पिछली साल एक अग्रणी अंग्रेजी दैनिक अखबार ने खुलासा किया था कांगडा जिले के 25 गांव की दस हजार आबादी किस तरह प्रदूषित पेयजल पीने के लिए विवश थी। इसमें बताया गया था कि सरकार ने पेयजल स्कीम तो मुहैया कराई है मगर जन स्वास्थय विभाग ने पेय जल सप्लाई के लिए निर्मित कुएं को खुला ही छोड दिया था। इससे लोगों को प्रदूषित एवं अशुद्ध पेयजल की सप्लाई की जा रही थी। लंबे समय से यह सिलसिला चल रहा था। लोगो ने कई बार शिकायत की मगर किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। खबर छपने पर विभाग हरकत में आया तो सही मगर इसकी कोई गारंटी नहीं है कि लोगों को स्वच्छ पेय जल मिल रहा है । पूरे हिमाचल प्रदेश में यही हालात है। नदी किनारे बसे मंडी शहर भी पीने के पानी को तरस रहे हैं। ब्यास नदी किनारे स्थित मंडी शहर में रोजाना बमुश्किल एक घंटा सुबह, एक घंटा शाम पेय जल की सप्लाई होती है और शुद्ध पेयजल की कोई गारंटी नहीं है। राजधानी शिमला में पेयजल क भीशण संकट बना रहता है। गर्मियों में तो कुछ ज्यादा ही। एक तो पेय जल का संकट, उस पर पर्यटकों का भारी रश । आम आदमी का हैरान-परेशान होना स्वभाविक है। शिमला से लगभग 4 किलोमीटर दूर चाबा से सतलुज बहती है आज तक इस नदी से शिमला के लिए पानी लिफ्ट नहीं हो पाया। राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री थे, उन्होंने शिमला के लिए सतलुज से पानी लिफ्ट करने का वाादा किया था मगर कुछ नही हुआ। फिरंगियों ने जब शिमला बसाया था, बसतंपुर के निकट गुम्मा से नॉटी (चंचल ) खडड से पेयजल सप्लाई मुहैया कराई और और इसी खडड के पानी से चाबा में बिजली तैयार की। फिरंगियों के जमने में न तो बिजली का संकट, न ही पीने के पाई की किल्लत। स्वदेशी सरकार के आते ही पीने का पानी का संकट। गर्मियों में स्वच्छ पेयजल की सप्लाई तो दीगर रही, ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को बूंद-बूंद के लिए तरसना पडा है। सरकार का दावा है कि राज्य में प्रति व्यक्ति 70 लीटर पीने का पानी मुहैया कराया जा रहा है मगर इन आंकडों पर विश्वास करना कठिन है। आंकडों को बढा-चढा कर पेश करना नौकरशाही को खूब आता है। युएन के मानदंडों के अनुसार गर्म इलाकों में हर व्यक्ति को रोजाना कम-से-कम 16 लीटर स्वच्छ पीने का पानी पीना चाहिए। स्वच्छ पेय जल हर आदमी की बुनियादी जरुरत है। और अगर आजादी के सात दशक में भी लोगों को स्वच्छ पेयजल के लिए तरसना पडे तो ऐसी आजादी किस काम की़ हर सरकार और उसका मुखिया सत्ता में आते ही लोगों को पेय जल की नियमित आपूर्ति का वायदा करती है। 1977 में शांता कुमार के नेतृत्व वाली सरकार ने सभी “बहनों“ को स्वच्छ पीने का पानी मुहैया कराने का पक्का वायदा किया था। उन्होंने इस दिशा में काम भी किया मगर अढाई साल में ही उनकी सरकार गिर गई। देश में हर नई सरकार को पिछली सरकार को नीचा दिखाने और उसके कार्यक्रमों को निरस्त करने या बदलने की लत है। शांता कुमार की इस योजना को गति नहीं मिल पाई हालांकि 1990 में दोबारा मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने फिर इस महत्वाकांक्षी योजना को रिवाइव करने की हर संभव कोषिष की मगर इस बार भी उनकी सरकार अढाई साल से ज्यादा नहीं चली। लोगों को समयबद्ध सुविधाओं के साथ-साथ इनकी स्पीडी डिलीवरी हर सरकार की प्राथमिकता होची चाहिए। जयराम सरकार भी अपवाद नहीं है।
सोमवार, 30 अप्रैल 2018
आसारामः आस्था के साम्राज्य से जेल तक
Posted on 7:18 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कानून किसी को नहीं बश्ख़्ता । आसाराम और गुरमीत राम रहीम सरीखे स्वंयभू “भगवान“ को भी नहीं। सोलह बरस की अनुयायी से बलात्कार के लिए दोषी पाए गए धर्मगुरु आसाराम को अब जीवन के अंतिम सांस तक जेल में रहना पडेगा। जोधपुर की अदालत ने गत बुधवार को उन्हें बलात्कार के घृणित अपराध के लिए ताउम्र जेल की सजा सुनाई है। आसाराम को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दोषी पाया है। अदालत ने मध्य प्रदेश के छिंडवाडा आश्रम के डायरेक्टर शरत चन्द्र और वार्डन शिल्पी को 20-20 साल की जेल की सजा सुनाई है। पीडिता इसी आश्रम में पढाई किया करती थी। 2013 में पीडिता के गिरकर चोट लगने के उपरांत, उसे इलाज के लिए जोधपुर के मनाई आश्रम लाया गया था। पीडिता के परिजनों को बताया गया कि उस पर भूत-प्रेत का साया है और उसका उपचार आसाराम ही कर सकते हैं। वो उस समय जोधुपुर आश्रम में थे। अगस्त 2013 में नाबालिग लडकी के परिवार ने आसाराम पर बलात्कार का मामला दर्ज करवाया था। आसाराम पर एक अन्य महिला से बलात्कार का मामला भी चल रहा है। आसाराम पर आशीर्वाद देते समय महिलाओं से छेडछाड और उनका यौन शोषण करने के आरोप लगते रहे हैं। आसाराम के अलावा पिछले साल अगस्त से हरियाणा के सिरसा डेरा के संचालक गुरमीत राम रहीम भी बलात्कार के लिए जेल की सलाखों के पीछे हैं। आसाराम की तरह गुरमीत राम रहीम को भी अपनी अनुयायी का यौन शोषण का दोषी पाया गया था। इससे पहले 2010 में सेक्स सीडी सामने आने पर स्वामी नित्यानंद के खिलाफ अश्लीलता और धोखाधडी के मामले दर्ज हुए थे। इस सीडी में स्वामी नित्यानंद को एक अभिनेत्री के साथ शारीरिक संबंध बनाते हुए दिखाया गया था। बंगलुरु में उनके आश्रम से पुलिस छापे के दौरान कंडोम और गांजा तक बरामद हुआ था। 1997 में स्वयंभू इच्छाधारी संत स्वामी भीमानंद को दिल्ली के लाजपत नगर में देह व्यापार चलाने के लिए गिरफ्तार किया गया था। इन प्रकरणों से पता चलता है कि भारत में धर्मगुरुओं के आश्रमों में कैसा गोरखधंधा चलता है और वे किस हद तक गिर सकते है़ं। आसाराम का आस्था का साम्राज्य जितनी तेजी से फैला, उससे कहीं तीव्र रफ्तार से ध्वस्त भी हो गया । गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों के गरीब, पिछडे और आदिवासियों को “दवा, प्रवचन और भजन कीर्तन से शुरु हुआ आसाराम का मायाजाल जल्द ही देश -विदेश तक फैल गया। प्रसाद के साथ अनुयायियो को मुफ्त भोजन की व्यवस्था ने भी आसाराम का सामाज्य फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। देश -विदेश में उनक 400 से ज्यादा आश्रम है और कुल मिलाकर दस हजार करोड की संपत्ति है। आसाराम पर अवैध तरीके से जमीन हथियाने के आरोप भी हैं। आसाराम की वेबसाइट पर अनुयायियो की संख्या चार करोड से ज्यादा बताई गई है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्ययंत्री ता उनके आश्रम में आशीर्वाद लेने आते थे। 2008 में आसाराम के अहमदाबाद के निकट मुटेरा स्थित आश्रम के बाहर दो नाबालिग भाइयों के अधजले शव विकृत अवस्था में बरामद होने के बाद आसाराम का जलवा फीका पडने लग पडा। दोनों बालक आसाराम गुरुकुल के छात्र थे। राज्य सरकार ने इन बालकों की हत्या की जांच के लिए आयोग का गठन किया था मगर आसाराम के रसूख के कारण इस रिपोर्ट को दबा दिया गया। बलात्कार पीडिता के माता-पिता 2013 से पहले आसाराम के कटटर अनुयायी थे। पीडिता के पिता ने शाहजहांपुर में अपने खर्चे पर आसाराम का आश्रम बनाया था। संस्कारित शिक्षा की उम्मीद में उन्होंने अपने दो बच्चों को छिंडवाडा आश्रम में भेजा था। पीडिता से बलात्कार ने इस परिवार की आस्था को ही चकनाचूर कर दिया है। इस प्रकरण ने बाबाओं और धर्मगुरुओं पर गहरी आस्था रखने वालो “भक्तों“ का विश्वास भी तोडा है। भारत में आश्रम संस्कारित शिक्षा, अनुशासित आचरण, नैतिकता और मर्यादा के स्तंभ रहे है। आसाराम जैसे स्वयंभू “धर्मगुरु“ ने भारत की इस समृद्ध संस्कृति को शर्मसार कर रहे हैं।
बुधवार, 25 अप्रैल 2018
महाभियोग पर किरकिरी
Posted on 10:11 am by mnfaindia.blogspot.com/
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पर कांग्रेस ने अपनी ही किरकिरी करवाई है। कांग्रेस समेत सात विपक्षी दलों ने पिछले सप्ताह राज्यसभा के सभापति को देश के मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव देकर अभूतपूर्व कदम उठाया था। न्यायविद इसे न्यायपालिका के इतिहास का काला दिन बता रहे हैं। राज्यसभा के सभापति एवं उप-राष्ट्र्पति वैंकेया नायडू ने सोमवार को इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया है। देष के उप-राश्ट्रपति ही राज्यसभा के सभापति भी हैं। अधिकतर न्यायविदों को लगता है कि कांग्रेस ने जल्दबाजी में प्रस्ताव पेष कर इस मुद्दे पर खामख्वाह अपनी भद पिटवाई है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष सरीखे उच्चस्थ संवैधानिक पद पर आसीन जज को हटाने के लिए अत्याधिक ठोस वजह होनी चाहिए। सुनी-सुनाई बातों अथवा प्रैस कॉन्फ्रेस में लगाए गए आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को नहीं हटाया जा सकता। न्यायाधीश किसी पार्टी अथवा विचारधारा से सम्बंद्ध नहीं होते हैं और न ही उन्हें इस नजरिए से देखा जाना चाहिए। अब यह बात भी सामने आई है कि महाभियोग प्रस्ताव पर सात पूर्व सांसदों के भी दस्तख्त थे। इससे यही लग रहा है कि प्रस्ताव काफी पहले तैयार कर लिया गया था। इससे भाजपा के इन आरोपों की पुष्टि होती है कि महाभियोग प्रस्ताव पेश करने से पहले कांग्रेस जज लोया पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार कर रही थी और जैसे ही फैसला पक्ष में नहीं आया, कांग्रेस ने राज्यसभा सभापति को महाभियोग प्रस्ताव सौंप दिया। इससे कांग्रेस पर इस बात का संदेह होना स्वभाविक है कि पार्टी ने “बदले की भावना“ से काम किया है। महाभियोग प्रस्ताव के लिए हालांकि कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के आरोपों को भी आधार बनाया है मगर न्यायविद मानते हैं कि जस्टिस चेमलेशवर, जस्टिस रंजन गोगई, कुरियन जोसेफ और जस्टिस मदन लोकुर का विरोध एकदम अलग था और उनकी भावनाओं को महाभियोग का मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। महाभियोग प्रस्ताव के लिए पुख्ता सबूतों की जरुरत होती है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग अत्याधिक गंभीर मुद्दा है और इसे बगैर फूलप्रूफ सबूतं के पेष करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट अथवा हाई कोर्ट के जज को महाभियोग प्रस्ताव से ही हटाया जा सकता है मगर इस तरह के प्रस्ताव को पारित करवाने के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की दरकार होती है। विपक्ष दो-तिहाई बहुमत जुटा पाएगा, यह लगभग नामुमकिन है। इतना प्रचंड बहुमत केवल सत्तारूढ दल के पास ही होता है। इस स्थिति में जाहिर है सत्तारूढ दल के समर्थन के बगैर महाभियोग का प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता। कांग्रेस और महाभियोग पर उसका समर्थन करने वाला राजनीतिक दल यह बात बखूबी जानते हैं। फिर महाभियोग प्रस्ताव लाने का क्या औचित्य? वैसे भी चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा इस साल दो अक्टूबर को रिटायर होमे जा रहे हैं और अगर क्षण भर के लिए मान भी लिया जाए कि महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार हो जाता, तो भी पूरी प्रकिया पूरी होने तक जस्टिस मिश्रा रिटायर हो जाते। महाभियोग एक लंबी प्रकिया है। लोकसभा अथवा राज्यसभा में प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद तीन सदस्यीय समिति का गठन किया जाता है और यह समिति महाभियोग के लिए पेष सबूतों की जांच करती है। इसमें समय लगता है। समिति की रिपोर्ट पर संसद में महाभियोग का प्रस्ताव पारित होता है और इसके बाद ही राश्ट्रपति से दोशी जज को हटाने की सिफारिष की जाती है। आज तक किसी भी जज को महाभियोग से नहीं हटाया गया है। इससे साफ होता है कि कांग्रेस और विपक्ष न्यायपालिका पर दबाव डालना चाहते हैं। न्यायापालिका की स्वायतता और निश्पक्षता के लिए इस तरह का प्रयास बेहद खतरनाक है। यही अब एकमात्र ऐसी संस्था है जिस पर लोगों को भरोसा है। न्यायपालिका की विष्वसनीयता हर हाल में राजनीति से ऊपर रखी जानी चाहिए।
मंगलवार, 24 अप्रैल 2018
Why Political Party, There Are Other Options Too ?
