बुधवार को कानपुर के निकट सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस हादसे ने भारत में सुरक्षित रेल यात्रा पर फिर सवालिया निशान खडा कर दिया है। दो माह में कानपुर के निकट यह दूसरा रेल हादसा है। इस बार भी सियालदह-अजमेर एक्सप्रेस के 15 डिब्बे पटरी से उतर गए और इस हादसे में 65 यात्री घायल हो गए। कहा जा रहा है कि ट्रैक खराब था, इसलिए यह हादसा हुआ। पिछले माह 20 नवंबर को कानपुर के निकट इंदौर-पटना एक्सप्रेस पटरी कानपुर के निकट पटरी से उतर गई थी और इस हादसे में 150 से ज्यादा यात्री मारे गए थे। तब भी ट्रैक खराब होने के कारण हादसा हुआ था। अब सवाल यह है कि कानपुर के निकट ही बार-बार रेल ट्रैक क्यों खराब हो रहा है जबकि 38 दिन पहले ही कानपुर के निकट पटरी टूट जाने से बडा हादसा हुआ था। इस माह यह दूसरा रेल हादसा है। 6 दिसंबर को बिहार के राजेन्द्रनगर से गुवाहटी जा रही केपिटल एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने के कारण 2 यात्री मारे गए थे और 10 घायल हो गए थे। 5 अक्टूबर को जम्मू तवी-पुणे झेलम एक्सप्रेस के 9 डिब्बे पटरी से उतर गए थे मगर शुक्र है इस हादसे में कोई हताहत नहीं हुआ। 28 अगस्त को तिरुवनन्तपुरम-मंगलौर एक्सप्रैस के 2 डिब्बे पटरी से उतर गए थे। एक मई को उत्तर प्रदेश में हापुर के निकट पुरानी दिल्ली-फैजाबाद एक्स्प्रैस के 8 डिब्बे पटरी से उतर गए और इसमें 12 यात्री घायल हो गए थे। 5 फरवरी को क्न्याकुमारी-बंगलौर एक्सप्रैस के कुछ डिब्बे तमिल नाडु में पटरी से उतर गए थे और इस हादसे में 10 लोग घायल हो गए थे। कुल मिलाकर, इस साल अब तक सात से अधिक हादसे रेल डिब्बों के पटरी से उतरने के कारण हो चुके हैं। हैरानी इस बात पर है कि टूटी पटरी (फैक्चरड टैªक) का पता लगाने के लिए रेलवे के पास पुख्ता व्यवस्था होने के बावजूद डिब्बों के पटरियों से उतरने के हादसे हो रहें हैं । रेलवे ट्रैक की नियमित जांच होती है और नवंबर में कानपुर के निकट हादसे के बाद आसपास के ट्रैक्स की नियमित जांच हुई थी। ट्रंक रुट की हर मेन लाइन पर अल्ट्रासोनिक वॉल डिटेक्शन लगाए गए हैं जो रेल पटरी की हर छोटी-बडी खामी अथवा त्रुटि को फौरन पकड लेते हैं। मेन लाइन की नियमित जांच करना भी अनिवार्य है। इतनी पुख्ता व्यवस्था के बावजूद एक साल में बार-बार पटरी का टूट जाना और डिब्बों का पटरी से उतर जाना यही साबित करता है कि हर बार कहीं-न-कहीं कोई गंभीर चूक हो रही है। खराब ट्रैक के अलावा भी रेल हादसे के और कई कारण हैं। भारत में रेल अक्सर ओवर लोडिड होती है और इससे पटरी पर दबाव बढता है और वह टूट जाती है। अधिकतर रेल हादसे इसी वजह से हो रहे हैं। पिछले माह कानपुर के निकट दुर्घटनाग्रस्त इंदौर-पटना एक्सप्रेस से पहले ट्रैक से ओवरलोडिड माल गाडी गुजरी थी। माना जा रहा है कि ओवरलोडिड माल गाडी के गुजरने से ट्रैक में दरार आई थी हालंाकि इस हादसे की जांच अभी जारी है और रिपोर्ट इस माह सरकार को सौंपी जा सकती है। सर्दियों में घनी धुंध भी कई बार हादसे का कारण बनती है। नियमानुसार, हर रेल इंजन में दौ सौ मीटर दूरी दिखाई दिया जाना चाहिए मगर भारतीय रेल इंजन बमुश्किल दस मीटर दुर देख पाते हैं। आमतौर पर, पटरी में छोटी-मोटी दरार से हादसे नहीं होते हैं और इसी वजह इन्हें उपेक्षित कर दिया जाता है मगर उतरोत्तर यही मामूली दरार चौडी हो जाती है और हादसे का कारण बनती है। देश में हर रेल हादसे के बाद सरकार जांच कमेटी बनाती है। कमेटी अपनी रिपोर्ट में कुछ सुझाव देती है। इन्हें आधे-अधूरे मन से लागू किया जाता है। फिर हादसा होता है और कमेटी गठित की जाती है। यह सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है पर रेल हाद्से नहीं रुकते। आखिर यह सिला कब तक चलेगा और कब तक देश के रेल यात्री कीडे-मकोडों की तरह मरते रहेंगे।
शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016
गुरुवार, 29 दिसंबर 2016
50 दिन पूरे हुए !
Posted on 7:25 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नोटबंदी के पचास दिन पूरे होते ही मोदी सरकार ने देश के जनमानस की पुलिसिंग का काम भी शुरु कर दिया है। बुधवार को सरकार ने अध्यादेश जारी करके पुराने नोटों को दंडनीय अपराध बना दिया है। अध्यादेश के अनुसार 31 मार्च के बाद से अगर किसी व्यक्ति के पास 10 से ज्यादा के 500 और 1000 रु के पुराने नोट पाए गए, तो उसे जुर्माना भरना पडेगा और चार साल की जेल भी हो सकती है । यह कानून 1 जनवरी से ही लागू हो जाएगा मगर सरकार ने लोगों को 1 जनवरी से 31 मार्च तक पुराने नोट रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के विशेष काउंटर्स पर बदलने का विकल्प दिया है। अध्यादेश में यह व्यवस्था भी है कि पुराने नोटों को लेकर कोई भी व्यक्ति कानूनी दावा नहीं कर सकता। 1978 में मोरारजी देसाई की जनता सरकार ने 1000 और 5000 रु के नोट बंद करने के बाद भी ऐसा ही अध्यादेश जारी किया था। तब भाजपा (तत्कालीन जनसंघ) भी इसी सरकार का हिस्सा थी। तब इसका कुछ असर पडा था मगर ताजा स्थिति में मोदी सरकार की इस कवायद का कोई ज्यादा प्रभाव नहीं फ्डने जा रहा है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के बाद से 28 दिसंबर तक सरकार के पास 15.4 लाख करोड रु के 500 और 1000 रु के पुराने नोट मेंसे 14 लाख करोड रु जमा हो चुके हैं। यानी सिस्टम में अब 1.4 लाख करोड के पुराने नोट ही बचे है। इसके यह अभिप्राय हैं कि देश में 1.4 लाख करोड रु का काला धन है जबकि सरकार का अपना आकलन है कि कम-से-कम तीन लाख करोड के पुराने नोट काले धन के रुप में थे और जमा नहीं किए जाएंगे। इन आंकडों से इतना तो स्पष्ट है कि नोटबंदी का काला धन बाहर निकालने का जो मूल मकसद था, वह हासिल नहीं किया जा सका है। नोटबंदी से सिर्फ लोगों को खामख्वाह का कष्ट और परेशानी झेलनी पड रही है। प्रधानमंत्री ने देश के लोगों से नोटबंदी के लिए 50 दिन का समय मांगा था और बुधवार को यह समय सीमा समाप्त हो गई है। देश के अधिकतर हिस्सों में अभी भी नगदी का संकट बना हुआ है। लोगों को एटीएम से 2500 रु से ज्यादा की नगदी नहीं निकल रही है और बेंकों से एक सप्ताह में 24,000 से ज्यादा की रकम निकालने पर अभी भी रोक है। बैंकों मेँ ग्राहकों को 24,000 रु की जगह ज्यादा से ज्यादा 6,000 रु की नगदी ही दी जा रही है। बैंकों में नगदी का भीषण संकट है और इसी स्थिति के दृष्टिगत बैंको ने सरकार से आग्रह किया है कि नगदी निकालने पर लगी सीमा को 30 दिसंबर से आगे भी तब तक जारी रखी जाए जब तक उन्हें पर्याप्त नगदी नहीं मिल जाती। सरकार ने खुद बडे बैंकर्स से इस मामले में राय मांगी थी। बैंकों का आकलन है कि अगर नगदी निकालने की सीमा ह्टा दी जाती है तो देश में एकाएक नगदी संकट उत्पन्न हो सकता है। सीमा खत्म होते ही लोग बेंकों से अधिकाधिक नगदी निकाल सकते हैं मगर बेंकों के पास नोटबंदी के 50 दिन बाद भी पर्याप्त कैश नहीं है। भारत में आपातकाल के दौरान जमाखोरी की बुरी लत है। नोटबंदी के बाद से लोग-बाग डरे हुए हैं और उन्हें लग रहा है कि नगदी का संकट अभी लंबे समय तक जारी रह सकता है। इस स्थिति में अगर नगदी निकालने पर लगी सीमा हटा दी जाती है, तो देश में फिर कैश की कमी हो सकती है। बहरहाल, नोटबंदी ने पूरी अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। फैक्ट्री उत्पादन में 30 से 50 फीसदी की गिरावट आ चुकी है। नवबर और दिसंबर में एफएमसीजी ( फास्ट मूविंग कंज्युमर गुडस) की बिक्री में 30 फीसदी की गिरावट आई है। रोजगार के अवसर न के बराबर हैं और कारोबार ठंडा पडा है। इस पर भी मोदी सरकार लोगों की पुलिसिंग करे तो देश की अर्थव्यवस्था का तबाह होना तय है।
बुधवार, 28 दिसंबर 2016
भारत की एक और छलांग
Posted on 7:43 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सोमवार को अग्नि-5 का सफल परीक्षण करने के साथ ही भारत ने न्यूक्लियर टकनॉलॉजी में एक और लंबी छलांग लगाई है। अग्नि-5 भारत की अब तक की सबसे शक्तिशाली न्यूक्लियर मिसाइल है। इसके साथ ही भारत दुनिया के उन ताकतवर न्यूक्लियर पॉवर देशों के क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास 5000 किलोमीटर और उससे अधिक दूरी तक मार करने वाली मिसाइलें हैं। अग्नि-5 से भारत की नाभिकीय प्रतिरोधक क्षमता और मजबूत होगी और वह अपने चिर प्रतिद्धंदी चीन का मुकाबला करने में सक्षम होगा। भारत सरकार ने हालांकि अग्नि-5 की मारक क्षमता का खुलासा नहीं किया है पर चीन का दावा है कि इस मिसाइल की मारक क्षमता छह से आठ हजार किलोमीटर हो सकती है। इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइल की न्यूनतम मारक क्षमता ही 5500 किमी होती है, इसलिए चीन अग्नि की मारक क्षमता न्यूनतम छह हजार बता रहा है। अग्नि-5 बीस मिनट में चीन समेत आधी दुनिया को अपनी जद में ले लेगी। चीन के अलावा, पाकिस्तान, रुस, मलेशिया और इंडोनेशिया भी इसकी जद में आते हैं। अग्नि पांच से भारत यूरोप तक हमले करने में सक्षम हो जाएगा। चीन और भारत के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रुस इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइल (आईसीबीएम) से लैस हैं। अग्नि-5 से एक साथ कई परमाणु हथियार छोडे जा सकते हैं और छोडे जाने के बाद इन्हें रोका नहीं जा सकता। अग्नि-5 को 85 फीसदी स्वदेशी तकनीक से बनाया गया है और इस पर 2500 करोड रु का खर्च आया है। भारत के लिए यह फर्क की बात है कि मात्र चार साल में भारत ने मिसाइल टकनॉलॉजी में तीव्रगामी प्रगति की है। 