख्ता सबूत भी दे चुका है। पाकिस्तान भारत द्वारा पेश  सबूतों को मानता ही नहीं है। पाकिस्तान यही पैंतरा पठानकोट आतंकी हमले को लेकर भी चल सकता है। और पाकिस्तान के अग्रणी न्यूज चैनल पर विश्वास  किया जाए तो चल भी चुका है।  चैनल जियो न्यूज का दावा है कि पठानकोट हमले को लेकर  भारत ने  पाकिस्तान को जो सबूत दिए हैं, उन्हें सरकार ने नकार दिया गया है। भारत ने पाकिस्तान को आतंकियों के मोबाइल नंबर दिए थे। इन नंबरों से पठानकोट के हमलावरों ने पाकिस्तान स्थित सूत्रधारों और अपने परिजनों से बातचीत की थी।  मगर पाकिस्तान का कहना है कि जो नंबर उसे दिए गए , वे पाकिस्तान में रजिस्टर्ड तक नहीं है। पाकिस्तान ने अपनी आरंभिक जांच रिपोर्ट भी भारत को सौंप दी है। भारत यह बात अच्छी तरह जानता है कि पाकिस्तान पुख्ता सबूत होने के बावजूद इन्हें नकार देगा। पाकिस्तान तो क्या कोई भी देश  इस तरह के सबूत नहीं मानेगा। पाकिस्तान यह बात कैसे मान सकता है कि उसकी सरजमीं से भारत के खिलाफ “प्रॉक्सी वार “ लडा जा रहा है। इससे पूरे विश्व  उस पर थू-थू कर सकता है। बहरहाल, 15 जनवरी को विदेश  सचिव स्तर की वार्ता प्रस्तावित है। पाकिस्तान तो इस वार्ता के लिए तैयार है मगर भारत का स्टैंड है कि  पाकिस्तान जब तक पठानकोट हमले के सूत्रधारों पर ठोस कार्रवाई नहीं करता है, तब तक बात आगे नहीं बढ सकती। मंगलवार को गृहमंत्री के वकतव्य से लगता है कि भारत वार्ता  में शरीक हो सकता है मगर अभी भी स्थिति स्पष्ट  नहीं है। वार्ता  का जरी रहना दोनों  देशों  के हित में है।

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

Political Vacuum in Jammu & Kashmir

                                                   राजनीतिक  शून्यता

जम्मू-कश्मीर  में मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के आकस्मिक निधन से राज्य में एक तरह से राजनीतिक शून्यता घर कर गई है। राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में राज्यपाल  शासन लागू करना पडा है हालांकि सतारूढ गठबंधन पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और भारत जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत  हासिल है। मुख्यमंत्री पीडीपी का ही होगा और दिवंगत मुफ्ती की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती इस पद को संभालेगी, यह बात तय है। मगर महबूबा मुफ्ती अभी पदभार ग्रहण करने के लिए तैयार नहीं है। रविवार को चार दिनी राजकीय शोक के समापन पर महबूबा के पदभार संभालने की उम्मीद थी मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया और न ही इस बात के संकेत दिए कि वे कब मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करेगी ? महबूबा मुफ्ती अपने पिता के निधन से बेहद शोक  संतप्त है और वे तुरंत उनका वारिस बनने के लिए तैयार भी नहीं है।  इससे राज्य में  अनिश्चितता  व्याप्त हो गई है। रविवार को पीडीपी विधायकों को संबोधित करते हुए वे फूट-फूट कर रो दीं। उन्होंने पार्टी विधायकों से काफी कुछ कहा सिवा इसके कि अगली सरकार का गठन कब होगा। इससे पार्टी के साथ-साथ  गठबंधन  भाजपा का चिंतित होना स्वभाविक है। रविवार को एक अन्य घटनाक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी महबूबा से संवेदना व्यक्त करने श्रीनगर पहुंची। इससे राजनीतिक अटकलें लगनी  शुरु हो गई हैं। दरअसल, गठबंधन सहयोगी पीडीपी और भाजपा के राजनीतिक  दर्शन  में जमीन आसमान का अंतर है।  पीडीपी जम्मू-कश्मीर  में अलगाववादियों से सार्थक वार्ता और उन्हें मुख्यधारा में  शामिल  करने की पक्षधर है, भाजपा इस बात की घुर विरोधी है। पीडीपी संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत राज्य की स्वायतत्ता को हर हाल में संरक्षित रखने के लिए वचनबद्ध है ।  इसके विपरीत भाजपा  अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के पीछे पडी हुई है। भाजपा के प्रातींय नेता जब-तब इस मुद्दे को उछालते रहते हैं और इस पर पीडीपी की खासी फजीहत हो रही है।  भाजपा के वरिष्ठ  राष्ट्रीय  नेता सुब्रमण्यम स्वामी रविवार को एक न्यूज चैनल पर कश्मीर  में अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की पैरवी कर रहे थे। भाजपा के मुस्लिम विरोधी तेवर भी पीडीपी को खासी दुविधा में डाले हुए है। पीडीपी ने राज्य में सता पाने के लिए भले ही भाजपा को गले लगा लिया हो, मगर जमीनी सच्चाई यह है कि दोनों गठबंधन सहयोगी एक-दूसरे से विचारधारा में ही नहीं, नीतिगत कार्यक्रमों में कोसों दूर हैं। संभवतय, यही बात महबूबा मुफ्ती को परेशान कर रही है। पीडीपी के अधिकांश  विधायक और सांसद भी भाजपा के साथ गठबंधन के मुखर विरोधी हैं और सार्वजनिक तौर पर इसका विरोध करते रहते हैं। रविवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के श्रीनगर दौरे के कई मायने निकाले जा रहे हैं। महबूबा द्वारा पदभार ग्रहण नहीं करने के भी यह मतलब निकाले जा रहे हैं कि वे सभी विकल्पों को खुले रखे हुए हैं। भाजपा की जगह कांग्रेस से गठबंधन एक विकल्प हो सकता है। पीडीपी 2002 से 2008 तक कांग्रेस के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर  में सरकार चला चुकी है। 2002 से 2005 तक मुफ्ती मोहम्मद सईद इस गठबंधन के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। तब केन्द्र में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार थी। इस बार केन्द्र में भाजपा नीत राजग सरकार है। इस स्थिति में भाजपा से गठबंधन तोडना पीडीपी के लिए आसान नहीं होगा। केन्द्र से मिल रही उदार वित्तीय सहायता बंद हो जाएगी और राज्य पाई-पाई के लिए तरस सकता है। महबूबा के पास विकल्प तो हैं मगर व्यावहारिकता और राज्य की आर्थिक जरुरतें उन्हें भाजपा से  गठबंधन तोडने की अनुमति नहीं देती। जाहिर है उनके समक्ष कई चुनौतियां हैं और अब उनका मार्गदर्शन  करने के लिए उनके राजनीतिक गुरु पिता नहीं हैं। मुफ्ती सुलझे हुए राजनीतिज्ञ थे और समय के प्रवाह के साथ चलना बखूबी जानते थे। न केवल महबूबा को, बल्कि जम्मू-कश्मीर  भी उनकी कमी लंबे समय तक अखरती रहेगी।

