बुधवार, 28 नवंबर 2018

Is Jairam Thakur-Virbhadra Singh Bonhomie Good For State Politics ?

Politics is a 'marriage of convenience' and game of one-upmanshipp. Friends turn foes and latter friends as per their 'political convenience". This is best illustrated by the "cordial relationship" between present Himachal  chief minister, Jairam Thakur and his predecessor Virbhadra Singh. 

Both enjoy excellent bonhomie and  leave no opportunity  in singing songs for each other. The other day, Chief Minister, Jairam Thakur showered petals of praises on former chief minister Virbhadra Singh saying Congress doesn't respect him though  he is a tallest party leader. 

Former chief minister, unlike his strong antics towards his opponents  is  too soft on Jairam Thakur. He speaks more loudly against stare Congress chief Sukhwinder Singh Sukhu  than against any BJP leader, except father son duo-Dhumals. 

 Contrary to party stand, he is all praise for his successor though his party is preparing a charge-sheet (undoubtedly a futile exercise) against BJP govt.  Its good to note that chief minster Jairam Thakur  has also vowed not to pursue "politics of vendetta and "witch hunt" like earlier leaders. Its a direct indictment of ex-chief minister Prem Kumar Dhumal who was  at loggerheads with Virbhadra Singh all the time during his tenure. During Congress regime, Dhumal was constantly hounded and Dhumal paid the Virbhadra Singh in same coin. 

 A peaceful state like Himachal has no place for "political of vendetta". Virbhadra Singh is man of strong likes and dislikes. He becomes too vindictive to silence the voices of dissent and browbeat  his critics. As long BJP leader Thakur Jagdev Chand was alive, Virbhadra did  his best to browbeat  Shanta Kumar and propelled former to rebel against the latter. 

But, after death of Thakur Jagdev Chand and PK Dhumal taking center stage in BJP, Virbhadra Singh started courting Shanta Kumar. It suited his "politics of "divide and rule". Jairam Thakur, so far, looks a simple and straight forward leader, more engrossed in ensuring good governance. How long, he remains positioned in this mindset is yet to be seen.

 Contemporary politics has assumed dirtiest proportions. Political parties have gone bankrupt on public issues and raking up non-issues. The next four years will be acid test for Jairam Thakur. All his intent and purposes will be keenly watched. People of the sate sincerely hopes, he doesn't follow the politics of " bare opportunism and vendetta".           