Posted on 6:37 pm by mnfaindia.blogspot.com/
खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक्दर से पहले, खुदा बन्दे से खुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है“, समाज में कुछ कर दिखाने वालों पर यह षेयर सौ फीसदी मौजूं होता है। “खुदी को बुलंद करना“ हर आदमी के बूते की बात नहीं होती है। जिनके इरादे मजबूत होतें, वही समाज के लिए कुछ कर पाते हैं। देष की अलग-अलग प्रोद्योगिक संस्थानों से पढे 50 पूर्व छात्रों ने ऐसा ही कुछ कर दिखाने की ठानी है। प्रतिश्ठित प्रोद्योगिक संस्थानों (आईआईटी) में पढकर मोटी तन्ख्वाह और ऊंचा पद पाना हर युवक का दिव्य सपना होता है और इसे हकीकत में बदलने के लिए दिन-रात परिश्रम करता है, मगर इन 50 पूर्व छात्रों ने अपनी पूर्ण कालीन नौकरी-व्यवसाय छोडकर राजनीतिक पार्टी बनाई है। अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अन्य पिछडा वर्ग के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के मकसद से गठित इस पार्टी का नाम बहुजन आजादी पार्टी रखा गया है। इस पार्टी को निर्वाचन आयोग के पास पंजीकरण के लिए भेजा गया है और इसकी प्रतीक्षा की जा रही है और इस बीच सभौ 50 आईआईटी एलुमिनी जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं। पार्टी के प्रवक्ता का कहना है कि वे आनन-फानन में काम नहीं करना चाहते हैं। मजूबत इरादों से राजनीतिक अखाडे में उतरे इन युवकों का आगे का सफर बेहद कठिन है और पग-पग पर उन्हें तरह-तरह की रुकावटों का सामना करना पड सकता है। देष की ठेठ देसी सियासत और उसके काइंया नेता अपनी बिरादरी से बाहरी लोगों को जरा भी बर्दाष्त नहीं करते है और आज तक जितने भी “सज्जन“ सियासत में आए, दुर्ज्जनों ने भगा दिए या वे खुद ही मैदान छोड कर भाग गए। समकालीन भारतीय राजनीति:छल-कपट और झूठ-फरेब की पर्यावाची बन चुकी है और इसमें “सज्जन“ और योग्य व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। सियासत में आईआईटियन की क्या दुर्दषा होती है और किस तरह “सज्जन“ व्यक्ति “दुर्जन“ और नायक से खलनायक बन जाता है, आम आदमी पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल इसकी मिसाल है। देष में परपंरागत राजनीति से हटकर मर्यादित और मूल्य आधारित सियासत का वायदा करते-करते केजरीवाल खुद ही मर्यादा और मूल्यों की कद्र करना भूल गए। और पांच साल में उनकी हालत “न खुदा मिला, न विसाले सनम“ जैसी हो गई है। बहरहाल, देष के 50 आईआईटियन राजनीतिक पार्टी बनाकर “अनुसूचित जाति-जनजाति और अन्य पिछडे वर्ग का कैसे उद्धार करेंगे इसका कुछ-कुछ अनुमान भी से हो जाता है। समाज के षोशित तबकों का उत्त्थन बगैर राजनीतिक दल बनाए और अच्छे से किया जा सकता है। आचार्य विनोबा भवे ने “भूदानः आंदोलन चलाकर देष के भूमिहीनों के लिए अद्धितीय काम किया था। मदर टेरेसा का योगदान देष भुलाए भी नहीं भुलाया जा सकता है। बाबा आम्टे, पांडुरंग षास्त्री अथवले, गोपाल गणिष आगरकर सरीखे समाज सुधारकों का देष और समाज के लिए “राजनेताओं“ से कहीं बढकर योगदान दिया है। अन्ना हजारे लंबे समय से समाज सुधार का काम कर रहे हैं और उनका योगदान अरविंद केजरीवाल से कहीं ज्यादा बेहतर है। राजनीति सत्ता हथियाने का जरिया मात्र रह गया है। इससे सियासी नेताओं के सिवा समाज के किसी वर्ग का आर्थिक उत्त्थान नहीं हो पाया है। किसान बेहाल है, कामगारों का षोशण बदस्तूर जारी है। आजादी के सात दषक बाद भी दलितों का समग्र सामाजिक-आर्थिक उत्थान नहीं हो पाया है। वृद्ध गरीब और बेसहारा को सामाजिक सुरक्षा मिले न मिले मगर सांसदों और विधायकों को मोटी पेंषन जरुर मिल रही है, अवाम को अब सियासी नेताओं पर जरा भी भरोसा नहीं है। इन हालात में आईआईटियन को अगर वाकई दलितों और अन्य पिछडे वर्गर के लिए कुछ करना है तो राजनीति के अलावा और कई विकल्प है। ाजनीति में अपनी विष्वसनीयता को खतरे में डालने की बजाए, इन विकल्पों को आजमाया जाना ही उन युवाओं के लिए बेहतर होगा।
महाभियोगः न्यायपलिका पर प्रहार
Posted on 6:35 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों द्वारा शुक्रवार को देश के मुख्य न्यायाधी जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का नोटिस बेहद दुखद है। कई दिनों से इस बात की चर्चा हो रही थी। प्रस्ताव का पारित होना तो दीगर रहा, कांग्रेस के पास लोकसभा में प्रस्ताव पेष करने के लिए भी पर्याप्त सांसदों का समर्थन नहीं है। लोकसभा में प्रस्ताव पेष करने के लिए कम-से-कम 100 सांसदों के दस्तखत की जरुरत होती है। महाभियोग का प्रस्ताव राज्यसभा में पेष करने के लिए 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। षुक्रवार को पेष महाभियोग प्रस्ताव पर 71 सांसदों के दस्तखत हैं। और अगर राज्यसभा अध्यक्ष एवं उप-राश्ट्रपति ने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तो जस्टिस दीपक मिश्रा महाभियोग का सामना करने वाले पहले मुख्य न्यायाधीष होंगे। राश्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों को हटाने के लिए महाभियोग प्रकिया का इस्तेमाल किया जाता है। इससे पहले एक बार सुप्रीम कोर्ट के जज और एक बार हाई कोर्ट जज के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव पेष तो हुए मगर पारित नहीं हो पाए। देष की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव पेष किया गया है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट के जज वी रामास्वामी महाभियोग का सामना करने वाले पहले जज थे मगर यह महाभियोग प्रस्ताव लोक सभा में गिर गया था। तब सतारूढ दल कांग्रेस ने महाभियोग प्रस्ताव में हिस्सा नहीं लिया था, इसलिए यह पारित नहीं हो पाया। इसके लिए वही तर्क दिए गए, जो अब सत्त्तारूढ दल दे रहा है। कलकत्ता हाई कोर्ट के जज सौमित्र सेन के खिलाफ 2011 में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था। राज्यसभा में प्रस्ताव पारित भी हो गया मगर इससे पहले कि लोकसभा इसे पारित करती, उन्होंने खुद ही इस्तीफा दे दिया। 2011 में सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस पीडी दिनाकरन ने महाभियोग प्रस्ताव पेष होने से पहले ही पद छोड दिया था। 2015 में गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस जे बी पार्टीवाला पर जाति से जुडी अमर्यादित टिप्पणी के लिए महाभियोग लाने की तैयारी चल ही रही थी कि उन्होंने माफी मांग ली और मामला आगे नहीं बढा। उसी साल मध्य प्रदेष हाई कोर्ट के जस्टिस एसके गंगेल के खिलाफ जांच के दौरान आरोप साबित नहीं होने के कारण महाभियोग का प्रस्ताव नहीं लाया जा सका। आंध्र प्रदेष -तेलंगाना के जस्टिस सीवी नागार्जुन के खिलाफ 2016 और 2017 में दो बार महाभियोग लाने की कोषिष की गई मगर दोनों ही बार प्रस्ताव को प्रयाप्त समर्थन नहीं मिला। जजों के खिलाफ महाभियोग लाने की लंबी और जटिल प्रकिया है। पहले प्रस्ताव पेष करने के लिए पर्याप्त समर्थन की दरकार होती है, फिर संसद में पारित करवाने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरुरत। इतना (दो-तिहाही ) बहुमत सिर्फ सतारूढ दल के पास ही होता है, विपक्ष के पास नहीं। इस बात के दृश्टिगत सतारूढ दल के समर्थन के बगैर राश्ट्रपति अथवा जजों के खिलाफ महाभियोग का पारित होना कतई मुमकिन नहीं है। कांग्रेस और महाभियोग लाने वाली पार्टियां यह बात भली-भांति जानती है। फिर देष के मुख्य न्यायाधीष के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने का क्या औचित्य? जाहिर है यह सब न्यायपालिका पर दबाव डालने के लिए किया जा रहा है। कांग्रेस ने जो पांच कारण गिनाए हैं, उनमें भी “राजनीतिक स्वार्थ“ की बू आ रही है। कांग्रेस के वरिश्ठ नेता और पेषे से वकील सलमान खुर्षीद ने प्रस्ताव का मुखर विरोध किया है। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह ने भी प्रस्ताव पर दस्तखत नहीं किए है। साफ है महाभियोग पर कांग्रेस में ही मतभेद है। न्यायपालिका की निश्पक्षता और स्वायत्तता लाने के लिए ही संविधान में महाभियोग की व्यवस्था की गई है। देष में न्यायपालिका ही एकमात्र विष्वसनीय संस्था रह गई है। अवाम इस पर पूरा भरोसा करती है। सियासी लोग अब इस संस्था की निश्पक्षता को भी पचा नहीं पा रहे हैं।
शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018
सामाजिक एकता की मिसाल
Posted on 6:42 pm by mnfaindia.blogspot.com/
हैदराबाद के पुजारी ने दलित को अपने कंधों पर बिठाकर मंदिर के अभराण्य तक ले जाकर सामाजिक समरसता की अद्धितीय मिसाल पेश की है। देश में सामाजिक एकता का संदेश फैलाने के लिए हैदराबाद के चिरकुल बालाजी मंदिर के पुजारी ने गत सोमवार को यह अनुष्ठान सपन्न किया। 2700 साल पुराने “मुनी वाहन सेवा“ नाम का यह अनुष्ठान भारत की सनातनी उदार और सामाजिक समरस व्यवस्था का द्योतक है। इससे पता चलता है कि जात-पात के बावजूद भारतीय समाज के विभिन्न समुदायों में हमेशा “ सामाजिक भाईचारा“ बना रहा है। सनातनी भारत में न तो प्राचीन काल में और न समकालीन समाज में समाज को बांटने की “ओछी“ मानसिकता रही है। आधुनिक भारत में सियासी पार्टियां और दबंग अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए यह काम भले ही बखूबी कर रही हों , मगर अवाम ने इसे कभी भी स्वीकार नही किया है। इसी कारण कमजोर और पिछडे तबकों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान आज भी सबसे बडी चुनौती है। दक्षिण भारत में आज भी कई मंदिरों में अनुसूचित जाति से संबंधित लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं है। चाय की दुकानों पर दलितों के लिए अलग प्यालियों में चाय दी जाती है। उनकी महिलाओं का सामाजिक और शारीरिक उत्पीडन किया जाता है और मांगने पर भी त्वरित तो दीगर रहा, देर से भी न्याय नही मिलता है। असहिष्णुता के मौजूदा माहौल में हैदराबाद के पुजारी का यह संदेश अनुकरणीय है। पिछले कुछ समय से दलित अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं मगर इसका भी विरोध होना शुरु हो गया है। सुप्रीम कोर्ट की अजा-जजा एक्ट के तहत त्वरित गिरफ्तारी के फैसले के खिलाफ दलितों के दो अप्रैल को आहुत “भारत बंद“ के जवाब में 10 अप्रैल के बंद से सामाजिक एकता विखंडित हुई है । इससे पहले पहली जनवरी को महाराष्ट्र में भीमा कोरेगांव की 200वीं वर्षगांठ मनाने पर भी अनुसूचित जातियों और सवर्णों के बीच जबरदस्त टकराव हुआ था। आजादी के सात दशक बाद भी देश में सामाजिक और सामुदायिक समरसता मजबूत होने की बजाए उतरोत्तर कमजोर ही हो रही है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार 2015, 16 और 2017 के दौरान दलितों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढे हैं। 2015 में दलितों के खिलाफ 38,670 मामले दर्ज हुए थे। 2016 में 40, 801 मामले दर्ज किए गए और सबसे ज्यादा भाजपा शासित उत्तर प्रदेश , राजस्थान और बिहार में। 2017 में तो दलितों के खिलाफ दबंगो के अत्याचारों में और ज्यादा इजाफा हुआ था । पांच मई, 2017 को उत्तर प्रदेश में सहारनपुर जिले के शब्बीरपुर गांव में सवर्णों ने दलितं के 50 से ज्यादा जला डाले थे। दो दिन बाद 7 मई को मध्य प्रदेश के एक गांव में दलित दूल्हे को बेरहमी से पीटा गया। उसका बस इतना कसूर था कि वह बारातियों के साथ कार में सवार था। जून, 2017 में कर्नाटक में एक दलित को सवर्ण लडकी को भगा कर ले जाने के संदेह में पेड से बांधकर पीट-पीट कर अधमरा कर दिया गया। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि जिन क्षेत्रों में कटटरपंतियों का दबदबा है, वहां सवर्णों की दबंगई कुछ ज्यादा ही है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद असहिष्णुता भी बढी है। बहरहाल, दलितों पर अत्याचार का यह सिलसिला अंतहीन है। सरकार ने सख्त कानून बना रखे हैं मगर इन्हें लागू करने वालों में दलितों की संख्या बहुत कम है। इसलिए सख्त कानून भी कमजोर तबकों की मदद नहीं कर पा रहे हैं। सामाजिक टकराव भारत की “विविधता में एकता“ के बृहद भारत के लिए शुभ नहीं है। यही एकता आज तक समस्त भारत को एकसूत्र में बांधे रखे हुए हैं। हैदराबाद के मंदिर पुजारी ने जो मिसाल पेश की है,, उसे पूरे देश श में फोलो करने की जरुरत है।
गुरुवार, 19 अप्रैल 2018
नगदी का संकट क्यों?
Posted on 8:27 pm by mnfaindia.blogspot.com/
घर पर बेटी को ब्याहने बारात लेकर दुल्हा आ चुका है मगर घरवालों के पास बारातियों के स्वागत के लिए नगदी नहीं है। परिवार के कुछ सदस्य नगदी निकालने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। यह परिदृश्य पंजाब समेत देश के कई राज्यों में व्याप्त नगदी के संकट के कारण देखा जा सकता है। नगदी के मौजूदा संकट ने नोटबंदी “युग“ की याद ताजा कर दी है। पिछले कुछ दिनों से पंजाब, मध्य प्रदेश , तेलंगाना, बिहार, कर्नाटक, असम, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में नगदी का भारी संकट व्याप्त है। नवंबर, 2016 में मोदी सरकार द्वारा अचानक 500 और 1000 रुपए के नोट बंद किए जाने से पूरे देश में महीनों नगदी के लिए मारा-मारी मची रही और कतारों में खडे-खडे 100 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी। नगदी का ताजा संकट काला धन के जमा होने की ओर इशारा कर रहा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने भी माना है कि पिछले कुछ दिनों के दौरान अचानक नगदी की मांग बढी है। इसे बैशाखी, बिहू और अन्य त्योहारों एवं रबी फसल कटाई और मंडीकरण से जोडकर भी देखा जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार फसल कटाई के बाद हर साल मंडी में लाई जाती है। इससे पहले तो कभी भी नगदी का संकट खडा नहीं हुआ़़। फिर इस बार क्यों़? नगदी संकट का एक और कारण आरबीआई का प्रतिबंध भी हो सकता है। लगभग एक माह पहले आरबीआई ने बैंकों पर एक सर्कल से दूसरे में नगदी ले जाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। वित्त मंत्रालय के आंकडों अनुसार इस माह के पहले 13 दिनों के दौरान करंसी सप्लाई में 45,000 करोड रु का इजाफा हुआ है। आरबीआई हर रोज सिस्टम में 20,000 करोड की नगदी डालता है। नगदी क संकट को देखते हुए आरबीआई ने अब हर रोज 70,000 से 75,000 नगदी डालने का निर्णय लिया है। वित्त मंत्रालय के अनुसार जिस अनुपात में 2000 रु के नोट सिस्टम में सर्कुलेट हो रहे हैं, उस अनुपात में वापस नहीं आ रहे हैं। देश में 2000 रु के 6.7 लाख करोड रु के नोट सर्कुलेशन में है, मगर इनमेंसे 60 से 70 फीसदी ही सिस्टम में वापस आ रहे हैं। इससे साफ जाहिर है कि 2000 रु की जमाखोरी की जा रही है और इसे काले धन के रुप में छिपाया जा रहा है। अगर ऐसा है तो काले धन को बाहर निकालने के प्रयासो पर पानी फिरता नजर आ रहा है। इससे इस बात का भी पता चलता है कि काले धन को नोटबंदी से खत्म करना कारगर उपाय नहीं हे। पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह, नोबेल विजेता नामचीन अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और कई अन्य अब तक यह कर रहे हैं और नोटबंदी को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक बता चुके हैं। यह बात तो साफ है कि सिस्टम से 2000 रु के नोटों की जमाखोरी की जा रही है। मार्च के अंत तक देश में 18.29 लाख करोड की नगदी थी जबकि नोटबंदी के समय सिस्टम में 17.89 लाख करोड रु की नगदी थी। इसके बावजूद अगर नगदी का संकट हो, तो माना जाना चाहिए कि कहीं न कहीं भारी गडबड है। कर्नाटक विधानसभा से पहले राज्य में नगदी का संकट भारतीय जनता पार्टी को भारी पड सकता है। इस साल के अंत में मध्य प्रदेश , छत्तीसगढ और राजस्थान में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। नगदी संकट के लिए सरकार ने इशारों-इशारों में साजिश की आशंका जताई है। अफवाहों ने नगदी संकट से उत्पन्न स्थिति को और विकट बना दिया है। नगदी का संकट जल्द समाप्त होने वाला नहीं है। सरकार ने भी माना है कि नगदी का संकट अभी कम-से-कम एक सप्ताह जारी रह सकता है।
बुधवार, 18 अप्रैल 2018
तीसरा विश्व युद्ध ?
