रविवार, 31 दिसंबर 2017

अच्छा गुजरा साल-2017

खट्टी-मिठठी यादों के साथ  साल-2017 आज इतिहास के गर्भ में समा जाएगा।  मिठठी यादें हमेशा  रोमांचित करती हैं। साल 2017 में देश  में कई ऐसी अभूतपूर्व घटनाएं हुईं है जिनसे न केवल भारत का पूरी दुनिया में  फक्र  से सर ऊंचा हुआ है, अलबता भारत ने इस बात का भी अहसास कराया है कि आने वाले समय में उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। राजनीति हो या वर्ल्ड स्ट्रैटजी, स्पेस टकनॉलॉजी हो या स्पोर्टस या सैन्य शक्ति, भारत ने साल 2017 में हर मुकाम में बडों-बडों को भी पछाडा है। साल के  शुरु में ही 2 जनवरी को देश  की शीर्ष अदालत  सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसले ने  जात-पात और धर्म-सम्प्रदाय  अथवा भाशा के नाम पर वोट मांगने पर चुनाव लडने वाले उम्मीदवार को अयोग्य करार दिया गया। दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र के लिए यह ऐतिहासिक फैसला था और इसका तुरंत असर देखने को भी मिला। साल के शुरु में उत्तर प्रदेश , पंजाब समेत पांच राज्यों और  साल के  अंत  में हिमाचल और गुजरात   के विधानसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दल और उम्मीदवार जात-पात और धर्म के नाम पर वोट मांगने से बचते रहे। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को हालांकि अक्षरश  लागू करना मुमकिन नहीं है, मगर अदालत की अवमानना के भय ने राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को 2017 के विधानसभा चुनाव में धर्म और जात-पात के नाम पर वोट मांगने से रोका है। अगले साल 2018 में आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और इस बात की पूरी उम्मीद है कि  लोकतंत्र की इस स्वस्थ परंपरा का निर्वहन किया जाएगा। फरवरी में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्था (इसरो) ने एक ही राकेट के जरिए 30 मिनट में सात मुल्कों  के एक साथ 104 सैटेलाइटस लांच करके एक नया कीर्तिमान बनाया। आज तक अमेरिका और रुस भी ऐसा नहीं कर पाया था। इससे पहले रुस ने 2014 में एक साथ 34 सैटेलाइटस छोडने का रिकार्ड बनाया था। स्पेस टकनॉलॉजी में अमेरिका और रुस से आगे निकल जाना बहुत बडी बात है और भारत ने  यह  करिश्मा  कर दिखाया है। 15 फरवरी, 2017 का दिन अंतरिक्ष इतिहास में हमेशा  भारत के नाम दर्ज रहेगा। इसी साल  1 पहली फरवरी को संसद में बजट पेश  करने और  रेलवे बजट को आम बजट में समाहित करने का एक नया अध्याय भी लिखा गया।  अब तक बजट 28 फरवरी को और इससे दो दिन पहले अलग से रेलवे बजट पेष किया जाता था।  साल 2017 की यह घटना भी इतिहास में हमेषा दर्ज रहेगी। इस साल मार्च में पहली बार देश  के सबसे बडे राज्य उत्तर प्रदेश  में  भगवाधारी योगी आदित्यनाथ को मुख्य मंत्री बनाकर भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक नया इतिहास रचा। भाजपा हो या कांग्रेस या बसपा अथवा सपा, अब तक परंपरागत स्थापित  सियासी नेता या उसके उतराधिकारी को ही मुख्य मंत्री चुना जाता रहा है। गरीब दलित परिवार से संबंधित रामनाथ कोविंद का  राष्ट्रपति  बनना भी इस साल की विस्मरणीय घटना है। ऐसा पहली बार हुआ है कि देश  के दो सर्वोच्च पदों पर आम आदमी के नुमाइदे पदस्थ हों। आजादी के 70 साल बाद देश  में पहली बार क्रांतिकारी गुडस एवं सर्विसिस  कर व्यवस्था को लागू किया गया है। हरियाणा की बेटी  मानुषी  छिब्बर ने 17 साल बाद भारत के लिए मिस वर्ल्ड का खिताब जीत कर इस साल भारत को गौरवान्वित किया है। देश  के साथ-साथ हरियाणा का सर भी फक्र से ऊंचा हुआ है। और साल के जाते-जाते लोकसभा द्वारा तीन तलाक की कुप्रथा को कानून अपराध बनाने वाले बिल का पारित किया जाना भी साल की बडी घटना है। हालांकि  बिल का कानून बनने से पहले राज्यसभा द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य  है, मगर ऐतिहासिक पहल हो गई है और मोदी सरकार को 1400 साल पुरानी कुप्रथा को तोडने का श्रेय जाता है। साल 2017 भारत के लिए हर मायने में बेहतर रहा है। इसे खुशी -खुशी  अलविदा कहते हुए हम बेहतर नए साल की कामना करते हैं।

Wish India Become Super Power Sooner Than Latter

All of us wish India becomes super power sooner than latter. We are surrounded by more enemies than friends. We face more and more external as well as internal threats. 

On External fronts, China-Pakistan strong bonds is the biggest one.  In Pakistan. the traditional political leadership is lost the ground to anti-India radical elements. And days are not far off when a terrorist like Hafiz Saeed will be Ayatollah Khomeini  of the  Pakistan. In that event apart from a perpetual threat of a nuclear war, what we see today  in Kashmir, will see the whole over India. The only Hindu country Nepal is gradually drifting towards China. And Sri Lanka is also falling in Dragon trap with liberal aids. 

 India has been isolated by China by including Afghanistan in its  grand design of extending  China-Pakistan Economic Corridor. The 1,300-km corridor is seen as a direct threat t India's sovereignty. New Delhi has continuously opposed the project since it passes through the Pakistan-occupied 

Kashmiri territory of Gilgit-Baltistan. It is perceived to be an alternative economic road link for the Kashmir Valley lying on the Indian side of the border. A well-connected Gilgit-Baltistan that attracts industrial development and foreign investment, if CPEC proves a success, will further consolidate the region’s perception as internationally recognised Pakistani territory, diminishing India’s claim over the 73,000 sqkm piece of land. 

There are also strong apprehensions that once the corridor gets going, China will be able to arm twist India more  severely. n contemporary World, economic power matters .Major US ports on the East Coast depend on the Panama Canal to trade with China. Once CPEC becomes fully functional, China will be in a position to offer a ‘shorter and more economical’ trade route (avoiding travel through the entire Western Hemisphere) to most North and Latin American enterprises. This will give China the power to dictate the terms by which the international movement of goods will take place between the Atlantic and the Pacific oceans.

India, with over 60% of its oil supplies passing through the Strait, mainly from Saudi Arabia, Iran and Iraq, will be no exception. CPEC will enable  China to control over vast chunk of trade via Sea.
Major US ports on the East Coast depend on the Panama Canal to trade with China. Once CPEC becomes fully functional, China will be in a position to offer a ‘shorter and more economical’ trade route to most North and Latin American enterprises. This will give China the power to dictate the terms by which the international movement of goods will take place between the Atlantic and the Pacific oceans. That's India's greatest worry.

External threats aside, there are damning internal problems. And foremost among them are the increasing cult of "intolerance". The situation has become worse  after saffron party came to power and now ruling at center as well as in 19 states. The rise of caste and religious pressure groups is threatening the very socio-politico fabric of the country. India has been a nation of " diversities" and has survived by its strong Unity in diversities'. but, over the years, the "diversities' are being torn apart.

All these happenings do not bid  well for a strong and prosper  India. Let us make a New Year resolve. We do our best to contribute our's  mite. Wish my county men a happy and prosper New Year.      

Chander Sharma 



शुक्रवार, 29 दिसंबर 2017

तीन तलाकः “मैं न मानूं“

मुस्लिम महिलाओं 1400 साल  पुरानी   सामंती गुलामी से बाहर निकालने के लिए प्रस्तावित तीन तलाक पर जमकर सियासत की जा रही है। पीडित महिलाओं की चिंता हो न हो मगर मुस्लिम वोट बैंक पर नजर जरुर है। तीन तलाक को खत्म करने के लिए जब कभी भी कानून बनाने की बात आती है, मुस्लिम समाज के कट्टरपंथी और निहित स्वार्थी सियासी दल खूब राजनीति कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने जिस दिन तीन तलाक पर कानून बनाने की मंजूरी दी, उसी दिन से ऑल इंडिया मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड  इसका मुखर विरोध कर रहा है। इस साल 22 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट  ने तीन तलाक को संवैधानिक करार दिया था। वीरवार को तीन तलाक से संबंधित बिल को लोकसभा में पेश  किया गया और पारित भी हो गया । इस पर भी सदन में खासा हंगामा हुआ। सरकार ने बिल को संसद की स्थायी समिति को भेजने की विपक्ष की मांग खारिज कर दी।   बिल को पेश  करते हुए केन्द्रीय कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने एक रोचक किस्सा  सुनाते हुए कहा कि आज सुबह ही  मैने अखबार में यह समाचार पढा कि उत्तर प्रदेश  के रामपुर में एक महिला को इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि वह सुबह देर से उठी थी। इससे पता चलता है कि देश  में मुस्लिम महिलाओं को तलाक के नाम पर कितना प्रताडित किया जा रहा है। इस साल अब तक 300 तलाक हो चुके हैं और सुप्रीम कोर्ट  के फैसले के बाद 100 तलाक। इससे साफ जाहिर होता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी परिस्थितियां नहीं बदली है। तलाक-ए-बिद्दत में समझौते तक की गुजाइंश  नहीं है। बस शौहर  ने तीन बार तलाक कह दिया और पत्नी को दर-दर की ठोकरे खाने के लिए छोड दिया। तीन तलाक को लेकर भारत में ऐसे-ऐसे मामले सामने आए हैं जिनसे मानवीयता भी शर्मसार हो जाती है। किसी ने व्हाट्सप्प  पर एसएमएस भेजकर  तो किसी ने मेल भेज कर तलाक-तलाक कह दिया और पत्नी को छोड दिया।  ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  और मुस्लिम नेता भले ही सफाई देते रहे हैं कि इस तरह का तलाक अवैध है मगर बोर्ड  ने इस तरह के मामलों का कभी त्वरित संज्ञान तक नहीं लिया। भारत के पडोसी इस्लामिक देश  पाकिस्तान और बांग्ला देश में भी तीन तलाक को बहुत पहले  प्रतिबंधित किया जा चुका है। 1961 में पाकिस्तान में पारित कानून के अनुसार पत्नी को तलाक देने के लिए शौहर  को लिखित में देना होता है और अगर वह ऐसा नहीं करता है तो उसे एक साल की कैद और पांच हजार तक जुर्माना हो सकता है। यही कानून बांग्लादेश  में भी लागू है। इस्लामिक दे मले शिया, इंडोनेशिया, मोरक्को और मिस्त्र समेत 22 मुल्कों में भी तीन तलाक की प्रथा को प्रतिबंधित अथवा नियंत्रित किया जा चुका है जिससे महिलाओं को पीडित न होना पडा। मगर भारत में आजादी के सात दशक तक भी तीन तलाक की कुप्रथा को नियंत्रित नहीं किया जा सका । इसकी सबसे बडी वजह है कि समकालीन सरकारें अपने सियासी फायदे के लिए ताकतवर कट्टरपंथियों को नाराज नही करना चाहती थी। और आज भी राजनीतिक दल निहित स्वार्थी सियासी हितों की खातिर तीन तलाक के बिल में खामियां गिना रहे हैं। एआईएमआईएम के सांसद असदुद्यीन औवेसी तो यहां तक कह रहे हैं कि संसद को तो तीन तलाक पर कानून बनाने का  अधिकार ही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट  ने इस साल अगस्त में अपने फैसले में स्पष्ट  कहा है कि तीन तलाक की कुप्रथा संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत आती ही नहीं है और यह इस्लाम का अंतरंग हिस्सा नहीं है। संसद में पेश  बिल के अनुसार तीन तलाक देने वाले को तीन साल तक की कैद हो सकती है। तीन तलाक बिल पर षिक्षित मुस्लिम महिलाएं सरकार के साथ है।

