"पहाडों की रानी" शिमला में पेयजल के भीषण संकट ने इस साल फरवरी में दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन के संकट की याद तरोताजा कर दी है। नदी-नालों जैसे जल स्त्रोंतों से समृद्ध पहाडी इलाकों में भी अगर पेयजल संकट हो, तो मैदानी इलाकों की बदहाली का अनुमान लगाया जा सकता है। 2015 के भयंकर सूखे के बाद से केप टाउन में पेयजल के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी और फरवरी 2018 आते-आते इस अफ्रीकी शहर में पानी की सप्लाई (डे जीरो) पूृरी तरह बंद हो चुकी थी। आपतकालीन हालात को देखते हुए केप टाउन के लोगों को पानी की खपत को 50 फीसदी तक कम करना पड रहा है और पीने के लिए बूंद-बूंद बचानी पड रही है। हालांकि शिमला का पेयजल संकट केप टाउन जैसा भीषण नहीं है, पर शिमला और पेयजल संकट से पीडित सभी शहरों, बस्तियों और ग्रामीण इलाकों को यही करना पडेगा। सभी को पीने के लिए माकूल पानी मुहैया हो, हर परिवार को पानी से जुडी जरुरतों को कम करना और रियूज और रिसाइकिल को आजमाना पडेगा। शिमला से केप टाउन तक जिस तरह से पीने के पानी के लिए मारी-मारी हो रही है, उससे इस आकलन को बल मिलता है कि तीसरा विष्व युद्ध “पीने के पानी के लिए लडा जाएगा“। जिस गति से पेयजल के स्त्रोत सूख रहे हैं और भूमिगत जल स्तर दोहन के स्तर से भी नीचे जा रहा है, उस हिसाब से 2025 तक दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी को पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसना पडेगा। पानी की जरुरत सिर्फ पीने के लिए नहीं होती है, खेतों को सिंचने के लिए कहीं ज्यादा होती है। जैसे-जैसे नदी नालों में पानी कम होता जाएगा, पानी के लिए मारा-मारी बढेगी और नेशंस, स्टेट्स, लोकल बॉडीज, यहा तक कि गांव-गांव, घर-घर पानी के लिए:युद्ध“ जैसे हालात उत्पन्न हो जाएंगे। पंजाब, हरियाणा को पानी नहीं देना चाहता। कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को कर्नाटक और तमिल नाडु में सालों से “युद्ध“ छिडा हुआ है। गांव में अपने स्त्रोत से दूसरे को पानी ले जाने के लिए लठ्ठ चल पडते हैं। धरती पर 75 फीसदी पानी की मौजूदगी के बावजूद मात्र 3 फीसदी से भी कम ताजा पानी (फ्रेश वाटर) उपलब्ब्ध है। दुनिया में एक अरब आबादी को पीने का पानी उपलब्ध नही हे और 2.7 अरब आबादी को साल में एक माह पीने के पानी के लिए तरसना पडता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार विश्व के 500 बडे शहरों मेंसे हर चौथा शहर पीने के पानी की समस्या से जूझ रहा है। बीजिंग, बंगलुरु, लंदन, मास्को, काहिरा और जकार्ता समेत दुनिया के 11 बडे शहर केप टाउन की तरह जल्द ही पीने के पानी से महरुम हो जाएंगे। संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि 2030 तक पानी की मांग सप्लाई से 40 फीसदी ज्यादा हो जाएगी। बहरहाल, भारत में हर सरकार ने लोगों को पीने का पानी मुहैया कराने के लिए एक के बाद दूसरी स्कीम लागू की है। 1971 में पहली बार केन्द्र सरकार ने त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम ( एआरडब्ल्यूएसपी) की शुरुअात हुई थी। 1986 में केन्द्र ने पीने की पानी की गुणवता बढाने के लिए नेषनल ड्रिकिंग वाटर मिशन चलाया था। 1991 में इसका नाम बदल कर राजीव गांधी ड्रिकिंग वाटर मिशन रखा गया। 1999 में केन्द्र सरकार ने पेयजल परियोजनाओं में कम्युनिटी सहभागिता के लिए सेक्टर रिफॉर्म प्रोजेक्ट को लांच किया और फिर 2002 में इसका नाम “स्वजल धारा“ रखा गया। 2005 में शुरु की गई भारत निर्माण योजना में पेयजल कार्यक्रम को उच्च प्राथमिकता दी गई। 2009 में त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति योजना को बदल कर नेशनल ड्रिकिंग वाटर प्रोग्राम रखा गया। मोदी सरकार का पेयजल के साथ-साथ स्वच्छता (सेनीटेशन्) पर भी जोर रहा है, इसलिए अब पीने के पानी के अलवा स्वच्छता संबंधी परियोजनाए लागू की जा रही हैं। देश में इस समय 57,400 पेयजल परियोजनाएं चल रही है मगर लोग फिर भी प्यासे हैं।
गुरुवार, 31 मई 2018
कोबरा पोस्ट का “डंक“
Posted on 1:36 pm by mnfaindia.blogspot.com/
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर आज भारतीय पत्रकारिता जगत के “धुरधंर“ समाचार पत्र समूहों को लेकर कोबरा पोस्ट वेबसाइट के स्टिंग ऑपरेशन का उल्लेख करना चाहुंगा। “ऑपरेश न 136“ के नाम से कोबरापोस्ट के इस “स्टिंग “ में प्रेस की आजादी की पोल खोली गई है। स्टिंग ऑपरेशन का नाम 136 इसलिए रखा गया है क्योंकि 2017 में प्रैस फ्रीडम में पूरे विश्व में भारत 136वें पायदान पर था। कोबरापोस्ट का यह स्टिंग ऑपरेशन भारत में प्रेस फ्रीडम की स्थिति का सही आकलन है। कोबरापोस्ट का दावा है कि देश के बडे मीडिया समूह “ सतारूढ दल“ के हाथ बिके हुए हैं और मीडियाकर्मी और उनके “आका“ पैसा लेकर भाजपा का राजनीतिक एजेंडा आगे बढाने के लिए राजी होते दिखाई दे रहे हैं। इन मीडिया समूहों में टाइम्स ऑफ इंडिया, न्यू ईंडियन एक्सप्रैस, इंडिया टूडे और खरबपति मुकेश अंबानी समेत कई न्यूज चैनल्स शामिल हैं। इसीलिए नामी-गिरामी मीडिया समूहों ने कोबरा पोस्ट के इस खुलासे का ब्लैकआउट (चुनिंदा प्रिंट, वायर और स्कॉर्ल को छोडकर“) किया है। दुनिया के सबसे बडे लोकतंत्र में सियासत और धन्ना सेठों की कैदी “पत्रकारिता“ से ऐसी ही अपेक्षा है। इस प्रकरण ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि भारत वाकई ही “बनाना रिपब्लिक“ है और इस देश में अभिव्यक्ति की आजादी दूर की कौडी है। कोबरापोस्ट के अंडरकवर पत्रकार ने धार्मिक व्यक्ति के छदम वेश धारण कर इस स्टिंग ऑपरेशन को अंजाम दिया। वैसे वीडियो पर आधारित इस तरह के स्टिंग ऑपरेशन की विश्वसनीयता हमेशा संदेह के दायरे में रहती है। संपादन तकनीक के जरिए वीडियो से छेडछाड और वार्तालाप को अपनी सुविधानुसार तोड-मरोड कर पेश किया जा सकता है और अक्सर ऐसा होता है। तथापि कोबरा पोस्ट की इस ऑपरेशन की विश्वसनीयता को टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिवर्स स्टिंग ऑपरेशन करके सही साबित किया है। टीओआई समूह अब यह स्पष्टीकरण दे रहा है कि कोबरा पोस्ट के अंडरकवर पत्रकार की गैर-व्यवसायिक गतिविधियों की कलई खोलने के लिए समाचार पत्र समूह ने कोबरा के पत्रकार को ट्रैप करने के लिए भाजपा से मोल-तोल करने की बातें मानीं थी। इस बात पर कौन विश्वास करेगा। अगर ऐसा था तो समय रहते ब्लैकमैल करने वाले पत्रकार और वेबसाइट का पर्दाफाश क्यों नहीं किया गया? टीआईओ भी यह बात मानेगा कि पत्रकार बिरादरी में ईमानदार और समर्पित लोग ज्यादा हैं, बुरे एक दुक्के हैं और पूरी बिरादरी का यह कर्तव्य बनता है कि ऐसे लोगों को नंगा किया जाए और पत्रकारिता की “पवित्रता“ को हर हाल में बरकरार रखा जाए। इस स्टिंग ऑपरेशन में इस बात का भी खुलासा किया गया है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने कश्मीर में पत्थरबाजों की पहचान के लिए पेटीएम से डाटा मांगा था हालांकि कंपनी अब इस बात से मुकर रही है। अपनी बात से पलटना भारतीयों की फितरत है। हर भुक्तभोगी पत्रकार इस बात की ताकीद करेगा। कोबरापोस्ट साइट स्ंिटग ऑपरेशन करके बडे-बडे खुलासे करने के लिए जाना जाती है और मीडिया अक्सर इन खुलासों को नजरांदाज करता रहा है। बहरहाल, पत्रकारिता में आज बहुत बडा बदलाव आ चुका है। पत्रकारिता अब मिशन नही रही है। समाचार पत्र ब्रांड बन चुके हैं और उन्हें अब खोजी अथवा ईमानदारों पत्रकारों की जगह ब्रांड एम्बैसडरों की जरुरत है। व्यापरी और मुनाफाखोर मिशनरी हो नहीं सकते। मुनाफाखोर को अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता से कोई सरोकार नहीं होता है। इस स्थिति मे स्वस्थ और निष्पक्ष पत्रकारिता तो दीगर रही, सूचनात्मक पत्रकरिता भी बरकरार रहे तो गनीमत समझिए।
बुधवार, 30 मई 2018
कंगाली की कगार पर पाक
Posted on 6:07 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आतंक को पालते-पालते, चीन से दोस्ती निभाते-निभाते पाकिस्तान कंगाली की कगार पर पहुंच गया है। उसका सर्वजनिक कर्ज लगातार बढ रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था बहुत खराब दौर से गुजर रही है। आंतरिक हालात नाजुक हैं और सेना और सरकार के बीच दूरियां लगातार बढ रही हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी मुद्रा लगातार कर रही है। अमेरिकी डॉलर की तुलना में पाकिस्तानी मुद्रा 120 रु तक गिर चुकी है। पाकिस्तान की मुद्रा भी रुपया ही है। पाकिस्तान पर विदेशी कर्ज उतरोतर बढ रहा है। नेट सार्वजनिक कर्जा 2016 में ही 120 खरब डॉलर को पार कर चुका था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी मुद्रा की लाज बचाने के लिए पाकिस्तान विदेशी कर्ज-दर-कर्ज उठा रहा है। निर्यात न के बराबर है। इसलिए पाकिस्तान विदेशी कर्जा लेकर गुजारा कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार जून 2019 तक पाकिस्तान का विदेशी कर्ज 103.4 अरब डॉलर तक पहंच जाएगा और इसका ब्याज चुकाना ही पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो जाएगा। 2009 से 2018 के बीच पाकिस्तान का विदेशी कर्ज 50 फीसदी से भी ज्यादा बढा है। इस साल पाकिस्तान को अपनी जिम्मेदारियां पूृरी करने के लिए कम-से-कम 27 अरब डॉलर की दरकार है मगर पाकिस्तान की जो आर्थिक हालत है, इसके मद्देनजर उसे सस्ता विदेषी कर्जा मिलने से रहा। इन हालत में पाकिस्तान को महंगा कर्ज लेना पडेगा और उसकी माली हालत महंगा कर्ज लेने के काबिल नहीं है। पाकिस्तान का भुगतान संतुलन पहले ही संकटग्रस्त है। इस समय उसके पास जितनी विदेशी मुद्रा है, उससे वह मात्र दस सप्ताह तक आयात कर सकता है। मई में पाकिस्तान के पास लगभग 10 अरब डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, पिछले साल मई में उसके पास करीब 16 अरब डॉलर विदेशी मुद्रा थी। उसकी सबसे बडी समस्या बढता आयात और घटता निर्यात है। इससे व्यापार घाटा लगातार बढ रहा है। पिछले साल व्यापार घाटा 33 अरब डॉलर को पार कर चुका था। पिछले कुछ समय से विदेशों में मौकरी कर रहे पाकिस्तानियों भी स्वदेश कम पैसे (रेमेंटेंसिस) भेज रहे हैं। पाकिस्तान प्रवासियों से लगभग एक अरब डॉलर की उम्मीद लगाए हुए हैं मगर रेमेंटेसिस काफी कम है। 60 अरब डॉलर की चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के निर्माण में लगी कंपनियों को पाकिस्तान को विदेशी मुद्रा में भारी भुगतान करना पड रहा है। इससे भी पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार खाली हो रहा है। इसके अलावा पाकिस्तान को आर्थिक गलियारे के लिए चीनी मशीनों को भी खरीदना पड रहा है। इसमें भी काफी विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। अमेरिका ने आर्थिक मदद देनी बंद कर दी है। ताजा स्थिति में पाकिस्तान के पास चीन के आगे हाथ फैलाने के सिवा कोई चारा नहीं है। अगले कुछ दिनो में पाकिस्तान चीन से एक अरब से दो डॉलर का कर्जा ले सकता है। पाकिस्तान अब तक चीन से पांच अरब डॉलर का कर्जा ले चुका है। अप्रैल माह में ही पाकिस्तान ने चीन से एक अरब डॉलर का कर्जा लिया था। दरअसल, चीन अपनी आर्थिक गलियारा परियोजना को जारी रखने के लिए पाकिस्तान को कंगाली की कगार से बचाने को हर संभव कोशिश कर रहा है । इसलिए पाकिस्तान को चीन से कर्जा मिलने में कोई दिक्कत नहीं आएगी। इस साल जुलाई में पाकिस्तान में आम चुनाव होने के बाद अगली सरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की शरण में जा सकती है। 2013 में भी पाकिस्तान ने संकट से उभरने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 6.7 अरब डॉलर की मदद ली थी। हालांकि पाकिस्तान की चीन पर आर्थिक निर्भरता बढ रही है मगर उसकी कर्ज संबंधी जरुरतें इतनी ज्यादा है कि चीन भी इसे पूरी नहीं कर सकता। इन हालात में चीन को सउदी अरब की षरण में भी जाना पड सकता है। बहरहाल, सबसे बडा सवाल यह है कि उधार लेकर पाकिस्तान कब तक गुजारा करता रहेगा।
मंगलवार, 29 मई 2018
शासकीय कुप्रबंध का खमियाजा झेल रही है पब्लिक
