नरेन्द्र मोदी सरकार के दो साल पूरा होने के साथ ही देष में खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की बिक्री में खासा इजाफा होना स्वदेशी अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। खादीं की ब्रिकी में वृद्धि का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री खादी के सबसे बडे ब्रांड एम्बेेस्डर हैं। वे खुड खादी वस्त्र पहनते हैं और औरों को भी खादी पहनने को कहते हैं। केन्द्र में सत्तारूढ होते ही प्रधानमंत्री ने देशवासियों से “ खादी पहनने और इसे प्रोत्साहित करने“ (वीयर खादी, प्रोमोट खादी) का आहवान किया था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते भी नरेन्द्र मोदी ने 2012 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर “ खादी पहनो“ का आहवान किया था। इसी के फलस्वरुप गुजरात में खादी का खासा चलन बढा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “मन की बात“ में कई बार जनमानस से खादी पहने और इसे प्रोत्साहित करने का आहवान कर चुके हैं। सितंबर, 2015 में “मन की बात“ में लोगों से खादी पहनने का आहवान करते ही दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित प्रतिष्ठित खादी एवं ग्रामोद्योग भवन में मात्र दस दिन के भीतर खादी वस्त्रों की बिक्री में 88 फीसदी का इजाफा हुआ था। और खादी खरीदने वालों में लगभग 70 फीसदी युवा थे। आंकडों के मुताबिक पहली बार खादी कपडों की ब्रिकी में 29 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। सुखद स्थिति यह है कि देश में लगातार सूखे के कारण जहां बडी-बडी कंपनियों (इंडिया इनकॉपोर्रेट) की ब्रिकी में गिरावट आई है, वहीं खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की ब्रिकी बढी है। बडी कंपनियां विज्ञापनों पर भारी-भरकम राशि खर्च करती है और उनका उत्पादन पूंजी उन्मुख (केपिटल इंटेसिव) होता है। बडी कंपनियां डीलर नेटवर्क के जरिए अपने उत्पाद बेचती हैं। इससे उनकी लागत में खासी वृद्धि होती है और उत्पाद महंगे। बडी कंपनियों की ब्रिकी लागत ही 70 फीसदी से ज्यादा होती है। खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पाद इसकी तुलना में कहीं ज्यादा सस्ते होते हैं। ये उत्पाद देश के लगभग सात लाख परिवारों द्वारा तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों का एक छोटा सा भाग ही खादी एवं ग्रामोद्योग के बिक्रय केन्द्रों के माध्यम से बेचा जाता है। ज्यादातर छोटे एवं घरेलू उपभोग के उत्पाद सीधे दुकानों अथवा हाट बाजार लगा कर बेचे जाते है। खादी ग्रामोद्योग के तहत पापड, हीना, शहद से लेकर तेल-साबुन और फूड से लेकर हैडलूम-हैंडिक्रॉफट उत्पाद तैयार किए जाते हैं। 2015-16 के दौरान खादी-ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 14 फीसदी वृद्धि के साथ 37,935 करोड रु को पार कर गई थी जबकि इस दौरान योग गुरु रामदेव संचालित पंतजलि उत्पादों को छोडकर करीब-करीब सभी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कन्ज्युमर गुडस) की ब्रिकी में गिरावट दर्ज हुई। इन आंकडों से स्पष्ट है कि केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद और प्रधानमंत्री द्वारा खादी वस्त्रों को प्रोत्साहित करने के नतीजतन ग्रामोद्योग के उत्पादों की लोकप्रियता बढी है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह बात रामबाण साबित हो सकती है। देश की 70 फीसदी आबादी देहातों में बसती है और अगर गांवों में रोजगार का सृजन होता है, तो लोगों की आय बढती हे। इससे उनकी क्रय शक्ति (परचेंजिंग पॉवर) में इजाफा होता है और मांग उठती है। यही आर्थिक विकास का मूल मंत्र है। देश के लिए एक और अच्छी खबर यह है कि सूखे और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद मोदी सरकार के दो साल में देहातों में आर्थिक गतिविधियां बढी हैं। इस मार्च माह में ग्रामीण मांग (रूरल डिमांड) का स्टैंटर्ड चार्टर इंडेक्स 16 माह के शिखर पर था। देश की सबसे अग्रणी ट्रेक्टर बनाने वाली कंपनी मंहिद्रा एंड मंहिद्रा की फाइनेषशियल सर्विस की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि लंबे समय तक मंदी रहने के बाद पिछली तिमाही में पहली बार उसका कारोबार उठा हैे। इसका अर्थ है कि देहातों में मांग उठी है। जाहिर है ऐसा आय बढने के कारंण हुआ है। पिछले दो सालों में केन्द्र और राज्यों की सरकारों ने ग्रामीण क्षत्रों में रेल-सडक निर्माण और अन्य इंफरास्ट्रक्चरल कार्यों में खासा निवेश किया है और बिचौलियों का नेटवर्क ध्वस्त हुआ है। बहरहाल, खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की ब्रिकी बढना अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत है। इससे साफ है कि खादी युवाओं में भी लोकप्रिय है। भारत में खादी वस्त्र अथवा उत्पाद मात्र नहीं है। यह हमारी स्वदेशी सोच और राष्ट्रीय अस्मिता से जुडी है। इसी खादी की बदौलत हमने फिरंगी शासन से मुक्ति पाई थी और यही खादी अब देश को मल्टी नेषनल कंपनियों के भ्रमजाल से आजादी दिलाएगी।
मंगलवार, 31 मई 2016
राष्ट्रीय अस्मिता से जुडी है खादी
Posted on 8:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नरेन्द्र मोदी सरकार के दो साल पूरा होने के साथ ही देष में खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की बिक्री में खासा इजाफा होना स्वदेशी अर्थव्यवस्था की मजबूती का संकेत है। खादीं की ब्रिकी में वृद्धि का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दिया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री खादी के सबसे बडे ब्रांड एम्बेेस्डर हैं। वे खुड खादी वस्त्र पहनते हैं और औरों को भी खादी पहनने को कहते हैं। केन्द्र में सत्तारूढ होते ही प्रधानमंत्री ने देशवासियों से “ खादी पहनने और इसे प्रोत्साहित करने“ (वीयर खादी, प्रोमोट खादी) का आहवान किया था। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते भी नरेन्द्र मोदी ने 2012 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती पर “ खादी पहनो“ का आहवान किया था। इसी के फलस्वरुप गुजरात में खादी का खासा चलन बढा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी “मन की बात“ में कई बार जनमानस से खादी पहने और इसे प्रोत्साहित करने का आहवान कर चुके हैं। सितंबर, 2015 में “मन की बात“ में लोगों से खादी पहनने का आहवान करते ही दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित प्रतिष्ठित खादी एवं ग्रामोद्योग भवन में मात्र दस दिन के भीतर खादी वस्त्रों की बिक्री में 88 फीसदी का इजाफा हुआ था। और खादी खरीदने वालों में लगभग 70 फीसदी युवा थे। आंकडों के मुताबिक पहली बार खादी कपडों की ब्रिकी में 29 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। सुखद स्थिति यह है कि देश में लगातार सूखे के कारण जहां बडी-बडी कंपनियों (इंडिया इनकॉपोर्रेट) की ब्रिकी में गिरावट आई है, वहीं खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की ब्रिकी बढी है। बडी कंपनियां विज्ञापनों पर भारी-भरकम राशि खर्च करती है और उनका उत्पादन पूंजी उन्मुख (केपिटल इंटेसिव) होता है। बडी कंपनियां डीलर नेटवर्क के जरिए अपने उत्पाद बेचती हैं। इससे उनकी लागत में खासी वृद्धि होती है और उत्पाद महंगे। बडी कंपनियों की ब्रिकी लागत ही 70 फीसदी से ज्यादा होती है। खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पाद इसकी तुलना में कहीं ज्यादा सस्ते होते हैं। ये उत्पाद देश के लगभग सात लाख परिवारों द्वारा तैयार किए जाते हैं। इन उत्पादों का एक छोटा सा भाग ही खादी एवं ग्रामोद्योग के बिक्रय केन्द्रों के माध्यम से बेचा जाता है। ज्यादातर छोटे एवं घरेलू उपभोग के उत्पाद सीधे दुकानों अथवा हाट बाजार लगा कर बेचे जाते है। खादी ग्रामोद्योग के तहत पापड, हीना, शहद से लेकर तेल-साबुन और फूड से लेकर हैडलूम-हैंडिक्रॉफट उत्पाद तैयार किए जाते हैं। 2015-16 के दौरान खादी-ग्रामोद्योग उत्पादों की बिक्री 14 फीसदी वृद्धि के साथ 37,935 करोड रु को पार कर गई थी जबकि इस दौरान योग गुरु रामदेव संचालित पंतजलि उत्पादों को छोडकर करीब-करीब सभी एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कन्ज्युमर गुडस) की ब्रिकी में गिरावट दर्ज हुई। इन आंकडों से स्पष्ट है कि केन्द्र में मोदी सरकार के आने के बाद और प्रधानमंत्री द्वारा खादी वस्त्रों को प्रोत्साहित करने के नतीजतन ग्रामोद्योग के उत्पादों की लोकप्रियता बढी है। भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह बात रामबाण साबित हो सकती है। देश की 70 फीसदी आबादी देहातों में बसती है और अगर गांवों में रोजगार का सृजन होता है, तो लोगों की आय बढती हे। इससे उनकी क्रय शक्ति (परचेंजिंग पॉवर) में इजाफा होता है और मांग उठती है। यही आर्थिक विकास का मूल मंत्र है। देश के लिए एक और अच्छी खबर यह है कि सूखे और प्राकृतिक आपदाओं के बावजूद मोदी सरकार के दो साल में देहातों में आर्थिक गतिविधियां बढी हैं। इस मार्च माह में ग्रामीण मांग (रूरल डिमांड) का स्टैंटर्ड चार्टर इंडेक्स 16 माह के शिखर पर था। देश की सबसे अग्रणी ट्रेक्टर बनाने वाली कंपनी मंहिद्रा एंड मंहिद्रा की फाइनेषशियल सर्विस की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि लंबे समय तक मंदी रहने के बाद पिछली तिमाही में पहली बार उसका कारोबार उठा हैे। इसका अर्थ है कि देहातों में मांग उठी है। जाहिर है ऐसा आय बढने के कारंण हुआ है। पिछले दो सालों में केन्द्र और राज्यों की सरकारों ने ग्रामीण क्षत्रों में रेल-सडक निर्माण और अन्य इंफरास्ट्रक्चरल कार्यों में खासा निवेश किया है और बिचौलियों का नेटवर्क ध्वस्त हुआ है। बहरहाल, खादी एवं ग्रामोद्योग के उत्पादों की ब्रिकी बढना अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत है। इससे साफ है कि खादी युवाओं में भी लोकप्रिय है। भारत में खादी वस्त्र अथवा उत्पाद मात्र नहीं है। यह हमारी स्वदेशी सोच और राष्ट्रीय अस्मिता से जुडी है। इसी खादी की बदौलत हमने फिरंगी शासन से मुक्ति पाई थी और यही खादी अब देश को मल्टी नेषनल कंपनियों के भ्रमजाल से आजादी दिलाएगी।
