शुक्रवार, 30 जून 2017

चीन का नया पैंतरा

सिक्किम के दोका ला इलाके में गत दो सप्ताह से भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच तनाव की स्थिति बनी हुई है। चीनी सैनिकों ने जून के पहले सप्ताह भारतीय सीमा में घुसकर उसके बंकरों को तोड डाला और इस दौरान सैनिकों के बीच हाथापाई भी हुई। चीन ने सिक्किम के नाथू ला रास्ते को कैलाश  मानसरोवर यात्रा को भी रोक लिया है। चीन ने चेताया है कि वह कैलाश  मानसरोवर यात्रा का रास्ता तभी खोलेगा जब भारत अपनी गलतियां सुधारेगा। चीन तिब्बत में भारतीय सीमा के पास युद्ध टैंक भी तैनात कर चुका है। इस पर बीजिंग का कहना है कि 35 टन वजनी लाइट वेट बैटल टैंक का परीक्षण किया जा रहा है। यह परीक्षण उस समय किया  रहा  है  जब भारतीन सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत सिक्किम सीमा के दौरे पर हैं। जाहिर है यह सब भारत को आंखें दिखाने के लिए किया जा रहा है। चीन का यह पुराना पैंतरा है। चीन ने यह आरोप भी लगाया है कि  भारत  भूटान के कहने पर सिक्किम सीमा पर चीन को सडक का निर्माण में अडंगा डाल रहा है जबकि इस सडक का निर्माण चीनी सीमा के भीतर किया जा रहा है। चीन ने इसके लिए 1890 की सीनो-ब्रिटिश  ट्रीटी का हवाला दिया है। चीन के साथ भारत का सीमा विवाद 64 साल पुराना है। भारत लगभग 4000 किलोनीटर क्षेत्र को विवादित मानता है। इसमें अकसाई चीन का वह विवादित क्षेत्र भी  शामिल है, जो पाकिस्तान चीन के सुपुर्द कर चुका है। चीन 2000 किलोमीटर क्षेत्र को ही विवादित मानता है। बाकी  2000 किलोमीटर क्षेत्र को चीन अपना इलाका बताता है। भारत और चीन के बीच सीमा का निर्धारण मैकमोहन लाइन के आधार पर किया गया है। भारत तो  मैकमोहन लाइन को मानता है मगर चीन इसे “उपनिवेशवादी “ एकपक्षीय बताकर आज तक मानने से इंकार करता रहा है। चीन का  हर मामले में “चीत भी मेरी पट भी मेरी, सिक्का मेरे मामू का“ जैसा  रवैया रहता है। जो बात उसके हित में हो, गलत होते हुए भी उसे सही बताता है। आतंकी हाफिज  सईद, सैयद सलाहुद्दीन और मसूद अजहर जैसे आतंकियों को “देशभक्त“ बताकर उनकी पैरवी करता है। पूरी दुनिया मान रही है पाकिस्तान आतंक को अधिकृत तौर पर बढावा दे रहा है पर चीन कह रहा है पाकिस्तान आतंक को रोकने की हर संभव कोषिष कर रहा है। मैकमोह्न लाइन को मानता नही है मगर सिक्किम में विवादित क्षेत्र पर अपना हक जताने के लिए 1890 की सीनो-ब्रिटिश  ट्रीटी का हवाला दे रहा है। चीन से ताजा विवाद सिक्किम  और भूटान के मध्य स्थित 80 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को लेकर है। यह क्षेत्र भूटान का है मगर चीन इस पर कब्जा जमाए हुए है। 1984 से अब तक चीन और भूटान के बीच वार्ताओं के  लगभग 24 दौर हो चुके है, मगर विवाद सुलझ नहीं पाया। सच यह है कि चीन किसी भी देश  के साथ सीमा विवाद सुलझाना नहीं चाहता है और दादागिरी दिखाकर दूसरों की जमीन पर कब्जा करने की मंशा  पाले हुए है। पहले तिब्बत को हथिया। इससे पहले कि ड्रैगन सिक्किम को हडप जाता, इसका भारत में विलय हो गया। इस विलय को चीन आज तक नहीं पचा पाया है। चीन ने अब भारत को चेताया है कि उसे इतिहास से सबक लेना चाहिए और चीन के साथ सीमा विवाद सुलझाने के लिए “सार्थक“ पहल करनी चाहिए।  चीन का मूल मकसद भारत को अमेरिका से दूर रखना है। अमेरिकी  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच आत्मीयता से बौखलाया चीन  भारत को पहले ही सलाह दे चुका है कि वह अमेरिका ट्रैप में फंसने से बचे। बीजिंग यह भी धमकी दे चुका है कि चीन को घेरने के लिए भारत का अमेरिका से गठजोड उस पर भारी पड सकता है। भारत को चीन के मामले में फूंक-फूंक  कदम बढाने की जरुरत है।


चीन को मिर्ची क्यों लगी?

अमेरिकी  राष्ट्रपति  और भारतीय प्रधानमंत्री की मुलाकात हमेशा  पूरी दुनिया  मेँ चर्चा का विषय रही है, वह चाहे ओबामा-मोदी का गर्मजोशी  से हाथ मिलाना हो या मौजूदा राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप का प्रधानमंत्री मोदी से गले मिलना। इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति  ट्रंप और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी इतनी आत्मीयता से गले मिले कि चीन को इस पर खासी मिर्ची लग गई। अमेरिका के एक अग्रणी अखबार ने टिप्पणी की है कि दोनों नेताओं की यह आत्मीयता चीन के राष्ट्रपति  शी जिनपिंग को दिखाने के लिए थी। इतना ही नहीं ट्रंप-मोदी मुलाकात से ठीक पहले अमेरिका ने भारत को 22 ड्रोन बेचने की डील को भी हाथों-हाथ मंजूरी दे दी।  हिंद महासागर में चीनी नौसेना की जासूसी के लिए  इन ड्रोन का इस्तेमाल किया जा सकता है।  अमेरिका चीन से इस बात से खफा है कि चीन उत्तरी कोरिया को बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढाने से रोकने में विफल रहा है। भारत को चीन से कई गिले-शिकवे हैं। सिद्धांत की दुहाई देकर चीन भारत की न्यूक्लियर सप्लाई गु्रप में एंट्री को रोकने की हरचंद कोशिश  कर रहा है।  आतंकी संगठन जैश  के मुखिया मसूद अजहर और  हिजबुल मुजाहिदीन के आतंकी प्रमुख सैयद सलाहुद्दीन को संयुक्त राष्ट्र  संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय  आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव पर चीन हमेशा  अडंगा अडाता रहा है। 2014 से अब तक भारत छह से भी ज्यादा बार संयुक्त राष्ट्र  संघ में मसूद अजहर और  सैयद सलाहद्दीन को आतंकी घोषित कराने का प्रस्ताव पेश  कर चुका है पर चीन हर बार इसे रुकवाने में सफल रहा है। चीन अपनी वीटो पावर का बेजा इस्तेमाल कर भारत को नीचा दिखाने पर आमादा है।  सैयद सलाहद्दीन  को अमेरिका द्वारा  अंतरराष्ट्रीय  आतंकी घोषित किया जाना और 22 ड्रोन खरीद डील प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमेरिकी यात्रा की सबसे बडी उपलब्धि है। मोदी-ट्रंप की ताजा मुलाकात से चीन बौखला गया है। मंगलवार को चीन ने स्थानीय मीडिया के माध्यम से भारत को चेताया भी है कि  अमेरिका के साथ मिलकर चीन को घेरने की कोशिश भारत को भारी पड सकती है। चीन ने भारत से सीमा विवाद को भी उछाला है। मंगलवार को चीन ने नाथुला पास से सेना हटाने को कहा है। इसके एक दिन पहले चीनी सैनिक सिक्किम में भारतीय सीमा में घुसपैठ भी कर चुका है। बहरहाल, हिजबुल मुजाहिदीन के मुखिया  सैयद सलाहुद्दीन को अंतरराष्ट्रीय  आतंकी करार दिए जाने का सीधा असर कश्मीर  के मौजूदा हालात पर पड सकता है।  हिजबुल मुजाहिदीन को  कश्मीरियों  का सशस्त्र आतंकी संगठन माना जाता है और इसकी स्थानीय लोगों, खाासकर युवाओं पर पकड भी है। इस आतंकी संगठन का कश्मीर  की आजादी के अलावा कोई  वैश्विक  एजेंडा भी नहीं है।   हिजबुल अब तक संयुक्त  राष्ट्र  संघ के प्रस्ताव अनुसार जनमत संग्रह का पक्षधर रहा है।  सलाहुद्दीन  ने अल कायदा और इस्लामिक स्टेट (आईएस) दोनों से दूरी बनाए रखी है। इतना ही नहीं  सलाहुद्दीन ने  कश्मीरी  युवाओं से आईएस से दूरी बनाए रखने की अपील भी की थी जिस पर हिजबुल के कुछ स्थानीय कमांडर  सलाहुद्दीन  से खफा हो गए थे। इन सब बातों के मद्देनजर   सलाहुद्दीन को अमेरिका द्वारा अंतरराष्ट्रीय  आतंकी घोषित किए जाने से स्थानीय चरमपंथियों में उनकी पकड ढीली पड सकती है। जाकिर मूसा जैसे चरमपंथी पहले ही सलाहुद्दीन का विरोध कर रहे हैं। पाकिस्तान को भी अब  सलाहुद्दीन को खुला समर्थन देना  मुश्किल  हो जाएगा।  सलाहुद्दीन अभी  पाकिस्तान अधिकृत  कश्मीर  से ऑपरेट कर रहा है। भारत को अब आतकियों के खिलाफ अंतरंराष्ट्रीय  समर्थन भी मिल सकता है।   अमेरिका के इस कदम के बाद भारत अब सलाहुद्दीन के खिलाफ सर्जिक्ल स्ट्राइक जैसी कार्रवाई भी कर सकता है।  हुर्रियत कॉन्फ्रेस के नेताओं को भी फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।   हुर्रियत नेता सार्वजनिक तौर पर तो  कश्मीर  समस्या के  शांतिपूर्ण  हल की बातें करते है मगर अंदरखाते आतंकियों की भरपूर मदद करते हैं।  हुर्रियत नेताओं को अंतरराष्ट्रीय  आतंकी सलाहुद्दीन पर अब और ज्यादा सतर्क रवैया अपनाना पडेगा।

