गुरुवार, 31 मार्च 2016

संवैधानिक संकट से बच गए

गंगोत्री की पावन भूमि उत्तराखंड में यह क्या हो रहा है? मोदी सरकार को स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपराओं में जरा भी विश्वास  नहीं है। दल-बदल कानून के बावजूद देश  के लॉमेकर्स धडल्ले से “आया राम, गया राम “ को अंजाम दे रहे हैं। लॉमेकर्स  ही कानून का मखौल उडा रहे हैं और संवैधानिक पॉवर्स का दुरुपयोग किया जा रहा है।  विश्वास  मत हासिल करने से पहले ही केन्द्र सरकार ने हरीश  रावत सरकार को बर्खास्त कर  उत्तराखंड में राष्ट्रपति  शासन लगा दिया। कांग्रेस केन्द्र के फैसले के खिलाफ उव्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाती है और न्यायालय रावत को विश्वांस  मत हासिल करने के लिए वीरवार का दिन तय करती है। केद्र सरकार उच्च न्यायालय की इस व्यवस्था को इस बिला पर चुनौती देती है कि राज्य में  राष्ट्रपति  शासन लगने के बाद विधानसभा तब तक अस्थाई तौर पर निलंबित रहती है जब तक संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद  356 को हटा नहीं दिया जाता। यानी जब तक राज्य से  षासन हटा नहीं लिया जाता, विधानसभा निलंबित रहती है। उच्च न्यायालय में बुधवार को केन्द्र की दलील थी कि राष्ट्रपति  शासन के बाद राज्य में न तो कोई लोकप्रिय सरकार है और विधानसभा भी अस्तित्व में नहीं है। इस स्थिति के मद्देनजर  खाली विधानसभा भवन में विश्वास  मत कैसे हासिल किया जा सकता है? उच्च न्यायालय ने केन्द्र से सहमति जताते हुए  विश्वास  मत वाली व्यवस्था पलट दी। बुधवार को उच्च न्यायालय ने पूर्व मुख्यमंत्री हरीश  रावत को दी राहत निरस्त कर दी। मगर उच्च न्यायालय ने भी माना है कि लोकतंत्र में  विश्वास  मत ही सबसे उम्दा विकल्प है।  बहरहाल, उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी अभी भी प्रासंगिक है कि केन्द्र ने विधानसभा में  विश्वास  मत का इंतजार क्यों नहीं किया?  बुधवार को उच्च न्यायालय ने फिर कहा कि  दो दिन में ऐसा कौनसा पहाड टूट जाता कि केन्द्र को आनन-फानन में राष्ट्रपति  शासन लगाना पडा। अगले सोमवार को केन्द्र  को उच्च न्यायालय को उन परिस्थितियों को बताना पडेगा जिनके तहत उतराखंड में राष्ट्रपति  शासन लगाना पडा। उच्च न्यायालय का मंगलवार का फैसला न केवल ऐतिहासिक था, अलबत्ता अभूतपृर्व भी था। उत्तराखंड में इस फैसले से दल-बदल करने वाले विधायकों की कलई खुल जाती।  विश्वास  मत के दौरान बागी विधायकों के आचरण पर उच्च न्यायालय की नजर रहती।  नौ बागी विधायकों की वोटिंग को अलग से सीलबंद लिफाफे में उच्च न्यायालय में पेश  किया जाना था। इन सब घटनाक्रम से लोकतंत्र मजबूत होता। राज्य में लोकप्रिय सरकार को अस्थिर करने में कांग्रेस के नौ बागी विधायकों का बहुत बडा हाथ है। और अब अगर  इन विधायकों की मदद से राज्य में सरकार बनती है, तो यह कानून का बहुत बडा मजाक होगा। अरुणाचल प्रदेश  में दल-बदलुओं की सरकार बनाकर भाजपा ने दल-बदल कानून का खुला मजाक उडाया है। जनमानस सियासी नेताओं से आदर्श  आचरण और कानून का सम्मान करने की उम्मीद रखता है। ऐेसे दल-बदल निरोधी कानून का  क्या फायदा जो दल=बदलुओं को सत्ता का सुख भोगने का मार्ग  प्रशस्त करे। दल-बदल कानून के तहत भी एक तिहाई विधायकों का बहुमत ही मूल पार्टी से अलग हो सकता है। अरुणाचल प्रदेश  के लॉमेकर्स  इसी कारण दल-बदल कानून से बच गए। उतराखंड में ऐसा नहीं है। वहां दल-बदलू नौ विधायक कांग्रेस विधायक दल की मौजूदा संख्या का एक-तिहाई नहीं है। इस वजह अगर वे पार्टी व्हिप का उल्लघंन कर विरोध में वोट करते हैं, तो दल-बदलू कानून में अयोग्य करार दिए जाते। उत्तराखंड में राष्ट्रपति  शासन लगाने की असली वजह भी यही है कि भाजपा विधानसभा अध्यक्ष द्वारा अयोग्य ठहराए गए नौ बागी विधयकों की मदद से सरकार नहीं बना सकी । मोदी सरकार ने देश  में स्वच्छ और पारदर्षी सरकार का वायदा कर रखा है।  लेकिन हाल ही के राजनीतिक घटनाक्रम स्वच्छ राजनीति के लक्षण  नहीं है। भाजपा भी कांग्रेस की तरह सत्ता पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। दल-बदल को जड से मिटाकर ही स्वच्छ राजनीति को सुनिश्चित  किया जा सकता है। लोकतंत्र में जनादेश  का सम्मान किया जाना चाहिए। पार्टी के टिकट पर चुने गए सांसद अथवा विधायक को पार्टी छोडने पर विधानसभा सदस्यता से भी इस्तीफा दे देना चाहिए। पंजाब में कुछ विधायकों ने ऐसा करके स्वस्थ परंपरा निभाई है। कानून में इस तरह की स्पष्ट  व्यवस्था होनी चाहिए।

बुधवार, 30 मार्च 2016

पाक जांच टीम का विरोध


पठानकोट हमले में पाकिस्तान आतंकियों की संलिप्तता की पुष्टि  करने आई पाकी जांच टीम का विरोध करके कांग्रेस और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी बेवजह की राजनीति कर रही है। पांच सदस्यीय जांच टीम को मोदी सरकार ने बाकायदा अनुमति दे रखी है और अधिकृत तौर  पर आए टीम के सदस्य भारत के  मेहमान है। भारत में अतिथि दुश्मन  ही क्यों न हो, उसे “देव भव“ माना जाता है। पाकिस्तान की बदनाम मिल्ट्री खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विस इंटेलीजेंस अथवा आईएसआई का सदस्य जांच दल में शामिल किए जाने से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भडकी हुई है। जांच टीम का विरोध करने पठानकोट पहुंचे आप नेता और मंत्री कपिल मिश्रा का यह बयान हास्यास्पद है कि “ आईएसआई और भाजपा“ मिली हुई है और जांच टीम को भारत आने की अनुमति देकर मोदी सरकार ने आईएसआई को “बिरयानी“ की दावत दी है।  समकालीन भारतीय नेताओं को विरोधी पार्टी के हर अच्छे-बुरे कार्य  का विरोध करने की तो जैसे लत पड गई है। “ खुद मियां फजीहत, औरां को नसीहत“ को चरितार्थ  करते हुए सियासी नेताओं की “ हम करें तो सही, दूसरा करे तो एकदम गलत़" वाली फितरत हो गई है। जांच टीम का पठानकोट आना ही यह साबित करता है कि पडोसी कम-से-कम इतना तो कबूलता है कि हमलावर पाकिस्तान से आए थे। पठानकोट में जांच दल को उस जगह ले जाया गया, जहां से आतंकी एयरबेस के अंदर घुसे थे। जांच टीम को वह जगह भी दिखाई गई जहां से आतंकियों ने दो जनवरी को गोलीबारी की थी। एयरबेस के टेक्निक्ल एरिया को जांच  टीम के लिए बंद रखा गया था।  जांच टीम को उन जगहों पर ले जाया गया  जिस रूट से आतंकी पाकिस्तान से भारत की सीमा में घुसे थे। मोदी सरकार ने आतंकियों द्वारा अगवा किए गए पंजाब के पुलिस अधिकारी से भी मिलवाया गया  मगर उससे पूछताछ की अनुमति नहीं दी गई । मोदी सरकार की मंशा  पाकिस्तान को आतंकी हमले के पुख्ता सबूत देना है और इसमें कोई बुराई नहीं है और न ही इससे भारत की सुरक्षा को कोई खतरा है। इंटरनेट और प्रोन्नत टकनॉलॉजी के जमाने में  दुश्मन  से कुछ भी छिपा नहीं है। गूगल मैप पर जाइए, कहां क्या है और किस जगह छिपाया गया, इसका पूरा-पूरा पता चल जाता है। पठानकोट हमले के साजिशकर्ताओं को कड़ी-से -कड़ी  सजा मिले, मोदी सरकार ही नही, सभी देशवासी यही चाहते हैं। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी यही चाहेगी। फिर विरोध का यह नाटक क्यों? इससे पाकिस्तान को बहाना मिल सकता है कि जांच  टीम को  निष्पक्षता  से काम  ही नहीं करने  दिया गया । वैसे भी पाकिस्तान को भारत लाख पक्के सबूत दे, वह किसी भी सूरत में यह मानने को तैयार नहीं होगा कि पठानकोट हमले से साजिशकर्ता पाकिस्तानी थे। मुंबई  26/11 के हमलावर पाकिस्तानी थे  और हमलों का मास्टरमाइंड हाफिज सईद भी पाकिस्तान से ही हमलों का संचालन कर रहा था। पूरा विश्व  इस सच्चाई को जानता है और भारत पाकिस्तान को इस बात के पक्के सबूत भी दे चुका है मगर हाफिज सईद आज भी सरेआम घूम-घूम कर भारत के खिलाफ आग उगल रहा है। यह बात सौ फीसदी सच है कि पाकिस्तान जांच का नाटक कर रहा है और स्वदेश  लौटते ही अपनी बात से पलट जाएगा। तथापि, पाकिस्तान आतंकी हमले का भारत आकर जायजा लेने के बाद जिम्मेदारी से भाग नहीं सकता। पाकिस्तान के जांच दल को भारत आने की अनुमति “इस हाथ ले, उस हाथ दे“ आधार पर दी गई है। भारत पठानकोट हमले के मुख्य साजिशकर्ता  जैश  के मुखिया मौलाना मसूद अजहर तक पहुंचने की कोशिश  करेगा।  पाकिस्तान खुद आतंकी की भीषण आग में जल रहा है। रविवार  को लाहौर में आत्मघाती हमलों में 70 से ज्यादा लोग मारे गए। इनमें अधिकांश  ईसाई थे। आतंकियों ने लाहौर पर हमला करके पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सीधी चुनौती दी है। बहरहाल, पाकिस्तानी  जांच दल के  पठानकोट दौरा की  रिपोर्ट पूरी दुनिया को यह बताएगी कि पाकिस्तान आतंक के खिलाफ लडाई के प्रति कितना संजीदा है। भारत से कहीं ज्यादा पाकिस्तान आतंक से पीडित है। इस्लामिक स्टेट के बढते आतंकी हमलों से पूरी दुनिया खौफजदा है और आतंक के खिलाफ संयुक्त लडाई लडने के पक्ष में है।

मंगलवार, 29 मार्च 2016

संवैधानिक पावर्स का दुरुपयोग ?

