शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

सेना के पराक्रम को सलाम

     
भारतीय सेना के प्रराक्रम को कोटि-कोटि सलाम। पाकिस्तानी आतंकियों के अडडों पर  भारतीय सेना के सटीक सर्जिकल ऑपरेशन से समस्त भारत का सीना 56 इंच चौडा हो गया है। देश  भर में  जश्न मनाया जा रहा है और आतिशबाजी की जा रही है। इस कार्रवाई ने शहीदों के परिजनों के जख्मों पर मलहम-पट्टी का काम किया है। सेना ने लाइन ऑफ कंट्रोल से कहीं आगे  जाकर पाकिस्तान अधिकृत  कश्मीर में दो किलोमीटर अंदर घुसकर आतंकियों के 7 ठिकानों को नेस्तानाबूद कर डाला और 38 आतंकियों को मार गिराया।  सेना के इस् पराक्रम से 125 करोड भारतीयों के सीने में सुलग रही “बदले की आग““ काफी हद तक शांत  हो गई है। यही तो देश  चाहता था। उडी आतंकी हमले में  शहीद हुए 19 सैनिकों का बलिदान जाया न जाए, पाकिस्तान को उसकी जुबान में जवाब देना लाजिमी था। देश  की मांग थी कि जिस तरह जून 2015 को भारतीय सेना ने 40 मिनट के सर्जिकल ऑपरेशन  में म्यांमार में घुसकर 35 आतंकियों को मार गिराया था, उसी तरह पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकियों को मार गिराया जाना चाहिए। और सेना ने वही किया। सेना पहले से इस कार्रवाई की ओर इशारा रकर रही थी। उडी आतंकी हमले के बाद सेना ने पाकिस्तान को साफ-साफ चेतावनी दी थी कि  वह समय आने पर माकूल जवाब देगी। इस कार्रवाई से स्तब्ध और तिलमिलाया पाकिस्तान भले ही गला फाड-फाड कर इस सैन्य कार्रवाई को “छलावा“ बताए मगर सच्चाई छिपाए भी छिप नहीं सकती। पाकिस्तान की फरेबी फितरत के दृष्टिगत भारत ने पूरी कार्रवाई को कैमरे और वीडियो में रिकॉर्ड किया है। भारत ने  इस सर्जिकल कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान को भी अवगत करा दिया गया था। भारतीय सेना के डायरेक्टर जनरल ऑफ मिल्ट्री ऑपरेशन ले़, जनरल रणबीर सिंह ने साफ-साफ शब्दों में कहा है कि पाकिस्तान को जबाव देना बनता था। उडी आतंकी हमले के अलावा जम्मू-कश्मीर  में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों की घुसपैठ लगातार बढ रही थी। इसी माह 11 और  18 सितंबर को पूंछ और उडी में दो बडे हमले हुए। इस साल ब तक सेना पाकिस्तान से भेजे गए आतंकियों के 20 से ज्यादा घुसपैठ के प्रयास विफल कर चुकी है।  पकडे गए आतंकियों ने अपने कबूलनामे में पाकिस्तान की सलिंप्तता को स्पष्ट शब्दों में बयां किया है। पाकिस्तान के उव्च अधिकारियों को इन कबूलनामों से अवगत भी कराया गया है और दूतावासीय असेस की सुविधा भी दी गई मगर इस्लामाबाद है कि अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आता है। भारत और पाकिस्तान के बीच 2004 को हुए करार के मुताबिक इस्लामाबाद ने नई दिल्ली को वचन दे रखा है कि वह अपनी जमीन को आतंकी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होने देगा। मगर पाकिस्तान  हर बार अपने वायदे से मुकरता रहा है। पूरी दुनिया यह बात जानती है कि अंतरराष्ट्रीय  सीमा पर दोनों देशों  की सेनाओं का सख्त पहरा रहता  है। सेना और सरकार की मदद के बगैर पाकिस्तान से भारत में परिंदा तक पर नहीं मार सकता। जाहिर भारत में आने वाले आतंकियों को पाकिस्तान की हर तरह से भरपूर मदद मिल रही है और पाकिस्तानी सेना ही आतंकियों को भारत में घुसपैठ करा रही है। कोई भी देश  ज्यादा देर तक इस स्थिति को सहन नहीं करेगा। बहरहाल,  पाकिस्तानी आतंकियों के “लंचपैडस“ को  नष्ट  करने की भारतीय सेना की कार्रवाई से दो बातें  स्पष्ट  है। पहली यह है कि भारत अब “रक्षात्मक“ (डेफेसिंव“ की जगह अब “आक्रामक“ (ओफेसिंव) हो गया है। मोदी सरकार की यह नई रणनीति काबिलेतारीफ है। देश  भी यही चाहता है। पाकिस्तान जैसे पांखडी और फितरती पडोसी से आक्रामक होकर ही निपटा जा सकता है। दूसरी यह कि भारत अपनी “संप्रभुता“ की रक्षा के लिए एलओसी को भी लांघ सकता है। आज तक भारत ने ऐसा नहीं किया था। मगर यह आक्रमक रणनीति भारत को युद्ध की भट्ठी में भी झोंक सकती है। पाकिस्तान चुप बैठने से रहा और भारत पर हमला कर सकता है। पूरे देश  को इस स्थिति के लिए तैयार रहना होगा।    

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

भारत की कूटनीतिज्ञ जीत


इस्लामाबाद में नवंबर माह में होने वाली सार्क ( साउथ एशियन एसोसिएषन फॉर रीजनल कोऑपरेशन) 
शिखर सम्मेलन के बॉयकॉट  में भारत को तीन देशों  के समर्थन से  पाकिस्तान चारों खाने चित हो गया है। भारत ने उडी आतंकी हमले की प्रतिक्रियावश  सार्क  की  बैेठक का  बॉयकॉट   का निर्णय लिया है। भारत का अनुसरण करते हुए अफगानिस्तान, बांग्लादेश  और भूटान  ने भी  शिखर सम्मेलन के बॉयकॉट  का ऐलान किया है। अब इस बैठक की कोई अहमियत नहीं रह गई है और इसे रदद करने के सिवा कोई चारा नहीं है। बॉयकॉट  में अफगानिस्तान का साथ भारत की बहुत बडी कूटनीतिज्ञ जीत है। जम्मू-कश्मीर  में उडी आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को यह खासा करारा जवाब है। सिंधु जल संधि को निरस्त करने की धमकी और पाकिस्तान को “मोस्ट फैवरड नेशन“ का दर्जा वापस लेने से इस्लामाबाद इतना नहीं तिलमिलाया है, जितना अफगानिस्तान, बांग्लादेश  और भूटान का सार्क का  बॉयकॉट  करने के लिए भारत का साथ देने पर। भारत द्वारा  “मोस्ट फैवरड नेशन का दर्जा  वापस लेने से पाकिस्तान को कोई फर्क  नहीं पडता है। पाकिस्तान ने आज तक भारत को  “मोस्ट फैवरड नेशन का दर्जा  नहीं दिया है।  मगर अफगनिस्तान का  बॉयकॉट  पाकिस्तान के लिए जबरदस्त धक्का है। भूटान  को भारत का अनुकरण करना ही था क्योंकि वह हमेशा  भारत के साथ चलता है। बांग्लादेश  की  शेख हसीना सरकार भी  भारत के साथ है। बांग्ला देश  की मौजूदा प्रधानमंत्री  शेख हसीना बंग बन्धु  शेख मुजबीर रहमान की पुत्री हैं और देश  को पाकिस्तान से आजादी दिलाने के लिए भारत की  कृतज्ञ हैं। उनका साथ भी मिलना ही था मगर अफगानिस्तान का सार्क  बॉयकॉट  में भारत का साथ देना भारत की वाकई ही बहुत बडी कूटनीतिज्ञ सफलता है। अफगानिस्तान पश्चिम  में पाकिस्तान का पडोसी है और उसके इस्लामाबाद से गहरे संबंध रहे हैं। पूरे सार्क में अफगानिस्तान ही पाकिस्तान का गहरा मित्र है। 1979 में तत्कालीन सोवियत संघ के हमले के बाद से पाकिस्तान पडोसी अफगानिस्तान के लगभग 60 लाख शरणार्थियों को अपने यहां पालता रहा है। अफगानिस्तान के कई शीर्ष  नेता पाकिस्तान में राजनीतिक श रण लिए हुए हैं। इन हालात में अफगानिस्तान का पाकिस्तान को नाराज करने के यही अर्थ  निकाले जा सकते हैं कि काबुल भी पाकिस्तान की “आतंकी छवि“ से आजिज आ चुका है। दरअसल, पाकिस्तान की आतंकी फितरत से अफगानिस्तान भी खासा पीडित है। अफगानिस्तान को अपना पांचवा प्रांत जैसा सलूक देते हुए पाकिस्तान तालिबान के माध्यम से वहां छदम युद्ध  छेडे हुए है। काबुल यह बात भी आज तक नहीं भुला है कि तालिबान  शासन के समय  यूएई और सऊदी अरबिया के बाद  पाकिस्तान तीसरा देश  था, जिसने तालिनान सरकार को मान्यता दी थी। पाकिस्तान की बदनाम खुफिया मिल्ट्री एजेंसी आईएसआई भारत की ही तरह अफगानिस्तान में विध्वंसक गतिविधियों में संलिप्त रहती है। इसी वजह अफगानिस्तान के पूर्व  राष्ट्रपति हमीद करजई पाकिस्तान से खासे नाराज थे। करजई के उतराधिकारी अशरफ गनी ने पद संभालते ही सबसे पहले पाकिस्तान और अफगानिस्तान की इंटेलीजेस ऐजेसियों के बीच एक-दूसरे के क्षेत्र में विध्वंसक गतिविधियों नहीं फैलाने का करार करवाया मगर इसका भी पालन नहीं हुआ। गनी ने खुद माना है कि पाकिस्तान आज भी अफगानिस्तान को हर तरह से कमजोर करने की  बराबर कोशिश कर रहा है। इसी माह (सितंबर) में अपनी नई दिल्ली यात्रा के दौरान अफगान राष्ट्रपति ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात के दौरान पाकिस्तान की आतंकी फितरती  पर गहरी चिंता जताई थी। पाकिस्तान की तुलना में भारत अफगानिस्तान से मजबूती से दोस्ताना रिश्ते निभा रहा है।  इसी वजह अफगानिस्तान भारत को ज्यादा करीबी मानता है। बहरहाल, भारत, पाकिस्तान को अलग-थलग करने में सफल रहा है। मगर कश्मीर  के हालात अभी भी चिंताजनक है। दुश्मनों से लडना आसान है मगर अपनों से लडना बेहद मुश्किल । कश्मीर  घाटी में दिन-ब-दिन अवाम  राष्ट्रीय  मुख्यधारा से दूर होती जा रही है।  मोदी सरकार को इस मोर्चे को भी अविलंब संभालना होगा।