सोमवार, 30 मई 2016
अमेरिका के “मोदी“
Posted on 7:28 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अमेरिका में रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपति पद उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव प्रचार और भारत में 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार में काफी समानता है। और समानता भी इतनी करीबी कि डोनाल्ड ट्रंप को “ अमेरिका का मोदी“ माना जा रहा है। लोकसभा चुनाव में भाजपाई जिस तरह मुसलमानों के खिलाफ आग उगला करते थे, ठीक उसी तरह डोनाल्ड ट्रंप भी मुसलमानों के खिलाफ बोल रहे हैं। भारत में भाजपाई लोकसभा चुनाव के दौरान मुसलमानों को पाकिस्तान चले जाने का मश्विरा दिया करते थे। उसी तर्ज पर अमेरिका में ट्रंप मुसलमानों की एंट्री रोकने का ऐलान करा चुके हैं । भाजपाई नेता पाकिस्तान को सबक सिखाने की बातें करते रहे हैं तो ट्रंप मेक्सिको को। इसके लिए ट्रंप बार्डर पर दीवार खडी करने पर आमादा हैं। मुस्लिम विरोधी बोलकर भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए जिस तरह से मतदाताओं का ध्रुवीकरण कराया था, उसी तरह ट्रंप भी अश्वेतों के खिलाफ आग उगल कर अमेरिकी श्वेतों का ध्रुवीकरण करा रहे हैं। भारत में जिस तरह हिंदू मतदाताओं का वर्चस्व है, उसी तरह अमेरिका में लगभग 75 फीसदी श्वेत मतदाता है। भारत में अल्पसंख्यक भगवा पार्टी के समर्थक नहीं है, उसी तरह अमेरिका के अधिकांश अश्वेत रिपब्लिकन पार्टी के विरोधी है और डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक हैं। इस बात का ख्याल करते हुए मुस्लिम और अश्वेत विरोधी मुद्दे उछाल कर ट्रंप भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण करा रहे हैं। इस साल नवंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव होना है। मौजूदा राष्ट्रपति बराक ओबामा चुनाव मैदान में नहीं है। अमेरिका में संवैधानिक व्यवस्था है कि एक उम्मीदवार केवल दो बार ही राष्ट्रपति का चुनाव लड सकता है। बराक ओबामा लगातार दो बार बतौर डेमोक्रेटिक पार्टी उम्मीदवार अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जा चुके हैं, इसलिए वे तीसरी बार चुनाव नहीं लड सकते। डेमोक्रेटिक पार्टी से पूर्व राष्ट्रपति और बिल क्लिंटन की पत्नी पूर्व विदेश मंत्री हिलेरी अग्रणी उम्मीदवार है और उनकी उम्मीदवार भी करीब-करीब तय मानी जा रही है। डेमोक्रटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने के लिए हिलेरी एक कदम दूर है। उम्मीदवारी पाने के लिए कुल 4763 डेलिगेटस मेंसे 2383 के समर्थन की जरुरत होती है और हिलेरी को अभी तक 2306 का समर्थन मिल चुका है। पार्टी में उनके प्रमुख विरोधी बर्नी सैंडर्स को 1539 डेलिगेटस का समर्थन है। बहरहाल, वीरवार को ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी पक्की होने के साथ ही उनके विरोधियों के होश फाख्ता हो गए हैं। विषेशतय, उन लोगों के जो ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने पर अमेरिका छोड जाने की धमकी देते रहे हैं। हाल ही में कराए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार (मॉर्निंग कनस्लट- वॉकस पोल) 28 फीसदी अमेरिकी ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने पर अमेरिका छोड सकते हैं। गुगल की रिपोर्ट के अनुसार इस साल मार्च में ट्रंप द्वारा सात प्राइमरी में जीत दर्ज करने के तुरंत बाद अमेरिकियों द्वारा कनाडा बस जाने की सर्च में 350 फीसदी का इजाफा हुआ था। लोगों की इस मानसिकता के चलते पॉपर्टी एजेंट अखबारों और सोशल मीडिया पर “ गिव मी ए कॉल, आई केन हेल्प यू सैल युअर हाउस“ के विज्ञापन देकर बहती गंगा मे हाथ धो रहे हैं। अरबपति सफल बिजनेसमैन डोनाल्ड ट्रंप की शख्सियत जितनी विवादित है, उतनी ही विवादित उनकी सोच और बोल हैं। कोई उहें नाजी मानता है तो कोई लंपट। अधिकतर घरेलू महिलाएं उन्हें नापसंद करती हैं। सार्वजनिक मंचों से वे उल-जलूल बातें करते रहे हैं। अपनी रंगीली तबियत के लिए ट्रंप खासे चर्चित रहे हैं। तीन बार विवाहित ट्रंप के अनेक महिलाओ से संबंध रहे हैं। उदार अमेरिकी समाज में हालांकि इसे भारत की तरह बुरा नहीं माना जाता मगर राष्ट्रपति के उम्मीदवार के लिए यह आडे आ सकती है। तथापि ट्रंप का जितना तल्ख विरोध हो रहा है, उतनी ही तेजी से वे अमेरिकी जनमानस में लोकप्रिय हो रहे हैं। मार्च में ट्रंप डेमोक्रेटिक फ्रंट-रनर हिलेरी क्लिंटन से काफी पीछे थे मगर मई आते-आते वे अपने प्रमुख प्रतिद्धंद्धी को भी पीछे छोड गए है। चुनाव एनालिस्ट्स का आकलन है कि नवंबर तक ट्रंप हिलेरी से काफी आगे निकल जाएंगे। इसकी प्रमुख वजह है कि श्वेत अमेरिकी भी ट्रंप को उतना पसंद नहीं करते हैं, जितना हिलेरी किलंटन को नापसंद करते है। इसी कारण डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जीत सकते हैं। वैसे भी डेमोक्रेटिक उम्मीदवार पिछले दो टर्म से लगातार राष्ट्रपति चुनाव जीत रहे हैं। इस बार रिपब्लिकन की बारी है।
शुक्रवार, 27 मई 2016
अच्छे दिन कब आएंगे?
Posted on 7:02 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत राजग सरकार ने दो साल पूरे कर लिए हैं। किसी भी सरकार की परफॉरमेंस का आकलन करने के लिए दो साल का समय पर्याप्त होता है। भारत में पांच साल के लिए सरकार चुनी जाती है और इतने ही समय में सरकार को अपने चुनावी वायदे पूरे करने पडते हैं। मोदी सरकार के अब तीन साल बचे हैं। दो साल में मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड इतना भी बुरा नहीं है, सिवा इसके कि प्रमुख चुनावी वायदे अभी पूरे किए जाने बाकी हैं। चुनावी वायदे पूरे करने के लिए सरकार को पांच साल का समय दिया जाना चाहिए। दो साल में मोदी सरकार की सबसे बडी उपलब्धि यह रही है कि देश को घोटालों से निजात मिली है। संप्रग सरकार के कार्यकाल में घोटाला-दर-घोटाले का अनावरण होने से देश का सर नीचा हो रहा था, अब ऐसा नहीं हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने “न खुद खाऊंगा, न औरो को खाने दूंगा“ का वायदा पूरा किया है। मगर शीर्ष स्तर पर भले ही करप्शन (मिटी नहीं) गई हो मगर निचले स्तर पर घूसखोरी अभी भी बदस्तूर जारी है। राजस्व विभाग के कर्मी सरेआम संपति की रजिस्ट्री करते समय घूस लेते हैं और धडल्ले से कहते हैं “ पैसा ऊपर तक जाता है“। पंजाब तो इस मामले में खासा बदनाम है। पुलिसिए मामला दबाने के लिए खुलेआम घूस मांगते है। बिजली, पानी, राशन कार्ड बगैर घूस दिए नहीं मिलते। घूसखोर इंस्पेक्टरी राज अभी कायम है। सडक किनारे पानी-बीडी बेचने वालों से लेकर रेहडी-ठैले लगाने वालों से बाकायदा घूस ली जाती है। ट्रक ड्राइवर को पुलिस वाले को हफ्ता देना पडता है और इसकी बाकायदा डायरी में ऐंट्री की जाती है। कुल मिलाकर, रोजमर्रा की जिंदगी से जुडे हर मामले में घूस का बोलबाला है। आम आदमी के लिए शीर्ष स्तर पर के घोटाले ज्यादा मायने नहीं रखते क्योंकि इनसे उसका प्रत्यक्ष कोई सरोकार नहीं है। वह निचले स्तर के भ्रश्टाचार से आजिज आ चुका है। वैसे प्रधानमंत्री ने सहारनपुर की रैली में खुद अपना दो साल का रिपोर्ट कार्ड पढा है। मोदी के अनुसार पूर्व की सरकारों ने रसोई गैस जैसी बुनियादी जरुरत को भी अमीरों की सुविधा बना रखा था। झोपड-पट्टी में रहने वाले गरीब को रसोई गैस सपने जैसी लगती थी। उनकी सरकार ने पहली बार गरीब को रसोई गैस की सुविधा दी है। किसानों को फसल बीमा योजना और सॉयल टेस्टिंग कार्ड दिया गया है और गन्ना उत्पादकों का सारा बकाया चुकता कर दिया गया है। मगर प्रधानमंत्री ने भी माना कि निश्चित सिंचाई की सुविधा अभी भी किसानों से कोसों दूर है। किसानों को अगर सिंचाई सुविधा मिल जाती है, तो वे खेतों में सोना उगा सकते हैं। यानी किसान की सबसे बडी जरुरत अभी भी पूरी की जानी बाकी है। प्रधानमंत्री ने आश्वासन दिया है कि आजादी के 75 साल पूरे होने (2022) तक किसानों और गरीब परिवार की आय दोगुनी हो जाएगी। प्रधानमंत्री ने केन्द्र और राज्यों के संबंधों का भी उल्लेख किया है। अभी तक 65 फीसदी वित्तीय संसाधन केन्द्र के पास होते थे और 35 फीसदी राज्यों के पास। मोदी सरकार ने इसे बदल दिया है। अब 35 फीसदी केन्द्र के पास हैं, 65 फीसदी राज्यों के पास। मोदी कहते हैं वे प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि प्रधान सेवक है। मोदी की इस तरह की विनम्रता से ही लोग-बाग उनके कायल हैं। मगर कहते हैं लच्छेदार बातों से पेट नहीं भरता। भरपूर पेट भरने के लिए रोजगार चाहिए और महंगाई पर नियंत्रण। बहरहाल, आम आदमी अभी भी मोदी सरकार से “अच्छे दिन“ की उम्मीद कर रहा है। और उसके अच्छे दिन तभी आएंगे जब खाने-पीने की चीजें सस्ती हों; गरीब और मध्यम वर्ग को पक्का रोजगार, स्थायी आमदन और बुढापे में पेंशन मिले। आंकडों में भले ही मुद्रा-स्फीति कम हुई है मगर दाल, फल-सब्जी, दूध, आटा जैसी पेट भरने के लिए जरुरी चीजों के दाम कम होने की बजाए बढते ही जा रहे हैं। कर्ज भी महंगा है, इसलिए मैन्युफेक्चर्गि सेक्टर उठ नहीं पा रहा है और संतोशजनक रोजगार सृजन भी नहीं हो पा रहा है। आम आदमी बस एक ही सवाल करता है“ मोदी जी अच्छे दिन कब आएंगे“ ?