पूर्वोतर पहाडी राज्य अरुणाचल प्रदेश  में कांग्रेस की सरकार को गिराने के बाद अब मोदी सरकार ने उतराखंड में हरीश  रावत सरकार को चलता कर दिया है। केन्द्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 356 में प्रदत पावर्स का प्रयोग या यूं कहा जाए दुरुपयोग करके,  उत्तरी भारत के पहाडी राज्य में भी राष्ट्र्पति  शासन लागू कर दिया है। मोदी सरकार का यह कदम दल-बदलू निरोधी कानून और लोकप्रिय जनादेश  का घोर अपमान है।  हैरानी इस बात की है कि केन्द्र-राज्यों (सेंटर-स्टेटस रिलेशसं) के संबंधों पर सरकारिया आयोग के सिफारिशों  की जोरदार पैरवीकार भाजपा ने इस बार खुद इनका (सिफारिषों)  निरादर किया है। सरकार आयोग की पुरजोर सिफारिश  थी कि केन्द्र को अनुच्छेद  356 का अत्याधिक संयम से इस्तेमाल करना चाहिए। एक जमाने में इस अनुच्छेद का सियासी फायदों के लिए इस्तेमाल करने पर  भाजपा, कांग्रेस को जी भर कर कोसा करती थी। अब वही काम मोदी सरकार कर रही है।  तीन माह से भी कम समय के दौरान  मोदी सरकार ने कांग्रेस की दूसरी सरकार गिरा दी  है। कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत से मोदी सरकार को राज्य में राष्ट्र्पति  शासन का बहाना मिल गया। हरीश  रावत सरकार की बर्खास्तगी के लिए  वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क हास्यास्पद लगता है, जो गले नहीं उतर रहा है। बकौल जेटली उतराखंड के विधानसभा अध्यक्ष ने “मनी मिल“ को सदन  में पारित घोषित  कर अपनी शक्तियों का बेजा इस्तेमाल किया है जबकि सदन का बहुमत इस मामले पर वोटिंग के पक्ष में था। देश  के लोकतांत्रिक इतिहास में यह संभवतय पहला मौका है जब विधानसभा अध्यक्ष की कथित “असंवैेधानिक कार्यवाही“ के लिए राज्य में  राष्ट्रपति  शासन लगाना पडे। राज्यपाल ने  नौ विधायकों की बगावत के बाद मुख्यमंत्री हरीश रावत को सोमवार (28 मार्च) को विश्वास  मत हासिल करने को कहा  था। केन्द्र सरकार ने इसका भी इंतजार नहीं किया और विश्वास  मत से पहले ही राज्य में सरकार को बर्खास्त करने के लिए राष्ट्रपति  शासन लगा दिया। अब तक विधायकों की खरीद-फरोख्त चल रही थी।  बर्खास्त  मुख्यमंत्री हरीश  रावत पर भी विधायकों के खरीद-फरोख्त के संगीन आरोप लगाए गए और यह साबित करने के लिए स्टिंग ऑपरेशन तक किया गया। फॉरेंजिक जांच में  स्टिंग ऑपरेशन   को असली पाया गया। मोदी सरकार कह सकती है कि यह सब रोकने के लिए  राष्ट्रपति शासन  लगाना पडा मगर भाजपा भी इस प्रकरण में दूध की धुली नहीं है। कांग्रेस के बागी विधायकों ने सरेआम भाजपा का साथ देकर साबित कर दिया है कि “दाल में काफी कुछ काला“ है। बगैर किसी नफे के समकालीन नेता सीधी मुंह बात तक नहीं करते हैं । जाहिर है भारी लालच में विधायकों ने अपनी पार्टी से बगावत की है। 70 सदसयीय विधानसभा में कांग्रेस के 36 विधायक थे। नौ विधायकों की बगावत के बाद उसके पास केवल 27 विधायक ही रह गए हैं। कांग्रेस से ज्यादा भाजपा के पास 28 विधायक हैं। कांग्रेस के नौ बागी विधायकों के समर्थन से भाजपा आसानी से सरकार बना सकती थी मगर विधनसभा अध्यक्ष द्वारा बागियों को दल-बदलू घोषित  कर उन्हें अयोग्य ठहराए जाने से भाजपा की पूरी गेम ही बिगड गई। बागी विधायक विधानसभा अध्यक्ष की व्यवस्था के खिलाफ उच्च न्यायालय भी गए मगर वहां से भी उन्हें कोई राहत नहीं मिली। सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में रवि नाइक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में साफ व्यवस्था दी है कि अगर कोई विधायक अपनी मूल पार्टी के व्हिप का उल्लघंन करता है तो वह साफ जता  रहा है कि उसने पार्टी छोड दी है। जब भाजपा को लगा कि बागी विधायकों के समर्थन से सरकार नहीं बन सकती और हरीश  रावत निर्दलीय और क्षेत्रीय दल के समर्थन से विधानसभा में विष्वास मत जीत सकते हैं, मोदी सरकार ने राज्य में राष्ट्रपति  शासन थोप दिया।  संवैधानिक पावर्स का  सियासी फायदे के लिए इस्तेमाल करने से सरकार केवल संघीय ढांचे को ही कमजोर कर रही है। देश  में जिस तेजी से अलगाववाद और असहिष्णुता  फैल रही है, इसके मद्देनजर  केन्द्र सरकार को फूंक-फूंक कर कदम रखना होगा।  मोदी सरकार के ताजा कदम से सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच की दूरी और बढ सकती है। अतराखंड और अरुणाचल प्रदेश  के बाद अब हिमाचल प्रदेश  की बारी आ सकती है।  हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री पर प्रर्वतन निदेशालय पहले ही सख्त कार्रवाई कर चुका है। कांग्रेस का एक वर्ग मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का मुखर विरोधी है और उन्हें अपदस्थ करने के लिए मौके की तलाश  में है।

शुक्रवार, 25 मार्च 2016

पहले पेरिस अब ब्रसेल्स

दुनिया के सबसे ज्यादा खुशमिजाज  शहर बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स का मंगलवार सुबह ही मिजाज बिगड गया था। इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने ब्रसेल्स एयरपोर्ट  पर आत्मघाती बम धमाके करके  14 लोगों को  और इस घटना के कुछ देर बाद मेट्रो स्टेशन पर बम फोडकर  21 को बेमौत मार डाला। पेरिस हमले के आरोपी सालेह अब्देसलाम की गिरफ्तारी के मात्र चार दिन बाद  ब्रसेल्स पर आतंकी हमले  सीधे-सीधे यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को खुली चुनौती है। ब्रसेल्स हमले ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि इस्लामिक आतंकी कभी भी और कहीं भी हमले कर सकते हैं। आतंकी सालेह अब्देसलाम  पिछले  शुक्रवार (18 मार्च) को ही ब्रसेल्स से गिरफ्तार किया गया था। चार माह से वह मारा -मारा  फिर रहा था और पुलिस उसे  तलाश  रही थी।  पिछले साल   पेरिस हमले के लिए असलाह जुटाने में अब्देसलाम की प्रमुख भूमिका रही है। उसकी गिरफ्तारी के फौरन बाद बेल्जियम की राजधानी पर पेरिस की तरह आतंकी हमले साफ-साफ बता रहे हैं कि यूरोप में मुकम्मल सुरक्षा व्यवस्था के दावों में कोई दम नहीं है। ब्रसेल्स पर हमला करके इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने अपनी ताकत और पहुंच भी दिखा दी है। फ्रांस की राजधानी पेरिस और बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स की गणना यूरोप के उम्दा  सुरक्षित शहरों में की जाती है और इन्हें अपेक्षाकृत  शान्ति  का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए, इस्लामिक स्टेट के आतंकियों ने जानबूझकर  पेरिस और ब्रसेल्स को  हमले के लिए चुना।  ब्रसेल्स  यूरोपियन यूनियन का मुख्यालय भी है। मीडिया की ताजा रिपोर्टस में खुलासा किया गया है कि ब्रसेल्स पर आतंकी हमलों के लिए खालिद और ब्राहीम अल-बकरावी नाम के दो भाई प्रमुख रुप से जिम्मेदार हैं। ब्राहीम  अल-बकरावी  मे ब्रसेल्स के जैवेनटेम हवाई अड्डे पर आत्मघाती हमले किए और उसके भाई खालिद ने मेट्रो स्टेशन पर आत्मघाती विस्फोट किए। पहले नाजिम लाचारावी नाम के एक तीसरे आतंकी का नाम आया था। हमले से ठीक पहले की सीसीटीवी फुटेज में नाजिम को देखा गया था। ब्रसेल्स पुलिस ने अब इसका नाम वापस ले लिया है। बहरहाल, सवाल  यह है कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस सुरक्षा एजेसिंयों को  हमले से पहले दहशतगर्ताओं की गतिविधियों की भनक क्यों नहीं लग पाती? बेल्जियम के गृहमंत्री ने माना है कि सालेह अब्देसलाम की गिरफ्तारी के बाद खुफिया सूचनाएं मिलीं थी कि आतंकी बदले की कार्रवाई कर सकते हैं। इसके बावजूद सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद नहीं किए जाने से जनमानस में असुरक्षा की भावना घर जाना स्वभाविक है। इन हमलों से यह भी पता चलता है कि विभिन्न सुरक्षा एजेसिंयों में अभी भी तालमेल की भारी कमी है और न ही इंटेलीजेंस शेयरिंग, सर्विलेंस और तसल्लीबक्श मॉनिटरिंग  हो पा रही है। आतंक से निपटने के लिए यह सब बेहद जरुरी है। पेरिस और ब्रसेल्स हमलों ने यूरोप की सास्कृतिक विविधता (मल्टी कल्चरिज्म) एवं उदारवादी (लिबरलिज्म) नीतियों पर भी सवाल खडा कर दिया है। विगत एक दशक के दौरान यूरोप पर जितने भी आतंकी हमले हुए हैं, उन सब में स्थानीय लोग  शामिल हैं। उदारवादी नीतियों और सांस्कृतिक विविधता के कारण ही यूरोप  शरणार्थियों के संकट से जूझ रहा है। इसी वजह यूरोप और अमेरिका में दक्षिणपंथी और ज्यादा ताकतवर भी हो रहे हैं। अमेरिका में रिपलिकन पार्टी की  राष्ट्रपति  उम्मीदवारी दौड में सबसे आगे चल रहे डोनाल्ड ट्रंप पहले ही मुस्लिम विरोधी बातें कर रहे हैं। यह उनका प्रमुख चुनावी मुद्दा है। ताजा हमले यूरोप को शरणार्थी संकट से निपटने के लिए नये सिरे से सोचने पर विवश  कर सकता है। आतंक से निपटने के लिए साझा रणनीति की अविलंब जरुरत है। भारत लंबे समय से आतंक से निपटने के लिए विश्वव्यापी  रणनीति बनाने पर जोर दे रहा है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 30 मार्च को बेल्जियम के दौरे पर जा रहे हैं। उनकी बेलिज्यम यात्रा के दौरान  यूरोपियन नेताओं से बातचीत में आतंक प्रमुख मुद्दा हो सकता है।

बुधवार, 23 मार्च 2016

संघीय ढांचे को कमजोर न करें?

हाल ही  के राजनीतिक घटनाक्रम देश  के नाजुक  संघीय ढांचे की सेहत के लिए सुखद नहीं माने जा सकते हैं। सीमावर्ती राज्य जम्मू-कश्मीर  में दो माह से भी अधिक समय से राजनीतिक शून्यता व्याप्त है। एक और सीमावर्ती राज्य अरुणाचल प्रदेश  में भाजपा ने दल-बदल करवाकर कांग्रेस की सरकार गिरा दी थी। अब वहां कांग्रेस के दल-बदलू भाजपा के साथ मिलकर सत्ता में है। देश  में दल-बदल रोधी कानून का इससे बडा मजाक और क्या हो सकता है? और अब दल-बदल का गंदा खेल पहाडी राज्य उत्तराखंड में खेला जा रहा है। इस राज्य में भी कांग्रेस की सरकार है और यहां भी कांग्रेस के नौ विधायक बगावत पर आमादा है। भाजपा बगावत की आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने की फिराक में है। जम्मू-कश्मीर  में सता के बेहद करीब रहकर भी भाजपा इससे वंचित है। इस साल सात जनवरी को तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राज्य मे आज तक लोकप्रिय सरकार का गठन नहीं हो पाया है जबकि पीडीपी और भाजपा आसानी से सरकार बना सकती है। दिसंबर, 2014 के  विधानसभा चुनाव में त्रिशंकू जनादेश  मिलने पर मुफ्ती मोहम्मद सईद की क्षेत्रीय पार्टी पीडीपी और भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई थी। सरकार आराम से चल भी रही थी मगर मुफ्ती के निधन से सब गडबडा गया।  मुफ्ती की उत्तराधिकारी उनकी पुत्री और पार्टी अध्यक्ष मेहबूबा मुफ्ती ने भाजपा को आंखें दिखानी  शुरु कर दी और मोल-तोल करने लग पडी। उन्हें सता में आने की कोई जल्दी नहीं है मगर भाजपा को है। पिछले दो माह से इस संवेदनशील राज्य में सियासी “लुका-छिपी“ का खेल जारी है। इस जमीनी सच्चाई से पूरी दुनिया वाकिफ है कि आतंक और अलगाववाद से पीडित जम्मू-कश्मीर  में राजनीतिक अस्थिरता से सीमा पार के दुश्मनों  की मन की मुराद पूरी हो रही है। राजनीतिक अस्थिरता और सियासी दलों की अवसरवादिता से कश्मीर  जैसे संवेदनषील राज्य का कोई भला नहीं हो रहा है। जनता ने भले ही त्रिशंकू जनादेश  दिया हो मगर राजनीतिक दलों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे इस जनादेश  को गठबंधन के धागे में पिरोकर राज्य के अवाम को स्थायी सरकार दें। जम्मू-कश्मीर  के हालात सामान्य नहीं है। अलगाववाद कश्मीर  घाटी में सर चढकर बोल रहा है।  लंबे समय से राज्य में सुरक्षा बलों की तैनाती से लोग-बाग राष्ट्रीय  मुख्यधारा से दूर होते जा रहे हैं। पीडीपी राज्य में सेना की तैनाती की मुखर विरोधी है पर भाजपा इसके पक्ष में है। और भी कई अहम मुद्दे हैं जिन पर दोनों दल का अलग-अलग स्टैंड है। इसके बावजूद दोनों दल सता के भागीदार रहे हैं। ताजा घटनाक्रम से लग रहा है कि पीडीपी राज्य में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए तैयार है। मंगलवार को पीडीपी अध्यक्ष मेहबूबा मुफ्ती की नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद सरकार बनाने का रास्ता प्रशस्त हो गया है। मेहबूबा ने राज्य में भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए ही प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। मेहबूबा ने वीरवार को श्रीनगर में पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई है। उत्तराखंड में कांग्रेस के बागी विधायकों ने जमी-जमाई सरकार को अस्थिर कर दिया है। पूर्व  मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थक विधायक मुख्यमंत्री को हटाने की मांग कर रहे हैं। बगावत कराने के आरोप में कांग्रेस ने विजय बहुगुणा के पुत्र साकेत बहुगुणा को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। दल-बदल की प्रबल आशंका से मुख्यमंत्री हरीश  रावत ने विधायकों को जंगल में छिपा रखा है। 28 मार्च  को मुख्यमंत्री हरीश  रावत को विधानसभा में  विश्वाश  मत हासिल करना है। ताजा हालात यही संकेत दे रहे हैं कि बागी विधायक रावत का समर्थन नहीं करेंगे। भाजपा अरुणाचल प्रदेश  की तरह बागियों के साथ मिलकर कांग्रेस सरकार गिराने की फिराक में है। सत्ता में आते ही भाजपा वही कर रही है, जो कांग्रेस किया करती थी। यानी भाजपा का भी “कांग्रेसीकरण“ हो गया है। राज्यों में चुनी हुई सरकार को गिराने से संघीय ढांचा कमजोर हो रहा है।  यह  लोकप्रिय जनादेश  का सरासर अपमान है। इस तरह के घटनाक्रम लोगों को  अलगाववाद की ओर ले जाते हैं। कश्मीर  इसकी सबसे बडी मिसाल है। भाजपा को इतिहास से सबक सीखना चाहिए।

मंगलवार, 22 मार्च 2016

Pakistan Least Interested To Fight Terrorism ?