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

ब्रिटेन, फ्रांस से आगे भारत

आर्थिक तरक्की में भारत एक और बडी छलांग लगाने जा रहा है। सेंटर फॉर इकानॉमिक्स एंड बिजनेस रिसर्च (सीबीईआर)  की  ग्लोबल इकानॉमी पर ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि छोटे-मोटे लटके-झटकों के बावजूद भारत अगले साल (2018 मे)  ब्रिटेन और फ्रांस को पछाड कर  दुनिया  की पांचवी बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी और जीएसटी ने भारतीय  अर्थव्यवस्था की तेज रफ्ताार पर ब्रेक लगा दी थी मगर 2017 में इसने फिर  रफ्तार पकड ली है। इस रिपोर्ट के बाद मंगलवार को भारतीय शेयर बाजार में तेजी व्याप्त रही और सेंसेक्स पहली बार 34,000 के स्तर को पार कर गया। बुधवार को हालांकि सेंसेक्स और निफ्ट में गिरावट दर्ज हुई मगर  थोडी-बहुत घट-बढत के बावजूद भारतीय इक्विटी बाजार 2017 में पूरे साल गुलजार बना रहा। केन्द्र में स्थिर सरकार और प्रधानमंत्री के अच्छे कामों के कारण यह सब हुआ। इस साल सेंसक्स और निफ्टी में कुल मिलाकर 21 से 24 फीसदी की बढत हुई है। विदेशी  निवेशकों ने अब तक लगभग 7 अरब  डॉलर से ज्यादा के शेयर खरीदे हैं। 2016 में विदेशी  निवेशकों ने 200 करोड रु से भी कम के  शेयर्स  खरीदे थे। इससे साफ जाहिर है कि 2017 में विदेशी  निवेशकों का भारतीय बाजार में भरोसा बढा है। अक्टूबर में जारी वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम की रिपोर्ट में भी मोदी सरकार के कामों की तारीफ की गई थी और भारत ने रैंकिंग में तेज छलांग लगाई थी। फोरम की रिपोर्ट  में भारत 40वंे स्थान पर था जबकि तीन साल पहले वह 71वे नंबर पर था। फोरम की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत के आधारभूत ढांचे में अपेक्षित सुधार हुआ है। शिक्षा एवं प्रशिक्षण और  बेहतर हुए हैं। स्कूलों में इंटरनेट का प्रयोग बढा है और तकनीकी तैयारियां तेज हुईं हैं। यहीं नहीं सार्वजनिक खर्चों में निपुणता बढी है। इन सब उपायों के कारण ही भारत की रैकिंग में सुधार हुआ है। मगर इस फोरम ने तब यह आशंका भी जताई थी कि  भ्रष्टाचार   की मजबूत जडें भारत में निवेश  के माहौल को बिगाड सकता है। इसके अलावा भारत में अभी भी वित्तीय विकल्पों की कमी है और अस्थिर टैक्स व्यवस्था मुक्त निवेश  को रोक रही है।  हाल ही की कुछ घटनाएं भारतीय अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर सकती है। और इनमें कच्चे तेल की लगातार बढती कीमतें चिंता का विषय है। अब तक के कार्यकाल में मोदी सरकार को पहली बार तेल की ऊंची कीमतो से वास्ता पड सकता है। तेल की कीमतें बढने से महंगाई बढ सकती है। ताजा आंकडें भी इसी ओर इशारा कर रहे हैं। जून में रिटेल महंगाई 1.46 फीसदी के निचले स्तर पर थी मगर नवंबर आते-आते यह आठ माह के उच्चतम स्तर 4.88 फीसदी तक पहुंच गई थी। ऊंची तेल कीमतों के अलावा, सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों  को लागू करने से भी महंगाई बढ सकती है। अगले साल रिटेल मुद्रा स्फीति के 4-4.5 फीसदी के आसपास रहने की उम्मीद है। इससे अगले साल ब्याज दरों में कटौती की संभावनाएं क्षीण हो सकती हैं। अगले साल भारतीय बाजार 2017 की तरह गुलजार रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अमेरिका की कडी मौद्रिक नीति का सीधा असर विदेशी  निवेश  पर पडता है। अगले साल अमेरिका अपनी मौद्रिक नीति को और सख्त कर सकता है। बहरहाल, भारत के लिए सुखद स्थिति यह है कि 2017 में भी भारत की आर्थिक ग्रोथ एव़ं लंबी अवधि की वृद्धि दर चीन से बेहतर है। भारत पिछले चार सालों में  चीन के मुकाबले तेजी से आगे बढा है। वैश्विक  प्रतिस्पर्धा रैंकिंग में भारत ने चार साल में 20 अंक हासिल किए हैं। चीन जहां पहले था, वहीं है। और अगर यह गति रही तो भारत 2030 से पहले ही जापान और जर्मनी को पछाड कर  दुनिया  की तीसरी बडी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

मुलाकात के नाम पर नाटक

पाकिस्तान में जासूसी के आरोप में फांसी की सजा पाने वाले कुल भूषण यादव से इस्लामाबाद में उनकी माता और पत्नी की भेंट करवाकर पाकिस्तान इस तरह से इतरा रहा है मानो उसने कोई किला फतेह कर लिया हो। सोमवार को जाधव की पत्नी और माता ने उनसे लगभग 45 मिनट तक मुलाकात तो की मगर बीच में  शीशे   की दीवार खडी किए जाने के कारण मां अपने बेटे को गले तक लगा नहीं पाई और पत्नी अपने सुहाग से मिलकर फूट-फूट कर रो नहीं पाई। ऐसी मुलाकात का क्या मतलब जिसमें मां अपने बेटे को गले तक न लगा पाए और पत्नी पति के कंधे पर सिर रख कर आंसू न बहा सके। अगर मुलाकात के बीच दीवार ही खडी करनी थी, तो दोनों का इस्लामाबाद जाने का क्याा फायदा? ऐसी मुलाकात तो भारत में ही वीडियो कॉफ्रेंसिंग के जरिए भी की जा सकती थी। पाकिस्तान मानवीय मूल्यों की रक्षा में अपनी धूर्त  फितरत से बाज नहीं आया। मुलाकात का नाटक महज इंटरनेशनल  समुदाय को यह दिखाने के लिए मंचित किया गया कि “ देखो दुनिया वालो, हम कितने मानवीय मूल्यों के सरोकारी हैं“। इस मुलाकात के फौरन बाद पाकिस्तान के विदेश  मंत्रालय ने दुनिया को दिखाने के इस मुलाकात की तस्वीरों भी जारी की। इस वीडियो में जाधव को परिवार से मुलाकात करवाने के लिए बार-बार पाकिस्तान का आभार व्यक्त करते हुए भी दिखाया गया है। ्अगर इन तस्वीरों को गौर से देखा जाए तो यह बात एक बालक भी बता देगा कि कुल भूषण यादव को इस मुलाकात के लिए डरा-धमका कर  तैयार किया गया था। मां और पत्नी से मुलाकात के दौरान जाधव ने अपना गुनाह कबूल किया। जाहिर ऐसा उन्होंने पाकिस्तान के दबाव में किया है। जो इंसान खुद को बार-बार बेगुनाह बता रहा है, वह अपने परिवार के समक्ष भला ऐसा गुनाह क्यों कबूलेगा जो उसने किया ही नहीं। मंगलवार को भारत के विदेश  मंत्रालय ने इस मुलाकात को लेकर और भी कई  जानकारियां जारी की। मुलाकात के दौरान पाकिस्तान अधिकारियों ने जाधव की माता और पत्नी को अपनी मातृ   भाषा मराठी ंमें बातचीत तक नहीं करने दी। मुलाकात से पहले जाधव की पत्नी और माता को कपडे बदलने के लिए मजबूर किया गया। जाधव की पत्नी को  मंगलसूत्र और बिंदी को हटाने के लिए कहा गया। उनके जूते उतरवा लिए गए और बाद में वापस नहीं किए गए। पाकिस्तान मीडिया को जाधव की पत्नी और माता के पास आने की अनुमति दी गई और पत्रकारों को उंट-पटांग सवाल पूछने की खुली छूट दी गई। इस दौरान पाकिस्तान “जिदाबाद“ के नारे लगाए गए। दोनों देशों  में इस बात पर सहमति थी कि पत्रकारों को उनसे सवाल पूछने की अनुमति नहीं दी जाएगी। बीच में दीवार होने की वजह से बातचीत इंटरकॅाम के जरिए की गई। बहरहाल, पाकिस्तान, अब इस मुलाकात को खूब भुना रहा है। कुल भूषण  यादव को आतंकी साबित करके पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय  समुदाय को यह दिखाना चाहता है कि भारत भी पाकिस्तान में आतंकी और विध्वंसक गतिविधियों में लिप्त है। कुल भूषण जाधव को 3 मार्च, 2016 को पाकिस्तान में अवैध तरीके से घुसने और जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इस साल अप्रैल में पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जाधव को जासूसी करने और   विध्वंसक गतिविधियों में लिप्त होने के लिए फांसी की सजा सुनाई थी। मई में इंटरनेशनल कोर्ट  ने जाधव की फांसी की सजा पर रोक लगा दी थी। इस बात पर हैरानी व्यक्त की जा रही है कि पाकिस्तान एक ओर तो जाधव को कॉन्सलुर एक्सेस देने के लिए राजी नहीं है मगर वह जाधव की माता और पत्नी को उनसे मिलवाने के लिए फौरन मान गया? जाहिर है यह सब किसी खास मकसद से किया गया और पाकिस्तान इसे हासिल करने में काफी हद तक सफल भी रहा है। 

मंगलवार, 26 दिसंबर 2017

हिमाचल में जय श्रीराम

हिमाचल प्रदेश  के मंडी जिले की सराज घाटी की विहंगम और विलक्षण  प्राकृतिक सौंदर्यता की तरह ही इस क्षेत्र के लोग निश्चल  और साफ दिल है। राज्य के नए मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर  इसी क्षेत्र से आते हैं और पहली बार हिमाचल को  सराज क्षेत्र से मुख्यमंत्री मिला है। राज्य के लिए इससे एक नए युग की  शुरुआत हो सकती है और देवभूमि में “राम राज्य“ की नींव रखी जा सकती है।  मगर नए मुख्यमंत्री के समक्ष तरह-तरह की चुनौतियां है और सबसे बडी चुनौती नव निर्वाचित मुख्यमंत्री ने खुद ही पेश  की है। जयराम ठाकुर भाजपा को अगले कई सालों तक सत्ता में बनाए रखने का सपना बुने हुए हैं और पहले ही दिन उन्होंने इस आशय की घोषणा भी की है। कहते हैं कहना आसान है मगर करना बेहद मुश्किल । सत्तर के दशक के बाद से अब तक हिमाचल प्रदेश  में कोई भी सरकार लगातार दूसरी बार पदस्थ नहीं हो पाई है। इसकी सबसे बडी वजह है कि कोई भी सरकार जन अपेक्षाओं  और आकांक्षाओं को पूरी तरह से पूरा नहीं कर पाई हैं। हिमाचल प्रदेश  में  निश्चित  तौर पर तरक्की हुई है और यह पहाडी राज्यों के विकास का मॉडल भी माना जाता है। मगर यह सब कहने-सुनने में ही अच्छा लगता है।  जमीनी हकीकत कुछ और ही है। पीने का पानी है मगर न तो स्वच्छ और न ही माकूल। देहातों में  बमुश्किल  आध-एक घंटे पानी की सप्लाई मिलती है और कई जगह तो दूसरे-तीसरे दिन। राजधानी शिमला में गर्मियों में पीने के पानी की भीषण किल्लत रहती है। ब्यास नदी के किनारे बसे मंडी शहर में दिन में सुबह- शाम एक-एक घंटे और कई जगह  एक घंटे पानी की सप्लाई मिलती है। स्वच्छ पीने का पानी बुनियादी सुविधा है और अगर सरकार आजादी के सात दशक बाद भी माकूल पीने का पानी मुहैया नहीं करा पाए, तो ऐसे मॉडल राज्य के तगमे का लोगों को क्या फायदा?  अस्पताल हैं मगर न तो डाक्टर हैं और न ही गरीबों को दवाएं। सडकें हैं मगर उनके रख-रखाव के लिए बजट नहीं है। सडकें हिमाचल की जीवन रेखा है। संतोषजनक रखरखाव नहीं होने की वजह से हिमाचल में सडक दुर्घटनाओं में पिछले एक दशक में तीस हजार से अधिक लोगों को अपनी जानें गंवानी पडी हैं। बेतरतीब भवन निर्माण से  शिमला, धर्मशाला समेत अधिकतर शहर कंकरीट के जंगल बन गए हैं और तबाही के मुहाने पर खडे हैं। राज्य की वित्तीय स्थिति बेहद खराब है। 2014-15 तक हिमाचल को राजस्व सरप्लस बनाने का लक्ष्य दिया गया था। यह लक्ष्य पाना तो दीगर रहा, इस साल राजस्व घाटा लगभग 5,000 करोड तक पहुंच गया है। जीएसटी से अगर राजस्व नहीं बढा तो इस साल घाटा और बढ सकता है। सरकार का पूरा खर्चा  उधारी पर चल रहा है। सरकारी खर्चे का 22.55 फीसदी कर्जा  लेकर चलाया जा रहा है। केवल 77.45 फीसदी ही अपने राजस्व से पूरा किया जाता है। और यह उतरोत्तर बढता ही जा रहा है। यानी विकास के लिए मात्र 40 फीसदी ही बचता है और इसमें भी काफी कुछ बिचौलिए और घूसखोर नौक्ररशाह खा जाते है। इतना ही नहीं अक्सर विकास का बजट वाहन, फर्नीचर जैसे आलतु-फालतू कामों पर खर्च किया जाता है। विकास पर तो दस फीसदी भी खर्च  नहीं हो पाता। दुखद स्थिति यह है कि पिछले तीन दशक में किसी भी सरकार ने इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया है। इसके विपरीत सरकारी खजाने को राजनीतिक मह्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए लुटाने का सिलसिला बदस्तृुर  जारी रहा है।  नतीजतन, विकास के काम हो नहीं पा रहे हैं। जन अपेक्षाएं पूरी नहीं हो पाती हैं और जनता सरकार बदल देती है। जय राम ठाकुर को यह सब बदलना होगा और फिर से नई  शुरुआत करनी होगी। अगर वे ऐसा नहीं कर पाए, उनका फिर से सत्ता में आने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।            

