बुधवार, 31 अगस्त 2016

सिन्धुदेष की पुकार

पाकिस्तान में सिंधी लोग भी बलूचिस्तान की तरह सालों से आजादी की मांग कर रहे हैं। सिंध के लोकप्रिय नेता जी एम सईद ने सबसे पहले आजाद सिंधुदेश  की आवाज उठाई थी। 1967 में जीएम सईद एवं पीर अली मोहम्म्द रश्दी  के नेतृत्व में आजाद सिंध की मांग रखी गई और तब से आज तक यह दिन-ब-दिन बलवित होती जा रही है। भारत के प्रधानमंत्री द्वारा आजाद  बलूचिस्तान का समर्थन किए जाने के बाद अब सिंधी लोग भी खुलकर आजादी के पक्ष में आगे आ रहे हैं। सोमवार को सिंध प्रांत के मीरपुर र्में लोगों ने स्वतंत्र सिंधुदेश  के पक्ष ने नारे लगाए। लंदन मे बलूचिस्तान मूल के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समर्थन में नारे लगाए। बलूची नागरिकों ने लंदन स्थित चीनी दूतावास के समक्ष चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर के विरोध में भी प्रदर्शन  किया। अब तक  कश्मीर  में अलगाववाद और आतंक फैला कर पाकिस्तान इतरा रहा था। अब पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर , बलूचिस्तान और सिंध में  नृशंष  मानवाधिकारों को लेकर बुरी तरह से घिर गया है। बलूचिस्तान और पीओके के अलावा सिंध में पाकिस्तान के  शासकों और सेना ने स्थानीय नेताओं की बुलंद आवाज को इतनी बुरी तरह से दबा रखा है कि सिंध प्रांत में आज तक सिंध के एक भी  राष्ट्रीय  नेता को सरकार में जगह तक नहीं मिल पाई है। इसकी प्रमुख वजह है कि पाकिस्तान सरकार ने सिंध के लोकप्रिय राष्ट्रीय  नेताओं और सियासी संगठनों को “आतंक फैलाने और देशद्रोह“ के लिए प्रतिबंधित कर रखा है। इसी वजह आज तक सिंध प्रांत में पाकिस्तान के हुकमरानों का गुणगान करने वाले राजनीतिक दल ही सत्तारूढ होते रहे हैं। सिंध के लोग पाकिस्तान सरकार द्वारा उर्दु को स्थानीय लोगों पर थोपने और मुजाहिरों ( भारत से पाकिस्तान गए मुसलमान) को सिंध प्रांत में बसाने की मुखर मुखालफत करते रहे हैं। सिंध प्रांत यूएनपीओ (अनरेप्रेजेंटेड नेशन्स एंड पीपल्स) का सदस्य है। वर्ल्ड सिधी इंस्टीट्युट यूएनपीओ में सिंध प्रांत की नुमाइंदगी करता है। यूएनपीओ ने सिंध प्रातं को ओकूपाइड एवं अनरेकॉनीइज्ड क्षेत्र घोषित कर रखा है।  1971 मे बाग्लादेश  के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद 1972 में सिंधी नेता जीएम सईद ने पहली बार स्वतंत्र सिंधुदेश  की सार्वजनिक मांग रखी और इसके लिए सिंध के लोगों से हर तरह की कुर्बानी देने का आहवान किया। सिंधियों को पाकिस्तान में पंजाबी-मुजाहिर उपनिवेशवादी सियासतदान के साथ रहना जरा भी गवारा नहीं है। बहरहाल, पाकिस्तान ने बांग्लादेश  के अलग हो जाने के ऐतिहासिक संघर्ष  से भी कोई सबक नहीं लिया है। कश्मीर  में अलगाववाद की चिंगारी को हवा देते-देते पाकिस्तान यह बात भूल गया है कि उसके अपने लोग भी आजादी की मांग कर रहे हैं और जनता की बुलंद आवाज को दमन से ज्यादा देर तक नहीं दबाया जा सकता। बांग्लादेश  के मामले में भी यही हुआ था। स्वतंत्र  बांग्लादेश   को भारत का समर्थन मिलते ही वह आजाद हो गया। 1971 की भारत-पाकिस्तान ऐतिहासिक जंग और ले, जनरल एएके नियाजी की अगुवाई में लगभग  एक लाख पाक सैनिकों के आत्मसमर्पण से शर्मसार हुए पाकिस्तानी नेता इस घटना से भी कोई सीख नहीं ले पाए हैं। सच यह है कि पाकिस्तान विभाजन के बाद से निरंतर भारत को जब-तब अस्थिर करने  की हरसंभव कोशिश  करता रहा है मगर हर बार उसे मुंह की खानी पडती है। अब तक भारत पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दे रहा था। भारत  शिमला समझौते, लाहौर डेक्लेरेशन  और आगरा  शिखर सम्मेलन की मूल भावना का अक्षरश  पालन करता रहा है मगर पाकिस्तान है कि अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आता। बार-बार कश्मीर  समस्या का अंतरराष्ट्रीयकरण  करता रहता है। इस स्थिति में भारत के पास माकूल जवाब देने के सिवा कोई चारा नहीं बचता  है । और कहते हैं “पाजी और काजी“ को उनकी जुबान में ही जबाव देना बनता है।

मंगलवार, 30 अगस्त 2016

मलाईदार आरक्षण

सरकारी नौकरियों में अन्य पिछडा वर्ग के खाली पडे पदों की पूरी भर्ती नहीं होने से चिंतित मोदी सरकार ओबीसी के मलाईदार तबकों को भी आरक्षण देने की तैयारी में है। ताजा सूचना मुताबिक सरकार आय की अधिकतम सीमा में ढील देकर इसे 6 लाख से बढाकर सालाना 8 लाख का प्रस्ताव है। और अगर अन्य पिछडा वर्ग  आयोग का वश  चले तो आय की अधिकतम सीमा सालाना 15 लाख की जा सकती  है । रोचक पहलू यह है कि अन्य पिछडा तबकों को सरकारी नौकरियों में 27 फीसदी आरक्षण के बावजूद पिछले दो दशक में बमुश्किल   10-12 फीसदी पदों की भर्ती हो रही है। अन्य पिछडा आयोग का कहना है कि आय की अधिकतम सीमा भर्ती में आडे आ रही है। इसके यह अर्थ भी निकलते हैं कि अन्य पिछडा वर्ग  के निचले तबकों को आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल रहा है और मलाईदार तबके ही आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं। इससे यह भी निष्कर्ष   निकलता है कि आरक्षण का लाभ आरक्षित तबकों के अगडों को ही मिल रहा है। पिछडे आज भी आरक्षण के लाभ से वंचित है। सरकारी  नौकरियों एवं  शैक्षणिक संस्थाओं में सामाजिक और आर्थिक रुप से पिछडों का उत्थान  आरक्षण का मूल मकसद रहा है। इसी मकसद से संविधान निर्माताओं ने अनुसूचित एवं जन जातियों के लिए  सरकारी  नौकरियों एवं  शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की व्यवस्था की थी। देश  में  आजादी के बाद  अनुसूचित एवं जन जातियों के अलावा अन्य पिछडा वर्ग  और अल्पसंख्यकों को भी सरकारी नौकरियों और  शैक्षणिक संस्थाओं  में आरक्षण दिया जा रहा है। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि आजादी के सात दशक के बावजूद दलित, अनुसूचित एवं अन्य पिछडों के कमजोर तबकों को अपेक्षाकृत आरक्षण का पूरा लाभ मिल नहीं पाया है।   आजादी के समय समकालीन भारत का सामाजिक ताना-बाना मौजूदा समय से काफी भिन्न था। तब दलितों और कबालियों में मलाईदार तबकों का वजूद न  के बराबर था। इसीलिए  संविधान निर्माताओं ने तब मलाईदार (क्रीमी लेअर्स) का कोई उल्लेख नहीं किया था। मगर आजादी के बाद पिछले सात दशक में  सियासी दलों ने आरक्षण को ”वोट की राजनीति ”में बदलकर इस संवैधानिक व्यवस्था का जमकर दुरुपयोग किया है। नतीजतन, मौजूदा समय में समाज का हर वर्ग आरक्षण मांग रहा है। हरियाणा में जाट  इस बिला पर आरक्षण मांग रहे हैं कि यह समुदाय  शैक्षणिक रुप से काफी पिछडा हुआ है। जाट ही नहीं अगडों में आर्थिक रुप से कमजोर तबके भी आरक्षण की मांग कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी जब विपक्ष में हुआ करती थी, तब आरक्षित वर्गोंं के मलाईदार तबकों को आरक्षण सुविधा से बाहर रखने की पक्षधर थी और आरक्षण के लिए सामाजिक की बजाए आर्थिक पिछडेपन को आधार बनाने की जबरदस्त पैरवीकार हुआ करती थी। अस्सी के दशक में केन्द्र में भाजपा के समर्थन से सत्तारूढ  विश्व  प्रताप सिंह की जनता सरकार की मंडल आयोग की सिफारिशें  लागू करने पर पार्टी (भाजपा) ने सरकार ही गिरा दी थी। तब भाजपा की  मांग  थी कि आरक्षण आर्थिक आधार पर दिया जाना चाहिए। बहरहाल, सरकारी नौकरियों और  शैक्षणिक संस्थां में आरक्षण की मौजूदा मीति ने योग्य और प्रतिभावान पात्र युवकों को रोजगार से वंचित कर रखा है। केन्द्र और राज्य सरकारें अनुसूचित, जन जातियों एवं अन्य पिछडा वर्ग  को आरक्षित पदों के लिए रोस्टर पद्धति अपनाती है और पात्र लोग नहीं मिलने के बावजूद इन पदों को अनारिक्षत नहीं किया जाता। फलस्वरुप, कई पद ऐसे हैं जो लंबे समय से खाली पडे हैं जबकि देश  में बेरोजगारो की कतार लगी हुई है। यहां कहां का इंसाफ है? 