रविवार, 10 जनवरी 2016

Warning Signals For Sudden Cardiac Arrest

People of my age ( Sixty Plus) constantly  suffer from the fear of Sudden Cardiac Arrest as we live a Sedentary lifestyle.  Doctors says Sudden Cardiac Arrest takes one life every two minutes, claiming more lives than breast cancer, lung cancer, or AIDS. Over 60 percent of the people are still unaware of the disease. Though it’s commonly confused with a heart attack, cardiac arrest is different – and much worse.It causes the heart’s electrical activity to be knocked out of rhythm, abruptly stopping it from beating. So much so that even a small chest pain is, often. taken as alarm to cardiac arrest. Almost  the  The heart suddenly and unexpectedly stops beating. Blood stops flowing to the brain and other vital organs, and without treatment, within minutes a person is typically dead. However, a new study has suggested, it is not as sudden as first thought.Half of sufferers experience warning signals hours, days, sometimes even weeks before cardiac arrest strikes, doctors at Cedars-Sinai Heart Institute in Los Angeles have discovered. But, most people ignore those symptoms .In men the most common symptom was chest pain.While female sufferers were more likely to experience a shortness of breath.Other warning signs noted included fainting and heart palpitations. A study found that only a fraction of patients considered their symptoms bad enough to call emergency before they collapsed – and those people were the most likely to survive.A person’s chances of experiencing cardiac arrest is also increased if they’ve had previous heart attacks, coronary heart disease and certain inherited disorders that affect heartbeat.People who know they are at a high risk may receive an implanted defibrillator to shock their heart back into rhythm.Cardiac arrest is reversible in most victims if treated within minutes. It can be reversed if a trained emergency rescue team reaches the person quickly. Chances of survival reduce by 7-10 percent with every passing minute.

शनिवार, 9 जनवरी 2016

Turmoil in Stock Markets

                                            कहां ले जाएगी उथल-पुथल?

चीन में व्याप्त मंदी (स्लोडाउन) ने पूरी दुनिया के शेयर बाजार में अफरा-तफरी मचा रखी है। बुधवार और वीरवार को चीन का शेयर बाजार बुरी तरह से क्रेश  कर गया और वह भी नए साल के सातवें दिन में ही। इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी और इससे पूरी दुनिया का चिंतितं होना स्वभाविक है।  वीरवार को शंघाई एक्सचेंज में खुलते ही सभी अग्रणी  शेयर पलक झपते ही क्रेश  कर गए और मात्र 29 मिनट में ट्रेडिंग निलंबित करनी पडी। यही हाल बुधवार को था। एक सप्ताह में चीन का बेंचमार्क सीएसआई 300 इंडेक्स  12 फीसदी गिर चुका था।  शुक्रवार को स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही और चीनी  शेयर्स में दो फीसदी सुधार आया। नौ दिनों में पहली बार चीन ने अपनी मुद्रा को ऊंचा रखकर यह संदेश  देने की कोशिश  की कि युवान अभी नियंत्रण में है। मगर मार्केट एक्सपर्ट्स  अभी भी यह बात समझ नहीं पा रहे हैं कि चीन को साल के  शुरु में ही सर्किट ब्रेकर लगाने की जरुरत क्यों पडी। अंमूमन,  बेंचमार्क इंडेक्स में अगर पिछले दिन की तुलना में लेवल-वन के दौरान 7 फीसदी, लेवल-2 में 13 फीसदी और लेवल 3 में 20 फीसदी  की गिरावट आती है, तभी  मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर लगाया जाता है। शेयर  बाजार में यह अति की  स्थिति मानी जाती है।  इस स्थिति में बाजार में अफरा-तफरी रोकने के लिए कुछ देर के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है और अगर गिरावट 7 फीसदी से ज्यादा है तो पूरे दिन के लिए ट्रेडिंग रोक दी जाती है।  सोमवार और वीरवार को चीनी बाजार में गिरावट 7 फीसदी से कम थी।  षुक्रवार को बाजार संभल गया। शुक्रवार को  शंघाई स्टॉक मार्केट में तेजी आने और  शेयरों में दो फीसदी सुधार से निवेशक कुछ आश्वश्त  हुए हैं मगर खतरा अभी टला नहीं है। चीन के स्टॉक मार्केट्स में पिछले कुछ समय से भारी उथल-पुथल मची हुई है और अगर नए साल की  शुरुआत ही  मार्केट-वाइड सर्किट ब्रेकर से हो, तो निवेशकों का भरोसा टूटना स्वभाविक है। बाजार में एक दिन की तेजी और  मजबूत युवान के तब तक कोई मायने नहीं जब तक यह बरकरार न रहे। थोडी राहत वाली बात यह है कि कमोडिटी मार्केट में भी काफी देर बाद सुधार आया।  वीरवार को 12 साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंचने के बाद शुक्रवार को तेल की कीमतों में उछाल आया। इसके बावजूद विशेषज्ञों  का कहना है कि तेजी अस्थाई है और तेल की कीमतें अभी और गिर सकती हैं। अमेरिकी इंवेस्टमेंट बैंक गोल्डमैन साच्स का आकलन है कि तेल इस साल 20 डालर प्रति बैलर तक गिर सकता है। शुक्रवार को तेल की कीमत 34.28 डॉलर बैरल थी।  अब सवाल यह है कि स्टॉक और कमोडिटी मार्केट्स में एक दिन की तेजी क्या आने वाले अच्छे दिन के संकेत हैं। चीन दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और जिस तरह एक जमाने में अमेरिका की छींक पूरी दुनिया को सुनाई देती थी, ठीक उसी तरह अब चीनी इकॉनमी की आहट   पूरी दुनिया में सुनाई देती है।  भारतीय शेयर बाजार भी इससे अछूता नही हैं। चीन के स्लोडाउन से मई 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद से भारतीय शेयर बाजार में आई तेजी भी रुक गई है। वीरवार को सेंसेक्स पहली बार 25, 000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे खिसक गया था हालांकि शुक्रवार को सेंसक्स में लगभग 83 अंकों का सुधार आया। मगर सेंसेक्स अभी भी 25,000 के स्तर से नीचे है। चीन के स्लोडाउन के फलस्वरुप अगस्त 2015 में सेंसेक्स 1100 अंकों की बडी गिरावट भी दर्ज  कर चुका है।  तब एक ही दिन में निवेशकों के 7 लाख करोड रु डूब गए थे। अब तक सेंसेक्स 2000 अकों से ज्यादा टूट चुका है। बहरहाल, चीन की मंदी से पूरी दुनिया चिंतित है। मंदी ने पिछल महीने अमेरिकी फेडरल रिजर्व  द्वारा ब्याज दरों में मामूली वृद्धि का असर भी निष्क्रिय  कर दिया है। चीन की ग्रोथ में भी गिरावट आई है। ग्रोथ के मामले में भारत चीन को पीछे छोड चुका है। वर्ल्ड  बैंक और अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  का आकलन है कि  2016 न केवल जलवायु परिवर्तन ,बल्कि आर्थिक क्षेत्र में भी प्रतिकूल परिणामों  सामने  आ सकते  हैं। स्टॉक मार्केटस में इस साल भारी उथल-पुथल के आसार हैं।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