2012 में जहां भारत 700 किमीं मारक वाली अग्नि मिसाइल बना रहा था, वहीं 2016 में वह 5000 किमी से ज्यादा दूरी की मारक क्षमता वाली इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइल बनाने में सक्षम है। पूरी उम्मीद है कि अगले तीन सालों में भारत 10,000 किमी क्षमता वाली इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइल बनाने में सक्षम हो जाएगा। तथापि, भारत अभी भी बेलिस्टिक मिसाइल क्षमता में चीन से काफी पीछे है। चीन का मुख्य लक्ष्य 2020 तक अमेरिका से आगे बढ जाने का है। ताजा आकलन है कि चीनी नौसेना 2020 तक अमेरिकी नौसेना को पीछे छोड देगी और उसके पास अमेरिका से भी ज्यादा परमाणु पनडुब्बियां और हथियार हो जाएंगेें। चीन 2020 तक न्यूक्लिर पॉवर में अमेरिका से आगे निकल जाना चाहता है। चीन ने पिछले साल ही 3000 से 4000 किमी मारक क्षमता वाली डीएफ-26 बेलिस्टिक मिसाइल तैयार की है जिसकी मारक क्षमता अमेरिका के ग्याम (बडा सैन्य अड्डा् तक है। इसीलिए इस घातक मिसाइल कौ “ग्याम किलर“ भी कहा जाता है। चीन की सीएसएस-4 फ्लोरिडा को छोडकर पूरे अमेरिका को अपनी जद में लिए हुए है। चीन की डीएफ (डॉग फेन्ग)- 5 की मारक क्षमता 13,000 किमी है। यानी अमेरिका का हर शहर इस इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइल की जद में है। चीन की डीएफ 31-ए मिसाइल की मारक समता 11,200 किमी है। सबसे बडी 16,000 किमी मारक क्षमता वाली इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइल रुस के पास है। 2015 में प्रकाशित मिल्ट्री रिपोर्ट के अनुसार चीन के पास लंबी दूरी की मारक क्षमता वाली 50से 60 सिलो आधारित इंटरकॉन्टिनेंटल बेलिस्टिक मिसाइलें हैं और समूचा अमेरिका उनकी जद में है। पेंटागन ने भी माना है कि चीन की मिसाइलें अमेरिका के लिए सबसे बडा खतरा है। भाारत के लिए चीन की बढती न्यूक्लियर ताकत खासी चिंता का विषय है। निसंदेह, मिसाइल टकनॉलॉजी में भारत तेजी से आगे बढ रहा है मगर चीन के मुकाबले अभी हम काफी पीछे हैं। चीन हमारा पडोसी है और इसकी न्यूक्लियर क्षमता का मुकाबला करने के लिए हम जितने जल्दी सक्षम होंगे, भारत का सुरक्षा कवच उतनी तेजी से मजबूत होगा। दो पडोसी न्यूलियर ताकतवर देश भारत को चैन से रहने दे सकते।
मंगलवार, 27 दिसंबर 2016
तुम डाल-डाल, हम पात-पात
Posted on 8:02 pm by mnfaindia.blogspot.com/
काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बेनामी संपति पर जोरदार प्रहार करने जा रहे हैं। रविवार को इस साल की आखिरी “मन की बात“ में प्रधानमंत्री मोदी ने लोकप्रिय जुमले को उ्द्धृ्त करते हुए कहा “ भ्रष्टाचारी डाल-डाल तो हम पात-पात“। प्रधानमंत्री ने कहा कि बेनामी संपति पर अकुंश लगाने के लिए जल्द ही कानून को और धारदार बनाया जाएगा। इस मामले में मोदी सरकार ने पहल भी कर दी है। सोमवार को आयकर अधिकारियों ने बसपा सुप्रीमो सुश्री मायवती के भाई आनंद कुमार की बेनामी संपत्तियों की जाँच शुरु कर दी है। उन पर अथाह बेनामी संपत्ति बनाने का आरोप है। उनसे जुडे कई बिल्डरों को भी आयकर विभाग ने नोटिस भेजे हैं। हालांकि विधानसभा चुनाव की बेला पर मोदी सरकार के इस कदम में “राजनीतिक स्वार्थ की “गंध“ आ रही है पर इस कार्रवाई को काले धन के खिलाफ सरकार की सख्ती का हिस्सा माना जा रहा है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर दुख व्यक्त किया है कि बेनामी संपत्ति कानून 1988 से अस्तित्व में है मगर इसके तहत न तो नियम बनाए गए और अगर दिखाने के लिए थोडे-बहुत बनाए भी गए, तो उन्हें अधिसूचित नहीं किया गया। इसी वजह यह कानून कई सालों से निष्क्रिय पडा है। ऐसे कानून का क्या फायदा जो किसी काम न आए़। काली कमाई करने वाली इसी का फायदा उठा रहे हैं। बेनामी संपत्ति काले धन को छिपाने का प्रमुख स्त्रोत है। काली कमाई करने वाले किसी दूसरे (विश्वास पात्र अथवा परिजन) के नाम संपत्ति खरीदकर कर लेते हैं। कानून में व्याप्त खामियों को भुनाते अधिकारियो की आंखों में धूल झोंकते हुए कर चोर आसानी से काले धन से अकूत संपति जमा कर लेते हैं। मोदी सरकार ने हाल ही में 1988 के कानून को प्रभावी बनाने के लिए इसमें आवष्यक सशोधन किए हैं। सरकार का दूसरा प्रहार बेनामी संपत्ति पर है। आयकर रिटर्न की गहन जांच-पडताल, काली कमाई करने वालों पर आयकर एवं प्रवर्तन निदेशालय के छापे और बेनामी संपत्तियों की विश्वसनीय जानकारी हासिल कर सरकार ने ऐसी संपत्तियों की जांच पडताल शुरु भी कर दी है। 31 दिसंबर के बाद उन खातों को भी खंगाला जाएगा, जिनमें नोटबंदी के बाद से अढाई लाख से ज्यादा की नगदी जमा की गई है। विमुद्रीकरण के बाद अब कर अधिकारी का सारा ध्यान बेनामी संपति को बेनकाब करने पर है। आंकडों के अनुसार 2014 के बाद से काले धन में निरंतर गिरावट आ रही है। 2014 में सरकार का अपना आकलन था कि वाणिज्यकरण से फल-फूल रहे शिक्षा सेक्टर, माइनिंग की काली कमाई और रियल इस्टेट के बेनामी सोदों के कारण काला धन देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 75 फीसदी तक पहुच चुका था। इस तरह देश में काले धन की समानांतर अर्थ व्यवस्था की गहरी पैठ हो चुकी थी। ताजा अध्ययन के मुताबिक जून 2016 तक काले धन में खासी गिरावट आ चुकी है और अब यह जीडीपी का 30 फीसदी (लगभग 30 लाख करोड) तक गिर चुका है । अगर सरकार बेनामी संपत्ति कानून को धारदार बनाने में सफल हो गई तो अगले तीन सालों में काला धन जीडीपी का 10 फीसदी से भी कम रह जाएगा। इन आंकडों पर अगर विश्वास किया जाए तो दो साल के कार्यकाल में मोदी सरकार की काले धन के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक के हैरतअ्ंगेज परिंणाम सामने आ रहे हैं। काले धन के खिलाफ जो काम पिछले सरकारें साढे छह दशक में नहीं कर पाईं, वह करिश्मा मोदी सरकार मे मात्र दो साल में कर दिखाया है। तथापि, अकूत बेनामी संपत्ति को चिहिंत कर इन्हें जब्त करना चुनौतीपूर्ण कार्य है और भ्रष्ट नौकशाही हर बार की तरह इस मुहिम के कार्यवन्यन में भी पीछे रह सकती है। वैसे अगर सरकार अथाह बेनामी संपत्ति को जब्त करने में सफल हो जाती है तो देश के सभी 5 करोड शहरी और ग्रामीण बेघरों को आशियाना मुहैया कराया जा सकता है।
सोमवार, 26 दिसंबर 2016
मोदी बनाम राहुल
Posted on 7:50 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और कांग्रेस के “युवराज" राहुल गांधी के बीच जारी “वाक युद्ध“ अब हास्यास्पद लगने लग पडा है। खासकर, कांग्रेस उपाध्यक्ष के “बेतुके“ बोल। प्रधानमंत्री मोदी राहुल गांधी की तुलना में कहीं ज्यादा वाकपटु हैँ । राहुल गांधी ने यह कहकर अपना ही मजाक उडाया है कि संसद में उनके बोलने से “भूकंप“ आ जाएगा। यह किसी भी स्थिति में “वाक पटुता“ नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस पर चुटकी लेते हुए कहा है कि “ अब भूकंप नहीं आएगा, क्योंकि राहुल गांधी बोल चुके है़। वे युवा नेता हैं और बोलना सीख रहे हैं और उनका काला मन बाहर आ रहा है“। जिन आरोपों पर राहुल गांधी संसद में भूकंप आने का दावा कर रहे थे, उन आरोपो की बाहर आते ही हवा निकल गई क्योंकि दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल ये आरोप पहले ही लगा चुके थे। राहुल गांधी के पास अरविंद केजरीवाल के आरोपों के अलावा कोई नई जानकारी नहीं थी। सब जानते हैं “ चला हुआ कारतूस दोबारा नहीं चलता“। राहुल गांधी का यह वार भी फुस्स हो गया। फिर उन्होंने गुजरात में प्रधानमंत्री पर सहारा और बिरला समूह द्धारा बतौर मुख्यमंत्री मोदी को करोडों का चंदा देने का आरोप लगाया। मगर यह तीर भी नहीं चला क्योंकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि आरोप गंभीर नहीं है। राहुल बार-बार 12 लाख करोड के स्कैम का हवाला दे रहे हैं मगर यह स्कैम है क्या, इसका खुलासा तक नहीं कर पाए हैं। और जब उनके आरोपों का जनमानस पर कोई खास असर नहीं हुआ तो राहुल ने शेर -ओ- शायरी का सहारा लिया। मशहूर शायर बशीर बद्र के शेर “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में“ को उद्धृतकरा वाही-वाही लूटने की कोशिश की । प्रधानमंत्री पर ताजा हमले में राहुल गांधी ने “राम-नाम जपना, पराया माल अपना“ जुमले का सहारा लेते हुए फिर अपनी “ वाकपटुता“ का मजाक उडाया है। पहले ऊल-जलूल आरोप और अब जुमले और शेर-ओ-शायरी का सहारा। इससे साफ है राहुल गांधी के पास मोदी पर वार करने के लिए कुछ नया नहीं है। नोटबंदी पर राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर जितनी प्रखरता से आक्रमण करते हैं, उतना ही ज्यादा उनका मजाक उड रहा है। वैसे राहुल गांधी को लेकर भाजपाई हमेशा तिरस्कारपूर्ण और उपहास की भाषा का प्रयोग करते रहे हैं जबकि राहुल ने कभी अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं किया। समकालीन राजनीति आरोप-प्रत्यारोप से आगे निकल कर अब हास्य नौटंकी में बदलती जा रही है। इससे जनता का खूब मनोरंजन हो रहा है। राहुल गांधी भी बराबर चर्चा में है। लगातार प्रधानमंत्री और भाजपा नेताओं के निशाने पर बने रहने से राहुल गांधी खासे चर्चित हो रहे हैं और इस मामले में उन्होंने अरविंद केजरीवाल को भी पीछे छोड दिया है। कांग्रेस की भी यही रणनीति लगती है कि भाजपा नेताओं की अभद्रता और बडबोलेपन का जनता के समक्ष जितना ज्यादा भांडा फूटेगा, कांग्रेस को उतना ही फायदा होगा। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि जिस तरह कांग्रेस पूरी तरह से गांधी परिवार पर आश्रित है, उसी तरह आज भाजपा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पूरी तरह आश्रित है। भाजपाई अब खुद प्रधानमंत्री की इंदिरा गांधी से तुलना करने लग पडे है। कहा जा रहा है कि 1969 में जिस तरह इंदिरा गांधी ने बैकों का राष्ट्रीयकरण करके आलोचकों को नेस्तनाबूद कर दिया था, उसी तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी से काले धन पर प्रहार करके विपक्ष को हाशिए पर ला दिया है। चंडीगढ समेत महाराष्ट्र और गुजरात में हाल ही में सपन्न निकाय चुनाव के जनादेश से साफ है कि देश की जनता प्रधानमंत्री के साथ है और विपक्ष की किसी भी बात को गंभीरता से नहीं ले रही है। नोटबंदी के बाद से 100 से ज्यादा लोगों के बेमौत मारे जाने के बावजूद जनता अगर भाजपा के साथ हैं, तो दीवारों पर लिखी इबादत साफ पढी जा सकती है।
बुधवार, 21 दिसंबर 2016
जनता मोदी के साथ !