Posted on 9:05 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कुप्रबंध, घोर कुप्रबंध और “अत्याचारी“ कुप्रंबध। शिमला में पेयजल संकट से नागरिकों को पर जो अत्याचार हो रहा है, उसके लिए शब्द भी कम पड़ जाते हैं । शिमला नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर के अनुसार राजधानी के लिए पांच स्त्रोतों -गुम्मा, अश्वनी खडड, सियोग, गिरी नदी और चुरट- से कुल मिलाकर हर रोज 68 मिलियन लीटर पानी की व्यवस्था है जबकि जरुरत 45 मिलियन लीटर की है। यानी राजधानी के बाशिदों की कुल जरुरत से लगभग डेढ गुना ज्यादा पानी। लीकेज के बावजूद भी शिमला को हर रोज 35 मिलियन लीटर पानी की सप्लाई हो रही है। यानी जरुरत से 10 मिलियन लीटर कम। यह कोई बहुत बडा संकट नहीं है और अगर जरुरतों पर थोडी लगाम लगाई जाए, तो पूरी आबादी को माकूल पीने का पानी मिल सकता है। मगर इसके बावजूद लोग पानी की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। इस बार पेयजल समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि लोगों को पर्यटकों से शिमला नहीं आने के लिए आग्रह करना पडा है। ऐसा पहली बार हुआ है मगर क्या किसी ने सुना है कि मंत्रियों, विधायकों, बडे अफसरों और रसूखदारों को भी पानी के लिए कतार में खडा होना पड रहा है़़? आखिर कहां जाता है इतना पानी? अगर कुछ पानी का बीच में रिसाव हो भी जाता है, तो भी शहर के लिए इतनी सप्लाई आ रही है कि हर परिवार को हर रोज पर्याप्त पानी मिल सकता है। जाहिर है उपलब्ध पेयजल की बंदरबांट ने व्यवस्था को बिगाड रखा है। रसूखदारों को पर्याप्त पानी मिल रहा है मगर सारी मुसीबतें तो आम आदमी के लिए है। पेयजल का संकट हो तो आम आदमी को झेलना पडता है। रसोई गैस की किल्लत हो तो आम आदमी और महंगाई हो तो भी आम आदमी और खाने-पीने की चीजों की किल्लत हो तो आम आदमी। आखिर यह सिला कब तक चलेगा? पीने का पानी हर आदमी की बुनियादी जरुरत है। और अगर लोगों की सरकार इस जरुरत को पूरा करने में असमर्थ रहे तो लोकतंत्र की प्रासंगिकता पर सवाल उठना स्व्भाविक है। इतिहास के पन्ने झांक कर देंखें। फिरंगियों के राज में कम-से-कम शिमला के लोगों को पीने के पानी की किल्लत से नहीं जूझना पडता था।
इंडियन प्रीमियर लीग का जलवा
Posted on 8:09 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दो सीजन तक इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) से बाहर रहने के बाद महेन्द्र सिंह धोनी की कप्तानी में चैन्नई सुपरकिंग्स (सीएसके) ने आते ही इस बार खिताब जीत लिया। रविवार को फाइनल भिडंत में सीएसके ने सनराइजर्स हैदराबाद को आठ विकेटो से हरा कर तीसरी बार चैंपियनशिप जीती है और मुंबई इंडियन की बराबरी कर ली है। सीएसके के आस्ट्रेलियाई हरफनमौला बल्लेबाज और गेंदबाज शेन वॉटसन की शतकीय पारी हैदराबाद पर भारी पडी। सीएसके ने सात साल बाद आईपीएल चैंपपिनशिप जीती है। इससे पहले 2010 और 2011 में लगातार दो बार सीएसके आईपीएल का बादशाह रहा है। आईपीएल में सबसे उम्रदराज माने जाने वाली चैन्नई सुपरकिंग्स अपेक्षाकृत प्रतिद्धद्धी युवा टीमों से ज्यादा स्मार्ट और फिट निकली। सीएसके में धोनी समेत नौ खिलाडी 30 की उमर से ज्यादा थे मगर सभी का फिटनेस लेवल युवाओं से कम नहीं था। महेन्द्र सिंह धोनी के बारे क्रिकेट जगत में यह धारणा है कि जिस भी टीम के वे कप्तान होते हैं, उसकी जीत तो झक मारकर भी आ जाती है। 2007 के टी20 वर्ल्ड कप कप को ही ले लीजिए। वेस्ट इंदीज में 13 मार्च से 28 अप्रैल के दौरान हुए इस वर्ल्ड कप में बुरी तरह से हार का मुंह देख कर लौटी भारतीय टीम निराशा के दौर से गुजर रही थी। हार से क्षुब्ध क्रिकेट प्रेमी सचिन, सौरभ गांगुली राहुल द्रविड और वीरेन्द्र सहवाग के पोस्टर तक ला रहे थे। सितंबर 2007 में ही दक्षिण अफ्रीका में पहला टी20 वर्ल्ड कप भी होना था। बीसीसीआई क्रिकेट के इस फॉरमेट के सख्त खिलाफ थी। सीनियर खिलाडी भी इस प्रतियोगिता में खेलने से आनाकानी कर रहे थे। तब बीसीसीआई ने भारतीय टीम की कप्तानी महेन्द्र सिंह धोनी को सौंपी और इसके आगे की कहानी पूरी दुनिया जानती है। धोनी की कप्तानी ने न केवल 2007 का पहला टी20 वर्ल्ड कप जीता, अलबत्ता 2011 में 50 ओवर्स वाला वर्ल्ड कप भी जीता। धोनी ने न केवल भारतीय खिलाडियों को निराशा के दौर से बाहर निकाला, बल्कि दुनिया को दिखा दिया है कि सटीक रणनीति से कैसे मैच जीते जाते हैं। कठिन से कठिनतम परिस्थिति में भी संयत रहना और हर स्थिति का सामना करना उनकी सबसे बडी खूबी है। अपनी टीम की भरपूर क्षमता पर भरोसा करना उनकी विशेषता है। इसी के चलते धोनी ने इस बार उम्रदराज हरभजन सिंह भज्जी को चैन्नई सुपरकिंग्स टीम में षमिल कर बडा दांव खेला। दक्षिण अफ्रीका के युवा गेंदबाज एंगिडी पर भी दॉव खेला और यह भी सफल रहा। पूरी दुनिया इस बात की भी गवाह है कि 2007 के वर्ल्ड कप फाइनल में अंतिम ओवर अनुभवहीन जोगिन्द्र सिंह से कराने का साहस भी धोनी जैसा कप्तान ही दिखा सकता है। और भारत ने यह मैच जीता भी। आईपीएल में धोनी ने दीपक चाहर और शार्दुल ठाकुर को आगे करके बडा रिस्क लिया और दोनों ने जरुरत अनुसार विकेट चटाकर धोनी को निराश नहीं किया। उनकी पारखी नजर हर खिलाडी की क्षमता को भांप लेती है। कहते हैं“ साहसी और सटीक रणनीतिकार ही जंग जीतता है और धोनी इसी के पर्याय है्। बहरहाल, चमक-धमक से लबालब आईपीएल ने इस बार भी लगभग दो महीने तक देश -विदेश में क्रिकेट प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया। विडंबना देखिए, टी20 फॉरमेट का घुर विरोध करने वाली बीसीसीआई आज उसकी बदौलत इंडियन प्रीमियर लीग से दोनों हाथों से इतना पैसा बटोर रहा है कि दुनिया का हर क्रिकेट बोर्ड उससे ईर्ष्या करता है। टी20 फारमेट ने ही इंडियन प्रीमियर लीग को बुलंदियों तक पहुंचाया है और भारत की इस कमाऊ चैंपियनशिप की दुनिया में कोई सानी नहीं है। इसकी चमक-धमक ने धुरधंर से धुरंधर विदेशी खिलाडी को आकर्षित किया है। शेन वॉटसन इसकी मिसाल हैं। अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से रिटायर होने के बावजूद वॉटसन आईपीएल खेल रहे हैं उन जैसे और भी कई खिलाडी है। यही तो आईपीएल का जलवा है।
शनिवार, 26 मई 2018
Four Years Of Modi Govt: From "Acche To Bure Din"?
Posted on 2:28 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देेखते-देखते मोदी सरकार के चार साल निकल गए और आम आदमी “अच्छे दिन“ आने की उम्मीद में और उमर दराज हो गया। इस साल होने वाले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव और अगले साल मई में लोक सभा चुनाव की गहमा-गहमी में एक और साल भी निकल जाएगा। तब तक आए रोज की दिक्क्तों से आम आदमी का दम निकल आएगा । लोगों के “अच्छे दिन“ लाने के वायदे पर सत्ता में आई भगवा पार्टी की सरकार के चार साल में आम आदमी बेहाल है। इस साल फरवरी में पेश बजट में मोदी सरकार ने आम आदमी के लिए पांच लाख का बीमा और कृषि के लिए विशाल बजट की घोषणा की थी। बीमा योजना से 50 करोड लोगों को फायदा हो रहा है। बजट में किसानों को उनकी उपज का दो गुना दाम मुहैया कराने का वायदा भी किया गया। इस साल रोजगार परक योजनाएं चलाने का भी वायदा हो रखा है। मगर पेट्रोल-डीजल के उच्चतम दामों से इन सन घोशषओं की चमक फीकी पड गई है। पेट्रोल और डीजल के दाम अब तक के उच्चतम स्तर पर है़। मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले जनवरी, 2014 को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 112 डॉलर बैरल थी। दो साल के भीतर जनवरी, 2016 में कच्चे तेल की कीमतें 34 डॉलर तक गिर चुकी थीं। 90 फीसदी से अधिक तेल आयात करने वाले भारत के लिए तेल की कींमतों में भारी गिरावट बहुत बडी राहत थी। इस मामले में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार सौभाग्यशाली रही है। प्रधानमंत्री ने 2015 में एक चुनाव रैली के दौरान स्वीकार किया था “ मान लेते हैं मैं सौभाग्यशाली हूं। यदि मोदी की किस्मत से लोगों का फायदा हो रहा है, तो इससे ज्यादा सौभाग्य की क्या बात हो सकती है़“। मगर सच्चाई यह है कि मोदी सरकार ने लोगों को “सौभाग्यशाली“ बनने से महरुम रखा। न्याय का तकाजा है कि जिस तरह सरकार कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढने पर पेट्रोल-डीजल के दाम फौरन बढा देती है, उसी तरह कीमतें गिरने पर, पेट्रोल-डीजल के दाम भी फौरन घटाए जाने चाहिए। मगर सरकार ने बिल्कुल ऐसा नहीं किया। जैसे-जैसे कच्चे तेल के दाम गिरते गए, मोदी सरकार अपाा खजाना भरती गई। सरकार ने इस दौरान 9 बार उत्पाद शुल्क बढाया और केवल एक बार अक्टूबर, 2016 में राहत दी। एक अंतरराष्ट्रीय एजेंसी का आकलन है कि पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढाकर सरकार ने तीन गुना ज्यादा राजस्व कमाया है। उत्पाद शुल्क बढाते समय सरकार ने लोगों से वायदा किया था कि जब भी पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढेंगी, सरकार उत्पाद शुल्क में कटौती करके राहत दी जाएगी। अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ है। इसके विपरीत पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखकर लोगों को “लूटा“ गया है। निसंदेह, इस लूट में राज्य भी शामिल हैं मगर केन्द्र और 21 राज्यो में राज करने वाली भगवा पार्टी अगर चाहती तो पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत ला सकती थी। कहते हैं, चुनावी वायदों का क्या है़ ये शेयर मार्केट में “वायदा कारोबार“ की तरह होते हैं जिसमें 99 फीसदी आम आदमी को नुकसान उठाना ही पडता है। मोदी सरकार भी “वायदा कारोबारी“ निकली। वायदे पूरा करना तो दीगर रहा, उल्टे नोटबंदी करके लोगों को मुसीबत खडी कर दी। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा “जनहित“ फैसला होगा जिससे कतार में खडे-खडे 100 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पडी हो। मोदी सरकार की स्वच्छ छवि रही है मगर बैंक घोटालों ने इस पर भी छींटे डाले है। सरकार भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगा पाई है और न ही काले धन की “ अवैध उपज“ को रोक पाई है। असहिशुण्ता और कटटरपंथी चरम पर है। पूरी व्यवस्था आज भी भ्रष्ट है। बैंक से लेकर बिल्डर तक हर व्यक्ति उपभोक्ता को ठगने में आगे है। कानून इन ठगों का कुछ नहीं बिगाड सकता। सरकार को आम आदमी की मुसीबतों से कोई सरोकार नहीं है। रामराज्य है, “जय श्री राम“।
शुक्रवार, 25 मई 2018
एकता का मुखौटा
Posted on 11:29 am by mnfaindia.blogspot.com/
बुधवार को कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु में जनता दल (एस)-कांग्रेस की सरकार के शपथ समारोह में विपक्ष के शीर्ष नेताओं की बढ-चढ कर उपस्थिति ने विपक्षी दलों में एकता का संदेश देने की कोशिश की गई। भारी अंतर्विरोध और महत्वाकांक्षाओं के टकराव के बावजूद एकता से कहीं ज्यादा नरेन्द्र मोदी- अमित शाह युगल की लोकप्रियता और 2019 में “रिपीट मोदी सरकार“ का खौफ आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, टीडीपी नेता एव आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडु, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर मायावती, सीपीएम नेता सीता राम येचुरी और भाकपा नेता डी राजा को शपथ समारोह में खींच कर ले आया। ममता दीदी और माकपा-भाकपा का पहली बार एक मंच पर आना वाकई ही काबिलेगौर है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और माकपा एक-दूसरे की घुर विरोधी हैं। इसके बावजूद इन दलों का एच डी कुमारस्वामी के शपथ समारोह में एक साथ मौजूद रहना विपक्षी दलों की एकता के लिए शुभ संकेत हैं। इतिहास खुद को दोहराता है। एक जमाने में कांग्रेस को हराने के लिए भाजपा यही सब कवायद किया करती थी मगर दक्षिणपंथ और वामपंथ की वैचारिक और सिद्धांतिक दीवार हमेशा आडे आती रहीं। समकालीन विपक्षी दलों में फिलहाल ऐसी कोई दीवार नही है। हां, प्रधानमंत्री बनने की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं और राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता के प्रति विपक्षी नेताओं की “शंकाएं-आशंकाएं“ अपना रंग दिखा सकती है। बंगलुरु के शपथ समारोह में इसकी एक बानगी भी मिली। तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव शपथ समारोह से एक दिन पहले आए और चले भी गए। इससे यही संकेत मिलते हैं कि राव कांग्रेस से नजरें चुराना चाहते थे। सबसे बडा सवाल यह है कि “लोकत्रंत्र बचाओ, मोटी हटाओ“ का मुखौटा पहनकर विपक्षी दल का यह गठबंधन बनेगा भी या नहीं और अगर बन भी गया तो कितने दिन चलेगा़़? इतिहास इस बात का गवाह है कि फौरी मकसद से बनाया गया कोई भी राजनीतिक गठबंधन लंबे समय तक नहीं चल सकता। 1977 में जनता पार्टी और 1989 में जनता दल सरकार दोनों ही इस बात के गवाह है। इन दोनों का मकसद इंदिरा गांधी की कांग्रेस को सत्ता से हटाना था और मकसद पूरा होते ही, विपक्षी एकता का मुखौटा बेनकाब हो गया और गठबंधन फौरन टूट गया। बहरहाल, कर्नाटक का मौजूदा गठबंधन विपक्षी एकता की नई प्रयोगषाला बनने जा रहा है। न तो नए मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी और न ही कर्नाटक कांग्रेस के नेता दूध के धुले हैं। भ्रष्टाचार के मामले में कुमारस्वामी का रिकॉर्ड भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा से ज्यादा बेहतर नही है। वैसे भी जब गठबंधन सरकार की उमर को लेकर निश्चितता न हो, कोई भी नेता मौका चूकने से पीछे नहीं हटेगा। और कांग्रेस का रिकार्ड तो इस मामले पहले से ही खराब रहा है। मरणासन्न पडी कांग्रेस को कर्नाटक के नतीजों ने थोडा आत्म विश्वास भरा तो है मगर अभी भी ग्रांड ओल्ड पार्टी विपक्षी एकता के भरोसे प्रधानमंत्री मोदी को चुनाव में परास्त करने के “मुंगेरी लाल के हसीन सपने “ देख रही है। चार साल में कांग्रेस ने एक भी ऐसा काम नहीं किया है जिससे लोगों में उसकी धाक जमी हो। राहुल गांधी को उनके सलाहकार अध्यक्ष बनने के बाद भी यह बात समझा नहीं पाए हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र को गालियां देने से मतदाताओं को लुभाया नहीं जा सकता और न ही वोट मिलते हैं। कांग्रेस के लिए बस संतोष की बात यह है कि कर्नाटक के चुनाव परिणाम साफ कह रहे हैं कि मोदी-शाह की जोडी अपराजेय नहीं है और अगर विपक्षी दल एक हो जाएं तो भाजपा को चुनाव में परास्त किया जा सकता है। सालांत में होने वाले मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ के विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों की एकता का पता चल जाएगा।