Let Hill States Like HP, Uttarakhand Implement Odd-even Formula

                                              सम-विषम का खेल 

बच्चों को कुशाग्र बनाने के लिए सम-विषम ( ऑड-ईवन गेम) खेल को बेहतरीन माना जाता है और विभिन्न अध्ययनों ने इस बात की पुष्टि  भी की है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार अब सम-विषम की कुशाग्रता को प्रदूषण नियंत्रण के लिए  आजमा रही है। देश  की राजधानी दिल्ली में नए साल से वाहनों के लिए सम-विषम योजना लागू की गई है और इसके शुरुआती परिणाम संतोषजनक रहे हैं। इस योजना की सफलता परखने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली सरकार को एक सप्ताह का समय दिया है जबकि सरकार 15 दिन के समय की मांग कर रही थी। दिल्ली में सम-विषम योजना के लागू होने पर प्रदूषण कम हुआ है या नहीं, एक सप्ताह से भी कम समय में यह आंका नहीं जा सकता। तथापि, दिल्ली के पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन ने माना है कि इस योजना के लागू होने से मात्र छह दिनों में पेट्रोल और डीजल की खपत में 25 फीसदी की गिरावट आई है। दिल्ली में 400 पेट्रोल-डीजल पंप हैं और प्रत्येक पंप हर माह औसतन 4, 70,000 लीटर पेट्रोल-डीजल बेचा  जाता है। और अगर मौजूदा दर से बिक्री में  गिरावट जारी रही, तो हर फिलिंग स्टेशन की माहवार बिक्री 3,00, 000 लीटर तक आ सकती है। इस तरह देश  की राजधानी में सम-विषम योजना लागू रहने से माहवार 6 करोड 80 लाख लीटर की बचत हो सकती है। निसंदेह, पेट्रोल-डीजल की बिक्री में गिरावट से  सरकार को आबकारी  शुल्क खोना पडेगा, तेल कंपनियों और डीलरों का मुनाफा गिरेगा और इस व्यवसाय से जुडे अन्य कारोबारियों को नुकसान होगा मगर दिल्ली का बडा फायदा होगा।  पेट्रोलियम डीलर्स एसोसिएशन यह बात भी मनती है कि अगर इस योजना को सख्ती से लागू किया जाए तो पेट्रोल-डीजल की बिक्री में और अधिक गिरावट आ सकती है। सम-विषम योजना का मकसद दिल्ली में डीजल-पेट्रोल की बेइंतहा खपत से बढ रहे प्रदूषण को कम करना है। इस लिहाज से केजरीवाल सरकार की सम-विषम योजना कारगर होती नजर आ रही है। दिल्ली में अगर सम-विषम के साथ साइकिलिंग  वाला  आइडिया भी काम कर जाता है, तो प्रदूषण पर काफी हद तक काबू पाया जा सकता है। दिल्ली में इस योजना की सफलता को हिमाचल प्रदेश  और उत्तराखंड जैसे पहाडी राज्यों में अविलंब लागू किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश  की राजधानी  शिमला में इस योजना को तुरंत लागू करने की जरुरत है। शिमला की भौगोलिक संरचना अब और ज्यादा वाहनों के आवागमन की कतई अनुमति नहीं देती।  शिमला में इस समय 80,000 वाहन पंजीकृत हैं मगर मात्र 690 वाहनों के लिए पार्किंग व्यवस्था है। स्थानीय वाहनों के अलावा शिमला में हर रोज औसतन 1000 वाहन बाहर से  आते हैं।  शिमला हिमाचल की राजधानी है, इसलिए लोग-बाग और कर्मचारी सरकारी कामकाज के सिलसिले में राज्य के विभिन्न भागों से  शिमला आते-जाते रहते हैं। शिमला में आए दिन के जाम और ट्रेफिक अव्यवस्था का ख्याल करते हुए उच्च न्यायालय के निर्देश  पर सरकार ने नए वाहनों के पंजीकरण पर रोक लगा दी है। केवल उन्हीं नए वाहनों का पंजीकरण किया जा रहा है, जिनके पास वाहन को पार्क करने की माकूल व्यवस्था है। इसके सुखद परिणाम आए हैं। शिमला के अलावा धर्मशाला और मनाली जैसे पर्यटक स्थलों में भी बढते वाहनों से न केवल समूची ट्रफिक व्यवस्था चरमर्रा गई है बल्कि इससे पहाडों पर भी प्रदूषण का खतरा मंडा रहा है। शिमला के कार्ट रोड स्थित पुराने बस स्टैंड पर वायु में 60 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पीएम (पार्टिकलस मैटर) पाए गए है जो कि विश्व  मानकों के हिसाब से काफी जहरीले हैं। इसकी तुलना में रिज पर  वायु में 20 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पीएम पाए गए हैं जो कि हानिकारक नहीं है। रिज पर वाहन नहीं चलते, इसलिए यहां प्रदूषण नहीं है। उतराखंड के देहरादून में प्रदूषण बहुत ज्यादा है। मसूरी एव नैनीताल में भी उतरोतर प्रदूषण बढ रहा है। पहाडों में प्रदूषण को रोकने और ट्रेफिक व्यवस्था को सुचारु करने के लिए सम-विषम योजना काफी सहायक हो सकती है।  केजरीवाल सरकार ने सम-विषम योजना को लागू  करके का सुखद पहल तो की है।