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विश्व सीरिया पर अमेरिका, फ्रांस और इंग्लैंड के मिसाइल हमलों के बाद से रुस और पश्चिम देशों के बीच तनाव और बढ गया है। सीरिया में विद्रोहियों के कब्जे वाले डूमा शहर पर असद की सेना ने पिछले सप्ताह नर्व एजेंट से रासायनिक हमला किया था जिसमें 70 से ज्यादा लोग मारे गए थे। इसके प्रतिक्रियास्वरुप गत शनिवार को अमेरिका और उसके मित्र फ्रांस और इंग्लैंड ने सीरिया पर मिसाइलों से हमला किया और दावा किया कि हमलों में सीरिया रासायनिक लैब नष्ट कर दी गई है।हमले इसी मकसद से किए गए थे। सीरिया में यह सिला पिछले सात साल से जारी है। गृह युद्ध से त्रस्त सीरिया को बडी ताकतों ने युद्ध का अखाडा बना रखा है। इस युद्ध विभीषका में कब दोस्त दुश्मन बन जाता है, इसका पता तक नहीं चलता। सीरिया ही नहीं अंतरराष्ट्रीय हालात अत्याधिक तनावपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार शीत युद्ध, दक्षिण चीन सागर पर बढता तनाव, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जॉन उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आए दिन की परमाणू हमलों की धमकियां और आपस में भिडते पडोसी पूरे विश्व को तीसरे वर्ल्ड वार की आशंका से डराने-धमकाने के लिए काफी है। नवंबर, 2017 में उत्तर कोरिया ने खुद को न्यूक्लियर पॉवर घोषित करके तीसरा विश्व युद्ध का सायरन तक बजा दिया था। तब अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने शीत युद्ध के बाद तब पहली बार अपने न्यूक्लियर बम दस्ते को 24 घंटे के अलर्ट पर रखा था। इंग्लैड के सलसबरी में रह रहे रुस के पूर्व जासूस सर्गेई स्क्रिपल की हत्या की कोशिश के कारण पश्चिम और रुस में संबंध पहले ही बिगड चुके थे। इस प्रकरण के बाद पश्चिम देशों ने रुस के 130 राजनयिकों को निकाल दिया था। और अब सीरिया पर ताजा हमले से रुस के साथ-साथ मध्य-पूर्व की बडी शक्ति ईरान भी भनभनाया हुआ है। ईरान अमेरिकी की दबंगई से पीडित रहा है और न्यूक्लियर परीक्षण के लिए अमेरिकी प्रतिबंध भी झेल चुका है। इजरायल के दखल को रोकने के लिए सीरिया में ईरान ने बाकायदा लडाकू सैनिक तैनात कर रखे हैं। सीरिया में उर्जा संयंत्र स्थापित करने और चलाने के लिए असद सरकार को मुफ्त में तेल और तकनीकी मदद भी दे रहा है। और यह सब ईरान अमेरिका और इजरायल की दबंगई रोकने के लिए कर रहा है। शिया बहुल आबादी वाला ईरान शियाओं बहुल देशों की अगुआई करता है। सीरिया में हालाकि सुन्नी मुसलमानों की आबादी ज्यादा है मगर ईरान राष्ट्रपति असद को षिया मुसलमान मानता है। सुन्नी मुसलमानों का लीडर सउदी अरबिया और अन्य सुन्नी बहुल देश सीरिया में रुस की दखलादांजी के सख्त खिलाफ हैं और अमेरिका के पीछे खडे हैं। असली लडाई शिया और सुन्नी के बीच है। ईरान और सउदी अरबिया दोनों में अरब देषों की होड है और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसी मकसद से वे बडी ताकतों की षरण में जाते हैं। और बडी ताकतें अपने फायदे के लिए छोटे देषों की युद्ध की भठ्ठी में झोंकने का कोई मौका नही चूकते हैं। पहले वियतनाम, फिर कंबोडिया , इराक और अब सीरिया। यमन, लेबनान, ईरान-इराक युद्ध से लेकर अफगानिस्तान, सीरिया गृह युद्ध और कोरियाई प्रायद्धीप में भी यही सब हो रहा है। युद्ध से बडी ताकतों की कमाई होती है और छोटे देशों की तबाही। ग्लोबल पीस इंडेक्स की रिपोर्ट के अनुसार 2015 इस सदी का अब तक सबसे खराब साल रहा है। 2015 में विभिन्न क्लॅशेस ( युद्ध) से वैश्विक अर्थव्यवस्था को 13.6 खरब (परचेजिंग पॉवर पैरिटी) का नुकसान उठाना पडा था। यानी प्रति व्यक्ति पांच डॉलर का नुकसान। अगर इस धन को भुखमरी और गरीबी हटाने के लिए खर्च किया जाता, आधी आबादी का आर्थिक उत्थान हो सकता था। दुनिया का कोई भी देश युद्ध नहीं चाहता मगर फिर भी हथियार खरीद पर बेतहाशा खर्च करता है। अगला युद्ध परमाणु हथियारों से लडा जाएगा और अगर युद्ध हुआ तो 48 घंटों के दौरान हर शहर की तीन लाख आबादी खत्म हो जाएगी। कोई भी देश ऐसा नहीं चाहेगा।
बेटियों ने बढाया देश का मान
Posted on 8:33 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जम्मू-कश्मीर के कठुआ, गुजरात के सूरत और हरियाणा के रोहतक में मानवता को शर्मसार करती अबोध बालिकाओं की बलात्कार के बाद निर्मम हत्याओं से पूरा देश गुस्से में है। जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं और वहशी हत्यारों को फांसी की मांग की जा रही है। समाज के इस विकृत चेहरे से दुनिया में देश की छवि धूमिल हो रही है। विकास और प्रगति के कोई मायने नहीं रह जाते हैं अगर हम अपनी बेटियों को “हवस के भेडियों“ से न बचा पाएं। एक ओर जहां महिलाओं की भयवाह स्थिति से पूरा देश चिंतित है, वहीं आस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में रविवार को सपन्न राष्ट्रमंडल खेलों में बेटियों के शानदार प्रदर्शन से देशवासी गौरवान्वित हुए हैं। आठ साल बाद कॉमनवैल्थ गेम्स-2018 में भारत ने 26 सोने के तमगे समेत 66 मेडल जीतकर अच्छा प्रदर्शन किया है। 2010 में दिल्ली में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने सबसे ज्यादा 100 मेडल जीते थे। चार साल पहले इंग्लैंड के ग्लास्को में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत ने 64 मेडल जीते थे। 13 बिलियन आबादी वाला भारत अभी भी 24 मिलियन आबादी वाले आस्ट्रेलिया और 66 मिलियन आबादी वाले इंग्लैंड से काफी पीछे है। मेजबान आस्ट्रेलिया ने 80 गोल्ड मेडल समेत कुल 198 पदक जीते हैं और 45 गोल्ड समेत 136 मेडल हासिल करने वाला इंग्लैंड भारत से कहीं आगे है। इस बार के राष्ट्रमंडल खेलों में बेटियों का प्रदर्शन इसलिए भी अभूतपूर्व रहा है कि पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों में भाग लेने वाली हरियाणा की 16 साल की बेटी मनु भाखर ने गोल्ड मेडल जीत कर नया रिकॉर्ड बनाया है तो 35 वर्षीय मेरी कॉम ने पहला कॉमनवैल्थ मेडल जीता है। मनु भाखर के अलावा निशानेबाज तेजस्वनी सावंत ने भी गोल्ड कोस्ट में नया रिकॉर्ड बनाकर देश का नाम रोशन किया है। 22 साल की मनिका बत्रा ने राष्ट्रमंडल खेलों में पहली बार भारत को टेबिल टेनिस में गोल्ड मेडल के अलावा चार-चार मेडल दिलवाए। आधे गोल्ड मेडल (12) महिलाओं ने जीते है और एक गोल्ड मेडल मिक्स वर्ग (महिला-पुरुष ) में जीता गया है। राष्ट्रमंडल खेलों में बेटियों की सफलता पर देशवासियों को गर्व है मगर इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें आज भी पुरुष प्रधान समाज में भेदभाव और कडे संघर्ष का सामना करना पडता है। महाराष्ट्र की निशानेबाज तेजस्वनी सावंत विदेशी राइफल खरीदने के लिए पैसे तक नहीं जुटा पाई थी। अपनी बेटी के सपने को पूरा करने के लिए उनके पिता को मदद के लिए दर-दर भटकना पडा था। गोल्ड कोस्ट मे भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाने वाली वेटलिफ्टर मीराबाई चीनू प्रतिदिन 40 किलोमीटर साइकल चलाकर प्रशिक्षण लिया करती थी। लोहे के बार नहीं मिलते तो बांस के बार से प्रेक्टिस करती। मेरी कॉम ने जब बॉक्सर बनने की ठानी, उन्हें प्रोत्साहित करने की बजाए लोग-बाग उनका मजाक उडाया करते थे। मगर उन्होंने हार नहीं मानी। 222 किलोग्राम वेट उठाकर भारत के लिए गोल्ड जीतने वाली 22 साल की पूनम यादव को इस मुकाम तक पहुंचने के लिए कडा संघर्ष करना पडा। पिता की कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण पूनम को वेट लिफ्टिंग के साथ-साथ पारिवारिक आर्थिक भार भी उठाना पडता था। गोल्ड कोस्ट मे कांस्य पदक जीतने वाली दिव्या काकरन को घर क बोझ उठाने के लिए गांव-गांव जाकर लडकों से कुश्ती लड़नी पडती क्योंकि ऐसा करने से ज्यादा कमाई होती मगर साथ में ताने भी मिलते। लगभग हर महिला के जूझारुपन के जज्बाती किस्से हैं। सामाजिक उत्पीडन के साथ-साथ भारत में महिला खिलाडियों को हर मुकाम पर नई चुनौती का सामना करना पडता है। कुश्ती तो एक जमाने में महिलाओं के लिए लगभग वर्जित थी। इसे पुरुषों की बपौती माना जाता था। बहरहाल, तरह-तरह की चुनौतियों के बावजूद महिलाओं ने इस बार राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों को भी पीछे छोड दिया है। भारत को इस बात का सकून है कि उसने पाकिस्तान की तुलना में कही ज्यादा मेडल जीते हैं।
शनिवार, 14 अप्रैल 2018
इंसाफ के लिए कहां जाएं ?
Posted on 9:50 am by mnfaindia.blogspot.com/
उत्तर प्रदेश के उन्नाव में नाबालिग युवती और आतंकी हिंसा से जूझ रहे जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में आठ साल की बालिका से बलात्कार जैसे जघन्य अमानवीय अपराध ने एक फिर भारत की “राश्ट्रीय अस्मिता“ को तार-तार कर दिया है। उन्नाव में सत्तारूढ दल भाजपा के विधायक पर नाबालिग लडकी से बलात्कार का आरोप है। जनता के भारी दबाव पर पुलिस ने विधायक के खिलाफ पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसिस एक्ट) के तहत मामला दर्ज तो कर लिया है मगर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। बाद में अदालत के आदेश पर उन्हें गिरफ्तार किया गया । नियमानुसार, भारतीय दंड संहिता के सेक्शन 363 (अपहरण), 366 ( अवैध संभोग), 376 (बलात्कार) और 506 (आपराधिक धमकी-ह्त्या) के तहत तुरंत गिरफ्तारी होनी चाहिए। आरोपी सत्तारूढ विधायक है, इसलिए पुलिस गिरफ्तारी से पल्ला झाड रही है जबकि यही पुलिस आम आदमी को इस तरह के जघन्य अपराध में फौरन गिरफ्तार कर लेती है। पुलिस का कथन है कि आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं मिले हैं जबकि सबूतों के बगैर पॉक्सो एक्ट के तहत मामला बनता ही नहीं है। यही पुलिस बलात्कार के आरोप पर पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति को गिरफ्तार कर चुकी है। उन्नाव बलात्कार पीडिता के पिता की पुलिस कस्टडी में मौत भी हो चुकी है। राज्य के प्रमुख गृह सचिव और डीजीपी पुलिस का आरोपी विधायक को “माननीय“ कहकर संबोधित करना साफ बता रहा है कि आरोपी को बचाया जा रहा है। बहरहाल “सरकारी तोतों“ की इस कार्यशैली पर किसी को हैरानी नहीं है। भारत में पुलिस का काम बस वीवीआईपी की सुरक्षा और रक्षा करना है। आम जनता के लिए उसके पास न तो समय है और न ही फोर्स । पुलिस की इसी कार्यशैली के कारण अपराधी अक्सर सजा से बच जाते हैं। बहरहाल, उन्नाव से कहीं ज्यादा संगीन जम्मू-कष्मीर के कठुआ जिले की आठ साल की बालिका की बलात्कार के बाद जघन्य हत्या का मामला है। राष्ट्रीय मीडिया उन्नाव बलात्कार मामले को खूब उछाल रहा है मगर कठुआ जिले में रसाना गांव की बालिका की हत्या और बलात्कार मामले को जम्मू के अखबारों ने भी नहीं उछाला। आठ साल की इस बालिका की इस साल जनवरी में बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। बालिका घुमंतु गुज्जर समुदाय से ताल्लुक रखती थी। 10 जनवरी को दोपहर बाद आसिफा अपने पषुओं को लाने पास के जंगल गई और एक सप्ताह बाद 17 जनवरी को उसकी लाष ही मिली। बालिका की अस्मिता को नोंच-नोच कर लूटा गया था।उसके लापता होने के दो दिन बाद परिजन जब उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखाने कठुआ थाने गए, उन्हें थानेदार ने यह कहकर भगा दिया कि “ पुलिस का सिरदर्द न बढाओ“। बाद में जब मामले पर बवाल मचा, थानेदार को सस्पेंड करना पडा। पुलिस का रवैया कितना पक्षपातपूर्ण था, इसका पता इस बात से चलता है कि लापता बालिका को तलाशने जिन पुलिसकर्मियों को भेजा गया, उन्होंने उस जगह को जानबूझकर नहीं तलाशा जिस जगह बालिका को छिपाया गया था। बालिका को एक मंदिर मंे छिपाया गया था। जंाच पर खुलासा हुआ कि बालिका को नशे की गोलियां खिलाई गईं, उसे बार-बार बलात्कार और टार्चर किया गया। गुज्जरों के भारी विरोध प्रदर्शन पर तीन महीने बाद इस जघन्य अपराध के लिए एक सेवा निवृत अधिकारी को गिरफ्तार किया गया। बालिका को दफन के लिए दो जगह जमीन भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पाई। कट्टरपंथियों ने इस पर कोहराम मचाया। उन्नाव और कठुआ बलात्कार मामले समकालीन भारत के विकृत चेहरे का आइना है। भारत में अबोध बालिकाओं से लेकर वृद्ध महिलाएं की सरेआम अस्मिता लूटी जाती है और पुलिस-प्रशासन को इसकी कतई फिक्र नहीं है। उन्नाव में पीडिता को एक साल बाद भी न्याय के लिए तरसना पड रहा है और कठुआ की अबोध बालिका को मरणोपरांत भी सुकून नहीं मिल रहा है। न्याय के लिए आखिर जाए तो जाएं कहां?