हिमाचल के विकास का रोडमैप
Posted on 11:13 am by mnfaindia.blogspot.com/
पानी का बर्तन सिर पर उठाए महिलाओं को देखकर बहुत बुरा लगता है। मां की याद आती है। पहाडों में महिलाओं को बहुत ज्यादा परिश्रम करना पडता है। चुल्हा-चौका संभालने के अलावा, पूरी घर-गृहस्थी संवारना खेतों में काम करना और उस पर पीने के पानी के लिए दूर-दूर तक भटकना। हर गर्मी में यह सिला बदस्तूर जारी है। शुद्ध पीने का पानी हर इंसान की बुनियादी जरुरत है और हर सरकार की उच्च प्राथमिकता। मगर आजादी के सात दशक बाद भी अगर पहाडों की महिलाओ को पानी के लिए भटकना पडा, तो लानत है ऐसी आजादी पर। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर जी आप तो साधारण ग्रामीण परिवेश से हैं, किसी राज परिवार से नहीं। आप तो ग्रामीण और दूर-दराज स्थित ग्रामीण इलाकों की महिलाओं की कठिनाइओं से बखूबी परिचित हैं। आपकी सरकार की पहली और सर्वोपरि प्राथमिकता लोगों को शुद्ध पेयजल मुहैया कराना होनी चाहिए। अपनों और वोट बैंक को रेवडियां बांटने के लिए अभी साढे चार साल से ज्यादा का समय पडा है। आपने तुगलगी फरमान जारी कर दिया कि गुम्मा के लोग नोटी खडड में मिलने वाली कूल्हों का पानी इस्तेमाल न करें। यह तो स्थानीय लोगों से सरासर अन्याय है। भीषण गर्मी में मौसमी सब्जियों के लिए कूल्ह का पानी ही एकमात्र सहारा है और अगर यह बंद हो गया ति किसानों को भारी नुकसान उठाना पडता है। गुम्मा का क्षेत्र मौसमी सब्जियां उगाने के लिए जाना जाता है और ये ताजा सब्जियां हर रोज शिमला को सप्लाई की जाती है। किसानों की नगदी आय का यह प्रमुख साधन है। शिमला शहर की प्यास बुझाने के लिए किसानों को क्योंकर “त्याग“ देना पडे। हर बार ग्रामीण ही क्यों त्याग दे , किसान तो हमेशा बेहाल रहता है। शहरी लोग तो मिनरल वाटर से भी गुजारा कर लेंगे। बहरहाल, गुम्मा में कूल्हों का पानी शिमला की प्यास नहीं बुझा सकता मगर यह गुम्मा के किसानों की रोजी-रोटी का प्रमुख स्त्रोत हैं। फौरी उपायों से पेयजल जैसी दीर्घकालीन समस्या का निदान नहीं हो सकता। पेयजल के परम्परागत स्त्रोत सुख चुके हैं और भूमिगत पानी का स्तर साल-दर साल नीचे जा रहा है ।नतीजतन, अधिकांश पेय जल स्कीमों मेम पानी नहीं आ रहा है । इसके लिए दीर्घकालीन योजना बनाई जानी चाहिए । मगर हर सरकार आज तक फौरी योजना बनाती रही है। फिरंगियों ने जब गुम्मा से शिमला के लिए पानी लिफ्ट किया था तब नॉटी खडड में बत्तेरा पानी था। पहले इस का इस्तेमाल शिमला की प्यास बुझाने के लिए और बचे हुए पानी से अंग्रेजों ने चाबा में बिजली पैदा की और इस बिजली का उपयोग पानी लिफ्ट करने और शिमला बिजलीकरण करने के लिए किया गया। स्वदेशी सरकार ने अंग्रेजों के नाज-नखरे तो अक्षरश ग्रहण कर लिए मगर सुशासन के तौर-तरीके सीखने भूल गए। शिमला हिमाचल की राजधानी है और इस स्थिति में इसका तेजी से फैलना-फूलना स्वभाविक है। राजधानी को राक्षस की तरह फैलने से बचाने के लिए एक प्राधिकरण स्थापित (शिमला विकास प्राधिकरण) करने की जरूरत है जो इस शहर की अगले सौ साल की जरुरतों को ध्यान में रखकर विकास का रोडमैप तैयार करे। और इसी तरह पूरे राज्य के लिए पंचायत स्तर से विकास का दीर्घकालीन रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए । इसमें माकूल पेयजल, बिजली,सडक, स्कूल और अन्य बुनियादी जरुरतों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस तरह के रोडमैप के लिए वित्तीय संसाधन जुटाना कोई कठिन काम नहीं है। बस दूरदर्शिता और दृढ इच्छा शक्ति की जरुरत है।
बुधवार, 23 मई 2018
बेवफाई मार गई
Posted on 4:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल पर “एक तो मंहगाई, उस पर सरकार की रुसवाई मार गई'' के बोल पूरी तरह से चरितार्थ होते हैं। मतदाताओं को पटाना हो तो, अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जोडे जाने के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए जाएंगे मगर सामान्य दिनों मे दाम बढाने का कोई मौका नहीं छोडा जाएगा। पिछले नौ दिन में हर रोज पेट्रोल-डीजल के दाम बढाए जा रहे हैं। मंगलवार को दिल्ली मंे पेट्रोल 76.87 रु प्रति लीटर और मुंबई में 84. 70 लीटर बिक रहा था। ये अब तक के उच्चतम दाम हैं। बुधवार को भी दाम बढ़ाए गए । कर्नाटक में विधानसभा चुनाव थे, तो 25 अप्रैल से 12 मई तक तेल कंपनियों ने एक दिन भी पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए जबकि इस दौरान कच्चे तेल की कीमतों में 3 डालर प्रति बैरल का इजाफा हुआ था। जाहिर है तेल कंपनियां यह सब सरकार के कहने पर कर रही थी। अगस्त 2017 से तेल कंपनियां पेट्रोल-डीजल के दाम अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जोडकर हर रोज निर्धारित कर रही हैं। कहने को यह कदम उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचाने के लिए उठाया गया है, मगर अब तक लोगों को चुनाव समय के सिवा कोई राहत नहीं मिली है। भारत में पेट्रोल-डीजल के ऊंचे दामों के लिए सरकार की अधिकाधिक राजस्व उगाहने की “भूख“ प्रमुख रुप से जिम्मेवार है। मोदी सरकार बार-बार कच्चे तेल की बढती अंतरराष्ट्रीय कीमतों को जिम्मेदार ठहरा रही है मगर वस्तु स्थिति कुछ और ही है। जुलाई 2008 में कच्चे तेल की कीमतें जब रिकॉर्ड 142 डॉलर प्रति बैरल थी, तब भी भारत में पेट्रोल के दाम 50 रु लीटर के आसपास और डीजल 35 रु लीटर के आसपास थे। इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमते 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास अर्थात 2008 से 80 फीसदी से कम है मगर भारत में पेट्रोल 76 से 80 रु लीटर और डीजल 68 रु लीटर बिक रहा है। तब पेट्रोल और डीजल पर सब्सिडी दी जा रही थी। अगर सब्सिडी हटा भी ली जाए, तब भी उस समय देश में पेट्रोल और डीजल आज की तुलना में काफी सस्ता बिक रहा था। इससे पता चलता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों के मामले में सरकार लोगों को “लूट“ रही है। मोदी सरकार के आने के बाद से पेट्रोल-डीजल पर 410 फीसदी से ज्यादा का शुल्क बढाया जा चुका है। मौजूदा समय में उपभोक्ता को दिल्ली में पेट्रोल पर 47 फीसदी और डीजल पर 37 फीसदी शुल्क देने पड रहे हैं। संप्रग सरकार की तुलना में मोदी सरकार के चार साल में पेट्रोल और डीजल के दाम अपेक्षाकृत कम रहे हैं। जनवरी 2016 में कच्चे तेल की कीमतें 27.67 डॉलर प्रति बैरल तक गिर चुकी थी। यह 2003 के न्यूनतम 28.36 डॉलर बैरल से भी कम थी मगर इसके बावजूद भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में अधिकतम 20 फीसदी की गिरावट आई थी। बाजार में कच्चा तेल सस्ते से सस्ता बिकने के बावजूद भारत में पेट्रोल की कीमतें 60 रु लीटर से नीचे नहीं आ पाईं। यह तो लोगों का सरासर शोषण है कि बाजार में जब कच्चा तेल की कीमतें रिकॉर्ड 142 डॉलर प्रति बैरल (2008) हो, तब भारत में पेट्रोल 50 रु लीटर बिके और जब कच्चे तेल के दाम 28 डॉलर बैरल (2016) हो तो पेट्रोल 70 रु लीटर बिके। पेट्रोल-डीजल को जीएसटी से बाहर रखना मोदी सरकार का जनता से सबसे बडा छल है। इस समय केन्द्र और 21 राज्यों में भगवा पार्टी की सरकार है और अगर मोदी सरकार चाहे तो पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के दायरे में ला सकती थी। इससे उपभोक्ताओं को खासी राहत मिलती। अब तक तो ऐसा हुआ नहीं मगर अगले साल लोकसभा चुनाव और इस साल के अंत में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव, मुमकिन है सरकार पेट्रोल-डीजल को भी जीएसटी के तहत लाने के लिए आगे आए। वोट के लिए सियासी दल कुछ भी कर सकते हैं।
मंगलवार, 22 मई 2018
बीएसएफ की बहादुरी
Posted on 6:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सीना पर बार-बार युद्ध विराम (सीज फायर) तोडने से आजिज सीमा सुरक्षा बल ने पाकिस्तान को इस कद्र मुंह तोड जवाब दिया कि दुश्मनों को “सीज फायर“ के लिए भारत के समक्ष गिडगडाना पडा। सीमा सुरक्षा बल की इस बहादुरी से पूरे देस का सिर गर्व से ऊंचा हुआ है। रमजान के पवित्र माह में भी पाकिस्तान अपनी “नापाक“ हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। पाकिस्तान पडोसी बनने की बजाए रमजान में भी “दुश्मनी “ निभा रहा है। दुश्मन के तो हर हाल में दांत खट्टे किए जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कश्मीर दौरे के समय रविवार को 19 सेकेंड के वीडियो में दिखाया गया कि किस तरह सीमा सुरक्षा बल ने पाकिस्तान की चौकियों पर ताबडतोड फायरिंग करके पाकिस्तानी रेजर्स को सघर्ष विराम पर गिडगिडाने के लिए विवश कर दिया। कहते हैं “ लातों के भूत बातों से नहीं मानते“। यह जुमला पाकिस्तान पर सौ फीसदी मौजूं होता है। भारत कुछ भी कर ले, पाकिस्तान अपनी दुश्मनी निभाएगा ही। 16 मई से सीमा पर पाकिस्तान द्वारां लगातार फायरिंग कर रहा है। सोमवार को जम्मू-कश्मीर के आरएस पुरा सेक्टर में पाकिस्तान ने फिर मोर्टार् दागे। इसमें एक पुलिसकर्मी और दो नागरिक जख्म हो गए। इससे पहले शुक्रवार को पाकिस्तानी गोलीबारी में एक सैनिक और चार नागरिक मारे गए थे। इस साल अब तक 18 सैनिकों समेत 36 लोगों को अपनी जान गंवानी पडी है। 26/11 नर संहार के दस साल बाद ही सही, पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाल शरीफ भी कबूल कर चुके हैं कि इस नरसंहार में पाकिस्तान का हाथ था। पूरी दुनिया पाकिस्तान की आतंकी हरकतों की गवाह है। पाकिस्तान के अनन्य मित्र होने का दावा करने वाला विस्तारवादी चीन एकमात्र ऐसा मुल्क है, जो पाकिस्तान को आतंकी देष नहीं मानता है। मगर दुनिया इस सच्चाई को भी जानती है कि चीन यह सब भारत को कूटनीति से सताने के लिए कर रहा है। सच कहा जाए तो पाकिस्तान के साथ-साथ चीन की विस्तारवादी मंषा भारत के लिए ज्यादा चुनौतीपूृर्ण है। पाकिस्तान को सबक सिखाया जा सकता है मगर चीन बेहद काइंया कूटनीतिज्ञ है। सामने से “हिंदी चीनी-चीनी भाई-भाई कहेगा, पीछे से पीठ पर वार करेगा। अप्रैल 27-28 को प्रधानमंत्री एवं चीन के राश्ट्रपति षी जिनपिंग की अनौपचारिक षिखर वार्ता में दोस्टि के कसीदे पढ गए मग्गर इस वार्ता के फौरन बाद चीन ने अरुणाचल प्रदेष ने अपने विस्तारवादी मंसूबों को अंजाम देने लग पडा। चीन ने अरुणाचल प्रदेष से सटे अप्ने अधिकृत क्षेत्र में सोने की खदान खोज निकाला है। इस खदान में सोने, चांदी समेत 6 हजार करोड रु मूल्य के खनिज पाए जाने का अनुमान है। चीन ने इस खदान के लिए अरुणाचल प्रदेष को तिब्बत का हिस्सा बताया है।
जाने कहां गए वो दिन
Posted on 12:50 pm by mnfaindia.blogspot.com/
