मंगलवार, 10 जुलाई 2018

भगोडों के सुरक्षित चरागाह

बेशर्मी की भी हद होती है मगर  बैंकों का दस हजार करोड रु से ज्यादा के कर्जदार  शराब कारोबारी विजय माल्या ने सारी हदें पार कर दी है। ब्रिटेन की अदालत से पिछले सप्ताह भारतीय बेंकों को कर्जदार विजय माल्या की ब्रिटिश  संपत्ति जब्त करने की छूट मिलने के बाद भी उन्हे कोई फर्क नहीं पड़ा  है। रविवार को माल्या ने यह कहकर भारत और बैंकों को चिढाया है कि ब्रिटिश  अचल संपत्ति उनके नाम है ही नहीं। ब्रिटेन में उनके दो आलीशान भवन है और दोनों ही परिवार के नाम है। इस स्थिति में जाहिर है अदालत से संपत्ति जब्त करने की छूट  मिलने के बावजूद   बेंकों के हाथ कुछ ज्यादा लगने वाला नहीं है। बकौल माल्या उनके नाम कुछ पुरानी कारें और ज्वैलरी है, जिन्हें  वे खुद बैंकों को सौपने को तैयार हैं। माल्या के इन बयानों में उनकी बदनीयति साफ झलकती है। बैंको  का पैसा डकार कर ब्रिटेन में ऐश -ए-आराम की उन्होंने पहले से ही तैयारी कर रखी थी। इसीलिए, उन्होंने अपनी संपत्ति परिवार (पुत्र और माता) के नाम कर रखी है। अगर माल्या की नीयत साफ होती, तो वे इन संपतियों को बेचकर बैंकों का कर्ज  चुकाते। अगर  सहारा परिवार ऐसा कर सकता है तो माल्या क्यों नहीं? सहारा को अपना न्यूयार्क स्थित भव्य होटल बढती देनदारी चुकाने के लिए बेचना पडा। भारत सरकार विजय माल्या के प्रत्यर्पण की हर संभव कोशिश  कर रही है।  माल्या भारत नहीं लौटने के लिए खुद को ब्रिटिश  नागरिक और अप्रवासी भारतीय (एनआरआई) बताते हैं। इसी माह के अंत में (31 जुलाई) को लंदन की अदालत में विजय माल्या के प्रत्यर्पण संबंधी मामले की अंतिम सुनवाई है और सितंबर में इस मामले में अदालत का फैसला आ सकता है। कोर्ट  के ताजा फैसले के  दृष्टिगत   माल्या के  प्रत्यर्पण की उम्मीदें बढी हैं। भगोडों के लिए  ब्रिटेन सबसे सुरक्षित स्थान माना जाता है। ब्रिटेन के उदार कानून भगोडों के मददगार हैं। ब्रिटेन  में यूरोपियन कन्वेशन ऑफ ह्यूमन राइटस लागू है। इसके तहत अगर  प्रत्यर्पण के पीछे राजनीतिक कारण, अथवा प्रताडना की  मंशा   या मौत की सजा नजर आती है, तो   कोर्ट प्रत्यर्पण की अनुमति नहीं देगा। भारत अथबा दुनिया के अन्य देशों  के भगोडे इसी उदार कानून का फायदा उठाते है। भारत और ब्रिटेन के बीच 1993 से  प्रत्यर्पण संधि है मगर इन 25 सालों में अब तक केवल एक भगोडे का  प्रत्यर्पण हो पाया है। और इस एकमात्र भगोडे का  प्रत्यर्पण करने में 23 साल लग गए।  19 अक्टूबर 2016 में कत्ल के एक आरोपी को पहली बार ब्रिटेन से भारत लाया गया। 2017 के अंत तक भारत की 43 मुल्कों से साथ  प्रत्यर्पण संधि है और 9 के साथ इस तरह की व्यवस्था है। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मन, फ्रांस, रुस, यूएई, सउदी अरब समेत पडोसी बांग्लादेश  और नेपाल भी  शामिल हैं। मगर चीन और पाकिस्तान के साथ ऐसी कोई संधिं नहीं है। पिछले डेढ दशक  के  दौरान भारत मात्र 65 भगोडों को वापस ला पाया  है। भारत को इस समय 24 मुल्कों से 121 भगोडे के प्रत्यर्पण का इंतजार है। इनमें  भारत का 40 हजार करोड रु हडप गए 31 भगोडे भी  शामिल है। ब्रिटेन से इस समय 17 भगोडे के  प्रत्यर्पण की प्रकिया जारी है।  इनमें आर्थिक अपराधी विजय माल्या ही नहीं, बल्कि गुलशन कुमार हत्याकांड के प्रमुख आरोपी संगीतकार नदी सैफी और ललित मोदी भी  शामिल हैं ।  जिस तरह आसानी से अपराधी विदेष भाग रहे हैं, उससे यह सवाल उठना स्वभाविक है कि ऐसी  प्रत्यर्पण संधि का क्या औचित्य जिसके तहत अपराधियों को विदशों से प्रत्यर्पण  करने में  पसीने छूट जाएं  । उदार नियमों के कारण ही भारत से अपराधी विदेश  भाग कर ऐश -ए -आराम कर रहे हैं। दुनिया मे जिस तेजी से आर्थिक अपराध बढ रहे है,  उसके मद्देनजर  सभी मुल्कों को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि अपराधियों का फौरन  प्रत्यर्पण  हो और उन्हें सजा मिले।