गुरुवार, 26 मई 2016
नीट पर “बदनीयत“
Posted on 7:54 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार ने कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा (मेडिकल एंट्रेस टेस्ट- नीट) को एक साल टालने के लिए अध्यादेश जारी करके कोई बडा काम नहीं किया है। मंगलवार को राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृति दिए जाने के बाद इस आशय का अध्यादेश जारी कर दिया गया। राष्ट्रपति के पास किसी भी अध्यादेश को स्वीकृत करने के अलावा कोई चारा नहीं होता है। संवैधानिक व्यवस्था है कि राष्ट्रपति को सरकार (मंत्रिमंडल) के हर अच्छे-बुरे , सही-गलत फैसले पर अपनी मुहर लगानी ही पडती है। राष्ट्रपति ज्यादा-से-ज्यादा सरकार से सिर्फ एक बार स्पष्टीकरण मांग सकते है। सरकार का जो भी स्पष्टीकरण हो, इसके बाद राष्ट्रपति को अध्यादेश पर आंख मूंद कर हस्ताक्षर करने पडते हैं। केन्द्रीय स्वास्थय मंत्री जेपी नड्डा ने सोमवार को राष्ट्रपति से मिलकर सरकार का पक्ष रखा और उन कारणों को गिनाया, जिनके चलते सरकार को एक साल के लिए कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा को टालना पड रहा है। राष्ट्रपति संतुष्ट न भी हों, उन्हें इसके बाद अध्यादेश को स्वीकृति देनी ही पडती है। यही भारत का संविधान है। अध्यादेश के लागू होते ही सरकारी मेडिकल कॉलेजों को अलग से मेडिकल एंट्रेस टेस्ट लेने की छूट होगी। मगर प्राइवेट कॉलेजों पर यह छूट लागू नहीं होगी। उन्हें नीट के तहत ही दाखिला देना पडेगा। यह छूट केवल एक साल के लिए है। अगले साल से देश भर में मेडिकल कॉलिजों के दाखिले कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा के आधार पर ही दिए जाएंगें। सवाल यह है कि एक साल का विलंब भी क्यों और वह भी केवल सरकारी मेडिकल कालिजों के लिए? अगर प्राइवेट कॉलेज कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा के तहत दाखिला दे सकते हैं तो सरकारी मेडिकल कॉलेज क्यों नही। और यह क्या बात हुई कि एक ही राज्य में सरकारी मेडिकल कॉलेजों का दाखिला राज्य की प्रवेश परीक्षा से हो और प्राइवेट कालिजों का दाखिला नीट से। जाहिर है सरकार दोहरे मानदंड अपना रही है। इस छूट के बावजूद दिल्ली में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मेडिकल दाखिले कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा के आधार पर देने का ऐलान किया है। अगर दिल्ली सरकार ऐसा कर सकती है, तो बाकी राज्य क्यों नहीं कर सकते? देश की शीर्ष अदालत ने इस साल से ही पूरे देश में मेडिकल कालिजों में दाखिले के लिए कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा-नीट को अनिवार्य कर दिया था। बहरहाल, इस पूरे मामले में अदालत की कभी “हां“ तो कभी “ना“ ने न केवल छात्रों को , अलबता राज्यों की सरकारों को भी पशोपेश में डाल रखा है। वेसे, पूरे देश में कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा का आइडिया केन्द्र सरकार का है। मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने मूलतः कॉमन मेडिकल प्रवेश परीक्षा 2012 से शुरु करने का ऐलान किया था मगर सीबीएसई तब इसके लिए तैयार नहीं थी। इसके अलावा आंध्र प्रदेश , कर्नाटक, तमिल नाडु, गुजरात और पश्चिम बंगाल ने इस बिला पर नीट का विरोध किया कि उनके और एमसीआई के पाठयक्रम में जमीन आसमान का अंतर है। इसके बाद नीट को एक साल के लिए टाल दिया गया। 5 मई 2013 को पहली बार पूरे देश में कॉमन मेडिकल एंट्रेस टेस्ट (नीट) लिया गया। मगर कुछ लोग नीट के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय चले गए और 18 जुलाई 2013 को न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी। न्यायालय ने यह व्यवस्था भी दी कि एमसीआई को मेडिकल कॉलेजों की प्रवेश प्रकिया में दखल देना का कोई अधिकार नहीं है। इस फैसले के बाद 2013 की नीट परीक्षा के परिणाम अधर में लटक गए। सीबीएसई ने मेरिट लिस्ट बनाई, इसके हिसाब से दाखिले भी हुए मगर मामला अदालत के विचाराधीन था, इसलिए छात्रों के भविष्य पर अनिश्चितता की तलवार लटकती रही। अब कही जाकर 11अप्रैल, 2016 को सर्वोच्च न्यायालय की पांच-सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने मेडिकल एंट्रेस टेस्ट-नीट को अनिवार्य कर दिया है। बहरहाल, नीट को लेकर अनिश्चितता की स्थिति ने छात्रों के करियर से खासा खिलवाड किया है। अब यह अनिश्चितता हमेशा के लिए खत्म हो जानी चाहिए।
बुधवार, 25 मई 2016
चाबहार पोर्टः पाक को झटका
Posted on 7:16 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत का किसी भी क्षेत्रीय ताकत से सामरिक ( स्ट्रेटेजिक) सहयोग पाकिस्तान को हर सूरत में प्रभावित करता है। भारतीय उपमहाद्धीप में पडोसी पाकिस्तान भारत का सबसे बडा प्रतिद्धंद्धी है और दोनों ही एक-दूसरे पर भारी पडने की हर चंद कोशिश करते रहते हैं। ईरान और अफगानिस्तान के साथ चाबहार पोर्ट पर सहयोग भारत के लिए सामरिक दृष्टि से जितना अहम है, पाकिस्तान और चीन के लिए उतना ही बडा झटका। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को ईरान यात्रा के दौरान चाबहार पोर्ट करार को अंतिम रुप दिया। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भी इस अवसर पर मौजूद थे। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध के कारण यह डील सालों से रुकी पडी थी। भारत नब्बे के दशक में चाबहार पोर्ट का आंशिक निर्माण कर चुका है। मगर बाद में किन्ही कारणों से इस पोर्ट का निर्माण आगे नहीं बढ पाया। दक्षिणपूर्व ईरान के चाबहार शहर में यह बंदरगाह ओमान की खाडी में स्थित है और इसके निर्माण से भारत को मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप से व्यापार करने का सुगम रास्ता मिल जाएगा। अभी तक भारत को मध्य एशिया और खाडी देशों में व्यापार के लिए पाकिस्तान होकर जाना पडता था। पाकिस्तान वक्त-बेवक्त सौ तरह के अडंगे अडाया करता है । इस पोर्ट के बनने से भारत को अफगानिस्तान से व्यापार करने का भी सीधा रास्ता मिल जाएगा। जाहिर है इस पोर्ट केे खुलने के बाद पाकिस्तान अलग-थलग पड जाएगा और भारत और अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक रिश्ते और मजबूत होंगे। भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच बढता आर्थिक और सामरिक सहयोग पाकिस्तान के लिए बढा खतरा है। चीन भले ही न माने, भारत की तरह ईरान और अफगानिस्तान भी यही मानते हैं कि क्षेत्र में जो आतंक को फैलाने में पाकिस्तान की आईएसआई का बहुत बडा हाथ है। इस स्थिति में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंक से जुडे मुद्दों को उठाने के लिए भारत को ईरान का सहयोग मिल सकता है। अभी तक भारत जब कभी भी ऐसे मुद्दे उठाता रहा है, पाकिस्तान अरब जगत के माध्यम से उसे मात देता रहा है। पाकिस्तान मुस्लिम जगत में खुद को बडी इस्लामिक ताकत के रुप में पेश कर रहा है। परमाणु ताकत बनने के बाद वह इस मकसद में कुछ हद तक सफल भी हुआ है। अमेरिकी प्रतिबंध उठने के बाद से ईरान नई ताकत के रुप में उभरा है। इस दृष्टि से ईरान पाकिस्तान का प्रतिद्धंद्धी है। ईरान आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक तौर पर भी बडी ताकत माना जाता है। ईरान और भारत के दोस्ताना संबंध पाकिस्तान को खासी चुभन दे सकते हैं। बहरहाल, चीन की पाकिस्तान के ग्वादर में पोर्ट बनाने में जैसी भूमिका रही है, वैसी ही भूमिका भारत की चाबहार पोर्ट में है। भारत अब तक इस पोर्ट के निर्माण पर 10 करोड डालर का निवेश कर चुका है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने 50 करोड डालर और निवेश करने का वायदा किया है। ग्वादर पोर्ट के बनने से पाकिस्तान इस बात पर इतरा रहा था कि उसने भारत से सामरिक बढत ले ली है मगर चाहबार पोर्ट के पूरा होने से उसकी इन उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। बहरहाल, ईरान के साथ भारत के दोस्ताना संबंध दोनों देशों को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकते हैं। दोनों देश सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक तौर पर समृद्ध और विविध हैं और इस लिहाज से एक-दूसरे के करीब भी हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने संबोधन में इस बात का उल्लेख भी किया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच दोस्ताना संबंध उतने ही पुराने हैं जितना पुराना इतिहास। चाहबार करार से भारत और ईरान के बीच सहयोग का नया अध्याय लिखा गया है। इससे न केवल भारत और ईरान को, बल्कि समूचे मध्य एषिया को सामरिक फायदा होगा। इस करार की सफलता पर प्रधानमंत्री ने मिर्जा गालिब का यह शे र पढा,“ नूनत गरबे नफ्से-खुद तमाम अस्त। जे-काशी पा-बे काशान नीम गाम अस्त“। यानी अगर हम मन मे ठान लें , तो काशी और काशम के बीच की दूरी केवल आधा कदम रह जाएगी। भारत और ईरान के बीच ताजा संबधों पर यह शेर सटीक बैठता है।
मंगलवार, 24 मई 2016
“युवा” अध्यक्ष बनाम लोढा समिति
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भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर का 41 साल की उमर में निर्विरोध भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) का अध्यक्ष चुने जाने से हिमाचल प्रदेश का सर गर्व से ऊंचा हुआ है। अब तक बीसीसीआई का अध्यक्ष पद तक पहुंचना तो दीगर रहा, दुनिया के इस अमीरतम खेल बॉडी में माकूल नुमाइंदगी हासिल करना भी हिमाचल प्रदेश के लिए मुमकिन नहीं हो रहा था। देश की बडी-बडी क्रिकेट बॉडीज की तुलना में हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ की कोई हैसियत नहीं है। तथापि , अनुराग ठाकुर की बदौलत हिमाचल प्रदेश ने वह मुकाम हासिल किया है, जिसकी वह कल्पना भी नही करता था। वे बीसीसीआई के दूसरे युवातम अध्यक्ष हैं। 56 साल पहले 1963 में फतेह सिंह गायकवाड 33 साल की उमर में बीसीसीआई के युवातम अध्यक्ष बने थे। अनुराग ठाकुर 25 साल की उमर में हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोशिएशन के युवातम अध्यक्ष चुने गए थे। यह भी एक रिकार्ड है। ठाकुर को धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय स्तर का क्रिकेट स्टेडियम बनाने का श्रेय भी जाता है। यह स्टेडियम देश में सबसे अधिक ऊंचाई पर बनाया गया पहला अंतरराष्ट्रीय स्तर का स्टेडियम है। इसी स्टेडियम की जमीन को लेकर हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने उन पर विजिलेंस का मामला चला रखा है। अनुराग ठाकुर पूर्व मुख्यमंत्री प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल के सुपुत्र हैं। वे भारतीय युवा मोर्चे के अध्यक्ष भी हैं। बहरहाल, अनुराग ठाकुर ने नाजुक समय में बीसीसीआई अध्यक्ष पद संभाला है। उन पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त जस्टिस (रिटायर्ड) आरएम लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने का दबाव रहेगा। समिति की एक अहम सिफारिश यह है कि सियासी नेताओं को बीसीसीआई समेत सभी स्पोर्टस बॉडी से दूर रखा जाना चाहिए। विडंबना यह है कि अनुराग ठाकुर खुद कद्दावर सियासी नेता हैं हालांकि अनुराग ठाकुर क्रिकेट से अंतरंग तौर पर जुडे रहे हैं। 2000-01 सीजन के दौरान ठाकुर ने फर्स्ट क्लास मैच में हिस्सा लिया था। तब अनुराग हिमाचल प्रदेश क्रिकेट टीम के कप्तान थे। शशांक मनोहर द्वारा बीसीसीआई अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिए जाने के कारण खाली हुए पद पर अनुराग ठाकुर चुने गए हैं। शशांक मनोहर की छवि साफ रही है। अक्टूबर 2015 में जगमोहन डालमिया के निधन पर “मिस्टर क्लीन“ मनोहर बीसीसीआई अध्यक्ष बने थे। नवंबर 2015 में शशांक मनोहर एन श्रीनिवासन की जगह आईसीआई के चेयरमैन बने थे। उन्हे हाल ही में आईसीसी के “एक पद, एक व्यक्ति“ सिद्धांत के कारण बीसीसीआई अध्यक्ष पद छोडना पडा । बहरहाल, अनुराग ठाकुर के अध्यक्ष पद पर चुने जाने से लोढा समिति की सिफारिशों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। निसंदेह, देश में क्रिकेट समेत तमाम खेल संगठनों को सियासी नेताओं के शिकंजे से मुक्त करने की अविलंब जरुरत है। न्यायपालिका ने इस दिशा में सार्थक पहल की है मगर देश के सियासतदान इस पर पानी फेरने पर आमादा है। अनुराग ठाकुर बेशक क्रिकेट से जुडे हैं मगर उनकी पहचान क्रिकेट से कहीं ज्यादा राजनीति से है। ठाकुर 2008 से लगातार हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर लोकसभाई हलके से भाजपा के सांसद चुने जाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अगर महान क्रिकेट खिलाडी सुनील गावस्कर अथवा शिवलाल यादव को बीसीसीआई का अंतरिम अधयक्ष बनाया जा सकता है, तो फिर सचिन तेंडुलकर जैसे महान खिलाडी क्यों नहीं? दरअसल, देश में खेल संगठनों का ढांचा ऐसा है कि इनमें प्रतिभा अथवा योग्यता की जगह रसूख और मनी पॉवर का दबदबा रहता है। इसीलिए सियासी नेता और उधोगपति बीसीसीआई और अन्य खेल संगठनों पर कब्जा जमाने में सफल हो जाते हैं। स्पोटर्स बॉडीज को सियासी नेताओं और धन्नासेठों के कब्जे से मुक्त कराने के लिए वैधानिक कवच की जरुरत है। लोढा समिति ने भी ऐसी सिफारिश की है। मगर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या मोदी सरकार ऐसा कर पाएगी?
