शुक्रवार, 30 मार्च 2018

Supreme Court Landmark Judgement

देर से मिला न्याय, न मिलने जैसा होता है (जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड) और अगर यह  न्यायपालिका की तकनीकी  प्रकिया में उलझ कर रह जाए, तो और भी कष्टदायक  जाता है। हर छोटे-बडे मामले में अदालत से “स्टे“ लेकर न्याय में विलंब डालना अब तक मुकदमे  का अहम हिस्सा रहा है। भारत की अदालतों में सालों मामले लटकते रहते हैं, इसलिए अक्सर अंतिम फैसला आने तक अभियुक्त त्वरित न्याय से महरुम रह जाता है। मगर अब ऐसा नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट  ने बुधवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अदालती “स्टे“ की अधिकतम सीमा छह माह तय कर दी है। यानी किसी भी मुकदमे में अदालती “स्टे“ छह माह पूरा होते ही निरस्त हो जाएगा। बुधवार से ही सुप्रीम कोर्ट  की यह व्यवस्था लागू हो गई है और सभी पुराने मामलों पर लागू मानी जाएगी। शीर्ष  अदालत ने यह व्यवस्था भी दी है कि अगर जज को लगता है कि किसी मामले में “स्टे“ छह माह के बाद भी याय के लिए जरुरी  है, तो इसके लिए लिखित में कारण बताने होंगे। छह माह पूरा होते ही स्टे स्वतः निरस्त हो जाएगा और मामले की सुनवाई फिर से  शुरू  हो जाएगी। 2016 में विधि मंत्रालय द्वारा कराए गए एक अध्ययन का  निष्कर्ष  था कि अदालती स्टे के कारण सुनवाई में औसतन 6.5 साल का विलंब हो जाता है।  सुप्रीम कोर्ट  के इस फैसले से “स्टे“ के कारण अदालतो में सालों से लंबित पडे लाखों मामलों की सुनवाई में तेजी आ सकती है। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने लैंडमार्क फैसला लगभग दो दशक पहले  दिल्ली में सडक निर्माण घोटाले पर सुनाया है। इस मामले में निचली अदालत ने आरोपियों को भ्रष्ट  तौर-तरीकों में  दोषी  पाए जाने पर सजा सुनाई थी मगर आरोपी हाई कोर्ट चले गए और अदालत ने सजा को स्थगित कर दिया। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और इस तरह अदालत में भ्रश्टाचार के दोशी पाए जाने के बावजूद आरोपी दो दशक से भी ज्यादा समय तक सजा से बचते रहे।  अदालत ने माना कि इस तरह के कानूनी दाव-पेंच लडाकर न्याय में विलंब को रोकने के लिए अविलंब कारगर उपाय की जरुरत है। 2015-16 में भारतीय न्यायपालिका की वार्षिक  रिपोर्ट  में बताया गया था कि देश  की विभिन्न अदालतों में लगभग 3 करोड मामले सुनवाई के लिए लंबित पडे थे। निचली अदालतों मे 25 फीसदी मामले पांच साल से ज्यादा समय से लंबित पडे थे और इनमे 16 फीसदी आपराधिक मामले थे। ्हालांकि इसके लिए अदालतों में जजों की भारी कमी को जिम्मेदार ठहराया गया था मगर विधि विशेषज्ञ  भी मानते हैं कि “अदालती स्टे के कारण भी काफी मामले लटक जाते हैं। भारत में न्याय प्रकिया वैसे भी समय खपाऊ और महंगी मानी जाती है। कानून के प्रावधानों की बाहें मरोडकर सजा से बचना भारत में आम बात है। इसी कारण अक्सर अपराधी बच निकलते हैं। आपराधिक मामलों में न्याय की लंबी प्रकिया भी “त्चरित समयबद्ध न्याय “ मे, बाधा डालती है। भारत की जेलों में बंद केदियों में 68 फीसदी अंडरट्रायल होते हैं और सालों उन्हें न्याय नहीं मिलता। 60 फीसदी से ज्यादा अंडरट्रायल निर्दोष पाए जाते हैं और उन्हें खामख्वाह सजा भुगतनी पडती है।  आंकडों के अनुसार देश  में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 60 फीसदी अभियुक्त निर्दोष  होते हैं और उनकी गिरफ्तारी अकारण की जाती है। कानून में अंडरट्रायल तब तक निर्दोष  माना जाता है जब तक अदालत द्वारा  सजा नहीं दी जाती। न्याय व्यवस्था त्वरित और नैसर्गिक न्याय पर आधारित है। देर से मिले न्याय की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। भारत में न्याय व्यवस्था मे अभी भी क्रांतिकारी सुधारों की जरुरत है। सुप्रीम कोर्ट  का ताजा फैसला, निसंदेह, क्रांतिकारी व्यवस्था है।

गुरुवार, 29 मार्च 2018

शीत युद्ध की वापसी ?

 रुस के पूर्व जासूस  सर्गेई स्क्रिपल जहर  प्रकरण से रुस और पश्चिम  देशोँ  के बीच तनाव दिन-ब-दिन बढता ही जा रहा है। शीत युद्ध जैसे हालात पैदा होते दिख रहे हैं।  रुस पर ब्रिटेन के सैलस्बरी में सपरिवार रह रहे पूर्व  जासूस सर्गेई स्क्रिपल और उनकी बेटी यूलिया को जहर देकर हत्या के लिए रासनायिक हथियार (तंत्रिका एजेंट)  के इस्तेमाल के आरोप हैं।  सर्गेई स्क्रिपल  मार्च के पहले सप्ताह सैलस्बरी के एक शॉपिंग  माल में बेंच पर बेहोश  पडा मिला था। डॉक्टरी  मुआयने से पता चला था कि उसे जहर देकर मारने का प्रयास किया गया।  स्क्रिपल रुस का पूर्व  जासूस होने के साथ-साथ ब्रिटेन की मिल्ट्री इंटेलीजेंस एमआई 16 का डबल एजेंट भी रह चुका था।  स्क्रिपल की हत्या प्रयास का संदेह रुस पर  जाना स्वभाविक था। सर्गेई स्क्रिपल मूलतः रुसी सेना का जासूस था मगर डबल क्रास  करने के लिए उसे देशद्रोह में जेल की सजा हुई थी। 2010 में “जासूसों (स्पाई) की अदला-बदली के तहत  स्क्रिपल ब्रिटेन लाया गया और उसके बाद वह  सैलस्बरी में सैटल हो गया।  जहर प्रकरण से क्षुब्ध ब्रिटेन के साथ-साथ अमेरिका, कनाड समेत पश्चिम  के बीस से ज्यादा देश अब तक 140 से ज्यादा रुसी राजनयिकों को निष्कासित  कर चुके हैं। राजनयिकों को निष्कासित करने वाले मुल्कों में रुस के साथ वॉरसा पेक्ट में  शामिल रहे  पोलेंड और हंगरी भी  शामिल है। नाटो ने भी रुस के सात राजनयिकों को निष्कासित कर दिया है। इन सब पर जासूसी करने का संदेह है। इतने बडे पैमाने पर राजनयिकों के निष्कासन  का यह अपने आप में रिकॉर्ड  है। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इन राजनयिकों को अब तक का सबसे बडा सामूहिक निष्कासन  बताया है। पश्चिम देशों  के बीच इस एकता से रुस को झटका लगा है और वह अलग-थलग पड गया है। साठ के दशक में तत्कालीन सोवियत संघ और पश्चिम देशों के बीच जब तनाव चरम पर था, उस दौरान इतने बडे पैमाने पर राजनयिकों को निष्कासित  किया गया था। द्धितीय युद्ध के बाद से 1990 तक की अवधि को षीत युद्ध का दौर माना जाता है। इस दौरान पूरी दुनिया दो धु्रवों में बंटी हुई थी। एक का नेतृत्व अमेरिका और दूसरे का तत्कालीन सोवियत संघ कर रहा था। उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनावपूर्ण  संबंधों को षीत युद्ध कहा जाता था। ताजा प्रकरण में रुस ने अमेरिका पर सहयोगी देशों  पर  राजनयिकों को निष्कासित  करने के लिए दबाव डालने का आरोप लगाया है। मगर सच्चाई यह है कि यूरोप के देशों  ने स्क्रिपल प्रकरण पर जबरदस्त एकता दिखाई है। तथापि अभी भी  ऐसे सवाल   हैं जो जवाब मांग रहे हैं। सबसे अहम और बडा  प्रश्न   यह है कि  राष्ट्रपति  चुनाव से एक सप्ताह पहले रुस पूर्व  जासूस की हत्या का प्रयास क्योंकर करेगा और वह भी 8 साल का लंबा समय गुजर जाने के बाद? स्क्रिपल कई सालों से ब्रिटेन के सैलस्बरी में रिटायरमेंट की जिंदगी जी रहा था। इस स्थिति में रुस को ऐसे व्यक्ति को मार कर क्या मिलता, जो पूरी तरह से निष्क्रिय  था।  और  अगर रुस को तंत्रिका एजेंट का इस्तेमाल करके हत्या करनी ही थी, तो यह काम पहले भी किया जा सकता था?  यह सवाल भी उठ रहा है कि  रुस का पूर्व  जासूस सैलस्बरी में क्यों रह रहा था और क्या वह अब भी ब्रिटेन के लिए जासूसी कर रहा था? ब्रिटेन पर नोविचोक (तांत्रिक) एजेंट को जमा करना का भी आरोप है। सोवियत संघ-रुस  ने 1971 और 1993 के दरम्यान  नोविचोक एजेंट को विकसित किया था और इसे घातकतम तंत्रिका एजेंट माना जाता है।  बहरहाल, इन सब प्रश्नो  के जवाब पाने के लिए उच्च स्तरीय जांच की जरुरत है। परमाणु युद्ध और प्रर्यावरण संकट के कगार पर खडे  विश्व  को अमन और चैन की दरकार है।   




बुधवार, 28 मार्च 2018

फिजूल के मुद्दों पर समय की बर्बादी

प्रधानमंत्री और कांग्रेस एप डेटा लीक को लेकर भारतीय जनता पार्टी और ग्रांड ओल्ड पार्टी में घमासान चल रहा है। साइबर सुरक्षा मामलों पर खोज करने वाले  फ्रांस के इलियट एल्डरसन ने खुलासा किया है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अधिकृत एप से लोगों की निजी गोपनीय जानकारी अमेरिका स्थित थर्ल्ड पार्टी के साथ साझा की जा रही है। शनिवार को  इलियट एल्डरसन के छदम नाम से प्रधानमंत्री के एप बारे कई टवीट पोस्ट किए गए। इनमें बताया गया कि जैसे ही कोई यूजर प्रधानमंत्री के सरकारी एप पर प्रोफाइल डालता है, तमाम जानकारियां (ओएस, नेटवर्क, कैरियऱ) तथा नाम, फोटो, लिंग और ईमेल जैसी व्यक्तिगत जानकारिया स्वतः इन.डब्ल्यूजेडाारकेटी नाम के डोमेन पर लोड हो जाती है। यह डोमेन अमेरिका में “क्लेवर टेप“ नाम की कंपनी द्वारा  संचालित की जाती है। कंपनी ने अपने प्रोफाइल में खुद को नेक्सट जेनेरेशन एप इंगेजमेंट प्लेटफार्म  बताया है। कंपनी विपणन संस्थाओं को डेटा मुहैया कराती है। भाजपा ने भी माना है कि प्रधानमंत्री के ऐप की जानकारी “स्थिति विशेष  संदर्भ“ में  विश्लेषण  के लिए शेयर की जाती है। यानी लोगों का व्यक्तिगत डेटा प्रधानमंत्री के ऐप से  शेयर किया जाता है। इस खुलासे के सार्वजनिक होते ही कांग्रेस “बल्लियां उछल पडी“ और प्रधानमंत्री पर ताबड तोड प्रहार करने  शुरु कर दिए। मगर कांग्रेस की यह उछल-कूद थोडी देर में काफूर हो गई। इससे पहले कि  पार्टी कार्यकर्ता अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्देश  पर प्रधानमंत्री के एप को हटाते, कांग्रेस को अपना ही “विद आईएनसी“ एप को हटाना पडा। दरअसल, प्रधानमंत्री एप से संबंधित खुलासे के साथ-साथ  एल्डरसन सोमवार को यह खुलासा भी किया कि कांग्रेस पार्टी के एप का डेटा  सिंगापुर से संचालित होता  है। कांग्रेस की सदस्यता का डेटा जिस लिंक (मेंबरशिप आईएनसी .इन)  पर जाता है, वह सिगापुर स्थित सर्वर में फीड और सेव किया जाता है। इसकी एनकोडिंग जिस बेस (64) से की जाती है, वह एन्क्रिप्टेड नहीं है और इसे डिकोड करना आसान है। जाहिर है इस डेटा को कोई भी डाउनलोड कर सकता है। कांग्रेस अपने ही बिछाए जाल में फंस गई।  एल्डरसन के खुलासे के बाद कांग्रेस को तुरंत अपना एप डिलीट करना पडा और ऑनलाइन मेंबरषिप साइट भी बंद करनी पडी। भाजपा ने तो यहां तक कह दिया को कांग्रेस का डेटा नक्सलियों, पत्थरबाजों, अलगाववादियों, चीनी दूतावास और कैंब्रिज एनालिटिका को दिया जा रहा है। बहरहाल, सियासी दलों को ऊल-जलूल के मुद्दे ऊछालने की बुरी लत है। देश  के समक्ष गंभीर चुनौतियां मुहं फैलाए खडी हैं मगर देश  के दो प्रमुख दल बेकार की बातों में समय बर्बाद कर रहे हैं। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश  का तेजी से डिजिटाइजेशन हो रहा है। मगर यह भी सच है की  लोगों की निजता से जुडे डेटा के दुरुपयोग को लेकर  हाल ही में भारत ही नहीं, अमेरिका और इग्लैंड में भी बवाल मचा हुआ है । पिछले सप्ताह कैंब्रिज एनालिटिका द्वारा 2016 में अमेरिकी  राष्ट्रपति  चुनाव को प्रभावित करने की गर्ज  से फेसबुक से डेटा चोरी करने का मामला सामने आया था। भारत में भी इस कंपनी का उपक्रम है। यह कंपनी भाजपा और जनत दल (यू) के चुनाव अभियान से जुडी रही है। इसलिए, इस सूचना से देश  के राजनीतिक हलकों में खासी हलचल हुई है। आधार डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा  को लेकर भी देश  में तरह-तरह की बातों हो रही है। देश  को तेजी से आगे बढना है, तो डेटा की जरुरत तो पडेगी ही मगर इनकी पुख्ता सुरक्षा के लिए राजनीतिक दलों को मिलकर समाधान निकालना चाहिए। 

