गुरुवार, 30 जून 2016

न्यायपालिका में अनुशासनहीनता

       न्यायपालिका में अनुशासनहीनता

स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका के इतिहास में पहली बार तेलगांना के जज हतताल पर है। अब तक न्यायपालिक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, सिवा पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट  के जजों की एक दिन के सामूहिक अवकाश  की घटना के। 2004 में  पंजाब-हरियाणा हाइकोर्ट  के 25 जज सामूहिक अवकाष पर चले गए थे। तेलंगाना के जजों की  हडताल की प्रमुख वजह आंध्र प्रदेश  से संबंधित 130 जजों की राज्य में नियुक्ति को लेकर उपजा विवाद है। हाइकोर्ट  ने हाल ही में  130 जजों की नियुक्ति की थी। चयनित सभी जज क्योंकि आंध्र प्रदेश  में जन्में है, इसलिए तेलंगाना के जज इन नियुक्तियो को अवैध मान रहे हैं। तेलंगाना के जजों का आरोप है कि भर्ती के समय आंध्र और तेलंगाना में जन्मे लोगों के अनुपात का पालन नहीं किया गया । हडताली जजों का यह भी आरोप है कि हाईकोर्ट  के जजों की नियुक्ति में भी दोनों राज्यों के अनुपात (60ः40) का पालन नहीं किया गया है। हाईकोर्ट में कुल 21 जज हैं और इनमें सिर्फ  तीन तेलंगाना के है। यहां भी अनुपात को सुधारने की जरुरत है। इससे कई बार राज्य से जुडे फैसले प्रभावित हो रहे हैं। विशेषतय, 2014 के बाद ऐसा देखा गया है। तेलंगाना के लिए अलग से हाईकोर्ट की माग की जा रही है। अभी आध्र प्रदेश  और तेलंगाना के लिए एक ही हाईकोर्ट  है। विरोध में तेलंगाना के दौ सौ जज 15 दिन की छुट्टी पर चले गए है। 125 जजों ने विरोधस्वरुप एसोसिएशन अध्यक्ष को अपने-अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं। हाईकोर्ट ने अनुशासनहीनता के लिए 11 जजों को निलंबित कर दिया है। निलबंन से तेलंगाना के न्यायिक अधिकारी और भडक गए हैं। तेलंगाना के वकील भी जजों के समर्थन में खडे हो गए है।  यानी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की लडाई में अब जज भी  शामिल हो गए हैं। इस मामले में दोनों राज्यों के बीच कटुता इस कद्र बढ गई है कि वारंगल में आंध्र प्रदेश  में जन्मे एक जज को तेलंगाना छोडने तक के लिए कहा गया।  अलग हाइकोर्ट को लेकर तेलंगाना और केन्द्र के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर भी जारी है। मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर के नाम से मशहूर) की सांसद पुत्री ने यह कहकर विवाद खडा कर दिया है कि आंध्र प्रदेश  के जज तेलंगाना में जानबूझकर जगह (नियुक्ति) चुन रहे हैं ताकि नौकरशाही और पुलिस को परेशान किया जा सके। उधर, मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव केन्द्रीय कानून मंत्री सदानंद गौड के इस बयान पर भडक गए हैं कि अलग हाईकोर्ट  बनाने में केन्द्र की कोई भूमिका नहीं है। गौड के इस बयान में कोई दम नहीं है कि मुख्यमंत्री को अलग हाईकोर्ट  स्थापित करने के लिए चीफ जस्टिस  से बातचीत करनी चाहिए। अगर ऐसा होता तो हरियाणा कब का अपने लिए अलग हाई कोर्ट स्थापित कर चुका होता। संविधान में राज्य की विधानसभा को अपना अलग हाईकोर्ट स्थापित करने का अधिकार नहीं है हालांकि अनुछेच्द 214 के तहत हर राज्य के लिए अलग हाईकोर्ट की व्यवस्था है मगर ऐसा संसद ही कर सकती है। आंध्र प्रदेश  और तेलंगाना के लिए संयुक्त हाईकोर्ट भी संसद द्वारा पारित कानून के तहत स्थापित किया गया है। बहरहाल, तेलंगाना के लिए अलग हाईकोर्ट बनाने से मौजूदा समस्या का हल निकल सकता है। तथापि, न्यायपालिका का क्षेत्र अथवा जात-पात पर बंटना बेहद दुखद है। न्याय की कुर्सी पर बैठा न्यायाधीश  नैसर्गिक न्याय की मूर्ति माना जाता है, न कि किसी क्षेत्र अथवा समुदाय विशेष  का। तेलंगाना के हडताली जजों की मांग जायज हो सकती है मगर उनके विरोध का तरीका एकदम गलत है। न्यायाधीश  कानून और व्यवस्था का सबसे बडा संरक्षक होता है। और अगर बाढ ही खेत को खाने लग जाए तो हो ली फसल। क्षेत्रीय  आकांशाएं भी एक सीमा तक ही पूृरी की जा सकती हैं। देश  की अखंडता को खतरे में डालने वाली क्षेत्रीय आकांशाएं सहन नहीं की जा सकती। तेलंगाना के हडताली जजों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए। देश  में भेड चाल की रिवायत है। तेलंगाना की चिंगारी और राज्यों में भी भडक सकती है।

बुधवार, 29 जून 2016

भला यह भी कोई उम्र है सन्यास लेने की !

 समकालीन दुनिया में फुटबाल के बेहतरीन खिलाडी लियोनेल मेसी का महज 29 साल की उमर में सन्यास लेना खेल प्रेमियों को खटक रहा है। भला यह भी कोई उमर है सन्यास लेने की ! मेसी अभी अपने केरियर की बुलंदियों पर थे। अर्जेटीनी खिलाडी लियोनेल मेसी, पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो और ब्राजील के नेमार डी सिल्वा सैंटोस जूनियर (नेमार के नाम से मशहूर) इस समय दुनिया के तीन सर्वश्रेष्ठ  फुटबाल खिलाडी माने जाते हैं और तीनों की कोई सानी नहीं रखता है। मेसी की सानी करना तो फिलहाल बेहद मुश्किल  है। वे दुनिया के एकमात्र ऐसे खिलाडी हैं, जिन्होंने लगातार सात सीजन में 40 से ज्यादा गोल किए हैं। मेसी पांच बार फीफा बैलोन डी”या अवार्ड जीत चुके हैं। और  24 साल 6 महीने की आयु में तीन बार  फीफा बैलोन डी”या अवार्ड जीतने वाले एकमात्र युवातम  खिलाडी हैं। 2012 में  91 गोल दाग कर मेसी ने नया गिनीज विश्व  रिकॉर्ड स्थापित किया था।  फीफा के प्रो वर्ल्ड- इलेवन में (2007-2015) मेसी नौ बार नामित हो चुके हैं। क्रिस्टियानो रोनाल्डो दूसरे ऐसे खिलाडी हैं जो नौ बार  प्रो वर्ल्ड- इलेवन में चयनित किए जा चुके हैं। मेसी दुनिया के एकमात्र ऐसे खिलाडी हैं जिन्होंने प्रोफेशनल लीग मेचों में हर टीम के खिलाफ लगातार गोल दागे हैं। 27 साल की उमर में  यूरोपियन क्लब के लिए चार सौ गोल दागने वाले वे युवातम खिलाडी हैं।  मेसी ने और भी कई रिकार्ड बनाए हैं और लिस्ट बहुत लंबी है। वे दुनिया के दूसरे सबसे अमीर खिलाडी हैं और सालाना 543 करोड रु कमाते हैं।  मेसी ने एकाएक सन्यास क्यों लिया? क्या वे कोपा अमेरिका में लगतार दूसरी बार पेनल्टी शूट  आउट मिस करने पर बेहद निराश  थे या अर्जेटीना के लगातार तीसरी बार कोपा फाइनल हारने से। कोपा अमेरिका के फाइनल में चिली के खिलाफ  पेनल्टी शूट  में मेसी की चूक के कारण अर्जेटीना को  हार का सामना करना पडा हालांकि एक और खिलाडी भी पैनल्टी  शूटटआउट चूक गया था। मगर मेसी जैसे महानतम खिलाडी से इस तरह की चूक की उम्मीद नहीं की जा सकती। पिछले साल भी मेसी पेनल्टी शूटआउट  चूक गए थे और अर्जेटीना फाइनल में चिली से हार गया था। मेसी सरीखे दिग्गज खिलाडी की मौजूदगी के बावजूद अर्जेटीना कोपा अमेरिका में पिछले तीन साल से लगातार फाइनल में हार रहा है। 2014 में अर्जेटीना जर्मनी से हारा।  2015 और अब 2016 में चिली से।  2008 में मेसी ने अर्जेटीना को ओलंपिक में गोल्ड मेडल दिलवाया था। इसले अलावा  अर्जेटीना विगत 23 साल से  कोई भी बडा खिताब नहीं जीत पाया है। टीम ने अंतिम बार 1993 में कोपा कप जीता था। संभवतय, बार-बार की चूक और टीम की फाइनल में हार की वजह से मेसी निराश  हो गए थे। ओलंपिक में जगह नहीं मिलने से भी मेसी निराश  थे। मेसी ने यह कह कर स्वीकारा भी कि वे चार बार अर्जेटीना के लिए बडे टूर्नामेंट  खेल चुके हैं मगर हर बार हार का सामना करना पडा। इस बार कोपा अमेरिका में चिली से हारने पर मेसी काफी व्यथित थे। खेल प्रतियोगिताओं में हार-जीत का क्रम चलता रहता है और इससे किसी खिलाडी की प्रतिभा कम नहीं हो जाती। वस्तुतः, खेल प्रतियोगिता खिलाडी को गिरकर उठने और फिर आगे बढकर प्रतिद्धंद्धी का डटकर मुकाबला करने की सीख देती है। मेसी का अंतरराष्ट्रीय  खेलों से सन्यास लेने से फुटबाल जगत एक प्रतिभावान खिलाडी से महरुम हो जाएगा। अभी उनमें काफी प्रतिभा थी और वे कम-से-कम तीन-चार साल और खेल सकते थे। मेसी के साथ ही इस बार यूरो कप से स्वीडन के बेहतरीन खिलाडी ज्लाटन इब्राहिमोविच ने भी सन्यास ले लिया है मगर वे 35 साल के हैं और यही अंतरराष्ट्रीय  प्रतियोगिता से सन्यास लेने का सही समय है। मेसी अपेक्षाकृत अभी युवा हैं और यह उमर सन्यास लेने की नहीं होती। फुटबाल प्रेमी लंबे समय तक सफेद-आसमानी रंग की जर्सी में मेसी के जलवे को मिस करते रहेंगे।

मंगलवार, 28 जून 2016

लफ्फाजी से काम नहीं चलेगा

सोशल मीडिया पर कालेधन को लेकर प्रधानमंत्री के भाषणों का आकलन करें , तो आपको वह भाषण (12 फरवरी, 2014) मिल जाएगा जिसमें नरेन्द्र मोदी ने विदेशों  में छिपाए गए काले धन को स्वदेश  लाकर हर आदमी के खाते में 15 लाख जमा कराने का वायदा किया था। यह भले ही चुनावी वायदा था मगर देश  के आम आदमी ने इसे सच मान लिया और आज भी इसी मुगालते में जी रहा है। चुनाव जीतने के लिए समकालीन सियासी नेता आसमान से तारे तोडकर लाने का भी वायदा कर लेते हैं मगर अमल में बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधा तक मुहैया नहीं करा पाते। भाजपा ने सत्ता में आते ही हर कस्बे-गांव को चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराने का वायदा किया था मगर दो साल गुजर गए हैं, चौबीस घंटे तो क्या छह घंटे भी लगातार बिजली सप्लाई नहीं मिलती। इस गति से एक साल तो क्या देश  में चौबीस घंटे बिजली मुहैया कराने में कई साल लग सकते हैं। बहरहाल, इस रविवार को प्रधानमंत्री ने “ मन की बात“ कार्यक्रम में वाकई ही ऐसी बात कही जिस पर देश  का हर प्रबुद्ध नागरिक उनसे सहमति रखता है। प्रधानमंत्री ने “मन की बात“ में कहा कि देश  में लाखों लोगों के पास करोडों रुपए के बंगले है मगर आय पचास लाख से भी कम, इस पर भरोसा नहीं होता। संदर्भ अघोषित संपत्ति के खुलासे संबंधी सरकार की स्कीम का था। इस स्कीम के तहत 30 सितंबर अघोषित संपत्ति को घोषित करने की आखिरी तिथि है। इसके बाद सरकार सख्त कार्रवाई करेगी। केद्र सरकार इस तरह की स्कीम पहले भी कई बार लागू कर चुकी है मगर इसके कोई बहुत ज्यादा सकारात्मक परिणाम नहीं निकले हैं। जैसा कि प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि इस बात पर विश्वास  नहीं किया जा सकता है कि सवा सौ करोड की आबादी वाले देश  में 50 लाख से ज्यादा आय वाले मात्र डेढ लाख ही होंगे जबकि हर छोटे-बडे शहर में लाखों नहीं तो हजारों के पास करोडों की संपत्ति है। आयकर विभाग को इस सच्चाई का पता है मगर फिर भी यह अघोषित संपत्ति सरकार की नजर से छिपती रही है। देश का  करप्ट  सरकारी तंत्र और साधन-सपन्न लोगों के उन्मुख न्यायिक व्यवस्था इसके लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। तीस सितंबर के बाद सरकार कर चोरों का पेन कार्ड  ब्लॉक कर देगी, अखबारों में उनके नाम प्रकाशित  किए जाएंगे, बैकों से लोन नहीं मिलेगा आदि जैसे उपाय प्रस्तावित है। मगर फौरी उपायों से कर चोरी को पूरी तरह से नहीं रोका जा सकता।  देश  का सरकारी तंत्र  इतना   हो चुका है कि अपराधियों को रोकने की बजाय, वह उनकी मदद करता है। आयकर विभाग के पास पहले ही इस तरह के अधिकार हैं कि विभागीय अफसर करोंडों की संपत्ति के मालिक लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं और उनकी संपत्ति जब्त कर सकते हैं मगर अभी तक ऐसा नही हो रहा है। सरकार को अघोषित संपत्ति अथवा काला धन बाहर निकालने के लिए विशेष  स्कीम चलानी पडे, यह अपने आप में संबंधित विभाग की अकुशलता का प्रमाण है। आयकर अधिकारी इस सच्चाई को बखूबी जानते हैं कि काला धन अर्जित कर काली संपत्ति जोडने वाले लोग रसूकदार होते हैं और उनका सियासत में तगडा दखल होता है। प्रधानमंत्री मोदी भी इस सच्चाई को जानते हैं कि देश  में चुनाव भी इसी काले धन और अघोषित संपत्ति के बूते लडे जाते हैं। इन हालात में सरकार को फौरी अल्पकालीन उपाय  करने की बजाए, दीर्घ-कालीन उपाय करने चाहिए ताकि देश  में काले धन के पनपने और फलने-फूलने की कोई गुजाइंश  ही न रहे। काले धन की उत्पति के लिए देश  के कुछ “काले कानून“ प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। भला यह भी कोई आयकर छूट हुई कि दौ सौ रुपए किलो दाल और आसमान छूते मकान किराए  के जमाने में मात्र तीन लाख रु सालाना आय अथवा इससे कम आय  को कर से मुक्त रखा जाए। इस आय में तो मध्यम वर्ग  अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी बमुश्किल  जुटा सकता है। काले धन की उत्पति रोकने के लिए प्रत्यक्ष कर व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने की जरुरत है। अल्पकालीन उपाय बहुत ज्यादा असरदार नहीं हो सकते।