बुधवार, 28 सितंबर 2016

मार्केट और डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिका में इस साल नवंबर माह में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुईं हैं। विशेषकर, निवेश क इस चुनाव में गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया की सबसे बडी अर्थव्यवस्था अमेरिका के शीर्षस्थ  पद के चुनाव पर में निवेशकों की दिलचस्पी स्वभाविक है। सोमवार को  पूरी दुनिया की स्टॉक मार्केट में लगभग भूचाल सा आ गया था। सोमवार को न्यूयार्क  में  राष्ट्रपति उम्मीदवारों के बीच होने वाली राष्ट्रीय  बहस से पहले ही मार्केट में डोनाल्ड ट्रंप को लेकर अफरा-तफरी फैल गई । जर्मनी के शीर्ष   ड्यूश   बैंक की खस्ता हाल ने आग में घी का काम किया। निवेशकों को इस बात का भय सता रहा है कि अगर खरबपति बिजनेसमैन  डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने जाते हैं, तो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर इसका प्रतिकूल असर पड सकता है। ट्रंप हर पहलू का नफे-नुकसान में आकलन करते है। सरकार और अर्थव्यवस्था  नफे-नुकसान के नजरिए से नहीं चलती। डेमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से अमेरिका के पूर्व  राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी पूर्व विदेश  मंत्री हिलेरी  डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार है।  वैसे अमेरिका की दो प्रमुख  रिपब्लिकन और  डेमोक्रेटिक पार्टियों में टिकट पाने की पुख्ता प्रकिया है। संभावित उम्मीदवारों को हर राज्य के पार्टी डेलेगेटस का बहुमत समर्थन हासिल करना पडता है। अमेरिकी की अधिकांश  जनता पूर्व विदेश  मंत्री हिलेरी किलंटन की ईमेल प्रकरण में विवादास्पद भूमिका से भी नाराज है मगर डोनाल्ड ट्रंप को भी ज्यादा पसंद नहीं करते हैं। ट्रंप ने  श्वेत  बनाम अश्वेत का मुद्दा उठाकर अमेरिका के  अश्वेतों को खासा नाराज कर रखा है। अश्वेत पूरी तरह से हिलेरी क्लिंटन के साथ हैं। मुसलमानों को आतंकी बताकर और अमेरिका में उनकी एंट्री पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान करके ट्रंप ने मुस्लिम समुदाय की नाराजगी मोल ले रखी है। अमेरिका के पडोसी मेक्सिको की सीमा पर दीवार खडी करने की  घोषणा  करके ट्रंप ने अमेरिका में बसे मेक्सिकन लोगों को नाराज कर रखा है। रुस के राश्ट्रपति पुतिन की तारीफ करके अमेरिकी पूंजीपतियों को और चीन के साथ सभी वाणिज्यिक संधियों का पुनरावलोकन की बात करके चीनी समुदाय को नाराज कर दिया। महिलाओं को भोग की वस्तु मानने के लिए अमेरिका का यह शक्तिशाली तबका डोनाल्ड ट्रंप का मुखर विरोधी है। अमेरिका बहु-नस्लीय देश  है और यहां  की अर्थव्यवस्था में हर नागरिक का अहम योगदान है। पार्टी नामांकन अभियान के  शुरुआत में ट्रंप हिलेरी से काफी पीछे थे मगर ताजा चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में वे डेमोक्रेटिक उम्मीदवार के बराबर आ गए हैं। अभी चुनाव के लिए दो माह का समय है और अगर मतदाताओ का रुझान यही रहा तो वे हिलेरी से आगे निकल सकते हैं। सोमवार को दुनिया भर की मार्केट में यही आशंका बलवित रही और अधिकतर शेयर औंधे मुंह गिर गए। तथापि, मंगलवार को स्थिति एकदम बदल गई। सोमवार को हिलेरी और ट्रंप के बीच हुई  बहस में क्लिंटन ने डोनाल्ड को ऐसे पछाडा कि पूरी दुनिया की मार्केट में आशा  की एक नई किरण प्रज्वलित हो गई। एक अंतरराष्ट्रीय   समाचार एजेंसी  के मुताबिक सोमवार की बहस के बाद 62 फीसदी अमेरिकी जनमानस ने माना कि हिलेरी ने बाजी जीत ली जबकि मात्र 27 फीसदी ट्रंप के पक्ष में थे। बहस के बाद के स्नैप पोल भी हिलेरी के पक्ष में हैं। नतीजतन, मंगलवार को मार्केटस में तेजी छाई रही और  शेयरों में भारी उछाल आया। ट्रंप के मुखर विरोधी  मेक्सिको की मुद्रा पीसो में डॉलर के मुकाबले  2 फीसदी का उछाल दर्ज  हुआ। अभी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारो में  9 और 19  अक्टूबर को बहस के दो दौर होने बाकी है। आठ नवंबर को  राष्ट्रपति चुनाव से पहले इन दोनों डेबेटस पर भी निवेशकों की पैनी नजर रहेगी। अगर ट्रंप हिलेरी पर भारी पडते हैं, बाजार में फिर अफरा-तफरा फैल सकती है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने पर मार्केट्स  को किस भयावह  स्थिति का सामना करना पड सकता है ? 

मंगलवार, 27 सितंबर 2016

भारत के पास “पानी बम“ !

“जल और लहू एक साथ नहीं बह सकते“, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का सिंधु जल संधि पर यह कथन सामयिक और प्रासंगिक है। तथापि, जमीनी सच्चाई यही है कि भारत पाकिस्तान को सिंधु नदी का पानी प्रवाहित करता रहेगा और पाकिस्तान भारत की धरती को लहूलुहान करता रहेगा। इसे सामरिक विवशता कहा जाए या अंतरराष्ट्रीय  भाईचारे का पालन, भारत ने सिंधु संधि को निरस्त नहीं करने का फैसला लिया है हालांकि पूरा देश  चाहता है कि भारत में लहु की नदियां बहाने वाले पकिस्तान को उसकी भाषा  में ही जबाव दिया जाना चाहिए। सिंधु बेसिन नदी करार अंतरराष्ट्रीय  संधि है और इसे निरस्त करने से भारत की छवि कलंकित हो सकती है। भारत ने आज तक कभी किसी भी अंतरराष्ट्रीय  संधि को नहीं तोडा। इस स्थिति के दृष्टिगत सोमवार की बैठक में फैसला लिया गया कि भारत को पाकिस्तान के नियंत्रण वाली तीन नदियों- सिंधु झेलम और चिनाब- के जल का अधिकाधिक दोहण करना चाहिए। सिंधु नदी संधि के तहत तीन नदियों - सतलुज, ब्यास और रावी- पर भारत का नियंत्रण है और बाकी तीन पर पाकिस्तान का। भारत से पाकिस्तान को बहने वाली सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम नदियां पाकिस्तान की सीमा पर सिंधु नदी में समा जाती हैं। 1960 में लगभग दस साल की जद्दोजेहद के बाद विश्व  बैंक के दखल से भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी को लेकर संधि हुई थी। पााकिस्तान को शुरु से ही इस बात का भय था कि युद्ध अथवा इस तरह की  आपातकालीन स्थिति के समय भारत पाकिस्तान को नदियों का पानी रोक सकता है। संधि में इस बात का प्रावधान रखा गया है कि भारत, पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों पर डैम और जल-विद्युत परियोजनाएं स्थापित तो कर सकता है मगर नदियों के प्रवाह को नहीं रोक सकता। इस संधि के मुताबिक भारत सिंधु नदी समागम का केवल 20 फीसदी जल का ही उपयोग कर सकता है। संधि में इस बात का भी प्रावधान है कि जल बंटवारे पर किसी भी तरह के मनमुटाव अथवा मतभेद की स्थिति में इसका कानून सम्मत निपटान किया जाएगा। भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी समागम के जल बंटवारे को लेकर आज तक कोई बडा मनमुटाव नहीं हुआ है और पूरी दुनिया में सिंधु बेसिन को बेहद सफल संधि माना जाता है। मगर उडी आतंकी हमले के बाद से भारत में पहली बार इस संधि को निरस्त करने की आवाज उठी है हालांकि ऐसा करना आसान नहीं है। भारत चीन की तरह हठ्ठी और काइंया नहीं बन सकता। चीन ने हाल ही में दक्षिण चीन सागर पर कब्जे को लेकर अंतरराश्ट्रीय पंचाट के फैसले को मानने से इंकार कर दिया है। चीन के इस फैसले से दक्षिण चीन सागर में तनाव बढ गया है। भारत सिंधु नदी संधि को तोड सकता है मगर इससे वह अलग-थलग पड जाएगा। जम्मू-कश्मीर  कई बार इस संधि को निरस्त करने की मांग कर चुका है। संधि के निरस्त किए जाने से पाकिस्तान में पानी की भीषण  किल्लत हो सकती है और अवाम भुखमरी का शिकार हो सकती है। दुनिया का कोई भी देश  इस स्थिति में भारत का साथ नहीं देगा। वैसे, इस तरह की स्थिति पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों के मन की मुराद पूरी कर सकती है। पाकिस्तान में भारत विरोधी आतंकी संगठन भारत के खिलाफ अवाम को भडकाने के लिए इस तरह के ,मौके की फिराक में रहते है। भारत अपने नियंत्रण वाली नदियों के पानी का पहले ही भरपूर दोहण कर चुका है। अब पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों की बारी है।  मोदी सरकार का पाकिस्तान के नियंत्रण वाली नदियों के पानी से जम्मू-कश्मीर में लगभग 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सिंचित करने का फैसला समय की मांग है।  पाकिस्तान को पता चलना चाहिए कि भारत के पास “पानी बम“ भी है और पानी कैसे भीषण तबाही मचा सकता है।

सोमवार, 26 सितंबर 2016

जीएसटी अगले 1 अप्रैल से ?

विलंब से ही सही,  शुक्र है अततः वस्तु एवं सेवा कर (गुडस एंड सर्विसिस -जीएसटी) बिल संसद  में पारित हो ही गया। और अब तमाम बाधाएं लांघते हुए  शुक्र है केद्र और राज्य 1 अप्रैल, 017 से जीएसटी को लागू करने के लिए सहमत हो गए हैं। जीएसटी जितनी जल्दी लागू होगा, यह देश  के लिए उतना ही हितकर होगा। विशेषज्ञों का आकलन है कि जीएसटी के लागू होने से देश  के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कम-से-कम डेढ से दो फीसदी का इजाफा हो सकता है। अगर  इसे संजीदगी से लागू किया जाए, तो जीडीपी तीन फीसदी तक बढ सकता है। अगर ऐसा होता है तो भारत दुनिया की सबसे तेज बढती अर्थव्यवस्था बन जाएगी। वीरवार को अपनी पहली बैठक में जीएसटी परिषद में कई मुद्दो पर भारी मतभेदों के बावजूद जीएसटी को 1 अप्रैल, 2017 से लागू किए जाने पर पूर्ण सहमति थी। तथापि, कहना आसान है, करना बेहद मुश्किल ( इजीयर सैड देन डन)। जीएसटी परिषद  की पहली ही   बैठक में तमिल नाडु और उत्तर प्रदेश  ने “ वन-स्टेट, वन वोट“ सिद्धांत का मुखर विरोध करते हुए कहा की बडे राज्यों को छोटे राजों के बराबर रखना अन्यायपूर्ण है। यह बात दीगर है कि परिषद ने इस विरोध को खारिज कर दिया। जीएसटी में व्यापारियों की छूट सीमा पर भी कोई सहमति नहीं बन पाई। कुछ राज्य माहवार 10 लाख रु कारोबार करने वालों को छूट देने के पक्ष में थे। अधिकांष राज्य इस सीमा को 25 लाख रु तक के टर्नओवर को जीएसतटी से बाहर रखने के पक्ष में थे। बहरहाल, शु क्रवार को तय किया गया कि  25 लाख रु से कम का सालाना कारोबार करने वालों पर जीएसटी नहीं लगेगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार परिषद ने योजनाबद्ध बिक्री कर (सेल्स टेक्स) के
विवादास्पद मामले को भी सुलझा लिया है और इस पर सहमति बन गई है। शुक्रवार की बैठक में दोहरे नियंत्रण (डुअल कंट्रोल) के मामले को भी सुलझा लिया गया है। टैक्स लाइबिलिटी तय करने के लिए केन्द्र अथवा राज्य स्तर पर एक ही प्राधिकरण होगा, केद्र और राज्य स्तर पर अलग-अलग नहीं। इस मामले में उधोग और व्यापार जगत को इस बात पर निराशा हो सकती है कि एक समन्वित प्राधिकरण का खाका नहीं बन पाया है।  जीएसटी रेट और स्लैब पर बैठक में सहमति नही बन पाई और इसे अगले माह अक्टूबर में होने वालौ बैठक के लिए छोड दिया गया। यह मुद्दा काफी संवेदनशील  है और इस पर कुछ राज्य और समय चाहते हैं। केन्द्र सरकार टैक्स रेट 18-19 फीसदी के बीच तय करने के पक्ष में है मगर अधिकतर राज्य इसे 22 से 23 फीसदी निर्धारित करने के पक्ष में है।  जीएसटी रेट और स्लैब के अलावा  एरिया-बेस्ड छूट का मामला भी अभी सुलझ नहीं पाया है। बहरहाल, जीएसटी परिषद में कई विवादास्पद मुद्दों पर सहमति बनना सुखद पहल है और इससे उम्मीद की जा सकती है कि देश  इस क्रांतिकारी कर को अगले साल 1 अप्रैल से लागू होने के मार्ग  पर प्रशस्त हो रहा है। मगर अभी भी केन्द्र और राज्यों को अप्रैल 2017 से पहले तीन प्रमुख बिल संसद और विधानसभाओं से पारित करवाने हैं। और सबसे अहम कानून जीएसटी रेट और उसके स्लैब से संबंधित है। यह कानून तब तक पारित नहीं हो सकता, जब तक जीएसटी परिषद रेट और इसके स्लैब निर्धारित नहीं कर लेती। जीएसटी परिषद को अगले माह होने वालीे बैठक में रेट तय करना ही पडेगा ताकि   केन्द्र सरकार नवंबर में  शुरु होने वाले संसद  के  शीतकालीन सत्र में तीनों बिलों को पारित कर सके। जीएसटी लागू करने के लिए केद्र और राज्यों को युद्ध स्तर पर काम करना होगा।  