मंगलवार, 27 मार्च 2018

आ बैल मुझे मार

क्रिकेट अब वाकई ही भद्र लोगों का खेल नहीं रह गया है। स्लेजिंग, बाल-टेंपरिंग और मैच-फिक्सिंग जैसे कृत्यों से “भद्र लोगों के खेल“ में अभद्रता की इंतहा हो गई है। और क्रिकेट में 'अभद्रता' के लिए आस्ट्रेलिया की कोई सानी नहीं है।  दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ तीसरे टेस्ट में आस्ट्रलेया ने बाल-टेंपरिंग करके पूरे खेल जगत को शर्मसार कर डाला है। टेस्ट के तीसरे दिन अंपायरों ने आस्ट्रेलिया के खिलाडी कैमरन बैनक्रॉफ्ट को गेंद से छेडखानी करते हुए देखा।  बैनक्रॉफ्ट की यह हरकत कैमरे में भी कैद हो गई और बाद में कप्तान स्टीव स्मिथ ने सार्वजनिक तौर पर बॉल टेंपरिंग की बात कबूली। टीवी फुटेज में  बैनक्रॉफ्ट को जेब से कुछ निकालते  गेंद पर लगाते देखा गया। बाद में  बैनक्रॉफ्ट ने माना कि यह पीला टेप था। कप्तान स्टीव स्मिथ ने भी स्वीकार किया कि उन्हें इस योजना की पहले से ही जानकारी थी।  बस फिर क्या था। समूचे क्रिकेट जगत में भूचाल सा आ गया। मामले की गंभीरता का इस बात से पता चलता है कि आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री मैल्कुम टर्नबुल ने  इस घटना पर गहरी नाराजगी जताई और क्रिकेट आस्ट्रेलिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) जेम्स  सदरलैंड को सार्वजनिक माफी तक मांगनी पडी। अततः कप्तान स्मिथ और उप-कप्तान डेविड वार्नर को पद गंवाने पडे। स्मिथ को इडियन प्रीमियर लीग में राजस्थान रॉयल्स की कप्तानी भी गंवानी पडी है। इस घटना से पहले दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ  पहले टेस्ट के दौरान डेविड वार्नर और क्विंटन  डी कॉक के बीच ड्रेसिंग रुम में जमकर “तू-तू, मैं-मै“ भी हुई थी और वीडियो में साफ दिखाया गया था कि अगर बीच-बचाव नहीं किया जाता, तो नौबत मारपीट तक आ जाती। तीसरे टेस्ट में डेविड वार्नर पैवेलियन लौटते समय एक  दर्शक  से भी उलझ गए थे और सुरक्षा कर्मियों को बीच-बचाव करना पडा था। भारत और आस्ट्रेलिया के बीच मार्च 2017 में दूसरे टेस्ट के दौरान बंगलुरु में स्टीव स्मिथ द्वारा डीआरएस रेफरल के लिए ड्रेसिंग रुम से मदद के लिए इशारा करने पर भी बवाल मचा था। नियमानुसार, डीआरएस रेफरल का फैसला खिलाडियों को मैदान में ही लेना पडता है। 2001 में मुंबई टेस्ट के दौरान आस्ट्रेलियाई खिलाडी माइकल स्लेटर ने न केवल भारतीत बल्लेबाज राहुल द्रविड के खिलाफ  अभद्र भाषा  का प्रयोग किया था, अलबत्ता वे अंपायर एस वेंकटराघवन से भी उलझ गए थे ।  आस्ट्रेलियाई क्रिकेट बॉडी के सख्त आचार संहिता के तहत  बाल-टेंपरिंग के लिए स्टीव स्मिथ और डेविड वार्नर पर आजीवन प्रतिबंध  लग सकता है। बहरहाल, विवाद और आस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम का चोली दामन का साथ रहा है।   विवादों के कारण आस्ट्रेलियाई टीम कई बार मुसीबत में फंस चुकी है। इससे टीम की छवि पर बुरा असर पडा है। खिलाडियों के खिलाफ कडी कार्रवाई भी हुई है। जीत के लिए आस्ट्रेलियाई टीम नियमों का उल्लघंन करने से बाज नहीं आती है और इसी कारण गाहे-बगाहे  “आ बैल मुझे मार“ जैसी स्थिति में फंस जाती है।  स्लेजिंग  आस्ट्रेलिया में आम बात है क्योंकि  यह गेंदबाजी को और आक्रामक बना देती है। आस्ट्रलियाई गेंदबाजों ने  कई अवसरों पर  इसका बेहतरीन इस्तेमाल भी किया है। आस्ट्रेलियाई के तेज गेंदबाज मर्व  ह्यूज तो स्लेजिंग में सिद्धहस्त थे। स्लेजिंग के लिए एक बार मैच के दौरान पाकिस्तानी बल्लेबाज जावेद मियांदाद और ह्यूज में तीखी नोंक-झोंक भी हुई थी। भारतीय क्रिकेट खिलाडी सुनील गावस्कर से लेकर हरभजन सिंह की भी  ऑस्ट्रेलिया  खिलाडियों से तीखी नोक-झोंक हो चुकी है। खेल के मैदान में बेईमानी के लिए कोई जगह नही होती है। क्रिकेट के खेल में हार जीत से ज्यादा  उत्कृष्ट  खेल भावना और कायदे-नियमों का पालन मायने रखता है। हर छोटा-बडा क्रिकेट खिलाडी खेल प्रेमियों का नायक  होता है और उनसे आदर्श    आचरण की अपेक्षा रखता है। बाल-टेंपरिंग जैसे अभद्र कृत्य क्रिकेट की महिमा को खंडित करते हैं। आस्ट्रेलियाई खिलाडियों को ताजा प्रकरण से सीख लेनी चाहिए। 

शनिवार, 24 मार्च 2018

राज्यसभा चुनाव और दल-बदल

राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है और न ही  शत्रु। और भारत की समकालीन राजनीति तो चलती ही दल-बदल पर है। राज्यसभा के चुनाव हो या लोकसभा अथवा विधानसभा चुनाव, दल-बदल चरम पर रहता है और हर राजनीतिक पार्टी इसे शह देती है। 2017 में गुजरात में राज्यसभा की एक सीट के लिए जिस तरह से दल-बदल (क्रॉस वोटिंग) को बढावा दिया गया, 2018 के मौजूदा राज्यसभा चुनाव में उसकी पुनरावृति हुई है। 16 राज्यों के 59 राज्यसभा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल-मई में समाप्त हो रहा है, इसलिए इन सीटों के लिए चुनाव कराए जा रहे हैं। अब तक 10 राज्यों से 33 राज्यसभा सदस्य निर्विरोध चुने जा चुके हैं। इनमें 17 भाजपा के, 4 कांग्रेस और बाकी अन्य दलों के हैं। 25 सीटों के लिए मतदान कराया जा रहा है। इनमें उत्तर प्रदेश   की दस सीटें भी शा मिल हैं। इस चुनाव के बाद राज्यसभा में भाजपा सबसे बडी पार्टी बन सकती है। 1980 में अस्तित्व में आने के बाद से भाजपा का यह सर्वश्रेष्ठ  प्रदर्शन   होगा। विधानसभा में मौजूदा स्थिति के अनुसार भाजपा के 8 और समाजवादी पार्टी का एक सदस्य चुना जाना तय था। इसलिए  दसवीं  सीट के लिए एक-एक विधायक का समर्थन पाने के लिए भाजपा और विपक्ष में मारी-मारी हो रही थी। इस सीट पर बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार और भाजपा उम्मीदवार में कांटे की टक्कर थी। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने बसपा उम्मीदवार का समर्थन किया। सपा और बसपा  के एक-एक विधायक ने क्रॉस-वोटिग करके बसपा उम्मीदवार को संकट में डाल दिया था। अब नजरें  निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैयापर थी। दोनों उम्मीदवारों ने राजा भैया का वोट हासिल करने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाया। राजा भैया समाजवादी पार्टी नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव के करीबी माने जाते हैं मगर वे मौके की नजाकत को बखूबी समझते हैं।  राजा भैया का उत्तर प्रदेश  के कुंडा विधानसभा हलके में डंका बजता है और वे अथवा  उनका परिवार 1993 से लगातार इस हलके से चुनाव जीत रहा है। राजा भैया के दादा बजरंग बहादुर सिंह भद्री 1958 से 1963 तक हिमाचल प्रदेश  के उप-राज्यपाल रहे चुके हैं। हिमाचल प्रदेश  तब केन्द्रीय  शासित क्षेत्र हुआ करता था। मतदान से पहले राजा भैया ने पहले अखिलेश  यादव से मुलाकात की और फिर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से। उनकी इस मुलाकात से यही कयास लगाए गए कि उन्होंने बसपा की बजाए भाजपा के पक्ष में वोट डाले। सीट जीतने के लिए भाजपा को 6 और बसपा को चार विधायकों के समर्थन की दरकार थी। भाजपा का वुनाव प्रबंधन बसपा-सपा-कांग्रेस से कहीं ज्यादा कारगर साबित हुआ। इससे पहले 2017 में गुजरात से राज्यसभा चुनाव में भी कांग्रेस को राज्य के कद्दावर नेता अहमद पटेल को जिताने के लिए एडी-चोटी का जोर लगाना पडा था। पार्टी के 44 विधायकों को भाजपा की छीना-झपटी से बचाने के लिए कई दिन तक गुजरात से बाहर बंगलुरु में छिपा कर रखना पडा था। 2016 में हरियाण से राज्यसभा के चुनाव में चुनाव अधिकारी द्वारा कांग्रेस के “स्याही विवाद“ के कारण 12 विधायकों के वोट रदद  किए जाने पर भी भारी बवाल मचा था। उस समय निर्वाचन आयोग ने हरियाणा विधनसभा के सचिव को फटकार भी लगाई थी।  बहरहाल, लोकतंत्र की जडों को खोखला करने वाला राजनीतिक असूचिता का यह खेला कब तक चलता रहेगा? त्रासदी यह है कि राजनीतिक दल विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक सूचिता के प्रबल पैरवीकार बन जाते हैं मगर सत्ता में आते ही इसे भूलकर दल-बदल को बढावा देते हैं। भाजपा आज वही कर रही है जो कांग्रेस सत्ता में रहते हुए करती थी। इस तरह के आचरण से राजनीतिक दल लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। अब बहुत हो गया। “अर्त्यात्मा की आवाज “ की आड में दल-बदल का यह  खेल कानूनन प्रतिबंधित होना चाहिए। 

