सरकारी बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगाकर विदेष भागने वाले “आर्थिक अपराधियों“ पर नकेल डालने के लिए अविलंब सख्त कानून की जरुरत है। विजय माल्या के बाद, नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेषनल बैंक समेत सात बैंकों को 12 हजार करोड रु से भी ज्यादा का चूना लगाने के “कारनामे“ ने देष में बैंकिंग व्यवस्था की चूलें हिला दी है। अभी इस घोटाले की आग ठंडी भी नहीं पडी थी कि रोटोमैक पैन बनाने वाली कंपनी का फर्जीवाडा सामने आ गया। सरकारी बैंकों में घोटाला-दर-घोटाले से चौकन्नी मोदी सरकार मौजूदा बजट सत्र के दूसरे चरण में संसद में “ आर्थिक अपराधी बिल“ लाने की तैयारी में है। आर्थिक अपराधियों की परिसंपत्तियां जब्त करके कर्जा वसूली के लिए नया कानून का मसौदा तैयार है। विजय माल्या 9600 करोड रु का कर्जां दबाने के बाद विदेष में ऐष कर रहे हैं, सरकार और प्रॉसिक्यूषन एजेंसियां हाथ मलती रह गई है। कानून में व्याप्त खामियों का फायदा उठाते हुए “आर्थिक अपराधी“ विदेष भाग जाते हैं। फरवरी, 2017 में प्रस्तावित कानून को विधि मंत्रालय ने अपनी स्वीकृति भी दे दी थी । वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2017-18 के बजट में नया कानून बनाने की घोशणा की थी। वित्त मंत्रालय ने प्रस्तावित कानून का मसौदा तैयार करके पिछले साल ही विधि मंत्रालय को भेज दिया था। लालफीताषाही वाली व्यवस्था में हर काम में विलंब होना निष्चित है। प्रस्तावित कानून 100 करोड रु से ज्यादा का “फ्राड“ करने वालों पर ही लागू होगा और यह विजय माल्या, ललित मोदी और नीरव मोदी जैसे देष छोडने वाले “आर्थिक अपराधियों “ के मामलों को सामने रखकर तैयार किया गया है। भगोडा आर्थिक अपराधी, बिल (फ्यूजिटिव इकॉनानिक आफेंडर्स बिल) के तहत आर्थिक अपराध करके गिरफ्तारी से बचने के लिए विदेष भाग गए और कानून और सजा से बचने के लिए स्वदेषी नहीं लौटने वाले को “भगोडा अपराधी” माना गया है। बहरहाल, प्रस्तावित कानून से आर्थिक अपराधियों को देष छोडने और उनकी परिसंपत्तियां कुर्क करके बैकों का कर्जा वसूलने में आसानी तो होगी मगर अभी भी कुछ खामियां हैं। अपराधी का षातिर दिमाग कानून को तोडना-मरोडना बखूबी जानता है। आर्थिक अपराधी विदेषों में परिसंपत्तियां खडी करके नए कानून से बच सकते हैं। जिस तरह विदेषों में जमा विषाल काले धन को स्वदेष लाना आसानी से सरकार के वष में नहीं है, उसी तरह आर्थिक अपराधियों की विदेषी परिसंपत्तियों का पता लगाना और जब्त करना बेहद कठिन है। बेंकों में लगातार हो रहे घोटाले और बढते बैड लोंस से चिंतित कॉर्पोरेट जगत ने सरकारी बैंकों के निजीकरण की वकालत की है। इस बात में दो राय नहीं है कि सरकारी बैंक राजनीतिक दवाब में काम करते हैं और सियासी दखलादांजी के कारण ही सरकारी बैंकों में भ्रश्टाचार बढा है। सरकारी बैंकों में टॉप लेवल की नियुक्तियां में व्याप्त भाई-भतीजावाद ने इनकी कार्यषैली को खासा प्रभावित किया है। तथापि, सच्चाई यह भी है कि 1969 में बैंकों के राश्ट्रीयकरण के बाद इंक्लुसिव बैंकिग का तेजी से विस्तार हुआ है। राश्ट्रीयकरण से पहले जहां देष में 8000 से भी कम बैंक षाखाएं थीं, वहां अब 80,000 से ज्यादा षाखाएं हैं और बैंकों का जाल अब दूर-सदूर इलाकों तक फैला है। कृशि और किसानों को कर्जे देने में भी सरकारी बैंक कहीं आगे हैं। देष में सीमांत और लघु उधोगों को सस्ते और आसान किस्तों में कर्ज उपलब्ध करवाकर सरकारी बैंकों की औधोगिक उत्पादन बढाने में अहम भूमिका रही है। लंबी अवधि के कर्ज भी सरकारी बैंक ही देते हैं। कुल मिलाकर सरकारी बैंको ने राश्ट्रीय जरुरतों को पूरा किया है। समस्या बैकों के राश्ट्रीयकरण अथवा निजीकरण की नहीं है। सरकारौ बैंको में निगरानी, सतर्कता और इंस्पेक्षन व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने की जरुरत है। सजा के डर से आज तक अपराध कम नहीं हुए है।
बुधवार, 28 फ़रवरी 2018
मंगलवार, 27 फ़रवरी 2018
चांदनी की “जुदाई“
Posted on 8:12 pm by mnfaindia.blogspot.com/
बालीवुड की दिव्या श्रीदेवी नहीं रहीं। सुरमयी अंखियों वाली भारतीय फिल्म जगत की पहली फीमेल सुपरस्टार के शनिवार रात दुबई में आकस्मिक निधन से पूरा देश स्तब्ध रह गया। श्रीदेवी के न होने की खबर फैंस को इतना असहज कर रही है कि सोशल मीडिया पर श्रद्धांजलि देने वालों के शब्दों में “ दर्द और पीडा“ साफ-साफ पढी जा सकती है। अपने अदभुत अभिनय से करोडों दिलों पर राज करने वाली “रुप की रानी” , “ख्बाबों की षहजादी, चांदनी की “जुदाई“ अविस्मीय और अपूर्णीय है। श्रीदेवी जैसा कलाकार दूसरा हो नहीं सकता। फिल्मी हों या असली, उन्होंने जो भी किरदार निभाए हैं, वे सिर्फ श्रीदेवी ही कर सकती थीं। उनके अभिनय की शोहरत पाकिस्तान, जापान और सिंगापुर तक फैली हुई थी। नब्बे के दशक में भारत तो क्या पाकिस्तान में भी श्रीदेवी के अभिनय का जादू इस कद्र सिर चढ कर बोलता था कि यूनिवसर्टी के लौंडे अपने कमरों में सबसे पहले श्रीदेवी का पोस्टर चिपकाते हालांकि उस समय पाकिस्तान में भारतीय फिल्में देखने पर प्रतिबंध था और पकडे जाने पर छह माह तक की कैद की सजा दी जाती थी। मगर श्रीदेवी के सम्मोहन में लौंडे यह सजा भुगतने को भी तैयार रहते। यहां तक कि पुलिसकर्मी और सैनिक चुपके-चुपके वीसीआर उधार लेकर श्रीदेवी की फिल्में देखते। सिंगापुर मे एक रेस्तरां में श्रीदेवी जैसी डॉल रखने और उसका नाम उन पर रखने की वजह से मशहूर हो गया । यह वह जमाना था जब सिनेमा के सितारों को आसमान में चमकने वाले सितारों की तरह देखा जाता। तब श्रीदेवी आसमान में सबसे ज्यादा चमकने वाला सितारा थी। उनमें न केवल गजब के अभिनय की क्षमता थी, अलबता दर्शक उनके नृत्य के कायल थे। वैसे दक्षिण भारत की अभिनेत्रियों में नृत्य की अद्धितीय प्रतिभा रही है। पहले वैजयंती माला, फिर हेमा मालिनी। श्रीदेवी ने इस परंपरा का बखूबी निभाया। जब वे अपने कैरियर के शिखर पर थी, श्रीदेवी ने 15 साल का बेक्र लेकर घर-गृहस्थी जमाई। बतौर पत्नी, मां और बहू का असल किरदार भी बखूबी निभाई। 15 साल बाद जब फिल्मों में वापसी की तो अपने अभिनय का फिर डंका बजाया। उनकी “इंग्लिश- विंग्लिश “ और मॉम बॉक्स आफिस पर काफी हिट हुईं। दुबई में श्रीदेवी पति के भानजे की षादी में शरीक होने गईं थी और होटल में नहाते समय उन्हें दिल का दौरा पडा और वे वे हमेशा के लिए ओझल हो गई। मौत कब, कहां और कैसे आती है, कोई नहीं जानता मगर इसका आना निश्चित है, यह भी शास्तव सत्य है। मगर कम उमर में मृत्यु का आना परिजनों और चाहने वालों को ताउम्र सालता है। सितारे जीते-जी भी सुर्खियों में रहते हैं और मरणोपंरात भी। श्रीदेवी की आकस्मिक मौत भी पीछे कई सवाल छोड गई । पहले कहा जा रहा था कि उनकी मौत दिल का दौरा पडने से हुई थी। इस पर विश्वास नहीं हो रहा था। वे अपनी सेहत और छरहरी काया के प्रति बेहद सजग थी और योगा के साथ-साथ जिम भी जाती थी । ताजा सूचना के अनुसार उनकी बॉडी में शराब के अंश पाए गए हैं। यही मौत का प्रमुख कारण भी माना जा रहा है। वे टब में गिर गईं , खुद को संभाल नहीं पाई और डूबने से उनकी मौत हो गई। इसके यह अर्थ लगाए जा रहे हैं कि श्रीदेवी स्ट्रेस में थी। बहरहाल, बालीवुड की “चांदनी“ का एक लम्हें भर में खो जाना अविश्सनीय लगता है मगर सच यही है कि श्रीदेवी अब हमारी यादों में जीवित है। कहते हैं अभिनय अमर होता है। वह कभी नहीं मरता। शरीर नश्वर होता है, यादें नहीं। चुलबुली, जादुई वाणी वाली श्रीदेवी अपने फैंस की यादों में हमेशा जिंदा रहेगी।
सोमवार, 26 फ़रवरी 2018
कहां है लोकपाल ?
Posted on 7:21 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पांच साल पहले 2013 में लोकपाल की स्थापना के लिए समाजसेवी अन्ना हजारे के आंदोलन को भाजपा ने बढ-चढ कर समर्थन किया था और सत्ता में आने पर तुरंत लोकपाल नियुक्त करने का वायदा किया था। अब कहां है भ्रश्टाचार को मिटाने वाला यह “जादूगर“ (ओम्बड्समैन)। संसद मे 2014 में लोकपाल की नियुक्ति के लिए बाकायदा कानून भी पारित हो चुका है। मगर इसके बावजूद मोदी सरकार चार साल में भी लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाई है। षुक्रवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जानकारी दी कि पहली मार्च को लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति की बैठक हो रही है। देष की षीर्श अदालत में एक स्वंयसेवी संस्था द्वारा लोकपाल की नियुक्ति के लिए दायर याचिका पर मोदी सरकार ने यह जानकारी दी। लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित चयन समिति में प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीष के अलावा विपक्ष के नेता भी हैं। मगर संसद में कोई भी अधिकृत विपक्षी नेता नहीं है, इसलिए सरकार को लोकपाल की नियुक्ति टालने का वाजिब बहाना मिल गया। पिछले साल अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि विपक्ष का अधिकृत नेता नहीं होने से लोकपाल की नियुक्ति को टाला नहीं जा सकता। कोर्ट ने निर्देष दिए थे कि लोकपाल चयन समिति की बैठक बगैर विपक्षी नेता के भी आयोजित की जा सकती है। इस बात को भी लगभग साल हो गया है मगर बैठक फिर नहीं हुई। और अब सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान कहीं जाकर सरकार ने सूचना दी है कि पहली मार्च को चयन समिति की बैठक हो रही है। इन सब बातों से यही लगता है कि मोदी सरकार भी संप्रग सरकार की तरह जब तक संभव हो, लोकपाल की नियुक्ति को टालती रही है। आखिर देष को हर छोटी-बडी बात के लिए न्यायपालिका की षरण में ही क्यों जाना पडता है़? चार साल में मोदी सरकार विपक्ष के अधिकृत नेता संबंधी नियमों में संषोधन तक नहीं कर पाई है। नियमानुसार जिस पार्टी के पास लोकसभा की कुल सदस्यता के कम-से-कम दस फीसदी सांसद हैं, उसी दल को अधिकृत विपक्षी दल की मान्यता दी जा सकती है। लोकसभा के 545 सदस्य हैं और अधिकृत विपक्षी नेता की मान्यता के लिए किसी भी दल को कम-से-कम 55 सदस्यों की जरुरत है। लोकसभा में सबसे बडी पार्टी कांग्रेस के पास केवल 44 सांसद हैं, इसलिए पार्टी नेता को अधिकृत विपक्ष दल का दर्जा नहीं मिल पाया है। कांग्रेस नेता को अधिकृत नेता का दर्जा देने के लिए संबंधित नियमों में संषोधन की जरुरत है मगर सरकार यह भी नहीं कर पाई है। सुप्रीम कोर्ट की टीका-टोकी के बाद मोदी सरकार ने लोकसभा में सबसे बडे चिपक्षी दल को लोकपाल चयन समिति और सीबीआई प्रमुख चयन समिति में षामिल जरुर कर लिया। भाजपा ने भ्रश्टाचार उन्मूलन को लोकसभा चुनाव प्रचार का प्रमुख मुददा बनाया था। संप्रग सरकार के षासन में फैले कथित व्यापक भ्रश्टाचार मामलों को भी भाजपा ने खूब उछाला था और लोगों को भ्रश्टाचार से निजात दिलाने का वायदा किया था। हाल ही में पंजाब नेषनल बैंक से हीरा कारोबारी नीरव मोदी की धोखाधडी और रोटोमैक कंपनी के मालिक के घोटालेे से सरकार की छवि पर छींटे पडे हैं। वीरवार को ट्रंासपेरेंसी इंटरनेषनल की रिपोर्ट में भारत को फिर दुनिया के भ्रश्टतम देषों की श्रेणी में षुमार किया गया है। ग्लोबल करप्षन पर्सेपषन इंडेक्स में भारत इस बार दो पायदान फिसला है। यानी भारत में भ्रश्टाचार कम होने की बजाए और बढा है। यही नहीं रिपोर्ट में भारत को पत्रकारिता और स्वंयसेवी संस्थाओं के लिए काफी असुरक्षित बताया गया है। रिपोर्टं में भारत की फिलिपींस और मालदीव से तुलना और भी अपमानजनक है। इसका मतलब यह है कि मोदी सरकार फिलिपींस की रोड्रिगो दुतेर्ते और मालदीप के यामीन अब्दुल यमीन जैसी बदनाम है। संभवतय, लोकपाल की नियुक्ति के बाद स्थिति में कुछ सुधार की उम्मीद की जा सकती है।
शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018
खालिस्तानियों के ”हमदर्द“ ट्रूडो ?
