बिहार में पिछले कई दिनों से जारी सियासी ड्रामे का बुधवार को पटाक्षेप हो ही गय। इस नाटक का स्क्रिप्ट पिछले साल ही लिखा जा चुका था और लगातार रिहर्सल की जा रही थी। नीतिश को अधिक विश्वसनीय सहयोगी पार्टी की दरकार थी और भाजपा को बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य की। इसीलिए नीतिश कुमार को भ्रष्टाचार पर “जीरो टोलरेंस याद आ रहा था। लालू प्रसाद परिवार के खिलाफ बेनामी संपत्ति जांच से नीतिश को गठबंधन तोडने का बहाना मिल गया। अतंत; लालू प्रसाद की राजद और कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव की बेला पर बनाए गए महागठबंधन को बाइस माह में डंप करके नीतिश कुमार ने फिर भगवा पार्टी का दामन लिया। बुधवार को महागठबंधन से पीछा छुडाने के लिए नीतिश कुमार ने पहले राज्यपाल को इस्तीफा दिया, फिर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा किया और वीरवार सुबह होते-होते मुख्यमंत्री की शपथ भी ले ली। लालू प्रसाद एंड संस देखते ही रह गए। उन्हें सरकार बनाने का अवसर तक नही दिया गया। तेजी से घटते घटनाक्रम में केन्द्र ने नीतिश का पूरा साथ दिया। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा नीत सरकार इस स्क्रिप्ट का अहम हिस्सा थी, इसलिए स्टेज पहले से ही सजा ली गई थी। इधर नीतिश ने पटना में इस्तीफा दिया, उधर दिल्ली में फौरन भाजपा के निर्णायक मंडल की बैठक हुई और नीतिश के साथ मिलकर सरकार बनाने का ऐलान किया गया। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार नीतिश कुमार द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद राज्यपाल को सबसे पहले लालू प्रसाद की पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण देना चाहिए था। लालू प्रसाद की पार्टी के विधानसभा में सबसे ज्यादा विधायक हैं, इस स्थिति में सरकार बनाने का न्यौता उन्हें दिया जाना चाहिए था। और अगर राज्यपाल को लगता राज्य में फिलहाल राजनीतिक अस्थिरता है, तो अल्पावधि के लिए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करनी चाहिए थी। संवैधानिक व्यवस्था का यही तकाजा था। मगर देश में कायदे-कानून और मर्यादाओं का सम्मान कहां किया जाता है? केन्द्र में कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा अथवा किसी और गठबंधन की, सब संविधान द्वारा प्रदत शक्तियों का खुलकर दुरुपयोग करते हैं। मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है। पहले अरुणाचल प्रदेश , फिर उत्तराखंड और अब बिहार में मीदी सरकार ने जिस तरह से संवैधानिक व्यवस्था का हरण किया है, उससे देश का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है। लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है और इसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए। कश्मीर और पूर्वोतर भारत के हालात क्या केन्द्र को इस बात का अहसास दिलाने के लिए काफी नहीं है कि अवाम की आवाज को दबाना भारत की एकता और अखंडता पर प्रहार करने जैसा है। इस तरह की कवायद से ही अवाम मुख्यधारा से छिटक जाता है। बहरहाल, बिहार में महागठबंधन से बाहर आकर भाजपा से गलबाहियां करने के लिए नीतिश कुमार काफी पहले से जमीन तैयार कर रहे थे। विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ विवशता में महागठबंधन बना तो लिया मगर लालू प्रसाद द्वारा जब-तब बाहें मरोडना उन्हें रास नहीं आ रहा था। लालू बार-बार सार्वजनिक तौर पर सबसे बडी पार्टी होने का रौब झाडते। लालू से छुटकारा पाने के लिए नीतिश उचित अवसर की तलाश में थे। और मोदी सरकार ने लालू प्रसाद के खिलाफ बेनामी संपत्ति का मामला बनाकर नीतिश को यह मौका भी दे दिया। कहते हैं “राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई परमानेंट दुश्मन' । सत्ता के लिए नीतिश ने अपने सबसे बडे प्रतिद्धदी लालू से हाथ मिलाया और अब उसी भगवा पार्टी से मिल गए जिसे जद(यू) नेता चुनाव में सांप्रदायिक बता रहे थे। इस सारे खेल में न तो नीतिश जीते हैं और न ही लालू हारे हैं। अगर कोई हारा है तो वह है लोकतंत्र। मोदी जी बधाई हो, बिहार भी कांग्रेस मुक्त हो गया है।
शुक्रवार, 28 जुलाई 2017
Congrats Modi jee For Adding Bihar To Your Kitty
Posted on 6:25 pm by mnfaindia.blogspot.com/
बिहार में पिछले कई दिनों से जारी सियासी ड्रामे का बुधवार को पटाक्षेप हो ही गय। इस नाटक का स्क्रिप्ट पिछले साल ही लिखा जा चुका था और लगातार रिहर्सल की जा रही थी। नीतिश को अधिक विश्वसनीय सहयोगी पार्टी की दरकार थी और भाजपा को बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य की। इसीलिए नीतिश कुमार को भ्रष्टाचार पर “जीरो टोलरेंस याद आ रहा था। लालू प्रसाद परिवार के खिलाफ बेनामी संपत्ति जांच से नीतिश को गठबंधन तोडने का बहाना मिल गया। अतंत; लालू प्रसाद की राजद और कांग्रेस के साथ विधानसभा चुनाव की बेला पर बनाए गए महागठबंधन को बाइस माह में डंप करके नीतिश कुमार ने फिर भगवा पार्टी का दामन लिया। बुधवार को महागठबंधन से पीछा छुडाने के लिए नीतिश कुमार ने पहले राज्यपाल को इस्तीफा दिया, फिर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने का दावा किया और वीरवार सुबह होते-होते मुख्यमंत्री की शपथ भी ले ली। लालू प्रसाद एंड संस देखते ही रह गए। उन्हें सरकार बनाने का अवसर तक नही दिया गया। तेजी से घटते घटनाक्रम में केन्द्र ने नीतिश का पूरा साथ दिया। केन्द्र में सत्तारूढ भाजपा नीत सरकार इस स्क्रिप्ट का अहम हिस्सा थी, इसलिए स्टेज पहले से ही सजा ली गई थी। इधर नीतिश ने पटना में इस्तीफा दिया, उधर दिल्ली में फौरन भाजपा के निर्णायक मंडल की बैठक हुई और नीतिश के साथ मिलकर सरकार बनाने का ऐलान किया गया। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार नीतिश कुमार द्वारा इस्तीफा दिए जाने के बाद राज्यपाल को सबसे पहले लालू प्रसाद की पार्टी को सरकार बनाने का निमंत्रण देना चाहिए था। लालू प्रसाद की पार्टी के विधानसभा में सबसे ज्यादा विधायक हैं, इस स्थिति में सरकार बनाने का न्यौता उन्हें दिया जाना चाहिए था। और अगर राज्यपाल को लगता राज्य में फिलहाल राजनीतिक अस्थिरता है, तो अल्पावधि के लिए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश करनी चाहिए थी। संवैधानिक व्यवस्था का यही तकाजा था। मगर देश में कायदे-कानून और मर्यादाओं का सम्मान कहां किया जाता है? केन्द्र में कांग्रेस की सरकार हो या भाजपा अथवा किसी और गठबंधन की, सब संविधान द्वारा प्रदत शक्तियों का खुलकर दुरुपयोग करते हैं। मोदी सरकार भी अपवाद नहीं है। पहले अरुणाचल प्रदेश , फिर उत्तराखंड और अब बिहार में मीदी सरकार ने जिस तरह से संवैधानिक व्यवस्था का हरण किया है, उससे देश का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है। लोकतंत्र में जनादेश सर्वोपरि होता है और इसका हर हाल में सम्मान किया जाना चाहिए। कश्मीर और पूर्वोतर भारत के हालात क्या केन्द्र को इस बात का अहसास दिलाने के लिए काफी नहीं है कि अवाम की आवाज को दबाना भारत की एकता और अखंडता पर प्रहार करने जैसा है। इस तरह की कवायद से ही अवाम मुख्यधारा से छिटक जाता है। बहरहाल, बिहार में महागठबंधन से बाहर आकर भाजपा से गलबाहियां करने के लिए नीतिश कुमार काफी पहले से जमीन तैयार कर रहे थे। विधानसभा चुनाव जीतने के लिए उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ विवशता में महागठबंधन बना तो लिया मगर लालू प्रसाद द्वारा जब-तब बाहें मरोडना उन्हें रास नहीं आ रहा था। लालू बार-बार सार्वजनिक तौर पर सबसे बडी पार्टी होने का रौब झाडते। लालू से छुटकारा पाने के लिए नीतिश उचित अवसर की तलाश में थे। और मोदी सरकार ने लालू प्रसाद के खिलाफ बेनामी संपत्ति का मामला बनाकर नीतिश को यह मौका भी दे दिया। कहते हैं “राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई परमानेंट दुश्मन' । सत्ता के लिए नीतिश ने अपने सबसे बडे प्रतिद्धदी लालू से हाथ मिलाया और अब उसी भगवा पार्टी से मिल गए जिसे जद(यू) नेता चुनाव में सांप्रदायिक बता रहे थे। इस सारे खेल में न तो नीतिश जीते हैं और न ही लालू हारे हैं। अगर कोई हारा है तो वह है लोकतंत्र। मोदी जी बधाई हो, बिहार भी कांग्रेस मुक्त हो गया है।
दहेज कानून का दुरुपयोग
Posted on 6:16 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दहेज कानून के दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था से उन परिवारों, खासकर बुजुर्ग दंपत्तियों, को राहत की उम्मीद जगी है, जो अब तक बेवजह दहेज कानून के बेजा इस्तेमाल से प्रताडित होते रहे हैं। वीरवार को सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि दहेज प्रताडना की शिकायतमात्र पर आरोपियों को बगैर पुख्ता सबूत के गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अभी तक दहेज प्रताडना की शिकायत दर्ज होते ही पुलिस तुरंत आरोपियों को गिरफ्तार कर उन्हें जेल में बंद कर देती है। मौजूदा एक्ट के तहत दहेज प्रताडना के आरोपियों को न तो जमानत मिलती है और नही मामला कंपाउंड योग्य है। बाद में अगर अदालत में दहेज प्रताडना की सही शिकायत झूठी निकलती है, तो उस अपराध की सजा की भरपाई नहीं की जा सकती जो आरोपी ने किया ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए (दहेज प्रताडना एवं घरेलू हिंसा) का सदुपयोग की बजाए इसका दुरुपयोग ज्यादा किया जा रहा है। निसंदेह, दहेज लोभियों को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए और इन्हें कडी से कडी सजा मिलनी चाहिए। मगर कानून को “ ससुराल अथवा पति प्रताडना “ के लिए हथियार बनाना भी गलत है। 1983 में अस्तित्व में आए दहेज प्रताडना एवं घरेलू हिंसा के तहत मात्र पीडिता की शिकायत पर ससुराल पक्ष के आरोपियों को बगैर प्राथमिक जांच के हिरासत में लेने का प्रावधान है। और इसी प्रावधान का देश में सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया गया है। ससुराल पक्ष से बदला लेने अथवा उन्हें दबाकर रखने के लिए अक्सर विवाहिता पुलिस में दहेज प्रताडना की शिकायत करती है। मौजूदा कानून के तहत अन्य मामलों की तरह दहेज प्रताडना मामले की पुलिस को प्राथमिक जांच भी नहीं करनी पडती। इस स्थिति में आरोपियों को भारी जिल्लत उठानी पडती है। उनका कई बार सामाजिक बहिष्कार तक किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह कोई नैसर्गिक इंसाफ नही है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो ( एनसीआरबी) के अनुसार दहेज प्रताडना और घरेलू हिंसा के तहत हर साल 90,000 से एक लाख के करीब सही शिकायतें दर्ज की जाती हैं और इनमेंसे दस हजार से अधिक झूठी पाई जाती हैं। अध्ययन में यह भी पाया गया है कि दहेज प्रताडना एवं घरेलू हिंसा एक्ट का देश में सबसे ज्यादा दुरुपयोग किया जाता है। ब्यूरो द्वारा जारी आंकडें बताते हैं कि भारत में आत्महत्या करने चालों में 66 फीसदी विवाहित पुरुष होते हैं। 2014 में 18,623 विवाहित पुरुषों ने “ अन्य पारिवारिक समस्या“ को लेकर आत्महत्या की थी और इस “अन्य पारिवारिक समस्या“ में दहेज प्रताडना से जुडी सही शिकायत का प्रमुख हाथ होता है। वीरवार को सुप्रीम कोर्ट ने दहेज प्रताडना एवं घरेलू हिंसा एक्ट के तहत किसी भी आरोपी की बगैर प्राथमिक जांच किए गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। अब गिरफ्तारी से पहले पुलिस को ठोंक-पीटकर शिकायत की जांच करनी पडेगी। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए हैं कि देश भर में हर जिले में फैमली वेल्फेयर कमेटी बनाई जाए। समिति दहेज प्रताडना की प्रत्येक शिकायत की जांच करेगी। और समिति की रिपोर्ट के बाद ही मजिस्ट्रेट के आदेश से ही आरोपी की गिरफ्तारी की जा सकेगी। न्यायालय ने जिला समिति के गठन की प्रकिया भी साफ तौर पर निर्धारित की है। इससे पहले जुलाई, 2014 में न्यायालय 41 बिदुंओं की चेक लिस्ट भी जारी कर चुका है। तब न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि दहेज प्रताडना के आरोपी को न्यायालय की अनुमति के बगैर पुलिस गिरफ्तार नहीं कर स्कती। सुप्रीम कोर्ट ने इस एक्ट के दुरुपयोग को रोकने के लिए केन्द्र सरकार को इसमें यथावत संशोधन का सुझाव भी दिया था। केन्द्र इस सुझाव पर विचार भी कर रही है और 498ए के तहत अपराध को कंपाउंड योग्य बनाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, दहेज प्रताडना एवं घरेलू हिंसा कानून को महिलाओं के खिलाफ अपराध रोकने की प्रभावशाली शील्ड होनी चाहिए, हथियार नहीं।