शुक्रवार, 23 मार्च 2018

सोशल मीडिया का दुरुपयोग

सोशल मीडिया के दुरुपयोग से  किस तरह अरबों-खरबों रुपए (डॉलर)  कमाए जा सकते हैं, पूरी दुनिया इस सच्चाई  को जानती हैं। ताजा मामला राजनीतिक परामर्श  देने वाली कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका का सामने आया है। इस कंपनी पर फेसबुक के पांच करोड यूजर का डेटा चोरी करके अरबों की कमाई करने का आरोप  है।  कैम्ब्रिज एनालिटिका ने 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति   चुनाव को प्रभावित करने के लिए फेसबुक से डेटा  चोरी किया था। ब्रिटेन के एक चैनल ने वीडियो में  कैम्ब्रिज एनालिटिका के अधिकारी को यह कहते हुए दिखाया है कि कंपनी घूस देकर नेताओं को बदनाम करने का काम भी करती है। अमेरिका  में सोशल मीडिया के जरिए 2016 के  राष्ट्रपति  चुनाव को प्रभावित करने के आरोपों की जांच की जा रही है। रुस पर ट्रंप के पक्ष में चुनाव प्रभावित करने के पहले ही आरोप लग चुके हैं। दो दिन पहले तक भारत में  कैम्ब्रिज एनालिटिका को कोई नहीं जानता था मगर अब पूरे देश  में इसकी चर्चा हो रही है। भारत में  कैम्ब्रिज एनालिटिका  का काम एससीएल नाम की कंपनी देख रही है। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार यह एससीएल और ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस (ओबीआई) का साझा उपक्रम है। भारत में इस कंपनी का काम अमरीश  त्यागी देख रहे हैं। अमरीश  जनता दल (यू) केसी त्यागी के पुत्र हैं।  अमरीश  त्यागी पहले ही इस बात का खुलासा कर चुके हैं कि 2016 के अमेरिकी  राष्ट्रपति  चुनाव में उनकी क्या भूमिका रही है। कैम्ब्रिज एनालिटिका से जुडा डेटा चोरी का मामला सामने आते ही  ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस की वेवसाइट को फौरन बंद कर दिया गया है।  एससीएल और ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस भारत में कई तरह की सेवाएं देती है और “राजनीतिक प्रबंध“ इनमेंसे एक है। इसके तहत कंपनी सोशल मीडिया के लिए रणनीति तय करती है और मोबाइल कैपेन भी मैनेज करती है। कंपनी सोशल मीडिया पर ब्लॉगर, मार्केटिंग और छवि निर्माण (इमेज बिल्डिंग) का काम भी करती है। और जाहिर है कंपनी की रणनीति में विरोधियों को:बदनाम“ करने का काम भी  शामिल है। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान  कैम्ब्रिज एनालिटिका ने मतदाताओं को ऐसी सूचनाएं दी जिनसे मतदान कम रहा और इसका ट्रंप को फायदा मिला।  भारत में भाजपा और कांग्रेस दोनों ने इस कंपनी की सेवाएं ली है हालांकि दोनों ही इस बात से इंकार कर रही हैं।  कांग्रेस और भाजपा एक-दूसरे पर इस कंपनी से संबंध होने के आरोप लगा रही हैं। उपलब्ध  जानकारी के अनुसार दोनों ही इस मामले में झूठ बोल रहे हैं। कंपनी के एक शीर्ष  अधिकारी ने दावा किया है कि ओबीआई ने भाजपा के चार चुनाव अभियानों का काम देखा है और इनमें 2014 का लोकसभा चुनाव भी शामिल है। बिहार के 2010 के चुनाव का प्रबंधन भी इसी कंपनी के पास था और तब जनता दल (यू) और भाजपा ने मिलकर चुनाव लडा था। बहरहाल, चुनाव अभियान और प्रचार के लिए राजनीतिक दलों द्वारा परामर्श   कंपनियों और  एक्सपर्ट्स  को हायर करना नई बात नहीं है और इसमे कोई बुराई भी नहीं है।  इस सच्चाई को भीं नकारा नहीं  जा सकता कि लोगों  के मोबाइल नंबर और ई-मेल  का जमकर दुरुपयोग किया जा रहा है और संबंधित कंपनिया इन्हें बेचकर दोनों हाथों से पैसा कमा रही है। डेटा चोरी और इसकेे दुरुपयोग को रोकने के लिए देश में अभी सख्त कानून नहीं है।  सूचना प्रोद्योगिकी कानून, 2000 के तहत  पासवर्ड, वित्तीय और बायोमैट्रिक जानकारी संवेदनशील डेटा माना गया़ है और डेटा लीक पर सजा और मुआवजे का प्रावधान भी है। मगर भारत में न्याय प्रकिया इतनी जटिल, समय खपाऊ और महंगी है कि लडते-लडते  आम आदमी की हिम्मत जवाब दे जाती है। चेक बाउंस मामले ही ले लीजिए। इन मामलों में पीडित को न्याय मिलते-मिलते लंबा समय लग जाता है और तब उसका इतना नुकसान हो जाता है कि उसकी भरपाई नहीं की जा सकती। सोशल मीडिया डेटा के दुरुपयोग रोकने के लिए कडे कानून बनाए जाने चाहिए। 


गुरुवार, 22 मार्च 2018

विशुद्ध राजनीतिक फैसला

चुनाव की बेला पर  लोक-लुभावने फैसलों से मतदाताओं को पटाना सियासी दलों की पुरानी फितरत है। सत्ता पाने के लिए सियासी दल “आसमान से तारे तोडने“ तक के वायदे करने से भी नहीं चूकते हैं। और भारत की भोली-भाली जनता उनके झांसे में आ जाती है।  कर्नाटक में कांग्रेस सरकार का  लिंगायत-वीरशैव लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव इस समुदाय के मतदाताओं को लुभाने के लिए विशुद्ध राजनीतिक फैसला है। पांच साल तक सत्ता में रहने के बावजूद  कांग्रेस सरकार को लिंगायत समुदाय की सुध लेने की फुर्सत नहीं मिली मगर विधानसभा चुनाव समीप आते ही उसका “लिंगायत“ प्रेम जागा उठा। जाहिर है कांग्रेस सरकार यह सब भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार और राज्य के पूर्व  मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की लिंगायत समुदाय में ठोस पैठ में सेंध लगाने के लिए कर रही है।   येदियुरप्पा खुद लिंगायत समुदाय से हैं और इस समुदाय के कद्दावर नेता माने जाते हैं। लिंगायत अर्से से अल्पसंख्यंक धर्मिक समुदाय  की मांग करते रहे हैं। इसी मांग के चलते गत सोमवार को कर्नाटक में सत्तारूढ कांग्रेस सरकार ने  लिंगायत-वीरशैव लिंगायत  को धार्मिक अल्पसंख्यक (रिलीजियस माइनॉरॉटी) का दर्जा देने  का कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया का यह “मास्टर स्ट्रोकः बताया जा रहा है। राज्य की कुल आबादी में लगभग 17 फीसदी आबादी लिंगायत की है।  सौ विधानसभा हलकों में लिंगायत समुदाय की निर्णायक भूमिका रहती है। लिंगायत समुदाय को परंपरागत भाजपा समर्थक माना जाता है। इस समुदाय को अभी अन्य पिछडा वर्ग  में शामिल किया गया है। 2008 में भाजपा को  दक्षिण भारत में पहली बार सत्ता में लाने और 2013 में सत्ताच्युत करने में लिंगायत समुदाय की अहम भूमिका रही है। 2008 में बीएस  येदियुरप्पा भाजपा में थे और  2013 में भाजपा छोडकर उहोंने अलग से अपनी पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लडा था। भाजपा को इसी का खामियाजा भुगतना पडा था। कुछ लोगों को इस बात पर भी हैरानी है कि कांग्रेस सरकार ने वीरशैव को लिंगायत समुदाय से जोडकर एक नया कार्ड  खेला है और यह उलटा भी पड सकता है। कांग्रेस सरकार ने विधान सभा चुनाव से ठीक पहले लिंगायत-वीरशैव लिंगायत को धर्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने की सिफारिश करके केन्द्र में सत्तारुढ भाजपा नीत राजग सरकार को दुविधा में डाल दिया है। अंतिम फैसला केन्द्र सरकार को ही करना है। इस मामले में राज्य सरकार सिर्फ केन्द्र  से  सिफारिश  कर सकती है। मोदी सरकार के लिए विधानसभा चुनाव की बेला पर इस फैसले को अस्वीकार करना अथवा मान लेना दोनों ही चुनौतीपूर्ण  है। कर्नाटक में भाजपा कांग्रेस सरकार के इस फैसले से पहल ही लाल-पीली हो रखी है। भाजपा का आरोप है कि कंाग्रेस की “डिवाइड एंड रुल“ की नीति ने पहले ही देश  का बंटाधार कर रखा है और अब लोगों को धार्मिक तौर पर बांटने का प्रयास कर रही है। कांग्रेस पर लिंगायत को हिंदू धर्म से अलग करने का भी आरोप लगाया जा रहा है। वैैसे 2013 में ऑल इंडिया लिंगायत-वीरशैव महासभा ने इस समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक दर्जे के लिए संप्रग सरकार को जो ज्ञापन दिया था, उस पर बीएस  येदियुरप्पा के भी हस्ताक्षर थे। अब भाजपा कह रही है कि उस समय येदियुरप्पा  भाजपा में नहीं थे। कर्नाटक मे लिंगायत और वोक्कालिगा के बीच बराबर सत्ता संघर्ष  रहा है।  वोक्कालिगा की आबादी भी 16 फीसदी के आसपास बताई जाती है। पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल(एस) के नेता  एचडी देेवगौडा इसी समुदाय से हैं। अगर दोनों समुदाय एक हो जाएं तो कर्नाटक की राजनीति में बहुत बडा बदलाव आ सकता है। मगर इन दोनों का आपसी टकराव राज्य के विकास में बाधा डालता रहा है। कर्नाटक के तीव्र विकास के लिए न केवल इन दोनों समुदाय में एकता की दरकार है, अलबता राजनीतिक दलों को भी विकास के एजेंडे पर चुनाव लडने की जरुरत है। अब जनता को खुद ही फैसला करना होगा।