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

The Lesson From Pathankot Miscued Operation

                               
                                                   पठानकोट हमले से सीख


पंजाब के सीमावर्ती जिले पठानकोट ऑपरेशन ने स्पष्ट  कर दिया है कि देश  पर बार-बार आतंकी हमले के बावजूद पंजाब पुलिस ने कोई सबक नहीं लिया है। यही नहीं पठानकोट ऑपरेशन के दौरान थल सेना, वायु सेना और नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) में भारी तालमेल की कमी ने भी देश  को निराश  किया है। इस ऑपरेशन के दौरान  आला अधिकारी आतंकियों से लडने की बजाय आपस में ही लडते रहे और एक-दूसरे की बात काटते रहे। पंजाब पुलिस ने न तो खुद तत्काल कार्रवाई की और न ही सेना को बुलाया और जब सेना आई, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पंजाब पुलिस पहले से ही खासी बदनाम है। आपस में लडने और एक-दूसरे की टांग खींचना पंजाब पुलिस का पुरानी  फितरत  है। यही कारण है कि दिशा  और सामंज्सयहीन पठानकोट ऑपरेशन में  छह आतंकी चार दिन तक सेना की एक बटालियन, वायु सेना के 300 जवान और  60 से अधिक एनएसजी कमांडो, और पंजाब पुलिस कर्मियों का मुकाबला करते रहे। देश  के लिए यह शर्म की बात है कि छह आतंकी सेना के सात जवानों को मौत के घाट उतार दें और 20 से ज्यादा को जख्मी कर दें। अब सवाल यह है कि सेना के सात जवानों की शहादत और दिशाहीन ऑपरेशन से हुई  जगहंसाई के लिए कौन जिम्मेदार है? पिछले तीन दशक में पठानकोट ऑपरेषन को अब तक का सबसे कमजोर आतंक-निरोधी ऑपरेशन बताया जा रहा है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने मंगलवार को माना कि आतंकियों का पठानकोट के एयरबेस में घुसना भारी सुरक्षा चूक है। रक्षा मंत्री ने यह भी माना कि देश की सुरक्षा के लिए इस तरह की लापरवाही मंहगी पड सकती है। हैरानी इस बात की है कि पंजाब का सबसे संवेदनषील सीमावर्ती क्षेत्र होते हुए भी न तो पंजाब पुलिस और न ही सेना ने  पठानकोट में कडे एहतियातन सुरक्षा उपाय कर रखे थे जबकि इंटेलीजेंस एजेंसियां आतंकी हमले की आशंका व्यक्त कर चुकीं थी। इतना ही नहीं  हमले के 24 घंटे पहले  आतंकी पंजाब पुलिस के एसपी स्तर के अधिकारी को अगवा कर चुके थे। अपहृत होने के बाद एसपी अपने आला अफसरों से कहते रहे कि आतंकियों ने उन्हें अगवा कर लिया गया है मगर उनकी बात पर विश्वास  करने की बजाय वे एक-दूसरे की टांग खींचते रहे। अगले दिन इस अपहरण की खबर अखबारों की सुर्खियों में थी। समाचारों के अनुसार आतंकी हमले करने से काफी पहले 31 दिसंबर को ही एयरफोर्स की दीवार को फांद चुके थे। एयरफोर्स स्टेशन में दाखिल होने के लिए आतंकियों ने पहले तारों को काटा, फिर सफेदे की टहनियों के सहारे दीवार पर चढे और रस्सी से लटक कर एयरफोर्स स्टेशन के अंदर आ गए। इस सारी कार्रवाई को पूरा करने में आतंकियों को खासा समय लगा मगर किसी ने उन्हें देखा तक नहीं। इससे पता चलता है कि पठानकोट एयर स्टेशन की दीवार को फांदना कोई कठिन  काम नहीं है और आतंकी जब चाहें, वहां घुसपैठ कर सकते हैं। पठानकोट ऑपरेशन के दौरान पंजाब पुलिस की विफलता फिर उजागर हुई है। पंजाब की पुलिस घूसखोरी के लिए पहले ही बदनाम है मगर आतंकी हमले के दौरान  भी वह इतनी निक्कमी साबित होगी, इसकी उम्मीद नहीं थी। दीनानगर आतंकी हमले के दौरान पंजाब पुलिस ने जो बहादुरी दिखाई थी, इस बार इस पर पानी फिर गया है। यही बात चिंताजनक है। पंजाब ने लंबे समय तक आतंक का दंश  झेला है और इस स्थिति  के  दृष्टिगत पंजाब की पुलिस को और ज्यादा मुस्तैद रहने की जरुरत है। पंजाब का पडोसी जम्मू-कष्मीर पहले ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंक में झुलस रहा है। पाकिस्तान बराबर खालिस्तानी समर्थकों की पीठ थपथपा रहा है और पंजाब को फिर से आतंकवाद की भठ्ठी में झोंकने की फिराक में रहता है। बुधवार को भी पठानकोट एयरफोर्स बेस के गेट से एक संदिग्ध आतंकी को पकडा गया।  इन हालात में अगर “निकम्मी“  पंजाब पुलिस के साथ-साथ सेना और देश  को आतंकी हमलों से बचाने के लिए खासतौर पर तैयार किए गए नेशनल सुरक्षा गार्ड (एनएसजी)  भी निक्क्मे साबित हों, तो देश  को कौन बचाएगा? सुरक्षा में चूक के लिए विपक्ष में रहते हुए भाजपा कांग्रेस को  घेरने का कोई मौका नहीं छोडती थी। अब वह किस मुंह से जनमानस का सामना करेगी?