मंगलवार, 17 मई 2016
ऐसे तो चीन कभी नहीं सुधरेगा
Posted on 7:28 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय जनमानस के बारे यह पक्की धारणा है कि वह दो बातों की जरुर परवाह करता है। पहली और अहम बात यह कि उसकी जेब में कितना पैसा आता है। साफ शब्दों में कहा जाए तो नौकरी, महंगाई और सुविधाएं आम आदमी के लिए सबसे ज्यादा मायने रखती हैं। दूसरी बात यह है कि सरकार में कितना दमखम है और पडोसी मुल्क पाकिस्तान और चीन के साथ सरकार कैसे निपटती है। पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध की न तो भारत में बहुत ज्यादा उम्मीद है और न ही पाकिस्तान में। भारतीय अवाम यह सच्चाई अच्छी तरह जानती है कि अगर पाकिस्तान को भारत के साथ भाईचारा ही रखना होता, तो वह भारत से अलग क्यों होता? यही जमीनी हकीकत है और पाकिस्तान के साथ द्धिपक्षीय संबंधों की बुनियाद भी इसी सोच पर आधारित है। भारत लाख प्रयास कर ले पाकिस्तान शक्तिशाली भारत के वजूद को कभी नहीं मानेगा और इसी मकसद से वह चीन की शरण में गया है। भारत के लिए यही सबसे बडा खतरा है। पाकिस्तान की सैन्य शक्ति से निपटना भारत के लिए ज्यादा कठिन नहीं है मगर चीन और पाकिस्तान की साझी सैन्य ताकत का मुकाबला करना भारत के लिए आसान नहीं है। चीन की उपनिवेशवादी मानसिकता भारत के लिए सबसे बडा खतरा है। विवादित दक्षिण चीनी सागर में चीन की बढती सैन्य उपस्थित इस बात का प्रमाण है। चीन की इस हिमाकत से न केवल जापान और विएतनाम ही, बल्कि अमेरिका भी बौखलाया हुआ है। मगर सिवा धमकी देने अथवा वक्तव्य जरी करने के अलावा वे कुछ कर नहीं सकते। चीन पूरे एशिया में अपना प्रभुत्व जमाना चाहता है। चीन लगातार अपनी सैन्य शक्ति भी बढा रहा है हालांकि भारत और जापान भी पीछे नहीं है। अमेरिकी के रक्षा मंत्रालय पैटागन ने गत शुक्रवार को जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि चीन ने हाल ही में अपनी सैन्य शक्ति में खासा इजाफा किया है और भारत के साथ लगती सीमा पर और ज्यादा सैनिको को तैनात किया है। चीन ने हालांकि इस रिपोर्ट की निंदा करते हुए कहा है कि अमेरिका उसकी दक्षिण चीनी सागर में उपस्थिति से बौखलाया हुआ है और इसलिए जानबूझकर दो पडोसी मुल्कों के बीच अविश्वास का माहौल बना रहा है। पेंटागन ने अपनी रिपोर्ट में यह आशंका भी जताई है कि चीन दक्षिण चीनी सागर में इस साल बडे पैमाने कम्युनिकेशन और सर्विलेंस सिस्टम को मजबूत करके अपनी सैन्य ताकत बढाएगा। चीन के रक्षा मंत्रालय ने पेंटागन की रिपोर्ट को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिका को उसकी अपनी करनी का खौफ सता रहा है, न कि चीन की बढती सैन्य ताकत का। चीन का कहना है कि सालों से उसकी नेशनल डिफेंस पॉलिसी रही है और इस पॉलिसी का मूल मकसद किसी पर आक्रमण करना नहीं, बल्कि अपनी संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा करना है। चीन की इस बात पर किसी को विष्वास नहीं है। चीनी काइंया कूटनीतिज्ञ माने जाते हैं। वे कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं। भारत चीन से कई बार धोखा खा चुका है। 1962 में “हिंदी-चीनी भाई भाई” कहकर चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया था। 1967 में चीनी सेना सिक्कम में घुस आई थी। सिक्कम तब संप्रभु राज्य हुआ करता था और इसके बाद ही उसका भारत में विलय हुआ था। अरुणाचल प्रदेश को चीन आज भी विवादित क्षेत्र मानता है। 3,225 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा को लेकर चीन से आज तक समझौता नहीं हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र में अक्सर चीन भारत का विरोध करता है और पाकिस्तान का साथ देता है। भारत को न्यूक्लियर सप्लायर गु्रप में नहीं आने देने के लिए चीन ऐडी-चोटी का जोर लगाए हुए है़। पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश -ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा प्रतिबंधित करने की भारत के हर प्रयास पर चीन हर बार पानी फेर देता है। भारत को छकाना तो जैसे चीन की फितरत है। बहरहाल, चीन के बढती उपनिवेश वादी भूख से निपटने के लिए भारत को जापान और अमेरिका से हाथ मिलाना होगा। अमेरिका और जापान दक्षिण चीनी सागर में चीन की बढती सैन्य उपस्थिति से परेशान है । भारत के लिए भी यह बढा खतरा है। भारत को पाकिस्तान से इतना खतरा नहीं है, जितना चीन से। आंखे दिखाने से ही ड्रैगन को रास्ते पर लाया जा सकता है।
रविवार, 15 मई 2016
How To Fight Pollution?
Posted on 5:43 pm by mnfaindia.blogspot.com/
इस बात पर ज्यादा इतराने की जरुरत नहीं है कि देश की राजधानी दिल्ली अब दुनिया का सर्वाधिक प्रदूषित शहर नहीं रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डव्ल्यूएचओ) की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि दिल्ली की आबो-हवा में सुधार आया है और अब यह नौंवे स्थान पर पहुंच गई है। निसंदेह, सीएनजी और सम-विषम स्कीम ने दिल्ली में प्रदूषण कम करने में अहम भूमिका निभाई है और अब स्मार्ट सिटी से प्रदूषण के और कम होने की उम्मीद की जा सकती है। डव्ल्यूएचओ ने प्रदूषण से निपटने के लिए भारत के प्रयासों की सराहना भी की है। मगर यह बात इतनी सुकून देने वाली नहीं है जितनी ड्ब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट का यह खुलासा कि दुनिया के सर्वाधिक बीस प्रदूषित जगहों में दस तो भारतीय शहर हैं। और सर्वाधिक पहले पांच शहरों में चार भारत के हैं। इनमें ग्वालियर, इलाहाबाद, रायपुर और पटना शामिल हैं। पंजाब के खन्ना और लुधियाना भी प्रदूषित शहरों की श्रेणी में शामिल हो गए हैं। आधुनिक भारत में प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बडा खतरा बनता जा रहा है। दिल्ली में हर साल दस हजार से ज्यादा लोग प्रदूषण जनित रोगों से मरते हैं। और पूरी दुनिया में हर साल 70 लाख लोग वायु प्रदूषण से मरते हैं। इन मेंसे तीस लाख लोग बाहर की जहरीली हवा से मारे जाते हैं। भारत में 55 फीसदी लोग प्रदूषण से पीडित हैं । वायु प्रदूषण लोगों की सेहत बिगाडने वाले दस प्रमुख खतरनाक कारणों में शुमार है। सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती यह हे कि बडे-तो-बडे, छोटे श हर भी उत्तरोतर प्रदूषण की चपेट में आ रहे हैं। संसद के बजट सत्र में सरकार ने माना था कि देश के कई छोटे शहर भी प्रदूषण की जद में आ रहे हैं। पंजाब और हिमाचल समेत देश के टियर-दो के 74 शहरों मेंसे 41 व्यापक स्तर पर वायु और जल प्रदूशण की समस्या से जूझ रहे हैं। बढती आबादी, बेतरतीब निर्माण, गरीबी और देहातों से शहरों की ओर बढता पलायन जैसे प्रमुख कारण है, जिनसे शहरों में प्रदूषण बढता है। महानगरों में बढती वाहनों की संख्या प्रदूषण बढाने का प्रमुख कारण है तो देहातों में जल प्रदूषण की समस्या भी है। देश के अधिकांश शहरों और बस्तियों मे पीने का पानी प्रदूषित पाया गया है। एशियन डवलपमेंट बैंक की 2007 की रिपोर्ट के मुताबिक भारते के बडे शहरों में भी शुद्ध पीने के पानी की सप्लाई नहीं की जाती है, छोटे शहरों की हालत तो और भी खराब है। नदी -नालों पर निर्भर गा्रमीण क्षेत्रों का और भी बुरा हाल है। अधिकतर पेयजल के परंपरागत स्त्रोत पूरी तरह से प्रदूषित हो चुके हैं। राष्ट्रीय अस्मिता से जुडी गंगा का पानी बिल्कुल पीने लायक नहीं है। गंगा को प्रदूषण से बचाने के लिए हालांकि बडी-बडी योजनाएं शुरू की गई है मगर इसका प्रदूषण बढता ही जा रहा है। गंगा- यमुना के संगम इलाहाबाद शहर का विश्व के चार सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शामिल होना इस बात का प्रमाण है। इसी तरह गंगा के तट पर बसे बिहार की राजधानी पटना का भी इलाहाबाद के साथ सर्वाधिक प्रदषित शहरों में शामिल होना भी यही दर्शाता है कि गंगा और ज्यादा प्रदूषित होती जा रही है। भारत में प्रदषित पेयजल 22 फीसदी संचारी (क्म्युनिकेबल) रोगों के लिए जिम्मेदार है। 2012 में 3,883 लोग प्रदषित पीने के पानी के कारण मारे गए थे। बहरहाल, बढते प्रदूषण से उभरते शहरों और बस्तियों को कैसे बचाया जाए, सरकार को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। मोदी सरकार की “स्मार्ट सिटी “ योजना प्रदूषण रोकने के लिए कारगर साबित हो सकती है। पर भारत में महत्वाकांक्षी योजनाओं के कार्यन्वयन का हश्र संतोषजनक नहीं रहा है । बडी-बडी योजनाए जमीनी सच्चाई से कहीं दूर वातानुकुलित कमरों के भीतर तैयार की जाती हैं। अनावश्यक विलंब, लालफीताशाही और करप्ट तंत्र से अततः सब कुछ गुड-गोबर हो जाया करता है। गंगा को स्वच्छ बनाने की मोदी सरकार की योजना इस बात का प्रमाण है। स्मार्ट योजनाएं चलाने और उनके सफल कार्यन्वयन के लिए राजनीतिक स्वार्थ से मुक्त स्मार्ट सोच, स्मार्ट कार्यशैली और स्मार्ट इच्छा शक्ति की दरकार है। प्रदूषण से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर उपाय करने की जरुरत है । यह तभी मुमकिन हो पाएगा जब सरकार स्वार्थ की राजनीति से उपर उठकर निस्वार्थ भावना से काम करे।
शुक्रवार, 13 मई 2016
सूखे पर “सूखी“ चिंता
Posted on 8:44 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश में व्याप्त सूखे से कैसे निपटा जाए, अगर यह बात भी न्यायपालिका को ही बतानी पडे तो सरकार किस काम? बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने सूखे की स्थिति पर केन्द्र और राज्यों की सरकारों के “शुतुरमुर्ग जैसे रवैए“ पर कडी फटकार लगाई। न्यायालय ने साफ शब्दों में कहा कि केन्द्र और राज्यों की सरकारे अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती। देश के शीर्ष स्वत्रंतता सेनानी बाल गंगाधर तिलक को उद्धृत करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा “ समस्या संसाधनों अथवा क्षमता की कमी की नहीं है, बल्कि इच्छा शक्ति की कमी की है“। यानी देश की शीर्ष अदालत ने भी माना है कि सूखे पर केन्द्र और राज्यों में इच्छा शक्ति की कमी है। और सच भी यही है कि समकालीन सियासतदानों में आम आदमी से जुडे ज्वलंत मुद्दों को निपटाने के लिए इच्छा शक्ति की कमी है। इसी कारण अधिकतर समस्याओं का संजीदगी से हल नहीं ढूंढा जाता। राज्य सूखे की स्थिति को लेकर कितने गंभीर हैं, इसका पता इसी बात से चलता है कि बिहार, गुजरात और हरियाणा अभी तक यह तय नहीं कर पाएं है कि इन राज्यों में सूखा पडा भी है या नहीं। इसके लिए भी न्यायालय को केंद्रीय कृषि सचिव को इन राज्यों के मुख्य सचिवों से बैठक करने के निर्देश देने पड हैं। इसी वजह सूखे पर सर्वोच्च न्यायालय को कहना पडा कि यदि केन्द्र और राज्यों की सरकारें सूखे से उत्पन्न संकट पर कारगर कदम उठाए में नाकाम रहती हैं, तो न्यायालय उचित निर्देश जारी करने के लिए बाध्य हो