बुधवार, 21 मार्च 2018

उम्मीदें दफन, लौटे कफन

इराक में अगवा किए गए 39 भारतीयों को इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) के आतंकियों ने बहुत पहले  ही  मार दिया था। चार साल से सरकार इस बात से अनभिज्ञ थी।   लोकसभा में अततः मंगलवार को विदेश  मंत्री सुषमा स्वराज ने यह  शोकभरी सूचना दी। जून 2014 में इराक के मोसुल  से 40 भारतीयों को  आईएसआईएस ने अगवा कर लिया था। अगवा किए गए भारतीयों मेंसे 27 पंजाब, 4 हिमाचल प्रदेश , 6 बिहार और 2 पश्चिम  बंगाल के थे । इनमेंसे एक हरजीत मसीह आतंकियों के चगुंल से बच निकला था। भारत लौटने पर हरजीत ने भी बताया था कि उसने 39 भारतीयों को मरते देखा था। सरकार ने हरजीत के इस दावे को सही नहीं माना। इससे  परिजनों में अगवा किए गए 39 युवकों के सुरक्षित लौटने की झूठी उम्मीदें जगी रहीं।  हरजीत मसीह ने मंगलवार को फिर मीडिया से कहा है कि उसने 39 लोगों के जिंदा देखे जाने की सूचना कभी नहीं दी। इसके विपरीत वह शुरु से यही कह रहा है कि सभी 39 भारतीयों को उसके सामने ही मार दिया गया था। मंगलवार को परिजनों की रही-सही उम्मीदें भी जाती रही है। चार साल से अपनों को जिंदा देखने के सपने संजोए परिजनों पर इस जानकारी से कितनी पीडा हुआ है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। दिसंबर, 2017 में लापता भारतीयों और उनके परिजनों के डीएनए टेस्ट हुए थे। मार्च, 2018 में  डीनए मैच होने के बाद  39 भारतीयों के मारे जाने की  पुष्टि  हुई । जून, 2017 में मोसुल के  आईएसआईएस के कब्जे से मुक्त कराए जाने के बाद, जुलाई में विदेश  राज्य मंत्री जनरल (सेवा निवृत) वीके सिंह इन लापता भारतीयों की तलाश  में इराक के इरबिल  गए थे। तब सरकार की ओर से कहा गया था कि लापता भारतीय संभवतय मोसुल के निकट बदूुश  जेल में बंद हैं। इस जानकारी के बाद भारतीय मीडिया ने बंदूश  जाकर इस बात का खुलासा किया था कि जेल चूंकि बमबारी से पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी, इस स्थिति में लापता भारतीयों के जिंदा मिलने की कोई उम्मीद नहीं है। इसके बाद लापता भारतीयों के परिजनों के डीएनए सैंपल लेकर लाशों  से मैच करवाए  गए । लाशों  के ढेर से डीएनए का मैच करवाना आसान नहीं था।  विदेश  राज्य मंत्री जनरल वीके सिंह और उनकी टीम को एक पहाड के बारे में बताया गया। इस पहाड में लाशों  को दफनाया गया था। पूरा पहाड खुदवाया गया और तब शवों   का पता चला। कुछ शवों में लंबे बाल और कडे मिले और आईडी कार्डस भी मिले।  इन 39 भारतीयों की हत्या पर एक ओर जहां पूरा दे षोकाकुल है, वहीं इस पर जमकर सियासत हो रही है। कांग्रेस ने इस सूचना पर संसद में खूब हंगामा किया और मोदी सरकार पर चार साल तक देष को गुमराह करने का आरोप लगाया है। कांग्रेस हरजीत मसीह के बयान को ढाल बनाकर मोदी सरकार को आडे हाथ ले रही है। बहरहाल, 39 भारतीयों की बेरहम हत्या पर सियासत करने की बजाए इस जमीनी हकीकत पर गहन मंथन की जरुरत है कि रोजी-रोटी तलाष में विदेषों में मारे-मारे फिरते भारतीयों के लिए कैसे इस तरह के हादसों से सुरक्षित रखा जाए। मध्य-पूर्व के कई देषों, खासकर कतर, सऊदी अरबिया, ओमान, कुवैत में भारतीय कामगार काफी असुरक्षित हैं। 2012 से 2017 के बीच अकेले कतर में 1787 भारतीय कामगार बेमौत मारे जा चुके हैं।  अमेरिका और यूरोप की तुलना में भारतीय कामगार मध्य-पूर्व मुल्कों में 90 फीसदी ज्यादा असुरक्षित हैं। सभी राजनीतिक दलों को मिल-बैठकर इन सब बातों का समाधान निकालना चाहिए। जनता की भलाई लोकतंत्र में जनता के नुमाइंदों का प्रमुख दायित्व होता है। हर छोटी-बडी घटना पर राजनीतिक रोटियां सेंकने से जनता का कोई भला नहीं होने जा रहा है।   

मंगलवार, 20 मार्च 2018

सीमा पर “ना“पाक हरकतें

जम्मू-कश्मीर  में  सीमा पर पाकिस्तानी सेना द्वारा संघर्ष  विराम (सीज फायर) उल्लंघन का सिलसिला बद्स्तूर जारी रहना कोई नई घटना नहीं है। 1971  और 1999 में मुंह की खाने के बाद से पाकिस्तान की “नापाक“ हरकतें उत्तरोतर बढती ही जा रही हैं। रविवार को पुंछ जिले में पाकिस्तान की ओर से संघर्ष  विराम उल्लंघन में तीन बच्चों समेत पांच लोग मारे गए और दो किशोरियां गंभीर रुप से घायल हो गईं। पाकिस्तान सेना सीमा पर नागरिकों को खास तौर निशाना बना रही हैं। पाकिस्तानी सेना नियंत्रण रेखा से तीन-चार किलोमीटर तक की दूरी पर स्थिति आबादी को भी निशाना बना रही है। पाकिस्तान ने भी भारत पर सीज फायर उल्लघंन का आरोप लगाते हुए कहा है कि पाक अधिकृत कश्मीर  में भारतीय सेना की गोलीबारी से दो किशोरियों समेत नौ लोग घायल हुए हैं। आतंक फैलाकर और सीमा से सटे आबादी वाले इलाकों में निरंतर निर्दोष  लोगों को मार कर पाकिस्तान  जम्मू-कश्मीर  के लोगों को डराने-धमकाने से बाज नहीं आ रहा है और न ही सबक सिखाए बगैर बाज आने वाला है। भारत अब तक पाकिस्तान को उसकी बेजा हरकतों से रोक नहीं पाया है।  इससे पकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठनों का हौसला बढ रहा है। भारत-पाकिस्तान सीमा कश्मीर -पंजाब से राजस्थान-गुजरात तक की लगभग 2900 किलोमीटर तक फैली हुई हैं। भारत-पाकिस्तान सीमा को दुनिया की सबसे खतरनाक बॉर्डर माना जाता है। भारत ने इस सीमा पर दिन -रात चौकसी के लिए  लगभग डेढ लाख फल्ड लाइटस लगा रखी है और 50 हजार पोल्स गाड  रखे हैं। गुजरात- सिंध और पंजाब  के साथ लगती सीमा को तो अंतरराष्ट्रीय  मान्यता है। कश्मीर  की सीमा पर 1972 में  शिमला संमझौते के बाद नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ कंट्रोल ) लागू है। पाकिस्तान ने आज तक इस नियंत्रण रेखा का और न ही 2003 के सीज फायर का सम्मान किया है। शिमला समझौते के लगातार उल्लघंन के बाद 2003 में दोनों मुल्कों के बीच संघर्ष   विराम पर सहमति बनी थी मगर यह सहमति भी कबकी मृतप्रायः हो चुकी है। 2017 में पाकिस्तान ने 777 बार संघर्ष  विराम का उल्लघंन किया है। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत ने 2017 में 1300 बार संघर्ष   विराम को तोडा है। बहरहाल, विभाजन से आज तक पाकिस्तान और भारत में तीन बार (1965, 1971, 1999) जंग हो चुकी है। बांग्ला दे श  पाकिस्तान से अलग हो चुका है और अलग बलूचिस्तान की मांग साल-दर-साल और ज्यादा मुखर हो रही है। अफगानिस्तान और ईरान के बीच बंटा बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए सामरिक  दृष्टि  से काफी मह्तवपूर्ण है। बलूचिस्तान का अपना ऐतिहासिक महत्व है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बलूची ही असल में सिंधु घाटी के मूल लोग हैं।  फिरंगी  शासन ने 1944 में बलूचिस्तान को स्वतंत्र मुल्क बनाने पर विचार भी किया था मगर कम आबादी  के कारण बात नहीं बन पाई। बलूची लोग अब पूरी ताकत से पाकिस्तान से अलग होने की मांग कर रहे हैं। इस्लामाबाद को इसमें भारत का हाथ नजर आ रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 अगस्त को अपने भाषण में बलूचिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  की आजादी की मांग का उल्लेख भी किया था।  पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर   में भी पाकिस्तानी सेना की दमनकारी नीतियों से लोग-बाग आजिज आ चुके हैं और अलग होने की मांग कर रहे है।  पाकिस्तान इन सब घटनाओं से खासा परेशान है। आंतरिक हालात संभलते नहीं बन पा रहे हैं और न ही अंतरराष्ट्रीय  हालात नियंत्रण में है। आतंकियों को पालने-पोसने के लिए पाकिस्तान अलग-थलग पड चुका है। अवाम को भटकाने और गुमराह करने के लिए पाकिस्तान के पास भारत के खिलाफ आग उगलने और सघंर्ष  विराम का उल्लघंन  करने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचा है।

रविवार, 18 मार्च 2018

केजरीवाल की माफी पर बगावत

“अपनी जडें काटने में माहिर“ दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल का बडबोलापान अब उनकी ”जी का जंजाल” साबित हो रहा है। पंजाब के सीनियर अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया पर बेबुुनियाद आरोप लगाने के लिए उन्हें अदालत में माफी मांगनी पडी है।  विधान सभा चुनाव के दौरान आप प्रमुख ने मजीठिया पर ड्रग माफिया से कथित संबंधों के संगीन आरोप लगाए थे। इस पर  मजीठिया  ने केजरीवाल, संजय सिंह और आशीष  खेतान पर अमृतसर की अदालत में मानहानि का मामला दायर किया था। केजरीवाल के माफीनामे के बाद  मजीठिया  ने मानहानि का मामला वापस ले लिया है। केजरीवाल को वित्त मंत्री अरुण जेटली से भी माफी मांगनी पड सकती है। जेटली ने भी केजरीवाल पर बेबुनियाद आरोप लगाने के लिए मानहानि का  मामला दायर कर रखा है। केजरीवाल के माफीनामे से यही संदेश  मिलता है कि उन्हें “बेबुनियाद“ आरोप लगाने की लत है। अपने माफीनामे में केजरीवाल ने यह बात मानी  भी है। माफीनामे पर पंजाब के आप नेता बेहद खफा हैं।  “आप“ के प्रदेशाध्यक्ष सांसद भगवंत मान और उपाध्यक्ष अमन अरोडा ने अपन-अपनेे पदों से इस्तीफा दे दिया है। आप विधायक दल और पंजाब में विपक्ष के नेता सुखपाल खैहरा ने भी टवीट करके अपनी नाराजगी जाहिर की है। यहां तक कि केजरीवाल के  विश्वास  पात्र राज्यसभा सदस्य संजय सिंह भी नाराज नजर आ रहे हैं। उन्होंने भी सोशल मीडिया पर कहा है कि इस फैसले से पार्टी के कई नेता नाखुश  है। संजय सिंह ने सफाई भी दी है कि उन्होंने माफी नहीं मांगी है। सबसे तल्ख प्रतिक्रिया कुमार  विश्वास  ने व्यक्त की है। उन्होंने टवीट किया है “ एकता बांटने में माहिर है, अपनी जडें काटने में माहिर है; हम क्या उस शख्स पर थूकें जो खुद, थूक कर चाटने में माहिर है“।   आप नेताओं को सबसे ज्यादा गुस्सा इस बात पर है कि माफी मांगने से पहले केजरीवाल ने पंजाब के नेताओं से चर्चा तक नहीं की। मामला पंजाब से संबंधित था, इसलिए राज्य नेताओं की राय जाने बगैर माफी मांगना उनका अपमान है। हैरानी इस बात  की भी है कि ऐसे समय में जब एसटीएफ (स्पेशल टॉस्क फौर्स) ने हाई कोर्ट में मजीठिया के खिलाफ ठोस सबूत पेश  किए हैं, माफी मांगने का कोई औचित्य नहीं बनता है।   पार्टी के कार्यकर्ता भी केजरीवाल के इस स्टैंड से स्तब्ध हैं। केन्द्रीय मंत्री और मजीठिया की बहन हरसिमरत कौर बादल ने इसे “ केजरीवाल की ओच्छी राजनीति“ बताया है। लोक इंसाफ पार्टी ने आम आदमी पार्टी से नाता तोड लिया है। पार्टी नेता सिमरजीत सिंह बैंस को लगता है कि केजरीवाल और मजीठिया के बीच कोई डील हुई है।  पंजाब में आम आदमी पार्टी ने नशे  के खिलाफ लडाई लडने और इसे जड से मिटाने का संकल्प ले रखा है। बहरहाल, केजरीवाल के माफीनामे प्रकरण ने पंजाब में पार्टी की बची-खुची साख को भी ध्वस्त कर दिया है।   आप को युवाओं की पार्टी  माना जाता है। पंजाब में 70 फीसदी से भी ज्यादा युवा नशे  की गिरफ्त में है और नशीली वस्तुओं की तस्करी राज्य की सबसे भयावह समस्या है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भौगोलिक निकटता के कारण पंजाब नशीली वस्तुओं की तस्करी का गढ बन चुका है। पिछले साल सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने पंजाब में 1325 करोड रु मूल्य की 279 किलो हिरोइन जब्त की थी। ं पंजाब मे अलगावादियों को भडका कर आतंकी हिंसा फैलाने में नाकाम रहने के बाद पाकिस्तान अब नशीले पदार्थों की तस्करी और नकली नोटों का मायाजाल फैला कर इस खुशाहल राज्य को तबाह करना  चाहता है। तट्स्थ लोगों का मानना है कि सियासी लोगों की मदद के बगैर नशी ली वस्तुओं का धंधा मुमकिन नहीं है। यह बात के जरीवाल भी जानते हैं और कहते भी रहे हैं। केजरीवाल का “यू टर्न“ पंजाब के लिए दुखद है।     

