गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

ISI And India

                                           आईएसआई के नापाक इरादे

पाकिस्तान की कुख्यात इंटेलीजेस एजेंसी -आईएसआई (इंटर सर्विस इंटेलीजेंस)-   के जासूसों की गिफ्तारियों से भारतीय सुरक्षा एजेंसियां का चिंतित होना स्वभाविक है। चिंता इस बात की है हाल ही में आईएसआई के स्थानीय जासूसों की एक के बाद एक गिरफ्तारी हो रही है। सोमवार को दिल्ली पुलिस ने पंजाब के बठिंडा से एक और आईएसआई जासूस को गिरफ्तार किया। पंजाब पुलिस को न तो आईएसआई के लिए जासूसी करने वाले इस देशद्रोही की गतिविधियों की कोई भनक थी और न ही उसकी गिरफ्तारी की। केरल का रहने वाला यह आईएसआई जासूस भारतीय वायु सेना का बर्खास्त अफसर है। बर्खास्तगी से पहले वह  बठिंडा में तैनात था। आईएसआई के हनी ट्रैप में फंसकर रंजीत कुमार आईएसआई को गोपनीय सूचनाएं पहुंचा रहा था। फेसबुक के जरिए अपने प्रेम जाल में फंसाकर आईएसआई से सम्बंद्ध महिला रंजीत कुमार से ई-मेल से सूचनाएं ले रही थी। यह महिला हनी ट्रैप के जरिए ही बीएसएफ और आर्मी के अफसरों को भी फंसा चुकी है।  फेसबुक पर दामिनि मेकनॉट नाम के प्रोफाइल में खुद को ब्रिटिश  पत्रकार बताकर महिला खुफिया जानकारियां हासिल कर रही थी। खुफिया एजेंसियों को यह भी पता चला है कि पाकिस्तान स्थित आईएसआई के बहावलपुर कार्यालय में जासूसी का काल सेंटर है और यही से भारत के लिए जासूसी का नेटवर्क  काम कर रहा है। हैरानी इस बात की है कि सेना के अफसर पूरी तरह प्रशिक्षित होने के बावजूद अनजान काल्स ले रहे थे जबकि सेना ने उन्हें ऐसा नहीं करने के निर्देश  दे रखे हैं।  भारतीय इंटेलीजेंसी एजेंसियों को संदेह है कि रंजीत कुमार की तरह महिला के हनी ट्रैप में सेना के और अफसर  भी जुडे हो सकते हैं। जासूसी रैकेट में अब तक सेना और बीएसएफ के एक-एक अफसर समेत पांच  लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। नवंबर में दिल्ली पुलिस सेना के एक हवलदार को आईएसआई के लिए जासूसी करने पर गिरफ्तार कर चुकी है। इसी तरह जम्मू-कष्मीर से सेना के एक रिटायर्ड  जवान और एक अध्यापक को जासूसी के लिए गिरफ्तार किया जा चुका है। जासूसों की गिरफ्तारी कोई नई बात नहीं है। आईएसआई पाकिस्तान की अग्रणी सैन्य (मिलट्री) संचालित इंटेलीजेंस एजेंसी है और सेना के लिए दुश्मनो  की सैन्य शक्ति और महत्वपूर्ण ठिकानों की जानकारियां जुटाना इसका काम है। अपने काम को अंजाम देने के लिए आईएसअ्ाई ही नहीं, सभी खुफिया एजेंसियां “साम, दाम, दंड, भेद“ की नीति अपनाकर स्थानीय जासूस तैयार करती है। जम्मू-कश्मीर  के अलगावादियों में आईएसआई का व्यापक नेटवर्क है। गत रविवार को हैदराबाद में पकडे गए इस्लामिक स्टेट में भर्ती होने जा रहे तीन युवकों ने पूछताछ में कश्मीरी  अलगाववादी और आईएसआई की करीबी आसिया अंद्राबी के संपर्क में रहने की बात कबूली है। आसिया अंद्राबी कश्मीर में पाकिस्तान की प्रबल समर्थक है। वे हमेशा भारत के खिलाफ आग उगलती रहती हैं। हैदराबादी तीनों युवक सीरिया जाने के लिए आसिया अंद्राबी की मदद लेना चाहते थे। पुलिस अब इस बात की छानबीन कर रही है कि कहीं अंद्राबी का जाल कश्मीर  से हैदराबाद तक तो नहीं फैला है? पुलिस को सूचना मिली है कि आसिया अंद्राबी हैदराबाद की कई बार यात्रा कर चुकी है। बहरहाल, कश्मीर  में आतंक फैलाने और आतंकियों को प्रशि क्षित करने में आईएसआई की अग्रणी भूमिका रही है। 1990 में लीबिया से 50 आतंकी ट्रेनर्स  को कश्मीर  लाकर आईएसआई ने आतंक का ताडंव  शुरु क्या किया, भारत आज तक इसे नेस्तानाबूद नहीं कर पाया है। जानकारी अनुसार आईएसआई अब तक कश्मीर  में आतंक फैलाने के लिए 200 से ज्यादा ट्रेनिंग कैंप लगाा चुका है और 50,000 से ज्यादा आतंकियों को प्रशिक्षित कर चुका है। आईएसााई के पास फंड की कोई कमी नहीं है। इस एजेंसी को बाहर से भी खासी मदद मिल रही है। भारत के लिए यही सबसे बडा खतरा है।   

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

No-subsidized LPG to Undeserving Consumers

                                     साहसिक फैसला

सालाना 10 लाख से ज्यादा कमाने वाले उपभोक्ताओं को सस्ती (सब्सिडाइजड) रसोई गैस (एलपीजी) सुविधा से बाहर रखना, देर से ही सही, मगर मोदी सरकार का साहसिक फैसला  है। सरकार के इस फैसले से लगभग 20 लाख उपभोक्ताओं को सस्ती रसोई गैस नहीं मिलेगी। आयकर विभाग में दायर आयकर रिटर्न  के अनुसार देश  में सालाना दस लाख से अधिक कमाने वाले 20 लाख लोग हैं। इससे सरकार को सालाना 400 करोड से अधिक की बचत होगी। यद्यपि केन्द्र सरकार की भारी भरकम सब्सिडी बजट की तुलना में यह रकम “ऊंट के मुंह में जीरा“ समान लग रही है मगर कहते हैं “बूंद-बूंद से ही घडा भरता है“। सरकार के खर्चे बढ्ते ही जा रहे हैं। कमाई उस अनुपात में नहीं हो रही है। इस स्थिति में बचत के सिवा कोई चारा नहीं है।  मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही अनाप-शा प सब्सिडी को बंद करके सकारात्मक पहल की है। चालू वित्तीय साल 2015-16 के सब्सिडी बजट में कटौती करके इसे 2.27 लाख करोड रु ( 37 अरब डॉलर) रखा गया है।  इससे पहले वित्तीय साल 2014-15 में सब्सिडी का बजट  2.54 लाख करोड रु था। इस बजट मेंसे सरकार 1.24 लाख करोड रु तो फूड सब्सिडी पर ही खर्च करती है। लगभग 970 अरब रु की सब्सिडी फ्यूल (रसोई गैस एवं केरोसिन) पर दी जाती है और 660 अरब रु की सब्सिडी रासायनिक खाद (फर्टीलाइजर) पर दी जा रही है। वित्तीय वर्ष  2014-15 के दौरान रसोई गैस सब्सिडी पर सरकार को 40, 551 करोड रु खर्च करने पडे थे। इस वित्तीय वर्ष में रसोई गैस सब्सिडी के और कम होने की संभावना है। सब्सिडी रेट पर 14.2 किलो का  रसोई गैस सिलेंडर 419 रु में दिया जाता है मगर मार्केट रेट पर यह 608 रु में बेचा जा रहा है। इस तरह सरकार हर सिलेंडर पर लगभग 189 रु की सब्सिडी दे रही है। औसतन एक आम परिवार महीने में एक ही सिलेंडर की खपत कर सकता है क्योंकि साल में सब्सिडी वाले 12 सिलेंडर ही मिलते हैं।  इस हिसाब से देश  का हर एलपीजी उपभोक्ता परिवार सरकार से हर माह 189 रु की सब्सिडी ले रहा है। गरीब और आर्थिक रुप से पिछडे लोगों के लिए तो महीने में 189 रु मायने रखते हैं मगर साधन सपन्न और धनाढय वर्ग के लिए इस सब्सिडी के कोई मायने नहीं हैं। रसोई गैस सब्सिडी का जमकर दुरुपयोग भी किया जाता रहा है। इसे रोकने के लिए सरकार ने 2013 से सब्सिडी की रकम सीधे उपभोक्ता के खाते में जमा करनी शुरु कर दी है। इस समय देश  के कुल 16.35 करोड एलपीजी उपभोक्ताओं मेंसे 14.78 करोड उपभोक्ताओं के बैंक खाते में एलपीजी सब्सिडी जमा की जा रही है।  न्याय का तकाजा है कि एलपीजी सब्सिडी केवल उन्हीं उपभोक्ताओं को दी जानी चाहिए जो इसके वास्तव में हकदार है मगर  निहित सियासी स्वार्थों से प्रेरित राजनीतिक दल मध्यम वर्ग  को एलपीजी सब्सिडी से बाहर रखने का साहस नहीं जुटा पाए हैं। देश  में एलपीजी के आने से पहले चूल्हों पर खाना पकाया जाता था। इन चूल्हों को जलाने के लिए लकडी का इस्तेमाल किया जाता था। इससे अमूल्य वन संपदा नष्ट  हो रही थी। तब सरकार ने वन संपदा बचाने के लिए गांव-गांव एलपीजी को लोकप्रिय बनाने के लिए सस्ती दरों पर रसोई गैस मुहैया कराई। इसी वजह निजी क्षेत्र रसोई गैस बेचने का कारोबार नहीं कर पाया और एलपीजी का पूरा कारोबार आज भी सरकारी तेल कंपनियों के पास है। एलपीजी के लोकप्रिय होने से निश्चित   तौर पर वन संपदा संरक्षित हुई है और अगर इस बात का ख्याल किया जाए तो सरकार ने एलपीजी पर सब्सिडी देकर अमूल्य वन संपदा को संरक्षित किया है। विभिन्न सब्सिडी देने वाला  भारत अकेला मुल्क  नहीं है। यूरोप का 40 फीसदी बजट कृषि  और मत्स्य पालन सब्सिडी पर ही खर्च  किया जाता है। अमेरिका और अन्य विकसित देशों  में भी बजट का अच्छा-खासा भाग सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च होता है। सबसिडी और टैक्स किसी भी सरकार के बजट का अहम पहलू होते हैं। सरकार अगर कर लगाकर, इस हाथ लेती है तो सब्सिडी और सामाजिक सुरक्षा देकर उस हाथ देती भी है। बस, सब्सिडी का दर्शन  न्यायसंगत होना चाहिए। जो लोग सब्सिडी के पात्र ही नहीं, उन्हें यह क्यों दी जाए?

मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

Probe Clean Chit To Jaitley: Embarrassment to Kejriwal

                                                       जेटली को क्लीन चिट

दिल्ली एवं जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) में कथित अनियमितताओं के लिए ”आम आदमी पार्टी“ सरकार की जांच समिति द्वारा केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को कलीन चिट दिए जाने से मुख्यंत्री अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी की खासी फजीहत हुई है।  मुख्यमंत्री की प्रतिकिया से ही साफ पता चलता है कि  केजरीवाल इस रिपोर्ट से किस कद्र हतप्रत हैं। केजरीवाल ने रिपोर्ट  पर कुछ कहने की बजाय मीडिया घरानों पर आरोप जड दिए कि वे जेटली को निर्दोष साबित  करने के लिए जमीन-आसमान एक कर रहे हैं। मुददा यह है कि डीडीसीए में व्याप्त अनियमितताओं के लिए बतौर अध्यक्ष अरुण जेटली जिम्मेदार हैं या नहीं? जांच रिपोर्ट  ने साफ-साफ तो नहीं कहा मगर वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम न लेकर इशारा किया है “नहीं है“। आम आदमी पार्टी का इस रिपोर्ट से खिसखिसयाना स्वभाविक है।  दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने बडे जोश -ए-खरोश  से सतर्कता विभाग के प्रधान सचिव की अध्यक्षता में डीडीसीए में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए समिति का गठन किया था। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप के वरिश्ठ नेता डीडीसीए के अध्यक्ष रहे अरुण जेटली के कार्यकाल के दौरान भारी अनियमिताओं के गंभीर आरोप लगा चुके हैं। अरुण जेटली 13 साल तक डीडीसीए के अध्यक्ष रह चुके हैं।  केजरीवाल ने यह आरोप भी लगाया था कि सीबीआई ने हाल ही में उनके कार्यालय पर डीडीसीए से संबंधित रिकार्ड  खंगालने की मंशा  से ही छापा मारा था। इन्हीं आरोपों के चलते वित्त मंत्री अरुण जेटली ने दिल्ली के मुख्यंत्री अरुण केजरीवाल और “आप“ के पांच वरिष्ठ  नेताओं पर दिल्ली की अदालत में 10 करोड रु मानहानि का दावा भी दायर किया  है। सांसद  और क्रिकेटर कीर्ति आजाद भी डीडीसीए में भारी अनिमितताओं के आरोप लगा चुके हैं और इसके लिए उन्हें पार्टी से निलंबित भी कर दिया गया है। आजाद ने अनियमितताओं के सबूत भी पेश  किए थे और वीडियो भी जारी किया था। दिल्ली सरकार की जांच समिति की रिपोर्ट ने वित्त मंत्री अरुण जेटली का मानहानि का दावा पुख्ता कर दिया है। इस रिपोर्ट के बाद केजरीवाल एंड कंपनी अब यह भी कह नहीं सकते कि जांच समिति पर दबाव डाला गया। हैरानी इस बात की है कि दिल्ली सरकार की जांच समिति ने बीसीसीआई से डीडीसीए को निलंबित करने की सिफारिष की है। समिति ने  बीसीसीआई की इस बात के लिए भी तीखी आलोचना की है कि उसने समय रहते डीडीसीए कौ कार्यशैली को सुधारने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए। समिति ने दिल्ली सरकार को यह सलाह भी दी है कि डीडीसीए को सुधारने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त जस्टिस लोढा समिति की सिफारिषें लागू की जानी चाहिए। कुल मिलाकर समिति ने माना है कि डीडीसीए में सब कुछ ठीकठाक नहीं है मगर अरुण जेटली के कार्यकाल पर समिति ने एक शब्द भी नहीं लिखा है। पूरी दुनिया जानती है कि डीडीसीए में किस कद्र भ्रश्टाचार व्याप्त है। डीडीसीए को लेकर जब-तब घोटाला-दर-घोटाले का पर्दाफाश  होता रहा है। इतना होने के बावजूद अरुण जेटली पर कभी भी अगुंली नहीं उठाई गई। दरअसल, जेटली के बतौर डीडीसीए अध्यक्ष कार्यकाल के दौरान कथित अनियमितताओं के आरोपों की पृश्ठभूमि में “बदले की भावना“ काम कर रही है। मुख्यमंत्री के कार्यालय पर सीबीआई छापे से तिलमिलाए केजरीवाल और आप नेताओं ने आनन-फानन में डीडीसीए को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर हमला  बोल दिया । अरुण जेटली पेशे  से वकील हैं और ऐसे मामलों से कैसे निपटा जाता है, बखूबी जानते हैं। जेटली का राजनीतिक कैरियर भी एकदम साफ है। वे छात्र राजनीति से बढते-बढते राजनीति के शिखर पर पहुंचे हैं। दिल्ली के विवादास्पद आईएएस अधिकारी प्रधान सचिव राजेन्द्र कुमार प्रकरण में केजरीवाल पहले ही अपने हाथ जला चुके हैं। अब अरुण जेटली के मामले में भी उन्हें मुंह की खानी पड सकती है।  