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

यरूशलम और भारत

 संयुक्त राश्ट्र में यरूशलम पर अमेरिका और इसराइल का साथ न देकर भारत ने अपने दो जिगरी दोस्तों को नाराज किया है। वीरवार को  संयुक्त  राष्ट्र  संघ द्वारा अमेरिका के  राष्ट्रपति  डोनाल्ड ट्रंप के यरूशलम  को  इसराइल की राजधानी न बनाने के प्रस्ताव का भारत समेत सौ से भी अधिक देशों  ने समर्थन किया। ट्रंप ने हाल ही में  विवादित यरूशलम  को  इसराइल की राजधानी का दर्जा दिया है। अभी तेल अवीव इसराइल की राजधानी है। संयुक्त राष्ट्र  में  128 देशों  ने ट्रंप के खिलाफ वोटिंग की। 38 देश  वोटिंग से गैर-हाजिर रहे। केवल 9 देशों  ने ट्रंप के पक्ष में वोट डाले। इससे से क्षुब्ध  राष्ट्रपति  ट्रंप  लाल-पीले हो रहे हैं और उन्होंने अमेरिका के खिलाफ जाने वाले देशों  की सहायता बंद करने की धमकी दी है। अमेरिका की सबसे बडी फजीहत इस बात पर हुई है कि उसके खास मित्र माने जाने वाले  पश्चिम  और खाडी के देशोँ  ने भी इस मामले में उसका साथ नहीं दिया। यरूशलम  दुनिया का सबसे विवादित स्थल है और मध्य-पूर्व  में अमन-चैन में सबसे बडा अवरोधक। इस्लाम, ईसाई और यहूदी तीनों ही इसे अपने-अपने धर्म  के लिए अत्याधिक अहम मानते हैं। सदियों से यह प्राचीन और पवित्र शहर यहुदियों, ईसाईयों और मुसलमानों के दिलों में रचा-बसा हुआ है। इस शहर को कई बार ध्वस्त किया गया और  कब्जाया गया । इस शहर की मिट्टी के कण-कण में इतिहास की परतें छिपी हुई है़। चार हिस्सो में विभाजित यरूशलम  का “चर्च  ऑफ दी होली सेपल्कर” दुनिया भर के ईसाईयों की आस्था का केन्द्र हैं। इसी जगह ईसा मसीह् को सूली पर चढाया गया था और यहीं वे अवतरित भी हुए थे। इसी स्थल पर  ईसा का मकबरा भी है। मुसलमानों का  विश्वास    है कि पैगंबर मोहम्मद मक्का से यहां आकर पैगम्बरों की आत्माओं से मुखातिब हुए थे। कुछ कदम दूर ”डोम्स ऑफ दी रॉक“ है। मुसलमानों में मान्यता है कि इसी जगह से पैगंबर ने जन्नत की यात्रा की थी। मुसलमान हजारों की संख्या में यहां आते हैं और रमजान के महीने जुमे के  दिन श्रद्धालुओं का भारी रश  रहता है। यहूदी वाले इलाके में स्थित “होली ऑफ दी होलीज“ यहूदियों का पवित्र स्थल है। उनका विष्वास है कि यहीं से विश्व  का निर्माण हुआ था और पैंगबर इब्राहिम ने अपने बेटे  की बलि के लिए इसी जगह को चुना था। प्राचीन यरूशलम शहर फिलिस्तनियों और यहूदियों में सबसे बडे तनाव की वजह् है। अक्सर मामूली सा बदलाव भी बहुत बडे तनाव का कारण बन जाता है। 1967 के युद्ध में इसराइल ने पूर्वी यरूशलम पर भी कब्जा कर लिया था। इससे प्राचीन शहर भी इसराइल के बब्जे में आ गया मगर इसे आज तक अंतरराष्ट्रीय  मान्यता नहीं मिली है। फलस्तीनी पूर्वी यरूशलम  को अपनी राजधानी मानते हैं और बराबर इस तरह की मांग कर रहे हैं।  उधर, यहूदी इसे अपनी राजधानी मानते हैं। फलिस्तीनी सदियों से पूर्वी यरूशलम  में बसे हुए हैं और शहर की एक तिहाई आबादी फलिस्तीनियों की है। पूर्वी यरूशलम में यहूदियों को लगातार बसाया जाना भी तनाव का बडा कारण है। यरूशलम में कोई भी बदलाव अंतरराष्ट्रीय   शांति  प्रस्ताव से ही आ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति  ने यरूशलम  को इसराइल की राजधानी घोषित करके न केवल फलिस्तीनियों को ही उकसाया है, अलबता अब तक की मान्य स्थिति को भी चुनौती दी है। “बहाव के साथ बहना (स्विम विथ टाइड), भारत की आजमाई हुई कूटनीति रही है। इस्तांबुल में सपन्न आईओसी की बैठक में बहुमत फलीस्तिनियों के साथ था। इसलिए भारत को अमेरिका और इसराइल का विरोध करना पडा। वैसे अमेरिका और इसरायल इस सच्चाई को  समझते हैं कि अंतरराष्ट्रीय    हित सामयिक कूटनीति से तय  होते हैं, दोस्ती के मानदंड से नहीं ।   

घोटाला तो था ही नहीं?

जिस ।.76 लाख करोड रु घोटाले के लिए कांग्रेस नीत संप्रग सरकार को बहुत बडी कीमत चुकानी पडी थी, वह तो था ही नही्। बस अगर कुछ था तो आरोप, अफवाहें और अटकलों का दौर और पूरा घोटाला इन बातों पर खडा किया गया था। वीरवार को सुनाए गए सीबीअई की विषेश अदालत के फैसले का निचोड भी यही है। अदालत ने  इस घोटाले के सभी आरोपियों को तीनों मामलों में बरी कर दिया है। संप्रग सरकार में संचार मंत्री रहे और घोटाले के प्रमुख आरोपी ए राजा सभी आरोपों से बरी हो गए हैं। द्रमुक नेता और  पूर्व मुख्यमंत्री के करुणानिधि की सांसद पुत्री कनिमोडी और उन तीन कंपनियों, जिन्हें कथित घोटाले से फायदा हुआ था, को भी अदालत ने आरोप मुक्त कर दिया है। सभी 17 आरोपी छूट गए हैं। अपने फैसले में जज ने कहा है“ मैं सात साल तक इंतजार करता रहा। काम के प्रतिदिन और गर्मियों की छुट्टियों में भी, मैं हर दिन  सुबह 10 से षाम 5 बजे तक इस अदालत में बैठ्कर इंतजार करता रहा कि कोई कानून रुप से स्वीकार्य सबूत लेकर आए, लेकिन कोई भी नहीं आया“। जज की इस टिप्पणी से 2जी घोटाले की “गंभीरता “ का अंदाजा हो जाता है। दरअसल,  2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला 2010 में तत्कालीन महालेखाकार (सीएगी) विनोद राय की रिपोर्ट पर उजागर हुआ था। कैग की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि संप्रग सरकार द्वारा 2008 में आवंटित  2जी स्पेक्ट्रम से देष को  ।.76 लाख करोड रु का नुकसान हुआ है। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होते ही पूर देष में खलबली मच गई। 122 स्पेक्ट्रम लाइसेंस रदद कर दिए गए।  देष की सियासत में भूचाल आ गया। कई इस्तीफे हुए और फिर षुरु हुई मुकदमेबाजी। मामला सुप्रीम कोर्ट में चला और सीबीआई की जांच भी षीर्श  अदालत की निगरानी में की गई। मगर अदालत में सीबीआई द्वारा ठोस सबूत पेष नहीं किए जाने से सभी आरोपी छूट गए हैं। सच यह है कि इस घोटाले में साक्ष्य और सबूत जुटाने बेहद मुष्किल थे। महालेखाकार ने संप्रग सरकार की “पहले आओ, पहले पाओ” की नीति को गलत बताते हुए केवल अनुमान लगाया था कि अगर 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन खुली नीलामी से किया जाता तो देष को  ।.76 लाख करोड रु ज्यादा मिलते।  सीबीआई ने “पहले आओ, पहले पाओ“ के कारण हुए नुकसान को 30,000 करोड रु के करीब आंका था। महालेखाकार ने  ।.76 लाख करोड रु के नुकसान का आकलन अनुमान लगाकर किया था। अदालत में इसके साक्ष्य जुटाना वाकई मुष्किल था। अदालती फैसले से मोदी सरकार और भाजपा की खासी किरकिरी हुई है। भाजपा ने इस घोटाले को चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ प्रमुख मुद्दा  बनाया था। और अब जब अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है, सरकार और भाजपा के नेताओं को स्पश्टीकरण देते नहीं बन पा रहा है। अदालती फैसले से उत्साहित वीरवार को कांग्रेस ने संसद में खूब हंगामा किया और भारत रत्न और महान किक्रेटर सचिन तेंदुलकर तक को बोलने तक नहीं दिया। 2जी स्कैम के कारण भाजपा ने 2010 में लगातार 22 दिन तक संसद को चलने नहीं दिया था। उस साल संसद की 83 बैठकों मेंसे 38 2जी  घोटाले की भेंट चढी थी। और इससे देष को 240 करोड रु का नुकसान उठाना पडा था। अब जबकि सीबीआई अदालत ने भी माना है कि पूरा घोटाला अफवाहों और अटकलों पर खडा किया गया था, जनता इस बात का जवाब मंागेगी कि संसद की कार्यवाही को बाधित करके देष को जो नुकसान हुआ है, उसकी भरपाई कौन करेगा? कांग्रेस का उत्साहित होना स्वभाविक है। इस घोटाले के कारण ही संप्रग सरकार को बडी फजीहत हुई थी। अदालत के फैसले से महालेखाकार की विष्वसनीयता पर भी सवाल खडा कर दिया है। भाजपा के सीनियर नेता डाक्टर सुब्रमनयम ने भी माना है कि अदालत के फैसले से भाजपा की छवि खराब हो सकती है।
   

गुरुवार, 21 दिसंबर 2017

इक्विटी मार्केट और भाजपा

गुजरात और हिमाचल प्रदेश  में भाजपा की जीत से देश  का इक्विटी मार्केट गुलजार है। सोमवार को मार्केट के खुलते ही पहले दो घंटों में  सेंसेक्स में जबरदस्त 1200 अंकों की फिसलन दर्ज  हुई। यह गिरावट उस समय आई जब  शुरुआती  मतगणना में कांग्रेस भाजपा से आगे निकल गई थी। मगर जैसे ही गुजरात में भाजपा की जीत निश्चित  हो  गई, सेंसेक्स स्मार्ट रिक्वरी करते हुए सेशन के अंत में अंकों की 135 अंकों की बढत से बंद हुआ। मंगलवार को पूरे दिन इक्विटी मार्केट में तेजी बनी रही और अंत में 235 अंकों की बढत से बंद हुआ। बुधवार को बाजार में तेजी बनी रही हालांकि अंत में गिरावट से बंद हुआ मगर मिडकैप और स्मॉलकैप इंडेक्स में वृद्धि जारी रही। बैकों के साढे आठ लाख  करोड के भारी-भरकम बेड लोंस  आंकडों की रिपोर्ट ने बाजार की तेजी को ब्रेक लगा  दी  है। इस जुलाई में  राष्ट्रीय  सूचकांक निफ्टी पहली बार दस हजारी बना और तब से दस हजार के ऊपर बरकरार है। बुधवार को सेंसेक्स 34,000 के स्तर के निकट आ पहुंचा था। सेंसेक्स और निफ्टी की चाल-ढाल से यही निष्कर्ष   निकलता है कि देश  की इक्विटी मार्केट को कांग्रेस की तुलना में भाजपा से ज्यादा अपेक्षाएं हैं। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से बाजार में आया अप्रत्याशित उछाल इस बात का प्रमाण है। पिछले तीन साल के दौरान सेंसेक्स में 12,000 अंकों से ज्यादा का उछाल आया है। मई 2014 में सेंसेक्स 22,000 के आसपास था। दिसंबर, 2017 में सेंसेक्स 34,000 के आसपास है। इसकी सबसे बडी वजह राजनीतिक स्थिरता और अर्थव्यवस्था के मजबूत फंडामेंटल्स हैं। नोटबंदी से पहले मोदी सरकार के  शासन में ग्रोथ रेट 7 फीसदी से ज्यादा दर्ज हो रही थी। नोटबंदी और जीएसटी ने इसे अल्पावधि के लिए पटरी से उतारा जरुर  है मगर अब ग्रोथ ने फिर रफ्तार पकड ली है और अंतरराष्ट्रीय  एजेंसियों का भी आकलन है कि अगले वित्तीय साल से भारतीय अर्थव्यवस्था फिर तेज रफ्तार पकड लेगी। जीएसटी के लागू होने से ग्रोथ को और गति मिलेगी, आलोचक भले ही इस बात को न माने। मुद्रा-स्फीति मेंबडी गिरावट सबसे बडी राहत है। जून, 2014 में रिटेल मुद्रा-स्फीति 8.33 फीसदी थी। अप्रैल, 2017 में यह घटकर 2.33 फीसदी रह गई थी। कर्जा  भी सस्ता हुआ है, पिछले तीन साल में ब्याज दरों में दो फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। यह बात दीगर है कि बैंकों ने ब्याज दरों में कटौती को पूरी तरह से कस्टमर्स तक नहीं पहुंचाया है। 2017 में विदेशी  निवेश  में भी खासा इजाफा हुआ है। इस साल विदेषी निवेशकों ने 30 अरब डॉलर (दो लाख करोड रु से भी ज्यादा) की विदेशी  मुद्रा का भारत में निवेश  किया है और इस मेंसे 8 अरब डॉलर का इक्विटी मार्केट में लगाया गया है। यह रकम पिछले दो सालों में आए विदेषी निवेश  से कहीं ज्यादा है। इससे साफ है कि निवेशकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर भरोसा बढा है। इस साल विदेशी  संस्थागत निवेशकों ने  शेयर बाजार में 55,000 करोड रु का निवेश  किया है। यह दो पिछले दो साल से लगभग दोगुना है। 2015 में  विदेषी संस्थागत निवेषकों ने भारतीय बाजार में 15,000 करोड रु और 2016 में 20,500 करोड रु का निवेष किया था। मगर यह अभी भी 2012 के  1.28 लाख करोड, 2013 के  1,13 और 2014 के   97,000 हजार करोड रु से काफी कम है। तथापि, सुखद स्थिति यह है कि  विदेशी  निवेशकों ने भारतीय ऋण बाजार में 2017 के दौरान अब तक 1.5 लाख करोड का निवेश  किया है। यही सिलसिला 2018 में जारी रहने की उम्मीद है। मोदी सरकार की राजनीतिक स्थिरता, एक के बाद दूसरी चुनावी सफलता और उदार आर्थिक नीतियिं के कारण बाजार अपेक्षाकृत गुलजार रहा है। यही क्रम अगले साल भी बदस्तूर जारी रह सकता है। 