सोमवार, 27 जून 2016

एकता तार-तार

                               

एक जमाने में पूरी दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन ने अततः यूरोपियन यूनियन छोडकर ”एकला चलो” का मार्ग चुना है। द्धितीय विश्व  युद्ध के बाद यूरोप के देशों  ने महाद्धीप के समग्र विकास के लिए मिलकर आगे बढने का संकल्प लिया था। ब्रिटेन के ईयू छोडने के फैसले से इस संकल्प (यूरोपियन प्रोजेक्ट ऑफ ग्रेटर यूनिटी) को गहरा धक्का लगा है। फ्रांस के  राष्ट्रपति  की यह टिप्पणी काबिलेगौर है कि ब्रिटेन के बगैर यूरोप पहले जैसा नहीं रहेगा। ब्रिटेन के इस ऐतिहासिक फैसले के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं और मुल्क को अपने इस फैसले का भारी खमियाजा भुगतना पड सकता है। जनमत संग्रह के नतीजे आते ही ब्रिटेन की राजनीति में भूचाल आ गया।  प्रधानमंत्री डेविड कमरुन ने इस्तीफा दे दिया है। वैकल्पिक “प्रधानमंत्री (शेडो प्राइम मिनिस्टर) लेबर पार्टी के नेता जेरेमी कॉर्बिन के खिलाफ  प्रचंड बगावत  खडी  हो गई है  और अविश्वास  प्रस्ताव लाया गया है। आरोप है कि लेबर पार्टी के पचास फीसदी से ज्यादा समर्थकों ने पार्टी के तय स्टैंड के खिलाफ वोटिंग की है। लेबर पार्टी के नेताओं का कहना है कि  जेरेमी कॉर्बिन ने पूरी गंभीरता से जनमत संग्रह को लेकर प्रचार नहीं किया। ब्रिटेन के ईयू को छोडने के फैसले से देश  की अखंडता भी खतरे में पड गई है। ब्रिटेन के अभिन्न हिस्सा स्कॉटलैंड की तीन-चौथाई जनता ने यूरोपियन यूनियन में बने रहने के पक्ष में फतवा दिया है़। नतीजे आने के फौरन बाद  स्कॉटलैंड में भी ब्रिटेन से अलग होने के लिए जनमत संग्रह की मांग उठी  और अब भडक सकती है। ब्रिटेन ने दुनिया भर की स्टॉक मार्केट में भी भारी हलचल मचा दी है। ब्रिटेन की मुद्रा पाउंड  शुक्रवार को दस फीसदी से भी अधिक लुढक गई । तीस साल में ऐसा पहली बार हुआ है। लॉयड्स और बार्कलेज जैसे षीर्श  बैंको के  शेयर 30 फीसदी से भी ज्यादा गिरावट के साथ बंद हुए। सत्र के  शुरु में ही शीर्ष  बैंकों को 130 अरब डॉलर का फटका लगा। प्रधानमंत्री केमरुन के इस्तीफे से चांसलर जॉर्ज ओसबोर्न के भविष्य  पर भी तलवार लटक गई है। इस नाजुक मौके पर इस तरह की अनिश्चितता  ब्रिटेन के हित में नहीं है। जापान की स्टॉक मार्केट में खुलते ही अफरा-तफरा मच गई और ट्रेडिंग को निलंबति करना पडा। थॉमस कुक ने ऑनलाइन करंसी सेल्स बंद कर दी है और अपनी सभी  शाखाओं में एक हजार पाउंड से ज्यादा की खरीदारी पर प्रतिबंध लगा दिया है। जनमत संग्रह के नतीजे आने के बाद यूरो की मांग सातवें आसमान को छूने लग पडी है। भारतीय स्टॉक मार्केट में भी ब्रिटेन के ईयू एक्जिट का प्रतिकूल  प्रभाव पडा है। सत्र के शुरुआत में  सेंसेक्स 1091 अंक लुढकने के बाद कुछ संभला और  604. 51 अंकों की गिरावट के साथ बंद हुआ। आरबीआई के दखल से डॉलर के मुकाबले रुपया पाउंड की तरह बहुत ज्यादा नहीं गिरा और अंत में 1.06 फीसदी गिरावट के साथ प्रति डॉलर  67.96 पर बंद हुआ। ब्रिटेन की देखा-देखी  यूरोप के अन्य देश  भी यूरोपियन यूनियन से अलग होने की मांग कर सकते हैं। फ्रांस में नेशनल पार्टी की नेता मरीन ली पेन ने  सरकार से ईयू को लेकर जनमत संग्रह की आवाज बुलंद की है। पिछले सप्ताह पेन ने वियना में साफ-साफ कहा था कि फ्रांस के पास ईयू छोडने के हजार कारण है। नीदरलैंड के एंटी-इमीग्रेशन नेता ग्रीट वाइल्डर्स ने भी ब्रिटेन की तरह जनमत संग्रह की मांग की है। इस तरह की मांग  उठने से स्पष्ट  है कि यूरोपियन यूनियन बिखराव की ओर जा रहा है। विशेषज्ञों  का मानना है कि ब्रिटेन के ईयू से अलग होने का “डोमिनो इफेक्ट“ हो सकता है। यूरोपियन यूनियन के समक्ष अब सबसे बडी चुनौती है कि कैसे एक नए यूरोप का निर्माण किया जाए और “एकीकृत यूरोप“ को संभाल कर रखा जाए। एक झटके में ईयू को लगभग 16 फीसदी आर्थिक आउटपुट का नुकसान उठाना पडेगा। ब्रिटेन के समक्ष अब तरह-तरह की चुनौतियां है। ब्रिटेन को पूरी आर्थिक-व्यापारिक समझौते नए सिरे से करने पडेगे। अब वह व्यापार बैरियर मुक्त एकल यूरोपियन मार्केट का हिस्सा नहीं रहेगा। ब्रिटेन को विभिन्न देशों  से नई व्यापार और वाणिज्य संधियां करनी पडेगी। सब कुछ इतना आसान नहीं है। एकता का पुल बनाने में सालों लग जाते हैं। इसे ढहाने में जरा भी समय नहीं लगता मगर इससे जो व्यापक क्षति होती है, उसकी आसानी से भरपाई नहीं की जा सकती।  

बुधवार, 22 जून 2016

आर्थिक सुधारों की ओर !


 मौदी सरकार ने रक्षा और नागरिक उडडयन क्षेत्रों में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  (एफडीआई) की अनुमति देकर  शिथिल पडे आर्थिक सुधारों को गति देने का प्रयास किया है। सरकार के इस फैसले से “मेक इन इंडिया“ को भी बढावा मिल सकता है और सैन्य उपकरणों की टेकनॉलॉजी के भारत में आने से देश  में रोजगार के अवसर भी सृजित हो सकते हैं। लंबे समय से मंदी से पीडित देसी नागरिक उडडयन क्षेत्रों को वास्तव में निवेश  की दरकार है ओर इससे उन लो-फेयर केरियर एयरलाइंस को प्रत्यक्ष विदेश  निवेश  की संजीवनी बुटि मिल सकती है जो अस्तित्व में आने के बाद लगातार घाटे में चल रही है। शराब करोबारी विजय माल्या की किंगफिशर कंपनी के डूबने के बाद और माल्या द्वारा बेंकों का नौ हजार करोड रु का कर्ज नहीं चुकाने  पर वित्तीय सस्थाएं एयरलाइंस को कर्ज देने में आनाकानी कर रही हैं। बहरहाल, नागरिक उड्डयन क्षेत्र से कहीं ज्यादा प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  रक्षा क्षेत्र में आ सकता है। भारत दुनिया में रक्षा उपकरण खरीदने वाला दुनिया का सबसे बडा देश  है। हाल में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार इस समय भारत का रक्षा आयात चीन, पाकिस्तान और तेल की कमाई से लब्बालब सउदी अरब से भी तीन गुना ज्यादा है। स्टॉकहॉम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीटयुट का आकलन है कि भारत औसतन हर साल दुनिया के 15 फीसदी रक्षा उपकरण खरीदता है।  उसका रक्षा आयात 140 फीसदी बढ रहा है। 2005-2009 के दरम्यान जहां भारत का रक्षा आयात चीन से 23 फीसदी कम था, अब यह चीन से तीन गुना अधिक है।  अमेरिका  ने रक्षा उपकरण और हथियार बेच-बेच कर खूब कमाई की है। कहते हैं अपनी रक्षा उपकरणों के उधोग को फलते-फूलते रखने के लिए अमेरिका ने सालों तक कई देशॉ  को युद्ध की भठ्ठी में झोंका रखा और आज भी वही कर रहा है। पाकिस्तान अब भी अमेरिका के लडाकू एफ-सोलह जहाजों को सस्ते दामों (सब्सिडायज्ड) पर खरीदने के लिए मरा जा रहा है। भारतीय दबाव के कारण  अमेरिका इस बार पाकिस्तान को एफ-सोलह विमान नहीं बेच पाया है। अपने रक्षा उधोग के हितों की खातिर अमेरिका गरीब देशॉ  को सस्ते दामों पर रक्षा उपकरण बेचकर उन पर एहसान जताता रहा है।  मोदी सरकार ने रक्षा में सौ फीसदी एफडीआई की अनुमति देकर रक्षा उपकरणों के उत्पादन के विदेशी  द्धार खोल दिए हैं। मगर सरकार की हां भर से रक्षा उत्पादन में विदेशी  निवेश  और टेकनॉलॉजी ट्रांसफर होने से रहा।  रक्षा क्षेत्र में इस समय 49 फीसदी की अनुमति है मगर बहुत कम लोगों को मालूम है कि “ स्टेट ऑफ दी आर्ट टेकनॉलॉजी“ में पहले से सौ फीसदी एफडीआई को मंजूरी दी जा चुकी है। इसके बावजूद रक्षा क्षेत्र में  आज तक एक पैसे की “स्टेट ऑफ दी आर्ट टेकनॉलॉजी“ नहीं आ पाई है। इसकी वजह यह है कि सरकार आज तक यह स्पष्ट  नहीं कर पाई है कि  “स्टेट ऑफ दी आर्ट“ है क्या? मौजूदा सरकार को भी अभी  आधुनिक और प्रोन्नत टेकनॉलॉजी की स्पष्ट  व्याख्या करना है। जब तक  नीतिगत पहलुओं को स्पष्ट  नहीं किया जाता प्रत्यक्ष विदेशी  निवेश  नहीं आएगा। नीतिगत अस्पष्टता  की वजह से मोदी सरकार रक्षा क्षेत्र के लिए रखे गए लगभग 50 अरब डॉलर के बजट को खर्च  तक नहीं कर पाई है। निसंदेह, भारत में रक्षा तकनीक की कमी है और यही कारण है कि सरकार को इसे सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदशी  निवेश  के लिए खोलना पडा है। तथापि सौ फीसदी विदेशी निवेश  के लिए नियम और शर्तें किस तरह तय की जाएंगी, यह बात ज्यादा अहम है। सौ फीसदी एफडीआई का पूरा-पूरा फायदा लेने के लिए नियम और शर्तें पूरी तरह से भारत के पक्ष में होनी चाहिए। जब तक नियम और  शर्तें  स्पष्ट नहीं  हो जातीं, तब तक यह कहना मुश्किल  है कि एफडीआई के आने से टेकनॉलॉजी ट्रांसफर का कितना फायदा होगा और भारत के लोगों को कितना रोजगार मिलेगा। बहरहाल, सुखद पहल हुई है और इससे उम्मीद है कि सुधारों को गति मिलेगी।    