       
पाकिस्तान के नामचीन इस्लामिक सूफी विद्धान और धर्मगुरु डाक्टर मोहम्मद ताहिर-उल-कादरी के सुझाव पर पाकिस्तान को गंभीरता से विचार करने की जरुरत है। डाक्टर कादरी का सुझाव है कि भारत और पाकिस्तान को आतंक का मिलकर मुकाबला करना चाहिए। डाक्टर कादरी का यह सुझाव भी काबिलेगौर है कि आतंक को देशद्रोह करार दिया जाना चाहिए।  आतंक की भीषण आग में जल रहे पाकिस्तान के धर्मगुरु भी मानते हैं कि आतंक के रहते न तो पाकिस्तान तरक्की कर सकता है, और न ही भारत। आतंक दोनों देशों  में तेज विकास को रोक रहा है। यह स्थिति अगर लंबे समय तक रहती है, दोनों देश  आतंक की आग में बुरी तरह झुलस सकते हैं। डाक्टर कादरी ने ये बातें दिल्ली में विश्व  सूफी मंच के समापन पर कही। पाकिस्तान के धर्मगुरु हों या सियासी नेता, जब भी भारत आते हैं, दोस्ती और अमन-चैन की बातें करते हैं मगर स्वदेश  लौटते ही उन्हें सांप सुंघ जाता है। भारत तो जमाने से यही कह रहा है और इस पर अमल भी करता है पर पाकिस्तान और इसके नेता सिर्फ लफ्फाजी करते हैं। पाकिस्तान के धर्मगुरु और नेता  अगर वाकई ही ऐसा चाहते हैं, तो इस तरह की बातें उन्हें अपने मुल्क में करनी चाहिए और सियासी नेताओं  को समझाना चाहिए। आतंक से मिलकर मुकाबला करने के लिए किसी लिखा-पढी की जरुरत नही है। इसके लिए सिर्फ दृढ इच्छाशक्ति और नेकनीयत की दरकार है पर पाकिस्तान ऐसा करने से रहा। अब तक इस पर वार्ताओं के कई दौर हो चुके हैं पर नतीजा सिफर। सच्चाई यह है कि पाकिस्तान, भारत में अमन-चैन को पचा ही नहीं सकता और अपने सबसे बडे दुश्मन  “ भारत“ को अस्थिर रखना उसकी सामरिक जरुरत है। शक्तिशाली और प्रोन्नत भारत पाकिस्तान के अस्तित्व को सबसे बडा खतरा है। विभाजन के बाद लगभग सात दशकों में दोनों देशों  के अवाम की सोच काफी बदल चुकी है। विभाजन से पहले कंधे-से-कंधा  मिलाकर संयुक्त  भारत में रहने वाले लोग उतरोतर कम होते जा रहे हैं। पाकिस्तान की नई पीढी को भारत के प्रति सिर्फ और सिर्फ नफरत करना सिखाया गया है। दोस्ती और भाईचारे की बयार कबकी लुप्तप्राय हो चुकी है। पाकिस्तान के लोग भारत के प्रति कितनी कटुता रखते हैं, पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान शाहिद अफरीदी का “भारत प्रेम“ संबंधी बयान इस बात का ताजा उदाहरण है। अफरीदी ने भारत की मेहमानवाजी  और लोगों के स्नेह की तारीफ क्या की, उनके खिलाफ लाहौर की अदालत में मुकदमा तक दायर कर दिया गया। विश्व  कप में भाग लेने के लिए टीम के साथ भारत आए पाकिस्तान क्रिकेट कप्तान ने कहा था कि पाक खिलाडियों को स्वदेश (पाकिस्तान) की जगह भारत में कहीं ज्यादा “स्नेह“ मिलता है। अफरीदी के इस बयान से माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम के समधी पूर्व क्रिकेटर जावेद मियांदाद तो अफरीदी के पीछे लठ्ठ लेकर पड गए हैं। पाकिस्तान में इस्लामिक आतंकी दिन में कई बार भारत के खिलाफ जहर उगलते हैं और युद्ध लडने का ऐलान करते हैं। पाकिस्तान, भारत से आतंक से मिलकर लडने की बातें तो करता है मगर अमल में कुछ नहीं करता। चीन के साथ पाकिस्तान आतंक का मिलकर मुकाबला करने को तैयार है और इस आशय का कई बार ऐलान भी कर चुका है। पिछले साल चीन के राश्ट्रपति शी  जिनपिंग की पाकिस्तान की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने संसद में इस बात का जोर-शोर  से ऐलान भी किया था। पाकिस्तान की चीन से बढती दोस्ती भारत के लिए खतरा हो सकती है मगर हर संप्रभु मुल्क को इस बात का पूरा हक है कि वह किससे गहरी दोस्ती रखे, किससे नहीं। पर सच्चाई यह भी है कि पडोसियों के साथ अमन-चैन से रहना सफल कूटनीति का हिस्सा है। भारत को अस्थिर करते-करते पाकिस्तान अब खुद आतंक की आग में बुरी तरह से झुसल रहा है। और अगर अब भी पाकिस्तान आतंक फैलाने से बाज नहीं आया, तो भारत से कहीं ज्यादा उसकी का नुकसान हो सकता है। अब तक का इतिहास इस बात का गवाह है। आतंक ने इस समय पूरे विश्व को  अपनी चपेट में ले रखा है।  आतंक के विश्वव्यापी  खतरे का केवल मिलकर ही मुकाबला किया जा सकता है।    

शुक्रवार, 18 मार्च 2016

आधार पर संषय निराधार नहीं ?

देश  में व्याप्त असहिष्णु  माहौल में “आधार“ को अनिवार्य  बनाने के लिए संसद में आनान-फानन में बिल पारित किए जाने से  मोदी सरकार की “नीयत“ पर शक-सुबह  होना स्वभाविक है। इस बिल को पारित करवाने के लिए “मनी बिल“ रुट का सहारा लेकर सरकार ने “जल्दबाजी“ दिखाई है। देश  का सर्वोच्च न्यायालय व्यवस्था दे चुका है कि “आधार“ को ऐच्छिक बनाया जाना चाहिए, अनिवार्य नहीं। मामला अभी भी न्यायालय के विचाराधीन है। लेकिन मोदी सरकार को “आधार“ को अनिवार्य  बनाने की इतनी जल्दी है कि राज्यसभा से बचने के लिए सरकार ने आधार संशोधन को “मनी बिल“ में समाहित करके लोकसभा से पारित करवा लिया। आधार  संशोधन बिल चूंकि संविधान संशोधन बिल नहीं है, इसलिए इसे मनी बिल के साथ पेश  किया जा सकता है। मनी निल को राज्यसभा से पारित करवाने की जरुरत नहीं पडती। मनी बिल टैक्स अथवा सरकार के खर्चे से संबंधित होता है, इसलिए इसे राज्यसभा में पारित करवाने की जरुरत नहीं मानी जाती। सरकार का तर्क  है कि आधार सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी अथवा खर्चों से संबंधित है, इसलिए इसे मनी बिल के रुप में पेश  किया गया। सरकार के पास लोकसभा में खासा बहुमत है मगर राज्यसभा में बहुमत नहीं होने से सरकार ने:मनी रुट“ का रास्ता अपनाया। राज्यसभा ने बुधवार को इस बिल को पांच संषोधनों के साथ लोकसभा को लौटा दिया। नियमानुसार  लोकसभा इस बिल पर राज्यसभा की सलाह मानने को बाध्य नहीं है। वह इसे पारित कर सकती है। बहरहाल, आधार बिल के तहत कुछ ऐसे प्रावधान है जिन पर विपक्ष के साथ-साथ जनमानस भी असहज महसूस कर रहा है। सरकार के पास देश  के हर नागरिक की पूरी गोपनीय व्यक्तिगत जानकारी होगी। नेशनल सिक्योरिटी के नाम पर “आधार“ के तहत सरकार किसी  भी तरह की गोपनीय-से-गोपनीय जानकारी एकत्र कर सकती है। आधार अथॉरिटी को स्वतः जानकारियां जुटाने का अधिकार दिया गया है। सियासी नेताओं, बुद्धिजीवियों और विद्धानों को संदेह है सरकार का भ्रष्ट  तंत्र सिक्योरिटी  के नाम पर लोगों की सुरक्षा को भी खतरे में डाल सकता है और “निरकुंश “ शासक इस तरह की जानकारियों का अपन विरोधियों के खिलाफ दुरुपयोग कर सकता है।  आधार लोगों की निजता (प्राइवेसी) पर सीधा-सीधा दखल माना जा रहा है। दुनिया अमेरिका में नेशनल सिक्युरिटी एजेंसी (एनएसए) के पूर्व कर्मचारी एडवर्ड स्नोडन के  2013 के सनसनीखेज खुलासे को आज तक भूल नहीं पाई है। स्नोडन का कहना था कि अमेरिकी की एनएसए  इंटरनेट से डाटा लेकर दुनिया के शीर्ष   लोगों की जासूसी करती है।  इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आधार अथॉरिटी द्वारा एकत्र  बायोमेट्रिक डाटा, फिंगर प्रिंटस और आईआरआईएस स्कैन का दुरुपयोग नहीं होगा और महत्वपूर्ण  जानकारियां  दुश्मनो  के हाथ नहीं लग पाएगा। आधार योजना  मूलतः सात साल पहले संप्रग सरकार द्वारा  सरकारी सब्सिडियों का युक्तिकरण करने के लिए  शुरु की गई थी। और किसी सरकारी योजना से लाभान्वित होने के लिए “आधार“ को अनिवार्य  बनाने से उसका युक्तिकरण होगा, इस बात में कोई दम नहीं है। इसके तहत पात्र व्यक्तियों का बायोमेट्रिक डाटा एकत्र करने का औचित्य हो सकता है मगर जो लोग  सरकार की सब्सिडी नहीं ले रहे हैं, उनकी गोपनीय जानकारियां एकत्र करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।  विपक्ष को संदेह है कि मोदी सरकार देश  में हिंदू एजेंडा लागू करने के लिए लोगों की  गोपनीय जानकारियां एकत्र कर रही है। मोदी सरकार के सता में आने के बाद से देश  के माहौल में बराबर “सांप्रदायिकता“ का जहर घोला जा रहा है। शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। देशप्रेम और राष्ट्रीयता  की आड में “अभिव्यक्ति की आजादी“ पर अंकुश  लगाने की कोशिश  की जा रही है। हैरानी इस बाद की भाजपा (तत्कालीन जनसंघ) आपातकाल में जबरी परिवार नियोजन का यह कहकर मुखर विरोधी थी कि लोकतंत्र में कोई भी  शासकीय काम “ जबरी“ अथवा अनिवार्य नहीं होना चाहिए। अब वही पार्टी आधार को अनिवार्य बनाकर लोकतंत्र परंपराओं का मखौल उडा रही है।

गुरुवार, 17 मार्च 2016

कंगाली में दरियादिली

                                                                 
देश  में सियासी दल  वोट की खातिर सरकारी खजाने को किस तरह से लूटा रहें  हैं, मंगलवार को पंजाब विधानसभा में अगले वित्तीय वर्ष  (2016-17) के लिए पेश  बजट यही  दर्शाता   है। पंजाब की माली हालात इतनी दयनीय है कि राज्य सरकार अपने कर्मचारियों को छठे वेतन आयोग का बकाया एरियर भुगतान भी  बमुश्किल  किश्तों  में अदा कर पाई है। सरकार का खजाना पूरी तरह से खाली है। उसके पास लंबित बिलों के भुगतान के लिए भी पैसा नहीं है। इसी माह के  शुरु में राज्य सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में माना था कि राज्य सरकार के पास 1800 करोड रु के बिल लंबे समय से पेमेंट के लिए लंबित पडे हैं और खजाने में इतना भी पैसा नहीं है कि वह इनका भुगतान कर सके। इसके बावजूद बादल सरकार ने कर मुक्त बजट में तीन हजार करोड रु से भी अधिक की रियायतें बांटी  है।  7561 करोड के घाटे वाले बजट में 1200 करोड रु की तीस बडी परियोजनाएं घोषित की गई हैं मगर कुछ शतों के साथ। इससे साफ  जाहिर  होता है कि ये सिर्फ लोक-लुभावनी घोषणाएं हैं। पांच एकड तक की जमीन के मालिक किसानों को  50,000 रु तक का  ब्याज मुक्त फसली ऋण देने की घोषणा  की गई है। किसानों को पहले ही मुफ्त बिजली मिल रही है। 35 हजार करोड रु कर्ज  के बोझ में दबे किसानों के लिए प्रॉविडेंट फंड (पीएफ) स्कीम भी दी गई है।  शहरी वोटरों के लिए स्टांप डयूटी में 50 फीसदी छूट के साथ-साथ नए हाउसिंग प्रोजेक्टस के लिए सीएलयू, ईडीसी और लाइसेंस फीस में 25 फीसदी की छूट दी गई है। छात्राओं को मुफ्त स्कूली बैग, स्टेशनरी  और महिला  मंडलों को मुफ्त बर्तन देने का भी ऐलान किया गया है। स्टार्टअप प्रोजेक्टस को ब्याज मुक्त सब्सिडी का तोहफा दिया गया है। यार्न पर टैक्स कम किया गया है। हर वर्ग  को लुभाया गया है मगर बादल सरकार  खाली खजाने से लोकलुभावने वायदों को कैसे पूरा करेगी, इसका बजट में कोई उल्लेख नहीं है। जाहिर है सरकार कर्जा लेकर इन वायदों को पूरा करेगी। यह बात दीगर है कि पंजाब अब तक पहले ही सवा लाख करोड रु से भी ज्यादा कर्ज  ले चुका है।  प्रति व्यक्ति कर्ज बोझ राज्य में सबसे ज्यादा है। बजट से एक दिन पहले राज्य विधानसभा में पेश  महालेखाकार (सीएजी) की रिपोर्ट में भी खुलासा किया गया है कि पंजाब सरकार विभिन्न स्त्रोतों से लिए जा रहे ऋण मेंसे 70 फीसदी से भी ज्यादा पुराना कर्ज  चुकाने में खर्च  कर रही है। यह कर्ज  राज्य में विकास के नाम लिया जाता है। इससे साफ है कि राज्य की माली हालत किस कद्र खराब है। सीएजी की इस रिपोर्ट  से बादल सरकार के इन दावों की भी कलई खुल गई है कि सरकार की वित्तीय स्थिति काफी मजबूत है। रिपोर्ट के अनुसार बादल सरकार की आटा-दाल स्कीम चलाने के लिए भी 2025 करोड रु का कर्जा लिया गया जबकि भारी  कर्ज से दबी बादल सरकार ने उधोग-व्यापार से 2500 करोड रु के बकाया  शुल्क वसूलने का कोई प्रयास नहीं किया। अगले साल के  शुरु में विधानसभा चुनाव होने है। इसलिए  शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी गठबंधन का यह इस टर्म का आखिरी बजट था। इस बात के मद्देनजर इस बार बादल सरकार के बजट में लोकलुभावनी रियायतें अपेक्षित थी। अकाली-भाजपा सरकार मतदाताओं को लुभावने के लिए हरसंभव कोशिश  करेगी, यह भी अपेक्षित था। लेकिन राज्य की माली हालात इस कद्र दयनीय है कि बजट की लोक-लुभावनी रियायतों को पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा, इस पर अब  जनमानस को भी भरोसा नहीं रह गया है। सरकार का हाथ तंग होने के कारण अधिकांश  चुनावी वायदे या तो आधे-अधूरे रह जाते हैं या घोषणाओं तक ही सिमट कर रह जाते हैं। यही वजह है कि बादल सरकार पिछले साल के बजट में घोषित 17 परियोजनाओं मेंसे तीन को तो  शुरु ही नहीं कर पाईं जबकि 10 अभी भी अधूरी पडी हैं। वेलफेयर स्टेट में जनमानस को रियायतें देना अच्छी बात है मगर उधारी लेकर न तो घर-गृहस्थी चलाई जा सकती है और न ही राज्य को । एक दिन ऐसा भी आता है जब उधारी भी बंद हो जाती है। यूनान इस बात की ताजा मिसाल है। कर्ज के मकडजाल में फंसे पंजाब में चुनावी रियायतों पर पैसा लुटाने की जरा भी गुजांइश  नहीं है।  कंगाली मे दरियादिली के कोई मायने नहीं होते हैं।  