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

92 साल की परंपरा का अंत

 संसद में 92 साल से चली आ रही अलग रेल बजट प्रस्तुत करने की परंपरा का अंत देश  के लिए सुखद साबित हो सकता  है। मोदी सरकार ने अगले वित्तीय साल के लिए रेल बजट को आम बजट में समाहित करने का निर्णय लिया है। रेल बजट आमा बजट से दो दिन पहले पेश किया जाता  है। मोदी सरकार ने फरवरी माह के आखिरी दिन आम बजट को पेश  करने की परंपरा भी खत्म कर दी है। अब बजट फरवरी माह की पहली तारीख को पेश  किया जाएगा। रेल बजट को आम बजट में समाहित करने से रेलवे को 10,000 करोड रु की बचत होगी। रेलवे को सरकार से हर साल लगभग 40,000 करोड रु की बजटीय सपोर्ट लेने के लिए 10,000 करोड चुकाने पडते थे। अब रेल बजट आम बजट का हिस्सा होने से रेलवे को यह रकम (डिविडेंट) नहीं देनी पडेगी। रेलवे का अलग से बजट पेश  करने की परंपरा ब्रिटिश  काल में सबसे पहले 1924 में  शुरु की गई थी। तब रेलवे रोजगार देने वाली भारत की सबसे बडी संस्था थी और इसका बजट अन्य सभी सरकारी संस्थाओं से कहीं ज्यादा था। इसी बिला पर तब रेलवे के बजटीय प्रावधानों को आम विभागों के बजटीय प्रावधानों से अलग किया गया था। देश  आजाद होने के बाद स्वदेशी  सरकार फिरंगियों की इस परंपरा को ढोती रही। इसकी प्रमुख वजह यह थी कि रेलवे अभी भी देश  में सबसे बडी नियोक्ता थी और इसका बजट भी अन्य उपक्रमों से कहीं ज्यादा विशाल था। मगर नब्बे के दशक में उदारीकरण के बाद स्थिति में काफी बदलाव आया। अब रेलवे देश  का सबसे बडा नियोक्ता नहीं रही और सरकार के और कई उपक्रम इससे बडे नियोक्ता हो गए थे। सर्विस सेक्टर के उभरने से यह सेक्टर सबसे बडा नियोक्ता बन गया था। इस स्थिति में अलग से रेल बजट की प्रासंगिकता नहीं रह गई थी। इस समय रेलवे की अपनी वित्तीय स्थिति काफी डांवाडोल है। सातवें वेतन आयोग के मुताबिक कर्मचारियों को संशोधित वेतनमान देने के लिए 40,000 करोड रु की जरुरत है और यात्री किराए में सब्सिडी देने के लिए 30,000 करोड की दरकार है। आम श्रेणी का यात्री किराया बढा नहीं सकते और अगर जैसे-तैसे बढाया भी तो भी एक-आध फीसदी से ज्यादा बढाया नहीं जा सकता जबकि रेलवे यात्री किराए पर 50 फीसदी सब्सिडी देता है। माल भाडे को बढाया जा सकता है मगर इतना भी नहीं कि इस बढोतरी से 70,000 करोड रु जुटाए जा सकें। इसके अलावा रेलवे को अपने नए और पुराने 458 प्रोजेक्टस पूरे करने के लिए 4.83 लाख करोड रु जुटाने है। रेलवे के पास यात्री किराया और माल भाडा बढाए के अलावा और कोई आय स्त्रोत नहीं है। ज्यादा से ज्यादा रेलवे अपनी खाली पडी संपति बेच सकता है। मगर संपति बेचकर भी कब तक गुजारा किया जा सकता है। इन सब बातों के  दृष्टिगत  बेहतर यही था कि रेल बजट को आम बजट में समाहित करके इसके लिए आम बजट से वित्तीय संसाधन जुटाए जाएं। अब रेलवे का राजस्व और पूंजीगत घाटा आम बजट में परिलक्षित होने से इसे खासी राहत मिलेगी। रेलवे के पुनर्गठन के लिए  बिबेक देबरॉय की अध्यक्षता में गठित नीति आयोग की समिति की सिफारिश  पर सरकार ने रेल बजट को अलग से पेश  करने  की परंपरा को खत्म किया  है। समिति का मानना था कि ब्रिटिश  सरकार के समय से चली आ रही इस परंपरा की अब कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। बहरहाल, आम बजट में रेल बजट के लिए अलग से प्रावधान होगा और संसद में इस पर अलग से चर्चा भी होगी। वित्त मंत्री अरुण जेटली के अनुसार इस कवायद से रेलवे की “कार्यात्मक स्वायत्तता“ (फंकशनल अटॉनॉमी) पर कोई असर नहीं पडेगा। भारतीय रेलवे दुनिया की सबसे बडी रेल सेवाओं में  शुमार है। देश  में नेटवर्क के प्रसार के लिए रेलवे को अविलंब अतिरिक्त संसाधन की दरकार है। रेलवे अपने बूते यह सब नहीं कर सकता। यह काम आम बजट में  बेहतर ढंग से किया जा सकता है।

बुधवार, 21 सितंबर 2016

आर्थिक अस्त्र शस्त्र बेहतर विकल्प

भारत को अगर दुनिया में अपना परचम फहराना है तो उसे अपनी आर्थिक ताकत को तेजी से मजबूत करना होगा और इसे इतना पैना एवं धारधार बनाना होगा कि वह अपने शत्रुओं पर जब चाहे प्रहार कर सके। आर्थिक प्रहार एकमात्र ऐसा अस्त्र है जिससे हम पाकिस्तान को पटखनी दे सकते है।  भारत इस समय अपने घुर प्रतिद्धंद्धी चीन से भी अधिक तेजी से आगे बढ रहा है और यही भारत का सबसे  मजबूत पायदान है, जिसके बूते वह चीन को भी पीछे छोड सकता है। पाकिस्तान की तो आर्थिक क्षेत्र मे भारत के समक्ष कोई औकात ही नहीं है। आतंक और कट्टरवाद में उलझा पाकिस्तान का सकल घरेलू उत्पाद अगले चार सालों में 2020 तक मात्र 2.5 फीसदी की दर से बढने की उम्मीद है। इसकी तुलना में भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) अगले चार सालों में 5.7 फीसदी के सालाना  दर से बढने की उम्मीद है। चीन के सकल घरेलू उत्पाद की सालाना  वृद्धि दर 4.8 फीसदी रहेगी। यानी भारत से लगभग एक फीसदी कम। भारत की जीडीपी में सालाना वृद्धि का यह आकलन गुडस एंड सर्विसिस टैक्स लागू होने से पहले का है। जीएसटी के लागू होने के बाद भारत के सकल घरेलू उत्पाद में डेढ से दो फीसदी बढोतरी होने की उम्मीद की जा रही है। और ऐसा हुआ तो भारत चीन समेत अन्य सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं  को भी काफी छोड देगा। मोर्गन स्टेनली की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अगले साल भारत और इंडोनेशिया की आर्थिक वृद्धि में सुधार होगा जबकि चीन और दक्षिण कोरिया की आर्थिक वृद्धि में गिरावट के आसार हैं। आतंक और मंदी ने पूरी दुनिया में इस समय खलबली मचा रखी है। मगर भारत में स्थायित्व कायम है और इससे उसकी आर्थिक वृद्धि और मजबूत हो सकती है। ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन  का कर्ज खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है और अगर कर्ज की रफ्तार यही रही तो अगले तीन साल में उसके समक्ष कर्ज का संकट खडा हो सकता है। कर्ज के मामले में भारत की स्थिति भी बेहतर नहीं है मगर भारत के पास दीर्घ-कालीन कर्जे ज्यादा हैं। सुखद स्थिति यह है कि कम  अवधि के विदेशी  कर्ज में 2. 5 फीसदी की गिरावट आई है। एक और अच्छी खबर यह है कि बेंकों की नई गैर-निष्पादित परिसंपतियां (नॉन परर्फोमिंग असेट्स-एनपीए) की रफ्तार  धीमी हो गई है और इससे बैंकिंग क्षेत्र मजबूत हो सकता है। बहरहाल, रविवार को जम्मू-कश्मीर  के उडी में सेना के ब्रिगेड मुख्यालय पर आतंकी हमले भारत का तिलमिलाना स्वभाविक है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान को दुनिया में अलग-थलग करने का  संकल्प लिया है और भारत ऐसा करने में सक्षम भी है। मगर पाकिस्तान को अलग-थलग किए जाने से भारत को आतंक का और ज्यादा खतरा हो सकता है। पाकिस्तान में अभी भी कटटरवादी आतंकी संगठनों की तूती बोलती है और वहां की सरकार अपने ही देश  में आतंकी घटनाओं को रोक नहीं पा रही है। पाकिस्तान में आए रोज बम फूटते हैं और निर्दोष  लोग मारे जा रहे हैं। सच यह है कि पाकिस्तान सरकार का आतंकी संगठनों पर कोई वश  नहीं चलता है। इस स्थिति में उससे भारत में फैलाए जा रहे आतंक से निपटने की कोई उम्मीद रखना नादानी है। तथापि पाकिस्तान को अलग-थलग करने से वहा की सरकार कमजोर होगी और आतंकी संगठनों को और ज्यादा ताकत मिलेगी। भारत के लिए यह स्थिति ठीक नहीं होगी। भारत क्यों चाहेगा कि उसके पडोस में सीरिया अथवा इराक जैसे हालात बनें? भारत के पास उसका आर्थिक शस्त्र पुख्ता विकल्प है। पाकिस्तान को आर्थिक और वाणिज्यिक तौर पर निर्भर बना कर भारत जब चाहे उसकी बांहें मरोड सकता है। कहते हैं आर्थिक अस्त्र-श स्त्र जबरदस्त प्रहार करते हैं और आर्थिक रुप से कमजोर व्यक्ति या मुल्क अक्सर कमर झुका कर चलता है।

खुद ही भस्म हो जाएगा (ना)पाक

   रविवार को जम्मू-कश्मीर  में सेना के उडी स्थित ब्रिगेड हैडक्वार्टर पर पाकिस्तानी आतंकियों के हमले से पूरा देश  जितना स्तब्ध था, उतना ही चिंतित भी। सुबह-सुबह सैन्य  हैडक्वार्टर पर हमला करके मुठ्ठी भर आतंकियों ने 17 सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया और तीस से ज्यादा को गंभीर रुप से जख्मी कर दिया। चारों आतंकी भी मारे गए। इस हमले की खबर फैलते ही पूरे देश  में गली-गली, घर-घर और सडक से सता के गलियारों तक एक ही आवाज उठी “ बस अब बहुत हो गया, पाकिस्तान को माकूल जवाब दिया जाए “। और अगर देश  के जनमानस की सुनी जाए, तो भारत को फौरन पाकिस्तान पर सैन्य हमला कर देना चाहिए, फिर चाहे इसके परिणाम कितने ही खतरनाक क्यों न होॅ। अगर पाकिस्तान पर हमला नहीं कर सकते हैं तो पिछले साल जिस तरह सेना ने म्यामार में घुसकर आतंकियों को मार गिराया था, वैसी सैन्य कार्रवाई तो की ही जा सकती है। मगर ऐसा करना आसान नहीं है। इससे पाकिस्तान के साथ युद्ध छिड सकता है। तथापि, सच्चाई यह भी है कि युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं है। दुनिया युद्ध के घातक परिणाम भुगत चुकी है। द्धितीय विश्व  युद्ध की विभीषिका के घातक परिणाम जापान के लोग आज भी भुगत रहे है। एशिया में सीरिया, इराक, अफगानिस्तान और यमन युद्ध में करीब-करीब तबाह हो चुके हैं और इन देशों  की आधी से ज्यादा आबादी भुखमरी की कगार पर है। कडवी सच्चाई यह है कि विज्ञान और  प्रोन्नत टकनॉलॅाजी के इस युग में पारंपरिक (कन्वेशनल) युद्ध की जगह रासायनिक हथियारो का युद्ध लडा जाएगा।  अगर भारत और पाकिस्तान के बीच रासायनिक हथियारों का युद्ध होता है,  दोनो देशो की अवाम को इसके बेहद खतरनाक परिणाम भुगतने पड सकते हैं। 1947 में विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच 3 युद्ध हो चुके हैं मगर इनसे किसी समस्या का हल नहीं हो पाया है। पाकिस्तान अपनी बेजा हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के फलस्वरुप पूर्वी पाकिस्तान  के अलग होकर बांग्लादेश के बनने के बाद भी पाकिस्तान ने कोई सबक नहीं सीखा है। सच यह है कि पाकिस्तान के सियासी और कटटरपंथी नेता भारत की तरक्की और खुशाहली से जलते हैं। इसीलिए भारत को अस्थिर बनाने की लगातार  कोशिश करते रहते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच 1800 किलोमीटर लंबी सीमा पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा खतरनाक बॉर्डर है, जहां दो न्यूक्लियर हथियारों से लैस ताकतों का हर रोज  शत्रुतापूर्ण  आमना-सामना होता है। इससे पूरी दुनिया चिंतित है। भारत 2004 के बाद से एक नए सैन्य सिद्धांत  (मिल्ट्री डाक्टराइन) “ कोल्ड स्टार्ट“ के तहत पाकिस्तान को रोकने की कोशिश  कर रहा है। इसके तहत जरुरत पडने पर भारत, पाकिस्तान  पर सीमित सैन्य कार्रवाई के लिए अपनी लगभग पांच लाख  सेना को 72 घंटों में लामबंद कर सकता है। पारंपरिक वॉर में भारत, पाकिस्तान पर बहुत ज्यादा भारी पडता है और उसे चंद घंटों में धूल चटा सकता है। इससे भयभीत पाकिस्तान  ने काफी मात्रा में रासायनिक हथियार जमा कर रखे हैं। पाकिस्तान बार-बार धमकी देता रहता है कि भारत को पाकिस्तान पर आक्रमण करने से रोकने के लिए वह रासायनिक हथियार इस्तेमाल कर सकता है। यानी पाकिस्तान पारंपरिक युद्ध की बजाए भारत से रासायनिक युद्ध लड सकता है। रासायनिक युद्ध न तो भारत की अवाम के हित में और न ही पाकिस्तानी अवाम के। चंद सिरफिरे लोगों के लिए अवाम को रासायनिक युद्ध की भठठी नहीं झोंका जा सकता। इसी जमीनी सच्चाई के दृष्टिगत  मोदी सरकार ने पाकिस्तान को कूटनीति से परास्त करने का  सही निर्णय लिया है। पाकिस्तान खुद आतंक की भीषण आग में जल रहा है और वह दिन दूर नही जब यह आतंकी देश  इस आग में जल कर भस्म हो जाएगा।

