गुरुवार, 26 जुलाई 2018

विरोध-प्रदर्शन मौलिक अधिकार है इसे कुचला नहीं जा सकता

दुनिया भर में आज तक जितने भी  शासन व्यवस्थाएं रही हैं, उनमें लोकतंत्र सर्वश्रेष्ठ  है। लोकतंत्र में वह मुक्त माहौल और स्वत्रंत्रता मौजूद है, जो मानव के सतत और समग्र विकास के लिए  अपरिहार्य है। भारत के संविधान में नागरिकों के मौलिक अधिकारों का स्पष्ट  उल्लेख है और इनमें  अभिव्यक्ति और लेखन की आजादी एवं  फ्रीडम ऑफ रिलीजन और फ्रीडम ऑफ एषोसिएषन एंड पीसफुल असेंबली भी  शामिल है। फ्रीडम ऑफ असेंबली के तहत देश  के हर नागरिक को  कहीं भी, कभी भी पीसफुल असेंबली का अधिकार है।  अमेरिका में नागरिकों को अपने हक के लिए  शांतिपूर्वक विरोध करने का पूरा अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट  व्यवस्था दी है कि “विरोध-प्रदर्शन  करना“ लोगों का मौलिक अधिकार है और इस पर निरंकुश  प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। शीर्ष  अदालत ने राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और इंडिया गेट के समीप स्थित  बोट क्लब  पर विरोध प्रदर्शन  पर लगे प्रतिबंध  हटा लिए  है । दिल्ली का ऐतिहासिक जंतर-मंतर और बोट क्लब लंबे समय से विरोध-प्रदर्शन के स्थल रहे हैं। समाजसेवी अन्ना हजारे, पूर्व  सैनिकों और तमिल नाडु के किसानों ने अपनी-अपनी मांगों के समर्थन मेँ  जंतर-मंतर पर ही आंदोलन किए थे।  पिछले साल नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने इस बिला पर जंतर-मंतर और बोट क्लब में विरोध-प्रदर्शन  पर प्रतिबंध लगा दिया था कि इनसे दिल्ली में  प्रदूषण  बढ रहा है। मजदूर किसान शक्ति संगठन, एक्स-सर्विसमैन मूवमेंट जैसे संगठनों ने एनजीटी के इस आदेश  को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।  सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इन याचिकाओं पर व्यवस्था देते हुए दिल्ली पुलिस को इन स्थलों पर विरोध-प्रदर्शन के लिए नियम बनाने को कहा है। बोट क्लब  प्रदर्शनकारियों  की पहली पसंद रहा है। यह स्थल जंतर-मंतर से कहीं बडा है। 1988 में महेन्द्र सिंह टिकैत की अगुवाई में पांच लाख से ज्यादा किसानों ने दिल्ली को लगभग पंगु बना दिया था। किसान राशन-पानी, मंजियां, ट्रेक्टर और गाय-भैंस लेकर एक सप्ताह तक दिल्ली में डेरा डाले रहे। इस आंदोलन के बाद बोट क्लब में विरोध-प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया था मगर 2011 मे इस प्रतिबंध को हटा लिया गया था। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि लोकतंत्र में प्रदूषण अथवा कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचल नहीं जा सकता। ऐसा सिर्फ  पुलिस स्टेट में ही होता है। वैसे भी कहते हैं कि सरकार अक्सर बहरी होती है और उसके कानों में ऊंची आवाजें ही सुनाई देती है। समाजसेवी अन्ना हजारे ने लोकपाल के लिए जंतर-मंतर पर आंदोलन किया, सरकार को लोकपाल बिल लाना पडा। यह बात दीगर है कि बिल पारित होने के पांच साल बाद और सुप्रीम कोर्ट  के दखल के  बावजूद अभी तक  लोकपाल की नियुक्त नहीं हो पाई है। जंतर-मंतर पर कई दिनों तक आंदोलन करने के बाद ही सरकार को पूर्व-सैनिकों की पेंशन संबंधी मागों पर विचार करने के लिए विवश  होना पडा। 2017 में तमिल नाडु के जंतर-मंतर पर किसानों के  आंदोलन के बाद ही राज्य सरकार जागी  और किसानों को सूखा राहत और ऋण माफी का पैकेज मिला था। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन सरकार को जगाने का एक सशक्त माध्यम है और इस अधिकार के बगैर लोकतंत्र  पुलिस स्टेट बन जाता है। वैसे,  संविधान में मौलिक अधिकारों के साथ-साथ “ फंडामेंटल डयूटीज “ भी निर्दिश  हैं। 2013 में आर्टिकल 51-ए को संविधान (42) सशोधन, एक्ट  1976 में जोड दिया गया था। इसके तहत नागरिकों के लिए दस “फंडामेंटल डयूटीज “ को निभाना अनिवार्य है। इनमें “डयूटी टू वोट“, “ड्यूटी टू पे टैक्सिस“ और “ ड्यूटी   "ड्यूटी टू  रिजिस्ट इनजस्टिस" शामिल है।   अधिकार और जिम्मेदारियां एक ही सिक्के के दो पहलू हैं मगर हम अधिकारों के लिए तो लडते हैं मगर ड्यूटी निभाने से अक्सर बच निकलते हैं।