मंगलवार, 27 जून 2017

रमजान में भी खून-खराबा

सोमवार को ईद के पवित्र अवसर पर  पूरी दुनियाा में खुषाहली और अमन-चैन के लिए दुआएं मांगी जा रही थी, कश्मीर  आतंकी और उपद्रवी अपनी  नापाक हरकतों का तांडव मचाए हुए थे।  ईद के दिन  कई जगह पथराव हुआ और इसमें तीस से ज्यादा जवान जख्मी हो गए। उपद्रवियों ने  प्रदर्शन  के दौरान पाकिस्तान और आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) के झंडे भी लहराए। सरकार ने एतिहातन अलवाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी और मीरवाइज उमर फारुख को नजरबंद रखा। एक और अलगाववादी नेता जेकेएलएफ चीफ यासीन मलिक को हिरासत में लिया गया ताकि वे लोगों को भडका न सकें। पूरे रमजान माह कश्मीर  घाटी में हिंसा का तांडव होता रहा। दुनिया भर में मुसलमान पहली बार कुरान के उतरने पर अल्लाह की नैमत पाने के लिए  रमजान के पूरे महीने रोजे रखते हैं। रमजान  माह  मेँ दान करके सबाब (पुण्य) कमाना और आपसी भाईचारा निभाना इस्लाम के बुनियादी सिद्धांतों में शामिल है।  इस्लामिक कैलेंडर में शब-ए-कदर की रात को सबसे पवित्र रात माना जाता है। मुसलमानों का मानना है कि इसी रात पैगंबर मुहम्मद को कुरान की आयतें नजीर हुईं थीं। इसी कारण  गत शुक्रवार को श्रीनगर के नौहटा स्थित जामा मस्जिद में प्राथना सभा का आयोजन किया गया था। मस्जिद के मौलवी और हुर्रियत कॉन्फ्रेस के चेयरमैन मीरवाइज  उमर फारुख जब प्राथना सभा में बार-बार अल्लाल की मेहर और इंसानियत की नसीहत दे रह थे, बाहर लगभग दो सौ युवक एक इंसान को लाठियों और लोहे की छडों से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर रहे थे। इस इंसान के प्राण पखेरु उडते ही उसके शव को पास के नाले में फेंक दिया गया । और यह इंसान और कोई नहीं राज्य पुलिस के डीएसपी अयूब पंडित थे जो लोगों की सुरक्षा के लिए अपनी ड्यूटी निभा रहे थे।  वहां मौजूद सैंकडों लोगों ने यह खूनी नजारा देखा मगर किसी ने कुछ नहीं किया।  शब-ए-कदर की पवित्र रात को आतंक के पैरवीकारों द्वारा एक इंसान की बेहरमी से हत्या कर देना कौनसा बहादुरी का काम है? इस दिन  शैतान भी ऐसा पाप नहीं करेगा। दुनिया का कोई भी महजब इस तरह के जघन्य अपराध की अनुमति नहीं देता। तथापि, सच्चाई यह है कि आतंकी  शैतान से भी गए-गुजरे होते हैं।  उनका कोई महजब नहीं होता और न ही उनमें इसांनियत नाम की कोई चीज होती है। बहरहाल, अब वक्त आ गया  है कि  कश्मीरी  अवाम को इसानियत और महजब के दुश्मन आतंकियों और उपद्रवियों को माकूल जवाब  देना ही पडेगा।  शहीद  अयूब पंडित कश्मीर  में हिंदू और मुसलमान के बीच सदियों से व्याप्त सांप्रदायिक सौहाद्र के प्रतीक थे। कश्मीर  में  पंडित हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। जो लोग ब्राह्मण से मुसलमान बने, वे आज भी अपने नाम के आगे पंडित लगाकर अपनी  विरासत को बरकरार रखे हुए हैं। कहते हैं आदि कल में कश्मीर  में सभी हिंदू थे। इसी विरासत ने  कश्मीर  घाटी को आज भी  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जोडे रखा है। आतंकी और पाकिस्तान के पिठ्ठुओं को लंबे समय से यह बात अखर रही है।  कश्मीरी  अवाम आतंकियों और अलगाववादियों की नापाक हरकतों से आजिज आ चुका है और दबी जुबान इसकी भर्त्सना भी करता है। और अब डीएसपी अयूब पंडित की निर्मम हत्या ने अवाम को झकझोर कर रख दिया है। शहीद अयूब की पत्नी की ये पंक्तियो् “  अब अपने पति की किस कब्र में तलाश  कंरू“ और  उनकी भाभी का यह कथन “इसी आजादी के लिए लड रहे हैं हम“,  कष्मीरी अवाम की व्यथा बयां करता है। हिंसा और आतंक के बेमियादी  दौर ने आम कश्मीरी  को कहीं का नहीं छोडा है। आम कश्मीरीअलगाववादियों की तरह  भारत की रोटियां खाकर पाकिस्तान के गुण नहीं गाता। आतंक और अलगाववाद ने  मेहनतकश   एवं “शिल्पकार“ कश्मीरी को बर्बाद करके रख दिया है। अवाम को इससे मुक्ति चाहिए।

सोमवार, 26 जून 2017

Weak Opposition is not Good For Vibrant Democracy

 मजबूत विपक्ष स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य है मगर दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र भारत में कभी भी विपक्ष सुदृढ नही रहा है। न तो तब जब देष में ग्रांड ओल्ड पार्टी कांग्रेस का एकछत्र राज था और  न ही अब जब भगवा पार्टी नीत गठबंधन का षासन है। भारत में छुआछूत कुप्रथा की तरह राजनीतिक दलों को भी  “वैैचारिक छुआछूत“ की बुरी लत है। आजादी के बाद एक जमाने में भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज जनसंघ और अस्सी के बाद भाजपा को अधिकतर राजनीतिक दल  “अछूुत“ मानते थे। खासकर समाजवादी और वामपंथी दक्षिणपंथी भाजपा को लंबे समय तक “संाप्रदायिकता“ के लिए अछूत मानते रहे हैं। इसी सोच के कारण विपक्ष में कभी एकता नहीं बन पाई। नब्बे के दषक के बाद भाजपा के बढते जनाधार के कारण समाजवादियों ने तो समय के साथ-साथ समझौता कर लिया और नीतिष कुमार, जार्ज  फर्डानिन्स जैसे उदार समाजवादी केन्द्र में सत्ता का सुख भोगने के लिए भगवा पार्टी के साथ हो लिए। पर वामपंथी अपनी वैचारिक सोच पर बरकरार हैं और आज भी भगवा पार्टी को “अछूतः मानते हैं और इसका मुखर विरोध करने पर आमादा हैं। भाजपा का विरोध करना कांग्रेस की सामरिक विवषता है। भारत की जीओपी खुद को भाजपा का विकल्प मानती है और इसी खुषफहमी के कारण अपना जनाधार भाजपा को लुटा भी चुकी है। उसके पास भाजपा का विरोध करने के सिवा कोई चारा नहीं है हालंाकि कांग्रेस भी उसी तरह की राजनीति करती रही है जो आज भगवा पार्टी कर रही है। दरअसल, अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए देष की राजनीतिक पार्टियां सत्तारुढ दल का कम एक-दूुसरे का ज्यादा नुकसान करती रही हैं।  दल-बदल, छल-कपट,  और अवसरवादिता भारतीय सियासत का अंतरंग हिस्सा रहा है।  समकालीन सियासत के “अर्जुन“ एवं बिहार के मुख्यमंत्री नीतिष कुमार का ताजा पैंतरा इसका ताजा प्रमाण है। राश्ट्रपति पद के लिए विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खडा करने की पहल करने वाले नीतिष कुमार ऐन वक्त पर पैंतरा बदल कर विपक्ष को डंप करते हुए भाजपा के साथ हो गए हैं। राजनीतिक बयार किस ओर बह रही है, यह भांपने में नीतिष का जवाब नहीं है। नीतिष कुमार भली-भांति जानते हैं कि विपक्ष लाख कोषिष कर लें, न तो उनमें एकता हो पाएगी और न ही उनका प्रत्याषी राश्ट्रपति चुनाव जीत पाएगा। इस  बार राश्ट्रपति चुनाव का गणित राजग उम्मीदवार के पक्ष में , ठीक 2012 की तरह।   2012 में बयार भाजपा के विरोध में बह रही थी, इसीलिए राजग गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी नीतिष और उनकी पार्टी जनता दल (यू) ने तब संप्रग उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी के पक्ष में वोट डाले। इस बार चुनावी बयार भाजपा के पक्ष में है, इसलिए बिहार में लालू प्रसाद और कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी नीतिष कुमार ने ”उगते सूरज“ को प्राणायाम किया है। सत्ता की यही सबसे बडी खूबी है। बयार के साथ बहना ही समझदारी है। सत्ता पाना भारतीय राजनीतिक दलों का प्रमुख लक्ष्य होता है। सत्ता के माध्यम से देष और जनसेवा करने का संकल्प अब काफी पीछे छूट गया है। इसी सत्ता लोलुपता के कारण लालू प्रसाद एंड सन्स बिहार में नीतिष कुमार से चिपके हुए है जबकि बिहार के मुख्यमंत्री पिछले कुछ समय से भाजपा के काफी करीब जा चुके हैं। लालू भाजपा के घुर विरोधी हैं। राजनीतिक समीकरणों को अपने फायदे के लिए भुनाना सियासत का हिस्सा है मगर इससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है क्योंकि इसमें मजबूत विपक्ष के लिए स्पेस नहीं बच पा रहा है। अवसरवादी विपक्ष के कोई मायने नहीं है। मजबूत विपक्ष नहीं होने से भारत जैसे विषाल और बहु-जातीय समाज में सभी तबकों को माकूल प्रतिनिधित्व नहीं मिल पा रहा है। इसी कारण आजादी के सात दषक बाद भी गरीब और अमीर के बीच खाई और चौडी होती जा रही है। भारत की तुलना में अमेरिका और ब्रिटेन का द्धि-पार्टी आधारित लोकतंत्र ज्यादा सफल है।

गुरु बिन ज्ञान नही


संत कबीर ने बहुत पहले कहा था, “ गुरु बिन ज्ञान न उपजे, गुरु बिन मिले न मोक्ष; गुरु बिन लिखे न सत्य, गुरु बिन मिटे न दोश“। संक्षेप में आप चाहे कितने ही प्रतिभाषाली क्यों न हों मगर गुरु के बगैर न तो प्रतिभा तराषी जा सकती है  और न ही निखरती है। टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली के  दुनिया भर में फैले फैंस चाहेंगे कि वे अपने कोच का सम्मान करें और अपने दंपपूर्ण  आचरण को छोड दें। फलदार वृक्ष हमेषा झुकता है। महान खिलाडी की भी यही विषेशता होनी चाहिए। अनिल कुंबले को टीम इंडिया के पद से जिन हालात में इस्तीफा देना पडा, भारतीय क्रिकेट और टीम इंडिया के लिए इन्हें कतई सुखद नही माना जा सकता। क्रिकेट को भी खेल की भावनाओं से खेला जाना चाहिए। मगर यह कैसी खेल भावना है कि अपने कोच को जलील करते रहो और सच सामने आने तक इसे झुठलाते रहो। पिछले मंगलवार तक कप्तान विराट कोहली और कोच अनिल कुंबले के बीच कभी न खत्म होने वाले वाले झगडे से बीसीसीआई साफ मुकरता रहा और फिर अचानक अनिल कुबले ने इस्तीफा दे दिया। इस पर न तो बीसीसीआई और न ही कुंबले ने कुछ कहा है। माना कि ड्रैसिंग रूम की बातों को बाहर नहीं लाया जाना चाहिए मगर इन्हें बीसीसीआई के ध्यान में तो लाया जा सकता है। बहरहाल, टवीटर पर कुंबले ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवी लक्ष्मण की तीन सदस्यीय वाली क्रिकेट सलाहकार समिति (सीएसी) चाहती थी कि वे कोच बने रहें। कुबले कोच पद पर नहीं बने रहना चाहते थे पर  सीएसी ने उन्हें मना लिया। मगर कप्तान विराट कोहली को इस पर कडा ऐतराज था और अन्तोगत्वा कुंबले को इस्तीफा देना पडा। इसके यह मायने लगाए जा सकते हैं कि विराट का कद सीएसी से भी बडा है और कोच किसे बनाए जाए, इस पर तीन सदस्यीय समिति की बजाए कप्तान की पसंद को ज्यादा तवज्जो दी जा रही है। इस पर सुनील गावस्कर ने तंज भी कसा है “ कप्तान जिसे भी पसंद करते हैं, टीम इंडिया का कप्तान उसे ही क्यों नहीं बना देते“। कुंबले टीम इंडिया में अनुषासन, पेषेवर दक्षता, प्रतिबद्धता और प्रतिभा को निखारने वाली सोच रखते थे और उन्होंने टीम इंडिया को इस सांचे में ढालने की कोषिष भी की। विराट कोहली को कुंबले की यही अप्रोच अखरी और ताजा सूचना के मुताबिक कोच और भारतीय कप्तान में पिछले छह माह से बोलचाल तक बंद थी। यह काफी गंभीर बात थी और बीसीसीआई को तुरंत इसे गंभीरता से लेना चाहिए था।  कोहली और कुंबले के बीच जारी षीत युद्ध के दृश्टिगत इस बात की पूरी संभावना है कि चैंपियन ट्राफी के दौरान विराट कोच कुंबले की पेषेवर सलाह से महरूम रहे। इसी वजह विराट ने फाइनल में पहले गेंदबाजी की जबकि कुबल पहले बैटिंग करना चाहते थे। खेल भी युद्ध के मैदान की तरह होता है और इसमें षीर्श  जनरलों के बीच मतभेद बहुत भारी पडते हैं। महाभारत में युद्ध का कौषल भी यही संदेष देता है कि दुर्योधन का घमंड कौरवों की हार का सबसे बडा कारण बना था। बहरहाल, टीम इंडिया के कोच और कप्तान के बीच जंग का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले  2005 और  2006 में कप्तान सौरव गांगुली और कोच ग्रेग चैप्पल में लंबे समय तक झगडा चलता रहा। नतीजतन, सौरव गांगुली को कप्तानी से हाथ धोना पडा और वे अपनी उम्दा फार्म भी खो बैठे। खेल हो या युद्ध का मैदान, इसमें विवाद, अहम और व्यक्तिगत कुंठाओं के लिए कोई जगह नहीं होती हे और जो भी टीम इन सब नकारात्मक पहलुओं से पीडित होती है, उसका हारना तय है। पाकिस्तान की टीम इसकी मिसाल है। पहली बार टीम नकारात्मक बातों से मुक्त रही और पहली बार चैंपियन ट्राफी जीत गई।                    


