सोमवार, 31 अक्टूबर 2016

न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका

केन्द्र सरकार  द्धारा जजों की नियुक्तियों में अनावश्यक विलंब किए जाने पर देश के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जस्टिस टीएस ठाकुर बेहद खफा हैं । पिछले शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीष जस्टिस ठाकुर को कहना पडा कि सरकार न्यायपालिका को बर्बाद करने पर आमादा है। सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने फरवरी में उच्च न्यायालयों में नियुक्तियों के लिए 75 जजों के नाम सरकार की स्वीकृति के लिए भेजे थे मगर इस पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। सरकार अभी भी जजों की नियुक्तियों को प्रोसिजरल झमेले में उलझा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि आज स्थिति यह हो गई है कि जजों के न होने के कारण  न्यायाधीशों के कमरों पर ताले पडे हैं। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी  न्यायपालिका की हताशा  दर्शाती  है कि सरकार को अगर न्याय व्यवस्था को ही रोकना है तो समूची न्यायपालिका को ही “लॉक आउट“ क्यों नहीं कर देती़? यह पहली बार नही है कि जजों की नियुक्तियों में अनावश्यक विलंब पर  मुख्य न्यायाधीश ने  चिंता जताई है। इससे पहले इस साल अप्रैल माह में जजों पर अत्याधिक काम का बोझ और  उनकी नियुक्तियों में विलंब को लेकर प्रधानंमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में  भारत के मुख्य न्यायाधीश ठाकुर की आंखें भर आई थीं। देश  के मुख्य न्यायाधीश का जजों की नियुक्तियों में अत्याधिक देरी पर चिंतित होना स्वभाविक है।  न्याय व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखना  देश के न्यायाधीश की जिम्मेदारी है और न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं। यही कारण है कि जनमानस को आज भी न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है। सियासतदान अपने लिए स्पेस बनाने और अपने लोगों की नियुक्तियां करने में जरा भी विलंब नहीं करते हैं मगर जब  औरों की बारी आती है, तब सरकार को सांप सूंघ जाता है। जजों की नियुक्तियों के मामले को लेकर सरकार और न्यायपालिका में खासा टकराव है। मोदी सरकार ने जजों की नियुक्तियों के वास्ते मौजूदा सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम व्यवस्था को बदल कर पिछले साल नेशनल ज्युडिशियल  अपाइंटमेंटस कमीशन गठित किया था।  इस कमीशन में केन्द्रीय विधि मंत्री और प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता द्वारा चयनित दो न्यायविदों को  शामिल किया जाना था। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार के इस कमीशन को इस बिला पर निरस्त कर दिया गया था कि इससे जजों की नियुक्तियों में सरकार का खासा दखल रहेगा और इससे न्यायपालिक की  विश्वसनीयता ही जाती रहेगी। मौजूदा कॉलिजियम चयन पद्धति में सर्वोच्च न्यायालय के सेनियरमोस्ट  जजों को  शामिल किया जाता है और उनकी सिफारिशों पर ही जजों की नियुक्ति की जाती है। सुप्रीम कोर्ट  अपनी सिफारिशों को  राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए केन्द्र सरकार के पास भेजती है। राष्ट्रपति  की स्वीकृति के बाद सरकार नियुक्ति की अधिसूचना जारी करती है। अब तक इसी व्यवस्था का पालन किया जाता रहा है। और मोदी सरकार से पहले इस व्यवस्था में कोई खोट नहीं पाया गई  था। जाहिर है सरकार जजों की नियुक्तियों में भी अपना दखल चाहती है। अब यह बात तो आम आदमी भी जानता है कि देश के सियासी नेताओं की परख कैसी है? जजों की नियुक्तियों का काम  सर्वोच्च न्यायालय के जजों से बेहतर और कोई नहीं कर सकता। ताजा स्थिति यह है कि सरकार अपनी बात पर अडी हुई है और न्यायपालिका अपने स्टैंड पर। इसी स्थिति के  दृष्टिगत , सर्वोच्च न्यायालय को  शुक्रवार को कहना पडा कि जजों की नियुक्तियों का मामला अहं संतुष्टि  का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। अगर न्यायविदों से पूछा जाए तो वे यही कहंगें कि जजों की नियुक्तियों में खामख्वाह का विलंब नहीं किया जाना चाहिए। यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण  है। देश की न्यायिक व्यवस्था की  विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए यह जरुरी है कि जजों की नियुक्तियां पूरी तरह से निष्पक्ष  हों। देश की विधायिका और कार्यपालिका पहले ही अपनी  विश्वसनीयता खो चुकी है।       

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

कारोबारी (अ)सुगमता

आर्थिक सुधारों को संजीदगी से लागू करने और लालफीताषाही तथा लाइसेंस राज खत्म करने के बावजूद भारत में बिजनेस करना (कारोबार सुगमता) अभी भी आसान नहीं है। विश्व  बैंक की ताजा समीक्षा रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। 190 अर्थव्यवस्थाओं की फेहरिस्त में भारत 130वें स्थान पर है। पिछले साल वह 131वें स्थान पर था। भारत की तुलना में इजराइल, मलेशिया, कजाख्स्तान, दुबई और हांग कांग इस मामले में कहीं बेहतर है। मगर भारत के लिए अच्छी खबर यह है कि विश्व  बैंक ने आर्थिक सुधारों को संजीदगी से लागू करने के सरकार के प्रयासों की सराहना की है और एक पूरा अध्याय इस पर समर्पित किया गया है। इस अध्याय में कहा गया है कि भारत ने देश  में कारोबारी माहौल बनाने के लिए सकारात्मक प्रयास किए हैं और इनके सुखद परिणाम भी सामने आ रहे हैं।  उधोग और व्यापार जगत को माकूल सुविधएं दी गई हैं। कानूनी अडचनें दूर की गई हैं और निवेश  के लिए बेहतर माहौल बनाया गया है। तथापि कारोबारी सुगमता के लिए अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है। वीरवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौकरशाही से इस बात का विश्लेषण  करने को कहा कि भारत में कारोबारी सुगमता के लिए माकूल माहौल कैसे बनाया जा सकता है। भारत 130वें स्थान पर क्यों है, शीर्ष  पर क्यों नही इस बात पर भी मंथन किया जाना चाहिए। देश  में मुक्त रुप से निवेश  तभी आएगा जब कारोबारी सुगमता वाला माहौल हो और इसके लिए उन तमाम बाधाओं को दूर करना होगा, जिनसे निवेशकों को आए दिन परेशानी होती हो। निवशकों को सबसे ज्यादा कोफ्त आलतु-फालतू की कागजी औपचारकिताएं से होती है और इन्ही कागजी लफ्डों से करप्शन पनपती है। भारत में कहने के लिए लाइसेंस और इंस्पेक्टरी राज खत्म हो गया है मगर अमल में ऐसा कुछ भी नहीं है। भारत में अभी भी उधोग लगाने के लिए सौ तरह के झंझट हैं और सरकारी दफ्तरों की खाक छाननी पडती है। देश  के अग्रणी उधोगपति आदि गोदरेज ने कुछ समय पहले इस बात पर निराशा  जताई थी कि लाइसेंस और इस्पेक्टरी राज खत्म किए जाने के बावजूद अभी भी केन्द्र और संबंधित राज्य सरकार से कई तरह की अनुमति लेनी पडती है। इसमें न केवल समय जाया होता है, बल्कि कई जगह कर्मचारियों की मुठ्ठी गर्म करनी पडती है। देश  में कारोबार करना कितना सुगम है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक अग्रणी औद्योगिक  घराने को महाराष्ट्र  में संयंत्र लगाने के लिए कई माह इंतजार करने के बाद भी अनुमति नहीं मिल पाई। हिमाचल के मनाली में अमेरिका के प्रतिष्ठित  फोर्ड औधोगिक घराने को कई साल इंतजार करने के बाद खाली हाथ अमेरिका लौटना पडा। भारत में कारोबार करने में स्थानीय सियासी हित भी आडे आते हैं। हिमाचल में फोर्ड के मामले में यही हुआ था। पंजाब और महाराष्ट्र  ने लालफीतशाही को काफी हद तक कम  किया है। श्रम कानून भी नरम किए गए हैं। महाराष्ट्र सरकार ने कारोबार स्थापित करने के लिए निर्धारित 76 अनुमतियों (परमिशन) को घटाकर 35 कर दिया है मगर अभी भी इन्हें काफी ज्यादा माना जा रहा है। भारत में सख्त और उत्पादन विरोधी कर व्यवस्था भी बिजनेस में अडचन डालती है। तरह-तरह और जगह-जगह कर लगना और इस क्रम में घुसखोरी को बढावा मिलने से भारत में कारोबारी खासे परेशान किये जाते हैं। जीएसटी अभी तक लागू नहीं हो पाया है। भारत की तुलना में शीर्ष पर रहने वाले सिंगापुर और न्यूजीलैंड में कारोबार करना बेहद सुगम है और दोनों  मुल्कों में एक दिन में ही कारोबार स्थापित किया जा सकता है। निवेशक वहीं जाएगा, जहां उसे सुगमता से कारोबार करने का माहौल मिलेगा। भारत दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है और अगर देश को दुनिया में अपना परचम लहराना है तो कारोबारी सुगमता का माहौल निर्मित करना होगा।  

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

येदियुरप्पा को राहत

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा को सीबीआई कोर्ट से बडी राहत मिली है। सीबीआई कोर्ट ने येदियुरप्पा को 40 करोड रु के घूसखोरी मामले से बरी कर दिया है। येदियुरप्पा को इस मामले में तीन सप्ताह तक जेल में रहना पडा था और उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी तक गंवानी पडी थी। कोर्ट ने उनके दो पुत्रों और दामाद समेत 13 अन्य को भी बरी कर दिया है। येदियुरप्पा और उनके परिवार पर आरोप था कि बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने 2010 में राज्य में स्थित एक स्टील कंपनी की कायदे-कानून के बाहर जाकर मदद की थी। इस स्टील कंपनी को माइनिंग लाइसेंस दिलवाने के लिए 40 करोड रु की घूस ली थी। 20 करोड येदियुरप्पा के दो पुत्रों और दामाद के बैंक अकांउट में 20 करोड जमा कराए गए थे। इसके अलावा 20 करोड प्रेरणा एजुकेशनल ट्रस्ट में जमा कराए गए थ। इस ट्रस्ट को येदियुरप्पा के पुत्र चलाते हैं। ये सब आरोप सीबीआई ने अदालत में दायर चार्जशीट में लगाए थे। येदियुरप्पा का एक पुत्र अभी कर्नाटक विधानसभा का सदस्य है। 2011 में मामले सामने आने पर येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद भी छोडना पडा था। अदालत से बरी होने के बाद येदियुरप्पा का पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनने का रास्ता साफ हो गया है। कर्नाटक में मई 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं। भाजपा के  राष्ट्रीय  अध्यक्ष अमित  शाह येदियुरप्पा को पहले ही पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर चुके हैं। कर्नाटक में अभी कांग्रेस की सरकार है। दक्षिण भारत में कर्नाटक एकमात्र ऐसा राज्य है जहां भाजपा का वर्चस्व है और राज्य मे पार्टी की  सरकार भी सत्तारूढ रही है। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पहली बार स्पष्ट  बहुमत मिला था और येदियुरप्पा  दूसरी बार मुख्यमंत्री बने थे। इससे पहले 12 नवंबर, 2007 को बीएस येदियुरप्पा राज्य में भगवा पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बने थे मगर तब भाजपा को जनता दल (एस) का समर्थन नहीं मिलने पर 7 दिन बाद उनकी सरकार गिर गई थी। कनार्टक में भाजपा और जनता दल (एस) का बेमेल राजनीतिक गठबंधन की दिलचस्प गाथा है। 2005 में राज्य में धर्म सिंह के नेतृत्व में गठबंधन सरकार को गिराने के बाद भाजपा और जनता दल (एस) ने सरकार बनाई और तय हुआ पहले बीस महीने जेडी (एस) के एचडी कुमारस्वामी मुख्यमंत्री होगे और उनके बाद अगले बीस महीने भाजपा के येदियुरप्पा। बीस माह तक सब सही चलता रहा मगर जब भाजपा की बारी आई, कुमारस्वामी अपनी बात से मुकर गए और पद छोडने से मना कर दिया। इससे खफा भाजपा गठबंधन से बाहर आ गई और राज्य राष्ट्रपति  शासन के अधीन आ गया। नवंबर 2007 में भाजपा-जनता दल (एस) में फिर समझौता हुआ और येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बन गए मगर जेडी (एस) फिर अपनी बात से मुकर गई और भाजपा की सरकार 7 दिन में ही गिर गई।  2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पहली बार अपने बूते स्पष्ट  बहुमत मिला और येदियुरप्पा फिर मुख्यमंत्री बने। 2013 के विधानसभा चुनाव आते-आते  येदियुरप्पा भाजपा छोड चुके थे और उन्होने चुनाव अपनी अलग क्षेत्रीय पार्टी के बैनर में लडा पर कोई खास सफलता नहीं मिली।  2014 में लोकसभा चुनव से पहले येदियुरप्पा फिर भाजपा में षामिल हो गए। बहरहाल, येदियुरप्पा कर्नाटक के ताकतवर लिंगायत समुदाय से हैं। कर्नाटक में लिंगायत की सबसे अधिक 17 फीसदी आबादी है। और इस समुदाय की राज्य में राजनीतिक दलों को स्पष्ट  बहुमत दिलाने में अहम भूमिका रहती है। 2008 के विधानसभा चुनाव में लिंगायत ने भाजपा को  स्पष्ट  बहुमत दिलाने में महत्वपूर्ण  भूमिका निभाई थी और 2013 में येदियुरप्पा के अपमान से आहत इस समुदाय ने भाजपा का साथ नहीं दिया था। इसी जमीनी सच्चाई के दृष्टिगत भाजपा ने येदियुरप्पा को पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष और मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बनाया है जबकि अभी चुनाव डेढ साल दूर है। घूसखोरी के आरोप से दोषमुक्त होने से येदियुरप्पा अब विरोधियों पर भारी पड सकते हैं। 