सोमवार, 29 अगस्त 2016

बढती आबादी का बम

 भारत को अगर योजनाबद्ध विकास का लाभ गरीब से गरीबतम को पहुंचाना है, तो देश  को बढती आबादी पर रोक लगानी होगी। देश  के समक्ष सबसे बडी चुनौती भी यही है कि बढती आबादी के विस्फोटक दुषपरिणामों से उन लोगों को कैसे जागरुक किया जाए, जो आम जनता को ज्यादा से ज्यादा बव्चे पैदा करने के लिए जब-तब उकसाते रहते हैं। आबादी को लेकर  राष्ट्रीय  स्वंय सेवक के नेताओं का स्टैंड जरा भी देश  के हित में नहीं है। भला यह भी कोई बात हुई कि इंटरनेट के जमाने में  परिवार नियोजन की बजाए लोगों को  अधिकाधिक बच्चे पैदा करने के लिए कहा जाए। गत शनिवार को आगरा में दंपत्तियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वंय सेवक प्रमुख मोहन भागवत ने हिन्दुओं को ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने को कहा क्योंकि समाज के कुछ तबके परिवार नियोजन नहीं अपना रहे हैं। उनका इशारा मुसलमानों की तरफ था। मुस्लिम समुदाय में बच्चे पैदा करने की खुली छूट है और यह बात  राष्ट्रीय स्वंय सेवक के नेताओं को जरा भी गवारा नहीं है। आरएसएस प्रमुख ने यह बात भी साफ कर दी कि वे मोदी सरकार के “संदेशवाहक“ नहीं है और लोगों को अगर शिकायतों का निवारण कराना है, तो संबंधित मंत्री के पास जाना होगा। बहरहाल, बढती जनसंख्या अमेरिका, जापान जैसे देशों  को तो लाभान्वित कर सकती है जो समृद्ध और साधन सपन्न है मगर भारत जैसे विकासशील देश  के लिए जनसख्या में बेलगाम वृद्धि उन्नति के पथ पर रोडा बन सकती है। जनसंख्या विस्फोट का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1950 में जहां भारत की आबादी 36 करोड थी, 2011 आते-आते यह बढकर 1.20 करोड को भी पार कर गई है। इस दौरान यद्यपि भारत का सकल घरेलू उत्पाद  2.7 लाख रु से बढकर 57 लाख करोड रु को भी पार कर गया है, मगर इस वृद्धि का प्रत्यक्ष लाभ समाज के निचले तबकों तक नहीं पहुंच पाया है। इसकी सबसे बडी वजह यह है कि निचले एवं कमजोर तबकों में परिवार नियोजन लोकप्रिय नहीं हो पाया है। परिवार का आकार इतना बढ जाता है कि सीमिति आय वालों के लिए गुजर-बसर करना भी दुर्भर् है। बच्चें वांछित लालन-पालन और शिक्षा-दीक्षा से महरुम रह जाते हैं।  भारत में चार लाख से भी ज्यादा स्ट्रीट चिल्डर्न का न तो कोई वर्तमान है और न ही कोई भविष्य । सडकों पर रहते हैं और गली-मोहल्लों से कबाड इकठ्ठा कर गुजर-बसर करते हैं। इस दौरान गंदगी से साबका पडने पर बेमौत मारे जाते हैं। दुनिया में सबसे अधिक कुपोषित बच्चे भी भारत में ही हैं। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बाद भारत दुनिया में भूखों, नंगों का तीसरा बडा देश  है। इसीलिए भारत की गणना निम्न आय वाले देश  में की जाती है, जहां आबादी का बहुत बडा हिस्सा गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करता है।  लगभग 20 करोड भूखमरी के  शिकार हैं। 83 करोड लोग रोजाना बीस रुपए से भी नीचे गुजर-बसर करते हैं और उन्हें दो वक्त का भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता। हर रोज  लगभग 7000 लोग भूखमरी के कारण मारे जाते हैं। इसके विपरीत भारत में 50,000 करोड रु मूल्य का 40 फीसदी भोजन जाया जाता है। 2.1 करोड टन गेंहू हर साल बर्बाद हो रही है। इस तरह के निराशाजनक आंकडों की कमी नहीं है। आबादी बढाने के पैरवीकारों को इन सब आंकडों से कोई सरोकार नहीं है जबकि इन सब का लब्बोलुआब यह है कि भारत की विशाल आबादी देश  में समान विकास और संसाधनों के भरपृर दोहण आडे आ रही है। देश  को समय रहते चेतना होगा, वरना अगले तीन दश कों में स्थिति और ज्यादा भयावह हो जाएगी। आरएसएस नेताओं की देशभक्ति और समर्पण की भावना काबिलेतारीफ है। पर सच यह है कि परिवार नियोजन देश  की सबसे बडी जरुरत  है।

सोमवार, 22 अगस्त 2016

दो फौजियों की लड़ाई

भारतीय सेना के दो जनरलों की लड़ाई में सेना की छवि पर दाग लगना  स्वाभाविक है। शीर्ष  स्तर के विवाद से सैनिकों के  मनोबल पर भी असर पड सकता  है।  भारतीय सेना के  मौजूदा  अध्यक्ष  जनरल  दलबीर सिंह सिहाग ने पूर्व  सेना अध्यक्ष एवं  केंद्रीय राज्य मंत्री  वी के सिंह पर उन्हें बेवजह प्रताडित करने और उनकी पदोन्नति रोकने के लिए दुर्भावना से काम करने के गंभीर आरोप लगाए हैं। ये आरोप सर्वोच्च न्यायालय में दायर दस्तावेज  में लगाए गए हैं । इससे पहले जनरल सिहाग 2012 में आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल  में  भी यही आरोप लगा चुके हैं । जनरल सिहाग को अपने पूर्व बॉस  से इस बात का गिला है कि  अपने विश्वासपात्र  को सेनाध्यक्ष बनाने के लिए  जनरल वी के सिंह ने सेनाध्यक्ष रहते हुए हर तरह के गलत तौर-तरीके अपनाए। 20  दिसंबर 2011 को असम के जोरहाट में एक तलाशी अभियान में गफलत हो जाने के कारण जनरल दलबीर सिह सिहाग  के  खिलाफ तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह  ने   अनुशानात्मक कार्रवाई  की  थी और उन पर "डिसिप्लिन एण्ड विजिलेंस " बन लगाया था। सेना में  यह कार्रवाई काफी सख्त मानी जाती है और इससे जनरल  सिहाग का करियर तबाह हो सकता था। तब जनरल सिहाग  असम  स्थित  थ्री  कोर के जनरल ओफिसर कमांडिंग (जीओसी ) थे । जोरहाट का यह आपरेशन भी काफी दिलचस्प था ।  सैनिकों की वर्दी में कुछ आतंकी मिलिट्री कांट्रेक्टर के घर में घुसकर उसकी पत्नी और तीन बच्चों की आंखों में पट्टी बांधकर लूटपाट करते हैं  और इस डकैती का दोष आर्मी पर मढ़ दिया जाता है। बाद में मीलिट्री इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि ठेकेदार आतंकियों से मिला हुआ था। इस घटना को लेकर जनरल सिहाग को खामख्वाह प्रताडित होना पडा था । जनरल सिहाग ने बाद में ट्रिब्यूनल को बताया था की इस ऑपरेशन के समय वे वार्षिक अवकाश पर  थे और उन्होंने  घटना के 6 दिन बाद 26 दिसम्बर को ज्वाइन किया था । जनरल दलबीर सिंह की पदोन्नति तक रोक दी गई है। है। कहते हैं " बेकसूर को बेवजह सजा दिए जाने पर उसके जख्म खासे गहरे होते हैं और उन्हें भरने में काफी समय लग जाता है। 2012 में जनरल वीके सिंह के रिटायर होने के बाद उनके उत्तराधिकारी जनरल  बिक्रम सिंह ने पिछली कार्रवाई पलट कर जनरल सिहाग पर से बेन हटाकर उन्हें पदोन्नति  दी और इस तरह उनका सेनाध्यक्ष बनने का रास्ता प्रशस्त हो गया।  बहरहाल, जनरल वीके सिंह और जनरल दलबीर सिंह सिहाग दोनों ही  सेना के हाइली डेकोरेटेड  ऑफिसर्स हैं और युवा अधिकारियों के प्रेरणा स्त्रोत। दोनों के बीच का अदालती विवाद  किसी एक को फ़ौरी राहत दे सकता है मगर इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं।  भारतीय सेना की गिनती दुनिया के उत्कृष्टतम आर्मीज में की जाती है। जनमानस सेना को बेहद सम्मान और श्रद्धा की दृष्टि से देखता है और हमारे सैनिक युवाओं के आर्दश होते हैं । सेना की वर्दी पहनकर देश सेवा करना हर युवक का सपना होता ।  इसकी प्रमुख़ वजह भी  यही है कि सिविल की अपेक्षा सेना को बेहद प्रोफेशनल और स्मार्ट माना जाता है.। सेना को लाग-लपेट, भाई-भतीजावाद  और गन्दी राजनीति से कहीं ऊपर माना जाता है । मगर देश के पूर्व और वर्तमान सेनाध्यक्ष के बीच " दो बिल्लियों " जैसी लड़ाई से सेना की यह  छवि ख़राब हो सकती  है । इस समय देश  के हालात ठीक नहीं हैं । भारत चौतरफा शत्रुओं से घिरा हुआ है और हमारे सैनिकों  को दिन-रात  चाक -चौबंद रहने की जरूरत है । गत कुछ समय से सेना में भी अनियमितताओं के मामले सामने आए  हैं और दोषी आला अफसरों  को दंडित भी किया गया है । और अगर शीर्ष स्तर पर व्यक्तिगत द्वेष और दुर्भावना से काम किया जाता है तो देश को इसकी बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड सकती है । सेना में प्रोफेशनलिज्म  हर सूरत में पत्थर की लकीर होनी चाहिए  ।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

अल्फॉन्स प्रकरण से क्या मिला?

चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक नियुक्त करने की  मोदी सरकार की कवायद षुरु होने से पहले ही ध्वस्त हो गई। बुधवार को सरकार ने पंजाब के लिए 18 महीने बाद राजस्थान के वरिष्ठ  भाजपाई नेता वीपी सिंह बदनौर को राज्यपाल बनाने के अलावा केरल के भाजपा नेता एवं  पूर्व नौकरशाह केजे अल्फॉन्स को चंडीगढ का अलग से प्रशासक नियुक्त किया था। मगर देर रात इस नियुक्ति को निरस्त करना पडा।  पंजाब के सभी राजनीतिक दलों ने  इस नियुक्ति का मुखर विरोध किया। पिछले 32 साल से पंजाब के राज्यपाल को ही चंडीगढ प्रषासक की जिम्मेदारी दी जाती रही है। चंडीगढ और नहरी पानी शिरोमणि अकाली दल को ही नहीं पंजाब के सभी सियासी दलों के लिए  जी-जान से भी ज्यादा प्रिय है और  दोनों मुद्दों के लिए अकाली हर समय लंबी लडाई लडने पर आमादा रहते  हैं। शिरोमणि अकाली दल न केवल भाजपा नीत राजग का अहम हिस्सा है, अलबत्ता पंजाब में पिछले दस साल से भाजपा के साथ सरकार भी चला रहा है। बुधवार दोपहर चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक नियुक्ति की खबर आते ही पंजाब भाजपा को जैसे सांप सुंघ गया। पार्टी न तो नियुक्ति का विरोध कर पाई और न ही समर्थन जबकि कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल इसके विरोध में उतर आए थे । पंजाब के राजनीतिक दलों को लग रहा था कि केन्द्र चंडीगढ में अलग से प्रशासक नियुक्त करके  इस केन्द्र शासित क्षेत्र से  पंजाब का दावा कमजोर कर रहा है। और इस तरह की किसी भी पहल में सच्चाई भी है। चंडीगढ पंजाब और हरियाणा के बीच राजनीतिक रस्साकस्सी  का शिकार है।  चंडीगढ पर न तो पंजाब और न ही हरियाणा अपना दावा छोडने को तैयार हैं। यह मामला पिछले पचास सालों से लटका पडा है और इस दौरान पंजाब मोहाली और हरियाणा पंचकूला को वैकल्पिक राजधानी के रुप में विकसित कर चुका है। चंडीगढ की तुलना में पंचकूला और मोहाली काफी ज्यादा फैल चुके हैं। पचास साल में चंडीगढ ने अपना अलग अस्तित्व विकसित किया है। और अगर चंडीगढ के लोगों की राय ली जाए तो वे न पंजाब में जाने चाहेंगे और न ही हरियाणा में।  लोग-बाग केद्र शासित क्षेत्र के पक्ष में राय देंगे। बहरहाल, जमीनी सच्चाई अपनी जगह है और सियासी हित सब पर भारी पडते हैं। विधानसभा चुनाव की बेला पर चंडीगढ के लिए अलग से  प्रशासक  की नियुक्ति पंजाब में शिअद-भाजपा गठबंधन के लिए भारी पड सकती थी। यह सब जानते हुए भी मोदी सरकार ने चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक बनाने का खतरा क्यों मोल लिया?  इस कवायद से भाजपा ने यह संदेश  देने की कोशिश  की है कि समय आने पर वह चंडीगढ और पंजाब में अपना अलग रास्ता अख्तियार कर सकती है। चंडीगढ में भाजपा का दबदबा है और भाजपा की किरण खेर संसद में इस केन्द्र शासित क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है।  इतने साल बाद पंजाब को विश्वाश    में लिए बगैर चंडीगढ के लिए अलग से प्रशासक नियुक्त करके मोदी सरकार ने वास्तव में गठबंधन धर्म तोडा है। अल्फॉन्स प्रकरण ने विपक्ष के इन आरोपों को भी पुष्ट  किया है कि राज्यपाल की नियुक्ति के समय केन्द्र गैर-भाजपा  शासित राज्यों को सूचित करने का शिष्टाचार  तक नहीं निभाता है है। पंजाब में राज्यपाल को नियुक्त करते-करते मोदी सरकार को 18 माह का लंबा समय लग गया। इससे यह संदेश  जाता है कि मोदी सरकार को या तो राज्यपाल की नियुक्ति करने का समय नहीं था अथवा उसे ऐसा व्यक्ति नहीं मिल रहा था, जो सरकार की नजर में पंजाब के लिए योग्य हो। और बदनौर को खोजने में डेढ साल लग गया। इन्हीं सब कारणों से मोदी सरकार की कार्यशैली को  उनके सहयोगी दल भी संदेह की नजर से देखते हैं। शिवसेना काफी पहले से मोदी सरकार की कार्यशैली की आलोचक रही है। अल्फॉन्स प्रकरण ने शिअद को भी उसी श्रेणी में लाकर खडा कर दिया है।

गुरुवार, 18 अगस्त 2016

आक्रामक पाक नीति



स्वंत्रतता दिवस पर पाकिस्तान को लेकर  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आक्रामक रुख से इस्लामाबाद के होश फाख्ता हो गए हैं। अब तक पाकिस्तान भारत  को काफी हल्के में ले रहा था और कश्मीर  में आतंक फैलाकर भारत के नाकों दम करने के बावजूद चैन की नींद सो रहा था। यहां तक कि  कश्मीर  घाटी में हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी को “शहीद“ बताकर अपना असली खौफनाक चेहरा उजागर किया है। इन घटनाओं ने यह बात  साफ कर दी है कि पाकिस्तान भारत के साथ दोस्ती चाहता ही नहीं है। सार्क बैठक के लिए गृहमंत्री की इस्लामाबाद यात्रा के दौरान आतंकी संगठनों का भारत विरोधी प्रदर्शन  और राजनाथ सिंह की ठंडी अगवानी से भी साफ है कि दोनों देशों  के बीच अब कहने-सुनने के लिए कुछ भी बचा नहीं है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह संसद में कह चुके हैं कि “पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं है“। 1971 में  बांग्लादेश  की आजादी के लिए  भारत-पाकिस्तान युद्ध  के बाद पहली बार  दो पडोसियों के रिश्ते   बेहद खराब है। इन हालात में भारत के पास पाकिस्तान को आइने दिखाने के सिवा और कोई चारा बचा ही नहीं था । पाकिस्तान यह बात पूरी तरह से भूल चुका है कि “ जो लोग खुद शीशे  के महल में रहते हैं, वे दूसरे के घरों पर पत्थर नहीं फेंका करते“। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  के अलावा पाकिस्तान बलूचिस्तान में सालों से दमन चक्र चलाए हुए हैं मगर दुनिया को ऐसे दिखाता है जैसे इन क्षेत्रों में पूरी तरह से अमन-चैन है। वस्तु स्थिति यह है कि  बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर में सेना का जबरदस्त दमन चक्र जारी है और अवाम इससे मुक्ति चाहता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में  बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  के अवाम की आवाज बुलंद करके इन क्षेत्रों के लोगों का दिल जीता है। प्रधानमंत्री के इस आक्रमण का तुरंत असर भी हुआ है। पाकिस्तान ने भारत को  कश्मीर  पर वार्ता का न्योता दिया और भारत ने भी साफ-साफ षब्दों में कह दिया कि वह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  और इस्लामाबाद प्रायोजित आतंक पर बातचीत के लिए तैयार है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह संसद में भी यह बात  स्पष्ट  कर चुके हैं कि भारत अब पाकिस्तान के साथ सिर्फ उसके अधिकृत कष्मीर पर ही बातचीत करेगा। बहरहाल, पाकिस्तान को उसकी ही भाषा  में जबाव देने से प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान नीति को एक नया मोड दिया है। भारत अब तक पडोसी देश  के प्रति “सहअस्तित्व“  (लीव एंड लैट लीव) की नीति अपनाए हुए था मगर पाकिस्तान भारत के अस्तित्व को मानने को तैयार ही नहीं है, और वह भारत को अस्थिर करने की हर मुमकिन कोशिश करता रहता है। पाकिस्तान  बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में अपनी सेना के दमन चक्र को छिपाने के लिए कश्मीर में  भाडे के टटुओं को भेजकर खून-खराबा करा रहा है और  पूरी दुनिया को दिखाना चाहता है कि भारत के हिस्से वाले  कश्मीर  में भी सेना का दमन चक्र जारी है। तथापि एक कटु सत्य यह भी है कि आजादी की आवाज को कहीं भी अधिक देर तक दमन से दबाया नहीं जा सकता। एक-न-एक दिन यह विस्फोट बनकर बाहर आ ही जाता है। पाकिस्तान में बलोच लोग आजादी के लिए न केवल पाकिस्तान से, अलबता ईरान से भी लोहा ले रहे है और स्वतंत्र बलोचिस्तान के लिए गोरिल्ला युद्ध  छेडे हुए हैं। बलूचिस्तान के लोग पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत, ईरान का सिस्तान और बलूचिस्तान और अफगानिस्तान का बलूचिस्तान  शामिल है। बलूचिस्तान के  राष्ट्रवादी  फाइटर  1948 1958-59, 1962-63 औरा ं1973-77 मे पाकिस्तान के खिलाफ जबरदस्त संघर्ष  छेड चुके हैं। 2003 से यह संघर्ष और भी तेज हुआ है। इसी तरह ं गिलगित-बल्तिस्तान समेत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  के लोग भी सम्पूृर्ण आजादी चाहते हैं। पाकिस्तान को अब पता चलेगा कि दूसरों के मामलों में दखल देने के परिणाम कितने खतरनाक हो सकते हैं।

मंगलवार, 16 अगस्त 2016

केंद्र -राज्य तल्ख संबंध क्यों?