शनिवार, 26 दिसंबर 2015

Prime Minister Modi's "Master Stroke'

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का शुक्रवार को काबुल से लौटते समय अचानक पाकिस्तान के ऐतिहासिक शहर लाहौर रुकना और नवाज शरीफ से मिलना कूटनीति में उनका मास्टर स्ट्रोक है। माना यह परंपरा से हटकर है पर यह बात भी सच है कि दोस्ताना संबंध परंपरा से हटकर ही बनाए जाते हैं। भारतीय प्रधानमंत्री के बगैर औपचारिक कार्यक्रम के लाहौर पहुंचने पर पाकिस्तान भी हतप्रत रह गया। किसी को मोदी के इस तरह अचानक आने की कतई उम्मीद नहीं थी। अमूमन, राश्ट्राध्यक्ष इस तरह अचानक यात्रा नहीं करता। प्रधानमंत्री मोदी का पहले से कोई तय कार्यक्रम नहीं था। शुक्रवार को सुबह ही लाहौर जाने का कार्यक्रम बना। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ  का जन्मदिन था और मोदी बधाई  देने पंहुच गए। शुक्रवार को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में भारत के सहयोग से निर्मित अफगानिस्तानी संसद भवन का उदघाटन करने रुस से लौटते समय मोदी  कुछ देर के लिए वहां रुके थे। अफगानिस्तान के साथ भारत के अंतरंग संबंध रहे हैं और इस देश के पुनर्निर्माण में भारत की अहम भूमिका रही है। पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत के बढते दखल से खासा परेशान रहा है और इसे कम करने के लिए तालिबान की मदद भी करता रहा है। अफगानिस्तान को लेकर भी भारत और पाकिस्तान में टकराव की स्थिति रही है। पिछले कुछ समय से पाकिस्तान और भारत के बीच जिस तरह रिश्तों  में कडुवाहट आई  है, उसके दृष्टिगत  अचानक लाहौर रुकना तो क्या, अगले साल (2016) में पाकिस्तान में होने वाले सार्क सम्मेलन में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अधिकृत यात्रा को लेकर अभी  एक असमंजस की  स्थिति  है।  मोदी सरकार पाकिस्तान को दो टूक शब्दों में साफ-साफ कह चुकी  है कि जब तक पाकिस्तान  कश्मीर  में आतंकी और अलगाववादियों को पालना-पोसना बंद नहीं  करता है, तब तक दोनों पडोसी देशों  के द्धिपक्षीय संबंध सामान्य हो ही नहीं सकते। तथापि, हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों में व्याप्त  शिथिलता की बर्फ को पिघलाने के लिए कुछ पहल हुई है। इसी माह पेरिस में जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात हुई थी और द्धिपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए जमीन तैयार की गई थी।  इसी माह के पहले सप्ताह 7 दिसंबर को भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय  सुरक्षा सलाहकारों की बैॅकॉक में वार्ता  हुई। इसके तुरंत बाद विदेश  मंत्री सुषमा  स्वराज पाकिस्तान के दौरे पर गईं औरं प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात की। इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अगले साल सार्क सम्मेलन के लिए पाकिस्तान यात्रा का खाका तैयार किया गया। पाकिस्तान 2016 में सार्क सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारत सार्क का नेतृत्व कर रहा है और अगर प्रधानमंत्री मोदी इस सम्मेलन में नहीं जाते हैं तो पाकिस्तान की खासी किरकिरी हो सकती है। बहरहाल, शुक्रवार को अचानक अफगानिस्तान से लौटते समय लाहौर पहुंचकर भारतीय प्रधानमंत्री ने द्धिपक्षीय संबंधों को नई दिशा  देने का प्रयास किया है। मोदी की इस यात्रा ने पाकिस्तान को यह संदेश  भी दिया है कि “अगर पाकिस्तान दोस्ती का एक कदम आगे बढाता है, भारत दो कदम बढाएगा”। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ मोदी को  लाहौर के निकट अपने पैतृक गांव ले गए और वहां उनकी खूब खातिरदारी की। दोनों में कई अहम मुद्दों पर भी बातचीत हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अचानक लाहौर यात्रा पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। कांग्रेस का कहना है कि यह भी कोई सलीका हुआ कि प्रधानमंत्री टहलते-टहलते लाहौर पहुंच जाएं और किसी को इसकी कानो-कान खबर तक न हो। कांग्रेस का तिलमिलाना स्वभाविक है। जो काम कांग्रेस सालों नहीं कर पाई, मोदी ने कुछ माह में कर दिखाया है। प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी की “भगवा छवि“ को लेकर पाकिस्तान हमेशा  सशंकित रहा है। इसके बावजूद अगर प्रधानमंत्री पाकिस्तान के साथ द्धिपक्षीय संबंध बेहतर बनाने के लिए हर मुमकिन प्रयास करते हैं, तो इसमें हर्ज ही क्या है। अफगानिस्तान से लौटते समय प्रधानमंत्री ने लाहौर रुक कर द्धिपक्षीय संबंधों को सुधारने की सुखद पहल की है। उनका यह साहसिक कदम  न केवल  साहसिक है, बाल्कि ऐतिहासिक भी है।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

Suspending Kirti Azad May Not Help BJP

                आजाद की “आजादी”


भारतीय जनता पार्टी ने बिहार से पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद को निलंबित करके बागी नेता को आजाद कर दिया है। अब न रही  पार्टी और न ही उसका अनुषासन। कीर्ति आजाद के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करके भाजपा ने कोई बडा तीर नहीं मार लिया है, अलबत्ता अपने पैरों पर कुल्हाडी मारी है। इससे जनमानस में यह संदेश  जाता है कि भाजपा में भी सच्ची आवाज को दबा दिया जाता है। यानी पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है। भाजपा वही पार्टी है जो एक जमाने में गला फाड-फाड कर कांग्रेस पर आंतरिक लोकतंत्र का गला घोंटने और शीर्ष  कांग्रेस नेताओं को “तानाशाह“ बताया करती थी। आज भी कांग्रेस पर पार्टी यही आरोप लगाती है। कांग्रेस में भी नेहरु और गांधी परिवार के खिलाफ आवाज उठाने पर बागी को फौरन बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। मगर लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस में थोडा-बहुत आंतरिक लोकतंत्र लौटा है और पार्टी के वयोवृद्ध नेता जब-तब शीर्ष  नेतृत्व की कार्यशैली  के खिलाफ बागी सुर बोल रहे हैं। इसके विपरीत कीर्ति आजाद प्रकरण से स्पष्ट  गया है कि भाजपा में अब आंतरिक लोकतंत्र जरा भी बर्दाश्त   नहीं है। न्याय का तकाजा यह था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व  कीर्ति आजाद की बातों को गौर से सुनता और फिर उस पर कोई फैसला लेता है। कोई भी व्यक्ति कानून और जनहित से ऊपर नहीं होता। अरुण जेटली भी नहीं। कीर्ति आजाद को दिल्ली  क्रिकेट बॉडी (डीडीसीए- देहली क्रिकेट एंड डिस्ट्रिक एसोसिएशन) में कथित अनियमितताओं को उजागर करने का पूरा अधिकार है। आजाद न केवल  क्रिकेटर हैं, बल्कि सांसद भी हैं।  कीर्ति आजाद काफी दिनों से डीडीसीए में कथित अनियमितताओं का मामला उठा रहे थे और इस संदर्भ में उन्होंने अरुण जेटली को कई चिठ्ठियां भी लिखीं। जेटली लगभग 13 साल तक डीडीसीए के अध्यक्ष रहे हैं। कीर्ति आजाद अरुण जेटली पर निशाना साध कर “सियासी पासे“ फेंक रहे हैं, जनमानस को इससे कोई सरोकार नहीं है। यह बात जगजाहिर है कि सियासी नेताओं के हर मूव के पीछे कोई-न-कोई स्वार्थ छिपा होता है और कीर्ति आजाद भी अपवाद नहीं है। मगर उन्होंने जो मुद्दा उठाया है, उसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। भाजपा अगर ऐसा करने की कोशिश  करती भी है, तो इसके लिए पार्टी को भारी कीमत चुकानी पड सकती है।  कीर्ति आजाद के साथ-साथ दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने भी डीडीसीए में अरुण  जेटली के कार्यकाल में कथित अनियमितताओं की जांच के लिए आयोग का गठन  किया है। अरुण जेटली ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत “आप“ नेताओं पर अदालत में मानहानि का दावा कर रखा है। कुल मिलाकर, डीडीसीए में कथित अनिमितताओं का मामला इतना आगे बढ चुका है कि भाजपा और अरुण जेटली चारों तरफ से  घिर चुके हैं। इस स्थिति में कीर्ति आजाद के आप और अरुण जेटली विरोधियों के साथ मिलकर जेटली के खिलाफ मोर्चा  खोलने से भाजपा का ही नुकसान होगा। जेटली अगर निर्दोष  हैं तो  न ही उन्हें और न ही पार्टी को डरने की जरुरत  है। मगर पार्टी के शीर्ष   नेताओं को इस बात का डर था कि “घर का भेदी, लंका ढहा सकता है“। अरुण जेटली पर अगर शुरुआती जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो उन पर इस्तीफे का दबाव बढ सकता है। भाजपा  हिमाचल प्रदेश  के मुख्यंमंत्री वीरभद्र सिंह पर भी इन्हीं हालात में इस्तीफे के लिए दबाव डाल रही है। भाजपा नैतिकता की दुहाई देकर वीरभद्र सिंह से बराबर इस्तीफे की मांग करती रही है। और अगर अरुण जेटली पर कथित अनियमिताओं के आरोपों में जांच आयोग को कुछ मिलता है, तो कांग्रेस भी वही करेगी जो भाजपा हिमाचल प्रदेश  में कर रही है। दुखद स्थिति यह है कि पिछले कुछ समय से समकालीन राजनीति “बदले की भावना“ से हांकी जा रही है। बहरहाल, कीर्ति आजाद की आजादी भाजपा पर भारी पड सकती है।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

Sir, Why a Soldier's Family CriesEverytime? Mr. Rajnath Answer the Question

                                        सैनिक ही क्यों हों शहीद ?

“सर, हर बार  सैनिकों के परिजनों को ही क्यों रोना  पडता है? बुधवार को गृहमंत्री राजनाथ सिंह से जब सीमा सुरक्षा बल विमान हादसे में  शहीद हुए एसआई रवीन्द्र कुमार की बेटी ने यह सवाल किया, वे जबाव नहीं दे पाए। मगर जनमानस जबाव मांगता है।  देश  के लिए सैनिकों और सुरक्षा बलों को ही क्यों कुर्बानियां देनी पडती है?  यह प्रश्न  वाकई अहम है कि जिस तरह बडी-बडी और अति विशिष्ठ   हस्तियों के विमानों की  तकनीकी  सुरक्षा और रख-रखाव का  विशेष  ख्याल रखा जाता है, सुरक्षा बलों का क्यों नहीं? और यह सवाल भी जबाव मांगता है कि देश  में अति विशिष्ठ  व्यक्तियों की तरह सैनिकों को भी क्यों वैसा ही मान-सम्मान नहीं दिया जाता?  सच्चाई यह है कि देश  को सियासी नेताओं की अपेक्षा सैनिकों की कहीं ज्यादा जरुरत होती है। दिल्ली में मंगलवार को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ)  का विमान उडान भरते ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और इसमें सवार सभी दस जवान मारे गए। 10 सदस्यीय  टीम विमान से रांची में खराब पडे हेलीकॉप्टर की मरम्मत करने जा रही थी। और यह बीएसएफ के सैनिकों की बहादुरी का जज्बा ही था कि शहीद होते-होते भी उन्होंने कई लोगों को बचाने के लिए अपनी जान की कुर्बानी दे दी। तकनीकी खराबी का पता चलते ही पायलट ने तीन बार दिशा  बदली और अततः इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट  की दीवार से टकराकर शहादत पा ली। विमान 22 साल पुराना था। पायलट ने विमान की हालात देखकर उडान भरने से मना कर दिया था। पर देश  में चूंकि इस तरह की बातों पर ध्यान न देकर जुगाड भिडाने की रिवायत है, लिहाजा पायलट को तकनीक तौर पर खराब विमान को उडाने को कहा गया। विमान को बीएसएफ के डिप्टी कमांडेट पायलट भगवती प्रसाद भट्ट सहायक पायलट राजेश  शयोरण  के साथ चला रहे थे। वैसे  बी 200 सुपर एयरक्राफ्ट  दुनिया में बेहतरीन विमान माना जाता है। विश्व  विख्यात अमेरिकिी स्पेस एजेंसी नासा भी इस विमान को छोटे-मोटे कार्यों के लिए उपयोग करती है। बी 200 सुपर एयरक्राफ्ट छोटा विमान है जिसमें पायलट और को-पायलट के अलावा 11 लोगों के बैठने की क्षमता होती है। विख्यात विमान निर्माता कंपनी बीचक्राफ्ट ने नब्बे के दशक में 200 एवं 300 सीरिज के “सुपर किंग“ विमान बनाए और बेचे। 1996 में कंपनी ने अपने मॉडल से “सुपर“ को ड्राप कर दिया। इसके बद विमान की तकनीक में काफी बदलाव भी आया। इस विमान की सुरक्षित उडान आयु 20 से 25 साल मानी जाती है और अगर रखरखाव उम्दा है तो यह 30 से 35 साल तक आराम से उडान भर सकता है। बीएसएफ का विमान इतना भी पुराना नहीं कि उडान ही न भर सके। बीएसएफ के महानिदेषक डीके पाठक के मुताबिक  बी 200 एयरक्राफ्ट कम-से-कम 40-45 साल तक आराम से उडानें भरता है। मगर रिकार्ड  इस बात की गवाही नहीं देता।  बीएसएफ के हाल ही में संपन्न सम्मेलन के दौरान  इसी विमान ने कई बार सुरक्षित उडानें भरीं थी। बहरहाल, विमान हादसे रोकना किसी के वश  में नहीं है मगर एहतियातन कदम उठाए जा  सकते हैं। भारतीय वायु सेना के मिग एयरक्राफट तो जैसे हादसों के लिए जाने जाते हैं जबकि एक जमाने में मिग बेहतरीन लडाकू जहाज माने जाते थे।  2013 और 2014 के दौरान ही पांच मिग विमान हादसे हुए और इनमें 25 लोग मारे गए। जून 2013 में उतराखंड की प्रलंयकारी बाढ के दौरान मिग-17 वी5 के दुघर्टना ग्रस्त होने पर 20 लोग मारे गए थे। कहते हैं “मशीनरी कभी भी धोखा दे सकती है"। बस, सजग रहने की जरुरत होती है। बीएसएफ के दुर्घटनाग्रस्त विमान के मामले में भी यही हुआ। तकनीकी खराबी के बावजूद पायलट को उडान भरने के लिए कहना भयंकर गलती थी। इस गलती के कारण दस जानें चलीं गईं और दस परिवार बेसहारा हो गए। जवानों को मौत के मुंह में धकेलने के लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