गुरुवार, 12 अप्रैल 2018
मौत का मंजर
Posted on 8:31 pm by mnfaindia.blogspot.com/
हर तरफ मौत का मंजर। लाशों का ढेर। विलखता-टूटता क्रंदन, रूह को कंपा देने वाला चीत्कार । आंसुओं का सैलाब। सडक पर आए दिन होनी वाली दुर्घटनाओं के समय अक्सर यह नजारा देखने को मिलता है। पहाडों में तो कुछ ज्यादा ही। पर यह अलाप-विलाप आलीशान भवनों में रहने वाले शासकों और लोभी “मौत के सौदागरों“ को सुनाई नहीं देता है। और अगर सुनाई देता भी है, तो बस “इस कान सुन, उस कान निकाल“ । सडक परिवहन पहाडों में आवाजाही का एकमात्र साधन होता है । आजादी के सात दशकों में रेल नेटवर्क अभी पहाडों में पहुंचा नहीं है। हवाई यातायात की सुविधा न के बराबर है । दुखद स्थिति यह है कि सात दशक बाद भी पहाडी राज्यों में सडकों का सफर सुरक्षित नहीं बन पाया है। हिमाचल प्रदेश के कांगडा जिले में नूरपुर के निकट सोमवार को हुए दर्दनाक सकूली बस हादसा यही बयां करता है। इस हादसे में 24 मासूमों समेत 27 लोग मारे गए हैं। अपने लाडलों को खोने वाले माता-पिता और परिजनों की पीडा को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। बच्चों को खोने की क्षति अपूर्णिय होती है और दुनिया भर की महलम-पट्टी ताउम्र इस नासूर को भर नहीं सकती। ऐसी प्रगति और खुशाहली का क्या फायदा जो बच्चों तक को सुरक्षा मुहैया नहीं करा पाए। स्कूली बसों की दुर्घटनाएं रोकने के लिए सरकार ने लंबे-चौडे नियम बना रखे हैं मगर उनका पालन नहीं किया जाता और न ही प्रशासन इन्हें सख्ती से लागू करवाता है। दुृर्घटना के समय नेताओं की बिरादरी “मगरमच्छी आंसू“ टपका कर बडी-बडी बातें करती है मगर अमल में होता कुछ भी नहीं। ज्यादा से ज्यादा जांच समिति बिठाकर “दुर्घटना“ का ठीकरा किसी अदने कर्मचारी के सिर फोड दिता जाता है। पुलिस रिकार्ड के अनुसार हिमाचल प्रदेश में हर साल औसतन 3000 सडक हादसे होते हैं और इनमें 1,000 लोग मारे जाते हैं। पिछले दस साल में 30,000 से ज्यादा सडक हादसे हो चुके है और इनमें 11,000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। यह सिलसिला अंतहीन है और इसमें कमी आने की बजाए उतरोत्तर बढोतरी हो रही है। पूरे देश का यही हाल है। दुनिया में सबसे ज्यादा सडक हादसे भारत में होते हैं। हर चार मिनट में एक व्यक्ति सडक हादसों में मारा जाता है। भारत में हर साल जितने लोग सडक हादसों में कालग्रसत हो जाते हैं, उतने लोग तो आज तक विभिन्न युद्धों में नहीं मारे गए । 2013 में 1 लाख 37 हजार लोग सडक दुर्घटनाओं में मारे गए थे। यह अपने आप में एक रिकार्ड है। इसके बावजूद अभी तक नेशनल रोड सेफ्टी एंड ट्रैफिक मेनेजमेंट बोर्ड बिल पारित नहीं हो पाया है। 8 साल से यह बिल संसद की मंजूरी के लिए तरस रहा है। भूतल परिवहन मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कि लापरवाह ड्राइविंग, तेज गति और यातायात नियमों की घोर उल्लंघन और ड्राइविंग के समय मोबाइल का उपयोग सडक दुर्घटनाओं के लिए काफी हद तक जिम्मेदार होते हैं। यातायाय नियमों का उल्लघन देश का चरित्र बन चुका है। रेड लाइट तोडना, गलत लेन या साइड पर चलना, वोवरटेकिंग, सीट बेल्ट लगाए बगैर सफर करना और ड्राइविंग के समय बातों में ध्यान बंटना कानूनन प्रतिबंधित है और इसके लिए चालकों को दंडित भी किया जाता है। मगर मजाल है कि इन कदमों से कोई फर्क पडा हो। दंडित होने के बावजूद चालक वही गलती दोहराता है। हर काम प्रशासनिक मशीनरी पर नहीं छोडा जा सकता। सीसीटीवी कैमरा जैसी उन्नत टकनॉलॉजी के इस्तेमाल से निगरानी रखी जा सकती है मगर सडक हादसे नहीं रोके जा सकते। पुलिस सडकों पर चालान कर सकती है मगर लोगों को कायदे-कानून का सम्मान करने के लिए विवश तो नहीं कर सकती। हर नागरिक अगर ट्रैफिक नियमों का संजीदगी से पालन करता है, तो सडक दुर्घटनाएं वैसे ही कम हो जाएंगी। हिमाचल प्रदेश के नूरपुर स्कूल बस हादसे में अगर जरा सी एतियातन बरत जाती, मासूमों की जिंदगी बच जाती।
बुधवार, 11 अप्रैल 2018
आरक्षण पर सामाजिक टकराव
Posted on 7:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
जाति आधारित आरक्षण के खिलाफ मंगलवार (10 अप्रैल) को आहुत “भारत बंद“ से इस माह दूसरी बार देश में जनजीवन अस्त-व्यस्त हुआ है। हर छोटे-बडे मुद्दे पर जनजीवन अस्त-व्यस्त करना अवाम की जैसे आदत बन गई है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आरक्षण संबंधी फैसले से क्षुब्ध दलितों ने दो अप्रैल को “भारत बंद“ का आहवान किया था। इस बंद के दौरान हिंसक घटनाओं में 12 लोग मारे गए थे। अकेले मध्य प्रदेश में ही आठ लोगों की मौत हो गई थी। मंगलवार को भारत बंद सवर्णों द्वारा बुलाया गया था। इस बंद का सबसे ज्यादा असर बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और राजस्थान में देखा गया। बिहार में फैली हिंसा में 12 लोग जख्मी हो गए। बंद में हिंसा की आशंका के दृष्टिगत राजस्थान के जयपुर और मध्य प्रदेश के भोपाल में धारा 144 लगानी पडी। बहरहाल, आरक्षण पर दलितों और सवर्णों में टकराव सामाजिक विषमता को और तल्ख कर सकता है। दलित-सवर्ण टकराव से भारतीय जनता पार्टी के “सामाजिक समरसता“ और:सबका साथ, सबका विकास“ की भी बघिया उधेड डाली है। देश में लंबे समय से जाति आधारित आरक्षण का विरोध हो रहा है। 1989 में पिछडी जातियों को आरक्षण देने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की कोशिश में भाजपा समर्थित वीपी सिंह सरकार को सता तक गंवानी पडी थी। इस दौरान देश व्यापी आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान छात्रों ने आत्मदाह तक की थी। उग्र आंदोलन के कारण वीपी सिंह सरकार को अन्य पिछडी जातियों को आरक्षण देने से पीछे हटना पडा था। अन्य पिछडी जातियों को आरक्षण देने के लिए जनता पार्टी की सरकार ने 1979 में मंडल आयोग का गठन किया था और दिसंबर, 1980 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंपी थी। तब जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) भी जनता पार्टी का हिस्सा थी। इससे पहले की जनता पार्टी की सरकार मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करती, सरकार ही गिर गई। आयोग की रिपोर्ट केे मुताबिक उस समय देश की 52 फीसदी आबादी अन्य पिछडी जातियों की थी। मगर 2006 में नेशनल सेंपल सर्वे के अनुसार ओबीसी की आबादी गिरकर 41 फीसदी ही रह गई थी। तमिल नाडु में पिछडे वर्गों की आबादी 86 फीसदी है। महाराश्ट्र की 52 फीसदी आबादी पिछडी हुई है। 2006 कांग्रेस नीत संप्रग सरकार ने अन्य पिछडा वर्गों को आईआईटी, आईआईएम, एम्स और अन्य उच्च शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण देने का फैसला लिया था। पूरे देश में इसका जबरदस्त विरोध हुआ था। देश की 16.6 फीसदी अनुसूचित जाततियों को 15 फीसदी और 6.6 फीसदी जनजातियों को 7.5 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। इस बात के मद्देनजर अक्सर यह सवाल क्यिा जाता है कि 41 फीसदी आबादी को 27 फीसदी आरक्षण क्यों? देश में ओबीसी, अजा-जजा की कुल मिलाकर 64 फीसदी से ज्यादा आबादी है। इस लिहाज से इन्हें 64 फीसदी आरक्षण मिलना चाहिए। मगर अभी भी 64 फीसदी पिछडे तबकों को 49 फीसदी आरक्षण ही मिल रहा है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी से अधिक नहीं की जा सकती। इस फैसले के बावजूद तमिल नाडु में 69 फीसद्ी आरक्षण है और राजस्थान में 54 फीसदी। तमिल नाडु ने 86 फीसदी पिछडी आबादी की बिला पर ं अपने 69 फीसदी आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट में जायज ठहराया है। इस बात में दम है कि देष में अन्य पिछडा वर्गों, अनुसूचित और जनजातियो की आबादी 64 फीसदी से भी ज्यादा और कई राज्यों में इससे कहीं अधिक है, इसलिए मौजूदा आरक्षण व्यवस्था कहीं ज्यादा प्रांसगिक है। और सच्चाई यह भी है कि राजनीतिक दलों ने आरक्षण का मुद्दा मतदाताओं को लुभाने का जरिया बना रखा है। इसीलिए, किसी भी राजनीतिक पार्टी में आरक्षण का विरोध करने का मादा नहीं है। मगर समय का तकाजा है कि आरक्षण मुद्दे पर गहराई से आत्ममंथन किया जाना चाहिए।
मंगलवार, 10 अप्रैल 2018
कब खत्म होगा यह सिलसिला