मंगलवार, 21 जून 2016

राजन की अमर्यादित विदाई



 भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर रधुराम राजन की असभ्य और अमर्यादित विदाई ने देश  को जता दिया है कि भद्र लोगों और स्वतंत्र सोच रखने वाले बुद्धिजीवियों के लिए " निहित  स्वार्थी“ मौजूदा परिवेश  में कोई जगह नहीं है। और भगवा पार्टी  के  शासन में  तो कतई नहीं।  गैर-भगवाधारी  भगवा पार्टी की  आंख की सबसे बडी किरकिरी माने जाते हैं। रघुराम राजन भी भगवा पार्टी के लिए बाहर के व्यक्ति थे और उनकी निष्पक्ष  एवं स्वतंत्र कार्यशैली भाजपाइयों को रास नहीं आ रही थी। इस सच्चाई के चलते रघुराम राजन का जाना तय था और राजन खुद मोदी सरकार के सत्ता मे आने के बाद से ही इस स्थिति के लिए पूरी तरह से तैयार भी थे । वैसे भी  जमाने का चलन है कि सामान्य बुद्धि वाले सियासतदान असाधारण प्रतिभा को कभी बर्दाश्त  नहीं करते हैं । रघुराम राजन 1991 के बाद आरबीआई के पहले ऐसे गवर्नर हैं जिन्हें दूसरी कार्यकाल नहीं दिया गया है। पिछले कुछ समय से जिस तरह भगवा पार्टी के लोग उनके पीछे पडे हुए थे, उससे साफ था कि राजन को चलता करने के लिए माहौल तैयार किया जा रहा है। भाजपा के बडबोले नेता सुब्रमण्यन स्वामी ही नही, भगवा पार्टी के और भी कई नेता राजन के पीछे हाथ धोकर पडे हुए थे और जाहिर यह सब  शीर्ष  नेताओ की सहमति से किया जा रहा था। यह बात नौसिखिया भी जानता है कि अगर उच्च पद पर आसीन भद्र व्यक्तित्व को सार्वजनिक तौर पर अपमानित किया जाए, तो उसके पास पद छोडने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता है। साफ-सुथरी छवि ही भद्र व्यक्ति की सबसे बडी पूंजी होती है। खुद को सबसे अधिक अनुशासित कहने वाली भाजपा का अनुशासन भी वाकई कमाल का है। पार्टी के वरिष्ठ  नेता सरेआम उच्च पद पर आसीन व्यक्तियों को भला-बुरा कहते रहते हैं मगर नेतृत्व चुपचाप तमाशा  देखता रहता है। आरबीआई देश  की प्रतिष्ठित्त  वित्त मंत्रालय से संबंधित स्वायत्त संस्था  है और इस नाते रघुराम के बवाव में आगे आना वित्त मंत्री अरुण जेटली का नैतिक दायित्व था। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। माना कि  शासक दल को किसी को नियुक्त करने अथवा हटाने का पूरा अधिकार होता है, मगर ऐसा मर्यादा में रहकर ही किया जाना चाहिए है। रघुराम राजन का कसूर यह है कि बतौर आरबीआई गवर्नर उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए गंभीरता से प्रयास किए, और सरकार की “हां में हां“ नहीं मिलाई। उनकी उच्च ब्याज दर वाली सख्त मौद्रिक नीति को लेकर अर्थशास्त्रियों में मतभेद हो सकते हैं मगर राजन की नीयत पर किसी को शक नहीं है। राजन ने बेलगाम और करप्शन  का पर्याय बने सरकारी बैंको पर नकेल डालने की भरपूर कोशिश  की और इसके सकारात्मक परिणाम भी दिखे। तथापि दलाल और निहित स्वार्थी सियासी नेता  राजन की कार्यशैली को पचा नहीं पाए और उनके पीछे पड गए। मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता के लिए भी राजन को ही बलि का बकरा बनाया गया है। संघ परिवार राजन की सख्त मौद्रिक नीति को महंगाई के लिए दोषी  मानता है। भाजपा मानती है कि महंगे कर्ज के कारण ही देश  में महंगाई बढी है जबकि सच यह है कि महंगाई के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार है। सस्ते तेल के बावजूद न तो भाडा कम हुआ और न ही फ्यूल की कीमतें। सस्ते तेल का अधिकतर  फायदा सरकार डकार गई। पिछले एक साल से जमाखोरी और कालाबाजारी के कारण दालों की कीमतें आसमान को छू रही हैं मगर सरकार ने कोई एहतियातन कदम नहीं उठाए। इन हालात में बाजार में और ज्यादा तरलता आने से कालाबाजारी और जमाखोरी और बढ जाती। कोई भी व्यक्ति किसी संस्था से बडा नहीं होता। गवर्नर आते-जाते रहेंगे।  रघुराम राजन खुद ऐसा कह रहे हैं। रिजर्व बैंक राजन के बगैर भी निर्बाध रुप से चलेता रहेगा मगर उनकी अमर्यादित विदाई आरबीआई को सालों तक अस्वस्थ बनाए रखेगी।

सोमवार, 20 जून 2016

पीपल्स फ्रेंडली कर अधिकारी !



देश  में कर अधिकारी का नाम सुनते ही बडे-बडों के भी पसीने छूट जाया करते हैं। इस पब्लिक अनफ्रेंडली छवि के लिए संबंधित कर विभाग खुद जिम्मेदार हैं। आम आदमी के साथ  शालीन एव भद्र सलूक अपनाने की बजाए नौकरशाही अक्सर “ रुखा और सख्त“ व्यवहार दिखाती है और कई मर्तबा तो अफसर सीधे मुंह बात तक नहीं करते। कर विभाग (आयकर, आबकारी, सीमा  शुल्क आदि)  की तो बात ही छोडिए, जनकल्याण से सीधा जुडा सिविल प्रशासन भी आम आदमी की परवाह नहीं करता है। भारत में नौकरशाही आज भी फिरंगी शासन की संस्कृति में सराबोर है। राजसी कार्यशैली, रहन-सहन, खान-पान और वैसी ही मानसिकता। निजी सहायक आम आदमी को बडे साहब से मिलने ही नही देगा। आजादी के सात दशक बाद भी भारत  “वेल्फेयर स्टेट“ की जगह “पुलिस स्टेट“ बना हुआ है।  आयकर विभाग को लेकर तो आम आदमी के मन में उत्पीडन अथवा परेशान करने वाली छवि बनी हुई है। उस पर “करप्शन “ ने इस छवि को और दागदार बना दिया है। इन सब बातों के मद्देनजर  प्रधानमंत्री नौकरशाही को “ आम आदमी“ फ्रेंडली बनाने की हर संभव कोशिश  कर रहे हैं। गत वीरवार को प्रधानमंत्री ने कर अधिकारियों को आम आदमी से “सीधे मुंह“ बात करने की नसीहत दी। प्रधानमंत्री ने “राजस्व ज्ञान संगम“ में  कर अधिकारियों के कान में रेपिड (आरएपीआईडी)- रेवेन्यू, अकांटिबिलिटी, प्रोबिटी, इंफॉर्मेशन एंड डिजीटलाईजेशन- का मंत्र फूंकते हुए कहा कि इसी से करदाता और करउगहाता के बीच की खाई पाटी जा सकती है। भारत में अभी भी करदाताओं का  दायरा काफी सीमित है और प्रधानमंत्री चाहते हैं कि जल्द ही यह दस करोड को पार कर जाना चाहिए। आयकर का दायरा बढेगा तो सरकार का राजस्व भी बढेगा। सवा सौ करोड  से ज्यादा आबादी वाले देश  में केवल एक फीसदी लोग आयकर अदा कर रहे हैं। अप्रैल माह में सेंट्रल बोर्ड  ऑफ डायरेक्ट टैक्सिस द्वारा जारी आंकडों के अनुसार 2012-13 के दौरान 2.87 करोड लोगों ने आईटी रिटर्न  भरा था मगर इनमें  1.62 करोड ने कोई कर नहीं चुकाया। इस तरह उस साल मात्र  1.25 करोड लोगों ने आयकर अदा किया। इन आंकडों से साफ होता है कि देश  में सिर्फ  सर्विस क्लास से जुडे लोग आयकर अदा कर रहे हैं। एक करोड से ज्यादा आयकर अदा करने वालों की तादाद 5430 के करीब है जबकि 2014 में जारी आंकडे बताते हैं कि भारत में 1.98 अरबपति हैं। इससे साफ है कि अधिकतर अरबपति भी माकूल आयकर नहीं चुका रहे हैं। मौजूदा भारतीय परिवेश  में आयकर दाताओं का दायरा बढाना आसान नहीं है । 18 से 58-60 साल तक की वर्किंग आबादी को ही आयकर के दायरे में लाया लाया जा सकता है। देश  में 15 से 59 साल की वर्किंग आबादी लगभग 480 मिलियन (48 करोड) के करीब है मगर इन सब को आयकर दाता की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता।  180 मिलियन लोग कृषि  से जुडे हैं और यह सेक्टर अभी आयकर दायरे से बाहर हैं। इसके अलावा 82 मिलियन कृषि  कामगार हैं और 18 मिलियन घरेलू कामगार। ये श्रेणियों भी  आयकर के दायरे से बाहर हैं। कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि 480 मिलियन की वर्किंग आबादी में 280 मिलियन आयकर के दायरे से ही बाहर है। इस तरह बाकी बचे  200 मिलियन पात्र लोगों मेंसे 58 फीसदी वर्किंग आबादी की कमाई रोजना दो रुपए से भी कम है। इसलिए यह  116 मिलियन आबादी भी आयकर से बाहर है। बच-बचाकर 84 मिलियन (8.40 करोड) वर्किंग आबादी आयकर के दायरे में आती है। इसमेंसे 2012-13 में 1.25 करोड आयकर दे रहे थे। इस स्थिति के दृष्टिगत  ज्यादा से ज्यादा से ज्यादा 7.15 करोड को ही कर दायरे में लाया जा सकता है। प्रधानमंत्री ने  करदाताओं को यही लक्ष्य दिया है। बहरहाल, आयकर अदा नही करने वाली वर्किंग आबादी को आयकर दायरे में लाने के साथ-साथ काले धन को बाहर निकालना सरकार के समक्ष बडी चुनौती है। मोदी सरकार इस चुनौतौ से कैसे निपटती है, जनमानस की इस पर नजर है। और इसके लिए कर अधिकारियों को “सेवक“ बनना पडेगा।

महंगाई का दानव

                          महंगाई का दानव

दाल-सब्जी की कीमतें आसमान छूने के बाद अततः मोदी सरकार की निद्रा टूटी और पिछले  बुधवार को कुछ औपचारिक फैसले लेकर दालों की कीमतों पर नियंत्रण पाने के लिए फौरी उपायों की घोषणा की गई। दालों की कीमतें तो अर्से से आसमान छू रही है और गरीब तो क्या निम्न मध्यम वर्ग  के बजट से भी बाहर हो गई है। मौसमी सब्जियां भी सस्ती होने की बजाय महंगी ही होती जा रहीं हैं। कभी टमाटर तो कभी प्याज रुला रहा है। देश  के लॉमेकर्स को तो जैसे सत्ता में आते ही जमीनी सच्चाई से कोई वास्ता नहीं रह जाता है। सरकार की ओर से उन्हें मोटी तनख्वाह, भत्ते और हर तरह की सुविधाएं मिलती है। उन्हें आयकर भी नहीं देना पडता। वातानुकुलित बंगलों में रहते भला आम आदमी की बदहाल जीवन का  कैेसे पता चल सकता है। मंगलवार को जब थोक मुद्रा-स्फीति के आंकडे आए, तब कहीं जाकर सरकार चेती। आंकडों में बताया गया है कि खाद्य वस्तुओं के दाम बढने से मई में थोक मुद्रा-स्फीति में  0.79 फीसदी का इजाफा हुआ और यह उछल कर इक्कीस माह के उच्च स्तर 5.78 फीसदी को छू रही है। मई में खाद्य वस्तुओं के दामों में  7.88 फीसदी का इजाफा हुआ। सबसे ज्यादा मई में सब्जियो के दाम 12.9 बढे और दूध-अंडे के दाम भी लगभग चार पफीसदी  बढे हैं। दालों की मुद्रास्फीति में 35.56 फीसदी वृद्धि हो रही है।  इन आंकडों के बाद सरकार को होश  आया कि दालों की कीमतें घटाने के लिए कुछ करना चाहिए। आनन-फानन में सरकार ने अरहर और उडद दाल की अधिकतम कीमत 120 रु कर दी। राज्यों के सरकारी बिक्रय केद्रों से अरहर और उडद इस भाव पर बिकेंगी। मगर बाकी दालें बाजार में उसी महंगे दामों पर बिका करेंगी। सरकार हर दाल को सस्ते दाम पर नहीं बेच सकती। बाजार में इस समय अधिकतर दालें दौ सौ रु किलो के परचून भाव में बेची जा रही है। हर आदमी सरकारी दुकान से दालें खरीदने से रहा। सरकारी दुकानों पर दो दालें कम दाम से बिकने पर भारत जैसे विशाल देश  में महंगाई पर लगाम लगाई जा सके, इस पर संदेह हो रहा है।  बाजार भाव सरकार की मर्जी से नहीं चलते और निजी दुकानदार घाटे वाले भाव पर दालें नहीं बेचेगा। इस मामले में जीवन रक्षक और इस तरह की दवाओं की मिसाल ली जा सकती है। सरकार जैसे ही दवाओं के दाम कम कर देती हैं, वे बाजार से गायब हो जाती है और उनकी जगह फिर महंगी वैकल्पिक दवाएं बाजार में आ जाती हैं। सरकार चुपचाप तमाशबीन बनी रहती है। पूंजीवादी और खुले बाजार का यही दस्तूर है। दाल-सब्जियों के मामले में भी यही हो रहा है। भारत दुनिया में दालों की पैदावार करने वाला सबसे बडा देश  है। हर साल, लगभग 18.5 मिलियन टन दालों का उत्पादन किया जाता है जबकि खपत लगभग  22 मिलियन टन की होती है। इस तरह, भारत को हर साल औसतन  3.5 मिलियन टन दालों का आयात करना पडता है। यह सिलसिला सालों से चल रहा है। अनुमान है कि पिछले कुछ महीनों से दाम आसमान छूने के कारण दालों की मांग में खासी गिरावट आई है। पिछले दो साल से लगातार सूखे के कारण दालो की पैदावार में कुछ गिरावट आई है मगर इतनी भी नहीं कि दालों के दाम आसमान को छूनेे लगे। विशेषज्ञों का आकलन है कि दालों की जमाखोरी और कालाबाजारी दालों के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि के प्रमुख कारण है। कांग्रेस समेत विपक्ष  का यह भी आरोप  है कि भाजपा सरकार के आते ही जमाखोरी और कालाबाजारी बढ जाती है क्योंकि अधिकतर व्यापारी पार्टी के कट्टर समर्थक हैं। एक जमाने में भाजपा की पूर्वज जनसंघ को “व्यापारियों “ की पार्टी माना जाता था। बहरहाल, दालों की कीमतों में गिरावट के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। दालों की मांग उतरोत्तर बढती जा रही है। इंडियन इंस्टीटयुट ऑफ  पल्सिस रिसर्च  के विजिन डाक्युमेंट अनुसार 2030 भारत में दालों की खपत बढ़कर  32 मिलियन टन तक पहुंच जाएगी और अगर तब तक इसी अनुपात में दालों की पैदावार नहीं बढती है तो कीमतों पर नियंत्रण पाना मुमकिन नहीं हो पाएगा। इसका एकमात्र विकल्प उच्च उपज वाली फसल है। सरकार को इस विकल्प पर जोर-शोर   से काम करना चाहिए।    