Posted on 8:14 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का सात दिवसीय भारत दौरा इन दिनों विदेशी मीडिया की सुर्खियों में छाया हुआ है। मीडिया बात चुभ रही है कि कनाडा के प्रधान मंत्री ट्रूडो भारत मैं बिन बुलाये मेहमान की तरह घूम रहे हैं । अमूमन, पश्चिम मुल्कों का मीडिया किसी विदेशी प्रधानमंत्री की भारतीय यात्रा को इतनी तवज्जो नहीं देता है, जितनी इस बार कनाडा के प्रधानमंत्री के भारतीय दीरे को दी जा रही है। विदेशी मीडिया बार-बार इस बात को उछाल रहा है कि भारत ने कनाडा के प्रधानमंत्री की अगवानी में उदासीनता दिखाई है। प्रधानमंत्री मोदी दिल्ली पहुंचने पर ट्रूडो की अगवानी करने नही गए जबकि अब तक हर विश्व नेता का मोदी ने भारत पहुंचते ही “जादू की झप्पी “ से स्वागत किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा हो या चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग अथवा इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, यहां तक कि सउदी अरब के क्राउन प्रिंस तक की अगवानी के लिए प्रधानमंत्री मोदी खुद दिल्ली एयरपोर्ट पर खडे रहे। कनाडाई प्रधानमंत्री की अगवानी के लिए मोदी ने भेजा भी तो जूनियर मंत्री को । इतना ही नहीं, आगरा में ताजमहल देखने गए प्रधानमंत्री ट्रूडो की अगवानी जिला अधिकारियों ने की। न तो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उपस्थित थे और न ही कोई मंत्री। इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के आगरा दौरे के समय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पूरे समय वहां मौजूद रहे। गुजरात के दौरे के समय भी यही हाल रहा। पंजाब के दौरे के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने प्रधानमंत्री की अमृतसर में अगवानी तो नहीं की मगर उनसे मुलाकात जरुर की और खालिस्तान के समर्थकों को कनाडा के समर्थन का मामला भी उठाया। मगर इन सब औपचारिक्ताओं से बेपरवाह कनाडा के प्रधानमंत्री ने स्वदेशी मीडिया में भी खूब सुर्खिया बटोरी। जस्टिन ट्रूडो के मीडिया सलाहकारों ने कनाडाई प्रधानमंत्री के दौरे को सुर्खियां बनाए में कोई कसर नहीं छोडी है। कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो का भारत से पुराना नाता है। वे बचपन में भी भारत आ चुके हैं। तब उनके पिता कनाडा के प्रधानमंत्री थे। ट्रूडो भारतियों के मिजाज और “मसाज“ (आवभगत) से भली-भांति वाकिफ हैं । कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री ट्रूडो सात दिवसीय यात्रा के पहले चरण में सपरिवार भारत की निजी यात्रा पर हैं। इसके समाप्त होते ही उनकी आधिकारिक यात्रा शुरु होगी और तब प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से उनकी मुलाकात भी होगी। वैसे अब तक की रिवायत यह रही है कि विश्व नेता की अधिकारिकारिक यात्रा पहले पूरी की जाती है, निजी यात्रा बाद में। ट्रूडो ने इस बार इस रिवायत को पलट दिया। बहरहाल, भारत ने कनाडा को खालिस्तानियों का हमदर्द बनने के लिए फटकार लगाई है। कनाडा में खालिस्तानियों को भारत के खिलाफ आग उगलने की खुली छूट मिली हूई है। कनाडा के भारवंशियों में सबसे ज्यादा आबादी सिखों की है और चरमपंथी सिखों को प्रधानमंत्री ट्रूडो और उनकी पार्टी का खुला समर्थन है। ट्रूडो की केबिनेट में चार सिख मंत्री हैं और इन्हें चरमपंथियों का समर्थक माना जाता है। 2015 में प्रधानंमत्री ट्रूडो ने भारत पर तंज कसते हुए कहा भी था कि उनके केबिनेट में जितने सिख ंमंत्री हैं, उतने तो भारत में भी नहीं है। पिछले साल पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन से मिलने से इसी वजह इंकार कर दिया था। कनाडाई प्रधानमंत्री के दौरे के प्रति भारत की बेरूखी को एक तरह से कनाडा को भारत की कूटनीतिक फटकार माना जा रहा है हालांकि ट्रूडो ऐसा नहीं मानते हैं। तथापि सच्चाई यही है कि खालिस्तानियों से संबंधों के कारण भारत और कनाडा के बीच तनावपूर्ण रिष्तों को सुधारने के लिए ही ट्रूडो भारत के दौरे पर आए हैं। भारत और कनाडा के बीच संबंध काफी पुराने हैं। दोनों देष लोकतांत्रिक हैं और कामनवैल्थ में साथ-साथ रहे हैं। भारत की संप्रभुता को ललकारना कनाडा के हित में नहीं है। शुक्रवार को मोदी-ट्रूडो के बीच प्रस्तावित मुलाकात से कटुता के बादल छंटने की उम्मीद है।
गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018
चीनी विस्तारवादी मंसूबे
Posted on 7:18 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चीन की सैन्य शक्ति का तेजी से आधुनिकीकरण और पाकिस्तान से दिन-ब-दिन मजबूत होती दोस्ती भारत के लिए सबसे बडा खतरा है। चीनी सेना की तकनीकी दक्षता का भी कोई मुकाबला नहीं है। चीन के पास लंबी दूरी तक मार करने वाली मिसाइलों के साथ-साथ फिफ्थ जेनेरेशन के लडाकू विमान भी हैं। अंतरराष्ट्रीय रक्षा विषेशज्ञ भी मानते हैं कि चीनी सेना को हिलाना, पहाड हिलाने जैसा है। बहरहाल, जम्मू-कश्मीर सरकार के वरिष्ठ मंत्री नईम अख्तर ने यह कहकर देश को और चिंता में डाल दिया है कि चीन का कश्मीर में दखल लगातार बढ रहा है। चीन कश्मीर में अपने पैर जमाने की फ़िराक में है और इसी मकसद से आतंकी संगठन जैश -ए- मोहम्मद को भी संरक्षण दे रहा है। अख्तर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के करीबी हैं और सरकार के प्रवक्ता भी हैं। कश्मीर समस्या को अब तक कश्मीरी अवाम और सियासतदान भारत और पाकिस्तान के बीच की समस्या के रुप में देखते रहे हैं। पहली बार किसी सीनियर कश्मीरी नेता ने चीन का नाम लिया है। नईम अख्तर के इस बयान को हालांकि पीडीपी का “नया राजनीतिक पैंतरा“ बताया जा रहा है मगर पीडीपी के वरिष्ठ नेता की बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता। वैसे कश्मीरी नेताओं को दोनों तरफ से बैंटिग करने की आदत है। नईम अख्तर की इस बात में वजन है कि हाल ही के आतंकी हमलों में बार-बार जैश -ए-मोहम्म्द का नाम आना भी यही संकेत दे रहा है। चीन आतंकी हाफिज सईद और मसूद अजहर को बचाता रहा है और उन्हें अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रयासों पर लगातार पानी फेर रहा है। इन आतंकियों से चीन का विशेष लगाव उसकी कूटनीति का हिस्सा है और ड्रेगन यह सब भारत को घेरने के लिए कर रहा है। इतना ही नहीं बीजिंग पाकिस्तान-चीन इक्नॉमिक कॉरिडर (सीपीईसी) में बाधा बने बलूची चरमपंथियों को भी मनाने में लगा हुआ है। बलूची न केवल इस इक्नॉमिक कॉरिडर का मुखर विरोध कर रहे हैं , अलबता पाकिस्तान से आजादी के लिए भी लड रहे हैं। हाल ही में बलूचिस्तान में चीनी नागरिकों पर खूनी हमले बढे हैं और इससे चीन काफी चिंतित है। 3000 किलोमीटर लंबे इक्नॉमिक कॉरिडर के तहत सडक, रेल, पाइपलाइन और ऑफ्टिक्ल केबल फाइबर नेटवर्क के जरिए चीन को पाकिस्तान से जोडने का लक्ष्य है। चीन ने अब तक पाकिस्तान में 300 से ज्यादा प्रोजेक्टस में निवेश किया है। इस कॉरिडर का भारत मुखर विरोध कर रहा है। सीपीईसी पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजर रहा है। इससे कश्मीर में चीनी दखल बढने की आशंका है। चीन की अब तक संप्रभु राष्ट्रों के आतरिक मामलों में दखल नहीं देने की नीति रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से चीन के विस्तारबादी मंसूबे पंख लगाकर उड रहे हैं। पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में चीन के दखल से भारत का चिंतित होना स्वभाविक है। पाकिस्तान के अलावा चीन नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव और बांग्लादेश की भी खुले हाथ से आर्थिक मदद दे रहा है। 2015 में आर्थिक नाकेबंदी से खफा नेपाल चीन की षरण में जा चुका है। म्यांमार पहले ही चीन के ज्यादा करीब है। श्रीलंका में चीनी अब बंदरगाह से लेकर पब और माल्स हर जगह काम करते नजर आते हैं। 2005 से 2017 तक चीन ने श्री लंका में 15 अरब डॉलर का निवेश कर चुका है। भारत अभी भी श्री लंका से “ सांस्कृतिक-ऐतिहासिक“ संबंधों की दुहाई दे रहा है। बांग्ला देश भी चीन के करीब जा रहा है और बांग्ला प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इस मामले में मंगलवार को भारत को आंखें भी दिखाई हैं। हसीना ने कहा है कि भारत को चीन से बांग्ला देश के संबंधों पर चिंता करने की जरुरत नहीं है। चीन ने भारत को चौतरफा घेर लिया है । कश्मीर में चीन का दखल बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।
बुधवार, 21 फ़रवरी 2018
विवादों का भंवर और आप
Posted on 6:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आम आदमी पार्टौ और विवादों का चोली-दामन का साथ है। अपने पांच साल के अस्तित्व में आम आदमी पार्टी ने समकालीन राजनीति में इतने प्रयोग नहीं किए हैं, जितना वह विवादों में उलझी रही है । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर दिल्ली के उप-राज्यपाल और अब मुख्य सचिव से उलझना तो जैसे आप का टॉप एजेंडा हैं। और इसे यूं भी कहा जा सकता है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार की बाहें मरोडना केन्द्र में सत्तारुढ भाजपा सरकार का फेवरेट पास्टटाइम है। विवाद भाजपा ने पैदा किया या कांग्रेस ने, मगर अंततोगत्वा, नुकसान अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का ही हुआ है। मंगलवार को दिल्ली के मुख्य सचिव ने अपनी ही पार्टी की सरकार पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की उपस्थिति में पिटाई का आरोप लगाया। मुख्य सचिव अंशु प्रकाश का आरोप है कि मुख्यमंत्री के निवास पर बुलाई गई बैठक में आप विधायक अमानातुल्लाह ने उन्हें कॉलर से पकड कर पीटा। मुख्य सचिव का यह भी आरोप है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। आप विधायकों की अफसरों से बदसलूकी लंबे समय से चल रही है। वैसे अमानातुल्लाह पहले भी विवादों में रह चुके हैं। उधर, आम आदमी पार्टी का आरोप है कि मुख्य सचिव यह सब भाजपा के इशारे पर कर रहे हैं। आप नेता दिल्ली पांडेय ने आने पोस्ट में आरोप लगाया है कि अढाई लाख लोगों को पिछले माह राशन नहीं मिलने पर बैठक में स्पष्टीकरण मांगा गया था। मुख्य सचिव ने इस पर यह कहकर जवाब देने से इंकार कर दिया कि वे केवल उप-राज्यपाल के प्रति जवाबदेह हैं। पोस्ट में यह भी आरोप लगाया है कि मुख्य सचिव ने न केवल विधायकों के खिलाफ अपशब्द कहे, अलबत्ता बगैर जवाब दिए बैठक से निकल गए। आप विधायक सौरभ भारद्धाज ने मीडिया से बातचीत में आरोप लगाया कि “दिल्ली में राशन व्यवस्था बर्बाद करने की सुपारी किसने ली है तो यह क्यों न मान लिया जाए कि वो अपने आप को बचाने के लिए झूठा नाटक कर रहे हैं। कौन सच्चा है और कौन झूठा, यह तो कोर्ट ही तय करेगा“। बहरहाल, दिल्ली सरकार के कर्मचारी और आईएएस एसोसिएशन ने इस मामले में मुख्य सचिव का साथ देते हुए हडताल पर जाने की धमकी दी है। दिल्ली एडमिनिस्ट्रेटिव सब-ऑडिनेट सर्विसेज एसोसिएशन (दास) ने तो ताजा मामले को संवैधानिक संकट जैसा बताया है। कर्मचारियों की एकता भी यही संदेश दे रही है कि दिल्ली की आप सरकार लगातार अपनी क्रेडिब्लिटी खोती जा रही है। मुश्किलों के एक के बाद दूसरे भंवर में फंस कर आम आदमी पार्टी का बंटाधार होने से रहा। विवादों में उलझ कर आम आदमी पार्टी स्वंय विरोधी दलों की मदद कर रही है। देश की सियासत में कुछ अलग करने के जज्बे से जन्मी आम आदमी पार्टी उत्साही युवाओं को उनकी मंजिल तक ले जाने में बुरी तरह से विफल रही है। आम आदमी पार्टी भ्रष्ट व्यवस्था, घिसी-पिटी सियासत और दागी नेताओं से ऊब चुके लोगों की उम्मीद की किरण थी मगर तीन साल के कार्यकाल में आप ने जनता को भारी निराश किया है। पांच साल से भी कम समय में अरविंद केजरीवाल के आंदोलनकारी सहयोगी, प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव उनका साथ छोड गए हैं। कुमार विश्वास बागी हो गए हैं। जब कभी आप मजबूत होती नजर आती है, पार्टी विवादों में उलझ जाती है। निसंदेह, दिल्ली सरकार की उपलब्धियों को भी नकारा नहीं जा सकता। दिल्ली में स्वास्थय सेवाएं पहले से कहीं बेहतर हैं। सरकार की “मोहल्ला क्लीनिक“ योजना और शिक्षा सुधार योजना के सकारात्मक परिणाम निकले हैं। मुफ्त बिजली-पानी ने भी आम आदमी को लुभाया है। पार्टी ने पिछले एक साल से बयानबाजी छोडकर काम करने पर ज्यादा ध्यान दिया है मगर ताजा विवाद से पार्टी को नुकसान हो सकता है।
मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018
कावेरी जल बंटवारा
Posted on 7:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से जूझ रही दुनिया में अगला महायुद्ध जल को लेकर हो सकता है, पर्यावरणविद इस बात पर सहमत है। 2025 तक दुनिया की 4 से 5 अरब आबादी को पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसना पडेगा। नासा सैटेलाइट से उपलब्ध तस्वीरों से साफ पता चलता है कि विश्व के एक-तिहाई से भी ज्यादा भूगर्भीय जल स्त्रोत (एक्वीफर) सूख चूके हैं और बाकी भी सूखने की कगार पर हैं। बचे-खुचे जल स्त्रोतों के लिए राज्यों और लोगों मे मारी-मारी होना तय है। भारत में तो इस तरह का परिदृश्य पहले से ही चल रहा है। नदियों के जल बंटवारे को लेकर विभिन्न राज्यों में घमासान जारी है। रावी-ब्यास जल बंटवारे पर पंजाब, हरियाणा अरसे से एक-दूसरे के खिलाफ लामबंद हैं। दक्षिण भारत के दो राज्यों तमिल नाडु और कर्नाटक (तत्कालीन मद्रास प्रेसिडेंसी और मैसूर राज्य) में कावेरी जल विवाद 19वीं शताब्दी से चला हुआ है। कालान्तर में केरल और पुडुचेरी भी इस विवाद में शामिल हो गए। 1976 में चारों राज्यों के बीच कावेरी नदी के जल बंटवारे पर समझौता भी हुआ था मगर इसका पालन नहीं किया गया। कोई भी राज्य अपने हिस्से का एक बूंद पानी भी छोडने को तैयार नहीं है। गत शुक्रवार को स्ुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को बिलगुंडलू डैम से तमिल नाडु को 177.25 टीएमसी (थॉउजेंड मिलियन क्यूबिक) फीट पानी छोडने का आदेश दिया । 2007 में कावेरी पंचाट ने तमिल नाडु को 192 टीएमसी पानी दिया था। इस अवार्ड को तमिल नाडु, केरल और कर्नाटक तीनों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। तमिल नाडु के हिस्से में 14.75 टीएमसी की कटौती को डीएमके समेत राज्य के राजनीतिक दलों ने ताजा फैसले को लोगों से “धोखा“ करार दिया है, मगर किसान संगठन फैसले से संतुश्ट हैं। तमिल नाडु कावेरी डेल्टा फॉरमर्स वेल्फेयर ऐसोसिएषन की प्रतिक्रिया है कि राज्य के हिस्से में की गई कटौती को बेहतर जल प्रबंधन से पूरा किया जा सकता है। केरल और पुडुचेरी के हिस्से में चूंकि कोई कटौती नहीं की गई है, लिहाजा दोनों राज्य ताजा फैसले से संतुश्ट हैं। सुप्रीम कोर्ट ने ताजा फैसले में कावेरी रिवर वाटर मेनेजमेंट बोर्ड गठित करने के भी आदेष दिए हैं। इससे जल प्रबंधन और बेहतर हो सकते है। कोर्ट ने ताजा फैसले के खिलाफ अपील करने की संभावना को बंद कर दिया है। इस व्यवस्था के कारण संबंधित राज्यों को फैसला अविलंब लागू करने के सिवा कोई चारा नहीं रह गया है। 800 किलोमीटर लंबी कावेरी नदी कर्नाटक, तमिल नाडु और केरल राज्य से बहते हुए समुद्र में मिलने से पहले पुडुचेरी के कराइकल से भी गुजरती है। कावेरी नदी में चार राज्यों के नदी-नालों से भी पानी डाला जाता है। लगभग 740 टीएमसी पानी इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है। कर्नाटक से कावेरी में 462 टीएमसी पानी डाला जाता है मगर इसे 270 टीएमसी पानी ही मिलता है। तमिल नाडु 227 टीएमसी पानी डालता है मगर राज्य को 419 टीएमसी पानी के इस्तेमाल की अनुमति है। कर्नाटक को सबसे ज्यादा इसी बात का गिला है। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले से कर्नाटक को कुछ राहत मिली है। बहरहाल, कावेरी जल विवाद के निपटान से हरियाणा सरकार की उम्मीदें जगी है। 34 साल से भी ज्यादा समय से रावी-ब्यास के जल बंटवारे का मामला लटका हुआ है। तीन बार सुप्रीम कोर्ट के फैसले भी आ चुके हैं मगर हरियाणा को आज तक न्याय नही मिला है। न्याय मिलना तो दूर रहा, रावी-ब्यास का पानी लाने के लिए प्रस्तावित नहर पर भी पंजाब में मिट्टी डाल दी गई है। नवंबर, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा के पक्ष में फैसला दिया था। इस पर भी अमल नहीं हो पाया है। मोदी सरकार जल विवादों के लिए स्थाई पंचाट स्थापित करने पर विचार कर रही है। षायद, इससे हरियाणा को न्याय मिले मगर पंजाब के लोग एक भी बूद देने को तैयार नहीं है। इस स्थिति में पंचाट भी क्या कर सकता है।
“लूट सके तो लूट“
Posted on 7:12 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सरकारी बैंकों को लूटने का सिलसिला बदस्तूर जारी है। पंजाब नेशनल बैंक को 11,500 करोड रु का चूना लगाने वाले ज्वैलरी व्यापारी नीरव मोदी के मामले की आग अभी ठंडी भी नहीं पडी थी कि सरकारी बैकों के लगभग 3700 करोड रु न लौटाने का एक और मामला सामने आया है। ताजा मामले में रोटोमैक पेन निर्माता कंपनी के मालिक बिक्रम कोठारी के खिलाफ सात सरकारी बैंकों का 3700 करोड रु दबाने के लिए सीबीआई ने एफआईआर दर्ज की है। सोमवार को सीबीआई ने कानपुर में बिक्रम कोठारीज़ उनकी पत्नी और पुत्र से पूछताछ भी की। बिक्रम कोठारी के खिलाफ बैंक ऑफ बडौदा (बीओबी) ने धोखाधडी की शिकायत की है। सीबीआई ने इसी शिकायत के बाद यह कार्रवाई की। बैंक आफ बडौडा के साथ-साथ बिक्रम कोठारी ने बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद बैंक, बैंक ऑफ महाराश्ट्र, इंडियन औवरसीज बैंक और ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स के 3695 करोड रु दबा रखे हैं। फरवरी, 2017 में बिक्रम कोठारी को विलफुल डिफाल्टर घोषित किया गया था। इस पर बिक्रम कोठारी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और उन्हें राहत भी मिल गई मगर बैंकों का पैसा नहीं लौटाया। इसके बाद बैंकों ने अपना पैसा वसूलने के लिए उनकी संपत्ति कुर्क की मगर सात बैंको का अभी भी लगभग 3700 करोड रु बकाया है। बिक्रम कोठारी मशहूर ”पान पराग“ बनाने वाले घराने से है। 1973 में मनसुख भाई कोठारी ने अपने दो पुत्र बिक्रम और दीपक के साथ पान पराग के नाम से पान मसाला बनाना शुरु किया था और यह जल्द ही हाथों-हाथ बिकने भी लगा। पान पराग की लोकप्रियता का इस बात से ही अनुमान लगाया जा सकता है कि अस्सी के दशक में अग्रणी बालीवुड अभिनेता अशोक कुमार और शम्मी कपूर पान पराग के विज्ञापन में नजर आते थे। तब “बारातियों का स्वागत पान पराग से करें“ खासा लोकप्रिय हुआ था। मगर पान मसाले के कारण मुख के कैंसर के बढते मामले सामने आने से इसकी खपत एकदम घट गई। 1992 में बिक्रम कोठारी ने पान पराग से अलग होने के बाद रोटोमैेक नाम से पेन बनाने का कारखाना खोला। नब्बे के दशक में मशहूर अभिनेत्री रवीना टंडन ने रोटोमैक के विज्ञापन में नजर आती थी। बहरहाल, बिक्रम कोठारी के मामले में गनीमत यह है कि वे अभी भी देश में ही है हालांकि पहले खबर आई थी कि वे भी विदेश भाग गए हैं। ताजा मामले से यह कडवी सच्चाई फिर उजागर हुई है कि सराकारी बैकों की कार्यशैली में भारी खामियां हैं और भ्रष्टाचार ने सारी हदें पार ली हैं। पंजाब नेशनल बैंक में घूसखोर के कारण ही इतना बडा घोटाला हुआ है। इससे पहले सरकारी बैंक आईडीआईबी ने नियमों को दर किनार कर शराब कारोबारी विजय माल्या को भरी -भरकम कर्जा दिया था। जाहिर है यह इस मामले में संबंधित अधिकारियों की मुठ्ठी गर्म की गई थी। राजनीतिक हस्तक्षेप और घूसखोरी ने सरकारौ बैकों की लुटिया डूबो कर रख दी है। पीएनबी मामले में न तो इंटरनल ऑडिट, न ही सतर्कता अधिकारी और न ही आरबीआई की इंस्पेक्शन टीम लंबे समय से जारी फर्जीवाडे को डेटेक्ट कर पाई। सरकारी बैंकों की तुलना में निजी बैंको का निगरानी और जांच पडताल सिस्टम कहीं ज्यादा फुलप्रूफ है। सरकार को रिकैपटिलाइजेषन की बजाय सरकारी बैंको में अऔर ज्यादा निजी हिस्सेदारी बढानी चाहिए। आंकडे इस बात के गवाह है कि सतर के दशक में बेंकों के निजीकरण के बाद इनमें फर्जीवाडे के मामलों में अप्रत्याशित इजाफा हुआ है। मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम भी मानते हैं कि सरकारी बैकों में निगरानी, जांच पडताल और सख्त रेगुलेशन की कमी के कारण ही फर्जीवाडी के मामले बढ रहे हैं। सरकारी बैकों को बचाना है तो इनमें भी निजी हिस्सेदारी बढानी होगी।
शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018
देश को लुटो और विदेश भाग जाओ
Posted on 7:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत में इन दिनों " देश को लुटो और विदेश भाग जाओ " का खेल चल रहा है । पहले ललित मोदी, फिर विजय माल्या और अब नीरव मोदी । देश को लुटने वाले आराम से विदेश भाग जाते हैं और सरकार और कानून हाथ मलते रह जाते हैं । पंजाब नेशनल बैंक में 11,500 करोड रु का घोटाला इसी लूट की ताजा कड़ी है। देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक को सरकार की नाक के नीचे लूटा गया मगर किसी को कानों-कान भनक तक नहीं लगी। 2011 से यह घोटाला चल रहा था। बैकों में बाकायदा चैक एंड बैलेंस सिस्टम होता है। ताजा घोटाले ने इस सिस्टम की भी कलई खोल दी है। इस घोटाले का न तो बैंक के इंटरनल ऑडिट को पता चला और न ही रिजर्व बैक की इंस्पेक्शन टीम को। बैंक में सात साल से घोटाला चलता रहे, मगर अधिकारियों की पकड में नहीं आए, इस पर कौन विश्वास करेगा। इस तरह की घोर लापरवाही से ग्राहकों को तो यही लगेगा कि “ बहती गंगा में सब हाथ धो रहे थे“। घोटाला पकड में भी आया तो बैक के एक कर्मचारी के रिटायरमेंट होने पर। अगर यह कर्मचारी रिटायर नहीं होता और उसकी जगह दूसरा कर्मचारी नहीं आता, तो घोटाला पकड में नहीं आता। घोटाले पंजाब नेशनल बैंक तक ही सीमित नहीं था। कुछ और बैंक भी इसमें भागीदार हैं। घोटाले को लैटर ऑफ अंडरटेकिंग (एलओयू) के जरिए अंजाम दिया गया। बैकों में एलओयू एक ऐसी व्यवस्था है जिसके तहत एक बैंक की गारंटी पर दूसरे बैंक अकांउटहोल्डर को क्रेडिट देते हैं। अकांउटहोल्डर के समय पर पैसा नहीं लौटाने की स्थिति में एलओयू जारी करने वाले बैंक को पैसा चुकाना पडता है। पंजाब नेशनल बैंक की मुंबई स्थित ब्रीच कैंडी शाखा में यह घोटाला हुआ है। बुधवार को बैंक ने खुद इसका खुलासा किया। बैंक के अनुसार चुनिंदा लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए खाताधारकों और कर्मचारियों की मिलीभगत से पीएनबी को 11,500 करोड रु का चूना लगाया गया। बैंक ने हालांकि धोखाधडी करने वाले लोगों के नाम का खुलासा नहीं किया है मगर इस घोटाले में गुजरात के बडे हीरा व्यापारी नीरव मोदी का नाम सामने आया है। पीएनबी की शिकायत पर पुलिस ने वीरवार को नीरव मोदी के ठिकानों पर छापेमारी भी की। मोदी के खिलाफ सीबीआई पहले ही 280 करोड रु की चपत लगाने की जांच की जा रही है। बैक ने नीरव मोदी, उनके परिजनो और मेहल चीनू भाई चौकसी पर अधिकारियों के साथ साजिश रचने के आरोप लगाए हैं। यह बात भी सामने आई है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पिछले साल जुलाई में ही इस घोटाले की जानकारी दे दी गई थी। नीरव मोदी को हाल ही में दावोस में प्रधानमंत्री के साथ भी देखा गया था। पहली जनवरी को मोदी विदेश भाग गया । बहरहाल, कांग्रेस को 2जी स्पेक्ट्रम, कोयला और कॉमनवैल्थ गेम्स घोटाले के लिए गला फाड-फाड कर कोसने वाली भाजपा और मोदी सरकार पीएनबी में सबसे बडे बैंकिग घोटाले से बैकफुट पर आ गई है। पंजाब नेशनल बैंक के एमडी सुनील मेहता का यह स्पष्टीकरण काबिलेगौर और दिलचस्प है कि बैंक अधिकारियों ने तो 2011 में ही इस घोटाले को पकड लिया था और संबंधित एजेंसियों को इसकी जानकारी भी दी गई थी। जाहिर है यह कहकर मेहता घोटाले का ठीकरा औरों के सिर पर फोड रहे है अगर बैंक अधिकारियों को 2011 में इस घोटाले का पता चल गया था, तो यह सात साल कैसे चलता रहा? इस बात पर कौन विश्वास करेगा। सच यह है कि ताजा घोटाला बैंकों में व्याप्त बेलगाम भ्रष्टाचार का नतीजा है। कर्जा देने के लिए बैंकों में बाकायदा हिस्सेदारी मागी जाती है और सारा काम “ दलालों“ के माध्यम से किया जाता है। यही कारण है कि बैंकों के बैड लोन 11 लाख करोड रु तक पहुंच गए हैं। देश के बैंको की लूट-खसोट को अविलंब रोकना होगा। सरकार ने अगर जल्द कारगर और सख्त कदम नहीं उठाए, तो वह दिन दूर नहीं अधिकतर सरकारी बैंक दिवालिया होने की कगार पर पहुंव जाएंगे।