गुरुवार, 27 जुलाई 2017
जमीन खा गई, आसमान निगल गया
Posted on 7:21 pm by mnfaindia.blogspot.com/
“जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि“, इस जुमले को आधुनिक परिवेश में यूं कहा जा सकता है,“ जहां न पहुंचे सरकार, वहां पहुंचे पत्रकार। इंटरनेट के जमाने में मीडिया सरकार से भी कहीं ज्यादा सामाजिक सरोकारी हो गया है। इराक में लापता 39 भारतीयों के बारे मोसुल से ताजा अपडेट लाकर मीडिया ने मोदी सरकार को ही कटघरे में खडा कर दिया है। दुनिया के खूंखारतम आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) को मोसुल से खदेडे जाने के बाद भी 39 लापता भारतीयों के बारे कोई पुख्ता सूचना नहीं मिल रही है। लापता भारतीयों के परिजन अभी भी यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सभी 39 भारतीय इराक की किसी जेल में बंद हैं। इन लापता भारतीयों के बारे न तो भारत सरकार को कोई पुख्ता जानकारी है और न ही इराकी सरकार को। भारत की यात्रा पर नई दिल्ली पहुंचे इराक के विदेश मंत्री इब्राहिम अली जाफरी ने तो साफ-साफ कह दिया है कि उनकी सरकार को लापता भारतीयों के बारे कोई जानकारी नही हैं। इस बयान से लापता के परिजनों की चिंता बढना स्वभाविक है। केन्द्र सरकार भी 39 लापता भारतीयों के बारे ठोस जानकारी नहीं दे पा रही है। पिछले सप्ताह विदेश मंत्री सुश्री सुषमा स्वराज ने कहा था कि लापता भारतीय मासूल की बंदूश जेल में बंद हैं। मगर मीडिया ने बंदूश जाकर सरकार के इन दावों की कलई खोल दी। मीडिया ने साबित कर दिया कि बंदूश में जेल कई माह से अस्तित्व में है ही नहीं। आईएसआईएस के आतंकीं इस जेल को बहुत पहले नष्ट कर चुके हैं। जाहिर है विदेश मंत्री ने यह बयान विदेश राज्य मंत्री जनरल (सेवा निवृत) वीके सिंह और इराक में भारतीय दूतावास की ब्रीफिंग पर दिया था। विदेश राज्य मंत्री लापता भारतीयों का पता लगाने स्वंय इराक गए थे, इसलिए उनकी जानकारी को विदेश मंत्री ने पुख्ता माना। मगर मीडिया ने बंदूश जाकर सच्चाई का पता लगा ही लिया। इस प्रकरण से साफ पता चलता है कि भारत का कोई भी अधिकारी मोसुल गया ही नहीं। अगर गया होता तो सरकार को पता चल जाता कि बंदूश जेल कबकी खंडहर में तब्दील हो चुकी है। दरअसल, नौकरशाहों को भीषण युद्ध से जूझ रहे मोसुल में जाने का मादा ही नहीं है। भला बाबुओं को अपनी जान जोखिम में डालने की क्या पडी है? जनरल वीके सिंह ने भी ताजा जानकारी को पुख्ता करने की जहमत नहीं उठाई। इराक में भारतीय दूतावास के स्टाफ ने इधर-उधर से सुन-सुनाकर जो जनकारी दी, विदेश मंत्री ने अक्षरश; संसद में पेश कर दी। कांग्रेस अब विदेश मंत्री पर सदन को गुमराह करने का आरोप लगा रही है। विदेश मंत्री बेहद सुलझी हुई राजनीतिज्ञ और प्रखर वक्ता है। बुधवार को उन्होंने कांग्रेस को यह कहकर शांत कर दिया कि बगैर पुख्ता जानकारी के किसी को मृत बताना घोर पाप है। बहरहाल, पूरा मामला खामख्वाह राजनीति में उलझता जा रहा है। तीन साल पहले 40 भारतीय इराक में लापता हो गए थे। इनमेंसे एक हरजीत मसीह जैसे-तैसे भारत लौट आया था और उसने दावा किया था कि बाकी 39 भारतीयों को आईएस आतंकियों ने मार डाला। मगर न तो भारत सरकार ने और न ही लापता के परिजनों ने तब हरजीत के इस बात पर विश्वास किया । लापता भारतीयों के परिजन इस मामले को लेकर कई बार विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिल चुके हैं मगर आज तक उन्हें अपने प्रियजनों को लेकर कोई ठोस जानकारी नहीं मिल पाई है। परिजन इस बात को लेकर परेशान हैं कि आखिर 39 भारतीयों को जमीन निगल खा गई या आसमान निगल गया? अधिकांश लापता भारतीय पंजाब से हैं और इन्हें इराक भेजने के लिए परिजनों ने अपनी जमीन-जायदाद तक बेच डाली थी। अब इन परिवारों के पास न तो जमीन है और न ही कमाई करने वाला परिवार का सदस्य। केन्द्र और राज्य सरकार को इनकी मदद के लिए आगे आना चाहिए।
बुधवार, 26 जुलाई 2017
सैयद गिलानी ,यासीन मालिक, मीरवाइज को गिरफ्तार करें तो जाने
Posted on 8:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर के सात अलगाववादी (असल में आतंकी) हुर्रियत नेताओं को गिरफ्तार करके वाकई ही साहस का परिचय दिया है। हुर्रियत और अन्य अलगाववादी नेता नमक भारत का खाते हैं मगर हलाली पाकिस्तान की करते हैं। सोमवार को राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने हुर्रियत के शीर्ष नेता सैयद अली शाह गिलानी के जवांई अल्ताफ अहमद शाह उर्फ अल्ताफ फंटूष समेत सात को हिरासत में लिया और उन्हें पूछताछ के लिए दिल्ली ले जाया गया। इनमें छह को श्रीनगर से गिरफ्तार किया गया और एक को दिल्ली से। इन सभी पर आरोप हैं कि उन्हें कश्मीर घाटी में हिंसा फैलाने, सरकारी संपति को करने और स्कूलों एवं अन्य संस्थानों को जलाने के लिए लश्कर के प्रमुख आतंकी हाफिज सईद से पैसा मिलता है। इसी साल मई में एनआईए ने तीन अलगाववादी नेताओं को दिल्ली बुलाकर उनसे कडी पूछताछ की थी। तब इन नेताओं ने एनआईए को बताया था कि उन्हें कश्मीर में आतंक फैलाने के लिए पाकिस्तान की आईएसआई और अन्य आतंकी संगठनों से भरपूर आर्थिक मदद मिलती है। मई में ही एनआईए ने तहरीक-ए-हुर्रियत और जेकेएलएफ के नेताओं से श्रीनगर में लगभग चार घंटे लगातार पूछताछ की थी और इनसे हवाला चैनलो के जरिए अलगाववादी और आतंकियों की फडिंग के सुराग मिले थे। एनआईए अब तक तेरह अलगाववादी नेताओं के खिलाफ सबूत जुटा चुकी है। इस स्थिति में हुर्रियत के कुछ और नेताओं की गिरफ्तारी भी हो सकती है। बहरहाल, कश्मीर में लंबे समय से जारी आतंक और हिसा के दौर के मद्देनजर सात दोयम दर्जे के अलगाववादी नेताओं की गिरफ्तारी “ऊंट के मुह में जीराः समान लग रही है। गिरफ्तार करना ही तो सैयद गिलानी, मीरवाइज उमर फारुक और यासीन मलिक को करें। अगर गिलानी का दामाद, मीरवाइज गुट अथवा जेकेएलएफ के अदने नेता कश्मीर में आतंक फैलाने के लिए पाकिस्तान से आर्थिक मदद ले रहे हैं, तो उनके आकाओं गिलानी, मीरवाइज फारुक और कट्टर पाकिस्तानी समर्थक यासीन मलिक को क्यों बख्शा गया है? कश्मीर में 26 से अधिक अलगावादी राजनीतिक और धार्मिक संगठन सक्रिय हैं और इन सभी को सीमा पार से खुलकर आर्थिक मदद मिलती है। ये सभी संगठन पाकिस्तान द्वारा भारत के खिलाफ चलाए जा रहे “प्रॉक्सी वार“ का अहम हिस्सा है। नब्बे के दशक में कश्मीर में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पाकिस्तान प्रायोजित आतंक और अलगाववादियों की कमर तोड देने के बाद जम्मू-कश्मीर में चरमपंथी बिखरने की कगार पर थे। तत्कालीन सबसे बडा आतंकी संगठन जेकेएलफ लगभग निष्क्रिय हो चुका था। मार्च 1993, भारत के खिलाफ मिलकर लड़ने की गर्ज से 26 अलगावादी राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने ऑल पार्टी हुर्रियत क्रांफेस (एपीएचसी) बनाया। तब माना गया कि पाकिस्तान की शह पर अमेरिका के थिंक-टैंक रॉबर्ट ओकले के संगठन यूएस इंस्टीट्युट ऑफ पीस (यूएसआईपी) ने एपीएचसी को गठित करवाने में अहम भूमिका निभाई थी। बाद की घटनाओं ने इस बात की पुष्टि भी की थी। ओकले पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत रह चुके थे और उनके राजनयिक समय में अमेरिका-पाकिस्तान के द्धिपक्षीय संबंध चरम पर थे। नब्बे के दशक में सैयद गिलानी के एक हमले में जख्मी होने के बाद जब उन्हें दिल्ली के अस्पताल में भर्ती करवाया गया था, अमेरिकी एबेंसी के नुमाइंदे हर रोज उनका कुशलक्षेम लेने अस्पताल आते थे । इतना सब होने के बावजूद भी केन्द्र और राज्य सरकार हुर्रियत नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाए उन्हें पालती रही है। सरकार अलवागवादी नेताओं की सुरक्षा, विदेशी यात्राओं और अन्य सुविधाओं पर सालाना सौ करोड रु से अधिक खर्च कर रही है। ऐसा किसलिए? यह पैसा कश्मीर की अवाम को मिलना चाहिए था। अवाम “ कश्मीर की काली भेडो“ं को बखूबी पहचानती है। मंगलवार को अलगाववादियों के बंद को मिला फीका रिस्पांस इस बात का प्रमाण है। अब समय आ गया है कि कश्मीर को भारत से अलग करने की साजिश रचने वालों को जेल में बंद किया जाए।
मंगलवार, 25 जुलाई 2017
हार कर भी छा गईं
Posted on 7:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जीत के एकदम करीब पहुंच कर हार जाना बेहद कष्टदायक होता है और इससे भी ज्यादा पीडादायक होता है इस तरह की हार के अपमान का घूंट पी जाना। रविवार को इंग्लैंड में क्रिकेट के “मक्का“ लार्डस में आईसीसी क्रिकेट वर्ल्ड कप कप के फाइनल में भारत का इंग्लैंड से मात्र आठ रनों से हार जाना काफी दुखदायी है। चालीस साल के महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के इतिहास में भारत को दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का सुनहरा मौका मिला था। सेमी-फाइनल में भारत ने जिस तरह छह बार की चैंपियन आस्ट्रेलियाई पर शानदार जीत दर्ज की थी और टूर्नामेंट के पहले ही मैच में इंग्लैंड को 35 रनों से हराया था, उससे भारत के विश्व चैंपियन बनने की पूरी उम्मीद थी। फाइनल में सधी हुई गेंदबाजी कर भारत ने इंग्लैंड की बल्लेबाजों को खुलकर शॉट्स लगाने का मौका नहीं दिया। इंग्लैंड की टीम 50 ओवर्स में 228 रन ही बना पाई। इसके जवाब में भारत ने 42.4 ओवर्स में तीन विकेट गंवाकर 191 रन बना लिए थे। जीत के लिए टीम इंडिया को 44 गेंदों में 38 रनों की दरकार थी और तब लग रहा था कि भारत आसानी से जीत जाएगा। स्टेडियम में मौजूद भारतीय दर्शक जीत का जश्न मनाने की तैयारियां कर चुके थे। मगर आखिर गेंद तक रोमांचक खेल क्रिकेट अनिश्चतता से भरा होता है। 43वें ओवर के बाद ऐसा हुआ जिसकी भारत ने कल्पना तक नहीं की थी। भारत की बाकी सात खिलाडी महज 28 रन के अंदर पैवेलियन लौंट गईं। तीन खिलाडी तो खाता तक नहीं खोल पाईं। आखिरी तीन ओवर्स में भारत को 14 रन बनाने थे और उसके तीन विकेट बचे थे। और अगर बल्लेबाज एक-एक रन भी बटोरते, तो भी भारत आसानी से जीत जाता। मगर ऐसा नहीं हुआ। बडे शॉट्स लगाने के चक्कर में बाकी तीन बल्लेबाज भी पैवेलियन लौंट गईं। इग्लैंड की सीमर एन्या श्रुबसोल ने छह विकेट झटककर भारत से जीत छीन ली। भारतीय बल्ले बाज गेम के अंतिम क्षणों का दवाब झेल नहीं पाई और जीत के करीब आकर आठ रन से हार गईं। भारतीय टीम की कप्तान मिताली राज ने माना है कि भारत नाजुक क्षणों के प्रेशर को झेल नहीं पाया। भारत की हार का सबसे बडा कारण इसके मिडल आर्डर बल्लेबाजों का फ्लॉप रहना था। कप्तान मिताली ने लापरवाही से रन आउट होकर अपना विकेट गंवा दिया। स्मृति मंधाना बिना खाता खोले आउट हो गई। भारतीय टीम की फील्डिंग बेहद कमजोर रही। इंग्लैंड की बल्लेबाज स्काइवर को जीवनदान देना महंगा पडा। बहरहाल, खेल में हार-जीत तो होती ही रहती है। इस विश्व कप में भारतीय महिला टीम का शुरु से शानदार प्रदर्शन रहा। पहले ही मैच में इंग्लैंड को हराया और सेमी-फाइनल में मजबूत आस्ट्रेलिया को। फाइनल हार जाने के बावजूद भारतीय महिला टीम पूरे टूर्नामेंट में छाई रहीं। भारत को इस हार से सबक लेनी चाहिए और टीम को नाजुक क्षणों मे दबाव झेलने के लिए तैयार किया जाना चाहिए। पिछले तीन दशकों के दौरान महिला क्रिकेटरों को खासा प्रोत्साहन मिल रहा है। अब महिला क्रिकेटरों को भी पांच सितारा होटलों में ठहरने की सुविधा, चमचमाती पोशाक, विदेशी लीग मैचों में खेलने के अवसर और जीतने पर ढेरों इनाम मिलते हैं। शोहरत अलग से। मगर अस्सी के दशक में ऐसा नहीं था। तब महिला क्रिकेटरों को टेस्ट मैच खेलने के लिए मात्र एक हजार रु मिलते थे। टीए-डीए तक नहीं मिलता था। महिला क्रिकेट में तब पैसे की चमक-दमक भी नहीं थी। और न ही महिला क्रिकेट मैच के प्रति आज जैसा क्रेज था। रविवार को भारत और इंग्लैंड के बीच फाइनल मैच को दुनिया भर में टीवी चैन्लस पर लाइव दिखा जा रहा था। पहले ऐसा नही होता था। भारत के लिए यही बडी उपलब्धि है कि उसकी महिला टीम दो बार फाइनल में पहुंची है।