लंबे अंतराल के बाद पिछले कल परम मित्र कृष्ण भानु से बातचीत कर शिमला में बिताए स्वर्णिम दिन याद आ गए। समय किसी के लिए नहीं रुकता। काश रुकता और मैं अस्सी के दशक में लौट जाता। उस समय (70-80) शिमला का कॉफी हाउस पत्रकारों का ड्राइंग रुम हुआ करता था और पापाजी (आदरणीय हृदयेश आर्य) इसके प्रमुख पैटर्न। पापाजी का जब मन करता, लोअर बाजार स्थित अपनी दुकान से कॉफी हाउस आ जाते , ईधर-उधर की फेंकते और चल देते । तब लगभग सभी पत्रकार यूएस क्लब में रहते थे। रवीन्द्र रणदेव, पीएन शर्मा और खजूरिया जी नाभा हाउस के वासी थे। पत्रकार आचरण मैं औरों से अलग होते हैं । इतने कि अपनी विरादरी को भी नहीं बख्शते । एक बार रवीन्द्र रणदेव जी को शिमला नगर निगम चुनाव लडने कि सुझी। बस, फिर क्या था. पूरी पत्रकार बिरादरी सक्रिय हो गई। नाभा से कांग्रेस का टिकट भी मिल गया मगर हार गए और उनकी हार में पत्रकार बधुंओं का बडा हाथ था। मेरे लिए यह स्वर्णिम समय रहा है। काम भी फक्क्ड और तबयित भी। नाश्ता किया और यूएस क्लब से काफी हाउस को चल दिए। पत्रकार बंधुओं से गपशप की, माल रोड स्थित प्रैस रुम आ गए। तब तक लंच का समय हो जाता और सभी पत्रकार घर लौट जाते। आए दिन आशियाना में प्रैस काँफ्रेस होती, इसलिए अक्सर घर का लंच मिस हो जाता। शाम को खबरें भेजी और फिर काफी हाउस आकर बैठ गए, यह थी दिनचर्या । सचिवालय जाना हो तो सरकारी वाहन लेने आ जाता। ऐसी आरामदायक दिनचर्या अन्यत्र कहीं नहीं मिली। अल्प समय के लिए भोपाल और लखनऊ रहा। इन दोनों जगहों का काफी हाउस कल्चर भी शिमला जैसा ही है। लखनऊ का कॉफी हाउस तो ऐतिहासक घटनाओं का साक्षी रहा है। दिल्ली कॉफी हाउस का महानगरीय कल्चर एकदम अलग है । चंडीगढ का कॉफी ह्हसय विशुद्ध व्यवसायिक है। बहरहाल, शिमला के कॉफी काफी हाउसकर्मी हमारे लिए सूचनावाहक का काम करते। कौन आया या आएगा, कब आया अथवा आएगा और किसके साथ काफी की चुस्कियां लीं या लेगा , पूरी जानकारी हमें मिल जाती। सुबह से शाम तक कॉफी हाउस तब राजनीतिक नेताओं, वकीलों और पत्रकारों से अटा रहता था। राजनीति से सन्यास लेने के बाद भाजपा के दिग्गज नेता दौलत राम चौहान अक्सर हमें काफी के लिए आमंत्रित करते। एनडी की ब्लैक काफी के साथ चौहान जी भी ब्लैक कॉफी पीते। शांता कुमार, प्रेम कुमार धूमल, आनंद शर्मा समेत सभी सियासी नेता कॉफी हाउस के रेगुलर विजिटर थे। कई सियासी नेताओं का तो यह स्थाई अडडा था। नेताओं को इस बात का बखूबी अहसास था कि पत्रकारों से मिलना हो तो बस उनके ड्राइंग रुम (कॉफी हाउस) पहुंच जाएं, मुलाकात तो हो ही जाएगी। सुबह-सुबह इडली और शाम को बडा और सांभर की महक, कॉफी हाउस की विशेषता थी। बच्चों के लिए जैली। मेरा पुत्र आज भी उस जैली को भूल नहीं पाया है। के एस तोमर (हाल ही में हिमाचल लोक सेवा आयोग के चैयरमैन से सेवानिवृत) सुबह पूरे ग्रुप के साथ और अपराहं तातश्री पीएनषर्मा को कॉफी जरुर पिलाते। हमारी विरादारी में तबा प्रकाश लोहमी एकमात्र ऐसे पत्रकार थे जो इस दिनचर्या में शामिल नहीं थे। प्रकाश ज्योतिष के लिए इतने प्रसिद्ध थे कि लोग-बाग उन्हें रास्ते में रोक लेते और वे बडी संजीदगी से कुंडली देखने लग जाते। साधुवादी लोहमी सचमुच ज्योतिष विध्या का प्रकाश फैलाया करते और संभवतय आज भी वही कर रहे हैं। सीता राम खजुरिया की अलग ही डफली बजती थी । पत्रकारों के भीष्म पितामह जेएन साधु सबसे अलग थे। लांगवुड से पैदल चलकर हर रोज कॉफी हाउस आते और अपनी गैर पत्रकार मंडली से कॉफी हाउस के निचले फ्लोर में चर्चा करते। उन्हें अपनी बिरादरी से बेकार बतियाना गवारा नहीं था । उनके आचार-विचार से सहमत रहना हर किसी के वश की बात नहीं थी। उन्हें दुकानदारी, व्यापार, राजनीति से जुडे लोगों का पत्रकार बिरादरी में शामिल होने पर सख्त ऐतराज था। अपने समकालीन पीएन शर्मा की चुटकी लेने का अवसर वे कभी नहीं चूकते। के एस तोमर वाकई विलक्षण व्यक्ति हैं। आप उनकी कितनी भी नुक्ताचीनी कर लें मगर उनके सम्मोहन से बच नहीं पाएंगे। वे मेरे जैसे सामान्य पत्रकार से कहीं ज्यादा व्यवहारिक और सफल रहे हैं। मैं बस कागज काले ही करते रह गया और तोमर बहुत आगे निकल गए। पत्रकार से लोक सेवा आयोग का चैयरमैन बनना आसान नहीं है। वे किसी राजनीतिक दल से जुडे नहीं है। साधारण परिवार से अग्रणी अंग्रेजी अखबार का संपादक बनने तक के सफर का मैं भी गवाह हूं। मुझे सतर के दशक के वो दिन आज भी याद है जब तोमर एक स्थानीय अखबार के प्रतिनिधि के तौर पर मुझसे मिलने सचिवालय आया करते। तब मैं लोक संपर्क विभाग में काम करता था। उन्होंने कडी मेहनत और लग्न से बडे पायदान तय किए हैं। मेरा पुत्र अक्सर मुझे उलाहना देता है कि मैं तोमर जैसा एक फीसदी भी नहीं बन पाया। भानु ने मुझे सूचित किया है कि तोमर जी भी पत्रकार कॉलोनी में रहने आ गए हैं। मेरा मन भी उड कर शिमला पहुंचने को मचल रहा है। फिर तोमर के साथ रोज कॉफी हाउस जाऊं और गपशप करुं। एनडी शर्मा को भोपाल से शिमला बुला लूं। भोपाल में एनडी की आज भी यही दिनचर्या है। मुझसे उनसे रंजिष होती है। एनडी शर्मा पत्रकारों के आदर्श हैं। उन जैसा समकालीन पेशेवर, ईमानदार, विद्धान और समर्पित पत्रकार हो ही नहीं सकता। मैने उन जैसा बनने की बहुत कोशिश की मगर नहीं बन सका। भास्कर में बाबू लाल शर्मा भी आदर्श थे मगर एनडी सबसे बढकर हैं। 2003-04 में शिमला लौटने पर बहुत निराशा हुई थी । न तो पहले जैसा कॉफी हाउस माहौल और न ही पत्रकार बंधु। सूचना एव लोक संपर्क विभाग के निदेशक (अब सेवा निवृत) बीडी शर्मा अभी भी कॉफी हाउस के नियमित विजटर थे और पापा जी भी। मगर इक्का-दुक्का बुजुर्ग कॉफी हाउसकर्मियों को भी इस बात का मलाल था कि वो पुराने दिन अब लद गए । भानु की आज भी मस्त चाल-ढाल और संगीतमय सुर हैं। वे नई बिरदारी में भी रम गए लगते हैं। पत्रकारों की नई बिरादरी कॉफी हाउस कल्चर से ऊपर हो गई है। रिज पर स्थित आशियाना उनका नया ठिकाना हो गया है। यह प्रैस क्लब के एकदम समीप है। शिमला में अब पत्रकारों की भीड हो गई है और इस भीड में सब कुछ खो गया है। जाने कहां गए वो दिऩ़़़़़़़़्
रविवार, 20 मई 2018
Democracy Dies In Darkness
Posted on 2:29 pm by mnfaindia.blogspot.com/
Most of us by now must have not noticed how different is Narendra Modi era BJP from Atal Bihari Vajpayee era. Two instances will help us arriving at some conclusion. Atal Bihari Vajpayee was the strong votary of "abide by rules (raj Dharma) governance" and Narendra Modi himself admitted in 2013 that BJP icon leader preached him "Raj Dharma. And what is this Raj Dharma, attributed to Vajpayee jee and often quoted by BJP leaders. It was in the aftermath of 2002 Gujarat riots that Prime Minister, Vajpayee advised chief minister, Narendra Modi to follow 'Raj Dharma". Even. ex' Himachal chief minister and BJP senior Shanta Kumar also advised Modi to follow "Raj Dharma" Shanta Kumar later had to pay heavy price for his comment.
In 1982, amid hung verdict in Himachal Pradesh, BJP won 29, 5 short of clear majority and Congress 31 seats with 6 independents holding the balance of power in 68-member assembly. Shanta Kumar was then the leader of BJP legislative party and he was advised by some BJP leaders to explore the possibilities of forming the government as independent were ready to support BJP govt. Shanta Kumar consulted Vajpayee jee and latter suggested to sit in opposition as the mandate was not for forming the govt. Now imagine, what would have Vajpayee jee dne the same thing. Advising BSY and Karnataka BJP to sit in opposition. History has uncanny way to assert itself. BJP has landed itself in the situation, it wanted to avoid. In the process, it has lost the everything, it had scored over Congress and Janata Dal (S) in Karnataka.
Prime Minister Modi and Amit Shah don't believe in Vajpayee era "gentleman politics" and go by "tit for tat' . Honestly, Modi can never become Vajpayee. Both have nothing in common. Vajpayee was a poet, excellent orator and had 'across the spectrum' following. Even Congressmen used to respect him and would attend his rallies to relish his oratory skill. He was a great visionary and transcends boundaries and barriers It was this broad vision, he turned out to be most popular foreign minister during Janata Party regime. He is still the best. Remember the days when P. V. Narasimha Rao was PM and Atal Bihari Vajpayee as leader of opposition. Both had prefect chemistry and never utter disrespectful words against each-other. Even Indira Gandhi as PM respected Vajpayee jee and latter did not hesitate to call her "Durga" in 197 after India won decisive war over Pakistan and Bangladesh was liberated.
There is an old saying that Politics is not an gentleman game but Atal Bihari Vajpayee defied this idoam. All through his political career, he remained a gentleman and never crossed the borders. All those golden days of Indian politics now appear as dream. India is passing through an critical period. All our democratic institutions are under threat. The savoirs and champions of democracy are hardly to be seen. There is darkness everywhere and democracy dies in darkness.
-Chander Sharma
In 1982, amid hung verdict in Himachal Pradesh, BJP won 29, 5 short of clear majority and Congress 31 seats with 6 independents holding the balance of power in 68-member assembly. Shanta Kumar was then the leader of BJP legislative party and he was advised by some BJP leaders to explore the possibilities of forming the government as independent were ready to support BJP govt. Shanta Kumar consulted Vajpayee jee and latter suggested to sit in opposition as the mandate was not for forming the govt. Now imagine, what would have Vajpayee jee dne the same thing. Advising BSY and Karnataka BJP to sit in opposition. History has uncanny way to assert itself. BJP has landed itself in the situation, it wanted to avoid. In the process, it has lost the everything, it had scored over Congress and Janata Dal (S) in Karnataka.
Prime Minister Modi and Amit Shah don't believe in Vajpayee era "gentleman politics" and go by "tit for tat' . Honestly, Modi can never become Vajpayee. Both have nothing in common. Vajpayee was a poet, excellent orator and had 'across the spectrum' following. Even Congressmen used to respect him and would attend his rallies to relish his oratory skill. He was a great visionary and transcends boundaries and barriers It was this broad vision, he turned out to be most popular foreign minister during Janata Party regime. He is still the best. Remember the days when P. V. Narasimha Rao was PM and Atal Bihari Vajpayee as leader of opposition. Both had prefect chemistry and never utter disrespectful words against each-other. Even Indira Gandhi as PM respected Vajpayee jee and latter did not hesitate to call her "Durga" in 197 after India won decisive war over Pakistan and Bangladesh was liberated.
There is an old saying that Politics is not an gentleman game but Atal Bihari Vajpayee defied this idoam. All through his political career, he remained a gentleman and never crossed the borders. All those golden days of Indian politics now appear as dream. India is passing through an critical period. All our democratic institutions are under threat. The savoirs and champions of democracy are hardly to be seen. There is darkness everywhere and democracy dies in darkness.