Posted on 8:22 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत में आजादी के बाद बदस्तूर जारी घोटाला-दर-घोटाले ने वित्तीय सेक्टर को बर्बादी की कगार पर ला खडा कर दिया है और इसका खमियाजा आम आदमी को भुगतना पड रहा है। कभी नॉन बैंकिंग फाइनेस कंपनियों ( एनबीएफसी) के घोटाले , तो कभी पोंजी स्कीम की आड में निवेशकों को ठगने का धंधा़। और अगर कुछ नहीं तो बैंकों का फ्रॉड या प्रतिभूति घोटाले। नब्बे के दशक में प्रतिभूति घोटाले ने शेयर बाजार में कोहराम मचा दिया था। देश में निवेशकों से ठगी और धोखाधडी का यह सिलसिला बदस्तूर जारी है मगर सरकार और आरबीआई मूक दर्शक बने रहते हैं। सरकार तब जागती है जब कंपनियां निवेशकों को भारी चूना लगा चुकी होती हैं। सांप के निकलने जाने से लाठी पीटने का क्या फायदा ? 70 और 80 के दशक में नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों की बहार थी और ये संसथाएं निवेशकों को भारी-भरकम ब्याज का लालच देकर आकर्षित करती थी जबकि कानूनन आरबीआई द्वारा तय ब्याज दरों से ज्यादा देना अपराध था। यह सिलसिला पिछली शताबदी के अंत तक चलता रहा और जब बंद हुआ तब तक छोटे और मझौले निवेशकों को अरबों रु का चूना लग चुका था। सुप्रीम कोर्ट को भी एक एनबीएफसी से निवेशकों के तीस हजार करोड रु से ज्यादा राशि वसूलने के लिए पूरा जोर लगाना पड रहा है। नॉन बैंकिंग फाइनेंस कंपनिया बंद हुई तो पोंजी स्कीम की बाढ आ गई और इन फर्जी कंपनियों की धोखाधडी बंद हुई तो एक के बाद दूसरा बैंक फ्रॉड सामने आ रहा है । अभी पीएनबी से 12500 करोड रु की धोखाधडी की स्याही सूखी भी नहीं थी कि देश में निजी सेक्टर के सबसे बडे बैंक आईसीआईसीआई में 3250 करोड रु के घोटाले का पर्दाफाश हुआ है। इस घोटाले में आईसीआईसीआई की मुख्य कार्यकारी अधिकारी का नाम भी सामने आया है। आरोप है कि आईसीआईसीआई ने बैंक की सीईओ के पति को लाभ पहुंचाने के लिए एक बडी कंपनी को 3250 करोड रु का कर्जा दिया। कंपनी ने इस क्रर्ज का एक पैसा भी नहीं लौटाया। अब सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है। इस मामले में सीबीआई आईसीआईसीआई की सीईओ, उनके पति, देवर और संबंधित कंपनी प्रमुख के लुकआउट सर्कुलर तक जारी कर चुकी है। आरोपियों के खिलाफ बैंकों में लगातार हो रहे फ्रॉड के मामले में बैंकों के कर्मचारियों का हाथ रहता है। इससे पहले सरकारी बैंक आईडीआईबी के एमडी को विजय माल्या को घाटे में चल रही किंगफिशर को “भ्रष्ट “ तरीके से ऋण देने के लिए गिरफ्तार किया जा चुका है। एक्सिस बंका की सीईओ सीबीआई बी जाँच के घेरे मैं है। आरबीआई द्वारा जारी आंकडों के अनुसार देश में सरकारी बैंकों में घोटालों का सिला इस कद्र बढ गया है कि हर चार घंटों में एक बैंक कर्मी को फ्रॉड के लिए गिरफ्तार किया जाता है। जनवरी 2015 से मार्च 2017 के दौरान 5200 बैंक कर्मियों को फ्रॉड में गिरफ्तार किया गया। 2013 से 2017 के दौरान बैंक फ्रॉड के 17,504 मामले पकडे गए और इनमें बैंकों की 66068 करोड रु की विषाल राशि डूब गई। 2016-17 के दौरान ही बैंक फ्रॉड के 3870 मामले पकडे गए और इनमें बैकों की 17,750 करोड रु की राशि डूब गई। 2016-17 में 86 फीसदी बैक फ्रॉड एडवांस (लोन) से संबंधित थे और पंजाब नेशनल बैंक के 99 फीसदी फ्रॉड लोन से जुडे थे। हैरानी इस बात की है कि बैंकों में फ्रॉड रोकने के लिए कडी निगरानी व्यवस्था के बावजूद घोटालों का जारी रहना साफ बताता है कि निगरानी व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार है। भारत ही नहीं , हर देश को बैंकों के फ्रॉड और घोटाले से दो-चार होना पडता है मगर इनसे अर्थव्यवस्था को भारी कीमत चुकानी पडती है। भारत तेज रफ्तार से आगे बढती अर्थव्यवस्था है। घोटाले और फ्रॉड उसकी रफ्तार रोकते हैं। बैकों के निजीकरण से घोटाले नहीं रुक सकते। इन्हें रोकने के लिए निगरानी व्यवस्था को और चुस्त-दुरुस्त करने की जरुरत है।
सोमवार, 9 अप्रैल 2018
अब ऑनलाइन मीडिया की बारी
Posted on 8:08 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ प्रैस पर जिस किसी ने भी नकेल डालने की कोशिश की, उसे मुंह की ही खानी पडी है। इतिहास इस बात का गवाह है। 70 के दशक में देश पर आपातकाल थोपने और मीडिया पर सेंसरशिप लगाने के लिए कांग्रेस सरकार को बहुत बडी कीमत चुकानी पडी थी। और बिडवंना देखिए कि जो पार्टी तब प्रैस की आजादी की सबसे बडी पैरवीकार हुआ करती थी, उसी पार्टी की सरकार को अब यह कांटे की तरह चुभ रही है। फर्जी अथवा झूठी (फेक न्यूज) खबरों के मामले में फजीहत झेलने के बाद अब सरकार ने ऑनलाईन, सोशल मीडिया और न्यूजपोर्टल को नियंत्रित करने की ठान ली है। इसके लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। सरकारी नुमाइंदों के अलावा समिति में प्रैस काउंसिल, इंडियन ब्रॉडकास्टर्स फेडेरेशन और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधि में शामिल किए गए हैं। समिति के गठन का मूल मकसद ऑनलाइन मीडिया को भी प्रिंट और इलेट्रॉनिक मीडिया की तर्ज पर आचार संहिता के दायरे में लाना है। फेक न्यूज से संबंधित दिशा -निर्दोशों को वापस लेने के तुरंत बाद इस समिति का गठन किया है। इस बात में दो राय नहीं है कि ऑनलाइन एवं सोशल मीडिया को अविलंब आचार संहिता के दायरे में लाने की जरुरत है। झूठी खबरें प्रकाशित कर सनसनी फैलाने में ऑनलाइन एवं सोशल मीडिया और न्यूज पोर्टल्स का बहुत बडा हाथ रहता है। उतराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में सोशल मीडिया पर फैलाई गई एक झूठी खबर इसकी ताजा मिसाल है । झूठी खबर ने अगस्त्यमुनि क्षेत्र में तनाव पैदा कर दिया। सोशल मीडिया पर किसी ने एक फर्जी फोटो पोस्ट कर दी। इसमें एक युवती और युवक के आधे शरीर दिखाकर कहा गया कि एक समुदाय विशेष के युवक ने दूसरे समुदाय की युवती से बलात्कार किया है। इस पोस्ट से पूरे क्षेत्र में तनाव उत्पन्न हो गया। कुछ दुकानों से सामान बाहर फेंक गया। एक अन्य वाक्या केरल का है। लडकियां फोटो खिंचवाने स्टूडियो जाती हैं। मगर फोटोग्राफर उनकी तस्वीरों से छेडछाड कर पोर्न बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करने की धमकी देकर लडकियों कों ब्लैकमेल करता रहा। टीवी में इस तरह के किस्से आए रोज दिखाए जाते हैं। दोनों घटनाएं ऑनलाइन और सोशल मीडिया का खतरनाक मंशा से दुरुपयोग को उजागर करती है। निसंदेह ,सोशल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए ठोस कदम उठाना सरकार का दायित्व है। तथापि, फेक न्यूज के मामले में सरकार की पहल दिशाहीन है। पत्रकारों की सरकारी (पीएनबी) मान्यता को निरस्त करने से फेक न्यूज बंद होने से रहा। मौजूदा नियमों के तहत भी फेक न्यूज पर सरकार कभी भी पत्रकार की मान्यता निरस्त कर सकती है। तथापि, यह तय करना बेहद कठिन है कि कौनसी खबर फेक है। सरकारी मानदंडों पर हर ऐसी खबर (खोजी) फेक मानी जाएगी, जिसमें उसकी आलोचना की गई हो। सरकार की मंशा अगर वाकई फेक न्यूज को रोकने की है तो इसके लिए पत्रकारों की मान्यता रदद करने जैसे प्रभावहीन उपायों की जरुरत नहीं है। लोकतंत्र में इस तरह के दिशाहीन कदम स्वस्थ माहौल को प्रदूषित करते हैं। मोदी सरकार की “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ के प्रति संवेदनशीलता को लेकर मीडिया पहले ही संशक्ति है। लोकतंत्र स्वस्थ परंपराओं और मर्यादाओं के निर्वहन से फलत-फूलता है। भारत की सामाजिक और आर्थिक तरक्की में मीडिया का बहुत बडा योगदान है। मीडिया पर नकेल डालने से देश और समाज को किस कद्र झेलना पडता है , अवाम इस का खमियाजा आजादी से पहले और बाद में भुगत चुका है। सोशल और ऑनलाइन मीडिया का दायरा बहुत व्यापक है और इसकी पैठ भी गहरी है। समकालीन जीवन में सोशल मीडिया की भूमिका का काफी महत्व है। इसका दुरुपयोग रोकना जितना आवष्यक है, उससे कहीं ज्यादा जरुरी इसका सदुपयोग है। सरकार को फिजूल की बातों में समय नष्ट करने की बजाए सृजनात्मक कार्यों पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018
“टाइगर“ पर भारी काला हिरण
Posted on 8:24 pm by mnfaindia.blogspot.com/
“न दुआ काम आई और न ही दलीलें“, अततः बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान को काला हिरण शिकार के लिए पांच साल जेल की सजा सुनाई गई है। उनके करोडों फैंस स्तब्ध हैं। जोधपुर की अदालत ने 20 साल पहले राजस्थान में “हम साथ-साथ हैं“ फिल्म की शूटिंग के दौरान सलमान खान को दो काले हिरणों (चिंकारा) के शिकार का दोषी माना और उन्हें पांच साल कैद की सजा सुनाई है। मगर अदालत ने सलमान के साथी एक्टर्स- सैल अली खान, सोनाली बेंद्रे, तब्बू और नीलम कोठारी को बरी कर दिया है। अदालत के इस फैसले पर सलमान के फैंस को हैरानी भी हुई है। सलमान के साथी स्टार्स को सबूतों मे अभाव में बरी कर दिया गया पर सलमान फंस गए। तीन साल से ज्यादा सजा मिलने के कारण उन्हें तब तक जेल में ही रहना पड सकता है, जब तक ऊपरी अदालत उनकी सजा पर रोक नही लगा देती या जमानत नहीं दे देती। सलमान खान की जमानत पर कल सेशन कोर्ट में सुनवाई होगी। सलमान खान को सजा मिलते ही जोधपुर की जेल भेज दिया गया है। काला हिरण वाल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972 के तहत संरक्षित वन्य प्राणी है और इसका शिकार करना कानूनन संगीन अपराध है। 1998 को राजस्थान के कोकांणी में जब बालीवुड स्टार्स ने दो काला हिरणों का शिकार किया था, ग्रामीणों ने गोली की आवाज सुनकर इनका पीछा किया था। ग्रामीणों ने इन्हें मौके पर भी देखा और हिरणों के शव को वन विभाग के सुपुर्द कर दिया। वन विभाग ने गोली चलाने के लिए सलमान खान को मुख्य आरोपी बनाया। विष्नोई समाज की वन्य प्राणी और वृक्षों की रक्षा में गहरी आस्था है और इसके लिए वे अपने प्राण तक भी न्यौछावर करने से पीछे नही हटते हैं। 2 अक्टूबर, 1998 को बिश्नोई समुदाय ने सलमान खान के खिलाफ काले हिरणों के शिकार के लिए एफआईआर दर्ज करवाई थी और इसके दस दिन बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसी मामले में सलमान 1998 के अलावा 2006 और 2007 में कुल मिलाकर 18 दिन जेल में रह चुके हैं। इस मामले ने काफी उतार-चढाव देखे हैं। पहली पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में एक हिरण की मौत दम घुटने से और दूसरे की मौत खाई में गिरकर श्वानों द्धारा खा जाने से बताई गई। अभियोजन पक्ष ने इस रिपोर्ट को नहीं माना और दोबारा पोस्टमॉर्टम के लिए मेडिकल बोर्ड बनाया गया। दूसरी रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि हुई कि हिरणों की मौत गन शॉट इजरी के कारण हुई थी। सलमान खान पर काले हिरण के शिकार को लेकर कुल चार मामले अदालत में चल रहे हैं। घोडा फार्म में काले हिरण शिकार मामले में सलमान खान को 2006 में निचली अदालत ने पांच साल की सजा सुनाई थी पर हाई कोर्ट ने इसे पलट दिया। अब मामला सुप्रीम कोर्ट में है। फरवरी, 2007 में भवाद गांव केस में सलमान को एक साल कैद की सजा हुई थी। हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया। अब यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में है। आर्म्स मामले में कोर्ट ने 2017 में सलमान को बरी कर दिया था मगर सरकार ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील कर रखी है। कोकांणी केस में वीरवार को सलमान को पांच साल जेल की सजा सुनाई गई है। सलमान खान काले हिरण का शिकार करने के दोषी हो सकते हैं मगर जिस तरह से पिछले बीस साल से उन्हें चार-चार मामले में उलझा कर रखा गया है, उससे लगता है उन्हें सुपर स्टार बनने की सजा मिल रही है। 20 साल की लंबी अवधि में सजा की आशंका से घुट-घुट कर जीने का सफर सजा से कहीं ज्यादा कष्टदायक होता है। कानून का यह अजब-गजब का खेल है कि खूंखार अपराधी तो बच निकलते हैं मगर भद्र लोग फौरन इसकी जद में आ जाते हैं।