गुरुवार, 16 जून 2016

जीएसटी पर सहमति

मंगलवार को राजधानी दिल्ली में राज्यों के वित्त मंत्रियों से विस्तृत चर्चा के बाद केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेट्ली ने दावा किया है कि तमिल नाडु को छोडकर बाकी सभी राज्यों ने लंबे समय से संसद की धूल चाट रहे गुडस एंड सर्विसिस टैक्स को अविलंब लागू करने पर सहमति जताई है। राज्यों के वित्त मंत्रियों की सर्व अधिकार सपन्न (एम्पॉवर्ड  कमेटी) समिति की बैठक में 29 मेंसे 22 राज्य की मौजूदगी ही अपने आप में रिकॉर्ड है। इससे लगता है जीएसटी का रास्ता प्रशस्त हो गया है हालांकि अभी भी इसे कई अवरोधक लांघने है। वित्त मंत्री को उम्मीद है कि मॉनसून सत्र में जीएसटी बिल पारित हो जाएगा। संवैधानिक संशोधन बिल के पारित होने के बाद केद्र सरकार को संसद से जीएसटी बिल पारित कराना होगा। राज्यों को विधानसभा में जीएसटी बिल पारित करवाना होगा। जीएसटी लागू करवाने के लिए कम-से-कम पचास फीसदी विधानसभाओं की मंजूरी संवैधानिक तौर पर अनिवार्य  है। इसमें खासा समय लग सकता है। जीएसटी सभी के हित में है, यह जानते हुए भी राज्य और सियासी दल, इसे पारित होने नहीं दे रहे हैं। सबसे बडा अवरोधक कांग्रेस ने खडा कर रखा है। कांग्रेस जीएसटी बिल में सीलिंग (अधिकतम सीमा) की संवैधानिक व्यवस्था चाहती है। कांग्रेस इस सीमा को 18 फीसदी निर्धारित करने के पक्ष में है। सरकार ने इसे मान भी लिया है मगर अधिकांश  राज्य जीएसटी की अधिकतम सीमा के पक्ष में नहीं है। करीब-करीब सभी राज्य मानते है कि  आने वाले समय में इसे बढाने की जरुरत पड सकती है। पहले जीएसटी में इंटर-स्टेट गुडस और सर्विसिस पर एक फीसदी कर लगाने का प्रस्ताव था। उधोग और व्यापार जगत इसका मुखर विरोध कर रहा था। कांग्रेस भी इस कर को निरस्त करने के पक्ष में थी। सरकार ने इसे वापस ले लिया। कांग्रेस जीसटी मामलों के निपटान के लिए स्वायत्त व्यवस्था की भी पैरवी कर रही थी। यह भी मॉडल  बिल में समाहित है। कांग्रेस हालांकि अभी भी पूरी तरह से संतुष्ट  नहीं है मगर इस मामले में वह अलग-थलग पड चुकी है और उसके पास जीएसटी बिल पर सरकार का साथ देने के सिवा कोई चारा नहीं है। और अगर कांग्रेस अब भी विरोध पर अडी रही, तो यही माना जाएगा कि पार्टी जीएसटी का विरोध मुद्दों पर नहीं, सिर्फ सरकार का विरोध करने के लिए कर रही है। बहरहाल, तमिल नाडु अभी भी अपनी बात पर अडा हुआ है। तमिल नाडु  को आशंका है कि जीएसटी के लागू होने से राज्य को खासा वित्तीय नुकसान होगा। इसके अलावा तमिल नाडु को “वित्तीय स्वायतता“ के खो जाने का भी डर है। जीएसटी की पूरी व्यवस्था केन्द्र सरकार के हाथ मे होगी। इसी भय के चलते  संवेदनषील मुद्दों पर अभी तक सहमति नहीं बन पाई है। इनमें जीएसटी के तहत रेवेन्यू न्यूट्रल रेट  सबसे अहम मुददा है। सभी राज्य चाहते हैं कि जीएसटी के लागू होने के बाद उन्हें किसी तरह का राजस्व नुकसान नहीं होना चाहिए। वित्त मंत्री ने राज्यो को आश्वत  किया है कि सरकार इस बात का पूरा ख्याल रखेगी मगर राज्य इस पर वैधानिक व्यवस्था चाहते हैं। व्यापारियों के लिए दोहरे कंट्रोल का मामला अभी भी सुलझा नहीं है। जीएसटी के तहत बिजनेसमैन को सेंट्रल और स्टेट दोनों जगह रिटर्न फाइल करनी पडेगी। जुलाई में होने वाली वित्त मंत्रियों की एम्पावर्डक कमेटी की बैठक में  इन मुद्दों का तोड निकाला जा सकता है। मंगलवार को मॉडल जीएसटी पर सहमति बनना बैठक की बडी उपलब्धि है। इसके तहत टैक्स उस जगह लगेगा, जहां गुडस या सर्विस की प्रथम ट्रांजैक्शन  होगी। इससे स्थिति स्पष्ट  हो गई है। मॉडल जीएसटी कानून में नियमों का उल्लघंन करने पर पांच साल की कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान है। टैक्स चुकाने के पात्र व्यक्ति अथवा कारोबारी को खुद देय टैक्स का आकलन और रिटर्न भरना होगा। वार्षिक  दस लाख से ज्यादा कारोबार करने पर ही जीएसटी चुकाना होगा। सिक्किम और पूर्वोतर राज्यों के लिए यह सीमा पांच लाख है।  उपभीक्ताओं के लिए अलग से कोष  बनेगा। मॉडल  कानून में और भी कई अच्छी बाते हैं। बहरहाल, यह स्थिति बेहद सुखद है कि जीएसटी पर धीरे-धीरे ही सही मगर राज्यों और केन्द्र में अधिकतर मामलों में सहमति बन रही है। इस साल जीएसटी भले ही लागू नहीं हो पाए मगर अगले साल इसके लागू होने की उम्मीद की जा सकती है।

बुधवार, 15 जून 2016

हिल गई दुनिया

                                                                            हिल गई दुनिया

अमेरिका समेत बडी न्यूक्लिर ताकतें अपनी पहुंच और सैन्य शक्ति की  कितनी भी  शेघी बघार लें, पर दुनिया के खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने फिर उन्हें हिलाकर रख दिया है। अमेरिका के फ्लोरिडा प्रांत के ओरलेंडों शहर में समलैंगिक नाइटक्लब में इस्लामिक स्टेट से संबंध हमलावर ने देखते-देखते 50 लोगों का नरसंहार कर डाला और  53 को गंभीर रुप से जख्मी कर दिया। हमलावर चार घंटे तक मौत का तांडव करता रहा।  ओरलेंडों पुलिस को घटनास्थल तक पहुंचने में चार घंटे लग गए। अमेरिका के इतिहास में 9/11 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के बाद यह दूसरा बडा घातक हमला था । इस हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। रुस से लेकर ब्राजील तक और इग्लैंड और यूरोप से लेकर अफ्गानिस्तान और पाकिस्तान तक हर देश  मे इस नृशंष  कृत्य की भर्त्सना की जा रही है। इस्लामिक स्टेट हमले की जिम्मेदारी लेते हुए इतरा रहा है। हाल ही में इस्लामिक स्टेट से जुडी एक हैकर साइट पर आईएस ने 8,318 नामों की किल  (मार गिराओ) लिस्ट जारी की थी जिसमें 8000 अमेरिकियों को भी “टारगेट“ बताया गया था। इससे पहले मार्च माह में आईएस ने 39 पेज  की सूची जारी की थी जिसमें न्यू जर्सी के कई सीनियर पुलिस  अधिकारियों का नाम  था। अब तक यही माना जा रहा था कि इस्लामिक स्टेट अपना खौफ फैलाने के लिए यह सब कर रहा है मगर पहले पेरिस, फिर बेल्जियम और यूरोपियन यूनियन की राजधानी ब्रसल्स और अब अमेरिका के  ओरलेंडो हमलों ने जता दिया है कि इस्लमिक स्टेट से जुडे आतंकी दुनिया में मौत का तांडव करने पर आमादा है। फ्रांस, बेल्जियम और अमेरिका के हमलों में सबसे बडी समानता यह है कि हमलावर स्थानीय थे। और यही स्थिति अमेरिका और यूरोप के लिए खतरनाक है। अमेरिका और यूरोप बहु नस्लीय (मल्टी-रेसियल) समाज  हैं और इन देशों  के रूढिवादी (कंजरवेटिव) इस नीति का मुखर विरोध भी कर रहे हैं। इस सच्चाई के चलते अमेरिका, फ्रांस और आस्ट्रिया में   रूढिवादी राजनीतिक दल अथवा विचारधारा उतरोत्तर प्रगतिशील  दलों पर भारी पडते जा रहे हैं। फ्रांस में मरीन ली पेन और उनकी कंजरवेटिव पार्टी नेशनल फ्रंट राष्ट्रपति  फ्रांकोइस ओलांदे की सोशलिस्ट पार्टी पर भारी पडती जा रही है। हाल ही में कराए गए सर्वे में बताया गया है कि ली पेन तेजी से लोकप्रियता में आगे बढ रही है और 2017 को होने वाले  राष्ट्रपति चुनाव  में सत्तारुढ दल   सोशलिस्ट पार्टी को कडी चुनौती पेश  कर सकती है। आस्ट्रिया में इस साल मई में सपन्न हुए  राष्ट्रपति  चुनाव में ग्रीन समर्थित निर्दलीय  अलेक्जेंडर वान डेर बमुश्किल  अति दक्षिणपंथी नॉर्बर्ट हॉफर को  हरा पाए । और अब अमेरिका के राष्ट्रपति  चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर है। ग्रांड ओल्ड (जीओपी) रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप डेमोक्रटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को कडी चुनौती दे रहे हैं। अमेरिका में नवंबर में राष्ट्रपति  चुनाव होने हैं। ट्रंप ने अपने प्राइमरी चुनाव के दौरान मुसलमानों के खिलाफ आग उगली है और वे बार-बार कह रहे हैं कि अमेरिका में आतंक फैलाने में स्थानीय मुसलमानों का बहुत बडा हाथ है।  इस बात को लेकर ट्रंप श्वेतों  से मुसलमानों की अमेरिका में एंट्री पर प्रतिबंध लगाने का वायदा भी कर चुके हैं।   ओरलेंडो हमले के बाद डोनाल्ड ट्रंप का मुस्लिम विरोध और तल्ख हो गया है और उन्होंने बराक ओबामा को भी इस बात के लिए आडे हाथ लिया है कि  राष्ट्रपति  ने मुसलमानों को दोषी  नहीं ठहराया। ट्रंप के मुस्लिम विरोधी स्टैंड के कारण अमेरिका में मुसलमानों के खिलाफ नस्लीय हिंसा में खासा इजाफा हुआ हैं। जार्जटाउन यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर क्रिस्चियन  एंड मुस्लिम अंडरस्टैडिंग के अध्ययन मुताबिक  2015 में ट्रंप के  रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी दौड में  शामिल होते ही मुसलमानों के प्रति नस्लीय अपराधों में 20 से 30 फीसदी का इजाफा हुआ है । अकेले दिसंबर  2015 में मुसलमानों पर 53 हमले हुए हैं।  2015 में  12 हत्याओं के साथ मुसलमानों पर  174 हमले हुए थे। अमेरिकी समाज भारत की अपेक्षा ज्यादा सहिष्णु  माना जाता है मगर जिस तरह भारत में भगवा पार्टी के नेताओं की मुस्लिम विरोधी बातों से देश  में असहिष्णुता  बढी है, उसी तरह  ट्रंप के  राष्ट्रपति  चुनाव में उतरने और उनकी मुस्लिम विरोधी बातों  से अमेरिकी समाज भी उतरोतर असहिष्णु  होता जा रहा है। और  ओरलेंडो  जैसे हमले असहिष्णुता को  बढाने में मदद करते हैं।