बुधवार, 16 मार्च 2016

मुद्रा -स्फीति घटी मगर महंगाई नहीं

                                         मुद्रा -स्फीति घटी  मगर महंगाई नहीं
देश में थोक मूल्य सूचकांक (होलसेल प्राइस इंडेक्स-डब्ल्यूपीआई) में पिछले सोलह माह से जारी लगातार गिरावट से लग रहा है कि महंगाई पर नियंत्रण पा लिया गया है और आम आदमी के “अच्छे दिन“ आ गए  हैं। सोमवार को जारी आंकडों के अनुसार थोक महंगाई दर  शून्य से नीचे है। इसकी वजह सब्जियों और दालों की कीमतों में गिरावट बताई जा रही है। दाल-सब्जी सस्ती हैं तो आम आदमी के अच्छे दिन माने जा सकते हैं। थोक मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति जनवरी में शून्य से 0.90 फीसदी थी। पिछले साल जनवरी में यह शून्य से 2.17 फीसदी थी। नवंबर 2014, यानी मोदी सरकार के सत्ता में आने के छह माह बाद  से थोक मुद्रा स्फीति में लगातार गिरावट आ रही है।  इस साल जनवरी में मुद्रा-स्फीति पिछले साल की तुलना में कुछ बढी है। पिछले साल भी यही कहा गया था कि दाल-सब्जियां सस्ती होने से मुद्रा स्फीति दर कम होकर शून्य से नीचे चली गई है। इस हिसाब से देश  में महंगाई तो है ही नहीं । सरकारी आंकडों के अनुसार फरवरी में थोक खाद्य मुद्रा स्फीति तेजी से घटकर 3.35 रह गई है। जनवरी में यह 6.02 फीसदी थी।  अर्थात  फरवरी में थोक मुद्रा स्फीति में लगभग पौने तीन फीसदी की गिरावट आई है।  आंकडों के जरिए यह भी बताया गया है कि जनवरी में दाल-दलहनों की कीमतों में लगभग 39 फीसदी की गिरावट आई है। प्याज  13.22 फीसदी सस्ता हुआ है। सब्जियां 3.34 फीसदी और फल 1.95 फीसदी सस्ते हुए हैं। आंकडों के लिहाज से अगर थोक मुद्रा स्फीति  शून्य से नीचे ह, तोै महंगाई होनी ही नहीं चाहिए।  मगर जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है। सरकारी आंकडे आम आदमी के पल्ले नहीं पडते हैं। दाल, सब्जियों के थोक भाव भले ही कम हो गए हों मगर परचून के भाव में कोई गिरावट नहीं आई है। इसके विपरीत पिछले साल की तुलना में दाल-सब्जी और फलों के दाम बढे हैं। सरकारी आंकडे यह भी बताते हैं कि जनवरी 2016 में ईयर-टू --ईयर  आधार पर  उपभोक्ता मूल्य में  5.18 फीसदी की बढोतरी दर्ज हुई। जनवरी में यह वृद्धि 5.69 फीसदी थी। इन आंकडों से साफ है कि थोक कीमतों में गिरावट का लाभ आम आदमी तक नहीं पहुंच रहा है। और अगर वाकई ही परचून कीमतों में गिरावट आती, थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक  सूचकांक (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स-सीपीआई) में इतना बडा अंतर (पांच फीसदी से भी ज्यादा) नहीं होता। दोनों सूचकांक में ज्यादा से ज्यादा एक फीसदी का अंतर होना चाहिए।  लेकिन भारत में थोक मूल्य सूचकांक  और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के अलग-अलग मानदंड होने की वजह  से मुद्रा स्फीति को लेकर असंमजस बना रहता है।  पिछले एक साल में थोक मूल्य सूचकांक मे लगातार गिरावट आ रही है, तो  उपभोक्ता मूल्य सूचकांक बराबर बढ रहा है। दरअसल, थोक मूल्य सूचकांक में मैन्युफेक्चरिंग को ज्यादा वेटेज  दी  जाती  है, जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) में खाद्य वस्तुओं को अधिक वेटेज दी जाती है। इस स्थिति में  डब्ल्यूपीआई और सीपीआई में भारी अतर होना स्वभाविक है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश  में फ्यूल ( पेट्रोल-डीजल) की कीमतों में खासी गिरावट आई है। इससे मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर की उत्पादन लागत में गिरावट आई है और मैन्युफेक्चरिंग से जुडी चीजें सस्ती हुई हैं हालांकि कर्ज  अभी भी महंगा है। दूसरी ओर  खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बहुत ज्यादा गिरावट नहीं आने से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक लगातार ऊपर जा रहा है। इन दो विपरीत स्थितियों से आम आदमी का भ्रमित रहना स्वभाविक है। इस भ्रामक स्थिति के बलबूते रिजर्व  बैंक ब्याज दरें घटाने को तैयार नहीं है। भारत में अभी भी प्रतियोगी एकीकृत मार्केट नहीं होने के कारण डब्ल्यूपीआई की तुलना में  सीपीआई का सही आकलन नहीं हो पाता है। प्रतियोगी एकीकृत मार्केट के अभाव में ही कच्चे माल, केपिटल और इंटरमीडिएट गुडस की कीमतों में उतार-चढाव का अंतिम उत्पाद में पता ही नहीं चल पाता। इस वजह सूचकांक का सही आकलन भी नहीं हो पाता है। निष्कर्ष  यह है कि भारत में मूल्य सूचकांक अभी भी वास्तविक स्थिति को नहीं दर्शा   पा रहे हैं। इससे आम आदमी ही नहीं नीति निर्धारक भी  भ्रमित हो रहे हैं।

मंगलवार, 15 मार्च 2016

Can India Fight China-Pakistan ?

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  (पोक) में चीनी सैनिकों की उपस्थिति भारत के लिए खतरे की घंटी है। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टस के अनुसार नौगाम सेक्टर के दूसरी तरफ पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र में  चीनी सैनिकों को देखा गया। सैनिकों में  वरिष्ठ  अफसर भी  शामिल हैं। पाकिस्तानी सेना अफसरों की बातचीत भी रिकॉर्ड  हुई है और इससे पता चलता है कि चीनी सेना लोप घाटी में कुछ सुरगों का निर्माण कर रही है। चीन की एक हाइड्रो कंपनी भारत की सीमा के साथ लगते पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में झेलम नदी पर 970 मेगावट परियोजना का निर्माण भी कर रही है। इस जल-विद्युत परियोजना का निर्माण भारत की  किशनगंगा परियोजना के जबाव में किया जा रहा है। लेकिन पाक अधिकृत कषमीर में चीनी सैनिकों की उपस्थिति नई घटना नहीं है। पिछले कई सालों से चीन पाक अधिकृत कश्मीर  में गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र में अपनी सामरिक जरुरतों के लिए कई परियोजनाएं चला रहा है और इन सभी में चीनी सैनिकों को इस्तेमाल किया जा रहा है।गिलगिट-बाल्टिस्तान विवादित  क्षेत्र  है और भारत इस पर अपना दावा जताता है। इस स्थिति के मद्देनजर चीन की इस सामरिक नीति से पाकिस्तान को बैठे-बिठाए भारत को छकाने का हथियार मिला हुआ है। सबसे अधिक चिंताजनक बात पाकिस्तान और चीन के बीच बढता सैन्य एवं आर्थिक सहयोग है। पाकिस्तान और चीन मिलकर 46 अरब डॉलर की लागत से इकोनॉमिक कॉरिडोर बना रहे हैं। यह कॉरिडोर चीन के झिजियांग प्रांत को काराकोरम हाईवे के जरिए पाकिस्तान की ग्वादर बंदरगाह से जोडेगा। पाकिस्तान के ग्वादर में चीन ने बंदरगाह बना रखी है। काराकोरम हाईवे वारतीय उपमहाद्धीप और एशिया के बीच सेतु का काम करता  है।  ईसिस हाइवे के कारण  भारत, पाकिस्तान, चीन, अफगानिस्तान और तजाकिस्तान  एक-दूसरे से 250 किमी के दायरे में आ जाते हैं। 1300 किमी लंबा  काराकोरम हाईवे गिलगिट-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान से जोडने का एकमात्र अ़ाल-वैदर मार्ग  है।  यह हाईवे चीन के साथ-साथ पाकिस्तान के लिए भी सामरिक दृष्टि  से अति महत्वपूर्ण  है। इकोनॉमिक कॉरिडोर से पाकिस्तान और चीन दोनों को फायदा हो रहा है। इस हाईवे के खुलने से भारत , चीन और पाकिस्तान दोनों की राडार पर आ गया है। चीन पाकिस्तान की मदद से भारत को घेरने के लिए हर विकल्प को आजमा रहा है। चीन के बारे  यह बात जगत प्रसिद्ध है कि उसकी कूटनीति  “मुंह में राम-राम, बगल में छुरी जैसी है“। चीन एक ओर भारत से दोस्ती का हाथ बढाता है, तो दूसरी ओर उसके सैनिक सीमा पर लगाताार घुसपैठ करते रहते हैं। भारत और चीन मे बीच लगभग चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है। आजादी से पहले फिरंगी  शासन और तिब्बत के बीच 1914 का शिमला कन्वेंशन  करार सीमाओं का निर्धारण करता था मगर  तिब्बत हथियाने के बाद चीन ने इस करार को खारिज कर दिया। इसी वजह आज तक दोनों देशों  में सीमाओं का निर्धारण नहीं हो पाया  है। जिसके कब्जे में जितना क्षेत्र है, वही सीमा का निर्धारण कर रहा है। 1962 में भारत पर अचानक हमला करके चीन ने  भारत का काफी बडा क्षेत्र हथिया लिया था। चीन ने हाल ही में भारत को चौतरफा घेर लिया है। पाकिस्तान से दोस्ती करके चीन भारत के सबसे बडे दुश्मन  को अपने साथ मिला लिया है। नेपाल से भी चीन की निकटता बढ रही है। पूरी दुनिया में भारत के अलावा नेपाल एकमात्र हिदू आबादी बहुल देश  है मगर पिछले कुछ समय से यह भी भारत से दूर होता जा रहा है। म्यांमार का सैन्य  शासन भारत की अपेक्षा चीन के अधिक निकट है। पडोसियों से मिल-जुलकर रहना हर देश  की सामरिक जरुरत होती है। पाकिस्तान, चीन और नेपाल से  मधुर संबंध रखना भारत की सामरिक विवशता है। खुदा-ना-खास्ता अगर चीन और पाकिस्तान मिलकर  हमला करते हैं , तो भारत इन दोनों का मुकाबला नहीं कर सकता। वैसे भी अगला युद्ध परमाणु अस्त्र-शस्त्रों से लडा जाएगा और इस मामले में अकेला चीन ही भारत पर काफी भारी पडता है। पाकिस्तान भी परमाणु हथियार में भारत से कम नहीं है। हाल ही में भारतीय वायु सेना ने यह सच्चाई कबूली है कि भारत, चीन और पाकिस्तान का मिलकर मुकाबला नहीं कर सकता। यह स्थिति भारत के लिए बेहद चिंता जनक है। अमेरिका पर ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता। अमेरिका की “बनिया“ फितरत उसे व्यापारिक हितों की खातिर किसी ओर भी ले जा सकती है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि रुस आज भी उसका भरोसामंद मित्र है। सोवियत संघ के बिखराव के बाद से भले ही रुस चीन के मुकाबले कमजोर पडता है, तथापि, भारत और रुस मिलकर किसी भी सैन्य गठजोड का मुकाबला कर सकते हैं ।

शनिवार, 12 मार्च 2016

चिंतामुक्त हो जाएं!