-Chander Sharma
शनिवार, 19 मई 2018
जुगाड में पिछड गई भाजपा
Posted on 8:44 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भाजपा की जुगाड कर्नाटक में काम नहीं आई। बतेरी कोशिश की मगर कांग्रेस-जनता दल (एस) की जुगाड ने बाजी मार ली। 72 घंटे से भी काम समय के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा जुगाड में फिस्सडी निकले। छह माह तक लगातार अमित शाह के साथ कर्नाटक नापते-नापते भी येदि उनकी “जगाडु“ प्रतिभा को ग्रहण नहीं कर पाए। अमित शाह की राजनीतिक “जुगाड“ प्रतिभा की पूरी दुनिया कायल है। कर्नाटक के राज्यपाल द्वारा येदियुरप्पा को विश्वास मत हासिल करने के लिए 15 दिन का समय देने पर सोशल मीडिया पर कमेंट था “ 15 दिन में तो अमित शाह उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोन-उन के दस्तखत भी ले लाएंगे“। 2017 में गुजरात राज्यसभा के चुनाव के दौरान अमित शाह ने कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल को जीत के लिए जिस तरह से पसीने छुडवाए थे, कर्नाट्क में येदियुरप्पा की सरकार बनाने के समय उसकी पुनरावृति हो रही थी। उस समय भी कांग्रेस को अपने विधायक भाजपा की पोचिंग से बचाने के लिए बंगलुरु में छिपाना पडा था। इस बार भी कांग्रेस और जनता दल (एस) के विधायकों को भाजपा की पोचिंग से हैदराबाद में छिपाना पडा। इसे कहते हैं“ तू डाल-डाल, मैं पात-पात“। कर्नाटक में न कांग्रेस-जनता दल (एस) गठबंधन जीता, न ही भाजपा हारी, लोकतंत्र की लाज बच गई। 15 दिन का समय मिल जाता, अमित शाह की पार्टी शर्तिया विश्वास मत प्राप्त कर लेती। 7 दिन भी मिल जाते, येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने रहते। सुप्रीम कोर्ट ने सारा खेल बिगाड दिया। कोर्ट की व्यवस्था से दल-बदलू डर गए। टॉप कोर्ट ने साफ कर दिया था कि विधायक इस गलतफहमी में न रहे कि शपथ लेने से पहले विधायकों पर दल-बदल लागू नहीं होता है। सियासी नेता कानून को सुविधानुसार तोडने-मरोडने में सिद्धहस्त हैं। कनार्टक में कांग्रेस, जनता दल (एस) के विधायकों को यह कहकर बरगलाया जा रहा था कि शपथ लेने से पहले दल-बदल कानून से न डरें। धन्य हैं हमारे सियासी नेता और समकालीन राजनीति। कोई किसी से कम नहीं है। मगर एक सच्च्चाई यह है कि “जुगाड की हांडी“ बार-बार नहीं चढती“।
लोकतंत्र की हत्या
Posted on 9:51 am by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार ने अपने चार साल के “पारदर्शी “ शासन में स्वस्थ-समृद्ध लोकतांत्रिक परंपराओं का जी भरकर उपहास उडाया है। दल-बदल लोकतंत्र के लिए सबसे बडा खतरा है। दल-बदल कराकर बनाई गई सरकार जनादेश का घोर अपमान है। एक जमाने में भाजपा यही सब कुछ कहा करती थी। सत्ता में आते ही भगवा पार्टी सारी आदर्शवादी बातें भूल गई। कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए भाजपा दल-बदल का खुलेआम सहारा ले रही है। केन्द्र में सरकार भी अपनी है और राज्यों में गवर्नर भी अपने। गवर्नर्स अपने हैं तो कानून को सुविधानुसार तोडा -मरोड़ा जा सकता है। गोवा में सरकार बनाते समय वहां के गवर्नर को सबसे बडी पार्टी को सरकार बनाने की रिवायत याद नहीं रही मगर कर्नाटक में जरुर रही। गोवा विधानसभा चुनाव के त्रिशंकू जनादेश में कांग्रेस सबसे बडी पार्टी थी पर केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार को यह कतई गवार नहीं था कि कांग्रेस सरकार बनाए। राज्यपाल ने कांग्रेस की बजाए दूसरी बडी पार्टी भाजपा नीत गठबंधन को सरकार बनाने का न्यौता दिया। राज्यपाल महोदय ने तर्क दिया बहुमत भाजपा के साथ था, इसलिए गठबंधन को न्यौता दिया गया। परंपरा अनुसार अगर सबसे बडी पार्टी सरकार बनाने का निमत्रंण ठुकरा देती है, तभी दूसरी पार्टी को सरकार बनाने का न्यौता दिया जा सकता है। मोदी सरकार के राजभवन में पदस्थ नुमाइदों ने मणिपुर, मेघालय और अब कर्नाटक में कांग्रेस को सता से बाहर रखने के लिए इन परम्पराओं का पालन नहीं किया किया। बहुमत परखने के लिए राजभवन कोई उपयुक्त जगह नहीं है। विधायकों की परेड कराना और उन्हें भेड-बकरियों की तरह गिनना जनादेश का अपमान है। यह काम विधानसभा में होना चाहिए और देश की शीर्ष अदालत कई बार यह व्यवस्था दे चुकी है। बहुमत भी विधानसभा में जल्द से जल्द साबित होना चाहिए। 15 दिन का लंबा समय “दल-बदल (होर्स ट्रेडिंग) को बढावा देता है। कर्नाटक में पूरा खेल यही था। गोवा, मणिपुर और कर्नाटक में जो कुछ भी हुआ, उससे भारतीय लोकतंत्र शर्मसार हुआ है। कर्नाटक में कांग्रेस-जनता दल (एस) को स्पश्ट बहुमत के बावजूद इस गठबंधन को गोवा की तर्ज पर सरकार बनाने का निमत्रंण नहीं दिया गया। भाजपा को स्पश्ट बहुमत साबित करने के लिए के लिए कम-से-कम सात विधायकों की दरकार है। विधानसभा में केवल दो निर्दलीय चुन कर आए हैं। इनमेंसे एक भाजपा के साथ हो लिया है, दूसरा कांग्रेस के साथ है। दोनों निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बावजूद भाजपा बगैर दल-बदल कराए अपना बहुमत साबित नहीं कर सकती। कांग्रेस और जनता दल (एस) के विधायकों के विश्वास प्रस्ताव के समय पार्टी व्हिप दर किनार करते हुए अनुपस्थित रहने पर भी यह दल-बदल माना जाएगा। भाजपा की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि शपथ लेने से पहले किसी भी विधायक पर दल-बदल लागू नहीं होता है। यानी वह एक पार्टी छोड, दूसरी में शामिल हो सकता है। यह सरासर लोकतंत्र की हत्या है। सुप्रीम कोर्ट ने वीरवार को सुनवाई के दौरान इस तर्क को निरर्थक बताते हुए कहा कि शपथ लेने से पहले भी किसी को दल-बदल की अनुमति नहीं दी जा सकती। पार्टी के टिकट पर निर्वाचित होकर आया विधायक शपथ से पहले या बाद में दल बद्ले, वह दल-बदलू ही माना जाएगा। दल-बदल को बढावा देने वाले सियासी दल, सरकार और राज्यपाल लोकतंत्र के मित्र नहीं हो सकते। भारतीय लोकतंत्र का सौभाग्य है कि न्यायपालिका “सत्ता के लिए कुछ भी करेंगे“ की मानसिकता वाली सियासी दलों को नकेल डाल रही है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को शनिवार चार बजे तक विश्वास मत हासिल करने का आदेष देकर लोकतंत्र की लाज रखी है। प्रो-टेम स्पीकर का चयन, उसकी अधिसूचना और षपथ और फिर सभी 222 विधायकों की षपथ कल 4 बजे तक पूरा करना चुनौतीपूर्ण है मगर टॅाप कोर्ट के आदेश हैं, तो यह सब करना ही पडेगा। बस तमाशा देखते रहिए और शनिवार सांयकाल तक इंतजार कीजिए।
शुक्रवार, 18 मई 2018
रमजान ,“आतंकी भी भाईजान“
Posted on 6:45 pm by mnfaindia.blogspot.com/
आतंकी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा “सीजफायर“ की घोषणा से राज्य में रमजान के दौरान अमन-चैन कायम हो न हो, मगर केन्द्र के इस फैसले से राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राहत जरुर मिल सकती है। वीरवार से जम्मू-कश्मीर में यह सीजफायर लागू हो गया है। इसके तहत सुरक्षाकर्मी आतंकियों के हमले की स्थिति में ही जवाबी कार्रवाई करेंगेें। मगर राज्य के भाजपाई नेता ही “सेना को गोलियां, आतंकियों को सेवेइयां“ की नीति से खासे क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र से रमजान के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा “सीजफायर“ की मांग रखी थी। मुख्यमंत्री ने रमजान के दौरान “ऑपरेशन आल आउट“ को रोकने के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। भाजपा ने इसका बहिष्कार किया था। सेना पिछले कई माह से आतंकियों के खिलाफ “ऑपरेशन आल आउट“ चलाए हुए है। इस ऑपरेशन के दौरान इस साल अब तक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री के जम्मू-कश्मीर दौरे से ठीक पहले सीजफायर की घोषणा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कश्मीर के दो दिन के दौरे पर श्रीनगर जा रहे हैं। कश्मीर के अलगाववादी नेता पहले ही इस दौरे के बहिष्कार की घोषणा कर चुके हैं। अलगाववादी सईद गिलानी, मीरवेज उमर फारुक और यासीन मलिक ने “ शनिवार“ को “श्रीनगर के लाल चौक चलो“ का आहवान किया है। पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन लष्कर-ए-तैयबा ने भी “सीजफायर“ को ठुकरा कर “वार्ता“ की मांग की है। 17 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने 2000-01 में भी रमजान के दौरान जम्मू-कष्मीर में चार चरणों में सीजफायर लागू किया था। पहला सीजफायर नवंबर 28 से 27 दिसंबर 2000 तक लागू किया गया था और इस दौरान जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत 211 लोग मारे गए थे। 28 दिसंबर से 26, जनवरी 2001 तक लागू दूसरे चरण के सीजफायर में 203, 27 जनवरी से 26 फरवरी के तीसरे चरण के सीजफायर में 235 और फरवरी 27 से 30 मई तक के चौथे चरण में 189 लोग मारे गए थे। इन आंकडों से स्पष्ट होता है कि रमजान जैसे पवित्र माह में हिंसा और खून-खराबे के दानवों को सीजफायर से कोई सरोकार नहीं है। सरकार का यह फैसला आतंकियों से लडते-लडते शहीद हुए सैनिकों की शुरवीरता का घोर अपमान है। कश्मीर में सेना सबसे बडी स्टैकहोल्डर है। उन सियासी नेताओं से भी कहीं ज्यादा जो भारी सुरक्षा बंदोबस्त में आतंकियों को रमजान के दौरान “सेवईयां“ खिलाने की पैरवी करते हैं। कश्मीर का अवाम भी यही चाहेगा कि आतंकियों से वार्ता करने की पैरवी करने वाले अलगाववादी और सियासी नेता बगैर भारी सुरक्षा के बाहर आकर देख ले, उन्हें जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। और इस बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने सेना पर “राजनीतिक साजिश “ का आरोप लगाकर माहौल को और खराब कर दिया है। सेना ने जम्मू के नगरोटा में निर्मल सिंह द्वारा निर्माणाधीन भवन को फौरन बंद करने का नोटिस भेजा है। “एक तो चोरी, उस पर सीनाजोरी“ को चरितार्थ करते हुए नेता ने सेना पर ही संगीन आरोप मढ दिए हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि राश्ट्रवादी का चोला ओढने वाले भाजपाई नेता भी अपने “निहित स्वार्थ“ के लिए कुछ सकते हैं। कश्मीर में ताजा सीजफायर से एक बार फिर सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना ने दक्षिण कश्मीर आतंक बहुल जिलों में आतंकियों के तमाम-छोटे बडे मॉड्यूल का ध्वस्त कर डाला था। मगर अब एक माह में आतंकियों को फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा। महबूबा मुफ्ती की प्रतिष्ठा बचाने के लिए कश्मीर में “ऑपरेशन आल आउट“ की सफलता को खतरे में डालना कारगर रणनीति नहीं है।
रमजान में “आतंकी भी भाईजान“