नव संवत्सर और नवरात्र

नव संवत्सर पर हार्दिक  शुभकामनाएं। फिरंगियों की चापलूसी करते-करते हम अपनी संस्कृति और सभ्यता ही भूल चुके हैं। हिंदुओं की मान्यताओं के अनुसार नववर्ष  चैत्र माह की प्रतिपदा से  शुरु हो जाता है। इसी दिन  से ब्रहृमा ने  सृष्टि  की रचना  शुरु की थी। इससे पहले  ब्रह्माण्ड  में अंधकार ही अंधकार था। जीवन में हमेशा  उजाला बना रहे और अंधकार का साया भी न पडे, नवरात्र  पर  सभी के लिए यही  शुभेच्छा। आज से जी शारदीय नवरात्र  शुरु हो गए हैं। शक्ति उपासना के पर्व नवरात्र नवधा श्रद्धा के साथ सनातन काल से मनाए जाते हैं। इस दौरान  शक्ति की  देवी के अलग-अलग नौ रुपों- शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी चंद्रघटा,  कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री- की उपासना की जाती है। शास्त्रों में वसंत और  शरद ऋृतु की शुरुआत, यानी सूर्य और जलवायु के प्रभावों को महत्वपूृर्ण  माना गया है। इसीलिए साल  में दो बार, वसंत और शरद  ऋृतु के आगमन पर परम रचनात्मक उर्जा  के लिए दैवी की उपासना की जाती है। और रचनात्मक उर्जा पाने के लिए व्रत और उपासना से ज्यादा कोई क्रिया हो ही नहीं  सकती।   विज्ञान भी इस बात को मानता है कि शरीर की नियमित  शुद्धि होनी चाहिए। चाहें तो  पश्चिम  की नकल करके डाक्टर से चैक-अप करा लें अथवा भारतीय मान्यताओं के अनुरुप व्रत और उपासना कर  शुद्धि कर लें। परंपराएं और मान्यताएं किसी भी देश  की क्यों न हों, वे हमे जीने का कला सिखाती हैं। सनातन काल से चली आ रही भारतीय मान्यताओं का अपना  विशिष्ट  स्थान हैं। पुराणों और ग्रथों में ऋृषि  -मुनियों के रोग मुक्त, स्वस्थ और दीर्घायु का राज अनुशासित जीवन और सात्विक आचार-विचार ही था। मगर हम उनका अनुकरण करने की बजाए पाश्चात्य  संस्कृति के दीवाने हो गए। अग्रेजों की बुरी लतें (सांमती जीवन  शैली, अहंकारी स्वभाव) तो अपना लीं   मगर अच्छी बातें छोड दी।  अग्रेजों  को आज भी समय का पाबंद माना जाता है मगर हम लेट-लतीफी में अभ्यस्त  हैं।  उनकी धार्मिक आस्थाएं हमसे ज्यादा पवित्र और सच्ची है। हम भगवान को भी  रिश्वत  देने से नहीं चूकते और पूजा-अर्चना में भी बदनीयत दिखाते हैं। कुत्ते को पालने में पालंगे मगर गरीब और लाचार इंसान को सहारा नहीं देंगे। नव  वर्ष  और नवरात्रि पर हमें इन सब  बातों  पर सोचने की जरुरत है। हमारी परंपराए और मान्यताएं हमें सच्चा इंसान बनने की सीख देती है। शक्ति की देवी की उपासना का मूल मकसद भी यही होन चाहिए। एक बार फिर हार्दिक  शुभकामनाएं।    

शुक्रवार, 16 मार्च 2018

भाजपा को लगा जोर का झटका

इतिहास खुद को दोहरा रहा है। उत्तर प्रदेश  में गोरखपुर और फूलपुर  लोकसभा हलकों के उप चुनाव  गैर-भाजपाई दलों की एकता के चमत्कारी नतीजे यही  दर्शाते   र्हैं। सपा-बसपा के गठजोड ने उत्तर प्रदेश  में भाजपा को चारों खाने चित कर दिया है। बिहार की अररिया लोकसभा सीट भी भाजपा पूरी ताकत लगाने के बावजूद  राष्ट्रीय   जनता दल से छीन नहीं पाई है।  जनता दल (यू) से चुनावी गठजोड भी भाजपा के काम नहीं आया और न ही  मुख्यमंत्री नीतिश  कुमार का धुआंधार  चुनाव प्रचार। जूनियर लालू  नीतिश   ज्यादा  सयाने निकले हाल ही में  भाजपा को उत्तर प्रदेश , बिहार और राजस्थान में पांच मेंसे चार लोकसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पडा है। मध्य प्रदेश  में फरवरी में दो सीटों के लिए हुए  विधानसभा उपचुनाव भी भाजपा हार गई थी जबकि राज्य में 15 साल से भाजपा की सरकार है। 2019 के लोकसभा उपचुनाव से पहले एक के बाद दूसरी हार भाजपा के लिए  शुभ नहीं है। गोरखपुर लोकसभा सीट की पराजय  भाजपा को सबसे बडा धक्का है। यह सीट योगी आदित्यनाथ के  मुख्यमंत्री बनने पर खाली हुई थी और योगी 1998 से लगातार इस सीट पर जीत रहे थे। फूलपुर लोकसभा सीट पर 2014 में उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य  जीते थे। इस उपचुनाव में भाजपा यह सीट भारी मतों के अंतर से हार गई है।  बहुजन समाज पार्टी के समर्थन से  दोनों सीटें समाजवादी पार्टी ने जीती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी माना है कि सपा-बसपा के गठबंधन के कारण भाजपा हारी है। भाजपा के नेता भी इस बात को मानते हैं कि उत्तर प्रदेश  में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी गठजोड भाजपा से भी अधिक ताकतवर गठबंधन है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के 42.63 फीसदी वोट की तुलना में समाजवादी, बसपा और कांग्रेस को 49.83ः  फीसदी वोट मिले थे। स्पष्ट  है अगर 2014 के लोकसभा चुनाव मे तीनों का चुनावी गठबंधन होता, तो चुनाव परिणाम कुछ और ही होते। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत गिरकर 39.6 रह गया था जबकि बसपा, सपा और कांग्रेस को 50.3 फीसदी (बसपा 22.23, सपा को 21.82 और कांग्रेस को 6.25 फीसदी) वोट मिले थे। इससे पता चलता है कि अगर विधनसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ-साथ सपा का बसपा से भी गठबंधन होता, भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलना लगभग असंभव होता। चुनावी इतिहास इस बात का गवाह है कि एकजुट विपक्ष सतारूढ दल को चुनावी पटखनी देने में पूृरी तरह से सक्षम है। एक जमाने में कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा समेत विपक्षी दल साझा मोर्चा  खडा करने के लिए दिन रात हाथ-पांव मारा करते थे। उस समय चुनावी गणित साझा विपक्ष के पक्ष में होते हुए भी कांग्रेस मत विभाजन का फायदा उठा कर सत्ता पर काबिज हो जाती थी। गैर-कांग्रेस दलों के पास कांग्रेस से ज्यादा वोट  होने के बावजूद कांग्रेस को बहुमत मिल जाता। 1977 में गैर कांग्रेसी दलों ने साझा मोर्चा  बनाया और कांग्रेस का उत्तर भारत में सुपडा साफ हो गया। 1989 में फिर साझा विपक्ष ने कांग्रेस को सता से बेदखल कर दिया और दूसरी बार केन्द्र में भाजपा के समर्थन से गैर-कांग्रेस सरकार बनी। 70 और 80 के दशक में भाजपा समेत तत्कालीन विपक्षी दलों को जिस  स्थिति का सामना करना पडता था, ठीक उसी तरह की स्थिति का सामना अब कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को करना पड रहा है।, गैर-भाजपाई दलों में चुनावी गठबंधन आसान नहीं है। राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की महत्वाकांक्षाएं हर बाार एकता में बाधा डालती रही है। उत्तर प्रदेश  उपचुनाव के नतीजे आने के बाद  बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने सबसे मुखर प्रहार कांग्रेस पर किया है। बहरहाल, दो दिन पहले संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के रात्रि भोज में सपा, बसपा, राकांपा समेत 20 विपक्षी दलों की उपस्थिति विपक्षी एकता के लिए शु भ संकेत हैं। इसी साल के अंत में  मध्य प्रदेश , राजस्थान , छतीसगढ और मई में कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के दौरान  विपक्षी एकता का पता चल जाएगा।   

गुरुवार, 15 मार्च 2018

महान विज्ञानी स्टीफन हाकिंग

21 साल  की  बाली उमर में अगर कोई  एक दिन अचानक लडखडा जाए और उसे पता चले कि वह दो-तीन साल से ज्यादा समय तक जीवित नहीं रह पाएगी, ऐसे व्यक्ति की तो दुनिया ही उजड जाएगी। यह जाने-माने भौतिकविद  स्टीफन हॉकिंग की कहानी है जिन्हे्  अल्बर्ट  आइइंस्टीन  के बाद दुनिया का  दूसरा विलक्षणतम विज्ञानी माना जाता है।  स्टीफन हॉकिंग के देहांत से विज्ञान जगत में वही  शून्य भर आया है जो 1955 में आाइस्टीन के निधन से उत्पन्न हुआ था। 21 वर्ष   की आयु में  स्टीफन हॉकिंग को बताया गया कि वे मोटर न्यूरॉन रोग (एमएनडी) से पीडित हैं और दो-तीन साल से ज्यादा नहीं जी पाएंगे। एमएनडी एक ऐसी अससाधारण स्थिति है जिसमें दिमाग और तांत्रिक प्रकिया धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं। शरीर कमजोर होने लगता है और समय के साथ बीमारी बढती जाती है।  एमएनडी का  शुरु में पता नहीं चलता और इसके लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं। यह जानलेवा बीमारी उमर को छोटा कर देती है और इससे पीडित व्यक्ति लंबी आयु तक नहीं जी सकता। मगर स्टीफन हॉकिंग भाग्यशाली रहे।  इस जानलेवा बीमारी से उनका शरीर लकवाग्रस्त हो गया और उन्हें व्हीलचेयर से बंधे रहने के लिए विवश  कर दिया। इसी कारण हॉकिंग को उन्नत उपकरणों और कंप्यूटर के जरिए संवाद करना पडता था। इस संघर्षपूर्ण   जीवन के बावजूद  हॉकिंग ने 76 साल की आयु का सफर तय किया । बुधवार  प्रातकाल उनका निधन हो गया। समकालीन दौर के सबसे चर्चित विज्ञानी, हॉकिंग का भौतिक विज्ञान में बहुत बडा योगदान है। भौतिक विज्ञान में स्नातक डिग्री हासिल करने के बाद  हॉकिंग ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ख्यातिप्राप्त कोस्मोलॉजिस्ट डेनिस स्काइमा के निर्देश
न में पीएचडी की। इस दौरान हॉकिंग को पता चला कि मोटर न्यूरॉन रोग ने उन्हें जकड लिया है। हॉकिंग ने हिम्मत नहीं हारी। यह वह जमाना था जब वैज्ञानिक ब्लैक होल और जेनरल रिलेटिविटी (सामान्य सापेक्षता) मे गहरी दिलचस्पी दिखा रहे थे। ब्लैक होल ने हॉकिंग का ध्यान भी खींचा और उन्होंने इस पर अपनी रिसर्च  आरंभ  कर दी। इससे उनकी असाधारण प्रतिभा का भी पता चला।   स्काइमा के निर्देशन में हॉकिंग ने बिग बैंग थ्योरी पर काम करना  शुरू र कर दिया। हॉकिग ने प्रतिपादित किया कि ब्लैक होल का उलटा पतन ही बिग बैंग है। 1970 में हॉकिंग एमएनडी के कारण  शैयाग्ग्रस्त हो गए  और उनका चलना-फिरना भी  मुश्किल  हो गया थ। इसके बावजूद हॉकिग  जिंदगी  से लड़ते रहे । उन्होंने  ख्यातिप्राप्त भौतिक विज्ञानी रोजर पेनरोस के साथ मिलकर गहराई से रिसर्च की।  1970 में अपने षोधपत्र में हॉकिंग ने सिद्ध किया कि सामान्य सापेक्षता के  स्पष्ट  मायने है कि ब्रह्मांड ब्ळैक होल के केन्द्र से ही षुरु होता है और इसका आकार कभी घटता नहीं है। यह हमेषा बढता रहता है। ब्लैक होल के निकट जाने वाली कोई भी वस्तु बच नहीं सकती और इसमें समा जाती है। इससे ब्लैक होल का वजन बढता रहता है। हॉकिंग ने यह भी बताया कि ब्लैक होल को छोटे ब्लैक होल्स में  विभाजित नहीं किया जा सकता।  भौतिक विज्ञान के अलग-अलग  विषयों - क्ंवाटम थ्योरी, जेनरल रिलेटिविटी,  ब्रह्माड विज्ञान, सूचना सिद्धांत और थ्रमोडायनामिक्स  को भी हॉकिंग एक साथ ले आए । अब तक कोई भी वैज्ञानिक ऐसा नहीं कर पाया था। क्ंवाटम थ्योरी में परमाणु जैसी सुक्ष्म से सुक्ष्म चीजों का विवरण दिया जाता है। सामान्य सापेक्षता ( जनरल रिलेटिविटी“ ) के सिद्धांत तारों और आकाशगंगाओं आधारित ब्रह्माडीय  विषयों  का सार है।  शारीरिक तौर पर पंगु होते हुए भी स्टीफन हॉकिंग उन विलक्षण वैज्ञानियों मं शुमार है जिन्होंने दुनिया को बहुत कुछ दिया है। इस महान भौतिकविद को नोबेल सम्मान से महरुम रखना इस अवार्ड  का ही अपमान है।   