Thank God, Our Lawmakers Have Done a Good Job

लोकतंत्र में जनमानस का भारी दबाव अक्सर काम कर ही जाता है। दिसंबर 2012 में देश  की राजधानी दिल्ली में “निर्भय“ सामूहिक बलात्कार ने पूरे देश  को झकझोर कर रख दिया था। तब जनमानस के दबाव का ही असर था कि मनमोहन सिंह सरकार को प्रोटेक्शन  ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम  सेक्सुअल ओफ्फेंसस एक्ट में बदलाव करना पडा था। संशोधित एक्ट के तहत स्वेच्छिक संभोग की आयु 16 से बढाकर 18 साल की गई थी। और जनमानस के दबाव का ही असर था  कि मोदी सरकार ने 2014 में लोकसभा में जुवेनाइल जस्टिस बिल पेश  किया और  इस साल मई में इसे पारित भी कर दिया। राज्यसभा द्वारा संशोधित बिल को पारित नहीं किए जाने से यह कानून नहीं बन पाया है। अगर संशोधित जुवेनाइल बिल संसद से पारित हो जाता, तो निर्भय के जुवेनाइल बलात्कारी को भी अन्य बलात्कारियों की तरह कडी सजा मिलती। संशोधित जुवेनाइल जस्टिस बिल (केयर एंड प्रोटेक्शन  ऑफ चिल्ड्रन) के तहत  16 से 18 साल के  यौन उत्पीडन आरोपियों को भी व्यस्क की तरह मुकदमा चलाने की व्यवस्था की गई है। दिल्ली “निर्भय“ सामूहिक बलात्कार कांड के बाद ही जुवेनाइल कानून में संशोधन की जरुरत महसूस हुई थी। दरअसल, निर्भय के छह बहशी  बलात्कारियों में एक नाबालिग भी था। छह में से  चार बलात्कारियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। पांचवे ने जेल में ही आत्महत्या कर ली थी। मगर छठा आरोपी अभी 18 साल से कम था, इसलिए उस पर अलग से जुवेनाइल कानून के तहत मुकदमा चलाया गया। जुवेनाइल कोर्ट ने नाबालिग बलात्कारी को तीन साल तक रिमांड होम में रखने की सजा दी। जनमानस का कहना है कि यह भी कोई न्याय हुआ। नाबालिग को करीब-करीब माफी और बाकियों को मौत की सजा? इस रविवार को युवा बलात्कारी रिमांड होम से बाहर आकर आजाद हो गया है। निर्भय के युवा बलात्कारी की रिहाई और मामूली सजा से पूरा देश , खासकर महिलाएं उबली हुई हैं और दिल्ली में प्रदर्शन  किए जा रहे हैं। दिल्ली महिला आयोग ने युवा बलात्कारी की रिहाई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट  में भी दस्तक दी। मगर देश  की सर्वोच्च अदालत ने यह कहकर अपना पल्लू झाड लिया कि “ न्यायालय के “हाथ बंधे हुए हैं“। वस्तुस्थिति भी यही है। न्यायपालिका कानून नहीं बनाती, अलबत्ता कानून की व्याख्या करके और उस पर अमल करवाकर उसकी रक्षा करती है। कानून बनाना सांसदों और विधायकों का काम है और अगर देश  की बेट्टियों के बलात्कारी मामूली सी सजा पाकर छूट जाते हैं, तो इसके लिए वे दोषी हैं, न्यायपालिका नहीं। बहरहाल, ”निर्भय” के युवा बलात्कारी की रिहाई से उद्धेलित जनमानस के दबाव पर मंगलवार को राज्यसभा ने  जुवेनाइल जस्टिस बिल 2015 पर चर्चा  की और इस बिल को पारित भी कर दिया । देश  का जनमानस भी यही चाहता है कि बलात्कारी, नाबालिग ही क्यों न हो, उसे कडी से कडी सजा दी जानी चाहिए। कानून अगर अव्यस्क बलात्कारियों से सख्ती नहीं बरतता है तो देश  की बेट्टियों की अस्मत सरेआम लूटती रहेगी। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि यौन उत्पीडन करने वालों में 50 फीसदी अव्यस्क होते हैं और वे वस्तुस्थिति से बखूबी वाकिफ होते हैं कि कानून उन्हें इस अपराध के लिए कडी सजा नहीं देता।  तथापि, बिल में 16 से 18 साल के यौन उत्पीडन आरोपियों को व्यस्क की तरह मुकदमा चलाने के प्रावधान पर सहमति नहीं है। विधि वेताओं को   इस बात पर ऐतराज है कि पहली बार किसी देश  में “जुडिशल वेवर“ की अवधारणा को लागू किया जा रहा है। इसे कानून सम्मत नहीं माना जा सकता। देश  के चिल्ड्रन राइटस और वुमेन राइट्स एक्टिविस्ट भी प सशोधित कानून  को प्रतिगामी (रेग्रेसिसव) कदम बता  रहे हैं। विधि विशेयज्ञों का यह भी कहना है कि निर्भय सामूहिक बलात्कार कांड के बाद की घटनाएं विशुद्ध मीडिया की उपज है। सभ्य और सुसंस्कृति समाज  अपने कानून को सुविधा अनुसार नहीं बनाता। निष्कर्ष  यह  है कि बाल यौन अपराधियों से कैसे निपटा जाए, इस पर अभी तक आम सहमति तक नहीं बन पाई थी मगर निर्भय के युवा बलात्कारी की रिहाई ने सांसदों को एकजुट कर दिया है और राज्यसभा ने मंगलवार को ध्वनि मत से बिल पारित भी कर दिया।


मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

The Open Revolt in BJP

                                                    कीर्ति आजाद की बगावत ?

"पुराना जुमला है, “घर का भेदी, लंका ढहाए“। भाजपा के सांसद कीर्ति आजाद की खुली बगावत पर यह जुमला सौ फीसदी  मौजू होता है।  कहां तो  भाजपा दिल्ली सरकार के वरिष्ठ  आईएएस अधिकारी राजेन्द्र कुमार को  घूसखोरी के मामले में बचाने के लिए अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी को कटघरे में खडा करने की स्थिति में थी, कहां अब कीर्ति आजाद की बगावत से भाजपा खुद  कटघरे में खडी हो गई है।   भाजपा का अपना ही सांसद अगर दिल्ली एंड डिस्ट्रिक क्रिकेट एसोसिएशन  (डीडीसीए) में कथित अनियमितताओं के संगीन आरोप लगाता है, तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। आजाद लंबे समय तक क्रिकेट से जुडे रहे हैं और टीम इंडिया के अहम सदस्य भी रह चुके हैं। केन्द्र में भारी बहुमत से सत्ता में आने के बाद पिछले डेढ साल में तीसरी बार पार्टी के सांसद ने खुली बगावत की है। भाजपा अध्यक्ष अमित  शाह की चेतावनी को नजरादांज और पार्टी व्हिप का उल्लघंन करते हुए सांसद कीर्ति आजाद ने रविवार को दिल्ली क्रिकेट बॉडी में अनियमितताओं को लेकर वीडियो जारी किया और वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम लिए बगैर उन पर संगीन आरोप लगाए। अरुण जेटली 13 साल तक डीडीसीए के अध्यक्ष पद पर काबिज रहे हैं। कीर्ति आजाद का आरोप है कि 2008 से 2013 के बीच डीडीसीए में भारी अनियमितताएं हुईं हैं। इतना ही नहीं सोमवार को कीर्ति आजाद  ने यह मामला लोकसभा में भी उठाया और भाजपा के वरिष्ठ  नेता मूक श्रोता बने रहे। भाजपा के इतिहास में यह पहला मौका था जब पार्टी के सांसद ने अपने ही वरिष्ठ  मंत्री पर सदन में निशाना साधा हो। सोमवार को कीर्ति आजाद ने अरुण जेटली को चुनौती तक दे डाली कि अगर उनमें हिम्मत है तो वे उन पर मानहानि का मुकदमा करें। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सोमवार को डीडीसीए में कथित अनियमितताओं में उन्हें लपेटने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर अदालत में मानहानि का मुकदमा दायर किया। आजाद ने इसी मुकदमे का हवाला देकर जेटली को चुनौती दी है। भाजपा के सांसद द्वारा वित्त मंत्री पर आरोप लगाने से आम आदमी पार्टी का पक्ष खासा मजबूत हुआ है। कीर्ति आजाद के आरोपों के बाद “आप“ सीना ठोंक कर कह सकती है कि दिल्ली में क्रिकेट को लेकर कीर्ति आजाद ने जो चिंता व्यक्त की है, पार्टी भी वही कर रही थी। आजाद के आरोपों के बाद दिल्ली सरकार ने डीडीसीए की जांच के लिए गोपाल सुब्रण्यम की अध्यक्षता में आयोग भी गठित किया हैं।  पिछले सप्ताह मंगलवार (15 दिसंबर) को सीबीआई द्वारा दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के कार्यालय में छापे की कार्रवाई के बाद से “आप“ ने भाजपा और वित्त मंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। आप नेताओं ने भी कीर्ति आजाद की तर्ज पर डीडीसीए में अरुण जेटली के कार्यकाल के दौरान भारी अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। बहरहाल, कीर्ति आजाद की खुली बगावत भाजपा को महंगी पड सकती है। आजाद बिहार से भाजपा के सांसद हैं और पार्टी में खुली बगावत करने वाले तीसरे नेता हैं। बिहार के ही वरिष्ठ  भाजपा नेता शत्रुघ्न सिंहा पहले ही बागी हो चुके हैं ओर जब-तब पार्टी की किरकरी करवाते रहते हैं। पार्टी के एक और सांसद और पूर्व केन्द्रीय गृह सचिव आर के सिंह भी बिहार चुनाव के दौरान बागी सुर अपना चुके हैं। नौकरशाह से सांसद बने सिंह बिहार चुनाव में पार्टी टिकटों को बेचने तक के संगीन आरोप लगा चुके हैं। आजाद को भाजपा में अरुण जेटली विरोधी गुट से संबंधित एक वरिष्ठ  नेता का समर्थक माना जाता है। इस बात के दृष्टिगत  माना यह जा रहा है को कीर्ति आजाद ने एक तीर से कई निशान साधे हैं। उन्होंने अरुण जेटली को लपेटा तो है मगर नाम लिए बगैर। डीडीसीए में अनियमितताओं की जांच की मांग करने पर पार्टी आसानी से उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी नही कर सकती। भ्रष्टाचार  के खिलाफ आवाज उठाना अनुशासनहीनता नहीं मानी जा सकती। आजाद की बगावत से भाजपा के अनुशासन की कलई खोल दी है।   

रविवार, 20 दिसंबर 2015

What If There Is Nuke War Between India, Pakistan

 अमेरिकी लॉमेकर फ्रेंक हॉफमेन ने भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध (न्यूक्लियर वॉर) की संभावनाओं की गुलाबी बगुले (पिंक फ्लेमिंगो) के साथ तुलना की है। जिस तरह बगला भक्त बनकर अपने शिकार से आंखमिचौली करता है, ठीक उसी तरह दुनिया में कई ऐसी घटनाएं होती हैं, जिनके घातक परिणाम जानते हुए भी इनकी बराबर उपेक्षा की जाती है। हॉफमेन का आकलन है कि भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध भी एक ऐसी अपरिहार्य संभावना है, जिसके घातक परिणाम जानते हुए भी दुनिया इससे अनजान बनी हुई है। दुनिया के अग्रणी एंटी न्यूक्लियर संगठन, इंटरनेशनल  फिजिशियंस फॉर दी प्रिवेनशन ऑफ न्यूक्लियर वार एंड फिजिशियंस फॉर सोशल रिस्पांसिबिलिटी  का आकलन है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध होता है तो कम-से-कम दो अरब लोग बेमौत मारे जा सकते हैं। विकिरण (रेडिएशन) के प्रभाव के कारण दो करोड से ज्यादा लोग तत्काल मारे जाएंगें।  इससे भयंकर सूखा पड जाएगा।  सीमित परमाणु युद्ध की स्थिति में भी उपजाऊ धरती बंजर हो जाएगी, पर्यावरण बुरी तरह से प्रदूषित  हो जाएगा और पूरी दुनिया में खाद्यान्न का घोर संकट हो जाएगा। भारत-पाकिस्तान परमाणु युद्ध से चीन भी अछूता नहीं रहेगा और वहां भी  भुखमरी फैल जाएगी। इस संगठन का यह भी आकलन है कि भारत और पाकिस्तान के परमाणु युद्ध से अमेरिका भी प्रभावित होगा। वायुमंडल में ब्लैक कार्बन एरोसोल के कण फैलने से अमेरिका का कॉर्न और सोयाबीन उत्पादन 10 फीसदी घट जाएगा। चीन में धान का उत्पादन चार साल में ही 21 फीसदी घट जाएगा। परमाणु युद्ध के बाद पहले ही साल चीन में गेंहूं का उत्पादन 50 फीसदी तक गिर जाएगा। परमाणु युद्ध के और भी कई घातक परिणाम भुगतने पडेंगे और इस बार का न्यूक्लियर वार जापान के हीरोशिमा एटम बम के दुष्परिणामों  से भी कहीं अधिक तबाही लाएगा। हॉफ्मेन इस बात से चिंतित हैं कि सब कुछ जानते हुए भी दुनिया भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध को रोकने के लिए कोई गंभीर प्रयास नहीं कर रही है।  अमेरिका के पाकिस्तान-अफगानिस्तान विशेष  प्रतिनिधि रिचर्ड ओल्सन ने भी इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है कि दक्षिण-पष्चिम एशिया का पारंपारिक संघर्ष  बढते-बढते परमाणु युद्ध में भी बदल सकता है।  सबसे ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि पाकिस्तान में कटटरपंथी नेता के सत्ता में आने की स्थिति में परमाणु युद्ध का खतरा और ज्यादा बढ जाता है। मध्य-पूर्व  एशिया  में इस्लामिक स्टेट के बढते प्रभाव से स्थिति और ज्यादा चिंताजनक है। अब सवाल यह है कि इस युद्ध को रोका कैसे जाए?  पाकिस्तान की तुलना में भारत काफी बडा मुल्क है और इसके पास सैन्य शक्ति भी कहीं ज्यादा है। इस स्थिति से पाकिस्तान अब तक हमेशा  खौफजदा रहा है. पर न्यूक्लियर वेपन्स के ईजाद होने के बाद से स्थिति बदल गई है  और पाकिस्तान  जानता है कि  अगला युद्ध कन्वेंशनल  क़ी बजाय  न्यूक्लियर होगा ।  इसीलिए, भारत का मुकाबला करने के लिए पाकिस्तान  दनादन परमाणु हथियार और मिसाइलें बना रहा है। सामरिक रणनीति भी यही कहती है कि भारत के बराबर परमाणु हथियारों से लैस होकर ही पाकिस्तान उसका मुकाबला कर सकता है। पिछले कई सालों से पाकिस्तान यही कर रहा है। रक्षा विशेषज्ञों  का आकलन है कि भारत और पाकिस्तान दोनों के पास 100-100 के आसपास परमाणु अस्त्र-शस्त्र (वारहैडस) हैं। यानी परमाणु हथियारों के मामले में भारत और पाकिस्तान के बीच बराबर की टक्कर है। भारत और पाकिस्तान का अब तक तीन बार युद्ध में सामना हो चुका है। 1971 की हार को पाकिस्तान आज तक नहीं भुला पाया है। इस युद्ध के फलस्वरुप बांग्लादेश  पाकिस्तान से अलग हो गया था और लगभग 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया था। भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध रोकने के लिए परमाणु अप्रसार संधि उपयोगी हो सकती थी मगर भारत और पाकिस्तान दोनों ने इस संधि को नहीं माना। इससे दोनों देशों  के बीच परमाणु युद्ध की संभावनाएं कहीं ज्यादा बढ़  जाती है। फिलहाल  तो  द्धिपक्षीय वार्ता ही इस खतरे को टाल सकती है।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2015