सकता है। न्यायालय ने केन्द्र को सूखे पर तीन माह के भीतर राष्ट्रीय आपदा राहत कोष स्थापित करने एवं स्पेशल टास्क फोर्स तथा राष्ट्रीय योजना बनाने के निर्देश दिए हैं। यह स्थिति और भी दुखद है कि बार-बार सूखे पडने के बावजूद आज तक इससे निपटने के लिए कोई राष्ट्रीय योजना नहीं बन पाई है। सूखे को लेकर केन्द्र और राज्यों की उदासीन रवैए से यही निष्कर्ष निकलता है जैसे सूखा पीडित राज्यों में “प्रशासन और सरकार“ पर भी सूखे की मार पडी है। वैसे देश की समकालीन सरकार का प्राकृतिक आपदा के समय तहस-नहस अथवा नाकाम हो जाना नई बात नहीं है। जून 2013 में उत्तराखंड में आई प्रलंयकारी बाढ के समय तत्कालीन बहुगुणा सरकार पीडितों की समय पर मदद करने अथवा राहत पहुंचाने में बुरी तरह विफल रही थी। तब सेना को ही आगे आना पडा था। सेना ने बाढ में फंसे 110,000 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला था। सितंबर, 2014 में कश्मीर घाटी में आई बाढ में राज्य का प्रशासनिक अमला भी डूब गया था और कई दिनों तक सरकार कहीं नजर नहीं आई थी। महाराष्ट्र के लातूर जिले में इन दिनों भीषण सूखा पडा है और लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं मगर भरष्ट नौकरशाही पानी को अमीरों को बेच रही है। सियासी नेता चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। संसद के बजट सत्र के दौरान भी बमुश्किल कुछ देर के लिए एक-आध बार सूखे पर चर्चा हुई। संसद में सूखे से कही ज्यादा उत्तराखंड, श्रीनगर स्थित एनआईटी और अगस्तावेस्टलैंड मामले छाए रहे। उत्तर प्रदेश से भाजपा सांसद भैरो प्रसाद मिश्रा कई बार लोकसभा में सूखे पर चर्चा की मांग करते रहे मगर उनकी आवाज अन्य ममालों में दबकर रह गई। देश के दस राज्यों में जबरदस्त सूखा पडा है। एक तिहाई क्षेत्र में लगभग अकाल जैसी स्थिति है। न पीने को पानी है और न ही रोजगार। खाने के लाले पडे हैं मगर जनता के नुमाइदों को वातानुकूलित संसद में सूखे पर एकमत से आपातकालीन उपाय करने के लिए प्रस्ताव पारित करने की फुर्सत तक नहीं मिली। हर बार की तरह इस बार भी न्यायपालिका को ही पहल करनी पडी। सूखे से देश को 6.50 लाख करोड रुपए के नुकसान होने का अनुमान है। अभी बरसात आने तक तीन सप्ताह लग सकते हैं, इसलिए नुकसन बढ सकता है। सूखा पीडित मराठवाडा में बरसात में भी बहुत ज्यादा पानी नहीं बरसता है। पिछले कई सालों से यह क्षेत्र भीषण सूखे से पीडित हैं। यही हाल तेलंगाना, ओडीशा और आंध्र प्रदेश का है। देश के चंद लोग सरकारी बैंकों का 170 अरब डॅालर अथवा लगभग 11225 अरब रुपए हडप कर गए है। इस विशाल रकम से पूरे देश को हरा-भरा किया जा सकता है। आखिर, देश का आम आदमी कब तक यू ही शोषित होता रहेगा। हर चीज की हद होती है। पानी सर से गुजर रहा है। हर काम के लिए न्यायपालिका पर आश्रित रहने से विधायिका और कार्यपालिका की रही-सही विश्वसनीयता भी जाती रहेगी।
गुरुवार, 12 मई 2016
उत्तराखंड से सबक लें
Posted on 8:58 pm by mnfaindia.blogspot.com/
गंगोत्री की पावन धरती उत्तराखंड में मोदी सरकार को न्यायपालिका ने बडा पाप करने से बचा लिया। मोदी सरकार सत्ता के बल पर इस पहाडी राज्य में लोकतंत्र की लगभग हत्या कर चुकी थी। धन्य है देश की न्यायपालिका जिसने न केवल लोकतंत्र की रक्षा की, बल्कि दल-बदलुओं को भी सबक सिखाया है। भाजपा की लाख कोशिशों के बावजूद उत्तराखंड में कांग्रेस सरकार का फिर से पदस्थ होना केन्द्र और उसके नुमाइंदे राज्यपाल के मुंह पर करारा तमाचा है। मंगलवार (दस मई) को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर बर्खास्त हरीश रावत सरकार ने विधानसभा में विश्वास मत प्राप्त करके राज्य में चुनी हुई सरकार के पदस्थ होने का रास्ता प्रशस्त कर दिया। 70 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के नौ बागी विधायक निलंबित हैं। इस स्थिति में 61 सदस्यीय सदन में हरीश रावत को सदन का विश्वास प्राप्त करने के लिए 31 विधायकों के समर्थन की दरकार थी। कांग्रेस के पास रेखा आर्य के भाजपा के साथ जाने के बाद केवल 26 विधायक थे मगर भीम लाल आर्य के पार्टी में आने से उसके विधायकों की संख्या फिर 27 हो गई। भाजपा के पास 28 विधायक थे । बसपा के 2, 3 निर्दलीय और उत्त्तराखंड क्रांति दल के 1 विधायक ने भी हरीश रावत का साथ दिया। इस तरह रावत बाजी मार गए। दराअसल, भाजपा की सारी उम्मीद कांग्रेस के नौ बागी विधयाकों पर टिकी हुई थी। अगर इन नौ विधायकों को मतदान का अधिकार मिल जाता, रावत शर्तिया हार जाते। मगर न्याायपालिका ने ऐसा नहीं होने दिया। केन्द सरकार के पास अब राज्य में राष्ट्रपति शासन जारी रखने का कोई बहाना नहीं बचा है। विश्वास मत सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में सपन्न हुआ था। इस बात के मद्देनजर केन्द्र के पास “कुटिल“ चालें चलने का भी कोई अवसर नहीं है। बुधवार को केन्द्र ने न्यायालय में माना कि हरीश रावत के पास सदन में बहुमत है। उत्तराखंड प्रकरण से मोदी सरकार की खासी फजीहत हुई है। राज्यपाल की सिफारिश पर उत्तराखंड में इस बिला पर राष्ट्रपति शासन लगाया गया था कि हरीश रावत के पास बहुमत नहीं है और बहुमत जुटाने के लिए विधायकों की “खरीद-फरोख्त हो सकती है। मगर विश्वास मत से एक दिन पहले तक दल-बदल का खेल बदस्तूर जारी रहा। एक-दूसरे के घर में सेंध लगाने की हरचंद कोशिश होती रही। कांग्रेस की विधायक रेखा आर्य ऐन समय पर पार्टी छोडकर भाजपा के साथ हो ली। भाजपा के बागी विधायक भीम लाल आर्य कांग्रेस में शामिल हो गए। जाहिर है यह सब फोक्ट में तो नहीं हुआ होगा। बहरहाल, भाजपा की उत्तराखंड को कांग्रेस मुक्त करने की चाल सफल नहीं हो पाई और इसे विफल करने में कांग्रेस का कोई बहुत बडा योगदान नहीं है। कांग्रेस ने सिर्फ इतना भर किया कि वह अदालत की शरण में चली गई। सच यह है कि हर बार की तरह इस मर्तबा भी कांग्रेस के “विभीषणों“ ने ही लंका ढहाई है। कांग्रेस के नौ बागी विधायक पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थक बताए जाते हैं और उनकी शह पर ही विधायकों ने पार्टी से बगावत की है। विजय बहुगुणा को इस बात का मलाल है कि हरीश रावत ने उन्हें हटाने के लिए साजिश रची थी। वे अपने घाव सहला रहे थे। भाजपा के उतराखंड प्रभारी विजय वर्गीज को यह बात बखूबी मालूम थी। स्थिति को भुनाने के लिए वर्गीज ने पहले साकेत बहुगुणा से संपर्क साधा और बेटे के मार्फत पिता विजय बहुगुणा को विश्वास में लिया। फिर शुरू हुआ रावत को हटाने का खेल। हरीश रावत से नाराज और मंत्री पद के भूखे विधायकों को पटाया गया। इस क्रम में नौ विधायक पार्टी छोडकर भाजपा के साथ मिलकर रावत सरकार गिराने को तैयार हो गए। हैरानी इस बात कि है कि विजय बहुगुणा अथवा भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बात पर गौर क्यों नहीं किया कि दल-बदल कानून उनके आडे आ सकता है। बहरहाल, उत्तराखंड प्रकरण से केन्द्र को सबक लेना चाहिए कि हर बार आग से खेलना सुरक्षित नहीं होता है। कभी-न-कभी तो इस खेल में हाथ जलते ही हैं। अगले साल के शुरू में ही उत्तरखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ताजा प्रकरण ने भाजपा को चुनाव से पहले जनता के समक्ष “अपराधी“ बना दिया है और हरीश रावत के प्रति सहानुभुति उपजी है। भाजपा को अब तो समझ जाना चाहिए कि दल-बदल से आज तक किसी भला नहीं हुआ है।
बुधवार, 11 मई 2016
लांछन की गंदी राजनीति
Posted on 8:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश की आन-बान के लिए यह बात बेहद शर्मनाक है कि प्रधानमंत्री को अपनी शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण सार्वजनिक रुप से देना पडे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीए-एमए कहां से पास की है, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी इस पर खूब बवाल मचा रही है। मामले को इतना तूल दिया जा चुका है कि सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमिल शाह को प्रधानमंत्री की बीए-एमए की डिग्रियां सार्वजनिक तौर पर दिखानी पडी। शाह का साथ देने के लिए बतौर गवाह वित्त मंत्री अरुण जेटली भी मौजूद थे। जेटली सतहर के दशक (1975-77) में दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र नेता थे। जेटली के अनुसार देश में आपातकाल लगे होने के कारण नरेन्द्र मोदी को पढाई करने दिल्ली आना पडा था। इससे मामले की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मगर अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के लोग हैं कि इन डिग्रियों पर भी सवाल उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से बीए पास की है और उनकी डिग्री को सार्वजनिक तौर पर दिखाया भी गया है मगर आम आदमी पार्टी कह रही है कि यह डिग्री किसी और नरेन्द्र दामोदर मोदी की है। आम आदमी पार्टी के अनुसार मार्क शीटस नरेन्द्र कुमार दामोदर दास मोदी नाम पर जारी की गई है जबकि डिग्री में कुमार गायब है और इसमें नरेन्द्र दामोदर दास मोदी दर्ज है। आप का यह भी आरोप है कि मार्क शीटस 1977 में जारी की गई मगर डिग्री 1978 में। यह मुमकिन नहीं है और जाहिर है कुछ गडबड है। आप का यह भी दावा है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के रिकार्ड मुताबिक 1978 में अलवर (राजस्थान) के रहने वाले नरेन्द्र महावीर मोदी ने बीए की परीक्षा उतीर्ण की थी। इसके अलावा और किसी भी नरेन्द्र मोदी ने 1978 में दिल्ली से बीए पास नहीं की। इसी बिला पर आप डिग्री को फर्जी करार दे रही है। यूनिवर्सिटीज अथवा विभिन्न बोर्डों द्वारा जारी डिग्री और मार्क शीटस में गलतियां पाया जाना आम बात है मगर इससे डिग्री को फर्जी करार नहीं दिया जा सकता। दिल्ली यूनिवर्सिटी ने खुद कहा है कि यह डिग्री उसी ने जारी की है। आम आदमी पार्टी बाल की खाल उतारने पर आमादा है। बहरहाल, देश में शीर्ष नेताओं की शैक्षणिक योग्यता को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं दी जाती है। जिस देश मे विश्व के सबसे अधिक निरक्षर हों और जहां आजादी के सात दशक बाद भी साक्षरता दर विश्व स्तर से काफी कम हो ( भारतः 74 फीसदी, विश्व: 84 फीसदी), वहां सियासी नेताओं की शैक्षणिक योग्यता ज्यादा मायने नहीं रखती। नई पीढी को शायद ही मालूम हो कि कांग्रेस के कद्दावर द्रविड नेता कामराज मैट्रिक पास भी नहीं थे मगर पचास के दशक में वे मद्रास के अत्याधिक कुशल प्रशासक साबित हुए थे। इंदिरा गांधी के पास भी बहुत बडी शैक्षणिक योग्यता नहीं थी मगर वे लोगों के दिलों पर राज करती थी। र्राजीव गांधी की शैक्षणिक योग्यत भी ज्यादा नहीं थी। काग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की शैक्षणिक योग्यता पर भी जब-तब अंगुलियां उठाई जाती हैं। पीवी नरसिंह राव बहुत ज्यादा पढे-लिखे, प्रकांड विद्धान और कई भाषाओं में पारंगत थे मगर उनकी शैक्षणिक योग्यता उन्हे बहुत ज्यादा लोकप्रिय नहीं बना पाई। आदमी पार्टी मोदी सरकार को इसलिए निशाना बनाए हुए हैं क्योंकि उसके कुछ नेता फर्जी डिग्री अथवा दस्तावेजों के लिए नपे गए हैं। देश में लांछन की राजनीति बराबर सर चढ कर बोल रही है। केजरीवाल और कांग्रेस प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर कीचड उछाल रहे हैं, तो भाजपा अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर स्कैम में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाना बना हुए हैं। देश की एक तिहाई आबादी भीषण सूखे से त्रस्त है और बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है, सियासी दलों को इसकी कोई चिंता नहीं है। ज्वलंत मुद्दे छोडकर, गौण मुद्दो को कैसे हवा दी जाती है, समकालीन भारतीय नेता यह बात बखूबी जानते हैं। लंाछन की राजनीति से रही-सही मूल्य आधारित राजनीति भी जाती रही है। देश को इस विषय पर सोचना होगा।