सोमवार, 19 सितंबर 2016

Whats There In Name? Very Much, Says Haryana

“नाम में क्या रखा है। गुलाब को किसी और नाम से पुकारे जाने पर उसकी महक खत्म नहीं हो जाती “, विख्यात लेखक विलियम शेक्सपियर का यह जुमला काफी लोकप्रिय है। मगर चंडीगढ में नए अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट  के नामकरण पर  हरियाणा महान लेखक  से इतेफाक नहीं रखता । अततः नाम ही तो है जो हमारी पहचान बताता है। चंडीगढ में अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट पर भी यह बात मौजू बैठती है। अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट का नाम चंडीगढ रखा जाए अथवा मोहाली, इस पर खासा विवाद है। हरियाणा चाहता है कि एयरपोर्ट का नाम चंडीगढ रखा जाए क्योंकि अंतरराष्ट्रीय  एयरपोर्ट पंजाब और हरियाणा का संयुक्त प्रकल्प है। हरियाणा ने इस एयरपोर्ट के निर्माण के लिए 250 करोड रु दे रखे हैं। यह रकम इसी शर्त पर दी गई थी कि अंतरराष्ट्रीय   एयरपोर्ट पर पंजाब और हरियाणा का बराबर का हिस्सा है। वीरवार को  अंतरराश्ट्रीय एयरपोट से षारजाह के लिए पहली इंटरनेषनल उडान के उदघाटन पर समाचार पत्रों में जारी विज्ञापनो में एयरपोर्ट  का नाम मोहाली अंतरराश्ट्रीय एयरपोर्ट बताया गया। इस एयरपोर्ट  के नाम को लेकर हरियाणा, पंजाब से पहले भी अपना ऐतराज जता चुका है। वीरवार को विज्ञापनो में पंजाब द्वारा अंतरराश्ट्रीय एयरपोर्ट का नाम मोहाली एयरपोर्ट  बताए जाने से क्षुब्ध हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पंजाब के मुख्यमंत्री को चिठ्ठी लिखकर अपना सख्त ऐतराज जताया है। हरियाणा का कहना है कि केन्द्र ने अभी इस एयरपोर्ट का नामकरण नहीं किया है। इस स्थिति में इसे मोहाली बताया जाना गलत है। वीरवार को पहली  अंतरराष्ट्रीय   के उदघाटन पर चंडीगढ आए केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री अषोक गणपति राजू ने भी माना कि केन्द्र ने अभी चंडीगढ एयरपोर्ट के नामकरण को अंतिम रुप नहीं दिया है। बहरहाल, पंजाब को इस एयरपोर्ट का नाम मोहाली एयरपोर्ट रखने की जल्दी है। राज्य में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे है और बादल सरकार एयरपोर्ट  को अपनी उपलब्धि बताकर चुनाव में भुनाना चाहती है। हरियाणा के लिए एयरपोर्ट का नाम काफी मायने रखता है। अगर 250 करोड रु देकर नाम भी  अपनी पसंद का नहीं रखवा पाए, तो खट्टर सरकार को विपक्ष की तीखी नुक्ताचीनी का सामना करना पड सकता है। एयरपोर्ट के निर्माण के लिए 250 करोड रु का योगदान हुड्डा सरकार के समय दिया गया था। सतलुज-यमुना लिंक परियोजना को खारिज किए जाने और किसानों को जमीन लौटाए जाने से  हरियाणा पहले ही  पंजाब से बेहद खफा है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री अंतरराष्ट्रीय  उडान के उदघाटन समारोह में शरीक तक नहीं हुए। इस स्थिति में अगर एयरपोर्ट का नाम मोहाली रखा जाता है, तो यह संदेश  जाएगा कि हरियाणा ने 250 करोड रु देने के बावजूद अपना हक छोड दिया है। पंजाब से कोई उम्मीद नहीं की  जा  सकती। सियासी हितों से विवश  पंजाब बहुत पहले हरियाणा से बडे भाई का फर्ज निभाना भूल चूका है। वैसे भी राजनीति में कोई  सगा नहीं होता।  जमीनी सच्चाई यह है कि इस समय पंजाब और हरियाणा के बीच भारत-पाकिस्तान जैसी दीवार खडी हो चुकी है।  केन्द्र ही हरियाणा की आखिरी उम्मीद है। केन्द्र में भाजपा नीत राजग  की सरकार है हालांकि  शिरोमणि अकाली दल सरकार का अहम हिस्सा है। राजग में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश  सिंह बादल का राजनीतिक काफी ऊंचा है। हरियाणा के लिए पंजाब से अंतरराष्ट्रीय  के नामकरण की जंग जीतना  आसान नहीं है। अब तक इंटर स्टेट मामलों मे केन्द्र का रवैया “ गंगा गए गंगा राम, यमुना गए यमुना दास” जैसा  रहा है। मोहाली एयरपोर्ट  मामले में भी ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सक्ती। कम-से-कम विधानसभा चुनाव तक तो कतई नहीं।   

The Great Indian Samajwadi Drama!

उतर प्रदेश  में “नेता जी“ मुलायम सिंह यादव की पारिवारिक कलह सत्तारूढ समाजवादी पार्टी को आने वाले विधानसभा में भारी पड सकती है। अगर घर के झगडे गल्ली-मोहल्ले में आ जाएं, तो  सिर्फ जंग हंसाई ही होती है। यदुवंशी  परिवार की यह कलह पार्टी को कहां ले जाएगी, इसका जबाव तो समय के गर्भ  में छिपा है पर राज्य के युवातम मुख्यमंत्री अखिलेश  यादव अपने चाचा शिवपाल यादव के साथ “करो या मरो“ की लडाई जरुर लड रहे हैं। सपा ने अखिलेश  यादव को देश  के सबसे बडे राज्य का मुख्यमंत्री तो बना दिया गया मगर परिवार ने उनके हाथ भी बांध दिए।  पिछले साढे चार साल से कभी पिता, तो कभी ताऊ तो कभी चाचा, सब के सब अपने-अपने सियासी हित साध रहे थे। ऐसे पद का क्या फायदा अगर  मुख्यमंत्री न तो अपनी पसंद का सचिव रख सकें और न ही मुख्य सचिव। पिता मुलायम सिंह यादव बार-बार अपमानित करते। कभी मंत्रियों के समक्ष तो कभी  सार्वजनिक मंचों पर भी। खनन मंत्री गायत्री प्रजापति जैसे मुलायम सिंह के मुंह लगे  मंत्री भ्रष्टाचार  में   संलिप्त होने के बावजूद प्रमोशन-दर-प्रमोशन पाते रहे। प्रजापति को ही लें। सबसे पहले राज्य मंत्री बने, फिर स्वतंत्र प्रभार हथिया लिया और अततः केबिनेट मंत्री बन गए। सब नेताजी की कृपा से। इस तरह के और भी कई उदाहरण है। इसी तरह करप्श्न  के कई मामलों में जांच का सामना कर रहे दीपक सिंघल को अखिलेश राज्य का मुख्य सचिव नहीं बनाचा चाहते थे ,पर मुलायम सिंह और चाचा  शिवपाल के दबाव में उन्हें ऐसा करना पडा। इस पर अखिलेश  खून का घूंट पीकर रह गए।   मगर हर चीज की एक हद होती है और “बहुत ज्यादा तंग करने पर“ गाय भी सींग मारने लगती  है। इस 15 अगस्त को अखिलेश  यादव का धैर्य भी जबाव दे गया। उस दिन पिता मुलायम सिंह यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं के समक्ष दागी मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता का समाजवादी पार्टी में विलय का मुखर विरोध करने के लिए अखिलेश  यादव को बुरी तरह से फटकारा। बस इससे अखिलेश  का सब्र का बांध टूट गया और बगावत की नींव रखी गई। अखाडे के पहलवान मुलायम सिंह यादव के बारे यह धारणा है कि उन्हें पल-पल की खबर रहती है मगर इस बार मुलायम भी गरचा खा गए। पुत्र अखिलेश  ने मुलायम के खासमखास गायत्री प्रजापति और राज सिंह किशोर को मंत्रिमंडल से हटा दिया और  दीपक सिंघला की जगह राहुल भटनागर को मुख्य सचिव बना दिया। मुलायम को इसकी कानोंकान भनक तक नहीं लगी और उन्होंने खुद माना कि मंत्रियों की बर्खास्तगी की खबर उन्हें मीडिया से मिली। इस कार्रवाई से तिलमिलाए मुलायम ने बेटे अखिलेश  को पार्टी अध्यक्ष पद से ही हटाकर अपने भाई  शिवपाल को पार्टी की कमान सौंप दी। अखिलेश   शिवपाल को तो पार्टी अध्यक्ष पद से हटा नहीं सकते थे, क्योंकि यह अधिकार राष्ट्रीय  पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह के पास है, मगर मुख्यमंत्री ने  शिवपाल से सभी मलाईदार विभाग लेकर उन्हें समाज कल्याण जैसा अदना महकमा सौंप दिया। मुलायम ने सुलह-सफाई के लिए दिल्ली बैठक बुलाई मगर अखिलेश इस बैठक में नहीं आए। इस सारे खेल में अमर सिंह का हाथ भी बताया जा रहा है। अमर सिंह छह साल पार्टी से बाहर रहने का दर्द नहीं भूल पाए हैं। उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में अखिलेश  की अहम भूमिका रही है। बहरहाल, “दी ग्रेट इंडियन समाजवादी ड्रामे में, कौन विभीषण है और कौन लक्ष्मण, इस सच्चाई से पार्टी कार्यकर्ता बखूबी वाकिफ है और वे यह भी जानते है कि इस पारिवारिक कलई में पार्टी की छवि खराब हुई है। यदुवंशी  परिवार में एकता है तो समाजवादी पाटी का वजूद है। अगर परिवार में दरार आती है, तो पार्टी का टूटना तय है।

आक्रामक पंजाब कांग्रेस



विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खडे पंजाब में सत्ता की प्रमुख दावेदार कांग्रेस इन दिनों खासी आक्रामक मुद्रा में नजर आ रही है। कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रदेश  अध्यक्ष और चरणजीत सिंह चन्नी के कांग्रेस विधायक दल नेता बनने के बाद यह बदलाव आया है।  कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब में कांग्रेस के एकमात्र ऐसा नेता है जो विधनसभा चुनाव में पार्टी की नैया पार लगा सकते हैं। कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव से पहले कैप्टन को प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष बनाने के साथ-साथ चरणजीत सिंह चन्नी को विधायक दल का नेता बनाकर जातीय समीकरण बैठाने की भरपूर कोशिश  की है। राज्य की कुल आबादी में लगभग 32 फीसदी अनुसूचित जाति हैं और 25 फीसदी जाट सिख। चरणजीत सिंह चन्नी अनुसूचित जाति से हैं और कैप्टन अमरिंदर सिह जाट सिख। राज्य की 57 फीसदी आबादी से संबंधित नेताओं को संगठन के शीर्ष  पदों पर स्थापित करके कांग्रेस ने खासा संतुलन बैठाया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह को राज्य कांग्रेस की कमान सौंपने से पहले कांग्रेस मरणासन्न स्थिति में थी। 2012 के विधानसभा चुनाव के बाद राज्य में जितने भी उप-चुनाव हुए, कांग्रेस एक भी जीत नहीं पाई और हर उप-चुनाव में हार का अंतर भी खासा भारी रहा। लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस का कोई अच्छा प्रदर्शन  नहीं रहा मगर कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी लहर में अमृतसर लोकसभाई सीट से भाजपा के दिग्गज नेता अरुण जेटली को एक लाख से भी ज्यादा अंतर से हराकर पार्टी की लाज बचा ली। बहरहाल, मौजूदा विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस का आक्रमक रुख और संघर्ष  का मादा  स्पष्ट संकेत  दे रहा है कि पार्टी अब सदन से सडक तक हर मुकाम पर लोगों के लिए किसी भी तरह की कुर्बानी देने को तैयार है। अमूमन, कांग्रेस नेताओं के बारे यह माना जाता रहा है कि लंबे समय तक सत्ता का सुख  भोगते-भोगते वे आरामप्रस्त हो गए हैं और उनमें लडाई लडने का मादा नहीं रहा। मगर कांग्रेस के विधायक पिछले तीन दिन से जिस तरह विधानसभा के भीतर धरने पर बैठे रहे, उससे यह धारणा ध्वस्त हो गई है। कांग्रसियों ने साबित कर दिया है कि जरुरत पडने पर पार्टी सडक से सदन तक लंबा  संघर्ष  कर सकती है और अभी भी उनमें  संघर्ष   का जबरदस्त मादा है। समकालीन सियासत की भी यही मांग है। जनमानस अब सियासी पार्टियों के चुनाव की बेला पर लोक-लुभावने वायदों से आजिज आ चुका है। मतदाता  अब थोथे और  कोरे वायदे नहीं, राजनीतिक दलों से ठोस नतीजे चाहता है और वह राजनीतिक दलों को इन्ही मानदंडो  पर जांच-परख भी रहा है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने बिजली और पानी की लडाई लडी थी और इसी के नतीजतन जनता ने पार्टी को प्रचंड जनादेश  दिया था। पंजाब में कांग्रेस के पास जनता के लिए संघर्षरत  रहने के सिवा और कोई चारा नहीं है। एक जमाने में देश  का खुशाहलतम प्रांत आज मादक पदार्थों की लत से बुरी तरह से पीडित है। देहातों में 70 फीसदी से भी ज्यादा युवा को नशे  की लत पड चुकी है। गुरु नानक देव वूनिवर्सिटी के एक अध्ययन अनुसार  राज्य के 70 फीसदी युवाओ कों नशे की लत है क्योंकि पंजाब में मादक पदार्थ  आसानी से उपलब्ध है। राज्य के दस मेंसे हर चौथा व्यक्ति नशे  की चपेट में है।  65 फीसदी परिवार नशे  की समस्या से बुरी तरह से पीडित हैं और टूटने की कगार पर है। दुखद  स्थिति  यह  है कि राज्य सरकार सभी सियासी दलों को साथ लेकर  नशे  के खिलाफ अभियान चलाने की बजाए राज्य को नशामुक्त साबित करने में जुटी है। कांग्रेस को अगर पंजाब की जनता का विष्वास जीतना है, तो राज्य को नशा मुक्त बनाना पार्टी के चुनावी घोषणा पत्र की उच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। और अब विधानसभा सत्र खत्म होते ही कांग्रेस को जनमानस की समस्याओं के लिए सडकों पर  उतरना पडेगा। 