सोमवार, 24 जुलाई 2017
छोटी को निगल जाएगी बडी मछली
Posted on 8:02 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था (फ्री मार्केट इकॉनॉमी) में बडी मछली कैसे छोटी मछलियों को साबुत निगल जाती है, भारत के समृद्धतम उधोगपति मुकेश अंबानी का रिलायंस जियो इसकी ताजा मिसाल है। शुक्रवार को रिलायंस इंडस्ट्रीज की एनुअल जनरल मीटिंग में मुकेश अंबानी ने जियो फोन का अनावरण किया। ग्राहकों को लंबे समय से इस फोन का इंतजार था। जियो का यह फोन ग्राहकों को मुफ्त में मिलेगा और वह भी अनलिमिटेड 4जी डेटा के साथ। ग्राहकों को बतौर सिक्योरिटी 1500 रु जमा कराने पडेंगे जोकि तीन साल पूरा होने पर वापस कर दिए जाएंगे। कंपनी का दावा है कि जियो फोन में वे सारे फीचर्स मौजूद हैं, जो बाजार में तीन से साढे चार हजार रु कीमत वाले स्मार्टफोन में उपलब्ध हैं। इसे कहते हैं “हींग लगे न फटकरी, रंग आए चोखा“। बिजनेस हो तो ऐसा। कंपनी को ग्राहकों से अरबों की फंडिंग मिल जाएगी और तीन साल तक ग्राहक भी पक्के । किसी कंपनी के पास ग्राहकों का विशाल आधार तो वह कई अन्य स्त्रोतों से आय जुटा सकती है। रिलायंस कंपनी भी, संभवतय, इसी फंडे पर काम कर रही है। जियों फोन और नई स्कीमें बाहर आते ही बाजार में भारती एयरटेल और आइडिया सेल्युलर के शेयर औंधे मुंह गिर गए। एयरटेल के शेयर्स में साढे तीन फीसदी और आइडिया सेल्युलर के शेयर्स में साढे छह फीसदी की गिरावट आई। ,मुकेश के भाई अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस कम्युनिकेशन के शेयर्स तीन फीसदी गिरे। शुक्रवार को ही मुकेश अंबानी ने रिलायंस के शेयरधारकों को देश का अब तक का सबसे बडा डिविडेंट भी दिया। इससे पता चलता है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज कितनी बुलंदियों पर है। वीरवार को रिलायंस द्वारा जारी पहली तिमाही के वित्तीय नतीजों में कंपनी के शुद्ध लाभ में 9 फीसदी का इजाफा दिखाया गया था। यह विशेषज्ञों के आकलन से कहीं ज्यादा था। रिलायंस का पेट्रोकेमिक्ल्स और ऑयल-गैस खोज का कारोबार चरम पर है। रिलायंस जियो के टेलिकॉम सेक्टर में कदम रखते ही उधोग में खलबली मची हुई है, खासकर अब तक घरेलू मार्केट में लीडर माने जानी वाली एयरटेल और आइडिया सेल्युलर जैसी कंपनियां परेशान हैं। अनिल अंबानी की रिलायंस कम्युनिकेशन का तो धंधा हौ चौपट हो गया है और कंपनी भारी घाटे में चल रही है। यद्यपि मुकेश अंबानी की जियो पर भी मुफ्त स्कीमों से भारी वित्तीय बोझ पड रहा है मगर कंपनी की मजबूत वित्तीय के कारण जियो बाजार में लंबे समय तक बने रहने में सक्षम है। एयरटेल का कहना है कि कॉल कनेक्शन चार्जेज से किसी तरह का फायदा होने की बजाए रिलायंस को हर तिमाही 550 करोड रु का नुकसान हो रहा है। रिलायंस जियो का आरोप है कि एयरटेल मोबाइल टर्मिनेशन चार्जेज से ही भारी मुनाफा कमा रही है और अब तक दो बडी टेलिकॉम कंपनियां ग्राहकों से 1.2 लाख करोड रु की अतिरिक्त कमाई कर चुकी हैं। कंपनियों का नाम लिए बगैर रिलायंस का आरोप है कि इस राशि मेंसे नंबर एक कंपनी ने 73,385 करोड रु और तीसरे स्थान वाली कंपनी ने 45,940 करोड रु अतिरिक्त वसूले हैं। निसंदेह, मनमाने चार्जेज लगाकर अब तक टेलिकॉम कंपनी ग्राहकों का जमकर शोषण कर रही थी। आम ग्राहक को इस बात की कोई जानकारी नहीं होती है कि देष की रेगुलेटर एजेंसी ”ट्राई“ ने टेलिकॉम सर्वसिस के लिए क्या-क्या चार्जेज तय कर रखे हैं। कंपनियां जो वसूलती है, ग्राह्क चुपचाप उसे मान लेते हैं। रिलायंस जियो के आने से स्थिति काफी तक बदल गई है। अब कंपनियां मीडिया में विज्ञापनों के माध्यम से ग्राहकों को बता रही है कि उनके साथ अब तक कैसी-कैसी ठगी की गई है। तथापि, इस गला काट प्रतिस्पर्धा में सबसे बडा खतरा इस बात का है कि बडी मछली छोटी को निगल सकती है और अंततोगत्वा बाजार में उसका एकाधिकार हो सकता है। यह स्थिति और भी खराब है।
शुक्रवार, 21 जुलाई 2017
भारत के महामहिम राम
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दलित परिवार से संबंधित रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति चुने गए हैं। कोविंद की पृष्ठ्भूमि काफी साधारण है। उत्तर प्रदेश के कानपुर देहात में गरीब दलित परिवार से संबंधित कोविंद का देश के सर्वोच्च पद पर पहुंचना लोकतंत्र की महानता दर्शाता है। दूसरी बार दलित देश का राष्ट्रपति चुना गया है। बीस साल पहले 1997 में राजनयिक के आर नारायणन देश के पहले दलित राश्ट्रपति चुने गए थे। मिट्टी के कच्चे घर से रायसीना हिल्स के 365 कमरों के राश्ट्रपति भवन तक का रामनाथ कोविंद का सफर वास्तव में अनुकरणीय है। राश्ट्रपति चुने जाने पर कोविंद ने अपने पहले संदेष में इस बात पर जोर दिया कि अगर वे राश्ट्रपति बन सकते हैं, तो भारत का कोई भी आम आदमी देष के सर्वोच्च पद तक का सफर तय कर सकता है। महामहिम ने अपनी अति साधारण पृश्ठभूमि का उल्लेख करते हुए बरसात के उन दिनों को याद किया जब उन्हें अपने भाई-बहनों के साथ पानी बरसने पर घास-फूस से बने छप्प्पर से पानी टपकने पर दीवार से खडे रहकर रात गुजारनी पडती थी। उनकी इस बात में देष के करोडों गरीब एवं दबे-कुचलों की दुर्दषा का मर्म झलकता है। ्केन्द्र और तेरह राज्यों में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत राजग के राश्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद ने विपक्ष के साझा उम्मीदवार पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को पराजित किया है। कोविंद को निर्वाचक मंडल के 65 फीसदी से कुछ ज्यादा वोट मिले हैं। मीरा कुमार को 34 फीसदी। इस राश्ट्रपति चुनाव की सबसे बडी विषेशता यह रही है कि दिल्ली समेत कई राज्यों में विपक्ष से कोविंद के पक्ष में क्रॉस वोटिंग हुई है। कहते हैं “ इतिहास खुद को दोहराता है“। 2012 में कांग्रेस नीत संप्रग के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी ने भी भाजपा समर्थित पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा को पराजित किया था और तब भी विपक्ष से क्रॉस वोटिंग हुई थी। क्रॉस वोटिंग पर विपक्ष की उम्मीदवार मीरा कुमार का कहना था कि राश्ट्रपति चुनाव में “अंर्त्यात्मा की आवाज“ पर मतदान होना लोकतंत्र के लिए षुभ संकेत है। 1969 में देष के चौथे राश्ट्रपति चुनाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी “अंर्त्यात्मा की आवाज“ की पैरवी की थी। 24 जुलाई को वर्तमान राश्ट्रपति प्रणब मुखर्जी अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। कोविंद 25 जुलाई को राश्ट्रपति की षपथ लेंगें। आजादी के सात दषक में पहली बार देष के तीन सर्वोच्च पदों- राश्ट्रपति, उप-राश्ट्रपति और प्रधानमंत्री- पर राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता पदस्थ होंगे। राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के लिए यह गौरव की बात है। तथापि, इस स्थिति से कुछ लोग खासे चिंतित भी हैं। इसकी वजह है कि आरएसएस कटटर हिंदूवादी सोच वाली संस्था है और वह भारत के संवैधानिक धर्मनिरपेक्ष चरित्र की मुखर आलोचक है। चीन के साथ सिक्किम को लेकर ताजा सीमा विवाद में बीजिंग ने चेताया भी है कि भारत में बढता हिंदू राट्रवाद दोनों देष के बीच युद्ध का कारण बन सकता है। भाजपाइयों की असहिश्णुता और गो-रक्षा जैसे संवेदनषील मुद्दे को उछालने से अल्पसंख्यकों में पहले से असुरक्षा भावना घर चुकी है। प्रधानमंत्री की चेतावनी के बावजूद भगवा संगठनों के कार्यकर्ता देष के धर्म निरपेक्ष चरित्र को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। इससे पता चलता है कि देष किन हालात से गुजर रहा है। हाल ही की कुछ घटनाएं देष की अखंडता के लिए लिए षुभ नहीं है। देष में समान नागरिक संहिता लागू करना और अनुच्छेद 370 को निरस्त करना भाजपा के प्रमुख मुद्दे रहे हैं। रायसीन हिल्स और राज्यसभा (उप-राश्ट्रपति) जैसे सर्वोच्च पदों पर आरएसएस विचारकों का पदस्थ होना भाजपा को इन मुद्दों को लागू करने में मददगार हो सकता है। देष में धर्म निरपेक्ष लोगों के लिए यही चिंता का सबब है।
नायडू बनाम गांधी
Posted on 7:03 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भाजपा ने अपने दक्षिण भारतीय “फेस“ एवं वरिष्ठ नेता वैंकेया नायडू को उप-राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर एक तीर से कई निशान साधे है। पार्टी का यह फैसला उतना हैरतअंगेज भी नहीं है जितना राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद का चयन। लाल कृष्ण आडवानी, मुरली मनोहर जोशी , शांता कुमार जैसे दिग्गज और अनुभवी नेताओं के रहते अपेक्षाकृत कनिष्ट राम नाथ कोविंद का राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी बनाए जाने से राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट स्वभाविक है। वरिष्ठता और अनुभव में वैंकेया नायडू भी राम नाथ कोविंद पर भारी पडते हैं। नायडू जुलाई 2002 से अक्टूबर 2004 तक भाजपा के राष्ट्री अध्यक्ष भी रह चुके हैं। कोविंद दलित हैं और देश के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश से हैं, देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति पद उम्मीदवार चयन के लिए इस तरह के मानदंड क्या वाकई तार्किक और प्रासंगिक हैं? और यह भी जरुरी नहीं है कि अगर राष्ट्रपति उत्तर भारत से हो तो उप-राष्ट्रपति दक्षिण भारत से ही हो। कम-से-कम राष्ट्रपति , उप-राष्ट्रपति पदों के चयन में तो जात-पात, क्षेत्रवाद और राजनीतिक नफे-नुकसान की जगह योग्यता को तरजीह नहीं दी जानी चाहिए। वैंकेया नायडू का उप-राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाया जाना भाजपा की सामरिक विवशता भी है। उप-राष्ट्रपति राज्यसभा का सभापति भी होता है और यही इस पद की प्रमुख संवैधानिक जिम्मेदारी भी है। भाजपा नीत सतारूढ राजग गठबंधन के पास फिलहाल राज्यसभा में बहुमत नही है। संसदीय कार्यों को लेकर सबसे ज्यादा समस्या भी राज्यसभा में हो रही है। सतारूढ गठबंधन को राज्यसभा से सरकारी कामकाज निपटाने में खासी दिक्कत आ रही है। अब तक मोदी सरकार के कई अहम बिल राज्यसभा की वजह से लटकते रहे हैं। यहां तक कि जीएसटी जैसा मह्त्वपूर्ण बिल भी लंबे समय तक राज्यसभा में लटका रहा। इस स्थिति में भाजपा को ऐसे नेता की तलाश थी जो राज्यसभा का संचालन बखूबी कर सके और सरकार को “एल्डर हाउस“ को लेकर ज्यादा परेशानी न उठानी पडे। वैंकेया नायडू मूल रुप से आंध्र प्रदेश से हैं मगर अब