बुधवार, 6 जनवरी 2016

Will Cricket Become a Gentleman Game?

                              क्रिकेट फिर बनेगी जेंटलमैन गेम

देश  मे अगर किसी समृद्धतम स्पोर्टस संस्था में अविलंब  क्रांतिकारी बदलाव की जरुरत है, तो वह  भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) है। बीसीसीआई दुनिया की सबसे धनी स्पोर्टस बॉडी है और इसलिए सियासी नेता और रसूखदार हस्तियां इस पर कब्जा जमाने की फिराक में रहती हैं। यहां तक कि जिन लोगों को खुद क्रिकेट का ”कखग” नहीं मालूम, अब तक वे ही दुनिया की इस  समृद्धतम संस्था को चलाते रहे हैं। एक जमाना था जब क्रिकेट को जेंटलमैन गेम माना जाता था जिसमें स्लेजिंग, बॉडीलाइन बाउलिंग, एक्सेसिव अपीलिंग के लिए कोई जगह नहीं होती थी, मैच फिक्सिंग तो दीगर रहा। खिलाडी पूरी संजीदगी से नियमों का पालन करते। मगर समय के साथ-साथ  पैसा और शोहरत ने इस जेंटलमैन गेम को धन बटोरने का जरिया बना दिया। सट्टेबाजी और मैच फिक्सिंग ने क्रिकेट को  सटोरियों की  गेम भी  बना दिया है।  इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) में तो हद ही हो गई। आईपीएल के खिलाडी मैच फिक्सिंग में लिप्त पाए गए, प्रेम में मदहोश  कुछ खिलाडियों ने  नियमों को तोडने में कोई कसर नहीं छोडी और पूरा आईपीएल विवादों में उलझ कर रहा गया। मैच फिक्सिंग के गंभीर आरोपों  में  चैन्नई सुपर किंग और राजस्थान रायल टीमों को आईपीएल से बाहर होना पडा। मई 2013 में दिल्ली पुलिस ने आईपीएल के चार खिलाडियों को मैच  फिक्सिंग के आरोप में गिरफ्तार किया । चैन्नई सुपर किंग के सीईओ और बीसीसीआई के पूर्व  अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद गुरुनाथ मय्यपन को मई 2013 में मुंबई पुलिस ने गिरफ्तार किया। मैच फिक्सिंग के आरोपों की जांच के लिए  देश  के सर्वोच्च न्यायालय  ने जस्टिस मुकुल मुदगल की अध्यक्षता में चार सदस्यीय समिति का गठन किया था। और इस समिति ने आईपीएल तत्कालीन सीईओ सुंदर राजन की भूमिका को ही संदिग्ध पाया था। मुदगल समिति की सिफारिशॉ  के बाद  बिहार क्रिकेट एसोसिएषन सर्वोच्च न्यायालय की शरण में गई और अदालत  से बीसीसीआई की कार्यशैली  को पारदर्शी  एवं और ज्यादा क्रिकेट फ्रेंडली बनाने की गुहार लगाई। बिहार क्रिकेट एसोसिशन की  याचिका पर गौर करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने जस्टिस आरएम लोढा की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था। सोमवार को समिति ने सर्वोच्च न्यायाल को अपनी रिपोर्ट दी। समिति ने बीसीसीआई को पेशेवर बनाने, सियासी नेताओं को इससे अलग रखने, क्रिकेट को फिर जेंटलमैन गेम बनाने, खिलाडियों के हितों की रक्षा करने और बीसीसीआई को निहित स्वार्थों के टकराव से मुक्त रखने के सुझाव दिए हैं।  लोढा समिति की सिफारिषों में सबसे अहम बात आडिट को लेकर है। समिति की सिफारिश  है कि बीसीसीआई का ऑडिट सीएजी से करवाया जाए। अभी बीसीसीआई का ऑडिट प्राइवेट आडिटर्स करते है़ं। पूरी दुनिया जानती है कि इस तरह के ऑडिट की उतनी विश्वसनीयता  नहीं है जितनी संवैधानिक संस्था सीएजी के ऑडिट की होती है। समिति ने क्रिकेट में सट्टेबाजी को वैध करने की जो सिफारिश  की है, उस पर विवाद हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय लोढा समिति की सिफारिशॉ  पर क्या निर्णय लेता है, यह देखना अभी बाकी है मगर इतना तय है कि बीसीसीआई को इन सिफारिशों  पर देर-सबेर अमल करना ही होगा। अगर अगर बीसीसीआई ने ऐसा नहीं किया तो बिहार क्रिकेट एसोसिएशन  लोढा समिति की सिफारिशों पर अमल करवाने के लिए फिर सर्वोच्च न्यायालय की  शरण में जाएगी।   बीसीसीआई के लिए बेहतर यही होगा कि वह स्वेच्छा से अविलंब  लोढा समिति की सिफारिशॉ  को अक्षरश  लागू करे। ऐसा करने से बीसीसीआई की  विश्वसनीयता बढेगी। मगर मिलियन डॉलर सवाल यह है कि क्या बीसीसीआई आसानी से  लोढा समिति की सिफारिशे  लागू कर पाएगी। इस समय बीसीसीआई में राजनेताओं का दबदबा है और यही हालात विभिन्न राज्यों की क्रिकेट एसोसिएशनों का है। राजनेता बदलाव लाने में सबसे पीछे रहते हैं। भारत में क्रिकेट का जनून है और अगर बीसीसीआई अभी भी नहीं सुधरा तो कभी नहीं सुधरेगा। वैसे भारत मे हर छोटे-बडे क्रांतिकारी बदलाव को लाने में न्यायपालिका की अग्रणी भूमिका रही है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीसीसीआई मे क्रांतिकारी बदलाव लाने भी न्यायपालिका ही पहल करेगी।

