शनिवार, 7 जुलाई 2018

न्यूनतम समर्थन मूल्य मेँ वृद्धि : चुनावी फसल काटने की सियासी चाल

खरीफ फसलों का न्यूनतम  समर्थन मूल्य (एमएसपी) लागत  के मुकाबले डेढ गुना बढाने का मोदी सरकार का फैसला  क्या वाकई  ही  किसानों  को बड़ी राहत  है  या चुनावी फसल काटने की सियासी  चाल  । किसान लंबे समय  से  स्वामीनाथन  द्वारा  रेकमेंडेड  सी-2ः वेटेड एवरेज कॉस्ट पर निर्धारित करने की मांग कर रहे हैं  मगर हर सरकार एटू प्लस एफएल  फॉर्मूले से एमएसपी  तय कर रही है । महंगे कर्ज और बढती लागत के बोझ ने देश  के किसानों, खासकर  लघु और सीमांत (दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले) की कमर तोड रखी है। भारत में 80 फीसदी किसान के पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है। देश  का अन्नदाता माने जाने वाले पंजाब में 70 फीसदी लघु और सीमांत किसान हैं।  उपज के वाजिब दाम नहीं मिलने से 80 फीसदी किसानों को गुजर-बसर के भी लाले पड जाते हैं। किसानों की सबसे बडी त्रासदी  साहूकारों से लिया गया महंगा कर्ज होता है। गांव-गांव सरकारी बैंकों के बावजूद 60 फीसदी से भी ज्यादा किसान आज भी फसली कर्ज केे लिए साहूकारों और आढतियों पर आश्रित है। बैंकों की लंबी -चौडी औपचारिकताएं आम किसान  तो क्या, पढे-लिखे आदमी के पल्ले भी नहीं पडती है। किसानों की बढती कर्जदारी पर  केन्द्रीय कृषि  मंत्रालय की समिति का आकलन है कि पंजाब और हरियाणा के अधिकतर लघु और सीमांत किसान फसली कर्ज  के लिए अभी भी आढतियों पर  निर्भर है। पंजाब में मात्र 4.71 और हरयाणा में  5.67 बैंको से कर्ज  लेते हैं। 35 से 40 फीसदी किसान सहकारी बैंको से कर्ज लेते हैं। बाकी 60 फीसदी किसान कर्ज  के लिए आढतियों की  शरण में जाते हैं। और आढतियों का कर्ज इतना महंगा (20 से 30 फीसदी फ्लैट) होता है कि कर्जदार किसानों को अपनी फसल औने-पौने दाम पर आढती को ही बेचनी पडती है। किसान आढती के ऋण ट्रैप से ताउम्र बाहर नहीं निकल पाता।  आढत और किसान के बीच कानून के  मुताबिक  लिखा पढी नहीं होती, इसलिए कानून भी किसानों की मदद नहीं कर पाता। एक रिपोर्ट केे अनुसार पंजाब का 60 फीसदी और हरयाणा का 45 फीसदी किसान सदियों से अपने हर तरह के कर्ज के लिए आढती पर निर्भर है और बाप-दादा का कर्ज  भी चुका रहा है। यही  व्यथा  देश  के अन्य भागों के किसानों की है। महाराष्ट्र  में विदर्भ के किसान तो इससे भी बदतर हालात हैं। एक बार साहूकार के जाल में फंस गए, तो चाह कर भी वह इससे बाहर नहीं निकल पाता।  इन 60 फीसदी किसानों का क्या जो आढतियों के चक्कर में फंसे हुए हैं और न्यूनतम सर्मथन मूल्य से लाभान्वित नहीं हो रहे हैं। आढती न्यूनतम समर्थन  मूल्य पर खरीद  नहीं करता और अगर करता है तो फसल की क्वालिटी (नमी आदि) में ंमीनमेख निकाल कर कम दाम देने का रास्ता निकाल लेता है। बहरहाल, सरकार का किसानों को डेढ गुना एमएसपी की सौगात चुनावी फसल काटने का प्रयास है। इस साल के अंत में मध्य प्रदेश , राजस्थान और  छतीसगढ में विधानसभा चुनाव होने है और अगले साल मई में लोकसभा चुनाव। जाहिर है सरकार का यह लोक-लुभावना फैसला चुनावों को ध्यान में रखकर लिया गया है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में किसानों की आय को पांच साल में दो गुना करने क वायदा किया था। मगर सत्ता में आते ही सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि एमएसपी को लागत 50 फीसदी बढाना  नहीं है क्योंकि  इससे से खाधान्न बाजार में अफरा तफरी मच जाएगी। सरकार का फसल की लागत आंकने का फार्मूला भी त्रुटिपूर्ण है। एाएसपी सी-2ः वेटेड एवरेज कॉस्ट पर निर्धारित किए जाने की बजाए  एटू प्लस एफएल  पर आधारित है। इस फार्मूले में जमीन की रेंटल कॉस्ट को  शामिल नहीं किया जाता है। किसान लंबे समय से  सी-2 फार्मूला आधारित लागत पर एमएसपी की मांग कर रहे हैं। सरकार के ताजा फैसले से किसानों का भला होता या नहीं पर क्रूड की लगातार बढती कीमतों के साथ महंगा खाद्यान्न महंगाई को और बढा सकता है।  सरकार की चुनावी फसल काटने की सियासी चाल  देश  पर हमेशा  भारी पडती है।