Its Now Central Board For Film Certification Not Censorship, Then Why Block Creativity ?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने सेंसर बोर्ड  (सेंटरल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) को उसकी औकात दिखा दी है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सेंसर बोर्ड  का काम फिल्मों की काट-छांट करना नहीं, बल्कि उन्हें प्रमाणित करना है। न्यायपालिका ने यह व्यवस्था पंजाब की ज्वंलत समस्या नशाखोरी पर बनाई गई बालीवुड फिल्म “उडता पंजाब“ में सेंसर द्वारां  मनमानी कैंची चलाने पर दी है। सेंसर बोर्ड ने पहले 89 कट लगाकर फिल्म का करीब-करीब सत्यानाश  कर दिया था। बवाल उठने पर सेंसर बोर्ड  89 कट की जगह  13 पर सहमत हो गया मगर  बॉम्बे हाई कोर्ट  ने सिर्फ  एक सीन पर कट की अनुमति देकर फिल्म को तय समय पर रिलीज होने की अनुमति दे दी। हाई कोर्ट  ने   सेंटरल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेषन को 48 घंटों के भीतर निर्माता अनुराग कश्यप  को नया सर्टिफिकेट जारी करने के निर्देश  दिए हैं। फिल्म 17 जून को रिलीज होनी है। लेकिन अभी भी फिल्म के रिलीज होने पर अनिश्चितता   के बादल मंडरा रहे हैं। पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में इस फिल्म के प्रदर्शन  पर रोक के मामले की सुनवाई चल रही है और 16 जून को अगली सुनवाई होनी है। बहरहाल, “उडता पंजाब“ पर सेंसर बोर्ड की कैंची को लेकर देश  में “क्रिएटिविटी“ को लेकर फिर बहस-मुहासिब  शुरु हो गई है। अमूमन, सेंटरल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेषन (सेंसर बोर्ड) का मुखिया फिल्म जगत से जुडा होता है।  इस बात के मद्देनजर  बोर्ड  से उम्मीद की जाती है कि वह निष्पक्ष  और स्वतंत्र तौर पर काम करे और फिल्म निर्माताओं की समस्याओं को समझे। बोर्ड  के मौजूदा अध्यक्ष पहजाल निहलानी खुद भी फिल्म निर्माता है मगर उन्होंने निष्पक्ष  पर काम करने की बजाए खुद को प्रधानमंत्री का “चमचा“ साबित करने में अपना और देश  का समय जाया किया हैं। देश  के प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री को किसी “चमचे“ या भक्त की जरुरत नहीं है, केन्द्रीय संचार मंत्री रवि संचार मंत्री रवि शंकर प्रसाद को यह कहते हुए निहलानी को फटकार लगानी पडी है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती कि “उडता पंजाब“ के मामले में मोदी सरकार की खासी किरकिरी हुई है। जिस तरह से सेंसर बोर्ड  ने फिल्म पर कैंची चलाने का प्रयास किया है, उससे साफ है कि इसके पीछे संसरशिप  का मकसद कम, राजनीतिक स्वार्थ कहीं ज्यादा रहे हैं। पंजाब में अगले साल के शुरु में विधानसभा चुनाव होने हैं और “उडता पंजाब“ में ड्रग को लेकर सियासी दलों और निहित स्वार्थी तत्वों की कलई खोली गई है। विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले इस फिल्म का रिलीज होना सत्तारूढ गठबंधन शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के लिए शुभ नहीं माना जा रहा है। पंजाब में पिछले दस साल से अकाली दल-भाजपा सरकार सत्ता में है और आंकडे इस बात के गवाह हैं कि इस दौरान राज्य में ड्रग का अवैध कारोबार भरपूर फला-फूला है। “उडता पंजाब” पर सेंसर के बेतहाशा  कट के पीछे असली वजह भी यही है। देश  के सियासी दलों की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। विपक्ष में रहते सियासी दल जिन बातों के लिए सत्तारूढ दल को कोसा करते हैं, सत्ता में आते ही वही करते हैं। भारत में फिल्मों के सेंसरशिप का इतिहास बहुत पुराना नही है। 1921 में पहली बार फिरंगी  शासन ने “भक्त विदूर“ पर कैंची चलाई थी क्योंकि फिल्म के पात्र महात्मा गांधी से काफी मिलते-जुलते थे। तत्कालीन फिरंगी शासक महात्मा गांधी से जुडे किसी भी मामले को सहन नहीं करते थे।  सत्तहर के दशक में आपातकाल के दौरान फिल्म “ किस्सा कुर्सी का “ पर सेंसर बोर्ड की कैंची चलने पर तत्काकालीन जनसंघ (भाजपा की पूर्वज) के नेताओं ने खूब हंगामा किया था। 1981 में फिल्म “मेरी आवाज सुनो“ को प्रदर्शित  नहीं होने दिया गया। 1994 में फूलन देवी पर आधारित “बैंडिट क्वीन“ भी न्यायपालिका के दखल से ही  रिलीज हो पाई थी । और भी कई  फिल्में हैं जिन पर खासा विवाद रहा है मगर “किस्सा कुर्सी का“ को छोडकर इन सब फिल्मों की सेंसरशिप  में राजनीतिक स्वार्थ नहीं था। “उडता पंजाब“ में राजनीतिक स्वार्थ है और बोर्ड अध्यक्ष निहलानी ने अपने कथन से यह स्पष्ट  भी कर दिया है। बहरहाल, क्रिएटिविटी पर प्रहार देश  हित में नहीं है। बॉम्बे  हाई कोर्ट  ने भी साफ  तौर पर कहा है, “ जब तक क्रिएटिविटी फ्रीडम का दुरुपयोग न हो, किसी हस्तक्षेप की जरुरत नहीं है। सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेश न का काम फिल्मों को सर्टिफिकेट जारी करना है, कैंची चलाना नहीं है।

सोमवार, 13 जून 2016

Why Are We So Cruel Towards Animals?



बिहार में  अढाई सौ से भी अधिक नीलगायों की हत्या को लेकर केद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी  की चिंता वाजिब है। मेनका ने केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश   जावेडकर को चिठ्ठी लिखकर इस बात पर गहरा खेद जताया है कि उनके मंत्रालय को जानवरों को मारने की मानो जैसे हवस सी है। घोर एनिमल्स  प्रेमी केन्द्रीय मंत्री को इस बात का भी दुख है कि बिहार में लगभग 250 नीलगायों की हत्या आजादी के बाद का सबसे बडा संहार है  और यह कृत्य गौ माता“ की रक्षा करने को प्रतिबध भाजपा सरकार की देख-रेख में हुआ है।  बिहार सरकार को इतने बडे पैमाने पर “नीलगायों“ की हत्या करने की अनुमति चुटकियों में दे दी गई मानो जैसे संबंधित मंत्रालय को इस बात से कोई सरोकार न हो कि सरकार रक्षक होती है, भक्षक नहीं।   बिहार सरकार ने “नीलगाय“ को नुकसानदेह जानवर घोषित  कर रखा है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश  जावेडकर के  इस स्पष्टीकरण   में कोई वजन  नहीं है क्योंकि बिहार सरकार ने नीलगायों का संहार करने की अनुमति  मांगी थी, उनके मंत्रालय ने बगैर टोका-टोकी के फौरन दे दी। जंगलो में आग लगने की वजह से जंगली जानवर आहार की तलाश  में खेतों और खलिहानों की ओर आकर्षित  होते हैं। गर्मियों में अक्सर जंगलों में भीषण आग लग जाती है। जंगलों को आग से बचाना सरकार की जिम्मेदारी है। मेनका ने पर्यावरण मंत्रालय की इस कार्रवाई पर भी अफसोस जताया है कि जंगली जानवरों को मारने में यह मंत्रालय भी न केवल शामिल है, बल्कि लीड रोल में है। यह बात भी चिंताजनक है कि केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय राज्यों से पूछ रहा है कि किस जानवर को मारा जाए, किसे नहीं। मंत्रालय बंगाल में हाथियों को मारने की सलाह दे रहा है। गोवा में मोर मारे जा रहे हैं। मंत्रालय नीलगायों को मारने की खुली अनुमति दे रहा है । और-तो-और हिमाचल में हिंदुओं के “हनुमान“ बंदरों को मारने के निर्देश  जारी किए गए हैं। इन सब बातों से न केवल मेनका गांधी, बल्कि अन्य पशु -प्रेमी भी बेहद आहत हैं। सरकार का काम जानवरों को मारना नहीं, अलबत्ता उनका संरक्षण करना है।   नीलगाय झुंडों में आकर फसलें चटकर जाती हैं, इसलिए किसान उन्हें नापंसद करते हैं। मगर फसलों को गाय जैसे अन्य दुधारु पशु  भी नुकसान पहुंचाते हैं। तो क्या उनका भी संहार कर दिया जाए?   समकालीन भारत में नीलगाय भले ही गौमाता जैसी पूज्यनीय न हो मगर वैदिक काल में इसे पूज्यनीय माना जाता था और उसकी पूजा की जाती थी। मुगल काल में जब तत्कालीन शासकों द्वारा नीलगायों का  शिकार किए जाता,  हिन्दू उनकी रक्षा किए करते थे। बहरहाल, देश  का कानून साफ-साफ कहता है कि देश  के हर नागरिक को जानवरों के प्रति स्नेह रखना चाहिए, क्रुरता नहीं। संविधान के अनुच्छेदे 51(ए) में यह व्यवस्था है। भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों  में  शुमार है , जहा पशु -पक्षियों के संरक्षण के लिए आला दर्जे का कानून है। जंगली अथवा आवारा पशु  को मारना अथवा उसे नुकसान पहुंचाना भी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा (सेक्शन ) 428 तथा 429 के तहत दंडनीय अपराध है। पालतु पशु  अथवा पक्षी को मरने के लिए त्यागना भी दंडनीय अपराध है। कुत्तो को उनकी पंसदीदा जगह से अन्यत्र ले जाना भी अपराध है। और-तो-और पालतु पशु -पक्षी को भूखे-प्यासे रखना अथवा उसे लंबे समय तक कैद रखना भी पीसी एक्ट 1960 की धारा 11(1)(एच) के तहत दंडनीय अपराध है। बंदर, भालु, शेर जैसे जानवरों को प्रशिक्षित करके उनका मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करना भी प्रतिबंधित है। पशु  बलि भी प्रतिबंधित है। पशु -पक्षी संरक्षण के वास्ते और भी कई कानून है। पर इतना सब होने के बावजूद देश  में कानून की धज्जियां उडाने की रिवायत है। ताजा प्रकरण में सरकार खुद नीलगाय का संहार करके कानून का मजाक उडा रही है। एक ओर देश  में खूंखार टाइगर को बचाने के लिए विशेष  प्रयास किए जाते है, तो दूसरी ओर नीलगाय का संहार किया जाता है। यह कहां का इंसाफ है? सरकार को यह बताने की जरुरत नहीं है कि जानवरों को मारना अगर कानूनन अपराध है, तो बिहार में नीलगायों का संहार करने के लिए राज्य से ज्यादा केद्र सरकार अपराधी है। देश  केन्द्रीय मंत्री मेनका गांधी का आभारी है कि उन्होंने एक ज्वलंत समस्या को उठाया है। इसका सर्वमान्य हल निकाला जाना चाहिए।          