बुधवार, 20 दिसंबर 2017

अब शुरू होंगी चुनौतियां

गुजरात और हिमाचल प्रदेश  को फतेह करने के बाद अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के समक्ष और नई साल में कई चुनौतियां हैं। और कांग्रेस के नए अध्यक्ष के समक्ष तो  और भी बडी चुनौतियां हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने तीन साल के कार्यकाल में 18 मेंसे 12 चुनाव जीत कर नया कीर्तिमान बना चुके हैं। इस मामले में मोदी पूर्व  प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से थोडा पीछे हैं। 1967 में प्रधानमंत्री बनने के बाद तीन साल में 17 मेंसे 13 चुनाव जिताए थे। जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लगातार 29वीं चुनाव हार चुके हैं। गुजरात के चुनाव परिणाम हालांकि भाजपा के पक्ष में गए हैं मगर राहुल गांधी के लिए यह बात थोडी राहत भरी है कि उनके प्रचंड चुनाव प्रचार ने गुजरात में भाजपा को डरा-डरा कर जिताया है। गुजरात में पार्टी की जीत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए नाक का सवाल बनी हुई थी। अगर पार्टी प्रधानमंत्री के गृुह राज्य में ही हार जाती, इसका प्रतिकूल असर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव पर पडता और कांग्रेस के लिए यह बहुत बडा हथियार साबित होता।  पहली बार देश  के प्रधानमंत्री ने विधानसभा चुनाव में  34 जनसभाओं को संबोधित किया है।   मगर प्रधानमंत्री मोदी का हार को जीत में बदलने में महारत हासिल है और इस मामले में उनका कोई सानी नहीं है। कांग्रेस के युवा अध्यक्ष इस मामले में उनका  दूर-दूर तक भी मुकाबला नहीं कर सकते। गुजरात में राहुल गांधी ने पाटीदार, ओबीसी और दलितों का मोर्चा  खडा करके भाजपा के खिलाफ एक तगडा मोर्चा  खडा तो किया मगर प्रधानमंत्री मोदी ने एक ही झटके में इसके प्रभाव को  ध्वस्त कर दिया। विरोधियों की चुनावी रणनीति को तहस-नहस करना रणभूमि का अहम हिस्सा होता है। बनी-बनाई बिसात को कैसे तोडा जाता है, प्रधानमंत्री मोदी बखूबी जानते हैं। कांग्रेस के बडबोले नेता मणि  शंकर अय्यर और कपिल सिब्बल खुद ही  मोदी के दांव में फंस गए। मणि  शंकर क्या बोले मोदी ने इसे “गुजरात की अस्मिता“ से जोड दिया और कपिल सिब्बल की बयानबाजी को हिदुओं की अस्मिता से। गुजरात के चुनाव ने सियासी दलों को “चुनावी चक्रब्यूह“ को तोडने का सटीक नुस्खा भी सिखाया है। जात-पात पर आधारित ताकतवार मोर्चे और नोटबंदी एवं जीएसटी के प्रतिकूल प्रभाव कैसे  निष्क्रिय  किया जाता है, प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी दिखा दिया है। बहरहाल, प्रधानमंत्री मोदी को अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी के विजयरथ का सारथी बनना है। 2018 में कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश , छतीसगढ समेत आठ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। गुजरात  की तरह  मध्य प्रदेश  में भाजपा 2003 से लगातार सत्ता में है और  छत्तीसगढ में 14 साल से।  इन दोनों राज्यों में  फिर से सत्ता में आना  भाजपा के लिए नाक का सवाल है और कांग्रेस के लिए अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की असली अग्नि परीक्षा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में होगी। इन चुनावों को लोकसभा का कर्टन रेजर माना जा रहा है। इन चुनावों के बाद मई 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं, इन आठ राज्यों और गुजरात मे कुम मिलाकर 100 लोकसभाई हलकें। गुजरात और हिमाचल प्रदेश  को मिलाकर 130 लोकसभा सीटें है। ये 130 सीटें 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के लिए बेहद अहम है। काग्रेस के लिए  राजस्थान, मध्य प्रदेश , छतीसगढ के चुनाव तो अहम हैं ही, कर्नाटक के चुनाव भी बेहद मह्त्वपूर्ण  है। भाजपा मध्य प्रदेश  और छत्तीसगढ में फिर से सत्ता में आने के प्रति आश्वस्त  है मगर कांग्रेस कर्नाटक में फिर सत्ता में आएगी पार्टी खुद भी  आश्वस्त  नहीं है। इन राज्यों में अगर कांग्रेस का  प्रदर्शन  संतोषजनक नहीं रहता है तो कांग्रेस अध्यक्ष की डगर और कठिन हो सकती है।   

मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

जीत कर भी “हार“

गुजरात और हिमाचल प्रदेश  विधानसभा के चुनाव परिणाम इस बार सारगर्भित और खासे दिलचस्प रहे हैं। दोनों ही राज्यों में भाजपा को  स्पष्ट  जनादेश  मिला है। मगर कांग्रेस गुजरात में चुनाव हार कर भी “ श्रेय “ की हकदार है और हिमाचल प्रदेश  में भाजपा को बेशक  दो-तिहाई बहुमत मिला है मगर पार्टी प्रचंड जनादेश  के बावजूद वीरभद्र सिंह से हार गई है। भाजपा के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल “मोदी लहर“ में भी चुनाव हार गए हैं। धूमल ही नही, भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष सत पाल सती भी चुनाव हार गए हैं। भाजपा महिला मोर्चे की अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की करीबी इंदु गोस्वामी भी चुनाव हार गई है। भाजपा के दिग्गज नेता और धूमल के समधी ठाकुर गुलाब सिंह, कुल्लू से  महेश्वर  सिंह और कांगडा जिले के  वरिष्ठ  नेता रवीन्द्र रवि भी हार गए हैं।  इस स्थिति की तुलना में मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अर्की से चुनाव जीत गए हैं। अर्की सोलन जिले में है और वीरभद्र सिंह ने पहली बार  शिमला जिले से बाहर आकर चुनाव लडा है। वीरभद्र सिंह के आलोचक भी मानते हैं अपने परंपरागत चुनाव हलके से बाहर चुनाव लडने का मादा केवल उनमे  है। बाकी नेता तो अपने हलके से बाहर नहीं निकल पाते हैं । धूमल अपने ही जिले में चुनाव नहीं जीत पाए। वीरभद्र सिंह ने पिछला विधानसभा चुनाव  शिमला ग्रामीण से लडा था। इस बार उन्होंने  इस हलके को पुत्र के लिए छोड दिया है।  पुत्र बिक्रमादित्य सिंह भी चुनाव जीत गए हैं। वीरभद्र सिंह के परंपरागत रामपुर और रोहडू (दोनों आरक्षित) से भी कांग्रेस के उम्मीदवार जीते हैं। हिमाचल प्रदेश  में वीरभद्र सिंह ने अकेले चुनाव प्रचार किया जबकि भाजपा के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी और उनकी टीम ने धुंआधार प्रचार किया । हिमाचल प्रदेष में भाजपा को 48 फीसदी से ज्यादा वोट के बावजूद भाजपा के षीर्श  नेताओं का हार जाना यही दर्षाता है कि मतदाताओं को “ टेकन फॉर ग्रांटेड“ नहीं लिया जा सकता।  गुजरात में भले ही भाजपा को स्पश्ट बहुमत मिला है मगर कांग्रेस ने 80 सीटें जीत कर भगवा पार्टी को आइना दिखाया है। चार दिन पहले सभी एक्जिट पोल्स में कांग्रेस को 60 प्लस और भाजपा को 110 प्लस सीटें दी गईं थी। एक्जिट पोल्स फिर गलत साबित हुअ हैं गुजरात की 27 सीटें ऐसी हैं जहां हार जीत का अंतर 2000 से नीचे रहा है। कांग्रेस को ग्रामीव क्षेत्रों में अच्छा रिस्पांस मिला है मगर षहरी क्षेत्रों के वह भाजपा के मजबूत बढत को तोड नहीं पाई है। भाजपा को मात देने के लिए कांग्रेस को षहरी क्षेत्रों में भी ग्रामीण क्षेत्रों जैसे प्रदर्षन की जरुरत थी। पिछले विधानसभा चुनाव की तरह इस बार भी 64 षहरी हलकों में भाजपा का प्रदर्षन काफी अच्छा रहा है। भाजपा 99 सीटें जीतकर आराम से षासन नहीं कर सकती। 80 सीटों लेकर कांग्रेस भाजपा सरकार को आराम से नहीं चलने देगी। भाजपा को इस सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा कि जिस राहुल गांधी को पार्टी कोई चुनौती ही नहीं मानती थी और “पप्पू-पप्पू” कहकर उनका उपहास उडाती थी, उन्हीं से गुजरात में पार्टी को कडी चुनौती का सामना करना पडा। और चुनौती भी इतनी जबरदस्त कि प्रधानमंत्री को “गुजरात का बेटा“ , चायवाला जैसे जुमलों का सहारा लेना पडा। भाजपा को इस बात पर भी आत्ममंथन करना होगा कि कांग्रेस की ही तर्ज  पर भाजपा भी एक व्यक्ति अथवा नेता की लोकप्रियता पर केन्द्रित होकर रह गई है। गुजरात में इस बार कोई स्थानीय मुद्दा और नेता प्रासंगिक नहीं रहा। पूरा चुनाव मोदी बनाम राहुल पर केन्द्रित रहा।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रहते भाजपा में “सामूहिक लीडरषिप“ धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। भाजपा का मार्ग दर्षक मंडल भी अप्रांसगिक हो चुका है। यही दषा कांग्रेस की है। दोनों पार्टियों को इस बारे गहराई से मंथन करने की जरुरत है। लोकतंत्र में यह सब ज्यादा समय तक नहीं चल सकता।

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

आस्था पर “प्रहार“

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ( राष्ट्रीय  हरित प्राधिकरण-एनजीटी) द्वारा अमरनाथ गुफा में मंत्रोच्चारण और जयकारों पर प्रतिबंध लगाए जाने से भक्तों का क्षुब्ध होना स्वभाविक है।  मंत्रोच्चारण, पूजा अर्चना और जयकारों  के बगैर कोई भी धार्मिक  अनुष्ठान  पूरा नहीं होता है। और अगर अमरनाथ गुफा में  मंत्रोच्चारण और पूजा अर्चना ही न हो, तो इस पवित्र यात्रा के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। एनजीटी ने बुधवार को  पोलुशन  रोकने के लिए एक  निश्चित  स्थान से आगे पूजा-अर्चना करने पर भी रोक लगा दी है। अमरनाथ गुफा को “साइलेंस जोन“ घोषित किया गया है। इसका मतलब है कि गुफा में न तो  मंत्रोच्चारण किए जा सकते हैं और न ही जयकार।  एनजीटी ने यह कदम अमरनाथ गुफा को हिमस्खलन से बचाने और इसके मौलिक स्वरुप को कायम रखने के लिए उठाया है। ट्रिब्यूनल ने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ श्रद्धालुओं के लिए समुचित प्रबंध करने के भी निर्देश  दिए हैं ताकि उन्हें  दर्शन  से वंचित न होना पडे। एनजीटी का गठन ही पर्यावरण संरक्षण के मकसद से किया गया है और यह अपना काम बखूबी कर रहा है। प्रकृति की सार्वभौमिक विधि में मानव का दखल अवांछित माना जाता है। पर्यावरण  विशेषज्ञ  भी मानते हैं कि अमरनाथ गुफा में  श्रद्धालुओं की उतरोतर बढती संख्या से  शिवलिंग का आकार   घटता जा रहा है।  श्रद्धालुओं के  शोर-शराबे, लाउड स्पीकर की आवाज, घोडे-खच्चर से गुफा के आस-पास खासा  पोलुशन  फैल रहा है। हिम विज्ञानियों का भी यही कहना है कि पहाडों में  शोर-शराबे अथवा ध्वनि  प्रदूषण  से हिमस्खलन का खतरा बढ जाता है।  इससे शिवलिंग के सतत निर्माण पर प्रतिकूल असर पड रहा है और यह  विलुप्त होने की कगार पर है। इससे पहले एनजीटी ने हिमाचल प्रदेश  में रोहतांग दर्रे को बचाने के लिए कडे कदम उठाए थे। एनजीटी ने  रोहतांग दर्रे   पर कमर्शियल  गतिविधियों और पेट्रोल-डीजल के वाहनों के आवागमन पर रोक लगा दी थी। इसके सुखद परिणाम सामने आए हैं। एनजीटी प्रतिबंध के एक साल बाद  रोहतांग पास न केवल अपेक्षाकृत साफ-सुथरा है, अलबत्ता और अधिक खूबसूरत और खुला-खुला नजर आ रहा है। बहरहाल, एनजीटी की इस कार्रवाई पर राजनीति की जा रही है। भाजपा समेत हिंदू संगठनों ने एनजीटी के इस फैसले को “ हिंदू“ विरोधी बताया है। भक्तों का कहना है कि  मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना हिन्दुओं की धार्मिक आस्था का अहम हिस्सा है और इस पर प्रतिबंध आस्था पर पहरा लगाने जैसा है। इसी मुखर विरोध के कारण वीरवार को एनजीटी को अपने ताजा फैसले को लेकर स्पष्टीकरण  भी  देना पडा। एनजीटी ने  स्पष्ट  किया है कि न तो अमरनाथ गुफा को “साइलेंस जोन“ घोषित किया गया है और न ही गुफा में  मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना पर रोक लगाई गई है। अमरनाथ हिंदुओं के लिए बेहद पावन यात्रा है। भोले बाबा के भक्तों की असीम आस्था का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि श्र्द्धालु लगभग पांच दिन तक 48 किलोमीटर पैदल चल कर गुफा पहुंचते हैं। अमरनाथ गुफा के लिए कश्मीर  के सोनमर्ग  से कम दूरी (16 किमी) वाला रास्ता भी है मगर खडी चढाई होने के कारण यह बहुत कठिन माना जाता है। 12,756 फीट की ऊंचाई पर स्थित अमरनाथ गुफा सारी साल बर्फ से ढकी रहने के कारण बंद रहती है। गर्मियों में कुछ समय के लिए यह खुलती है और इसी दौरान गुफा के लिए यात्रा का आयोजन किया जाता है। बहरहाल, अमरनाथ गुफा ”साइलेंस जोन” घोषित किए जाने वाला एकमात्र धार्मिक स्थल नहीं है। दक्षिण भारत के तिरुपति मंदिर का दर्शन  स्थल और अक्षरधाम में भी “साइलेंट जोन“ हैं। यह दोनों मंदिर श्रद्धालुओं के लिए सारी साल खुले रहते हैं। भक्तों की इस बात में दम है भारत में मंत्रोच्चारण और पूजा-अर्चना अनादि काल से प्रचलित है। पर्यावरण को षुद्ध करने के लिए भारत में हवन-यज्ञ करने की परंपरा है। यह भारतीय संस्कृति का अहम हिस्सा है। इसे हिमस्खलन अथवा ध्वनि प्रदूषण से नहीं जोडा जाना चाहिए।

