राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय नेताओं की तुलना मे रीजनल स्तर के दल राज्य हित में बेहतर काम करते हैं। राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दलों के क्षेत्रीय नेताओं को स्वतंत्र् निर्णय लेने की अपेक्षाकृत उतनी छूट नहीं होती जितनी क्षेत्रीय दलों के नेताओं को। डाक्टर वाई एस परमार से लेकर वीरभद्र सिंह, शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल से लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर सार्वजनिक तौर पर भले ही न मानें, मगर ये सभी इस पीडा को झेल चुके हैं अथवा झेल रहे हैं। छोटे से छोटे फैसले के लिए हाई कमान की मजूरी के लिए दिल्ली दौडना और फिर महीनों तक आला कमान फैसले के इंतजार में हाथ मलते रहना। दिल्ली का दखल इतना कि प्रियंका को सीलिंग से कहीं ज्यादा जमीन खरीदने की रातोंरात परमिशन दे दी जाती मगर आमा हिमाचली का आग्रह ठुकरा दिया जाता। दिल्ली में वातानुकूलित कमरों में बैठकर क्षेत्रीय हितों को सर्व करना तो दूर, इनकी सही-सही पहचान तक नहीं की जा सकती। कांग्रेस नेहरु परिवार के हिमाचल प्रदेश के प्रति उदार रवैए पर बहुत इतराती है मगर हिमाचल को जम्मू-कश्मीर की तुलना में बहुत कम उदार सहायता मिलती रही है। हिमाचल निर्माता डाक्टर परमार नेहरु परिवार के करीब थे, इसके बावजूद उन्हें हिमाचल के बृह्द और स्वतंत्र स्वरुप के लिए काफी मषक्कत करनी पडी थी । आजादी के बाद से हिमाचल प्रदेश को पूर्वोतर भारत और जम्मू-कश्मीर की तरह उदार केन्द्रीय सहायता नहीं मिल पाई। इस राज्य के षांतिप्रिय लोगों के धैर्य और देशभक्ति की बार-बार परीक्षा ली गई। बच्चा जब तक रोता नहीं है, मां भी उसे दूध नहीं पिलाती। मेरा मानना है कि हिमाचल को राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में इसलिए तवज्जो नहीं दी गई कि यहां से लोकसभा की मात्र चार सीटें है, अलबता इसलिए कि यह प्रदेश राष्ट्रीय मुख्यधारा मैं जी-जान से जुटा रहा है और इस प्रदेश के लोगों में वह क्षेत्रीय जज्बा नहीं है जो कश्मीर , पंजाब अथवा पूर्वोतर राज्यों में है। 70 के दशक में हिमाचल में लोकराज पार्टी नाम का एक क्षेत्रीय दल हुआ करता था। यहाँ पार्टी स्थानीय मुद्दों पर फोकस्ड रही है । ठाकुर सेन नेगी इसके नेता थे। नेगी कबायली किन्नौर जिले से सबंधित हिमाचल के पहले मुख्य सचिव बने। जमीन से जुडे हुए अफसर थे और किन्नौर जिले में उनका खासा दबदबा था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डाक्टर परमार के घुर विरोधी। उनका मानना था की कॉग्रेस के नेता अपने सियासी हित साधने को ज्यादा प्राथमिकता देते हैं । एक बार उन्होंने डाक्टर परमार को चुनौती दी थी कि “ंमैं तो मुख्यमंत्री बन सकता हूं मगर आप मुख्य सचिव नहीं बन सकते"। मगर विपक्ष का नेता होते भी ठेठ नौकरशाह ही रह गए। ताउम्र अविवाहित रहे। सुबह दस बजे तैयार होकर विधानसभा परिसर स्थित अपने दफ्तर पहुंच जाते, दिन में घर से बना खाना वहीं खाते और थोडी देर के लिए जरुर सुस्ताते। पांच बजे नहीं कि घर लौट जाते। फिर खास को छोड्कर किसी से नहीं मिलते। उनकी यह कार्यशैली उन्हे किन्नौर से बाहरं लोकप्रिय नेता नहीं बना पाई। नेगी की तुलना में पार्टी के एक और नेता हीरा सिंह पाल ज्यादा लोकप्रिय थे मगर वे भी अपने हलके से बाहर नहीं निकल पाए। मेरा इस पार्टी से इतना नाता था कि तब में पार्टी के साप्ताहिक मुखपत्र में नौकरी करता था। अक्सर मुझे पार्टी की बैठकों में कवरेज के लिए बुलाया जाता। तब तो मुझे अहसास नहीं हुआ मगर बाद में लगा इस पार्टी में अन्य दलों से कही ज्यादा स्वंत्रतता थी। हर मुद्दे पर खुलकर चर्चा होती और हर सदस्य को बोलने का पूरा-पूरा अवसर दिया जाता। पार्टी का राजनीतिक दर्शन भी कांग्रेस से बेहतर था। इस पार्टी को सत्ता में आने का मौका मिलता तो हिमाचल की तस्वीर कुछ और होती। बहरहाल, बाद में पार्टी बिखर गई। तब से आज तक हिमाचल में कोई क्षेेत्रीय दल नहीं उभर पाया। राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने हिमाचल में अपना जनाधार तेजी से फैलाया है। हिमाचल में हिंदुओं का बोलबाला है और इस राज्य को देवभूमि कहा जाता है, आरएसएस के फ्रेमवर्क में हिमाचल की यह छवि एकदम फिट बैठती है। और यह जनाधार किसी क्षेत्रीय दल को उभरने ही नहीं देगा। हां, कालांतर में अगर कांग्रेस टूटती है, तो क्षत्रप पनप सकते हैं। बहरहाल, देवभूमि के लिए आज भी क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रासंगिक हो सकता है। इससे क्षेत्रीय नेताओं की बार-बार की दिल्ली दौड से निजात मिल जाएगी और हर फैसले के लिए हाई कमान पर निर्भरता भी खत्म हो जाएगी। हरियाणा में बंसीलाल की क्षेत्रीय पार्टी की सरकार में जितना विकास हुआ, उतना आज तक कभी नहीं हुआ। अकाली दल सरकार पंजाब को और ज्यादा खुशाहल बना सकती थी अगर अकाली निजी हितों से ज्यादा क्षेत्रीय हितों को तरजीह देते।
शुक्रवार, 20 जुलाई 2018
The Relevance Of Regional Party In a Hill Sate Of Himachal Pradesh
Posted on 9:10 pm by mnfaindia.blogspot.com/