Posted on 7:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चंडीगढ नगर निगम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत से नोटबंदी के आलोचकों की जुबान पर ताला लग जाना चाहिए। नोटबंदी के कारण जनमानस को हो रही असुविधा और कष्ट से चिंतित विपक्ष को जनता ने “ हमारी चिंता छोडिए, अपनी कीजिए“ सरीखा करारा जवाब दिया है। चंडीगढ नगर निगम की 26 सीटों मेंसे भाजपा ने 20 और उसके सहयोगी दल शिरोमणि अकाली दल ने 1 सीट जीती है। कांग्रेस को मात्र 4 सीटें मिली है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का सुपडा साफ हो गया है। नगर निगम के पिछले हाउस में कांग्रेस के पास 11 और भाजपा के पास 10 सीटें थीं। बसपा के दो सदस्य थे। नोटबंदी के समय भाजपा को चंडीगढ नगर निगम में दो-तिहाई सीटें मिलना पार्टी की बडी उपलब्धि है। ताजा जनादेश के साफ संकेत है कि जनता नोटबंदी पर पूरी तरह से प्रधानमंत्री के साथ है। प्रधानमंत्री के जनहित फैसलों की खातिर देश का जनमानस घंटों कतार में खडे रहने, कष्ट और असुविधा झेलने के लिए भी तैयार है। यह वही जनमानस है जो मामूली सी असुविधा के लिए एकदम सडक पर उतर जाया करता था। चंडीगढ देश का सबसे ज्यादा जागरुक शहर है और इस शहर में सर्विस सेक्टर से जुडे लोगों का वर्चस्व है। 90 फीसदी से ज्यादा पुरुष और 81 फीसदी महिलाएं साक्षर है। स्मार्ट सिटी बनने की कगार पर है। पंजाब और हरियाणा के साथ-साथ चंडीगढ हिमाचल प्रदेश की राजनीतिक नब्ज भी है। पंजाब में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं और मतदान की तारीख की किसी भी क्षण घोषणा की जा सकती है। हिमाचल प्रदेश में 2017 के अंत में चुनाव कराए जाएंगे। इस लिहाज से चंडीगढ के नगर निगम चुनाव नतीजे पंजाब और हिमाचल प्रदेश के लिए अहम मायने रखते हैं। केन्द्र शासित चंडीगढ में नगर निगम को ही एक तरह से विधान सभा माना जाता है। चंडीगढ की आबादी में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के लोगों का वर्चस्व है। पंजाब में भाजपा शिरोमणि अकाली दल के साथ लगातार दस साल से सत्ता में है। चंडीगढ के नगर निगम चुनाव नतीजों से पंजाब सतारुढ गठबंधन का फूले नहीं समाना स्वभाविक है। कांग्रेस के लिए नगर निगम के चुनाव निराशाजनक रहे हैं। लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस को हर चुनाव में झटके पर झटका लगता रहा है। दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र और हरियाणा कांग्रेस के हाथ से जाता रहा है। नोटबंदी के बाद कांग्रेस को महाराष्ट्र के निकाय चुनावों के परिणामों से जो थोडी-बहुत राहत मिली थी, चंडीगढ नगर निगम चुनाव नतीजों से वह काफूर हो गई है। कांग्रेस नेता बेशक यह कर अपने दिल को तसल्ली दें कि चंडीगढ के लोकल चुनाव पंजाब पर कोई असर नहीं डालेंगे, पर सच्चाई यही है कि आने वाले तूफान का बहती बयार से पता चल जाता है। भाजपा पंजाब में शहरों और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में ठोस जनाधार है और अकाली दल का देहाती क्षेत्रों में। चंडीगढ नगर निगम चुनाव नतीजे शहरी मतदाताओं के रुझान की झलक है। भाजपा के लिए यह राहत की बात है कि नोटबंदी से शहरी मतदाता मोदी के साथ है और अगर यही रुझान पंजाब विधानसभा चुनाव में सक्रिय हुआ, तो कांग्रेस को लेने के देने पड सकते हैं। कांग्रेस के लिए पंजाब के विधानसभा चुनाव “ डू एंड डाई“ जैसे हैं। अब यही एकमात्र ऐसा राज्य है जो कांग्रेस की लाज रख सकता है। पंजाब के साथ उतराखंड के भी चुनाव होने हैं और फिर वर्षान्त तक हिमाचल प्रदेश में। इन दोनों राज्यों में अभी कांग्रेस की सरकार है। दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव में हर बार सतारुढ दल के खिलाफ “एंटी इंकूबेंसी“ सक्रिय रहा है। कांग्रेस के लिए बस यही सकून की बात है कि पंजाब में लोकसभा चुनाव के दौरन मोदी लहर इतनी प्रचंड नहीं थी, जितनी अन्य राज्यों में थी।
पहले चीन, अब ब्रिटेन
Posted on 7:46 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दो सौ साल से भी ज्यादा समय तक भारत पर उपनिवेशवादी राज करने वाले ब्रिटेन को भारत ने मात्र सात दशक की आजादी के बाद पीछे छोड दिया है। पिछले डेढ़ सौ साल में पहली बार भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) ब्रिटेन से ज्यादा हो गया है। अब भारत अमेरिका, चीन,जापान, फ्रांस और जर्मनी के बाद दुनिया की छठी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है। और वह दिन भी दूर नहीं है जब भारत जापान, फ्रांस और जर्मन को भी जीडीपी में पीछे छोड देगा। ताजा आकलन है कि अगले चार साल में 2021 तक भारत जीडीपी में तीसरे पायदान पर पहुंच जाएगा। वैसे 8.7 खरब डॉलर की परचेंजिंग पॉवर पेरिटी के लिहाज से भारत दुनिया में पहले ही तीसरे पायदान पर है। साल 2016 भारत के लिए बेहतरीन रहा है और इस दौरान भारत ने कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इस साल फरवरी में भारत ने चीन को तीव्रतम ग्रोथ में पीछे छोड दिया था। भारत इस समय दुनिया की तेजी से आगे बढती नबंर वन अर्थव्यवस्था है। और अब वर्षान्त तक भारत ब्रिटेन को पछाड कर छठी सबसे बडी अर्थव्यवस्था बन गई है। पहले आकलन था कि भारत मौजूदा ग्रोथ की रफ्तार से 2020 में जीडीपी के मामले में ब्रिटेन से आगे निकल पाएगा। लेकिन ब्रिटेन के यूरोपियन यूनियन (ईयू) से बाहर निकलने के बाद उसकी मुद्रा में 20 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट आने से भारत आगे निकल गया है। ताजा आकलन के अनुसार पॉउंड की मौजूदा विनिमय दर के हिसाब से ब्रिटेन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2.29 खरब (ट्रिलियन) डॉलर आंका गया है। इसकी तुलना में भारत की जीडीपी मौजूदा विनिमय दर पर 2.30 खरब डॉलर है। अमेरिका 18.5 खरब (ट्रिलियन) डॉलर के साथ पहले नंबर पर है। 11.3 खरब डॉलर की चीनी अर्थव्यवस्था दूसरे नंबर पर, 4.93 खरब डॉलर के साथ जापान तीसरे, 3.40 खरब डॉलर की जर्मन अर्थव्यवस्था चौथे और 2.49 खरब डॉलर जीडीपी वाला फ्रांस पांचवे स्थान पर है। यूरोपियन यूनियन छोडने से पहले ब्रिटेन की जीडीपी 2.65 खरब डॉलर की थी और वह पांचवे नंबर पर था मगर ईयू से बाहर आने के बाद वह फ्रांस से पिछड कर छठे नबर पर और अव सातवें पायदान पर पहुंच गया है। भारत का ग्रोथ रेट क्योंकि ब्रिटेन से कहीं ज्यादा है, इसलिए आने वाले समय में इंडिया इग्लैंड से कहीं आगे निकल जाएगा। 2016 में ब्रिटेन की ग्रोथ रेट 1.7 फीसदी और 2017 में 1.1 फीसदी रहने का अनुमान है। अगर नोटबंदी का बहुत ज्यादा असर नहीं हुआ तो भारत की ग्रोथ रेट 2016 और 2017 में 7.6 फीसदी को भी पार कर सकती है। यह चीन की ग्रोथ रेट से भी ज्यादा है। चीन की 2016 और 2017 में ग्रोथ रेट 7 फीसदी से नीचे रहने की संभावना है। तथापि ब्रिटेन को जिस तरह से यूरोपियन यूनियन को भारी खमियाजा भुगतना पड रहा है, भारत को भी “ नोटबंदी“ से तगडा झटका लग सकता है। अधिकांश अग्रणी अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी से भारत के सकल घरेलू उत्पाद में दो फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। इससे भारत का 2021 में तीसरे पायदाने पर आने का सफर बाधित हो सकता है। ताजा पायदान से हमें ज्यादा इतराने की जरुरत नहीं है। प्रति व्यक्ति आय में ब्रिटेन अभी भी भारत से कही आगे है। भारत की 130 करोड आबादी के लिए 2.30 खरब डॉलर की जीडीपी कम पडती है और उसकी प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इंकम) 1.18 लाख रु के करीब है तो ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति आय भारत से 23 गुना ज्यादा 27.78 लाख रु है। इससे पता चलता है कि भारत में आर्थिक विषमता कितनी अधिक है। फॉस्ट ग्रोथ के तब तक कोई मायने नहीं जब तक यह आर्थिक विषमता को कम करने की जगह इसे और बढ़ाए । भारत की 40 फीसदी आबादी आज भी गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करती है और उसे दो समय का भरपेट भोजन भी नहीं मिल पाता ।
मंगलवार, 20 दिसंबर 2016
Why Did Venezuela Flop In Demonetization ?
Posted on 8:04 pm by mnfaindia.blogspot.com/
साउथ अमेरिका के प्रमुख तेल उत्पादक देश वेनेजुएला ने भी भारत की देखादेखी अपनी मुद्रा बोलिवर का विमुद्रीकरण करके माफिया के काले धन पर प्रहार क्या किया, पूरे देश में हिंसा फैल गई। वेनेजुएला के राश्ट्रपति निकोलस मादुरो ने 11 दिसंबर को देश में प्रचलित मुद्रा की सबसे बडी 100 बोलिवर करंसी की नोटबंदी (विमुद्रीकरण) की थी। एक सप्ताह बाद राष्ट्रपति को अपना फैसला स्थगित करना पडा। सरकार ने विमुद्रीकरण के लिए 72 घंटे की मोहलत दी थी। जिस समय बोलिवर का विमुद्रीकरण किया गया, तब इसकी कीमत डॉलर के मुकाबले दो सेंट से भी कम रह गई थी। 100 बोलिवर भारतीय 675 रुपयों के बराबर है। काले धन ने वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को तबाह कर रखा है। पूरे 2016 में इस देश में काले मुद्रा का दबदबा रहा। कहते हैं द्धितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी मुद्रा ( मार्क) की हालात यह हो गई थी कि लोगों को बोरों में भर कर करंसी ले जानी पडती और सामान जेब में डाल कर लाया जाता। लगभग यही स्थिति वेनेजुएला की है। वेनेजुएला की मुद्रा इस कद्र कमजोर हो चुकी है कि दुकानदार सामान तोलने की बजाए अब मुद्रा तोल रहे हैं। वेनेजुएला की कुल प्रसारित मुद्रा में 77 फीसदी हिस्सा 100 बोलिवर का था। इसके विमुद्रीकरण से महंगाई से पीडित जनता की क्रिसमिस से पहले बची-खुची क्रय शक्ति भी जाती रही। नोटबंदी के बाद से फैली हिंसा में तीन लोग मारे गए। हताशा में लोगों ने 100 बोलिवर से या तो सिगरेट जलाई अथवा उन्हें विरोधस्वरुप लैंपपोस्टों और दीवारों पर चिपका दिया । नई करंसी नहीं मिलने और पुरानी नहीं चलने पर गुस्साए लोगों ने दुकानें लूट लीं और जगह-जगह कानून अपने हाथ में ले लिया। भारत की ही तरह नोटबंदी के कारण पुराने बोलिवर जमा कराने के लिए बैंकों के समक्ष लोगों का हजूम उमड पडा। तीन लोगों की मौत, लूट-पाट और हिंसक प प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रपति मादुरो को नोटबंदी का फैसला दो जनवरी तक टालना पडा। बेलगाम महंगाई पर नियंत्रण पाने और माफिया द्धारा जमा की जा रही अवैध करंसी को निष्क्रिय करने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया था। राष्ट्रपति निकोलस मादुरो का आरोप है कि विदेशी साजिश के तहत नई मुद्रा से भरे तीन हवाई जहाज वेनेजुएला नहीं पहुंच पाए, जिस वजह लोगों को नई करंसी नहीं मिल पाई। मूलतः, वेनेजुएला तेल उत्पादक समृद्ध देश है और इसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से तेल के अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर निर्भर है। पिछले कुछ समय से तेल की कीमतों में भारी गिरावट के कारण वेनेजुएला गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है। माफिया और काली कमाई करने वालों ने भारी मात्रा में 100 बोलिवर की अरबों करंसी कोलंबिया और ब्राजील में छिपा रखी है। इससे वेनेजुएला में महंगाई चरम पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का आकलन है वेनेजुएला मैम मुद्रा-स्फीति 475 फीसदी से भी अधिक है। वेनेजुएला की स्थिति भारत से एकदम भिन्न है। भारत में महंगाई दर पहले की तुलना में काफी कम है। वेनेजुएला में काले धन की समस्या भारत से भी ज्यादा गंभीर है। ब्लैक मार्केट रेट को नियंत्रित करने के लिए वेनेजुएला में दो एक्सचेंज रेट है। इसके बावजूद भी करंसी की ब्लैक मर्केट को रोका नहीं जा सका है। बहरहाल, भारत सरकार को वेनेजुएला की स्थिति से सबक लेना चाहिए। वेनेजुएला की तरह अब नोटबंदी पर जनता का गुस्सा फूटने लग पडा है। कई जगह बैंक कर्मियों को जनता के गुस्से का सामना करना पड रहा है। भारतीय जनमानस के धैर्य की तारीफ की जानी चाहिए। जनमानस ने सरकार को सामान्य स्थिति लाने के लिए लंबा समय दिया है। गाय भी लंबे समय तक खूटे से बंधने रहने पर सींग मारती है। सरकार को अब तो नोटबंदी पर चाक-चौबंद हो जाना चाहिए।
सोमवार, 19 दिसंबर 2016
नोटबंदी : “दुविधा में दोऊ गए, माया मिली, न राम“।