बुधवार, 14 सितंबर 2016

पानी आग भी लगाता है!

आज की समस्या कल पर टाल देना अथवा यूं कहा जाए 'अपने सिर की बला, दूसरे पर मढ देना' हमारी पुरानी आदत है। नतीजतन, एक दिन ऐसा भी आता है कि छोटी सी समस्या विशालकाय बनकर हमने निगलने के लिए मुंह फाडे हमारे सामने खडी हो जाती है। और समस्या भी इतनी विकराल कि पानी आग बुझाने की बजाए आग लगाने का काम करता है। दक्षिंण भारत के दो पडोसी राज्य कर्नाटक और तमिल नाडु के बीच कावेरी नदी के पानी बंटवारे को लेकर जारी विवाद यही प्रमाणित करता है। लगभग सौ साल से भी ज्यादा समय से जारी कावेरी नदी जल बंटवारा विवाद लटकते-लटकते आज इस नाजुक स्थिति पर पहुंच गया है कि कर्नाटक के लोग देश  की सर्वोच्च अदालत के फैसले को भी मानने को तैयार नहीं है। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक को तमिल नाडु के लिए दस दिन अतिरिक्त पानी जारी करने के निर्देश  दिए जाने के बाद राज्य में विरोध की आग भडक गई और पुलिस को उपद्रवियों पर फायरिंग तक करनी पडी।  इसमें एक की मौत हो गई। मंगलवार को राजधानी बंगलुरु के कई हिस्सों में कफर्यू  लगाना पडा। बंगलुरु को देश  में इंफॉर्मेषन टकनॉलॉजी (आई टी) का डेस्टिनेशन माना जाता है और यहां हर छोटी-बडी आईटी कंपनी का दफ्तर है। ऐसोचैम का आकलन है कि कावेरी नदी विवाद के कारण बंगलुरु बंद से अब तक आईटी कंपनियों को 20 से 25,000 करोड रु का नुकसान हो चुका है। और अगर हालात जन्द  सुधरे नहीं तो नुकसान और ज्यादा बढ सकता है। हालात सुधरने की उम्मीद नजर नहीं आ रही है। राज्य सरकार ने अपने हाथ खडे कर दिए हैं। हालात बिगडते देख मंगलवार को राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने प्रधानमंत्री से हस्तक्षेप करने की मांग की है। सिद्धारमैया  चाहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी तमिल नाडु की मुख्यमंत्री जयललिता से बातचीत कर समस्या का सर्वमान्य हल निकाले। और इस समस्या का हल भी यही है कि केन्द्र को दोनों राज्यों को साथ-साथ बैठाकर कोई स्थायी हल निकालना चाहिए। मगर इसमें पेंच यह है कि कोई भी राज्य अपने हक की एक बूंद पानी छोडने को तैयार नही है। और अगर सियासी नेता मान भी जाएं, तो भी जनता कतई तैयार नहीं है और पानी की एक-एक बूंद के लिए मरने-मारने पर आमादा हो जाते हैं। पंजाब और हरियाणा में लंबे समय से जल विवाद है मगर पंजाब के लोग अपने हिस्से से एक भी बूंद हरियाणा को देने को तैयार नहीं है। इस मामले में आए दिन एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने वाले नेता एक मंच पर इक्ठ्ठे हो जाते हैं। कावेरी जल विवाद की जड भी यही है। 802 किलोमीटर लंबी कावेरी नदी लगभग 54 फीसदी तमिल नाडु के हिस्से में बहती है और 42 फीसदी कर्नाटक के। साढे तीन फीसदी केरल में और थोडी बहुत पुडुचेरी में भी। मगर कावेरी नदी प्रमुखता तमिल नाडु और कर्नाटक की जल धारा है। कावेरी नदी के जल के बलबूते तमिल नाडु तीन लाख हेकेटेयर क्षेत्र को सिंचाई की निश्चित सुविधा मुहैया करा चुका है। और अब पानी की एक बूंद भी छोडने को तैयार नही है। कर्नाटक का कहना है कि 1892 और 1924 के दोनों ही अनुबंध तत्कालीन मद्रास प्रेजीडेंसी के पक्ष में थे । इसलिए वह इन्हें नहीं मानता। लंबे समय तक दोनों राज्यों में विवाद चलता रहा और जब नहीं सुलझा, 1990 में केन्द्र ने कावेरी जल विवाद के लिए पंचाट गठित किया। 16 साल की सुनवाई के बाद पंचाट ने फरवरी 2007 में फैसला सुनाया मगर संबंधित राज्यों ने इसे भी नहीं माना। और अब कर्नाटक की जनता सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी मानने से इंकार कर रही है और सरकार द्वारा तमिल नाडु को अतिरिक्त पानी रिलीज करने का हिंसक विरोध कर रही है। बहरहाल, कानून-व्यवस्था स्थिति से निपटना राज्य सरकार का काम है मगर केन्द्र को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी और समस्या का सर्व मान्य हल निकालना होगा।

मंगलवार, 13 सितंबर 2016

नहीं चाहिए सरकार का खजाना लुटाने वाले

देश  का अन्नदाता माने जाने वाले पंजाब की दयनीय वित्तीय स्थिति के लिए राज्य के सियासी दल प्रमुख रुप से जिम्मेदार है। चुनाव जीतने के लिए “आसमान से तारे तोड कर“ लाने का वायदा करते-करते सियासी दलों ने पंजाब को वित्तीय कंगाली की कगार पर ला खडा कर दिया है। और इस स्थिति के बावजूद सियासी दल सरकारी खजाने को  लुटाने से बाज नहीं आ रहे है। और अब औरों से कुछ अलग करने का दम भरने वाली आम आदमी पार्टी भी इस कडी में अन्य सियासी दलों के साथ जुड गई है। रविवार को आम आदमी  पार्टी के  राष्ट्रीय  संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का चुनावी घोषणा  पत्र (  इलेक्शन  मेनिफेस्टो) जारी करते हुए किसानों से लेकर सरकारी कर्मचारियो और आम आदमी को लुभाने के लिए वायदों की झडी लगा दी। गरीब किसानों के सारे कर्जे माफ कर दिए जाएंगे। इतना ही नहीं अगर आप की सरकार बनती है तो पार्टी बडे किसानों के ब्याज भी माफ कर देगी। इसके अलावा किसानों का पांच लाख तक का मुफ्त बीमा कराया जाएगा। किसानों को 12 घंटे मुफ्त बिजली दी जाएगी। प्राकृतिक आपदा के समय बीस हजार एकड का मुआवजा देने का भी वायदा किया गया है। किसानों को 12 घंटे मुफ्त बिजली, आटा-दाल, शगुन जैसी लोक-लुभावनी स्कीमों का दायरा बढाने का वायदा करके आम आदमी पार्टी  शिरोमणि अकाली दल से भी आगे निकल गई है। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल ने 31 वायदे किए हैं और इन्हें अक्षरश : पूरा करने के लिए पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश  का संयुक्त बजट भी कम पड सकता है। गरीब किसानं के कर्ज माफ करने के लिए ही 85,000 करोड रु की दरकार होगी जबकि पंजाब का अपना राजस्व भी इतना नहीं है। पंजाब पर पहले ही 1.15 लाख करोड कर्ज  का बोझ है और सरकार एक सीमा तक ही कर्ज  ले सकतौ है। 12 घंटे मुफ्त बिजली और रियायती दरों पर  आटा-दाल स्कीम के लिए ही कम-से-कम 15 हजार करोड रु की जरूरत पडेगी। आप सरकार अपने वायदे पूरा करने के लिए इतना धन कहां से जुटाएगी, मेनिफेस्टो में इस बात का कोई उल्लेख नहीं है। वैसे, केजरीवाल ने सबसे पहले अपना  मेनिफेस्टो जारी करके अन्य सियासी दलों को पीछे छोड दिया है। इससे उनका तिलमिलाना स्वभाविक है। कांग्रेस ने आप के मेनिफेस्टो को पार्टी का कार्बन कॉपी करार दिया है। कांग्रेस का कहना है कि प्रदेश  कांग्रेस अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले ही किसानों के कर्जे माफ करने का वायदा कर चुके हैं। शिरोमणि अकाली दल का आरोप है कि केजरीवाल को किसानों की समझ ही नहीं हैं। अभी राज्य के प्रमुख राजनीतिक दलों- शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस- का मेनिफेस्टो आना बाकी है। आप के लोक-लुभावने वायदों  का इन दलों के मेनिफेस्टो पर असर पडना तय है और सभी दल मतदाताओं को लुभाने के लिए एक-दूसरे से आगे निकलने की हर संभव कोशिश  करेंगे। बहरहाल, पंजाब में सत्ता पाने के लिए अरविंद केजरीवाल ने भी अन्य राजनीतिक दलों की तरह सबसे आसान रास्ता चुना है। दिल्ली में केजरीवाल  ने आम आदमी की लडाई लडी थी, इसलिए वे जनता के प्रिय बने थे। पंजाब में वे ऐसा कोई करिश्मा   नहीं कर पाए है।। इसके विपरीत  सुच्चा सिंह छोटेपुर प्रकरण से पार्टी को जबरदस्त झटका लगा है। छोटेपुर प्रकरण से लग रहा था कि पंजाब में आप विधानसभा चुनाव से पहले ही बिखर जाएगा मगर केजरीवाल ने स्थिति काफी हद तक संभाल ली है। पंजाब में छोटा किसान आप के साथ है और अब बडे किसानों को ब्याज माफ करने का वायदा करके केजरीवाल ने इस तबके को भी लुभाने की कोशिश  की है। यह बात दीगर है कि  राज्य की खस्ता माली हालत से बडे-बडे तो क्या, छोटे-मोटे वायदे भी पूरे नहीं किए जा सकते। पंजाब को इस समय राज्य के खजाना लूटाने वाला नहीं, बल्कि इसे बचाने वाला नेता चाहिए।  