गुरुवार, 5 अप्रैल 2018
सरकार का सिरदर्द
Posted on 7:34 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण कानून (एससी/ एसटी-प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) पर सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले से सरकार का सिरदर्द बढ सकता है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को सरकार की पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटीषन) पर अपनी 20 मार्च की व्यवस्था पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी से पहले शुरुआती जांच पर जोर दिया था। इस एक्ट के तहत आरोपी को जमानत नहीं दी जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरोपियों को जमानत भी दे दी। 2012 में सर्वोच्च न्यायालय ने ही एससी-एसटी एक्ट के तहत आरोपी को जमानत की व्यवस्था को निरस्त कर दिया था। 20 मार्च के फैसले से क्षुब्ध दलित संगठनों ने इस सोमवार (2 अप्रैल) को भारत बंद का आहवान किया था। बंद के दौरान प्रदर्शनकारियों ने न केवल कानून-व्यवस्था की धज्जियां उडाई, बल्कि हिंसा में 9 निर्दोष लोगों की मौत भी हो गई। बंद के एक दिन बाद राजस्थान में दलित नेताओं के घर-बार फूंक डाले और दलित बस्तियों को आग लगा दी गई। इस मामले में जिरह के दौरान एटॉर्नी जनरल ने कहा था कि सदियों से सामाजिक अत्याचार से पीडित दलित धारा 21 के सुरक्षा के हकदार है। सर्वोच्च न्यायालय ने इससे सहमति व्यक्त की है मगर अदालत का काम हर पक्ष को न्याय देना है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि एससी-एसटी एक्ट को ब्लैकमेल के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और किसी निर्दोष को सजा नहीं दी जा सकती। योग्य जजों ने यह भी कहा है कि अदालत से बाहर की घटनाएं सुनवाई और फैसले को प्रभावित नहीं कर सकती। बहरहाल, अदालत किसी भी एक्ट की व्याख्या और समीक्षा ही कर सकती है, इसमें बदलाव करने का उसके पास कोई अधिकार नहीं है। यह काम विधायिका का है। कानून बनने के बावजूद भी दलितों पर अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं। दरअसल, सामाजिक व्यवस्था से उपजी विषमताओं का समाधान कानून बनाकर नहीं किया जा सकता। इसके लिए समकालीन समाज में क्रांतिकारी सुधार लाने की जरुरत है। दलितों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने किसी कानून का सहारा नहीं लिया, अलबता लोगों को छुआछूत के प्रति सजग किया था। जन्म से कोई भी छोटा या अछूत, हिंदू या मुसलमान नही होता है। समाज ही आदमी को बडा-छोटा बनाता है। महात्मा गांधी ने “छुआछूत को हिंदू शरीर में कोढ जैसा रोग बताया था। हिंदू समाज का दलित बनाम स्वर्णों में बंटना भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक मंसूबों पर पानी फेर सकता है। भाजपा को पहले ही मुसलमान विरोधी माना जाता है। देश की कुल आबादी का 16.6 फीसदी दलित हैं और 8.6 फीसदी जनजाति आबादी है। पंजाब में सबसे ज्यादा 32 फीसदी दलितों की आबादी है। दस दिन बाद सर्वोच्च न्यायालय में फिर से इस मामले की सुनवाई होनी है। तब तक सरकार के पास अपना मजबूत पक्ष तैयार करने का समय है। सरकार चाहे तो कानून को और सख्त भी बना सकती है मगर ऐसे कानून की ज्यादा प्रांसगिकता नहीं है जिससे सामाजिक विशमताएं उपजे और समाज और ज्यादा बंटे। सरकार को फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहिए। मई में कर्नाटक विधानसभा के चुनाव है, इस राज्य में कांग्रेस सरकार ने लिंगायत बनाम विक्कालिगा बनाम वीरशैव लिंगायत में बांट रखा है और गेंद केन्द्र के पाले में डाल दी है। साल के अंत में मध्य प्रदेष, राजस्थान और छत्तीसगढ में विधानसभा चुनाव होने हैं। दलितों के भारत बंद के दौरान सबसे ज्यादा हिंसा भी इन राज्यों में हुई है। मोदी सरकार के लिए ताजा मामला बहुत बडी चुनौती है।
बुधवार, 4 अप्रैल 2018
महंगा फ्यूल, बेबस लोग
Posted on 7:51 pm by mnfaindia.blogspot.com/
एक जमाना था जब पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढते ही, पूरे देश में हंगामा मच जाता था मगर अब स्थिति एकदम बदल गई है। पिछले 6 दिन से पेट्रोल और डीजल के दाम हर रोज बढाए जा रहे हैं मगर कहीं से आक्रोश का एक स्वर तक नहीं फूटा है। राजनीतिक दलों को अब महंगे फ्यूल की आग में रोटियां सेंकना गवारा नहीं लग रहा है। देश की अखंडता पर प्रहार करने वाले और समाज को तोडने वाले मुद्दे ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। 16 जून, 2017 से पेट्रोल-डीजल की कीमतें हर रोज तय की जा रही हैं। उपभोक्ताओं को पेट्रोल-डीजल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आने वाले उतार-चढाव का लाभ देने लिए इस व्यवस्था को लागू किया गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें इन दिनों लगातार बढ रही हैं। इसी कारण भारत में भी पेट्रोल-डीजल महंगा हो रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस समय कच्चे तेल 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बिक रहा है। सरकार और इसकी तेल कंपनियां इसी बिला पर पिछले 6 दिन से कीमतें बढा रही हैं। इस साल अब तक पेट्रोल की कीमत 4 रु प्रति लीटर और डीजल 5 रु प्रति लीटर बढाई जा चुकी है। महाराष्ट्र में कई जगह पेट्रोल 82 रु लीटर और आंध्र प्रदेश में डीजल 70 रु लीटर तक बिक रहा है। तेल की कीमतों में फिलहाल राहत की कोई उम्मीद नहीं है। मोदी सरकार ने भी साफ कह दिया है कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती की कोई गुजाइंश नहीं है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें जब 30 से 35 डॉलर बैरल थीं, सरकार ने एक्साइज डयूटी बढा कर दोनों हाथों से राजस्व बटोरा और तब लोगों से वायदा किया था कि कीमतें अगर अप्रत्याशित रुप से बढती हैं, एक्साइज ड्यूटी में कटौती करके राहत दी जाएगी। अब सरकार अपनी ही बात से पीछे हट रही है। पिछले साल अक्टूबर में सरकार ने एक्साइज डयूटी में दो रु की कटौती की थी और इससे सरकार को सालाना 26,000 करोड रु का नुकसान उठाना पडा था। इससे ज्यादा राहत देने मंे सरकार के हाथ-पांव फूल रहे हैं। मोदी सरकार नवंबर 2014 से जनवरी 2016 के दौरान पेट्रोल-डीजल पर नौ बार एक्साइज ड्यूटी बढा चुकी है मगर राहत मात्र एक बार दी गई है। यह कहां का इंसाफ है कि तेल की कीमतों में गिरावट आए तो सरकार कमाए और जब कीमतें बढें तो उपभोक्ता भरे? इस हिसाब से तो सरकार बनिए से दो कदम आगे निकल गई है। सरकार के अपने खर्चे दिन-ब-दिन बढते जा रहे हैं और इन्हें पूरा करने के लिए उसके पास लोगों की जेबें काटने के सिवा कोई चारा नहीं है। तेल की कीमतों में लगभग 49 फीसदी टैक्स सरकार की कमाई का प्रमुख जरिया है। यही वजह है कि सरकार ने पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखा है। जीएसटी की अधिकतम सीमा 28 फीसदी है जबकि पेट्रोल-डीजल पर जीएसटी की अधिकत्म सीमा से भी दोगुना ज्यादा एक्साइज डयूटी है। ं एशिया के कई देशों की तुलना में भारत में पेट्रोल-डीजल सबसे महंगा है। यहां तक कि पाकिस्तान, बांग्ला देश और श्री लंका में पेट्रोल-डीजल भारत से कहीं सस्ता है। भारत के 70 से 80 रु प्रति लीटर की तुलना में पाकिस्तान में इस समय पेट्रोल 42 रु लीटर बिक रहा है। पाकिस्तान में डीजल, पेट्रोल से महंगा (47 रु लीटर) है। श्री लंका में डीजल भारत से कहीं सस्ता, 39.69 रु और पेट्रोल 53.47 रु लीटर बिक रहा है। मलेशिया में पेट्रोल की कीमत 32.19 रु और डीजल की 31.59 रु लीटर है। इसकी प्रमुख वजह यह है कि इन सभी देशों में पेट्रोल-डीजल पर टैक्स भारत की तुलना में कहीं कम है। डीजल की कीमतों में वृद्धि का सीधा असर खाने-पीने और अन्य रोजमर्रा की वस्तुओं पर पडता है। महंगे डीजल का मतलब महंगी ढुलाई और महंगी खाने-पीने की वस्तुएं। इससे लोगों के “अच्छे दिन तो आने से रहे।
मंगलवार, 3 अप्रैल 2018
आक्रोशित दलित समाज