बुधवार, 26 अक्टूबर 2016

मिस्त्री को टा--टा

देश  के अग्रणी एवं प्रतिष्ठित  औद्योगिक घराने टाटा समूह में तख्ता पलट ने पूरी दुनिया के उधोग-व्यापार जगत को चौंका दिया है। बोर्डरुम में उठा-पटक आम बात है मगर 150 साल पुराने टाटा ग्रुप  में ऐसा बदलाव  पहली बार हुआ है। और ऐसा भी  पहली बार ही हुआ है कि चैयरमैन को हटाया जाना था मगर उन्हें इसकी कानोकान खबर तक नहीं लगी। सोमवार को टाटा ग्रुप  ने अप्रत्याषित घटनाक्रम में अपने चेयरमैन साइरस  मिस्त्री को हटाकर रतन टाटा को अंतरिम चेयरमैन नियुक्त किया। दिसंबर, 2012 को साइरस मिस्त्री ने रतन टाटा की जगह ली थी। रतन टाटा अभी चेयरमैन एमेरिटस हैं। नए चेयरमैन की नियुक्ति के लिए एक पैनल भी  गठित किया गया है। चार महीने में नया चेयरमैन नियुक्त कर लिया जाएगा। टाटा ग्रुप  को मर्यादित और कन्वेशनल माना जाता है और ग्रुप  के बोर्डरुम में क्या होने जा रहा है और क्या नहीं, इसकी  शेयरधारकों को ही नहीं, मीडिया को भी अग्रिम सूचना रहती है। सौ से ज्यादा देशों  में टाटा का कारोबार फैला हुआ है। सुई से लेकर भारी मशीनरी तक टाटा के उत्पाद हैं। इस्पात और वाहन उत्पादन में टाटा की पूरे विश्व में अलग पहचान है। ब्रिटेन में टाटा इस्पात का सबसे बडा उत्पादक है। आखिर ऐसा क्या हुआ कि ग्रुप  को अपने चेयरमैन को गुपचुप तरीके से हटाना पडा और इसकी किसी को भनक तक नहीं लग पाई जबकि  ग्रुप  के  चेयरमैन को बोर्डरुम के हर कदम की पूरी जानकारी रहती है। टाटा   सरीखे प्रतिष्ठित ग्रुप  के बॉस को अपनी बर्खास्तगी की भनक न लगे, इसके साफ अर्थ  है कि मामला बेहद गंभीर था और  बोर्ड चैयरमैन को अपने बचाव का जरा भी अवसर नहीं देना चाहता था। निसंदेह, साइरस मिस्त्री की टाटा गु्रप के चैयरमैन पद से बर्खास्तगी कार्पोरेट जगत में अपमानजनक मानी जा सकती है मगर कोई भी  कार्पोरेट हाउस अपने चेयरमैन को बेहद गंभीर परिस्थितियों में ही हटाता है। टाटा बोर्ड  की इस कार्रवाई से इस बात का पता चलता है कि चैयरमैन पद पर रहते हुए साइरस मिस्त्री ने जरुर ऐसे कदम उठाए हैं, जिनसे रतन टाटा  को व्यक्तितौर पर नुकसान हो रहा था। वैसे साइरस मिस्त्री टाटा ग्रुप  में पहले बाहरी  (गैर-पारिवारिक) चैयरमैन हैं। इस नाते उनकी डगर और भी कठिन थी। साइरस मिस्त्री  के सहकर्मी उन्हें मृदभाषी और ”सब को साथ लेकर चलने वाला” बॉस बताते हैं और कहते हैं उनके मार्गदर्शन  में  ग्रुप  ने नई बुलदियां छुईं हैं। टाटा से पहले साइरस मिस्त्री शपूरजी पालोनजी एंड कंपनी में थे और उनके मार्गदर्शन  में कंपनी ने भारी मुनाफा कमाया था। कंपनी का टर्नओवर दो करोड पाउंड से डेढ अरब पाउंड पहुंच गया था। टाटा ग्रुप  में भी मिस्त्री ऐसा कुछ करना चाहते थे।  शुरु में साइरस  मिस्त्री रतन टाटा के मार्गदर्शन  में काम करते रहे  मगर धीरे-धीरे उन्होंने स्वतंत्र फैसले लेने  शुरु कर दिए थे और रतन टाटा के फैसलों को पलटना  शुरु करके अपने लिए अलग रास्ता बना लिया था। रतन टाटा के करीबी मिस्त्री पर ग्रुप  की रत्न इकाइयों को एक-एक करके बेचने का आरोप लगा रहे हैं। इस मामले में ब्रिटेन की प्रतिष्ठित  इस्पात कंपनी की मिसाल दी जा रही है। तथापि, जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। रतन टाटा ने 2002 से 2008 के बीच तेजी के दौर में देश -विदेश  में टेटली और कोरस जैसी नामी ब्रांड  समेत कई कंपनियों का अधिग्रहण किया था। कई होटल भी खरीदे मगर इनमें अधिकांश  भारी घाटे में चल रही  थी। मिस्त्री को विरासत में घाटे वाली कंपनियां ज्यादा मिलीं। उन्होंने ग्रुप  को घाटे से उभारने के लिए ऐसी कंपनियों को बेचना  शुरु कर दिया। एक तरह से यह रतन टाटा के फैसलों को पलटना जैसा था। बहरहाल, साइरस मिस्त्री की बर्खास्तगी ने यह बात स्पष्ट  कर दी है कि पारिवारिक  औधोगिक घरानों में बाहरी व्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। अब मामला अदालत में लडा जाएगा।  

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016

मुलायम “समाजवाद“

                
“अपने पांव पर कुल्हाडी कैसे मारी जाए,“ समाजवादी पार्टी से सीखें। उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ  पार्टी  के  पारिवारिक क्लेश  ने विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मुलायम सिंह एंड सन्स  का जनाजा निकाल दिया है। कहां तो चुनाव से पहले पार्टी में मुखर आलोचकों को समझा-बुझा कर मना लिया जाता है , और कहां लखनऊ के “शतरंज खिलाडी“ पारिवारिक कलह से पार्टी को हो रहे बेतहाशा नुकसान से बेपरवाह “ शह और मात“ की चालें चल रहे हैं। देश  के युवातम मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव की हालत बिल्कुल मुगलिया सल्तनत के शहजादे सलीम जैसी है। अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने के लिए अखिलेश  यादव को  सम्राट अकबर  के शहजादे सलीम की तरह अपने ही पिता से बगावत करनी पड रही है। और पिता मुलायम 'दी  ग्रेट ' हैं कि अपने मुख्यमंत्री बेटे का साथ देने की बजाए उन्हें सार्वजनिक फटकार लगा रहे हैं। यह सिला तब से जारी है जबसे मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाया और खुद रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाते रहे। कौन मंत्री बनेगा, किसको कौनसा विभाग दिया जाएगा, किस अफसर की कहां तैनाती की जाएगी, यह सब मुलायम सिंह तय करते हैं। अखिलेश  तो बस नाम मुख्ममंत्री हैं। उन्हें राज्य के मुख्य सचिव तक को नियुक्त करने की पॉवर तक नहीं थी। पहली बार पिछले सितंबर माह में अखिलेश ने चाचा  शिवपाल यादव के करीबी दीपक सिंघल को मुख्य सचिव पद से हटाकर अपनी पसंद के राहुल भटनागर को राज्य का नया मुख्य सचिव बनाया था। इससे पहले अखिलेश  ने  शिवपाल यादव के करीबी दो ताकतवर मंत्रियों को बर्खास्त कर दिया था और चाचा से महत्वपूर्ण  विभाग छीन लिए थे। बाद में मुलायम सिंह के हस्तक्षेप पर  शिवपाल को पुराने विभाग लौटाए जाने और बर्खास्त मत्रियों को  वापस मंत्रिमंडल में  शामिल किए जाने से लग रहा था कलह थम गई है। मगर दो दिन पहले अखिलेश  ने  शिवपाल यादव और अमर सिंह के तीन करीबी मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर कलह और बढा दी है। अब चाचा-भतीजे की कलह चरम पर पहुंच गई है।  शुक्रवार को लखनऊ की बैठक में इसकी झलक भी मिली। चाचा  शिवपाल ने मुख्यमंत्री से माइक तक छीन लिया और धक्का-मुक्की तक हुई। मुलायम ने बेटे और  शिवपाल को गले मिलने को कहा मगर दोनों ने इसे नहीं माना।  मुलायम सिंह भाई  शिवपाल यादव और “भाई समान “ अमर सिंह का साथ दे रहे हैं। अखिलेश को  अपनी औकात मे रहने को कहा गया। पार्टी की बैठक में चाचा  शिवपाल यादव और भतीजे अखिलेश  के बीच हुई गरमागर्मी और माइक छीनने की घटना से साफ है कि समाजवादी पार्टी में “सब कुछ अच्छा नहीं है”। अखिलेश  के ”बगावती“ तेवरों से यह भी  स्पष्ट  है कि वे स्वतंत्र राजनीतिक मार्ग  की तलाश  में। इसी बात को सामने रखकर वे विवादास्पद मुख्तार अंसारी और अमर सिंह का पार्टी में मुखर विरोध कर रहे है। अखिलेश  और उनके समर्थकों को लगता है कि मुख्तार अंसारी का विरोध करने से राज्य के लोगों, खासकर  युवाओं  में उनकी छवि निखर सकती  है। समाजवादी पार्टी को अब तक “मव्वालियों और असामाजिक तत्वों“ की पार्टी कहा जाता है। अखिलेश  के कडे विरोध के बावजूद मुलायम सिंह और  शिवपाल यादव ने मुख्तार अंसारी को पार्टी में  शामिल  करवाकर यह साबित भी कर दिया है। अब अखिलेश  के पास बगावत करने के सिवा कोई चारा भी नहीं है। पार्टी में रहते हुए भी अखिलेश अपने लिए अलग रास्ता प्रशस्त कर सकते है़। उनकी लडाई केवल चाचा से ही नहीं है, अलबत्ता अपनी सौतली मॉ से भी है जो अपने बेटे को मुलायम सिंह का उतराधिकारी बनाना चाहती है।  शिवपाल यादव इस मामले में अखिलेश  की सौतली मां का साथ दे रहे हैं। पूरी पारिवारिक कलह भी इसी बात को लेकर है कि मुलायम सिंह का उतराधिकारी कौन बनेगा। इस पूरे घटनाक्रम से समाजवादी पार्टी की छवि को खासा धक्का लगा है। अगर विधानसभा चुनाव तक कलह थमती नहीं है, तो पार्टी का सफाया तय है। ताजा चुनावी सर्वेक्षण समाजवादी पार्टी के पक्ष में नहीं है।   

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

अब आया ऊंट पहाड के नीचे

देश की  शीर्ष अदालत की अवमानना पर आमादा भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सर्वोच्च न्यायालय ने फिर जोरदार झटका दिया है। और यह सिला तब तक चलता रहेगा, जब तक बोर्ड लोढा समिति की सिफारिशों  को अक्षरश  लागू नहीं कर लेता। सुधार लाने में बीसीसीआई की ना-नुकर  से खफा  सुप्रीम कोर्ट ने  गाठ शुक्रवार को बोर्ड के पर ही कतर डाले। कोर्ट ने लोढा पैनल से कहा है कि वह बीसीसीआई के बडे कॉन्ट्रैेक्ट देने के लिए अपना स्वतंत्र ऑडिटर नियुक्त करे।  अब तक दिए गए बडे  कॉन्ट्रैेक्ट और अन्य अकाउंट्स की भी जांच कराए। सुप्रीम कोर्ट  ने बीसीसीआई को निर्देश  दिए हैं कि जब तक  लोढा पैनल की सिफारिशें  लागू नहीं की जाती, तब तक राज्यों के क्रिकेट बोर्ड  को कोई भी ग्रांट जारी नहीं की जाए। सुप्रीम कोर्ट  ने बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर को फिर निर्देश  दिए हैं कि  अगली सुनवाई तक लोढा समिति की  सिफारिशों को लागू किया जाना चाहिए। अगली सुनवाई दिसंबर 3 को रखी गई है। और अगर तब तक बीसीआईआई  लोढा समिति की  सिफारिशें   लागू नहीं करती, सुप्रीम कोर्ट  बीसीसीआई को भंग करके अपने प्रशासक नियुक्त कर सकता है। यह बात सुप्रीम कोर्ट पहले ही  स्पष्ट  कर चुका है। बीसीसीआई ने लोढा  समिति की सिफारिशों को लागू करने से साफ मना करते हुए सुप्रीम कोर्ट  में पुनर्याचिका दायर की थी। 18 जुलाई को  सुप्रीम कोर्ट  ने इस याचिका को अस्वीकार करते हुए बीसीसीआई को  निर्देश  दिए थे कि उसे लोढा समिति की सिफारिशें  हर हाल में लागू करने होगी। इस पर भी बीसीसीआई ना-नुकर करती रही।  ताजा फैसले से बीसीसीआई की कॉन्ट्रैक्ट अवार्ड  करने की पॉवर जाती रही है। बीसीसीआई को अगले दस  साल (2019 से) के लिए इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के मीडिया राइटस देने हैं। हाल ही में बीसीसीआई ने इसके लिए निविदाएं आंमंत्रित की थीं और इसके जबाव में ट्विटर और फेसबुक जैसी लोकप्रिय सोशल साईट्स ने भी गहरी रुचि दिखाई थी। इन दोनों के अलावा सोनी, स्टार टीवी और रिलायंस जियो भी मैदान में है। 2018 तक के आईपीएल मीडिया राइटस सोनी के पास हैं और इसके लिए सोनी ने दस साल पहले 1.6 अरब डॉलर की बोली लगाई थी। इस बार बीसीसीआई को आईपीएल की मीडिया राइटस बोली से 4.5 अरब डॉलर के आय का अनुमान है। मगर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से बीसीसीआई की जगह अब लोढा समिति का ऑडिटर फैसला करेगा। लोढा समिति की सिफारिशें लागू करने पर बीसीसीआई के कई मौजूदा दिग्गज प्रभावित  हो रहे हैं। बीसीसीआई को मंत्रियों और नौकरशाहों की जद से बाहर रखना, एक पद-एक व्यक्ति, दो से ज्यादा टर्म पर प्रतिबंध, एक राज्य-एक वोट और आयु सीमा (अधिकतम 70 साल) लोढा समिति की प्रमुख सिफारिशें  हैं। अगर इन सिफारिशों  को लागू किया जाता है, तो बीसीसीआई अध्यक्ष समेत कई पदाधिकारी बाहर हो जाएंगे। बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर खुद 14 साल से हिमाचल प्रदेश  क्रिकेट संघ के अध्यक्ष पद पर जमे हुए हैं। लोढा समिति की सिफारिशें  लागू होने से उन्हें एक पद छोडना पडेगा। लोढा समिति की सिफारिशों  को लागू करने से मना करके बीसीसीआई ने साफ कर दिया है कि उसे सुधार में कोई दिलचस्पी नहीं है जबकि बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर यह बात भली-भांति जानते थे कि देश की शीर्ष  अदालत की अवमानना करना उन्हें महंगा पड सकता है। युवा सांसद अनुराग ठाकुर  की यह बदकिस्मती है कि उन्होंनें बीसीसीआई अध्यक्ष का पदभार नाजुक समय में संभाला है। अनुराग ठाकुर को राजनीति में अभी लंबा सफर तय करना है। उनके लिए बेहतर यही होगा कि वे अविलंब संजीदगी से लोढा समिति की सिफारिशों  को अक्षरश: लागू करवाएं और क्रिकेट के इतिहास में अपने लिए स्वर्णिम स्थान बनाएं। खलनायक की भूमिका से उनके राजनीतिक कैरियर पर असर पड सकता है। यही तो उनके विरोधी साबित करना चाहते हैं।