गुरुवार, 15 फ़रवरी 2018
टीम इंडिया का जलवा
Posted on 6:46 pm by mnfaindia.blogspot.com/
विराट कोहली की कप्तानी में टीम इंदिया ने इतिहास रचा है। पहली बार भारतीय टीम ने दक्षिण अफ्रीका को उसी की जमीन पर हराया है। आज तक कोई भी भारतीय टीम यह करिश्मा कर पाई थी। मंगलवार को पोर्ट एलिजाबेथ में भारतीय फिरक्की गेंदबाज युजवेन्द्र चहल की गेंद पर दक्षिण अफ्रीका के अंतिम पुच्छले बल्लेबाज मॉर्न मोर्कल के आउट होते ही भारत ने पांचवा एक दिवसीय मैच 73 रनों से जीत कर 6 मैचों की सीरीज 4-1 से अपने नाम कर ली। इस सीरीज जीत के साथ ही टेस्ट और एक दिवसीय क्रिकेट दोनों में भारत का ही जलवा हो गया है। टेस्ट में तो पहले ही भारत दुनिया की नंबर एक टीम है मगर अब वह एक दिवसीय क्रिकेट में भी दक्षिण अफ्रीका को पछाडकर नंबर वन बन गई है। भारत ने दक्षिण अफ्रीका के सामने जीत के लिए 275 रनों का लक्ष्य रखा था मगर मेजबान टीम 201 के स्कोर पर ही आउट हो गई। इस जीत में भारत के सलामी बल्लेबाज रोहित शर्मा और गेंदबाज युजवेन्द्र चहल, कुलदीप यादव और हार्दिक पंडया का बडा योगदान रहा है। चार मैच में लगातार फ्लॉप रहने के बाद आखिरकार हिटमैन रोहित शर्मा फॉर्मे में आ ही गए और 115 रनों की पारी खेलकर “मैन ऑफ दी मैच“ भी बने। पडंया ने कसी हुई गेंदबाजी करते हुए दो विकेट झटके। इस जीत से भारत ने पोर्ट एलिजाबेथ में लगातार हारने का क्रम भी तोडा है। पांचवे एक दिवसीय मैच से पहले भारत ने आज तक पोर्ट एलिजाबेथ में पांच मैच खेले थे और पांचों ही हारे थे। यहां तक कि 2001 में पोर्ट एलिजाबेथ के सेंट जॉर्ज पार्क में भारत केन्या से भी हार गया था। मंगलवार को पोर्ट एलिजाबेथ के मैदान कें मैच जीतकर विराट कोहली की टीम ने भारत को इस “कलंक“ से भी निजात दिलाई है। दक्षिण अफ्रीका के साथ खेली जा रही मौजूदा 6-मैचो की एक दिवसीय सीरीज कई मायनों में भारत के लिए सुखद रही है। अब तक यह माना जाता था कि विदेशों की तेज गेंदबाजों को मदद करने वाली पिचों पर फिरक्की गेंदबाजों का जलवा नहीं चलता है मगर इस बार एक दिवसीय मैचों में फिरक्की गेंदबाजों का दबदबा सिर चढ कर बोला है। भारतीय फिरक्की गेंदबाजों ने पांच एक दिवसीय मैचों में कुल मिलाकर 29 विकेट झटके हैं। कुलदीप यादव ने 16 तो युजवेन्द्र चहल ने 13 विकेट लेकर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। दोनों भारतीय फिरक्की गेंदबाजों ने मंगलवार को विदेशी फिरक्की गेंदबाज द्वारा सबसे अधिक विकेट लेने का रिकॉर्ड भी तोडा है। इससे पहले 1998-99 में दक्षिण अफ्रीका में 7-मैचों की एक दिवसीय सीरीज के दौरान वेस्ट इंडीज के हरफनमौला स्पिनर कीथ ऑथरटन ने 12 विकेट लेकर रिकार्ड बनाया था। 1993-94 की दक्षिण अफ्रीका- आस्ट्रेलिया की 8 ,मेंचों की एक दिवसीय श्रृंखला में शेन वार्न ने 11 विकेट और 1996-97 की 6-मैचों की एक दिवसीय श्रृंखला में 10 विकेट लिए थे। लेकिन पांच एक दिवसीय मैचों में फिरक्की गेॅदबाजों का 29 विकेट का रिकार्ड अभूतपूर्व है। इसी स्थिति को सामने रखते हुए दक्षिण अफ्रीका ने पांचवे एक दिवसीय मैच में स्पिनर तबरेज शम्सी को खिलाया। शम्सी को विकेट तो नहीं मिली मगर उन्होंने किफायती गेंदबाजी की। इस सीरीज ने भारत की कमजोर फील्डिंग को फिर उजागर किया है़। कहते हैं“ कैचिच विन दी मैचिच“ और अगर बडे बल्लेबाजों के कैच छूट जाएं, तो हार पक्की हो जाती है। जोहन्सबर्ग में खेले गए चौथे मैच में दक्षिण अफ्रीकी बल्लेबाज मिलर का दो बार कैच छूटना भारत के लिए महंगा साबित हुआ। मिलर ने भारत के जबडे से मैच छीन लिया। दक्षिण अफ्रीका के कप्तान एडन मार्क्राम ने चौथे और पांचवे में दो लगभग नामुमकिन कैच लपक कर अदभुत फील्डिंग का नमूना पेश किया। 18 फरवरी से दक्षिण अफ्रीका के साथ तीन टी-20 सीरीज शुरु होनी है। टी-20 में तो कैच छोडने का मतलब हार को न्यौता देना है। भारत को अगर टी-20 का बादशाह बनना है, तो एडन मार्क्राम जैसे कैच लपकने होंगे।
बुधवार, 14 फ़रवरी 2018
सजायाफ्ताओं की नेतागिरी
Posted on 8:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सजायाफ्ता नेताओं को अगर मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी का नेतृत्व करने, पार्टी टिकट बांटने और यह तय करने कि किसे मंत्री बनाया जाए की कानूनन छूट हो तो मान लेना चाहिए कि देश की सियासत बुरे दिन से गुजर रही है। और क्या यह लोकतंत्र का मजाक नहीं है? सोमवार को मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाले तीन सदस्यीय बेंच ने सजायाफ्ता नेताओं को ताउम्र चुनाव लडने से प्रतिबंधित करने संबंधी याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि जब सजा याफ्ता नेता खुद चुनाव नहीं लड सकता, फिर वह पार्टी का मुखिया कैसे रह सकता है और उसे प्रत्याशियों को चुनने का अधिकार कैसे दिया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट में सजा याफ्ता नेताओं को आजीवन चुनाव लडने से प्रतिबंधित करने के लिए जनहित याचिका दायर की गई है। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए सुपीम कोर्ट ने केन्द्र से इस मामले में अपना स्टैंड स्पष्ट करने के लिए कहा है। यह याचिका भाजपा के नेता द्वारा दायर की गई है और इसमें कहा गया है कि कानून में स्पष्ट प्रावधान नहीं होने के कारण कई सजायाफ्ता नेता सियासत और सत्ता का सुख भोग रहे हैं। इस मामले की अगली सुनवाई 26 मार्च को होगी। इस याचिका के जवाब में निर्वाचन आयोग का कथन है कि उसके पास ऐसी कोई पॉवर नहीं जिससे सजायाफ्ता नेताओं को पार्टी पद संभालने से रोका जा सके। इस मामले में आयोग ने सजायाफ्ता नेताओं को पार्टी पद देने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रदद करने का अधिकार मांगा है। कानून में व्याप्त खामियों की वजह से सजायाफ्ता नेता राजनीतिक दल बनाकर अपने समर्थको से चुनाव लडाकर सता में काबिज हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट अगर सजायाफ्ता नेताओं को पार्टी पद ग्रहण करने से प्रतिबंधित कर देता है, तो इसका सीधा असर हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री इनेलो नेता ओम प्रकाश चौटाला और राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव पर पडेगा। दोनों नेता सजायाफ्ता हैं और इस समय जेल में बंद हैं। लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोपरि होता है, अक्सर सजायाफ्ता नेता जनादेश की बात कहकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। मगर जनादेश भी कानून के दायरे को लांघ नहीं सकता। देश में गाहे-बगाहे चुनाव सुधारों की चर्चा होती रही है मगर क्रांतिकारी चुनाव सुधार आज तक नहीं लाए जा सके हैं। इसके विपरीत सरकार ऐसे कानून बनाती है, जिससे सजायाफ्तता अथवा जेल में बंद नेताओं की मदद हो सके। 2013 में संप्रग सरकार ने जन प्रतिनितिधि (पीआर) एक्ट 1951 में संशोधन करके जेल में बंद नेताओं को राहत प्रदान की थी। तब सरकार का कथन था कि अक्सर किसी नेता को चुनाव लडने से रोकने के लिए उस पर झूठा आपराधिक मामला दर्ज करवाकर चुनाव लडने से रोका जाता है। सरकार ने पीआर एक्ट में इस बात का प्रावधान किया कि जेल में बंद व्यक्ति भले ही मतदान नही कर पाए, पर अगर मतदाता सूची में उसका नाम दर्ज है, तो वह जेल से भी चुनाव लड सकता है। इससे पहले 2013 में ही सुप्रीम कोर्ट ने जेल में बंद अथवा पुलिस हिरासत में रखे गए नेताओं के विधान सभा चुनाव लडने से रोक लगा थी। शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी थी कि जेल अथवा पुलिस हिरासत में बंद व्यक्ति मतदान नहीं कर सकता और क्योंकि वह वोट नहीं डाल सकता, इसलिए वह चुनाव नहीं लड सकता। विधानसभा चुनाव लडने के लिए वोटर लिस्ट में नाम होना अनिवार्य है। इस फेसले की काट के लिए यह संशोधन किया गया था। देश के लिए यह र्म की बात है कि लोकतंत्र को सशक्त करने वाले चुनाव सुधारों के लिए भी न्यायपालिका को ही पहल करनी पड रही है। विपक्ष में रहते हुए भाजपा चुनाव सुधारों को लेकर बडी-बडी बातें करती थी मगर चार साल बीत जाने पर भी इस मामले में कुछ विशेष नहीं हो पाया है। सजायाफ्ता नेताओं को सियासत से बाहर रखना लोकतंत्र की मजबूती के लिए नितांत जरुरी है।
मंगलवार, 13 फ़रवरी 2018
White Mantle Dons Dhauladhar Peaks
Posted on 8:57 pm by mnfaindia.blogspot.com/
Its too charming to see white mantle on Dhauladhar peaks. After a long wait Dhauladhar peaks, finally, had fresh snowfall on Sunday and Monday. Otherwise, Dhauladhar ranges have remained without snow this December-January and till mid-Feb. Any bout of snowfall is never too heavy for hills . Heaviest the snow, more water flows down the hills. Most of the rivers and rivulets in Himachal are snow fed and so are the power generation.
Dhauladhar ranges lie almost entirely in Himachal Pradesh. They are distinctive in their typical rocky formations with a remarkably steep rise culminating in sharp streaks of snow and ice at the top of their crested peaks. The ranges are best seen from the Kangra Valley from where they shoot up almost vertically. The Dhauladhars also have a peculiar topography. Supporting an vertical incline, ascending from any side is a difficult,
Though high mountains don't even grow a single blade of grass , yet Dhauladhar ranges regulate the local ecosystem. There is hardly any habitation on the ranges . However, meadows abound near the crest provide rich pastures for grazing where large numbers of Gaddi shepherds take their flocks. Grazing by livestocks prevents regeneration of vegetation. The dependence of foothills people on forests for fuel and fodder have since long created ecological imbalances.