मंगलवार, 10 मई 2016
लोकतंत्र फिर जीता
Posted on 9:42 pm by mnfaindia.blogspot.com/
उत्तराखंड में विश्वास मत से एक रोज पहले नौ दल-बदलू विधायकों पर न्यायपालिका का ताजा फैसला लोकतंत्र की बहुत बडी जीत है। सोमवार को प्रातः उच्च न्यायालय और अपरान्ह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नौ दल-बदलुओं को विश्वास मत के लिए अयोग्य ठहराए जाने से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को राहत मिली सो मिली, इन फैसलों से दल-बदल पर अंकुश लगने की उम्मीद की जा सकती है। नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय ने सोमवार को व्यवस्था दी कि नौ दल-बदलू विधायक मंगलवार को होने वाले विश्वास मत में हिस्सा नहीं ले सकते। इस फैसले के आते ही दल-बदलू विधायक फौरन सर्वोच्च न्यायालय पहुंच गए मगर वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए नौ दल-बदलू विधायकों को विश्वास मत में भाग लेने की अनुमति नहीं दी। अगली सुनवाई 12 मई को होगी मगर तब तक विश्वास मत का फैसला आ चुका होगा। कांग्रेस से बगावत कर भाजपा के साथ मिले नौ दल-बदलू विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष ने अयोग्य करार कर दिया था। दल-बदलू विधायक विधानसभा अध्यक्ष के इस फैसले के खिलाफ अदालत गए थे। सर्वोच्च न्यायालय ने कांग्रेस पार्टी की हरीश रावत सरकार को दस मई (मंगलवार) को विधानसभा में विश्वास मत लेने को कहा है। इससे पहले उच्च न्यायालय भी ऐसी ही व्यवस्था दे चुका है। राज्य में इस समय राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है और विधानसभा निलंबित है। मगर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर दस मई को उत्तराखंड में दो घंटे के लिए प्रातः 11बजे से दोपहर 1बजे तक राष्ट्रपति शासन उठा लिया जाएगा और विधानसभा जीवंत हो जाएगी। विश्वास मत के बाद न्यायपालिका तय करेगी कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू रहेगा या चुनी हुई सरकार फिर से पदस्थ होगी। ताजा स्थिति में 70 सदस्यीय सदन में नौ दल-बदलुओं के अयोग्य करार दिए जाने के बाद हरीश रावत को बहुमत साबित करने के लिए 31 विधायकों के समर्थन की जरुरत पडेगी। विभिन्न दलों की स्थिति के दृष्टिगत एक-एक विधायक मायने रखता है। कांग्रेस के 27 सदस्य हैं और भाजपा क 28 विधायक हैं। बसपा के 2 और उत्तराखंड क्रांति दल का 1 विधायक है। 3 निर्दलीय हैं और इनकी भूुमिका अहम रहेगी। नौ दल-बदलू विधायकों के अयोग्य करार दिए जाने से भाजपा का सारा गणित बिगड गया है। दल-बदलू विधायक अब न घर के रहे, ना घाट के“। ंदल-बदल ने देश की समकालीन राजनीति को बुरी तरह से प्रदूषित कर रखा है। दुखद बात यह है कि राजनीतिक दल दल-बदल कानून का सम्मान करने की बजाए इसका अपमान करने में सबसे आगे रहते हैं। उत्तराखंड प्रकरण इस बात की ताजा मिसाल है। पूरा देश जानता है कि पार्टी छोडकर जाने वाले विधायकों को दल-बदल कानून के तहत अयोग्य ठहराया जा सकता है। मगर भाजपा है कि दल-बदलुओं की मदद से जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को गिराने अथवा अपदस्थ करने पर आमादा है। 1985 में बने दल-बदल निरोधी कानून में एक पेंच से सियासी दल अपने ही बनाए कानून को तोड रहे हैं। इसके तहत अगर पार्टी के दो- तिहाई विधायक या सांसद पार्टी छोड कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाते हैं, तो इसे दल-बदल नहीं अलबता विलय (मर्जर) माना जाएगा। 2003 से पहले दो-तिहाई की जगह एक-तिहाई का प्रावधान था। उत्तराखंड में कांग्रेस के 36 विधायक थे। मौजूदा व्यवस्था के लिहाज से कम-से-कम 24 विधायक ही पार्टी को तोड सकते थे। अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के दो-तिहाई विधायक बगावत कर गए थे, इसीलिए वे दल-बदल निरोधी कानून से बच गए। बहरहाल, उत्तराखंड प्रकरण से राजनीतिक दलों को सबल लेना चाहिए कि सियासी नेता भले ही दल-बदल कानून का मखौल उडाते रहें मगर देश की न्यायपालिका कानून का अपमान नहीं होने देगी। दल-बदल कानून की प्रासंगिकता पर भी प्रश्न चिंह लग जाता है। दल-बदल निरोधी कानून और मंत्रिमंडल के आकार की सीमा तय करने वाले 2003 संवैधानिक संशोधन एक्ट की कोई प्रासंगिकता नही रह गई है। विधायक बडे मजे से दल-बदल कर रहे हैं और कई राज्यों में मंत्रिमंडल का आकार सीमा से कहीं ज्यादा है। इस पर अकुंश लगाए जाने की अविलंब जरुरत है।
रविवार, 8 मई 2016
Mr. Modi, This Is Not The Way To Get Rid Off Congress
Posted on 10:46 pm by mnfaindia.blogspot.com/
एक बार फिर न्यायपालिका को ही लोकतांत्रिक की स्वस्थ परपंराओं का निर्वहन कराने के लिए दखल देना पडा है। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को बहुमत साबित करने का एक मौका दिया है। इससे उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने भी यही व्यवस्था दी है। दुखद स्थिति यह है कि जो लोग लोकतंत्र के प्रहरी है, वही उसके पीठ पर वार कर रहे हैं। केन्द्र सरकार ने उत्तराखंड में अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल करके जनता द्वारा चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करके राज्य में राष्ट्र्रपति शासन लगाकर “लोकतंत्र का गला घोंटा है, सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं का यही निचोड है। उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार का कसूर इतना था कि उसका संबंध कांग्रेस से था। केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार ने अब चूंकि देश को कांग्रेस मुक्त करने का संकल्प ले रखा है, इसलिए साम, दाम, दंड, भेद के तौर-तरीके अपनाकर भाजपा कांग्रेस शासित राज्यों को अपदस्थ करने पर आमादा है। भाजपा, इसी साल के शुरु में पहाडी राज्य अरुणाचल प्रदेश में दल-बदल करवाकर कांग्रेस की सरकार गिरा चुकी है। इसके तुरंत बाद उत्तराखंड को निशाना बनाया गया और कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत की आड में हरीश रावत सरकार को गिराने का प्रयास किया गया। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस के नौ बागी विधायकों ने 18 मार्च को बजट पारित करते समय सरकार के खिलाफ वोटिंग की थी मगर विधानसभा अध्यक्ष ने आनन-फानन में बजट पास कर दिया था। बस, इसी बिला पर मोदी सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया। सच्चाई यह हे कि विधानसभा अध्यक्ष द्वारा कांग्रेस के नौ विधायकों की सदस्यता निरस्त किए जाने से भाजपा सरकार नहीं बना सकी। और जब न कांग्रेस की सरकार गिरी, न ही अपनी बनी, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। इसे लोकतंत्र नहीं, जंगलतंत्र ही माना जा सकता है। बहरहाल, देश की सर्वोच्च अदालत ने भाजपा के मंसूबों पर फिलहाल पानी फेर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को आगामी दस मई को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने का मौका दिया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी कि दस मई को दो घंटे के लिए सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक राज्य में राष्ट्रपति शासन उठा लिया जाएगा। विधानसभा जीवंत हो जाएगी और सुप्रीम कोर्ट के पर्यवेक्षक की निगरानी में सदन मे दो घंटे कें मुख्यमंत्री हरीश रावत विश्वास मत पेश करेगें। समूची कार्यवाही की वीडियो रिकार्डिंग की जाएगी और सुप्रीम कोर्ट में पेश की जाएगी। देश में, संभवतय, पहली बार ऐसा हो रहा है कि किसी राज्य से मात्र दो घंटे के लिए राष्ट्रपति शासन हटा लिया जाएगा और विधानसभा निलंबित नहीं रहेगी। हरीश रावत फिर दो घंटे के लिए मुख्यमंत्री होंगे। इससे पहले उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा 21 अप्रैल को राज्य में राष्ट्रपति शासन अवैध घोषित किए जाने पर हरीश रावत एक दिन के लिए और मुख्यमंत्री बने थे। उच्च न्यायालय ने 29 अप्रैल विधानसभा में बहुमत साबित करने की तारीख भी तय की थी। अगले ही दिन सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय की व्यवस्था रोक दी और राज्य में फिर राष्ट्रपति शासन लग गया। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी विश्वास मत को लोकतंत्र में बहुमत साबित करने का एकमात्र विकल्प माना है। पहले उच्च न्यायालय और अब सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था से मोदी सरकार को तगडा झटका लगा है। अब अगर हरीश रावत विधानसभा में अपना बहुमत साबित कर लेते हैं, तो मोदी सरकार और जोर से झटका लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के नौ बागी विधायकों को दस मई के विष्वास मत में शामिल होने की अनुमति नहीं दी है। हाई कोर्ट सोमवार को इस मामले में फैसला सुनाएगा। इस स्थिति में लग रहा है कि रावत सदन में अपना बहुमत साबित कर लेंगे। उतराखंड प्रकरण ने मोदी सरकार की “अलोकतांत्रिक“ सोच को उजागर किया है। लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है। देश को कांग्रेस से मुक्त रहना है या नहीं, यह फैसला जनता करेगी। उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होनेे है। मोदी सरकार जनता से कांग्रेस मुक्त शासन का जनादेश मांग सकती है। दिल्ली पहले ही कांग्रेस से मुक्त है। जो पार्टी दिल्ली पर लगातार 15 साल तक एकछत्र राज करती रही, उस पार्टी का आज विधानसभा में एक भी विधायक नहीं है। यह करिश्मा अरविंद केजरीवाल या भाजपा ने नही, दिल्ली की जनता ने कर दिखाया है। मोदी सरकार को इससे सीख लेने की जरुरत है। ताकत अथवा छल से किसी राज्य तो क्या, मोहल्ले को भी कांग्रेस मुक्त नहीं किया जा सकता।
शुक्रवार, 6 मई 2016
अगस्ता डील में ढील क्यों?