संसद में वीरवार को समाजवादी पार्टी और जनता दल (यूनाइटेड) के आक्रोश  ने फिर  केन्द्र-राज्यों के  तल्ख संबंधों को उजागर किया है। उत्तर प्रदेश  में सत्तारुढ समाजवादी पार्टी और बिहार में भारतीय जनता पार्टी से अलग होकर राष्ट्रीय  जनता दल के साथ सता में आई जनता दल (यूनाइटेड) का आरोप है कि भाजपा नीत केन्द्र सरकार उन्हें पर्याप्त बजट नही दे रही है। बिहार के सांसद अली अनवर अंसारी का कहना था कि राज्य के 14 जिले भीषण बाढ से प्रभावित हैं, 2300 गांव पूरी तरह से डूब चुके हैं और पाच लाख  हेक्टेेयर क्षेत्र में फसल नश्ट हो चुकी है। मगर इसके बावजूद प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना लागू नहीं की गई है। समाजवादी पार्टी का भी यही आरोप है। कांग्रेस का आरोप है कि केद्र सरकार गैर-भाजपा  शासित राज्यों से भेदभाव कर रही है। यह पहला अवसर नहीं है। संप्रग सरकार के समय भाजपा यही आरोप लगाया करती थी कि कांग्रेस नीत संप्रग सरकार भाजपा  शासित राज्यों से भेदभाव कर रही है। वित्तीय मदद के अलावा केन्द्र पर संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग के भी आरोप लगते रहे हैं। और इस संवैधानिक व्यवस्था का दुरुययोग करने में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही एक-दूसरे से आगे रही हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी, वह कांग्रेस को अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग करने के लिए जी भर कर कोसा करती थी। 1992 में अयोध्या में कार सेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद केन्द्र में सतारूढ नरसिंह राव सरकार ने उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , राजस्थान और हिमाचल प्रदेश  में प्रचंड जनादेश  से आई भाजपा सरकारों को डिसमिस करके विधानसभाएं भंग कर दी थी। तब कांग्रेस सरकार का यह कदम उतना ही असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक था, जितना मोदी सरकार का उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश  में कांग्रेस सरकार को हटाने के लिए  राष्ट्रपति  शासन लगाना। उत्तर प्रदेश  और बिहार अथवा अन्य गैर भाजपा शासित राज्यों के गिले-शिकवों  के अलावा दिल्ली में मुख्यमंत्री-उप राज्यपाल टकराव ने भी कई प्रश्न  खडे किए हैं। भारत में  लिखित संविधान है और इसमें केन्द्र और राज्यों के अधिकारों को लेकर  सुस्पष्ट  व्याख्या  की गई है। भारत को “ यूनियन ऑफ स्टेटस“ करार देते हुए संविधान में संघीय ढांचे ( फेडेरल सिसटम) की परिकल्पना की गई है। राज्यों को संसद में पर्याप्त नुमाइंदगी देने के लिए राज्य सभा का गठन किया गया है।  निष्पक्ष  न्यायपालिका संवैधानिक वॉच डॉग का काम करती है। संवैधानिक तौर पर गठित वित्त आयोग केन्द्र और राज्यों में वित्तीय संसाधनों का बंटवारा करता है। केन्द्र सरकार वित आयोग की सिफारिशों  को लागू करने के लिए बाध्य है।  इन सब व्यवस्थाओं के बावजूद फिर संघीय ढांचे को कमजोर करने के प्रयास क्यों? दरअसल, विधि वेताओं का मत है कि संविधान में गैर संघीय विशेषताएं (फीचर्स)  संघीय विशेषताओं पर भारी पडती है। संविधान में ताकतवर केद्र का सृजन किया गया है, और यह व्यवस्था इतनी ताकतवर है कि इसमें राज्यों को सिवा शोर  मचाने के सिवा कोई अधिकार नहीं है। संविधान में तीन अनुसूचिया- केन्द्र, स्टेट और समवर्ती- तो हैं और इनमें अधिकारों की स्पष्ट  व्याख्या भी है मगर राज्यों के लिए अलग से कोई संविधान नही है। अमेरिका में हर स्टेट का अपना अलग संविधान है। तथापि भारत अमेरिका जैसा नहीं बन सकता। भारत में भाषा , संप्रदाय और सांस्कृतिक विविधता हैं और इन सब को एकसूत्र में बांध रखने के लिए मजबूत केन्द्र की दरकार थी। कश्मीर  और पूर्वोतर राज्यों की घटनाएं भी इसी अनिवार्यता को उजागर करती हैं। मगर केन्द्र सरकार का यह संवैधानिक दायित्व है कि राज्यों को उनका माकूल हक मिले और इसमें “कौन अपना है, कौन पराया“, इस भावना से भेदभाव नहीं किया जाए। कमजोर संघीय ढांचा देश  की अखंडता पर प्रहार कर सकता है।        

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

महंगा कर्ज और मुद्रा-स्फीति

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने पद छोडने से पहले अपनी अंतिम मौद्रिक नीति में ब्याज दरों को यथावत रखकर विदाई ली है।  नौ अगस्त को जारी नीति में रघुराम राजन ने रेपो रेट 6. 5 फीसदी पर बनाए रखा। इस साल अप्रैल में आरबीआई द्वारा रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से यह छह साल के न्यूनतम स्तर पर आ गया था। इस दौरान मुद्रा-स्फीति में भी गिरावट दर्ज हुई थी। अधिकतर आर्थिक  एक्सपर्ट्स को रेट कट की उम्मीद भी नहीं थी। इसके दो कारण थे। पहला यह कि  गवर्नर रघुराम राजन सितंबर में अपना पदभार छोड रहे हैं, इसलिए उन्होंने रेट कट का जिम्मा अपने उतराधिकारी पर छोड दिया। वैसे भी मोदी सरकार ने ब्याज दरें निर्धारित करने का काम अब मौद्रिक नीति समिति (मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी) के सुपुर्द कर दिया है। आगे से ब्याज दरें निर्धारण का काम यही समिति किया करेगी और आरबीआई का इसमें कोई विशेष  भूमिका नहीं रहेगी। दूसरी प्रमुख वजह है कि अभी मानसून सीजन चल रहा है और इसके खत्म होने के बाद ही रेपो रेट में कट या वृद्धि की गुजांइश  बनती है। इस साल आम तौर पर बरसात में जमकर पानी बरस रहा है और देश  के कई क्षेत्र जलमग्न है। अच्छी मानसून से बंपर खरीफ फसल की उम्मीद की जा रही है। बरसात के बाद त्यौहारी सीजन में मांग बढने से बाजार को और ज्यादा नकदी की दरकार होगी। नव गठित छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति  अक्टूबर में रेट कट पर विचार कर सकती है। इस समिति के सदस्य अभी नियुक्त किए जाने है और तब तक इनकी नियुक्ति भी हो जाएगी और आरबीआई का नया गवर्नर भी पद ग्रहण कर लेगा। ब्याज दर निर्धारण का काम सरकार द्वारा नियुक्त  मौद्रिक नीति समिति  के सुपुर्द किए जाने से मौद्रिक नीति बनाने में राजनीतिक दखल की गुंजाइश  बढी है। आरबीआई का गवर्नर अमूमन अर्थशास्त्री अथवा वित्त विशेषज्ञ होता है, इसलिए अब तक मौद्रिक नीति में राजनीतिक दखलादांजी की गुजाइंश  काफी कम रही है। संप्रग सरकार के समय आरबीआई के गवर्नर रहे डी सुब्बाराव ने अपनी पुस्तक में इस बात का उल्लेख किया है कि कैसे कांग्रेस नीत संप्रग सरकार उन पर ब्याज दरों के लिए दबाव डालती रही है। अमेरिका, चीन और यूरोप की तुलना में भारत में ब्याज दरें अभी भी काफी ऊंची है और इससे विदेषी निवशकों को भारत में अच्छा रिटर्न मिल रहा है। अमेरिका और यूरोप में मंदी का दौर चल रहा है, इसलिए इन देशों  में कर्ज  काफी सस्ता है। यूरोप और फेडरल रिजर्व (अमेरिकी सेंट्रल बैंक) अगर ब्याज दरें बढाता है, तो इसका असर भारत पर भी पडेगा। मोदी सरकार ने  आरबीआई को अगले पांच सालों में रिटेल मुद्रा-स्फीति को चार फीसदी के आसपास लाने का लक्ष्य दे रखा है। रिटेल मुद्रा स्फीति अभी भी कंफर्ट जोन से ऊपर है। इस स्थिति में रेपो रेट में कटौती से मुद्रा स्फीति में उछाल आने का खतरा बना हुआ है। दुखद स्थिति यह है कि ब्याज दरें कम किए जाने का फायदा जनमानस तक पहुंच ही नहीं रहा है। पिछले साल जनवरी से अब तक रघुराम राजन रेपो रेट में डेढ फीसदी की कटौतौ कर चुके हैं मगर देश  के सरकारी और निजी बैंक हैं कि कटौती का अधिकांश  फायदा खुद हजम कर गए है। कुछ बैकों ने अपने ग्राहकों को  मिल-मिलाकर बमुश्किल  आधा फीसदी की राहत दी है। रघुराम राजन की यही सबसे बडी विफलता रही है। वे बेलगाम बैंकों पर नकेल नहीं डाल पाए। न तो बैंकों के एनपीए (नॉन परर्फोंमिंग असेट्स) में कोई गिरावट आई है और न ही कर्जदारों को पर्याप्त राहत मिली है। मौद्रिक नीति का फायदा सिर्फ  बैंको और साहूकारों तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। गरीब कर्जदार को एक-एक रुपए की राहत भी मायने रखती है।