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

लाल बनाम भगवा फ्लैग

नेपाल की अवाम ने इस बार संसद (प्रतिनिधि सभा) और प्रांतीय सभाओं के चुनाव में वामपंथियों को दिल खोलकर जनादेश  दिया है। 2008 में नेपाल के गणतंत्र बनने के बाद पहली बार वामपंथियों को इतना प्रचंड जनादेश  मिला है और नेपाली कांग्रेस की इतनी दुर्गति हुई है। 265 वाली सीटों वाली प्रतिनिधि सभा में 165 सीटों के लिए हुए प्रत्यक्ष चुनाव ( फर्स्ट पास्ट दि पोस्ट) में नेकपा-एमाले (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) को 76 और नेकपा (ंमाओइस्ट सेंटर) को 38 सीटें मिली है। नेकपा (एमाले) ने 103 और नेकपा (ंमाओइस्ट सेंटर) ने 60 सीटें लडीं थी। दोनों ने मिलकर चुनाव लडा था। अब तक वामपंथी 114 सीटें जीत चुके हैं और 8 पर उनकी बढत है।  नेपाली कांग्रेस मात्र 21 सीटें ही जीत पाईं है जबकि पार्टी ने 151 उम्मीदवार चुनाव में उतारे थे। आठ प्रदेशों  के चुनाव में समानुपातिक प्रतिनिधित्व के फार्मूले के अनुसार वामपंथियों को कुछ और सीटें मिल सकती हैं। सात मेंसे छह प्रदेशों  में वामपंथियों की सरकार बननी तय है। हिंदुवादी एवं राजतंत्र समर्थक पार्टियों को जनता ने पूरी तरह से नकार दिया है। राष्ट्रीय  प्रजातंत्र पार्टी को मात्र एक सीट मिली है और राजतंत्र एव हिंदू राष्ट्र  के प्रबल समर्थक कमल थापा चुनाव ही हार गए हैं।  गणतंत्र बनने के बाद आज तक कोई भी सरकार अपना कार्यकाल  पूरा नहीं कर पाई है। पहली बार नेपाल में किसी गठबंधन को  स्पष्ट  बहुमत मिला है। इससे नेपाल में पहली बार स्थिर सरकार बनने की उम्मीद है। नेकपा (एमाले) नेता के पी ओले के नेतृत्व में अगली सरकार का पदस्थ होना तय है।  भारत के लिए नेपाल में वामपंथी सरकार का सत्ता में आना शुभ संकेत नहीं है। नई दिल्ली में दक्षिणपंथी भगवा पार्टी की सरकार है और हालिया घटनाओं ने वामपंथियों को मोदी सरकार से काफी दूर कर दिया है। ताजा नतीजों से  मोदी सरकार की नेपाल के प्रति खोखली नीति की कलई भी खुल गई है। नेपाल एक संप्रभु देश  है और उसके आंतरिक मामले में बाहरी दखल वहां की जनता को जरा भी गवारा नहीं है। वामपंथियों का आरोप है कि भारत की दक्षिणपंथी सरकार ने नेपाल के आंतरिक मामलों में खासा दखल दिया और मधेस का मुद्दा भी इसी मकसद से उछाला गया था। सितंबर 2015 में भारत के विदेश  सचिव जयशंकर ने नेपाल जाकर राजनीतिक दलों से मधेस समस्या का हवाला देकर संविधान को स्थगित करने के लिए दबाव डाला था।  नई दिल्ली ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पुष्पकमल  दाहाल “प्रचंड“ से  नेपाल के संविधान से “धर्मनिरपेक्ष“ को हटाने के लिए भी कहा था। भाजपा नेता भगत सिंह  कोश्यारी  ने एक इंटरव्यू में माना था कि विदेश  ंमत्री के साथ उन्होंने प्रचंड से ऐसा करने को कहा था।  चुनाव से पहले अक्टूबर में जब  नेकपा-एमाले (नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी) और नेकपा (ंमाओइस्ट सेंटर) ने मोर्चा बनाया था, तब भारत समर्थक ताकतों ने  इसे तोडने की भरपूर कोशिश   की थी। वामपंथियों ने नई दिल्ली पर इस मोर्चे को तोडने का आरोप भी लगाया था। मधेसियों द्वारा नेपाल की नाकेबंदी से भी वहां की जनता भारत से क्षुब्ध है और इसी नाकेबंदी की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री के पी ओले को चीन की शरण में जाना पडा था। नाकेबंदी से नेपाल को दवाओं समेत जरुरी  वस्तुओं की कमी से जूझना पडा था। भारत से हर रोज लगभग 5000 ट्रक  सामान लेकर नेपाल पहुंचते हैं। इन सब घ्टनाओं ने नेपाल के चुनाव पर खासा असर डाला है और भारत समर्थक नेपाली कांग्रेस की लुटिया डूबोई है। नेपाल भारत के अलावा दुनिया का एकमात्र हिंन्दु  राष्ट्र  है और अब तक भारत का आल वैथर मित्र रहा है। एक छोर पर ड्रेगन, तो दूसरे पर पाकिस्तान पहले ही भारत की अखंडता के लिए बहुत बडी चुनौती है। अब अगर एकमात्र हिन्दु राष्ट्र  नेपाल भी भारत से छिटक कर चीन के पाले में चला जाता है, नई दिल्ली में  भगवा पार्टी  की सरकार के खिलाफ एक और फ्रंट खुल जाएगा।

बुधवार, 13 दिसंबर 2017

“विराट“ परिणय सूत्र

शोहरत, अथाह धन और ग्लैमर से भरपूर बॉलीवुड और क्रिकेट में कई समानताएं हैं और दोनों में अच्छे  रिश्ते  भी हैं। सत्तर  के दशक में  (27 दिसंबर, 1969) बॉलीवुड की दबंग अभिनेत्री और नोबल विजेता महान कवि एवं लेखक रवीन्द्र नाथ टैगौर की वंशज शर्मिला टैगोर और क्रिकेटर मंसूर अली खान ( पटौती के नवाब) के प्रणय सूत्र में बंधने से बॉलीवुड और क्रिकेट का रिश्ता  और गहरा हो गया था । इस साल क्रिकेटर जहीर खान और बॉलीवुड अभिनेत्री एव मॉडल सागरिका घाटगे और अब टीम इंडिया के कप्तान और बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का  शर्मा  के विवाह ने इस रिश्ते  को और मजबूत किया है। मंसूर अली खान उर्फ पटौती क्रिकेट जगत की वह  शख्सियत है जिनके नाम कई अद्धितीय रिकॉर्ड  जुडे हैं।  21 साल की बाली उमर में भारतीय टीम का युवातम कप्तान चुने जाने का रिकार्ड  पटौती के नाम दर्ज  है और वे एक आंख की रोशनी जाने के बावजूद क्रिकेट खेलने वाले दुनिया के एकमात्र क्रिकेटर हैं। एक दुर्घटना में उनकी बाईं आंख की रोशनी जाती रही थी। शर्मिला टैगोर और नवाब पटौती की  शादी ने बॉलीवुड और क्रिकेट जगत में तहलका मचा दिया था। शर्मिला टैगोर खालिस बंगाली हिंदू परिवार से संबंधित थे और मंसूर अली खान मुस्लिम और राजसी परिवार से। दोनों में कोई समानता नहीं थी। यहां तक क़ि शर्मिला टैगोर के परिजनों  को पारिवारिक और सामाजिक  असमानता के कारण इस  बंधन की सफलता को लेकर कई शंकाएं थीं। मगर यह प्रणय सूत्र कालांतर में मिसाल साबित हुई है। पटौती दंपत्ति की तीन संतानें है। पुत्र सैफ अली खान और पुत्री सोहा अली खान बॉलीवुड कलाकार हैं और एक और पुत्र साबा अली खान ज्वैलरी डिजाइनर हैं। सोमवार को बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का  शर्मा  और टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली के बीच रोमांस का लंबा दौर परिणय  सूत्र में बंध गया। दोनों ने इटली में  टस्कनी के एक रिजॉर्ट में सात फेरे लगाकर “अनंत काल तक  एक-दूसरे के प्यार में बंधे रहने का वायदा किया“। अनुष्का  शर्मा से परिणय  सूत्र से बंधने के लिए विराट कोहली ने श्री लंका के खिलाफ मौजूदा एक दिवसीय और टी-20 सीरीज को भी छोड दिया । अनुष्का    से ब्याह रचाने के बाद अब विराट दिल्ली छोडकर मुंबई शिफ्ट हो जाएंगे। मुंबई के वर्ली में विराट-अनुष्का  ने नया आषियाना बनाया है। इससे यह माना जा रहा है कि अनुष्का  शर्मा  शादी के बाद भी अपना फिल्मी कैरियर जारी रखेंगी। विराट और अनुष्का के फैंस को इस बात का जरुर मलाल है कि दोनों ने  शादी रचाने के लिए भारत की जगह इटली को चुना। दरअसल, इटली को रोमांस का “डेस्टिनेशन“ माना जाता है। मशहूर  दार्शनिक  बर्ट्रैड रसल का कथन था कि इटली, वसंत और लव निराश  से निराशतम व्यक्ति को प्रसन्नचित  रखने  के लिए पर्याप्त है। इटली का वेनिस  तो प्रेम और  प्रमियों का प्रियतम शहर  माना   जाता है।  इटली की कहानियों पर आधारित विलियम  शेक्सपियर की  रोमियो-जुलियट  को आज भी रोमांचक प्रेम प्रसंग माना जाता है। इस कहानी का अंत भले ही दुखद रहा हो मगर दो प्रेमियों का काल्पनिक प्रेम प्रंसग  जीवंत लगता है। कई फिल्मों, गीतों और ओपेरो स्थानों पर रोमिया-जूलियट प्रेम प्रसंग का मंचन किया जाता है। टस्कनी के बोर्गो  फिनोशिटो रिजॉर्ट  शादी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है और सबसे महंगे होटलों में शुमार है। 2017 में अमेरिका के तत्कालीन  राष्ट्रपति  भी छुटियां मनाने सपरिवार इस रिजॉर्ट में ही ठहरे थे।  अपने “प्रेम प्रसंग“ को अनंत काल तक अजेय रखने के लिए ही विराट और  अनुष्का  ने इटली को चुना। बहरहाल, हनीमून के तुंरत बाद विराट कोहली को अगले साल जनवरी में दक्षिण अफ्रीका के दौर पर जाने वाली भारतीय टीम की कप्तानी संभालनी है। टीम इंडिया को दक्षिण अफ्रीका के साथ 3 टेस्ट, 6 एक दिवसीय और 3 टी20 खेलने है। साल 2018 में टीम इंडिया जून-सितंबर में इग्लैंड और साल के अंत में आस्ट्रेलिया के दौरे पर जाएगी। साल 2018 कोहली के लिए “विराट“ चुनौतियां लेकर आ रहा है।           


मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

पागल होता चुनाव प्रचार

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में पाकिस्तान के दखल की बात करके देश  के भीतर  और बाहर खलबली मचा दी है। प्रधानमंत्री ने रविवार को गुजरात में चुनावी सभाओं को संबोधित करते हुए आरोप लगाया कि पाकिस्तान गुजरात चुनाव में कांग्रेस के जरिए दखल दे रहा है और कांग्रेस नेता अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने की जुगत में है। उन्होंने कांग्रेस और पाकिस्तान के पूर्व  अधिकारियों के बीच मिली भगत के आरोप भी लगाए। उनका इशारा नई दिल्ली में पिछले सप्ताह कांग्रेस नेता मणि शंकर  अय्यर द्वारा आयोजित भोज की ओर था। पिछले सप्ताह ही प्रधानमंत्री पर उदंड टिपण्णी के लिए कांग्रेस ने अय्यर को पार्टी से निलंबित कर दिया था। इस भोज में पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह, पूर्व  उप-राष्ट्रपति  हमीद अंसारी, पूर्व  विदेश  मंत्री नटवर सिंह, पूर्व विदेश  सचिव सलमान हैदर के अलावा पाकिस्तान के  भारत में वर्तमान उच्चायुक्त सोहिल महमूद  और सीनियर जर्नलिस्ट्स  भी मौजूद थे। प्रधानमंत्री ने इस भोज को गुप्त बैठक बताया है और आरोप लगाया है कि इसमें साजिश  रची गई थी। प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल अरशद रफीक द्वारा कांग्रेस नेता अहमद पटेल को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा जताने वाले बयान को भी चुनावी साजिश  से जोडा है। बहरहाल, देश  का प्रधानमंत्री अगर यह बात कहे कि पाकिस्तान गुजरात के चुनाव में दखल दे रहा है तो अवाम इस पर  विश्वास  करेगा। मगर क्या वाकई ही पाकिस्तान गुजरात चुनाव में दखल दे रहा है? जम्मू-कश्मीर   चुनाव कें पाकिस्तान के दखल के आरोप अक्सर लगते रहे हैं मगर गुजरात अथवा किसी अन्य राज्य में पाकिस्तान के दखल की बात जमती नहीं है। पाकिस्तान ने भी प्रधानमंत्री के इन आरोपों का  खंडन करते हुए कहा है कि “भारत हमें इस मामले में न घसीटे“ और अपने बूते चुनाव लडे। पाकिस्तान में संसद अथवा प्रांतीय चुनाव तो क्या, गल्ली-मोहल्ले के चुनाव भी  भारत का नाम लिए बगैर नहीं लडे जाते। जो नेता पाकिस्तान में भारत के खिलाफ जितना जहर उगलता है, कटटरपंथी मतदाताओं में वह उतना ही ज्यादा लोकप्रिय हो जाता है। तो क्या अब भारत के सियासी दल भी पाकिस्तान की राह पर चल पडे हैं और अब चुनाव पाकिस्तान के नाम पर लडे जाएंगें़? वैसे भारत के राजनीतिक रंगंमंच पर भी पाकिस्तान को कोसे बगैर कोई आयोजन मुक्कमल नहीं होता है। एक जमाने में जिस तरह अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए को भारत को अस्थिर करने और पूर्वोत्तर में अफरा-तफरी फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था, उसी तरह अब हर हिंसक वारदात के लिए पाकिस्तानी स्पाई एजेंसी आईएसआई का नाम लिया जाता है। आईएसआई गुजरात चुनाव के दौरान विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त हो सकता है मगर गुजरात का मुख्यमंत्री बनाने में उसकी भूमिका को देश का प्रधानमंत्री तक माने, यह बात  जमती नहीं है। भारत की अवाम इतनी भी नासमझ नहीं है कि वह पाकिस्तान के झांसे में आ जाए। मणि  शंकर अय्यर के रात्रि भोज को चुनावी साजिश  से जोडना भी गले नहीं उतरता है। इस भोज में उपस्थित पूर्व  प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के इन आरोपों पर खेद भी जताया है। इस भोज को साजिश  से जोडकर प्रधानमंत्री ने डाक्टर मनमोहन सिंह की निश्ठा पर ही सवाल उठाया है और पूर्व  प्रधानमंत्री इससे आहत हुए हैं। इस बात कै लिए उन्होंने प्रधानमंत्री से माफी मांगने की मांग की है। विपक्ष की  इस  मांग  मैं  वजन है  क़ि अगर देश  खिलाफ  साजिश हुई  है तो सरकार कार्रवाई  क्यों नहीं करती है। बहरहाल,  गुजरात चुनाव इस बार ऊल-जलूल के मुद्दों पर लडा जा रहा है और लगभग सभी स्टैकहोल्डर्स विकास के एजेंड को भूल चूके हैं। मंदिर-मस्जिद, जात-पात, चरित्र हनन, पाकिस्तान, आतंकी हाफिज जैसे बेकार के मुद्दे उछाले जा रहे हैं जिनसे गुजरात की अवाम को कोई सरोकार नहीं है। इन सब बातों से तो यही लगता है कि गुजरात में चुनाव प्रचार “पागल“ हो गया है़़।     

सोमवार, 11 दिसंबर 2017

12 साल लग गए?

संसद में पैसे लेकर सवाल पूछने के मामले में वीरवार को दिल्ली की अदालत ने अततः  11 पूर्व  सांसदों के खिलाफ आरोप तय कर ही लिए। 11 जनवरी से मामले की नियमित सुनवाई  शुरु हो जाएगी। इस साल दस अगस्त को अदालत ने आरोप तय करने के आदेश  दिए थे। अदालत को आरोप तय करने में 12 साल लग गए।  संसदीय इतिहास के इस काले कारनामे में आरोपी सांसद् सुनवाई टालने की हर मुमकिन कोशिश  करते  रहे और अदालत में पेश  होने से बचते रहे। इसी साल सितंबर में  भाजपा से संबंधित एक सांसद के बार-बार पेशी   में हाजिर नहीं होने से क्षुब्ध न्यायालय ने उन्हें अंतिम मौके देते हुए साफ कह दिया था कि दिसंबर में हर हाल में आरोप तय कर लिए जाएंगें।  इस मामले ने देश  के राजनीतिक दलों के चाल-चलन की कलई खोल कर रख दी थी। 12 दिसंबर, 2005 में एक स्टिंग स्टिंग  ऑपरेशन के दौरान 11 सांसदों को मोटी रकम लेकर संसद में सवाल पूछने के लिए रंगेहाथ  पकडा गया था। नार्थ  इंडिया स्मॉल मैन्युफेक्चरिंग एसोसिएशन के नाम 60 प्रश्न सूचीबद्ध  थे मगर केवल 25 ही पूछे गए थे।  आरोपी सांसदों में छह भाजपा के, 3 बहुजन समाज पार्टी और एक-एक कांग्रेस और राश्ट्रीय जनता दल के थे। दस लोकसभा के सदस्य थे  और 1 राज्यसभा का। इस स्कैम का भांडा फूटने पर संसद ने 25 दिसंबर को सभी 11 सांसदों को निलंबित कर दिया था। भाजपा ने तब लोकसभा में  आरोपी सांसदों के खिलाफ निलंबन की कार्यवाही  का मुखर विरोध  और लोकसभा का  बॉयकॉट  तक किया था। लोकसभा में विपक्ष के तत्कालीन नेता लाल  कृष्ण  अडवानी ने आरोपी सांसदों के निलंबन को ” अत्याधिक कठोर कार्रव्ाई“  बताया था।  इस फैसले के खिलाफ आरोपियों ने  सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 2007 मे सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने आरोपी सांसदों  की याचिका को खारिज करते हुए लोकसभा अध्यक्ष की कार्रवाई को सही ठहराया था। मगर  संवैधानिक पीठ ने लोकसभा अध्यक्ष की इस दलील को नहीं माना कि देश  की  शीर्ष  अदालत को बर्खास्त सांसदों के मामले की सुनवाई का कोई अधिकार नहीं है। संविधान में सुप्रीम कोर्ट  को संवैधानिक व्याख्याओं का पूरा अधिकार दिया है और संसद भी संवैधानिक व्याख्या के दायरे में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी सांसदों की इस दलील को भी नहीं माना कि उन्हें अपना पक्ष रखने का माकूल मौका नहीं दिया गया। बंसल समिति ने आरोपी सांसदों को उचित मौका दिया था। इस मामले का एक रोचक पहलू यह है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने 2007 में  स्टिंग   ऑपरेशन करने वाले दो पत्रकारों के खिलाफ भी मुकदमा चलाने के आदेश  दिए थे। मगर बाद में अदालत ने इस मामले को इस बिला पर खारिज कर दिया कि किसी को स्टिंग  ऑपरेशन से नहीं रोका जा सकता। यह मामला फिर भारतीय न्यायप्रक्रिया  की धीमी प्रकिया को उजागर करता है। 12 साल के बाद आरोप तय होने के बाद भी न्याय प्रकिया और लंबी चल सकती है। इतना तय है कि सजा के खिलाफ आरोपी अगली अदालत में जाएंगे और अंतिम  फैेसला आने मे काफी वक्त लग सकता है। न्याय प्रकिया की एक और बडी खामी यह है कि सजायाफ्ता होने पर भी अपराधी लंबे समय तक आजाद घुमते हैं। बिहार के पूर्व  मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले में सजायाफ्ता हैं मगर अभी भी बिहार के किंग मेकर बने हुए है। उनका पूरा परिवार सता का सुख भोग रहा है। पत्नी मुख्यमंत्री रह चुकी है, बेटा उप-मुख्यमंत्री और अब पार्टी ने उन्हें अपना मुख्यमंत्री प्रत्याशी  घोषित किया है। सुप्रीम कोर्ट  ने इस साल मई लालू और चारा घोटाले के अन्य आरोपियों पर भ्रष्टाचार  का   एक और मुकदमा चलाने के आदेश  दिए हैं। देश  में और भी कई नेता हैं जिन पर संगीन आपराधिक मुकदमे चलने के बावजूद वे सत्ता का सुख भोग रहे हैं। इस तरह की व्यवस्था राजनीतिक सुचिता लाने की बजाए भ्रष्टाचार को ही बढा रहा है।

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

“उदंडता“ की इंतहा

“तू चाय बेच“, यह आदमी तो बडा नीच है, राहुल गाधी खिलजी की औलाद“, “पप्पू“  जैसी उदंड और गंवारु  भाषा  का इस्तेमाल करके समकालीन सियासी नेताओं ने राजनीतिक असभ्याचार की इंतहा कर दी है। हमारे  दुश्मन  पडोसी मुल्क भी भारतीय नेताओं के निम्न स्तर के आचरण से हैरान है। टवीटर पर हमारा मखौल उडाया जा रहा है। जो देश  अपनी समृद्ध  संस्कृति और सभ्यता पर खूब इतराता है, वहां अगर सियासी नेताओं का आचरण ऐसा हो, तो लानत है ऐसी संस्कृति पर ? कांग्रेस के  वरिष्ठ  नेता मणिशंकर अय्यर की उदंड  भाषा  ने तो राजनीतिक सभ्याचार की सारी मर्यादाएं ही लांघ ली हैं। वीरवार को दिल्ली में अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर के उदघाटन पर प्रधानमंत्री मोदी के राहुल गांधी पर कसे तंज से तिलमिलाए मणि  शंकर अय्यर ने जिस  भाषा  का प्रयोग किया है, उस पर राहुल गांधी को भी टवीट करके फौरन  स्पष्टीकरण  जारी करना पडा। उनके स्टेट्स वाले दिग्गज नेता से इस तरह की उडंड शब्दों  की उम्मीद नहीं की जा सकती।  मणि शंकर अय्यर गैर-हिन्दी भाषी  का बहाना बनाकर अब सफाई दे रहे हैं और उन्होंने माफी भी मांग ली है मगर उनकी इस उदंडता से कांग्रेस को कपिल  सिब्बल के अयोध्या वाले बयान से भी ज्यादा नुकसान हो सकता है।  देश  के प्रधानमंत्री को “गाली“ देना पूरे देश  को गाली देने जैसा है। मणि  शंकर अय्यर को संभवतय इस बात का अंदाजा भी नहीं है कि प्रधानमंत्री के लिए उदंड शब्दों का प्रयोग करके उन्होंने पार्टी का गुजरात में कितना नुकसान किया है। इससे पहले 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान भी अय्यर मोदी को “चाय बेचने वाला“ कह कर अपमानित कर चुके हैं। इससे भी कांग्रेस को भारी नुकसान उठाना पडा था। भाजपाई नेताओं ने फौरन इस प्रकरण को लपकते हुए काग्रेस पर ताबडतोड हमले  शुरु कर दिए हैं।  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान मणि  शंकर अय्यर के इस बयान को खूब भुनाया। गुजरात में पहले चरण का चुनाव प्रचार आज सांय समाप्त हो गया है। पहले चरण के मतदान से ठीक पहले प्रधानमंत्री के अपमान पर गुजरात में तीखी प्रतिक्रियाएं स्वभाविक है और इससे कांग्रेस को चुनाव में भारी नुकसान हो सकता है। इससे पहले मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट  में  वरिष्ठ  कांग्रेस नेता और दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने अयोध्या मामले की सुनवाई को 2019 के लोकसभा चुनाव तक टालने की मांग करके कांग्रेस के लिए मुसीबत खडी कर दी थी। सिब्बल के इस बयान पर भाजपा को कांग्रेस को  हिंदु विरोध बताने का हथियार मिल गया है। सिब्बल के इस स्टैंड से भडके साक्षी महाराज ने राहुल गांधी के खिलाफ “खिलजी की औलाद“ जैसी उदंड भाषा  का प्रयोग कर डाला। पिछले सप्ताह गुजरात यात्रा के दौरान सोमनाथ मंदिर के विजिटर रजिस्ट्रर में राहुल गांधी को  गैर-हिन्दू बताकर कांग्रेस के “सॉफ्ट हिंदुत्वः की हवा निकल गई थी। इस पर कांग्रेस और राहुल गांधी को सफाई देनी पडी कि वे तो जनेऊधारी हिंदू है। बहरहाल, गुजरात के चुनाव प्रचार में मूल मुद्दे गायब हो गए हैं और “ राम मदिर“, हिन्दुत्व, जात-पात और चरित्र हनन का सहारा लेकर मतदाताओं को भ्रमित किया जा रहा है। भाजपा ने पिछला विधानसभा चुनाव “विकास“ पर लडा था और पार्टी को प्रचंड बहुमत मिला था। 2014 का लोकसभा चुनाव भी भाजपा ने “ गुजरात के विकास मॉडल“ पर लडा  था और इस पर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी को पहली बार  स्पष्ट  बहुमत मिला था। मगर इस बार गुजरात चुनाव प्रचार में विकास की बातें पीछे छूट गई हैं। समकालीन नेताओं के लिए हर हाल में चुनाव जीतना एकमात्र लक्ष्य रह गया है और इसके लिए अगर उन्हें लोकतांत्रिक मर्यादाएं तोडनी पडे, वे ऐसा करने में जरा भी हिचकते नहीं है। लोकतंत्र में  निर्भीक , स्वतंत्र चुनाव और स्वस्थ मर्यादाएं ज्यादा मायने रख्ती हैं। मर्यादाएं तोडकर चुनाव जीतने से लोकत्त्र कमजोर होता है।

गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

कब सुलझेगा अयोध्या विवाद?

 अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ढहाए 25 साल गुजर गए हैं और मंदिर निर्माण का मामला सात दशकों से लटका हुआ है मगर  इतन लंबा समय बीत जाने के बाद भी विवाद हल होता नजर नहीं आ रहा है। आए दिन कोई-न-कोई बखेडा खडा हो जाता है।  अब सारी उम्मीदें देश  की  शीर्ष  अदालत पर टिकी हुईं है। 6 दिसंबर, 1992 को भगवा संगठनों के कार सेवकों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया था। भाजपा के  वरिष्ठ  नेता लाल कृश्ण अडवानी, मुरली मनोहर जोशी  और सुश्री उमा भारती इन कार सेवकों की अगुवाई कर रहे थे। सुप्रीम कोर्ट ने इसी साल बाबरी मस्जिद ढहाने के लिए अडवानी, जोशी  और उमा भारती पर आपराधिक साजिश  के तहत मुकदमा चलाने के आदेश  दिए थे। मंगलवार  को सुप्रीम कोर्ट  में अयोध्या मामले की सुनवाई हुई और रोजाना सुनवाई के लिए आठ फरवरी की तारीख मुकर्रर की है। विवाद इस बात पर है कि अयोध्या में विवादित स्थल पर पहले मंदिर था या नहीं और मुगल  शासक बाबर ने मंदिर को ध्वस्त कर यहां बाबरी मस्जिद बनाई थी़? राम भक्तों की दलील है कि 1528 तक  अयोध्या में राम मंदिर था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्देश  पर पुरातत्व विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य की  पुष्टि  की है  कि दसवीं शताब्दी तक अय्योध्या की विवादित जगह पर राम मंदिर था और 13वीं  सदी  तक वहां पूजा-र्अ्चना हुआ करती थी। मुस्लिम संगठनों ने हालांकि इस रिपोर्ट  को न्यायालय में चुनौती दी मगर हाई कोर्ट  ने रिपोर्ट को सही माना। इतिहास भी  इस बात को प्रमाणित करता है कि 1525 में बाबर द्वारा भारत पर हमला करने के  तीन साल बाद उसके सेनापति मीर बागी ने अयोध्या में राम मंदिर को ध्वस्त करके यहां मस्जिद बनाई थी। 1949 में बाबरी मस्जिद की मुख्य गुम्बज में राम की मूर्ति को स्थापित किया गया। एक साल बाद राम भक्तों ने  बाबरी मस्जिद में स्थापित मूर्ति की पूजा-अर्चना के लिए  फैजाबाद की अदालत में याचिका दायर की। बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद 1993 में उतर प्रदेश  सरकार ने विवादित स्थल के आस-पास 67 एकड जमीन का अधिग्रहण करके न्यायालय में याचिका डालकर पूछा कि क्या बाबरी मस्जिद से पहले वहां मंदिर था? राम मंदिर में पुजारी तैनात करने और नियमित पूजा-अर्चना जारी रखने के लिए  1993 में ही राज्य सरकार ने अयोध्या एक्ट पारित किया। 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने विवादित बाबरी मस्जिद साइट को निर्मोही अखाडा, राम लल्ला और उत्तर प्रदेश  सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच  बराबर तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया।  वक्फ बोर्ड ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट मे चुनौती दी और अदालत ने इस फैसले पर स्थगन आदेश  जारी कर यथा स्थिति के आदेश  दे रखे है।ं फिलहाल मामला पहले की तरह लटका हुआ है। इन सारी घटनाओं से साफ है कि मामला बेहद जटिल है और कोई भी पक्ष झुकने को तैयार नहीं है मगर सभी अदालत का फैसला मानने के लिए बाध्य हैं। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना अभी बाकी है मगर भाजपा और भगवा संगठन अभी से जीत का जश्न   मनाने लग पडे हैं। भाजपा के  वरिष्ठ  नेता डाक्टर सुब्रामनयम स्वामी तो बार-बार का रहे हैं कि फैसला उनके पक्ष में ही आना है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला  आने में समय लग सकता है मगर यह 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले   आता  है  तो  भाजपा को इसका तगडा चुनावी फायदा हो सकता है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील कपिल सिब्बल ने  शायद इसी आशंका से ग्रस्त होकर कोर्ट से सुनवाई 2019 चुनाव तक स्थगित करने की गुजारिश  की थी। यह बात दीगर है कि उनका यह दांव कांग्रेस के लिए उल्टा पड गया है। भाजपा इसे खूब भुना रही है। इस प्रकरण से अयोध्या विवाद के राजनीतिक रंगत का अनुमान  लग जाता है।

बुधवार, 6 दिसंबर 2017

राहुल पर जल्दबाजी क्यों?

कांग्रेस के “युवराज“ राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष बनना  निश्चित   है। महज औपचारिक घोषणा बाकी है।  मंगलवार को पार्टी ने कहा कि कांग्रेस  अध्यक्ष पद के लिए राहुल एकमात्र उम्मीदवार हैं। 11 दिसंबर को नाम वापस लेने की आखिरी तारीख समाप्त होते ही यह यह घोषणा भी कर दी जाएगी। उन्हें सोनिया गांधी का उतराधिकारी बनाने के लिए कांग्रेसियों में होड लगी हुई है। राहुल गांधी को अध्यक्ष बनाने के लिए  कांग्रेस के छोटे से बडे है हर  नेता ने  दनादन  उनके नामांकन का अनुमोदन किया। कांग्रेस की यही संस्कृति रही है। दिग्गज कवि  मुक्तिबोध की एक पंक्ति  है,“ गलत समय पर झगडा करते हैं और गलत समय पर झुक जाते हैं, इसलिए सारी गडबडियां होती है“। राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष चुनने के लिए कांग्रेस ने जो समय चुना है, उस पर राजनीतिक पंडितों  को आश्चर्य  हो रहा हैे। कांग्रेस किसे पार्टी अध्यक्ष चुनती है और कब, यह उसका अंदरुनी मामला है मगर देश  की ग्रांड ओल्ड पार्टी से करोडों लोगों की अपेक्षाएं जुडी है, इसलिए  लोकतांत्रिक  सरोकारों को दरकिनार नहीं किया जा सकता और   पार्टी के हर काम की बारीकी से मुआयना जरुरी है।  राहुल गांधी की ताजपोशी  के मात्र एक सप्ताह बाद हिमाचल प्रदेश  और गुजरात विधानसभा के चुनाव परिणाम आने हैं। हिमाचल प्रदेश  में कांग्रेस सत्ता में है और अगर वह फिर से सत्ता में नहीं आती है तो पार्टी के “हाथ“ से एक और राज्य भाजपा के पाले में चला जाएगा। गुजरात में राहुल गांधी ने अपना सब कुछ दांव पर लगा रखा है। हिमाचल प्रदेश  की तुलना में राहुल का सारा जोर गुजरात पर रहा है। गुजरात में अगर कांग्रेस को बहुमत मिलता है, तो राहुल गांधी के लिए यह बहुत बडा प्लेटफार्म  बन जाएगा। जीत का पूरा श्रेय राहुल गांधी को ही जाएगा। इस स्थिति में उनकी ताजपोशी  और ज्यादा प्रासंगिक हो जाती। और  अगर पार्टी को स्पष्ट  बहुमत नहीं भी मिलता है, तो भी राहुल गांधी की ताजपोशी  और अधिक तार्किक हो सकती थी। पार्टी कह सकती थी कि राहुल गांधी की ताजपोशी   से पार्टी अब् नई रणनीति के साथ मैदान में उतरेगी।  भाजपा इस जमीनी सच्चाई को अच्छी तरह जानती है कि देश  में कांग्रेस ही उसका एकमात्र विकल्प है और यही पार्टी उसे सता से हटा सकती है। राहुल गांधी प्रधानंमत्री नरेन्द्र मोदी से अपेक्षाकृत युवा हैं और लंबे समय तक पार्टी को लीड कर सकते हैं। इसीलिए भजपा और उसे जुडे भगवा संगठनों का पूरा जोर राहुल गांधी को कमजोर करने पर रहता है। गुजरात में राहुल गांधी ने धुंआधार र प्रचार करके  भाजपा के नाको दम कर रखा है। इसके सुखद नतीजे सामने भी आ रहे हैं।  एक न्यूज चैनल के ओपिनियन पोल से पता चलता है कि गुजरात में मौसम और मिजाज दोनों ही बदल रहे हैं। नवंबर के आखिरी सप्ताह कें कराए गए इस ओपिनियन पोल के अनुसार गुजरात में कांटे की टक्कर है और इस समय दोनों पार्टियों को बराबर के वोट मिल रहे हैं। भाजपा के ग्राफ में चार प्वांइट की गिरावट आई है और कांग्रेस को दो-प्वांइट की बढत मिली है। यह पोल चुनाव प्रचार  शुरु होने के समय किया गया था। इसके बाद प्रचार और तेज हो गया है और मतदान तक स्थिति बदल सकती है।  अगस्त में इसी तरह के ओपियन पोल में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिलने की संभावना जताई गई थी और कांग्रेस का सुपडा साफ होता बताया गया था। चार माह में अगर चुनावी बयार कांग्रेस के पक्ष में बह रही है, तो इसका सारा श्रेय राहुल गांधी को जाता है। बहरहाल, राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद कडी चुनौतियों का सामना करना पड सकता है/ उनमें  वह स्पार्क  नहीं है जो उनकी दादी इंदिरा गांधी में था। अगले साल (2018) कर्नाटक, मध्य प्रदेश , राजस्थान, छत्तीसगढ समेत आठ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने है। यह राहुल गांधी की सबसे बडी अग्नि परीक्षा होगी। 

मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

पॉल्यूशन की मारी दिल्ली

भारत और श्रीलंका के बीच तीसरे टेस्ट के दूसरे दिन रविवार को दिल्ली के फिरोजशाह कोटला में ऐसा कुछ हुआ, जो क्रिकेट के इतिहास में आज तक नहीं हुआ । श्रीलंका के खिलाडी मास्क लगाकर मैदान में फील्डिंग करते रहे और प्रदूषित  हवा का हवाला देकर 58 मिनट में चार बार खेल को रुकवाया। श्रीलंकाई खिलाडियों का कहना था प्रदूषित  हवा के कारण उनके एक गेंदबाज को चक्कर आ रहे थे और दूसरे का सांस फूल रहा था। बहरहाल, अंपायर ने श्री लंकाई टीम की बात नहीं मानी और खेल जारी रहा। सोमवार को श्रीलंका बैंटिग कर रही थी, इसलिए खिलडियों ने प्रदूषण की कोई  शिकायत नहीं की। श्रीलंका के कप्तान दिनेश  चंदीमल खेल शुरु होने से खत्म होने तक पिच पर डटे रहे। इस दौरान श्रीलंका के किसी भी बल्लेबाज को प्रदूषित त वायु ने जरा भी परेशान नहीं किया।  इससे साफ है रविवार को श्री लंका की टीम भारतीय दबंग बल्लेबाजी से  खौफ खाकर खेल रोकने के लिए बहाना ढूंढ रही थी। इसी कारण खराब एयर क्वालिटी का मुद्दा उठाकर तिहरे शतक की ओर बढ रहे भारतीय कप्तान  विराट कोहली का  ध्यान बंटाने के लिए खराब एयर क्वालिटी का मुद्दा उछाल गया। और इसमें वे काफी हद तक कामयाब भी हुए। कोहली न केवल तीसरे शतक लगाने से पहले ही आउट हो गए, अलबत्ता बार-बार की रुकावट से क्षुब्ध होकर उन्होंने भारत की पहली पारी 537 के स्कोर पर ही घोषित  कर दी। इसके बाद भारतीय गेंदबाजों ने श्रीलंका के तीन विकेट झटके मगर भारतीय तेज गेंदबाजों की सांसे नहीं फूलीं। जाहिर है श्रीलंकाई टीम ने खास मकसद से यह सब कुछ किया ।  बीसीसीआई के कार्यवाहक अध्यक्ष सीके खन्ना ने भी माना है कि विराट कोहली का तिहरा शतक रोकने के लिए श्रीलंकाई खिलाडियों ने यह तमाशा  खडा किया। स्टेडियम में मौजूद 20 हजार दर्षकों  पर  खराब एयर क्वालिटी का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडा। न ही मैदान में खडे अंपायरों पर  प्रदूषित  वायु का कोई असर पडा। क्रिकेट हो फुटबाल या कब्बडी, खेल को अगर खेल भावना से न खेला जाए तो यह खेल नहीं राजनीति का अखाडा बन जाता है।  बहरहाल, भारत की राजधानी दिल्ली ही नहीं, श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में भी प्रदषण का स्तर खतरनाक स्तर पर है़। 2017 में श्रीलंका में प्रदूषण की समस्या इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है कि सरकार को इससे जूझने के लिए सेना की मदद लेनी पड रही है। 2016 में दिल्ली में पॉल्यूशन का स्तर 2.2 गुना ज्यादा था तो कोलंबो में यह 3.2 गुना ज्यादा था। भारतीय खिलाडियों ने श्रीलंका में हाल ही की सीरीज के दौरान  खराब एयर क्वालिटी  की कोई शिकायत नहीं की। बहरहाल, कहते हैं “ अपना ही सिक्का खोटा हो तो औरों का क्या दोष “।  इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता है कि दिल्ली “ दुनिया के सर्वाधिक प्रदूषित महानगरों में  शुमार है और यहां  प्रदूषण  का स्तर इतने खतरनाक स्तर पर है कि भारत की राजधानी को  गैस का चेंबर कहा जाता है। दिल्ली के  हर तीसरे बच्चे का फेफडा प्रदूषित हवा से संक्रमित हो चुका है।  पिछले महीने ही दिल्ली में प्रदूषण का प्रकोप इतना बढ गया था कि राजधानी का जनजीवन ही ठप्प पड गया । स्कूल-कालेजिज बंद करने पडे थे और लोगों बाहर निकलने में भी परेशानी हो रही थी। दिल्ली में सर्दी के मौसम में पॉल्यूशन का स्तर  विश्व  स्वास्थय संगठन (डब्ल्यूएचओ) के निर्धारित मानक से 30 गुना ज्यादा बढ जाता है। दुखद स्थिति यह है कि दिल्ली ही नहीं, दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों मंे 8 भारत में है़। मध्य प्रदेश  का ग्वालियर और पंजाब का लुधियाना दिल्ली से भी ज्यादा प्रदूषित है। प्रदूषण इस समय सबसे गंभीर समस्या है। और यह स्थिति लंबे समय से है मगर न तो केन्द्र और न ही संबंधित राज्य  इसके निदान के लिए आज तक कुछ ठोस कर पाए हैं।

सोमवार, 4 दिसंबर 2017

भाजपा के अच्छे दिन

मोदी सरकार के  शासन में आम आदमी पार्टी के अच्छे दिन भले ही न आए हों मगर सत्तारूढ दल भारतीय जनता पार्टी के अच्छे दिन बराबर आते रहे हैं। हर मोर्चे पर मोदी सरकार को मुंहमांगी सफलता मिल रही है।  2014 के लोकसभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने के बाद भाजपा ने पंजाब को छोडकर  विधानसभा चुनावों में भी बेहतरीन  प्रदर्शन  किया है। और अब गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उत्तर प्रदेश  के निकाय चुनावों में जबरदस्त जीत दर्ज  करके भाजपा ने कांग्रेस को आइना दिखा दिया है। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा को निकाय चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला है। कांग्रेस का  प्रदर्शन  इतना कमजोर रहा है कि पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लोकसभा हलके अमेठी में भी पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई है। कांग्रेस अब यह सफाई  दे रही है कि उसने पार्टी चुनाव चिंह पर निकाय चुनाव लडे ही नहीं। बहरहाल, चुनावी राजनीति को छोड दिया जाए, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 6.3 फीसदी की बढोतरी ने मोदी सरकार के आलोचकों के मुंह बंद कर दिए हैं। जुलाई-सितंबर तिमाही के दौरान जीडीपी ग्रोथ ने पाच तिमाहियों में लगातार गिरने का सिलसिला तोड दिया है। इससे पिछली तिमाही (अप्रैल जून) में जीडीपी की ग्रोथ  5.7 फीसदी थी।  पिछले साल इसी तिमाही में जीडीपी में ग्रोथ  साढे सात फीसदी थी। पिछली पांच तिमाही के दौरान जीडीपी की ग्रोथ रेट में लगातार गिरावट दर्ज हो रही थी। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद देश  की जीडीपी में यह सबसे खराब स्थिति थी। आलोचक इसके लिए नोटबंदी और आनन-फानन में लागू जीएसटी को जिम्मेदार ठहरा रहे थे। इससे पहले संप्रग सरकार के समय 2013-14 की आखिरी तिमाही में अर्थव्यवस्था में सबसे कम 4.3 फीसदी ग्रोथ रेट दर्ज हुई थी। जीडीपी ग्रोथ के ताजा अंाकडे साफ बता रहे हैं कि नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था पर जो प्रतिकूल असर पडा था, वह अब काफूर हो गया है और भारतीय अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकड ली है। इससे यह उम्मीद भी जगी है ग्रोथ  जल्द ही साढे सात फीसदी के स्तर को पार कर लेगी। जीडीपी देश  की आर्थिक सेहत को मापने का सबसे पुख्ता पैमाना है। जीडीपी में ग्रोथ बढोतरी का मतलब है कि देश  आर्थिक रुप से  हृष्ट -पुष्ट  है। गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले ग्रोथ का रफ्तार पकडना भाजपा के लिए काफी सुखद है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नोटबंदी और जीएसटी से अर्थव्यवस्था पर हो रहे प्रतिकूल असर को गुजरात विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाए हुए हैं। ताजा आंकडों ने सरकार के आलोचकों को  निरुतर कर दिया है। ग्रोथ के ताजा अंाकडों की सबसे अच्छी बात यह है कि अब तक सुस्त पडे निर्माण क्षेत्र में भी सात फीसदी ग्रोथ दर्ज हुई है। उर्जा और गैस सेक्टर  7.5 फीसदी की दर से आगे बढा है। ये तीनों सेक्टर अर्थव्यवस्था के बुनियादी क्षेत्र है और इनकी ग्रोथ अन्य सेक्टरों को भी प्रभावित करती है। होटल, व्यापार और ट्रांसपोर्ट में 9.9 फीसदी की ग्रोथ काबिलेगौर है। मगर कृषि  क्षेत्र में लगातार गिरावट चिंताजनक है। देश  में इस समय प्याज, टमाटर और मौसमी फल-सब्जियों के दाम आसमान को छू रहे हैं। कृषि  क्षेत्र में गिरावट जारी रहने से खाने-पीने की चीजें और महंगी हो सकती हैं। इसका असर मुद्रा-स्फीति पर पडेगा और कर्ज  महंगा हो सकता है। सरकार का बजटीय घाटा निरंतर बढ रहा है और दिंसबर आते-आते यह निर्धारित लक्ष्य का 96 फीसदी के स्तर को छू रहा है। अभी वित्तीय वर्ष   के चार माह बाकी है। सरकार को अपने खर्च  कम करने होंगे मगर इसका असर विकास पर नहीं पडना चाहिए।  मुद्रा स्फीति से बचने के लिए सरकार अपनी बजटीय घाटे पर लगाम लगा सकती है। बहरहाल, मोदी सरकार की हर तरफ से पौ-बारह हो रही है और कांग्रेस को चौतरफा मुंह की खानी पड रही है।  

शुक्रवार, 1 दिसंबर 2017

धर्म पर बवाल क्यों ?

भारत में धर्म अथवा धार्मिक मुद्दों पर चुनाव लडने पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद राजनीतिक दल खुलकर धर्म और धार्मिक मुद्दों को खूब उछालते हैं। इस बार गुजरात चुनाव में धार्मिक मुद्दों को खुलमखुल्ला उछाल जा रहा है। भाजपा के कट्टर हिन्दुत्व के जवाब में कांग्रेस ने “साफ्ट हिन्दुत्व“ का चोला ओढ रखा है और भाजपा इससे तिलमिलाई हुई है। हिन्दुत्व भाजपा का ब्रांड है और कोई इस ब्रांड को चुराए, भगवा पार्टी को यह कतई सहन नहीं है। एक जमाने में जिस तरह कांग्रेस ने अल्पसंख्यकों के  तुष्टिकरण  को अपना ब्रांड बना रखा था, ठीक उसी तरह अब  “बहुसंख्यकों“ के धु्व्रीकरण  के लिए  “हिन्दुत्व“ को अपनाए हुए है। अस्सी के दशक में गुजरात में कांग्रेस ने अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए खाम (क्षत्रिय,हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) का राजनीतिक फंडा अपनाया था और इसी के कारण ताकतवर पटेल (पाटीदार) समुदाय कांग्रेस से हमेशा   के लिए छिटक गया था। उसके बाद से 2017 के विधानसभा चुनाव में पहली बार पटेल  समुदाय आरक्षण के लॉलीपॉप पर कांग्रेस के समर्थन में आता  दिख रहा  है । बहरहाल, बुधवार को कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर दर्शन  पर भी खासा बवाल खडा हो गया है। मंदिर के एंट्री रजिस्टर पर राहुल गांधी का नाम दर्ज किए जाने पर् भाजपा ने कांग्रेस उपाध्यक्ष के “धर्म“ को लेकर सवाल खडा किया है। दरअसल, सोमनाथ मंदिर का नियम है कि गैर-हिंदुओं  को  दर्शन  से पहले रजिस्टर में एंट्री करनी पडती है। यह नियम हिंदुओं पर लागू नहीं होता है। बुधवार को एंट्री रजिस्टर में राहुल गांधी और अहमद पटेल का नाम दर्ज किए जाने के बाद भाजपा ने इस मुद्दे को खूब उछाला है। अहमद पटेल क्योंकि हिंदू नहीं है, इसलिए उनका नाम एंट्री रजिस्टर मे दर्ज है मगर राहुल गांधी तो हिन्दू हैं, फिर उनका नाम रजिस्टर में क्यों दर्ज किया गया? एंट्री सिर्फ गैर-हिंदुओं के लिए है। भाजपा बार-बार यही सवाल कर रही है। कांग्रेस ने इस एंट्री को भाजपा की साजिश  करार दिया है और पार्टी बार-बार दावा कर रही है कि राहुल गांधी तो जनेऊधारी हिन्दू हैं। यह स्थिति निश्चित  तोर पर समकालीन  भारतीय राजनीतिक हालात की दुर्बलता को  दर्शाती  है। क्या भारत में सियासत का स्तर इतना गिर गया है कि राजनीतिक दलों को अपने अस्तित्व पर भी  सफाई  देनी  पडे? राहुल गांधी हिन्दु हैं या पारसी, यह कोई चुनाव का मुद्दा नहीं है। देश  में हर नागरिक को अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि  चुनने का पूरा अधिकार है। राहुल गाधी की पैतृक  पृष्ठभूमि पारसी है और उनकी दादी इंदिरा गांधी  नेहरु खानदान से संबंधित होते हुए भी “गांधी“ पारिवारिक पृष्ठभूमि  से जुडी रही़।  मगर इंदिरा गांधी के पति फिरोज गांधी किसी हिन्दु परिवार से नहीं थे। फिरोज गांधी ने अपना “गांधी“  उपनाम महात्मा गांधी से प्रेरित होकर बदला  था । मूलतः उनका नाम फिरोज जहांगीर “घांडी“ था और उनके माता-पिता पारसी थे। यह बात आज तक स्पष्ट  नहीं हो पाई है कि  पारसी खानदान के वंशज मात्र उपनाम बदलने से हिंदू कैसे बन गए? भारत में  अमूमन, पारिवारिक पहचान पैतृक  पृष्ठभूमि  से जुडी होती है। राहुल गांधी की पैतृक  पृष्ठभूमि पारसी है, तो क्या इसीलिए सोमनाथ मंदिर में उन्हें गैर-हिन्दू बताया गया। अगर ऐसा है तो इस स्थिति पर बवाल क्यों़? भाजपा को तो इस बात बार खुश  होना चाहिए कि राहुल गांधी की पैतृक पारसी पृष्ठभूमि के बावजूद वे जनेऊधारी हिन्दू हैं। तथापि, कांग्रेस का गुजरात में “सॉफ्ट हिन्द्त्व“ का  प्रयोग भी “ राजनीतिक अवसरवादिता“ ही है। इससे ग्रांड ओल्ड पार्टी का धर्मनिरपेक्ष चेहरा अब धर्मसाक्षेप नजर आ रहा है।  कांग्रेस को अन्तोगत्वा इससे कोई बहुत बडा फायदा नहीं होने जा रहा है। भाजपा की राह पर चलकर कांग्रेस भगवा पार्टी का विकल्प नहीं बन सकती।  नकल करके जैसे-तैसे परीक्षा  पास तो की ज सकती है, मगर अच्छे अंक हासिल  नहीं किए जा सकते।