संसद द्वारा रियल एस्टेट बिल पारित किए जाने के साथ ही  मकान खरीदने वालों को बडी राहत मिली है।  राज्यसभा ने वीरवार को इस बिल को पारित कर दिया। सरकार के लिए इस बिल को पारित करवाना बडी चुनौती थी। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस बिल पर सरकार से सहयोग किया। यह बिल पिछले पांच साल से लटका हुआ था। लोकसभा इसे पहले ही पारित कर चुकी है। रियल एस्टेट के लिए कानून बनने से देश  में बेलगाम बिल्डरों पर  नकेल कसी जा सकेगी। बिल में ऐसे प्रावधान हैं, जिनके माध्यम से रियलटी सेक्टर में काले धन को भी रोका जा सकेगा। अभी तक प्रॉपर्टी बाजार काले धन के बलबूते ही फलता-फूलता रहा है। इस बिल के कानून  बनने पर मकान खरीदने वालों को ही नहीं, बिल्डरों को भी फायदा होगा। राज्यों और केन्द्रीय  शासित क्षेत्रों में रियल एस्टेट रेगुलेटरी ऑथॉरिटी को गठित किए जाने से  रियल सेक्टर से संबंधित शिकायतों का जल्द  निपटान हो पाएगा। प्राधिकरण को साठ दिन के भीतर मामले का निपटान करना होगा। अभी तक मकान खरीदारों को बिल्डरों के खिलाफ शिकायतों के लिए कंज्युमर कोर्ट की शरण में जाना पडता है और इसमें काफी समय लग जाता है। रियल एस्टेट को रेगुलेट करने के लिए पुख्ता कानून नहीं होने के कारण रियल्टी सेक्टर में न तो किसी तरह के मानकीकरण का पालन होता है और न ही बिल्डरों के कारोबार में कोई पारदर्शिता  होती  है। लोगों को अभी तक मकान बनाने वालों की बदनीयत“ अथवा छल या कपट का पता भी नहीं चलता पाता था। नतीजतन, घटिया निर्माण, प्राइस मेन्युपुलेशन और प्रोजेक्ट में अत्याधिक विलंब आम बात है। बडे बिल्डरों के लिए तो राज्यों में पंजीकरण करवाना अथवा प्रोजेक्ट पास करवाना वैधानिक तौर पर अनिवार्य  है, मगर छोटे बिल्डरों और प्रॉपटी बाजार के लिए कोई पुख्ता कानून नहीं है। ताजा बिल के कानून बनने पर पांच सौ वर्ग मीटर और इससे ज्यादा जमीन पर मकान  अथवा आठ फ्लैट्स  से ज्यादा बनाने पर भवन निर्माता अथवा बिल्डर को  रियल एस्टेट रेगुलेटरी ऑथॉरिटी से अनुमति लेना अनिवार्य होगा।  और अगर किसी बिल्डर ने ऐसा नहीं किया तो उसे पेनल्टी भरनी पडेगी। दोबारा ऐसी गलती करने पर जेल भी हो सकती है। नए कानून के तहत बिल्डर को खरीदार से वसूला गई रकम का पचास फीसदी निर्माण के लिए अलग से सुरक्षित रखना पडेगा। राज्य इस सीमा को बढा तो सकते हैं मगर कम नहीं कर सकते। इस प्रावधान से बिल्डरों की एक प्रोजेक्ट का पैसा दूसरे में लगाने की प्रवृति पर रोक लग पाएगी। कारपेट  एरिया का स्पष्ट  निर्धारण किया गया है और इसमें रसोई और शौचालय को भी  शामिल किया गया है। अभी ऐसा नहीं है। अधिकांश  मामलों में बिल्डर बताते कुछ हैं और बाद में निकलता कुछ और है। इस बात के  दृष्टिगत  सरकार ने निर्माण संबंधी त्रृटियों (स्ट्रक्चरल) को दूर करने के लिए दो साल की जगह पांच साल की अवधि तय की है। बिल्डर को अब हाउसिंग प्रोजेक्ट को तय समय पर पूरा करना पडेगा, वरना खरीदारों को मुआवजा देने पडेगा। कुल मिला कर देश  में पहली बार रियल्टी सेक्टर के नियंत्रण लिए कानून बनाया जाना सुखद पहल है। भारत में हाउसिंग तेजी से उभरता सेक्टर है और तरक्की और खुशाहली के साथ-साथ आवास की मांग भी तेजी से बढ रही है। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी भारत में औसतन अधिकतर परिवार छोटे से दस फीट-बाई-दस फीट के कमरे में गुजर-बसर करते हैं। यह औसत ग्रामीण क्षेत्रों 103 फीट और श हरी क्षेत्रों में  118 फीट आती है। चालीस करोड लोगों के पास आज भी शौचालय की सुविधा नहीं है। मोदी सरकार ने 2022 तक देश  के हर परिवार को अपना घर मुहैया कराने का लक्ष्य तय कर रखा है। और यह तभी संभव है जब बिल्डर निम्न तबकों को वास्तव में सस्ते आवास मुहैया कराएं। अभी तक बिल्डर बडे-बडे वायदे तो करते हैं मगर उन्हें पूरा नहीं करते। नए कानून से इस सब मामलों में पारदर्शिता  आने की उम्मीद की जा सकती है।

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

“माललिया“ , भाग लिए

                         
                                                “माललिया“ , भाग लिए

एक जमाने के “हैंडसेम रईस“ और देश  के सबसे बडे शराब कारोबारी किंगफिशर के मालिक एवं राज्यसभा सदस्य विजय माल्या इन दिनों खूब सुर्खियों  में हैं। देश  के 17 बैकों का नौ हजार करोड़ रु डकारने के बाद विजय विट्ठल माल्या विदेश  भाग गए  और बैंक हाथ मलते रह गए। बैकों ने माल्या को विदेश  जाने से रोकने और पैसा न लौटाने पर उन्हें गिरफ्तार कराने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा रखा है। बैंकों ने इग्लैंड की महशूर शराब बनाने वाली कंपनी  डियाजियो से माल्या को मिले 515 करोड रु को जब्त करने की भी भरपूर कोशिश  की। कर्ज वसूली ट्रिब्यूनल (डीआरटी) ने डियाजियो को माल्या को 7.5 करोड डॉलर ट्रांसफर करने पर भी रोक लगा दी मगर बाद में पता चला यह धन माल्या के खाते में पहले ही जमा हो चुका है। माल्या को  युनाइटेड स्पिरिट्स का चेयरमैन पद छोडने के एवज में डियाजियो से यह पैसा मिला था। माल्या अपनी शराब बनाने की कंपनी इंग्लैड की डियाजियो को बेच चुके हैं। किंगफिशर एयरलाइंस चलाने के लिए विजय माल्या ने  17 बैंकों से नौ हजार करोड रु का कर्ज  लिया था। इसमेंसे सात हजार करोड रु माल्या को अभी भी चुकाने  हैं ।  सबसे ज्यादा स्टेट बैंक ऑफ इंडिया का 1600 करोड और पीएनबी तथा आईडीआईबी का 800-800 करोड फंसा है। 2012 के बाद माल्या ने बैंकों का ब्याज तक नहीं चुकाया, मूल धन लौटाना तो दीगर रहा। इसके अलावा माल्या किंगफिशर एयरलाइंस के कर्मचारियों की कई माह की तनख्वाह भी डकार गए। कर्मचारी  न्यायालय की शरण में भी गए और उन्हें वहां से न्याय भी मिला मगर तनख्वाह नहीं मिली। स्टेट बैंक ने अपना पैसा वसूलने के लिए विजय माल्या के गोवा स्थित आलीशान बंगले को न्यायालय की मदद से हासिल  भी कर लिया मगर एसबीआई आज तक इस बंगले को अपने कब्जे में नहीं ले पाया। माल्या ने इस बंगले को बतौर कोलेटर सिक्योरिटी स्टेट एसबीआई के पास गिरवी रखा था। एसबीआई की चैयरमैन अरुणधति भट्टाचार्य  के अनुसार हाई कोर्ट  ने कलेक्टर को तीन माह के भीतर इस बंगले को एसबीआई के सुपुर्द करने के आदेश  दिए थे मगर संबंधित अधिकारी मामले को टालता रहा। आठ बार सुनवाई की और फिर छुट्टी चला गया। नियमानुसार ऐसे मामलों में कलेक्टर को सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है और उसे अदालत के आदेशों  का पालन करना पडता है। इस प्रसंग से पता चलता है कि देश  में रसूखदार किस तरह से कानून को  ठेंगा  दिखाते  हैं।  बैंक पुलिस की मदद से कर्जा  वसूलने के लिए गरीबों  की संपति नीलाम करने में जरा भी देर नहीं लगाते, पर रसूखदारों से अदालत की मदद से भी कर्जा  वसूल नहीं पाते। साफ है कि देश  की  भरष्ट  शासकीय तंत्र रसूखदारों की खुलकर मदद करता है। माल्या को एसबीआई एक साल पहले पूरी तरह (टोटली) डिफॉल्टर घोषित कर चुका है। दो और बैंक भी ऐसा ही कर चुके हैं। माल्या के अलावा उनकी होल्डिंग कंपनी युनाइटेड ब्रीवरीज और किंगफिशर  एयरलाइन  को भी टोटली डिफॉल्टर घोषित किया जा चुका है। प्रवर्तन निदेशालय ने उनके खिलाफ मनी लॉड्रिंग का मामला दर्ज  कर रखा   है। प्रवर्तन निदेशालय इस बात की भी जाच कर रहा है कि माल्या ने कहीं विदेशी  मुद्रा कानून का उल्लघंन तो नहीं किया है। सीबीआई भी इस मामले की जांच कर रही है। माल्या पर यह भी आरोप हैं कि उन्होंने बैंकों के लिए कर्ज  से लगभग चार हजार करोड रु अपने विदेशी  खातों में जमा किए हैं। जुलाई से सीबीआई इस मामले की भी जांच कर रही है। आश्चर्यजनक  बात यह है कि बैंकों ने अभी तक माल्या को फ्रॉड घोषित नहीं किया है जबकि ऐसे मामले में आम आदमी के साथ फौरन ऐसा किया जाता है। इतना सब होने के बाबजूद माल्या दो मार्च को ही अपने निजी जहाज से बगैर रोक-टोक के विदेश  चले गए?  संबंधित एजेंसीज  और बैंक्स हाथ मलते रह गए। माल्या की नीयत में खोट हैं, उनका  विदेश  भाग जाना यही  दर्शाता   है। कोई भी इज्जतदार व्यक्ति इन हालात में विदेश  नहीं जाएगा। माल्या के पास विदेशों  में इतनी संपत्ति है कि उन्हें बेचकर वे अपना सारा कर्ज चुका सकते हैं। माल्या प्रकरण से देश  की वित्तीय संस्थाओं की नकारा रिकवरी व्यवस्था की कलई खोली है। इस व्यवस्था को और ज्यादा धारदार बनाने की जरुरत है।

गुरुवार, 10 मार्च 2016

श्री श्री क्या पर्यावरण प्रेमी नहीं ?

दिल्ली में यमुना किनारे  शुक्रवार से  शुरु होने वाले श्री श्री रविशंकर के तीन-दिवसीय “वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल“ पर अनिश्चितता  के बादल वीरवार को छंट  गए । नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने  कुछ शर्तों  के साथ  श्री श्री रविशंकर की  आर्ट ऑफ लीविंग को  यमुना किनारे आयोजन को हरी झंडी दे दी।  पर्यावरण  नुकसान के लिए पांच करोड़ का जुर्माना किया गया है। श्री श्री रवि  शंकर पर आरोप है कि उनके ताजा आयोजन ने दिल्ली की यमुना नदी के नाजुक पर्यावरण को नष्ट  कर डाला है। लगभग 150 देशों  के 35 लाख से अधिक देसी-विदेशी  मेहमानों के लिए एक हजार एकड अथवा चार सौ हेक्टेयर क्षेत्र में विशाल पंडाल स्थापित किए गए हैं। सात एकड क्षेत्र में तो 35,000 नृतकों और संगीतकारों के लिए विशेष  स्टेज बनाया गया है। इसे विश्व  का सबसे बडा परर्फोमिंग स्टेज बताया जा रहा है। आयोजन के दौरान पूरे तीन दिन आठ से दस हजार कलाकर हर समय नृत्य और संगीत कार्यक्रम पेश  करते रहेंगें। 650  शौचालय बनाए गए हैं और धूल-मिटटी हटाने के लिए अलग से डर्ट  ट्रेक्स लगाए गए हैं। रवि  शंकर के  योगा के मुरीद प्रधानमंत्री  शुक्रवार को इस “सांस्कृतिक फेस्टिवल“ का उदघाटन करने वाले हैं मगर सुरक्षा एजेसियों ने अभी तक प्रधानमंत्री की उपस्थिति को हरी झंडी नहीं दिखाई है। राष्ट्र्पति  प्रणब मुखर्जी इस आयोजन का निमंत्रण पहले ही अस्वीकार कर चुके हैं । पर्यावरण प्रेमियों ने इतने  विशाल  आयोजन से यमुना के नाजुक पर्यावरण को होने वाले नुकसान के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है। इस आयोजन से यमुना के तटीय क्षत्रों की रही-सही वनस्पतियां भी नष्ट  हो गई हैं और पानी के सतत प्रवाह के अवरुद्ध होने का खतरा है। इन खतरों से चिंतित पर्यावरण प्रमियों ने इस आयोजन को रद्द कराने के लिए  नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका दायर कर रखी है। ट्रिब्यूनल ने इतने विशाल  आयोजन को बगैर पुलिस और पर्यावरण कलीयरेंस के अनुमति दिए जाने पर हैरानी  व्यक्त की  है। ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा गठित विशेषज्ञों की समिति ने इस आयोजन से 100 से 120 करोड रु के नुकसान का आकलन किया है और इस नुकसान की भरपाई श्री श्री रवि  शं कर से करवाने की सिफारिष की है। भारत में ही नहीं, दुनिया भर में श्री श्री रवि  शंकर के ”आर्ट ऑफ लीविंग” को खासी लोकप्रियता हासिल है। 156 देशों  में सक्रिय “आर्ट  ऑफ लीविंग“ दुनिया की सबसे बडी एनजीओ है। संयुक्त राष्ट संघ  इकानॉमिक एंड सोशल काउंसिल ने “आर्ट ऑफ लीविंग फाउडेशन“ को विशेष  दूतावास (कांसुलेट ) का दर्जा दे रखा है। यूरोप में श्री श्री रवि  शंकर की “आर्ट ऑफ लीविंग“ “एसोसिएशन ऑफ इनर ग्रोथ“ के नाम से लोकप्रिय  है। इतनी विख्यात संस्था बगैर अधिकृत अनुमति के नाजुक पर्यावरण वाली यमुना के बाढ वाली जगह पर निर्माण करे, इस पर सहज में विश्वास  नहीं होता है। “आर्ट ऑफ लीविंग“ ने भी  स्पष्टीकरण  दिया है कि “वर्ल्ड  कल्चर फेस्टिवल“ के दिल्ली आयोजन स्थल के लिए हर तरह की अनुमति दिसंबर माह में ही ले ली गई थी। सवाल यह है कि नाजुक बाढ-प्रोन जगह पर इस विशाल आयोजन की अनुमति क्यों दी गई? अब पर्यावरण मंत्रालय को जबाव देते नहीं बन पा रहा है।  ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण मंत्रालय को इस मामले में जबाव नहीं देने के लिए फटकार लगाई है। पर्यावरण प्रेमियों को इस आयोजन का पता चलते ही उन्होंने फौरन ग्रीन ट्रिब्यूनल में याचिका डाल दी। भारत में अभी भी पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरुकता नहीं है। श्री श्री रविषंकर का ताजा आयोजन भी यही दर्षाता है। यह बात बच्चा भी जानता है कि जिस जगह 35 लाख लोग तीन दिन के लिए एकत्र होंगे, वहां की वनस्पतियां, जल स्त्रोत और सीवरेज का कबाडा तो होगा ही? आयोजन स्थल के निकट पक्षी विहार भी है और पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि श्री श्री के आयोजन से इस विहार को भी गंभीर खतरा है। दिल्ली पुलिस ने चेताया है कि मौजूदा माहौल में इस आयोजन के दौरान भी अप्रिय घटना की आशंका है और इससे अफरा-तफरी फैल सकती है। हाल ही में लगभग एक दर्जन आतंकी देश  में खून-खराबा फैलाने के लिए भारत  में घुस आए हैं। इस  मामले से विपक्ष को मोदी सरकार को घेरने का एक और मौका मिल गया है। इसकी संसद में गूंज भी सुनाई दी। श्री श्री रवि  शं कर की आर्ट ऑफ लीविंग का जनमानस के जीवन को सुखद बनाने में खासा योगदान है मगर पर्यावरण नष्ट  करने की किसी को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए ।