गुरुवार, 22 जून 2017

भाजपा का मास्टर स्ट्रोक

बिहार के राज्यपाल राम नाथ कोविंद को अपना  राष्ट्रपति  उम्मीदवार चुनकर भाजपा नीत राजग ने विपक्ष दलों की कथित एकता को  छिन्न-भिन्न कर दिया है।  कोविंद दलित समुदाय से हैं।  राष्ट्रपति पद के लिए विपक्ष दलों को भी अब मजबूरन दलित उम्मीदवार ही उतारना पडेगा।  बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने स्पष्ट  कह दिया  है कि उनकी पार्टी  दलित उम्मीदवार का ही समर्थन करेगी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश  कुमार भी कोविंद के समर्थक बताए जा रहे है़ं। नीतिश  इन दिनों विपक्ष की अपेक्षा भाजपा के ज्यादा करीब है। कोविंद को लेकर नीतिश  और सहयोगी पार्टी राजद प्रमुख लालू यादव के बीच गंभीर मदभेद हैं। बहरहाल, कोविंद  अगर चुन  लिए जाते हैं, तो आजादी के बाद वे दूसरे दलित राष्ट्रपति होंगे और देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  से पहली बार देश  का प्रथम नागरिक चुना जाएगा।  इससे पहले 1997 में दलित समुदाय से संबंधित के आर  नारायणन (कोच्चेरील रामन नारायणन) देश  के दसवें राष्ट्रपति चुने गए थे। राम नाथ  कोविंद 1991 से भारतीय जनता पार्टी में हैं और  लगातार 12 साल तक राज्यसभा सदस्य रहे हैं। कोविंद भाजपा दलित मोर्चा के राष्ट्रीय   अध्यक्ष भी रह चुके हैं। 8 अगस्त 2015 को उन्हें बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया गया था। देश  में पिछले कुछ समय से अगडों और पिछडों में तनाव बढा है। भाजपा  शासित राज्यों में कुछ ज्यादा ही। गो-रक्षा की आड में दलितों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। मई में उत्तर प्रदेश  के सहारनपुर जिले के एक गांव में दलितों और ठाकुरों में जमकर जातीय टकराव हुआ। राज्य मे योगी आदित्यनाथ सरकार के सत्ता में आते ही ठाकुरों का दबदबा बढ गया है और दलितों से टकराव भी बढा है । योगी आदित्यनाथ खुद  ठाकुर है। कहा जाता है जब सुश्री मायावती सत्ता में थी,  ठाकुर दलितों से दबे-दबे रहते थे। समाजवादी पार्टी के राज में भी जातीय टकराव दबा रहा। मगर भाजपा सरकार के आते ही पूरे राज्य में जातीय तनाव बढा है। पूरे देश  में दलितों की यही सही शिकायत है कि आजादी के बाद से अब तक सात दशकों में भी  देश  के दलित  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जुड नहीं पाए हैं हालांकि समकालीन केन्द्र और राज्य सरकारें दलितों के लिए सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों के दाखिले में आरक्षण समेत तरह-तरह की सुविधाएं दे रही है। इसके वावजूद दलितों का अपेक्षित सामाजिक उत्थान नहीं हो पाया है। देहातों में छुआछूत और ऊंच-नीच वाली सोच  अभी भी बरकरार है। दलितों को कुंओं से पानी भरने तक से रोका जाता है। मंदिरों में भी उन्हे आसानी से प्रवेश  नहीं दिया जाता। दलित महिलाओं की अस्मत सरेआम लूटी जाती है।  यह हमारी सामाजिक व्यवस्था की सबसे बडी विफलता है। दलितों को मुख्यधारा से जोडने और उनसे हो रहे अन्याय को रोकने का पूरा उत्तरदायित्व सरकार पर है। इन सब बातों को सामने रखते हुए प्रधानमंत्री ने दलित को राजग का राष्ट्रपति  उम्मीदवार बनाया है। भाजपा को लगता है के देश  का प्रथम नागरिक दलित समुदाय से होगा तो दलितों में सरकार के प्रति भरोसा बढेगा। दो साल बाद लोकसभा चुनाव होने हैं।  विपक्ष ने अभी अपना उम्मीदवार तय नहीं किया है। वीरवार को विपक्ष दलों की प्रस्तावित बैठक में उम्मीदवार तह हो सकता है। तथापि,  सत्ताधारी दल के उम्मीदवार का चुना जाना तय माना जा रहा है।  जीत के लिए राजग उम्मीदवार को  5,49, 452 वोटों की दरकार है जबकि राजग को बीजू जनता दल, नीतिश  कुमार की पार्टी जनता दल (यू) समेत राष्ट्रपति को चुनने वाले कुल 10,98,903 वोटों मेंसे 6,09, 433 का समर्थन  है। इसके अलावा एआईएडीएमके के 58,224 और  शिवसेना के  25, 893 वोट भी राजग उम्मीदवार के पक्ष में जा सकते है़। मुलायम सिंह यादव भी राजग को समर्थन का ऐलान कर चुके है। राजग की तुलना में विपक्ष के पास बमुश्किल  3,81, 295 वोटस हैं। इस स्थिति में विपक्ष के उम्मीदवार के चुने जाने की कोई सभावना नजर नहीं आ  रही है।

मंगलवार, 20 जून 2017

शर्मनाक हार

चैपिंयन ट्राफी के फाइनल में टीम इंडिया की शर्मनाक हार से करोडों क्रिकेट प्रेमी बेहद निराश  हैं । हार तो हार है और धरती पर इंसान तो क्या कोई भी जीव हार को आसानी से निगल नहीं पाता है। खेल मे हार-जीत बेशक बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती  है पर  अगर हार पाकिस्तान के हाथो हों, तो भारत का हर नागरिक अपमान का घूंट पीकर रह जाता है। और हार इतनी शर्मनाक कि पाकिस्तानी सेना भी इस पर बार-बार तंज कस रही है। जिस टीम को 14 दिन पहले ही इसी टूर्नामेंट में भारत ने 124 रन से हराया हो, उसी टीम से फाइनल में 180 रनों से हार जाना वाकई ही अपमानजनक है। चैंपियन ट्राफी फाइनल के इतिहास में यह अब तक सबसे बडी हार है। इससे पहले भारत 2003 के वर्ल्ड कप के फाइनल में  आस्ट्रलिया से 124 रनों से हार चुकी है। इस हार ने भारत की मजबूत बैंटिंग की कलई भी खोल कर रख दी है। भारत अपनी मजबूत बैटिंग पर खूब इतरा रहा था। पाकिस्तानी गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजों को गेंद की लाइन और लैंथ को जांचने परखने का मौका तक नहीं दिया। पारी की तीसरी गेंद में रोहित शर्मा मोहम्मद आमिर की गेंद पर आउट हो गए। और एक ओवर बाद कप्तान विराट कोहली “ तू चल, मैं आया“ की तर्ज पर आउट हो गए। आउट होने से एक गेंद पहले कोहली को जीवनदान मिल चुका था मगर उन्होंने इसका कोई फायदा नहीं उठाया। कोहली का  चेंजिग में बेहतरीन रिकॉर्ड  रहा है और उन्होंने बडी पारियां खेलकर भारत को कई मैचों में जीत दिलाई है। पाकिस्तान के खिलाफ पहले मैच में कोहली ने 81 रनों की  शानदार पारी खेली थी। कोहली के आउट होते ही साफ हो गया था कि टीम इंडिया के लिए 339 रनों को चेज करना लगभग नामुमकिन हो जाएगा। और यही हुआ भी। इसके बाद युवराज सिंह ने थोडी देर के लिए  शिखर धवन के साथ मोर्चा  संभाला मगर दोनों ही जल्द आउट हो गए। मिस्टर कूल महेन्द्र सिंह धोनी और केदार जाधव भी जल्द ही चलते बने। भारतीय बल्ले बाजों के जल्द आउट होने से साफ लग रहा था कि वे पाकिस्तानी गेंदबाजों से खौफजदा हैं। मगर हार्दिक पंडया की  शानदार बैटिंग ने जता दिया कि पाकिस्तानी गेंदबाजों को आराम से खेला जा सकता है। उनके रन आउट होते ही हार  निश्चित  हो गई थी और पूरी भारतीय टीम 30.3 ओवर्स  में ही आउट हो गई। फाइनल में इससे ज्यादा शर्मनाक हार हो ही नहीं सकती। पाकिस्तान गेंदबाजों ने साबित कर दिया कि उसके  गेंदबाज श्रेष्ठ  से  श्रेष्ठ  बल्लेबाज को ध्वस्त कर सकते है़ं। टूर्नामेंट के षुरु में पाकिस्तानइ टीम को हल्के में लिया जा रहा था मगर इसी टीम ने दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड, श्री लंका और अंत में भारत को बुरी तरह हराया। यह भी दावा किया जा रहा था कि भारत की गेंदबाजी पहले की अपेक्षा कहीं ज्यादा धारदार है। मगर पाकिस्तानी खिलाडियों ने इसे भी ध्वस्त कर दिया। दुनिया के नंबर बन गेंदबाज रविचंद्रन  आश्विन  की पाकिस्तानी खिलाडियों ने बहुत ज्यादा ठुकाई की। कमजोर भारतीय गेंदबाजी के कारण ही पाकिस्तान विशाल स्कोर खडा करने में कामयाब रहा। जसप्रीत बुमराह ने बार-बार नो बाल फेंककर सारी हदें पार कर दीं ।  फाइनल में बार-बार नो बाल करना कमजोर गेंदबाजी की निशानी है। बुमराह ने चौथे ओवर में फखर जमान को चलता कर दिया था मगर उनके नो बाल ने मैच का रुख ही पलट दिया। पाकिस्तानी की सधी और पैनी गेंदबाजी के समक्ष भारतीय गेंदबाजी एकदम बौनी साबित हुई। भारत की फील्डिंग भी बेअसर रही । शुरु में रन आउट के दो अवसर मिले थे मगर दोनों ही गंवा दिए गए।  खेल में जो टीम बेहतरीन खेलती है, वही जीतती है। पाकिस्तान फाइनल में भारत की तुलना में कहीं ज्यादा अच्छा खेली और इसीलिए जीत गई। क्रिकेट प्रेमी कालांतर मे भले ही भारत की इस  शर्मनाक हार को भूल जाएं मगर इतिहास कभी  नहीं भूलता।