गुरुवार, 22 नवंबर 2018

आतंकी हमले से सहमा पंजाब

 अमृतसर के राजा सांसी गांव में  पिछले रविवार को निरंकारी सत्संग पर आतंकी हमले से पंजाब  भयावह आतंकी दौर की पुनरावृति की  आशंका  से सहम गया है। इस हमले में तीन लोग मारे गए और कम-से-कम 19 लोग जख्मी हो गए। रविवार को अमृतसर से दस किलोमौटर दूर राजा सांसी स्थित निरंकारी भवन में साप्ताहिक सत्संग चल रहा था। मोटर साइकल पर दो नकाबकोश  आए; एक ने गेट पर तैनात सुरक्षा गार्ड  पर पिस्तौल तान दी और दूसरे ने अंदर जाकर सत्संग के मंच पर ग्रेनेड  फ़ेंक  दिया । धमाके से तीन लोग मारे गए और  19 लोग  घायल हो गए। हमलावरों ने अपने चेहरे छिपा रखे थे और   चश्मदीदों   के अनुसार वे पंजाबी  बोल रहे थे। इस हमले को पंजाब पुलिस आतंकी हमले के तौर पर जांच कर रही है हालांकि अभी तक किसी आतंकी संगठन ने हमले की जिम्मेदारी नहीं ली। मुख्यमंत्री ने इस हमले में  पाकिस्तान का हाथ बताया है। कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के मुताबिक हमले में इस्तेमाल किए गए ग्रेनेड पर पाकिस्तान सेना की छाप है। इस हमले ने पंजाब में सुरक्षा प्रबंधों की कलई खोल दी है। पिछले सप्ताह ही सरकार ने आतंकी संगठन जैश -ए-मोहम्मद से जुडे आतंकियों के पंजाब में दाखिल होने की आशंका के चलते रेड अलर्ट जारी किया था। इस अलर्ट के बाद सुरक्षा व्यवस्था कडी कर दी गई थी और अमृतसर समेत पूरे राज्य में नाके लगाकर आने-जाने वालों की जांच की जा रही थी। इसके बावजूद हमला हो गया। बहरहाल, इस हमले की पृष्ठभूमि  में सिख-निरंकारी विवाद को भी देखा जा रहा है। लंबे समय से सिखों और निरकारियों में विचारधारा को लेकर गहरे मतभेद रहे है। यह विवाद तब  शुरु हुआ जब  1929 में निरंकारी मिशन को एक अलग पंथ के तौर पर स्थापित किया गया। सिख किसी व्यक्ति विशेष  की जगह गुरु ग्रंथ साहिब को अपना गुरु मानते हैं जबकि निरंकारी मिशन के मुखिया को अपना गुरु मानते हैं। निरंकारी गुरु ग्रंथ साहिब में  विश्वास  रखते तो हैं मगर उनका मानना है कि ग्रंथ को वाणी से समझाने के लिए गुरु की जरुरत है। इसलिए निरंकारी अपना गुरु चुनते है। निरंकारी मिशन के संस्थापक बाबा अवतार सिंह द्वारा रचित वाणी को अवतारवाणी का नाम दिया गया है मगर सिखों को यह बात गवारा नहीं गुजरी। उनका आरोप है कि इसमें सिख संकल्प के साथ छेडछाड की गई है। इसके बाद सिखों और निरंकारियों में दूरियां इस कद्र बढती गईं कि 1980 में तत्कालीन निरंकारी प्रमुख गुरबचन सिंह की हत्या कर दी गई। इसके बाद पंजाब आतंकी हिंसा के अत्याधिक भयावह दौर का गवाह बना। रविवार के हमले से पंजाब को यही डर सता रहा है। सतहर के दषक के बाद से राज्य में जब- जब भी कांग्रेस सरकार सत्तारुढ हुई है आतंकी घटनाओं में इजाफा हुआ है। अकालियों पर चरमपंथियों को उकसाने के आरोप लगते रहे हैं। आतंकी  हिंसा, नखोरी और “डिवाइड एंड रूल“ की सियासत  पहले ही पंजाब की आर्थिकी को तबाह कर चुकी है। इस सच्चाई से सभी वाकिफ है कि सियासी दल अपने राजनीतिक हित साधने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। लोगों को स्वंय अपने हितों की रक्षा करनी होगी।

शनिवार, 10 नवंबर 2018

लानत है ऐसी राजनीति पर ?

लानत है ऐसी सियासत पर कि तथाकथित धर्म  निरपेक्ष राजनीतिक दल को गौमाता के नाम पर वोट मांगने पडे।  राम मंदिर और गोमाता की राजनीति पर भाजपा को  “सांप्रदायिक“  बताने वाली  कांग्रेस को भी अब मतदाताओं को लुभाने के लिए  गोमाता का सहारा लेना पडा है। षनिवार को मध्य प्रदेश  विधानसभा चुनाव के लिए जारी चुनावी घोषणा पत्र में कांग्रेस ने सत्ता में आने पर प्रत्येक ग्राम पंचायत में कम-से-कम एक गौशाला  बनाने का “वचन“ दिया है। कांग्रेस ने अपने चुनावी घोषणा पत्र को “वचन पत्र“ का  नाम दिया है। जाहिर है चुनावी घोषणाओं पर मतदाताओं को अब भरोसा नहीं रहा है । इसलिए “चुनावी वचन“ का झांसा देकर मतदाताओं को  पटाने की कोशिश  की गई है। भाजपा भी इस मामले में पीछे नहीं है। तेलंगाना में भगवा पार्टी ने हर साल लोगों को एक लाख गौमाता बांटने  का  वायदा किया है। अब तक भाजपा समेत राजनीतिक दल मोबाइल, लेपटॉप, साइकल बांटा करती थीं। पहली बार भाजपा ने गौमाता देने का वायदा किया है। हार्ड हिन्दुत्व के दमखम पर चुनावी में प्रचंड बहुमत हासिल कर भाजपा ने  कांग्रेस की “धर्म  निरपेक्ष“ राजनीति को करारा झटका दिया है। मजबूरन, कांग्रेस को भी “सॉफ्ट हिंदुत्त्व“ का सहारा लेना पडा है। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष  नर्मदा नदी की आरती उतार कर “नर्मदा भक्त“ होने का आडंबर भी  किया था। बहरहाल,  गौमाता का मुद्दा ्कांग्रेस की चुनावी वैतरणी पार करने में सहायक होती है या नहीं, इसका पता चुनाव परिणाम आने पर ही चलेगा मगर इतना तय है कि राजनीतिक दलों के पास चुनावी “झांसे“ का स्टॉक खत्म होता  जा  रहा है। यह राजनीतिक “दिवालियापन दर्शाता  है। पिछले सात दशक में सियासी दलों ने देश  को हाल-बेहाल तो किया ही है, राजतीतिक सुचिता को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर डाला है। आजादी के बाद से पिछले सात दशक के सफर का लेखा-जोखा किया जाए तो किसान-जवान, कामगार-कर्मचारी, खिलाडी, उधोगपति और व्यवसायी, समाज के हर वर्ग ने देश  को बुलंदियों पर पहुंचाया है मगर नेताओं ने क्या किया? मतदाताओं को  चुनाव मे इसका हिसाब मांगना चाहिए। 