शुक्रवार, 10 जून 2016

मोदी को अमेरिकी सलाम

कहते हैं समय किसी के वश  में नहीं होता है और न ही किसी के साथ चलता है। आज बुरा समय है तो कल अच्छा जरुर आएगा। यही नियति का कालचक्र है। जुम्मा-जुम्मा तीन साल पहले तक जिस नरेन्द्र मोदी को अमेरिकी “सांप्रदायिकता“ के लिए “अछूत“ मानकर वीजा देने से साफ मुकरा करते थे, उसी मोदी को अमेरिका के लॉमेकर्स  ने बुधवार को सर-आंखों पर बिठाया। सांसदों में भारतीय प्रधानमंत्री का आँटोग्राफ लेनेे के लिए होड लगी रही। हाउस ऑफ रिपरेजेन्टेटिवस के स्पीकर पॉल रयान ने  प्रधानमंत्री मोदी को उनकी अमेरिकी यात्रा के दौरान कांग्रेस को संबोधित करने का खास न्योता दिया था। मोदी अमेरिकी के संयुक्त सदन को संबोधित करने वाले छठे प्रधानमंत्री हैं। उनसे पहले जवाहर लाल नेहरु, राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह भी अमेरिकी लॉमेकर्स  को संबोधित कर चुके हैं। 1929-1931 के बाद पहली बार  हाउस ऑफ रिपरेजेन्टेटिवस की  247 और सीनेट की 54 सीटों के साथ  रिपब्लिकन पार्टी का कांग्रेस में बहुमत है। और इस बहुमत के बूते  रिपब्लिकनस ने राष्ट्रपति  बराक ओबामा की नींद हरा कर रखी है। बहरहाल्ल, अमेरिकी सांसदों ने प्रधानमंत्री को धैर्य  से सुना और उनके हर फिकरे का तालियां बजाकर अभिनंदन किया। अपने खास मेहमान की मेहमानवाजी कैसे की जाए,  अमेरिकी यह बात बखूबी जानते हैं। प्रधानमंत्री का संबोधन भी एकदम अमेरिकियों की उदारवादी एवं खुली सोच के माफिक था। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इब्राहिम लिंकन से महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग से  भीमराव अम्बेडकर और वाल्ट व्हिटमैन से स्वामी विवेकानंद के आदर्शो  का उद्धरण करते हुए भारत और अमेरिका के बीच की समानताओं का ऐसा खाका खींचा कि अमेरिकी लॉमेकर्स भी यह कहते-कहते रह गए “ क्या बात है“। भारत की तरह अमेरिका भी दुनिया का विषालतम लोकतांत्रिक देश  है। और दुनिया में बहुत कम ऐसे देश  है, जिनसे भारतीय लोकतंत्र की सानी की जा सकती है। अमेरिका उन में से एक है और इसी सच्चाई के मद्देनजर  प्रधानमॅत्री अमेरिका से घनिष्टतम  संबंध चाहते हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन और अमेरिकी सांसदों की सकारात्मक प्रतिक्रियाएं साफ-साफ  कहती हैं कि भारत की तरह अमेरिकी भी दुनिया की दो बडी लोकतांत्रिक ताकतों के बीच हर क्षेत्र में मजबूत और स्थायी सहयोग चाहते हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन का यही लब्बोलुआब भी था। निसंदेह, मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत के अमेरिका से संबंध और घनिष्ठ  हुए हैं। इसके सकारात्मक नतीजे भी सामने आ रहे हैं।  न्यूक्लियर सप्लायर्स  ग्रुप (एनएसजी ) में भारत को एंट्री दिलाने के लिए अमेरिका एडी-चोटी का जोर लगा रहा है। अमेरिका भारत से हर तरह से सहयोग कर भी रहा है और पाकिस्तान को भारत से संबंध सुधारने की बराबर नसीहत दे रहा है। शीत युद्ध के जमाने में जिस तरह अमेरिका पाकिस्तान क साथ हर मुकाम पर खडा हो जाता था, वही स्थिति आज भारत की है।  चीन के कडे विरोध के बावजूद अमेरिका भारत के लिए दुनिया भर में समर्थन जुटा रहा है। इससे पाकिस्तान को खासी तकलीफ हो रही है। अमेरिका से निकटता के कारण ही स्विटजरलैंड और मेक्सिको ने भारत को  न्यूक्लियर सप्लायर्स  गु्रप (एनएसजी) में एंट्री दिलाने के लिए समर्थन का आश्वाशन  दिया है। अमेरिका से मेक्सिको पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी को मेक्सिको के राष्ट्रपति  एन्रिके पेन्या नियेतो ने भी एएसजी मामले में भरपूर समर्थन का वायदा किया है। 48 देशों  के एनएसजी में अब चीन के अलावा आस्ट्रिया, दक्षिण अफ्रीका, न्यूजीलैंड, आयरलैंड और टर्की ही भारत की एंट्री का विरोध कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी की अमेरिकी यात्रा बेहद सफल रही है। इस यात्रा से भारत का मान और सम्मान बढा है। इसका सबसे बडा प्रमाण पाकिस्तानी अखबारों की चिंता है। पाकिस्तान मीडिया ने मोदी की ताजा यात्रा को सुर्खियों में प्रकाशित करते हुए प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को इस यात्रा का तोड निकालने की सलाह दी है। अगर दुश्मन   यात्रा से घबराए तो इसकी सफलता पर शक  की कोई गुजाइंश  नहीं रह जाती है।

गुरुवार, 9 जून 2016

India Untold Story: Rich Getting More Richer....

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रिजर्व  बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने इस बार कर्ज सस्ता करने की बजाए व्याज दरों को यथावत रखकर मुद्रा स्फीति नियंत्रण पर फोकस किया है। राजन का तर्क  है कि रिटेल इंफ्लेशन अभी भी निर्धारित सीमा से कहीं ज्यादा है और  जब तक यह नियंत्रण में नहीं आ जाता, ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद नहीं की जा सकती। और अगर कटौती की भी जाती है, देश  में “बनिया“ मानसिकता वाले बैंक सस्ते ब्याज का लाभ आम ग्राहक को पास ऑन करने की बजाए  अपना मुनाफा बढाने में इस्तेमाल करेगें। मंगलवार को अपनी ताजा मौद्रिक नीति जारी करते हुए आरबीआई ने रेपो-रेट को 6.5 फीसदी पर यथावत रखा है। यह पांच साल के निम्न स्तर पर है। पिछले करीब डेढ साल में  रघुराम राजन ब्याज में 1.5 फीसदी की कटौती कर चुके हैं मगर देश  के अधिकांश  बैंक इस राहत को खुद ही हजम कर गए  हैं।   होम लोन्स  के कर्जदारों को  बमुश्किल  आधा (0.50) फीसदी ब्याज की राहत देते हुए भी बैंकों  के  हाथ-पांव फूल गए हैं। बाकी 1 फीसदी ब्याज सरकारी बैंकों समेत अधिकांश  बैंक खुद डकार गए हैं। और उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं है। रेपो रेट के बढाए जाने से बैंक ब्याज बढाने में एक दिन का भी समय नहीं लगाते हैं मगर रेपो रेट कम किए जाने की सूरत में उन्हें सांप सूंघ जाता है। अनुमान है कि पांच साल पहले के फ्लोटिंग ब्याज दरों पर होम लोन्स के ग्राहकों की जो ईएआई थी, वही आज लगभग सालाना 36,000 रु ज्यादा है। और बैंक ग्राहकों को राहत देने की बजाए उनसे सालाना इतनी रकम लूट रहे हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की यही सबसे बडी नीतिगत विफलता है। राजन जमीनी सच्चाई की लिखावट को पढ नहीं पाए और मुद्रा स्फीति पर अधिकतर हवा में तीर मारते रहे हैं। भाजपा के वरिष्ठ  नेता और अर्थशास्त्री डाक्टर सुब्रमनयम स्वामी के इन आरोपों में वजन है कि खालिस देसी होते हुए भी राजन आम आदमी की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाए। उनकी मानसिकता उनके  अमेरिकी ग्रीन कार्ड  जैसी ही है।   महंगाई से जूझ रहे आम आदमी के लिए होम लोन में मामूली राहत भी मायने रखती है। तेल की कीमतों में अत्याधिक गिरावट के बावजूद न तो खाद्यान्न महंगाई कम हुई और न ही कर्ज सस्ता हुआ। सस्ते तेल का पूरा-पूरा फायदा सरकार ने अपनी जेब भर कर बटोर लिया और सस्ते कर्ज (रेपो रेट) का फायदा बेंकों ने डकार लिया। मोदी सरकार के राज में आम आदमी बेचारा इस उम्मीद में  जीता रहा कि आज नहीं तो कल कर्ज सस्ता होगा ही क्योंकि प्रधानमंत्री ने अच्छे दिन लाने का वायदा कर रखा है। रघुराम राजन के कार्यकाल के तीन साल बीत गए मगर न तो खाद्य महंगाई कम हुई है और न ही होम लोन की ईएमआई। इस सितंबर में बतौर रिजर्व बैंक गवर्नर राजन का तीन साल का कार्यकाल पूरा हो रहा है। आम ग्राहक को इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि रघुराम राजन की नीतियों से मुद्रा-स्फीति कम हुई है और सुस्त पडी अर्थव्यवस्था ने रफ्तार पकडी है। पहले की अपेक्षा स्टॉक मार्केट गुलजार हुई है और देश  की क्रेडिट रेटिंग सुधरी है। उसके लिए यह सब किताबी बातें हैं। आम आदमी सिर्फ  यह जानना चाहता है कि खाद्य महंगाई कितनी कम हुई है, उसकी क्रय शक्ति (परचेजिंग पॉवर) कितनी बढी है और उसकी जरुरतों को पूरा करने के लिए कर्ज  कितना सस्ता है। और इन सब बातों का सीधा-सीधा सरोकार रिजर्व  बैंक से है। महंगाई को कम करना आरबीआई की नीतिगत जिम्मेदारी है। आरबीआई ही मार्केट में लिक्वडिटी को नियंत्रित करता है। ब्याज दरें भी वही तय करता है। महंगाई बढाने-घटाने में इन दोनों का प्रमुख योगदान रहता है। हाल ही में जारी रैकिंग के अनुसार भारत को अब वर्ल्ड बैंक ने  विकासशील देश  से हटाकर लोअर मिडल इंकम (गरीब) देशों  की श्रेणी में  शुमार किया है। यानी भारत का स्तर गिरा है, उठा नहीं है। इसका यही अर्थ निकलता है कि भारत में गरीबी बढी है, कम नहीं हुई है। यानी समान विकास की बजाय पक्षपाती तरक्की हुई है। अमीर और ज्यादा अमीर हुआ है और गरीब, गरीबतम होता गया। आजादी के सात दशक बाद यह स्थिति बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। गरीब देश  में अगर कर्ज  महंगा होगा, तो कैसे होगा समान विकास? देश  को आगे बढाना है तो कर्ज सस्ता करना ही होगा।

बुधवार, 8 जून 2016

No Chance For India To Get Into NSG

   
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मौदी की तीन दिवसीय अमेरिका यात्रा के ऐन वक्त पर चीन ने भारत की  न्युक्लियर  सप्लायर्स गु्रप  (एनएसजी) में एंट्री पर फिर अडंगा अडा दिया है। भारत एनएसजी में एंट्री पाने के लिए दुनिया भर में समर्थन जुटा रहा है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री मोदी अचानक स्विट्जरलैंड पहुंचे और एनएसजी पर इस देश  का समर्थन हासिल करने में कामयाब रहे।  स्विट्जरलैंड  और आस्ट्रिया अब तक भारत को एनएसजी में   शामिल करने के खिलाफ रहे हैं।  स्विट्जरलैंड का समर्थन जुटाने के बाद भारत को अमेरिकी के सहयोग से चीन को मनाने की उम्मीद थी मगर अमेरिका फिर काइंया बिजनेसमैन निकला।  बीजिंग में चल रहे अमेरीकी-चीनी स्ट्रेटेजिक एंड इकनॉमिक डायलॉग के दौरान ओबामा के नुमाइदों ने चीन से बहुत कुछ ले लिया सिवा भारत के लिए एनएसजी में चीनी समर्थन। जैसी अपेक्षा थी, चीन ने इस बार भी अपने अनन्य मित्र पाकिस्तान की ही भाषा  बोली। पाकिस्तान को इन दिनों भारत के “दौरे“ पड रहे हैं। प्रधानमंत्री जब कभी विदेशी  यात्रा पर जाते हैं, पाकिस्तान के हाथ-पांव फूल जाते हैं। भारत का  न्युक्लियर सप्लायर्स  ग्रुप  में शरीक होने से पाकिस्तान कि गहरा आघात लगना स्वभाविक है। भारत के अलावा पाकिस्तान ने भी परमाणु अप्रसार संधि (न्युक्लियर  नॉन-प्रोलिफेरशन  ट्रीटी -एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। इसी बिला पर चीन भारत का एनएसजी में मुखर विरोध कर रहा है। पाकिस्तान, भारत को एनएसजी में नहीं आने देने के लिए हर जगह हाथ-पांव मार रहा है। यहां तक कि इस साल मई में जैसे ही भारत ने  न्युक्लियर  सप्लायर्स  ग्रुप  की सदस्यता का फॉर्म  भरा, एक सप्ताह बाद पाकिस्तान ने भी वैसा ही किया। मुमकिन है चीन ने उसे ऐसा करने के लिए उकसाया हो। चीन पहले ही यह बात स्पष्ट  कर चुका है कि  न्युक्लियर  सप्लायर्स ग्रुप  में एंट्री के लिए “पिक एंड चूज“ की नीति नहीं अपनाई जानी चाहिए। इस बात पर चीन 48 देशों  के न्युक्लियर  सप्लायर्स से मांग कर चुका है कि ग्रुप  को  परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करने वालों देशों  की एंट्री पर अपनी नीति स्पश्ट करनी चाहिए।  यानी अगर   परमाणु अप्रसार संधि  पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है, तो पाकिस्तान  समेत अन्य देशों  को भी एंट्री दी जानी चाहिए। चीन एनएसजी का महत्वपूर्ण  सदस्य है। चीन का तर्क  है कि  युक्लियर  सप्लायर्स  गु्रप   परमाणु अप्रसार संधि का अहम हिस्सा है और अगर इस मामले में ढील दी जाती है, तो एनपीटी का मूल मकसद ही पिट जाएगा।  परमाणु अप्रसार संधि का हिस्सा नहीं होने के बावजूद अमेरिका और उसके मित्र देश  भारत की एनएसजी में एंट्री की इस बिला पर पैरवी कर रहे हैं कि उसका (भारत) परमाणू अप्रसार पर साफ-सुथरा रिकार्ड है। भारत-यूएस सिविल न्युक्लियर संधि के कारण भी अमेरिका भारत की एसएसजी में लाने की हरसंभव कोशिश  कर रहा है। इसी मकसद से राष्ट्रपति  बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीन दिवसीय अमेरिकी यात्रा के ऐन वक्त पर बीजिंग में चीन से अहम मुद्दों पर वार्ता  आयोजित करवाई है। यह बात दीगर है कि फिलहाल विदेश  मंत्री जॉन कैरी एवं खजाना मंत्री जैक ल्यू अभी तक चीन को मना नहीं पाए है। सच कहा जाए तो चीन मानेगा भी नहीं। भारत की तुलना में चीन अपनी कूटनीति में पाकिस्तान को कहीं ज्यादा तरजीह देता है और इसी वजह चीन भारत का विरोध कर रहा है। इस मामले में भारत का अपना पक्ष भी कमजोर है और इसी वजह चीन को भारत विरोध का हथकंडा मिला हुआ है। परमाणु अप्रसार संधि पर  हस्ताक्षर नहीं करके भारत ने एनएसजी की सदस्यता के लिए खुद अपना दावा कमजोर किया है। लेट-लतीफी संस्कृति भारत में सर चढ कर बोलती है। बुश  प्रशासन के समय अमेरिका के साथ ऐतहासिक परमाणु संधि के बावजूद आज तक भारत किसी भी अमेरिकी कंपनी को परमाणु बिजली घर बनाने का काम नहीं दे पाया। कुछ स्थानीय कानून आडे आ रहे थे, अब इस बाधा को भी दूर कर लिया गया है। बहरहाल, भारत का फिलहाल एनएसजी में एंट्री लेने का सपना अधूरा ही रह सकता है। ओबामा का कार्यकाल नवंबर में समाप्त हो रहा है। हैलेरी क्लिंटन राष्ट्रपति  चुनी गई तो उम्मीद बाकी है मगर डोनाल्ड ट्रंप का भारत के प्रति कम-से-कम ओबामा जैसा रवैया तो होने से रहा।