गुरुवार, 11 अगस्त 2016

रियो जाओ, सेल्फी लो,,,,

जानी-मानी लेखिका  शोभा डे ने ओलंपिक में भारतीय खिलाडियों के प्रदर्शन को लेकर तल्ख टिप्पणी करके सोशल मीडिया पर मुसीबत मोल ले ली है। बेबाक और तीखे लेखन के लिए विख्यात शोभा डे का कथन है कि रियो में  भारतीय टीम का लक्ष्य है “ रियो जाओ, सेल्फी लो और खाली हाथ वापस आओ“। यह पैसे की बर्बादी नहीं तो और क्या है?  शोभा डे की इस टिप्पणी पर खिलाडियों के अलावा खेल प्रेमियों
और बालीवुड के कलाकारों ने उन्हें इसके लिए  उन्हें फटकार लगाई है। बीजिंग ओलंपिक के स्वर्ण  पदक विजेता अभिनव बिन्द्रा ने शोभा की टिप्पणी को बचकाना करार दिया है। बालीवुड कलाकार और आप नेता गुल पनाग ने भी इस टिप्पणी को “अशोभनीय “ बताया है। मगर शोभा डे अपने कथन पर कायम है। उनका स्पष्टीकरण है कि इन सब के लिए सरकार की उदासीनता (ऑफिशियल अपाथी) जिम्मेदार है। तथापि शोभा डे ने जो विचार व्यक्त किए है, उनसे देश  के अधिकांष लोग सहमत होंगे। वैसे भी भारत में हर नागरिक को अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी है और अगर शोभा डे को लगता है कि ओलंपिक में भारतीय टीम का खाली हाथ लौटाना देश के पैसे की बर्बादी है तो उन्हें अपने विचार व्यक्त करने की पूरी छूट है। इस पर कुछ लोगों को लाल-पीला होने का कोई औचित्य नहीं बनता है। क्या यह असहिष्णुता नहीं है? आप नेता गुल पनाग और उन जैसे कला के पुजारी स्वतंत्र और मुक्त  विचारों की काट कर क्या साबित करना चाहते हैं? पिछले लगभग 100 साल से भारत ओलंपिक में हिस्सा ले रहा है मगर वह इतने सालों में उतने भी स्वर्ण पदक नहीं जीत पाया है, जितमे अमेरिका के तैराक माइकल फैल्पस ने अपनी बाली उमर में जीते (22 स्वर्ण) हैं। 1920 से आज तक भारत बमुश्किल  नौ स्वर्ण पदक जीत पाया है। इनमें भी 7 हाकी में जीते है। 1928 से 1956 तक ओलंपिक हाकी में भारत की बादशाहत रही है और इस दौरान उसने लगातार छह स्वर्ण पदक जीते हैं। मगर 1958 के बाद पाकिस्तान के अस्तित्व में आने से भारत की हाकी की बादशाहत भी खत्म हो गई। इसके बाद भारत केवल दो बार 1964 और 1980 में हाकी का स्वर्ण पदक जीत पाया है। 1980 के बाद आज तक पिाछले 36  वर्षों में भारत स्वर्ण पदक तो दूर प्लेऑफ में भी नहीं पहुंच पाया था। इस बार  पहली बार भारत अर्जेटीना को हराकर प्लेऑफ में पहुंचा है। 2016 के ओलंपिक में भी अब तक  जिमानास्ट दीपा करमाकर को छोडकर भारत का  प्रदर्शन  निराशाजनक रहा है। बीजिंग ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिन्द्रा भी पदक से चूक गए हैं। इस बार के ओलंपिक में भारत अब तक सबसे ज्यादा 124 प्रतिर्स्पधाओं में भाग ले रहा है। 2012 में लंदन ओलपिंक में भारत ने 83 प्रतिर्स्पधाओं में भाग लिया था। रियो ओलंपिक में 29 खेलों की 412 प्रतिर्स्पधाएं हो रही है । इनमें पुरुष  वर्ग की 157 एवं महिलाओं की 255  प्रतिर्स्पधाएं हैँ  मगर भारत आधी से भी कम 124 में ही भाग ले रहा है। सवा करोड की आबादी वाला देश  अगर मेडल जीतने वाले दस- पंद्रह खिलाडी भी तैयार नहीं कर पाए, तो ओलंपिक में हिस्सा लेने का क्या मतलब? लेखिका शोभा डे ने भारतीय टीम के ओलंपिक प्रदर्शन को लेकर जो कुछ भी कहा या लिखा है, उसमें कुछ भी गलत नहीं है हालांकि उनके शब्दबाण काफी धारदार हैं और खिलाडियों और खेल प्रमियों को चुभे हैं। मगर एक सच्चाई यह भी है कि स्वस्थ लेखन किसी आलोचना अथवा भावनाओं का मोहताज नहीं होता। समाज को आइना दिखाना लेखन का गंतव्य होता है। भारत में खेल प्रशासन की स्थिति प्रतिर्स्पधा के माफिक तक नहीं है। सियासी नेता  खेल संगठनों पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं और अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं। खिलाडियों के चयन में क्षेत्रवाद और पक्षपात का बोलबाला है। भारत में खेल प्रतिभाओं को खोजने  और उन्हें तराशने की अविलंब जरुरत है।

बुधवार, 10 अगस्त 2016

कश्मीरियों की मलहम-पट्टी

एक माह से भी अधिक समय से हिंसा और अलगाववाद की आग में जल रहे कश्मीर  के जख्मों पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय वाली मलहम-पट्टी की जरुरत है। सोमवार को जम्मू-कश्मीर  के मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के दौरान कहा था कि अगर सरकार को कश्मीर  के लोगों का दिल जीतना है, तो वही करना होगा, जो पूर्व  प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को कहा कि वे  कश्मीर  को लेकर उसी रास्ते पर चल रहे हैं जो वाजपेयी ने अपनाया था। निसंदेह, कश्मीर  की अवाम  शांति और विकास चाहती है। कश्मीर  घाटी में लंबे समय से जारी हिंसा ने स्थानीय लोगों का रोजगार छीन लिया है। अलगाववादी और पाकिस्तान के पिठ्ठुओं को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि हिंसा और आतंक ने  कश्मीर के लोगों का निवाला ही छीन लिया है और अवाम ऐसे लोगों का कभी भी समर्थन नही करती है। अलगाववादी युवकों को गुमराह करके कश्मीर  में हिंसा फैलाकर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं। प्रधानमंत्री ने इस बात पर गहरा दुख जताया है कि कश्मीर  में जिन बालकों के हाथ में लेपटॉप, किताब और बल्ला, मन में सपने होने चाहिए, उनके हाथ में पत्थर थमा दिए गए हैं। ऐसा करने वाले अवाम के सबसे बडे  दुश्मन  है। देश  के हर नागरिक की तरह कश्मीर के लोगों को भी वैसी ही आजादी मिली हुई है मगर कुछ लोग इस आजादी का गलत फायदा उठा रहे हैं। इसी आजादी का नाजायज फायदा उठाते हुए कुछ लोग घाटी में बेधडक  भारत -विरोधी गतिविधियों में सलिंप्त रहते है।  पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को पूरी दुनिया में “ शांति का दूत“ माना जाता है। उन्होंने  कश्मीर  में अमन-चैन बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश  की। पाकिस्तान को भी मनाया और कश्मीरियों   से सीधा संवाद स्थापित किया। 1977 में अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार जब जनता पार्टी सरकार में विदेश  मंत्री बने थे, तब पाकिस्तान को वाजपेयी के जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) की हिंदुवादी छवि को लेकर खासी आशांका थी। मगर तत्कालीन विदेश  मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तमाम आशांकाओं को निर्मूल साबित करते हुए पाकिस्तान के साथ बेहतर द्धिपक्षीय संबंध बनाए थे। प्रधानमंत्री बनने पर कश्मीरियों   के साथ वार्ता का दौर शुरु करके घाटी में अमन-चैन स्थापित करने के भरपूर प्रयास किए  थे। कश्मीर प्रशासनिक अथवा कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, अलबत्ता राजनीतिक समस्या है और इसका हल भी राजनीतिक प्रयासों से ही निकल सकता है। कश्मीर समस्या का राजनीतिक हल निकालने में जितना विलंब होगा, घाटी का उतना ही ज्यादा नुकसान होगा। हिजबुल आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से कश्मीर में अलगाववादी अवाम को गुमराह करके सुरक्षा बलों पर भारी पडते दिख रहे हैं। यह स्थिति देश  की अखंडता के लिए ठीक नहीं है। इस स्थिति को भांपते हुए ही मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने वाजपेयी के समय वाले “हीलिंग टच“ की मांग की है। इससे यह अर्थ भी निकाले जा सकते है कि  कश्मीर को लेकर मोदी सरकार की नीति विफल सबित हुई है। इसी कारण प्रधानमंत्री को स्पष्टीकरण भी देना पडा है कि कश्मीर  को लेकर सरकार वाजपेयी के रास्ते पर चल रही है। पिछले सप्ताह गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर  गए थे और कुछ लोगों से सीधा संवाद भी किया था। भाजपा मे महामंत्री राम माधव भी लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने के प्रयास कर रहे हैं। निसंदेह, इस तरह के राजनीतिक प्रयासों की दरकार है। कश्मीर  घाटी में अलगाववादी भीड में घुसकर स्थिति का फायदा उठाते हुए  हिसा फैला रहे है। ऐसे लोगों को अवाम से अलग-थलग करने की जरुरत है। जब तक अलगाववादियों और पाकिस्तानी पिठ्ठुओं को अवाम से अलग-थलग नहीं किया जाता, कोई भी नीति कारगर साबित नहीं हो सकती।