गुरुवार, 8 नवंबर 2018

नोटबंदी के दो साल

ठीक दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक नोटबंदी का ऐलान करके वित्त मंत्री अरुण जेटली समेत भाजपा के  शीर्ष  नेताओं को भी सकते में डाल दिया था। नोटबंदी का मूल मकसद काले धन को बाहर निकालना था मगर प्रधानमंत्री का  यह कदम  अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया। इसके विपरीत नोटबंदी से सौ से अधिक लोगों को अपना पैसा लेने के लिए भी प्राण गंवाने पडे। देश  और जनमानस भले ही भूल जाए मगर नोटबंदी के दौरान मारे गए लोगों के परिजन इस त्रासदी को भूल नहीं सकते हैं। पूरी दुनिया मे पहली बार भारत में नोटबंदी जैसे आर्थिक कदम के कारण आम आदमी को अपने प्राण गंवाने पडे। अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार रुक गई। और अब दो साल बाद मोदी सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के बीच भी ठन गई है। मोदी सरकार मौद्रिक व्यवस्था को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार  केन्द्रीय बैंक  की स्वायतता को ध्वस्त करने पर आमादा है। सरकार अब आरबीआई से 3.61 लाख करोड रु मांग रही है। आरबीआई के पास जरुरत से कहीं  ज्यादा पैसा है और सरकार चाहती है कि बैंक इस सरप्लस धन को उसके हवाले करे ताकि इसका सदुपयोग किया जा सके। आरबीआई को मुद्रा स्फीति की चिंता है, इसलिए इस सरप्लस नगदी को सरकार को लौटाने में आनाकानी कर रही है।  अततः बैंक को झुकना पडेगा और यह सरप्लस पैसा सरकार के सुपुर्द  करना ही पडेगा। बहरहाल, इस तनातनी से एक बात तो साफ हो गई है कि मोदी सरकार को पूरी उम्मीद थी नोटबंदी से ज्यादा नहीं तो तीन-चार लाख करोड का काला धन आरबीआई के मार्फत सरकार के खजाने में आ जाएगा। मगर ऐसा हो नहीं और अब सरकार अपनी विफलता का ठीकरा आरबीआई के सर फोड रही है। सरकार और आरबीआई की ताजा तनातनी से यह बात भी साफ है कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के समय आरबीआई को भी  विश्वास  में  नहीं लिया था। वैसे प्रधानमंत्री की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि सरकार के टॉप फैसले को गोपनीय रखा गया। हवा तक को सुंघने वाले पत्रकारों को भी कानोंकान भनक नहीं लगी। अमूमन, सरकार के अधिकतर फैसले लीक हो जाया  करते  हैं ।  नोटबंदी से अर्थव्यवस्था और देश  को कोई फायदा हुआ हो, इसके भी कोई संकेत नहीं है। नोटबंदी के समय प्रधानमंत्री ने अवाम को इस कदम से लाभान्वति कराने के लिए  देश चासियों से 50 दिन का समय मांगा था। अब दो साल गुजर गए हैं। देश  प्रधानमंत्री से यह उम्मीद रखता है कि वे जनता को नोटबंदी से लोगों को क्या मिला,  इसका हिसाब दे।