झटके पर झटका

दिल्ली में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई आम आदमी पार्टी के “अच्छे दिन“ नहीं चल रहे हैं। सच कहा जाए तो अरविंद केजरीवाल सरकार के “अच्छे दिन“ आए ही नहीं। कभी मंत्री का स्केंडल, तो कभी विधायकों की एक-के-बाद दूसरी गिरफ्तारी अथवा पार्टी में बगावत। सता में आते ही पार्टी का एक मंत्री फर्जी डिग्री में धर लिया जाता है। फिर खाद्य मंत्री असीम अहमद खान को भ्रष्टाचार  के आरोपों में बर्खास्त कर दिया जाता है। अभी इसकी आग ठंडी भी नहीं पडी थी कि एक दूसरा मंत्री सेक्स स्केडल में गिरफ्तार कर लिया जाता है। सात मंत्री  है, तीन बर्खास्त हो चुके हैं।  पार्टी को सत्ता में आए अभी जुम्मा-जुम्मा डेढ साल भी नहीं हुआ है कि “आप“ के 11 विधायक जेल की हवा खा चुके हैं। दिल्ली उव्च न्यायालय के फैसले के बाद 21 विधायकों पर अयोग्यता की तलवार लटक रही है। पिछले वीरवार को दिल्ली उच्च न्यायालय ने 21 विधायकों की संसदीय पद की नियुक्ति इस बिला पर निरस्त कर दी कि मुख्यमंत्री ने उप-राज्यपाल की अनुमति नहीं ली थी। अरविंद केजरीवाल ने पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय पद से नवाजा था। मंत्रिमंडल का आकार सीमित (कुल विधायकों का 10 फीसदी, केन्द्र में 15 फीसदी) रखना कानूनन अनिवार्य  है। 70 सदस्यीय  विधानसभा वाली दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री सहित सात से ज्यादा मंत्री नही बनाए जा सकते। इस बंदिश  के चलते अरविंद केजरीवाल ने भी औरों की तरह कानून को ठेंगा दिखाने वाला रास्ता अख्तियार किया और 21 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त कर दिया। नियमानुसार ऐसा करने के लिए मुख्यमंत्री को उप-राज्यपाल की अनुमति लेना कानून सम्मत था। उप-राज्यपाल से उनकी बनती नहीं है, इसलिए वे जानते थे कि इन्हें संसदीव सचिव नियुक्त करने की अनुमति नहीं मिलेगी। इस तरह अरविंद केजरीवाल ने दो-दो गैर-कानूनी काम किए। एक ओर 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर संवैधानिक व्यवस्था का मखौल उडाया, तो दूसरी ओर उप-राज्यपाल को दरकिनार अपनी पावर्स का बेजा इस्तेमाल किया। इसे  दिल्ली अभी भी केन्द्रीय शासित प्रांत है और उप-राज्यपाल ही यहां सर्वोसर्वा है। दिल्ली पुलिस केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है। यह बात अरविंद केजरीवाल और इनके साथी अच्छी तरह जानते थे। पूर्व मुख्यमंत्री  शीला दीक्षित पूरे 15 साल इस बात के लिए लडती रही।  और केजरीवाल अगर नही जानते थे, कानूनी  विषेज्ञयों की  राय ली जा सकती थी। मगर केजरीवाल ने ऐसा नहीं किया और खुद वही काम किया जिसके लिए वे विरोधियों की मुखर आलोचना करते रहे हैं। अरविंद केजरीवाल पंजाब में बादल सरकार को सता की भूखी और  भ्रष्ट  करार देते-देते अघाते नहीं है। मगर केजरीवाल ने दिल्ली में वही किया, जो पंजाब में मुख्यमंत्री प्रकाश  सिंह बादल ने किया। बादल ने अगर 117 सदस्यीय विधान सभा वाले पंजाब में 24 मुख्य संसदीय सचिव बनाए, तो केजरीवाल ने 70 सदस्यीय विधानसभा वाली दिल्ली में 21 संसदीय सचिव नियुक्त कर पंजाब को भी पीछे छोड दिया। फिर अरविंद केजरीवाल और प्रकाश  सिंह बादल में क्या फर्क रह जाता है? और अगर खुदा-ना-खास्ता पंजाब में आप सत्ता में आ जाती है, तो केजरीवाल दिल्ली की तरह राज्य में मुख्य संसदीय सचिव की फौज खडी नहीं करेंगे, इस बात की क्या गारंटी  है ? अरविंद केजरीवाल की कार्यशैली से साफ पता चलता है कि उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। अब तक उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया जो  मुख्यधारा की सियासत से अलग नजर आए। इसके विपरीत केजरीवाल भी समकालीन स्वार्थी और सता-लोलुप सियासी नेताओं की रंगत में रंग चुके है। केजरीवाल में न तो सब को साथ लेकर चलने का मादा हैं और न ही उनमें संवैधानिक परिधि में काम करने की इच्छा शक्ति है। एक के बाद एक सहयोगी  का पार्टी छोडना अथवा निकाला जाना यही साबित करता है।  पंजाब में पार्टी की मौजूदा बगावत से आप का ग्राफ काफी नीचे गिरा है। पार्टी की खींचतान, भ्रष्ट  मानसिकता और नेताओं के विवादास्पद आचरण ने पंजाब के लोगो को समय रहते आगाह कर दिया है।   

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

Digital India Can Take Country To New Height

भारत को अगर तेज रफ्तार से प्रगति करनी है तो सवा सौ करोड लोगों को हर हाल में जल्द से जल्द  आधुनिक डिजिटल टकनॉलॉजी से सुविधा-सपन्न करना होगा। इन दिनों मुकेश  अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो की पूरे देश  में धूम मची हुई है। सदी के महानायक अमिताभ बच्चन टीवी चैन्लस पर रिलायंस जियो के लिए प्रधानमंत्री के डिजिटल इंडिया के सपने को साकार करने का संकल्प दोहरा रहे हैं।  इस विज्ञापन को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री पर रिलायंस के लिए मॉडलिंग करने का तंज भी कसा है। तथापि, महानायक के इस विज्ञापन में देश  की डिजिटल इंडिया को लेकर मौजूदा स्थिति का पता  चलता है। देश  को अभी इस दिशा  में लंबा सफर तय करना है और टेलिकॉम कंपनियां इस सफर को आरामदायक और सफल बनाने में महत्वपूृर्ण भूमिका निभा सकती है। निसंदेह, टेलीकॉम कंपनियों नें देश  में संचार क्रांति लाने में महत्वपूर्ण  भूमिका निभाई है। संचार क्रांति आने से देश  के कोने-कोने में मोबाइल, डिजिटल टीवी और इंटरनेट की सुविधा पहुंची है। इंटरनेट के आने से चिठ्ठी लिखने का चलन करीब-करीब खत्म हो चुका है। दुनिया के किसी भी कोने में चटपट ई-मेल अथवा एसएमएस से फौरन संदेश  भेजे जा सकते हैं। इंटरनेट ने वाकई ही पूरी दुनिया को ग्लोबल विलेज बना दिया है। इस स्थिति के  दृष्टिगत देश  को डिजिटल बनाने में कोई ज्यादा परेशानी  नहीं आनी चाहिए। देश  ने इस ओर कदम भी बढा दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जुलाई, 2015 में डिजिटल इंडिया की नींव रखी थी। इस कार्यक्रम के तीन पायदानों  पर सरकार प्राथमिकता से काम कर रही है। डिजिटल बुनियादी ढांचे का सृजन करना पहला पायदान है। इसके तहत देश  के कोने-कोने में इंटरनेट और वाई-फाई की सुविधाएं सृजित करना है। देश  संचार क्रांति के दौरान पहले ही बुनियदी सुविधाओं का मजबूत ढांचा तैयार कर चुका है। अब इसे और ज्यादा व्यापक और सुदृढ बनाना है। डिजिटल सेवाओं की सुनिश्चित  डिलीवरी देना इस कार्यक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पायदान है। रिलायंस और उस जैसी टेलिकॉम कंपनियों का इसमें प्रमुख योगदान रहेगा। डिजिटल साक्षरता इस कार्यक्रम का तीसरा पायदान है और यह सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण  है। देश  में अभी भी लगभग 20 फीसदी लोग साक्षर नहीं है। इस स्थिति में पहले इन लोगों को साक्षर करना होगा और इसके बाद उन्हें डिजिटल साक्षर किया जा सकता है। वैसे विशेषज्ञों को भरोसा है कि डिजिटल साक्षरता की मदद से देश  के बकाया निरक्षरों को भी साक्षर किया जा सकता है। आधिनुक टकनॉलॉजी के कारण ही लोग अपना राजस्व संबंधी सारा रिकार्ड  आनलाइन जांच-परख सकते हैं। इससे लोगों के समय की बचत भी हुई है और पटवारी के नखरों से भी निजात मिली है। अब डिजीलॉकर के माध्यम से ड्राइविंग लाइसेंस, गाडी की आरसी, इंसोयरेश  आदि साथ रखने की जरुरत भी नहीं है। मोबाइल पर एक क्लिक से डीएल और आरसी सामने आ जाएगी। इंटरनेट ने हमारी जीवनषैली को वास्तव में कभी आसान और उपयोगी बना दिया है। अब दुनिया के किसी भी हिस्से अथवा किसी भी विषय  की कोई भी सूचना अथवा जानकारी एक क्लिक से इंटरनेट से हासिल की जा सकती है। विकसित देश  आधुनिक टकनॉलॉजी का भरपूर फायदा उठा रहे है। वैश्विक मंदी में भी उन्नत प्रोद्योगिकी के दमखम पर कमजोर अर्थव्यवस्थाएं सरवाई कर पाई हैं। भारत के लिए डिजिटल सुविधाएं आगे बढने का सुनहरा मौका है। मात्र चार साल बाद 2020 में भारत दुनिया का युवातम देश  बन जाएगा। देश  का औसत नागरिक 29 साल का युवा होगा और शहर में ही बसेगा। मगर इस  अमूल्य मानव संपदा का सही दिशा  और कार्य में उपयोग करने के लिए देश  को रोजगार के अधिकाधिक अवसर सृजित करने होंगे। इतने कम समय में यह तभी मुमकिन है अगर डिजिटल इंडिया पर तेजी से काम हो।

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

Populist Measures During Election Year Is Sort Of Corruption.



चुनाव आते ही राजनीतिक दलों को आम आदमी की चिंता सताने लगती है और उसे लुभाने के लिए “आसमान से तारे तक तोड कर“ लाने का वायदा कर डालते हैं। और कई वायदे तो ऐसे होते हैं जिन्हें पूरा करने के लिए “ भामा  शाह का खजाना“ भी खाली पड जाए। लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने विदेशों  में छिपाए गए काले धन को स्वदेश  लाकर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रु जमा कराने का वायदा (झांसा) किया था जबकि यह कतई मुमकिन नहीं था। बेचारा आम आदमी इसे सच मान बैठा और आज भी इस विषाल राशि को पाने की उम्मीद लगाए बेठा है। इसी तरह तब प्रधानमंत्री का “ अच्छे दिन आएंगे“ का नारा बच्चे-बच्चे की जुबान पर था। यह वायदा भी “झांसा“ ही निकला। फिर बिहार के विधानसभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने राज्य के लिए केन्द्रीय मदद का पिटारा खोल दिया था और कई हजार करोड रु की आर्थिक मदद की घोषणा की थी। देश  के संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिससे प्रधानमंत्री सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लुटाए। राज्यों को किस मद्द से कैसे आर्थिक मदद दी जाती है, इसका भी पूरा हिसाब-किताब होता है। केन्द्र और राज्यों में संसाधनों के बंटवारे के लिए बाकायदा संवैधानिक बॉडी वित्त आयोग है और वही राज्यों को आर्थिक मदद के बंटवारे का फार्मूला तय करता है। राज्यों को  विशेष  दर्जा और पैकेज देने का काम भी वित्त आयोग ही करता है। वार्षिक  और पंचवर्षीय  योजनाओं का आकार और प्रकार नीति आयोग (पहले योजना आयोग) तय करता है। राज्यों को परियोजनाओं के लिए  हर साल पेश  होने वाले आम बजट में  धन का प्रावधान कर लिया जाता है। प्रधानमंत्री के पास सिवा “ आपातकालीन  राहत“ के अलावा ऐसा कोई फंड नहीं है, जिससे किसी राज्य विशेष  को अलग से आर्थिक मदद दी जा सके। तथापि विधानसभा चुनाव के दौरान विशेष मदद दिए जाने की रिवायत बदस्तूर जारी है। लगभग चार माह बाद (जनवरी-फरवरी, 2017) उत्तर प्रदेश , पंजाब और उत्तराखंड समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस बात के दृश्टिगत हर सियासी  दल दिल खोलकर मतदाताओं को लुभा रहा है और अनाप-शाप वायदे किए जा रहे हैं । कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश  में किसानों की “खाट सभा“ में पार्टी की सरकार आने पर कर्ज माफी की घोषणा  की जबकि इस योजना से पहले ही सरकारी बैंकों का  दिवाला निकल चुका है। बैंकों से किसानों को कर्ज तय मानदंडों के हिसाब से मिलता है और कर्ज की अदायगी न करना दंडनीय अपराध है। लेकिन राजनीतिक दलों की कर्ज माफी वायदे के कारण किसानों के कर्ज अदायगी न करने के मामले बढे हैं। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2015 के बीच राष्ट्रीयकृत बैकों ने 2.11 लाख करोड रु के कर्ज माफ किए है और पिछले तीन साल में 1.14 लाख करोड रु के कर्ज माफ किए गए हैं। इससे देश  के 28 सरकारी बैंक दिवाला होने की कगार पर हैं। दुनिया के किसी भी देश  में ऐसा नहीं हो रहा है। अगर कर्ज  माफ ही किए जाने है तो क्यों न किसानों को सीधी आर्थिक मदद दी जाए ?   बैंकों ने किन लोगों के कर्ज  माफ किए गए, आरबीआई और बैंक यह जानकारी देने को तैयार नहीं है मगर माना जाता है कि अधिकतर किसान कर्ज माफी श्रेणी के हैं। कर्ज माफी ही नहीं, पंजाब में किसानों को मुफ्त में बिजली और अन्य कई रियायतें दी जा रही है। बहरहाल, सरकारी खजाना जुटाकर अथवा लोक-लुभावने वायदे करके चुनाव लडना लोकतंत्र का सबसे बडा मजाक है। लेवल-प्लेइंग फील्ड, निष्पक्ष , स्वतंत्र और लोभ-लालच से ऊपर मतदान ही स्वस्थ लोकतंत्र की बुनियाद है। लोक-लुभावने वायदों से जीता गया चुनाव सिर्फ पूरी व्यवस्था को ही  भ्रष्ट   कर रहा है। देश  के निर्वाचन आयोग को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। चुनावी साल  में लोक-लुभावने वायदों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