बुधवार, 14 मार्च 2018

किसानों की व्यथा

चलते-चलते पत्थर हो गए पैर, पांव में पडे छाले नासूर बन गए; हाय री किस्मत, किसी को हम नजर नहीं आए“, किसान की यह दुर्दशा  हुक्मरानों को व्यथित नहीं करती है।  और न ही बडे  शहरों में बसे लोगों को । महाराष्ट्र  के किसानों का आंदोलन इसकी ताजा मिसाल है । मुंबई में वातानुकूलित कमरों में “थोथी“ योजनाएं बना रहे  शासकों को जगाने के लिए लगातार पांच दिन तक 180 किलोमीटर की पैदल यात्रा मेनस्ट्रीम मीडिया तक को भी  नजर नहीं आई और न ही किसानों के फफोले नजर नहीं आए। मगर आंदोलनकारी किसानों की दरियादिली देखिए कि परीक्षारत छात्रों को कोई असुविधा न हो, इसलिए वे रात भर पैदल यात्रा कर मुबई पहुंचे। किसान का दिल जितना बडा है, उससे भी बडा देश  का अन्न भंडार भरने में उसका योगदान है। भारत कृषि  प्रधान देश  है और किसान अन्न दाता है, स्कूलों में आज भी यह पाठ पढाया जाता है। और यही अन्नदाता और कृषि  प्रधान देश  का नायक आजादी के सात दशक भी उसी तरह बेहाल है, जिस तरह वह फिरंगी शासन के जमाने में हुआ करता था।  शहरों में आज भी किसानों की छवि “गंवार“ और बैक्वर्ड   वाली ही है। मिट्टी-गोबर से सने हाथ और पसीने की “बू“, शहरियों को तो छोडिए, उनके नुमाइंदों  को भी  रास नहीं आती है। समकालीन “निहित स्वार्थी राजनीति“ में  किसानों की समस्याओं को भी “वोट“  भुनाने  का जरिया बना लिया गया है और इसी नजरिए से उनकी समस्याओं का समाधान निकाला जाता है।  विपक्षी पार्टियां किसानों के लिए आसमान से तारे तोडने का झांसा देते-देते नहीं अघाती हैं मगर पॉवर में आते ही “ वित्तीय संसाधनों“ की कमी का रोना रोती है। मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के वेतन-भत्ते, पेंशन बढाने और  शाही सुविधाएं जुटाने के लिए कभी भी संसाधनों की कमी आडे नहीं आती है मगर किसान, मजदूर और शोषित  तबकों  के  लिए सामाजिक सुरक्षा देने में भी कंजूसी दिखाई जाती है। किसानों की बदहाली का आलम यह है कि 1997 से अब तक दो लाख से ज्यादा किसान आत्मह्त्या कर चुके हैं। महाराष्ट्र  के विदर्भ  क्षेत्र में सबसे ज्यादा हर साल 4000 से ज्यादा किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं और यह सिला उतरोत्तर बढता जा रहा है। छत्तीसगढ जैसे राज्य में 2000 तक किसान आत्मह्त्या का एक भी मामला नहीं था, मगर 2007 में एक साल में ही 1500 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्याएं की थी।  कृषि  उत्पादों की बढती लागत और इसकी तुलना में गिरते दाम  किसानों को साल-दर-साल कर्जदार बना रहे हैं।  विश्व  व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के तहत मुक्त व्यापार के लिए भारत की  मंडियां खुलने से सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पडा है।  विश्व  व्यापार संगठन के कृषि उत्पाद संबंधी नियम असल में मात्र डंपिंग को बढावा देते हैं। समृद्ध देश  अपने यहां  एग्री -बिजनेस को और ज्यादा सबसिडी दे रहे हैं मगर विकसित देशों  को ऐसा करने से रोक रहे हैं। अमेरिका में  कपास उत्पादको को हर साल चार अरब डॉलर की सब्सिडी दी जाती है। अंतरराष्ट्रीय  दाम कम रहने से अमेरिका का कॉटन मार्केट पर एकाधिकार स्थापित हो चुका है और बुर्किना फासो और माली जैसे गरीब मुल्को  को भारी नुकसान उठाना पड रहा है। डब्ल्यूटीओ के अस्तित्व में आने के बाद से  कृषि उत्पाद के दाम निरंतर गिर रहे हैं। पास्ता में प्रयोग होने वाले कनाडा की डुरुम गेंहू के दाम  पिछले साल 45 फीसदी की गिरावट के साथ छह साल के न्यूनतम स्तर पर थे। कॉर्न और सोयाबीन के दाम इस समय दस साल के निम्नतम स्तर पर पहुंच चुके हैं। भारत में हालांकि रबी और खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम खरीद मूल्य  तय किया जाता है मगर इसे लागत से नहीं जोडा जाता है। इस साल के बजट में केन्द्र सरकार ने किसानों को उनकी फसल का लागत से डेढ गुना ज्यादा कीमत देने का वायदा किया है। किसानों को कृषि  उत्पादों का लाभदायक मूल्य ही उनकी समस्याओं का स्थाई  समाधान हो सकता है।             

मंगलवार, 13 मार्च 2018

भारत-फ्रांस की बढती मित्रता

दिल्ली में सरकार किसी भी राजनीतिक दल की हो, भारत और फ्रांस के बीच दोस्ती का ग्राफ बराबर ऊंचा उठता रहा है। फ्रांस के  राष्ट्रपति  इमैनुएल मै्रकों के मौजूदा भारतीय दौरे के दौरान  यह बात सामने आई है। मैक्रों 2017 में  राष्ट्रपति   बनने के बाद पहली बार भारत की यात्रा पर आए हैं।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राश्ट्रपति मैक्रों ने भी माना है कि भारत और फ्रांस के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध हमेषा मजबूत होते रहे हैं। दोनों देषों के बीच संबंध कितने अहम है, इसका अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर पूरी दुनिया में दो विपरीत  धु्रवों में स्थित दो देश  कंधे से कंधे मिलाकर चल सकते हैं, तो वह भारत और फ्रांस हैं। जमीन से आसमान तक ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जिसमें भारत और फ्रांस मिलकर काम नहीं कर रहे हों। फ्रांस, भारत में सबसे ज्यादा निवेष करने वाला नौवां देष है। पिछले 17 सालो में फ्रांस ने भारत में 16 अरब डॉलर का निवेश  किया है। मार्च  2016 से अप्रैल 2017 के बीच ही फ्रंास ने 11 अरब डॉलर का निवेष किया है। पश्चिम   के देश   भारत को दुनिया की तेजी से उभरती शक्ति मानते हैं और उसके साथ हर क्षेत्र में सहयोग के लिए लालायित रहते हैं। भारत के रक्षा कवच को सुढृढ करने में  एक जमाने में रुस की जो अहम भूमिका होती थी, अब फ्रांस वही रोल निभा रहा है। भारत अब फ्रांस को सबसे विष्वस्त रक्षा साझेदार मानता है। भारत को रक्षा उपकरणों और उनके उत्पादन में फ्रांस का महत्वपूर्ण  योगदान रहा है। राश्ट्रपति  इमैनुएल मै्रकों की यात्रा के दौरान दोनों देषों के बीच 14 समझौते हुए हैं और इनमें फ्रांस और भारतीय सेना के बीच लॉजिस्ट्क सहयोग  सबसे अहम है।  प्रशांत  महासागर  (इंडो पैसेफिक) में चीन की बढती सक्रियता से चिंतित भारत को ऐसे शक्तिशाली दोस्त के सहयोग की दरकार थी जिसकी इस क्षेत्र में बडी उपस्थिति हो। भारतीय नौसेना की प्रशांत  महासागर में न के बराबर उपस्थिति है जबकि फ्रांस अभी भी इस क्षेत्र में बहुत बडी शक्ति है हालांकि उसकी नौसेना उत्तरोतर कमजोर होती जा रही है।  इस क्षेत्र का बहुत बडा इलाका फ्रांस के पास है और अगर वह  अपनी नौसेना की ताकत को भारत के साथ साझा करता है, तो इसमें उसका भी फायदा है और भारत का भी। इस समय प्रशांत  महासागर में अमेरिका की सैन्य शक्ति में  पहले जैसा दम-खम नहीं रहा है। इन हालात में भारत और फ्रंास के पास एक दूसरे के साथ सहयोग करने के सिवा कोई चारा नही है। भारत ने अमेरिका के साथ भी सैन्य लॉजिस्टिक (लमोआ- लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट)  साझा करने का समझौता कर रखा है। इसके तहत भारत और अमेरिका एक-दूसरे के साथ सैन्य लॉजिस्टिक को साझा कर सकते हैं। और अब फ्रांस के साथ लॉजिस्टिक समझौता होने से भारत प्रषांत महासागर में सुखद स्थिति में आ गया है। फ्रांस ने अपने सैनिक अड्डे भारतीय सेना के लिए खोल दिए हैं। रक्षा क्षेत्र के अलावा पर्यावरण पर भी भारत और फ्रांस के बीच सहयोग बढा है।  जलवायु परिवर्तन पर  अमेरिका द्वारा अपनी प्रतिबद्धता से हाथ खींच लेने के बाद इस क्षेत्र में भी भारत और फ्रांस की भूमिका बढी है। दोनों देषों ने पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन की चिंताओं को साझा करते हुए इस क्षेत्र में सहयोग को आगे बढाने के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई है। फ्रांस के पास पर्यावरण को लेकर उन्नत तकनीक है और इसके सहयोग से भारत पर्यावरण और जलवायु से जुडी समस्याओं का निदान कर सकता है।  फ्रांस  सोलर उर्जा  में भी भारत को तकनीकी मदद दे सकता है। भारत में दुनिया के सबसे विषाल न्युक्लियर पॉवर संयत्र को स्थापित करने में भी फ्रांस सहयोग करेगा। 2016 में फ्रांस के तत्कालीन राश्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांदे ने इस संयत्र को लगाने में सहयोग का ऐलान किया था। यह सहयोग भारत और फ्रांस के बीच पक्की दोस्ती की मिसाल है।