India Need Not To Worry Over Fed Rate Hike

                                     फेड रिजर्व का छींका फूटा

अततः लगभग एक दशक बाद अमेरिका सेंट्रल बैंक फेडेरल रिजर्व ने ब्याज दरें बढाकर  मार्केटस में व्याप्त अनिश्चितता   को कुछ हद तक दूर कर दिया है। लंबे समय से अमेरिकी सेंट्रल बैंक के मूव को लेकर “ अब-तब“ का असमंजस व्याप्त था। दो दिन की जद्दोजेहद के बाद बुधवार को अमेरिकी सेंट्रल बैंक ने ब्याज में 0.25 फीसदी की बढोतरी करके यह संकेत दिए हैं कि दुनिया की सबसे बढी अर्थव्यवस्था में गुणात्मक सुधार आया है और यह महंगे कर्ज को सहने की क्षमता रखती है। वैसे  सहमे-सहमे सेंट्रल बैंक ने ब्याज में नाममात्र की वृद्धि तो कर दी है मगर वह अभी भी 2007-09 के वित्तीय संकट के भय से उबरा नहीं है। यही वजह है कि ब्याज में मामूली से बढोतरी करने के लिए भी फेडेरल रिजर्व  के अधिकारियों को दो दिन तक  माथा-पच्ची करनी पडी।  1930 की “भीषण मंदी“ के बाद पूरी दुनिया 2008 में भी रिसेशन  की चपेट में आ गई थी। अगस्त 2007 में शुरु हुई इस मंदी से देखते-देखते पूरे विश्व  में हाहाकार मच गया था। बडे बैंक भी दिवालिया होने के कगार पर पहुंच गए थे। तब संबंधित देश  की सरकार को बेल आउट पैकेज देकर वित्तीय संस्थाओं को बचाना पडा था। और इस मंदी का कारण था: अमेरिका हाउसिंग उद्योग। 2004 आते-आते अमेरिका में रियल इस्टेट का कारोबार चरम पर था मगर इसके बाद तेजी का बुलबुला ऐसा फूटा कि अमेरिका के समूचे वित्तीय प्रबंध को पल भर में धराशायी कर गया। अमेरिका रियल इस्टेट की प्रतिभूतियां (सिक्यूरिटीज) का मूल्य इतना गिर गया कि पूरी दुनिया में नामी-गिरामी वित्तीय संस्थाएं भी दिवाला होने के कगार पर पहुंच गई। अगस्त, 2007 में अमेरिका का अग्रणी बैंक बीएनपी परिबास नकदी (लिक्विडिटी) के संकट का हवाला देकर तीन बडे ग्राहकों को  केश   (विदड्राल) देने से मुकर गया। इसके बाद तो पूरा बैंकिंग सिस्टम ही चर्रामरा गया। तब  मंदी का संकट इतना गहराया गया था कि बैंकों ने कर्जा देना बंद कर दिया, स्टॉक मार्केटस में अफरा-तफरी फैल गई और निवेशकों का बाजार से भरोसा ही उठ गया था। मंदी से उबरने के लिए तरह-तरह के वित्तीय प्रलोभन दिए गए। कर्जा बेहद सस्ता किया गया। तब कहीं जाकर 2013 में दुनिया कुछ हद तक मंदी से उबर पाई। इसी मंदी का असर है कि अमेरिकी सेंट्रल बैंक दस साल से ब्याज दरों को स्थिर रखे हुए था। बुधबार को ब्याज बढाते समय फेड अध्यक्ष जेनेत येलेन ने कहा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की  आशातीत रिकॉवरी के दृष्टिगत  ही ब्याज बढाया जा रहा है। बेरोजगारी 5 फीसदी से आसपास है और अगले साल इसके 4.75 फीसदी तक गिरने की उम्मीद है। डिफ्लेशन से निपटना अमेरिका की सबसे बडी चुनौती है। इस समय मुद्रा स्फीति  शून्य से भी कम है। इसका मतलब है कि अमेरिकी उपभ्भोक्ताओं की क्रय शक्ति (परचेजिंग पॉवर) भारतीयों से कहीं ज्यादा सषक्त हैं। इस  स्थिति में उपभोक्ता अधिकाधिक खर्च  करने की क्षमता रखता है। जितनी ज्यादा मुद्रा-स्फीति होगी, क्रय शक्ति उतनी ही कम। फेडेरल रिजर्व अगले साल तक इसे 2 फीसदी तक लाना चाहता है। ब्याज दरें बढने से मुद्रा-स्फीति बढ सकती है। बहरहाल, अमेरिका में ब्याज दरें बढने से संस्थागत निवेशक अमेरिका की ओर आकर्षित   हो सकते हैं। येलेन ने आगे भी ब्याज दरें बढाने के संकेत दिए हैं मगर यह इस बात पर  निर्भर करता है कि बुधवार की बढोतरी क्या रंग लाती है। अमेरिका की देखा-देखी  यूरोपियन सेंट्रल बैंक भी ब्याज दरें बढा सकता है। अमेरिका में ब्याज दरें बढने से संस्थागत निवेशकों (फॉरेन इंस्टिटूशनल  इनवेस्टर्स ) का रुख अमेरिका की ओर बढ सकता है। अभी संस्थागत निवेशकों को अमेरिका और यूरोप की अपेक्षा भारतीय पूंजी बाजार में अच्छा रिटर्न मिल रहा है। संस्थागत निवेशकों का भारतीय स्टॉक मार्केटस में 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। डॉलर की तुलना में कमजोर रुपया निवेशकों को और ज्यादा हतोत्साहित कर सकता है। इन हालात में भारतीय रिजर्व बैंक ब्याज दरें और ज्यादा घटाने का खतरा मोल नहीं लेना चाहेगा।

गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

CBI Raid On Kejiwal's Ofice Smacks of Vindictiveness

                                                  बदले की कार्रवाई

दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री कार्यालय पर सरकारी ”तोते” सीबीआई के छापे की कार्रवाई से देश  के सियासी माहौल में उबाल आ गया है। सीबीआई मंगलवार सुबह दनदनाती दिल्ली सरकार सचिवालय में मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंची और रिकार्ड खंगालने  शुरु कर दिए। सीबीआई ने, दरअसल, मुख्यमंत्री कार्यालय में तैनात आईएएस अधिकार राजेन्द्र कुमार के कार्यालय पर छापा मारा था। राजेन्द्र कुमार  अरविंद केजरीवाल के सबसे ज्यादा करीबी और विश्वासपात्र  अफसर  हैं, इसलिए केजरीवाल ने सीबीआई की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी कि उन्होंने प्रधानमंत्री के खिलाफ ट्वीट पर अपशब्द तक  कह डाले । केजरीवाल को इस बात का गुस्सा था कि सीबीआई ने उनके कार्यालय पर छापा मारने के लिए उनकी अनुमति नहीं ली और न ही उन्हें सूचित किया। वैसे  इस तरह की कार्रवाई अचानक की जाती है और अगर इसकी किसी को भनक लग जाए तो जाहिर है, सारी कार्रवाई बेमानी साबित हो जाती है। सीबीआई द्वारा केजरीवाल को सूचित करना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले सीबीआई सितंबर में  हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के शिमला और दिल्ली स्थित निजी आवास और कार्यालय पर भी अचानक रेड कर चुकी है। सीबीआई ने जिस दिन वीरभद्र सिंह के निजी आवास पर छापा मारा था, उस दिन उनकी बेटी की शादी थी। कहते  हैं ख़ुशी और गम के मौहोल  में दुश्मन को भी बख्श  दिया जाता है पर लगता  है मोदी सरकार इस पर विश्वास नहीं करती।  सीबीआई की ताजा कार्रवाई से सरकार और विपक्ष के बीच टकराव और ज्यादा बढ गया है। मंगलवार को इस पर संसद में हंगामा हुआ और बुधवार को भी मामले की गूंज संसद में सुनाई दी। सीबीआई की कार्रवाई अपनी जगह सही हो सकती है । भ्रष्टाचार  करने वाले किसी भी अधिकारी को बख्शा  नहीं जाना चाहिए।।  पर सीबीआई को लेकर जनमानस में यही छवि है कि यह संस्था पुलिस की तरह सिर्फ  और सिर्फ सरकार के इशारे पर काम करती है। देश  की सर्वोच्च अदालत भी सीबीआई को “सरकारी तोता“ बता चुकी है।  इसकी कार्यशैली भी यही बात प्रमाणित करती है। हिमाचल प्रदेश  के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के  विश्वासपात्र  राजेन्द्र कुमार के कथित “घूसखोरी“ से कहीं ज्यादा संगीन मध्य प्रदेश  में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुडा “व्यापम घोटाला“ और इंडियन प्रीमियम लीग (आईपीएल) के पूर्व अध्यक्ष एवं नामी उधोगपति ललित मोदी से जुडा मामला हैं। मध्य प्रदेश  के कुख्यात व्यापम स्कैम  की जांच को इस साल जुलाई में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देष पर सीबीआई के हवाले कर दिया गया था।  मामले में सीबीआई की जांच कछुआ गति से चल रही है। मध्य प्रदेश  व्यावसायिक परीक्षा मंडल बोर्ड (व्यापम) से जुडे इस घोटाले में 2000 से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। 40 से ज्यादा आरोपी और पीडितों ने या तो खुदकुषी कर ली है, या उनका कत्ल किया जा चुका है। इतना सब होने के बावजूद सीबीआई को मध्य प्रदेश  के मुख्यमंत्री कार्यालय का रिकार्ड  खंगालने की जरुरत महसूस नही हुई। वजह साफ है कि मध्य प्रदेष में भाजपा की सरकार है, इसलिए सीबीआई वहां के मुख्यमंत्री पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है अथवा उसे “ऊपर“ से हरी झंडी नहीं मिली है। इसी तरह ललित मोदी से जुडे 1700 करोड रु के घोटाले में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया  और विदेश  मंत्री सुशमा स्वराज का नाम आया है। इस घोटाले को लेकर विपक्ष संसद की कार्यवाही को भी बाधित कर चुका है। प्रवर्तन निदेशालय ललित मोदी को भगौडा घोषित कर चुका है। विपक्ष इस मामले की सुप्रीम कोर्ट  की निगरानी में  जांच  की मांग कर चुका है मगर सरकार ने मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया है।  “भगौडे“ ललित मोदी को स्वदेश  लाने के गंभीर प्रयास तक नहीं किए जा रहे हैं।  पंजाब में अकाली मंत्रियों पर “घूसखोरी“ के  सार्वजनिक आरोप लग रहे हैं। निसंदेह, देश  में रिश्वतखोर  और घोटालाबाजों को बख्शा  नहीं जाना चाहिए। कानून की नजर में कोई “अपना-पराया“ नहीं होता है और कानून का डंडा सब पर एक जैसा फेरा जाना चाहिए। 130 करोड आबादी वाले देश में सिर्फ वीरभद्र सिंह और राजेन्द्र कुमार ही “भ्रष्टाचार “ में संलिप्त हों, इस पर सहज में  विश्वास  नहीं किया जा सकता। इन हालात में वीरभद्र सिंह और दिल्ली मुख्यमंत्री कार्यालय पर सीबीआई की कार्यवाही “बदले की भावना“ से प्रेरित नजर आ रही है।

बुधवार, 16 दिसंबर 2015

Inflation Hitting Commonman Hard

                                                    महंगाई मार गई

मोदी सरकार के राज में भी महंगाई आम आदमी की कमर तोड रही है। विपक्ष में रहते भाजपा मनमोहन सिंह सरकार को महंगाई के लिए कोसा करती  थी  और इस पर काबू पाने की डींगे हांका करती थी। मनमोहन सिंह सरकार के दस साल के शासन को “ सर्वनाश  का दश क ( डिकेड ऑफ डिके)“ बताते हुए भाजपा ने आम आदमी के लिए “सौ दिन में अच्छे दिन“ लाने का वायदा किया था। चुनावी सभाओं में 56 इंच का सीना ठोंककर कहा जाता था कि “ जमाखोरी और कुप्रबंध  के कारण देश  को महंगाई झेलनी पड रही है। मोदी सरकार के आते ही महंगाई पर अविलंब नियंत्रण पा लिया जाएगा। मोदी सरकार को सत्ता में आए 600 से ज्यादा दिन हो गए हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री 30 से ज्यादा विदेशी  यात्राएं कर चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल की कीमते 11 आल के न्यूनतम स्तर पर है। पेट्रोल और डीजल  पर  शुल्क लगाकर मोदी सरकार अच्च्छी खासी कमाई करके  माला-माल हो रही  है।   व्यापारी, ट्रांसपोटर और अन्य कारोबारी भी सस्ते पेट्रोल-डीजल का फायदा उठा रहे हैं। मगर आम आदमी है कि  सस्ते पेट्रोल-डीजल के जमाने में भी उसे अधिक यात्री भाडा चुकाना पड रहा है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हुई है। आसमान को छूती  कीमतों के कारण  दालें आम आदमी की रसोई से बाहर हो गई हैं । मौसमी सब्जियों और फल सस्ती होने का नाम नहीं ले रही हैं। बाजार में पिछले डेढ साल के दौरान न तो दालों के दामों में गिरावट आई और न ही फल सब्जी के दाम गिरे हैं मगर सरकार के आंकडे पिछले माह (अक्टूबर) तक कह रहे थे कि थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित थोक मुद्रा स्फीति  शून्य  से नीचे चली गई  है । यानी देश  में थोक वस्तुओं के दामों में जबरदस्त गिरावट आई है। अब नवंबर माह में प्याज और दालों की कीमतें बढने से थोक मूल्य सूचकांक में 1.82 फीसदी का उछाल आया है मगर  अभी भी यह  शून्य  से नीचे ही है और पिछले तेरह माह से लगातार शून्य से नीचे टिका हुआ है। अक्टूबर में जहां थोक मूल्य सूचकांक माइनस 3. 81 फीसदी था, नवंबर में यह बढकर माइनस 1.99 फीसदी था। रिटेल मुद्रा स्फीति में भी उछाल आया है और नवंबर में यह बढकर 14-माह के उच्च स्तर 5.41 फीसदी पहुंच गई है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल के कारण नवंबर में रिटेल मुद्रा स्फीति और थोक मुद्रा स्फीति दोनों में इजाफा हुआ है। आकंडों के अनुसार खाद्य वस्तुओं की कीमतें निरंतर बढ रही हैं। नवंबर में खाद्य वस्तुओं की कीमतों में 2. 3 फीसदी का इजाफा हुआ। अगस्त से अक्टूबर की तिमाही में खाद्य वस्तुओं के दामों में लगातार वृद्धि हुई है। भारतीय मुद्रा रुपया डॉलर की तुलना में लगातार कमजोर होता जा रहा है। इस समय रुपया 27-माह के न्यूनतम स्तर को छू रहा है।इससे साफ है तेल की कीमतों में निरंतर गिरावट और अर्थव्यवस्था के मजबूत आधार के कारण जो अपेक्षाकृत एडवांटेज  मिल रही है, वह अब हाथ से फिसलती जा रही है। इस बात में शक नहीं है कि मनमोहन सिंह सरकार की तुलना में मोदी सरकार के  शासन में देश  की आर्थिक स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। राजनीतिक स्थिरता और नीतिगत स्थायित्व से निवेशकों का भरोसा बढा है पर देश  में व्याप्त असहिष्णु मौहाल  ने सब गुड-गोबर कर दिया है। टकराव की राजनीति के चलते संसदीय कार्य  भी सुचारु रुप से नहीं चल रहा है। गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) बिल का पारित होना देश  हित में है। इससे महंगाई कम हो सकती है मगर राजनीतिक दल इस मामले में भी आम सहमति नहीं बना पा रहे हैं। बहरहाल, आम आदमी को इन सब बातों से कोई सरोकार नहीं है। उसकी  सरकार से ज्यादा अपेक्षा नहीं रहती है। महंगाई आम आदमी को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। सरकारी आंकडे नीति निर्धारण के लिए तो उपयोगी हो सकते हैं मगर इनसे आम आदमी के पल्ले कुछ भी नहीं पडता है। बाजार में अगर दाल-सब्जियां, दूध-घी और आटा-चावल सस्ता है तो उसके अच्छे दिन हैं। और अगर ये सब चीजें महंगी हैं, तो सरकार की स्वच्छ और उज्जवल छवि एव   भ्रष्टाचार  मुक्त सुशासन भी उसके किसी काम  का  नहीं।