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2016

जीएसटी में विलंब

लंबी जद्दोजेहद और सियासी खींचतान के बाद  अंतोगत्वा संसद और राज्य विधानसभाओं द्धारा   पारित किए जाने के बावजूद अब गुडस  और सर्विस टैक्स, जीएसटी परिषद में अटक गया है। बुधवार को दिल्ली में सपन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में भी कर दरों को लेकर कोई सहमति नहीं बन पाई। पिछले माह भी परिषद की बैठक में जीएसटी रेट को लेकर कोई फैसला नहीं लिया जा सका था और कहा गया था अक्टूबर की बैठक में हर हाल में रेट तय कर लिए जाएंगें। और अब फैसला नवंबर में होने वाली बैठक पर छोड दिया गया है। अगर नवंबर में जीएसटी रेटस तय नहीं हो पाए तो अप्रैल, 2017 से जीएसटी का लागू किया जाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। जीएसटी परिषद की अब तक तीन बैठक हो चुकी है मगर  रेटस पर कोई सहमति नहीं हो पाई है। जीएसटी का मूल रेट क्या हो, इस पर केन्द्र और राज्यों में अभी भी मतभेद बने हुए हैं। बुधवार को सहमित की उम्मीद थी मगर फैसला फिर टाल दिया गया। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार अक्टूबर की बैठक में राज्यों को जीएसटी  लागू किए जाने पर राजस्व के नुकसाई की भरपाई पर सहमति हो गई है। इस स्थिति के दृष्टिगत जेटली  आशान्वित है नवंबर की बैठ्क में जीएसटी के तहत रेट्स निर्धारित कर लिए जाएंगे। केन्द्र सरकार ने इस बार परिषद के समक्ष करों की पांच श्रेणियों का प्रस्ताव रखा है। मूल टैक्स दर 12 से 18 फीसदी के बीच रखी गई है। स्टैंडर्ड रेट 12 से 18 फीसदी  और थरेशहोल्ड रेट 7 फीसदी सुझाया गया है। यानी जीएसटी 18 फीसदी से कम ही रहेगा। अधिकांश  विशेषज्ञों का सुझाव है कि जीएसटी 16 फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए।  एशियाई प्रशांत के  अधिकतर देशों  में जीएसटी 10 फीसदी से नीचे ही है। सिंगापुर ने 1994 में जब जीएसटी (सेल्स टैकस) लागू किया था, यह 4 फीसदी था और अब 12 साल बाद 7 फीसदी के आसपास है। इसी वजह सिंगापुर ने तेजी से तरक्की की है। जीएसटी जितना भारी होगा, उतनी ही ज्यादा इसकी चोरी होगी। केन्द्र ने मैट्ल्स पर 4 फीसदी और अन्य आवश्ययक वस्तुओं पर 6 फीसदी जीएसटी का प्रस्ताव रखा है। विलासिता (कन्ज्युमर गुडस)  वस्तुओं पर 26 फीसदी जीएसटी प्रस्तावित है। मगर कुछ कन्ज्युमर डयुरेबल उत्पादों को 18 फीसदी जीएसटी के दायरे में लाने का प्रस्ताव है। अभी इन पर 33 फीसदी कर लगाया जा रहा है। सर्विस पर 18 फीसदी जीएसटी का प्रस्ताव है मगर छोटी सर्विस पर 12 फीसदी जीएसटी लगाया जाएगा। उपाभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में  शामिल 50 वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने का प्रस्ताव है। अधिकतर राज्य केन्द्र के इन प्रस्तावों से सहमत हैं मगर कांग्रेस  शासित राज्य जीएसटी को 16 फीसदी रखने के पक्ष में है। अधिकतर राज्य 17-18 फीसदी के पक्ष में है। इसमें कोई ज्यादा अंतर नहीं है। अरविंद सुब्रहृमण्यम पैनल ने जीएसटी की जो तीन श्रेणियां सुझाईं थी, उसमें पहली और दूसरी श्रेणी में कोई ज्यादा अंतर नहीं था। मगर  सुब्रहृमण्यम पैनल विलासिता वाली वस्तुओं पर 40 फीसदी जीएसटी के पक्ष में था।  बहरहाल, ज्यादा मतभेद राज्यों को मुआवजा तय करने पर था। अधिक औद्योगिकृत महाराष्ट्र  और तमिल नाडु जैसे राज्यों को जीएसटी के लागू होने पर खासा नुकसान हो रहा है। नई कर व्यवस्था के तहत जीएसटी उत्पादक से रिटेलर तक एक बार ही लगेगा। इससे उन राज्यों को ज्यादा नुकसान होगा जहां अधिकतर उत्पादक स्थित है। इसी कारण महाराष्ट्र  और तमिल नाडु जीएसटी का विरोध कर रहे थे। जीएसटी को जल्द से जल्द लागू करना देश  हित में है। भारत तीव्रगामी प्रगति के मुहाने पर खडा है और जीएसटी देश  को तेजी से आगे ले जा सकता है। जीएसटी को संसद से पारित करवाना मोदी सरकार की  शानदार उपलब्धि है। अब 1 अप्रैल, 2017 से जीएसटी लागू करवाना सरकार के समक्ष बडी चुनौती है।

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016

स्वदेशी जीवनशैली का प्रतीक है खादी


 आम आदमी की रोजी-रोटी का सहारा खादी को संजीदगी से प्रोत्साहित करना और स्वस्थ रहने की संजीवनी बूटी स्वच्छता के मूल-मंत्र को गांव-गांव  लोकप्रिय बनाना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बडी उपलधियां मानी जा सकती हैं। खादी और स्वच्छता दोनों ही समाज के पिछडे एवं शोषित  तबकों से जुडी हैं। खादी ग्रामोधोग में 80 फीसदी से भी अधिक ग्रामीण महिला कारीगरों की रोजी-रोटी जुडी हुई है। इसी तरह 90 फीसदी ग्रामीण महिलाएं  शौचालय बनाए जाने से लाभान्वित हुई हैं। इन आंकडों से पता चलता है कि खादी और स्वच्छता देश के लिए कितना महत्व रखती है। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी इस बात के लिए प्रशंसा के पात्र हैं कि उन्होंने सबसे पहले महिलाओं से जुडी ज्वलंत समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद मोदी ने सबसे पहले स्वच्छ भारत कार्यक्रम की नींव रखी और फिर “मन की बात“ में लोगों से खादी से जुडने का आहवान किया। खादी और स्वच्छता दोनों ही  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की  जीवनशैली का  अभिन्न हिस्सा थे। वे खुद अपना  शौचालय साफ करते और अपने लिए चरखे पर वस्त्र तैयार करते। महात्मा का कहना था “ चरखे के हर धागे में मुझे गरीब का चेहरा  दिखता है और आशा  की किरण नजर आती है “। महात्मा गांधी के लिए चरखा मात्र सूत कातने का जरिया नहीं था। चरखा जनमानस की आकांक्षाओं और आर्थिक स्वालंबन का प्रतीक है। जब तक देश  आर्थिक रुप से आत्म-निर्भर नहीं हो जाता, तब तक आम आदमी उपनिवेशवादी व्यवस्था और सोच का गुलाम बना रहेगा।  यह बात आजादी से पहले जितनी प्रासंगिक थी, उतनी ही प्रांसगिक आज भी है। भारत में फिरगिंयों ने व्यापार की आड में अपने पांव पसार थेे। ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फत व्यापार करते-करते फिरगिंयों ने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया। सैन्य ताकतें फिरंगियों को भारत से खदेड  नहीं पाई मगर लंगोटी पहने महात्मा गांधी ने स्वदेशी  और स्वराज के मूल-मंत्र से उन्हें भारत छोडने को मजबूर कर दिया। खादी का मतलब खद्दर पहनने से ही नहीं है। खादी हमारी जौवनशैली है। इसका सीधा संबंध देश  प्रेम  और भारतीयता से है।  विशुद्ध स्वदेशी सोच ( सिंपल लीविंग, हाई थींकिंग), आर्थिक नीतियां और राम राज्य वाला कार्यवन्यन। आजादी के सात दशक बाद  देश  में खादी एवं ग्रामोधोग  1300 रु करोड़  का कारोबार कर रहा है और लगभग 19.5 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। मगर यह अपेक्षा से कहीं कम है। इसकी तुलना में योग गुरु बाबा रामदेव का पंतजलि  कहीं ज्यादा कारोबार कर रहा है और मल्टी-नेshनल कंपनियों को कडी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की व्यक्तिगत पहल  और सदी के अभिनेता अमिताभ बच्चन के खादी का ब्रांड एंबेसडर बनने से खादी ग्रामोधोग को प्रोत्साहन तो मिला है मगर मल्टीनेशनल कंपनियों का मुकाबला करने के लिए अभी भी इसे कई पाएदान पार करने है। तडक-भडक के इस जमाने में किसी भी उत्पाद को जन-जन तक पहुंचाने के लिए टीवी, मीडिया और अन्य संचार साधनों पर प्रचार-प्रसार की जरुरत पडती है। मल्टी नेशनल और बडी कंपनियां विज्ञापन और जन संचार के माध्यम से अपने उत्पादों का खूब ढिंढोरा पीटती हैं  और इससे उनके उत्पाद खासे महंगे भी हो जाते हैं मगर फिर भी बिकते है। खादी ग्रामोधोग  मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह बिक्रय लागत (सेंलिग कॉस्ट) बेतहाशा  बढाकर  ऐसा नहीं कर सकता। पूरे देश  में खादी ग्रामोधोग के 75,000 के करीब सेल्स सेंटर है। इनके माध्यम से खादी ग्रामोधोग जन-जन तक पहुंच सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दीपावली पर खादी ग्रामोधोग के उत्पाद खरीदने की अपील से स्वदेशी  उत्पात लाभान्वित हो सकते हैं। भाजपा का दावा है कि वह 8.8 करोड सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है। और अगर सभी भाजपाई प्रधानमंत्री के आहवान पर अमल करे, खादी भी देश के सबसे लोकप्रिय उत्पाद बन सकते हैं और मल्टी नेशनल कंपनियो के उत्पादों को पीछे छोड  सकते हैं।  
सदी से भी अधिक ग्रामीण महिला कारीगरों की रोजी-रोटी जुडी हुई है। इसी तरह 90 फीसदी ग्रामीण महिलाएं षौचालय बनाए जाने से लाभान्वित हुई हैं। इन आंकडों से पता चलता है कि खादी और स्वच्छता देष के लिए कितना महत्व रखती है। प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए प्रषंसा के पात्र हैं कि उन्होंने सबसे पहले महिलाओं से जुडी ज्वलंत समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया है। प्रधानमंत्री बनने के तुरंत बाद मोदी ने सबसे पहले स्वच्छ भारत कार्यक्रम की नींव रखी और फिर “मन की बात“ में लोगों से खादी से जुडने का आहवान किया। खादी और स्वच्छता दोनों ही राश्ट्रपिता महात्मा गांधी की  जीवनषैली के अभिन्न हिस्सा थे। वे खुद अपना षौचालय साफ करते और अपने लिए चरखे पर वस्त्र तैयार करते। महात्मा का कहना था “ चरखे के हर धागे में मुझे गरीब का चेहरा  दिखता है और आषा की किरण नजर आती है “। महात्मा गांधी के लिए चरखा मात्र सूत कातने का जरिया नहीं था। चरखा जनमानस की आकांक्षाओं और आर्थिक स्वालंबन का प्रतीक है। जब तक देष आर्थिक रुप से आत्म-निर्भर नहीं हो जाता, तब तक आम आदमी उपनिवेषवादी व्यवस्था और सोच का गुलाम बना रहेगा।  यह बात आजादी से पहले जितनी प्रासंगिक थी, उतनी ही प्रांसगिक आज भी है। भारत में फिरगिंयों ने व्यापार की आड में अपने पांव पसार थेे। ईस्ट इंडिया कंपनी के मार्फत व्यापार करते-करते फिरगिंयों ने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया। सैन्य ताकतें फिरंगियों को भारत से खदेड  नहीं पाई मगर लंगोटी पहने महात्मा गांधी ने स्वदेषी और स्वराज के मूल-मंत्र से उन्हें भारत छोडने को मजबूर कर दिया। खादी का मतलब खद्दर पहनने से ही नहीं है। खादी हमारी जौवनषैली है। इसका सीधा संबंध देष प्रेम  और भारतीयता से है।  विषुद्ध स्वदेषी सोच ( सिंपल लीविंग, हाई थींकिंग), आर्थिक नीतियां और राम राज्य वाला कार्यवन्यन। आजादी के सात दषक बाद  देष में खादी एवं ग्रामोधोग  1300 रु का कारोबार कर रहा है और लगभग 19.5 लाख लोगों को रोजगार मुहैया करा रहा है। मगर यह अपेक्षा से कहीं कम है। इसकी तुलना में योग गुरु बाबा रामदेव का पंतजलि गु्रप कहीं ज्यादा कारोबार कर रहा है और मल्टी-नेषनल कंपनियों को कडी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की व्यक्तिगत पहल  और सदी के अभिनेता अमिताभ बच्चन के खादी का ब्रांड एंबेसडर बनने से खादी ग्रामोधोग को प्रोत्साहन तो मिला है मगर मल्टीनेषनल कंपनियों का मुकाबला करने के लिए अभी भी इसे कई पाएदान पार करने है। तडक-भडक के इस जमाने में किसी भी उत्पाद को जन-जन तक पहुंचाने के लिए टीवी, मीडिया और अन्य संचार साधनों पर प्रचार-प्रसार की जरुरत पडती है। मल्टी नेषनल और बडी कंपनियां विज्ञापन और जन संचार के माध्यम से अपने उत्पादों का खूब ढिंढोरा पीटती और इससे उनके उत्पाद खासे महंगे भी हो जाते हैं मगर फिर भी बिकते है। खादी ग्रामोधोग बिक्रय लागत (सेंलिग कॉस्ट) बेतहाषा बढाकर  ऐसा नहीं कर सकता। पूरे देष में खादी ग्रामोधोग के 75,000 के करीब सेल्स सेंटर है। इनके माध्यम से खादी ग्रामोधोग जन-जन तक पहुंच सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दीपावली पर खादी ग्रामोधोग के उत्पाद खरीदने की अपील से स्वदेषी उत्पात लाभान्वित हो सकते हैं। भाजपा का दावा है कि वह 8.8 करोड सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है। और अगर सभी भाजपाई प्रधानमंत्री के आहवान पर अमल करे, खादी भी देष के सबसे लोकप्रिय उत्पाद बन सकते हैं और मल्टी नेषनल कंपनियो के उत्पादों को पीछे छोड  सकते हैं।  
 से कहीं कम है। इसकी तुलना में योग गुरु बाबा रामदेव का पंतजलि गु्रप कहीं ज्यादा कारोबार कर रहा है और मल्टी-नेषनल कंपनियों को कडी चुनौती दे रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की व्यक्तिगत पहल  और सदी के अभिनेता अमिताभ बच्चन के खादी का ब्रांड एंबेसडर बनने से खादी ग्रामोधोग को प्रोत्साहन तो मिला है मगर मल्टीनेषनल कंपनियों का मुकाबला करने के लिए अभी भी इसे कई पाएदान पार करने है। तडक-भडक के इस जमाने में किसी भी उत्पाद को जन-जन तक पहुंचाने के लिए टीवी, मीडिया और अन्य संचार साधनों पर प्रचार-प्रसार की जरुरत पडती है। मल्टी नेषनल और बडी कंपनियां विज्ञापन और जन संचार के माध्यम से अपने उत्पादों का खूब ढिंढोरा पीटती और इससे उनके उत्पाद खासे महंगे भी हो जाते हैं मगर फिर भी बिकते है। खादी ग्रामोधोग बिक्रय लागत (सेंलिग कॉस्ट) बेतहाषा बढाकर  ऐसा नहीं कर सकता। पूरे देष में खादी ग्रामोधोग के 75,000 के करीब सेल्स सेंटर है। इनके माध्यम से खादी ग्रामोधोग जन-जन तक पहुंच सकता है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दीपावली पर खादी ग्रामोधोग के उत्पाद खरीदने की अपील से स्वदेषी उत्पात लाभान्वित हो सकते हैं। भाजपा का दावा है कि वह 8.8 करोड सदस्यों के साथ दुनिया की सबसे बडी राजनीतिक पार्टी है। और अगर सभी भाजपाई प्रधानमंत्री के आहवान पर अमल करे, खादी भी देष के सबसे लोकप्रिय उत्पाद बन सकते हैं और मल्टी नेषनल कंपनियो के उत्पादों को पीछे छोड  सकते हैं।  