आतंकी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कष्मीर में मोदी सरकार द्वारा “सीजफायर“ की घोशणा से राज्य में रमजान के दौरान अमन-चैन कायम हो न हो, मगर केन्द्र के इस फैसले से राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राहत जरुर मिल सकती है। वीरवार से जम्मू-कष्मीर मंे यह सीजफायर लागू हो गया है। इसके तहत सुरक्षाकर्मी आतंकियों के हमले की स्थिति में ही जवाबी कार्रवाई करेंगेें। मगर राज्य के भाजपाई नेता ही “सेना को गोलियां, आतंकियों को सेवेइयां“ की नीति से खासे क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र से रमजान के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा “सीजफायर“ की मांग रखी थी। मुख्यमंत्री ने रमजान के दौरान “ऑपरेषन आल आउट“ को रोकने के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। भाजपा ने इसका बहिश्कार किया था। सेना पिछले कई माह से आतंकियों के खिलाफ “ऑपरेषन आल आउट“ चलाए हुए है। इस ऑपरेषन के दौरान इस साल अब तक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री के जम्मू-कष्मीर दौरे से ठीक पहले सीजफायर की घोशणा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस षनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कष्मीर के दो दिन के दौरे पर श्रीनगर जा रहे हैं। कष्मीर के अलगाववादी नेता पहले ही इस दौरे के बहिश्कार की घोशणा कर चुके हैं। अलगाववादी सईद गिलानी, मीरवेज उमर फारुक और यासीन मलिक ने “ षनिवार“ को “श्रीनगर के लाल चौक चलो“ का आहवान किया है। पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन लष्कर-ए-तैयबा ने भी “सीजफायर“ को ठुकरा कर “वार्ता“ की मांग की है। 17 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने 2000-01 में भी रमजान के दौरान जम्मू-कष्मीर में चार चरणों में सीजफायर लागू किया था। पहला सीजफायर नवंबर 28 से 27 दिसंबर 2000 तक लागू किया गया था और इस दौरान जम्मू-कष्मीर में सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत 211 लोग मारे गए थे। 28 दिसंबर से 26, जनवरी 2001 तक लागू दूसरे चरण के सीजफायर में 203, 27 जनवरी से 26 फरवरी के तीसरे चरण के सीजफायर में 235 और फरवरी 27 से 30 मई तक के चौथे चरण में 189 लोग मारे गए थे। इन आंकडों से स्पश्ट होता है कि रमजान जैसे पवित्र माह में हिंसा और खून-खराबे के दानवों को सीजफायर से कोई सरोकार नहीं है। सरकार का यह फैसला आतंकियों से लडते-लडते षहीद हुए सैनिकों की षूरवीरता का घोर अपमान है। कष्मीर में सेना सबसे बडी स्टैकहोल्डर है। उन सियासी नेताओं से भी कहीं ज्यादा जो भारी सुरक्षा बंदोबस्त में आतंकियों को रमजान के दौरान “सेवईयां“ खिलाने की पैरवी करते हैं। कष्मीर का अवाम भी यही चाहेगा कि आतंकियों से वार्ता करने की पैरवी करने वाले अलगाववादी और सियासी नेता बगैर भारी सुरक्षा के बाहर आकर देख ले, उन्हें जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। और इस बीच भाजपा के वरिश्ठ नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने सेना को “राजनीतिक साजिष“ का आरोप लगाकर माहौल को और खराब कर दिया है। सेना ने जम्मू के नगरोटा में निर्मल सिंह द्वारा निर्माणाधीन भवन को फौरन बंद करने का नोटिस भेजा है। “एक तो चोरी, उस पर सीनाजोरी“ को चरितार्थ करते हुए सेना पर ही संगीन आरोप मढ दिए हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि राश्ट्रवादी का चोला ओढने वाले भाजपाई नेता भी अपने “निहित स्वार्थ“ के लिए कुछ सकते हैं। कष्मीर में ताजा सीजफायर से एक बार फिर सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना ने दक्षिण कष्मीर के आतंक बहुल जिलों में आतंकियों के तमाम-छोटे बडे मॉड्यूल का ध्वस्त कर डाला था। मगर अब एक माह में आतंकियों को फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा। महबूबा मुफ्ती की प्रतिश्ठा को बचाने के लिए कष्मीर में “ऑपरेषन आल आउट“ की सफलता को खतरे में डालना कारगर रणनीति साबित हो सकती है।
रमजान में “आतंकी भी भाईजान“
आतंकी हिंसा में झुलस रहे जम्मू-कष्मीर में मोदी सरकार द्वारा “सीजफायर“ की घोशणा से राज्य में रमजान के दौरान अमन-चैन कायम हो न हो, मगर केन्द्र के इस फैसले से राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को राहत जरुर मिल सकती है। वीरवार से जम्मू-कष्मीर मंे यह सीजफायर लागू हो गया है। इसके तहत सुरक्षाकर्मी आतंकियों के हमले की स्थिति में ही जवाबी कार्रवाई करेंगेें। मगर राज्य के भाजपाई नेता ही “सेना को गोलियां, आतंकियों को सेवेइयां“ की नीति से खासे क्षुब्ध हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केन्द्र से रमजान के दौरान सुरक्षाकर्मियों द्वारा “सीजफायर“ की मांग रखी थी। मुख्यमंत्री ने रमजान के दौरान “ऑपरेषन आल आउट“ को रोकने के लिए सर्वदलीय बैठक भी बुलाई थी। भाजपा ने इसका बहिश्कार किया था। सेना पिछले कई माह से आतंकियों के खिलाफ “ऑपरेषन आल आउट“ चलाए हुए है। इस ऑपरेषन के दौरान इस साल अब तक 200 से ज्यादा आतंकी मारे जा चुके हैं। प्रधानमंत्री के जम्मू-कष्मीर दौरे से ठीक पहले सीजफायर की घोशणा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। इस षनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जम्मू-कष्मीर के दो दिन के दौरे पर श्रीनगर जा रहे हैं। कष्मीर के अलगाववादी नेता पहले ही इस दौरे के बहिश्कार की घोशणा कर चुके हैं। अलगाववादी सईद गिलानी, मीरवेज उमर फारुक और यासीन मलिक ने “ षनिवार“ को “श्रीनगर के लाल चौक चलो“ का आहवान किया है। पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे आतंकी संगठन लष्कर-ए-तैयबा ने भी “सीजफायर“ को ठुकरा कर “वार्ता“ की मांग की है। 17 साल पहले अटल बिहारी वाजपेयी की राजग सरकार ने 2000-01 में भी रमजान के दौरान जम्मू-कष्मीर में चार चरणों में सीजफायर लागू किया था। पहला सीजफायर नवंबर 28 से 27 दिसंबर 2000 तक लागू किया गया था और इस दौरान जम्मू-कष्मीर में सुरक्षा बलों और नागरिकों समेत 211 लोग मारे गए थे। 28 दिसंबर से 26, जनवरी 2001 तक लागू दूसरे चरण के सीजफायर में 203, 27 जनवरी से 26 फरवरी के तीसरे चरण के सीजफायर में 235 और फरवरी 27 से 30 मई तक के चौथे चरण में 189 लोग मारे गए थे। इन आंकडों से स्पश्ट होता है कि रमजान जैसे पवित्र माह में हिंसा और खून-खराबे के दानवों को सीजफायर से कोई सरोकार नहीं है। सरकार का यह फैसला आतंकियों से लडते-लडते षहीद हुए सैनिकों की षूरवीरता का घोर अपमान है। कष्मीर में सेना सबसे बडी स्टैकहोल्डर है। उन सियासी नेताओं से भी कहीं ज्यादा जो भारी सुरक्षा बंदोबस्त में आतंकियों को रमजान के दौरान “सेवईयां“ खिलाने की पैरवी करते हैं। कष्मीर का अवाम भी यही चाहेगा कि आतंकियों से वार्ता करने की पैरवी करने वाले अलगाववादी और सियासी नेता बगैर भारी सुरक्षा के बाहर आकर देख ले, उन्हें जमीनी सच्चाई का पता चल जाएगा। और इस बीच भाजपा के वरिश्ठ नेता और पूर्व उप-मुख्यमंत्री निर्मल सिंह ने सेना को “राजनीतिक साजिष“ का आरोप लगाकर माहौल को और खराब कर दिया है। सेना ने जम्मू के नगरोटा में निर्मल सिंह द्वारा निर्माणाधीन भवन को फौरन बंद करने का नोटिस भेजा है। “एक तो चोरी, उस पर सीनाजोरी“ को चरितार्थ करते हुए सेना पर ही संगीन आरोप मढ दिए हैं। यह प्रकरण इस बात का प्रमाण है कि राश्ट्रवादी का चोला ओढने वाले भाजपाई नेता भी अपने “निहित स्वार्थ“ के लिए कुछ सकते हैं। कष्मीर में ताजा सीजफायर से एक बार फिर सेना का मनोबल गिर सकता है। सेना ने दक्षिण कष्मीर के आतंक बहुल जिलों में आतंकियों के तमाम-छोटे बडे मॉड्यूल का ध्वस्त कर डाला था। मगर अब एक माह में आतंकियों को फिर से सक्रिय होने का मौका मिल जाएगा। महबूबा मुफ्ती की प्रतिश्ठा को बचाने के लिए कष्मीर में “ऑपरेषन आल आउट“ की सफलता को खतरे में डालना कारगर रणनीति साबित हो सकती है।
गुरुवार, 17 मई 2018
सीएम वही जो गवर्नर मन भाए!
Posted on 10:40 am by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार के समय एक प्रचलित जुमला है “मुख्यमंत्री वही जो गवर्नर मन भाए“। कर्नाटक में त्रिशंकू विधानसभा के लिए यह जुमला सटीक बैठता है। किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने की स्थिति में राज्यपाल जिस भी पार्टी अथवा गठबंधन को न्यौता देंगे, वह जोड-तोड करके सरकार बना ही लेगी और अपना बहुमत सिद्ध भी कर लेगी। मंगलवार को कर्नाटक में त्रिशंकू विधानसभा की स्थिति साफ होते ही जोड-तोड शुरु हो गई । कांग्रेस ने बगैर एक क्षण गंवाए, जनता दल (एस) को अपना समर्थन देकर भाजपा का सरकार बनाने के दावे में रोडा अटका दिया। कांग्रेस के समर्थन से गदगद जनता दल (एस) के नेता एच डी कुमारस्वामी ने फौरन सरकार बनाने का दावा भी ठोक दिया। 224 सदस्यीय कर्नाटक विधान सभा में कांग्रेस और जनता दल(एस) को 116 विधायकों जे समर्थन से स्पष्ट बहुमत है। भाजपा के 104 सदस्य हैं और उसे बहुमत के लिए 8 सदस्यों के समर्थन की दरकार है। 224 मेंसे 222 हलकों के ही चुनाव हुए हैं। दो विधानसभा हलकों में चुनाव स्थगित कर दिए गए थे। कांग्रेस के लिंगायत विधायक एच डी कुमारस्वामी को पार्टी समर्थन के खिलाफ हैं और बगावत की धमकी दे चुके हैं। जनता दल (एस) नेता एव पूर्व मुख्यमंत्री कुमारस्वामी वोक्कालिगा समुदाय से हैं। लिंगायत समुदाय को वोक्कालिगा फूटी आंख भी नहीं सुहाते हैं। सिद्धारमैया सरकार ने वोक्कालिगा से ताल्लुक रखने वाले अधिकारियों से खूब भेदभाव किया था। बुधवार को कुमारस्वामी ने भाजपा पर उनकी पार्टी के विधायकों की खरीद-फरोख्त के संगीन आरोप भी लगाए हैं। जनता दल (एस) के पांच विधायक लापता हैं और पार्टी को संदेह हैं कि ये सभी भाजपा के खेमे में चले गए हैं। बंगलुरु में राजनीतिक नोटंकियां जारी है। कांग्रेस के तीन विधायक भी लापता है। कांग्रेस के विधायकों को पोचिंग से बचाने के लिए बसों में ठूंस कर पहले राजभवन और फिर रिजॉर्ट में ले जाया गया। देश में बाकायदा दल-बदल कानून लागू है। इस कानून के तहत किसी भी पार्टी से सम्बद्ध विधायक पार्टी छोडने पर अपनी सदस्यता गंवा सकता है। इसके बावजूद भी विधायक दल-बदल करने में संकोच नहीं करते हैं। इससे पता चलता है कि भारत में कानून का कितना सम्मान किया जाता है। बहरहाल, सरकार किस पार्टी अथवा गठबंधन की बनती है, अब यह बात पूरी तरह से राज्यपाल के विवेक पर निर्भर था । और राज्यपाल का विवेक संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार काम करता है। त्रिषंकू विधानसभा की स्थिति के लिए कोई संवैधानिक व्यवस्था नहीं है। 1989 में देश में पहली बार त्रिशंकू संसद का गठा हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकेटरमण ने सबसे बडे दल को पहले सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने की परंपरा का निर्वहन किया था। मगर 1996 में जब इसी परंपरा का निर्वहन किया गया, सरकार 14 दिन भी चल नहीं पाई। इस स्थिति के दृष्टिगत संविधान विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्यपाल को सबसे बडे दल की परंपरा के साथ-साथ स्थाई सरकार को भी तवज्जो देनी चाहिए। दल-बदल से बनी सरकार संविधान का अपमान है और राज्यपाल संविधान का रक्षक होता है। कर्नाटक में भाजपा बेषक सबसे बडा दल है मगर पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है और अगर पार्टी सरकार बनाती है, तो उसे अपना बहुमत साबित करने के लिए दल-बदल का सहारा लेना पडेगा। मौजूदा स्थिति में बहुमत कांग्रेस-जनता दल (एस) के पक्ष में है। राज्यपाल का विवेक भी स्पष्ट रुप से इस स्थिति को देख सकता था कि बहुमत कांग्रेस-जद(एस) गठबंधन के पास है। मगर 38 विधायकों वाले दल को सरकार बनाने का न्यौता देना भी तो जनादेश का अपमान है। जनता दल (एस) को समर्थन देकर कांग्रेस का मकसद स्थायी सरकार देना नहीं, अलबत्ता भाजपा को सत्ता से बाहर रखना है। यह भी निराशाजनक स्थिति है। विधानसभा में बहुमत सिद्ध करने के लिए विपक्ष के विधायकों को अनुपस्थित कराने की रणनीति भी लोकतंत्र के लिए घातक है। अतत:, मुख्यमंत्री वही बना जो गवर्नर के विवेक को भाया और राज्यपाल का मन तो बीजेपी के साथ है ।