उनका परिवार चैन्नई में बस गया है। इस लिहाज से देखा जाए तो भाजपा ने एक तीर से कई निषान किए हैं। उत्तर-दक्षिण का संतुलन भी स्थापित कर लिया गया और राज्यसभा के लिए काबिल सभापति भी मिल गया। सत्तारूढ गठबंधन के पास उप-राष्ट्रपति प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त बहुमत है। बतौर संसदीय कार्य मंत्री वैंकेया नायडू का कामकाज बेहतर रहा है। उनके राजग के अलावा कांग्रेस, जनता दल (यू), राकांपा और समाजवादी पार्टी में भी अंतरंग मित्र हैं। उन्होंने विपक्ष से जो संबंध बना रखे हैं, वह सब उनके काम आ सकते हैं। इससे पहले 2002 में भाजपा के राजस्थानी दिग्गज नेता भैरो सिंह शेखावत और 2007 में नजमा हेपतुल्ला बतौर उप-राष्ट्रपति और राज्यसभा सभापति अपना दायित्व बखूबी निभा चुकी हैं। तब भी भाजपा नीत राजग के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं था। भाजपा के वरिष्ठ नेता भैरो सिंह शेखावत के भी पार्टी के बाहर विभिन्न राजनीतिक दलों में अंतरंग मित्र हुआ करते थेे। शेखावत के राजनीति कौशल और दूरदर्शिता का लोहा विरोधी भी मानते थे। वैंकेया नायडू का कद भले ही शेखावत बराबर न हो मगर दोनों में काफी समानता है। राजनीतिक कौशल और सियासी अनुभव में नायडू अपने प्रतिद्धंदी गोपाल गांधी पर भारी पडते है़ं। गांधी, निसंदेह, विद्धान और कुशल प्रशासक है मगर उनके पास नायडू जैसा राजनीतिक अनुभव नहीं है। राज्यसभा के कुशल संचालन के लिए राजनीतिक अनुभव हो तो इसे अतिरिक्त योग्यता मानी जाती है। बहरहाल, वैंकेया नायडू के केन्द्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने पर अब मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार अनिवार्य लग रहा है। मनोहर पर्रिकर के गोवा के मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद अब रक्षा ंमंत्रालय के अलावा सूचना और प्रसारण एव शहरी विकास मंत्रालय भी खाली हो गया है। संसद के मौजूदा मॉनसून सत्र के दौरान भी मंत्रिमंडल का विस्तार हो सकता है।
गुरुवार, 20 जुलाई 2017
बरसात में साजिश की “उमस“
Posted on 8:47 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मैदानी इलाकों में बरसात में उमस जितनी परेशान करती है, उससे कहीं ज्यादा पहाडों में उफनती नदियां और नाले जनजीवन को बाधित करते हैं। और अगर भारी बारिश में अपेक्षाकृत शान्तचित लोग-बाग सडक पर उतर आएं तो समझ लीजिए मामला अति गंभीर है। पिछले एक सप्ताह से भी ज्यादा समय से देश का अग्रणी सेब उत्पादक क्षेत्र शिमला जिला अपनी “बिटिया“ के नृषंस बलात्कार और जघन्य हत्या पर खौल रहा है। कोटखाई तहसील की बीपीएल (बिलो पावर्टी लाइन) परिवार से संबंधित सोलह वर्षीय गुडिया चार जुलाई को स्कूल छूटने से पहले ही घर के लिए अकेले रवाना हुई। और यही उसके जीवन की सबसे बडी भूल साबित हुई । दो दिन बाद छह जुलाई को गुडिया का शव मुख्य सडक से लगभग दो सौ मीटर की दूरी पर बरामद हुआ। इस मासूम की बलात्कार के बाद जघन्य हत्या कर दी गई। तफतीश से पता चला कि स्कूल से घर लौटते समय गुडिया को एक गाडी चालक ने लिफ्ट दी थी। गाडी मे पांच और लोग भी थे और सब-के-सब नशे मे धुत थे। पुलिस के मुताबिक लडकी के साथ रास्ते में ही इन सभी ने पहले बारी-बारी बलात्कार किया और फिर जान से मार दिया। उसके नग्न शव के सोशल मीडिया पर वायरल होते ही समूचा हिमाचल दहल गया। पुलिस की जांच का आलम यह था कि इस इस जघन्य आपराधिक घटना के एक सप्ताह तक भी अपराधियों को पकडा नहीं जा सका। जन दबाव पडने पर खानापूर्ति के लिए आनन-फानन में 13 जुलाई को पुलिस ने छह आरोपियों को पकडा। इममे दो नेपाली मूल के और दो पौडी गढवाल के थे। हत्या-बलात्कार के प्रमुख आरोपी वाहन चालक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। बुधवार 19 जुलाई को इस प्रकरण के नेपाली मूल के एक आरोपी की कोटखाई पुलिस हिरासत में ही गला घोंटकर हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद जनाक्रोश सातवें आसमान पर पहुंच गया। क्षुब्ध जन सैलाब ने थाने पर हमला बोल दिया और इसे आग लगा दी। जनता को इस बात का जबरदस्त गुस्सा था कि सबूत मिटाने की गर्ज से पुलिस की मदद से ही आरोपी की हत्य की गई। पुलिस की इस बात पर कौन विष्वास करेगा कि आरोपियों में किसी बात पर झगडा हुआ और पुलिस की मौजूदगी में ही थाने में एक आरोपी ने दूसरे की हत्या कर दी। पुलिस की तफ्तीश में पहले ही कई छेद हैं। लड्की के साथ सडक से महज दो सौ मीटर की दूरी पर सामूहिक बलात्कार किया जाता रहा। वह चीखी-चिल्लाती रही मगर किसी को उसकी आवाज तक सुनाई नहीं दी। दो दिन तक सडक के समीप उसकी लाश पडी रही मगर, किसी भी जानवर ने उसे छुआ तक नहीं। लोगों को पूरा भरोसा है कि लडकी से किसी सुरक्षित स्थान पर बलात्कार किया गया और बाद में उसकी लाश को सडक के समीप जंगल में फेंक दिया गया। आशंका है कि असली अपराध क्षेत्र के कुछ रसूखदार लोग हैं और पुलिस उन पर हाथ डालने से पीछे हट रही है। एक जमाने में ठाकुर राम लाल इस क्षेत्र का नुमाइंदगी किया करते थे। डाक्टर वाईएस परमार के बाद वे राज्य के मुख्यमंत्री बने और बाद में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल भी रहे। इस हलके में वे खासे लोकप्रिय थे और उन्होंने एक बार इसी हलके से मौजूदा और तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को भी पराजित किया था। ठाकुर राम लाल के रहते इस हलके को हिमाचल का “जेएंडके“ कहा जाता था। कोटखाई के साथ-साथ जुब्बल भी इस विधानसभा हलके का हिस्सा है। ठाकुर राम लाल के पोते रोहित ठाकुर अब इस हलके की नुमाइंदगी कर रहे हैं। भाजपा से पूर्व मंत्री नरेन्द्र बरागटा इस हलके की नुमाइंदगी कर चुके हैं। बहरहाल, गुडिया प्रकरण ने वीरभद्र सरकार को कटघरे में खडा कर दिया है। शिमला जिला कांग्रेस का गढ माना जाता है। मगर इस प्रकरण से कांग्रेस के इस गढ में विपक्ष ने गहरी सेंध लगाई है।
मंगलवार, 18 जुलाई 2017
काहे का महागठबंधन
Posted on 8:47 pm by mnfaindia.blogspot.com/
समकालीन भारत में सियासी गठबंधन ज्यादा समय तक चल ही नहीं सकता। पिछली सदी में साठ के दशक में क्षत्रपों के सियासी गठबंधन का प्रयोग हालांकि बढते-बढते सदी के अंत तक केन्द्र में भी आजमाया गया मगर सियास दलों की अंतर्कलह ने किसी भी गठबंधन को ज्यादा समय तक नहीं चले दिया। गठबंधनों का टूटना-बिखरना बद्स्तूर जारी रहा। फिर चाहे भाजपा नीत राजग हो या कांग्रेस नीत संप्रग। सियासी गठबंधन अपनी अंतर्कलह से किस तरह बैमोत मरता है, बिहार में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद्), नीतिश कुमार के जनता दल (यू) और कांग्रेस के बीच महागठबंधन इसकी ताजा मिसाल है। लालू प्रसाद यादव, जद(यू) और कांग्रेस नेताओं के “अटूट गठबंधन“ के तमाम दावों के बावजूद बिहार का महागठबंधन लगभग टूट की कगार पर है। इस बार लालू प्रसाद यादव परिवार का कथित बेनामी संपत्ति घोटाला महागठबंधन की टूट का कारण बन रहा है। भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ का दावे करने वाले मुख्यमंत्री नीतिश कुमार चाहते हैं कि “लालू पुत्र“ उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बेनामी संपत्ति मामले में नाम आने के बाद स्वेच्छा से पद छोड दंे। तेजस्वी से त्यागपत्र मांगने अथवा उन्हें बर्खास्त करने का साहस वे जुटा नहीं पा रहे हैं। मुमकिन है तेजस्वी को हटाने की बजाए वे खुद ही हटने का नाटक मंचित करें। वे पहले भी ऐसा कर चुके हैं। लालू तेजस्वी यादव के इस्तीफे नही देने पर अडे हुए हैं। लालू की पार्टी दहाड रही है“ हमारे पास 80 विधायक हैं और तेजस्वी पार्टी के बूते उप-मुख्यमंत्री बने है। इसलिए तेजस्वी से उप-मुख्यमंत्री का इस्तीफा मांगने वाले बाहरी (नीतिश ) कौन होते हैं?“ राजद की इस दहाड में वजन भी है। राजद की तुलना में जनता दल (यू) के कम (71) विधायक होने के बावजूद लालू ने नीतिश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया था। सवाल किया जा रहा है कि मुख्यमंत्री बनने पर अथवा महागठबंधन बनाते समय नीतिश कुमार को “ भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ पर “जीरो टॉलरेस“ क्यों याद नहीं रहा? चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने के बावजूद नीतिश कुमार सत्ता पाने के लिए लालू प्रसाद से गठबंधन के लिए सहर्ष तैयार हो गए जबकि बिहार के दोनों दिग्गज अब तक एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे। तब यह समझ पाना ज्यादा मुश्किल नहीं था कि सत्तालोलुपता की गलबहियां पर “ भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ “ की आंच भी बेअसर हो रही थी। जिस देश में सियासी दल चुनाव लडने के लिए झूठ-फरेब का सहारा लेते हों, अपराधियों को पार्टी का टिकट देकर उन्हें गले लगाते हों, वहां भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ पर “जीरो टॉलरेस“ सबसे बडा मजाक लगता है। सच यह है कि नीतिष कुमार एंड कंपनी का भ्रष्टाचार पर “जीरो टॉलरेस“ तो बहाना मात्र है। वैसे भी मूल्य, सिद्धांत और स्वस्थ परपराएं भारतीय राजनीति में कोई मायने नहीं रखती। जनता पार्टी से जनता दल, फिर समता पार्टी और अंत में जनता दल (यू) तक नीतिश कुमार का लंबा सफर रहा है। और अब उनका फिर गैर-भाजपा दलों से मन उब चुका है। लालू प्रसाद से तो कुछ ज्यादा ही। गठबंधन के सत्ता में आने के बाद जैसे ही लालू प्रसाद ने नीतिश कुमार की बाहें मरोडनी शुरु कर दीं, कुमार बुरी तरह चिढ गए। इसीलिए उन्होंने लालू प्रसाद और गठबंधन को पहला झटका पिछले साल नवंबर में नोटबंदी पर दिया। ऐसे समय में जब समूचा विपक्ष नोटबंदी पर मोदी सरकार को हर तरफ से घेर रहा था, नीतिश ने नोटबंदी की तारीफ में कसीदे पढ कर न केवल लालू को अलबता पूरे विपक्ष को जोर का झटका दिया। इसके बाद से वे अनन्य “मोदी भक्त” हो गए । राष्ट्रपति चुनाव में पहले साझा विपक्ष के उम्मीदवार की पैरवी करते रहे , फिर अचानक कह दिया कि वे भाजपा उम्मीदवार का समर्थन करेंगे। नीतिश उगते सूरज को नमस्कार करते हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव को सामने रखकर नीतिश फिर भाजपा के संग जाने चाहते हैं। महागठबंधन को तो हर हाल में टूटना ही है।
सोमवार, 17 जुलाई 2017
ड्रैगन का नया पैंतरा