मंगलवार, 9 अगस्त 2016

मोदी की चेतावनी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का  “गौ-रक्षा“ की आड में समाज को बांटने वालों के खिलाफ मोर्चा  खोलने से समाज-विरोधी गतिविधियों पर अंकुश  लगने की उम्मीद की जा सकती है। विलंब से ही सही, लेकिन देश  के प्रधानमंत्री की चेतावनी जाया नहीं जाएगी।  गत दो दिन में कई बार अलग-अलग मंचों से तथा-कथित गो रक्षा की आड में दलितों पर अत्याचार करने वालों को  प्रधानमंत्री सख्त चेतावनी दे चुके हैं। सुसभ्य और सुसंस्कृत समाज में समाज को बांटने और कमजोर वर्गों पर अत्याचार करने वालों के लिए कोई जगह नहीं होती है। गो माता की सेवा करना और उसकी रक्षा करना, हर हिंदु अपना परम कर्तव्य मानता है मगर तथा-कथित गो-रक्षा यह बात भूल जाते हैं कि दलित भी हिंदू हैं और उन पर अत्याचार करना समाज को विखंडित करना है। प्रधानमंत्री गुजरात के उना में कथित गो-रक्षकों द्वारा दलितों की निर्मम पिटाई से बेहद क्षुब्ध हैं। गुजरात प्रधानमंत्री का पैतृक राज्य है और अगर उनके अपने ही राज्य मे दलित सुरक्षित न हो, तो पूरे देश  में गलत संदेश  जाता है। प्रधानमंत्री की नाराजगी का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि रविवार को तेलगांना दौरे के दौरान उन्होंने यहां तक कह डाला कि “ मुझे गोली मार दो, मगर दलित भाइयों पर हमले बंद करना बंद करो“। प्रधानमंत्री का इतना कहना भर काफी है कि फर्जी गो-रक्षक देश  में टकराव पैदा करना चाहते हैं, इसलिए उन्हें दंडित करना जरुरी है। बाकी का काम पुलिस और कानून खुद करेगा। निसंदेह, ऐसे लोगों को कडी से कडी सजा मिलनी ही चाहिए जो मृत पशु  की कथित रक्षा की खातिर इंसान को जीते जी मारना चाहते हैं। कथित गो-रक्षकों द्वारा दलित उत्पीडन से न केवल  गुजरात, बल्कि पूरे देश  के दलित उबले हुए हैं और इससे भाजपा को आने वाले विधानसभाई चुनाव में भारी नुकसान हो सकता है। अगले साल के  शुरु में उत्तर प्रदेश  और पंजाब समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और साल के उत्तरार्ध में गुजरात और हिमाचल प्रदेश  में। गुजरात में लंबे समय से सतारुढ भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस से कडी चुनौती मिल सकती है। देश  के एक अग्रणी समाचार पत्र ने हाल ही में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है कि पाटीदार आरक्षण (पटेल) आंदोलन से भाजपा का इस समुदाय में मजबूत जनाधार कमजोर हुआ है। इसी आंदोलन के चलते भाजपा को गुजरात में आंनदीबेन पटेल को मुख्यमंत्री  पद से हटाना पडा। और अब उना दलित उत्पीडन प्रकरण ने भाजपा के समक्ष एक और चुनौती खडी कर दी है। देश में दलित और जनजातियों की 25 फीसदी (एक चौथाई) आबादी है। दलितों की  सबसे ज्यादा आबादी (लगभग 32 फीसदी ) पंजाब में है और इस राज्य के दलित आमतौर पर कांग्रेस के समर्थक है मगर लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते दलितों ने भाजपा का साथ दिया था। उत्तर प्रदेश  में अगर भाजपा को सता में आना है  तो दलितों का साथ जरुरी है मगर हालिया घटनाएं भाजपा के इन मंसूबों पर पानी फेर सकती है। बहरहाल, प्रधानमंत्री ने गो-रक्षकों को लताड लगाकर दलितों के जख्मों पर मलहम-पट्टी लगाने की कोशिश  की है और साथ में राजनीतिक निशाना भी साधा है। सुखद स्थिति यह है कि प्रधानमंत्री के साथ-साथ  राष्ट्रीय  स्वंय सेवक (आरएसएस) ने भी तथा-कथित गो-रक्षकों के खिलाफ मोर्चा खोला है। सामाजिक टकराव पैदा करने वाले फर्जी गो-रक्षकों का चिंहित करना वास्तव में जरुरी है। देश  के हालात ठीक नहीं है। प्रायोजित सीमापार आतंक से निपटना पहले ही बडी चुनौती है। भाजपाई अल्पसंख्यकों के खिलाफ आग उगल कर माहौल को तनावपूर्ण  बना देते हैं और अब तथा-कथित गो-रक्षक हिंदू समाज को भी बांट रहे हैं। इसे हर हाल में रोकना होगा।

सोमवार, 8 अगस्त 2016

असली बॉस कौन?

         
देश की राजधानी दिल्ली में जनता द्वारा चुनी गई सरकार की कोई अहमियत नहीं है? दिल्ली उच्च न्यायालय ने वीरवार को दिल्ली में सतारुढ आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा दायर याचिका पर व्यवस्था दी है कि दिल्ली अभी भी केन्द्र  शासित क्षेत्र है। यहां उप-राज्यपाल ही असली बॉस है और बगैर उनकी अनुमति के जनता द्वारा चुनी गई सरकार न तो किसी की नियुक्ति कर सकती है और न ही किसी पैनल को स्थापित कर सकती है। उच्च न्यायालय के फैसले के बाद केजरीवाल द्वारा नियुक्त दो पैनल तुरंत बर्खास्त हो गए हैं। उच्च न्यायालय के ताजा फैसले से साफ है कि दिल्ली में असली सरकार केन्द्र ही चला रहा है। दिल्ली पुलिस पहले से केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है और दिल्ली सरकार का उस पर कोई नियंत्रण नहीं है। यही कारण है कि दिल्ली पुलिस धडाधड आम आदमी पार्टी के विधायकों के खिलाफ मामले दर्ज  कर उन्हें जेल में ठूंस रही है। अब तक आम आदमी पार्टी के 12 विधायकों को गिरफ्तार किया जा चुका है। इनमें एक विधायक को पंजाब में धार्मिक बेअदबी के लिए गिरफ्तार किया गया है। यह सब इसलिए हो रहा है कि दिल्ली में पुलिस पर दिल्ली सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की दिल्ली को लेकर तमाम महत्वाकांक्षाएं धराशायी हो गई हैं हालांकि आप ने मामला सर्वोच्च न्यायालय में ले जाने की बात कही है। न्यायपालिका भावनाओं में नहीं बहती और संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार की फैसले सुनाती है। और संविधान में  स्पष्ट  है कि कोई क्षेत्र अगर केन्द्र  शासित है, तो वहां केंद्र का ही  शासन चलेगा। दिल्ली देश  की राजधानी है, इसलिए इसे केन्द्र  शासित रखा गया है। केन्द्र का मानना है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने से तरह-तरह की प्रशासनिक समस्याएं खडी हो सकती हैं। तथापि, केन्द्र शासित प्रदेशं  में अधिकार विहीन विधानसभा और मंत्रिमंडल के गठन का कोई औचित्य नहीं रह जाता है। लोकतंत्र में सांसदों और विधायकों की जनता के प्रति जबावदेही होती है, राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल की नहीं है। पूरी दुनिया यह बात जाानती है कि भारत में राज्यपाल अथवा उपराज्यपाल मात्र केन्द्र के एजेंट बतौर काम करते हैं। अरुणाचल प्रदेश  और उत्ताराखंड की हालिया घटनाओं ने भी यही साबित किया है। दिल्ली की मौजूदा स्थिति जनादेश  का सरासर अपमान है।ं दिल्ली की जनता के प्रचंड जनादेश  की कोई प्रासंगिकता नही रह जाती है। भाजपा के लिए यह स्थिति  और भी सुखद है कि दिल्ली की जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद दिल्ली में वही राज कर रही है। दिल्ली की  तरह हिमाचल प्रदेश  भी लंबे समय तक बतौर केन्द्र  शासित उपराज्यपाल के अधीन सर्व-अधिकार विहीन चुनी हुई सरकार का दर्द झेल चुका है।  हिमाचल प्रदेश  के निर्माता डाक्टर यशवंत सिंह परमार ने इसी दर्द के कारण पूर्ण  राज्य के लिए लंबी लडाई लडी और अतंत़ 1971 में हिमाचल पूर्ण राज्य बना। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी सरकार के पास भी दो ही विकल्प है। पहला विकल्प है कि पार्टी मौजूदा व्यवस्था के विरोध में इस्तीफा देकर पूर्ण राजत्व के लिए फिर से जनादेश  ले मगर यह पलायन का रास्ता होगा और इससे जनता को खामख्वाह का खमियाजा भुगतना पडेगा। इसके अलावा इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि जनादेश  मिलने पर केन्द्र दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दे ही देगा। दूसरा विकल्प है कि मौजूदा प्रचंड बहुमत और जनता के समर्थन से विधानसभा के भीतर और बाहर पूर्ण राज्य के लिए संघर्ष  छेडा जाए। यह विकल्प पहले से कहीं बेहतर है।  जनशक्ति के आगे तानाशाह और सैन्य  शासकों को भी झुकने पर विवश  होना पडता है। तुर्की इसी बात की मिसाल है। इस देश  की जनता ने रात को सडकों पर आकर राष्ट्रपति  तईब इरदुगान के खिलाफ सैन्य तख्ता पलट को भी विफल कर दिया ।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