बुधवार, 19 अक्टूबर 2016

राम नाम की लूट

 देश  के सबसे विशाल प्रांत उत्तर प्रदेश  में विधानसभा चुनाव की बेला पर राजनीतिक दलों ने  मर्यादा पुरषोतम राम का सियासी फायदा उठाने की जैसे लूट मचा रखी है। अब तक भगवा भारतीय जनता पार्टी को अयोध्या और राम मंदिर को सियासी हितों के लिए  भुनाने पर कोसा जाता रहा है मगर अब तो समाजवादी पार्टी  भाजपा से भी एक कदम आगे निकल गई है। भीषण पारिवारिक कलह से पीडित यदुवंशी  परिवार की समाजवादी पार्टी ने सोमवार को अयोध्या  में इंटरनेशनल थीम पार्क  बनाने का ऐलान कर सभी को चौंका दिया। यही वही सरकार है जिसने अयोध्या में राम मंदिर बनाने आए भक्तों पर गोलियां बरसाईं थी और अयोध्या में विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद बनाने का संकल्प ले रखा है। मुलायम  सिंह यादव की अगुवाई वाली समाजवादी पार्टी को अल्पसंख्यकों और पिछडे तबकों का खैरख्वाह माना जाता है। यहां तक कि मुसलमानों के हितों की रक्षा के लिए प्राण तक न्यौछावर करने का संकल्प लेने वाले मुलायम सिंह यादव को भाजपाई “मुल्ला सिंह“ यादव के नाम से छींटाकशी  किया करते हैं। समाजवादी पार्टी  अयोध्या में राममंदिर को बनाने की मुखर विरोधी रही है। मुलायम सिंह संसद में अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनाने  का संकल्प भी दोहरा चुके हैं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराने और राममंदिर को चुनावी मुददा बनाने के लिए मुलायम सिंह यादव और उनकी पार्टी  के लोग भाजपाइयों को जी भर कर कोसा करते हैं। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर  भाजपा अयोध्या में रामायण संग्रहालय के निर्माण का पहले ही ऐलान कर चुकी है। संग्रहालय के लिए भाजपा ने अयोध्या स्थित विवादित राम मंदिर- बाबरी मस्जिद स्थल से करीब 15 किलोमीटर की दूरी पर 25 एकड जमीन का चयन भी किया है। मंगलवार को केन्द्रीय पर्यटन एवं सांस्कृतिक मंत्री महेश  शर्मा ने अयोध्या में इस साइट का निरीक्षण किया। केन्द्र सरकार अयोध्या में रामायण संग्रहालय के साथ-साथ कृश्ण और बुद्ध सर्किट का भी निर्माण कर रही है। केन्द्र सरकार का कहना है कि यह सब पिछले दो साल से पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा रहा है।  इसी की काट के लिए अखिलेश  सरकार ने अयोध्या थीम पार्क बनाने का फैसला लिया है। यही तर्क  समाजवादी पार्टी भी दे रही है मगर दोनों दलों  के  स्पष्टीकरण  जनता के गले नहीं उतर रहे हैं। पांच साल से उत्तर प्रदेश  में सत्तारूढ सपा सरकार को अब तक अयोध्या में थीम पार्क  बनाने का विचार नहीं आया। और अगर विधानसभा चुनाव में सपा को  स्पष्ट  बहुमत नहीं मिलता है, तो इस प्रस्ताव का स्वतः दफन हो जाना तय है। जाहिर है अखिलेश  सरकार का अयोध्या थीम पार्क बनाने का फैसला विशुद्ध राजनीतिक है और मतदाताओं को रिझाने के मकसद से लिया गया है। और भाजपा का रामायण संग्रहलाय की योजना भी “ चुनावी“ रणनीति का हिस्सा है। इस मामले में भाजपा के सहयोगी संगठन विश्व  हिंदू परिषद और बजरंग दल भी संतुष्ट  नहीं है। और-तो-और भाजपा के वरिष्ठ  नेता सांसद विनय कटियार ने रामायण संग्रहालय को “ चुनावी लॉलीपॉप“ बताया है। विनय कटियार भाजपा की  राष्ट्रीय  कार्यकारिणी के सदस्य हैं और वे  राष्ट्रीय  स्वंय सेवक के काफी करीब हैं। दरअसल, अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय के विचाराधीन है। इन हालात में  केन्द्र सरकार राम ंमंदिर का निर्माण करने की स्थिति में नहीं है। लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण भाजपा का प्रमुख चुनाव मुद्दा रहा है। मोदी सरकार यह बात जानती थी कि अदालत का फैसला जल्द आने वाला नहीं है। इसीलिए वैकल्पिक तौर पर अयोध्या में रामायण संग्रहालय बनाने का निर्णय लिया गया ताकि विधनसभा चुनाव में इसे भुनाया जा सके । मगर इस प्रस्ताव पर भी अभी कोई ठोस प्रगति नही हुई है। और अब अखिलेश  सरकार का थीम पार्क भाजपा का गणित बिगाड सकता है। बहरहाल, मर्यादा पुरुषोतम को सियासी हितों के लिए भुनाना  दर्शाता  है कि समकालीन  राजनीतिक दल मान-मर्यादा का कितना सम्मान करते हैं।       
























    

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

ब्रिक्स की प्रांसगिकता

गोवा में रविवार को सपन्न हुए पांच देशों  के संगठन ब्रिक्स (ब्राजील,रुस, भारत, चीन एव दक्षिण अफ्रीका) सम्मेलन महज औपचारिक भर साबित हुआ है। पूरी दुनिया इस समय राक्षसी आतंक से जूझ रही है मगर ब्रिक्स को जैसे इससे कोई खास सरोकार नहीं है। ब्रिक्स देश  इस सच्चाई से आंखे  मूंदे रहे कि दुनिया में अमन-चैन के बगैर तेज ग्रोथ मुमकिन नहीं है। चीन इस मुगालते में है कि अमेरिका, भारत और यूरोप की तरह आतंक बीजिंग को ज्यादा प्रभावित नहीं करता है। चीन के दूर पश्चिम के झिंजियांग स्वायत्त क्षेत्र में उडघुर मुस्लिम आबादी का जातीय तनाव और आतंकी घटनाओं को  कुचल दिया गया है, इसलिए चीन आतंक से बेफ्रिक है।  सम्मेलन के समापन पर जारी सयुंक्त घोष णा पत्र (डेक्लेरेशन) में आतंक पर मात्र लफ्फाजी की गई है। सात हजार शब्दों के इस घोषणा पत्र में   वैश्विक अर्थव्यवस्था के ढीले कल-पुर्जों  को कसने की कवायद के अलावा इंटरनेट और आउटर स्पेस  तक की बात की गई है, मगर दुनिया के समक्ष सबसे बडी चुनौती आतंक से निपटने के प्रति गंभीरता नहीं दिखाई गई है।  मेजबान देश  भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आतंक के खिलाफ ब्रिक्स को एकजुट होने का आहवान किया मगर चीन है कि पाकिस्तान को हर मुकाम पर बचाने पर आमादा है। चीन के दबाव में ही ब्रिक्स सम्मेलन में  भारत के खिलाफ आग उगलने वाले  पाकिस्तान के खूंखार आतंकी हाफिज सईद और मसूद अजहर पर प्रतिबंध के मामले में सहमति नहीं बन पाई।  सम्मेलन के समाप्त होते ही बीजिंग ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “मदरशिप ऑफ टेर्रर“ पर पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए कहा है कि इस्लामाबाद भी आतंक से उतना ही पीडित है जितना भारत। इतना ही नहीं चीन ने आतंक के खिलाफ पाकिस्तान द्धारा  किए जा रहे “अनथक“ प्रयासों की सराहना तक की है। चीन के इस रुख से साफ है कि आतंक पर बीजिंग पाकिस्तान को पाक दामन मानने से पीछे नहीं हटेगा और वह जैश -ए-मोहम्मद और  लश्कर  जैसे खूंखार आतंकी संगठनों की पीठ थपथपाता रहेगा। ब्रिक्स पांच देश  का शक्तिशाली संगठन है और अगर पांच देश  आतंक जैसे सार्वभौमिक (यूनिवर्सल) विषय पर भी एकमत नहीं हो सकते हैं, तो ऐसे संगठन की प्रासंगिकता ही क्या रह जाती है। ब्रिक्स से कहीं ज्यादा बिम्सटेक (बांग्लादेश , म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड, भूटान, नेपाल और मालद्धीप) देश  आतंक पर भारत का साथ दे रहे हैं क्योंकि इस संगठन में चीन का दखल नहीं है।  बिम्सटेक की प्रासंगिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सम्मेलन के दौरान नेपाल ने भारत और चीन के बीच सेतु बनने की पहल की है। गोवा में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प  कमल दहल “प्रचंड“ और चीन के  राष्ट्रपति   शी जिनपिंग से बातचीत के दौरान नेपाल भारत के साथ खडा होता नजर आया। पूरे दक्षिण एशिया क्षेत्र में पाकिस्तान एकमात्र ऐसा देश  है जो भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाने की बजाए नई दिल्ली को अस्थिर करने पर आमादा है। और इसी कारण पाकिस्तान न केवल दक्षेस (सार्क) में बल्कि दुनिया में भी अलग-थलग पड चुका है।  भारत ने गोवा सम्मेलन में दक्षेस  की बजाए बिम्सटेक के सदस्य देशों  को बुलावा भेजा था। बिमस्टेक में पाकिस्तान  शामिल नहीं है। शक्तिशाली भारत चीन और पाकिस्तान दोनों की आंख की किरकिरी है। ग्रोथ में भारत चीन से आगे निकल चुका है। सोमवार को जारी एक अंतरराष्ट्रीय  एजेंसी  के आकलन अनुसार 2017 में चीन का ग्रोथ रेट 6.5 फीसदी रहने का अनुमान है। इसकी तुलना में भारत  का ग्रोथ रेट साढे सात फीसदी से भी अधिक रहने का अनुमान है। बहरहाल, गोवा सम्मेलन में ब्रिक्स बैंक अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ-साथ बैंक का पहला एक अरब डॉलर का ऋण मंजूर कर इसकी  शुरुआत की गई। रुस के साथ मिजाइल के अलावा और भी कई करार हुए। चीन के साथ कई मुद्दों पर मतभेद के बावजूद द्धिपक्षीय व्यापारिक संबंध मजबूत करने का संकल्प लिया जाना सम्मेलन की बडी उपलब्धि है।  