मंगलवार, 15 दिसंबर 2015

Stop Deriving Political Mileage Out Of Every Tragedy

                                               हर मामले में सियासत बंद होनी चाहिए 

दिल्ली की  शकुर बस्ती में अतिक्रमण हटाने के मामले में भी सियासी दलों द्वारा “राजनीतिक रोटियां“ सेंकना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। समकालीन राजनीतिक दलों को तो जैसे हर छोटे-बडे मामले को सियासी रंगत देने की लत पड गई हो। शनिवार रात पश्चिम  दिल्ली की शकूर बस्ती में अवैध झुग्गियों को हटाने के दौरान एक बच्ची की मौत हो गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इसके लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहराया है।  रेलवे का स्पष्टीकरण  है कि बच्ची की मौत अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई  शुरु करने से  दो घंटे पहले ही हो गई थी। मगर पोस्ट-मॉर्टम  रिपोर्ट साफ़  बताती है कि  बच्ची की मौत अतिक्रमण कार्रवाई के बाद हुई है ।केजरीवाल ने इस बात पर दुख जताया है कि भीषण  सर्दी में देर रात को अतिक्रमण हटाए गए। यह अमानवीय कार्रवाई है। हाई कोर्ट ने भी इसकी  निंदा की है।सारी रात 2000 परिवार खुले आसमान के नीचे सर्दी में ठिठुरते रहे। रेलवे को बच्चों पर भी तरस नहीं आया। केजरीवाल ने पीडितों को समय पर खाने-पीने की वस्तुएं मुहैया नहीं कराने में विफल रहने पर दो एसडीएम समेत तीन अधिकारियों को सस्पेंड कर दिया है। सोमवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के बीच इस घटना को लेकर वाक युद्ध जारी रहा। इस बार भी राहुल गांधी दौडे-दोडे शकुर बस्ती पहुंचे और इस घटना के लिए दिल्ली सरकार को जिम्मेदार ठहराया। राहुल का आरोप था कि झुग्गियां गिराने में दिल्ली सरकार की भी भूमिका रही है। कांग्रेस उपाध्यक्ष के आरोप से तिलमिलाए मुख्यमंत्री केजरीवाल ने राहुल गांधी को “ राजनीति में बच्चा (किड) तक कह डाला। हमेशा  की तरह, इस बार भी मूल मुद्दा दरकिनार कर सभी राजनीतिक दल पीडितों की सहानुभूति बटोरने में लगे हैं। सोमवार को संसद में भी यह मामला उठाया गया और इस पर हंगामा भी हुआ। केन्द्रीय मंत्री वैंकेया नाडु ने भी संसद में माना कि अतिक्रमण हटाने के लिए गलत समय चुना गया। सर्दी में हजारों लोगों को बेघर करना कोई जनहित कार्रवाई नहीं है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपनी राजनीतिक जमीन पक्की करने के लिए हर घटना पर पीडितों का दुख-दर्द  (?) बांटने सबसे पहले पहुंच जाते हैं। शकुर बस्ती के पीडित परिवारों के समक्ष राहुल दहाडे “ जब कभी कोई स्लम  बस्ती तोडी जाए, मेरे पास आ जाइएगा, तोडने नहीं दूंगा“। इससे पता चलता है कि देश  के समकालीन नेता “वोट बैंक“ पक्का करने के लिए किस हद तक जा सकते हैं। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की झुग्गियों में खासी पैठ है, इसलिए पार्टी को पीडितों की ज्यादा चिंता सता रही है। एक जमाने में झुग्गी-झोपड बस्ती वाले कांग्रेस के पक्के वोटर हुआ करते थे मगर “ आम आदमी पार्टी“ के उदय के बाद कांग्रेस का यह जनाधार भी खिसक गया। इसी बात के दृष्टिगत  राहुल गांधी शकुर बस्ती गए और वहां भाजपा की बजाय “आप“ को आडे हाथ लिया। भाजपा का झुग्गी वालों से ज्यादा समर्थन नहीं मिला, इसलिए इस बस्ती से अतिक्रमण हटाने को हरी झंडी दे दी। बहरहाल, शकुर बस्ती प्रकरण ने फिर वही सवाल खडा कर दिया है कि इस तरह की अवैध बस्तियों को बसने ही क्यों दिया जाता है? शकुर बस्ती रेलवे की प्राइम प्रॉपर्टी है। इस समय इसकी कीमत 6000 करोड रु बताई जाती है। रेलवे तो क्या कोई भी विभाग इतनी बेशकीमती संपति को जाया नहीं रहने दे सकता। शकूर बस्ती की तरह  दिल्ली में रेलवे की जमीन पर करीब 52 अवैध बस्तियां है और इनमें 50,000 के करीब लोग  रहते हैं। हैरानी इस बात की है कि इन बस्तियों को बाकायदा बिजली के कनेक्शंस  दिए गए हैं। अगर ये बस्तियां रेलवे की जमीन पर अवैध तरीके से बनाई गई हैं, तो इन्हें बिजली के कनेक्शंस क्योंकर दिए गए?  जाहिर है झुग्गियों को बसाने में सियासी दलों की अहम भूमिका रहती है। वैसे दिल्ली सरकार अपनी जगह सही है। आप सरकार ने रेलवे से तब तक अवैध बस्तियों से अतिक्रमण नहीं हटाने का अनुरोध कर रखा है, जब तक वह झुग्गियों में रहने वालों की पुख्ता पुनर्वास व्यवस्था न हो जाए। केजरीवाल सरकार ने अगले पांच साल में स्लम में रहने वालों के लिए पक्के मकान  बनाने का वायदा कर रखा है। इस स्थिति के  मद्देनजर  शकुर बस्ती से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में भी राजनीति की “बू“ आ रही है।  हर बात में सियासी फायदा लेने की प्रवृति बंद होनी चाहिए।

रविवार, 13 दिसंबर 2015

Try Salt Therapy For Effective Treatment of Respiratory Illnesses

Have you ever heard of "Salt Therapy or Speleotherapy. It is believed to be one of the most effective natural therapy for the treatment of Asthma. My close relations have been suffering from respiratory illnesses for long and have tried all sort of treatment.  Asthma patients generally use inhalers (medicines) to fight the decease but end up with a number of side effects. The salt therapy is a natural form of treatment that provides symptomatic relief to the patients from respiratory problems, and  without any side-effect. People have  benefited from salt therapy (speleotherapy with Himalayan salt) to relieve respiratory  diseases, improve skin conditions and strengthen their immune systems. People of all ages can benefit from the natural healing properties found in Himalayan salt through halotherapy – salt therapy in a man made salt cave to help with. Contrary to  the name, the Himalayan salt is not extracted from alpine caves but  is a table salt, stripped of minerals and bleached, in a freak of nature.  Sea salts, unfortunately, are becoming more and more polluted as the oceans fill up with toxins. Real Salt, mined from ancient sea beds, is untainted by toxins and provides a rich source of 60+ trace minerals. Himalayan salt is mined from ancient sea beds, so it is pure from modern environmental toxins. It provides a whopping 84 trace minerals, plus a unique ionic energy that is released when the salt is mixed with water. As it turns out, Real Salt, Celtic Salt, and Himalayan Salt share the same number and type of minerals. Unfortunately.  “84 minerals” in Himalayan salt is still unsupported claim. However, Himalayan salt benefits include supporting weight loss, detox, and balanced hormones. You can even use it in your home improve air quality also. As the Himalayan salt is inhaled, it travels through the sinuses and respiratory tract absorbing moisture, cleansing, clearing mucus and killing bacteria. Himalayan salt has long been known for its anti-inflammatory and anti-bacterial properties as well as helping to loosen mucus build up and phlegm, help with asthma treatment and bronchial conditions. Studies have shown that people with chronic upper respiratory conditions, seasonal allergies, sinusitis, bronchitis and skin disorders can derive significant benefits from salt therapy. Salt therapy can also help prevent respiratory viruses, including the common cold and flu. Children and adults who experience chronic or multiple colds throughout the year due to day cares, schools, or poor ventilation in the work environment can benefit greatly from Halotherapy. In addition to helping with respiratory illnesses, salt therapy can help many common skin diseases including: eczema, psoriasis, and acne. Salt therapy also promotes stress reduction through the production of negative ions to boost the immune system and reduce chronic stress and fatigue. Halotherapy is 100% natural, safe, and drug free treatment. It provides effective long-term relief and it can be used as a complementary treatment to prescribed medications or as a sole treatment. Halotherapy works exceedingly well for children.  shown that people with chronic upper respiratory conditions, seasonal allergies, sinusitis, bronchitis and skin disorders can derive significant benefits from salt therapy. Actually, just about anyone can benefit from Halotherapy.

शनिवार, 12 दिसंबर 2015

Fate of GST Bill Hangs in Balance

                                   जीएसटी बिल पर असमंजस

लंबे समय से लंबित गुडस एंड सर्विस टैक्स बिल इस बार भी लटकता नजर आ रहा है।  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को  नेशनल हेराल्ड मामले में अदालत  में घसीटे जाने से पार्टी तिलमिलाई हुई है। दिल्ली की एक अदालत ने नेशनल हेराल्ड की संपति को कथित तौर पर हडपने के लिए सोनिया गांधी और राहुल गांधी को  19 दिसंबर को  पेशी  पर तलब किया है। कांग्रेस इस मामले को  मोदी सरकार की “बदले की कार्रवाई“ बता रही है जबकि अदालत में यह मामला भाजपा नेता सुब्रह्यण्यम स्वामी ने दायर किया है। कांग्रेस का आरोप है कि मामला सौ फीसदी “राजनीतिक“ है, इसलिए पार्टी इसका जबाव भी राजनीतिक अंदाज में ही देगी। कांग्रेस के पास सरकार को झुकाने का बहृास्त्र भी है। मोदी सरकार को राज्यसभा में जीएसटी बिल को पारित करवाने के लिए कांग्रेस के समर्थन की दरकार है। सरकार के पास राज्यसभा में दो-तिहाई तो क्या, स्पष्ट  बहुमत भी नहीं है। इसी कारण जीएसटी बिल राज्यसभा से पारित नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस के पास यही बहृास्त्र है और  इसका इस्तेमाल करके पार्टी मोदी सरकार से मोल-तोल करने की फिराक में है। लोकसभा इस बिल को काफी पहले पारित कर चुकी है। जीएसटी का मामला पिछले 15 सालों से लटका पडा है। साल 2000 में अटल बिहारी सरकार ने पपश्चिम  बंगाल की मार्क्सवादी सरकार के वित्त मंत्री असीम गुप्त की अध्यक्षता में जीएसटी की रुपरेखा तैयार करने के लिए समिति का गठन किया था। इस समिति की रिपोर्ट  आने के बाद 28 फरवरी 2006 को अपना बजट पेश  करते समय तत्कालीन वित मंत्री पी चिंदबरम  ने 1 अप्रैल, 2010 से जीएसटी को लागू करने का ऐलान किया था। इसे समय पर लागू करने के लिए 2007 में राज्यों के वित्त मंत्रियों की एमपावर्ड  कमेटी भी बनाई गई। नवंबर, 2007 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी दे दी। अप्रैल, 2008 को इस कमेटी ने अपनी अंतिम रिपोर्ट केन्द्र सरकार को सौंप दी मगर छह साल तक मामला लटका रहा। 19 दिसंबर, 2014 को जीएसटी बिल लोकसभा में पेश  किया गया और सदन ने 6 मई, 2015 को इसे ध्वनि मत से पारित भी कर दिया मगर राज्यसभा में यह बिल आज तक पारित नहीं हो पाया है। सरकार ने जीएसटी को एक अप्रैल, 2016 से लागू करने का ऐलान कर रखा है। मगर ताजा हालात बताते हैं कि जीएसटी बिल मौजूदा  शीतकालीन सत्र में पारित होने से रहा। कांग्रेस ने स्पष्ट  कर दिया है कि ताजा स्थिति में वह इस बिल का फिलहाल समर्थन नहीं करेगी। पिछले सप्ताह कांग्रेस ने जीएसटी बिल पर पार्टी समर्थन के लिए कुछ शर्तें रखीं थीं। इनमें जीएसटी में कर की अधिकतम सीमा 18 फीसदी की संवैधानिक व्यवस्था और उत्पादकों  पर एक फीसदी  शुल्क न लगाने की शर्तें प्रमुख थीं। मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्यण्यम पैनल ने भी उत्पादकों पर एक फीसदी कर को निरस्त करने की सिफारिश  की है मगर यह जीएसटी की अधिकतम संवैधानिक व्यवस्था के पक्ष में नहीं है। पैनल जीएसटी कर को 18 फीसदी से कम रखने के पक्ष में है। सरकार ने इन्हें मान लिया  और इसके बाद लग रहा था कि जीएसटी बिल चालू सत्र में पारित हो जाएगा। कांग्रेस के अलावा हालात की नजाकत देखकर भाजपा के सहयोगी दल शिवसेना भी जीएसटी  बिल पर अपना विरोध दर्ज किया है। शिवसेना का कहना है कि जीएसटी से मुंबई महानगर पालिका जैसी समृद्ध स्थानीय निकाओं को खासा राजस्व का नुकसान हो सकता है। मुबंई महानगरपालिका (मनपा) को इस समय चुंगी से ही सालाना 8000 करोड रु का राजस्व मिल रहा है। इस नुकसान की भरपाई कैसे होगी, शिवसेना इस पर स्पष्ट  व्यवस्था की पक्षधर है। बहरहाल, संसद का  शीतकालीन सत्र 23 दिसंबर को समाप्त हो रहा है और तब तक अगर कांग्रेस इसी तरह संसद की कार्यवाही बाधित करती रही, तो जीएसटी बिल का पारित होना मुमकिन नहीं हो पाएगा। जीएसटी बिल के अगले वित्तीय साल से लागू नहीं होने की स्थिति में देश  के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 2 फीसदी का नुकसान हो सकता है। कांग्रेस को यह बात समझनी होगी।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