Posted on 7:29 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दुनिया को आंखें दिखाकर दबाना और अपनी हेकडी चलाना ड्रैगन (चीन) की पुरानी फितरत है। कहते हैं “ पुरानी आदतें बमुश्किल जाती हैं- ओल्ड हैबिट्स डाई हार्ड“। जमाना बदल गया है और कूटनीति की परिभाषा भी बदल गई है। कूटनीति के पुराने नुस्खे अप्रासंगिक हो चुके हैं और वैश्विक परिदृश्य भी मगर चीन की फितरत नहीं बदली है। अपने घरेलू मामलों में किसी का रत्ती भर भी दखल मंजूर नहीं, पर दूसरों के घरेलू मामले में टांग अडाने की चीन को जैसे लत लगी हुई है। तिब्बत को अपना घरेलू मामला बताकर चीन निर्वासित तिब्बती नेता दलाई लामा की यात्रा पर भी लाल-पीला हो जाता है मगर खुद बार-बार भारत को कश्मीर मसले में दखल की धमकी देता है। कश्मीर मसले पर पाकिस्तान और भारत के बीच मध्यस्थता की पेशक़श चीन का भारत को घेरने का ताजा पैंतरा है। भारत ने पूरी दुनिया को बता रखा है कि कश्मीर समस्या पाकिस्तान के साथ उसका द्धिपक्षीय मामला है और संयुक्त राष्ट्र समेत पूरी दुनिया अब इस स्थिति को मानती है। चीन भी भारत के इस स्टैंड से अच्छी तरह से वाकिफ हैं। सिक्किम में सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन में काफी ठनी हुई है। भारत को इस मुद्दे पर दबाने के लिए चीन ने कश्मीर में मध्यस्थता का नया पैंतरा चला है। दसों दिशाओं से घिरा चीन भारत को भी इसी तर्ज पर घेरने की फिराक में है। मगर उसका यह कदम उस पर उल्टा पड सकता है। अपने सबसे बडे विद्रोही नेता लू श्याबाओ की दुखद मौत से चीन की दुनिया भर में तीखी आलोचना हो रही है। नोबेल पुरुस्कार विजेता 61 वर्षीय लू श्याबाओ की वीरवार को चीन के अस्पताल में कैंसर से मौत हो गई। चीन की तानाशाहों ने उन्हें इलाज के लिए विदेश जाने की अनुमति तक नहीं दी। श्याबाओ माकूल उपचार के बगैर अस्पताल में तिल-तिल कर मर रहे थे, चीन को इस बात की फिक्र थी कि देश से बाहर जाने पर नोबेल पुरुस्कार विजेता तानाशाही की सारी सच्चाई उगल देंगे। लू श्याबाओ चीन में लोकतंत्र स्थापित करने के लिए शांतिपूर्ण संघर्ष कर रहे थे। 11 साल से वे जेल में बंद थे। उनकी पत्नी भी नजरबंद है। 1989 के नियानमेन विद्रोह और चीनी सेना का नरसंहार भी उनकी सामाजिक चेतना का परिणाम था। इसीलिए विद्रोही नेता को इलाज के लिए बाहर नहीं जाने दिया गया। कम्युनिस्ट पार्टी के पिंजरे में कैद तोता “मीडिया“ लू श्याबाओ को “राजसत्ता को उखाडने के लिए सजायाफ्ता“ बता रहा है। तो क्या चीन के शासक इतने कमजोर हैं कि एक अदद विद्रोही नेता से ही डर गए? 2010 में लू श्याबाओ को नोबेल पुरुस्कार से सम्मानित करने वाली समिति ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि उनकी ंमौत के लिए चीन प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। क्रवार को चीन के छह बमर हवाई जहाजों ने जापान के मियाको द्धीप पर उडाने भरीं और टोक्यों को धमकाया कि उसे इस तरहें की उडानें के लिए तैयार रहना चाहिए। उत्तर कोरिया प्रकरण के बाद चीन का यह दुस्साहस स्थिति को और तनावपूर्ण बना सकता है। दक्षिण चीन सागर में चीन, विएतनाम के अलावा मलेशिया, इंडोनेशिया फिलीपिंस और बू्रनी से उलझा हुआ है। दक्षिण चीन सागर के रास्ते हर साल पांच खरब डॉलर का व्यापार होता है, इसलिए अधिकतर देश इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय व्यापार क्षेत्र बनने के पक्ष में है मगर चीन इसके लिए तैयार नहीं है। बहरहाल, भारत और चीन के बीच मौजूदा सीमा विवाद का कूटनीतिक हल दोनों देशों के हित में है। 26 जुलाई को बीजिंग में ब्रिक्स देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों की बेठक हो रही है। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल इसमें भाग ले रहे हैं। इस दौरान चीन और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के मध्य सीमा विवाद पर बातचीत हो सकती है।
शुक्रवार, 14 जुलाई 2017
चीजें सस्ती मगर कर्ज महंगा
Posted on 6:59 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आम आदमी के लिए यह जानकारी काफी सुकून भरी है कि देश में मंहगाई (खुदरा मुद्रा स्फीति) अठारह साल के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। खाने-पीने की चीजें सस्ती होने के कारण जून माह में खुदरा मुद्रा स्फीति गिरकर 1.54 फीसदी पर आ गई है। महंगाई में आशातीत गिरावट के लिए देश को 18 साल तक इंतजार करना पडा। इससे पहले 1999 में रिटेल मुद्रा स्फीति 1.54 फीसदी के स्तर पर थी। अगर और पीछे जाएं तो अगस्त 1978 में खुदरा मुद्रा स्फीति इसी स्तर पर थी। खुदरा मुद्रा स्फीति में उपभोक्ता द्वारा रिटेल दुकान पर विभिन्न वस्तुओं के लिए चुकाई जाने वाली कीमतों को शामिल किया जाता है। ठीक एक साल पहले खुदरा मुद्रा स्फीति 5.77 फीसदी के स्तर पर थी। यानी एक साल के दौरान भारत में महंगाई में चार फीसदी से भी ज्यादा की गिरावट आई है। यह वाकई बहुत बडी गिरावट है। बुधवार को जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि जून में खुदरा महंगाई में 2.12 फीसदी की गिरावट आई है। साग-सब्जियों की कीमतों में 16 फीसदी और दाल-दहलनों की कीमतों में 21 फीसदी की गिरावट आई है। मगर दूध 4.15 फीसदी और फल 2 फीसदी महंगे हो गए। अगर ऐसा नहीं होता तो महंगाई और कम हो जाती। बहरहाल, मई में चूंकि औधोगिक उत्पादन में 1.7 फीसदी की गिरावट आई थी, इसके स्पष्ट संकेत हैं कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती व्याप्त है और इसे मंदी से उबारने के लिए मांग को उठाकर ग्रोथ को रफ्तार देने की आवश्यकता है। मगर देश का सैंट्रल बैंक आरबीआई अभी भी प्रतिबंधित नोटों को गिनने में व्यस्त है। नोटबंदी के बाद से कर्ज को सस्ता करने की मांग की जा रही थी। नोटबंदी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रोक दी थी। मगर शुक्र है इस बार जमकर पानी बरस रहा है जिससे रिकार्डतोड फसल की उम्मीद की जा रही है। नोटबंदी के बावजूद रबी की बंपर फसल हुई और अब दूसरे साल अच्छी बरसात के कारण खरीफ की बंपर फसल की उम्मीद की जा रही है। इससे जुलाई के बाद की तिमाही में भी महंगाई दो फीसदी से नीचे रहने की उम्मीद है। यही आरबीआई का खुदरा महगाई को लेकर लक्ष्य है। इस स्थिति में उम्मीद की जा रही है कि आरबीआई अगस्त में जारी होने वाली अपनी मौद्रिक नीति में ब्याज दरों में अगर ज्यादा नहीं तो 0.25 फीसदी की रियायत दे सकता है। महगांई के कम होने से सबसे ज्यादा राहत आम आदमी को मिली है। इस स्थिति में साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का “अच्छे दिन“ लाने का वायदा वास्तव में साकार हो रहा है। आम आदमी को दो वक्त का पेट भर भोजन मिल जाए, यही पर्याप्त है। किसान को उसकी फसल के वाजिब दाम मिल जाए, उसके लिए इतना ही काफी है। मेहनतकश श्रमिकों को रोजगार मिल जाए, उसके लिए इससे ज्यादा अच्छी बात हो ही नहीं सकती। किसानों के लिए केन्द्र समेत राज्यों की सरकारें काफी कुछ कर रही है। कृषि उत्पादों के माकूल दाम सुनिश्चित करने के लिए देश में मजबूत बुनियादी ढांचा खडा किया गया है। सरकार फसलों के न्यूनतम खरीद दाम भी तय करती है। मंडियों में सरकारी खरीद तक की जाती हैं। इतना सब किए जाने के बावजूद भी देश का 90 फीसदी किसाान आजादी के सात दशक बाद भी बदहाल है। यही हाल मेहनतकश श्रमिकों का है। इसके लिए देश की भ्रष्ट और लचर व्यवस्था को जिम्मेदार माना जा रहा है। सूदखोर और साहूकार अभी भी किसानों और श्रमिकों का खुलक शोषण कर रहें हैं। कानून का धडल्ले से उल्लघंन किया जाता है। और देश के सियासी नेता इसमें सबसे आगे है। निजीकरण के बाद बैंक सबसे बडे साहूकार बन गए है। सूदखोर बैंकों की मनमानी पर कोई अंकुश नहीं हे। महंगे कर्ज से व्यवस्था बद से बदतर होती जा रही है। आरबीआई को इन सब खामियों को दूर करना चाहिए।
गुरुवार, 13 जुलाई 2017
उपराष्ट्रपति पद के “गांधी“
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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी को विपक्ष ने उप-राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाकर सत्तारूढ गठबंधन को घेरने की चाल चली है। तथापि, विपक्ष की इस रणनीति में गांधी का नाम भुनाने की कोशिश गोपाल कृष्ण गांधी की योग्यता पर भारी पडती नजर आ रही है। देश में पंचायत से लेकर राष्ट्रपति उम्मीदवार का चयन विशुद्ध वोट बैंक गणित पर आधारित रहता है। वैसे उदारवादी विचारक एवं विद्धान गोपाल कृष्ण गांधी की महात्मा गांधी के पोते होने के अलावा अपनी खास पहचान है। 1968 में भारतीय प्रषासनिक सेवा में आने के बाद 1992 में उन्होने स्वेच्छा से “बाबूगिरी“ को छोड भी दिया। गोपाल गांधी कई महत्वपूर्ण ओहदों पर रह चुके हैं। वे 1985 से 1987 तक उप-राष्ट्रपति के सचिव और 1987 से 1992 तक राष्ट्रपति के सचिव भी रहे। वे नार्वे और आइसलैंड में भारत के राजदूत और दक्षिण अफ्रीका तथा लेसोथो में राजनयिक भी रह चुके हैं। 2004 से 2009 तक गोपाल कृष्ण गांधी पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे। तब इस राज्य में वाम (लेफ्ट) मोर्चे की सरकार थी। नंदीग्राम किसान आंदोलन को लेकर गाँधी ने तीस साल से बंगाल की सत्ता पर काबिज वाम मोर्चे को आडे हाथों भी लिया था। गोपाल कृष्ण गांधी विवादास्पद मामलों पर अपनी स्पश्ट राय रखने के लिए जाने जाते हैं। वे गोरक्षा और आक्रामक राजनीति के मुखर आलोचक रहे हैं और राजनीति में पारदर्शिता और नैतिकता के पक्षधर हैं। वर्तमान में गोपाल कृष्ण अशोक यूनिवर्सिटी में राजनीति और इतिहास के प्रोफेसर हैं। सत्तारुढ गठबंधन ने अभी तक अपना उम्मीदवार तय नहीं किया है मगर माना जा रहा है कि भाजपा राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) से जुडे किसी अनुसूचित जनजातीय अथवा अल्पसंख्यक को अपना उम्मीदवार बना सकती है। उप-राष्ट्रपति चुनाव के लिए पांच अगस्त को मतदान होगा। मौजूदा उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी का कार्यकाल दस अगस्त को पूरा हो रहा है। यह उनका दूसरा कार्यकाल है। उप-राष्ट्रपति राज्यसभा के सभापति भी होते हैं। यह उनकी प्रमुख संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए उप-राष्ट्रपति पद का चुनाव भी अहम माना जाता है। किसी कारणवश राष्ट्रपति का पद बीच में खाली होने पर उप-राष्ट्रपति को ही राष्ट्रपति की जिम्मेदारी का निर्वहन करना पडता है। राष्ट्रपति पद कभी खाली नहीं रह सकता। राष्ट्रपति चुनाव से अलग उप-राष्ट्रपति का चुनाव केवल सांसदों द्वारा किया जाता है जबकि राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में 784 सांसद और 4,114 विधायक हैं। विशेष बात यह है कि मनोनीत सांसद राष्ट्रपति चुनाव में मतदान नहीं कर सकते मगर उप-राष्ट्रपति चुनाव में अपना वोट डाल सकते हैं। और दूसरी विशेषता यह है कि उप-राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को मात्र 20 प्रस्तावक और 20 ही अनुमोदक की अनिवार्यता है जबकि राष्ट्रपति प्रत्याशी के लिए 50 प्रस्तावक और 50 अनुमोदक अनिवार्य हैं। उप-राष्ट्रपति चुनाव के लिए मौजूदा निर्वाचक मंडल में कुल मिलाकर 790 सदस्य हैं। इनमें राज्यसभा के निर्वाचित 233 और 12 मनोनीत सदस्य हैं। लोकसभा के 543 निर्वाचित और 2 मनोनीत सदस्य हैं। भाजपा नीत सत्तारूढ गठबंधन राजग को अन्नाद्रमुक, इनलो और बीजू जनता दल का भी समर्थन है। उप-राष्ट्रपति चुनाव से पहले 17 जुलाई को राष्ट्रपति का चुनाव होना है। इस चुनाव में कडा मुकाबला हो सकता था। एआईएडीएमके, बीजू जनता दल, आम आदमी पार्टी, इंडियन नेशनल लोक दल और आंध्र प्रदेश की स्थानीय पार्टी वाईएसआरसीपी के पास कुल राष्ट्रपति निर्वाचक मंडल के 13 फीसदी वोट हैं और संयुक्त विपक्ष के पास 35.47 फीसदी वोट। अगर समूची विपक्षी पार्टियां एकजुट हो जाती तो विपक्ष के 48.53 फीसदी और सत्तारूढ गठबंधन के 48.64 फीसदी में कडा मुकाबला हो सकता था मगर ऐसा नहीं हुआ। इस स्थिति में विपक्ष के उम्मीदवार का जीत पाना मुमकिन नहीं लग पा रहा है। योग्यता अगर उप-राष्ट्रपति चुनाव का एकमात्र मानदंड होता तो गोपाल कृष्ण गांधी शर्तिया चुन लिए जाते। दुर्भाग्यवश , देश में योग्यता को दरकिनार करने की रिवायत है ।
बुधवार, 12 जुलाई 2017
श्रद्धालुओं की “अमर यात्रा“