Posted on 6:49 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अति विशिष्ट व्यक्तियों को सियाचीन और पूर्वोतर में लाने और ले जाने के लिए खरीदे गए अगस्तावेस्ट्लैंड हेलिकाँप्टर सौदे में कथित घूसखोरी का जिन्न अब बोतल से बाहर निकल आया है। इससे कांग्रेस नीत पूर्व संप्रग सरकार के साथ साथ राजग सरकार के दामन पर “दलाली“ के छींटे पडना स्वभाविक है। यह सौदा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार के समय आगे बढा था मगर सौदे को अंतिम रुप मनमोहन सिंह सरकार ने दिया था। इसलिए इस सौदे में दलाली को लेकर काग्रेस के नेताओं का नाम आ रहे हैं। ताजा रिपोर्टे में बताया गया हे की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने कंपनी को फवौर करने के लिए फ्लाइट की हाइट घटा दी थी। इस खुलासे से भाजपा की नींद हराम हो सकती है। बहरहाल, इटली कोर्ट के दस्तावेजों में किसी “एपी“ सियासी नेता का नाम आया है। भाजपा का कहना है कि यह “एपी“ और कोई नहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के करीबी अहमद पटेल है। इसी बात पर सोनिया गांधी और राहुल गांधी को निशाना बनाया जा रहा है। इन दिनों वेस्ट बंगाल में विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जा रहे है। इसी माह तमिल नाडु और केरल में विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे। भाजपा अगस्ता सौदे को चुनाव में खूब भुना रही है और कांग्रेस को जवाब देते नहीं बन पा रहा है। अगस्तावेस्टलैंड हेलिकॉप्टर सौदे पर खरीद में कथित दलाली के आरोप लगने से यधपि सौदा 2014 में ही निरस्त कर दिया गया था मगर इस साल अप्रैल में इटली की अदालत के फैसले से यह मामला फिर सुर्खियों में आ गया है। 8 अप्रैल, 2016 को इटली में मिलान स्थित कोर्ट ऑफ अपील ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी के प्रमुख ग्यूसेप ओरसी को सौदा पटाने के लिए भारतीय राजनेताओ, वायु सेना के अफसरों और नौकरषाहों को 30 करोड यूरो की घूस देने के आरोप में चार साल के कारावास की सजा सुनाई। अपने 225 पृष्ठ के फेसले में अदालत ने साफ-साफ कहा कि भारतीय नेताओं और नौकरशाहों को घूस देकर ही सौदा पटाया गया था और कानूनन यह एक संगीन अपराध है। अब यह बात तो बच्चा भी कहेगा कि अगर इटली में रिश्वत देने के लिए कंपनी के मुखिया को सजा मिल सकती है, तो भारत में घूस लेकर देश के साथ गद्दारी करने वाले करप्ट नेताओं, नौकरशाहों और वायु सेना के अधिकारियों को क्यों बखशा जा रहा है? बुधवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने हालांकि देश को आश्व्स्त किया कि मोदी सरकार इस मामले में “दूध का दूध और पानी का पानी“ करके रहेगी मगर अब तक का अनुभव इस बात की गवाही नहीं देता है। 25 मार्च 2013 को तत्कालीन रक्षा मंत्री एके एंटनी ने संसद में कबूल किया था, “ हां, अगस्ता हेलिकॉफ्टर सौदे में भ्रष्टाचार हुआ है और रिश्वत ली गई है। तब रक्षा मंत्री ने पूरी शिद्दत से यह भी कहा था कि सीबीआई इस मामले की तेजी से जांच कर रही है। इस बात को गुजरे तीन साल हो गए हैं मगर न तो सीबीआई जांच की कोई खबर है और न ही मोदी सरकार की ओर से इस मामले में खास पहल हुई है। और सच्चाई यह है कि रक्षा सौदे में दलाली का यह मामला दब कर रह जाता अगर इटली कोर्ट का फेसला न आया होता। कांग्रेस के इस आरोप में वजन है कि संप्रग सरकार द्वारा अगस्ता को ब्लैकलिस्ट किए जाने के बावजूद मोदी सरकार द्वारा इसे फिर ओपन किए जाने पर “दाल में कुछ काला“ नजर आ रहा है। इस बीच रक्षा सौदों के अंतरराष्ट्रीय दलाल क्रिस्टियन मिशेल का आरोप है कि भारत और इटली के प्रधानमंत्रियों के बीव संयुक्त राष्ट्र में लंबी बैठक हुई थी और इसमे कांग्रेस अध्यक्ष को फंसाने की रणनीति बनाई गई थी। माना कि दलाल की बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता मगर लंबी मुलाकात हुई थी, यह बात सच है। अगस्ता सौदे में मीडिया को भी लपेटा गया है। आरोप है कि मीडिया को साठ लाख यूरो बांटे गए हैं। भाजपा के सांसद कीर्ति सौमेया के कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर लगाए गए ताजा आरोप भी संगीन है। भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमनयम स्वामी का भी दावा है कि उनके पास गांधी परिवार की संदिग्ध सौदों में सलिंप्तता के ठोस सबूत है। अभी और भी कई आरोप-प्रत्यारोप उछाले जा सकते हैं। आरोप-प्रत्यारोपों से कोई हल नहीं निकल सकता। जनमानस न केवल सच्चाई जानना चाहता है, अलबता घूसखोर नेताओं और नौकरशाहों को सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं। इस मामले की भी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
गुरुवार, 5 मई 2016
जल पर कल का विकल्प
Posted on 8:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/
संसद की स्थायी समिति का यह सुझाव वाकई काबिलेगौर है कि जल को समवर्ती सूची में शामिल किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि समवर्ती सूची में शामिल किए जाने से सूखे और बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बेहतर ढंग से निपटा जा सकता है। अभी पानी राज्य सूची (स्टेट लिस्ट) में शामिल है, इस कारण केन्द्र का इस पर कोई वश नहीं चलता है। संविधान में कौन-कौन से विषय केन्द्र के अधीन है और कौन से राज्य के, इस बात की सुस्पष्ट व्याख्या है। कुछ ऐसे विषय भी हैं, जिन पर केन्द्र और राज्यों का साझा अधिकार है। ऐसे विषयों को समवर्ती सूची में शामिल किया गया है। भारतीय संविधान में विधायिका (लेजिसलेटिव) कार्यों को तीन हिस्सों में बांटा गया है। पहली लिस्ट संसद के अधिकार क्षेत्र में आने वाले विधायिका विषयों की है। ऐसे विषयों पर संसद ही कानून बना सकती है। दूसरी लिस्ट राज्यों को दिए गए विषयों की है जिन पर विधानसभा-मंडल ही कानून बना सकते हैं। तीसरी समवर्ती अनुसूची में साझे विषय हैं, जिन पर संसद और राज्य विधानसभा दोनो को विधायिका पावर्स दी गई है। ऐसे विषयो पर विधानसभा और संसद दोनों ही कानून बना सकती है और अगर कभी किसी विधानसभा द्वारा कानून संसद द्वारा पारित कानून से टकराव रखता है, तो संसद का कानून ही चलेगा। ऐसी परिस्थिति में विधानसभा का कानून निरस्त हो जाएगा। संविधान ने अवशिष्ट (रेजीडुअल) पावर केद्र सरकार को दी गई है। जल को राज्य की सूची में शामिल किए जाने से केद्र का इस मामले में कोई दखल नहीं है। इस कारण जल के दोहन, प्रबंधन और युक्तिकरण को लेकर संबंधित राज्यों में बराबर टकराव रहता है। पिछले करीब नौ दशक से कर्नाटक और तमिल नाडु के बीच कावेरी नदी के पानी बंटवारे को लेकर जबदस्त टकराव चल रहा है। लगभग आठ सौ किलोमीटर लंबी कावेरी नदी का करीब 44,000 वर्ग किलोमीटर बेसिन क्षेत्र तमिलनाडु में है और 32,000 वर्ग किलोमीटर कर्नाटक में। कर्नाटक का कहना है कि उसे उसके बाजिब हक का पानी नहीं मिल रहा है। इस संबंध में 1892 और 1924 में मद्रास प्रेजिडेंसी और मैसूर रियासत के बीच जो दो समझोते हुए थे, वे पूरी तरह तमिल नाडु के पक्ष में । दोनों राज्यों के बीच जारी लंबे टकराव के बाद 1990 में केद्र ने ट्रिब्यूनल का गठन किया। 16 साल तक सुनवाई चली और फरवरी 2007 को फैसला सुनाया गया। मगर यह फैसला न तो तमिल नाडु को मान्य है, न कर्नाटक और न ही दो और प्रभावित राज्य केरल और पुडुचेरी को। लगभग इसी तरह की स्थिति पंजाब और हरियाणा के बीच जल बंटवारे को लेकर है। हरियाणा को आज तक उसके हक का पानी नहीं मिला है। 1966 से पहले हरियाणा, पंजाब का हिस्सा हुआ करता था। हरियाणा राज्य बनने के बाद दोनों राज्यों में पानी को लेकर टकराव चलता रहा। 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दोनों राज्यों को बराबर 35 लाख एकड फीट जल का बंटवारा किया। पंजाब ने इसे नहीं माना। 1979 में हरियाणा सुप्रीम कोर्ट भी गया। 2002 में कोर्ट ने पंजाब को सतलुज-यमुना लिंक नहर (एसवाईएल) की खुदाई जारी रखने को कहा। इस पर अमल की बजाय पंजाब ने 2004 में विधानसभा में कानून पारित करके ( टर्मिनेशन ऑफ एग्रीमेंट एक्ट) अनुबंध ही निरस्त कर दिया। इसी साल अकाली-भाजपा सरकार ने एसवाईएल के लिए किसानों से अधिगृहीत की गई जमीन को लौटाने के लिए भी विधानसभा में कानून पास कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद पंजाब में नहर के लिए खोदी गई जमीन को भरा जा रहा है। इस मामले में कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल सरकार की हां में हां मिला रहे हैं। इस तरह के हालात देश के संघीय ढांचे को कमजोर करते हैं। पूरे देश में हर साल गर्मियों में भीषण सूखा पडता है और बरसात में बाढ आती है मगर न तो केन्द्र और न ही राज्यों की सरकारें कुछ ठोस कर पा रही हैं। केन्द्र का जल प्रबंधन पर कोई वश नहीं है, और राज्य आपस में लड रहे हैं। आखिर, “न खुद खेलेंगे, न ही औरों को खेलने देंगे“ वाली स्थिति कब तक चलती रहेगी ? जल को समवर्ती सूची में शिफ्ट किया जाना ही एकमात्र कारगर विकल्प नजर आ रहा है। पंजाब और तमिल नाडु जैसे राज्य भले ही इसे मानने मना कर देंगे मगर देश की संसद सर्वोपरि है। उसे संविधान को संशोधित करने का भी अधिकार है। राष्ट्र हित में अगर ऐसा करने की जरुरत पडे, तो इसे अविलंब पूरा किया जाना चाहिए।
बुधवार, 4 मई 2016
विंटेज पार्टी के नौसिखिए नेता
Posted on 7:57 pm by mnfaindia.blogspot.com/
उत्तर प्रदेश में पार्टी का बंटाधार कैसे किया जाए, कांग्रेस के समक्ष इस समय यह सबसे बडी चुनौती है। कांग्रेस के नेताओं को स्वंय इस बात का ज्ञान नहीं है कि पार्टी देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश में कब से सत्ता से बाहर है। 1984 के बाद से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आज तक न तो लोकसभा और न ही विधानसभा चुनाव में बहुमत सीटें हासिल कर पाई हैं। 1984 लोकसभा चुनाव कांग्रस का अंतिम सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर के कारण कांगेस ने लोकसभा चुनाव में विपक्ष का सुपडा ही साफ कर दिया था। तब उतर प्रदेश में कांग्रेस को 85 मेंसे 83 सीटों का प्रचंड जनादेश मिला था। लेकिन इससे भी ज्यादा प्रचण्ड जनादेश 1977 में कांग्रेस के खिलाफ भी दिया गया था । 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उत्तर प्रदेश की 85 सीटों मेंसे एक सीट भी निकाल नहीं पाई। इसके बाद से देश की सबसे पुरानी पुरानी पार्टी का यह हश्र है कि पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी अस्सी मेंसे मात्र दो सीटें-राय बरेली से पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और अमेठी से राहुल गांधी- जीत पाई। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 21 सीटें जीती थी। 1984 के बाद उत्तर प्रदेश में यह कांग्रेस का सबसे अच्छी परफॉर्मंस थी । मगर तीन साल बाद 2012 के विधानसभा चुनाव में पार्टी 403 विधानसभाई सीटों मेंसे बमुश्किल 28 निकाल पाई थी। उत्तर प्रदेश के बारे कहा जाता है कि जिसने इस राज्य को जीत लिया, उसने दिल्ली फतेह कर ली। 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजे इस बात के प्रमाण है। प्रचंड मोदी लहर के बलबूते भाजपा ने 80 मेंसे 71 सीटे जीत कर दिल्ली फतेह कर ली। कांग्रेस का एक जमाने में उत्तर प्रदेश पर एकछत्र राज हुआ करता था। मतदाताओं का धुर्वीकरण कराकर कांग्रेस मजे से शानदार जनादेश हासिल कर लेती। यह सिलसिला इंदिरा गांधी के समय तक जारी रहा अगर 1977 में पहली बार जनता लहर ने नेहरु परिवार का तिलिस्म तोड दिया। 