India-Pakistan Composite Dialogue

                                                          भारत-पाक सौजन्यता

भारतीय सिनेमा के एक लोकप्रिय गीत के बोल कुछ इस तरह से हैं“ खिलते हैं गुल यहां, खिल के बिखरने को; मिलते हैं दिल यहां, मिल के बिछडने को“। भारत और पाकिस्तान के बीच प्रकारांतर से जारी द्धिपक्षीय वार्ता पर यह गीत सही मायने में चरितार्थ होता है। विभाजन के बाद से आज तक दोनों पडोसी देशों  के बीच द्धिपक्षीय संबंधों को सुधारने के लिए  वार्ताओं के कई  दौर हो चुके हैं। तीन बार-शिमला, आगरा और लाहौर- शिखर सम्मेलन हो चुके हैं। तीन बार -1965, 1971 और 1999 में कारगिल- दोनों का युद्ध में भी सामना हो चुका है। पाकिस्तान ने हर वार्ता  अथवा शिखर सम्मेलन के बाद भारत का भरोसा तोडा है। 1971 में भारत से रणभूमि में बुरी तरह से मुंह की खाने और बांग्लादेश  के पाकिस्तान से अलग होने पर खिसखिसाए पाकिस्तान ने जुलाई, 1972 में शिमला समझौता किया था। इस समझौते के तहत पाकिस्तान ने पुराने संबंधों की कडुवाहट भुलाकर अमन-चैन से रहने का संकल्प लिया था। इसी के फलस्वरुप 1976 में दोनों देशों  के बीच रेल सेवाएं भी शुरु की गईं। मगर पाकिस्तान लौटते ही भुट्टो ने भारत के साथ “हजार साल तक युद्ध लडने“ का ऐलान कर डाला। 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पाकिस्तान की यात्रा पर गए और लाहौर समझौता हुआ मगर इसके तत्काल बाद कारगिल में अचानक आक्रमण करके पाकिस्तान ने संबंधों की होली जला डाली। फिर 2001 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति  जनरल परवेज मुशर्रफ के बीच आगरा में शिखर वार्ता  हुई और एक नया समझौता हुआ। अभी इस समझोते की स्याही सूखी भी नहीं थी कि पाकिस्तान की शह पर आतंकियों ने दिसंबर, 2001 को भारत की सवोच्च संस्था संसद पर ही हमला करने की कोशिश  की। इस हमले के नतीजतन भारत और पाकिस्तान के बीच न्युक्लियर वार का खतरा तक मंडराने लग पडा था। तब जैसे-तैसे मामला शांत हुआ और कुछ काँफिडेंस बिल्डिंग कदम उठाए गए। 2003 में युद्ध विराम को लेकर समझौता हुआ। संबंध सुधारने के लिए लाहौर-दिल्ली बस चलाई गई। इतना सब होने के बावजूद पाकिस्तान से हमारे संबंध सुधरे नहीं । अस्सी  के दशक के बाद से तो दोनों देशों  के बीच संबंध बिगडते ही गए । पहले सियाचिन पर टकराव, फिर 1989 में कश्मीर  को आतंक की दस्तक, पाकिस्तान का न्युक्लियर टेस्ट, कारगिल युद्ध, संसद पर हमला, मुंबई में नरसंहार जैसी कई ऐसी त्रासदियां हैं, जिनमें स्पष्ट  रुप से पाकिस्तान का हाथ रहा है। विभाजन के बाद से अब तक झेलम में इतना पानी बह चुका है कि दोनों देशों  की अवाम के बीच भी उतरोत्तर दूरियां बढती ही जा रही हैं। बीबीसी द्वारा 2014 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 49 फीसदी भारतीय पाकिस्तान को भरोसेमंद नहीं मानते हैं। मात्र 19 फीसदी ही पाकिस्तान को अच्छा मानते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान की 58 फीसदी अवाम भारत के प्रति दुर्भावना रखती  हैं। केवल 21 फीसदी पाकिस्तान भारत से मधुर संबंध रखने के पक्ष में है। अस्सी के दशक में यह स्थिति अलग थी। तब 45 फीसदी पाकिस्तानी भारत के साथ मैत्रीपूर्ण  संबंध के पक्ष में थे और 48 फीसदी भारतीय भी यही चाहते थे। भारत के जनमानस की राय ली जाए तो वे यही कहेंगे कि पाकिस्तान कतई भरोसेमंद लायक नही है। उसकी नीयत में खोट है और उसकी मित्रता भी “मुंह में राम, बगल में छुरी“ जैसी है। विदेश  मंत्री सुषमा  स्वराज ने भले ही पाकिस्तान के साथ दोस्ती का हाथ बढाया है, मगर वे भी बखूबी जानती है कि पाकिस्तान पर जरा भी विश्वास  नहीं किया जा सकता। जब तक पाकिस्तान आतंकियों को भारत में हिंसा फैलाने के लिए उकसाने से बाज नहीं आएगा, बेहतर संबंध की उम्मीद नहीं की जा सकती। पडोसी कितना भी कुटिल क्यों न हो, उससे उलझाए रखना सामरिक विवशता होती है। एक-दूसरे को वार्ता  में उलझाए रखना दोनों देशों  की सामरिक विवशता है। 2016 में पाकिस्तान 19वीं सार्क शिखर सम्मेलन का मेजबान है और भारत के बिना यह सम्मेलन अर्थहीन है। भारत मार्च-अप्रैल में टी20 वर्ल्ड का मेजबान है। पाकिस्तान के बगैर यह कप नीरस हो जाएगा।  यही विवशता, संभवतय, दोनों को वार्ता के द्धार पर खींच लाई है।

गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

Gandhis Should Trust Judiciary

                                     न्यायपालिका पर भरोसा रखे

कांग्रेस  अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नेशनल हेराल्ड समाचार पत्र के मामले में  दिल्ली की एक अदालत ने अब 19 दिसंबर को हाजिर होने का कहा है। दिल्ली स्थित पटियाला हाउस कोर्ट ने पहले उन्हें मंगलवार (8 दिसंबर)  को अदालत में हाजिर होने को कहा था। मगर मंगलवार को कोई भी  आरोपी पेश  नहीं हुआ। राहुल गांधी तमिल नाडु में बाढ का जायजा लेने चेन्नई गए हुए थे। सोनिया गांधी ससद सत्र में व्यस्त थीं। मामले के एक अन्य आरोपी सैम पित्रोदा लंदन में थे और अगर कोई दिल्ली में था भी, तो भी अदालत में पेश  नहीं हुआ। इन तीनों के अलावा कांग्रेस के  वयोवृद्ध  नेता मोती लाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडिस और पत्रकार सुमन दुबे भी  नेशनल हेराल्ड मामले में आरोपी हैं।  आरोपियों के वकील मनु सिघंवी ने अदालत को बताया कि सभी हाजिर होने को तैयार हैं। अदालत ने  आरोपियों को मंगलवार की पेशी  से छूट देते हुए, अब 19 दिसंबर को तलब किया है। मामला अदालत में है मगर इसकी गूंज संसद में सुनाई दे रही है। कांग्रेस ने मोदी सरकार पर “प्रतिशोधात्मक कार्रवाई“  का आरोप लगाते हुए मंगलवार को संसद नहीं चलने दी और बुधवार को भी।  कांग्रेस ने जीएसटी बिल को समर्थन नहीं देने की धमकी भी दी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने यहां तक कह दिया कि वे इंदिरा गांधी की बहू हैं, किसी से डरती नहीं हैं“।  हंगामे की वजह से मंगलवार को तीन बार लोकसभा और पांच बार राज्यसभा की कार्यवाही को स्थगित करना पडा। बुधवार को दोनों सदनों में कांग्रेस ने नेशनल हेराल्ड मामले को लेकर जमकर हंगामा किया।  तृणमूल कांग्रेस ने लोकसभा में कांग्रेस का साथ दिया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ शब्दों में कहा कि समन अदालत ने जारी किए  हैं , सरकार ने नहीं। कांग्रेस अगर सदन में इस पर बहस करानी चाहती है, सरकार तैयार है। बुधवार को भी इस मामले में आरोप-प्रत्यारोप के दौरे चलते रहे। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी दहाडे “ मामला सौ फीसदी पॉलिटिक्ल है। यह पूरी तरह से बदले की कार्रवाई है और सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश  जारी हुए हैं। राहुल के जवाब में भाजपा के प्रवक्ता राजीव प्रताप रूढी ने कहा कि अगर राहुल में दम है तो संसद में प्रमाण देकर खुद को निर्दोष  साबित करें। केन्द्रीय मंत्री  वैंकेया नाडु ने तो सीधे-सीधे कांगेस पर “संसद के माध्यम से न्यायपालिका“ को डराने का आरोप जड दिया। बहरहाल, कांग्रेस ने पूरे मामले को राजनीतिक रंग दे दिया है। इससे लग रहा है कि कांग्रेस को यह मामला परेशान कर रहा है। इस मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी और अन्य पर आरोप हैं कि इन सभी ने आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले चर्चित समाचार पत्र नेशनल हेराल्ड की संपति को अवैध तरीके से हडप लिया। इस मामले में भारतीय जनता पार्टी के नेता सुब्रह्यण्यम स्वामी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और न्यायालय ने प्रथम दृष्टया  आरोपों को ठोस माना है।  मामले को रुकवाने के लिए  कांग्रेस दिल्ली उच्च न्यायालय भी गई मगर वहां से उसे कोई राहत नहीं मिली। मामला भाजपा नेता  सुब्रह्यण्यम स्वामी ने चलाया है, इसलिए कांग्रेस इसे “प्रतिशोधात्मक कार्रवाई“ बता रही है। स्वामी न हाल ही में राहुल गांधी पर ब्रिटिश  नागरिकता होने के प्रमाण भी दिए थे और उनकी संसद सदस्यता को निरस्त करने की मांग भी की थी।  हिमाचल प्रदेश  के कांग्रेसी मुख्यमंत्री के खिलाफ  सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को भी राजनीति से प्रेरित“ माना जा रहा है। राजस्थान में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ भी जांच की जा रही है। इस बात को दुनिया जानती है कि सीबीआई “सरकार का तोता है“ और प्रवर्तन निदेशालय भी सरकार के इशारे पर काम करता है। इस बात के दृष्टिगत  कांग्रेस को नेशनल हेराल्ड मामले में “ राजनीतिक प्रतिशोध“ की बू आ रही है मगर मामला अदालत में है, इसलिए कांग्रेस के आरोपों में दम नहीं लगता है। देश  की न्यायपालिका की निष्पक्षता  पर जनमानस को आज भी पूरा भरोसा है। कांग्रेस को न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए। सोनिया गांधी और राहुल गांधी समेत अन्य कांग्रेसी नेता अगर नेशनल हेराल्ड मामले में निर्दोष  हैं , तो फिर डर काहे का। सरकार राजनीतिक बदले की भावना से काम कर सकती है, न्यायपालिका नहीॅ।

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

India Registers Historical Series Win vs South Africa

                                      भारत की    शानदार जीत

“शुक्र है पिच को लेकर कोई भी बात नहीं कर रहा है, यहां तक कि दक्षिण अफ्रीका का अंतिम बल्लेबाज भी सीधी गेंद पर आउट हुआ (थैंक गॉड, नो वन इज टाल्किंग अबॉउट  दी पिच, ईवन लास्ट  साऊथ अफ्रीकन बेटसमैन गोट आउट टू ए स्ट्रैट बाल“, महान बल्लेबाज और कमेंटेटर   सुनील गावस्कर ने दिल्ली में चौथे टेस्ट में भारत की  शानदार जीत पर यह प्रतिकिया व्यक्त की। क्रिकेट में हारने वाली टीम का पिच को दोषी ठहराना कोई नई बात नहीं है। भारत ने इस बार दुनिया की नंबर वन टेस्ट टीम दक्षिण अफ्रीका को हराकर नया इतिहास रचा है। और जीत भी ऐसी कि दक्षिण अफ्रीका चार टेस्ट मैचों की श्रृंखला में एक भी जीत नहीं पाया। यानी कि कलीन स्वीप। कहते हैं “ खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे“। हार की खीज मिटाने के लिए दक्षिण अफ्रीका के क्रिकेट एक्सपर्ट्स  की फिरकी गेंदबाजी फ्रेंडली पिच को दोषी  मान रहे हैं।  जिस टीम में एबी डिविलियर्स, हाशिम मला, डू प्लेसिस और डुमिनी जैसे नामी-गिरामी बल्लेबाज हों, वह इतनी बुरी  तरह से हार जाए, इस पर सहज में विश्वास  नही होता। और-तो-और टेस्ट खेलने के माहिर माने जाने वाले कप्तान हाशिम अमला भी नहीं चले।  जिस बल्लेबाज की  टेस्ट  कैरियर बैटिंग औसत 50. 64 और स्ट्राइकिंग औसत 77 के करीब रही हो, वह अगर दिल्ली जैसी पिच पर 11.11 की स्ट्राइकिंग औसत से बल्लेबाजी करे, तो हैरानी तो होगी ही। मगर नागपुर को छोड दिया जाए तो मोहाली और दिल्ली की पिचों पर भी दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज रन नहीं बना पाए। भारत के कप्तान विराट कोहली और दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हाशिम अमला दोनों ने माना था कि मोहाली की पिच खेलनेयोग्य (प्लेबल) थी। दिल्ली टेस्ट में तो अमला ने टेस्ट मैच पारी के इतिहास में 200 गेंदों में मात्र  11.11 की औसत से रन बनाकर  टेस्ट इतिहास में एक नया रिकार्ड  बनाया है। और भी कई रिकार्ड  टूटे। 75 ओवर में मात्र 75 रन और वह भी तब जब क्रीज पर डिलिलियर्स  और अमला जैसे धुरंधर बल्लेबाज खेल रहे हों। दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाजों की कछुआ चाल रनों के लिए धीमी पिच को दोषी  नहीं माना जा सकता। इसी पिच पर भारत के बल्लेबाज अजिंके रहाणे ने पहली बारी में चार छक्कों के साथ 127 और दूसरी पारी में तीन छक्कों के साथ नाबाद 100 रन बनाए। रहाणे दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ दोनों पारियों में शतक जडने वाले पहले भारतीय बल्लेबाज भी हैं। इससे साफ है कि फिरोजशाह कोटला की पिच में कोई दोष  नहीं था। इस मामले में दक्षिण अफ्रीका के कोच  रसल डोमिंगो की प्रशंसा की जानी चाहिए कि उन्होंने पिच को दोषी ठहराने की बजाय अपने बल्लेबाजों की खराब तकनीक, अप्रोच और अनुभवहीनता को हार के लिए ज्यादा जिम्मेदार माना। और सच भी यही है। मैच हार जाने के बाद पिच को दोषी  नहीं ठहराया जा सकता। मैच से पहले टीम के कप्तान और कोच पिच का मुआयना करते हैं। पिच पर बाल टर्न करेगी या नहीं, इस बात का कुछ-न-कुछ अनुमान लग ही जाता है। नागपुर की पिच पर पहले ही दिन से बाल बाउंस कर रहा था। पिच पर सीम और अनइवननैस भी बहुत ज्यादा थी मगर दोनों टीमों ने इसे झेला। अगर भारतीय फिरकी गेंदबाजों को पिच से मदद मिल रही थी, तो यह दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाजों के लिए भी मदद कर रही थी। क्रिकेट में लेवल प्लेइंग फील्ड होती है। बहरहाल, इन्हीं पिचों पर दक्षिण अफ्रीका ने भारत को टी20 और एक दिवसीय श्रंृखला में हराया है। टेस्ट मैच तक दक्षिण अफ्रीका टीम पूरे आत्मविश्वास  से उतरी तो सही  मगर पहला टेस्ट हारते ही उसका आत्म-विश्वास   डोल गया। दक्षिण अफ्रीकी खिलाडियों को इस बात की कल्पना तक नहीं थी कि भारत टेस्ट में उन्हें हरा देगी। वे इस हार से उबर ही नहीं पाए और भारतीय गेंदबाजों के आगे ढेर हो गए।           

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

What Should Be Girl's Marriageable Age?

                   कन्या कब ब्याही जाए?