Posted on 6:52 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सोमवार को दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग में अमरनाथ की यात्रा से लौट रहे श्रद्धालुओं पर आतंकी हमले ने इस पवित्र यात्रा की सुरक्षा पर फिर सवाल खडे किए हैं। इस आतंकी हमले में पांच महिलाओं समेत सात लोग मारे गए और 19 लोग घायल हो गए। घायलों में कुछ पुलिसकर्मी भी शामिल है। आतंकियों का निशाना भरी बस में सवार गुजरात और महाराष्ट्र के 56 तीर्थयात्री थे। मगर बस चालक की बहादुरी से 47 तीर्थयात्रियों की जाने बच गईं। भारी गोलीबारी के बीच चालक बस को दो किलोमीटर तक चलाते हुए समीपवर्ती सैन्य कैंप तक सुरक्षित ले गया। समूचा देश इस मुसलमान बस चालक की बहादुरी को कोटि-कोटि सलाम कर रहा है। 15 साल पहले 1 अगस्त, 2000 को भी आतंकियों ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड के पहलगाम स्थित बैस कैंप पर हमला किया था और इसमें 45 तीर्थयात्री मारे गए थे। खुफिया एजेंसियों ने अमरयात्रा यात्रा के दौरान आतंकी हमले की पहले ही चेतावनी दे रखी थी। पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन लश्कर के आतंकियों ने यह हमला करवाया है। सरकार ने तीर्थयात्रियों की सुरक्षा के लिए सेना, सीआरपीएफ, बीएसएफ और राज्य पुलिस के लगभग एक लाख जवान तैनात कर रखे हैं। फिर भी आतंकी हमला हो गया। सुरक्षा एजेसिंयां इस बात का पता लगाने में जुट गईं है कि भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बावजूद आखिर सुरक्षा की चूक हुई तो कहां हुई? इस तीर्थयात्रा का संचालन अमरनाथ श्राइन बोर्ड करता है। राज्यपाल इस बोर्ड के अध्यक्ष है। जम्मू-कश्मीर में भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार है। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा है कि “इस हमले से कश्मीरियों का सिर शर्म से झुक गया है। यह हमला कश्मीरी लोकचार के खिलाफ है। कश्मीरी अपने अतिथियों की सुरक्षा की पूरी गारंटी लेते हैं“। यही बात अलगाववादी नेताओं ने भी कही है। तथापि मुख्यमंत्री और अलगाववादी नेता यह बात भूल गए है कि लोकाचार सभ्य समाज के लिए होता है, हैवान-शैतानों के लिए नहीं। आतंकियों का कोई दीन-ईमान नहीं होता। इस हमले की चौतरफा निंदा हो रही है। यहां तक कि कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने भी हमले की तीखी निंदा की है। सोषल मीडिया पर जाने-माने लेखक चेतन भगत ने कहा है “ जब जुनैद की हत्या हुई थी, तो मीडिया ने कहा था कि उसे मुसलमान होने की वजह से मारा गया। तो फिर ये क्यों न कहा जाए कि जो लोग हमले में मरे हैं, उन्हें हिन्दू होने की वजह से मारा गया है“। और यही सच्चा ई भी है। आतंकी यह बार भली-भांति जानते हैं कि हिंदू ही अमरनाथ की तीर्थयात्रा करते हैं। लोगों को इस बात का ज्यादा गुस्सा है कि भाजपा की केन्द्र और राज्य में सरकारे होते हुए भी तीर्थयात्रियों पर आतंकी हमले जारी है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा तीर्थयात्रिओं की फुलप्रूफ सुरक्षा मुहैया कराने की बडी-बडी बातें किया करती थी। विरोधस्वरुप भाजपा के गढ जम्मू में आज बंद जरुर रखा गया। लोगों को इस बात का ज्यादा गुस्सा है कि अगर सउदी अरब मस्जिद पर आत्मघाती आतंकी हमले को विफल कर सकती है तो भारतीय सुरक्षा एजेसिंयां ऐसा क्यों नहीं कर सकती। इसी साल रमजान माह जून में सउदी अरब की सुरक्षा एजेसिंयों ने मक्का में अत्मघाती हमले को विफल कर दिया था। अवाम के लिए यह दुखद स्थिति है कि तीर्थयात्री न तो सुकून से कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर पा रहे हैं और न ही अमरनाथ की यात्रा। कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हैं। घाटी में आए दिन सुरक्षा बलों पर ही आतंकी हमले हो रहे हैं। अगर सुरक्षा बल अपनी ही सुरक्षा नहीं कर सकते है, तो अवाम की सुरक्षा की गारंटी कैसे दी जा सकती है। यही यक्ष प्रष्न अवाम को खाए जा रहा है। आखिर देश किस ओर जा रहा है? अब बहुत हो गया। बडे-बडे दावे करना बंद कीजिए और कुछ करके दिखाए।
मंगलवार, 11 जुलाई 2017
जी 20 में 420
Posted on 7:04 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जर्मनी के हैम्बर्ग शहर में सपन्न जी 20 शिखर सम्मेलन में पहली बार दुनिया का सबसे ताकतवर देश अमेरिका अपनी चारसौबीसी के लिए पूरी तरह से अलग-थलग पड गया। एक तरफ दुनिया के साधन संपन्न 19 देश थे तो दूसरी तरफ अकेला अमेरिका। हर मुकाम पर हमेशा दुनिया का नेतृत्व करने वाले अमेरिका को सम्मेलन में सबसे खरी-खोटी सुननी पडी। सम्मेलन के बाहर प्रदर्शनकारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ जमकर नारे लगा रहे थे। हैम्बर्ग में हिंसक प्रदर्शन भी हुए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस के अवरोधक तोड डाले। दुकानें लूट लीं। पुलिस ने स्थिति को बेहद गंभीर बताया। हालात इस कदर बिगड गए कि अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप को अपनी गतिविधियां सिकोडनी पडी। और यह सब राष्ट्रपति ट्रंप के अखकडपन और खालिस देसी सोच का परिणाम है। अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से पीछे हट चुका है। जी 20 सम्मेलन में भी अमेरिका को मनाने की भरपूर कोशिश की गई। जी 20 में शामिल 19 मुल्कों ने पेरिस जलवायु समझौत के प्रति अपनी पूरी निष्ठां व्यक्त की है। वार्ता के अंतिम दिन हालांकि गतिरोध बना रहा मगर अंतिम समय में इसे दूर कर लिया गया और फिर से सहमति बन गई। अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से बाहर होने के फैसले को मान लिया गया। सम्मेलन के साझा बयान में कहा गया “ हम अमेरिका के पेरिस समझौते से बाहर होने के फैसले को स्वीकार करते हैं“। हैम्बर्ग शिखर सम्मेलन में शामिल 19 देश के नेताओं ने इस बात पर भी प्रतिबद्धता जताई कि समझौता अब बदला नहीं जा सकता। बहरहाल, पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका की बेदखली के अलावा हैम्बर्ग शिखर सम्मेलन की दो घटनाओं ने पूरी दुनिया का ध्यानआकर्षित किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति की पुत्री इवांका ट्रप का सम्मेलन में अपने पिता की जगह लेना काबिलेगौर रहा। ऐसा पहली बार हुआ है। इससे पता चलता है कि राष्ट्रपति की पुत्री इवांका ट्रंप और उनके पति जारेड कुशनेर का व्हाइट हाउस में कितना दखल है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात ने भी पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। सिक्किम सीमा विवाद को लेकर एक माह से भी अधिक समय से चीन और भारत के बीच जबरदस्त तनाव व्याप्त है। इस मुलाकात से ठीक पहले चीन ने कहा था कि मौजूदा माहौल वार्ता के अनुकूल नहीं है। इसके बावजूद चीनी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री ने एक-दूसरे की तारीफ के कसीदे पढे। बहरहाल, हर अंतरराष्ट्रीय मंच की बैठक की तर्ज पर इस बार भी जी 20 के नेता अपना-अपना कूटनीतिज्ञ कौशल दिखाने में ज्यादा मशगूल रहे। ट्रंप-मोदी और पुतिन की तिगडी पर पूरी दुनिया की निगाहें थी। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रुस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन का “ गोल्डन हैंडशेक“ भी काबिलेगौर रहा। पिछले साल अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में रुस पर हैंकिग के आरोपों ने व्हाइट हाउस और क्रेमलिन के बीच रिश्तों में खटास पैदा कर दी थी। इसी वजह ट्रंप-पुतिन मुलाकात पर सबकी नजरें थी। इस मुलाकात के कारण ही सीरिया में युद्ध विराम पर भी सहमति बन पाई है। जी 20 के हैम्बर्ग शिखर सम्मेलन में वैश्विक संसाधनों के समान बंटवारे पर भी जोर रहा है। हैम्बर्ग में प्रदर्शनकारी संसाधनों के न्यायपूर्ण और समान बंटवारे की जोर-शोर से मांग कर रहे थे। पेरिस जलवायु समझौते को अमली जामा पहनाने के लिए यह बेहद जरुरी है। अमेरिका के इस समझौते से हटने के बाद इसे लागू करने में संसधान आडे आ सकते हैं। मगर अमेरिकी मदद को कैसे पाटा जाएगा, इसकी स्पष्ट रुपरेखा नहीं बनाई गई है। हैम्बर्ग शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उठाए गए आतंकवाद के मुद्दे पर भी सहमति बनी है और इसके खात्मे के लिए प्रतिबद्धता जताई गई है। चीन भी इस मुद्दे पर सहमत है। भारत के लिए यह बडी उपलब्धि है।
सोमवार, 10 जुलाई 2017
चीन की सामरिक मजबूरी
Posted on 7:23 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जर्मनी के हैमबर्ग में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राश्ट्रपति षी जिनपिंग के बीच “ग्रेट हैंडशेक“ से मौजूदा तनावपूर्ण संबंधों में “हिंदी-चीनी“ भाई-भाई जैसी गर्मजोशी दिख रही है। चीन का हाथ मिलाना भी उतना ही भ्रामक है जितना साठ के दशक में “हिंदी-चीनी, भाई-भाई का नारा”। पिछली बार दोनों नेताओं के बीच कजाखस्तान की राजधानी अस्ताना में मुलाकात हुई थी। तब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि जिस समय दोनों नेता हाथ मिला रहे थे, उधर चीनी सैना भूटान की संप्रभुता का हनन कर रही थी। चीन डोकलाम से भूटान के सैन्य कैंप जोंमेली तक चौडी सडक का निर्माण करने पर आमादा है। इस सडक के बनने से भारत-भूटान-चीन के कूटनीतिज्ञ त्रिकोण की परिभाषा ही बदल सकती है। इसी लक्ष्य को सामने रखकर चीन ने पठारी क्षेत्र डोकलाम में अपनी सेना तैनात कर रखी है। और भारत ने जब भूटान की मदद के लिए वहां अपनी सेना भेजी है, चीन धमकी-दर-धमकी पर उतर आया है। पिछले एक माह से भी ज्यादा समय से चीन और भारत के बीच इन सीमा विवाद को लेकर जबरदस्त तनाव चल रहा है। सच यह है कि एशिया की दो बडी ताकतें -चीन और भारत- इस मामले में घरेलू विवशताओं से बंधे हुई हैं, इसलिए तनाव को कम करने के लिए मोदी और जिनपिंग का गर्मजोशी से हाथ मिलाना भी उम्मीद की किरण नजर आ रही है। बहरहाल, दसों दिशाओं से घिरा चीन इस समय भारत से पंगा (युद्ध करने) लेने की स्थिति में नहीं है। उत्तर कोरिया के मामले में चीन की खासी फजीहत हुई है। अब तक यह माना जा रहा था कि “बेलगाम“ उत्तर कोरिया को केवल चीन ही नियंत्रण कर सकता है। इसी स्थिति के मद्देनजर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार चीन से उत्तर कोरिया को समझाने के लिए कहते रहे हैं। उत्तर कोरिया के ताजा रुख से साफ है कि उस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है। एक जमाने में म्यांमार भी चीन के नियंत्रण में हुआ करता था मगर अब वह भी चीन की नही मानता है। भारत की ताकत से भयभीत पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश है जो चीन की शरण में है मगर उसके घरेलू हालात इतने खराब हैं कि पाकिस्तान नेताओं की अपने ही देश में कोई नहीं सुनता है। चीन की इस समय सबसे बडी दुविधा उत्तर कोरिया को लेकर है। बार-बार चेतावनी के बावजूद प्योंगयांग (उतर कोरिया) अमेरिका को चुनौती देने के लिए मिसाइल-दर-मिसाइल का टेस्ट कर रहा है। चीन भी उसे रोक नहीं पा रहा है। उत्तर कोरिया ने दो दिन पहले मिसाइल को जापानी क्षेत्र में गिराया था। अमेरिका और जापान कभी भी उत्तर कोरिया पर हमला कर सकते हैं। चीन की दुविधा है कि जिगरी दोस्त होते हुए भी चीन हमले की स्थिति में उत्तर कोरिया की खुली मदद नहीं कर सकता और न ही उसे अकेला छोड सकता है। उत्तर कोरिया को अब तक चीन से ही सैन्य और सामरिक मदद मिलती रही है। चीन अगर उत्तर कोरिया का साथ छोडता है तो दुनिया उस पर दोस्त को संकट के समय मंझधार में छोडने का तोहमद लगाएगी। दुनिया का कोई भी मुल्क चीन की दोस्ती पर भरोसा नहीं करेगा। अगर मदद करता है तो दुनिया कहेगी चीन ने तानाशा ह की मदद की है। इतना ही नहीं दक्षिण चीन सागर में चीन, अमेरिका और उसके मित्र देशों से भी युद्ध के मुजाने पर है। शुक्रवार को अमेरिका के दो बमर हवाई जहाजों ने दक्षिण चीन सागर का मुआयना करके चीन को सीधी चुनौती दी है। उत्तर कोरिया और दक्षिण चीन में पहले से चौतरफा घिरा चीन ताजा हालात में भारत से पंगा लेने की स्थिति में नहीं है। इसी वजह चीनी राष्ट्रपति जिनपिंग ने मोदी से मुलाकात की जबकि पहले चीन जोर-शोर से इस बात का ढिंढोरा पीट चुका था कि मौजूदा तनावपूर्ण हालात में बातचीत नहीं हो सकती। तथापि, काइंया चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
शुक्रवार, 7 जुलाई 2017
असंवैधानिक नियुक्तियां क्यों?