To address all such problems, an integrated farm-forestry project was executed in eighties in technical collaboration with Germany. The project was meant for economically uplifting the people living in foothills of Dhauladhar ranges in Palampur of Kangra district. The target groups were to be helped to switch over to integrated farming as to reduce their dependence on forests for fuel , fodder and other needs.
The project also aimed at preventing the the loss of fertility from grazing, encouraging stall feeding and promoting integrated farming. The livestock's grazing destroys the fertility of the soil as ferociously as top soil of the denuded land is washed down the stream. There are much more adverse affects of the deforestation.
Germans were great fans of flora and fauna of Dhauladhar ranges and loved its majestic landscape. The all season snow capped hills fascinated them and they would often go out to scale high peaks, do para-gliding and carry other adventure sport activities. They were more hard working, disciplined and well informed. They did the homework assiduously, collected all relevant data and info required to kickstart the project. Even , govt departments didn't had such information.
Their smartness with info had placed them above us. They were really concerned with fragile ecology of the Dhauladhar ranges . However, we for that matter most of us working in such projects, were more interested in visiting Germany. Anyway, I had then detested the 'superiority' or call it our poor habit". There was a special washroom for them at the office and it used to locked to ensure we didn't have access to this. This mindset was similar to Colonial rule wherein Indians and dogs were banned from entering clubs and hgh places reserved for "Lat Saheb". All through my stint in the project, I remained uncomfortable with this "discrimination as the the basic philosophy of the project working was "No superior among equals". But in indian bureaucratic hierarchy, its better said than dine.
Honestly speaking, most of us are still not used to better 'hygienic habits". The dirty public toilet filled with filthy wall writings and Gutka spits here and there, even uncleaned stinking toilet and bathrooms and dirty undermount sinks speak for our poor hygienic habits. After I left the project, I had the chance to meet German leader of the project. He was totally dejected with the unnecessary interference of local leaders including ministers. Later, I came to know, he sought repatriation and went somewhere else. I had most enjoyed my posting there as I learnt a lot from Germans. They were straight forward in approach , honest to work and duty- target bound.
Five decades later. I was really pained to see almost naked Dhauladhar ranges even in winter. This is in sharp contrast to fully snow-capped hills even in summer during seventies and eighties. This time winter rain has seen lowest, while there were enough in Summer. Germans had envisioned this scenario in eighties and warned its serious repercussions. Alas! our political leaders turn their backs from realities. We must remember, mountains hit back when disturbed , they cry when hurt and they smile if looked after.
-Chander Sharma
Dhauladhar ranges lie almost entirely in Himachal Pradesh. They are distinctive in their typical rocky formations with a remarkably steep rise culminating in sharp streaks of snow and ice at the top of their crested peaks. The ranges are best seen from the Kangra Valley from where they shoot up almost vertically. The Dhauladhars also have a peculiar topography. Supporting an vertical incline, ascending from any side is a difficult,
Though high mountains don't even grow a single blade of grass , yet Dhauladhar ranges regulate the local ecosystem. There is hardly any habitation on the ranges . However, meadows abound near the crest provide rich pastures for grazing where large numbers of Gaddi shepherds take their flocks. Grazing by livestocks prevents regeneration of vegetation. The dependence of foothills people on forests for fuel and fodder have since long created ecological imbalances.
To address all such problems, an integrated farm-forestry project was executed in eighties in technical collaboration with Germany. The project was meant for economically uplifting the people living in foothills of Dhauladhar ranges in Palampur of Kangra district. The target groups were to be helped to switch over to integrated farming as to reduce their dependence on forests for fuel , fodder and other needs.
The project also aimed at preventing the the loss of fertility from grazing, encouraging stall feeding and promoting integrated farming. The livestock's grazing destroys the fertility of the soil as ferociously as top soil of the denuded land is washed down the stream. There are much more adverse affects of the deforestation.
Germans were great fans of flora and fauna of Dhauladhar ranges and loved its majestic landscape. The all season snow capped hills fascinated them and they would often go out to scale high peaks, do para-gliding and carry other adventure sport activities. They were more hard working, disciplined and well informed. They did the homework assiduously, collected all relevant data and info required to kickstart the project. Even , govt departments didn't had such information.
Their smartness with info had placed them above us. They were really concerned with fragile ecology of the Dhauladhar ranges . However, we for that matter most of us working in such projects, were more interested in visiting Germany. Anyway, I had then detested the 'superiority' or call it our poor habit". There was a special washroom for them at the office and it used to locked to ensure we didn't have access to this. This mindset was similar to Colonial rule wherein Indians and dogs were banned from entering clubs and hgh places reserved for "Lat Saheb". All through my stint in the project, I remained uncomfortable with this "discrimination as the the basic philosophy of the project working was "No superior among equals". But in indian bureaucratic hierarchy, its better said than dine.
Honestly speaking, most of us are still not used to better 'hygienic habits". The dirty public toilet filled with filthy wall writings and Gutka spits here and there, even uncleaned stinking toilet and bathrooms and dirty undermount sinks speak for our poor hygienic habits. After I left the project, I had the chance to meet German leader of the project. He was totally dejected with the unnecessary interference of local leaders including ministers. Later, I came to know, he sought repatriation and went somewhere else. I had most enjoyed my posting there as I learnt a lot from Germans. They were straight forward in approach , honest to work and duty- target bound.
Five decades later. I was really pained to see almost naked Dhauladhar ranges even in winter. This is in sharp contrast to fully snow-capped hills even in summer during seventies and eighties. This time winter rain has seen lowest, while there were enough in Summer. Germans had envisioned this scenario in eighties and warned its serious repercussions. Alas! our political leaders turn their backs from realities. We must remember, mountains hit back when disturbed , they cry when hurt and they smile if looked after.
-Chander Sharma
आरएसस की “आर्मी“
Posted on 8:25 pm by mnfaindia.blogspot.com/
राष्ट्रीय स्वमसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के सेना संबंधी बयान पर गैर-भाजपाई नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं आना अपेक्षित है। भारत में इस समय राष्ट्रीय स्वंय सेवक सबसे बडा एवं ताकतवर सामाजिक संगठन है। संघ ने कांग्रेस के सेवा दल और काडर-बेेस्ड वाम पंथी दलों को कहीं पीछे छोड दिया है। भाजपा को केन्द्र और राज्यों की सत्ता में लाने में भी संघ की अहम भूमिका रही है। इस स्थिति में जाहिर है आरएसएस गैर-भाजपाई दलों की आंख की सबसे बडी किरकिरी है। संघ के खालिस दक्षिणपंथी एवं हिंदुवादी सोच भी गैर भाजपाई दलों के लिए चिंता का विशय है। इसीलिए, संघ नेताओं की किसी भी छोटी-बडी बात पर गैर-भाजपाई दलों को देष की अखंडता पर प्रहार लगती है। रविवार को बिहार में स्वंयसेवकों को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अगर देष को जरुरत पडी और संविधान इस बात की अनुमति दे, तो संघ तीन दिन में अपनी सेना खडी कर सकता है। भागवत का यह कथन यहां तक तो आलोचकों को भी स्वीकार्य हो सकता है मगर संघ प्रमुख ने यह कहकर आग में घी डाल दिया है कि सेना को सैनिकों को प्रशिक्षित करने में छह-छह माह लग जाते हैं, संघ यह काम तीन में पूरा कर सकता है। इसके यह मायने लगाए जा रहे हैं कि संघ सैनिकों को प्रशिक्षित करने में सेना से ज्यादा सक्षम है। भारत में “बात का बतगंड“ बनाने और “बाल की खाल खींचने“ की बुरी परंपरा है। संघ प्रमुख का यह कहना भर ही था कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार सुबह टवीट करके भागवत के इस कथन को षहीदों और सैनिकों का घोर अपमान करार दे दिया। राहुल के अलावा आलोचकों ने इस बात पर भी नाराजगी जताई है कि संघ प्रमुख का यह बयान जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंक से लड रही सेना का भी अपमान है और उन्हें हतोत्साहित कर सकता है। सोमवार को संघ प्रवक्ता मनमोहन वैद्य को इस पर स्पश्टीकरण भी देना पडा। वैसे इस बात को नकारा भी नहीं जा सकता कि संघ प्रमुख की नीयत में कोई खोट नहीं है। उन्होंने यह बयान मौजूदा हालात को सामने रखकर दिया है। जम्मू-कश्मीर के हालात बेहद खराब हैं और सेना की तैनाती के बावजूद स्थिति दिन-ब-दिन बद-से-बदतर होती जा रही है। सुरक्षा कर्मियों के षिविरों पर आए रोज हो रहे आतंकी हमलों में सैनिकों की षहादत पर देषवासियों का खून खौल रहा है। हर हमले के बाद आतंकियों के आका पाकिस्तान को सबक सिखाने की डींगे हांकी जाती है मगर आतंकी हमले रुके नहीं रुक पा रहे हैं। पूरी दुनिया में इस जमीनी हकीकत को माना जाता है कि सेना को आंतरिक मामलों में बहुत लंबे समय तक तैनात नहीं किया जाना चाहिए। इसके पीछे तर्क यह है कि आर्मी दुष्मनों से बहादुरी से लड सकती है मगर अपने लोगों से नहीं लड सकती। मोदी सरकार की कष्मीर नीति में भी खोट है कि कष्मीर में बंदूक थामने वाला हर युवक पाकिस्तानी “आतंकी“ है। सच्चाई यह भी है कि बेरोजगारी और आर्थिक तंगी से बदहाल युवक आसानी से आतंकी संगठनों के चंगुल में फंस जाते हैं। बहरहाल, कष्मीर के मौजूदा हालात में यक्ष प्रष्न यह भी है कि कष्मीर जैसे हालात से निपटने के लिए अलग से सेना जैसी प्रषिक्षित आर्मी का गठन किया जाना चाहिए। मगर भारत में “बनाना“ आर्मी का खडा किया जाना तरह-तरह की समस्याएं पैदा कर सकता है। वैसे भी रोबोट और आर्टिफिषियल इंटेलिजेंस (एआई) के जमाने में “लठठ चालने वाले“ सैनिकों की कोई ज्यादा अहमियत नहीं है। रणभूमि में कई ऐसे काम है जो रोबोट और एआई मानव सैनिक से कहीं ज्यादा उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। देष की समस्या प्रषिक्षित सैनिकों और रसद की कमी नहीं है, अलबत्ता आंतरिक अषांत स्थिति से निपटना बडा सिरदर्द है। इससे कैसे निपटा जाए, संघ इस मामले में मोदी सरकार की मदद कर सकता है।
सोमवार, 12 फ़रवरी 2018
अमेरिका में शट डाउन के मायने
Posted on 5:54 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था और ताकतवर मुल्क अमेरिका में पिछले शुक्रवार को थोडे समय के लिए फिर सरकारी कामकाज ठप्प रहा हालांकि बाद में स्थिति सामान्य हो गई। इस साल ऐसा दूसरी बार हुआ। इससे पहले जनवरी में भी अमेरिकी सरकार का कामकाज तीन दिन तक ठप्प रहा था। अमेरिकी कांग्रेस द्वारा समय पर बजट पारित नहीं करने के लिए यह स्थिति उत्पन्न हो रही है। अस्थायी संघीय बजट की मियाद वीरवार रात को पूरी हो रही थी और सरकार को अपना खर्चा चलाने के लिए देर रात् कांग्रेस की मंजूरी मिलनी जरुरी थी मगर ऐसा नहीं हो सका। कांग्रेस की मंजूरी नहीं मिलने से वीरवार देर रात से ही शट डाउन शुरु हो गया मगर शुक्रवार सुबह हाउस ऑफ रेप्रेरेजेंटेटिव की मंजूरी मिलने से सरकार का कामकाज पटरी पर लौट आया। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होते ही सरकार को बजट मिल जाएगा। जनवरी में तीन दिन के शट डाउन के बाद कांग्रेस के दोनों सदनों ने अस्थाई बजट पारित किया था। वीरवार को फिर से अस्थायी बजट को कांग्रेस की मंजूरी आवश्यक थी मगर यह शुक्रवार सुबह मिली। ताजा अस्थायी बजट 23 मार्च तक मान्य रहेगा, इसके बाद फिर बजट को कांग्रेस की स्वीकृति की दरकार होगी। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार अमेरिका का बजट हर साल अक्टूबर से पहले-पहले पारित हो जाना चाहिए। अमेरिका में सरकार के वित्तीय वर्ष की शुरुआत पहली अक्टूबर से होती है और यह 30 सितंबर तक चलता है। बजट कांग्रेस के दोनों सदनो - हाउस ऑफ रेप्रेरेजेंटेटिव एवं सीनेट- द्वारा पारित किया जाना चाहिए। मगर इस बार कांग्रेस समय पर बजट पारित नहीं कर पाई। डेमोक्रेट और रिपब्लिकन के बीच कई मामलों पर सहमति नहीं होने से बजट में विलंब हो रहा है। ऐसा पहले भी हो चुका है कि कांग्रेस समय सीमा के भीतर बजट को पारित नहीं कर पाई और बजटीय प्रावधानों पर सौदेबाजी नए वित्तीय साल तक चलती रही। सरकार का कामकाज प्रभावित न हो, इसके लिए संघीय एजेंसियों को अस्थाई बजट मुहैया कराया जाता है। लेकिन इस बार कांग्रेस में अस्थायी बजट पर भी सहमति नहीं बन पाई। सतारूढ दल रिपब्लिकन पार्टी के कई सांसदों (सेनेटर्स) भारी राजकोषीय घाटे का मुखर विरोध कर रहे हैं। शुक्रवार को अगर डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद अस्थायी बजट का समर्थन नहीं करते, शट डाउन जारी रह सकता था। रिपब्लिकन पार्टी अब तक राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने की प्रबल पैरवीकार रही है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सोच को बदल डाला है। राष्ट्रपति दिल खोलकर खर्च कर रहे है और ट्रम्प का “मेक अमेरिका ग्रेट“ वाली सोच सर चढ कर बोल रही है। अमेरिका का कर्ज बोझ 20 खरब डॉलर से ज्यादा पहुंच गया है । दिसंबर में पारित टेक्स बिल से अगले दस सालों में अमेरिका का कर्ज 1.5 खरब डालर और बढ जाएगा। वित्तीय विशेषज्ञों का आकलन है कि तीन-चार दिन के शट डाउन से भी अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान हो सकता है। बढते कर्ज और राजकोषीय घाटे के दृष्टिगत इसकी भरपाई आसान नही है। 2013 में भी अमेरिका में 16 दिन तक शट डाउन रहा था। तब सकल घारेलू उत्पाद (जीडीपी) में 0.25 फीसदी की गिरावट आई थी। लगभग 2 अरब डालर की उत्पादकता प्रभावित हुई थी। नेशनल पार्कों को 500 मिलियन डालर की आय से हाथ धोना पडा था। दो सप्ताह के शट डाउान से 1 लाख, 20 हजार रोजगार अवसर डूब गए थे। 4 अरब डालर टैक्स रिफंड में विलंब हुआ था। शुक्र है शुक्रवार को शट डाउन जल्द खत्म हो गया वरना इसका असर बाजार पर बहुत बुरा पडता। समूचे वैश्विक बाजार में उथल-पुथल मची हुई है। वीरवार को वॉल स्ट्रीट के एस एंड पी 500 में 3.8 फीसदी की गिरावट दर्ज हुई थी। बहरहाल, अमेरिका को 23 मार्च तक राहत तो मिल गई है मगर यह अस्थायी व्यवस्था ज्यादा देर तक नहीं चल सकती। अब कल्पना कीजिए अगर इंडिया में यह स्थिति आती है तो क्या होगा?
शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018
बोफोर्स से रफाल तक
Posted on 7:07 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देष की सुरक्षा और अखंडता से जुडे राश्ट्रीय सरोकारों को राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए मगर सियासी दल इस राश्ट्रहित की इस अपरिहार्यता को भी मानने को तैयार नहीं है। देष की सुरक्षा के मुद्दों की ज्वाला भडका कर उसकी तपन में राजनीतिक रोटियां सेंकना तो जैसे भारतीय राजनीति का अंतरंग हिस्सा बन चुका है। बोफोर्स तोप सौदा , कारगिल ताबूत खरीद , राजग सरकार के समय 24,000 करोड रु का रक्षा सौदा, अगस्ता वेस्टलैंड सौदा और अब रफाल लडाकू विमान सौदा, इन सब में विपक्ष (कांग्रेस हो या भाजपा) को “घोटाले की बू“ आती है। कांग्रेस जब सत्ता में थी, तब भाजपा को बोफोर्स और अगस्ता वेस्टलैंड सौदे में भारी घोटाला नजर आता था। कांग्रेस को पहले कारगिल ताबूत सौदे पर और अब रफाल सौदे में घौटाले की “बू“ आ रही है। बोफोर्स घोटाले का “भूत“ कांग्रेस का आज भी पीछा कर रहा है। सीबीआई ने 12 साल बाद पिछले सप्ताह ही सुप्रीम कोर्ट में 2005 के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की है। दिल्ली हाई कोर्ट ने बोफोर्स सौदे में सीबीआई द्वारा एफआईआर को निरस्त कर दिया था। इससे कांग्रेस को भारी राहत मिली थी। इस मामले का रोचक पहलू यह है कि सरकार के अटार्नी जनरल ने सीबीआई को इतने लंबे समय बाद याचिका दायर करने के औचित्य पर सवाल उठाया था। जाहिर है सीबीआई ने वही किया जो उसे करने के लिए कहा गया। कारगिल ताबूत और 24,000 करोड के रक्षा सौदे में सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में राजग सरकार को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया था। इन मामलों में 2004 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। 3700 करोड रु के अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीद मामले में संप्रग सरकार के किसी नेता का नाम तो सामने नहीं आया मगर पूर्व वायु सेनाध्यक्ष एसपी त्यागी और उनके चचेरे भाई को संजीव त्यागी को प्रमुख आरोपी मानते हुए सीबीआई ने दोनों को ं जुलाई, 2017 में गिरफ्तार भी किया था। सीबीआई की जांच का आकलन है कि इस सौदे में 450 करोड रु की घूस दी गई थी। रफाल विमान खरीद प्रकिया संप्रग सरकार ने 2010 में षुरु की थी। तब एक रफाल विमान की कीमत 526 करोड रु थी और अब यह बढकर 1570 करोड रु तक पहुंच गई है। 2012 से 2015 तक भारत और फ्रांस के बीच इस सोदे को लेकर बातचीत चलती रही। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद 2016 में फ्रांस से 36 रफाल खरीदने के लिए 59,000 करोड रु का करार किया गया। कांग्रेस को इस बात पर ऐतराज है कि सरकार इस सौदे की पूरी जानकारी नहीं देकर बहुत कुछ छिपा रही है। मगर सच यह भी है कि काग्रेस ने भी सत्ता में रहते हुए किसी भी सौदे की जानकारी षेयर नहीं की है। बहरहाल, रफाल दुनिया का सबसे तेज और आक्रामक लडाकू विमान है। इसकी रफ्तार 2020 प्रति घंटा है। यानी यह विमान एक घंटे में दिल्ली से पाकिस्तान के क्वेटा और वापस दिल्ली का सफर तय कर सकता है। मूलतः रफाल मिराज 2000 का एडवांस वर्जन है। भारतीय आयु सेना के बेडे में इस समय 52 मिराज 2009 विमान हैं। इस विमान में हवा में भी तेल भरा जा सकता है। रफाल की सबसे बडी खासियत इस विमान की परमाणु मिसाइल डिलिवरी और अत्याधुनिक हथियारों के इस्तेमाल की क्षमता है जो इस विमान को औरों से विलक्षण बनाती है। इस विमान के मिलने से भारतीय वायु सेना की मारक (कंबेट) क्षमता और ज्यादा बढ जाएगी। इस विमान की इन खासियतों के कारण ही कांग्रेस नीत संप्रग ने रफाल खरीद प्रकिया षुरु की थी। सरकार पर नकेल डाले रखना विपक्ष का काम है मगर इसकी भी सीमा और मर्यादा होती है। सुरक्षा से जुडे मामलों को इन सब बातों से ऊपर रखा जाना चाहिए और इस तरह के सौदे की पारदर्षिता सुनिष्चित करने के लिए विषेशज्ञों की समिति गठित की जानी चााहिए।
गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018
कश्मीर अब तो हद हो गई
Posted on 7:20 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जम्मू- कश्मीर में हालात दिन-ब-दिन और ज्यादा बिगडते जा रहे हैं। मंगलवार को राजधानी श्रीनगर के हाई सिक्युरिटी जोन स्थित महाराजा हरि सिंह अस्पताल से चरमपंथी लश्कर -ए-तैयबा के खूंखार आतंकी नवेद जट को सुरक्षाकर्मियों से छुडा कर फरार हो गए। इस आतंकी हमले में दो पुलिसकर्मी शहीद हो गए। यह घटना कश्मीर में हालात की गंभीरता को बयां करती है। श्रीनगर सेंट्रल जेल से आतंकी समेत छह कैदियों को तीन पुलिसकर्मी बख्तरबंद वाहन में उपचार के लिए अस्पताल लाए थे। अस्पताल की पार्किंग में दो आतंकियों का मौजूद रहना, आतंकी नवेद को पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में पिस्तौल थमाया जाना और दो पुलिसकर्मियों को गोली मारकर हथकडी में आतंकी का दिन-दहाडे फरार हो जाना साफ बताता है कि कैदियों की सुरक्षा में भारी चूक हुई है। दो आतंकियों का अस्पताल में पहले से मौजूद रहना भी यही साबित करता है कि आतंकियों को पुलिस के हर कदम की पल-पल की जानकारी थी। सेंट्रल जेल से आतंकी नवेद समेत कैदियों को अस्पताल कब और कैसे लाया जाएगा, इसकी आतंकियों को पुख्ता जानकारी थी। इससे यही पता चलता है कि राज्य में आतंकियों का पुलिस और प्रषासन में भी पुख्ता नेटवर्क है। बहरहाल, कशमीर में स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और अब मोदी सरकार की कष्मीर नीति की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडे किए जा रहे हैं। मोदी षासन के चार साल में जम्मू-कष्मीर में पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार के बावजूद हालात सुधरने की बजाए और बिगडे है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि गठबंधन सरकार में शामिल पीडीपी और भाजपा में सत्ता की भूख के अलावा कुछ भी साझा नहीं है। पीडीपी अलगाववाद सोच भाजपा की खालिस राष्ट्रवादी सोच से एकदम भिन्न है। पीडीपी कश्मीर से अफ्सपा (आर्मड फोर्सिस स्पेषल पावर्स एक्ट) और सेना दोनों के हटाने की प्रबल समर्थक है। भाजपा जम्मू-कश्मीर में सेना और अफ्सपा दोनों को हर हाल में बनाए रखने के पक्ष में है। भाजपा अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की सबसे बडी पैरवीकार है, पीडीपी के लिए यह व्यवस्था जीवन-मरण का मुददा है। अनुच्छेद 370 को हटवाना भाजपा-आरएसएस का पुराना एजेंडा है और इसी कारण कष्मीर की अवाम भाजपा की अच्छी नीयत को भी संदेह की नजर से देखती है। पीडीपी का भाजपा से सत्ता के लिए हाथ मिलाना भी अवाम को रास नहीं आया है और इन घटनाक्रमों से कष्मीर में अलगाववाद और ज्यादा पनपा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता की भूख सिर्फ बर्बादी ही लाती है। एक-दूसरे से एकदम विपरीत राज्य की सत्ता के भागीदारों की खींचतान का जम्मू-कष्मीर में हालात बिगाडने में बडा योगदान रहा हैं। इससे सुरक्षा कर्मियों की षहदत भी जाया जा रही है। कष्मीर की सबसे बडी पीडा यह है कि लगभग सभी सरकारें घाटी में स्वायत्ता और आजादी की आवाज को पाकिस्तान प्रायोजित चष्मे से आकलन कर उसी अनुरुप नीति निर्धारण करती रही है। और मोदी सरकार तो पूरी षिद्दत से यह स्थापित करने में लगी है कि कष्मीर में जो कुछ भी हो रहा है, वह पूरी तरह से पाकिस्तान की षह पर हो रहा है। इस तरह की मानसिकता में कष्मीर समस्या के आंतरिक और ऐतिहासिक कारणों को पूरी तरह से नजरादंाज किया जा रहा है। इस स्थिति में कष्मीर को लेकर नीति निर्धारण में असंमजस और दुरुहता का समावेष स्वभाविक है। मोदी सरकार एक तरफ आतंकियों का जड से खात्मा करने के प्रति प्रतिबद्धता जताती है, तो दूसरी तरफ सभी पक्षों से बातचीत की बात करती है। मौजूदा वार्ताकार दिनेष्वर षर्मा भी इसी असमंजस से जूझ रहे हैं। कष्मीर के मौजूदा हालात के दृश्टिगत केन्द्र और राज्य सरकार को फौरन ठोस कदम उठाने की जरुरत है। सभी पक्षों से बातचीत से ही समस्या का हल सभंव है और अगर बातचीत उच्च से उच्चतम स्तर पर करनी पडे, तो इसे प्रतिश्ठा का प्रष्न नहीं बनाया जाना चाहिए। देष की अखंडता सर्वोपरि होती है।
बुधवार, 7 फ़रवरी 2018
मालद्धीपः भारत की अग्नि परीक्षा
Posted on 8:29 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मालद्धीप के मौजूदा हालात में भारत की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। पिछले कई महीनों से मालद्धीप में भारी राजनीतिक उठापटक चल रही है। बढते राजनीतिक गतिरोध के बीच राष्ट्रपति अब्दुल्ल्ला यमीन ने 15 दिन के लिए देश में इमरजेंसी लगा दी है। राष्ट्रपति ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उठाया है। मालद्धीप के सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा करने के आदेश दिए थे। राष्ट्रपति ने अदालत के आदेश मानने से इंकार कर दिया है। इतना ही नहीं सेना ने राष्ट्रपति के आदेश पर फैसला सुनाने वाले चीफ जस्टिस अब्दुल्ल सईद और एक और जज को गिरफ्तार भी कर लिया है। इससे मालद्धीप की जनता सडकों पर उतर आई हे और लोगों और पुलिस के बीच जगह-जगह झडपें जारी रहने की खबर है। पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद को अपदस्थ करने के बाद से राष्ट्रपति अब्दुल्ल्ला यमीन लगातार देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर सत्ता को पूरी तरह से अपनी मुठ्ठी में कैद करने की कोशिश करते रहे हैं। इस क्रम में यमीन ने अपने सभी विरोधियों और आलोचकों को जेल में डाल दिया। मोहम्मद नसीद देश के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति थे । नशीद ने 2008 में तीस साल से सत्तासीन तत्कालीन राष्ट्रपति मॉमून अब्दुल ग्य्यूम को हराया था। 2012 में नशीद ने रहस्समय परिस्थियों में राष्ट्रपति पद छोड दिया। तब नशीद का कहना था कि उन्हें पद छोडने पर विवश किया गया। मार्च, 2015 में नशीद को मालद्धीप के “ आतंक-निरोधी कानून“ के तहत एक जज को गिरफ्तार करवाने के अपराध में 13 साल की जेल की सजा चुनाई गई। तब एमनेस्टी इंटरनेशल ने इस फैसले को “ राजनीतिक द्धेषपूर्ण “ बताया था। अमेरिका ने भी ट्रायल के दौरान निष्पक्ष पद्धति का पालन नहीं किए जाने पर रोष जताया था। नशीद को ब्रिटेन ने राजनीतिक शरण दे रखी हैै। मंगलवार को पूर्व राष्ट्रपति नशीद ने भारत से “मालद्धीप के “बिगडते हालात“ में तुरंत हस्तक्षेप की मांग की है। भारत को नसीद का समर्थक माना जाता है। यमीन-नशीद के बीच की रस्साकशी में भारत पीछे से अपनी भूमिका निभा रहा था। 2008 में मालद्धीप में पहली लोकतांत्रिक सरकार के अपदस्थ किए जाने पर भारत की भूमिका पर सवाल उठाया गया था। तब पर्यवेक्षकों का मानना था कि भारत को खुलकर नशीद का समर्थन करना चाहिए था। मगर भारत किस भी संप्रभु राश्ट्र के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नही करता है। इसलिए न तो तब और न ही अब भारत खुलकर किसी भी पक्ष का समर्थन करेगा और तटस्थ ही रहेगा। ताजा हालात में मालद्धीप में मानवाधिकारों के हनन और “ दमनकारी“ कार्रवाईयों पर भारत, अमेरिका समेत अंतरराश्ट्रीय दबाव बढ सकता है। राश्ट्रपति अब्दुल्ल्ला यमीन चीन के ज्यादा करीब हैं, इसलिए वे बीजिंग से ताजा मामले में भी खुले समर्थन की उम्मीद रखते है। मगर चीन ने आज तक किसी भी मामले में वैष्विक ताकतों के खिलाफ कभी कुछ नहीं बोला है और न ही किसी देष का समर्थन किया है। उत्तर कोरिया का मामला इसकी मिसाल है। भारत के ताजा हालात में तटस्थ रहने पर मालद्धीप चीन के और करीब जा सकता है। नषीद तो भारत के समर्थक थे ही, राश्ट्रपति मॉमून अब्दुल ग्य्यूम के समय मे भी मालद्धीप चीन की अपेक्षा भारत के ज्यादा करीब रहा है। मग्गर पिछले एक दषक से भारत मालद्धीप को लेकर कुछ ज्यादा ही तटस्थ रहा है। इसका सीधा फायदा चीन को मिला है। चीन ने भारत को चौतरफा घेर रहा है। दक्षिण एषियाई मुल्कों में भारत, चीन के बढते प्रभाव के समक्ष उतरोत्तर कमजोर पडता नजर आ रहा है। आर्थिक हो या सामरिक मदद, भारत की तुलना में चीन अधिक स्मार्ट साबित हो रहा है। भारत इस स्थिति को कैसे संभालता है, यही भारतीय कूटनीति की अग्नि परीक्षा है।
मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018
क्या मार्केट के अच्छे दिन गए?