Posted on 7:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अनुसूचित जाति-जनजाति (एससी-एसटी) संबंधित सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्षुब्ध दलित समाज सोमवार को सडकों पर उतर आया। दलित संगठनों द्वारा आहुत “भारत बंद“ के दौरान 9 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में कर्क्यू तक लगना पडा। दलित सुप्रीम कोर्ट द्वारा एस-एसटी एक्ट ( प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज) के तहत दर्ज मामले में तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाने से नाराज है। सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर चिंता जताई थी और इसके तहत होने वाले दर्ज मामलों में तुरंत गिरफ्तारी की जगह षुरुआती जांच पर जोर दिया था। दलितों को इस बात का गुस्सा है कि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में संतोष जनक जिरह नहीं की और न ही मामले से जुडे विभिन्न पहलुओं को अदालत में सही तरीके से पेश भी नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट की इस व्यवस्था से देश में एससी-एसटी कानून का भय कम होने और दलितों पर अत्याचार के मामले बढने की आशंका है। जिस दिन यह फैसला आया है, उसी दिन से सरकार कोर्ट में समीक्षा याचिका (रिवीजन पिटिशन) दायर करने की बात कह रही थी। सोमवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर भी कर दी। जिस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया है, वह महाराष्ट्र के सतारा जिले में कराड स्थित सरकारी फार्मेसी कॉलेज के एक दलित कर्मचारी से जुडा है। इस कर्मचारी ने अपने एसीआर में नकारात्मक टिप्पणियों के लिए आला अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर लिखा रखी है। कराड फार्मेसी कॉलेज के दलित कर्मचारी की गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में उसके आला अधिकारियों ने नकारात्मक टिप्पणियां की थीं। इस एक्ट के तहत गिरफ्तारी पर अग्रिम जमानत तक की व्यवस्था नहीं है। एक्ट के तहत आरोपियों की गिरफ्तारी तय थी मगर मामला अदालत पहुंवा। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि इस एक्ट का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता और पहली नजर में आरोपी अधिकारियों के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता है। अदालत ने आरोपियों को जमानत भी दे दी। आरोपियों की दलील थी कि उन्होंने अपने अधीनस्थ कर्मचारी की एसीआर में जो कुछ भी लिखा है, वह उनके विवेक पर आधारित है और इस बिला पर एससी-एसटी एक्ट के तहत कोई मामला नहीं बनता है । अगर इस तरह का मामला बनाया गया तो कोई भी अधिकारी निष्पक्ष और विवेकपूर्ण एसीआर नहीं लिख पाएगा। इस मामले में दो राय नहीं हो सकती कि देश में कानूनों का सदुुपयोग कम और दुरुपयोग ज्यादा किया जाता है। कानून उन लोगों के लिए मान्य होता है, जो उसका सम्मान करते हैं। जो लोग मर्यादा तक का सम्मान नहीं करते, उनके लिए कैसा कानून? सभ्य समाज विरोध के नाम पारा हिंसा, आगजनी और निर्दोष लोगों की हत्या सहन नहीं करता है मगर इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता कि देश के कई हिस्सों में दलितों को आज भी स्वर्णों द्वारा बराबरी का दर्जा नहीं दिया जाता। मंदिरों में दलितों को प्रवेश नहीं दिया जाता। गांव के कुंए से पानीं नहीं भरने दिया जाता। सामाजिक आयोजनों में दलितों को अलग से बिठाया जाता है। दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में आज भी चाय की दुकानों पर दलितों को अलग गिलास अथवा डिस्पोजल कप मे चाय दी जाती है। दबंगों द्वारा दलितों की सरेआम पिटाई की जाती हे। उनकी महिलाओं की अस्मिता लुटी जाती है। 2016 के दौरान देश में दलितों पर अत्याचार के 40,801 मामले दर्ज हुए थे। सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को संजीदगी से लागू करने पर बल दिया है। न्यायपालिका कानून की व्याख्या करती है, कानून बनाती नहीं है। कानून बनाना संसद का काम है और अगर सरकार को लगता है मौजूदा एक्ट के प्रावधान पैने नहीं है, सरकार नए कानून बना सकती है। तथापि ऐसे कानून की कोई प्रासंगिकता नहीं है, जिनसे सामाजिक विषमताएं बढे और समाज बंटे। इस तरह के संवेदनशील विषयों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।
सोमवार, 2 अप्रैल 2018
ऐसी परीक्षा का क्या औचित्य?
Posted on 7:54 pm by mnfaindia.blogspot.com/
केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सेंट्रल बोर्ड ऑफ सेकंडरी एजुकेशन-सीबीएसई) की परीक्षा से पहले बाहरवीं और दसवीं के पेपर लीक हो जाने पर देश भर में हंगामा मचा हुआ है। इससे सीबीएसई की साख को गहरा धक्का लगा है। सीबीएसई दसवीं और बाहरवीं की परीक्षाओं के अलावा प्रतियोगी मेडिकल और जेईई-आईआईटी प्ररीक्षाओं का भी संचालन करती है। ताजा प्रकरण से अभिभावकों और परीक्षार्थियों का सीबीएसई पर भरोसा उठना स्वभाविक है। इस बार परीक्षा से पहले 26 मार्च को बारहवीं का अर्थशास्त्र और 28 मार्च को दसवीं का मैथ्स का प्रश्न पत्र लीक हुआ है। पुलिस अब तक 18 छात्रों और 5 कोचिंग सेंटर्स संचालकों समेत 40 लोगों से पूछताछ कर चुकी है। झारखंड के चतरा में 6 छात्रों और कोचिंग संचालकों को हिरासत में लिया गया है। पुलिस ने 10 वॉटसऐप गु्रप की पहचान भी की है। पुलिस जांच में पता चला है कि पेपर्स लीक होने से पहले किसी व्यक्ति ने सीबीएसई की चेयरमैन को आगाह कर दिया गया था। वॉटसऐप पर पेपर्स की फोटो तक भेजी गई थी। जांच पर यह भी पता चला कि सीबीएसई को पेपर लीक को लेकर तीन बार आगाह किया गया था मगर परीक्षा को रोका नहीं गया। गलती सीबीएसई ने की है मगर अब सजा छात्रों को मिल रही है। दोनों पेपर दोबारा कराने का फैसला लिया गया है। इससे क्षुब्ध छात्र देश भर में प्रदर्शन कर रहे हैं। सीबीएसई में प्रश्न पत्रों को तैयार करने से लेकर परीक्षा केन्द्र में परीक्षार्थियों को बांटने तक की प्रकिया बेहद सटीक और गोपनीय है। पेपर्स सेटिंग के बाद इन्हें परीक्षा केन्द्र के समीप बैंक में रखा जाता है और जिस दिन जिस विषय का पेपर होता है, उसी दिन प्रातः सीबीएसई, स्कूल और बैक के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में पेपर बैंक लाकर्स से निकाला जाता है और कडी सुरक्षा में परीक्षा केन्द्र तक पहुंचाया जाता है। परीक्षा शुरु होने से आध घंटा पहले बोर्ड के हैड एग्जामिनर, स्कूल प्रिसिंपल और परीक्षा केन्द्र निरीक्षकों की मौजूदगी में पेपर को खोला जाता है। इतनी कडी प्रकिया से पहले पेपर का लीक होना वाकई ही आश्चर्यजनक है। जाहिर है पेपर परीक्षा केन्द्र पहुंचने से पहले ही चुरा लिए गए थे। वैसे भारत में हर चीज बिकती है और धन के दमखम पर कुछ भी खरीदा जा सकता है। दलालों को भारी-भरकम फीस देकर नीट और जेईई-आईआईटी की परीक्षाओं में रेंक मिल जाता है। पैसे से मेडिकल कॉलेज मे दाखिला लिया जा सकता है। पहले केपिटेशन फीस हुआ करती थी और अब पेड सीट। और यह सब बाकायदा सरकार की छत्रछाया में हो रहा है। इससे दुनिया में भारत की शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था की साख बेहद कमजोर हो चुकी है। ताजा प्रकरण से यह और गिर सकती है। ऐसी शिक्षा और परीक्षा व्यवस्था का क्या औचित्य है जो परीक्षार्थियों को नकल करने के लिए प्रेरित करे। यही कारण है कि इस बार उत्तर प्रदेश में नकल पर नकेल कसे जाने के कारण डेढ लाख से ज्यादा परीक्षार्थी पेपर देने ही नहीं आए। परीक्षा का मूल मकसद परीक्षार्थी की योग्यता और प्रतिभा को आंकना होता है। नकल और धोखे से दी गई परीक्षा से यह मकसद पूरा नहीं होता। इसके विपरीत इस तरह की घटनाओं से होनहार छात्र निराश और हतोत्साहित हो जाते हैं। देश में वैसे भी परीक्षा पद्धति काफी भारी मानी जाती है। बाहरवीं की परीक्षा के बाद छात्रों को तुरंत प्रतियोगी परीक्षा देनी पडती है। इससे उन पर भारी स्ट्रेस पड रहा है। देश की शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था में अविलंब आमूल-चूल बदलाव लाने की जरुरत है।
Corrupt Banking System
Posted on 7:48 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अस्सी के दशक में समाचार-फीचर एजेंसी चलाने के लिए दो बैंकों से कर्जा लेना पडता था। कुछ अखबारों ने एजेंसी की सर्विस को तो खूब इस्तेमाल किया मगर एक पैसे का भुगतान नहीं किया और मैं डिफाल्टर बन गया। संबंधित बैंकों से सेटलमेंट का आग्रह किया मगर बात नहीं बनी। अततः मूल धन का चार गुना ज्यादा पैसा लौटाना पडा। बैंकों से कर्जा लिया हे तो लौटाना पडता है। मगर यह व्यवस्था धनाढय और रसूखदार लोगों पर लागू नहीं होती है। आरबीआई की रिपोर्ट के अनुसार देश की 12 कंपनियां बैकों के बैड लोंस का 25 फीसदी से ज्यादा डकार चुकी है। और इनमें कई नामी गिरामी कंपनियां शामिल हैं। भूषण स्टील बैंकों का 44,478 करोड रु दबाए हुए है। लैंको इंफ्राटेक 44, 364 करोड रु और एस्सार स्टील 37,248 करोड रु। विजय माल्या लगभग 10,000 करोड रु लेकर विदेश भाग गए हैं और बैंक्स हाथ मकते रह गए हैं । भारतीय बैंकों का लगभग 9 लाख करोड डूब चुका है। रेटिंग एजेंसियों के अनुसार इस साल बैंकों के बैड लोंस में 18 फीसदी का इजाफा हो सकता है। नेताओं समेत और भी कई बडे धुरंधर हैं, जिन्होंने अरबों डकार रखे हैं और माल्या की तरह ऐशो -आराम की जिंदगी जी रहे हैं। देश में अभी तक ऐसा कोई कानून नहीं है कि बडे-बडे डिफाल्टर को धरा जा सके। बेचारा किसान अथवा आम आदमी कर्ज से तंग आकर खुदकशी कर लेता है। पर क्या आपने कभी किसी बडे कर्जदारों को लेकर ऐसा कुछ सुना या पढा है (इस धृष्टता के लिए क्षमा याचना)। बैंक किसानों और आम डिफाल्टर्स की जमीन-जायदाद ली कुर्की लके अदालती आदेश ले आते हैं, उन्हें शर्मिदा और प्रताड़ित में कोई कसर नहीं छोडते मगर बडे लोगों की जायदाद कुर्की के अदालती आदशों पर भी अमल नहीं किया जाता । इस मामले में स्टेट बैंक प्रमुख अरून्धति भट्टाचार्य विजय माल्या के गोवा स्थित आलीशान बंगले की कुर्की को लेकर रोचक किस्सा सुना चुकी हैं। अदालती आदेश के बावजूद प्रशासन ने बहाना-दर-बहाना बनाकर लंबे समय तक कुर्की को टाले रखा और अंत में जब अदालती के अवमानना नोटिस का सामना करना पडा, कुर्की का अनुपालना करवाने वाले बडे बाबू लंबी छुट्टी पर चले गए। निष्कर्ष यह है कि अपने देश में सिर्फ पैसा और रसूख बोलता है।
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