कन्या कब ब्याही जानी चाहिए? क्या नाबालिग लडकी को भी अपनी पसंद का जीवन साथी चुनने और उससे ब्याह करने का मौलिक अधिकार है और क्या हिंदू मेरिज एक्ट विवाह के तहत 18 साल की आयु से पहले लडकी को अपनी मर्जी से ब्याह करने से रोकना उसके मौलिक अधिकार का हनन नहीं है? देश  में पिछले कई सालों से लडकी की बाली उमर (विवाह योग्य) को लेकर बहस जारी है। कानून के तहत लडकी के 18 साल पूरा होने पर ही उसे बालिग माना जाता है और यही उसकी विवाहयोग्य उमर भी तय की गई है। 18 साल की उमर से पहले नाबालिग लडकी से  शादी करना और यौन संबंध रखना गैर-कानूनी है। ऐसा करने पर संबंधित व्यक्ति को अपहरण और बलात्कार के संगीन अपराध में कडी सजा दी जाती है। नाबालिग लडकी को स्वेच्छा से  शादी करना अथवा यौन संबंध बनाने का भी हक नहीं है। मोहाली की अदालत द्वारा गर्भवती नाबालिग लडकी को अपने पति और ससुराल के साथ रहने की अनुमति देकर यह बहस फिर गरमा गई है। मोहाली से पहले इसी साल सितंबर में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने भी नाबालिग लडकी के विवाह को वैध मानते हुए उसे पति के साथ रहने की अनुमति दी थी। अपनी पसंद के लडके से  शादी करने पर लडकी उच्च न्यायालय की  शरण में गई थी। निचली अदालत ने लडकी की नाबालिग उमर के  दृष्टिगत  उसे नारी निकेतन भेज दिया था क्योंकि  शादी के बाद वह अपने माता-पिता के घर नहीं रहना चाहती थी। न्यायालय ने माना कि लडकी की इच्छा के विरुद्ध उसे नारी निकेतन में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत स्वंत्रतता की भावना के खिलाफ है। अदालत का मानना था कि  शादी को इस बिला पर अवैध करार नहीं दिया जा सकता कि लडकी नाबालिग है। अदालत ने इस नाबालिग लडकी के ब्याह को वैध करार दिया। इससे पहले अक्टूबर, 2005 में दिल्ली उच्च न्यायालय और फरवरी, 2006 में आंध्र प्रदेश  उच्च न्यायालय भी नाबालिग लडकी के ब्याह को वैध करार दे चुकी हैं। इन दोनों मामलों में न्यायालय ने आरोपी व्यक्तियों (पति) को अपहरण और बलात्कार के आरोपों से भी बरी कर दिया था। जुलाई, 2013 में देश  का सर्वोच्च न्यायालय भी कह चुका है कि “लडकी को कब ब्याह जाए, यह तय करना आसान नहीं है। व्यायालय ने व्यवस्था दी कि दिल्ली और आंध्र प्रदेश  उच्च न्यायालय की व्यवस्थाओं में कोई खामी नहीं है और दोनों न्यायालय अपनी जगह सही हैं। वैसे 2012 तक कानून के तहत स्वेच्छिक सेक्स के लिए कन्या की आयु 16 साल रखी गई थी। मणिपुर में लडकी को 14 में ही बालिग माना जाता है और उसे स्वेच्छिक सेक्स का अधिकार भी दिया गया है।  2013 में केन्द्र सरकार ने भी लडकी के लिए स्वेच्छिक सेक्स (कंसेन्सुअल  सेक्स) की आयु 16 करने का बिल संसद में लाया था मगर कुछ लोगों के कडे विरोध के कारण इसे वापस ले लिया गया। यानी न्यायालय तो न्यायालय, सरकार भी मानती है कि लडकी 16 तक व्यस्क हो जाती है, इसलिए उसे  स्वेच्छिक सेक्स ( कंसेन्सुअल  सेक्स) का अधिकार दिया जाना चाहिए। पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के अलावा मुसलमानों में लडकी को 15 साल अथवा उसके यौवन की दहलीज पर (पीरियड) कदम रखते ही विवाह योग्य माना जाता है। बहरहाल, देश  में मेरिज को लेकर अलग-अलग कानून है। और न्यायालय भी इस मामले में अलग-अलग व्यवस्थाएं दे रहे हैं। इस स्थिति का ख्याल करते हुए, लडकी कब ब्याही जाए, इसका फैसला लडकी पर छोड देना चाहिए। बाल विवाह 1929 से पूरी तरह से प्रतिबंधित है मगर देश  में आज भी यह कुप्रथा बदस्तूर जारी है। गरीब और आर्थिक तौर पर पिछडे तबकों में अपनी लडकी को बेचने का चलन है। इस बात का ख्याल करते हुए लडकी का ब्याह मां-बाप के विवेक पर छोडना भी खतरे से खाली नहीं है। नारी सशक्तिकरण का जमाना है और आधुनिक नारी को अपने मनपंसद का जीवन साथी चुनने और इससे कब और कैसे ब्याह करने की पूरी छूट होनी चाहिए। ऐसे कानून का कोई मतलब नहीं जो मानव की आजादी ही छीन ले।

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

Does a Flood Ravaged Country Need "Smart Cities"?

The Chennai deluge has , once again,  badly exposed  poor urban planning in India. We haven't learnt any lesson from past mistakes. Remember, 2005 Mumbai's worst flood.   In July, 2005, 944 mm of rain fell on Mumbai in a single day, killing over 500 people. Heavy development had destroyed green spaces and mangrove forests, its natural flood protection, leaving the financial metropolis of 18 million reliant on an inadequate drainage system. And then came the Uttrakhand flash flood in 2013. In June 2013, a  cloudburst centered on  Uttarakhand caused devastating floods and landslides. It was the country's worst natural disaster since the 2004 tsunami. In September 2014, the Kashmir valley suffered the worst flooding in more than a century, killing more than 200 people and displacing almost a million for weeks. .The state administration,  was itself knocked out after the waters of the Jhelum river gushed into the city centre. It struggled for over a week to cope with the flood. In March this year, flood again ravaged the Kashmir Valley after incessant rainfall for over four days. And now Chennai disaster severely  ripping apart the capital of  coastal state after almost a century. People of Chennai, are in no doubt as to why a mix of flood waters and sewage is swilling neck-deep around parts of the  city of 6 million people after weeks of monsoon rains culminated in a 345 mm (14-inch) cloudburst in 24 hours. Experts say, as was in Mumbai, Srinagar and now in  Chennai, construction blocked storm water channels and reduced the capacity of reservoirs designed to soak up unseasonal rains. As cities grow in leap and bound, unauthorised construction along these channels and lakes chokes water flow causing flood.  Is not the nature fury alone.Bad urban planning and rampant "encroachment" by fly-by-night property developers have made the situation worse. We haven't even  worked out a reliable water management for our cities. The ambitious plans to install pumping stations, widen drains and clean waterways have remained either on papers or if executed have missed deadlines, seen  cost overruns and running behind schedule. In the given situation, the prime minister Modi's  dream project of  building " Smart Cities" doesn't appear realm. Fixing flood-prone cities  should  to be  the govt prime task. 

Narendera Modi's Fan Barack Obama

                                        मोदी के मुरीद ओबामा

कहते हैं “सम्मान और अपमान किसी की प्रतीक्षा नहीं करता और न ही किसी के वश  में होता है।  जो स्थिति आज है, वह कल नहीं रहेगी और जो कल था, उसकी आज पुनरावृति नहीं हो सकती। शा स्त्रों और ग्रंथों का यही निचोड है। इसे विडबंना ही कहा जाए कि जिन नरेन्द्र मोदी को अमेरिका समेत पूरा पश्चिम  गुजरात दंगों के चलते “अछूत“ मानता था, उन्हीं की आज वे  दिल खोलकर तारीफ करते नहीं अघा रहे हैं। अमेरिका के  राष्ट्रपति  बराक ओबामा तो नरेन्द्र मोदी के मुरीद हो गए हैं। ओबामा का मानना है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्पष्ट  नजरिया है। वे अपनी जीवन की कहानी के नायक हैं।  उनकी तथ्यों पर गजब की पकड है और मोदी अपने देश  तथा उससे  जुड़े  विभिन्न मुद्दों की अच्छी समझ रखते हैं। आर्थिक मामलों में उनके महत्वाकांक्षी विजिन से भारत को तेजी से आगे ले जाने की क्षमता नजर आ रही है। पुरातन और आधुनिकता का मिश्रण करके मोदी भारत को बुलदियों तक ले जा सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्र्पति  के मुताबिक मोदी की “चाय बेचने वाली “पृश्ठभूमि“ का ख्याल करते हुए उनका प्रधानमंत्री बनना भारतीय लोकतंत्र की गतिशीलता और भारत के उदय की क्षमता दर्शाता  है। ओबामा मोदी के कूटनीति कौशल और नेतृत्व क्षमताओं के भी कायल हैं।  भारत में अगर कोई प्रधानमंत्री की तारीफ करे तो इसे हम “ खुशामदगी“ अथवा “श्लग्या “ मान सकते हैं, मगर दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का राष्ट्रपति अगर नरेन्द्र मोदी की तारीफ करता है, तो देशवासियों का सीना  56 इंच का हो जाता है। नरेन्द्र मोदी को अभी प्रधानमंत्री बने बमुश्किल  डेढ साल का समय हुआ है मगर इतने कम समय में उन्होंने विश्व  के अग्रणी नेताओ की पंक्ति में अपनी जगह बना ली है। प्रधानमंत्री की इस छवि से निश्चित  तौर पर भारत की छवि में भी निखार आया है।  डेढ साल पहले तक जिस भारत को “घोटालों से पीडित कमजोर मुल्क“ माना जाता था, वही आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में दुनिया की बडी ताकत बनकर उभरा है। भारत की इस बढती ताकत से पाकिस्तान भी सहमा हुआ है। चीन भी भारत का लोहा मानने के लिए बाध्य हो रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत ने ग्रोथ के मामले में चीन को भी पछाड दिया है। मोदी सरकार द्वारा तेजी से आर्थिक सुधार लागू करने की राह में बाधाओं  के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट आई है और गति पकड रही है। यूरोप, जापान और चीन समेत जहां अधिकतर देश  मंदी की चपेट में है, वहीं भारत तेजी से आगे बढ रहा है।  अगले वित्तीय वर्श  में भारत की ग्रोथ 8 फीसदी को पार कर जाएगी। यह चीन की ग्रोथ से ज्यादा है। शेयर और कमोडिटी बाजार भी सुधरे  हैं । भारत का भुगतान संतुलन तीन साल पहले की तुलना में कहीं बेहतर है भले ही यह स्थिति तेल की कीमतें गिरने के कारण बनी है। राजनीतिक स्थिरता (मेक्रो स्टेबिलिटी) के कारण भारत में विदेशी  निवेश  का प्रवाह बडा है। भूमि अधिग्रहण कानून में वांछित संशोंधन नहीं होने और गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के लटके रहने के बावजूद  मोदी सरकार ने निवेशकों का भारत में भरोसा बढाया है। तथापि हाल ही में असहिष्णुता  की घटनाओं ने विदेशों , विशेषतय पश्चिम  में भारत की छवि को फिर दागदार किया है। लेकिन अच्छी बात यह है कि इससे विदेशों  में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत छवि प्रभावित नहीं हुई है। अमेरिका के  राष्ट्रपति  द्वारा प्रधानमंत्री की तारीफ करना इस बात का प्रमाण है। दरससल, पूरी दुनिया का ध्यान इस समय आतंक और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों  पर केन्द्रित है। पेरिस में आतंकी वारदात के बाद अमेरिका और उसके मित्र देश  भडके हुए हैं और इस्लामिक स्टेट के आतंकियों का सफाया करने पर आमादा है। जलवायु परिवर्तन को लेकर भी विकासशील देशों से ज्यादा विकसित देश  चिंतित है। बहरहाल, दुनिया अगर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुरीद है तो इससे अच्छी बात भारत के लिए कुछ हो ही नहीं सकती। पाकिस्तान के लिए यह मुंहतोड जबाव भी है।


शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

Chennai Deluge: A Reminder to Urban Planner

                                          चेन्नई पर प्राकृतिक कहर

तमिल नाडु की राजधानी चेनई में सोमवार से जारी बरसात ने हमें फिर सचेत किया है कि कुदरत के बनाए नियम- कायदों  को तोडने के किस कद्र गंभीर परिणाम हो सकते हैं। चेन्नई में हो रही इस बार की बारिश  ने पिछले सौ साल के रिकार्ड  तोड दिए हैं। पिछले माह भी बरसात ने चेन्नई समेत तमिल नाडु और आंध्र प्रदेश  के तटीय क्षेत्रों में भारी तबाही मचाई थी और जन-जीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया था। अभी चेन्नई इस झटके से उबरी भी नहीं थी कि मौसम की ताजा मार ने लोगों की पीडा और कष्ट  को और ज्यादा बढा दिया है। राजधानी के अधिकांश  क्षेत्र जलमग्न है। बिजली और पेयजल व्यवस्था चरमर्रा  गई है। खाने-पीने की चीजों  की भारी  किल्लत  है क्योंकि अधिकतर व्यापारिक प्रतिष्ठान , दुकानें और फल-सब्जी विक्रेता बाढ की चपेट में आ चुके है। यातायात व्यवस्था पूरी तरह से ठप्प है, न बसें, टैक्सियां अथवा ऑटो-रिक्षा चल रहें, न ही  रेलगाडियां। और-तो- और एयरपोर्ट  के बाढग्रस्त हो जाने के कारण हवाई सेवाएं भी बंद है। लोगों को स्मरण नहीं है कि अपने जीवन में उन्होंने चेन्नई में बरसात का इस कद्र कहर झेला हो। सौ साल पहले कभी ऐसी बारिश  हुई होगी मगर ऐसा चेन्नईवासियों ने सिर्फ बुजुर्गों से सुना या किताबों में पढा था। मौसम विभाग का आकलन है कि अगले एक सप्ताह तक बरसात जारी रह सकती है। इस स्थिति में स्थिति और भी भयावह हो सकती है क्योंकि तटवर्ती होने की वजह से राज्य की जमीन पानी कम सोखती है। लगातार बारिश  होने से चेन्नई  में जमीन सुपर-सेचुरेटिड हो गई है और इस कारण  शहर से निकलने वाले नदी-नालों में पानी उल्टा चढने लग पडा है। निकासी की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं होने से पानी दूसरी और तीसरी, फिर चौथी मंजिल तक चढ सकता है। चेन्नई के ताजा हालात ने सितंबर 2014 में बाढग्रसत श्रीनगर, जुलाई 2005 में पानी में डूबी मायानगरी मुंबई  और जून, 2013 में उत्तराखंड की त्रासदी की याद तरोताजा कर दी है। यानी कुदरत का कहर कश्मीर  से कन्याकुमारी और उतर से पश्चिम  तक बराबर जारी है। भारत में मानसूनी बरसात दो बार सक्रिय होती है। एक बार जून से सितंबर और फिर अक्टूबर से नवंबर में। अमूमन, दक्षिण भारत में अक्टूबर-नवंबर में मानसून सक्रिय होती है। अक्टूबर में साउथ-वेस्ट हवाओं का रुख दक्षिण की ओर बहने से तमिल नाडु, आंध्र प्रदेष और पुडुचेरी में भारी पानी बरसता है मगर इतना नहीं जितना इस बार बरस रहा है। मौसम विभाग ने एक माह पहले ही चेता दिया था कि इस बार दक्षिण की बरसात भारी तबाही मचा सकती है मगर सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। देश  की सबसे बडी त्रासदी भी यही है। समकालीन सरकारें जनहित के मामलों  पर केन्द्रित होने की बजाय राजनीतिक तिगडमें भिडाने और वोट की राजनीति को ज्यादा अहमियत देतीे हैं। देश  पर कई बार कुदरत का कहर बरप चुका है। मगर न तो उत्तराखंड से, न ही 2005 की मुंबई बाढ  और न ही कश्मीर  त्रासदी से केन्द्र और राज्यों की सरकार ने कोई सबक सीखा है।  पर्यावरण  शास्त्री भी हमें बराबर चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) के कारण मानव को अत्याधिक बारिश  और सूखे की असामान्य स्थिति का सामना करना पड सकता है। फ्रांस की राजधानी पेरिस में भी इन दिनों दुनिया भर से 50,000 के करीब विषेज्ञय   जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर माथा-पच्ची कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के अलावा बेेहिसाब बढती आबादी के कारण भारत में शहरों और कस्बों का बेतरतीब फैलाव भी बाढ की समस्या को और जटिल करती है। अधिकांश  महानगरों, शहरों और कस्बों में पानी निकास की कोई पुख्ता व्यवस्था नहीं है। और अगर कहीं है भी तो रख-रखाव नईं होने से यह समय आने पर चरमर्रा  जाती है। इस स्थिति में असामान्य बरसात पडने पर अधिकांश  शहर बाढग्रस्त हो जाते हैं। माना की मौसम की अति को टालना मानव के वश  में नहीं है, मगर इससे बचने के सुरक्षित उपाय तो किए जा सकते हैं। स्मार्ट  सिटी बनाने की  बडी-बड़ी  बातें म बेमानी लगती  हैं अगर हम घर में ही  सुरक्षित न रह पाए।  

गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

Is Kejriwal Govt's Janlokpal Bill Worst Than Uttrakhand?