Posted on 8:09 pm by mnfaindia.blogspot.com/
पहली फरवरी को बजट पेश होने के बाद से देश के शेयर बाजार में हाहाकार मची हुई है। सोमवार को लगातार पांचवे दिन बेंचमार्क सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट जारी रही। सोमवार को सेंसेेक्स 309 अंक की गिरावट के साथ 34,757 पर बंद हुआ। शुक्रवार को सेंसेक्स और निफ्टी में 15 माह की सबसे बडी 2 फीसदी की गिरावट आई थी। सोमवार को कारोबार के दौरान सेंसेक्स 545 और निफ्टी 173 अंक तक टूट चुका था मगर बाद में कुछ संभला। बाजार में लगातार गिरावट से टाटा कंसल्टेंसी को एक ही दिन में 21251 करोड़ रु का नुक्सान उठाना पड़ा है। बजट में लॉन्ग टर्म केपिटल गेन टैक्स (एलटीसीजी) के लगने से मार्केट में बिकवाली और प्रॉफिट बुकिंग का जोर है हालांकि सरकार एलटीसीजी को गिरावट का प्रमुख कारण मानने से बच रही है। सोमवार को वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त सचिव हंसमुख अढिया दोनों ने जोर देकर कहा कि शेयर बाजार में बिकवाली के लिए लॉन्ग टर्म केपिटल गेन टैक्स नही, अलबत्ता ग्लोबल फेक्टर्स जिम्मेदार है। वैश्विक बाजार में इन दिनों खासी उठापटक चल रही है। अमेरिकी फेडेरल रिजर्व द्वारा एक फरवरी को ब्याज दरें यथावत रखे जाने के कारण बांड यील्ड बढने की संभावना से शुक्रवार को ग्लोबल मार्केट मे भी भारी गिरावट आई। शुक्रवार को डॉउ जोन्स में 666 अंक गिरा। बांड यील्ड में वृद्धि को ब्याज दर बढने के संकेत माने जाते हैं। ग्लोबल मार्केट में शुक्रवार की गिरावट का असर सोमवार को एशिया की मार्केटस में देखने को मिला। जापान का बेंचमार्क इंडेक्स नेक्कई 222 अंक गिरा। शुक्रवार को नेक्कई में 565 अंक की गिरावट आई थी। पूरे वैश्विक बाजार में यही स्थिति है। बाजार में मंदी को देखते हुए वित्त मंत्री की इस बात में वजन है कि भारतीय शेयर बाजार की गिरावट के लिए वैश्विक बाजार की मंदी जिम्मेदार है। मगर मार्केट एक्सपर्ट इस बात से सहमत नहीं है। लॉन्ग टर्म केपिटल गेन टैक्स के अलावा और भी कई कारण हैं। बजट में प्रस्तावित 3.5 फीसदी राजकोषीय घाटा भी बाजार में उथल-पुथल के लिए पर्याप्त हैं। घाटे की यह सीमा बाजार को निराश कर रही है क्योंकि इससे मुद्रा स्फीति बढने की पूृरी-पूृरी संभावना है। बाजार 3.2 फीसदी (जीडीपी का) राजकोषीय घाटे की उम्मीद कर रहा था। वित्त मंत्री का भी पहले यही लक्ष्य था मगर फार्म सेक्टर के लिए विशाल 14 लाख करोड रु का बजट और दुनिया की सबसे बडी हैल्थकेयर योजना के लिए अतिरिक्त संसाधन की दरकार है। चुनावी साल में इसे और ज्यादा टेक्स लगाकर भरा नहीं जा सकता था। इसलिए बजट घाटा और ज्यादा बढ सकता है। किसानों को उनके उत्पाद का लागत से डेढ गुना दाम मुहैया कराने के वायदे ने भी बाजार को भयभीत कर रखा है। इससे कीमतें बढने की जबरदस्त संभावना है। इससे भी शेयर मार्केट परेशान है। रिजर्व बैक भी मुद्रा-स्फीति के बढने की आषंका जता चुका है। भारत में भी 10-वर्षीय बांड यील्ड में जुलाई 2017 से अब तक 80 फीसदी का उछाल आ चुका है। इससे ब्याज दरें बढने की संभावना बनी हुई है। इसी सप्ताह आरबीआई अपनी मौद्रिक नीति की घोषणा करने जा रहा है और मौजूदा स्थिति में ब्याज दरों को यथावत रखे जाने की उम्मीद जताई जा रही है। मगर अगली मौद्रिक समीक्षा में ब्याज दरें बढ सकती हैं। पिछले दो साल के दौरान आरबीआई ब्याज दरों (रेपो रेट) में दो फीसदी की कटौती कर चुका है और इस समय रेपो रेट 6 फीसदी के न्यूनतम स्तर ओअर है। अब और ज्यादा की कोई गुंजाइश नहीं है। आरबीआई का मार्च, 2018 तक मुद्रा स्फीति को चार फीसदी से नीचे रखना का लक्ष्य भी पूरा होता नजर नहीं आ रहा है। 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में मुद्रा स्फीति को मार्च, 2018 तक 4 फीसदी से नीचे लाने का सपना दिखाया गया था। मगर किसानों के कर्ज माफी योजना, सरकारी बैंकों के खराब (एनपीए) कर्जे और अब बजट के लोक-लुभावने वायदों से मुद्रा स्फीति का बढना तय है। इस स्थिति में अच्छे दिन तो आने से रहे़।
सोमवार, 5 फ़रवरी 2018
Whats The Fun Of RERA If It Can't Tame incredulous Builders
Posted on 8:08 pm by mnfaindia.blogspot.com/
In India rules and regulations are honoured more in breach. The latest being the RERA act. The Real Estate (Regulation and Development) Act (RERA) was primarily enacted to regulate the builders and help buyers. The act is meant to protect the interest of the homebuyer and ensure timely delivery of projects.
But it can't regulate fraudulent builders like Ubber in Kharar, Dear Bassi and its representatives who are openly cheating the customers. Facebook is full of cheating complaints. But how does it matter to concerned authorities? Builders are smart enough to grease the palms of those who matter and as such are fully protected.
RERA is a central law, its implementation depends on state governments, as real estate is a state subject. And this aspect makes its implementation more difficult in Chandigarh and surrounding areas where a hordes of incredulous builders have mushroomed, especially in Kharar, Mullanpur And Zirakpur area. Since, all these areas have seen massive construction, the Act was required to be in place at the earliest. Still, regulatory bodies or appellate tribunals to solve the disputes between buyer and builder haven't come up. Under the act, disputes have to se settled within 120 days. The act also requires builders to deposit put 70% of the money collected from a buyer in a separate account to meet the construction cost of the project
.The buyer is required to pay only for the carpet area (area within walls). The builder can’t charge for the super built-up area, as is the practice at present. Developers will be able to sell projects only after the necessary clearances. Under RERA, builders and agents will have to register themselves with the regulator and get all projects with more than eight apartments registered before launch. There are many more stringent provisions.
But all these provisions of the RERA are on paper only. In practice, builders are cheating home and plot buyers openly and are least afraid of the act. Here is a case of Palm Meadows, in Kharar, a less than 10 acre housing project being developed by Ubber group. The customers are being fleeced by the builder promising finishing construction within nine months but delaying under one pretext the other. Worse, all those who matter are 'hand in glove' to cheat the buyers. In many cases, the builder has taken money from buyers for construction without approving the project and now refusing to retirn the money. Will the authority act?
But it can't regulate fraudulent builders like Ubber in Kharar, Dear Bassi and its representatives who are openly cheating the customers. Facebook is full of cheating complaints. But how does it matter to concerned authorities? Builders are smart enough to grease the palms of those who matter and as such are fully protected.
RERA is a central law, its implementation depends on state governments, as real estate is a state subject. And this aspect makes its implementation more difficult in Chandigarh and surrounding areas where a hordes of incredulous builders have mushroomed, especially in Kharar, Mullanpur And Zirakpur area. Since, all these areas have seen massive construction, the Act was required to be in place at the earliest. Still, regulatory bodies or appellate tribunals to solve the disputes between buyer and builder haven't come up. Under the act, disputes have to se settled within 120 days. The act also requires builders to deposit put 70% of the money collected from a buyer in a separate account to meet the construction cost of the project
.The buyer is required to pay only for the carpet area (area within walls). The builder can’t charge for the super built-up area, as is the practice at present. Developers will be able to sell projects only after the necessary clearances. Under RERA, builders and agents will have to register themselves with the regulator and get all projects with more than eight apartments registered before launch. There are many more stringent provisions.
But all these provisions of the RERA are on paper only. In practice, builders are cheating home and plot buyers openly and are least afraid of the act. Here is a case of Palm Meadows, in Kharar, a less than 10 acre housing project being developed by Ubber group. The customers are being fleeced by the builder promising finishing construction within nine months but delaying under one pretext the other. Worse, all those who matter are 'hand in glove' to cheat the buyers. In many cases, the builder has taken money from buyers for construction without approving the project and now refusing to retirn the money. Will the authority act?