Posted on 7:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नोटबंदी के बाद अब मोदी सरकार ने कैशलेस अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए कमर कस ली है। वीरवार को सरकार ने डिजिटल पेमेंट को बढावा देने के लिए 340 करोड रु के कैश इनाम देने का ऐलान किया। डिजिटल पेमेंट करने वाले ग्राहकों और कारोबारियों को हर रोज और साप्ताहिक ड्रा निकाले जाएंगें और 100 दिन बाद एक करोड रु का इनाम दिया जाएगा। अगले सौ दिन तक 15,000 ग्राहकों को एक-एक हजार रु का इनाम दिया जाएगा। 1 लाख, 10 हजार और 5 हजार के तीन साप्ताहिक इनाम भी होंगे। कारोबारियों को 50 हजार, 5 हजार और 1 हजार रु के तीन-तीन साप्ताहिक इनाम दिए जाएंगें। 15 अप्रैल को एक करोड, 50 लाख और 25 लाख रु के मेगा इनाम दिए जाएंगे। मोदी सरकार को भरोसा है कि नगद इनाम दिए जाने से देश में डिजिटल पेमेंट में इजाफा होगा। तथापि जमीनी हकीकत यह है कि देश को अभी डिजिटल पेमेंट व्यवस्था को अपनाने में कई साल लग सकते हैं। आंकडे इस बात के गवाह हैं। भारत में 70 फीसदी जनता के अभी भी बैंकों में कोई बैंक खाते नहीं है और उनका सारा लेन-देन कैश में चलता है। आयकर विभाग के अनुसार देश में इस समय कुल मिलाकर 44 करोड बैंक खाते हैं और 30 फीसदी खाते एक व्यक्ति या परिवार के हैं। लगभग 22 करोड जन-धन खाते हैं। 16 नवंबर तक जनधन खातों में 64,252 करोड रु की राशि जमा हो चुकी थी। मोदी सरकार की यह बडी उपलब्धि है। मगर समस्या यह है कि जन-धन के अधिकतर खाते क्रियाशील नहीं है। देश की 45 फीसदी आबादी ( सकल घरेलू उत्पाद का ) असंगठित क्षेत्र में है और यह पूरी तरह से नगदी पर आश्रित है। 3.85 करोड के करीब लघु और सीमांत कारोबारी हैं और 21,000 के करीब असंगठित मंडियां। इन सब में सारा लेनदेन नगदी भी किया जाता है। देश के अग्रणी औद्योगिक संगठन का आकलन है कि फॉस्ट मूविंग कंज्युमर गुडस (एफएमचीजी) का 93 फीसदी कारोबार करियाना स्टोर्स से किया जाता है और अधिकतर खरीदारी नगदी में की जाती है। मात्र एक फीसदी खरीदारी डिजिटल पेमेंट द्धारा की जाती है। शहरो में भले ही पेटीएम, ईवॉलेट जैसी डिजिटल पेमेंट सुविधा हो सकती है मगर ग्रामीण क्षेत्र अभी भी इस सुविधा से वंचित है। केवल 1.30 करोड लोगों के पास मोबाइल वॉलेट की सुविधा है। भारत में 95 फीसदी लोग अपने डेबिट कार्ड एटीएम से मात्र केश निकालने के लिए इस्तेमाल करते है। 5 फीसदी लोग ही डेबिट अथवा क्रेडिट कार्ड से खरीदारी करते हैं। इन आंकडों से साफ है कि देश को कैशलैश बनने में अभी कई साल लग सकते हैं और वह भी तब अगर सरकार कैशलैस बनने के लिए गांव-गांव डिजिटल पेमेंट की सुविधाएं मुहैया कराए। नोटबंदी का मकसद अगर काले धन को बाहर लाना है, तो यह इस मामले में बुरी तरह से विफल हुई है। सरकार ने खुद माना है कि 14.17 लाख करोड की नोटबंदी मेंसे अब तक 12 लाख करोड से ज्यादा के पुराने नोट बैंकों में जमा कराए जा चुके हैं और 31 दिसंबर तक यह आंकडा 14 लाख करोड तक पहुंच सकता है। इसके यह अभिप्राय है कि देश में काला धन बाहर आया ही नहीं और अगर थोडा बहुत आया भी, 44 करोड बैंक खाते खंगालने के बाद ही इसका पता चलेगा। वस्तु स्थिति यह है कि देश की कुल आय (जीडीपी) का 3.75 फीसदी काला धन के रुप में छिपा हुआ है और इस मेंसे मात्र 7.3 फीसदी नगदी में रखा गया है। बाकी का काला धन चल-अचल संपत्ति में छिपाया गया है। और जहां तक नकली नोटों का सवाल है आरबीआई का ही आकलन है कि दस लाख के नोटों में सिर्फ 250 रु नकली है। निष्कर्ष यह है कि नोटबंदी से “दुविधा में दोऊ गए, माया मिली, न राम“। बस आम आदमी को खामख्वाह का कष्ट झेलना पड रहा है।
शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016
भ्रष्ट बैंकिग व्यवस्था
Posted on 7:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कहावत है “ एक तो कंगाली, उस पर आटा गीला“। देश में नोटबंदी से उत्पन्न नगदी संकट को लेकर यह कहावत हूबहू चरितार्थ होती है। लोग सौ-सौ रु की नगदी के लिए भी मारे-मारे फिर रहे हैं मगर भ्रष्ट बैंककर्मी हैं कि करोडों के करारे-करारे नोट काली कमाई करने वालों को खुले हाथ से बांट रहे हैं। नोटबंदी के बाद से बैंक तो जैसे “राजा“ बन गए हों। जितने चाहें पुराने नोट बदलने के लिए खुला न्यौता देने के साथ-साथ फर्जी खाते खोलने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं जबकि कानूनन ऐसा करना अपराध है। वीरवार को नोएडा के एक्सिस बैंक में 20 कंपनियों के 100 से ज्यादा फर्जी खाते पकडे गए जिनमें 8 नवंबर के बाद से 60 करोड रु जमा किए जा चुके हैं। कानूनन, यह संगीन अपराध है। इससे पहले एक्सिस बैंक के 19 कर्मचारियों को मनी लॉड्रिंग में संलिप्त पाने पर निलंबित कर दिया गया था। इस घटना के बाद एक्सिस बैंक ने कुछ जौहरियों और सोना व्यापारियों के खातों को भी बंद कर दिए थे । एक्सिस सोना आयात करने वाला देश का सबसे बडा बैंक है। नोटबंदी के बाद से देश में जौहरियों द्धारा दोगुने-तिगने दामों पर पुराने नोटों लेकर सोना-गहने बेचने के मामले भी सामने आए हैं। नवंबर में चंडीगढ में आबकारी एवं कर अधिकारियों ने तीन जोहरियों को ऐसा करते रंगे हाथ पकडा था। आईटी अधिकारियों को ऐसी सूचना भी मिली है कि नोटबंदी के बाद दिल्ली के एक सोना व्यापारी ने 600 करोड का सोना बेचकर बैंक में जमा करवाए जबकि नियमानुसार ऐसा नहीं किया जा सकता । शुरु-शुरु में 500 और 1000 रु के पुराने नोटों पकडे जाते थे मगर जैसे ही नए नोट बैंकों में आने लग पडे, इन्हें “बेचने“ का धंधा शुरु हो गया। 12 दिसंबर तक देश में 164.57 करोड रु के नए नोट काली कमाई करने वालों को “बेचे“ जा चुके थे। सरकार की ताजा नीति के अनुसार एटीम से 2000 रु ( 2500 पर एटीएम में 500 अथवा 100 के नोट नहीं होने से 2000 ही निकलते हैॅ्) से ज्यादा कैश नहीं निकाला जा सकता। इस स्थिति के दृष्टिगत इतनी बडी रकम को एटीएम से निकालना दो चार- लोगों के लिए कतई मुमकिन नहीं था। इसके लिए 658, 282 लोगों की जरुरत पडती। यानी यह कैश देश के 658, 282 लोगों को मिल सकता था। नगदी निकालने के ताजा प्रतिबंध के अनुसार इतनी बडी रकम को चैक से निकालने के लिए भी 68, 571 बैंक खाता धारकों की जरुरत पडती। इस रकम से देश के 1374 एटीएम आसानी से पूरी कैश क्षमता से चलते। स्पष्ट है भ्रष्ट बैंककर्मियों की मिलीभगत के बगैर इतनी बडी रकम काला धंधा करने वालों के हाथ लग ही नहीं सकती थी। बैंकिग सेक्टर के उदारीकरण ने व्यवस्था को और ज्यादा लचर कर दिया है। सरकार की सबसे बडी सिरदर्दी भी यही है कि देश के 44 करोड खाता धारकों को कैसे खंगाला जाए। देश में इस समय आयकर विभाग में लगभग 25,000 कर्मचारियों की कमी है। 55,000 आयकर कर्मी 76,000 का काम कर रहे हैं और इससे उन पर काम का खासा दबाव पड रहा है। पहली जनवरी से आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय के साथ मिलकर नोटबंदी के दौरान मनी लॉड्रिंग का पता लगाने के लिए बैंक खातों की एसेसमेंट शु रु करने जा रहा है मगर इसके लिए भी विभाग को अतिरिक्त टॉफ की दरकार है। नगदी संकट जल्द दूर होने नहीं जा रहा है। सरकार ने वीरवार को फिर कहा कि अभी तक 5 खरब रु के करीब की नगदी सिस्टम में डाली जा चुकी है। इसकी तुलना में नोटबंदी से 500 और 1000 रु की 15.44 खरब की नगदी निकाली गई है। सरकार नगदी संकट को दूर करने के लिए धडाधड 500 रु के नोट छापने जा रही है मगर 10 खरब रु से ज्यादा नगदी की कमी को पूरा करने में महीने लग सकते हैं।
गुरुवार, 15 दिसंबर 2016
समग्र चुनाव सुधार
Posted on 7:49 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दुनिया के विशालतम भारतीय लोकतंत्र को अविलंब क्रांतिकारी चुनाव सुधार की दरकार है। काला धन, आपराधिक तत्वों की घुसपैठ, मतदाताओं को लुभाने की सियासत, जात-पात और राजनीति में धर्म के घाल-मेल ने भारत में लोकतंत्र को धन, बल और निहित स्वार्थी राजनीति ( करप्शन, कम्युनिल्जम, कास्टिज्म एंड क्राइम) का मोहताज बना रखा है। देश में अक्सर चुनाव सुधारों की चर्चा की जाती हैं और हर छोटा-बडा राजनीतिक दल इसकी हिमायत भी करता है, पर क्रांतिकारी चुनाव सुधारों को अमली जामा पहनाने में हर सरकार अपना हाथ खींच लेती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में अविलंब चुनाव सुधारों का वायदा किया था। मोदी सरकार को सत्ता में आए अढाई साल से ज्यादा का समय हो गया है मगर इस मामले में अब तक कोई गंभीर पहल नहीं हुई है। फरवरी में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के दृष्टिगत निर्वाचन आयोग ने पहल की है और सरकार से प्रत्याशियों को एक से ज्यादा सीट से चुनाव लडने पर प्रतिबंध की वकालत की है। निर्वाचन आयोग ने यह सिफारिश भी की है अगर इस छूट को जारी रखना है तो सीट खाली करने वाले प्रत्याशी से चुनाव खर्च की राशि वसूल की जाए। पूरा देश निर्वाचन आयोग की इस सिफारिश से सहमत है और इसे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। सियासी नेताओं की सुविधा के लिए जनता का पैसा इस तरह से लुटाया नहीं जा सकता। इसके लिए संसद में चुनाव संबंधी कानून में संशोधन करना पडेगा। संसद के मीजूदा शीतकालीन सत्र में इस संबंधी कानून लाना मुमकिन नहीं लग रहा है। शीतकालीन सत्र के मात्र दो दिन बचे हैं और बजट सत्र तक पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की चुनाव प्रकिया शुरु हो जाएगी। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि भारत में चुनाव के दौरान धन और बल का खुलकर दुरुपयोग किया जाता है। निष्पक्ष , निर्भीक और स्वतंत्र चुनाव लोकतंत्र की बुनियाद है। धन और बल लोकतंत्र की इस बुनियाद को खोखला करते हैं। देश को आजाद हुए सात दशक हो गए हैं मगर हर चुनाव में धन और बल का दुरुपयोग उतरोत्तर बढता ही जा रहा है। इस सच्चाई को भी पूरी दुनिया जानती है कि भारत में चुनाव के लिए खर्च की जो वैधानिक सीमा है, अमल मे उससे कहीं ज्यादा खर्च किया जाता है। और सबसे बडी त्रासदी यह है कि चुनाव सपन्न होने के बाद लगभग सभी प्रत्याशी चुनाव खर्च का झूठा ब्यौरा देते हैं। जाहिर है जिस चुनाव की बुनियाद ही झूठ-फरेब पर रखी जाए, उसके बलबूते लोकतंत्र कैसे फल-फूल सकता है? चुनावों को लेकर देश की सबसे बडी समस्या भी काला धन है। राजनीतिक दलों को चंदे के रुप में काला धन लेने की खुली छूट है। राजनीतिक दलों को आयकर छूट भी है। चुनाव प्रचार में काले धन का बोलबाला रहता है। कोई भी प्रत्याशी सफेद कमाई से चुनाव नहीं लडता। बहरहाल, देश में अगर चुनाव को निष्पक्ष , निर्भीक और स्वतंत्र बनाना है तो सबसे पहले चुनाव में काले धन के दुरुपयोग को पूरी तरह से रोकना होगा। और यह तभी संभव है जब चुनाव की स्टेट फडिंग होगी। देश को इसके लिए तैयार करना पडेगा। पर सबसे बडा सवाल यह है कि क्या देश के सभी राजनीतिक दल इसके लिए सहमत होंगे? निर्चाचन आयोग की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि लगभग 1866 पंजीकृत राजनीतिक दलों में अधिकतर चुनाव नहीं लडते हैं। निर्वाचन आयोग का आकलन है कि इन दलों को काला धन सफेद करने के लिए इस्तेमाल क्यिा जाता है। राजनीति से अपराधियों को बाहर रखना, जात-पात और राजनीति में धर्म के घालमेल से बचना और नैतिक मूल्यों पर सख्ती से अमल करवाना चुनाव सुधार के प्रमुख बिंदु हैं, जिन पर तुरंत अमल किया जाना चाहिए। प्रधानमंत्री अगर काला धन को जड से खत्म करने के लिए वाकई संजीदा है, तो उन्हें सबसे पहले क्रांतिकारी चुनाव सुधार लाने पडेंगे।
बुधवार, 14 दिसंबर 2016
“विराट“ टीम इंडिया
Posted on 7:31 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मुंबई के वानखेडे
स्टेडियम में शनिवार को भारतीय बल्लेबाज चितेश्वर पुजारा उस समय
झल्ला उठे जब उनके आउट होने पर दर्शकों ने तालियों से उनका स्वागत किया।
पुजारा समझ नहीं पाए कि स्टेडियम में क्रिकेट प्रेमी किस बात के लिए उनका तालियों से
स्वागत कर रहे हैं। उन्होंने कोई बहुत बडा स्कोर खडा नहीं किया था और जिस
समय पुजारा आउट हुए भारत को इंग्लैंड की पहली पारी के 400 रनों का पीछा
करना था मगर केएल राहुल और पुजारा के जल्द आउट होने पर भारत दबाव में आ गया