Posted on 8:38 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कानून की काट कैसे की जाए, देश के सियासी नेताओं को इसमें खासी निपुणता हासिल है। देश की संसद ने 2003 में कानून बनाया था कि मंत्रिमंडल का आकार कुल सांसदों अथवा विधायकों की संख्या का 15 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता है। इसके लिए संविधान में बाकायदा संशोधन (91वां) भी किया गया। संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) के तहत यह संवैधानिक व्यवस्था जनवरी 2004 से लागू है। इसके बावजूद यह जानते ही भी कि मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव के पद असंवेधानिक हैं, विभिन्न राज्यों में सत्तारूढ दल अक्सर ऐसी नियुक्तियां करते हैं। और सबसे अधिक आश्चर्यजनक काम देश में “साफ -सुथरी और समकालीन सियासत में क्रांतिकारी बदलाव“ का दम भरने वाले अरविंद केजरीवाल ने भी वही संवैधानिक गुनाह किया जो अन्य राजनीतिक दल करते रहे हैं। बुधवार को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा में चार मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियां निरस्त कर दीं। इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इससे पहले सितंबर, 2016 में दिल्ली उच्च न्यायालय आम आदमी पार्टी सरकार के 21 संसदीय सचिव की नियुक्तियां निरस्त कर चुका है और अब इन विधायकों पर उनकी सदस्यता तक निरस्त होने का खतरा मंडरा रहा है। केजरीवाल ने अपने प्रचंड बहुमत का बेजा इस्तेमाल भी किया। मार्च 2015 में 21 संसदीय सचिव नियुक्त किए और फिर इन असंवैधानिक पदों को वैध बनाने के लिए जून में दिल्ली विधानसभा में संशोधित बिल पारित करवाया। मगर हाई कोर्ट ने यह सब नहीं माना। पंजाब में तत्कालीन अकाली-भाजपा सरकार ने भी कानून को बखूबी ठेंगा दिखाया और दो दर्जन मुख्य संसदीय सचिव नियुक्त करके संविधान का खूब मखौल उडाया। अगस्त, 2016 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट इन मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्तियों को असंवैधानिक बता चुका है। 2005 में हिमाचल हाई कोर्ट ने अपनी व्यवस्था में साफ-साफ कहा था कि संसदीय सचिवों की नियुक्तियां मंत्रिमंडल के आकार संबंधी कानून की खुला उल्लंघन है और उनकी नियुक्तियां करके सरकार का मुखिया संविधान के अनुच्छेद 164(1ए) का भी अपमान कर रहा है। 2009 में बांबे हाई कोर्ट भी ऐसी ही व्यवस्था दे चुका है। अब हरियाणा में भाजपा सरकार ने वही काम किया है, जिसकी वह स्वंय मुखर आलोचक रही है। देश के लॉमेकर्स ने 2003 मे गहन विचार-विमर्श के बाद भारी-भरकम मंत्रिमंडल आकार को सीमित करने के लिए 91वां संशोधन किया था। तब केन्द्र में भाजपा नीत राजग की सरकार पदस्थ थी। यह बात वास्तव में दुखद है कि भाजपा सरकार भी असंवैधानिक काम कर रही है जबकि पार्टी खुद को औरों से कुछ अलग कर दिखाने का दम भरती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान लोगों से “ न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन (मिनिमम गवर्नमेंट, मेक्सिमम गवर्नेंस) का सुचिता वायदा किया था। तो क्या मोदी के सिपल सलाहकार प्रधानमंत्री के इस वायदे को भूल चुके हैं। दिल्ली में भाजपा आप सरकार के 21 संसदीय सचिव की फौज की मुखर आलोचक रही है। भारत में अक्सर विदेशों में नियुक्त संसदीय सचिवों की नियुक्तियों का हवाला दिया जाता है। कनाडा, इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, आयरलैंड और मलेशिया में मंत्रियों की सहायता के लिए संसदीय सचिवों को नियुक्त करने की परंपरा है मगर इन मुल्कों में प्रधानमंत्री इनकी नियुक्ति करता है। ईसके लिए बाकायदा कानून भी बनाया गया है। भारत में 91वां संशोधन पारित होने से पहले राज्यों में राज्य मंत्री और उप मंत्री नियुक्त करने की परंपरा थी। मगर मंत्रिमंडल का आकार तय होने के बाद इन पदों की कोई अहमियत नही रह गई। इनकी जगह असंवैधानिक मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव पदों ने ले ली है। अब समय आ गया है कि इस मामले में स्पष्ट संवैधानिक व्यवस्था की जानी चाहिए।
गुरुवार, 6 जुलाई 2017
कहां है एक राष्ट्र , एक टैक्स ?
Posted on 7:20 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पहली जुलाई, 2017 से लागू गुडस एंड सर्विसेज टैक्स से क्या पूरे देश में एक समान टैक्स दरें हैं? और क्या जीएसटी से “एक राष्ट्र , एक टैक्स“ का सपना साकार हो गया है। प्रधानमंत्री द्वारा परिभाषित गुड एंड सिंपल टैक्स को लेकर आम व्यापारी के मन में अभी भी कई शंकाएं हैं। सबसे गहरी शंका टैक्स के चार स्लैब को लेकर है। सरकार ने 5, 12, 16 और 28 फीसदी की चार दरें तय की है मगर अधिकतर वस्तुओं और सेवाओं को 12 एवं 18 फीसदी जीएसटी के दायरे में रखा गया है। एक हजार से अधिक वस्तुओं और सेवाओं की दरें तय हो गई हैं मगर पेट्रोलियम, बिजली, शराब और रियल एस्टेट को जीएसटी में शामिल नहीं किया गया। पेट्रोलियम पदार्थ , बिजलौ और शराब की भारत में सबसे ज्यादा खपत होती है। अब सवाल यह है कि आम आदमी से जुडी इन अहम वस्तुओं अथवा सेवाओं को जीएसटी से बाहर क्यों रखा गया है। और अगर इन चीजों को जीएसटी से बाहर ही रखना था तो “एक राष्ट्र , एक टैक्स “ का दावा क्यों किया जा रहा है। भला यह भी कोई बात हुई कि चंडीगढ जैसे ट्राईसिटी में पेट्रोल के अलग-अलग दाम हों। दिल्ली में पेट्रोल-डीजल जिस दाम पर मिलेगा, जयपुर, लखनऊ, पटना अथवा मुंबई में उस पर नहीं मिलेगा। दिल्ली में बिजली दरें कुछ होंगी तो गुरुग्राम- फरीदाबाद में कुछ और। दिल्ली में शराब के जो दाम होंगे मगर नोएडा अथवा चंडीगढ में वह नहीं होंगे। राज्यों की असहमति के कारण यह स्थिति बनी है। दरअसल, शराब और पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाली आबकारी ड्यूटी और रीयल इस्टेट की स्टांप डयूटी से राज्यों को भारी-भरकम राजस्व आता है। इसलिए राज्य इन वस्तुओं को जीएसटी के दायरे में लाने के लिए कतई तैयार नहीं थे। रीयल एस्टेट और शराब में सबसे ज्यादा काला धंधा होता है। इस स्थिति में इन्हें जीएसटी से बाहर रखने का मतलब है काले धन को फलने-फूलने की पूरी छूट देना। इन चार चीजों को जीएसटी से बाहर रखने की राज्यों की मांग का माना जाना केन्द्र की कमजोरी बताई जा रही है। शराब को जीएसटी से बाहर रखे जाने के साफ-साफ अर्थ हैं कि केन्द्र और राज्यों की सरकारें शराब माफियों के आगे नतमस्तक हो गई हैं। इससे शराब को मिलने वाली छूट भी जारी रहेगी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि शराब और रीयल एस्टेट का जीएसटी के दायरे में लाए जाने से काले धन पर नियंत्रण किया जा सकता था मगर समकालीन सरकार ने बहुत बडा मौका गंवा दिया है। पूंजीपतियों को खुश करने के लिए सरकार ने बिजली और पेट्रोलियम पदार्थों को भी जीएसटी से बाहर रखा है। बिजली और पेट्रोलियम का तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। इस बात के मद्देनजर सरकार पूंजीपतियों से टकराव नहीं चाहती है। हैरानी इस बात की है कि गरीबों के लिए विशेष रुप से खोले गए जन-धन खाते को चलाने के लिए खाताधारियों को आठ फीसदी सर्विस टैक्स देना होगा। और तो और जीएसटी के बाद घरेलू एलपीजी सिलेंडर भी 32 रु महंगा हो गया है। इसके विपरीत शिक्षा पर कोई जीएसटी नहीं लगाया गया है जबकि निजी स्कूल्स मोटा मुनाफा कमा रहे हैं। जीएसटी से छोटे कारोबारियों को भी कोई फायदा नहीं होगा। अमूमन, कारोबारी स्थानीय मार्केट से ही माल खरीदता है और अपना उत्पाद भी वहीं बेचता है। इस स्थिति में छोटे कारोबारियों को कोई फायदा नहीं होगा। इस सच्चाई को भी सभी जानते हैं कि जीएसटी को लागू करने के लिए विदेशी निवेशकों का भारी दबाव था। विदेशी कंपनियां अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग टैक्स से खासी परेशान थी। जीएसटी से विदेशी कंपनियों को सबसे ज्यादा फायदा होगा। बहरहाल, जीएसटी लागू होने के बावजूद “ एक राष्ट्र , एक टैक्स“ व्यवस्था लागू नहीं हो पाई है।
बुधवार, 5 जुलाई 2017
मोदी की इसराइल यात्रा
Posted on 6:56 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चौतरफा मुस्लिम देशों से घिरा इसराइल अरब में अकेले अपने दमखम पर दुश्मनों के नाको चने चबाए हुए है। दुश्मनों से अपने अस्तित्व को बचाए रखना उसकी विवशता भी है और ताकत भी। इसराइल दुनिया का एकमात्र ऐसा देश हैं, जहां यहूदी बहुसंख्यक हैं। 20,770 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में बसा इसराइल हिमाचल प्रदेश से आधा भी नहीं है। इसकी आबादी 84 लाख की आबादी (2015 की जनगणना के अनुसार) हिमाचल प्रदेश से थोडी सी ही ज्यादा है। हिमाचल प्रदेश बनने के ठीक एक माह बाद 14 मई, 1948 को दुनिया का पहला यहूदी देश अस्तित्व में आया था। हिमाचल प्रदेश 15 अप्रैल, 1948 को अस्तित्व में आया था। तथापि, पूरी दुनिया इस छोटे से देश की सैन्य ताकत का लोहा मानती है। इसके पास अत्याधुनिक न्यूक्लियर हथियार हैं। दुनिया की चौथी बड़ी वायु सेना है। इतने उम्दा हथियार कि दुश्मनों की न्यूक्लियर मिसाइलें भी इसराइल के आसमानी सुरक्षा कवच को भेद नहीं सकती। 1972 के म्युनिक ओलिंपिक मेँ अपने खिलाड़यों के नर संहार से क्रोधित इसराइल की मोसाद एजेन्सी ने कातिलों को दुनिया के अलग -अलग कोने ढूंढ कर मारा डाला था। अपनी सैन्य ताकत के दम पर ही इसराइल का अस्तित्व बरकरार है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इसराइली सेना के मुरीद हैं। 18 अक्टूबर, 2016 को हिमाचल प्रदेश में मंडी की जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, “ आजकल पूरे देश में हमारे सैनिकों के पराक्रम की चर्चा हो रही है। पहले कभी इसरायली सेना ने ऐसा किया, सुनते थे“। मंगलवार को राजधानी तेल अविव के एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में भी इसराइल की अनुकरणीय तरक्की और कडे परिश्रम की तारीफ करते हुए कहा कि यहां के लोगों से काफी कुछ सीखा जा सकता है। मगर दुनिया भर के मुसलमान आज भी इसराइल को “ अरब की जमीन का अवैध कब्जाधारी“ मानते हैं। 1948 में ही पडोसी देशों ने इसराइल पर हमला बोल दिया था। उनकी कोशिश इसराइल को नष्ट करने की थी मगर वे इसमें सफल नहीं हो पाए। 50 साल पहले 1967 में इसराइल देशों के बीच भीषण युद्ध छिडा था पर यह छह दिन चला मगर इस युद्ध का असर आज भी समूचे अरब पर साफ दिखाई देता है। विज्ञान और उन्नत प्रोद्योगिकी के बलबूते इसराइल ने रेतीले भूभाग को भी अत्याधिक उपजाऊ बनाया है। प्रतिकूल परिस्थितियों में ड्रिप सिंचाई से लेकर नेचुरल पेस्टीसाइटस के बलबूते खारी और शुष्क मिट्टी से इसराइली किसान देश की 95 फीसदी खाधान्न की जरुरतें पूरी कर रहे हैं। बहरहाल, भारत और इसराइल में भोगोलिक और सांस्कृतिक समानता न होते हुए भी दोनों की सामरिक जरुरतें एक जैसी है। भारत की तरह इसराइल भी आतंक से बुरी तरह पीडित है। जिस तरह पडोसियों को इसराइल का अस्तित्व स्वीकार्य नहीं है, उसी तरह पडोसी पाकिस्तान को भी भारत का अस्तित्व फूटी आंख भी नहीं सुहाता है। नरेन्द्र मोदी इसराइल की यात्रा करने वाले देश के पहले प्रधानमंत्री हैं। भारत और इसराइल की बीच गत 25 सालों से डिप्लोमैटिक संबंध तो हैं मगर इससे ज्यादा अब तक कोई बडी कूटनीतिक पहल नही हो पाई है। हां, पिछले कुछ सालों से हिन्दुवाद और यहूदीवाद के बीच सकारात्मक समानताएं खोजने की कोशिशे जरुर हुईं है। भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा से उत्साहित इसराइल उनके लिए पलक-पावडे बिछाए हुए हैं। इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने खुद एयरपोर्ट पर भारतीय प्रधानमंत्री की अगवानी की । इससे पहले इसराइल ने अब तक अमेरिकी राश्ट्रपति और पोप को ही ऐसा राजकीय सम्मान दिया है। प्रधानमंत्री की इसराइली यात्रा को दोनों देशों के बीच द्धिपक्षीय संबंधों के लिए चरमोत्कर्ष माना जा रहा है। भारत और इसराइल मिलकर आतंक के खिलाफ साझा लडाई लड सकते हैं। मगर प्रधानमंत्री की इसराइल यात्रा से अरब देशों के प्रति भारत की नीति में किसी बदलाव की कोई गुजाइंश नहीं है। अरब के मुस्लिम देशोँ की जरा भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद भी इसराइल के प्रति हमारी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। इतना जरुर है कि प्रधानमंत्री की इसराइल यात्रा से कुछ देशों की भौंहें तन सकती हैं।
मंगलवार, 4 जुलाई 2017
महिलाओं पर अत्याचार कब तक ?