राजनाथ की पाक यात्रा

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान यात्रा करके काबिलेतारीफ काम किया है। दो-एक सिरेफिरे आतंकियों के डर से अगर भारत के गृहमंत्री अपनी यात्रा रद्द कर देते, तो देश  की नाक कट जाती। कहावत है “ गली-मोहल्ले के कुत्तों के भौंकने के दर से वहां आना-जाना नहीं छोडा जाता“। भारत में भी पाकिस्तान विरोधी संगठन  आए दिन पाकिस्तानी खिलाडियों और नेताओं के भारत दौरे को लेकर धमकियां दिया करते हैं मगर इससे न तो  पाकिस्तानी खिलाडियों के दौरे रुके हैं और न ही शीर्ष   नेताओं की यात्राएं । राजकीय यात्राओं पर आने वाले शीर्ष  नेताओं की पुख्ता और भरोसेमंद सुरक्षा की व्यवस्था करना संबंधित देश  की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है और इसमें जरा सी चूक के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। जनवरी, 2016 में पठानकोट आतंकी हमले के बाद यह किसी भारतीय नेता की पहली पाकिस्तान यात्रा है। निसंदेह, भारत के गृह मंत्री राजनाथ सिंह ऐसे समय में इस्लामाबाद गए हैं, जब भारत और पाकिस्तान के बीच कडुवाहट चरम पर है। जम्मू-कश्मीर  में हिजबुल के आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से द्धिपक्षीय संबंध और भी खराब हुए हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने वाई को शहीद बताकर और भारत अधिकृत कश्मीर  पर अपना दावा जताकर संबंधों को और भी बिगाड दिया है। पाकिस्तान के आतंकी संगठन जमात-उद-दावा के सरगना हाफिज सईद और हिजबुल मुजाहिद्दिन  प्रमुख सैयद  सलाल्लुदीन  पाकिस्तान सरकार को राजनाथ सिंह की यात्रा को लेकर गंभीर परिणामों की धमकी भी दे चुके हैं। बुधवार को भारत के गृहमंत्री की इस्लामाबाद यात्रा से पहले  जमात-उद-दावा और हिजबुल समेत कई भारत विरोधी संगठनों ने पाकिस्तान मे जगह-जगह विरोध प्रर्दशन किए और सरकार से राजनाथ सिंह की अधिकृत अगवानी नहीं करने का दबाब डाला। ताजा घटनाक्रम के  दृष्टिगत  भारत ने गृहमंत्री की यात्रा को मात्र सार्क  गृहमंत्री की बैठक तक सीमित रखा है। स्थापित कूटनीतिक परंपरा को दर किनार कर राजनाथ सिंह अपने पाकिस्तानी समकक्ष गृह मंत्री चौधरी निसार अली खान से भी मुलाकात नहीं करेंगे। इस यात्रा के दौरान भारत और पाकिस्तान के बीच कोई  अधिकृत संवाद भी नहीं होगा,। संक्षेप में भारत के गृहमंत्री इस्लामाबाद  की यात्रा पर होते हुए भी पाकिस्तान में नही होंगे। इस्लामाबाद में वीरवार से सार्क  के गृह मंत्रियों की बैठक हो रही है। इस बैठक में 9 और 10 नवंबर को इस्लामाबाद और मढी में होने वाले सार्क  शिखर सम्मेलन की तैयारियों की समीक्षा की जाएगी । भारत दक्षिण एशिया के आठ देशों  के इस अहम संगठन का नेतृत्व करता है और भारत की उपस्थिति के बगैर इस शिखर सम्मेलन का कोई महत्व नहीं है। भारत और पाकिस्तान के अतिरिक्त बांग्लादेश , श्रीलंका, नेपाल, अफगानिस्तान, मालद्धीप  और भूटान सार्क के सदस्य हैं। दरअसल, पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को डर है कि राजनाथ सिंह सार्क की बैठक में पठानकोट हमले में हाफिज सईद और हिजबुल की नापाक हरकतों की चर्चा करेंगे और उनकी कलई खोलेंगे। जनवरी में पठानकोट हमले से लेकर कश्मीर में  मौजूदा हिंसा और आतंक की घटनाओं के लिए  हाफिज सईद और हिजबुल मुजाहीद्यीन प्रमुख सैयद सलाल्लुदीन  गठजोड को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। दो दिन पहले  हिजबुल मुजाहीद्यीन का एक प्रमुख आतंकी श्रीनगर में देखा गया था।  गृहमंत्री राजनाथ सिंह की पाकिस्तानी यात्रा से भारत पाकिस्तान को कूटनीति पटखनी देने की स्थिति में है। मौजूदा कटु संबंधों के दृष्टिगत  भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नवंबर सार्क  सम्मेलन में  शामिल होने का सवाल ही नहीं है। और अगर भारत के प्रधानमंत्री इस शिखर सम्मेलन में नहीं जाते हैं, तो पूरी दुनिया में पाकिस्तान की मिट्टी पलीत होना तय है।

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

पूरा देश शर्मसार

उत्तर प्रदेश के बुलंदषहर मे मां-बेटी के साथ बलात्कार की घटना ने फिर देश  को शर्मसार किया है। इस जघन्य कृत्य ने साबित कर दिया है कि देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  में कानून-व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं है और राज्य में गुंडों और मव्वालियों का राज चलता है। वैसे भी समाजवादी पार्टी को लेकर जनमानस में यही धारणा है कि उसके राज में आपराधिक घटनाए बढ जाती हैं। शुक्रवार देर रात नोएडा से शाहजहांपुर में अपने पैतृक गांव जा रहे परिवार की  कार  टायर बुलंदशहर के निकट  कार अचानक फट गया। कार में दो भाई, उनकी  पत्नियां और 13 साल की बेटी और भतीजा समेत छह लोग सवार थे। कार रोककर वे जैसे ही टायर चैक करने लगे, बदमाशों  ने उन्हें घेर लिया। परिवार को बंधक बनाकर एक महिला और उसकी 13 साल की बेटी से 12 लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया और बाद में बदमाश  गहने और नकदी लेकर शनिवार सुबह फरार हो गए। रविवार को इस घटना की खबर मीडिया में  प्रसारित-प्रकाशित  होते ही उत्तर प्रदेश  सरकार जागी और एसएसपी समेत पूरा थाना निलंबित कर दिया गया। जिस जगह बदमाश  दो महिलाओ की आबरु लूट रहे थे, उससे कुछ दूरी पर थाना स्थित था। राज्य के डीजीपी भी भागे-भागे बुलंदशहर पहुंचे और “ सांप निकल गया, लाठी पीटते रह  गए“। बुलंदशहर से पहले हरियाणा में जाट आरक्षण के दौरान मुरथल मे महिलाओं की अस्मत लूटी गई थी। इस मामले में भी पुलिस -प्रशासन की निष्क्रियता उजागर हुई थी। थोडे समय तक मुरथल बलात्कार कांड सुर्खियों में छाया रहा मगर फिर सब कुछ शांत हो गया। हर बार यही होता है। जब कभी भी किसी महिला की अस्मत लूटी जाती है, पूरे देश  में दो-चार दिन के लिए महिला की सुरक्षा को लेकर खूब शोर मचाया जाता है मगर फिर सब कुछ भुला दिया जाता है। गत वीरवार को राजधानी दिल्ली में 16  वर्षीय लडकी का सामूहिक बलात्कार किए जाने के बाद उसे जिंदा जला दिया गया। दिसंबर, 2012 में दिल्ली में एक मेडिकल छात्रा ( चर्चित निर्भय रेप कांड) से छह लोगों द्वारा नृशंष सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश  को हिला दिया था। सामूहिक बलात्कार की इस घटना में एक नाबालिग भी  शामिल था मगर देश  कानून इस तरह का है कि इस मामले के चार आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई, पांचवे ने जेल में खुदकुशी  कर ली मगर छठा तब का नाबालिग तीन साल सुधार गृह में रहकर अब आजाद घूम रहा है। तब रेप को लेकर सख्त कानून बनाने की मांग भी उठी थी मगर राजनीतिक “निहित स्वार्थों“ में दबकर रह गई। आंकडों के अनुसार भारत में हर साल लगभग 25,000 महिलाओं की अस्मत लूटी जाती है। आंकडें यह भी बताते हैं कि बलात्कार के 60 फीसदी मामलों में नाबालिग संलिप्त होते हैं। इस बात के दृष्टिगत, स्पष्ट  है कि 60 फीसदी बलात्कारी नाबालिग होने के कारण सख्त सजा से बच निकलते हैं। आंकडों से यह भी पता चलता है कि  50 फीसदी नाबालिग दोबारा बलात्कार का प्रयास करते हैं। महिलाओं का यौन शोषण भारत में  नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की बडी समस्या है। सयुंक्त राष्ट्र  संघ के 65 देशों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि हर साल इन देशों में 2,50,00 महिलाओं से जोर-जबरदस्ती करके यौन संबंध बनाए जाते हैं। पूरी दुनिया मे तो बलात्कार के मामले कहीं ज्यादा है। दक्षिण अफ्रीका में सबसे ज्यादा  बलात्कार के मामले रिपोर्ट किए जाते है। इस मामले में अमेरिका और इंग्लैंड भारत से कहीं आगे है। मगर अमेरिका और इंग्लैंड की तुलना में भारत में बलात्कार के  असली आंकडे कहीं ज्यादा हैं।  अधिकांश  मामले लोकलाज के कारण  रिपोर्ट ही नहीं किए जाते हैं। बहरहाल, बुलंदशहर सामूहिक बलात्कार कांड ने महिलाओं की सुरक्षा पर फिर प्रष्नचिंह खडा कर दिया है। आखिर, देश  की बहू-बेटियों का कब तक इस तरह से  नृशंष  और अमानवीय  यौन  शोषण होता रहेगा।