1977 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में 85 की 85 सीट हलकों में बुरु तरह से हार गई थी । यहां तक कि इंदिरा गांधी खुद राय बरेली से जनता पार्टी के उम्मीदवार समाजवादी नेता राज नारायण से हार गईं। तथापि मात्र अढाई साल बाद 1980 में हुए लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 85 मेंसे 50 सीटें जीतकर जनता पार्टी की लुटिया डूबो दी। तब तक जनता पार्टी पूरी तरह बिखर चुकी थी और पार्टी से अलग हुए किसान नेता चौधरी चरण सिंह की पार्टी 29 सीटें जीत कर दूसरे स्थान पर रही थी । कुल मिलाकर स्थिति यह है कि 1989 के बाद से उत्तर प्रदेश में कांग्रेस आज तक उभर नहीं पाई है। पार्टी को इस स्थिति से कैसे उभारा जाए, इसके लिए कांग्रेस ने चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर को हायर किया है। यह वही शख्स है जिनके बारे कहा जाता है कि बिहार में नीतिश कुमार के गठबंधन को सत्ता में लाने का इनका बडा योगदान है। अब इसे सियासी दलों के राजनीतिक कौशल का दिवालियापन कहा जाए या नेट जमाने की सामरिक जरुरत कि अब राजनितिक पार्टीज को बाहरी रणनीतिकारों को हायर कर चुनाव जीतने की नौबत आन पडी है। किशोर ने कांग्रेस को सुझाव दिया है कि अगर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी की परफॉर्मेंस सुधारनी है तो राहुल गांधी अथवा प्रियंका गांधी को मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित किया जाए। किशोर राहुल के पक्ष में है जबकि कार्यकर्ता प्रियंका गांधी को इंदिरा गांधी का “अवतार“ मानकर उन्हें आगे लाने की बराबर मांग कर रहे हैं। अपने पति और सास को खो चुकी माताश्री सोनिया गांधी दोनों को आगे लाने के पक्ष में नहीं है। कांग्रेस की दुविधा यह है कि पार्टी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना चुकी है। राहुल को राष्ट्र्रीय से प्रांतींय स्तर का नेता घोषित करना पार्टी के लिए आसान नहीं होगा और खुद राहुल इसके लिए तैयार नहीं होंगे। मगर प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपी जा सकती है, बशर्ते वे और उनका परिवार (ससुराल) इसके लिए स्वेच्छा से राजी हों। उतर प्रदेश में समाजवादी और बीएसपी की जातिगत राजनीति और भाजपा की धर्म-कर्म आधारित सियासत के लिए प्रियंका कांग्रेस के लिए असरदार विकल्प बन सकती है। बहरहाल, प्रशांत किशोर के सुझाव ने यह सच्चाई फिर उजागर की है कि कांग्रेस को अतोगत्वा नेहरु-गांधी परिवार पर ही आश्रित रहना पडता है और इस परिवार के सिवा देश की “विंटेज“ पार्टी के पास कोई दमदार विकल्प नहीं है।
मंगलवार, 3 मई 2016
उजाला से उज्ज्वला तक
Posted on 8:03 pm by mnfaindia.blogspot.com/
श्रमिक दिवस पर गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस मुहैया कराने की उज्ज्वला योजना आरंभ करके प्रधानमंत्री मोदी ने देश के सबसे बडे राज्य उतर प्रदेश में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा दिया है। इस योजना को लांच करते समय प्रधानमंत्री ने खुद स्पष्टीकरण दिया कि वे बलिया में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजाने नहीं , बल्कि गरीबी के खिलाफ लडाई ल डने आए हैं। मगर यह स्पष्टीकरण किसी के गले नहीं उतर रहा है। अगर गरीबी के खिलाफ लडाई लडने के लिए गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों (बीपीएल) को एलपीजी कनेक्शन्स ही देने थे, तो यह दिल्ली से ही किया जा सकता था। इसके लिए बिहार से सटे बलिया सरीखे सूदूर क्षेत्र में जाने की जरुरत नहीं थी। स्पष्ट है मकसद सियासी था। मोदी सरकार की अधिकांश परियोजनाओं की घोषणा अथवा आधारशिला इस साल उत्तर प्रदेश में रखी जा रही है, क्योंकि राज्य में अगले साल के शुरू में विधानसभा चुनाव होने है। हाल ही में प्रधानंत्री ने “स्टैंड अप इंडिया“ का नोएडा में शिलान्यास किया था। पिछले साल बिहार प्रधानमंत्री का बडी परियोजनाओं के शिलान्यास का डेस्टिनेशन हुआ करता था। तब बिहार में विधानसभा चुनाव होने थे । बिहार की तरह, भाजपा उतर प्रदेश में भी सत्ता की प्रमुख दावेदार है। लोकसभा चुवाव के नतीजे भाजपा के लिए काफी सुखद रहे हैं । लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा ने 80 मेंसे 71 सीटें जीतीं थीं। पार्टी का राज्य में यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था । उज्ज्वला योजना के तहत मोदी सरकार देश के पांच करोड बीपीएल परिवारों को अक्टूबर 2019 तक मुफ्त में रसोई गैस कनेक्शन और चूल्हे देगी। अक्टूबर 2019 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वी जयंती मनाई जानी है। इस बात के मद्देनजर मोदी सरकार ने यह लक्ष्य तय किया है। इसमें भी राजनीतिक स्वार्थ है। योजना पर आठ हजार करोड रु का खर्चा आएगा। निसंदेह, गरीबी रेखा से नीचे गुजर्-बसर करने वाले परिवारों को मुफ्त रसोईगैस की सबसे ज्यादा जरुरत है और उनके लिए मोदी सरकार की यह योजना वरदान साबित हो सकती है। मगर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या बीपीएल परिवारों के पास रसोईगैस पर पकाने के लिए पर्याप्त भोजन की सामर्थ्यता है ? भारत में अभी तक गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों (बीपीएल) की स्पष्ट परिभाषा नहीं है। कुछ साल पहले तत्कालीन योजना आयोग (मीजूदा नीति आयोग) ने शहरी क्षेत्रों में 32 रु तो देहातों में 26 रु से कम कमाए वाले व्यक्ति को गरीबी रेखा से नीचे माना था। यानी शहरों में 32 रु और देहातों में 26 रु से ज्यादा कमाने वाला गरीबी रेखा से नीचे नहीं है। यहां तक कि नरेन्द्र मोदी के मुख्य मंत्रित्व समय में गुजरात सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में प्रतिदिन 10.8 रु कमाने वाले को गरीबी रेखा से नीचे माना था। इस तरह मे मानदंड गरीबों का मजाक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रति दिन 1.90 डालर अथवा 126 रु कमाने वाला गरीबी रेखा से नीचे माना जाता है। इस मानदंड के अनुसार भी देश की लगभग 32.7 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करती है। और अगर देसी मानदंड को आधार माना जाए तो 70 फीसदी से भी ज्यादा आबादी गरीबी रेखा से नीचे गुजर -बसर कर रही है। बहरहाल, मोदी सरकार की ताजा योजना बीपीएल परिवारों तक पहुंच पाएगी, इस पर भी संदेह है। अब तक गरीबों के उत्थान के लिए जितनी भी योजनाएं चलाई गईं है, उनकी मलाई करप्ट नौकरशाही और सियासी नेता चाट गए हैं। दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी योजना मनरेगा से भी गरीबों का खास उत्थान नहीं हो पाया है। मनरेगा के तहत लोगों को सौ दिन के रोजगार का कानूनन हक दिया गया है और इस योजना का मूल मकसद भी ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबों को गारंटिड रोजगार मुहैया कराना है। इससे पहले सतहर के दशक में गरीबी कम करने के लिए “गरीबी हटाओ“ और बीस सूत्री आर्थिक कार्यक्रम चलाए गए थे। तथापि, सरकारी आंकडे यही बताते है कि पिछले चार दशकों में गरीबों क लिए बडी-बडी योजनाएं चलाने के बावजूद गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या में कोई गिरावट नहीं आई है। केन्द्र सरकार ने बिजली बचाने के लिए “उजाला“ स्कीम भी चला रखी है मगर यह भी बहुत ज्यादा कारगर सिद्ध नहीं हुई है। आखिर कब तक यह सिलसिला जारी रहेगा़?
सोमवार, 2 मई 2016
एक और मीलपत्थर
Posted on 2:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अमेरिकी जीपीएस को गुडबॉय, इंडियन आरपीएस का सुस्वागतम। भारत ने अपना नेविगेषन सिस्टम (स्वदेशी जीपीएस) बनाकर एक और मीलपत्थर स्थापित किया है। वीरवार को इसरो ने इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम का सातवां और आखिरी उपग्रह कक्षा में स्थापित करके रीजनल पोजिशनिंग सिस्टम (आरपीएस) का मुकाम हासिल कर लिया। आरपीएस के स्थापित होने से भारत को अमेरिका के जीपीएस ( ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) पर निर्भरता से मुक्ति मिल जाएगी। भारत 1973 से अमेरिकी जीपीएस पर आश्रित रहा है। मगर युद्ध अथवा शत्रुतापूर्ण परिस्थितियों में बाहरी नेविगेशन सिस्टम पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। कारगिल युद्ध के समय भारत को इस स्थिति का अहसास हुआ। तब अमेरिका भारत को जीपीएस के माध्यम से घुसपैठ कर रहे पाकिस्तानी सैनिकों की पोजिशनिंग बताने से साफ मुकर गया था जबकि सेना को जीपीएस की सबसे ज्यादा जरुरत थी। पहली बार तब भारत के वैज्ञानियों को विदेशी पर निर्भर रहने की बजाय स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम बनाने की जरुरत महसूस हुई। इसरो ने तय किया कि वह अपना रीजनल पोजिशनिंग सिस्टम बनाएगा। इसे बनाते-बनाते भारत को 17 साल लग गए। वीरवार को इसरो ने इस टास्क को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया। इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम को “नाविक“ नाम दिया गया है। इसके साथ ही भारत अमेरिका और रुस के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश है जिसके पास अपना नेविगेशन सिस्टम है। सात उपग्रहों की मदद से जुलाई से देश को 1500 किलोमीटर की चौतरफा सटीक जानकारी मिलनी शुरु हो जाएगी। इस सिस्टम का पूरा फायदा मिलने के लिए अभी एक से डेढ साल लग सकते हैं। आरपीएस का सबसे ज्यादा फायदा सेना को होगा। महत्वपूर्ण सामरिक जानकारी के लिए अब तक भारतीय सेना को अमेरिकी जीपीएस पर निर्भर रहना पडता था। अपना आरपीएस होने से सेना अब अपनी जरुरत के मुताबिक नेविगेशन कर पाएगी। आरपीएस से सेना को जियो-मैपिंग की सुविधा भी मिलेगी। आरपीएस से देश को प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी करने में भी मदद मिलेगी। नेविगेशन सैटेलाइट डाटा को कार नेविगेशन, हवाई जहाज और समुद्री जहाज यात्रा के समय और स्मार्टफोन और अन्य डिवाइसिस में प्रयोग किया जा सकता है। भारत के नाविक सिस्टम (आरपीएस) में तीन उपग्रह भू-स्थिर पृथ्वी कक्षा (जियो ऑरबिट) और चार उपग्रह पृथ्वी से 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर जीएसओ ऑरबिट में स्थापित किए गए हैं। दो उपग्रह धरती पर स्टैंडबाई स्थापित किए गए हैं। इनसे साफ और बगैर किसी बाधा के सिग्नल्स मिला करेगें। अक्टूबर, 2015 को इसरो ने बंगलुरु में सम्मेलन आयोजित कर ग्लोबल सिस्टम टकनॉलॉजी डवलपर्स, मोबाइल फोन निर्माता और नेविगेशन डिवाइस निर्माताओं के समक्ष स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम की खूबियों को प्रदर्शित की थी । इसरो का दावा है कि भारतीय नेविगेशन सिस्टम (आरपीएस) अमेरिकी जीपीएस से भी अधिक प्रोन्नत और बेहतर है। अमेरिकी जीपीएस और रुस के ग्लोनॉस में 24- 24 उपग्रह स्थापित किए गए हैं। यूरोपीय ग्लोबल नेविगेशन गैलिलियो में 27 उपग्रह और चीन के नेविगेशन में 35 उपग्रह हैं। इस लिहाज से भारत का आरपीएस अन्य से कहीं ज्यादा किफायती माना जा रहा है। आरपीएस के सिग्नल्स रिसीव करने के लिए हैंडहैल्ड डिवाइस में एक छोटा सा हार्डवेयर लगाना पडेगा और जबकि जीपीएस में यह काफी बडा और महंगा है। एल-बैंड सिग्नल्स रिसीव करने के लिए फोन में एक कोड लगाना पडेगा। भारत पहले ही अंतरिक्ष में दुनिया का सबसे सस्ता और सफल मंगलयान को स्थापित करके पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवा चुका है। भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगलयान को मात्र 450 करोड रु की लागत से निर्मित किया था। यह लागत अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के पहले “मंगल“ मिशन का दसवां और चीन एवं जापान के असफल मंगल मिशन की लागत का चौथाई भर भी नहीं है। प्रतिष्ठित टाइम पत्रिका ने “मंगलयान“ को 2014 के सर्वश्रेष्ठ आविष्कारों में शामिल किया है। भारत के वैज्ञानिकों ने अमेरिकी जीपीएस से बेहतर स्वदेषी नेविगेश न सिस्टम तैयार करके दुनिया में फिर अपने कौशल का लोहा मनवाया है।
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