मंगलवार, 5 जनवरी 2016

Let Prime Minster Modi's Lahore Initiative Go Ahead

                                            शैतानी पाकिस्तानी फितरत

भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ की इस बात में काफी वजन है कि “शैतान सुधर सकता है, पाकिस्तान नहीं“। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लाहौर यात्रा के मात्र आठ दिन और दीनानगर हमले के पांच महीने बाद पाकिस्तानी आतंकियों ने पंजाब में फिर हमले की जरुर्रत करके पूरे देश  को दहला दिया है। पठानकोट में भारतीय वायु सेना के एयरबेस पर आतंकियों का हमला  भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता के सूत्र तोडने की जबरदस्त कोशिश  है। प्रधानमंत्री की लाहौर यात्रा के बाद आतंकी हमले की आशंका व्यक्त की जा रही थी। खुफिया एजेंसियां आतंकी हमले को लेकर आगाह भी कर चुकी थी। पिछले चार दशक से पाकिस्तान यही कर रहा है। “मुंह में राम-राम और बगल में छुरी“ की कहावत को चरितार्थ करते हुए पाकिस्तान एक ओर भारत से दोस्ती की पींगे बढाएगा, दूसरी ओर भाडे के टटुओं से भारत की अखंडता पर प्रहार कराएगा। शिमला समझौते से लेकर मोदी की लाहौर यात्रा तक पाकिस्तान की “शैतानी फ़ितरत “ का यही सिला रहा है। पाकिस्तान की कायर सेना जब तीन बार भारत को युद्ध में परास्त नहीं कर पाई, तब उसने आतंक  का रास्ता पकडा। बेरोजगार और अशिक्षित युवाओं को इस्लाम के नाम पर मर-मिटने की घुटी पिलाई। उन्हें आतंकी बनाकर हिसा फैलाने के लिए  भारत भेजा। पाकिस्तान यह बात भली-भांति जानता है कि मुठठी भर आतंकी भारत में घुसकर सिवा निर्दोष  लोगों को मारने और खुद मारे जाने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। तथापि पाकिस्तान का मकसद भारत को अस्थिर करना है। पाकिस्तान भारत को ताकतवर और खुशाहल बनते देख ही नहीं सकता क्योंकि वह भारत का न तो आर्थिक रुप से और न ही युद्ध में मुकाबला कर सकता है। पाकिस्तान के आंतरिक हालात इस कद्र उलझे हुए हैं कि वह चाहकर भी भारत के साथ दोस्ती नहीं बढा सकता। सेना का देश  की सियासत में जबरदस्त दखल रहा है। जब कभी चुनी हुई सरकार सत्ता में आई पाकिस्तानी सेना ने उसे काम ही नहीं करने दिया और जब-तब तख्ता पलट दिया। सेना की मर्जी के बगैर पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं हिलता। सेना की ही तरह उसकी मददगार कुख्यात आईएसआई भारत की कट्टर विरोधी है। इन हालात में पाकिस्तान के गैर-सैनिक शासक जब कभी भी भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाते है, सेना और आईएसआई उस हाथ को काट देते  हैं। इन हालात में भारत को पाकिस्तान से दोस्ती की उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। जिस देश  की सेना, धार्मिक और सियासी नेताओं को भारत का वजूद फूटी आंख नहीं सुहाता हो, उससे दोस्ती नहीं “मक्कारी“ की ही उम्मीद की जा सकती है। पठानकोट हादसे ने फिर भारत की चौकसी और चाक-चौबंदी पर सवाल खडा कर दिया है। 27 जुलाई, 2015 को पंजाब में गुरदासपुर  जिले के दीनानगर पर आतंकी हमले से सबक लेते हुए हमें पूरी तरह से सतर्क  रहने की जरुरत थी मगर बार-बार आतंकी हमलो ंके बावजूद लगता है हमें सब कुछ भला देनी की बीमारी है। और दुश्मन  यह बात बखूबी जानता है। यही वजह है कि आतंकी आराम से भारत में घुसपैठ कर लेते हैं। तीन दिन तक आतंकी पठानकोट के आसपास घुमते रहे मगर खुफिया एजेेंसियों को भनक तक नहीं लगी। आतकियों  ने  स्पुरिटेंडट  ऑफ़ पुलिस  लेवल के अधिकारी को अगुवा  कर लिया , पंजाब पुलिस फिर भी नहीं चेती.। चिंताजनक बात यह है कि आतंकी आराम से पठानकोट स्थित वायु सेना के एयरबेस में भी घुसपैठ कर गए जबकि वहां कडा पहरा रहता है। पहली बार भारतीय वायु सेना के एयरबेस में आतंकियों ने दस्तक दी है।  यह स्थिति बेहद खतरनाक है। इससे तो यही संकेत मिलते हैं कि भारतीय सेना की सुरक्षा में भी भारी छेद है। पठानकोट आतंकी हमले को लेकर देश  में तीखी प्रतिक्रियाएं होना स्वभाविक है। आखिर कब तक हमारे बहादुर जवान पाकिस्तानी कायरतापूर्ण हरकतों की खातिर शहीद होते रहेंगे? भारत को कभी-न-कभी तो माकूल जवाब देना ही होगा। मगर सच्चाई यह भी है कि पडोसी की फितरत  शैतानी ही क्यों न हो, उससे बोले बगैर रहा नहीं जा सकता। इस तरह के प्रयास आपसी कटुता को कम करने में सहायक होते हैं। मोदी की लाहौर यात्रा के सूत्र आगे बढने ही चाहिए।