सोमवार, 1 अगस्त 2016

चली गईं हजार चौरासी की मां

जानी-मानी  लेखिका महाश्वेता  देवी और ताल के जादूगर लच्छू महाराज के स्वर्गवास से एक साथ साहित्य और संगीत जगत में विशाल  शून्य भर गया है।  नब्बे वर्षीय  महाश्वेता देवी ने कोलकत्ता  और 72 साल के लच्छू महाराज ने वाराणसी में अंतिम सांस ली। अस्सी के दश क तक हिंदी भाषा  के गिने-चुने लोग ही लेखिका महाश्वेता के नाम से परिचित थे। 1980 में बगाल के नक्क्सलबाडी आंदोलन की  पृष्ठभूमि  में लिखा गया उनका उपन्यास “हजार चौरासी की मां“ प्रकाशित  हुआ था। इसी उपन्यास के लिए उन्हें “हजार चौरासी की मां“ से जाना जाता है। तब हिंदी के कुछ छात्रों और समकालीन तीसरी दुनिया ने उनका इंटरव्यू लिया और पत्रिका में छापा। यह हिंदी में महाश्वेता का पहला इंटरव्यू था। इसके बाद महाश्वेता हिंदी साहित्य में भी खासी लोकप्रिय हो गई। महाश्वेता देवी अविभाजित् बंगाल के ढाका में पैदा हुई थीं। उनके पिता मनीष  घटक खुद मशहूर उपन्यासकार थे। 1926 में जन्मीं महाश्वेता 1940 तक बंगाल में वामपंथी आंदोलन से खासी प्रभावित हो चुकी थीं और वे दबे-कुचलों, आदिवासियों और  शोषित  वर्ग की आवाज बन गईं थी।  उन्होंने शोषण  की जटिल प्रकिया और समाज के सभी अंतर्विरोधों को बडी बारीकी से समझा और अपने लेखन में इसका बखूबी से वर्णन किया। महाश्वेता में  शोषण व्यवस्था के खिलाफ प्रचंड आग भरी थी। वे अक्सर कहती भी थीं कि “ मेरे भीतर शोषितों  और आदिवासियों के लिए लंबे अरसे से पीडा की जो ज्वाला धधक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही  शांत  होगी। और ऐसा ही हुआ। अंतिम सांस तक वे  शोषतों  के लिए लडती रही। महाश्वेता की मूल विधा कविता थी पर 1956 में “ झांसी की रानी“ ने उन्हें उपन्यासकार बना दिया। इस रचना के बाद, उन्होंने एक इंटरव्यू में माना कि “ झांसी की रानी“ लिखने के बाद उन्हें समझ में आया कि कि “वे मूल रुप से कथाकार ही हैं“। उनकी रचनाए केवल कल्पनामात्र नहीं होती, बल्कि सच का आइना होंती। उन्होंने पुणे, इंदौर, सागर, जबलपुर काल्पी आदि शहरों और ललितपुर के जंगलों में भ्रमण करते-करते  उन तमाम घटनाओं के साथ अपना उपन्यास “झांसी की रानी“ लिखा था, जो 1857 के संग्राम के दौरान हुई थी। उनकी कई रचनाओं पर फिल्में बनी। इतालवी फिल्म निदेशक इतालो स्पिनलो ने उनकी रचना “चोली के पीछे“ पर “गंगूर“ नाम से कई भाशाओं में फिल्म बनाई। “हजार चौरासी की मां“ पर 1998 में फिल्म बनी। उनके उपन्यास “रुदाली“ पर इसी नाम से फिल्म बनी थी। महाश्वेता को 1986 में पदमश्री, 1996 में ज्ञानपीठ और 2006 में पदम विभूशण से सम्मानित किया गया था। ऐसी महान रचनाकार के निधन से साहित्य जगत को गहरा आघात लगा है। वीरवार को ही देश  के मशहूर तबला वादक लच्छू महाराज का भी स्वर्गवास हो गया। उनका असली नाम लक्ष्मी नारायण सिंह था और वे बनारस घराने से संबंधित थे। लच्छू महाराज स्वभाव से वाकई ही महाराज और बेहद स्वभिमानी थे। किसी के कहने कभी तबला नही बजाया। जब तबियत हुई तबले पर अंगुलियां थिरक गईं। ताउम्र खूब तालियां बटोरी मगर कोई पुरस्कार-वार नहीं मिला हालांकि उनका हूनर कमाल का था। एक बार सरकार ने पदमश्री से सम्मानित किया था मगर उन्होंने लेने से इंकार कर दिया।  कहने को बनारस घराने से थे मगर चारों घराने की ताल तबियत से बजा लेते। फिल्म अभिनेता गोविंदा लच्छू महाराज के भानजे  हैं। आठ साल की उमर में मुंबई में तबला उन्हें बजाते देख एक बार नामचीन तबला वादक नवाज अहमद  उनसे इतने प्रभावित हुए थे कि उन्हें अपना बेटा बनाना चाहते थे। शरीर नश्वर  है मगर रचना और कला अमर होती है। महाश्वेता और लच्छू महाराज भी अपनी रचनाओं और कला से युगों तक याद किए जाते रहेंगें।

डोपिंग का डंक!

ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरिया में पांच अगस्त से  शुरु हो रहे ओलंपिक से पहले  रेसलर नरसिंह यादव और  शॉटपुट (गोला फेंक) खिलाडी इन्द्रजीत सिंह के डोपिंग टेस्ट में फेल होने से भारत को तगडा झटका लगा है। हरियाणा से संबंधित इन्द्रजीत ने 2014 में एशियन खेलों में कांस्य पद जीता था। नरसिंह यादव ने 2010 की कॉमनवैल्थ गेम्स में 74 किलो भार वर्ग फ्री-स्टाइल में स्वर्ण पदक जीता था।  ओलपिंक में भारत का रिकार्ड  अच्छा नहीं रहा है और इस बार भी ज्यादा पदक जीतने की बहुत कम उम्मीद है।  दोनों खिलाडियों पर प्रतिबंधित पदार्थ मेथानडिएनोने के सेवन का आरोप है। दोनों के शरीर में इस प्रतिबंधित प्रदार्थ  के अंश  पाए गए हैं। इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि दोनों खिलाडियों ने कहा है कि उनके खिलाफ साजिश  हुई है। रेसलर नरसिंह यादव का दूसरा डोपिंग टेस्ट भी फेल हो गया और उनके शरीर में फिर प्रतिबंधित प्रदार्थ  के अंश  मिले। इससे स्पष्ट  है कि यादव ने प्रतिबंधित  मेथानडिएनोन का सेवन किया था। विशेषज्ञों के मुताबिक  मेथानडिएनोन के अंश  कम-से-कम आठ सप्ताह तक शरीर में मौजूद रहते हैं और इस दौरान अगर डोपिंग टेस्ट किया जाता है, तो नतीजा बदलता नहीं है।  मेथानडिएनोन एक उपजय (एनाबोलिक) स्टेराइड है और एंड्रोजेनिक स्टेरॉयड का रासायनिक संषोधित संस्करण है। यह स्टेरॉयड बाल्डी बिल्डरों में काफी प्रचलित है। नरसिहं यादव अब तक कहते रहें हैं कि उनके खिलाफ साजिश  हुई है। उन्होंने कभी  स्टेरॉयड लिया ही नहीं। रेसलिंग फेडेरेशन ऑफ इंडिया भी उनके बचाव में आ गई है। सोनीपत स्थित स्पोर्टस अथॉरिटी में इंडिया (साई) परिसर में जिस युवक ने उनके खाने में मिलावट की थी, उसकी पहचान भी हो गई है। इससे लग रहा है  कि यादव डोपिंग के डंक से बच सकते हैं। वीरवार को नाडा के एंटी डोपिंग अनुशासन समिति के समक्ष वकीलों के साथ अपना पक्ष रखते समय उन्होंने माना कि डोपिंग हुई है मगर यह अनजाने में हुई। इसी तरह शॉटपुटर इंद्रजीत सिंह भी यही कह रहे हैं कि वे साजिश  का  शिकार हुए हैं। हर खिलाडी डोपिंग के बाद यही कहता है मगर नाडा को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। फिलहाल, स्थिति यह है को नरसिंह यादव रियो से बाहर हैं और उनकी जगह प्रवीण राणा को नामित किया गया है। सवाल यह है कि खिलाडी डोपिंग टेस्ट से पहले प्रतिबंधित स्टेरॉयड का सेवन  करते ही क्यों हैं? जबकि वे यह बात भली-भांति जानते हैं कि ऐसा करने से उन पर प्रतिबंध लग सकता है। खिलाडी इस सच्चाई से भी वाकिफ हैं कि  मेथानडिएनोन जैसे आधुनिक स्टेरॉयड का शरीर में लंबे समय ( 8 से 11 सप्ताह) तक रहता है और इस स्थिति में वे डोपिंग के डंक से बच नहीं सकते। रेसलर नरसिंह यादव और इन्द्रजीत सिंह के  स्पष्टीकरण  में वजन है कि डोपिंग टेस्ट से पहले भला कोई खिलाडी स्टेरॉयड क्यों लेगा़? जाहिर है, पूरे मामले की दाल में कुछ-न-कुछ काला जरुर है। और अगर नरसिंह राव अथवा इन्द्रजीत सिंह के खिलाफ साजिश  हुई है तो देष के लिए यह शर्म  की बात है। यादव के मामले में शक की सुई रेसलर सुशील  कुमार की ओर उठ रही है। सुशील  कुमार और नरसिंह ओलंपिक में भाग लेने के लिए अपने-अपने दावे को लेकर अदालत तक जा चुके हैं और फैसला यादव के पक्ष में रहा है।   भारत रियो ओलंपिक में अब तक का सबसे बडा 121 एथलीटसं का दल भेज रहा है मगर भारतीय खिलाडी मैडल ला पाएंगे, ऐसी उम्मीद काफी कम है। सुशील  कुमार मैडल विनर हो सकते थे मगर वे अदालती लडाई हार गए। भारत ने पहली बार 2012 के लंदन ओलंपिक में सबसे ज्यादा 6 (दो रजत और चार कांस्य) पदक जीते थे। बींजिग ओलंपिक में भारत ने तीन पदक जीते थे। रियो की  शुरुआत अच्छी नहीं रही है।




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