जी 20ः एक-दूसरे को घूरने का मंच

       जी 20:  एक-दूसरे को घूरने का मंच
पुरानी कहावत है, “जाको पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई“। भारत के पडोसी और दुनिया की दूसरी सबसे  विशाल  अर्थव्यवस्था चीन को अब पता चला कि आतंक से कोई भी अछूता नहीं है। इस सप्ताह चीन के हांग्जो में जी-2  शिखर सम्मेलन से ठीक पहले 30 अगस्त को किर्गिजस्तान की राजधानी बिशकेक में चीनी दूतावास में आत्मघाती विस्फोट ने चीन को सकते में डाल दिया था। चीन ने इस घटना की कडी भर्त्सना करते हुए आतंक फैलाने वाली की भी कडी निंदा की। पिछले करीब डेढ दशक से  अमेरिका सरीखे ताकतवर देश  समेत पूरी दुनिया आतंक से परेशान है। अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी समेत छोटे-बडे सभी मिलकर  आतंक से  निपटने की वकालत करते रहे हैं मगर चीन इस मुद्दे को अब तक टालता रहा है। इसकी प्रमुख वजह यही थी कि इस सदी के आरंभ तक चीन अपेक्षाकृत आतंक से अछूता रहा। अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकी संगठनों की चीन में घुसपैठ नहीं हो सकी हालांकि  झिंजियांग प्रांत में उईघुर मुस्लिम अलगाववादियों का क्रूर चीनी दमन बदस्तूर जारी रहा । चीन की आत्म-केन्द्रित राजनीतिक व्यवस्था आसानी से किसी बाहरी संगठन को अपने यहां घुसने की अनुमति नहीं देती थी। पिछले एक दशक में चीन में काफी बदलाव आया है और चीन अब खासी उदार अर्थयवस्था बन कर उभरी है। जिस तरह पहले अमेरिका को छींक आने पर पूरी दुनिया को जुकाम हो जाता था, उसी तरह अब चीन में पता हिलने पर दुनिया में भूंकप आ जाता है। समकालीन वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन की खासी उपस्थिति है। 2013 के त्यानआनमेन चौक और 2014 के कुनमिंग  हमले के बाद चीन ने आंतरिक चौकसी बढा दी थी। दोनों आतंकी हमले  उईघुर मुस्लिम अलगाववादियों द्वारा किए गए थे। इसके बाद से चीन में  आतंकी हमले नहीं हुए मगर किर्गिज गंणतंत्र के हमले ने चीन को भी आतंक का मिलकर मुकाबला करने के लिए विवश  किया है। उज्बेकिस्तान के  राष्ट्रपति इस्लाम करीमोव के निधन से भी क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा उत्पन्न हो गया है और चीन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकता है। हांग्जो जी 20 शिखर सम्मेलन में पहली बार चीन ने भी माना कि आतंक दुनिया के लिए मंदी अथवा स्लोडाउन से भी बडी चुनौती है। चीन आतंक से भले ही उतना पीडित नही है मगर पर्यावरण असंतुलन और ग्लोबल वार्मिंग के फलस्वरुप उपजी घनी धुंध ने चीन को खासा परेशान कर रखा है। बढती  आबादी के बाद घनी धुंध चीन की दूसरी बडी समस्या है। बहरहाल हांग्जो जी 20  शिखर सम्मलेन की सबसे बडी उपलब्धि यही है कि दुनिया के बीस ताकतवर देशों ने आतंक और ग्लोबल वार्मिग को आर्थिक मोर्चे के लिए भी सबसे बडा खतरा माना है।  वैश्विक अर्थव्यवस्था को तेजी से आगे बढने के लिए जरुरी है कि दुनिया में पूरी तरह से अमन-चैन व्याप्त हो। भूखमरी, सूखे और महामारी से निपटने के लिए ग्लोबल वार्मिंग को रोकना अपरिहार्य है। हांग्जो में इन सब मुद्दों पर चर्चा  हुई और आर्थिक विषमताओं को कम करने और आतंक से लडने के लिए मिलकर काम करने का संकल्प लिया गया। जलवायु परिवर्तन पर भी चर्चा  हुई। चीन और अमेरिका ने पेरिस संधि पर हस्ताक्षर भी किए मगर  वैश्विक आर्थिक समस्याओं से निपटने के लिए कोई कारगर उपाए नहीं सुझाए गए। इसके विपरीत शिखर सम्मेलन में अविश्वास  और तनाव साफ -साफ नजर आया। अमेरिका के  राष्ट्रपति ओबामा ने अपने रुसी समकक्ष पुतिन को जिस तरह से घुर कर देखा, उससे लगता नहीं है जी-20 में किसी तरह की एकता है। भारत और चीन के बीच हाल ही में दूरियां बढी है। प्रधानमंत्री मोदी ने  शिखर सम्मलेन में आतंक के पनाहगार पाकिस्तान पर हमला बोला तो चीन बगले झांकने लगा। ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने माइग्रेंट  मुद्दे पर कडा रूख अपनाया। ऐसे माहौल में लफ्फाजी के सिवा किसी ठोस नतीजे की उम्मीद नहीं की जा सकती।

मंगलवार, 6 सितंबर 2016

अलगाववादियों से यही उम्मीद थी

       
जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेताओं ने दिल्ली से घाटी आई सर्व दलीय टीम के नेताओं को दरवाजे पर से लौटा कर अपनी मंशा  साफ कर दी है। भला  पाकिस्तान के एजेंट दुनिया की जनन्त कश्मीर में अमन-चैन लौटा कर अपनी दुकानदारी बंद क्यों करेंगे?  कश्मीर के  अलगाववादी नेता पाकिस्तान की ही जुबान बोलते हैं,  उसके लिए काम करते हैं और इसके लिए उन्हें पाकिस्तान से खुली आर्थिक मदद भी मिलती है। जिस तरह आतंकी होता है और उसका कोई दीन-ईमान नहीं होता, उसी तरह अलगाववादी भी पूरी तरह अलगाववादी होता है और अपने “आकाओं“ को खुश  रखना ही उसका दीन और ईमान होता है। कश्मीर के अलगाववादी  न तो पहले कभी भारत के हितैषी  थे और न ही कभी होंगे। रविवार को दिल्ली से 26 सदस्यीय सर्व- दलीय टीम के कुछ सदस्यों ने अपना सियासी धर्म  निभाया। श्रीनगर पहुंचते ही सबसे पहले टीम के पांच सदस्य अलगाववादी और हुर्रियत कॉफ्रेंस के नेता सईद अली गिलानी,  मीरवाइज उमर फारुख, यासीन मलिक और अब्ब्दुल गनी बट से मिलने गए । सभी ने मिलने से यह कहकर मना कर दिया कि वार्ता  में पहले पाकिस्तान को  शामिल करो, तभी बातचीत होगी। ये वही नेता हैं, जो पाकिस्तान के किसी नेता के दिल्ली आने पर दौडे-दौडे वहां  हाजिरी लगाने पहुंच जाते हैं। दिल्ली में पाकिस्तान के उच्चायोग के बुलावे पर सिर के बल चलकर जाते हैं। पर भारतीय सांसदों के सर्वदलीय सदस्यों से मिलने से उन्हें खासा परहेज है। इस तरह के रवैए र्से  यही संदेश  जाता है कि कश्मीर के अलगाववादी नेता  सिर्फ और सिफ  पाकिस्तानी हैं।  सईद अली गिलानी ने खिडकी से सांसदों को आते देखा और उन्हें दरवाजे से ही लौटा दिया कश्मीरी सभ्यता में घर आए दुश्मन  की भी खातिरदारी की जाती है मगर अलगाववादी नेता इसे भी भूल गए जैसे उन्हें सभ्यता से कोई सरोकार नहीं है। जम्मू-कश्मीर  की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने बतौर पीडीपी प्रमुख न्योता भेजकर अलगाववादी नेताओं को वार्ता  के लिए बुलाया था मगर इसे भी ठुकरा दिया गया। स्पष्ट  है अलगाववादी नेता अपना राजनीतिक कद बढाने और पाकिस्तान से ज्यादा से ज्यादा मदद ऐंठने के लिए भाव दिखा रहे हैं। अब सवाल यह है कि सरकार और सर्व-दलीय नेता अलगाववादियों को खामख्वाह इतनी अहमियत क्यों दे रहे थे जबकि उनकी नीयत और तबियत दोनों ही पाकिस्तानी है। हुर्रियत नेता सईद अली लंबे समय तक अलगाववादी दलों के गठबंधन हुर्रियत कॉफ्रेस के मुखिया रहे है।   गिलानी का बेटा और बेटी पाकिस्तान में डाक्टर है। यासीन मलिक की पत्नी पाकिस्तानी है और पाकिस्तानी चैनल्स पर भारत के खिलाफ खूब आग उगलती है। मीरवाइज उमर फारुख कश्मीरी  मुसलमानों के धार्मिक नेता माने जाते हैं मगर वे  धार्मिक कम सियासत में ज्यादा सक्रिय हैं और हुर्रियत के साथ जुडे हुए हैं। रविवार को मीरवाइज ने सर्वदलीय टीम के सदस्यों को अपने दरवाजे तो खोले मगर दो मिनट में ही बातचीत निपटा दी। अब सरकार का कहना है कि न तो केद्र सरकार ने और नही राज्य सरकार ने अलगावादी नेताओं से वार्ता के लिए बुलाया था और न ही एजेंडे में ऐसा कोई प्रस्ताव था। महबूबा मुफ्ती ने मुख्यमंत्री की हैसियत से नहीं बल्कि पीडीपी अध्यक्ष बतौर हुर्रियत नेताओं को वार्ता  के लिए बुलाया था। बहरहाल, अलगाववादी नेताओं के ताजा रवैये से साफ है कि घाटी में षांति बहाली के लिए हुर्रियत कॉफ्रेंस से किसी तरह की अपेक्षा रखना बेकार है। इसके विपरीत राज्य में हिंसा फैलाने और कश्मीर में राजनीतिक  शून्यता बनाए रखने में अलगाववादियों की प्रमुख भूमिका है। कश्मीर  की अवाम  शांति चाहती है। हिसा और कर्फ्यू के माहौल ने  कश्मीर अवाम को भूखमरी की कगार पर ला खडा कर दिया है, मगर सर्वदलीय टीम का खाली हाथ लौटने से  कश्मीरी हताश  हो सकते है। सरकार और  सर्वदलीय टीम को अवाम से सीधे बातचीत कर उनका दिल जीतना होगा। यही अलगाववदियों को निष्क्रिय करने का एकमात्र रास्ता है।  

सोमवार, 5 सितंबर 2016

क्या मिलता है हडताल से?