शनिवार, 2 जनवरी 2016

Modi Govt's New Year Gift To Youth

                                               नए साल का तोहफा

केन्द्र सरकार में तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी (सी और डी गु्रप) के पदों की भर्ती के लिए इंटरव्यू पद्धति को खत्म करके मोदी सरकार ने देश  के लाखों बेरोजगारों को नव वर्ष  का उम्दा तोहफा दिया है। सरकारी नौकरी के लिए मारे-मारे फिर रहे युवाओं के लिए नए साल में इससे बढिया तोहफा हो ही नहीं सकता। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वत्रंतता दिवस के अपने संबोधन में केन्द्र सरकार के   तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी  के पदों की भर्ती में इंटरव्यू को समाप्त करने और इसे पहली जनवरी 2016 से लागू करने का ऐलान किया था। आज (पहली जनवरी) से यह व्यवस्था लागू हो गई है। प्रधानमंत्री ने तब कहा था कि दुनिया में ऐसा कोई भी चयनकर्ता  नहीं है जो दो मिनट के इंटरव्यू में आवेदक की योग्यता को परख ले। प्रधानमंत्री के इस कथन में खासा वजन है। योग्यता जांचने-परखने के लिए परीक्षा सबसे सटीक तरीका है और  मेरिट पर भर्ती एकदम न्यायसंगत व्यवस्था। एक जमाना था जब नौकरी और मेडिकल तथा इंजीनियरिंग में दाखिले भी विशुद्ध मेरिट पर दिए जाते थे। बाहरवीं की परीक्षा मे जो अव्वल आते, वही मेधावी छात्र मेडिकल और अन्य व्यावसायिक कॉलेजिज में दाखिला पाते। यह पद्धति  अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शी  और न्यायसंगत थी। मगर प्रतिस्पर्धा बढने के साथ इस पद्धति को ज्यादा कारगर नहीं पाया गया। अब बाहरर्वीं की परीक्षा से कहीं ज्यादा आल इंडिया मेडिकल, इंजीनियरिंग एव विभिन्न राज्यों के मेडिकल, इंजीनियरिंग परीक्षाएं महत्वपूर्ण हो गई हैं। इन सब में भी मेरिट के आधार पर ही दाखिले दिए जाते हैं। वैसे  सियासी नेताओं ने निजी मेडिकल और इंजीनिंयरिंग कॉलेजिज में मेनेजमेंट कोटा देकर बैकडोर दाखिले का जुगाड कर रखा है। इसी तरह सरकारी नौकरियों में  इंटरव्यू के जरिए भर्ती की व्यवस्था भी सिफारिश  और भाई-भतीजावाद फैलाने का जरिया है। यह बात जगजाहिर है कि सरकारी नौकरियों की भर्ती में सिफारिश का बोलबाला रहता है और सियासी नेताओं के परिजनों, करीबियों अथवा उनकी सिफारिश पर ही सरकारी नौकरी मिलती  है। सरकारी नौकरियों में भर्ती का आलम यह है कि अगर सिफारिश  है तो पद भी सृजित किया जाता है और रातोंरात भर्ती और चयन भी। प्रधानमंत्री मोदी ने बेरोजगार युवाओं के दुख- दर्द  को समझा है। यह स्थिति वाकई ही दुर्भाग्यपूर्ण  है कि बेरोजगारों को दो-तीन मिनट के इंटरव्यू के लिए दूर-सदूर क्षेत्रों से दिल्ली अथवा राज्यों की राजधानी आना पडे और बाद में पता चले कि चयन किसी सिफारिशी  का हुआ है। अब तक यही होता रहा है। हरियाणा के पूर्व  म्ुख्यमंत्री ओमप्रकाश  चौटाला और उनके पुत्र तो भर्ती में धांधलियों के लिए जेल की सजा काट रहे हैं। केन्द्र सरकार के 36 लाख पदों मेंसे 95 फीसदी पद तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी के हैं। हर साल  तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी के लगभग 50,000 पदों पर भर्ती की जाती है।  केद्र के अलावा विभिन्न राज्यों में भी यही स्थिति है। राज्यों में भी 90 फीसदी पद  तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी के हैं। प्रधानमंत्री ने राज्यों से भी तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू को समाप्त करने का आहवान किया है।  भाजपा शांसित राज्य ऐसा करने के लिए पूरी तरह से तैयार भी हैं मगर गैर-भाजपा  शासित राज्यों को जैसे सांप सूंघ गया हो।  तृतीय एवं चतुर्थ  श्रेणी के पदों की भर्ती में इंटरव्यू पद्धति खत्म करने से राज्यों को बचत भी हो सकती है। अधिकतर राज्यों ने  तृतीय श्रेणी के पदों की भर्ती के लिए अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड (एसएससबी) का गठन कर रखा है जबकि भर्ती का काम लोक सेवा आयोग भी कर सकता है।  तृतीय श्रेणी के पदों की भर्ती  में इंटरव्यू खत्म किए जाने से  एसएससबी की कोई जरुरत नहीं रहेगी। इससे सरकार का पैसा भी बचेगा।   देश  में आज भी सरकारी नौकरी को प्राथमिकता दी जाती है। मध्यम एवं कमजोर तबको के लिए सरकारी नौकरी वरदान  है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने सालों से जारी अन्यायपूर्ण  भर्ती को समाप्त करके पारदर्शी और निष्पक्ष  व्यवस्था को लागू करवाया है।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2016