था। दरअसल, दर्शक पुजारा के आउट होने पर नहीं, इस बात के लिए तालियां बजा
रहे थे कि उनके आउट होने पर कप्तान विराट कोहली क्रीज पर आएंगें। फैंस
बेसब्री से कोहली की बैटिंग का इंतजार कर रहे थे। कोहली ने उन्हें निराश नहीं किया। उनकी 235 रनों की पारी ने ही भारत की जीत की नींव रखी।
पुजारा के आउट होते ही वानखेडे स्टेडियम “कोहली,,,,कोहली“ के नारों से
गूंज उठा था। कोहली के मैदान मे आते ही पूरा स्टेडियम जैसे झूम रहा था।
2013 में सचिन तेंदुलकर के रिटायर होने के बाद से विराट कोहली एकमात्र
टेस्ट खिलाडी हैं जिन्हें दर्शकों ने इस कद्र चाह है। विराट 2016 में तीन दोहरे शतक लगाने के बाद से कोहली की सचिन से तुलना भी
की जानी लग पडी है। सचिन का रिकार्ड बेजोड है और दुनिया के किसी भी
बल्लेबाज को इसे तोड पाना आसान नहीं है। टेस्ट और एक दिवसीय मैचों में
34,000 से ज्यादा रन और शतकों का शतक (100 शतक) सचिन के नाम है। निसंदेह,
यह अद्धितीय रिकार्ड है। विराट कोहली अब तक 15 टेस्ट और 26 एक दिवसीय शतक
जमा चुके हैं। कोहली को अभी सचिन के रिकार्ड के आस-पास पहुंचने के लिए भी
कई पापड बेलने पडेंगें। तथापि दर्शकों को भरोसा है कि दुनिया का अगर कोई
मौजूदा बल्लेबाज सचिन के रिकार्ड के करीब आ सकता है, तो वह विराट कोहली ही
है। इग्लैंड के खिलाफ चौथे टेस्ट में कोहली की विराट पारी ने भारत की जीत
की नींव तो रखी ही मगर कई रिकार्ड भी बनाए। किसी भारतीय कप्तान द्धारा साल
में तीन दोहरे शतक बनाने का कोहली ने नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वे
अभी सिर्फ 28 साल के हैं और उनमें अभी कई रिकॅार्ड बनाने की क्षमता
है। 2011 में राहुल द्रविड के बाद एक साल मे 1000 टेस्ट रन बनाने वाले
विराट पहले खिलाडी हैं। 2014 में विराट इग्लैंड के खिलाफ बहुत ज्यादा रन
नहीं बना पाए थे। पांच टेस्ट श्रृंखला में कोहली 13.4 की औसत से मात्र 134
बना पाए थे और तब 39 रनों की उनकी सबसे बडी पारी थी। वही कोहली 2016 में
इग्लैंड के खिलाफ 126 की औसत से चार टेस्ट मैचों में 640 रन बना चुके है।
बतौर टेस्ट कप्तान विराट कोहली का रिकार्ड भी लाजवाब है। टीम इंडिया का
कप्तान बनने से पहले कोहली का टेस्ट में बल्लेबाजी औसत 41 के आस-पास था मगर
टेस्ट टीम को लीड करने के बाद से उनका बल्लेबाजी औसत 65.5 है। बतौर टेस्ट
कप्तान कोहली अब तक 6 शतक जामा चुके हैं और केवल तीन कप्तान- सुनील गावस्कर
(11 ) मोहम्मद अजहरुद्यीन (9) और सचिन तेंदुलकर (7) उनसे आगे है। विराट
एकमात्र ऐसे बल्लेबाज है जिनका टी20, एकदिवसीय और टेस्ट का औसत 50 से ऊपर
है। दुनिया के किसी भी बल्लेबाज का कोहली बराबर औसत नहीं है। विराट कोहली
की अगुवाई में 84 साल के टेस्ट करियर में भारत ने पहली बार लगााार तीन और
इससे अधिक 5 टेस्ट श्रृंखला में लगातार जीत दर्ज की है। डॉन ब्रैडमैन
(69.04 प्रतिश त) और जार्ज हैडली (66.67 प्रतिशत) के बाद विराट कोहली ( 52
प्रतिशत्) दुनिया के तीसरे एकमात्र क्रिकेटर हैं जो 50 के बाद अपनी पारी
को शतक में बदलने का मादा रखते हैं। सचिन तेंदुलकर के बाद विराट कोहली भारत
का वह नगीना है जो क्रिकेट के हर फार्मेट का बादशाह है।
मंगलवार, 13 दिसंबर 2016
नोटबंदी से जनता खुश : एक खबर
Posted on 7:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
1, नोटबंदी के बाद देष में 100 से ज्यादा लोगों की मौत मगर टीवी पर जनता कह रही मोदी ने अच्छा काम किया है।
2, नोटबंदी से लोगों को अपनी गाढी कमाई नहीं मिलने से बेटियों की शादियां टलने पर हताश मता-पिता ने खुदकुशी की। पर जनता टीवी चैनल्स पर कह रही है, मोदी ने अच्छा काम किया।
3, नोटबंदी से बैक के बाहर कतार में खडी-खडी महिला ने बच्चे को जन्म दिया, जनता कह रही मोदी ने बहुत अच्छा काम किया।
4, नोटबंदी के एक महीने बाद भी बैंकों और एटीएम पर लंबी कतार में खडे-खडे जनता बेहाल। फिर भी जनता कह रही है मोदी ने बहुत अच्छा काम किया।
निष्कर्ष : धन्य है भारत की जनता और टीवी चैनल्स। अब समझ में आया अपराधी, गुंडे और मव्वाली कैसे चुनाव जीतते हैं।
प्रधानमंत्री पर यह कैसा भरोसा !
Posted on 7:19 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नोटबंदी के कारण भारी कष्ट सहने के बावजूद देश के जनमानस को प्रधानमंत्री की बात पर पूरा भरोसा है। देशवासियों के इस धैर्य और कुर्बानी भाजपा खूब इतरा रही है। प्रधानमंत्री ने लोगों से नोटबंदी से उपजे संकट से निपटने के लिए 50 दिन का समय मांगा है और इस माह के अंत में यह अवधि खत्म होने जा रही है। नोटबंदी फैसले के एक माह बाद अभी भी देश नगदी के संकट से उभर नहीं पाया है। तथापि लोगों को पूरी उम्मीद है कि दिसंबर होते-होते नव वर्ष में लोगों को नगदी के संकट से जूझना नहीं पडेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को उत्तर प्रदेश में जनसभा को संबोधित करते हुए फिर कहा कि नोटबंदी पर उन्हें अपना “50 दिन“ का वायदा अच्छी तरह से याद है और वे हर हाल में इसे पूरा करेंगे। प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर आरोप लगाया कि वह संसद में उन्हें बोलने नहीं दे रहा है, इसलिए वे जनता से मुखातिब होकर नोटबंदी पर अपना पक्ष रख रहे हैं। निसंदेह, नोटबंदी के बाद नवंबर माह की अपेक्षा दिसंबर में स्थिति में मामूली सुधार आया है मगर सामान्य स्थिति लौटने में काफी समय लग सकता है। व्यवस्था में गंभीर खामियां हैं, और इसके लिए देश की भ्रष्ट “ नौकरषाही और बैकिंग व्यवस्था जिम्मेदार है। लोग-बाग ही नहीं सरकार खुद इस बात पर हैरान है कि उपलब्ध नगदी का नियंत्रित करने के लिए बैंकों और एटीएम से नगदी निकालने की सीमा तय किए जाने के बावजूद काला धन जमा करने वालों को करोडों के नए नोट कहां से मिल रहे हैं? नोटों की छपाई सेना के कडे पहरे में की जा रही है और देश के विभिन्न शहरों में नोटों की खेप कडी सुरक्षा में पहुंचाई जा रही है। जाहिर है नए नोटों को काला धन जमा करने वालों को “बेचने“ का धंधा बेंकों के माध्यम से चल रहा है। यहीं नही देश के निजी क्षेत्र के कई बैंक बुला-बुला कर पुराने नोट जमा करने का न्यौता दे रहे हैं। ताजा सूचना के अनुसार प्रधानमंत्री को बैंकों में दलाल, पुलिस और काला धंधा करने वालों के बीच जबरदस्त सांठगांठ के पुख्ता सबूत मिले हैं। बैकों की 500 शाखाओं में करवाए गए स्टिंग से सामने आया है कि किस तरह “भ्रष्ट" बैंककर्मी” पुलिस और दलाल से मिलकर प्रधानमंत्री की काला धन बाहर निकालने की मुहिम को पलीता लगा रहे हैं। देश को कुल मिलाकर 14.5 लाख करोड रु के नए नोट की जरुरत है। 8 नवंबर के बाद इतनी करंसी सिस्टम से सोखी जा चुकी है। आंकडों के अनुसार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की नोट छापने वाले यूनिट दिन-रात काम कर रहे हैं और प्रतिदिन 15 से 20 मिलियन के नए नोट छाप रहे हैं। आरबीआई के अनुसार अब तक लगभग तीन लाख करोड के नए नोट सिस्टम में डाले जा चुके हैं। मगर इसमें 2000 और 500 रु के नोट शामिल नहीं हैं। अनुमान है कि आरबीआई ने 2000 रु के लगभग दो बिलियन के नए छापे हैं। 500 रु के नोट अभी ज्यादा संख्या में सिस्टम में आए नहीं है। कुल मिलाकर, अभी तक सिस्टम में 5 लाख करोड रु ही डाले गए हैं जबकि 14.5 लाख करोड रु (14,500 बिलियन) की जरुरत है। मोटे तौर पर, एक महीने में आरबीआई अगर पांच लाख करोड रु के नए नोट छाप पाया है, तो अगले बीस दिन में साढे नौ लाख करोड रु की छपाई कतई मुमकिन नही है। आरबीआई प्रतिदिन ज्यादा से ज्यादा 20 मिलियन नए नोट छाप सकता है। यानी एक बिलियन नए नोट छापने में ही 50 दिन लगते हैं। इस गति से आरबीआई को बकाया साढे नौ लाख करोड मूल्य के नए नोट छापने में कई महीने लग सकते हैं । प्रधानमंत्री ने फिर कहा है कि उन्होंने हिसाब लगाया है कि नोटबंदी से उत्पन्न स्थिति को सामान्य होने में 50 दिन लग सकते हैं। देश के जनमानस की दिली इच्छा है कि प्रधानमंत्री का गणित सही हो और नए साल में लोगों को अपना पैसा निकालने के लिए बैंकों के धक्के न खाने पडे। मगर जमीनी सच्चाई इस बात की पुष्टि नहीं करती है।
रविवार, 11 दिसंबर 2016
“संसद को चलने दें“
Posted on 9:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नोटबंदी पर संसद के षीतकालीन सत्र की कार्यवाही को निरंतर बाधित करने से चितिंत देश के प्रथम नागरिक (राष्ट्रपति ) को सांसदों को नसीहत देनी पडी है। संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र की अब तक 17 बैठकों मेंसे बमुश्किल 10 घंटे का कामकाज हुआ है। और कामकाज का निपटान भी ज्ल्दबाजी में किया गया। 16 नवंबर को राज्यसभा की कार्यवाही अगर पांच घंटे चली तो लोकसभा मात्र 10 मिनट की कार्यवाही के बाद विपक्ष के हंगामे में स्थगित कर दी गई। 24 नवंबर को लोकसभा 15 मिनट चली। पूरे नवंबर में यही स्थिति रही। दिसंबर में अब तक लगभग यही स्थिति रही है । राज्य सभा की स्थिति भी ज्यादा बेहतर नहीं है। 16 नवंबर को छोडकर राज्यसभा में विपक्ष के शोर -शराबे के बीच कार्यवाही हर दिन बार-बार बाधित होती रही। अभी तक केवल 16 नवंबर को राज्यसभा की कार्यवाही पांच घंटे चल पाई । इसके बाद बाकी दिन राज्यसभा और लोकसभा की कार्यवाही ज्यादा से ज्यादा आधा घंटे ही चली। 8 दिसंबर को लोकसभा में प्राइवेट मेंबर्स डे था और इस दौरान कुछ महत्वपूर्ण कामकाज निपटाया जाना था मगर सदन की कार्यवाही आध घंटे में ही स्थगित करनी पडी। नियमानुसार संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही कम-से-कम 6 घंटे तो चलनी ही चाहिए। यानी 17 दिन में 102 घंटे का कामकाज तो होना ही चाहिए था। देश के सांसद इस सच्चाई को भली-भांति जानते हैं कि संसद की एक मिनट की कार्यवाही की मौजूदा लागत 3 लाख है। अर्थात संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर 1 करोड 80 लाख रु खर्च होते हैं। इस हिसाब से (102-10) 82 घंटे की कार्यवाही जाया करने के लिए विपक्ष ने जनता की कमाई का 165 करोड महज नोटबंदी पर अपनी सियासी रोटियां सेंकने के लिए बर्बाद किए हैं। इसके बावजूद भी जनता को कोई राहत नहीं मिली है। जनमानस से पूछा जाए तो वह कहेगा कि इस नुकसान की भरपाई उन सांसदों के वेतन से की जाए, जो इसके लिए जिम्मेदार है। इसी बात से चिंतित राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने संसद की कार्यवाही बाधित करने के लिए विपक्ष को खरी-खोटी सुनाई है। वीरवार को राष्ट्रपति ने इस बात पर दुख व्यक्त किया कि संसद की कार्यवाही को बाधित करने का जैसे चलन हो गया है। पूरा देश राष्ट्रपति की इस बात से सहमत होगा कि सांसदों को संसदीय कामकाज निपटाने और जनता की समस्याओं का हल ढूंढने के लिए चुना जाता है, संसद को बाधित करने के लिए नहीं। देश के प्रथम नागरिक को अगर सांसदोॅ को उनके संसदीय जिम्मेदारी का अहसास कराना पडे, तो इससे पता चलता है कि देश की राजनीति का किस हद तक पतन हो चुका है। बहरहाल, संसद की कार्यवाही बाधित करने से हो रहे नुकसान पर विपक्ष का तर्क है कि जनता ने उन्हें संसद में जन समस्याओं को उठाने के लिए चुना है और नोटबंदी से जनता जिस तरह से हलकान हो रही है, उसके दृष्टिगत इस मामले को उठाना बनता है। तथापि, सच्चाई यह है कि देश के लगभग सभी सियासी दलों का दोहरा आचरण है। विपक्ष में रहते हुए सब जायज मगर सत्ता में आते ही विपक्ष का सारा विरोध नाजायज। विपक्ष पहले प्रधानंत्री की लोकसभा में उपस्थिति पर अडा रहा और जब प्रधानमंत्री सदन में आए, विपक्ष चर्चा पर अड गया। राष्ट्र को अच्छी तरह से याद है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने भी 2जी स्कैम और कोयला घोटाले (कोलगेट) पर कई दिनो तक संसद नहीं चलने दी थी। बहरहाल, नोटबंदी पर संसद को नहीं चलने देना समस्या का हल नहीं है। मौजूदा शीतकालीन सत्र की मात्र चार बैठकें बची हैं और अभी काफी सारा कामकाज निपटाना बाकी है। कई अहम विधेयक अभी सदन में प्रस्तुत तक नहीं हो पाए हैं। इनमें कर्ज माफी के लिए नई स्कीम का विधेयक, व्हिसल ब्लोअर्स और विटनेस प्रोटेक्शन जैसे अहम बिल षामिल हैं। इन विधेयकों के पारित नहीं होने से जनता का ही नुकसान होगा।
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
नोटबंदी से क्या मिला़़?