शनिवार, 3 फ़रवरी 2018
भाजपा को जोर का झटका
Posted on 9:24 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रचलित जुमला है, “काठ की हंाडी बार-बार नही चढती“। यह कहावत राजस्थान में भाजपा के संदर्भ में सौ फीसदी चरितार्थ होती दिख रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 मेंसे 25 सीटों पर विजय फताका फहराने वाली भगवा पार्टी का उप चुनाव में कांग्रेस ने सुपडा ही साफ कर दिया। राज्य की दोनों लोकसभाई सीटों और एक विधानसभाई हलके में कांग्रेस को जबरदस्त जीत मिली है और पार्टी के प्रत्याशी रिकार्ड मतों से जीते हैं। भाजपा की हार इतनी शर्मनाक है कि पार्टी के प्रदेश प्रभारी अविनाश राय खन्ना ने इसे “रहस्यमय“ करार दिया है। इसी साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। उप-चुनाव में भाजपा की करारी हार से दीवारों पर लिखी इबारत साफ-साफ पढ़ी जा सकती है। धार्मिक धु्रवीकरण की आड लेकर मतदाताओं को लंबे समय तक पटाया नहीं जा सकता। जनता ठोस कम और जवाबदेही चाहती है। अजमेर लोकसभाई हलके के परिणाम यही संकेत दे रहे हैं। अजमेर गो-रक्षा और हिंदुत्व के मुद्दो को लेकर खासी चर्चा में रहा है और भाजपा ने इन्हें भरपूर भुनाने की कोशिश भी की। न तो हिंदुत्व और न ही संगठन कौशल और जाति समीकरण भाजपा के काम आए। कांग्रेस ने 81,000 से भी अधिक मतों के अंतर से यह सीट भाजपा से छीन ली। अलवर लोकसभा हलके में कांग्रेस की जीत का अंतर 1 लाख 11 हजार से भी ज्यादा है। भाजपा ने उप-चुनाव में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता को भी भुनाने के लिए मोदी का बाडमेर दौरा भी करवाया। बाडमेर में प्रधानमंत्री के हाथों ऑयल रिफाइनरी का काम शुरु करवाया गया। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के कामकाज की तारीफ भी की मगर मतदाताओं को यह भी रास नहीं आया। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने खुद प्रचार की कमान संभाल रखी थी और दोनों लोकसभाई हलके, भीलवाडा विधनसभाई हलके में उन्होंने धुंआधार प्रचार भी किया। मतदाताओं को लुभाने के लिए वसुंधरा राजे ने जातिवर समूह बनाकर विभिन्न लोगों से अलग-अलग मुलाकात भी की मगर उनका यह प्रयोग भी नहीं चला। इससे साफ है कि मतदाताओं में भाजपा के प्रति जबरदस्त रोष है और उप-चुनाव में उनका गुस्सा फूटा है। कांग्रेस को तो बैठे-बिठाए सब कुछ मिल गया है। पिछले चार साल में पार्टी ने कोई बडा जन संघर्ष नहीं किया और न ही कोई ऐसा ज्वलंत मुद्दा उठाया जिससे पार्टी का जनाधार और ज्यादा सषक्त होता। कांग्रेस को एंटी-इंकूबेंसी का पूरा फायदा मिला है। मतदाताओं में बेरोजगारी, करप्शन , कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों की उपेक्षा से सरकार के प्रति भारी गुस्सा है। हर बार यही हो रहा है। 1977 से 1980 की करीब अढाई साल की अवधि को छोडकर 1990 तक राजस्थान की सत्ता पर कांग्रेस का एकाधिकार रहा है। 1977 में जनता पार्टी की प्रचंड लहर ने पहली बार राजस्थान से कांग्रेस राज को उखाडा था और भैरो सिंह षेखावत राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने थे। शेखावत कद्दावर नेता थे और 1990 से 1998 तक (दिसंबर 1992 से दिसंबर 1993 के राश्ट्रपति शासन को छोडकर) फिर राज्य के मुख्यमंत्री बने। 1998 के बाद कांग्रेस के अशोक गहलोत और भाजपा की वसुंधरा राजे बारी-बारी दो-दो बार मुख्यमंत्री रहे हैं मगर दोनों ही लगातार दूसरी बार फिर से सत्ता पर काबिज नहीं हो पाए। राजस्थान के ताजा उपचुनाव नतीजे भी यही कह रहे हैं कि भाजपा फिर से सत्ता में लौटती नजर नहीं आ रही है। कांग्रेस राजस्थान के उपचुनाव नतीजों पर खूब इतरा रही है मगर पश्चिम बंगाल में पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है। पश्चिम बंगाल की एक लोकसभाई और एक विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई है। भाजपा का प्रदर्शन कांग्रेस से बेहतर रहा है। 2019 के लोकसभा चुनाव में अगर पार्टी को अच्छा प्रदर्शन करना है, तो कांग्रेस को पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बडे राज्यों मैं अपना जनाधार बढाना होगा।
Media Enclave Outfit At Karora, Nayagoan Proves Fraudulent
Posted on 9:16 pm by mnfaindia.blogspot.com/
There is a bad news for members of Media Enclave Journalist Society ( association) at Karora in Nayagoan near Chandigarh. With Punjab govt re-enforcing the section 4 of Punjab Land Preservation Act (PLPA) for another 15 years, all construction activities remain are banned and no colony or house can be built over there. Earlier, a report had appeared in a section of media that Govt was likely to allow the lapse of this act as Punjab Chief Minister Capt. Amarinder Singh has bought land in Siswan, near Korara. All members of the society now stand to lose . It is now as obvious that members were misled to believe in the last three years by the office-bearers of the society and were trapped . Those members who have purchased the plot with registry are at great loss. In fact, the very existence of this society was questionable right from the beginning and was, ostensibly, created to help the builder. The area was banned for constructions activities since 2003 as it was a demarcated forest area and no sale of plot were colony could be executed there. Despite this, an camouflaged journalists housing association was set up to help the builder and gullible journalists were trapped to believe that everything was fair and transparent. As a matter of fact, forming an association for developing a housing colony is totally illegal as group housing activities can be undertaken under the aegis of a legal entity i.e society. The so called association was run from builder office and his men were looking after the association days-to-day affairs. Even the brochure in the name of association was brought out by the builder. What is shocking is that name of Chandigarh Press Club was also used and membership of Rs. 1000 was also taken from the members. All these activities amount to fraud, cheating and trickery. The members are now left with only option to press for refund of money.
शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018
ग्रोथ उन्मुख चुनावी बजट
Posted on 7:03 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लोकसभा चुनाव से पहले आखिरी नियमित बजट में मोदी सरकार का पूरा फोकस किसान, गरीब और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर रहा है। किसान और कमजोर तबके देश का सबसे बडा वोट बैंक हैं। इस बात की भी चर्चा है कि लोकसभा चुनाव मई 2019 के बजाए इस साल के अंत तक कराए जा सकते हैं। इस के दृष्टिगत बजट में किसानों को सुनहरी सपने दिखाए गए हैं। 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का लक्ष्य रखा गया है। किसानों की उपज के लिए लागत से डेढ गुना मूल्य देने का वायदा किया गया है। 2000 करोड की लागत से कृषि बाजार स्थापित किया जाएगा। 10 करोड गरीबों के लिए 10 लाख रु का सालाना बीमा, 50 करोड लोगों के लिए 5 लाख रु प्रति वर्ष का चिकित्सा बीमा, दुनिया की सबसे बडी स्वास्थय योजना है। 5 करोड गरीब परिवारों को मुफ्त में रसोई गैस कनेक्शन , गांव और कृषि सेक्टर के लिए 14 लाख करोड रु का रिकॉर्ड बजट आवंटन और अलग-अलग हिस्सों में खेती उत्पाद के लिए स्टोरेज, प्रोसेसिंग और विपणन की व्यवस्था और खेती उत्पाद संस्थाओं को टैक्स में छूट समेत तरह-तरह की रियायतें और सुविधाएं दी गई हैं। सीनियर सिटिजंस के लिए 50 हजार रु के ब्याज तक आयकर में छूट और 50 हजार रु तक की हैल्थ इंशोरेंस प्रीमियम की सीमा छूट दी गई है। 80डी के तहत छूट की सीमा 50,000 रु और 80डीडीबी के तहत छूट अब 60 हजार की जगह एक लाख रु कर दी गई है। 250 करोड रु सालाना टर्नओवर वाले उधोगों को कॉर्पोरेट आयकर को घटाकर 25 फीसदी कर दिया गया है। इससे सरकार को 7,000 करोड रु का नुकसान होगा। मोदी सरकार ने राष्ट्रपति , उप-राश्ट्रपति समेत सांसदों के वेतन-भत्ते भी बढा गए हैं। सांसदों का वेतन हर पांच साल बाद बढाए जाने का प्रावधान किया गया है। बजट में धनाढय और साधन सपन्न वर्ग को छोडकर हर तबके को कुछ-न-कुछ दिया गया है। आयकर की सीमा यथावत रखकर मध्यम वर्ग की अपेक्षाओं पर पानी फेरा गया है। भाजपा ने अपने 2014 के इलेक्शन मेनिफेस्टो में आयकर सीमा को 5 लाख रु तक बढाए का वायदा कर रखा है। इसे आज तक पूरा नहीं किया गया है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2014 में खुद इसकी पैरवी करते हुए कहा था कि आयकर सीमा 5 लाख रु किए जाने से 3 करोड आयकरदाताओं को 25 करोड रु की बचत हो सकती है। मध्यम वर्ग के अलावा वित्तीय सेक्टर को भी बजट से झटका लगा है। सरकार का राजकोषीय घाटा बढने से बांड्स मार्किट में गिरावट आ सकती है। अगले साल (2019) में राजकोषीय घाटा साढे तीन फीसदी पहुँच सकता है। इससे बांडस मार्केट में और गिरावट आएगी। बजट में लांग-टर्म केपिटल गेंस टैक्स के प्रस्ताव से इक्विटी इन्वेस्टमेंट प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि वीरवार को शेयर बाजार में बिकवाली छाई रही और सेंसेक्स-निफ्टी गिरावट के साथ बंद हुआ। मगर कॉर्पोरेट जगत ने बजट की सराहना की है। बजट में इंफरास्ट्रक्चर को खासा बढावा मिलने से ग्रामीण क्षेत्रो में रोजगार के और ज्यादा अवसर सृजित होंगे। इससे लोगों की आय बढगी। आय बढने से मांग उठेगी और उपभोक्ता उत्पादों को फायदा होगा। बहरहाल, 2018 के बजट का ग्रोथ उन्मुख बजट है। गरीबों का खास ख्याल रखा गया है। किसान देश का अन्नदाता है और पूरे देश का पेट पालने के लिए कडी धूप-बारिश में पसीना बहाता है। देश का अन्नदाता खुश है तो देश भी तेजी से आगे बढ सकता है। वित्त मंत्री ने बजट की शुरुआत ही किसानों से की है। और पहली बार गरीबों के लिए महत्वाकांक्षी हैल्थकेयर योजना का आगाज किया गया है। कुल मिलाकर, मोदी सरकार ने अपने मौजूदा कार्यकाल के अंतिम नियमित् बजट में वोट के साथ ग्रोथ का भी पूरा ध्यान रखा है।
गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018
कासगंज घटना से देश आहत
Posted on 7:54 pm by mnfaindia.blogspot.com/
उत्तर प्रदेश के कासगंज में गणतंत्र दिवस पर हुई सांप्रदायिक हिंसा से देश आहत हुआ है। हिंसा की वजह गणतंत्र दिवस पर निकाली गई तिरंगा यात्रा थी। इस यात्रा के दौरान हिंसक झडप में एक व्यक्ति की मौत हो गई और एक व्यक्ति गंभीर रुप से घायल हो गया था। तिरंगा यात्रा के मुस्लिम बहुल इलाके से गुजरने पर दंगा फूटा। मुस्लिम समुदाय ने भगवा संगठनों की तिरंगा यात्रा पर आपत्ति जताई और इस बात पर दो समुदाय में झडप हो गई। नौबत गोलीबारी तक पहुंच गई। गोलियां चलने से दो युवक घायल हो गए और बाद में एक की मौत हो गई। मामला यहीं शांत नहीं हुआ। इस दुखद घटना को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। स्थिति बिगडती देख प्रशासन को धारा 144 लगानी पडी और लगभग दो दर्जन लोगों को हिरासत मे लेना पडा। इस घटना के पांच दिन बाद बुधवार को हिंसा फैलाने के प्रमुख आरोपी को गिरफ्तार किया जा सका। तरह-तरह की अफवाहों के फैलने के कारण प्रसाशन को इंटरनेट सेवाएं तक बंद करनी पडी। कासगंज अभी भी सांप्रदायिक हिंसा में झुलस रहा है। शरारती तत्व कासगंज को ही नहीं, पूरे राज्य को सांप्रदायिक हिंसा की भठ्ठी ंमें झोंकने पर आमदा है। कासगंज की घटना ने इस कडवी सच्चाई को फिर उजागर किया है कि कटटरवादी और शरारती तत्व देश में सांप्रदायिक सौहार्द को छिन्न-बिन करने का कोई अवसर नहीं छोडते हैं। कासगंज बेहद शांतिप्रिय शहर है और सालों से यहां सांप्रदायिक सौहार्द बना हुआ है। सांप्रदायिक हिंसा जैसी कोई घटना तो सालों से नहीं हुई। यह क्षेत्र अन्य पिछडा बहुल क्षेत्र है और वर्षों से हिंदू और मुसलमान मिल जुल कर रह रहे हैं। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ कि शांति प्रिय कासगंज का सांप्रदायिक सौहार्द देश के 69वें गणतंत्र दिवस पर बिखर गया? दोनों ही पक्ष हिंसा के लिए एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे है। तिरंगा यात्रा के पक्षधरों का आरोप है कि उनकी यात्रा को रोकने के लिए मुस्लिम समुदाय ने जानबूझ कर हिंसा फैलाई। घटना भी यही बयां करती है। हिंसा के दौरान पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगना उस बात का प्रमाण है। भाजपा के सीनियर नेताओं ने कासगंज की हिंसा के लिए पाकिस्तान समर्थक तत्वों को जिम्मेदार माना है। मुस्लिम समुदाय का आरोप है कि भगवा संगठनों ने सांप्रदायिक सौहार्द भंग करने की मंशा से ही तिरंगा यात्रा निकाली थी। यात्रा में तिरंगे कम, भगवा झंडे कही ज्यादा थे। और यह सब मुसलमानों को चिढाने के लिए किया गया था। हिंसा भडकते ही यात्रा निकालने वाले घटनास्थल से चुपचाप निकल लिए। बहरहाल, इस मामले में संबंधित पक्षों से ज्यादा प्रशासन दोषी है। मुस्लिम बहुल इलाके में भगवा संगठनों की तिरंगा यात्रा निकलने से सांप्रदायिक सौहार्द छिन्न-बिन होगा, इस बात की पूरी संभावना थी। फिर इस यात्रा की अनुमति क्यों दी गई़? अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यात्रा निकालने की अनुमति दी भी गई थी या नहीं। कासीगंज की घटना के बाद आगरा प्रशासन ने बुधवार को बडी चतुराई से विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की तिरंगा यात्रा को शुरू र होते ही संभाल लिया। यही काम कासगंज जिला प्रशासन भी कर सकता था। यह स्थिति बेहद दुखद है कि आजादी के सात दशक बाद भी देश में सांप्रदायिक सौहार्द कायम नहीं रह पाया है और अगर कहीं कायम है तो सरकार और प्रशासन इसे संभाल नहीं पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार के सत्ता में आने के बाद से राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को छिन्न-बिन करने के लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। मुगल सराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलना, लखनऊ में वक्फ बोर्ड की दीवारों पर भगवा रोकने पोतना और हर राष्ट्रवादी मुसलमानों को पाकिस्तान समर्थक के ताने देना जैसी घटनाएं सांप्रदायिक तनाव के लिए काफी है। कासगंज की स्थिति फिर न पनपे, उत्तर प्रदेश में योगी सरकार को राज धर्म निभाने पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)