Posted on 8:00 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लखनऊ में गैंग-रेप पीडिता पर चौथी बार एसिड अटैक से उत्तर प्रदेश को क्राइम फ्री बनाने के आदित्यनाथ सरकार के दावे बौने नजर आ रहे हैं। राजधानी लखनऊ स्थित वर्किंग वूमेन हास्टल में गत शनिवार सायं गैंग रेप पीडिता छात्र पर अचानक एसिड फैंका गया। जिस जगह एसिड फैंका गया, वहां से कुछ मीटर की दूरी पर सुरक्षा गार्ड खडा था। जाहिर है पीडिता को आरोपियों के खिलाफ खामोश रहने के लिए यह अटैक किया गया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस एसिड अटैक को “साजिश “ बताकर पीडिता के जख्मों पर नमक छिडका है। योगी ने लखनऊ के एक निजी चैनल से कहा कि छात्रावास की सुरक्षा व्यवस्था इतनी कडी है कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता। इसके बावजूद रेप पीडिता पर एसिड अटैक का वाक्या कैसे हो गया“? “ये घटना सचमुच की घटना है या फिर घटना के नाम पर कुछ लोग केवल बदनाम करने की साजिश रच रहे हैं“? मुख्यमंत्री का यह बयान वाकई ही दुखद है। रेप पीडिता अपने पर एसिड अटैक करवाकर सरकार को बदनाम करने की साजिश रचने से रही। अपनी नाकामी छिपाने के लिए अक्सर सियासी नेता “साजिश “ का सहारा लेते हैं। पीडित महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पीडिता लखनऊ के एक कैफे मे काम करती है जो एसिड अटैक पीडितों द्वारा चलाया जा रहा है। 2009 में गैंग रेप के बाद पिछले आठ सालों में पीडिता पर कई बार एसिड अटैक किया जा चुका है। इस साल मार्च में अपने गांव से लखनऊ लौटते समय ट्रेन में दंबगों ने पीडिता के गले में बलपूर्वक एसिड डाल दिया था। तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पीडिता का अस्पताल में कुशलक्षेम भी पूछा था और मुआवजा भी दिया था। पीडिता दो बच्चों की मां है। गैंप रेप पीडिता पर ताजा एसिड अटैक देश में महिलाओं की बदहाली को बयां करता है। मां-बेटियों की सरेआम अस्मत लूटना तो जैसे दबंगों का शौक बना हुआ है और कानून भी इनका कुछ नहीं बिगाड सकता। बलात्कारियों की दबंगई से अक्स पीडिता और उसके परिजन डर जाते है। जो डरते नहीं है, उनका लखनऊ की इस पीडिता जैसा हश्र होता है। गैंग रेप पीडिताएं खुली हवा में सांस लेना तो दूर, भारी सुरक्षा बंदोबस्त में भी सांस नहीं ले सकतीं। कानून में व्याप्त खामियों का फायदा उठाकर अधिकतर बलात्कारी साफ बच निकलते हैं। भारत में न्याय प्रकिया साक्ष्यों पर आधारित है और रेप की स्थिति में न के बराबर साक्ष्य जुटाए जा सकते है़ं। सबसे बडी खामी यह है कि अक्सर दबंगों अथवा सा सामाजिक दबाव में पीडिता नरम पड जाती है। भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 326ए के तहत एसिड अटैक करने वाले को उमर कैद की सजा का प्रावधान है। 2013 में पहली बार एसिड अटैकर के लिए अलग से 326बी कानून बनाया गया है। तथापि दबंगई बलात्कारियों के लिए यह कानून भी नाकाफी है। एसिड अटैक के 85 फीसदी से भी ज्यादा मामले महिलाओं से संबंधित होते हैं। आंकडों के अनुसार 2010 से 2014 के दौरान 60 फीसदी मामलों में एक साल तक भी अदालत में चार्जशीट तक दाखिल नही हुई थी। 81 फीसदी एसिड अटैक आरोपियों को तुरंत जमानत मिल जाती है़। 49 फीसदी गायब होकर कानून को ठेंगा दिखाते हैं। महिला से गैंग रेप करने के बाद उस पर एसिड अटैक करना अत्याधिक जघन्य अपराध है और यह कृत्य मानवीय संवेदना की तमाम सींमाएं लांघ जाता है। ऐसे अपराधियों को कानून में कडी से कडी और त्वरित सजा का प्रावधान होना चाहिए। भारत में एसिड की सहज उपलब्धता भी एसिड अटैक को आसान बना देता है। देश में डाक्टर की प्रिस्क्रिपन के बगैर दवाएं मिल जाती हैं तो एसिड का मिलना कोई मुश्किल काम नहीं है। नूडल्स की तरह एसिड बिकता है। 2013 के कानून की एसिड की उपलब्धता के लिए नियम तो बनाए गए हैं मगर इन पर कडाई से अमल नहीं होता है। महिलाओं को त्वरित न्याय मिले, सरकार को कानून में व्याप्त खामियों को अविलंब दूर करना चाहिए।
सोमवार, 3 जुलाई 2017
गोभक्ति के नाम पर गुंडागर्दी
Posted on 6:58 pm by mnfaindia.blogspot.com/
गुजरात के साबरमती से हमेशा देश को अनुकरणीय संदेश मिलता रहा है। अहमदाबाद के निकट साबरमती नदी के किनारे महात्मा गांधी का आश्रम आज भी बापू के आदर्शों को तरोताजा करता है। महात्मा गांधी ने इस आश्रम में बारह साल गुजारे थे। इसी आश्रम के कारण उन्हें सामरमती का संत भी कहा जाता है। आश्रम के सौ साल पूरे होने पर वीरवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साबरमती में थे। इस अवसर पर मोदी ने “बेलगाम“ तथाकथित गो-रक्षकों को फटकारने के लिए न केवल साबरमती को चुना, अलबत्ता “ गोभक्त साबरमती के संत“ को भी उद्धृत किया। गोभक्ति के नाम पर हो रही हत्याओं की भर्त्सना करने के लिए प्रधानमंत्री ने गांधीवादी आचार्य विनोबा भावे का भी सहारा लिया। मोदी ने कहा,“ गोभक्ति के नाम पर हत्याएं स्वीकार नही है। महात्मा गांधी भी कभी इससे सहमत नहीं होते। महात्मा गांधी गाय के अनन्य भक्त थे। अपनी पुस्तक “हिंद स्वराज“ में गोरक्षा पर विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था,“ मै गाय को पूजता हूं। गाय हिंदुस्तान की रक्षा करने वाली है। गाय कई तरह से उपयोगी है और इसे मुसलमान भी कबूल करेंगे“। इसके साथ ही महात्मा गांधी ने यह भी कहा था “ जैसे मैं गाय को पूजता हूं। वैसे ही मनुष्य को भी पूजता हूं। जिस तरह गाय उपयोगी है, उसी तरह मनुष्य भी, फिर चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, उपयोगी हैं। तो फिर क्या गाय को बचाने के लिए मैं मुसलमान से लडूंगा? उसे मारूंगा़? ऐसा करने से मैं गाय और मुसलमान दोनों का दुश्मन हो जाऊंगा“। महात्मा गांधी को उद्धृत करके प्रधानमंत्री गोभक्तों को यही समझाना चाहते थे कि हिंसा किसी भी समस्या का हल नहीं है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा , “ हम कैसे लोग हैं गाय के नाम पर इंसान को मारते हैं। इंसान की हत्या करना कैसी गो-रक्षा है? मुसलमानों की हत्या करके गाय की रक्षा करना भी उतना ही बडा पाप है, जितना गाय की हत्या करना। तथापि, प्रधानमंत्री की फटकार के बाद देश में गोभक्ति के नाम पर हो रही ह्त्याएं बंद हो जाएंगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसके विपरीत भगवा पार्टी से जुडे संगठन प्रधानमंत्री की इस बात को “इस कान से सुन दूसरे से बाहर निकाल“ देंगे। शुक्रवार को इसकी एक बानगी सामने आई। विश्व हिंदू परिषद ने साफ-साफ शब्दों में कहा कि अधिकांश गोभक्त कानून के रखवाले हैं और इनका सम्मान किया जाना चाहिए। अगर कुछ लोग अपराध करते हैं तो सम्पूर्ण गोरक्षकों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। विहिप काफी समय से गोहत्या बंदी के लिए केन्द्रीय कानून बनाए की मांग कर रहा है। प्रधानमंत्री की फटकार के बाद विहिप और ज्यादा मुखर हो गई है। विहिप का कहना हे कि महात्मा गांधी और विनोबा भावे गोहत्या रोकने के लिए कानून बनाने के पक्ष में थे। विनोबा भावे ने तो इसके लिए अनशन तक भी किया था। बहरहाल, गोरक्षकों
की इस माग में कोई वजन नहीं है कि गोहत्या रोक्ने के लिए केन्द्रीय कानून बनाया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 48 में पहले ही व्यवस्था है कि देश में गाय, बछडे और अन्य दुधारु पशुओं का वध करना गैर-कानूनी है। अक्टूबर, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संवैधानिक व्यवस्था को वैध बताया था। देश के 29 मेंसे 21 राज्यों में अभी भी गोहत्या अथवा बीफ पर प्रतिबंध के लिए कानून बना रखे हैं। केरल, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश , मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम ऐसे राज्य हैं जहां इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में कभी गोतस्करी तो कभी बीफ खाने के नाम पर मुसलमानों की हत्याएं की जा रही हैं और यह सिलसिला उतरोत्तर बढता ही जा रहा है। इसे अविलंब रोकने की जरुरत है। गोरक्षा के लिए मुसलमान भाईयों को भी समझाने की जरुरत है। महात्मा गांधी भी यही चाहते थे।
की इस माग में कोई वजन नहीं है कि गोहत्या रोक्ने के लिए केन्द्रीय कानून बनाया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 48 में पहले ही व्यवस्था है कि देश में गाय, बछडे और अन्य दुधारु पशुओं का वध करना गैर-कानूनी है। अक्टूबर, 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस संवैधानिक व्यवस्था को वैध बताया था। देश के 29 मेंसे 21 राज्यों में अभी भी गोहत्या अथवा बीफ पर प्रतिबंध के लिए कानून बना रखे हैं। केरल, पश्चिम बंगाल, अरुणाचल प्रदेश , मिजोरम, नगालैंड, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम ऐसे राज्य हैं जहां इस तरह का कोई प्रतिबंध नहीं है। मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में कभी गोतस्करी तो कभी बीफ खाने के नाम पर मुसलमानों की हत्याएं की जा रही हैं और यह सिलसिला उतरोत्तर बढता ही जा रहा है। इसे अविलंब रोकने की जरुरत है। गोरक्षा के लिए मुसलमान भाईयों को भी समझाने की जरुरत है। महात्मा गांधी भी यही चाहते थे।
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