Posted on 7:52 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नोटबंदी के एक माह बाद भी देश में व्याप्त वित्तीय अव्यवस्था में कोई संतोषजनक सुधार नहीं हो पाया है। दो लाख मेंसे अधिकांश ऑटोमेटिड टैलर मशी नें (एटीएम) खाली पडी हैं। पूरे देश में मात्रा 44,000 एटीएम काम कर रहे हैं। बैक एक दिन में अधिकतम 6 हजार से ज्यादा नगदी नहीं दे रहे हैं। नोटबंदी से अब तक देश में 85 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। काले धन को समाप्त करने के लिए सरकार विमुद्रीकरण करे, इस पर लोग-बाग सरकार के साथ है पर इसके लिए आम आदमी को अपनी जान देनी पडे, पूरी दुनिया में ऐसी मिसाल नहीं मिलती है। गर्भवती महिला ने अपना ही पैसा लेने के लिए कतार में खडे-खडे बच्चे को जन्म दिया हो, ऐसी मिसाल भी दुनिया में नहीं मिलती है। अपना ही कमाया पैसा नहीं मिलने से कई शादियां टूट चुकीं हैं। उन मां-बाप पर क्या गुजर रही है, जो ताउम्र पाई-पाई जमा करने के बावजूद जमा पैसा नहीं निकाल पाने के कारण अपनी बेटियों का ब्याह तक नहीं कर पा रहे हैं। नगदी की कमी के कारण कई लोगों को समय पर उपचार नहीं मिल पाया है। गरीबों के उपचार के लिए दान देने वालों ने भी अपना हाथ खींच लिया है। पूरे देश में आम आदमी एक महीने से हाल-बेहाल है। इतना सब होने के बाद भी सरकार काले धन को बाहर निकालने के लिए उठाए गए नोटबंदी कदम पर खूब इतरा रही है। नोटबंदी से कितना काला धन बाहर निकला है, इसका अभी पुख्ता आकलन नही हुआ है। तथापि, अनुमान है कि देश में 75 लाख करोड की सकल घरेलू आय (जीडीपी) का लगभग 8 फीसदी अथवा 6 लाख करोड नगदी काले धन के रुप में छिपाया गया है। अर्थशास्त्रियों का भी यही आकलन है कि लगभग साढे लाख करोड की नगदी काला धन है। 31 मार्च, 2016 को देश में 500 और 1000 रु की 14.5 लाख करोड रु की नगदी बाजार में थी और नोटबंदी के दिन भी इतनी ही मुद्रा थी। इस हिसाब से इस नोटबंदी के दिन 6 लाख करोड की नगदी काले धन के रुप में थी और 8.5 लाख करोड व्हाइट मनी। सरकार का दावा है कि 9 नवंबर से 7 दिसंबर तक देश के विभिन्न बैंकों में 11.5 लाख करोड के पुराने नोट बैंकों में जमा किए जा चुके हैं। पर सबसे बडे सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का आकलन है कि इस 11.5 लाख करोड रु मेंसे लगभग 10 से 15 फीसदी की गिनती दो बार हुई है। यानी लगभग 10 लाख करोड के 500 और 1000 रु के नोट जमा हुए हैं और इसमें से अधिकतर 8.5 लाख करोड व्हाइट मनी है। इमानदार आदमी अपने पुराने नोट बदलने के लिए दौडा-दौडा बैंक पहुंचा और कई दिनों तक कतार में लगा रहा मगर काला धन छिपाने वाले कहीं भी कतार में नजर नहीं आए। यानी 14.5 लाख करोड रु की नगदी मेंसे 6 लाख करोड का अधिकतर काला धन अभी भी बाहर आना बाकी है। काला धन ज्यादातर सोना, गहने और मकान जैसी अचल संपति में छिपाया जाता है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में माना है कि 5 करोड रु की नगदी बाहर नहीं आएगी। वीरवार को चेन्नई में मारे गए छापों में 100 किलो सोना और 80 करोड के नए नोट की करंसी का जब्त किया जाना भी यही दर्शाता है कि नोटबंदी से काला धन वालों पर पूरी तरह से नकेल नहीं डल पाई है। इसके यही अभिप्राय है कि नोटबंदी से 6 लाख करोड रु मेंसे 5 लाख करोड रु की समानांतर अर्थव्यवस्था जारी रहेगी और मिल मिलाकर एक लाख करोड रु ही बाहर आया है। सेंटर फॉर मॉनिटिरिंग दी इंडियन इकॉनॉमी का आकलन है कि 31 दिसंबर, 2016 तक विमुद्रीकरण की सरकारी लागत 1.29 लाख करोड रु तक पहुंच जाएगी। इन आंकडों से यही निष्कर्ष निकलता है कि नोटबंदी से काला धन तो बाहर नहीं निकला मगर देश में वित्तीय अफरा-तफरी जरुर फैली है।
गुरुवार, 8 दिसंबर 2016
कंगाली में आटा गीला
Posted on 7:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नए गवर्नर और ब्याज दरें तय करने के लिए गठित छह-सदस्यीय समिति ने ब्याज न घटाकर लोगों को “कंगाली में आटा गीला“ की सौगात दी है। एक माह पहले आठ नवंबर को 500 एवं 1000 रु के नोट बंद किए जाने के बाद से देश का लगभग हर आर्थिक और वित्तीय विशेषज्ञ नोटबंदी के बाद उपजी “नगदी के संकट“ की स्थिति के दृष्टिगत ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहा था। विभिन्न एजेंसियों द्वारा अर्थशास्त्रियों एवं वित्तीय विशेषज्ञों की राय पर करवाए गए हर सर्वेक्षण में भी ब्याज कटौती की उम्मीद जताई गई थी। मगर आरबीआई के गर्वनर और समिति ने ब्याज दरों को यथावत रख कर सभी को चौंकाया दिया है और महंगे कर्ज और नगदी के संकट से त्रस्त लोगों को राहत देना मुनासिब नहीं समझा है। उन्हें मुद्रा-स्फीति की ज्यादा चिंता है। नोटबंदी के बाद से देश की अर्थव्यवस्था में ग्रोथ की रफ्तार काफी धीमी पड गई है। आरबीआई ने खुद माना है कि नोटबंदी से ग्रोथ पर प्रतिकूल असर पडा है। इसीलिए आरबीआई ने चालू वित्तीय के लिए सकल वैल्यू एडिड ग्रोथ आउटलुक को 7.6 फीसदी से घटाकर 7.1 फीसदी कर दिया है। एक माह से भी कम समय में अगर आरबीआई को ग्रोथ आउटलुक 0.5 फीसदी घटाना पडा है, जाहिर है अगले कुछ महीनों में वैल्यू एडिड ग्रोथ की रफ्तार और भी धीमी पड सकती है। बुधवार को ही एक सर्वेक्षण में बताया गया कि नोटबंदी से स्टॉक मार्केट को भी खासा नुकसान हुआ है और अगले साल सेंसेक्स के रिकार्ड हाई छूने की जो उम्मीद है, उस पर पानी फिर गया। बुधवार को आरबीआई की मौद्रिक नीति घोषित होते ही सेंसेक्स और निफ्टी दोनों ही लुढक गए। नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित ख्यातिप्राप्त अमर्त्य सेन समेत देश के लगभग सभी अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत है कि नगदी पर फल-फूल रही भारतीय अर्थव्यवस्था से एकाएक केश की आक्सीजन बंद कर देने से ग्रोथ पर बहुत बुरा असर पड सकता है। पांच सौ और एक हजार रु के नोट बंद किए जाने से 86 फीसदी नगदी अर्थव्यवस्था से गायब हो गई है। नोटबंदी को एक माह का समय हो गया है, मगर इसकी जगह अभी बमुश्किल 27 फीसदी कैश भी मार्केट में आ पाया है। कालेधन को समाप्त करने के मोदी सरकार के दावे भी खोखले साबित हो रहे है़। आम आदमी को मामूली सी नगदी के लिए भी तरसना पड रहा है, मगर भ्रष्ट और टैक्स चोर आराम से दो हजार के करोडों के नए नोट जमा कर रहे हैं। बगंलुरु के दो इजीनियरों के घर से 4.5 करोड रु के नए नोट मिलना यही साबित करता है कि सरकार द्धारा जारी नए नोट आम आदमी को भले ही न मिले पर भ्रष्ट और काले कमाई करने वालों को आसानी से मिल रहे हैं। आए दिन लाखों के नए नोट जब्त किए जाने के मामले भी यही कह रहे हैं। आरबीआई को लगता है कि तेल की अंतरराश्ट्रीय कीमतों में आ रहे उछाल से मुद्रा-स्फीति बढ सकती है। भारत अपनी तेल खपत का 80 फीसदी आयात करता है। इस स्थिति में तेल आयात से मुद्रा-स्फीति के आयात का खतरा भी बना रहता है। आरबीआई ने ब्याज दरें यथावत रखने के लिए यह तर्क भी दिया है कि मुद्रा-स्फीति का खतरा अभी पूरी तरह से टला नहीं है। आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुुराम राजन भी ब्याज दरें नहीं बढाने के लिए यही तर्क दिया करते थे। तब वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपाई राजन की मुद्रा-स्फीति नियंत्रण की इस नीति के मुखर आलोचक हुआ करते थे। अब उम्मीद की जा सकती है कि आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल और समिति के सदस्य एक फरवरी को पेश होने जा रहे बजट के बाद फरवरी को जारी होने वाली मौद्रिक नीति में ब्याज दरे में कुछ कटौती दें। तब तक नोटबंदी के परिणाम भी सामने आ जाएंगें और बजट में मुद्रा-स्फीति को रोकने के लिए सरकार क्या कदम उठाने जा रही है, इसका भी पता चल जाएगा। अब लोगों को फरवरी तक इंतजार करने के सिवा कोई चारा नहीं है।
बुधवार, 7 दिसंबर 2016
जयाः अम्मु से अम्मा तक का सफर
Posted on 7:53 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आजाद भारत के कर्नाटक राज्य (तब मैसूृर) में जन्मी-पली और कन्नड सिनेमा से तमिल फिल्मों में पर्दापण कर नायिका से सियासी क्वीन बनी जयराम जयललिता के निधन से एक युग का अंत हो गया है। वे आम औरत की तरह कतई नहीं थी। उन्होंने कई परंपराएं तोडीं और नई परंपराएं कायम की। मीडिया के लिए जयललिता एक एग्निमा थीं, विरोधियों के लिए तीखी मिर्च, समर्थकों के लिए “अम्मा“। भारत में महिला को बुलंदियां छूने के लिए जितना संघर्ष करना पडता है, जयललिता ने उससे कहीं ज्यादा स्ट्रगल किया। और संघर्ष इतना किया कि अम्मु की शख्सियत आसमान को छूने लग पडी। तमिल नाडु में अपने जमाने में कल्ट माने जाने वाले एमजीआर (एम जी रामचन्द्रन) की राजनीतिक विरासत को पाना और निभाना आसान नहीं था। पर जयललिता ने यह भी संभव कर दिखाया। उन्होंने एमजीआर को भी पीछे छोड दिया। वे इरादों की पक्की थीं और जिस बात की ठान लेती, उसे पूरा करके ही हटतीं । तमिल नाडु विधानसभा में एक बार द्रमुक सदस्य ने उनका पल्लू खींच लिया था। इससे गुस्साई जयललिता ने तब सदन में ही द्रमुक सरकार को गिराने का संकल्प लिया और इसे 1991 में मुख्यमंत्री बनकर पूरा करके छोडा। राजनीति सूझबूझ में जया की सानी नहीं थी। 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू किए जाने पर तमिल नाडु में विकट स्थिति खडी हो गई थी। ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण दिया जाना था मगर सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नही दिया जा सकता था। ओबीसी को आरक्षण दिए जाने से तमिल नाडु में आरक्षण की सीमा 69 फीसदी को पार कर रही थी। यह सुप्रीम कोर्ट व्यवस्था की अवहेलना होती। तब जयललिता ने विधानसभा में 69 फीसदी आरक्षण सीमा का विधेयक पारित करवाकर केन्द्र को भी विवश कर दिया क़ि इसे संविधान की नौंवी अनुसूची में डालकर आरक्षण को न्यायिक समीक्षा से ही बाहर किया जाए। इसी वजह बाद में संविधान में 76वां संशोधन हुआ। जयललिता अडियल इतनी कि 2001 में राज्य के दो लाख कर्मचारी जब अचानक हडताल पर चले गए, तब पंगु प्रशासन से क्षुब्ध मुख्यमंत्री जयललिता ने सभी हडताली कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया। किसानों को दी जा रही मुफ्त बिजली बंद कर दी और लॉटरी को भी समाप्त कर दिया। 2004 में कांचीपुरम में एक मंदिर के मैनेजर की हत्या में कांची पीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती का नाम आया, तब जयललिता उन्हें गिरफ्तार करवाने से भी पीछे नहीं हटी। अक्कडपन, प्रतिशोध और रुखापन उनके स्वभाव का अहम हिस्सा थे। द्रमुक की सरकार बनने पर जब मुख्यमंत्री करुणानिधि ने उनके गहने जब्त किए गए, जया ने 14 साल तक गहने नहीं पहने। बाद में मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने करुणानिधि को आधी रात गिरफ्तार करवाया था। दो साल की थी, पिता चल बसे। पिता की कमी उन्हें ताउम्र खलती रही। संभवतय, इसी वजह पुरुषो के प्रति उनका पूर्वाग्रह बना रहा। इसी वजह समकालीन राजनीतिक नेताओं को उन्होंने मर्दानगी दिखाने का कोई अवसर नहीं दिया । जयललिता अविवाहिता रहीं। पुरुषों को या तो दिल में जगह दी या चरणों में। बचपन में अम्मु नाम रखा गया और राजनीति में आने पर जयललिता गरीबों, कमजोर तबकों और महिलाओं की अम्मा बन गईं। तमिल नाडु में बाहृमण विरोधी मानसिकता द्रविड आंदोलन की नींव बनीं थी। तमिल नाडु में पिछडों का बाहुल्य है और मगर विडम्बना देखिए कि जयललिता ब्राहृण होते हुए भी पिछडों के दिलों पर राज करती रही और उन्ही के समर्थन से लगातार पांच बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी। गरीबों के लिए जयललिता ने अम्मा नमक, अम्मा सीमेंट, अम्मा फार्मेसी, अम्मा कंटीन और अम्मा पीने का पानी जैसी स्कीमें शुरू की। गरीब और कमजोर तबके जयललिता की आंखों में अपने सपनों को देखते। उनके निधन से तमिल नाडु की सियासत में जो शुन्य आया है, उसे लंबे समय तक भरा नहीं जा सकता ।
मंगलवार, 6 दिसंबर 2016
हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन
Posted on 7:42 pm by mnfaindia.blogspot.com/
गुरु नगरी अमृतसर में रविवार को सपन्न दो दिवसीय हार्ट ऑफ एशिया (मिनिस्टीरियल कांफ्रेंस ऑन हार्ट ऑफ एशिया- इस्तांबुल प्रोसेस ऑफ अफगानिस्तान) सम्मेलन में भारत ने अफगानिस्तान के साथ मिलकर पाकिस्तान को घेरने की कोशिश की है। भारत को कम-से-कम इस बात का सकून है कि जो काम गोवा में नहीं हो पाया, अमृतसर में वह पूरा कर लिया गया। अक्टूबर में गोवा में सपन्न “ब्रिक्स“ शिखर सम्मलेन डिक्लेरेशन में भारत अल-कायदा, जैश -ए-मोहम्मद और लश्कर -ए-तैयबा जैसे दुर्दांत आतंकी संगठनों का उल्लेख करवाने में विफल रहा था। हार्ट ऑफ एशिया सम्मलेन के समापन पर जारी अमृतसर डिक्लेरेशन में लश्कर और जैश को क्षेत्र में शांति के लिए सबसे बडा खतरा बताया गया है। अफगानिस्तान ओर अन्य देशों द्धारा इस रेसोलुशन का अनुमोदन किए जाने से इस डिक्लेरेशन की विश्सनीयता को पाकिस्तान भी चुनौती नहीं दे सकता। सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने पाकिस्तान प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकर (वास्तव में विदेश मंत्री) सरताज अजिज की उपस्थिति में इस्लामाबाद को खरी-खोटी सुनाई। अफगानिस्तान के विकास के लिए पाकिस्तान की 500-मिलियन डॉलर मदद की पेशकश की गनी ने जमकर खिल्ली उडाते हुए इस बात पर जोर दिया कि आतंक का खात्मा करना काबुल के लिए कहीं ज्यादा अपरिहार्य है। अफगानिस्तान तालिबानी आतंक से लडते-लडते बेहाल हो चुका है और अगर इस देश को वास्तव में आगे बढना है, तो आतंक को परास्त करना होगा। अफगानिस्तान तालिबान को पाकिस्तान का खुला समर्थन है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने रविवार को हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन में साफ शब्दों में कहा कि अगर पाकिस्तान तालिबान की मदद करना छोड दे, तो अफगानी सेना एक माह में उसका सफाया कर सकती है। पाकिस्तान जिस तरह जैश और लश्कर को भारत में विध्वसंक गतिविधियों के लिए हर तरह से मदद दे रहा है, उसी तरह इस्लामाबाद तालिबानी आतंकियों की मदद कर रहा है। भारत से कहीं ज्यादा अफगानिस्तान ने पाकिस्तान प्रायोजित विध्वसंक गतिविधियां झेली है। यानी दोनों देशों का दर्द एक जैसा है। अमृतसर सम्मेलन ने अपना पूरा ध्यान तीन ज्वलंत मुद्दों पर केन्द्रित रखाः अफगानिस्तान में अमन-चैन स्थापित करने के लिए आतंक को मिलकर परास्त करना, विकास को तेज करने के लिए कनेक्टिविटी मुहैया कराना और आर्थिक खुशाहली सुनिश्चित करना। अफगानिस्तान में तालिबानी आतंक के रहते न तो विकास संभव है और न ही अमन-चैन। वस्तुतः, अमन-चैन के बगैर किसी भी देश में आर्थिक विकास संभव नहीं है। आतंक के बावजूद 2002 के बाद से अफगानिस्तान उदार अंतरराष्ट्रीय मदद और विदेशों में कार्यरत अफगानियों से मिलने वाली मुद्रा से तेजी से आगे बढा है। मगर पाकिस्तान भारत की तरक्की की तरह अफगानिस्तान की आर्थिक उन्नति को भी पचा नहीं पा रहा है। इसीलिए, आतंकियों की मदद करके भारत और पाकिस्तान को अस्थिर करने की हरचंद कोषिष कर रहा है। अमृतसर डिक्लेरेशन में साफ-साफ कहा गया है कि आतंक हार्ट ऑफ एशिया की शांति और स्थायित्व के लिए सबसे बडा खतरा है। डिक्लेरेशन में आतंकियों की मदद करने वालों को चेताया गया है कि वे आतंक को पालना-पोसना बंद कर दे। बगैर नाम लिए इशारा पाकिस्तान की ओर है हालांकि पाकिस्तान ने इस सम्मेलन में शिरकत करके क्षेत्र में अलग-थलग पडने से बचने की कोशिश की है। तथापि सम्मेलन में अफगानिस्तान द्धारा खरी-खोटी सुनाई जाने पर पाकिस्तान को अपमान का घूंट पीना पडा है। पाकिस्तान प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजिज की भारत के नेताओं से बातचीत नहीं होने से भी इस्लामाबाद को फजीहत होना पडा है। अमृतसर डिक्लेरेशन में और भी कईं बातें हैं जो पाकिस्तान के कान खींचने के लिए पर्याप्त है मगर इस्लामबाद बडा डीढ है। पाकिस्तान को इन सब बातों से कोई फर्क नहीं पडता है। दरअसल, पाकिस्तान के सियासी नेता पूरी तरह से सेना के प्रभाव में है और पाकी सेना भारत और अफगानिस्तान को अस्थिर करने में लगी हुई है। इन हालात में पाकिस्तान को अगर नकेल डालनी है , तो चीन को भी साथ लेना होगा।
सोमवार, 5 दिसंबर 2016
पाकिस्तान की कुटिल हरकत
Posted on 8:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के बीच टेलिफोन पर हुई बातचीत की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। पाकिस्तान ने छल-कपट करके जिस तरह से इस बातचीत को बढ-चढ कर अपने पक्ष में पेश किया है, उससे इस्लामाबाद फिर पूरी दुनिया के सामने नंगा हो गया है। पाकिस्तान प्रैस इंफॉर्मेशन ब्यूरो ने बाकायदा प्रैस विज्ञप्ति जारी करके दावा किया है कि नव-निर्वाचित राष्ट्रपति ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए कहा है कि “ आप (शरीफ) बहुत अच्छा काम कर रहा है जो हर तरफ साफ नजर आ रहा है“। पाकिस्तान का यह भी दावा है कि ट्रंप ने पाकिस्तान को गजब का देश बताते हुए कहा है कि उसके लोग बहुत समझदार हैं“। मुमकिन है नए राश्ट्रपति ने नवाज शरीफ के बधाई संदेश के जवाब में ऐसा कहा हो। अमूमन, जब भी दो देशों के राज्याध्यक्ष अथवा बड़े नेता एक-दूसरे से बात करते हैं, तो कटुता की बजाए शालीनता और प्यार-मोहब्बत से औपचारिक बातें करते हैं मगर इसका यह कतई मतलब नहीं होता है कि इससे रातों-रात द्धिपक्षीय संबंध सुधर जाएंगे। अमेरिका के लिए पाकिस्तान आज भी “आतंक“ को पालने-पोसने वाला देश है और नव-निर्वाचित राष्ट्रपति चुनाव प्रचार के दौरान कई बार यह बात कह चुके हैं। पाकिस्तान के इस महिमामंडन पर टीम ट्रंप ने स्पष्टीकरण भी दिया है कि नवाज शरीफ ने नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बधाई देने के लिए फोन किया था और इस दौरान दोनों नेताओं में “सकारात्मक“ बातचीत हुई। पाकिस्तान ने इस बातचीत को मसालेदार बनाकर अपने फायदे के लिए भुनाने की कोशिश की है। टीम ट्रंप के अनुसार पाकिस्तान सरकार का बयान मूल बातचीत से एकदम बेमेल है। इसे खूब बढा-चढा कर महिममंडित किया गया है। किसी देश द्धारा दो बडे नेताओं के बीच बातचीत को बढा-चढा कर पेश करने का यह अनोखा मामला है। पाकिस्तान की इस हरकत से कूटनीति शर्मसार हुई है। अमेरिकी मीडिया ने भी पाकिस्तान की इस बेजा हरकत पर नाराजगी जताते हुए कहा है कि यह प्रोटोकोल के गंभीर उल्लघनं का मामला है। अब दुनिया को पता चला है कि पाकिस्तान कितना झूठ बोलता है। कोई भी समझदार नेता नवाज शरीफ की तरह “अपने मुंह, मियां मिठ्ठू“ नहीं करेगा। नव-निर्वाचित राष्ट्रपति ने अभी शपथ भी ग्रहण नहीं की है। अभी वे अपनी टीम के गठन की प्रकिया में है। पाकिस्तान के प्रति ट्रंप की नीति क्या होगी, इसका खुलासा उनके व्हाइट हाउस पहुंचने के बाद ही होगा। मगर इतना तय है कि पाकिस्तान और अमेरिका के बीच मौजूदा तल्ख संबंध जल्द सुधरने वाले नहीं है। ट्रंप ही नहीं, निवृतमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी पाकिस्तान को “आंतक“ मददगार देश बता दे चुके हैं और कई बार उसे आतंकियों पर नकेल डालने की सलाह दे चुके हैं। सच यह है कि पाकिस्तान का वजूद ही आतंक पर टिका है। वहां की सरकार के लाख चाहने के बावजूद पाकिस्तान आतंकियों की पीठ थपथपाने से अपने हाथ नहीं खींच सकता । मगर अमेरिका अथवा दुनिया का कोई भी सभ्य देश उसकी इस विवशता को सहने से रहा। ट्रंप ने अपने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जब-जब भी पाकिस्तान का उल्लेख किया, छाती ठोंक कर पाकिस्तान को सबक सिखाने की कसमें खाईं। सोशल मीडिया पर ट्रंप ने साफ-साफ लिखा था“ इसे सीधा समझ लें, पाकिस्तान हमारा दोस्त नही है। हमने उसे अरबों डॉलर की मदद दी पर हमें क्या मिला। विश्वासघात , अपमान और उससे भी बुरा। अब समय आ गया है कि उससे सख्ती से निपटा जाए। भारत के साथ मिलकर उसे सबक सिखाउंगा“। नव-निर्वाचित राष्ट्रपति व्हाइट हाउस पहुंचकर यह सब भूल जाएंगे, पाकिस्तान को इस मुगालते में नहीं रहना चाहिए। बहरहाल, छल-कपट से किसी भी देश की विदेश नीति की दिश नहीं बदली जा सकती। विश्वासघात , झूठ-फरेब, छल-कपट पाकिस्तान की फितरत है। पाकिस्तान की ताजा हरकत ने भी यही साबित किया है। कहते हैं “कुते की पूंछ को 12 साल भी तेल में रखा जाए, वह सीधी नहीं होगी। पाकिस्तान पर यह कहावत सौ फीसदी मौजूं होती है।
शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016
नोटबंदी और ग्रोथ
Posted on 6:46 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश के लिए यह राहत की बात है कि
बीते तिमाही (जुलाई-सितंबर) में सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) ग्रोथ रेट में
पहली तिमाही (अप्रैल-जून) की तुलना में 0.2 फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है।
पहली तिमाही में जीडीपी की ग्रोथ 7.1 फीसदी थी और दूसरी तिमाही में यह 7.3
फीसदी । एक साल पहले इसी अवधि में जीडीपी ग्रोथ रेट 7.6 फीसदी थी। अक्टूबर
में उधोग की धडकन माने जाने वाले आठ उधोगों के कोर उत्पादन में भी एक
फीसदी की वृद्धि दर्ज हुई है। तथापि यह राहत जल्द ही काफूर हो सकती है। एक
साल बाद जीडीपी ग्रोथ रेट में 0.4 फीसदी की गिरावट चिंता का विषय है। ताजा
आंकडों से लग रहा है कि सरकार का पिछले साल के ग्रोथ रेट को पार करने का
लक्ष्य पूरा नहीं हो पाएगा। पिछले साल जीडीपी विकास दर 7.6 फीसदी रही थी।
ताजा स्थिति में इस साल (2016-17) 7.6 फीसदी ग्रोथ हासिल करना भी
चुनौतीपूर्ण लग रहा है। 8 नवंबर को प्रधानमंत्री द्धारा 500 और 1000 रु के
नोट बंद किए जाने से अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पडा है और नोटबंदी के
बाद से सकल घरेलू उत्पादन में शिथिलता देखी गई है। बाजार में नगदी के संकट
से फॉस्ट ग्रोथ के लिए आवश्यक तत्व अचानक गायब हो गए हैं। समय पर बुआई नहीं
होने और नगदी संकट से समय पर खाद और बीज नहीं मिलने के कारण रबी की फसल का
उत्पादन लक्ष्य हासिल करना मुमकिन नहीं लग रहा है। दूसरी तिमाही में
जीडीपी ग्रोथ रेट में मामूली वृद्धि कृषि में 3.3 फीसदी ग्रोथ के कारण
मुमकिन हुई है। पहली तिमाही में कृषि में अपेक्षाकृत ग्रोथ नहीं होने से
जीडीपी में वृद्धि दर 7.1 फीसदी दर्ज हो पाई थी । रबी सीजन में कृषि की
विकास दर 3.3 फीसदी रहेगी, इसकी क्षीण संभावनाएं है। भारतीय अर्थव्यवस्था
की तेज ग्रोथ का सबसे बडा कारण हैः लोगों का संस्थागत गवर्नेंस पर अटूट
भरोसा। ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियां तो इसी भरोसे पर चलती है।
देश में पहली बार नोटबंदी ने जनमानस के इस भरोसे को तोडा है। विख्यात
अर्थषास्त्री नोबेल पुरुस्कार विजेता अमर्त्य सेन का आकलन है कि नोटबंदी ने
भारतीय अर्थव्यवस्था की जड पर हमला किया है। पिछले बीस साल से भारतीय
अर्थव्यवस्था में व्याप्त तेजी की प्रमुख वजह भी भरोसा ही है। लोग-बाग
सरकार द्धारा जारी नोटों पर भरोसा करते है और अगर सरकार खुद नोटबंदी से इस
भरोसे को तोड दे, तो लोगों का बैंकिंग व्यवस्था पर भरोसा उठना तय है। लोग
अपने ही खातों से पैसा नहीं निकाल पाएं, तो वे बैंकों में अपना धन जमा
क्यों करेंगे? देश में हर छोटा-बडा यही कह रहा है कि नोटबंदी का मकसद तो
अच्छा है मगर इसका कार्यवन्यन एकदम “निरंकुश “ है। नोटबंदी को लगभग एक महीना
होने जा रहा है, मगर लोगों की परेशानियां कम होने का नाम नहीं ले रही है।
नगदी की आपाधापी में लोगों को काफी कुछ खोना पडा है। दुनिया में पहली बार
नोटबंदी (विमुद्रीकरण) के कारण लोगों को अपनी जान तक गंवानी पडी है।
सियासी नेताओं समेत बडे लोगों को कोई परेशानी नहीं है। पुराने नोट बदलने
के लिए न तो उन्हें कतार में खडा होना पडता है , और न ही उन्हें नगदी की
समस्या झेलनी पडी है। नोटबंदी से टैक्स चोरी करके छिपाया गया धन सरकारी
खजाने में आने से जितना फायदा होगा, उससे कही ज्यादा नुकसान अर्थव्यवस्था
की सतत ग्रोथ के रुक जाने से होगा। सरकार ने खुद माना है कि हालात सामान्य
होने में चार माह लग सकते है। निष्कर्ष यह है कि नोटबंदी से जनता हलकान
है। उत्पादन और कारोबार पर प्रतिकूल असर पड रहा है। उत्पादन रुक जाने से
रोजगार के अवसर भी कम हो गए है। रोजगार नहीं है तो आय भी नहीं है। और इंकम
नहीं होने से मांग भी नहीं है। इस तरह सारी की सारी आर्थिक गतिविधियां शिथिल पड गई हैं। नोटबंदी दीर्घकालीन में असरदार होती है या नहीं, मगर अल्पकाल
में इसका प्रतिकूल असर पड रहा है।
गुरुवार, 1 दिसंबर 2016
पहले पठानकोट, फिर उडी, अब नगरोटा;
Posted on 8:19 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पाकिस्तान प्रयोजित आतंक ने एक बार फिर अपना भयावह चेहरा दिखा दिया है और भारत की सैन्य ताकत को चुनौती दी है। उडी हमले के 72 दिन बाद आतंकियों ने सेना पर फिर हमले करके दो सैन्य अधिकारियों समेत सात जवानों की जानें ले लीं। आतंकी पुलिस की वर्दी में थे। मंगलवार को ही जनरल कमर जावेद बाजवा ने पाकिस्तान सेना के अध्यक्ष का पदभार संभाला था। एक ओर नए सेनाध्यक्ष नियंत्रण रेखा पर तनाव को कम करने की बातें कर रहे थे, तो दूसरी ओर पाकिस्तान के पिठ्ठू आतंकी भारतीय सेना पर हमले कर रहे थे। पाकिस्तान तनाव कम करने के लिए बातचीत की पेशकेश कर रहा है, तो आतंकियों को ढाल बनाकर भारत पर हमले कर रहा है। इससे पता चलता है कि पाकिस्तान किस तरह दोगली बातें करता है। मंगलवार को जम्मू-कश्मीर में एक साथ दो हमले हुए। पहला हमला जम्मू के नगरोटा में सेना कैंप पर किया गया। इसमें 2 मेजर समेत 7 सैनिक शहीद हो गए। हमले के दौरान आतंकियों ने महिलाओं और बच्चों को भी बंधक बनाया, जिन्हें सुरक्षित छुडा लिया गया। दूसरा हमला नगरोटा से 70 किमी दूर चमलियाल में हुआ। मुठभेड मे 3 आतंकी मारे गए मगर बाद में सर्च ऑपरेशन के दौरान हुए विस्फोट में सीमा सुरक्षा दल के डीआईजी समेत 5 जवान घायल हो गए। बहरहाल, उडी हमले के बाद से अब तक पाकिस्तान से आए आतंकियों ने सैन्य ठिकानों पर चार बडे हमले किए हैं। भारतीय सेना ने तीन को तो विफल कर दिया मगर वह राष्ट्रीय उच्च मार्ग पर स्थित नगरोटा हमले को विफल नहीं कर पाई। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार सात आतंकी चमलियाल के रास्ते भारतीय सीमा में घुस आए । हमेशा की तरह पाकिस्तान रेंजर्स ने उन्हें कवर किया। तीन आतंकी तो सीमा सुरक्षा बलों ने चमलियाल में ही मार गिराए मगर चार आतंकी सुरंग के रास्ते 70 मिलोमोटर की दूरी पर स्थित नगरोटा सैन्य कैंप पहुंच गए। मुख्य गेट पर सुरक्षा गार्ड को ग्रेनेड से मार गिराया और सेना के 16 कोर के कैंप में घुस आए। महिलाओं समेत सैनिकों के परिजनं को बंधक बना लिया। इसके बाद आतंकियों से मुठ्भेड में दो मेजर समेत 7 सैनिक मारे गए। हमले में दो मेजर की शहादत से साफ है कि आतंकी बडे सैनिक अधिकारियों को निशाना बनाना चाहते थे। नगरोट हमले ने एक बार फिर सैन्य ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खडा कर दिया है। सितंबर में उडी हमले के बाद जम्मू-कश्मीर स्थित सभी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था को पूरी तरह से चाक-चौबंद(?) किया गया था । मगर ताजा हमले से लगता है कि देश ने उडी हमले से भी कोई सबक नहीं सीखा है। पहले पठानकोट, फिर उडी और अब नगरोटा। और हर बार वही सुरक्षा में भरी चूक और आतंकी इसका भरपूर फायदा उठा रहे हैं। सैन्य ठिकानों पर साल में तीन-तीन आतंकी हमले। आतंकी सुरक्षा बलों का मनोबल गिराने और देश की सैन्य शक्ति को चुनौती देने के मकसद से जानबूझकर सैन्य ठिकानों पर हमले कर रहे है। मुठ्ठी भर आतंकियों द्वारा अभेध भारी सुरक्षा सपन्न सैन्य ठिकानों में घुसकर सैनिकों की हत्या करना इस बात के संकेत हैं कि सुरक्षा बल आतंकियों को रोके नहीं रोक पा रहे हैं। नगरोटा हमले में किसी स्थानीय सूत्र का हाथ है, इस बात से कहीं ज्यादा अहम यह है कि खुफिया एजेंसियों की चेतावनी के बावजूद एतिहाती सुरक्षा उपाय क्यों नहीं किए गए ? खुफिया एजेंसियां सतर्क नहीं भी करती, तो भी सैन्य ठिकानों की सुरक्षा व्यवस्था को हर हाल में चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था। हाफिज सइद समेत पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के सरगना आए दिन भारत को सबक सिखाने की धमकियां देते रहते हैं। इस साल अब तक आतंकी नौ बडे हमले कर चुके हैं और इनमें सुरक्षा बलों के 76 जवान मारे जा चुके है। आखिर यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा। निश्चित तौर पर, एक और बडे सर्जिकल स्ट्राइक की जरुरत है।
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