शनिवार, 15 अक्टूबर 2016

चुटकी में तलाक

           

विधि आयोग ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म  सिविल कोड) पर लोगों की राय क्या मांगी, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तिलमिला उठा और आनन-फानन में आयोग के  बहिष्कार  का ऐलान कर डाला। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  समान नागरिक संहिता का मुखर विरोधी है और इसे मुस्लिम समाज के धार्मिक मामलों में सरकार का दखल मानता है। इस बात के  दृष्टिगत  बोर्ड  का विरोध अपेक्षित था।  विधि आयोग ने लोगों की राय जानने के लिए 16 बिदुंओं की  प्रश्नावली  जारी की है। इसमें पूरा फोक्स समान नागरिक संहिता को लागू करने पर रखा गया है।   तीन दशक से  भी अधिक समय से सुप्रीम कोर्ट देश  में यूनिफॉर्म  सिविल कोड लागू करने पर जोर दे रही है मगर समकालीन सरकारें इसे टालती रही है।  संविधान के अनुच्छेद 44 में स्पष्ट  व्यवस्था है कि देश  में सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए। देश  में शादी-ब्याह, तलाक, संपति, इनहेरिटेंस , एडॉप्नश  जैसे निजी मामलों को लेकर अलग-अलग कायदे कानून है  और  कुछ तो ऐसे है, जो सांमती व्यवस्था को भी  शर्मसार कर देते हैं। मसलन, बहु पत्नी प्रथा के साथ-साथ कुछ समुदायों में बहू-पति प्रथा भी है। और सबसे बढकर “ चुटकी में तलाक” देने की रिवायत। विधि आयोग ने इन सब पर लोगों की राय मांगी है। इसके लिए लोगों को 45 दिन का समय दिया गया है। तथापि, यह प्रश्नावली  ऐसे समय में जारी की गई है जब सुप्रीम कोर्ट में “ तीन बार तलाक” के मामले पर सुनवाई जारी है। मुस्लिम महिलाओं ने  “चुटकी में (तीन बार) तलाक कहने की सामंती प्रथा को देश  के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे रखी है। इस मामले में मोदी सरकार भी मुस्लिम महिलाओं के साथ है और “तीन बार तलाक“ की प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में है।   देश  में यूनिफॉर्म  सिविल कोड लागू करवाना भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए जारी चुनावी घोषणा पत्र में  यूनिफॉर्म  सिविल कोड को जल्द से जल्द लागू करने का वायदा किया गया है।  ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के  बहिष्कार  से इस  यूनिफॉर्म  सिविल कोड पर आम सहमति बनने की गुजाइंश  खत्म हो गई है। इससे यह भी स्पष्ट  हो गया  है कि  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  किसी भी सूरत में  यूनिफॉर्म  सिविल कोड को स्वीकार नहीं करेगा। इसी वजह, अब तक समकालीन सरकारें इस मामले को टालती रही है। दरअसल,  यूनिफॉर्म  सिविल कोड संविधान के निर्देशित सिद्धांतों (डायरेक्टिव प्रिन्सिपलस)  के तहत सूचीबद्ध होनेे से इस मामले में सभी संबंधित पक्षों की सहमति वांछित है।  निर्देशित सिद्धांतो के अनुसार देश  के किसी भी समुदाय पर  कोई कानून (यूनिफॉर्म  सिविल कोड) जबरी नहीं थोपा जा सकता। इस स्थिति में सभी संबंधित पक्षों की सहमति बनाने के लिए इस पर व्यापक चर्चा  जरुरी है। केद्र में सतारूढ भाजपा का पिछला इतिहास और भाजपाई नेताओं की असहिष्णुता  के दृष्टिगत   संभवतय मुस्लिम समुदाय मोदी सरकार की इस पहल को संदेह की नजर  से देख रहा है।  इसी कारण  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  विधि आयोग को स्वंतत्र और निष्पक्ष  संस्था की बजाए सरकारी विभाग बता रहा है। सरकार का कथन है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट  की निगरानी में काम कर रहा है। बहरहाल, इस बात में दो राय नहीं कि देश में अविलंब समान नागरिक संहिता की दरकार है और तीन बार तलाक कहने से महिला कको  शादी के पवित्र बंधन से मुक्त किए जाने की सामंती प्रथा फौरन बंद होनी चाहिए। मुस्लिम महिलाओं का  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के खिलाफ खडा होना इस बात को  दर्शाता  है कि मुस्लिम जनमानस भी अब रुढिवादी सामाजिक कायदे-कानून को नही मानता है ।   रुढिवादी और महजब के ठेकेदार  इस्लाम की आड में अपने निहित स्वार्थ  पूरे कर रहे हैं। इस्लाम या कोई भी धर्म  इंसान को गैर-इस्लामी हरकतें करने  की इजाजत नहीं देता। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड  के लिए भी  यही बेहतर होगा कि उसे दीवारों पर लिखी इबारत पढ लेने की आदत डाल लेनी चाहिए।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016

For God Sake Please Spare Army From Becoming Victim Of "dity Politics"

हर छोटे-बडे मुद्दे को सियासी रंगत देना और इसकी आड में राजनीतिक रोटियां सेंकना समकालीन भारतीय नेताओं की फितरत बन गई है। सर्जिकल स्ट्राइक के मामले को ही लें। सितंबर के आखिरी सप्ताह सेना की इस अदम्य साहसिक कार्रवाई के सार्वजनिक होने के बाद से आज तक ऐसा कोई दिन नहीं गया जब इस पर सियासत न की गई हो। सतारूढ दल सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक तौर पर भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहा है और विपक्ष  सतारूढ दल को आइना दिखाने की हर चंद  कोशिश  कर रहा है। इस क्रम में देश  की छवि को जो क्षति पहुंच रही है, उसकी किसी को परवाह नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यधपि  अपने सहयोगियो को सर्जिकल स्ट्राइक पर  ढोल न पीटने (चेस्ट थंपिंग) की नसीहत दे रखी है मगर इसके बावजूद इसे सरकार की बडी उपलब्धि बताया जा रहा है। सेना पूरे देश  का गौरव होती है और उसकी हर शौर्यता पर  सभी देशवासी नाज करते हैं। इस बात के दृष्टिगत सैन्य कार्रवाई को किसी दल या सरकार विशेष  की उपलब्धि बताना सही नही है। अब तक यही रिवायत रही है मगर मोदी सरकार ने इसे तोड दिया है, आए दिन सर्जिकल स्ट्राइक को मोदी सरकार  की “महान उपलब्धि“ बताकर अभूतपूर्व  शौर्य दास्तां का “अपमान“ किया जा रहा है।  बुधवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने यह कहकर नया विवाद खडा कर दिया है कि सेना ने पहली बार सर्जिकल स्ट्राइक की है और ऐसा करने के लिए मोदी सरकार ने पहल की है। इससे पहले सेना ने जो भी कार्रवाई की थी, उसमें सरकार का कोई दखल नहीं था। रक्षा मंत्री के इस वक्तव्य से कांगेस उबल पडी है और रक्षा मंत्री के बयान को “सफेद झूठ“ करार दिया है। रक्षा मंत्री नेे अपने कथन  से जून 2015 में सेना की म्यांमार में सटीक सर्जिकल स्ट्राइक पर ही सवाल खडा कर दिया है। रक्षा मंत्री के ताजा बयान की माने तो म्यांमार सीमा पर सेना की कार्रवाई विशुद्ध  स्थानीय सैन्य कार्रवाई थी और सरकार का इसमें कोई दखल नहीं था। लगभग 40 मिनट की  इस सर्जिकल कार्रवाई में सैनिकों ने 158 आतंकियों को मार गिराया था। इस कार्रवाई पर तब मीडिया में प्रकाशित समाचारों के अनुसार सात जून 2015 को प्रधानमंत्री के  बांग्लादेश  से लौटते ही इस कार्रवाई के लिए उनकी अनुमति ले ली गई थी । विदेश  मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर पहले से ही लूप में थे। राष्ट्रीय   सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और थल सेना अध्यक्ष खुद  इस सर्जिकल स्ट्राइक की निगरानी कर रहे थे। म्यांमार सरकार को भी विश्वास  में लिया गया था। सीमा पार का इतनी बडी सैन्य कार्रवाई सेना स्थानीय स्तर पर नहीं कर सकती। जाहिर है रक्षा मंत्री पाकिस्तान अधिकृत  कश्मीर  में सर्जिक्ल स्ट्राइक से राजनीतिक फायदा उठाना चाहते हैं। ताजा चुनावी सर्वेक्षण के अनुसार उत्तर प्रदेश , पंजाब और उत्तराखंड का जनमानस पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक के लिए मोदी सरकार के कायल हैं। इन तीनों राज्यों में जनवरी-फरवरी 2017 में विधानसभा चुनाव होने हैं। रक्षा मंत्री का यह कथन भी गलत है कि सेना ने पहले कभी कोई सर्जिकल स्ट्राइक नहीं की थी। देश  के एक अग्रणी समाचार पत्र में हाल ही प्रकाशित रिपोर्ट  के अनुसार जुलाई 2011 में पाकिस्तान सेना द्वारा  कश्मीर  घाटी के कुपवाडा सेक्टर में भारतीय सैन्य शिविर पर हमले के बाद अगस्त 2011 को पाकिस्तान के खिलाफ “ऑपरेशन जिंजर“ को अंजाम दिया था। बहरहाल, सेना की कोई भी क्रॉस-बॉर्डर कार्रवाई बगैर रक्षा मंत्रालय और उच्च सेनाधिकारियों के दखल के नहीं की जा सकती।  नेताओं के इस तरह के बयानों से देश  का मखौल उड रहा है। सेना का अपनी गरिमा है और इसे किसी भी सूरत में कमतर नहीं किया जाना चाहिए। देश  के रक्षा मंत्री द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए सेना के शौर्य को कमतर आंकना बेहद दुखद है।  सुरक्षा बलों की  शौर्य  गाथाओं पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए।

गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

बातें कम, काम ज्यादा !

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लखनऊ के ऐतिहासिक ऐशबाग रामलीला के मंच से पाकिस्तान को ललकारते हुए फिर चेताया है कि आंतकवाद को शह देने वाले बख्शे  नहीं जाएंगे़। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद प्रधानमंत्री की यह पहली जनसभा थी, इसलिए इस पर दुश्मनो की नजरें भी टिकीं हुईं थी। मोदी का यह कथन काबिलेगौर है कि शांति बनाए रखने के लिए कभी-कभी युद्ध भी जरुरी हो जाता है। प्रधानमंत्री के इस कथन के यह मायने लगाए जा रहे हैं कि आतंकवाद के खात्मे के लिए भारत पाकिस्तान के साथ युद्ध लड सकता है। पूरे देश  की यही आवाज है। मगर प्रधानमंत्री ने साथ में यह भी कहा है कि भारत “युद्ध से बुद्ध” की ओर जाने वाला देश  है। तो इसके क्या मायने लगाए जाएं कि भारत “गौतम बुद्ध“ के मार्ग  पर चलेगा। भाजपा के नेताओं के बारे यह पुख्ता धारणा है कि वे “लफ्फाजी“ खूब करते हैं। वैसे रामलीला के मंच से युद्ध की बातें करना अपने-आप में सरकार की छटपटाहट  दर्शाता  है । पाकिस्तान की बेजा हरकतों और आए दिन की धमकियों से अब तो देश का बच्चा-बचा भी आजिज आ चुका है। सर्जिकल स्ट्राइक से तिलमिलाए पाकिस्तान और उसके पिठ्ठू आतंकियों ने  कश्मीर में आतंकी घटनाएं और तेज कर दी हैं। पिछले सोमवार को  राजधानी श्रीनगर के निकट पंपोर में सीआरपीएफ की बस पर हमले करने के बाद तीन पाकिस्तानी आतंकी सरकारी बिल्डिंग में छिप गए थे। 60 घंटे तक  सुरक्षा बलों पर गोलीबार करते रहे और तब कहीं जाकर तीनों मारे गए। इससे पहले इस साल फ्ररवरी माह में भी आतंकियों ने इसी बिल्डिंग में छिपकर सुरक्षा बलों पर हमला किया था। मंगलवार को घाटी के  शोपियां जिले में आतंकियों ने सैनिकों पर ग्रेनेड से हमला किया था जिसमें दो जवान और सात नागरिक बुरी तरह जख्मी हो गए थे । सर्जिकल स्ट्राइक के चार दिन बाद बारामुल्ला में बीएसएफ और सैन्य शिविरों पर  आतंकियों के हमले में एक बीएसएफ जवान शहीद  और दूसरा जख्मी हो गया था।  6 अक्टूबर को घाटी की लंगेट तहसील में आतंकियों ने सेना के  शिविर पर हमला किया था और इसमें तीन आतंकी मारे गए थे। दो दिन बाद 8 अक्टूबर को शोपियां में पुलिस चौकी पर हमले करके भाग निकले। इस हमले मे एक पुलिसकर्मी मारा गया था। और अब पंपोर हमला । यह सिलसिला पहले की तरह निरंतर जारी  है। आखिर, यह कब तक चलता रहेगा? जनमानस को इस बात का सबसे ज्यादा गुस्सा है कि केन्द्र में सतारूढ होने के अढाई साल बाद भी सरकार पाकिस्तान को माकूल जबाव नहीं दे पाया जबकि विपक्ष में रहते हुए भाजपा बडी-बडी बातें किया करती थीं।  और अब पाकिस्तान को उसकी बेजा हरकतों के लिए दंडित करने की बजाए  सर्जिकल स्ट्राइक को  मोदी सरकार को “बहुत बडी उपलब्धि“ बताकर इसका पूरा श्रेय खुद ले रही है। बुधवार को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने “सर्जिकल स्ट्राईक“ का मोदी सरकार को श्रेय देकर फिर एक नया विवाद खडा कर दिया है। कांग्रेस ने फिर इस बात पर ऐतराज जताया है कि सरकार सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय लेकर इसका राजनीतिकरण कर रही है। कांग्रेस को इस बात पर भी  है ऐतराज  कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान के साथ लगती नियंत्रण रेखा से दस किलोमीटर के दायरे में स्थित गांवों को खाली करवाकर सरकार ने  खामख्वाह का “वार हिस्ट्रिया“ खडा किया । और यह सब पंजाब में जल्द होने वाले विधानसभा चुनाव को सामने रखकर किया गया। पंजाब में 33 विधानसभा क्षेत्र सीमावर्ती क्षेत्रों में पडते हैं। बहरहाल, प्रधानमंत्री और भाजपा नेता अपने हर भाषण में पाकिस्तान को सबक सिखाने की बडी-बडी बातें तो करते हैं मगर अमल में अब तक एक सर्जिकल स्ट्राइक के अलावा कोई भी बडी कार्रवाई नहीं हुई है। प्रधानमंत्री ने लखनऊ भाषण में भी वही पुरानी बातें की हैं मगर इसमें सियासी विवशता भी झलकती है। जनमानस अब खाली बातों से आजिज आ चुका है। जनता  ठोस कार्रवाई चाहती है। 

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

Why To Question Surgical Strike?