बुधवार, 9 मार्च 2016

Don't Tax Savings, Extend Social Security To All

भारी दबाव के समक्ष नतमस्तक होकर अततः वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कर्मचारी भविष्य  निधि अथवा ईपीएफ पर प्रस्तावित टैक्स वापस ले लिया। मंगलवार को संसद में इस आशय की घोषणा करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि ईपीएफ निकासी पर  टैक्स का प्रस्ताव फिलहाल टाल दिया गया है। सरकार की इस घोषणा से लगता है कि कर्मचारियों की भविष्य निधि पर टैक्स पुनः लगाया जा सकता है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने वित्त मंत्री से इस टैक्स पर पुनर्विचार करने को कहा था। इससे  इस टैक्स के रोल बैक किए जाने की संभावनाएं बढ गईं थी। भविष्य निधि पर प्रस्तावित टैक्स लगने से लगभग छह करोड कर्मचारी प्रभावित होने वाले थे। बजट में अप्रैल 2016 के बाद कर्मचारी भविष्य निधि से 40 फीसदी पैसा निकालने पर टैक्स लगाया गया था। इतना ही नहीं सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि में  जमा होने वाले नियोक्ता (इम्पलॉयर) अंशदान पर भी टैक्स लगाया था।  देश  भर में इस प्रस्ताव के खिलाफ आवाज उठी थी। सोशल मीडिया पर एक लाख से अधिक लोगों ने ह्स्ताक्षरयुक्त ऑनलाइन याचिका भी अपलोड की थी और “रोलबैक ईपीएफ हेशटैग“ कई दिनों तक चलता रहा। भाजपा के अधिकांश  सांसद भी इस टैक्स के खिलाफ थे। सरकार का तर्क  था कि नेशनल पेंशन फंड को प्रोत्साहित करने के मकसद से कर्मचारी भविष्य निधि से पैसा निकालने पर टैक्स लगाया था। इस बात में कोई दम नहीं है। कर्मचारी भविष्य निधि कॉंट्रिब्युटरी  फंड है और इसमें नियोक्ता का  बराबर  (न्यूनतम 10 से 12 फीसदी) योगदान  वैधानिक तौर पर अनिवार्य है। नेशनल पेंशन फंड में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। केन्द्र सरकार ने 2011-12 से पांच साल के लिए (2016-17 तक) नेशनल पेंशन योजना में अपनी तरफ से अधिकतम हर माह एक हजार जमा  कराने की “स्वालंबन योजना “ चला रखी है मगर यह असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए  है। संगठित क्षेत्र के कर्मचारी इसकी जद से बाहर हैं। सरकार अगर नेशनल पेंशन स्कीम (एनपीएस)  को प्रोत्साहित करना ही चाहती है, तो कर्मचारी भविष्य निधि को बंद करके इसे एनपीएस में क्यों नहीं मिला देती? नेशनल पेंशन स्कीम में दो तरह के विकल्प भी हैं और कर्मचारी अपनी सुविधानुसार इन विकल्पों को चुन सकते हैं। इन विकल्पों में मध्यावधि अथवा जरुरत पडने पर पैसा निकालना शामिल हैं।  सरकार के इस तर्क  में भी कोई दम नहीं है कि ईपीएफ पर टैक्स लगाए जाने से लोग एकमुश्त  पैसा निकालने के प्रति हतोत्साहित होंगे। ईपीएफ से अत्यावश्यक  जरुरत अथवा रिटायरमेंट  के समय पैसा निकाला जाता है और दोनों ही परिस्थितियों में कर्मचारी टैक्स लगने पर भी पैसा निकालने के लिए विवश हैं । सरकार को अगर वाकई ही निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की इतनी ही चिंता है तो भविष्य निधि पर टैक्स लगाने की बजाय उन्हें सामाजिक सुरक्षा मुहैया क्यों नहीं कराती? निजी क्षेत्र के अधिकतर कर्मचारी रिटायरमेंट तक बच्चों की  शिक्षा, विवाह और अन्य जिमेदारियां निभाते-निभातेे अपनी बचत का बडा हिस्सा खर्च कर देते हैं। इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उन्हें भविष्य निधि से भी पैसा निकालना पडता है।  एक अध्ययन के मुताबिक 70 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी रिटायरमेंट तक ईपीएफ से काफी पैसा निकाल लेते हैं। विकसित देशों  में बुजुर्गों को वृद्धावस्था में पेंशन और मेडिकल सुविधा समेत प्रर्याप्त सामाजिक सुरक्षा दी जाती है। उन्हें रिटायरमेंट की  चिंता करने की जरुरत  ही नहीं पड़ती । फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं? देश  के लॉमेकर्स अपने लिए  हर तरह की सुविधा जुटा लेते हैं। सांसदों और विधायकों को पेंशन की सुविधा है। उन्हें आयकर भी नहीं देना पडता है और सस्ता आवास और वाहन खरीदने के लिए कर्ज भी मिलता है । हाल ही में सरकार ने सांसदों  को टोल टैक्स से भी फ्री करा दिया  है ।  मगर उस गरीब जनता का क्या जो उन्हें इन सब का हकदार बनाती है? मोदी सरकार को अगर कर्मचारियों की बचत पर टैक्स ही लगाना है, तो इसे  देश  के हर बुजुर्ग को साठ साल के बाद पेंशन देने के लिए लगाया जाना चाहिए। शिक्षा के लिए धन जुटाने के वास्ते अगर  शुल्क लगाया जा सकता है, तो सामाजिक सुरक्षा से महरुम बुजुर्गों को भी पेंशन सुविधा देने के लिए टैक्स लगाया जा सकता है। इस तरह की पहल का कोई भी मुखर विरोध नहीं करेगा। दुख इस बात है कि हर तरह की सुविधाओं से संपन्न देश  के लॉमेकर्स को गरीब और बेसहारा लोगों की कोई चिंता नहीं है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

खुफिया एजेंसियों की विश्वसनीयता

खुफिया एजेंसियों की सूचनाओं को कितना विश्वसनीय माना जाना चाहिए? देश  में जब-तब हो रहे बार बार के आतंकी हमलों के संदर्भ  में यह  प्रश्न   सामयिक है और देश  इसका जबाव मांग रहा है।  खुफिया एंजेसियों की सूचनाओं के आधार पर केन्द्र सरकार ने रविवार को देश  में हाई अलर्ट जारी करने के साथ ही महत्वपूर्ण जगहों की सुरक्षा भी बढा दी। खुफिया एजेंसियों के अनुसार समुद्र के रास्ते  पाकिस्तान से कुछ आतंकी गुजरात में घुसपैठ कर गए हैं और आतंकी हमले कर सकते हैं। आतंकियों के निशाने पर सोमनाथ मंदिर भी है। खुफिया सूचनाओं के बाद सोमनाथ मंदिर की सुरक्षा बढा दी गई है। एनएसजी की चार टुकडियां अहमदाबाद में तैनात की गईं है और सोमनाथ मंदिर की सुरक्षा को भी एनएसजी के सुपुर्द कर दिया गया है। पुलिस ने गुजरात के अलावा पंजाब में पठानकोट एयरबेस से करीब बारह किलोमीटर की दूरी पर स्थित  कटारु चक में गहन तलाशी  भी ली। मंगलवार को महा शिवरात्रि मनाई जा रही है। इस पावन अवसर पर मंदिरों में श्रद्धालुओं की भीड का उमडना स्वभाविक है। पठानकोट में शिवरात्रि मेले को रदद कर दिया है। पठानकोट के निकट एक गांव में  शनिवार रात को पाकिस्तान फोन कॉल ट्रेस की गई। पंजाब में भारत-पाकिस्तान बार्डर पर लोगों ने पाक वायु सेना का हेलीकॉप्टर मंडराता देखा मगर सीमा सुरक्षा दल ने इस बात को नकार दिया। इन घटनाक्रमों के मद्देनजर  देश  में हाई अलर्ट  जारी किया गया है । मगर सच यह है कि खुफिया एजेसिंयों की सूचनाओं को बहुत ज्यादा विश्वसनीय   नहीं माना जा सकता। महाशिवरात्रि पर्व  पर  देश  के धार्मिक स्थलों पर एतिहातन सुरक्षा चाक-चौबंद करना आम बात है और खुफिया एजेंसियों द्वारा अलर्ट  जारी करना भी रुटीन  है। मगर इस सच्चाई को नकारा भी नहीं जा सकता कि देश  में आज तक जितने भी आतंकी हमले हुए हैं, खुफिया एजेंसियों को उनकी भनक तक नहीं लग पाई है।  देश  के दुश्मन  इतने भी नौसिखिए नहीं हैं कि वे सूचना देकर अथवा भारतीय  खुफिया एजेंसियों के कान खडे करवाकर अपने  षडयंत्र को नेस्तानाबूद कर दें। दुनिया जानती है कि आतंकी हमले बताकर अथवा कडी सुरक्षा के वक्त नहीं किए जाते। महाशिवरात्रि या इस तरह के आयोजनों के दौरान कडी सुरक्षा व्यवस्था के बीच आतंकी हमले करने की हिमाकत करेंगे, इस पर संदेह होता है। इस बात का ख्याल करते हुए क्या यह माना जाए कि देश  की खुफिया एजेंसियों की   सूचनाओं में ज्यादा दमखम नहीं होता है। अगर होता तो पठानकोट और दीनानगर जैसे आतंकी हमले टाले जा सकते थे। आतंकी आराम से सीमा पार कर भारत में घुस आते हैं। इधर-उधर मटरगश्ती   करते हैं और बगैर किसी बेरोकटोक के किसी सुरक्षित जगह पनाह लेकर हमला कर देते हैं। पठानकोट, दीनानगर और मुंबई के 26/11 हमले समेत हर आतंकी हमले के दौरान अब तक यही होता रहा है। मुंबई हमले के आतंकी भी समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे और आराम से महानगर में नरसंहार करते रहे। कई साल बाद  यही दीनानगर में हुआ और पठानकोट में तो आतंकियों ने  हाई सिक्योरिटी  वाले एयरबेस में घुसकर सुरक्षा व्यवस्था की पोल ही खोल दी। पूरी दुनिया में इस सच्चाई को माना जाता है कि  प्रशिक्षित -से-प्रशिक्षित  खुफिया एजेंसी भी भरोसेमंद सूचना नही दे पाती हैं। अमेरिका की कुख्यात खुफिया एजेंसी सीआईए  और तत्कालीन सोवियत यूनियन की केजीबी भी पुख्ता जानकारियां एकत्रित नही कर पाईं। अथाह संसाधनों के बावजूद सीआईए न तो जर्मन की बर्लिन वॉल की खुफिया जानकारी हासिल कर पाई थी और न ही उसे सोवियत संघ के आसन्न पतन की भनक तक लग पाई। इराक में पूरी तरह से सक्रिय रहने के बावजूद सीआईए को कुवैत पर हमले की भी भनक तक नहीं लग पाई। भारतीय खुफिया एजेंसियों सीआईए या अमेरिकी खुफिया तंत्र से ज्यादा  साधन सपन्न  नहीं हैं । तथापि भारत जिस तरह चौतरफा ”शत्रु " पडोसियों से घिरा हुआ है, उसका ख्याल करते हुए हमें अपने खुफिया तंत्र को अत्याधुनिक और भरोसेमंद बनाने की जरुरत है।