                                                  केजरीवाल का जनलोकपाल

 दिल्ली में सतारूढ आम आदमी पार्टी सरकार के जनलोकपाल बिल पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अपने ही पुराने साथियों का जबरदस्त विरोध झेलना पड रहा है। भाजपा और कांग्रेस तो “आप“ सरकार के जनलोकपाल बिल को पहले ही  खारिज कर चुकी हैं। अन्ना हजारे के नेतृत्व में लडे गए भ्रष्टाचार  विरोधी आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ कंधे-से- कंधा मिलाकर चलने वाले प्रशांत भूषण  ने दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल को  “जोकपाल“ बिल बताया है। 2011 में अन्ना हजारे ने मनमोहन सिंह सरकार द्वारा संसद में पेश  लोकपाल बिल को “जोकपाल“ करार दिया था।  2011 में जनलोकपाल बिल का प्रारुप तैयार करने में प्रशांत भूषणऔर उनके पिता पूर्व मंत्री शांति भूषण  की अग्रणी भूमिका रही थी। इस बात का ख्याल करते हुए प्रशांत भूषण के आरोपों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वस्तुतः शांति भूषण  को “लोकपाल बिल“ की परिकल्पना का आर्किटेक्ट माना जा सकता है। 1968 में  शांति भूषण  ने ही पहली बार लोकसभा में लोकपाल बिल पेश  किया था और 1969 में चौथी लोकसभा ने इसे पारित भी किया था। मगर इससे पहले कि बिल को राज्यसभा द्वारा पारित किया जाता, लोकसभा को भंग कर दिया गया और यह बिल लैप्स हो गया। तब से 2013 तक लोकपाल बिल 11 बार संसद में पेश  किया गया मगर अततः 17 दिसंबर 2013 को राज्यसभा और 18 दिसंबर को लोकसभा द्वारा पारित किया गया। जनवरी 2014 में  बिल को  राष्ट्रपति  स्वीकृति मिलने पर 16 जनवरी 2014 से देश  में लोकपाल अस्तित्व में तो आ गया है मगर इसकी नियुक्ति आज तक नहीं हो पाई है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार द्वारा विधान सभा में पेश  जनलोकपाल बिल लोकपाल बिल से काफी अलग है। संसद द्वारा पारित लोकपाल और लोकायुक्त बिल से क्योंकि आम आदमी पार्टी संतुष्ट  नहीं थी, इसलिए अरविंद केजरीवाल सरकार ने विधानसभा में अलग से बिल पेष  किया है। दिल्ली से पहले उतराखंड में भाजपा सरकार जन लोकपाल की तर्ज  पर 2011 मे लोकायुक्त बिल को अमली जामा पहना चुकी है। और इस राज्य में लोकायुक्त काम भी कर रहा है मगर अभी तक  भ्रष्टाचार से संबंधित कोई बडा मामला सामने नहीं आया है। दिल्ली में आप सरकार का जनलोकपाल बिल भी उतराखंड की तर्ज पर बनाया गया है। उतराखंड की भाजपा सरकार के इस बिल की टीम अन्ना ने काफी तारीफ भी की थी मगर दिल्ली सरकार ने इसमें भी कुछ बदलाव किए हैं। प्रशांत भूषण  का कहना है कि दिल्ली का जनलोकपाल बिल तो उतराखंड से भी बदतर है। अरविंद केजरीवाल ने जानबूझकर जनलोकपाल को न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा है। दिल्ली के जनलोकपाल  के पास जांच के लिए स्वायत संस्था का भी प्रावधान नहीं है। इससे जनलोकपाल को सरकार की जांच एजेंसी पर निर्भर रहना पडेगा। प्रशांत भूषण के मुताबिक कहने को जनलोकपाल की नियुक्ति में सरकार का कोई दखल नहीं होगा मगर तीनों चयनकर्ता चूंकि सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे, इसलिए  दिखावा किया जा रहा है। दरअसल, विवाद इस बात को लेकर है कि दिल्ली जनलोकपाल बिल उतराखंड लोकायुक्त बिल से भी कमजोर है जबकि अरविंद केजरीवाल से इससे भी ज्यादा ताकतवर जनलोकपाल की उम्मीद की जा रही थी। नवंबर 2011 में बतौर टीम अन्ना सदस्य अरविंद केजरीवाल ने उतराखंड में लोकायुक्त बिल पारित किए जाने पर तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की यह कहकर चुटकी ली थी कि अगर केन्द्र का लोकपाल बिल राज्य से कमजोर हुआ तो इसकी कोई अहमियत नहीं रह जाएगी। अब यही बात दिल्ली सरकार के जनलोकपाल बिल पर भी लागू होती है। केन्द्र सरकार को अगर लगता है कि  दिल्ली में जनलोकपाल उसके लोकपाल से कमतर है तो इसे अस्वीकार भी किया जा सकता है। दिल्ली के जनलोकपाल बिल को उपराज्यपाल की स्वीकृति लेनी होगी। उपराज्यपाल वही करेंगे जो मोदी सरकार कहेगी। बहरहाल, दिल्ली में जनलोकपाल के अस्तित्व में आने से पहले ही विवादाग्रस्त होना  शुभ संकेत नहीं हैं।

बुधवार, 2 दिसंबर 2015

Dirt in Our Minds

                          मन-मस्तिष्क  में कूडा-कचरा  

देश  में व्याप्त असहिष्णुता के माहौल पर संसद के अंदर और बाहर जारी चर्चा देशहित में कम राजनीतिक रंगत में डूबी ज्यादा  लग रही है। सियासी दल असहिष्णुता पर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में लगे हैं। बुद्धिजीवी, कलाकार और साहित्यकार असहिष्णुता के विरोध में खडे तो हुए हैं मगर इस मामले में बंटे हुए नजर आ रहे हैं। वामपंथी खुलकर कुछ ज्यादा ही बोल रहे हैं। दक्षिणपंथी दबी जुबान में भी  असहिष्णुता का मुखर विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इस बात में दो राय नहीं हो सकती की   असहिष्णुता  देश  की अखंडता और एकता के लिए सबसे बडी चुनौती है। इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत में जब कभी भी  असहिष्णुता व्याप्त रही, देश  की अखंडता पर करारी चोट हुई। इतिहास हमें यह सीख भी देता है कि  असहिष्णुता ने  दुनिया में किसी भी मुल्क को सामाजिक-आर्थिक रुप से फलने-फूलने नहीं दिया।  और दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक मुल्क में तो  असहिष्णुता के लिए कोई जगह नहीं होनी  चाहिए । मोदी सरकार में  वरिष्ठ मंत्री वेंकैया नाडु ने भी सोमवार को  लोकसभा में माना कि देश  में इस समय असहिष्णुता  का माहौल है। भाजपा ने अब जाकर अपने सांसदों को नसीहत  दी है कि वे असहिष्णुता  पर आग उगलने वाली बयानबाजी से बचेॅ। इससे जाहिर है कि सतारूढ दल भी मान रहा है कि देश  में असहिष्णुता  है। बावजूद इसके सियासी दल माहौल को और तल्ख बनाने में लगे हुए  हैं। सोमवार को संसद में असहिष्णुता पर चर्चा  के दौरान मूल मुद्दे को दरकिनार कर सांसदों ने एक-दूसरे पर सिर्फ दोषारोपण किया। माकर्सवादी पार्टी (माकपा-सीपीएम) सांसद मोहम्मद सलीम के सदन में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के हवाले से  “800 साल बाद भारत में हिंदू शासक“ संबंधी बयान पर हंगामा तो होना ही था। संसद की अपनी गरिमा होती है और गरिमापूर्ण संसदीय आचरण का तकाजा है कि  देश  के इस पावन मंच को अनर्गल आरोप लगाकर अपवित्र नहीं किया जाना चाहिए। माकपा सांसद ने  भाजपा पर निशाना साधने के लिए एक पत्रिका में प्रकाशित जिस खबर को आधार बनाया था, वह पहले ही सफाई  दे चुकी थी कि खबर एकदम गलत थी और राजनाथ सिंह ने ऐसा कोई भी बयान नहीं दिया। वैसे भी देश  के गृहमंत्री के हवाले से इतनी महत्वपूर्ण बात का पता दिनभर खबर सूंघने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया को न लगे, इस पर सहज में विश्वास  नहीं किया जा सकता। भारत में मीडिया की जबरदस्त पैठ है और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के जमाने में इस तरह की महत्वपूर्ण खबर छूट ही  नहीं सकती। इस बात का ख्याल करते हुए मात्र एक पत्रिका में छपी खबर की विश्वश्नीयता  पर संदेह होता है। इतना ही नहीं, किसी पत्रिका अथवा अखबार या न्यूज चैनल की खबर के आधार पर देश  के गृहमंत्री पर “कीचड“ नहीं उछाला जा सकता। इस प्रकरण से स्पष्ट  होता है कि सियासी दल असहिष्णुता जैसे गंभीर मुद्दे को भी राजनीति हित के लिए भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी के इस कथन से जनमानस पूरी तरह सहमत है कि “गंदगी और कूडा-कचरा देश  की गलियों में नही, बल्कि हमारे मन-मस्तिष्क  में है और जब तक यह पूरी तरह से निकल नहीं जाता; संकीर्णता, भय और अविश्वास  का घुप अंधेरा हमारे अंदर घर करता रहेगा। सर्वप्रथम इस कचरे को  मन-मस्तिष्क  से खदेडने की जरुरत है।  बहरहाल,  असहिष्णुता लिए कौन दोषी  है और कौन पाक दामन, यह संसद में चर्चा  का विषय  नहीं होना चाहिए। अलबत्ता, देश  को  असहिष्णुतासे कैसे मुक्त रखा जाएगा, इसके लिए सभी सियासी दलों को मिलजुल कर काम करना चाहिए। संसद में सर्वसम्मति से  असहिष्णुता फैलाने वालों की भर्त्सना के लिए प्रस्ताव पारित किया जाना चाहिए। इससे जनमानस आश्वस्त  हो सकता है़।  

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

Paris Summit. World Eye Deliberations

                                            पेरिस सम्मेलन 

फ्रांस की राजधानी पेरिस में लगभग 190 देश  सोमवार से 11 दिसंबर तक इस बात पर माथा-पच्ची करेंगे कि दुनिया को ग्लोवल वार्मिंग के खतरों से कैसे बचाया जाए। जलवायु परिवर्तन पर आयोजित इस सम्मेलन में 25,000 अधिकारियों समेत लगभग 50, 000 लोगों का जमावडा जुटा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमेरिकी राश्ट्रपति बराक ओबामा समेत 150 देशों  के राज्याध्यक्ष भी इस सम्मेलन में भाग ले रहे हैं। दुनिया में जलवायु परिवर्तन के लिए हम खुद जिम्मेदार हैं। औधोगिक क्रांति के बाद पिछले करीब दो सौ साल के दौरान जहरीली गैसों का उत्सर्जन करके मानव जाति ने पर्यावरण संतुलन को बुरी तरह से बिगाड डाला है। संयुक्त राष्ट्र  संघ मौसम एजेंसी द्वारा हाल ही में जारी रिपोर्ट  में बताया गया है कि  2015 अब तक का सबसे गर्म साल रहा है। 2015 तक पृथ्वी का तापमान 1 डिग्री फॉरेनहाइट के खतरनाक स्तर से भी ज्यादा बढ चुका है और अब तक तापमान में 1.8 डिग्री फॉरेनहाइट की वृद्धि दर्ज  हो चुकी है।  रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगला साल (2016) और ज्यादा गर्म हो सकता है और तापमान में अप्रत्याशित वृद्धि का सिलसिला आगे भी जारी रह सकता है। यानी अगर तापमान का बढना इसी तरह जारी रहा तो अगले सौ साल में तापमान 3.5 फॉरेनहाइट (2 डिग्री सेलसिस) तक बढ सकता है। मौसम विज्ञानियों का आकलन है कि तामपान  के 2 डिग्री सेलसिस की सीमा पार करते ही इसके खतरनाक परिणाम हो सकते हैं। 2100 तक वायु में सीओ2 की मात्रा 700 पीपीएम (पाटर्स पर मिलियन) तक बढ सकती है। इस मात्रा में मानव का सांस लेना और जिंदा रहना मुश्किल  हो सकता है। भूमि बंजर हो सकती है और जल स्त्रोत सूख सकते हैं। इस समय वायु में सीओ2 की अधिकतम  मात्रा 350 के आसपास है। प्री-इंडस्ट्रियल युग में यह स्तर 280 से भी कम था। और अगर हम जैसे-तैसे वायु में सीओ2 की  मात्रा को अपेक्षा के अनुरुप 500 पीपीएम तक नियंत्रित कर भी लेते हैं, तो भी अमेरिका का औसत ताममान 5 से 10 डिग्री फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे कई क्षेत्रों में जमीन बंजर हो जाएगी और लोगों के भूखों मरने की नौबत आ सकती है। और अगर हम जहरीली गैस उत्सर्जन (सीओ2) को रोक नहीं पाते हैं और 2100 तक वायु में पीपीएम का स्तर 1100 को पार कर जाता है, तो अमेरिका का तापमान 15 से 20 फॉरेनहाइट तक बढ सकता है। इससे इसका 50 फीसदी उपजाऊ क्षेत्र बंजर हो जाएगा। मध्य-पूर्व  एषिया (अरब) अफ्रीकी महाद्धीप जैसे गर्म  क्षत्रों में तो 2050 तक ही 3 डिग्री सेलिसिस  तक बढ सकता है। दुनिया के बडे-छोटे देशों सब की यही चिंता है। ग्लोबल वार्मिंग ने मानव के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया है। इस समय सबसे बडी चुनौती यही है कि ग्लोबल वार्मिंग को कैसे कम किया जाए। औधोगिकरण और पेट्रोल-डीजल के अंधाधुंध इस्तेमाल से जहरीली गैसों का बेहिसाब उत्सर्जन हो रहा है। विकासशील देशों का कहना है कि पिछले दो सौ सालों में जहरीली गैस उत्सर्जन में विकसित देशों  का बडा हाथ रहा है। इसलिए ग्लोबल वार्मिंग को घटाने के लिए विश्व  स्तरीय प्रयासों में समृद्ध देशों  को ज्यादा वित्तीय स्त्रोत जुटाने चाहिए। विकसित देश  बराबरी के सहयोग पर जोर दे रहे हैं। अब तक इसी बात पर मगजखपाई  हो रही है की कौन ज्यादा  दोषी है। भारत का भी यही स्टैंड है कि समृद्ध देशों  को विकासशील मुल्कों  की तुलना में ज्यादा वित्तीय संसाधन जुटाने चाहिए। लगभग 183 देशों  ने ग्लोबल वार्मिंग पर नियंत्रण के लिए ऐक्शन  प्लान पेश  की है। पेरिस सम्मलेन में इस पर चर्चा भी हो सकती है। तथापि, यह  प्लान इतनी पुख्ता नहीं है कि इससे तापमान में दो डिग्री सेलसिस की संभावित वृद्धि रोकी जा सके।  यद्यपि पूरी दुनिया का जनमानस इस समय ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से निपटने के लिए एकजुट हो रहा है, मगर विश्व  नेताओं के मतभेद ठोस कार्रवाई के मार्ग  में आडे आ रहे हैं। विश्व  नेताओं पर दबाव  डालने के लिए रविवार को जगह-जगह  प्रदर्शन  किए गए। पेरिस सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं।