गुरुवार, 12 जुलाई 2018

चंडीगढ़ किसका? पिट चुका है यह मुद्दा

किसी शायर ने दो भाईयों के  प्रगाढ़  रिश्तों  क्या खूब कहा है,“ पल-पल से बनता है एहसास, एहसास से बनता है विश्वास ,  विश्वास  से बनते हैं  रिश्ते , रिश्तों से बनता है कोई खास“। काश  पिछले पांच दशक से भी ज्यादा समय से चंडीगढ और  पानी के लिए झगडे रहे पंजाब और हरियाणा के सियासी नेता इस रिश्ते  के मर्म को समझ पाते! पंजाब, हरियाणा का बडा भाई है और एक जमाने में संयुक्त पंजाब का हिस्सा रहे हरियाणा को पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने का पूरा हक है। मगर हर बडा भाई मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं होता। अपने हिस्से की एक इंच जमीन छोडना तो दीगर रहा, बडा भाई पंजाब, छोटे भाई हरियाणा को एक बूंद पानी तक देने को तैयार नहीं है। 1966 में राज्यों के पुनर्गठन के बाद से संपत्ति के बंटवारे का मसला उतरोत्तर जटिल होता चला गया। 52 साल के लंबे अरसे के बावजूद  केन्द्र भी इस मसले को सुलझा नहीं पाया।  और अब चंडीगढ और नदियों का पानी इस कद्र राजनीतिक रंगत ले चुका है कि इसके सुलझने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे है। मंगलवार को इसकी बानगी भी मिली। हरियाणा के मुख्यमंत्री ने चंडीगढ, पंचकूला और मोहाली के समग्र और एकीकृत विकास के लिए समर्पित (डेडिकेटिड) बोर्ड अथवा प्राधिकरण (ऑथॉरिटी) गठित करने की मांग पर पंजाब भडक गया है और इसे फौरन खारिज कर दिया है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरेन्द्र सिंह ने जोर देकर कहा चंडीगढ पर सिर्फ पंजाब का ही हक है। उन्होंने इस बात का भी जिक्र किया है कि दुनिया में पंजाब एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसकी अपनी स्वतंत्र राजधानी नहीं है। मुख्यमंत्री के इस बयान में पंजाब का दर्द  छिपा है। इस बात में वजन है कि राज्य बनने के बाद हरियाणा अपनी अलग राजधानी बना सकता था। पंजाब के लिए  चंडीगढ राजधानी से कहीं ज्यादा प्रतिष्ठा  का मुद्दा बन चुका है। 2016 में केन्द्र ने चंडीगढ के लिए पहला स्वतंत्र प्रशासक नियुक्त करने का फैसला लिया था और केजे अलफोन्स को उप-राज्यपाल (एलजी) के बराबर का दर्जा देकर  प्रशासक बनाने की घोषणा तक हो चुकी थी। मगर तब पंजाब ने इसका इतना मुखर विरोध किया कि केन्द्र को इसे वापस लेना पडा। 1984 के बाद से पंजाब के राज्यपाल ही चंडीगढ के राज्यपाल रहे हैं। पंजाब ने केन्द्र सरकार के इस फैसले में “राजनीतिक चाल की बू“ सुंघ ली । चंडीगढ के लोग इसे केद्र प्रशासित रखने के पक्ष में है और केन्द्र की यह पहल इसी नजरिए से देखी गई थी। चंडीगढ को लेकर पंजाब इतना संवेदनशील है कि एक छोटी से नियुक्ति पर भी राज्य के सियासी नेता मुखर हो जाते हैं। इस मामले में सारे मतभेद भुलाकर सभी राजनीतिक एक आवाज बुलंद करते हैं।  चंडीगढ में अफसरों की तैनातौ को लेकर भी पंजाब लगातार 60ः 40 (पंजाब 60, हरियाणा 40) की रेशो  को लागू करने पर जोर देता रहा है। ज़रा सा ऊपर  नीचे  पंजाब तिलमिला उठता है। चंडीगढ़ प्रशासन   में  60ः 40 का यह फार्मूला  चंडीगढ में पंजाब के हक को पुख्ता करता है। आजादी से बृहद  पंजाब (पाकिस्तान वाला पंजाब भी) की राजधानी लाहौर हुआ करती थी। लाहौर पाकिस्तान में चला गया, इसलिए संयुक्त पंजाब के लिए एक नई राजधानी बनानी पडी और  तत्कालीन पंजाब राज्य के मध्य स्थित चंडीगढ को नई राजधानी बनाया गया। इसे विडबंना ही कहा जाए कि पंजाब को जल्द ही नई राजधानी से भी महरुम होना पडा। संयुक्त पंजाब, तीन भागों में बंट गया। पहाडी क्षेत्र हिमाचल चले गए। हिंदी भाषी  हरियाणा को मिल गए और चंडीगढ संयुक्त राजधानी बन गया।  पंजाब पटियाला से अमृतसर तक 50362 वर्ग किलोमीटर (हिमाचल से भी छोटा) तक सिमट कर रह गया। पंजाब का यही दर्द है कि वह बार-बार का विभाजन सहने की स्थिति में नहीं है मगर जमीनी सच्चाई यह भी कि 52 साल में हालात बहुत बदल गए हैं। चंडीगढ को पंजाब और हरियाणा की संयुक्त राजधानी बनाए रखने में सभी पक्षों की भलाई है।