पिछले  शुक्रवार को बैंक, बीमा, टेलीकॉम, ट्रांसपोर्ट और आम आदमी से जुडी सेवाओं के कर्मचारियों की हडताल से कई राज्यों में जनजीवन प्रभावित हुआ । हडताल का आहवान वामपंथी दलों और कांग्रेस से सम्बद्ध श्रमिक संगठनों ने किया था, इसलिए इसका असर केरल और कर्नाटक में काफी ज्यादा रहा। केरल में वाम मोर्चे की सरकार और कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने  हडताल में खुलकर श्रमिक संगठनों का साथ दिया । वैसे आम आदमी को यह बात वास्तव में अटपटी लगेगी कि सरकार खुद जनजीवन को प्रभावित करने  वाली हडताल का समर्थन करे। हडतालियों का साथ देने का सीधा-सीधा अर्थ है कि सरकार स्वंय हडताल पर है। मगर वस्तुस्थिति, यही है कि हर श्रमिक संगठन किसी-न-किसी राजनीतिक दल से जुडा होता है और उसका रिमोट कंट्रोल भी सियासी नेताओ के हाथ में रहता है। इसीलिए, केरल और कर्नाटक में जनजीवन बुरी तरह से अस्त-व्यस्त रहा और इसके लिए दोनों राज्यों की सरकारें प्रमुख रुप से जिम्मेदार हैं। कर्नाटक में स्कूल और कॉलेजिज बंद कर दिए गए। कई राज्यों में नर्सें और रेडियोजिस्ट्स भी हडताल पर रहे जिससे मरीजों को खासी परेशानी उठानी पडी हालांकि हडताली नर्सों ने आपातकालीन सेवाएं जारी रखी।  हडताल में क्योंकि  राष्ट्रीय  स्वंयसेवक संघ से संबद्ध भारतीय मजदूर संघ ने हिस्सा नहीं लिया, लिहाजा भाजपा षासित राज्यों में इसका कोई ज्यादा असर नही पडा।  और बीमा और टेलीकाम सेक्टर्स में हडताल का असर काफी ज्यादा रहा। इन क्षेत्रों में वामपंथियों से सम्बद्ध ट्रेड यूनियंस का खासा दबदबा है। शुक्रवार की हडताल में 18 करोड श्रमिकों ने हिस्सा लिया। श्रमिक संगठन  देश  के करोडों कामगारों के लिए रिटायरमेंट के बाद पेंशन जैसी पुख्ता सामाजिक सुरक्षा की मांग  कर रहे हैं। सरकार ने न्यूनतम वेतन बढाने और दो साल का बोनस देने का वायदा किया था मगर श्रमिक संगठनों ने इसे नहीं माना। कामगार संगठनों का आरोप है को मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से श्रमिक कानूनों में खासी ढील देकर इन्हें पूंजीपतियों के माफिक बनाया गया है। देश  के कामगारों को इस बात का भी गिला है कि  सांसद और विधायक अपने लिए पूरी सामाजिक सुरक्षा का प्रबंध कर चुके है। हर सांसद और विधायक एक बार निर्वाचित होने पर भी पेंशन का हकदार हो जाता है मगर दिन-रात ताउम्र पसीना बहाने के बावजूद  कामगार के लिए कोई सामजिक सुरक्षा नही है। श्रमिकों की इस मांग में काफी वजन है। विकसित देशों  में रिटायरमेंट के बाद कर नागरिक के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा है मगर भारत में सांसदों और विधायकों के अलावा अब सरकारी कर्मचारियों की पेंशन सुविधा भी बंद कर दी गई है। बहरहाल, लोकतंत्र में विरोध करने सभी को अधिकार है मगर काम छोडकर सडकों पर उतरकर जनजीवन अस्त-व्यस्त करना न तो श्रमिकों के हित में है और न ही देश  के।  18 करोड श्रमिकों की हडताल से देष को न्यूनतम 108 करोड घंटों के काम का नुकसान उठाना पडा है। इसकी भरपाई करना आसान नहीं है। इस नुकसान की राशि  से लाखों कामगारों का भला हो सकता था। विरोध करने के और भी कई तरीके हैं। इस मामले में जापान से सीख ली जा सकती है। जापान के श्रमिक संगठनों का भरसक प्रयास रहता है कि उनकी हडताल से जनता को कोई परेशानी  न हो। जापान के एक अग्रणी अखबार ने 2015 में “ क्या जापान में हडताल (स्ट्राइक) लुप्तप्राय हो गई है“ शीर्षक  से एक लेख प्रकाशित  किया था। लेख के शीर्षक से ही पता चलता है कि इस मुल्क में हडताल भारत की तरह आम नहीं है। विरोध करना मानव के खून में है और उसे जब भी मौका मिलता  है, वह अपनी दबी आवाज को बुलंद करता  है । तथापि, ऐसे विरोध का क्या फायदा जो अपना ही नुकसान करे। देश  में जब-तब होने वाली हडतालें मूल मुद्दों पर कम, सियासी हितों को लेकर ज्यादा फोक्स रहती है। इससे सिर्फ  देश  का ही नुकसान हो रहा है।

सिंगूर में “झींगुर“

                
पायल की छनक जैसी मधुर आवाज निकालने वाले प्रकृति के सिपाही झींगुर रात के गहन सन्नाटे को संगीतमय बनाते हैं मगर अधिकतर लोग इनकी आवाज से परेशान हो जाते हैं। कहते हैं प्रकृति से लय स्थापित करने के लिए झींगुर की आवाज को समझना जरुरी है। दस साल तक पश्चिम  बंगाल में सिंगूर में किसानों की हालत भी झींगुर जैसी ही थी। किसान जबरी भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आवाज उठाते रहे मगर तत्कालीन वामपंथी सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।  सर्वहारा वर्ग के लिए लडने का दावा करने वाले कॉमरेड पूंजीपति के साथ हो लिए और टाटा की नैनो कार के लिए किसानों की जमीन का जबरी अधिग्रहण किया गया। कुल मिलाकर 997 एकड जमीन का अधिग्रहण किया गया। इस मेंसे 400 एकड जमीन उन 2200 किसानों की थी, जो अपनी “मां“ समान भूमि को बेचने अथवा अधिग्रहण के सख्त खिलाफ थे। तब किसानों के सघर्ष  में ममता “दीदी“ ने उनका भरपूर साथ दिया। और ममता बनर्जी को इसका फल भी मिला। पश्चिम  बंगाल में तीन दशक से भी ज्यादा समय से सत्ता पर कुंडली मार कर बैठे वाम मोर्चे को बेदखल करना कोई आसान काम नहीं था मगर सिंगूर की लडाई से ममता बनर्जी  पश्चिम बंगाल के राजनीतिक क्षितिज पर इस कद्र छा गई कि अकेली महिला ने पूर वाम मोर्चे की चूलें तक हिला दी। वाम पंथी आज तक अपने जख्मों को सहल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट  ने पिछले बुधवार को स्पष्ट  व्यवस्था दी   कि सिंगूर में किसानों की जमीन का अधिग्रहण कानून सम्मत नहीं था और वामपंथी सरकार ने भूमि अधिग्रहण एक्ट 1894 (2013 में संशोधित) का घोर उल्लंघन किया गया। देश  की  शीर्ष  अदालत की व्यवस्था से साफ है कि तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य सरकार को सिंगूर में नैनो कार प्रोजेक्ट लगवाने की इतनी जल्दी थी कि आनन-फानन में कायदे-कानून का भी पालन नहीं किया गया।  पूंजीपति बनाम सर्वहारा के नजरिए से  समाज का आकलन करने वाले कम्युनिस्ट अगर पूंजीपतियों के मित्र बन जाएं तो रहा-सहा समाजवाद भी लडखडा जाता है। समाजवाद औद्योगिकरण की मुखालफत नहीं करता है, अगर इससे सर्वहारा वर्ग का शोषण  नहीं हो। समस्या यह है कि पूंजीपति व्यवस्था में पूरा जोर पूंजी उन्मुख  तौर-तरीकों पर होता है। इस व्यवस्था में रोजगार के अवसर का कम होना और श्रमिकों का शोषण  किया जाना आम बात है। तथापि, इक्कीसवीं सदी आते-आते वामपंथी भी “सेलेक्टिव“ पूंजीवादी व्यवस्था के पक्ष में हो गए थे। पश्चिम  बंगाल की वामपंथी सरकार को राज्य में औद्योगिकरण की जल्दी थी। तब टाटा समूह के नैनो प्रोजेक्ट को अपने-अपने क्षेत्र में स्थापित करवाने के लिए राज्यों में होड लगी हुई थी।  औद्योगिकरण के मामले में  पश्चिम बंगाल का पलडा आज भी अन्य राज्यों पर  तुलनात्मक भारी पडता है। सस्ती लेबर, नजदीकी बंदरगाह और अन्य सुविधाएं  माकूल तौर पर उपलब्ध है। उस पर वामपंथी खुद टाटा समूह को राज्य में नैनो प्रोजेक्ट लाने का न्योता दे रहे थे। वामपंथी से जुडे श्रमिक संगठनों की आए दिन की हडताल से आजिज अधिकतर उधोग  पश्चिम बंगाल  से पहले ही पलायन कर चुके थे। इस बात के दृष्टिगत  वामपंथी सरकार हर हाल में टाटा समूह को राज्य में लाने के लिए जोर लगा रही थी। औद्योगिकरण कोई गलत काम नहीं है मगर किसानों की उपजाऊ जमीन का उधोग लगाने के लिए जबरी अधिगृहीत करना वास्तव में किसान विरोधी कदम है। इस जमीन का 2006 में अधिग्रहण किया गया था। तब भूमि अधिग्रहण कानून में संषोधन नहीं हुआ था। संप्रग सरकार ने 2013 में फिरंगी सरकार के समय के किसान विरोधी 1894 के एक्ट में संशोधन करके नया कानून बनाया है। इसके तहत किसानों की सहमति के बगैर उसकी जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। दस साल के  शासन में संप्रग सरकार  का यह क्रांतिकारी जनहित फैसला था। सिंगूर के किसान इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं।
या जा सकता। दस साल के षासन में संप्रग सरकार  का यह क्रांतिकारी जनहित फैसला था। सिंगूर के किसान इस बात को अच्छी तरह समझ चुके हैं। 

गुरुवार, 1 सितंबर 2016

निरपेक्ष से गुट-सापेक्ष की ओर

भारत और अमेरिका के बीच दस साल की जद्दोजेहद के बाद अंततः सैन्य करार हो ही गया। मंगलवार को अमेरिका के रक्षा मंत्री एश्टन  कार्टन और भारत के विदेश  मंत्री मनोहर पर्रिकर ने लॉजिस्टिक एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (लेमोआ) पर हस्ताक्षर कर सैन्य क्षेत्र में एक नई ऐतिहासिक  शुरुआत की है। ताजा समझौते के तहत दोनों देश  एक-दूसरे के थल, वायु और नौसैनिक अड्डों, ईंधन सुविधाएं और अन्य सैन्य उपकरणों का इस्तेमाल कर पाएंगे। इससे दोनों देशों की सामरिक सैन्य ताकत बढेगी। मगर दोनों देश  एक-दूसरे के क्षेत्र में सैन्य अड्डे नहीं बना पाएंगे। मगर कालांतर में दोनों देश  इस बात पर भी विचार कर सकते हैं। सैन्य सुबिधाओं का इस्तेमाल दोनों देशों  के कायदे-कानून अनुसार ही किया जाएगा। वैसे आधुनिक सामरिक रणनीति सैन्य अड्डो को बनाने की जरुरत नहीं समझती। मित्र और सहयोगी देशों  में सैन्य अड्डे बनाने की अमेरिकी रणनीति ज्यादा कारगर साबित नहीं हो पाई है। इससे क्षेत्रीय तनाव ही बढा है। बहरहाल, भारत और अमेरिका के बीच सैन्य सहयोग से पाकिस्तान और चीन का तिलमिलाना स्वभाविक है। चीन शिद्द्त से पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत की सामरिक घेराबंदी में लगा हुआ है। यही वजह है कि वह भारत के हर सामरिक मूव पर बौखला जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा बलूचिस्तान के पक्ष में बोलने पर भी चीन को मिर्ची लग गई । और अब भारत-अमेरिका सैन्य सहयोग से चीन की चिंता बढ गई है। इसकी प्रमुख वजह है कि ताजा सैन्य सहयोग सेे दुनिया को स्पष्ट  संदेश  गया है कि भारत अब गुट-निरपेक्ष की नीति से बाहर आ गया है। अब तक भारत देश  के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की गुट-निरपेक्ष नीति पर चल रहा था। मोदी सरकार ने  नेहरु की विदेश  नीति में आखिर कील ठोंक कर इसे दफना दिया है। मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग करके  भारत के भरोसेमंद मित्र रुस को भी दुत्कारा  है। भाजपा मूलतः दक्षिणमार्गी राजनीतिक पार्टी है और वह समाजवादी रुस की अपेक्षा पूंजीवादी अमेरिका के ज्यादा करीब है। गुट-निरपेक्षता ने भारत को दुनिया में एक अलग पहचान दी थी हालांकि न्यूक्लियर पॉवर बनने की होड और  वारसा संधि एव साम्यवादी व्यवस्था के टूटने एवं बाई-पोलर विश्व  के खत्म होते ही गुट-निरपेक्ष मूवमेंट की प्रासंगिकता ही जाती रही। चीन की विस्तारवादी नीति का माकूल जवाब देने के लिए अमेरिका अथवा रुस के साथ मिलकर सैन्य सहयोग करना  भारत की सामरिक जरुरत है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा रुस की बजाए अमेरिका को ज्यादा विश्वसनीय मानते हैं। अमेरिका के अलावा जापान, विएतनाम और दक्षिण कोरिया भी चीन की विस्तारवादी नीति के मुखर विरोधी हैं।  चीन की विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए अमेरिका ज्यादा प्रभावी है। दक्षिण चीन सागर पर अंतरराश्ट्रीय पंचाट के फैसले का जिस तरह से चीन अनादर कर रहा है, उसके दृष्टिगत चीन के विस्तारवादी मुखौटे का अनुमान लग जाता है। अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए चीन किसी भी हद तक जा सकता है। ताजा समाचारों के अनुसार चीन ने पाकिस्तान को पांच अरब डॉलर में 6 अत्याधुनिक पन्नडुब्बियां देने का करार किया है। भारत-अ्मेरिका रक्षा समझौता दोनों देशों  की सामरिक रिश्तों को और मजबूत करता है। भारत, अमेरिका के जितना ज्यादा करीब जाएगा, विस्तारवादी चीन उतना ही ज्यादा बौखलाएगा। अमेरिका के साथ बढ्ते  ऱिश्तों  का सीधा असर पाकिस्तान पर भी पडता है। पाकिस्तान को उतरोतर अमेरिका मदद काफी कम हो गई है। तथापि अमेरिका रक्षा समझौते के साथ कुछ खतरे भी हैं। अमेरिका आर्थिक और सैन्य दोनों ही  दृष्टि  से दुनिया की सबसे बडी ताकत है और वह सामरिक तौर पर दुनिया की सबसे बडी ताकत बनना चाहता है। भारत को इस तरह के खतरों से सचेत रहना होगा।