शनिवार, 10 मार्च 2018

यूथेनेशिया-इच्छा मृत्यु

सुप्रीम कोर्ट  ने अतंतः  इच्छा मृत्यु की अनुमति दे दी है। शुक्रवार को शीर्ष   अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने “लिंविग विल“ यानी इच्छा मृत्यु की इजाजत देते हुए व्यवस्था दी कि हर इंसान को गरिमापूर्ण  मृत्यु का अधिकार है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट  ने 42 साल से कोमा में रही अरुणा शानबाग को इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं दी थी। अरुणा मुंबई के केईएम अस्पताल में बलात्कार का शिकार होने के बाद कोमा में चली गई थी। अदालत ने “पैसिव यूथेनेशिया“ की अनुमति देते हुए इसके लिए दिशा -निर्देश  भी जारी किए हैं। रोगी जब गंभीर बीमारी से पीडित होने पर मौत जैसी स्थिति से गुजरता है, तब इच्छा मृत्यु मांगता है।   यूथेनेशिया में दो तरह की स्थितियां होती है-एक्टिव और पैसिव। दोनों में काफी अंतर है। एक्टिव यूथेनेशिया में रोगी की मृत्यु के लिए डाक्टरों की मदद ली जाती है।  पैसिव यूथेनेशिया में रोगी की जान बचाने अथवा उसे जिंदा रखने के लिए कुछ नहीं किया जाता। “लिंविग विल“ अथवा इच्छा मृत्यु पर कानून बनाए जाने तक सुप्रीम कोर्ट के दिशा  निर्देश  जारी रहेंगे। देश  में अभी तक इच्छा म्रत्यु पर कोई कानून नहीं है। अमेरिका और रुस जैसे  विकसित देशों  में भी इच्छा मृत्यु की इजाजत नहीं है और इस तरह की मौत को अपराध की श्रेणी (आत्म हत्या) में रखा गया है। अभी तक केवल चार मुल्कों- हालैंड, कनाडा, लक्जमबर्ग  और बेल्जियम- में ही इच्छा मृत्यु की अनुमति है। दक्षिण कोरिया में इस साल फरवरी से इच्छा मृत्यु की अनुमति दी गई है। सुप्रीम कोर्ट  के ताजा फैसले के बाद भारत अब इच्छा मृत्यु देने वाला दुनिया का छठा मुल्क बन जाएगा। अमेरिका के कुछ राज्यों, जर्मन और जापान में असिस्टिड आत्महत्या अथवा “डाक्टर की सहायता से आत्महत्या“ की अनुमति है। यह भी एक तरह से इच्छा मृत्यु ही है। आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य में 2019 में  असिस्टिड डाइंग स्कीम संबंधी कानून लागू हो जाएगा। बहरहाल, सदियों से दुनिया में इस बात पर जबरदस्त बहस होती रही है कि जिस तरह  सभ्य समाज में हर इंसान को सम्मान से जीने का अधिकार है, उसी तरह उसे गरिमापूर्ण  मृत्यु का भी अधिकार होना चाहिए। मगर समाज यह भी मानता है कि मौत कब आती है, इस पर किसी का वश  नहीं है। इस शाश्वत  सत्य को भी पूरी धरती मानती है कि मौत का समय निश्चित  है, इसे किसी भी सूरत में इसे टाला या समय पूर्व नहीं लाया जा सकता। उन्नत आर्युविज्ञान भी मौत पर काबू नहीं कर पाया है। दुनिया में कैंसर से आज भी हर साल एक करोड से ज्यादा लोग मरते हैं। मौत गरिमापूर्ण नहीं हो सकती।  इन सच्चाई के दृष्टिगत  मृत्यु को इच्छा के अनुसार कैसे संभव बनाया जा सकता है? मांगने पर अगर मौत मिलती तो मानव आत्महत्या ही क्यों करता?  लाइफ स्पोर्ट  सिस्टम से भी रोगी को तब तक जिंदा रखा जा सकता है, जब तक उसे मौत नहीं आ जाती। मानवतावादी  इस बात को लेकर अक्सर चिंता व्यक्त करते हैं कि मृत्युशैया पर लेटे मानव को मरने के लिए छोड देना क्या अमानवीय कृत्य नही है। इच्छा मृत्यु को लेकर देश  में अभी भी कई दिक्कतें है। केन्द्र सरकार इच्छा मृत्यु से जुडे तमाम पहलुओं पर गौर कर रही है और लोगों से सुझाव भी मांगे गए है। इन सब बातों के कारण केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट  में इच्छा मृत्यु का विरोध किया था। इच्छा मृत्यु को लेकर न्यायपालिका की अलग-अलग रही है। 1994 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मानव को जीने के साथ-साथ मरने का भी अधिकार होना चाहिए मगर 1996 में कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 (राइट टू लीव) का उल्लघंन बताया था। 2000 में केरल हाई कोर्ट ने इच्छा मृत्यु को आत्महत्या जैसा बताया था। बहरहाल, गेंद अब सरकार के पाले में है। 

शुक्रवार, 9 मार्च 2018

प्रतिमाएं तोडने से क्या होगा?

त्रिपुरा में भाजपा-नीत दक्षिणपंथी सरकार के सता में आते ही पूरे देश  में “ असहिष्णुता और   बदले" की  राजनीति"  ने सिर उठाना  शुरु कर दिया है। वाम सरकार के अपदस्थ होते ही  त्रिपुरा में रुसी क्रांति के नायक ब्लादिमीर लेनिन की प्रतिमाएं तोड दी गई हैं। इतना ही नहीं भाजपा के एक विधायक ने यहां तक कह दिया है कि त्रिपुरा में लेनिन, स्टालिन और मार्क्स सबको जाना होगा। प्रतिमाएं उखाड दी जाएंगी और इनके नाम वाली सडकें भी नहीं रहेंगी। किताबों में  लेनिन, स्टालिन और मार्क्स के बारे जो भी लिखा गया है, वह सब हटा दिया जाएगा क्योंकि यह सब भारतीय संस्कृति का हिस्सा नहीं है। हाल ही तक लेनिनग्रेड माना जाना वाला त्रिपुरा धीरे-धीरे लेनिन मुक्त हो रहा है। दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया कालेज स्कवायर में रविवार को लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर चढाकर ढहा दिया गया। सोमवार को अगरतला से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित सबरूम में लेनिन की मूर्ति तोड दी गई। भाजपा के  वरिष्ठ  नेता हेमंत बिस्वा सरमा ने तो पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार को पश्चिम  बंगाल, केरल अथवा पडोसी देश  बांग्ला देश  में शरण लेने की नसीहत तक दे डाली है। इसे उपहासपूर्ण  बयान नहीं माना जा सकता, अलबत्ता यह दक्षिणपंथियों की सोच को उजागर करता है। माणिक सरकार बंगाली है, इसीलिए उन्हें पश्चिम बंगाल अथवा बांग्ला देश  में  शरण लेने की बात कहकर अपमानित किया गया है। चुनावी जीत-हार  लोकतंत्र का अहम हिस्सा होता है लेकिन चुनावोपरांत हिंसा का माहौल लोकतंत्र का मजाक है। एक जमाने में भाजपा वाम दलों को पश्चिम  बंगाल में “हिंसा की राजनीति“ करने के लिए कोसा करती थी। अब भाजपा खुद वही कर रही है।  प्रतिमाएं तोडने का यह सिला मंगलवार को अन्य राज्यों में भी फैल गया। मंगलवार को तमिल नाडु के वेल्लूर जिले में दक्षिणपंथियों ने तमिल नाडु के लोकप्रिय नेता पेरियार की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया। इस घटना से पहले भाजपा के एक नेता ने फेसबुक पर चेताया था कि जिस तरह त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमाएं तोडी गईं है, उसी तरह तमिल नाडु में पेरियार की प्रतिमाएं तोडी जाएंगी। मंगलवार को फेसबुक पर यह पोस्ट आया और रात को पेरियार की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया गया। समाज सुधारक पेरियार जाति प्रथा के घुर विरोधी थे। उन्हें तमिल नाडु में ब्राहृमणवाद के प्रभुत्व को ललकारने और ”आत्म सम्मान आंदोलन“ चलाने के लिए जाना जाता है। कोलकता में कुछ लोगों ने भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज जनसंघ के संस्थापक डाक्टर  श्यामा  प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को तोड डाला। उत्तर प्रदेश  के मेरठ में षरारती तत्व ने मंगलवार रात को संविधान निर्माता डाक्टर भीम राव अंबेडकर की प्रतिमा को नुकसान पंहुचाया। ताजा मामले मैं केरल मैं  महात्मा  गाँधी की प्रतिमा को नुकसान पहुंचाया गया है ।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह और भाजपा के  राष्ट्रीय  अध्यक्ष अमित  शाह ने प्रतिमाएं खंडित करने और तोडने की घटनाओं की भर्त्सना करते हुए राज्यों को शरारती तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश  दिए हैं। मगर भाजपा से संबंधित  शासक विजयोन्माद भगवा कार्यकर्ताओं को रोकने की गंभीर कोशिश  करेंगे , इस पर संदेह हो रहा है। गृह मंत्री के निर्देश  के बावजूद त्रिपुरा के राज्यपाल जिस चतुराई से हिंसा को जायज ठहरा रहे हैं, उसके  मद्देनजर  लगता नहीं है, हिंसा रुक पाएगी। “ईंट का जवाब पत्थर से देना“ दक्षिणपंथियों की कार्यशैली का अहम हिस्सा रहा है। इससे पहले भगवा संगठनों ने गोहत्या, गोमांस सेवन, कट्टरवादी राष्ट्रवादी सोच और “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ को लेकर असहिष्णुता का माहौल बनाया था। इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोडा जा सकता है कि चुनाव जीतने के लिए हिंसक और नफरत की भाशा का इस्तेमाल करने और हिंसक प्रवृति को उकसाने वाले नेताओं से “प्रेम और सहिष्णुता“ की उम्मीद नहीं की जा सकती। प्रतिमाएं तोडने से विचारधारा को नही तोडा जा सकता और न ही ऐसा करके सामाजिक-आर्थिक उन्नति की जा सकती है। इससे सिर्फ नफरत और बंटवारे की दीवार खडी होती है।

बुधवार, 7 मार्च 2018

दीपक से कमल तक का सफर

भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज जनसंघ के जमाने में कांग्रेस का नारा हुआ करता था,“ दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं़“। तब जनसंघ का चुनाव चिंह दीपक हुआ करता था। जमाना कांग्रेस का था। उत्तर हो या दक्षिण, पूर्व हो या पश्चिम , हर तरफ  में कांग्रेस की ही दुन्दुभि बजती थी। वह जमाना पिछली सदी के अंत में ही लद गया था और इक्कीसवी सदी के दूसरे दशक में कांग्रेस का आलम  यह है कि  ग्रांड ओल्ड पार्टी  मात्र चार राज्यों-कर्नाटक, पंजाब , मिजोरम और पुडुचेरी-  तक सिमट कर रह गई है। और जिस पार्टी पर कांग्रेस तंज कसा करती थी कि सरकार चलाना उसके बूते का खेल नहीं है, वही पार्टी आज केन्द्र और 21 राज्यों में शान से सरकार चला रही है। भाजपा का “दीपक“ (जनसंघ) से कमल (भाजपा) तक का सफर अनुकरणीय है। आजादी के बाद केन्द्र और राज्यों में सता पाने के बाद कांग्रेस ने सिर्फ अवसरों को गंवाया है और पार्टी चुनौतियों भागती रही है। वहीं दूसरी ओर, राष्ट्रीय  स्वंय सेवक द्वारा पोषित भाजपा और उसकी पूर्वज जनसंघ ने कोई अवसर नहीं गंवाया और हर चुनौती का डटकर सामना किया। पुरानी कहावत है  जंग में अपने  दुश्मन  और राजनीति में अपने विरोधी को कभी कम नहीं आंकना चाहिए। मगर कांग्रेस ने यही गलती की। सता के नशे  में पार्टी इस कद्र चूर हो गई कि कांग्रेसी विरोधियों की ताकत का सही-सही आकलन नहीं कर पाए। कांग्रेस अब इसी का खमियाजा भुगत रही है। त्रिपुरा, नगालैंड और मेघालय के विधानसभा चुनाव में  भाजपा के  प्रदर्शन  से विपक्ष हत-प्रत हैं। बंगाल मूल आबादी बहुल वाले त्रिपुरा में  25 साल से सत्ता में काबिज वामफ्ंथी सरकार को बेदखल करके भाजपा ने इतिहास रचा है। 2013 में भाजपा ने 50 सीटों पर चुनाव लडा था। पार्टी को मात्र 1.5 फीसदी वोट मिले थे और उसके 49 उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी।  पांच साल बाद 2018 में भाजपा ने 43 फीसदी वोट हासिल करके 35 सीटें जीती हैं। भाजपा की गठबंधन सहयोगी पार्टी आईपीएफटी को 8 सीटें मिली हैं। पहली बार भाजपा ने वाम दलों को चुनाव में परास्त किया है। भाजपा की ताजा जीत इसलिए भी काबिलेगौर है कि भगवा पार्टी को अब तक हिंदी भाशी क्षेत्र (कॉउ बेल्ट) की पार्टी माना जाता था मगर त्रिपुरा और नगालैंड में भाजपा के षानदार प्रदर्षन ने इस भ्रम को भी तोड दिया है। नगालैंड मूलतः ईसाई आबादी बहुल वाला राज्य है और इस राज्य में अब तक कांग्रेस अथवा क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व रहा है मगर यहां भी भाजपा नीत सरकार का बनना तय है। देष के राजनीतिक इतिहास में लगभग पांच दषक बाद पूर्वोतर के सात में चार राज्यों में भाजपा नीत सरकार है।  भाजपा का 25 साल पहले का“ आज 4 प्रदेष, कल सारा देष“ का सपना साकार होता नजर आ रहा है। त्रिपुरा में भाजपा की प्रचंड जीत पार्टी को पष्चिम बंगाल में अपने पांव जमाने में सहायक हो सकती है। इस राज्य में भी वामपंथी ममता बनर्जी की लोकप्रियता को चुनौती देने में अब तक नाकाम साबित हुए हैं और इस राज्य में भी भाजपा तेजी से अपने पांव पसार रही है। भाजपा का इस बात से उत्साहित होना स्वभाविक है कि अगर त्रिपुरा में पार्टी 5 साल में 1.5 फीसदी से 43 फीसदी वोट हासिल करने में सफल हो सकती है, तो पष्चिम बंगाल में क्यों नहीं? पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पष्चिम बंगाल में 16 फीसदी वोट मिले थे मगर हाल ही में सपन्न उलुबेरिया लोकसभाई और नोपारा विधान सभा उप-चुनाव में भाजपा ने षानदार प्रदर्षन किया है और पार्टी उम्मीदवार वाम दलों को पीछे छोडते हुए दूसरे नंबर पर रहे है। कांग्रेस समेत विरोधी दलों की मौजूदा दुर्दषा से लगता नहीं है कि कोई भी दल भाजपा के विजय रथ को रोकने की स्थिति में है। बहरहाल,  पूर्वोतर  भारत का भगवाकरण के बाद अब दक्षिण भारत की बारी है।     

रविवार, 4 मार्च 2018

चीन से आगे निकलता भारत

घोटाला-दर-घोटाले से त्रस्त देष के लिए यह अच्छी खबर है कि भारत फिर से  तेज रफ्तार से ग्रो करने वाली अर्थव्यवस्था बन गई है और देष ने चीन को फिर पीछे छोड दिया है। बुधवार को केन्द्रीय सांख्यिकी संस्था (सीएसओ) द्वारा जारी आंकडों के अनुसार 2017-18 की अक्टूबर-दिसबर तिमाही के दौरान भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 7.2 फीसदी की रफ्तार से बढा है। इस दौरान चीन के सकल घरेलू उत्पाद की तिमाही ग्रोथ 6.8 फीसदी रही है। यानी भारत से दषमलव 4 फीसदी कम।  जुलाई-सितंबर की तिमाही में भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.6 फीसदी थी। जीडीपी में एक तिमाही  (अक्टूबर-दिसबर) में दषमलव 6 फीसदी की वृद्धि के स्पश्ट मायने है कि नवंबर 2016 की नोटबंदी और तदुपंरात हडबडी में लागू जीएसटी से उत्पन्न जटिलताएं जाती रही है और  अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकड ली है। अक्टूबर-दिसबर तिमाही की जीडीपी ग्रोथ ने विषेशज्ञों के आकलन को भी धराषायी कर दिया है। अंतरराश्ट्रीय एजेंसी रायटर ने वित्तीय साल 2017-18 की तीसरी तिमाही की जीडीपी ग्रोथ को 6.9 के आसपास आंका था, मॉर्गन स्टेनली ने 7 फीसदी। तिमाही ग्रोथ इन आकलनों से अधिक रही है।  ताजा आंकडों  के दृश्टिगत सीएसओ का आकलन है इस साल जीडीपी ग्रोथ दर 6.6 फीसदी हो सकती है। जनवरी में सीएसओ का आकलन था कि इस साल वार्शिक जीडीपी ग्रोथ  6.5 फीसदी रहेगी।  इस साल की जीडीपी की  वार्शिक ग्रोथ 2017 की तुलना में कम है। मार्च  2017 को समाप्त हुए वित्तीय साल में जीडीपी की वार्शिक ग्रोथ 7.1 फीसदी रही थी। इससे यह संकेत मिलते हैं कि मार्च 2018 को समाप्त हो रहे वित्तीय साल में जीडीपी ग्रोथ पिछले साल से कम रह सकती है।  जनवरी-मार्च तिमाही में 7.2 या इससे कुछ अधिक की ग्रोथ भी 2018 में वार्शिक ग्रोथ (6.6) 2017 की 7 फीसदी ग्रोथ को पार नहीं कर सकती। इस स्थिति में यह प्रष्न उठना स्वभाविक है कि वित्तीय साल 2018 में ऐसा क्या हो गया है कि जीडीपी की वार्शिक ग्रोथ साल 2017 से आगे नहीं बढ पा रही है। जाहिर है आनन-फानन में लागू जीएसटी ने जीडीपी ग्रोथ को प्रभावित किया है। सरकार ने खुद माना है कि अक्टूबर, नवंबर में जीएसटी राजस्व में गिरावट आई थी हालांकि दिसंबर में इसमें कुछ इजाफा हुआ है मगर जनवरी में इसमें फिर गिरावट आई है। साफ है जीएसटी की जटिलताएं अभी भी उत्पादकों, कारोबारियों  का पीछा नहीं छोड रही है। मगर सच यह भी है कि हर क्रांतिकारी कदम में षुरुआती अडचनें आती हैं। जीएसटी के अलवा मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर की ग्रोथ अभी भी चिंता का विशय है। फरवरी में इस सेक्टर की ग्रोथ चार माह में सबसे कम रही है। मगर इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर में 6.7 फीसदी ग्रोथ कुछ राहत प्रदान करती है।  जीडीपी ग्रोथ की तेज रफतार में अभी भी कई अवरोधक हैं और जब तक इन्हें पूरी तरह से हटाया नहीं जाता, ग्रोथ में  भारत का चीन को पछाडने का सपना पूरी तरह से साकार नहीं हो सकता। चीन कई मामलों में हमसे कहीं आगे है। प्रदूशण से बचने के लिए पेट्रोल-डीजल का विकल्प तैयार करना इस समय दुनिया के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। न केवल प्रदूशण से बचने के लिए, अलबत्ता विदेषी मुद्रा बचाने के लिए भी। फ्यूल खपत के मामले में भारत दुनिया का चौथा सबसे बडा देष है और चीन दूसरा। चीन की तुलना में भारत में प्रति व्यक्ति पेट्रोल-डीजल खपत काफी कम है मगर चीन तेजी से पॉवर से चलने वाली (इलेक्ट्रिक) कार की ओर बढ रहा है। चीन ने  इलेक्ट्रिक कार को प्रोत्साहित करने के लिए 2020 तक पूरे देष में 1,20,000 सार्वजनिक चार्जिंग स्टेषन स्थापित करने का लक्ष्य रखा है। भारत इस मामले में काफी पीछे है। अक्टूबर-दिसंबर की ग्रोथ मोदी सरकार के लिए अच्छी खबर है मगर अभी काफी कुछ करना बाकी है। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार को और गति देने के लिए क्रांतिकारी  नीतिगत फैसले लेने की जरुरत है।

गुरुवार, 1 मार्च 2018

यहां हार तो, वहां जीत!

मध्य प्रदेश  विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले 15 साल से लगातार राज्य में सतारूढ भारतीय जनता पार्टी को बडा झटका लगा है पर त्रिपुरा और मेघालय में भगवा पार्टी की जीत के पूर्वानुमान पार्टी को कुछ राहत प्रदान कर रहा है। मध्य प्रदेश  में 24 फ्ररवरी को हुए विधानसभा उपचुनाव में भाजपा जी-जान की कोशिशों  के बावजूद मुंगावली और कोलारस सीट कांग्रेस से छीन नहीं पाई है। 2013 के विधानसभा चुनाव में दोनों सीटें कांग्रेस ने जीती थीं। मुंगावली विधानसभा हलके का अपना अनूठा रिकार्ड है। 1985 से 2013 तक कोई भी पार्टी यहां दोबारा चुनाव नहीं जीत पाई। सात बार चुनाव हुए और चार मर्तबा कांग्रेस, तीन बार भाजपा जीती। पहली बार कांग्रेस ने यह सीट दूसरी बार जीती है। कोलारस कांग्रेस की परंपरागत सीट मानी जाती है। 15 साल में भाजपा कांग्रेस को इस हलके से बेदखल नहीं कर पाई है। इस उप चुनाव में भाजपा और कांग्रेस दोनों की प्रतिष्ठा  दांव पर लगी हुई थी। दोनों विधानसभाई हलके गुना लोकसभाई हलके का हिस्सा है और कांग्रेस के संभावित  मुख्यमंत्री चेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया इस हलके के सांसद हैं। कांग्रेस के दोनों प्रत्याशी   ज्योतिरादित्य के करीबी हैं। नामांकन पर्चा भरने से लेकर चुनाव प्रचार के अंतिम दिन तक  ज्योतिरादित्य बराबर मौजूद रहे। उन्होंने दोनों हलकों में 75 जनसभाओं और 15   रैलियों को संबोधित किया है। भाजपा ने  भी उपचुनाव में पूरी ताकत झोंक दी थी।  ज्योतिरादित्य के मुकाबले भाजपा ने उनकी  बुआ यशोधरा राजे सिंधिया को चुनाव प्रचार में उतारा था। मुख्यमंत्री  शिवराज चौहान ने 45 जनसभाएं कीं। पिछले साल चित्रकूट विधानसभा उपचुनाव में भी कांग्रेस ने भाजपा को करारी  शिकस्त दी थी। विधानसभा चुनाव से पहले दोनों सीटों के हार जाने से मुख्यमंत्री  शिवराज चौहान की लीडरषिप को चुनौती मिल सकती है। कांग्रेस की जीत से ज्योतिरादित्य सिंधिया का मुख्यमंत्री पद का दावा और मजबूत हुआ है। मध्य प्रदेश , राजस्थान और छतीसगढ में इस साल के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन तीनों राज्यों में भाजपा सत्ता में है। मध्य प्रदेश  के उपचुनाव नतीजे विधानसभा चुनाव से पहले मतदाताओं के रुझान माने जा रहे हैं। ओडीशा   की बीजेपुर विधानसभा सीट पर भाजपा का प्रदर्शन  कांग्रेस से अपेक्षाकृत बेहतर रहा है। यह सीट हालांकि बीजू जनता दल ने भारी मतों के अंतर से जीती हैं मगर भाजपा का दूसरे स्थान पर आना और कांग्रेस प्रत्याशी  की जमानत जब्त हो जाना पार्टी के लिए  शुभ संकेत है। भाजपा के लिए त्रिपुरा  से भी अच्छी खबर है। ताजा चुनाव सर्वेक्षणों के अनुसार भाजपा इस पूर्वोतर राज्य में वामपंथी किले को ढहाने की स्थिति में है। भाजपा ने चुनाव के लिए जनजातीयों की नुमाइंदगी करने वाली क्षेत्रीय पार्टी आईपीएफटी से गठबंधन कर रखा है। राज्य की 20 सीटें जनजातीयों के लिए आरक्षित है। इससे त्रिपुरा की 20 सीटों पर कांटे की टक्कर है। इन मेंसे 9 सीटें भाजपा और 11 सीटें  आईपीएफटी लड रही है।  त्रिपुरा में 70 फीसदी आबादी बंगालियों की है। इसीलिए पश्चिम  बंगाल की तरह इस राज्य में वामपंथी दलों का दबदबा रहा है। मगर राज्य की 28 फीसदी आबादी जनजातीयों की है।  आईपीएफटी जनजातीयों के लिए बंगालियों से अलग राज्य की मांग करती रही है। भाजपा इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। आईपीएफटी से चुनावी गठबंधन के कारण  20 सीटों पर भाजपा को एडवांटेज मिल सकती है। अगर इनमेंसे 10-12 सीटें भी गठबंधन को मिल जाती है तो चुनाव के बाद सियासी समीकरण बदल सकते हैं।  मगर  आईपीएफटी के साथ गठबंधन के कारण बंगाली आबादी बहुल हलकों में मतदाता पार्टी  से छिटक सकते हैं। इससे वामपंथी दलों को फायदा हो सकता है। बहरहाल, पूर्वोतर भारत में भगवा पार्टी का सत्ता में आना  क्या रंग लाता है, समय ही इसका जवाब दे सकता है।