सोमवार, 19 जून 2017

वीवीआईपी गरुर

देश  मे सियासी नेताओं पर वीवीआईपी कल्चर का गरुर सिर चढ कर बोल रहा है। सियासी नेता वीवीआईपी रुतबा दिखाने में  न केवल अपनी  शान समझते हैं, अलबत्ता कायदे-कानून को भी सरेआम ठेंगा दिखाते हैं। आंध्र प्रदेश  के तेलगू देशम पार्टी सांसद एक एयरलाइंस पर अपने वीवीआईपी होने की धौंस जमाने के लिए इन दिनों चर्चा  में है। विशाखापटनम  (विज़ाग ) से हैदराबाद की यात्रा के लिए समय पर नहीं पहुंचने के कारण सांसद दिवाकर रेड्डी को आसानी से बोर्डिंग पास नहीं मिला। इस पर उन्होंने एयरपोर्ट पर खूब हंगामा किया। एयरपोर्ट पर ही एक प्रिंटर तोड डाला और एक कर्मचारी को धक्का दिया। हालांकि जैसे-तैसे एयरलाइन ने उन्हें यात्रा करने दी मगर बाद में उन्हें एयरलाइन से यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया। अब तक छह घरेलू एयरलाइंस दिवाकर रेड्डी को  उनकी उडानों से हवाई यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा चुकी है। रेडडी से पहले इस साल अप्रैल में  शिवसेना सांसद रवीन्द्र गायकवाड इस बात की सार्वजनिक  शेघी  बघार  चुके हैं कि उन्होंने सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया के एक कर्मचारी को 25 बार अपनी चप्पलों से पीटा। इस घटना के बाद एयर इंडिया ने उन्हे अपनी फ्लाइटस से सफर करने पर रोक लगा दी थी। बाद में एयर इंडिया द्वारा  इस प्रतिबंध को हटा तो  दिया गया मगर एयरलाइंस के पायलटों मे उन्हें सफर नहीं करने दिया। केन्द्र नागरिक उडडयन मंत्री के हस्तक्षेप के बाद जैसे-तैसे इस मसले को हल किया गया। सांसद ही नही विधायक से लेकर स्थानीय नेता तक अपना रुतबा झाडने का कोई मौका नहीं चूकते। सात जून को मध्य प्रदेश  के मऊ के भाजपा विधायक श्रीराम सोनकर ने अपनी डयूटी निभा रहे ट्रैफिक होम गार्ड को तमाचा जड दिया और उसका मोबाइल तोड दिया। इस  ट्रैफिककर्मी का कसूर यह था कि उसने गलत साइट से चलाई जा रही विधायक की गाडी को रोका और ट्रैफिक नियमों का पालन करने को कहा। वीवीआईपी कल्चर के नशे  में चूर विधायक को यह गवारा नहीं लगा। अप्रैल माह में नशे  में धूत भाजपा विधायक राकेश  राठौर ने टोल प्लाजाकर्मी  की पिटाई कर दी। इसी साल फरवरी में राजस्थान के एक महिला विधायक के पति ने पत्नी की गाडी का चालान काटे जाने पर ट्रैफिक पुलिसकर्मी को तमाचा जड दिया था। मई में उत्तर प्रदेश में गोरखपुर जिले के भाजपा विधायक राधा मोहन दास अग्रवाल द्वारा  आईपीएस महिला अधिकारी से बदसलूकी का मामला समाचार पत्रों की सुर्खियों में थां। इन सब घटनाओं का निचोड़  यह है कि सांसद अथवा विधायक बनते ही नेताओं को वीवीआईपी कल्चर का इतना नशा  हो जाता है कि वे कानून तोडना अपना अधिकार मानने लग जाते हैं़। मऊ के भाजपा विधायक श्रीराम सोनकर इसकी बानगी है। ट्रैफिक नियम तोडने को अपना विधायकी अधिकारी बताते हुए सोनकर सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं कि बतौर विधायक नियमों को तोडना उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि देश  के सियासी नेता किस मिट्टी के बने हुए हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी तब वीवीआईपी कल्चर में रमे होने के लिए  कांग्रेस को जमकर कोसा करती थी। सत्ता में आते ही भाजपाई वीवीआईपी कल्चर को गले लगाने में कांग्रेसियों से भी आगे निकल गए हैं। और यह सब उस समय हो रहा है जब देश  का सर्वोच्च न्यायालय और प्रधानमंत्री कह चुके हैं कि असली वीवीआईपी जनता है और आम आदमी से भी वही सलूक किया जाना चाहिए जैसा उसके प्रतिनिधि सांसद अथवा विधायक से किया जाता है। मोदी सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने “लाल बत्ती“ का प्रचलन भी बंद कर दिया है। मगर इस देश  में कायदे-कानून का पालन होता ही कहां है? जिस देश  के लॉमेकर्स खुद ही नियमों को धडल्ले से तोडें और फिर इसकी  शेखी बघारना , वहां  आम आदमी से क्या उम्मीद की जा सकती है?  

Let The President Be Elected Unanimously

देश  का अगला  राष्ट्रपति  कौन होगा, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट  नहीं है। फिलहाल, इतना तय है कि  राष्ट्रपति  वही बनेगा जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी बनाना चाहेगी। जिस पार्टी अथवा गठबंधन के पास ज्यादा वोट होते हैं, उसी का उम्मीदवार चुना जाता है।  राष्ट्रपति  को देश  की जनता की तरफ से सांसद और विधायक चुनते हैं। अमूमन, केन्द्र और अधिकतर राज्यों में सतारूढ दल के पास विपक्षी दलों की तुलना में ज्यादा वोट होते हैं। इसलिए सत्तारूढ दल द्वारा प्रायोजित उम्मीदवार ही  राष्ट्रपति  चुना जाता है। केवल एक बारगी को छोडकर अब तक यही परंपरा रही है।  1969 में कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार नीलम  संजीवा रेड्डी को निर्दलीय प्रत्याशी वीवी गिरा ने हराया दिया था। पहली बार सतारूढ दल कांग्रेस का प्रत्याशी  चुनाव हारा था जबकि तक कांग्रेस के पास 431 सांसदों और 17 मेंसे  12 राज्य विधानसभाओं में भारी बहुमत प्राप्त था। निर्दलीय प्रत्याशी  वीवी गिरी तब उप-राष्ट्रपति  थे और उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव लडा था। दरअसल, यह वह जमाना था जब कांग्रेस में वयोवृद्ध नेताओं (सिंडीकेट) और इंदिरा गांधी की अगुवाई में युवाओं (यंग टकर्स) में जबरदस्त वैचारिक और राजनीतिक टकराच चल रहा था। इसी दौरान  बैकों का  राष्ट्रीयकरण  करके  इंदिरा गांधी  वामपंथी दलों की “प्रियदर्शनी  भी बन गई थी। पहली बार राष्ट्रपति   चुनाव में “विवेक अथवा अंर्त्यात्मा की आवाज“ पर वोट का आहवान किया गया था और इस आहवान को  करने वाली और कोई नहीं खुद इंदिरा गांधी थीं। नतीजतन, भारी संख्या में कांग्रेस सांसदों और विधायकों ने अधिकृत पार्टी उम्मीदवार की बजाय वीवी गिरी के पक्ष में मतदान किया और वे राष्ट्रपति  चुन लिए गए। बहरहाल, इसके बाद फिर से ऐसी नौबत नहीं आई और सत्तारूढ पार्टी उम्मीदवार ही राष्ट्रपति   चुना जाता रहा है। वर्तमान राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी संप्रग की पसंद हैं। वे लंबे समय से कांग्रेस पार्टी से जुडे रहे हैं। इस बात के दृष्टिगत  उनका भाजपा नीति राजग गठबंधन द्वारा फिर से उम्मीदवार बनाने की कोई संभावना नहीं है हालांकि भाजपा की सहयोगी पार्टी  शिवसेना ने पिछले चुनाव में प्रणब मुखर्जी के पक्ष में वोट डाले थे। उससे पहले प्रतिभा पाटिल को भी  शिवसेना ने अपना समर्थन दिया था क्योंकि वे महाराष्ट्र  से संबंधित थीं। 2002 के राष्ट्रपति  चुनाव में भी  शिवसेना ने राजग के उम्मीदवार एपीजे अब्दुल कलाम को समर्थन नहीं दिया था। शिवसेना के पास 20-25 वोट हैं और इस बार  शिवसेना के ये वोट भाजप नीत राजग के लिए बहुत मायने रखते है। भाजपा के उम्मीदवार चयन में  राष्ट्रीय  स्वंय सेवक भी अहम भूमिका मानी जा रही है। शिवसेना अगर राजग उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करती है, तो भी सत्तारूढ दल के प्रत्याशी  को  जीत के लिए बाहर से बीस हजार वोटों की जरुरत पडेगी। इसीलिए  भाजपा को  कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की मिन्नतें करनी पड रही है। भाजपा को अंदर ही अंदर ही इस बात का भी डर है कि प्रधानमंत्री की कार्यशैली से नाराज कुछ सांसद पार्टी से बगावत भी कर सकते हैं। विपक्ष भी इस स्थिति को भुनाने और एकजुट होने की  कोशिश कर रहा है। पिछले सप्ताह विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति   चुनाव को लेकर बैठक भी की। विपक्ष शिवसेना और तमिल नाडु में सत्तारूढ दल एआईएडीएमके के बागियों को भी साथ लेने की कोशिश  कर रहा है। वामपंथी दल  महात्मा गांधी के पोते गोपाल  कृष्ण गाँधी  को उम्मीदवार बनाने के पक्ष में है। उनके नाम पर सहमति बन सकती है। बहरहाल, राश्ट्रपति देश  का प्रथम नागरिक के साथ-साथ  तीन सेनाओं के  कमांडर भी हैं और संसद भी उनके बगैर अधूरी है। उनका चुनाव सर्वसम्मति से ही होना चाहिए। टोकन फाइट की कोई उपयोगिता नहीं है।  



गुरुवार, 15 जून 2017

“चोर” मचाए शोर

बेंकों के नौ हजार करोड रु से ज्यादा की रकम डकार कर इंग्लैंड में सर उठाकर ऐश -परस्ती कर रहे शराब कारोबारी विजय माल्या भारतीय कानून को खूब ठेंका दिखा रहे हैं। विदेशी  कायदे-कानून की शरण में गए  माल्या को  मंगलवार को लंदन की एक अदालत से चार दिसंबर तक जमानत मिल गई। यानी अब इस साल माल्या को भारत में प्रत्यर्पण किए जाने की कोई ंसंभावना नही है हालांकि मामले की अगली सुनवाई छह जुलाई को होनी है।  भारत में प्रत्यर्पण की कार्रवाई के सिलसिले में माल्या लंदन की अदालत में पेश  हुए थे। अदालत के बाहर माल्या ने तंज भी कसा “ करोडों की रिकवरी के सपने देखते रहिए“। बहरहाल, इंग्लैंड हो या यूरोप भारत में संगीन अपराध करके इन देशों  में शरण लेने वालों का वापस लाना खासा जटिल काम है। सच कहा जाए तो लगभग नामुमकिन सा है। आज तक भारत सरकार विदशों  से मात्र 62 अरोपियों का प्रत्यर्पण कर पाई है और इनमें अधिकांश  यूएई से ही प्रत्यर्पित हो पाए हैं़। अभी तक इंग्लैंड से केवल एक आरोपी का प्रत्यर्पण हो पाया है। बैंकों के लगभग 9000 करोड रु के कर्जदार माल्या को भारत लाने के अब तक तमाम प्रयास विफल रहे हैं। 2016 में भारत सरकार ने ब्रितानवी सरकार से विजय माल्या के प्रत्यर्पण का आग्रह किया था मगर इसे इस बिला पर अस्वीकार कर लिया गया था कि सरकार माल्या के खिलाफ पुख्ता चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाई। भारत सरकार ने माल्या के खिलाफ बैंकों का कर्जा  न लौटाने का चार्ज  लगाया था मगर ब्रितानवी कानून के तहत प्रत्यर्पण के लिए यह कोई पुख्ता चार्ज नहीं है। इस साल जनवरी में सीबीआई ने माल्या के खिलाफ लंदन में चार्जशीट पेश  की थी और अब मामला अदालत में चल रहा है। इंग्लैंड  में  प्रत्यर्पण की प्रकिया खासी लंबी है और इसमें कम-से-कम दो साल भी लग सकते हैं। विजय माल्या के खिलाफ भारत की विभिन्न अदालतों ने नौ से भी ज्यादा गैर जमानती वारंट जारी कर रखे हैं। इसके बावजूद भी माल्या को आरोपी साबित करने के लिए सीबीआई को खूब पसीना बहाना पड रहा है।  इंग्लैंड के कायदे-कानून का ख्याल करते हुए लगता नहीं है माल्या का प्रत्यर्पण जल्द हो पाएगा। इससे पहले नब्बे के दशक में भारत इंग्लैंड से गुलशन कुमार की हत्या के प्रमुख आरोपी नदीम अख्तर सैफी का प्रत्यर्पण करवाने में न केवल विफल रहा था , अलबता नई दिल्ली को जुर्माना भी भरना पडा था। बहरहाल, कायदे-कानून के कायल ब्रितानवी जनमानस भी  शायद ऐसे कानून की ताकीद करेगा जो विदेशी  अपराधियों का मददगार हो। भला यह भी कोई कानून हुआ कि कोई बैंकों का करोडों का डकार जाए और उसे सर उठाकर ऐश -परस्ती करने का हक दिया जाए। तथापि, इंग्लैंड तो दीगर रहा, भारत में  कानून को तोडना-मरोडना तो और भी आसान है। सालों से देश  को बताया जा रहा है कि भारत में मुठ्ठी भर लोग बैंकों का करोडों डकार कर कानून को ठेंगा दिखा रहे है़। ताजा आंकडे बताते हैं कि मात्र 12 बडे कर्जदार बैंकों का दो लाख करोड रु दबा बैठे हैं और अभी तक इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नही की गई है। हैरानी इस बात की है कि आम आदमी अगर चंद हजार रु का कर्ज  न लौटाए तो उसकी संपत्ति फौरन नीलामी की जाती है, पर जब रसूखदारों पर बन आती है तो कानून भी आंखें मूंद लेता है। देश  जानना चाहता है कि अगर कानून सबके लिए बराबर है तो  दो लाख करोड रु दबाने वालों के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नही हुई और बेंकों का कर्जदार होते हुए विजय माल्या विदेश  कैसे भाग गए? कानून भले ही रसूखदारों से नरमी दिखाए, जनमानस माल्या को “चोर“ ही मानता है। ओवल में चैंपियन ट्राफी मैच देखने आए  दर्शकों  ने माल्या को “ चोर  चोर“ कहकर खासा जलील किया।

बुधवार, 14 जून 2017

ट्राईसिटी का जलवा

आईआईटी में दाखिले के लिए आयोजित परीक्षा जेईई एडवांस्ड में पंचकूला के छात्र सर्वेश  मेहतानी ने पहला स्थान हासिल करके पूरे  देश   में टाईसिटी का नाम रोशन किया है।   जेईई एडवांस्ड परीक्षा देश  की सबसे प्रतिष्ठित   मानी जाती है। इस टेस्ट में रैंक पानी ही बहुत बडी उपलब्धि है, पहला स्थान हासिल करना तो वाकई अभूतपूर्व सफलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ट्राईसिटी (चंडीगढ, पंचकूला और मोहाली) के तीन छात्रों ने टॉप टेन में अपना स्थान बनाया है। चंडीमंदिर कैंट एरिया के आशीष  वैकर ने सातवां तथा चंडीगढ के रचित बंसल ने नौवां स्थान हासिल किया है। सर्वेश  ने  तो  सफलता की बुलदियों को चूमा है। जेईई मेन्स में सर्वेश  का  55वां रैंक था मगर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दिन-रात पढाई करके अपने लक्ष्य को पा लिया। उनकी कामयाबी अन्य परीक्षार्थियों के लिए प्रेरणा स्त्रोत  है। हरियाणा के चार छात्रों ने भी टॉप टेन में स्थान बनाकर प्रदेश  का नाम रोशन किया है । इतना ही नहीं राज्य के 12 से भी ज्यादा छात्र टॉप 100 में स्थान बनाने में कामयाब रहे हैं। पटियाला के रचित बंसल ने नौंवा स्थान हासिल कर पंजाब का नाम रोशन किया है। इस बार बेटियों  का  जेईई एडवांस्ड परीक्षा के टॉप 30 में स्थान हासिल नहीं कर पाना थोडा निराशाजनक है मगर सबसे ज्यादा क्वालिफाई करके बेटियों ने यह कसर पूरी कर दी है। जेईई मेन्स में 360 मेंसे 360 अंक  लेने वाले कल्पित टॉप टेन में अपना स्थान नहीं बना पाए हैं। उनका  जेईई एडवांस्ड में  109वां रैंक है मगर उन्होंने अपनी आरक्षित कैटगरी में टॉप किया है।  इस बार  जेईई एडवांस्ड में 1 लाख 59 हजार 540 परीक्षार्थी अपीयर हुए थे पर  50,455 ही टेस्ट को क्वालीफाई कर पाए जबकि पहली बार अधिकतम 18 बोनस मार्क्स  भी दिए गए हैं। आंसर की में छात्रों का फीडबैक मिलने के बाद आईआईटी मद्रास ने पहले 11 और फिर  7 बोनस  मार्क्स दिए। इसका असर यह हुआ कि कट ऑफ 126 तक आ गया। पिछले साल कट ऑफ 100 पर था।  इससे पहले दो बार 10 और एक बार 11  बोनस मार्क्स  दिए गए थे मगर कट ऑफ पर ज्यादा असर नहीं पडा था।  बोनस मार्क्स को मेहनती छात्रों के साथ खिलवाड माना जा रहा है। बहरहाल, पूरे देश  में ट्राईसिटी, हरियाणा और पंजाब शिक्षा के क्षेत्र में नित नई बुलिदियां छू रहा है। 11 साल पहले पंचकूला के रघु महाजन ने भी  इसी परीक्षा में पहला स्थान हासिल किया था। इस बार ट्राईसिटी के आठ होनहारों ने जेईई एडवांस्ड के टॉप 100 में अपना स्थान बनाया है। छात्रों की  शानदार सफलता ने फिर साबित कर दिया है कि  ट्राईसिटी  शिक्षा के क्षेत्र में रीजन में ही नहीं, पूरे देश  में अव्वल है। अभी मेडिकल दाखिले की प्रवेश  परीक्षा “नीट“  का परिणाम आना बाकी है। पहले की तरह इस बार भी ट्राईसिटी के होनहारों के टॉप स्थान ग्रहण करने की पूरी उम्मीद है। सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को दस दिन के भीतर परिणाम घोषित करने के आदेश  दिए है। मद्रास हाई कोर्ट ने 24 मई को नीट का परिंणाम घोषित करने पर रोक लगा दी थी। ट्राईसिटी के होनहार जेईई मेम्स, जेईई एडवांस्ड और नीट में ही नहीं बल्कि अखिल भारतीय सिविल सर्विसिस परीक्ष में भी शानदार  परिणाम ला रहे है़। इस बार अमृतसर के अनमोल सिंह बेदी ने देश  में दूसरा स्थान पाकर रीजन का नाम रोशन किया है। 31 मई को  घोषित  सिविल सर्विस परीक्षा परिणाम में चडीगढ के तीन होनहारों ने परीक्षा में सफलता पाई है हालांकि पहली बार ऐसा हुआ है कि ट्राईसिटी को पहले सौ स्थान में जगह नहीं मिल पाई है। 2015 में पंचकूला के अभिजीत कप्लिश   ने 15वां रैंक हासिल किया था और ट्राईसिटी के पांच परीक्षार्थियों ने टॉप 100  रैंक में स्थान पाया था।  सिविल सर्विस परीक्षा में भी ट्राईसिटी के होनहार बराबर अपना जलवा दिखा रहे हैं।    

सोमवार, 12 जून 2017

ब्रिटेन में त्रिशकू संसद



ब्रितानवी जनता ने  मध्यावधि चुनाव में प्रधानमंत्री टेरीजा मे को तगडा झटका दिया है। प्रधानमंत्री मे ने प्रचंड जनादेश  की उम्मीद में समय से पहले चुनाव कराए थे मगर उनका दांव उल्टा पड गया।  शुरुआती नतीजों से साफ है कि सत्तारूढ दल कंजरवेटिव पार्टी पूर्ण बहुमत से पिछड गई है और ब्रिटेन में त्रिशंकू संसद का गठन तय है। 650 सदस्यीय हाउस ऑफ कांमन्स में  स्पष्ट  बहुमत के लिए 326 सदस्यो की दरकार है मगर  प्रधानमंत्री टेरीजा मे की  कंजरवेटिव पार्टी को 319 सीटें ही मिल पाईं हैं।  पार्टी को 12 सीटों का नुकसान हुआ है। 2015 के आम चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री डेविड कमरून के नेतृत्व में  कंजरवेटिव पार्टी को  पूर्ण  बहुमत मिला था। इस चुनाव में  प्रमुख विपक्षी दल लेबर पार्टी को 265 मिलीं है मगर वह भी  स्पष्ट  बहुमत से काफी दूर है। लेबर पार्टी को 29 सीटों का फायदा मिला है।  सात साल पहले 2010 में भी ब्रिटेन में किसी भी पार्टी को  स्पष्ट  बहुमत नहीं मिला था और तब भी त्रिशंकू संसद का गठन हुआ था। इस बार स्कॉटिश  नेशनल पार्टी (एसएनपी) को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। इसके पूर्व नेता और 2007 से 2014 तक स्कॉटलैंड के प्रधानमंत्री रहे एलेक्स सेलमंड स्कॉटिश  कंजरवेटिव पार्टी के प्रत्याशी  से हार गए हैं। स्कॉटिश  नेशनल पार्टी  का  प्रदर्शन  बेहतर रहा है।  इस  बार पार्टी ने 35 सीटें जीती हैं। 1983 के बाद  स्कॉटिश  नेशनल  पार्टी ने पहली बार इतनी सीटें जीती हैं। संसद में एसएनपी के नेता एंगल रॉबर्टसन  चुनाव हार गए हैं। लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी निक क्लेग भी हार गए हैं। पहली बार संसद में सबसे ज्यादा 200 महिलाएं सांसद चुनी गईं है। 2015 में 196 महिलाएं सांसद चुनी गई थी। जालंधर से इंग्लैड गए तनमनजीत सिंह धेशी  पहली बार पगडीधारी सिख ब्रितानवी संसद पहुंचे हैं। बर्मिंघम के एजबेस्टन से प्रीति कौर गिल पहली सिख महिला सांसद बनी है। 1997 के बाद पहली बार सबसे ज्यादा 69 फीसदी मतदान हुआ था। इस चुनाव में भारतीय मूल के अब तक 12 सांसद जीते हैं, सात लेबर पार्टी से और पांच कंजावेटिव पार्टी से। पिछली बार भारतीय मूल के 10 सांसद थे। चुनाव परिणामों से साफ है कि ब्रितानवी अवाम को प्रधानमंत्री टेरीजा मे  द्धारा  देश  पर संसद के मध्यावधि चुनाव थोपना रास नहीं आया है। संसद की मियाद मई 2020 मई तक थी मगर यूरोपियन यूनियन से बाहर आने के फैसले पर चौतरफा घिरी टेरीजा मे मध्यावाधि चुनाव से  स्पष्ट  बहुमत हासिल कर आलोचकों का मुंह बंद कराने की फिराक में थी। और अब सरकार बनाने के लिए टेरीजा मे को छोटे-मोटे दलो का समर्थन लेना होगा। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि सरकार बनाने के लिए छोटे-मोटे दलों का समर्थन कितना महंगा पडता है़। ताजा सूचना है कि टेरीजा मे ने डेमोकेटिक यूनियनिस्ट पार्टी (डीयूपी) के साथ मिलकर सरकार बनाने के संकेत दिए हैं। इस पार्टी ने दस सीटें जीती हैं और कंजरवेटिव पार्टी को  स्पष्ट  बहुमत के लिए आठ सांसदों के समर्थन की दरकार है। अभी तक डीयूपी ने इस बारे कुछ नहीं कहा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मे डीयूपी से “ कॉन्फिडेंस एंड सप्लाई“ के फार्मूले वाले “वोट-टू-वोट“ आधार पर समर्थन लेंगी। अपने पिछले कार्यकाल की अपेक्षा इस बार टेरीजा मे का कार्यकाल ज्यादा चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है। उन्हें संसद के भीतर और बाहर और अधिक मुखर आलोचना का सामना करना पड सकता है। दस दिन बाद “बै्रक्सिट“ पर अहम बातचीत शुरु होनी है।  यूरोपियन यूनियन छोडने के लिए यूरोप के अधिकतर देश  ब्रिटेन से खासे खफा हैं। अमेरिका से उम्मीद थी मगर राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप काइंया निजनेसमैन हैं और मोल-तोल के लिए जाने जाते हैं।  “बै्रक्सिट“ पर ब्रिताबवी भी बंटे हुए हैं। इन हालात में प्रधानमंत्री टेरीजा मे का सफर वैसा आरामदायक नहीं होगा, जैसा मध्यावधि चुनाव कराकर वे चाहती थींा।    

शुक्रवार, 9 जून 2017

ग्लोबल वार्मिं(र्निं)ग

पर्यावरण से अत्याधिक छेडछाड कर ग्लोबल वार्मिंग की ओर तेजी से बढ रही धरती पर उसके बाशिंदों ने अभी भी कोई सबक नही सीखा है।  हर मुकाम पर  दुनिया का नेतृत्व करने वाला अमेरिका ही पेरिस क्लाइमेट करार से पीछे हट गया है। चीन और भारत समेत दुनिया के 195 मुल्क हालांकि एक सुर में कह रहे हैं,“ अमेरिका नहीं है तो क्या हुआ“, मगर जमीनी सच्चाई  यह है कि अधिकतर मुल्क वित्तीय और तकनीकी मदद के लिए पूरी तरह से अमेरिका पर आश्रित है। और अमेरिकी मदद के बगैर पेरिस जलवायु करार के लक्ष्यों को पाना  आसान नहीं होगा। महाशय ट्रम्प  इसी कारण भाव दिखा रहे हैं। बहरहाल, ग्लोबल वार्मिंग का असर पूरी दुनिया मे स्पष्ट  दिखाई दे रहा है। मौसम का मिजाज बुरी तरह से बिगड चुका है। सर्दियों  में अत्याधिक कडाके की ठंड और लंबे  ड्राई  जलवायु से जहां यूरोप के लोग परेशान है वहीं  अफ्रीका और एशिया  भीषण गर्मी  का प्रकोप झेल रहा है। यूरोप और उत्तरी अमेरिका  हाड  कंपाकंपाते  ठंडे  मौसम और लंबी सर्दी से जूझ रहा है तो एशिया , अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और खाडी  के देश  के कई क्षेत्र तापपान में बेताहाशा  वृद्धि से लुप्त होने  की कगार पर हैं। भारत में तीन माह की भीषण गर्मी का सीजन इस बार आंख-मिचौली खेल रहा है। एक रोज बदन  झुलसाने वाला तापमान है तो अगले रोज इसमें अप्रत्याशित  गिरावट। बुधवार को समूचे उत्तर भारत को भीषण गर्मी का प्रकोप झेलना पडा और कई जगह अधिकतम तापमान 45 डिग्री से 48 डिग्री रिकार्ड किया गया। वीरवार को तापपान में काफी गिरावट आई और अधिकतर स्थानों पर अधिकतम 40 डिग्री से नीचे लुढ्क गया। दिल्ली, चंडीगढ समेत ज्यादातर शहरों में अधिकतम तापमाान 36  डिग्री के आसपास रहा। उत्तर भारत में मई-जून खासा तपता है और औसतन तापमान  40 डिग्री से अधिक रहता है। लेकिन पिछले कुछ सालों से  तपती  गर्मी के सीजन में भी तापमान में खासा उतार-चढाव देखा गया है। इससे  मौसमी फसलों और फल-सब्जियों का उत्पादन प्रभावित हो रहा है। जलवायु परिवर्तन का सबसे ज्यादा खमियाजा पहाडों को भुगतान पड रहा है। गैर मौसमी बारिश , ओलावृष्टि  और तूफानी  हवाओं ने इस बार हिमाचल के किसानों के नाकों दम कर रखा है। ओलावृष्टि  और तूफानी हवाओं ने सेब, आम और आडू-पलम की फसलों को करीब-करीब तबाह कर दिया है। पूरे मई माह में बेमौसमी बारिश , ओलावृष्टि  होती रही और तेज हवाएं चलती रहीं। इससे मौसमी सब्जी उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। और यह सब पर्यावरण को असंतुलित करने का नतीजा है। ताजा अमेरिका अनुसंधान में बताया गया है कि भारत में पिछले पचास सालों में तापमान में औसत दशमलव पांच डिग्री वृद्धि के कारण गर्मी का प्रकोप बढा है। इससे गर्म  हवाओं (हीट वेव्ज) में 150 फीसदी  का इजाफा होने से औसतन सौ लोग  कालग्रस्त हो रहे हैं। इस अनुसंधान का यह  भी  निष्कर्ष है कि इस सदी के अंत तक भारत और अन्य एषियाई देशों  में औसत तापमान में 2.2से 5.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है। तापमान में अत्याधिक वृद्धि के कारण  एशिया उप-महाद्धीप (सब-कॉटिनेंट) मध्य-पूर्व, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका गर्मियों में वाकई ही रहने लायक ही नहीं रह जाएगा। खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट आएगी, पीने के पानी की गंभीर समस्या खडी हो जाएगी और अत्याधिक गर्मी के कारण विकासशील  देशों  में बीमारियां बढेगी। सबसे ज्यादा असर गरीब पर पडेगा। गरीब के पास न तो  शुद्ध पेय जल सुविधा है और न ही गर्मी से बचने के माकूल साधन। मलिन बस्तियों और झोपड-पट्टी में साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था नहीं होने से इन जगहों में गर्मियों में  बीमारियां फैलती हैं। मौसम में बदलाव बीमारियों को बढाता है। दुनिया को अगर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से बचाना है तो फौरन सतत प्रयास करने होंगे।    


गुरुवार, 8 जून 2017

आग से खेलना बंद करें

मध्य प्रदेश  के मंदसौर में पुलिस फायरिंग में छह किसानों की मौत से तो अब केन्द्र और राज्यों को चेत जाना चाहिए। इस दुखद हादसे से यह  सबक भी मिलता है कि किसानों को कर्ज माफी के लोक-लुभावने वायदे किस कद्र भयानक साबित हो सकते हैं। देश  के कई हिस्सों में इन दिनों किसान ऋण माफी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। मध्य प्रदेश  के किसान  ऋण माफी और कृषि  उत्पादों के समर्थन मूल्य में वृद्धि की मागों को लेकर  एक जून से  आंदोलन कर रहे हैं। महाराष्ट्र  में भी किसान एक जून से हडताल पर हैं। इससे पहले तमिल नाडु के किसान हाथ में खोपडियां और मुंह में चूहा दबाकर देश  की राजधानी दिल्ली में अर्धनग्न  प्रदर्शन  कर चुके हैं। और यह सब राजनीतिक दलों के खोखले आश्वासनों   और लोक लुभावने वायदों का किया धरा है। देश  का प्रधानमंत्री अगर किसी राज्य विशेष  के चुनाव दौरान स्वंय ऋण माफी का वायदा करे तो किसानों की अपेक्षाएं सातवें आसमान पर चढना स्वभाविक है। इस साल के  शुरु में सपन्न उत्तर प्रदेश  विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री ने राज्य के किसानों के ऋण माफ की घोषणा की थी। और अब योगी आदित्यनाथ सरकार इस वायदे को पूरा करने के लिए वचनबद्ध है। उत्तर प्रेद्श  की देखा-देखी महाराष्ट्र  और मध्य प्रदेश  के किसान भी दोनों राज्यों की भाजपा सरकार से ऋण माफी की उम्मीद कर रहे हैं और इसीलिए आंदोलन भी कर रहे हैं। पंजाब में कांग्रेस ने सत्ता में आने के लिए विधानसभा चुनाव के दौरान किसानों से ऋण माफी का पक्का वायदा किया था। अब इस वायदे को निभाने के लिए कैप्टन अमरेन्द्र सिंह सरकार अपने सभी वित्तीय स्त्रोत खंगाल रही है। राज्य सरकार की माली हालत इतनी दयनीय है कि सरकारी कर्मचारियों को वेतन आयोग के संशोधित वेतनमान लागू करने के लिए भी पैसा नहीं है। इसी साल हिमाचल प्रदेश  और गुजरात में विधानसभा  चुनाव होने हैं। इन राज्यों के किसान भी राजनीतिक दलों से ऋण माफी की उम्मीद लगाए बैठे हैं और अगर चुनाव जीतना है तो सभी दलों को यह वायदा करना ही होगा। दो साल बाद 2019 में लोकसभा चुनाव होने है और इस चुनाव में भी किसान राजनीतिक दलों से ऋण माफी के पक्के वायदे की उम्मीद रखेंगें। किसानों की ऋण माफी का यह सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो 2019 तक  विभिन्न राज्यों द्वारा किसानों के 2,57,000 करोड रु के ऋण माफ कर दिए जाएंगे मगर इसके बावजूद किसानों की आर्थिक दशा  में कोई सुधार आने की उम्मीद नही है। सच यह है कि ऋण माफी महज चुनाव जीतने का राजनीतिक हथकंडा है जिसका  सत्ता पाने के लिए  समय-समय पर राजनीतिक दल बखूबी इस्तेमाल करते रहे हैं। 1990 में  विश्व  प्रताप सिंह की सरकार ने अपना चुनावी वायदा पूरा करने के लिए किसानों के दस हजार रु तक के ऋण माफ करने की घोषणा की थी। तब चौधरी देवी लाल वीपी सिंह सरकार में उप-प्रधान मंत्री थे। इससे पहले देवी लाल बतौर मुख्यमंत्री  हरियाणा में किसानों के 227.5 करोड् रु के कर्ज माफ कर वुके थे। इसमें 162 करोड रु  कमर्शियल  बैंकों के थे। 2008 में संप्रग सरकार ने  31मार्च, 2007 तक देश  के सभी तीन करोड सीमांत और लघु किसानों के लगभग 50,000 करोड रु के ऋण माफ कर दिए थे। इसके अलावा और भी कई राज्य अब तक ऐसा कर चुके हैं मगर किसान आज भी बदहाल है। वन टाइम ऋण माफी से  किसान  का कोई भला नहीं होने जा रहा है। आजादी के बाद से सबसे ज्यादा बदहाल किसान है। देश  के 68.8 फीसदी किसानों के पास मात्र 8 फीसदी संपदा है। किसानों की  उपज को समुचित दाम और माकूल विपणन व्यवस्था  सुनिश्चित  करने  से ही उनकी वातविक आर्थिक उन्नति की जा सकती है। जिस तरह उधोग और व्यापार साल-दर-साल खुशाहल हो रहा है, उसी तरह किसान को भी माला-माल किया जाना चहिए। यही वास्तविक प्रगति है।
 

बुधवार, 7 जून 2017

भारत का बाहुबली

भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान में एक और लंबी छलांग लगाई है। सोमवार को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने दो सौ हाथियों के वजन (640 टन) बराबर   जीएसएलवी मार्क-3  रॉकेट का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण किया। इस विशालकाय रॉकेट के साथ विशाल उपग्रह  भी भेजा गया है।  जीएसएलवी मार्क-3 के सफल प्रक्षेपण से अंतरिक्ष में मानव यात्रियों को भेजने का मार्ग प्रशस्त भी हो जाएगा। तीस साल के सघन अनुसंधान के बाद भारत को यह सफलता मिली है। लॉन्चिंग के 16 मिनट बाद रॉकेट ने अपने साथ भेजे संचार उपग्रह जी सैट-19 को भी अपने कक्ष में स्थापित कर दिया। 3136 किलोग्राम वजन वाला जी-सैट-19 अब तक का सबसे वजनी उपग्रह है। इस उपग्रह को बनाने में ही इसरो को 15 साल लग गए।  अब तक  2.3 टन से ज्यादा के उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजने के लिए भारत को विदेशों  पर निर्भर रहना पडता था। जीएसएलवी मार्क-3  तीन स्तरीय इंजन वाला रॉकेट है। इसकी सबसे बडी खूबी  भी यही है कि यह पूरी तरह से स्वदेशी  निर्मित है। इसके सबसे बडे क्रायोजेनिक इंजन भारत में ही बनाए गए हैं। इसमें ईंधन के तौर पर “लिक्विड ऑक्सीजन“ और “हाइड्रोजन“ इस्तेमाल किया गया है। पहले स्तर का दो मोटर वाला इंजन ठोस  ईंधन से चलता है, तो दूसरे स्तर का इंजन तरल ईंधन से काम करता है। तीसरे स्तर पर क्रायोजेनिक इंजन लगा हुआ है। विदेशों  की तुलना में इस रॉकेट का निर्माण काफी किफायती रहा है। इस पर लगभग 160 करोड रु का खर्च  आया है। अमेरिका में इतने बजट में एक फिल्म तक नहीं बन पाती है।  रॉकेट के साथ भेजे गए  जी-सैट-19 के सफल प्रक्षेपण से भारत में इंटरनेट की स्पीड में खासी वृद्धि होगी। 15 साल तक काम करते रहने वाले  जी-सैट-19 में प्रति सेकेंड चार जीबी डेटा देने की क्षमता है। पहली बार किसी उपग्रह  में स्वदेशी   निर्मित लीथियम आयन बैटरियों का इस्तेमाल किया गया है।ं  जीएसएलवी मार्क-3 की लॉन्चिग से डिजिटल इंडिया भी सशक्त होगा। इससे भारत के स्पेस मिशन को भी गति मिलेगी। पिछले कुछ समय से इसरो ने स्पेस विज्ञान में अभूतपूर्व  उपलब्धियां हासिल करके पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाया है। तथापि, भारत के पास हैवी सेटेलाइट लांच व्हीक्ल का न होना  इसकी स्पेस क्षमताओं को प्रभावित कर रहा था।   जीएसएलवी मार्क-3 के लॉन्चिग से भारत को अब हैवी उपग्रह के कमर्षियल प्रक्षेपण के लिए बाहरी, खासकर  फ्रांस की कंपनी एरियन स्पेस पर निर्भर नहीं रहना पडेगा। इससे भारत को लागत में काफी बचत हो सकती है और इस धन को अन्य कामों पर खर्च किया जा सकता है। बाहरी देशों  से उपग्रहों का प्रक्षेपण काफी महंगा सौदा साबित हो रहा था। वैसे भी इसरो को  किफायती स्पेस टकनॉलॉजी तैयार करने के लिए जाना जाता है। इसरो ने “मंगल“ पर भेजे “मंगलायन“ को बेहद किफायती कीमत पर प्रक्षेपित करके नासा समेत समूचे विज्ञान जगत को आश्चर्यचकित  कर दिया था। इसरो की ताजा उपलब्धि के बाद अब मंगल ग्रह और मून  मिशन को और ज्यादा व्यापक बनाया जा सकता है। अब तक इसरो मंगल और मून पर टकनॉलॉजी डेमो मिशन ही चला पाया था। जीएसएलवी मार्क-3 की सफल लॉन्चिग के बाद से इसरो भारतीय थल और वायु सेना के लिए भी स्वदेशी  निर्मित उपग्रह लॉच करने में सक्षम होगा। पूरी दुनिया में बमुश्किल  11 मुल्कों के पास स्वदेशी  निर्मित तकनीकी से हैवी रॉकेट लॉच करने की क्षमता है। भारत अब इनमें  शामिल हो गया है और आसानी से हैवी सैटेलाइट की कमर्शियल  लाँचिंग करके पैसा कमा सकता है। इसरो का यह बाहुबली मिशन भारत के स्पेस विज्ञान की बहुत बडी उपलब्धि है।

मंगलवार, 6 जून 2017

लंदन कालिंग

भारत और पाकिस्तान के बीच चैंपियन ट्राफी मैच से एक दिन पहले इंग्लैंड की राजधानी लंदन में आतंकी हमले ब्रिटेन के साथ-साथ भारत के लिए भी कडी चेतावनी है। इस हमले में सात लोग मारे गए  और 48 घायल हो गए । दो माह के अंदर  लंदन में यह दूसरा आतंकी हमला है। इस साल मार्च में लंदन में संसद परिसर के समीप भी आतंकी हमला हुआ था। ताजा हमले की बर्बरता ने इंसानियत तो क्या, शैतानों को भी  शर्मसार किया  है। इस्लामिक आतंकियों ने शनिवार रात को पहले लंदन ब्रिज पर तेज रफ्तार से वाहन चलाकर लोगों को बुरी तरह जख्मी  किया  और फिर समीप की बोरो हाई स्ट्रीट पर छूरे से लोगों पर हमला कर दिया। हमले इतने जघन्य थे कि एक महिला की चौदह बार छूरा मारकर निर्मम  हत्या कर दी गई। पौडित दर्द  से कराह रहे थे और आतंकी अल्लाह को शर्मसार कर रहे थे। लंदन से मात्र 200 किलोमीटर की दूरी पर बर्मिंघम में इस हमले के अगले दिन भारत और पाकिस्तान के बीच क्रिकेट मैच होना था। आतंकी हमले के  दृष्टिगत  जिस होटल में टीम इंडिया ठहरी थी, उसे लॉकआउट कर दिया गया। ब्रिटेन में 8 जून को संसद के लिए चुनाव होने हैं। प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने संसद ( हाउस ऑफ कॉमन अथवा ब्रिटेन की लोकसभा) के मध्यावधि चुनाव कराए हैं यद्यपि मौजूदा संसद की मियाद अभी 7 मई, 2022 तक थी। आतंकी हमले के  बाद  राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार बंद कर दिया है। हमले की कडी भर्त्सना करते हुए प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने कहा है “अब बहुत हो गया“ मगर उन्होंने ने यह नहीं बताया गया कि सरकार आतंकियों से निबटने के लिए क्या करने जा रही है। अब तक पुलिस 12 संदिग्धों को गिरफ्तार कर चुकी है। तीन हमलावर  आतंकी पहले ही मारे जा चुके हैं। कहते हैं, “कहना आसान है मगर करना मुष्किल“। भारत समेत हर देश  आतंकी हमले के  बाद यही कहता है“ बहुत हो गया, अब और नहीं“ मगर आतंकी हमले रुकने क बजाए बढते जाते हैं। इग्लैंड में भी मुसलमानों, खासकर युवाओं को कट्टरपंथी की घुटी पिलाई जा रही है। वहां मुसलमानों की खासी आबादी है। पूरे ब्रिटेन मे मुसलमानों की आबादीं तीस लाख से ज्यादा है। लंदन में ही मुसलमानों की आबादी 607,083 है और 2011 की जनगणना के अनुसार यह ग्रेटर लंदन की कुल आबादी का 12,4 फीसदी है।  इसका मतलब यह हुआ कि लंदन का हर बारहवां नागरिक मुसलमान है। लंदन के मेयर साजिद खां भी मुसलमान हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प  ने इस बात पर तंज भी कसा है। हाई बर्थ रेट के कारण मुसलमानों की आबादी अन्यों की तुलना मे तेजी से  बढ रही है। अगर आबादी ऐसे ही बढती रही तो 2050 में ब्रिटेन में मुसलमानों  2.6 करोड तक हो जाएंगे  जबकि तब ब्रिटेन की कुल आबादी सात करोड के आसपास होगी। यानी  2050 में ब्रिटेन का हर तीसरा नागरिक मुसलिम समुदाय का होगा। ब्रिटेन के लिए यही सबसे बडी चुनौती है कि मुसलमानों को कटटरपंथी बनने से कैसे रोका जाए? और अगर ब्रिटिश  सरकार ऐसा नहीं कर पाई तो एक जमाने में पूरी दुनिया पर राज करने वालों अग्रेंजो को अपना अस्तित्व बचाना भी  मुश्किल  हो जाएगा। ब्रिटेन के ताजा आतंकी हमले ने अमेरिकी राष्ट्रपति  ट्रम्प  को फिर अपने “मुसलमान विरोधी तेवर“ दिखाने का मौका मिल गया है। पूरी दुनिया इस समय आतंक से डरी-सहमी है। आतंक ने मध्य-पूर्व एशिया को तबाह करके रख दिया है और अब अरब भी इस मामले पर बंट गया है। सोमवार को सउदी अरब, मिस्त्र और युएई समेत छह अरब देशों  ने कतर से आतंकियों स संबंध रखने के कारण संबंध तोड दिए । अब पाकिस्तान की बारी है। भारत को इस मामले में पहल करनी चाहिए।

सोमवार, 5 जून 2017

अमेरिका की वायदाखिलाफी

अमेरिका दुनिया को अपनी दादागिरी दिखाने का कोई मौका नहीं छोडता है। और जब से डोनाल्ड ट्रंप  राष्ट्रपति  बने हैं, दुनिया को डराने-धमकाने का सिलसिला और तेज हो गया है। पेरिस जलवायु करार से हाथ खींचकर अमेरिकी ने फिर अपनी दादागिरी दिखाई है। राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप  पेरिस जलवायु करार से यह कहकर पीछे हट गए हैं कि इससे चीन और भारत जैसे तेजी से बढते देशों  को ज्यादा फायदा होगा और अमेरिका के हाथ कुछ नहं लगेगा। दिसंबर 2015 में अमेरिका, चीन, भारत समेत दुनिया के 195 मुल्कों ने धरती पर बढते तापमान को रोकने के लिए मिल-जुल कर हर संभव प्रयास करने का संकल्प लिया था। विभिन्न वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि अत्याधिक वैश्विक  कार्बन उत्सर्जन के कारण धरती का तापमान  निरंतर बढ रहा है और अगर इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया तो  सूखे, बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाओं और अप्रत्याशित जलवायु परिवर्तन से धरती पर तबाही मच सकती है। इससे सी लेवल (समुद्री लहरें) भी अप्रत्साहित रुप से बढ सकता है और यह भयंकर तबाही मचा सकता है। इसी से चिंतित दुनिया के हर छोटे-बडे मुल्क ने पेरिस में धरती को बचाने का संकल्प लिया था।  पेरिस जलवायु करार पर विभिन्न देशों  में सहमति बनाने के लिए अमेरिका के तत्कालीन  राष्ट्रपति  बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति  शी  जिनपिंग ने अहम भूमिका निभाई थी। मगर अब अमेरिका के इस करार से पीछे हटने से निर्धारित लक्ष्यों को हासिल कर पाना काफी मुश्किल  हो जाएगा। वैश्विक  तापमान में वृद्धि को दो फीसदी से नीचे रखना पेरिस जलवायु करार का प्रनुख लक्ष्य है और इसे दुनिया के सभी देश  मिलकर ही हासिल कर सकते हैं।  कार्बन उत्सर्जन में अकेले अमेरिका का 15 फीसदी योगदान है। बढते तापमान को रोकने के लिए अमेरिका  विकासशील देशों  को वित्तीय एवं तकनीकी मदद मुहैया कराने वाला सबसे प्रमुख स्त्रोत भी है। सुखद स्थिति यह है कि राष्ट्रपति  ट्रम्प  के पीछे हट जाने के बावजूद अमेरिका का कॉपरेट जगत अभी भी  पेरिस जलवायु समझौते के साथ मजबूती से खडा है। गूगल, एपल और एक्षन मोबिल जैसी सैंकडों बडी कंपनियों ने  ट्रंप से आग्रह किया है कि वे पेरिस जलवायु समझौते के साथ बने रहे। बहरहाल, ट्रंप की “वायदाखिलाफी“ के बावजूद अमेरिका में  कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी आ सकती है। 2015 में पेरिस जलवायु करार के बाद से अमेरिका में कोयले की बजाए गैस से उर्जा  का उत्पादन हो रहा है। कोयले को  कार्बन उत्सर्जन  का सबसे बडा कारण माना जाता है। ब्रिटेन 2025 तक कोयले से उर्जा उत्पादन पूरी तरह से बंद कर देगा। पेरिस जलवायु करार के तहत भारत को भी कोयले पर आश्रित उर्जा उत्पादन को कम करना होगा। भारत इस करार के तहत अपनी 40 फीसदी उर्जा उत्पादन नवीनीकरण उर्जा  (रेन्युएबल एनर्जी) के तहत लाने को प्रतिबद्ध है। बहरहाल, अमेरिका का पेरिस जलवातु करार से बैक आउट कर जाना  वैश्विक  जलवायु प्रयासों के लिए तगडा झटका है। इस करार की शर्तों के अनुसार अमेरिका नवबंर, 2020 से पहले पीछे नहीं हट सकता।  नवबंर, 2020  में  राष्ट्रपति  के  चुनाव भी होने है। दुनिया के लिए यह राहत की बात है।  ट्रंप इस बात पर अडे हुए है कि पेरिस जलवायु करार उनके “ अमेरिका फर्स्ट“ दर्शन  के एकदम खिलाफ है और इस करार के लागू किए जाने से बेरोजगारी बढ सकती है। दुनिया में केवल सीरिया और निकारागुआ एकमात्र ऐसे देश  हैं जो पेरिस जलवायु करार से बाहर हैं और अब अमेरिका  इन देशों में शुमार हो जाएगा। अधिकतर अमेरिकी  पेरिस जलवायु करार पर  राष्ट्रपति  ट्रंप के स्टैंड से सहमत नहीं है। अब तक अमेरिका अपने हर वैश्विक  उत्तरदायित्व को बखूबी निभाता रहा है। ट्रंप प्रशासन में पहली बार अमेरिका अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटा है। ट्रंप के इस स्टैंड का खामियाजा आने वाली पीढी को भुगतना पड सकता है।  

           

शुक्रवार, 2 जून 2017

यह तो होना ही था !

दुनिया में सबसे तेज अर्थव्यवस्था की रफ्तार नोटबंदी ने रोक दी है। केन्द्रीय सांख्यिकी विभाग द्वारा बुधवार को जारी आंकडों के अनुसार  इस साल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में ग्रोथ की दर  7.1 फीसदी रही है जबकि पिछले साल यह 8 फीसदी थी।  वित्तीय वर्ष   2016-17 की जनवरी से मार्च तिमाही के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की ग्रोथ 7.1 फीसदी से गिरकर 6.1 फीसदी पर आ गई है।  अंतिम तिमाही  में यह 2014 के बाद अब तक की सबसे बडी गिरावट है। विकास दर में एक फीसदी गिरावट के कारण भारत ने दुनिया की सबसे तेज गति से बढती अर्थव्यवस्था होने का गौरव भी  खो दिया है। अब चीन ने भारत को  फास्टेस्ट  ग्रोइंग इकॉनॉमी के मामले में भारत को फिर पीछे छोड दिया है। इस साल की पहली तिमाही (जनवरी-मार्च) में चीन की अर्थव्यवस्था की विकास दर 6.9 फीसदी रही है। असल में जीडीपी में गिरावट और भी ज्यादा हो सकती है अगर असंगठित क्षेत्र और छोटे व्यवसायियों के आंकडे भी जीडीपी में  शामिल किए जाते। नोटबंदी का सबसे बुरा असर  असंगठित क्षेत्र और आंचलिक छोटे व्यवसायियों पर पडा है। भारत में ये तबके नकदी कारोबार पर पूरी तरह से आश्रित हैं। जीडीपी की गणना में  असंगठित क्षेत्र और आंचलिक छोटे व्यवसायियों को  शामिल नहीं किया जाता। नोबल पुरुस्कार विजेता नामचीन अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन सहित अधिकांश  आार्थिक विशेषज्ञों का आकलन था कि नोटबंदी का अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पडेगा। भारत में ग्रामीण क्षेत्रों में नब्बे फीसदी से ज्यादा कारोबार नगदी पर चलता है । नोटबंदी ने सबसे ज्यादा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। नगदी पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था दो महीने तक पूरी तरह से पंगु बनी रही और आम आदमी का रोजगार जाता रहा।  नगदी संकट के कारण  मांग में अप्रत्याशित गिरावट आने से उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री में खासी कमी आई । इसी वजह विनिर्माण, मैन्युफेक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के उत्पादन भी गिरा। कृषि  को छोडकर लगभग हर सेक्टर में गिरावट दर्ज  हुई है। रिपोर्ट  के मुताबिक आठ कोर सेक्टर में बहुत बडी गिरावट दर्ज  हुई है। अप्रैल में इन सेक्टर्स  का उत्पादन 8.7 फीसदी से गिरकर 2.6 तक गिर चुका था। उधोग जगत ने भी नोटबंदी के चलते नगदी संकट के कारण जीडीपी में गिरावट की आशंका जताई थी। वीरवार को जारी आंकडों में बताया गया है कि मई माह में औधोगिक उत्पादन तीन माह के न्यूनतम स्तर पर आ चुका था। इससे पता चलता है कि नोटबंदी का असर अभी भी जारी है।  ताजा आंकडों ने मोदी सरकार के इन दावों की कलई खोल दी है कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पडा है।  मोदी सरकार ने 26 मई को अपने कार्यकाल के तीन साल पूरे कर लिए हैं और सरकार अभी भी यही कह रही है कि नोटबंदी से जीडीपी पर कोई
असर नहीं पडा है। इसके विपरीत सरकार का दावा है कि नोटबंदी से टैक्स अदा करने वालों की संख्या बढी है। इससे डिजिटाइजेशन बढा है और नकदी में लेन-देन कम हुआ है जबकि सरकार के अपने आंकडे इस बात की ताकीद नहीं कर रहे हैं। तथापि, नोटबंदी का बुरा दौर गुजर चुका है।  रेटिंग एजेंसी मूडीज का ताजा आकलन है कि नोटबंदी के प्रतिकूल असर से अर्थव्यवस्था उभर चुकी है। इस रेटिंग एजेंसी के अनुसार सरकार के आर्थिक और वित्तीय  साल 2017.18 में भारत की विकास दर 7.5 फीसदी से भी आगे निकल जाएगी और अगले चार सालों में यह 8 फीसदी को पार कर जाएगी। नोटबंदी के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटलस अभी भी काफी मजबूत हैं और इनमें छोटे-मोटे झटके सहने की पूरी क्षमता है। पॅालिटिक्ल स्टेबिलिटी और चुनावों में सतारुढ दल की लगातार जीत से आउटलुक भी बेहतर है। अगले माह जुलाई में जीएसटी लागू होने से अर्थेव्यवस्था में तेजी लौट सकती है।

गुरुवार, 1 जून 2017

धार्मिक स्थल ढहाना “अपराध“

 क्या किसी धार्मिक स्थल को गिराना अपराध है ?, पिछले पचीस साल से देश   न्यायपालिका से इस मामले पर फैसले की प्रतीक्षा कर रहा है। देश  की न्याय प्रकिया इतनी जटिल और समय खपाऊ है कि अनिश्चितकाल  तक चलने वाली सुनवाई के दौरान कई आरोपी तो दुनिया से ही रुखस्त कर जाते हैं। अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद ढहाने के आरोप में फंसे भाजपाई नेताओं को लगभग पच्चीस साल बाद आरोपों का तय होना भारतीय में न्याय प्रकिया की “कछुआ चाल“ का प्रतीक है। इस दौरान आरोपी बाल ठाकरे, गिरिराज किशोर , अषोक सिंघल, मोरेष्वर सावे, महंत अवैद्यनाथ और परमहंस रामचंद्र भगवान को प्यारे हो गए हैं। लगभग अढाई दशक पहले 6 दिसंबर 1992 को  बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए  भगवा संगठनों से जुडे हजारों कार सेवकों ने अयोध्या पर धावा बोला था। तब उत्तर प्रदेश  में भाजपा की सरकार थी और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री। राज्य की भगवा सरकार ने अपना “राज धर्म“ नहीं निभाया। इसी बिला  पर तब केन्द्र में कांग्रेस की सरकार ने चार राज्यों में  सतारूढ भाजपा सरकार को बर्खास्त कर दिया था। कल्याण सिंह भी इस मामले मे आरोपी हैं मगर राज्यपाल पद पर आसीन होने के कारण उन पर मुकदमा नहीं चल सकता। दिसंबर,  1992  को दो एफआईआर दर्ज हुई थी। एक एफआईआर बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए अज्ञात कार सेवकों के खिलाफ और दूसरी भडकाउ भाषण देने के लिए आडवाणी, जोशी , उमा भारती और अन्य कई नेताओं के खिलाफ। इनमें  शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे भी  शामिल थे। अक्टूबर, 1993 में सीबीआई ने अदालत में आडवानी और अन्य आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। 2001 में सीबीआई कोर्ट  ने आडवानी, जोशी , उमा भारती और बाल ठाकरे और अन्य आरोपियों को तकनीकी आधार पर आरोप मुक्त कर दिया। तीन साल बाद 2004 सीबीआई ने सीबीआई अदालत के फैसले को हाई कोर्टं में चुनौती दी और  2010 में हाई कोर्ट  ने भी  सीबीआई की अपील खारिज कर दी । 2011 में सीबीआई सुप्रीम कोर्ट  पहुंची और 19 अप्रैल 2017 को सुप्रीम कोर्ट  ने आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत  13 नेताओं पर आपराधिक मामला चलने के आदेश  दिए। सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद ढहाने से जुडे दो अलग-अलग मामलों को भी एक करके, इसकी सुनवाई राय बरेली की बजाए  लखनउ निर्धारित कर दी । सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को दो साल में पूरी करने और सुनवाई करने वाले जज की तब तक ट्रांसफर न करने के भी आदेश  दे रखे हैं। मामले की सुनवाई  19 अप्रैल के चार सप्ताह के भीतर  शुरु करने के आदेश  भी दिए गए थे। और अब करीब 25 साल बाद लखनउ स्थित सीबीआई की विशेष  अदालत ने भाजपा के वयोवृद्ध नेता लाल  कृष्ण  आडवानी, मुरली मनोहर जोशी , सुश्री उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा और विश्व   हिंदू परिषद के  विष्णु  हरि डालमिया समेत 13 नेताओं के खिलाफ आरोप तय किए हैं। न्यायपालिका को व्यवस्था देनी है कि किसी धार्मिक ढांचे को इस बिला पर नहीं गिराया जा सकता है कि वहा पहले कुछ और था। अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाने जाने की दुखद घटना देश  को आज भी साल रही है। किसी भी सभ्य समाज में असभ्याचार के लिए कोई जगह नहीं है मगर भगवा संगठन आज भी यह मानने को तैयार नही है। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना और 1984 के सिख विरोधी दंगे देश  की धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक छवि पर ऐसे बदनुमा दाग हैं जिन्हें मिटाया जाना आसान नहीं है। माना धार्मिक उन्माद को नियंत्रित नहीं किया जा सकता मगर कानून-व्यवस्था को तोड कर किसी की आस्था पर प्रहार करने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती। यह जिम्मेवारी सरकार और प्रशासन की है। अगर मंदिर तोडना आस्था पर चोट है तो मस्जिद ढहाना क्यों नहीं?  कानून सब के लिए बराबर है और इसे अपना काम बखूबी करना चाहिए।