शनिवार, 5 मार्च 2016

क्रिकेट पर ”गंदी” राजनीति

                                                            क्रिकेट पर ”गंदी” राजनीति

सियासी लोग अपने निहित स्वार्थों के लिए किस हद तक जा सकते हैं, विश्व  विख्यात धौलाधार पर्वत श्रृखंलाओं के मध्य स्थित धर्मशाला में भारत और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित वर्ल्ड कप ट्वेंटी-20 को लेकर जारी “गंदी राजनीति“ इस बात का उदाहरण है। धर्मशाला ही नहीं पूरे हिमाचल प्रदेश  के लिए यह गौरव की बात है कि भारत का पहला  ट्वेंटी-20 पाकिस्तान के साथ हो रहा है और धर्मशाला स्टेडियम को इसके लिए चुना गया है। क्रिकेट हो या हॉकी,  खेल प्रेमियों के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच मैच हमेशा  “ बेहद रोमांचक“ रहा  है। इस मैच को हिमाचल प्रदेश  में लाने के लिए हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं बीसीसीआई सचिव अनुराग ठाकुर की अग्रणी भूमिका रही है। हिमाचल प्रदेश  के लिए यह भी गौरव की बात है कि अनुराग ठाकुर बीसीसीआई के सचिव भी हैं। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें कडी मेहनत करनी पडी है। इसी वजह बीसीसीआई में हिमाचल प्रदेश  की पूछ भी होने लग पडी है। पहली बार हिमाचल प्रदेश  के खिलाडी ऋषि  धवन को  आस्ट्रेलिया के खिलाफ एक दिवसीय मैच के लिए भारतीय टीम में शामिल किया गया। धर्मशाला में अंतरराष्ट्रीय  स्तर का क्रिकेट स्टेडियम बनवाना और यहां अंतरराष्ट्रीय  मैच आयोजित करवाने में भी अनुराग ठाकुर का बडा हाथ है। हिमाचल में सत्तारूढ कांग्रेस  के नेताओं को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है।  और दुर्भाग्यवश  सरकार और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को यही बातें सबसे ज्यादा खटक रही हैं। अनुराग ठाकुर हिमाचल प्रदेश  के पूर्व  मुख्यमंत्री प्रो. प्रेम कुमार धूमल के पुत्र और पूर्व  मंत्री गुलाब सिंह के दामाद है। कांग्रेस का शीर्ष  नेतृत्व इस सच्चाई को पचा नही पा रहा है।  धर्मशाला स्टेडियम को भी धूमल सरकार के समय बनवाया गया था। क्रिकेट जगत में इस स्टेडियम को बेहतरीन स्तर का माना जाता है और इसकी हिमाच्छादित पृश्ठ्भूमि में चौके-छक्के मैच को और भी रोमांचक बना देते हैं।  भारतीय खिलाडियों को सर्द जलवायु में अभ्यस्त करवाने के लिए इस स्टेडियम की अहम भूमिका है। अभी तक देश  में सर्द  जलवाय वाली जगह में अंतरराष्ट्रीय  स्तर का स्टेडियम नहीं था। धर्मशाला ने इस कमी को भी पूरा कर दिया है । मगर हिमाचल में वीरभद्र सिंह सरकार इस स्टेडियम के पीछे भी हाथ धोकर पडी है। धूमल सरकार ने इस स्टेडियम को जमीन क्यों दी और कितने पेड काटे गए, इन सब बातों को लेकर अनुराग ठाकुुर और हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट संघ के खिलाफ विजीलेंस जांच जारी है। अनुराग ठाकुर और अन्य पदाधिकारियों को गिरफतारी से बचने के लिए कोर्ट की शरण में जाना पडा है। सरकार की  कार्रवाई से ऐसा लग रहा है जैसे अनुराग ने कई बहुत बड़ा गुनाह किया हो जबकि सच्चाई  यहाँ है की जो काम कांग्रेसी  सालों तक नहीं कर पाए , अनुराग ने वह चंद सालों  में कर दिखाया । इतना ही नहीं, वीरभद्र सिंह सरकार कानून में बदलाव करके  अनुराग ठाकुर को हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट संघ से अपदस्थ करने पर आमादा है। इस आशय का बिल पारित हो चुका है और राज्यपाल की स्वीकृति के लिए लंबे समय से राजभवन की धूल चाट रहा है। निसंदेह, यह दुर्भाग्यपूर्ण  स्थिति है कि क्रिकेट को “ सियासी“ रस्साकशी  और “बदले की राजनीति“ का शिकार बनना पडे। पाकिस्तान भारत में न खेलने के पहले ही बहाने तलाश  रहा है और खिलाडियों की कडी सुरक्षा की मांग कर रहा है। राज्य के सियासी नेताओं की “कैट फाइट“ में पाकिस्तान को अच्छा बहाना मिल गया है। हिमाचल प्रदेश  सरकार ने इस मैच के लिए पठानकोट आतंकी हमले का हवाला देकर सुरक्षा मुहैया कराने से मना कर दिया है। जाहिर है अगर सरकार सुरक्षा नहीं देगी, मैच होगा ही नहीं। कांग्रेस पार्टी भी यही चाहती है कि मैच धर्मशाला में न हो। और अब दल-बदल के लिए विख्यात मेजर विजय सिंह मनकोटिया भी मैदान में कूद पडे हैं। मनकोटिया हिमाचल एक्स सर्विसमैन लीग के अध्यक्ष हैं और उनका कथन है कि मैच हिमाचल के सैनिकों की प्रतिष्ठा से  जुडा है। पठानकोट हमले में हिमाचल के दो सैनिक शहीद हो गए थे। मनकोटिया खुद पूर्व सैनिक हैं और वे जानते हैं कि शहादत माना सैनिकों के लिए गर्व की बात है। मनकोटिया और अन्य कांग्रेसी नेता यह भी जानते हैं कि क्रिकेट खिलाडियों का आतंक से दूर-दूर का भी वास्ता नहीं होता है। फिर भी क्रकेट मैच को लेकर जमकर राजनीति हो रही है। भारत इस बार वर्ल्ड कप टी-20 की मेजबानी कर रहा है। यह किसी व्यक्ति विशेष  का नही, बल्कि पूरे देश  का आयोजन है। फिर यह गंदी राजनीति क्यों?


शुक्रवार, 4 मार्च 2016

यह कहां का इंसाफ ?

                                                    यह कहां का इंसाफ ?
जीवन भर की बचत पर कर लगाकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थशास्त्र के  मान्य सिद्धांतों का उल्लघंन किया है। अर्थशास्त्र का सीधा-साधा सिद्धांत है कि बजट प्रोगेसिव होना चाहिए, रेग्ररेसिव नहीं। कर व्यवस्था से बचत और उत्पादन को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। और जिस बजट में बचत पर ही टैक्स लगाया जाए, ऐसे बजट को प्रोगेसिव नहीं माना जा सकता। अमूमन, बचत को बढावा देने के लिए करों में छूट दी जाती है। इस बार वित मंत्री ने तीन हजार की मामूली छूट देने के साथ ही प्रॉविडेंट फंड से पैसे की निकासी को कर के दायरे में लाया है। पूरे देश  में इस कर का मुखर विरोध हो रहा है। अब तक एक लाख से ज्यादा   लोग सोशल मीडिया पर विरोध दर्ज  कर चुके हैं। बजट के तुरंत बाद वित्त मंत्री के इस प्रस्ताव  पर मोदी सरकार को स्पष्टीकरण तक  देना पडा। बजट के दूसरे ही दिन सरकार ने तीन बार सफाई दी कि ईपीएफ की निकासी पर नहीं, बल्कि उसके ब्याज की साठ फीसदी रकम पर टैक्स लगाया गया है।  भाजपा के अधिकांश  सदस्य भी पीएफ पर टैक्स लगाने के खिलाफ हैं और वित्त मंत्री पर इसे रोल बैक करने का दबाव डाल रहे हैं। वित्त मंत्री ने अब गेंद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पाले में डाल दी है। वित्त मंत्री के बजट दर्शन   को लेकर कुछ चिंता व्यक्त की जा रही है। भाजपा को सर्विस सेक्टर फ्रेंडली माना जाता है और सर्विसिस क्लास को भाजपा से करों में रियायतें मिलने की उम्मीद रहती है। मगर इस बार का बजट मिडिल क्लास फ्रेंडली नहीं है।  अभी तक यह स्पष्ट  नहीं है कि ईपीएफ की पूरी निकासी पर टैक्स लगेगा या ब्याज पर। सरसरी गणना के अनुसार अप्रैल, 2016 से दस हजार बेसिक वेतन पाने वाले को 58 की सेवानिवृति पर लगभग डेढ करोड मूल रकम और एक करोड रु ब्याज से मिलेंगे। अभी यह स्पष्ट  नहीं है कि सरकार एक करोड रु के ब्याज को टैक्स करेगी या पूरी रकम (ब्याज प्लस मूल) पर। ब्याज पर टैक्स लगाना सर्विस क्लास की जेब पर डाका है। प्रत्यक्ष करों से मिलने वाले लगभग पौने दो लाख करोड रु  आयकर के अलावा सरकार को अन्य प्रत्यक्ष करों से बमुश्किल  सात सौ करोड रु मिलते हैं। इस बात के दृश्टिगत सर्विस क्लास की उम्र भर की बचत के ब्याज पर टैक्स से सरकार को बहुत ज्यादा कमाई नहीं होने जा रही है। सुखद स्थिति यह है कि नेशनल पेंशन स्कीम की निकासी को प्रस्तावित टैक्स से मुक्त रखा गया है।  इस साल और अगले साल संपन्न होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए बजट में कृषि  और सोशल सेक्टर को खासी प्राथमिकता दी गई है। अगले साल जनवरी-फरवरी में उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड, पंजाब समेत कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है। उत्तर प्रदेश  और पंजाब में किसानों का वर्चस्व है और सरकार बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। उत्तर प्रदेश  के विधानसभा चुनाव इस बार भाजपा के लिए खास महत्व रखता है। इसीलिए बजट को प्रो-किसान और प्रो-पुअर का फेस दिया गया है। अमल में किसानों को कितना उत्थान होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। सरकार की बजटीय घोषणा कितनी असरदार साबित  होती हैं, गंगा की सफाई के लिए घोषित योजना इसका प्रमाण है। पिछले साल बजट में गंगा की तत्काल सफाई की  जोश -खरोश   से घोषणा की गई मगर सफाई तो दीगर रही, बजट का पांच फीसदी भी सफाई पर खर्च नहीं हो पाया है। वस्तुतः, पिछले कई सालों से गंगा की सफाई के लिए दो चरणों में पचीस हजार करोड रु का प्रावधान किया जा चुका है मगर गंगा आज भी वैसी की वैसी मैली और गंदी है। इसी तरह बजट में काले धन को बाहर लाने के लिए स्वैच्छिक घोषणा स्कीम का ऐलान किया गया है। 1997 में इस तरह की स्कीम से सरकार मात्र दस हजार करोड रु जुटा पाई थी। इस स्कीम के तहत काले धन को सफेद बनाने के लिए 30 फीसदी टैक्स और  7.5 फीसदी पैनल्टी देनी पडेगी। देश  के मध्यम वर्ग को इस बात की हैरानी है कि मोदी सरकार टैक्स की चोरी करके देश  के साथ गद्दारी करने वाले धन्ना सेठों को तो पुरुस्कृत (एमेनेस्टी) कर रही है, मगर ईमानदारी से टेक्स देने वालों को टैक्स लगाकर रिटायरमेंट पर भी दंडित किया जा रहा है।  यह कहाँ का इन्साफ है ?