मंगलवार, 7 जून 2016

आम तो आम, गुठलियों के भी दाम

वाहनों से फैल रहे प्रदूषण को रोकना समकालीन मानव प्रजाति की सबसे बडी चुनौती है। पूरी दुनिया इस कडवी सच्चाई को जानती है कि अगर प्रदूषण पर जल्द काबू नहीं पा लिया गया तो यह मानव को ही निगल जाएगा। पांच जून को विश्व  पर्यावरण दिवस पर भी पूरे जगत में प्रदूषण को रोकने का संकल्प दोहराया गया। इसी चिंता के चलते मोदी सरकार ने पर्यावरण फ्रेंडली नई वाहन नीति तैयार की है। इस नीति का मूल मकसद प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को सडकों पर से हटा कर  पर्यावरण फ्रेंडली  वाहनं को प्रोत्साहित करना है। प्रस्तावित नीति के तहत एक दशक और इससे अधिक पुराने वाहनों को बदल दिया जाएगा। दस साल और इससे ज्यादा पुराने वाहन नए वाहनों की अपेक्षा 10 से 12 गुना ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। जाहिर है कोई भी प्रशासन इस स्थिति को सहन नहीं करेगा। इस बात के मद्देनजर  सरकार दस साल और इससे पुराने वाहनों को प्रतिबंधित करने जा रही है।  अनुमान है ऐसा करने से देश  भर में लगभग पौने तीन लाख वाहनों को सडकों पर से हटा लिया जाएगा। सरकार पुराने वाहनों की जगह नए वाहनो के लिए कीमत में दस फीसदी का प्रोत्साहन देगी। पुराने वाहनों के कबाड से देश  को करीब 11,500 करोड का इस्पात मिलेगा। इससे सरकार पर इस्पात आयात करने का बोझ  कम होगा। केन्द्र और राज्यों की सरकारों के अधिकांश  वाहन पुराने और खटारा हो चुके हैं। इन वाहनों के हटाने से भी सरकार को कबाड इस्पात मिलेगा। देश  को इस्पात का कम आयात करना पडेगा और विदेशी  मुद्रा की वचत होगी।  यानी “आम तो आम, गुठलियों के भी दाम“। नई वाहन नीति से देश  को चौतरफा फायदा गोगा। प्रदूषण कम होगा, इस्पात का आयात घटेगा और विदेशी  मुद्रा की बचत होगी। फिर ऐसी जनहित वाली नीति पर तुरंत अमल क्यों नहीं? मोदी सरकार को फौरन नई वाहन नीति को लागू कर देना चाहिए। सरकार के हर काम के विरोध का आदी विपक्ष कुछ अडंगे अडा सकता है, मगर जनता सब जानती है। तथापि कहते हैं“ कहना आसान है मगर करना मुश्किल “। लालफीताशाही और नकारा एवं करप्ट  प्रशासन के बलबूते बडी से बडी और महत्वाकांक्षी योजना का अब तक जो हश्र होता रहा है, उसका ख्याल करते हुए  प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को पूरी तरह से सडक पर से हटा लिया जाएगा, इस पर भी शक है।  सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह ही राज्यों को इस बात के लिए फटकार लगाई थी कि उनके पास किस शहर में कितना प्रदूषण है और प्रदूषण फैलाने वाले कितने वाहन है, इसकी भी पुख्ता जानकारी नहीं है। इस मामले में लाल-नीली बत्ती  का दुरुपयोग, सीट बेल्ट और हेलमेट की अनिवार्यता और वाहनों पर काले शीशे  लगाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों  की मिसाल ली जा सकती है। दो-एक माह देश  भर में इन निर्देशों का संजीदगी से पालन करवाया  गया मगर तदुपरांत सब कुछ भूल-भुला दिया गया। सडक दुर्घटनाओं पर हाल ही में जारी आंकडों के अनुसार सडक दुर्घटनाओं में  70 फीसदी चालक शराब पीकर गाडी चलाते हुए सीट बेल्ट नहीं लगाने से मारे जाते है और देश  में 60 फीसदी से ज्यादा चालक सीट बेल्ट नहीं लगाते। दो-पहिया वाहनों से जुडी सडक दुर्घटनाओं में  अस्सी फीसदी मौतें हेलमेट न पहनने के कारण होती हैं जबकि सुप्रीम कोर्ट ने हेलमेट पहनना और सीट  बेल्ट लगाना अनिवार्य  कर रखा है। कोई भी ऐरा-गैरा वाहन पर लाल-पीली-नीली बत्ती लगाकर घुम सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर भी प्रतिबंध लागा रखा है। यही हाल काले शीशे  वाले वाहनों का है। यही देश  की सबसे बडी त्रासदी है। कायदे-कनून को तोडना हमारी फितरत है और भरष्ट  तंत्र इसे रोकने के बजाए इसे बढाता है। सरकार को नई वाहन नीति लागू करते समय इन सब बातों का ख्याल रखना होगा। प्रदूषण की विकराल समस्या से  जूझने के लिए समर्पित और कुशल तंत्र की जरुरत है। सवाल यह है कि सरकार कहां से लाएगी ऐसा तंत्र जो वई वाहन नीति को अक्षरशः  लागू करे़ ?

सोमवार, 6 जून 2016

गुलबर्ग फैसला

 नैसर्गिक न्याय को लेकर एक पुरानी कहावत है, “जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड“। भारतीय न्यायिक व्यवस्था पर यह कहावत अक्सर सौ फीसदी चरितार्थ होती है। अधिकतर अदालती मामले इतने लंबे खींच जाते हैं कि न्याय मिलने तक पीडित या तो मरणासन्न हो जाता है, या स्वर्ग सिधार जाता है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था के तहत पहले ट्रायल कोर्ट की सुनवाई, फिर सेशन कोर्ट की, बाद में हाई कोर्ट और अन्तोगत्वा सुप्रीम कोर्ट । प्रत्येक  अदालत में पांच-सात साल का समय लगना आम बात है। इस प्रकिया में पीडित का दम घुट जाता है। गुजरात की राजधानी अहमदाबाद के चर्चित गुलबर्ग सोसाइटी मामले में भी लगभग 14 साल बाद ट्रायल कोर्ट  का फैसला आया है। इस दौरान करीब आधा दर्जन आरोपी स्वर्ग सिधार चुके हैं। इस मामले में सुनवाई सितंबर 2015 को ही पूरी हो गई थी मगर सुप्रींम कोर्ट  के निर्देश  पर फैसला सुरक्षित रखा गया । मामले की निगरानी कर रही सुप्रीम कोर्ट  ने विशेष  अदालत को इस मामले का फैसला 31मई, 2016 तक सुरक्षित रखने को कहा था। इसलिए करीब नौ माह बाद  फैसला सुनाया गया है। न्यायाधीश  पीबी देसाई की विशेष  अदालत ने 24 लोगों को गुलबर्ग  सोसायटी कांड में दोषी  पाया है। इनमंे भाजपा का पार्शद और एक पुलिस इंस्पेक्टर भी षामिल है। अदालत ने सबूतों के अभाव में  36 आरोपियों को बरी कर दिया है। पहले छह जून को सजा सुनाई जानी थी, अब 9 जून को सुनाई जाएगी । फैसले का रोचक पहलू यह है विशेष  अदालत ने आरोपियों पर से आपराधिक षडयंत्र (क्रिमिनल कंसपिरेसी) का मामला (अईपीसी की धारा 120-बी) निरस्त कर दिया है। अदालत ने व्यवस्था दी है कि गुलबर्ग  सोसायटी हमला पूर्व  नियोजित नहीं था।  गुलबर्ग   सोसायटी मामला देश  में ही नहीं, विदेशों  में भी सुर्खियों में उछाला जाता रहा है। इसकी प्रमुख वजह थी कांग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी समेत 69 लोगों की हत्या। 27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोदरा में साबरमती एक्सप्रैस कोच में भीड ने आग लगा दी थी। इस हादसे में अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवक जिदा जल गए थे।  इस हादसे के प्रतिक्रियावषश  पूरे गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे फूट गए और 1200 लोग मारे गए थे। मृतकों में अधिकतर अल्पसंख्यक थे। अहमदाबाद की गुलबर्ग मूलतः मुसलमानों की रिहायषी सोसायटी थी।  गोदरा कांड से क्रुध भीड ने इस सोसायटी में आग लगा दी और इस हादसे में  69 लोग मारे गए थे। यह हादसा इतना वीभत्स था कि इसमें जिंदा जले 30 लोगों के शव अवशेष  आज तक नहीं मिल पाएं हैं और उन्हें मरा हुआ मान लिया गया है। गुलबर्ग हत्या कांड में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री का नाम भी आया था मगर 2010 में एसआईटी की रिपोर्ट में मोदी को क्लीन चिट दे दी गई थी। बहरहाल, गुलबर्ग  सोसायटी मामले में अदालत ने सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया है। न्यायपालिका भावनाओं में नहीं बहती, अलबत्ता सबूतों पर फैसला सुनाती है। और सबूत जुटाना जांच एजेंसी (पुलिस) का काम है। पूरी दुनिया इस सच्चाई को जानती है कि भारत  की पुलिस वही करती है, जो सरकार उसे करने को कहती है। गुजरात में भगवा पार्टी का सिक्का चलता है और  2002 में भी यही स्थिति थी। भारत में आज भी बाबा-आदम के जमान का पुलिस एक्ट है और आपराधिक मामलों की जांच फिरंगियों द्वारा बनाए गए इंडियन पुलिस एक्ट 1860 के अनुसार की जाती है। फिरंगियों ने “गुलाम भारतीयों“ पर नकेल डालने के लिए यह एक्ट बनाया था ताकि पुलिस वही करे जो उसे करने के लिए कहा जाए। यह सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी है। आजाद भारत के “ स्वदेशी  शासकों” के राजनीतिक हितों के लिए यही एक्ट  माफिक बैठता है। और जब तक देश  में आपाराधिक मामलों की जांच व्यवस्था को निष्पक्ष  नहीं किया जाता, बेबस और बेसहारा आम आदमी के लिए फिरंगी मानसिकता वाली व्यवस्था से न्याय मिलने की बहुत कम उम्मीद है। बहरहाल, गोदरा और गुलबर्ग सोसायटी जैसे अमानवीय हादसों की जितनी भर्त्सना की जाए, उतनी कम है। इस तरह के हादसे केवलमात्र देश  की अखंडता और एकता पर प्रहार करते हैं।   

