रविवार, 8 जुलाई 2018

The End of An Era

वयोवृद्ध पत्रकार जे एन साधु के निधन के साथ  ही निर्भीक पत्रकारिता के एक स्वर्णिम युग का अंत  हो गया हो। साधु   खोजी और  निर्भोक पत्रकारिता के स्तंभ थे। 60 और 70 के दशक खोजी और निर्भीक  पत्रकारिता का दौर था और पत्रकार तब  मिशनरीज हुआ करते थे। अखबार लोकतंत्र के विशु द्ध चौथे स्तंभ।  कमर्शियल ब्रांडिंग  तब  पत्रकारिता   कोसों दूर थी ।70 के दशक में  शिमला में बमुश्किल आध दर्जन  पत्रकार हुआ करते थे और जेएन साधु, पीएन शर्मा, सीएल भारद्वाज, एसएस बनियाल, विद्या प्रकाश  प्रभाकर और युवा उभरते पत्रकार प्रकाश  लोहमी। प्रकाश  लोहमी तो सर्वव्यापी है। कहीं भी फिट हो जाता है।  खोजी और निर्भीक पत्रकारिता के लिए जिस सपार्क और जज्बे की जरुरत होती है, जेएन साधु उसके प्रतीक थे। उन्हें अखबार भी वैसा ही मिला था। इंडियन एक्सप्रेस खोजी पत्रकारिता का प्लेटफॉर्म  रहा है। साधु साहब इस अखबार के 35 साल तक आदर्श   नुमाइंदे थे।  पत्रकारों को दाना डालने की सियासी नेताओं की फितरत होती है मगर वे इस जाल मे नहीं फंसे। बडा से बडा सियासी नेता उनकी निर्भीक कलम से खौफ खाता था। 70 के दशक में हिमाचल में “वन माफिया“ बेलगाम हुआ करता था और यह सियासी समर्थन से खूब फल-फूल रहा था। साधु साहब ने इसका भांडाफोड करने में कोई कसर नहीं छोडी। मूलतः कश्मीरी  थे मगर  शिमला से ऐसे जुडे कि  यहीं के होकर रह गए। रिटायरमेंट के बाद दक्षिण के एक अग्रेंजी अखबार से जुडे रहे। उनकी साप्ताहिक डायरी इस अखबार में छपती थी और जब भी छपती प्रैस रुम आकर मुझे और केएस तोमर को पढवाते। तोमर  इसे “ पिस्डु“ (लघु लेख) बताकर साधु साहब को छेडा करते । उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। हमेशा  सहयोगियों और युवा पत्रकारों को प्रेरित करते रहे। सियासी नेताओं के चापलूसी वाले लेख अथवा खबरें उन्हें जरा भी पसंद नहीं थे और मुंह पर इसकी आलोचना किया करते थ। उनकी लेखनी में जितनी प्रखरता थी, स्वभाव में उतनी ही सरलता। पीएन शर्मा  को उनकी “रंगीन तबियत“ के लिए अक्सर छेडा करते और हम इसे खूब इंजॉय करते। अस्सी के दशक में मैने जब समाचार एजेंसी “मनफा“ शुरु की, साधु साहब ने हमारी खबरों और लेखो् को खूब सराहा और मुझे कई बार   टिप्स  भी दिए। जेएन साधु के निधन से निर्भीक पत्रकारिता ने एक नायाब हीरा खोया है। हिमाचल में पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया है।