The Challenges Before Us in New Year

                                                     सुस्वागतम 2016

 2015 को अलविदा और नव वर्ष  2016 का लख-लख सुस्वागतम। गुजरे साल की खट्टी-मीठी यादों को संजोए, नव वर्ष 2016 को अधिकाधिक खुशगवार बनाने के लिए हमें नए संकल्प लेने हैं और नए प्रकल्पों को संजीदगी से लागू करना है।   2016 में गुजरे साल की अपेक्षा और ज्यादा चुनौतियां हैं। पूरी  दुनिया  इस समय तबाही की कगार पर है। हर मुल्क को न्यूक्लियर पॉवर बनने की सनक सवार है। इससे समूचा विश्व  न्यूक्लियर युद्ध के मुहाने पर खडा है। किसी सनकी  शासक के हाथ अगर  न्यूक्लियर पॉवर आ गई तो पलक झपते ही तबाही का मंजर बिछ सकता है। अल कायदा, तालिबान, लश्कर  जैसे खूंखार आतंकी संगठनों को पीछे छोडते हुए अब सीरिया और इराक के बडे क्षेत्र पर कब्जा जमाए आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया) ने पूरी दुनिया में दहशत फैला रखी है।  आईएसआईएस की दहशत का आलम यह है कि बेल्जियम की राजधानी बु्रसेल्स में स्थानीय प्रशासन ने आतंकी हमले के डर से नए साल का जश्न  तक रद्द कर दिया। पेरिस के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा का कडा पहरा है। इस बार फ्रांस की राजधानी में नए साल के आगमन पर पटाखे नहीं फोडे गए । पेरिस अभी भी 13 नवंबर के आतंकी हमलों से सहमा हुआ है। इन श्रृंखलाबद्ध हमलों में 130 लोग मारे गए थे। रुस की राजधानी मास्को के रेड स्कॉवयर को  इस बार नए साल के  जश्न के लिए बंद रखा  गया  । जर्मनी की राजधानी बर्लिन में क्रिसमस के दिन से ब्रांडेनबर्ग गेट बंद है और नए साल के आयोजन के लिए भी बंद थे । ऐसा पहली बार हुआ  है। यूरोप के अन्य देशों और अमेरिका में भी नए साल के  आगमन  पर  तगडे सुरक्षा बंदोबस्त किए गए । आतंकी हमले की आशंका के माहौल में नए साल के जश्न  में इस बार वह जोश  नहीं था  जो अक्सर हुआ करता था। जब नए साल का आगाज ही भय और आतंक के माहौल से हो रहा है, तो अनुमान लगाया जा सकता है वर्ष  2016 कैसा होगा।  कुल मिलाकर स्थिति यह है कि दुनिया को अपनी सैन्य, आर्थिक और बौद्धिक ताकत की धोंस जमाने वाले अमेरिका और उसके मित्र यूरोपियन देश  इस्लामिक स्टेट और अल-कायदा से डरे और सहमे हुए है। न्यूक्लियर पॉवर   होते हुए भी यूरोप और अमेरिका आईएस और अल-कायदा जैसे आतंकी संगठनों को नेस्तनाबूद नहीं कर पाए हैं। 2015 में आतंकी घटनाएं जिस तरह पूरी दुनिया को दहलाती रहीं, 2016 में आतंक का चेहरा और ज्यादा वीभत्स हो सकता है। अगर आतंक 2016 में दुनिया के लिए सबसे बडा खतरा है तो   जलवायु परिवर्तन इससे भी बडा है। आतंक से निपटा जा सकता है और इसका तोड भी है मगर प्राकृतिक कहर का कोई तोड नहीं है। इग्लैंड के कई क्षेत्र इन दिनों बाढग्रस्त हैं। यॉर्क शहर बाढ के पानी में पूरी तरह डूब चुका है। मिडिल-वेस्ट  अमेरिका में मूसलाधार पानी बरस रहा है। 24 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं और कई क्षेत्र जलमग्न हो चुके हैं। दक्षिण अमेरिका में भी तूफान और बारिश  ने तबाही मचा रखी है। पिछले सप्ताह दक्षिण अमेरिकी देश  उरूग्वे, पराग्वे, ब्राजील और अर्जेटीना में भारी बारिश  से एक लाख लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पडा। इसी माह तमिल नाडु की राजधानी चेन्नई में प्रलंयंकारी बारिश  ने भारी तबाही मचाई और दो सप्ताह से भी ज्यादा समय तक सरकार भी बाढग्रस्त हो गई। वर्ष  2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा और मौसम विज्ञानियों का आकलन है 2016 उससे भी अधिक गर्म रहेगा। आतंक और जलवायु परिवर्तन के वैश्विक  खतरों के अलावा  आंतरिक खतरें  भी कम  नहीं  हैं । भारत दुनिया का तेजी से उभरता विकासशील  देश  है और  इस साल ग्रोथ में वह चीन को भी पीछे छोड देंगे। तथापि असहिष्णुता  और सांप्रयिकता दो ऐसे जहर हैं जो देश की अखंडता पर प्रहार  कर  रहें  है। नए साल को खुशगवार बनाने के लिए हमें “जियो और जीने दो“ पर चलना होगा।  प्रकृति के साथ मिल जुलकर आगे बढना  समय की मांग है ।