शुक्रवार, 3 जून 2016

कांग्रेस की दुविधा

 राहुल  गांधी को माताश्री सोनिया गांधी की जगह पार्टी की पूृरी कमान सौंपी  जाए  या अभी नहीं, लंबे समय से  कांग्रेस पार्टी इसी दुविधा में है। समय गुजरने के साथ-साथ कांग्रेस की यह दुविधा उतरोत्तर बढती ही जा रही है। दरअसल, कांग्रेस के  शीर्ष  नेताओं की दुविधा की असली वजह भी  “दुविधा“ है। कांग्रेस को मौजूदा मरणासन्न स्थिति से उभारने के लिए उन्हें लोक लुभावने नेतृत्व की जरुरत है। इंदिरा गांधी के बाद कांग्रेस को उनके जैसा आकर्षक  नेतृत्व नहीं मिल पाया है। इंदिरा गांधी में गजब का स्पार्क  था। उनकी हत्या के बाद उनके पुत्र राजीव गांधी में वह स्पार्क था मगर  1991 में राजीव गांधी की हत्या ने कांग्रेस को फिर लोक लुभावने नेतृत्व से वंचित कर डाला। बीच में कांग्रेस ने सीता राम केसरी जैसे खांटी नेता को भी आजमाया मगर भाजपा के अटल बिहारी वाजपेयी और लाल  कृष्ण  आडवानी के मुकाबले वे कहीं टिक नहीं पाए। पीवी नरसिंह राव का नेतृत्व भी बेअसर साबित हुआ।  थक-हार कर कांग्रेस को फिर नेहरु-इंदिरा गांधी परिवार की शरण में आना पडा और 1998 से सोनिया गांधी पार्टी की कमान संभाले हुए हैं। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को हालांकि अपने बूते आज तक स्पश्ट बहुमत तो नहीं मिला मगर पार्टी क्षेत्रीय दलों के सहयोग से 2004 से 2014 तक लगातार केन्द्र में स्त्तारूढ होती रही है। सोनिया गांधी  2004 में कांग्रेस नीत संप्रग सरकार का प्रधानमंत्री पद ठुकरा जनमानस में “वलिदान की देवी भी बनी और इसी छवि के चलते कांग्रेस को 2009 में क्षेत्रीय दलों के साथ सरकार बनाने का जनादेश  भी मिला पर घोटाला-दर-घोटाले ने संप्रग की लुटिया डूबो दी। 2014 के लोकसभा चुनाव और तदुपरांत एक के बाद दूसरे विधानसभा वुनाव में पार्टी की करारी हार ने  कांग्रेस को मरणासन्न स्थिति में ला खडा कर दिया है। देश  की सवा सौ साल से भी ज्यादा पुरानी पार्टी का उत्तर प्रदेश , बिहार, पष्चिम बंगाल, तमिल नाडु, गुजरात और ओडीशा  से सुपडा साफ हो चुका है। महाराष्ट्र  और आंध्र प्रदेश  में भी पार्टी का बचा-खुचा जनाधार जाता रहा है। महाराष्ट्र  में कांग्रेस पहले ही शरद पवार की  राष्ट्रीय  कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के पल्लू से बंधी हुई है। आंध्र प्रदेश  में भी पार्टी के जनाधार को कांग्रेस के दिग्गज नेता वाईएसआर (वाई एस राजशेखर रेड्डी) के पुत्र जगन रेड्डी की पार्टी  कमजोर कर चुकी है। पूरे देश  में कर्नाटक एकमात्र बडा राज्य है, जहां कांग्रेसा सत्ता में है। हाल ही के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस असम और केरल में भी सत्ता से बाहर हो गई। काग्रेस की यही दुविधा है। कांग्रेस ने  2014 का लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनाव राहुल गांधी और सोनिया गांधी के नेतृव में लडे हैं मगर हर बार पार्टी को करारी हार का सामना करना पडा है। अगले साल के शुरु में उत्तर प्रदेश , पंजाब और उतराखंड में विधान सभा चुनाव होने है। उत्तर प्रदेश  में कांग्रेस भाजपा, बसपा, सपा के बाद  कहीं जाकर चौथे नंबर पर है, इसलिए इस राज्य में पार्टी को करिशमाई नेतृत्व ही मरणासन्न स्थिति से उबार सकता है। पंजाब मे पार्टी सत्ता की प्रमुख दावेदार है मगर अरविंद केजरीवाल की “आप“ इस राज्य मे भी पार्टी को कडी चुनौती पेश  कर रही है। कांग्रेस के पास कैप्टन अमरेन्द्र सिंह के अलावा कोई लोक लुभावी नेता नहीं है। उत्तराखंड में भी पार्टी को भाजपा के दिग्गज नेताओं से कडी चुनौती का सामना करना पड सकता है। और अगर पंजाब, उतराखंड और उसके बाद हिमाचल प्रदेश  भी कांग्रेस के हाथ से निकल जाता है, तो कश्मीर  से कन्याकुमारी तक देश  कांग्रेस से मुक्त हो जाएगा और यही भाजपा का लक्ष्य भी है। कांग्रेस को इस समय प्रधानमंत्री  नरेन्द्र मोदी के लोक-लुभावने नेतृत्व का मुकाबला करने के लिए करिश्माई  नेतृत्व की जरुरत है। राहुल गांधी भले ही हाल ही के चुनाव में करिश्माई   नेतृत्व की खूबियां नहीं दिखा पाए, मगर उनमें वह स्पार्क  है और इसे चिंगारी बनने की देर है। कांग्रेस  के पास इसके सिवा चारा भी नहीं है। राहुल की बहन प्रियंका गांधी उनसे अधिक करिश्माई  और लोक लुभावी है मगर वे कांग्रेस का आखिरी तुरुप है। अब वक्त आ गया है कि  कांग्रेस  अब और तब की दुविधा छोडकर राहुल गांधी को पार्टी की कमान सौंप दें।   

गुरुवार, 2 जून 2016

इंडिया शाइनिंग


तेज रफ्तार से उभरती भारतीय अर्थव्यवस्था ने पिछली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में  7.9 ग्रोथ दर्ज कर पूरी दुनिया को दिखा दिया है कि वैश्विक  मंदी के बावजूद उसके फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं। पिछली तिमाही की इस  शानदार ग्रोथ ने अर्थशास्त्रियों को भी हक्का-बक्का कर दिया है। यह विशेषज्ञ के  आकलन से ज्यादा है। चोथी तिमाही में 7.5 फीसदी ग्रोथ अपेक्षित थी। इतना ही नहीं  भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरऑल ग्रोथ 7.6 को छू रही है। 2014-15 में यह 7.4 फीसदी थी। यह भी दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था चीन की ग्रोथ से कहीं ज्यादा है। जनवरी-मार्च  की तिमाही में चीन की ग्रोथ 6.7 फीसदी रही है।  2015-16 में कोर सेक्टर की ग्रोथ 8.5 फीसदी रही है। प्रति व्यक्ति आय (पर केपिटा इंकम) में भी 7.4 फीसदी का इजाफा हुआ है। 2014-15 की  86,879 रु की तुलना में  2015-16 में यह बढकर 93,293 रु हो गई है। यानी चौतरफा अच्छी खबर है और खुशाहली और तरक्की का माहौल है। पूरी दुनिया में इस समय मंदी का माहौल है और बडी-बडी अर्थव्यवस्थाएं भी  अपेक्षित विकास दर को हासिल नहीं कर पा रही है। कनाडा की विकास दर पहली तिमाही में  मात्र 0.6 फीसदी रही है और वार्षिक  दर  2.4 फीसदी।  इस अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स कमजोर पड गए हैं। दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था अमेरिका की जनवरी-मार्च तिमाही की ग्रोथ भी मात्र 0.8 फीसदी रही है। यूरोपियन देशों का और भी बुरा हाल है। जर्मनी की  पहली तिमाही की गोर्थ 0.7 फीसदी रही और इग्लैंड की 0.4 फीसदी। इस साल   की पहली तिमाही में रुस की ग्रोथ दर 1.2 फीसदी, ब्राजील की 1.4 और दक्षिण अफ्रीका की 0.50 फीसदी रही है । यूरोप में  सस्ता कर्ज होने के बावजूद आर्थिक गतिविधियों रफ्तार नहीं पकड पा रही है। पूरी दुनिया में भारत और चीन दो ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जो औरों की तुलना में अपेक्षाकृत तेज रफतार से आगे बढ रही हैं और इस मामले में भारत ने चीन को भी पछाड दिया है। पिछले दो सालों से लगातार सूखे के बावजूद  भारतीय अर्थव्यवस्था की ओवरऑल  7.6 गोर्थ  रेट काबिलेतारीफ है। इसका श्रेय मोदी सरकार को जाता है। पिछले सप्ताह 26 मई को मोदी सरकार के दो साल पूरे हुए हैं। अगर दो साल में सूखे और राजनीतिक अडंगों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढती है, तो निष्कर्ष  यही निकलता है कि सरकार की परफोर्मेस बेहतर रही है। जीडीपी की ग्रोथ रेट में और तेजी आ सकती है अगर गुडस एंड सर्वसिस टैक्स (जीएसटी) लागू हो जाता। इस जून से जीएसटी को पूरे देश  में लागू किया जाना है मगर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की जिद्द के कारण जीएसटी बिल अभी भी राज्यसभा में अटका हुआ है। जीएसटी के लागू होने से पूरे देश  में एक समान टैक्स व्यवस्था प्रभावी होगी और इससे सभी तरह के गुडस पर 25 से 30 फीसदी कर भार कम हो जाएगा। इससे उत्पादन में अप्रत्याशित इजाफा हो सकता है।  विशेषज्ञो का आकलन है कि जीएसटी के लागू होने से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 1.5 से 2 फीसदी का इजाफा हो सकता है। यानी कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने जीएसटी बिल को रोककर देश  को दो फीसदी जीडीपी से वंचित किया है। ऐसी सियासत के क्या मायने जो देश  का खासा नुकसान करे। पूरे देश  में जीएसटी को एक अप्रैल, 2010 से लागू होना था मगर मौजूदा टकराव से साफ है कि इस साल जून से भी जीएसटी लागू नहीं हो पाएगा। जीएसटी ही नहीं आार्थिक सुधारों  को लेकर और भी कई अहम मामले हैं जो विपक्ष के अडियल स्टैंड के कारण बेवजह रुके पडे हैं। लोकतंत्र की स्वस्थ परंपराओं का तकाजा है कि जीएसटी जैसे अहम जनहित के मामलों में सत्ता पक्ष और विपक्ष में सहमति होनी चाहिए। जनहित के मामलों को राजनीति का शिकार नहीं बनने दिया जाना चाहिए। बहरहाल, ताजा आंकडे यही कह रहे हैं कि मोदी सरकार का रिपोर्ट कार्ड काफी अच्छा रहा है और इस दौरान देश   आगे बढा है।

बुधवार, 1 जून 2016

ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती

पोलुशन  फैलाने वाले वाहनों पर नेश नल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सख्ती काबिलेतारीफ है। जो पहल केन्द्र और राज्यों को करनी चाहिए, वह न्यायपालिका को करनी पड रही है। उस पर समकालीन सरकारें बात-बात पर अडंगें अडाने से बाज नहीं आतीं। राज्यों को बस अपने राजस्व की पडी है। देश  में वाहनों से फैल रहे प्रदूषण से जनमानस की सेहत के साथ जो खिलवाड हो रहा है, उसकी राज्यों को कोई चिंता नहीं है। इसी लापरवाही से आजिज  नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 15 शहरों में वाहनों से बढ रहे प्रदूषण पर सख्त रुख अपनाया है। सोमवार को ग्रीन  ग्रीन ट्रिब्यूनल ने  पंजाब समेत सात राज्यों को फटकार लगाते हुए उन्हें आदेश  दिए कि अगर वे चौबीस घंटों के भीतर यह नहीं बता पाए कि उनके शहरों में कौनसा सबसे ज्यादा प्रदूषित है, तो ट्रिब्यूनल संबंधित राज्य के मुख्य सचिव की गिरफ्तारी के आदेश  जारी कर देगा। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल पंजाब, बिहार, महाराष्ट्र , उत्तर प्रदेष, तमिल नाडु, पश्चिम  बंगाल और कर्नाटक   राज्यों के  15 शहरों में बढते प्रदूषण पर सुनवाई कर रहा था। इनमें पंजाब के लुधियाना, जालंधर और गुरु नगरी अमृतसर भी  शामिल है। सुनवाई के समय किसी भी राज्य के पास किस शहर में डीजल और पेट्रोल के कितने-कितने वाहन है, इसकी कोई जानकारी नहीं थी। राज्यो की इस लापरवाही का यह भी मतलब निकाला जा सकता है कि वे जानबूंझकर जानकारी छिपा रहे हैं। यह बात  ट्रिब्यूनल के गले भी नहीं उतरी कि अदालत में प्रदूषण पर सुनवाई चल रही हो और समस्या से पीडित राज्य  वांछित जानकारी जुटा बगैर मुंह लटकाए अदालत में हाजिरी लगाएं । इससे पता चलता है कि समकालीन सरकारें विशुद्ध  जनहित से जुडे मामलों के प्रति कितनी संजीदा है। वाहनों से बढते प्रदूषण के कारण ग्रीन  ट्रिब्यूनल दो हजार सीसी और इससे अधिक पॉवर वाले डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण पीडित राज्यों से जानकारी मांगी थी।  ट्रिब्यूनल दिल्ली में डीजल के नए वाहनों के पंजीकरण पर रोक लगा चुका है। इसी संभावना के मद्देनजर  केन्द्रीय भारी उद्योग मंत्रालय ने ग्रीन  ट्रिब्यूनल में याचिका दायर कर रखी है। याचिका में  ट्रिब्यूनल को आगाह किया गया है कि डीजल वाहनों पर प्रतिबंध लगाए जाने से उद्योगों  को तो तो नुकसान होगा ही, लाखों लोगों का रोजगार भी जाता रहेगा। इससे साफ है कि सरकार को प्रदूषण से हो रहे नुकसान की बजाए उद्योंगों की ज्यादा चिंता है। बढते वाहनों के प्रदूषण से जनमानस और वातावरण का कितना नुकसान हो रहा है, सरकार को इसका संभवतय अंदाजा भी नहीं है।  विश्व  स्वास्थय सगठन (डब्ल्यूएचओ) की 2014 की रिपोर्ट केे अनुसार वायु प्रदूषण से दुनिया में हर साल 70 लाख से ज्यादा लोग मारे जाते हैं और मृतकों में अधिकतर विकासशील देशों  के लोग होते हैं। ताजा रिपोर्ट  के अनुसार वायु प्रदूषण फैलाने में वाहनों का सबसे प्रमुख योगदान रहता है। अमेरिका के सभी ट्रांसपोर्ट सोर्सिस द्वारा जनित पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) एमीशन का दो-तिहाई योगदान डीजल वाहनों अथवा मशीनों का आंका गया है। भारत में यह नब्बे फीसदी से भी ज्यादा है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार पंजाब का लुधियाना शहर विश्व के  चार सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में शुमार है।  लुधियाना के वायु कणों में प्रदूषण की मात्रा करीब 253 माइक्रोग्राम प्रति क्युबिक मीटर पाई गई है जो कि लोगों की सेहत के लिए अत्याधिक खतरनाक है।  डब्लयूएचओ  के मानदंड अनुसार वायु में प्रदूषण की मात्रा ज्यादा से ज्यादा 20  माइक्रोग्राम प्रति  क्युबिक मीटर होनी चाहिए। गुरु नगरी अमृतसर में प्रदूषण  की  मात्रा 210  माइक्रोग्राम प्रति  क्युबिक मीटर के आसपास है। यह भी बहुत अधिक है। अमृतसर देश  के सर्वाधिक नौ  शहरों में  शुमार है।  प्रदूषण का असर दुनिया के नायाब स्वर्ण मंदिर पर भी पडा है। बढते प्रदूषण के कारण स्वर्ण मंदिर के सोने से सुसज्जित गुबंद फीके पड चुके हैं और एसजीपीसी को 1999 में इन्हें फिर से चमकाना पडा था। सच यह है कि इस समय प्रदूषण मानव के लिए सबसे बडा खतरा है। सरकार को इस समस्या से भागने की बजाए इससे युद्ध स्तर पर निपटना चाहिए।