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर इस समय देश  में जमकर राजनीति हो रही है। विपक्ष दल  सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर ऊल-जलूल मुद्दे उठा रहे हैं, तो सत्ता पक्ष ढोल पीट-पीट कर इसे भुनाने में लगा हुआ है। सेना की इस अदम्य साहसिक कार्रवाई पर राजनीति इस कद्र हावी हो गई है कि सैनिकों की शौर्य  गाथा को ही भुला दिया गया है।  कांग्रेस और संप्रग में उसके सहयोगी दल भाजपा को स्मरण करा रहे हैं“ हमारे समय में भी सर्जिकल ऑपरेशन हुए थे मगर हमने तो इसे भुनाया नहीं“। साफ है उन्हें मौका नहीं मिला वरना वे भी इसे भुनाने के कोई कसर नहीं छोडते । यह सब देख सुन कर पाकिस्तान खूब मजे ले रहा है। सोमवार को पाकिस्तान के मीडिया ने बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती का बयान सुखियों में छापा जबकि अमूमन वहां के समाचार पत्र भारतीय नेताओं के वक्तव्यों को छापते तक नहीं है। रविवार को लखनऊ में आयोजित रैली में सुश्री मायावती ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए सर्जिकल स्ट्राइक की विष्वसनीयता पर ही सवाल उठाया हालांकि  इससे पहले बसपा प्रमुख सेना को सर्जिकल स्ट्राइक पर बधाई दे चुकी हैं। जाहिर है मायावती ने  मुद्दे का सियासीकरण करके इसे मोदी सरकार के खिलाफ भुनाने की कोशिश  की है । उत्तर  प्रदेश  में सतारूढ समाजवादी दल इस बात से आशंकित है कि अगले साल के शुरू  में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा सर्जिकल स्ट्राइक को भुना सकती है। इसलिए सपा नेता कह रहे हैं कि मुलायम सिंह जब रक्षा मंत्री थे, उन्होंने ही सर्जिकल स्ट्राइक  शुरु करवाई थी। पिछले सप्ताह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की जुबान इस कद्र फिसल गई कि उन्होंने मोदी सरकार के लिए “खून की दलाली“ जैसे कटु  शब्दों का प्रयोग कर डाला। राहुल गांधी के इस बयान पर भाजपा और उसके सहयोगी दल खासे उबले हुए हैं।  सियासी नेताओं की  गैर-जिमेदारानां बदजुबानी का आलम यह है कि भाजपा को एक पाकिस्तानी आतंकी संगठन का खैर-ख्वाह बताया जा रहा है। इससे पहले कांग्रेस के  वरिष्ठ  नेता पी चिदंबरम और संजय निरुपम भी सर्जिकल स्ट्राइक पर देशद्रोही वक्तव्य दे चुके हैं। देश  के विपक्षी नेताओं के  ऊल-जलूल वक्तव्यों से सिर्फ  दुश्मनों के आरोपों को बल मिल रहा है। भाजपा और उसके सहयोगी दल भी सर्जिकल स्ट्राइक की कामयाबी का श्रेय लेने और इसे सियासी फायदे के लिए भुनाने में कोई कसर नहीं छोड रहे है। गली-गली दीवारों पर पोस्टर चिपका कर भाजपाई सर्जिकल स्ट्राइक का पूरा श्रेय ले रहे हैं। इस बात पर भी  हैेरानी व्यक्त की जा रही है कि सेना के म्यांमार के भीतर जाकर  नगा आतंकियों को मार गिराने की सर्जिकल स्ट्राइक पर तो गोपनीयता बरती गई थी, मगर पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर का जोर-शोर  से प्रचार किया जा रहा है। निसंदेह, उडी आतंकी हमले के बाद जनमानस भी यही चाहता था कि पाकिस्तान को सबक सिखाया जाए। और पूरा देश   सर्जिकल स्ट्राइक से सेना और सरकार का कायल हो गया है। भाजपा जनमानस की इसी मनोस्थिति का सियासी फायदा उठाना चाहती है और  विपक्ष इस बात पर जला-भुना हुआ है। बहरहाल, सेना के शौर्य  पर देश  के राजनीतिक दलों का बंटना और इसे राजनीति  का मुद्दा बनाना बेहद दुखद है। इससे सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना लंबे समय से  कश्मीर  और पूर्वोतर भारत में सरहद पार प्रायोजित आतंक के खिलाफ लड रही है। सेना की सामरिक रणनीति और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे ऑपरेशन को किसी भी सूरत में सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए। इससे दुश्मनों को ही मदद मिलती है। सरकार और विपक्ष दोनों यह बात भली भांति जानते हैं कि सैन्य कार्रवाई को लेकर बहुत ज्यादा पारदर्शिता नहीं बरती जाती और इस मामले में अनुकूल-प्रतिकूल दोनों ही परिस्थितियों में पूरे देश को सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने की जरुरत है। राष्ट्रीयता  और देश  की अखंडता को सियासी फायदे के लिए तोडना-मरोडना भी देशद्रोह समान है।   

चीनी पैंतरा

गोवा में 15 अक्टूबर से षुरु होने वाले दो दिवसीय ब्रिक्स  शिखर सम्मेलन से ठीक पहले न्युक्लियर  सप्लायर ग्रुप  (एनएसजी) में भारत की एंट्री को लेकर चीन के रुख में आया बदलाव काबिलेगौर है। इस बदलाव को आतंक के प्रायोजक  पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय  मंच पर अलग-थलग पडने की  पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। भारत के मामले में चीन हमेशा  पाकिस्तान को सामने  रखकर आगे बढता है। चीन एनएसजी में भारत के प्रवेश  को अब तक कथित सैद्धांतिक तौर पर विरोध करता रहा है। चीनी राष्ट्रपति  शी  जिनपिंग की भारत यात्रा से ठीक पहले चीन ने एनएसजी में भारत की एंट्री पर नरम पडते हुए कहा है कि वह इस सिलसिले में आगे बातचीत करने के लिए तैयार है। आतंकी सरगना जैश -ए-मोहम्मद के मुखिया मसूद अजहर के मामले में  चीन द्धारा संयुक्त राष्ट्र  संघ में वीटो के प्रयोग पर भारत की आलोचना के बाद चीन ने एनएसजी पर यह पासा फेंका है। मगर चीन ने यह स्पष्ट  कर दिया है कि आतंकी मसूद अजहर के मामले में वह अपने स्टैंड से टस-से-मस होने वाला नहीं है। स्पष्टतय,   चीन भारत को सिर्फ बातचीत में उलझना चाहता  है। चीन बेहद काइंया कूटनीतिज्ञ है और उसकी हर चाल  में गहरे निहित स्वार्थ होते हैं। भारत  द्धारा   न्युक्लियर सप्लायर  में ऐंट्री के लिए आवेदन करते ही चीन की शह पर पाकिस्तान ने भी तत्काल आवेदन कर दिया। ऐसा इसलिए किया गया ताकि अगर अंतरराष्ट्रीय  में भारत को एनएसजी में एंट्री दी जाती है, तो चीन पाकिस्तान को भी एंट्री दिला देगा। चीन, भारत की तुलना में पाकिस्तान को कहीं ज्यादा तरजीह देता है और वह पाकिस्तान को बफर स्टैट के रुप में इस्तेमाल कर रहा है।  एनएसजी में चीन, भारत की एंट्री का इस बिला पर विरोध कर रहा है कि  न्युक्लियर प्लायर गु्रप  में सिर्फ वही देश  हैं, जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। 190 देश  इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। भारत, पाकिस्तान, इसरायल और दक्षिण सुडान  ने अभी तक परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत को  परमाणु अप्रसार संधि के इस प्रावधान पर सख्त ऐतराज है कि द्धितीय विश्व  युद्ध (वर्ल्ड वॉर) की पांच बडी शक्तियों को ही परमाणु हथियार रखने की छूट है और चीन इसमें  शुमार है। एनसीजी में न्युक्लियर पॉवर स्टेट और नॉन-  न्युक्लियर पॉवर स्टेट दोनों को ही  शामिल किया गया है मगर इसमें भी भेदभाव है। 1970 से पहले परमाणु हथियार ग्रहण करने वाले चीन, अमेरिका, रुस, फ्रांस और इंग्लैंड को एनएसजी में  शामिल किया गया है मगर इसके बाद  न्युक्लियर पॉवर स्टेट को  परमाणु अप्रसार संधि को स्वीकार करने के बाद ही  शामिल किया जाता है। एनएसजी के इस प्रावधान की आड में चीन भारत का विरोध कर रहा है। एनएसजी के मामले में भारत के समक्ष “एक तरफ कुआं, तो दूसरी तरफ खाई“ जैसी स्थिति है। भारत के दो पडोसी देश - चीन और पाकिस्तान- घातक परमाणु हथियारों से लैस है। इस स्थिति के  दृष्टिगत भारत को न्यूनतम परमाणु निवारक सुरक्षा कवच की दरकार है। अगर भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करता है, तो उसे अपने परमाणु हथियार नष्ट  करने पडेंगें। एनएसजी में  शामिल नहीं होने की स्थिति में भारत अंतरराष्ट्रीय  बाजार से परमाणु सामग्री और प्रोन्नत टकनॉलॉजी नहीं खरीद पाएगा। अभी भारत स्वदेशी  परमाणु टकनॉलॉजी से ही काम चला रहा है। चीन का रुख अभी भी भारत के प्रति आक्रामक  है। बात-बात पर चीन अंतरराष्ट्रीय  मंचों पर भारत का विरोध करता है। पाकिस्तान को आतंकी स्टेट मानना तो दीगर रहा, अलबत्ता चीन  आतंक की आड में इस्लामाबाद को अलग-थलग करने के लिए भारत को ही कोस रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक पर जब पूरी दुनिया भारत की पीठ ठोंक रहे है, चीन पाकिस्तान का हमदर्द बना हुआ है। चीन की किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भारत के मामले में ड्रैगन सिर्फ कूटनीतिज्ञ औपचारिकता निभा रहा है। 