गुरुवार, 3 मार्च 2016

शुक्र है संसद चली तो सही


मंगलवार को बार-बार बाधित किए जाने के बाद, शु क्र है, बुधवार को संसद की कार्यवाही सुचारु रुप से चली तो सही। पूर्व गृह मंत्री पी चिदंबरम के पुत्र कीर्ति और इशरत जहां पर पूर्व  गृह सचिव जीके पिल्लई के विवादास्पद बयान से  प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस सतारूढ दल के निशाने पर आ गई है। इसी कारण मंगलवार को विवादित मुद्दों पर गला फाड-फाड कर बोलते कांग्रेसी सदस्य बुधवार को दबे-दबे से नजर आए। भाजपा का आरोप है गुजरात की भाजपा सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को बदनाम करने के लिए पी चिदंबरम ने इशरत जहां के मामले में गलत हलफनामा दायर किया था। सरकार ने बडी चतुराई से पी चिदंबरम मामले को आगे करके   पासा कांग्रेस पर ही पलट दिया है। इसी कारण राज्यसभा में सरकार अन्नाद्रमुक की मांग पर कीर्ति चिदंबरम  मामले में चर्चा  के लिए तैयार हो गई। लोकसभा में भी इस मामले में चर्चा  हुई और वित्त मंत्री ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि सरकार दोषियों को कतई नही  बख्शेगी । स्पष्टतय,  इशारा पी चिदंबरम और उनके पुत्र  कीर्ति चिंदबरम की तरफ था। पिता-पुत्र एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में आरोपी हैं और अन्नाद्रमुक उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग पर अडा हुआ है। इस दौरान यह भी खुलासा हुआ है कि कीर्ति की कंपनियों का व्यापार चौदह देशों  तक फैला हुआ है। इस मामले के उछाले जाने से अब तक “आक्रामक“ कांग्रेस रक्षात्मक मोड में आ गई है।  मंगलवार को लोकसभा में केन्द्रीय मंत्री रमा  शंकर कठेरिया द्वारा दिए गए विवादित बयान पर विपक्ष ने लोकसभा की कार्यवाही बाधित की थी। कठेरिया पर आरोप है कि उन्होंने आगरा में एक समुदाय विशेष  को “राक्षस“ बताते हुए बहुसंख्यक समुदाय से बदला लेने का आहवान किया था। कठेरिया के इस बयान से असहिष्णुता  का मुद्दा फिर अन्य मुद्दों पर फिर हॉवी हो सकता  है। विपक्ष को बैठे-बिठाए भाजपा को घेरने का मुद्दा मिल गया था। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला के मामले में केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पहले ही विपक्ष के निशाने पर है। इन मामलों में भाजपा और कांग्रेसके सद्स्य एक-दूसरे के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश  कर माहौल को  और ज्यादा तल्ख कर रहे हैं।  बुधवार को भाजपा के सदस्यों ने इशरत जहां मामले में विषेशाधिकार हनन  प्रस्ताव पेश  किए। पर गनीमत यह रही कि   आरंभ  के कुछ क्षणों को छोडकर बुधवार को संसद  शांतिपूर्वक चली और चर्चा भी हुई। आक्रामक विपक्ष से कैसे निपटा जाए, बुधवार को इस मसले पर भाजपा ने बैठक करके रणनीति  तय की और संसद में कांग्रेस पर हमला बोला।  कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर निशाना  साधते हुए काले धन को सफेद करने की बजटीय स्कीम  पर चुटकी ली। पक्ष और विपक्ष अभी भी सकारात्मक  की बजाय गतिरोध बनाने वाली भावना से चर्चा कर रहे हैं।  इससे यही निष्कर्ष   निकलता है कि राष्ट्र्पति  प्रणब मुखर्जी और राज्यसभा के सभापति उप-राष्ट्र्पति  हामिद अंसारी की “गतिरोध की बजाय चर्चा“ के आहवान का कोई ज्यादा असर नहीं हुआ है। सियासी दल  संसद में हर विवादित मुद्दे उछाल कर जनसेवा का कम, निहित हितों का ख्याल कहीं ज्यादा रख रहे हैं। निसंदेह, विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश  करना सांसदों का अधिकार है मगर इसे सियासी हितों के लिए इस्तेमाल करना स्वस्थ संसदीय परंपरा के खिलाफ है। सांसदों के “आक्रामक“ आचरण से यह भी स्पष्ट  है कि “गतिरोध“ का खुमार अभी भी उन पर सर चढ कर बोल रहा है। सासदों के आचरण को  जनमानस पारखी नजर से देखते हैं और इसका उनपर असर भी पडता है। कहावत हैं “जैसी राजा, वैसी प्रजा“। देश  के नेता और जन प्रतिनिधियों से आदर्श   आचरण की अपेक्षा की जाती है। संसद में एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने अथवा सियासी फायदे के लिए मुद्दे उठाने से मर्यादाओं  का ही निरादर होता है। और लोकतंत्र मर्यादाओं का निरादर करके फल-फूल नहीं सकता। सांसद और जन प्रतिनिधियों को इस सच्चाई को ग्राह्य करना ही होगा।

बुधवार, 2 मार्च 2016

सस्ते कर्ज की दरकार

 बजट के बाद अब मार्केट की उम्मीद रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति में रेट कट पर टिकी हैं। स्टॉक मार्केट बजट से ज्यादा उत्साहित नहीं हुआ। सोमवार को बाजार में मंदी व्याप्त रही और सेंसेक्स 152 अंक टूटा मगर मंगलवार कोे  शेयर बाजार गुलजार रहा और सेंसेक्स 777 अंकों की उछाल से बंद हुआ। सात साल में यह सबसे बडा उछाल है। बजट में कृषि  को खासी प्राथमिकता दिए जाने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित किए जाने के  वायदे   से मंगलवार को स्टॉक मार्केट में तेजी छाई रही। डॉलर के मुकाबले रुपया भी कुछ मजबूत हुआ। वित्त मंत्री ने बजट में ग्रामीण क्षेत्रों और फार्म  सेक्टर को खासा बजट आवंटित करने के बाद भी राजकोषीय घाटे को  अगले वित्त वर्ष   में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3.5 फीसदी तक सीमित रखने का लक्ष्य रखा है। केन्द्र सरकार को अपने कर्मचारियों के लिए सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों  के अनुसार वेतन और पेंशन भी बढानी है। इसके साथ-साथ खाद्य और उर्वरक-फ्यूल सब्सिडी को भी अच्छा खासा बजट दिया गया है। इससे साफ संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स मजबूत हैं। इस स्थिति में बाजार को उम्मीद है कि रिजर्व  बैंक के गर्वनर रघुराम राजन रेपो रेट को कम करके ब्याज दरों में नरमी लाएंगे। पिछले साल सितंबर के बाद  रिजर्व बैंक ने ब्याज दरें नहीं घटाईं हैं। राजन ने वायदा भी कर रखा है कि अगर परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो ब्याज दरें घटाईं भी जा सकती हैं। वैश्विक  मंदी के दृष्टिगत  मांग को मजबूत करने की जरुरत है और यह तभी संभव है जब कर्ज सस्ता हो। भारत में कर्ज अभी भी काफी महंगा है। चीन में ब्याज दरें  1996 में 10.98 फीसदी के उच्च स्तर को छूने के बाद अक्टूबर 2015 में 4.37 फीसदी के निम्न स्तर पर हैं। चीन की तुलना में भारत में अभी भी ब्याज दरें (प्राइम लैंडिग रेट) 10 फीसदी से ज्यादा हैं और इस कारण कर्ज अपेक्षाकृत  महंगा है। महंगे कर्ज के चलते मांग दब कर रह गई है और लागत भी बढ रही है। अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल  की कीमतें न्यूनतम रहने के बावजूद फ्यूल (डीजल) अभी भी काफी महंगा है। सरकार  ने सोमवार को पेट्रोल तो तीन रु लीटर सस्ता कर दिया मगर डीजल के दाम लगभग डेढ रु बढा दिए हैं। डीजल के दाम बढने से ट्रांसर्पोटेशन लागत बढती है और इसका सीधा असर खाद्य वस्तुओं पर पडता है। महंगे कर्ज के कारण ही देश  का रियल्टी सेक्टर मंदी से उभर नहीं पा रहा है। इस सेक्टर को मंदी से उभारने के लिए कर्ज को सस्ता करने की जरुरत है। इस शताब्दी के शुरुआती वर्षों में कर्ज सस्ता (लो इंट्रेस्ट रिजिम) होने के कारण रियल्टी सेक्टर में खासी तेजी बनी रही । महंगे कर्ज  के कारण देश  का मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर भी मंदी से उभर नहीं पा रहा है। यह सेक्टर अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता है।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि सरकार  मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर को उभारने के लिए वचनबद्ध है।  ताजा रिपोर्ट के अनुुसार फरवरी माह में क्रेडिट ग्रोथ से मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर में कुछ सुधार देखा गया। फरवरी में मैन्युपैक्चरिंग सेक्टर को क्रडिट ग्रोथ दस माह में सबसे ज्यादा रही है। स्पष्ट  है कि क्रेडिट का प्रवाह बढने से उत्पादन बढता है। प्रधानमंत्री के “मेक इन इंडिया“ का मूल मकसद भी  मैन्युपैक्चरिंग गतिविधियों को बढाना है। इसके तहत  सरकार अंतरराष्ट्रीय  स्तर की बडी कंपनियों को भारत में आने के लिए प्रोत्साहित तो कर रही है मगर अभी तक बहुत ज्यादा सकारातक परिणाम सामने नहीं आए हैं। यहां तक कि टोल मैन्युफेक्चरिंग रुट भी ज्यादा लोकप्रिय नहीं हो पाया है। इसकी वजह भी महंगा कर्ज  बताई जा रही है। बडी कंपनियां वहीं जाएंगी जहां उन्हें सस्ता कर्ज मिलेगा। टैक्स से संबंधित बाधाएं भी बडी कंपनियों को भारत आने से रोकती हैं। चीन में भारत की अपेक्षा कर्ज भी सस्ता है और टैक्स बाधाएं भी नहीं है। बजट में इन सब बाधाओं को दूर करने का आश्वाशन  दिया गया है। इससे स्टॉक मार्केट को रेट कट की उम्मीद नजर आ रही है। सस्ता कर्ज समय की मांग है।

मंगलवार, 1 मार्च 2016

किसका बजट, कैसा बजट?

आय और व्यय में सामंजस्य स्थापित कर सबकी जरुरतों को पूरा करना हर सफल बजट की प्रमुख विषेशता होती है। बजट परिवार को या देश  का, इसकी  विशेषताएं   सभी को  साफ -साफ  नजर  आनी  चाहिए । मोदी सरकार के दूसरे नियमित से मध्यम वर्ग  को आशा षा कम, निराशा कहीं ज्यादा हो रही है। लगभग हर वर्ग  की जेब पर “डाका“ डालने के बावजूद बजट में  बीस फीसदी पैसा कर्ज लेकर जुटाया गया है। मोदी सरकार का यह तीसरा बजट है।  अरुण जेटली 2014-15 के लिए भी नौ माह का बजट पेश   कर चुके हैं। । इस बजट में सबसे ज्यादा मार मध्यम वर्ग  पर पडी है। अधिकांश  कर रियायतें वापस ले ली गईं हैं। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों से आयकर सीमा को  संतोषजनक  स्तर तक बढाने का वायदा किया था मगर अन्यों की तरह यह वायदा भी आज तक पूरा नहीं हो पाया है। इस बार आयकर सीमा में कोई बदलाव नहीं किया गया है। तीन लाख आय वालों को आयकर में मात्र 3000 की छूट महंगाई के इस जमाने में मजाक लगती है।  हर कोई यही कहेगा कि भला यह भी कोई छूट हुई। किराये की छूट को सालान 24000 से बढाकर 60,000 रु  बडी राहत मानी  जा  सकती  है। महानगरों और बडे शहरों   में रहने वालों के लिए यह छूट भी “ऊंट के मुंह में जीरा“ जैसी लग सकती है, मगर छोटे शहरों , कस्बों और ग्रामीण क्षत्रों में कार्यरत कर्मचारियों को इससे बडी राहत मिल सकती है। बजट में नए कर्मचारियों की प्रोविडेंट फंड में पहले तीन साल के अंशदान  को सरकार द्वारा भरे जाने का लाभ उन कर्मचारियों को मिलने से रहा जिनकी कंपनियां पीएफ देती ही नहीं है।  देश  में आज भी 50 फीसदी से ज्यादा कंपनियां हैं, जो अपने कर्मचारियों को  प्रोविडेंट फंड लागू ही नहीं करती हैं और कई मामलों में पीएफ का पैसा भी हजम कर जाती हैं। जेटली ने इस मामले भी चतुराई से पीएफ निकालने पर कर लगाकर जो राहत दी है, उसे वसूल लिया है। यानी वित्त मंत्री ने जितना इस हाथ से दिया है, उससे कहीं ज्यादा उस हाथ ले लिया है। सर्विस टैक्स तो बढाया नहीं मगर आधा फीसदी कृषि  कल्याण सैस लगाकर उन सभी चीजों को महंगा कर दिया है जो आमतौर पर उपभोग की जाती है। बाहर खाना-पीना, सिनेमा देखना, हवाई यात्री करना, क्रेडिट कार्ड, इवेंटस, प्रॉपर्टी खरीदना, इन्शुरन्स   जैसी हर चीज सैस लगने से मंहगी हो जाएंगी। और-तो-और फोन करना भी महंगा हो जाएगा। पिछले ही साल मोदी सरकार ने सर्विस टैक्स को 12.36 फीसदी से बढाकर 14 फीसदी कर दिया था और अब यह 14.50 फीसदी हो जाएगा। दो साल में दो फीसदी से भी ज्यादा की बढोतरी कुछ ज्यादा ही लग रही है। दस लाख से ज्यादा कार और डीजल गाडी खरीदने पर टैक्स, कोल्ड ड्रिंक और ब्रांडिड कपडों पर भी ज्यादा टैक्स। केबल कार या उडन खटोले में सैर करने पर भी टैक्स। कोयले पर टैक्स  लगने से बिजली भी महंगी हो जाएगी।  मध्यम वर्ग  से जुडी कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिस पर कर बढाया न गया हो। ऐसे बजट पर मध्यम तबका यही कहेगा  “तौबा, मेरी तौबा“? मोदी सरकार लगता है इस सच्चाई को भूल गई है कि यह वही तबका है जो भाजपा को सत्तारुढ करने में सबसे ज्यादा सक्रिय रहा है। कहते हैं“ रियायत वही जो तुरंत राहत दे़। दस-बीस साल बाद क्या होगा, इतना सब्र किसी के पास नहीं है। बजट को किसान और  फॉर्मर फ्रेंडली  बताया जा रहा है क्योंकि इसमें फार्म सेक्टर के बजट प्रावधान को लगभग दो गुना (90 फीसदी) कर दिया गया है। किसानों को दो लाख करोड रु का कर्जा  बांटने  का प्रावधान भी किया गया है। किसान यह सब बातें नहीं जानता। कर्ज में डूबा किसान और ज्यादा कर्ज लेने की स्थिति में ही नहीं है। इस कर्ज मेंसे भी बहुत बड़ी रकम  कृषि  की आड में पूंजीपति हडप जाएंगे। जिस तरह बडे उधोगपति बैकों का कर्जा हडप कर डिफाल्टर घोषित  हो  जाते हैं, ठीक उसी तरह बडे और रसूकदार जमींदार भी कर्ज लेकर उसे लौटाते ही नहीं है । किसान को अविलंब कर्ज से मुक्ति और फसल के दामों में पर्याप्त वृद्धि की दरकार है। बजट में पहली बार जवानों का कोई उल्लेख नहीं है और इससे पूर्व  सैनिक खासे क्षुब्ध है। उधोग-व्यापार जगत ने भी सकारात्मक प्रतिकिया व्यक्त नहीं की है। बजट के बाद सोमवार सेंसेक्स 152 अंक गिरकर बंद हुआ। प्रधानमंत्री और भाजपाई भले ही जेटली के बजट को “प्रो-फार्मर, प्रो-विलेज और प्रो-पुअर“ बताएं मगर जिस बजट से ज्यादातर तबके संतुष्ट न हों, उसे “प्रो“ नहीं माना जा सकता।