कांग्रेस पर संकट
Posted on 10:28 am by mnfaindia.blogspot.com/
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव परिणाम निकलने के साथ ही लोकतंत्र के पर्व का सोमवार को समापन हो गया। इस पर्व में जात-पात, धर्म-कर्म, ऊंच-नीच और आरोप-प्रत्यारोप की आहुतियां चढाने के लिए सियासी नेताओं ने कोई कसर नहीं छोडी। अततः, चुनावी दलदल में इस बार कमल खिला है और कांग्रेस फिर चुनाव हार गई है। चुनाव हारना तो जैसे ग्रांड ओल्ड पार्टी की नियति बन गई है। नरेन्द्र मोदी के प्रधान मंत्री बनने के चार साल के दौरान कांग्रेस 11 राज्यों से सिकुड कर 3 राज्यों में सिमट गई है और भाजपा-राजग का षासन 8 से बढकर 21 तक फैल गया है। कांग्रेस ने कर्नाटक को फतेह करने के लिए क्या नहीं किया। हर विधानसभा सीट के लिए अलग से रणनीति बनाई। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने हर बूथ स्तर तक कांग्रेस सरकार की उपलब्धियों का परचम लहराया और मतदाताओं से सीधा संपर्क साधा । कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पूरे राज्य में घूम-घूम कर पार्टी का अलख जगाया। वोटरों को लुभाने के लिए हर हथकंडे अपनाए। चुनाव से दो महीने पहले मार्च में कन्नडिगा स्वाभिमान“ का नारा बुलंद कर राज्य का अलग षासकीय झंडा तय किया गया। लिंगायत समुदाय को हिंदू धर्म से अलग अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर मान्यता दी। इतना सब करने के बावजूद कांग्रेस चुनाव हार गई। देष का मतदाता अब सयाना हो गया है। वह नेताओं के झांसे में नहीं आता। सच कहा जाए तो कांग्रेस ने राज्य में हार की बुनियाद उसी दिन रख दी थी, जिस दिन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दो-दो हलकों से चुनाव लडने के लिए पर्चा भरा था। जिस पार्टी का षीर्श नेता अपनी सीट को लेकर आष्वस्त न हो, उसका हारना तय है। वैसे नरेन्द्र मोदी- अमित षाह की जोडी का कांग्रेस के पास कोई तोड नहीं है। कांग्रेस का राश्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी की यह पहली हार है। लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पंजाब और पुडुचेरी को छोडकर हर विधानसभा चुनाव हारी है। एक के बाद एक विधानसभा चुनाव हारने के कारण कांग्रेस में नेतृत्व का संकट खडा हो सकता है। कांग्रेस का अब तक का यही इतिहास रहा है कि वह बहुत देर तक सत्ता से बाहर नहीं रह सकती और जो नेता उसे सता में लाने की क्षमता नहीं रखता है, देर-सबेर उसे हटा दिया जाता है। नेहरु परिवार पर पार्टी इसी मकसद से आश्रित रही है क्योंकि परिवार के बाहर का नेतृत्व पार्टी को सत्ता में नहीं ला सका। इसी लक्ष्य को सामने रखकर कांग्रेसी जब-तब प्रियंका गांधी वाड्रा को आगे लाने का आहवान करते रहे हैं। प्रियंका गांधी में अपनी दादी इंदिरा गांधी जैसा स्पार्क दिखता है मगर अपने पति राबर्ट वाड्रा पर मुकदमे चलने से प्रियंका की छवि पर भी असर पडा है। बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राश्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) देष को यह बात समझाने में कामयाब रहा है कि कांग्रेस को एक परिवार ने बंधक बना रखा है। भाजपा और आरएसएस कर्नाटक में सभी गैर भाजपाई दलों को हिंदू-विरोधी साबित करने में सफल रही है। कांग्रेस के लिए अब सबसे बडा संकट यह होगा कि अन्य विपक्ष दल राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने से हाथ खींच सकते हैं। कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए अब एक ही लाइफ लाइन बची है। इस साल के अंत मंे राजस्थान, मध्य प्रदेष, छतीसगढ और मिजोरम में विधानसभा चुनाव होने है। मिजोरम ज्यादा मायने नहीं रखता है मगर राजस्थान, मध्य प्रदेष और छतीसगढ बेहद महत्वपूर्ण है। अगर कांग्रेस इन राज्यों में भी चुनाव हार जाती है, तो 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का अस्तित्व ही खतरे में पड जाएगा। कांग्रेस के लिए अच्छी खबर यह है कि पार्टी का 30 से 40 फीसदी का जनाधार बरकरार है। कर्नाटक में मात्र 0.5 फीसदी ज्यादा वोट लेकर भाजपा स्पश्ट बहुमत के करीब पहुंचने में कामयाब रही है। कांग्रेस आज भी बडी पार्टी है और उसका पूरे देष में जनाधार है। बस उसे लोकप्रिय नेतृत्व की दरकार है।
मौसम की मार
Posted on 10:27 am by mnfaindia.blogspot.com/
गर्मी में खुषगवार मौसम और सर्दियों में गर्मी। भारत में मौसम के बदलते तेवरों ने विज्ञानियों को भी चक्कर में डाल रखा है। मौसम विज्ञानियों ने 2018 को 2017 से भी ज्यादा गर्म रहने का अनुमान लगाया था मगर अभी तक यह सही साबित नहीं हो रहा है। मई का आधा महीना गुजर चुका है मगर भीशण गर्मी तो दीगर रही, सामान्य तापमान भी औसत से कहीं कम है। बीते पखवाडे के दौरान देष में तूफानी हवाएं और धूल भरी आंधी चलने से अब तक लगभग 200 लोगों की मौत हो चुकी है। 2 मई को आए तूफान से उत्तर प्रदेष और राजस्थान में 130 से ज्यादा लोग मारे गए थे। भीशण तूफान की आषंका से दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ में स्कूलों को बंद कर दिया गया था। षुक्र है तब तूफानी हवाओं का प्रकोप इतना भयानक नहीं रहा, जितना मौसम विभाग का अनुमान था। रविवार को फिर तूफानी हवाएं चलने से देष में 70 से ज्यादा लोग मारे गए। सबसे ज्यादा जनहानि उत्तर प्रदेष में हुई है। 2 मई को उत्तर प्रदेष में 70 लोग मारे गए थे। रविवार को 42 लोग मारे गए और 84 से अधिक घायल हो गए। पष्चिम बंगाल में 14 और आंध्र प्रदेष में 12 लोग मारे गए। रविवार को पूरे देष में तूफानी हवाओं ने तबाही मचाई है। मौसम विभाग ने अलर्ट जारी कर सोमवार और मंगलवार को भी उत्तर, पूर्वोतर और दक्षिण भारत में तूफानी हवाएं चलने की संभावनाएं जताई है। वेस्टर्न डिस्टर्बेंसिस के कारण मौसम में यह बद्लाव आया है। तूफान आने के 30 मिनट के भीतर आसमानी बिजली गिरने का खतरा बना रहता है़। इस स्थिति के दृश्टिगत तूफान आने पर अधिकांष मौतंे आसमानी बिजली गिरने से होती हैं।
मौसम विभाग का अनुमान है कि अगले सोमवार 21 मई को अधिकतम 47 डिग्री और 22 तथा 23 मई को 46 डिग्री सेल्यसिस को छोडकर इस महीने तापमान औसत 42 डिग्री सेल्यसिस से नीचे ही रहेगा। जून के पहले सप्ताह भी औसत तापमान 38 से 40 डिग्री के आसपास रह सकता है। जून के दूसरे सप्ताह उत्तर भारत में प्री-मानसून बारिष पडने से गर्मी का प्रकोप कम हो जाता है। दक्षिण भारत में इस बार मई अंत तक और पष्चिम भारत में जून के पहले हफ्ते तक मानसून सक्रिय हो जाएंगी। इन हालात में मऔ और जून मे भीशण गर्मी नहीं पडना मौसम की कठोरता के संकेत है। वर्श 2017 मे मौसम ने पूरी दुनिया में अपने तीखे तेवर दिखाए थे। 2017 षुरु होते ही आस्ट्रेलिया के सिडनी और ब्रिसबेन में रिकॉर्ड तोड गर्मी पडी थी। यह असामान्य घटना थी और इससे पहले इस मुल्क में ऐसा कभी नहीं हुआ था। भीशण गर्मी के कारण अमेरिका के केलिफोर्निया के जंगलों में आग लगने और फैलने से भारी नुकसान हुआ था। दक्षिण यूरोप को भी असामान्य तौर पर पहली बार भीशण गर्मी से दो-चार होना पडा था। अटंलाटिक तूफान-हार्वे, इरमा और मारिया- ने अमेरिका प्रायद्धीप में भारी तबाही मचाते हुए 260 अरब डालर से ज्यादा की संपति नश्ट कर डाली थी। 2017 मे मानसून ने भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेष में भारी तबाही मचाई थी और 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। मौसम विज्ञानियों के अनुसार 2017 इतिहास में सबसे ज्यादा गैर-एल निनो गर्म साल रहा है और साल 2018 इससे भी ज्यादा गर्म और मौसम की मार से पीडित वर्श हो सकता है। आईपीसीसी (इंटरगर्वमेंटल पैनल ऑन कलामेट चेंज) की रिपोर्ट के अनुसार हालांकि साल-दर-साल गर्मी बढ सकती है मगर मौसम में अत्याधिक बदलाव भी देखे जा सकते हैं। यानी गर्मी में सदाबहार मौसम, सर्दी में गर्मी, तूफान, भारी बारिष और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम बात हो सकती हैं। मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि इस बार मानसून सामान्य रहेगी मगर मौसम के मौजूदा मिजाज और कठोरता इसकी गवाही नहीं दे रही है। यह सब पर्यावरण से छेडछाड का नतीजा है।
मौसम विभाग का अनुमान है कि अगले सोमवार 21 मई को अधिकतम 47 डिग्री और 22 तथा 23 मई को 46 डिग्री सेल्यसिस को छोडकर इस महीने तापमान औसत 42 डिग्री सेल्यसिस से नीचे ही रहेगा। जून के पहले सप्ताह भी औसत तापमान 38 से 40 डिग्री के आसपास रह सकता है। जून के दूसरे सप्ताह उत्तर भारत में प्री-मानसून बारिष पडने से गर्मी का प्रकोप कम हो जाता है। दक्षिण भारत में इस बार मई अंत तक और पष्चिम भारत में जून के पहले हफ्ते तक मानसून सक्रिय हो जाएंगी। इन हालात में मऔ और जून मे भीशण गर्मी नहीं पडना मौसम की कठोरता के संकेत है। वर्श 2017 मे मौसम ने पूरी दुनिया में अपने तीखे तेवर दिखाए थे। 2017 षुरु होते ही आस्ट्रेलिया के सिडनी और ब्रिसबेन में रिकॉर्ड तोड गर्मी पडी थी। यह असामान्य घटना थी और इससे पहले इस मुल्क में ऐसा कभी नहीं हुआ था। भीशण गर्मी के कारण अमेरिका के केलिफोर्निया के जंगलों में आग लगने और फैलने से भारी नुकसान हुआ था। दक्षिण यूरोप को भी असामान्य तौर पर पहली बार भीशण गर्मी से दो-चार होना पडा था। अटंलाटिक तूफान-हार्वे, इरमा और मारिया- ने अमेरिका प्रायद्धीप में भारी तबाही मचाते हुए 260 अरब डालर से ज्यादा की संपति नश्ट कर डाली थी। 2017 मे मानसून ने भारत, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेष में भारी तबाही मचाई थी और 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। मौसम विज्ञानियों के अनुसार 2017 इतिहास में सबसे ज्यादा गैर-एल निनो गर्म साल रहा है और साल 2018 इससे भी ज्यादा गर्म और मौसम की मार से पीडित वर्श हो सकता है। आईपीसीसी (इंटरगर्वमेंटल पैनल ऑन कलामेट चेंज) की रिपोर्ट के अनुसार हालांकि साल-दर-साल गर्मी बढ सकती है मगर मौसम में अत्याधिक बदलाव भी देखे जा सकते हैं। यानी गर्मी में सदाबहार मौसम, सर्दी में गर्मी, तूफान, भारी बारिष और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएं आम बात हो सकती हैं। मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि इस बार मानसून सामान्य रहेगी मगर मौसम के मौजूदा मिजाज और कठोरता इसकी गवाही नहीं दे रही है। यह सब पर्यावरण से छेडछाड का नतीजा है।
रविवार, 13 मई 2018
कितना भी हो जाऊं बड़ा, “माँ ” मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ
Posted on 2:17 pm by mnfaindia.blogspot.com/
घुटनों से रेंगते-रेंगते,
कब पैरों पर खड़ा हुआ,
तेरी ममता की छाँव में,
न जाने कब बड़ा हुआ,
काला टीका दूध मलाई,
आज भी सब कुछ वैसा हैं,
मैं ही मैं हूँ हर जगह,
प्यार ये तेरा कैसा हैं?
सीधा-साधा, भोला-भाला,
मैं ही सबसे अच्छा हूँ,
कितना भी हो जाऊं बड़ा,
“माँ ” मैं आज भी तेरा बच्चा हूँ.
काश मैं भी उन जैसा बन पाता !