सोमवार, 10 अक्टूबर 2016

उदंड बीसीसीआई पर नकेल

देश  की  शीर्ष अदालत उदंड भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) को सही मार्ग पर लाने के लिए कृतसंकल्प है। राजनीति दांव-पेंच में माहिर बीसीसीआई की उदंडता इस कद्र बढ गई है कि देश की  शीर्ष  दालत के आदेशों  की भी खिल्ल्लियां उडाई जा रही है। न्यायपालिका न तो भावनाओं में बहती है और न ही ऊंची-नीच का ख्याल करती है। लोढा समिति की सिफारिशों  को संजीदगी से लागू करने की बजाए बीसीसीआई तरह-तरह के बहाने गढ कर अदालत की अवमानना करने पर आमादा है। कभी कहा जा रहा है कि लोढा समिति की सिफारिशे  लागू करने से सरकार का दखल बढेगा, तो कभी चैंपियन ट्राफी और आईपीएल की आड ली जा रही है। देश  की न्यायपलिका की अवमानना का मतलब संविधान का अपमान है। बीसीसीआई अध्यक्ष सांसद अनुराग ठाकुर यह बात जानते हुए भी लोढा समिति की सिफारिशों  को लागू करने से इसलिए बच रहे हैं क्योंकि सुधार लाने से बीसीसीआई के पदाधिकारी  खुद इसकी जद में आ जाएंगे।समिति ने बीसीसीआई पदाधिकारी के लिए अधिकतम दो टर्म तय की है ओर अनुराग ठाकुर 14  साल से हिमाचल क्रोकेट अस्सोसिएशन  पर कब्ज़ा जमाये हुए हैं ।  मंत्री औरनौकरशाहों को बीसीसीआई से बाहर रखना  लोढा समिति की प्रमुख सिफारिशों  में  शामिल है।  समिति ने एक राज्य, एक वोट की नीति लागू करने और प्रॉक्सी वोट को समाप्त करने की भी सिफारिश  की है। एक राज्य, एक वोट की सिफारिष लागू किए जाने से महाराष्ट्र  जैसे राज्य को तगडा झटका लग सकता है। इस समय  इस राज्य  में मुंबई, विदर्भ  और महाराष्ट्र  के नाम से तीन-तीन क्रिकेट संगठन हैं और तीनों को अलग-अलग वोट का अधिकार है। यानी महाराष्ट्र  के पास तीन वोट है। जाहिर है, अन्य राज्यों की अपेक्षा महाराष्ट्र  की वोटिंग पॉवर कहीं ज्यादा है। इसलिए बीसीसीआई में  महाराष्ट्र  का दबदबा रहता है। मंत्रियों और नौकरशाहों को बीसीसीआई से बाहर रखना, लोढा समिति की क्रांतिकारी सिफारिश  है। बीसीसीआई ही नहीं देश  के अधिकतर खेल संगठनों पर सियासी नेताओं का कब्जा है।  गल्ली-मोहल्ले में  क्रिकेट खेलने वाला नेता भी बीसीसीआई का पदाधिकारी बन सकता है। क्रिकेट न भी खेला हो, तब भी बीसीसीआई का अध्यक्ष बन सकता है। वीरवार को देश  के मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस टीएस ठाकुर ने अनुराग ठाकुर को क्रिकेटर बताए जाने पर तंज कसते हुए कहा “ मैं भी  जजों की टीम का कप्तान हूं। तो क्या में क्रिकेटर बन गया?“ बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने  शुक्रवार को साफ-साफ षब्दों में कहा कि बीसीसीआई और राज्यों की क्रिकेट  अस्सोसिएशन्स को लोढा समिति की सिफारिशे  लागू करनी ही होगी। जब तक स्टेट अस्सोसिएश न्स  समिति की इन्हें  लागू नहीं करतीं, उन्हें बीसीसीआई द्वारा 21 सितंबर को दी गई ग्रांट जारी नहीं की जाएगी। अदालत ने इंफरास्ट्रक्चर की आड में बीसीसीआई द्वारा  स्टेट अस्सोसिएशन्स  को भारी-भरकम ग्रांट जारी करने पर नाराजगी जताई है। इससे पहले लोढा समिति ने स्टेट अस्सोसिएशन्स को भारी-भरकम ग्रांट जारी करने पर सख्त ऐतराज जताया था और बैंकों को बीसीसीआई के खाते फ्रीज तक करने को कहा था।  सर्वोच्च न्यायालय ने यह बात भी साफ कर दी है कि आधे-अधूरे (चैरी-पिक्ड रिफॉर्म) सुधार नहीं चलेंगे। बीसीसीआई को लोढा समिति की सिफारिशों  को एक-मुश्त लागू करना होगा और अगर बीसीसीआई ऐसा नहीं कर सकती, तो सर्वोच्च न्यायालय इन्हें लागू  करने के लिए प्रशासक नियुक्त करेगा ै। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि बीसीसीआई प्रमुख अनुराग ठाकुर ने अब तक अंतरराष्ट्रीय  क्रिकेट संघ (आईसीसी) की इस बात पर राय नहीं  ली है कि लोढा समिति की  सिफारिशे  लागू करने से बीसीसीआई में सरकार का दखल बढेगा। इस सफेद झूठ पर अदालत बेहद खफा है। बीसीसीआई के पास अभी भी वक्त है और उसे समय रहते संभल जाना चाहिए। वैसे देश  की शीर्ष   अदालत बीसीसीआई को राजनीतिक नेताओं के  शिकंजे से मुक्त करके ही रहेगी। अब तक देश  में हर क्रांतिकारी सुधार लाने की पहल अब न्यायपालिका ही करती रही है।

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

सियासी “एलओसी“ का उल्लंघन


देश  की समकालीन सियासत का स्तर किस कद्र गिर गया है, काग्रेस नेताओं की सर्जिकल स्ट्रृाइक पर “बदजुबानी“ इसका जीता-जागता प्रमाण है। कांग्रेस नेता संजय निरुपम का यह कथन कि “सर्जिकल स्ट्राइक“ फर्जी था, न केवल भारतीय सेना की काबिलियत को चुनौती देना है, बल्कि संगीन देश द्रोह भी है। और कांग्रेस के बडबोले नेता दिग्विजय सिंह तो अक्सर ऊल-जलूल बातें करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी बातों को कोई भी गंभीरता से नहीं लेता है। मगर पूर्व  गृह मंत्री पीसी चिदबरम का निरुपम ओर दिग्विजय  की जमात में शामिल होना समझ से पर है । यही तो पाकिस्तान चाहता है और अब दुश्मन को यह कहने का मौका मिल गया है कि “ दुनिया वालों सुन लो, भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक पर जो हम कह रहे हैं, वही हिन्दुस्तान के कुछ नेता भी कह रहे है“। साफ-साफ कहा जाए तो भारतीय नेताओं की “देशद्रोही“ बदजुबानी ने  पाकिस्तान के सफेद झूठ को कुछ विश्वसनीयता दे डाली है। इस तरह की बातें देश  को तोडने जैसी है।  माना कि भारत में कहने-सुनने की खुली छूट है मगर “अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता“ का बेजा इस्तेमाल किया जाए, इसकी कतई छूट नही है। इंटरनेट और प्रोन्नत इनफोर्मेषन टकनॉलॉजी के इस जमाने में किसी भी देश  की सेना क्या और कहां आक्रमण करती है, पूरी दुनिया के मीडिया को इसकी पल-पल की जानकारी रहती है।  देश  के एक अग्रणी समाचार पत्र ने सबूतों के साथ सचित्र  सर्जिकल स्ट्राइक की खबर प्रकाशित की है और इस समाचार पत्र की  विश्वसनीयता पर समूचे मीडिया जगत को नाज है। सरकार झूठ बोल सकती है मगर सबूत नहीं। वैसे किसी भी  सैन्य “कार्रवाई“ को फर्जी बताना उतना ही सफेद झूठ है, जितना काले कौवे का काटना। कांग्रेस के बडबोले नेताओं की  देशद्रोही बातों से  पार्टी के शीर्ष   नेताओं का कन्नी काटना स्वभाविक है। पिछले सप्ताह ही सर्जिकल स्ट्राइक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद सर्जिकल स्ट्राइक के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सेना को बधाई दी थी। तो क्या संजय निरुपम और उन जैसे बडबोले कांग्रेसी नेता पार्टी के  शीर्ष   नेताओं से भी बडे हैं? देश  की सबसे पुरानी पार्टी की समस्या यही है कि उसके छुटभैया नेताओं की जुबान पर पार्टी का कोई नियंत्रण नहीं है। और इसी बदजुबानी (अक्सर चापलुसी) ने कांग्रेस की छवि पर कीलें ठोंक-  ठोंक उसे मरणासन्न  बना डाला है। देश  की अखंडता और सुरक्षा को लेकर सभी राजनीतिक दल एक मंच पर आ जाते हैं। सर्जिक्ल स्ट्राइक मामले में भी देश  के तमाम राजनीतिक दल एक सुर में सेना और प्रधानमंत्री की तारीफ कर रहे थे। मगर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस “एकता“ को तोड डाला। केजरीवाल ने प्रधानंमत्री से मांग की थी कि मोदी सरकार को पाकिस्तान के झूठ का माकूल जबाव देना चाहिए। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इस संदर्भ में सयुंक्त राष्ट्र  का जो हवाला दिया है, उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं है।  केजरीवाल यह बात भूल गए कि  झूठ  का कोई जबाव  नहीं होता और अगर उतर दिया भी जाए तो भी झूठ बोलने वाला इसे नहीं मानेगा। पाकिस्तान को भारत मुंबई आतंकी हमले से लेकर पठानकोट हमले तक के पुख्ता सबूत दे चुका है मगर इस्लामाबाद है कि इन्हें मानता ही नहीं। और यह मानना सरासर बचकानी बात है कि सर्जिकल स्ट्राइक पर भारत द्वारा दिए गए सबूत पाकिस्तान मान लेगा।  इस सच्चाई के मद्देनजर विपक्षी नेताओं का सर्जिकल स्ट्राइक पर अगुंली उठाना बेहद दुखद है और वस्तु स्थिति से आंखें मूंद कर देश  की अखंडता और सुरक्षा से जुडे मुददे का राजनीतिकरण और भी दुखद है। भारतीय सेना ने पहले भी सर्जिकल ऑपरेशन कर चुकी है। इसी साल  सेना ने नगा अतंकियों के शिविरों को म्यांमार के भीतर ध्वस्त किया था। इस तरह की कार्रवाई अक्सर गोपनीय रखी जाती है। ताजा सर्जिकल स्ट्राइक मामले में सियासी नेताओं ने “राजनीतिक नियंत्रण रेखा“ लांघी है। जनमानस ही ऐसे नेताओं को  सजा देगा।

अनावश्यक विवाद

सेना द्धारा  सरकार को सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो सौंपे जाने से उन बडबोले नेताओं की जुबान पर ताला लग जाना चाहिए, जो जवानो की बहादुरी की मीनमेख निकाल रहे हैं। 28 सितंबर को पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भारतीय सेना ने सटीक सर्जिकल स्ट्राइक से आतंकियों के आठ  शिविरों को नेस्तनाबूद कर दिया था। पूरी दुनिया जब भारतीय सेना की इस बहादुरी की कायल हो रही थी,  देश  के कुछ नेता इस पर सवाल उठा रहे थे। उनकी इस हिमाकत से पाकिस्तान के सफेद झूठ को बल मिला है। यह स्थिति  बेहद दुखद है कि  एक ओर जहां पाकिस्तानी अफसर और पुलिस भी इस बात को मान रही है कि पाकिस्तान अधिकृत  कश्मीर  में भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी, वहीं काग्रेस और आप को पाकिस्तान के झूठ पर भरोसा है। कहते हैं “झूठ के पैर नहीं होते“। सर्जिकल स्ट्राईक पर संदेह करने वालों का “झूठ“ भी पलक झपते ही धराशायी हो गया। राजनीतिक हो-हल्ले के कारण सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक पर 90 मिनट के वीडियो को सरकार के सुपुर्द  कर दिया। इस वीडियो के सामने आने  पर अब कांग्रेस और आम आदमी पार्टी बगले झांक रही है। रक्षा विशेषज्ञ  और सरकार इस वीडियो को सार्वजनिक करने के सख्त खिलाफ थे। तथापि, राजनीति विवाद से आहत मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक का वीडियो मंगवाया। अब इस मामले में पहले जैसी एकता बनाए रखने के लिए सरकार  वीडियो को रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति को सौंप सकती है। समिति की 6 अक्टूबर (वीरवार) को बैठक थी, जो ऐन समय पर 14 अक्टूबर के लिए स्थगित कर दी गई। इससे उम्मीद की जा सकती है कि उस दिन सर्जिक्ल स्ट्राइक से जुडी कुछ तस्वीरें समिति के समक्ष पेश  की जा सकती हैं। बहरहाल, सेना की सर्जिकल स्ट्राइक को राजनीतिक स्वार्थ का मुद्दा बनाना अति निंदनीय है। देश  की अखंडता और सुरक्षा के मामले में अब तक देश  हमेशा एक साथ खडा होता रहा है। 1952 का भारत-चीन युद्ध हो अथवा 1965 और 1971 की भारत-पाकिस्तान जंग या कारगिल युद्ध, पूरा देश  एक साथ  शहीदों की कुर्बानियों पर रोया और उन्हें श्रंदा सुमन भेंट किए। 1971 के भारत-पाकिस्तान जंग में देश की जबरदस्त फतेह के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने सभी राजनीतिक मदभेद भुलाकर  तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को “दुर्गा का अवतार“ बताया था। इस युद्ध में पाकिस्तान के लगभग एक लाख सैनिकों ने भारतीय सेना के समक्ष आत्म समर्पण किया था। इसी युद्ध के फलस्वरुप पाकिस्तान विभाजित हुआ  और बांग्लादेश  का उदय हुआ था। कारगिल युद्ध के समय भी देश  के सभी राजनीतिक दल सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खडे थे। पहली बार देश  में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपनी ही सेना की काबलियत पर संदेह जताया है। निसंदेह, लोकतंत्र पारदर्शिता  और स्वस्थ आलोचना पर चलता है मगर किसी भी लोकतांत्रिक देश  में  सुरक्षा को लेकर अनावश्यक सवाल खडे नहीं किए जाते हैं। भावातिरेक होकर सेना की काबलियत पर संदेह करना देशभक्ति पर  संदेह जताना   जैसा है। भाजपा  द्धारा सर्जिकल स्ट्राइक को प्रचार का  मुद्दा   बनाए जाने पर कांग्रेस के ऐतराज को जायज माना जा सकता है। मगर इसके लिए सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति की जाए, यह बात भी हजम  नहीं हो रही है। कांग्रेस और संप्रग में उसके सहयोगी दल राकांपा का कहना है कि मनमोहन सरकार के समय भी तीन-तीन सर्जिकल ऑपरेशन किए गए थे, मगर सरकार ने इन्हें प्रचार का मुद्दा नहीं बनाया। अब इस बात पर भी विवाद हो रहा है कि क्या संप्रग सरकार के समय सर्जिकल स्ट्राइक किए गए थे़? बहरहाल, सैन्य कार्रवाई को राजनीति का मुददा नहीं बनाया जाना चाहिए। काग्रेस लंबे समय तक सत्ता में रही है और इसे बखूबी मालूम है कि सुरक्षा को लेकर कितनी पारदर्शिता  बरती जानी चाहिए। और अब मोदी सरकार को तय करना है कि सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर कितनी पारदर्शिता  बरती जाए।

बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

ग्रोथ उन्मुख सस्ता कर्ज


भारतीय रिजर्व  बैंक के नए गर्वनर उर्जित पटेल ने अपनी पहली मौद्रिक नीति में ब्याज सस्ता करके महंगे कर्ज  से त्रस्त लोगों को कुछ राहत प्रदान की है। पहली बार ब्याज दरें छह सदस्यीय मोद्रिक नीति समिति (एमपीसी) द्धारा  तय की गई हैं। महंगे कर्ज और तरह-तरह के सर्विस चार्जिज ने आम आदमी की कमर तोड रखी है।  पिछले साल सितंबर में तत्कालीन आरबीआई गर्वनर ने रेपो रेट में 0.50 फीसदी कटौती करके सभी को  चौंका दिया था। इसका सकारात्मक प्रभाव पडा था। दुनिया में तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत उन देशों  में  शुमार है, जहां ब्याज अभी भी काफी महंगा है। रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती से त्यौहारी सीजन में उधोग और बाणिज्य जगत के अलावा होम लोन लेने वालों को भी थोडी राहत  मिलेगी । ताजा कटौती से रेपो रेट छह साल के न्यूनतम 6.25 फीसदी स्तर पर आ गया है। रिवर्स  रेपो रेट 6 फीसदी से घटकर 5.75 फीसदी पर आ गया है। सीआरआर (केश  रिजर्व रेशो ) चार फीसदी पर ही रखी गई है। पिछली बार अप्रैल माह में आरबीआई ने रेपो रेट में  0.25 फीसदी की कटौती की थी जबकि जून और अगस्त में रेपो रेट यथावत रखे गए थे। रेपो रेट में कटौती से बैंको को आरबीआई से सस्ता कर्ज  मिलता है और बैंको से उम्मीद की जाती है कि वे सस्ते ब्याज का फायदा ग्राहकों को दें।  रेपो रेट अगर छह साल के निचले स्तर पर हैं तो ब्याज दरें भी छह साल के न्यूनतम स्तर पर आनी चाहिए। मगर यह तभी संभव है जब बैंक आरबीआई की सम्पूर्ण ब्याज कटौती को ग्राहकों तक पहुंचाए। मगर ऐसा नहीं हो रहा  है। 2014 के बाद से ताजा कटौती तक आरबीआई अब तक ब्याज को दो फीसदी सस्ता कर चुका है मगर अधिकांश  बैंक ग्राहकों को ब्याज में बमुश्किल  एक फीसदी भी राहत नहीं दे पाए हैं। दूसरी ओर रेपो रेट बढते ही बैंक ब्याज बढाने में जरा भी देर नहीं करते है। ब्याज दरों में ताजा कटौती से 30 लाख तक के होम लोन वालों को हर माह 500 रु की बचत होनी चाहिए अगर बैंक ब्याज कटौती को संजीदगी से लागू करे। इस हिसाब से पिछले दो साल में तीस लाख होम लोन चुकाने वालों को कम-से-कम 3000 रु मासिक की राहत मिलनी चाहिए मगर किसी भी बैंक ने ग्राहकों को इतनी बडी राहत नहीं दी है। आरबीआई ने त्योहारी सीजन में कर्ज सस्ता करके मांग को उठाने की कोशिश  की है। भारत में त्योहारों के दौरान जमकर खरीदारी करने की रिवायत है। नवरात्र से  शुरु होकर त्योहारी सीजन दीवाली  तक चलता है और इस दौरान गरीब से गरीब भी खूब खरीदारी करता है। इसी बात के दृष्टिगत आरबीआई के नए गर्वनर ने उधोग और वाणिज्य जगत को  राहत प्रदान की है। आरबीआ ई ने दिसंबर में मुद्रा स्फीति दर पांच फीसदी रहने की उम्मीद जताई है। इस स्थिति में ब्याज दरों में इस वित्तीय साल में एक और रेट कट की उम्मीद की जा सकती है। वैसे पूरी दुनिया में इस समय मंदी छाई हुई है और वैश्विक  मांग काफी कमजोर है। अमेरिका के सेंट्रल बैंक (फेडेरल रिजर्व)  पर पूरे विश्व  की नजरें टिकी हुई हैं। नवंबर  में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव सपन्न होते ही फेडेरल रिजर्व ब्याज दरें बढा सकता है। इसका एमर्जिंग मार्केट्स की ब्याज दरों पर असर पड सकता है। बहरहाल, भारत को अपनी तेज ग्रोथ को बरकरार रखने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को गति देनी होगी। सितंबर में कमजोर मांग के कारण फैक्टरी उत्पादन में फिर गिरावट आई है। कच्चे माल की ऊंची कीमतें और महंगा कर्ज फैक्टरी उत्पादन को उठाए नहीं उठने दे रहा है। कर्जा  सस्ता होने और त्योहारी सीजन में मांग मजबूत होने से मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर को गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है। सस्ते होम लोन से रियल्टी सेक्टर को भी राहत मिल सकती है। लंबे समय से यह सेक्टर मंदी की चपेट में है। सस्ता कर्ज समय की मांग है। मंदी के वैश्विक  दौर से बचने का यह पुख्ता विकल्प है।  

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016

Stop This War Hysteria

भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में घुसकर पाकिस्तानी आतंकियों को मारा गिराना और उनके लांचपेड्स नेस्तानाबूद करने के बाद युद्ध  की आशंका से पंजाब के सीमावर्ती गांवों को आनन-फानन में खाली करवाकर सरकार ने खामख्वाह 'वार हिस्टीरिया' का माहौल बनाया है। यह स्थिति ठीक उस गडरिए की तरह है जो ”भेडिया आया, भेडिया आया“ चिल्लाकर लोगों को डराया करता था मगर जब वास्तव में भेडिया आया तो कोई भी उसकी मदद को नहीं आया"। अपना घर-बार, खेत-खलिहान और खडी फसल छोडना कोई भी नहीं चाहता और अगर उसे विवश  किया जाए, तो वह इसका पुरजोर प्रतिकार करता है। इसकी झलक पंजाब के मुख्यमंत्री की सीमावर्ती गांवो के  शरणार्थी  शिविरों के दौरे के दौरान देखने को मिली और उन्हें लोगों का गुस्सा झेलना पडा। पंजाब में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान से युद्ध की आशंका से अब तक लगभग एक हजार  सीमावर्ती गांवों को खाली करवाया जा चुका है। पाकिस्तान से लगती सीमा के दस किलोमोटर के दायरे में स्थित सभी स्कूलों को एहतियातन बंद कर दिया गया है। जम्मू-कश्मीर  के सीमावर्ती क्षेत्रों को भी खाली करवा दिया गया है और हजारों परिवारों को शरणार्थियों की तरह अस्थायी (मेक-शिफ्ट्)  शिविरों में रहना पड रहा है। सरकार की पहल के बावजूद कुछ परिवार अभी भी सीमावर्ती क्षेत्रों में रह रहे हैं।  एलओसी पर बढते तनाव के दृष्टिगत सीमा सुरक्षा बल ने सीमा नियंत्रण रेखा के आसपास के क्षेत्रों में नागरिकों की आवाजाही भी पूरी तरह से रोक दी है। तथापि विपक्ष का आरोप है कि भाजपा नीत राजग सरकार  सर्जिकल स्ट्राइक  की आड में पूरे देश  में ”वार हिस्टीरिया” का माहौल खडा कर तीन माह बाद उत्तर प्रदेश  एवं पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में इसे भुनाने  की फिराक में है। पंजाब प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह का भी यही कथन है। पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार सर्जिकल स्ट्राइक के बावजूद भारतीय सेना अभी भी “पीस टाइम जोन्स“ में स्थित है मगर पंजाब के किसानों और ग्रामीणों को खामख्वाह ”बलि का बकरा” बनाया जा रहा है। यह सब उत्तर प्रदेश  एवं पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनावों के  दृष्टिगत किया जा रहा है।  पंजाब प्रदेश  कांग्रेसाध्यक्ष का कहना है कि युद्ध की रती भर भी आशंका नहीं है, फिर पंजाब के किसानों की खडी फसल को क्यों बर्बाद किया जा रहा है? कैप्टन अमरिंदर सिंह के कथन में काफी वजन है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि अब परपंरागत (कंवेशनल) युद्ध का जमाना नहीं रहा। अगला युद्ध परमाणु हथियारों से लडा जा सकता है। पाकिस्तान गाहे-बगाहे परमाणु हथियारों के इस्तेमाल की धमकी भी देता रहता है। वैसे, पाकिस्तान इस सच्चाई से भली-भांति परिचित है कि कंवेशनल वॉर में वह भारत से कभी नहीं जीत सकता। और अगर परमाणु युद्ध लडा जाता है, तो दोनों देश  में भारी तबाही मच सकती है। सच यह है कि पाकिस्तान लंबे समय से भारत के साथ आतंकियों के मार्फत  प्रॉक्सी युद्ध लड रहा है और आगे भी लडता रहेगा। सरकार और उसकी खुफिया एजेंसियां खुद इस बात की चेतावनी दे रही हैं कि पाकिस्तान आतंकियों के मार्फत भारत में आतंकी हमले करवाने की फिराक में है। पाकिस्तान भारत को आर्थिक  तौर पर पूरी तरह से बर्बाद करने पर आमादा है। कश्मीर  घाटी को आतंकियों ने आर्थिक और पर पूरी तरह तबाह कर डाला है और आम आदमी के भूखों मरने की नौबत आन पडी है। उस पर सीमावर्ती क्षेत्रो को खाली कराए जाने से पीडितों को भी तबाही की कगार पर ला खडा कर दिया है। सीमावर्ती गांवों को खाली करवाकर लोगों को ज्यादा देर तक श शरर्णाथी  शिविरं में नहीं रखा जा सकता। देर-सबेर उन्हें उनके गावों में लौटाना पडेगा। युद्ध की निर्मूल आशंका से सियासी रोटियां नहीं सेंकी जानी चाहिए।

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

काला धन सफेद नहीं बन सकता

शुक्रवार को स्वेच्छा से  काले धन को स्वेच्छा से घोषित करने की योजाना खत्म होते  की मोदी सरकार के समक्ष विदेशों में छिपाए गए अथाह धन को स्वदेश  लाने की  चुनौती फिर खडी हो जाएगी। मोदी सरकार ने काली कमाई करने वालों को चार महीने से  स्वेच्छा से काले धन पर आयकर चुकाकर  इसे सफेद बनाने का  सुनहरा अवसर दे रखा था। 30 सितंबर को इस योजना की मियाद खत्म गई । काले धन का खात्मा करना और विदेशों में छिपाए गए अथाह धन को स्वदेश  लाना, भारतीय जनता पार्टी का प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है। यहां तक कि लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा का हर छोटा-बडा नेता विदेशों  में छिपाए गए धन को सौ दिन के भीतर स्वदेश  लाकर हर नागरिक में समान रुप से बांटने का वायदा किया करता था। भारत का विदेशों  में कितना धन छिपा है, इस पर अलग-अलग अनुमान है। ताजा अनुमान है कि विदेशों  में भारत का कम-से-कम 30 खरब (30 ट्रिलियन) रु से भी ज्यादा का काला धन विभिन्न बैंकों में जमा है। और इस विशाल राशि से कई विदेशी  बैंक फल-फूल रहे हैं। कई विदेशी  बैंक बाकायदा उनके यहां काला धन छिपाने का न्योता देते हैं। विदेशी  बैंको में खाता धारकों की सूचना अति गोपनीय रखी जाती है और कर अधिकारियों को भी इसकी जानकारी नहीं दी जाती। बारमूडा, बहमास, यूएई एवं मोनाको जैसे कई ऐसे देश  है, जहां आयकर नहीं लगता और कई तरह की वित्तीय सुविधाएं दी जाती हैं। काली कमाई करने वाले अपना धन छिपाने के लिए उन देशों  का चयन करते हैं, जहां काले धन को गोपनीय रखा जाता है । इसी वजह स्विटजरलैंड के बैंक काले धन छिपाने के लिए लोकप्रिय डेस्टीनेशन बने हुए हैं। बहरहाल, स्वेच्छा से काला धन घोषित करने की  मोदी सरकार की योजना से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती। 2015 में भी सरकार ने इस योजना  को लागू किया था और इसमें मात्र 2500 करोड रु के काले धन का खुलासा हुआ था। इस बार भी इससे राशि  से बहुत ज्यादा काला धन घोषित किए जाने की आशा  नहीं  थी मगर सरकार का दावा है की  योजना के तहत  62 ,500  करोड रु  की काली कमाई घोषित हुई  है और सरकार को 16, 000 करोड रु कर के रूप नें मिलेगा । योजना के तहत काले धन की स्वेच्छा से घोषणा पर सरकार को 45 फीसदी आयकर देना पडेगा जबकि आयकर की मौजूदा अधिकतर सीमा 30 फीसदी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह दर बहुत ज्यादा है। इसे 30 फीसदी ही रखा जाना चाहिए था। सरकार ने हालांकि काला धन घोषित करने वालों को माफी देने का  आश्वासन  दे रखा है मगर अधिकतर को इस बात का भय है कि काली कमाई की घोषणा किए जाने पर वे आयकर अधिकारियों की नजर में आ जाएंगे। सवा करोड की आबादी वाले देश  में आज भी 5 फीसदी से कम आयकर रिटर्न  भरते हैं और इनमें अधिकतर सर्विस सेक्टर से जुडे लोग होते हैं। काले धन को लेकर सबसे बडी समस्या यह  है कि भारत में चुनाव काले धन के बलबूते ही लडे जाते हैं। निर्वाचन आयोग द्वारा तय चुनाव खर्च  की अधिततम सीमा से कहीं ज्यादा चुनाव में खर्च  किया जाता है और अधिकांश  खर्चा काले धन से आता है। 2014 का लोकसभा चुनाव अब तक का सबसे महंगा चुनाव था। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सात अरब रु खर्च  किए थे और कांग्रेस ने पांच अरब रु। सच यह है कि देश  में काले धन की जड महंगे चुनाव  हैं। जिस चुनाव की बुनियाद ही झूठ-फरेब ( चुनाव खर्च सीमा) पर खडी की जाए, उससे बहुत ज्यादा सामाजिक न्याय और पारदर्शिता की उम्मीद नहीं की जा सकती। समकालीन  पूंजीवाद ग्लोबल  अर्थव्यवस्था में काले धन की फसल खूब फलती-फूलती है। भारत में उदारीकरण के बाद पूंजीपतियों की संख्या उतरोत्तर बढती जा रही है। गरीब और ज्यादा गरीब हो रहा है और अमीर और ज्यादा अमीर। इस तरह की व्यवस्था में काले धन की त्वरित फसल लहलहाना स्वभाविक है। सरकार इसे नहीं रोक सकती।