Posted on 2:05 pm by mnfaindia.blogspot.com/
सोशल मीडिया पर रचनाकार मित्रों के आचार-विचार पढकर, कॉलेज के जमाने में महान कवि सूर्य काँत त्रिपाठी निराला जी का एक वृतांत याद आ गया। स्नातक में हिंदी मेरा इलेक्टिव विषय था और हमें रचनाकारों को कंठस्थ करना पडा था। रक्षाबंधन के दिन निराला जी को इलाहाबाद में अपनी मुंहबोली बहन कवियत्री महादेवी वर्मा से राखी बंधवाने उनके घर जाना था । स्वभाव से एकदम फक्कड निराला जी बहन को गिफ्ट देने के लिए अपनी रायल्टी लेने दौडे-दोडै प्रकाशक के पास गए। पैसे लेकर “इक्के“(तांगे) में सवार जब बहन महादेवी के घर की तरफ जा रहे थे, रास्ते में एक वृद्ध महिला भीख मांगती नजर आई। साधुवादी निराला जी ने इक्का छोडा और महिला को समझाने लगे कि “ भीख“ मांगने से अच्छा उसे कोई काम करना चाहिए। महिला काफी वृद्ध थी और मेहनत करके अपना गुजारा करने की स्थिति में नहीं थी। उसका कोई आगे-पीछे भी नही था। निराला जी ने वृद्धा को अपना बिजनेस शुरु करने की सलाह दी मगर इसके लिए छोटी-मोटी पूंजी की जरुरत थी। वृद्धा के पास इतनी भी पूंजी नहीं थी कि वह अपना बिजनेस शुरु कर सके। निराला जी ने फौरन रायल्टी की पूरी राशि वृद्धा को दे दी। अब उनके पास बहन के लिए गिफ्ट खरीदने के पैसे भी नहीं थे। वे महादेवी वर्मा के घर पहुंचे, राखी बंधवाई और चुपचाप खडे ही रहे । बाहर “इक्केवाला“ अपना भाडा लेने के लिए खडा था। और तब बहन को आगे आना पडा। इस महान कवि की रचनाएं जितनी समृद्ध थी, उससे कहीं ज्यादा विशाल उनका हृदय था। विशुद्ध भोतिकवादी जमाने में हम आज इस तरह की “दानवीरता“ की कल्पना तक नही कर सकते। रचनाकार तो बन नहीं सका मगर आज भी यही तमन्ना है कि काश में भी निराला जी जैसा एक फीसदी दानवीर बन पाता और भौतिकवादी सोच से निजात पा लेता।
शनिवार, 12 मई 2018
तेल के खेल में चुनावी फसल
Posted on 10:08 am by mnfaindia.blogspot.com/
भारत में हर फैसला 90 फीसदी राजनीतिक और 10 फीसदी व्यवहारिक होता है। और तो और विशुद्ध आर्थिक फैसलों पर भी राजनीतिक हित हॉवी रहते हैं। औरों की खेतों से कैसे फसल काटी जाती है, राजनीतिक दलों को यह कला बखूबी आती है। पेट्रोल-डीजल की कीमतें का मामला ही ले लीजिए है। हर रोज कीमतें तय करने वाली तेल कंपनियां 24 अप्रैल से इन्हें स्थिर रखे हुए हैं जबकि इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 3 डालर प्रति बैरल बढ चुकी है। उपभोक्ताओं पर तेल कंपनियों की यह मेहरबानी कर्नाटक विधान सभा चुनाव के कारण हुई है। केन्द्र में सतारूढ मोदी सरकार को हर हाल में दक्षिण भारत के महत्वपूर्ण राज्य कर्नाटक में विधानसभा चुनाव जीतने हैं, इसीलिए तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए । दक्षिण भारत में कर्नाटक एक मात्र ऐसा राज्य है, जहां भगवा पार्टी का वर्चस्व है। पिछले साल गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान भी पेट्रोल के दाम स्थिर रखे गए थे। 2017 के शुरु में पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और असम विधानसभा चुनाव के दौरान भी पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढाए गए थे हालांकि तब प्रतिदिन की बजाए 15 दिन में कीमतों का रिवीजन किया जाता था। तेल कंपनियों 12 मई का इंतजार कर रही हैं। इस दिन कर्नाटक में मतदान हो रहा है। इतना तय है कि 12 मई के बाद किसी भी दिन पेट्रोल-डीजल के दाम बढ सकते हैं। इन दिनो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम पिछले साढे चार साल के उच्चतम स्तर पर है। कच्चे तेल के दामों में नरमी की कोई उम्मीद भी नहीं है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव प्रचार ने मतदाताओं को फिर कई राजनीतिक नौटंकियां दिखाई हैं। शुक्रवार को इसकी फिर बानकी मिली। कांग्रेस ने एक वीडियो जारी किया है जिसमें रेड्डी बंधुओं के अवैध खनन मामले में पक्ष में फैसला हासिल करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज के बेटे और भाजपा नेता में सौदेबाजी होती दिखाई गई है। भाजपा ने इस वीडियो को फर्जी बताया है मगर कांग्रेस इसे असली बता रही है। मामला 2010 का है और कांग्रेस इसे 2018 में मतदान से दो दिन पूर्व जारी कर रही है। जाहिर है यह सब ओछी राजनीति का हिस्स्सा है और कांग्रेस इसे मतदान के लिए भुनाना चाहती है। पांच साल तक राज्य में कांग्रेस का शासन था मगर इस दौरान इस वीडियों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे पहले बंगलुरु के एक फ्लैट में दस हजार वोटर कार्डस मिलने पर भी भाजपा और कांग्रेस ने एक दूसरे को लपेटने का कोई मौका नहीं छोडा था। निर्वाचन आयोग द्वारा इन वोटर कार्डस को असली बताए जाने पर मामला और संगीन हो गया। पहले माना जा रहा था कि फर्जी वोटर कार्डस बनाने के लिए बगलुरु के इस फ्लैट का इस्तेमाल किया जा रहा था और शक की सुई कांग्रेस पर टिकी हुई थी। इस प्रकरण ने फिर इस सच्चाई को उजागर किया है कि निर्वाचन आयोग की तमाम कोशिशों के बावजूद चुनाव में धांधलियां हो रही हैं और निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव अभी भी दूर की कौडी है। तेल से राजनीतिक फसल काटने का यह आर्ट बहुत पुराना है। भारत ही नहीं अमेरिका में भी राष्ट्रपति चुनाव के समय पेट्रोल सस्ता हो जाता है। कांग्रेस भी इस खेल से भरपूर राजनीतिक और आर्थिक फसल काटती रही है। सरकार का खजान तो फ्यूल पर लगाए जा रहे शुल्क से भरा जाता है। मई, 2014 से 2018 के बीच मोदी सरकार 7 बार पेट्रोल-डीजल पर शुल्क बढा चुकी है। तेल के खेल से राजनीतिक फसल काटने का यह सिला बदस्तूर जारी रहेगा। लोगों को बस उस दिन का इंतजार है जब अमेरिका की तरह भारत में भी चुनाव के समय पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा।
शुक्रवार, 11 मई 2018
स्वदेशी मंच पर विदेशी "पंच"
Posted on 10:08 am by mnfaindia.blogspot.com/
कहते हैं सपनों को हकीकत में बदले के लिए भी सपने देखने पडते हैं।़ चंडीगढ के बंसल बंधुओं ने दुनिया को यही कर दिखाया है। 2005 में दिल्ली आईआईटी में मुलाकात हुई और दोनों पक्के दोस्त बन गए। दोनों ने यहीं एक स्टार्ट अप शुरु करने का सपना देखा और 2007 में एक अन्य साथी के साथ मिलकर बंगलुरु से फ्लिपकार्ट खोल कर इसे साकार किया। इसे विडबना ही कहा जाएगा कि जिस अमेज़ॉन कंपनी ने एक दिन सचिन बंसल को कमतर आंका था, वही बहुराष्ट्रीय कंपनी कालांतर में फ्लिपकार्ट को खरीदने पर आतुर उन्हें मनाने के लिए हाथ-पांव मार रही थी। सचिन बंसल की सर्च इंजन आप्टिमाइजेशन महारत की बदौलत फ्लिपकार्ट जल्द ही लोकप्रिय ऑनलाइन साइट बन गई। कंपनी को विज्ञापन मिलने से अच्छी-खासी कमाई होने लग पडी और फ्लिपकार्ट जल्द ही अपने पांव पर खडी हो गई। 2009 आते आते कंपनी ने 10 लाख डॉलर का कर्जा लिया और इसका बेहतर इस्तेमाल करके फ्लिपकार्ट ने नौ साल में ही करीब 6 अरब डालर बटोर लिए। 2014 में जब अमेज़ॉन ने भारत में अपना कारोबार जमाया, तब माना जा रहा था कि यह दिग्गज कंपनी फ्लिपकार्ट को खा जाएगा। मगर ऐसा नहीं हुआ और फ्लिपकार्ट मुकाबला करती रही। चार साल बाद वॉलमार्ट ने इसे खरीदकर फ्लिपकार्ट का लोहा माना है। अपने अस्तित्व के मात्र 11 साल में फ्लिपकार्ट दुनिया की एक मात्र ऐसी कंपनी है जिसने इतने कम समय में एक लाख सात हजार डालर के शेयर्स बेचे हैं। इससे पहले 2016 में रुस की कंपनी रोसनेफ्त ने एस्सार ऑयल को 12.9 अरब डालर में खरीद कर भारत का सबसे बडा अधिग्रहण सौदा किया था। फ्लिपकार्ट में माइक्रोसॉफ्ट, सॉफ्ट बैंक, टेनसेंट की भी हिस्सेदारी है और इन कंपनियों ने अभी अपने शेयर्स नही बेचे हैं। सॉफ्ट बैंक के सबसे ज्यादा 20 फीसदी शेयर्स हैं। 32.4 लाख करोड रु से वॉलमार्ट ऑनलाइन कारोबार करने वाली दुनिया की सबसे बडी कंपनी है। 9 लाख करोड रु के ऑनलाइन कारोबार करनी वाली अमेज़ॉन, वॉलमार्ट सेे काफी पीछे है। अलीबाबा का कारोबार डेढ लाख करोड रु के करीब है। 11 साल में भारत की फ्लिपकार्ट 20 हजार करोड रु का कारोबार कर रही है। फ्लिपकार्ट डील से वालमार्ट की स्थिति भारत में और मजबूत होगी। अमेरिका में कॉपोर्रेट टैक्स में कटौती के बाद वॉलमार्ट के पास अच्छा-खासा कैश है और कंपनी इसका सही इस्तेमाल करने के लिए आतुर थी। अमेरिका की यह दिग्गज कंपनी भारत में ठोस जमीन तलाश रही थी। भारत दुनिया का सबसे बडा बाजार है और ऑनलाइन शॉपिंग का कारोबार तेजी से बढ रहा हे। 2017 में भारत में ऑनलाइन कारोबार 2100 करोड डालर पहुंच चुका था। 2026 तक भारत में ऑनलाइन शॉपिंग 200 अरब डालर को पार कर जाएगा। इतने विशा ल बाजार को देखकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुंह में पानी आना स्वभाविक है। चार साल पहले भारती एयरटेल के साथ वॉलमार्ट ने भारत में प्रवेश किया था मगर तब विदेशी निवेश पर लगी पाबंदियों के चलते इसका कारोबार “कैश और कैरी“ के थोक व्यापार तक ही सीमित था। भारत में अभी भी वॉलमार्ट के 21 स्टोर हैं। बहरहाल, वॉलमार्ट द्वारा फ्लिपकार्ट के अधिग्रहण से छोटे कारोबारियों का चिंतित होना स्वभाविक है। बडी मछली हर हाल में छोटे को निगल जाती है। वॉलमार्ट का इतिहास रहा है कि वह कम दामों पर अपना सामान बेचकर छोटे कारोबारियों को रास्ते से हटा देती है। वॉलमार्ट के पास न तो कैश की कमी होती है और न ही संसाधनों की। दुनिया भर से सस्ता माल खरीदकर कंपनी इसे डंप कर देती है और फिर समय आने पर सस्ते में बेच देती है। आरएसएस से सम्बद्ध स्वदेशी जागरण मंच ने इस डील का मुखर विरोध किया है। ऑन लाइन वेंडर्स भी इस डील का मुखर विरोध कर रहे हैं। सच यही है कि स्वदेशी मंच पर विदेशी "पंच" राष्ट्रहित में नहीं हो सकता है। इतिहास स्वंय को दोहरा रहा है।
गुरुवार, 10 मई 2018
भारतीय मुद्रा की दुर्गति
Posted on 6:30 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मौसम की मार, अमेरिका-ईरान वार और रुपया तार-तार। भारत में यह है “आज की ताजा खबर“। मौसम के मिजाज इन दिनों बिगडे हुए हैं और देश मई की भीषण गर्मी की बजाए, सुहाने मौसम का लुत्फ उठा रहा है। यह अपने आप में अनहोनी घटना है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मिजाज भी मौसम की तरह बदलता रहता है। उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन से पंगा लेते-लेते उकताए गए तो चीन से व्यापार को लेकर दो-दो हाथ आजमा लिए और अब अमेरिका ईरान से उलझ गया है। ट्रंप ने मंगलवार को ईरान के साथ “बहुराष्ट्रीय “ परमाणु करार से अलग होने की ऐलान कर दिया है। लंबे समय से अमेरिका इस करार से अलग होने की धमकी दे रहा था। जुलाई, 2015 में विएना में अमेरिका, चीन, फ्रांस, रुस, ब्रिटेन और जर्मनी समेत 6 मुल्कों के साथ ईरान का परमाणु उपयोग पर समझौता हुआ था। डोनाल्ड ट्रंप शुरु से ही इसके मुखर विरोधी रहे हैं। राष्ट्रपति बनते ही वे इसे ध्वस्त करने में जुट गए। अमेरिका और पश्चिम के मुल्कों को शक है कि ईरान परमाणु बम बना रहा है। विएना करार के तहत अगर ईरान बम बनाता है, तो यह टूट सकता है। तेहरान के बार-बार स्पष्टीकरण के बावजूद अमेरिका और उसके मित्र देशों को ईरान पर विश्वास नहीं है। इस स्थिति में करार का टूटना तो तय था। वैसे भी दुनिया पर अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत की धैंास जमाने वाला अमेरिका अपने सिवा किसी पर भरोसा नहीं करता है। इससे पहले जून, 2017 में ट्रंप महाशय का अमेरिका पेरिस जलवायु करार से भी अलग हो गया था। अपनी शर्तें मनवाकर दुनिया को उंगलियों पर नचाना अमेरिका की फितरत है। बहरहाल, ट्रंप की तरह इन दिनों डॉलर का भी जलवा भी बुलंदियों पर है। डॉलर की तुलना में इस समय भारतीय रुपया 15-माह के न्यूनतम स्तर पर है। आजादी के बाद से भारतीय मुद्रा रुपया कभी आर्थिक तो कभी सियासी हालात का शिकार होता रहा है। भारतीय मुद्रा रुपए की डॉलर के मुकाबले जो दुर्गति हो रही है, वह देष के सियासी कर्णधारों के “कर्मों का फल है“। आजादी के बाद 1947 में भारतीय रुपया डॉलर के बराबर था। तब देश पर कोई कर्ज नहीं था। 1975 में डालर 8 रुपए, 1985 में 12 रुपए था। 1991 में उदारीकरण के बाद अगले दस साल में रुपया डॉलर के मुकाबले 47.48 रुपया तक गिर चुका था। और अब साठ रुपए से नीचे आने का नाम नहीं ले रहा है। इसे संयोग कहा जाए या कमजोर आर्थिक नीति, रुपए ने सबसे निचला स्तर- एक डॉलर 68.80 रुपए के बराबर- 2016 में मोदी सरकार के राज में छुआ था। विपक्ष में रहते हुए भाजपा बराबर संप्रग सरकार और उसके अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह को कमजोर रुपए के लिए जी भर कोसती रही है। अब वही भाजपाई नेता रुपए की दुर्गति पर मौन साधे हुए हैं। संप्रग सरकार के समय तेल की कीमतें आसमान को छू रही थीं मगर मोदी सरकार के शासन में तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें अपेक्षाकृत काफी कम रही हैं। तेल की ऊंची कीमतें ही कमजोर भारतीय रुपए की प्रमुख वजह है। भारत दुनिया में सबसे बडा तेल आयात करने वाले मुल्क है और तेल की कीमतें डॉलर में चुकानी पडती है। भारत की 70 फीसदी विदेशी मुद्रा तेल आयात पर ही खर्च हो जाती है जबकि भारत का निर्यात न के बराबर। विदेशी मुद्रा निर्यात से ही कमाई जाती है। यह तो षुक्र है प्रवासी भारतीयों का कि उनकी कमाई से विदेशी मुद्रा भंडार भर रहा है। भारत दुनिया में प्रवासियों की आय (रेमिटनेस) कमाने वाला सबसे बडा देश है। दुनिया की कुल विदेषों से भेजी जाने वाली मुद्रा (रेमिटनेस) मेंसे 12 फीसदी भारत को भेजी जाती है। भारतीय रुपए को मजबूत करने के लिए भारत को निर्यात बढाना होगा और तेल का विकल्प खोजना होगा। इलेक्ट्रिक कारें पुख्ता विकल्प हो सकती हैं। चीन इसा मामले मैं हमसे कहीं आगे है ।
बुधवार, 9 मई 2018
महााभियोग का “काला“ अध्याय
Posted on 9:48 am by mnfaindia.blogspot.com/
भारत के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का “काला“ अध्याय फिलहाल बंद हो गया है। कांग्रेस के दो सांसदों ने मंगलवार को राज्यसभा सभापति वैकेया नायडू द्वारा महाभियोग का प्रस्ताव अस्वीकार करने संबंधी फैसले के खिलाफ दायर याचिका वापस ले ली। सोमवार को कांग्रेस के दो सांसदो ने सुप्रीम कोर्ट में इस आशय की याचिका दायर की थी। इस याचिका में कहा गया था कि राज्यसभा में मुख्य न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए जितने सांसदों के हस्ताक्षर की अनिवार्यता थी, उसे पूरा करने के बाद सभापति के पास आरोपों की जांच के लिए पैनल गठित करने के सिवा और कोई विकल्प नहीं था। कांग्रेस को इस बात पर भी ऐतराज है कि 20 अपैल को राज्यसभा सभापति को महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया गया, 24 अप्रैल को इसे अस्वीकार कर लिया गया। महाभियोग का यह अध्याय बंद हो तो गया मगर इस इसका नाटकीय पटाक्षेप अनापेक्षित था। सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से इसके दो सांसदों की याचिका को हैंडल किया गया, कांग्रेस ने उस पर भी सवाल उठाया है। पार्टी सांसद और नामचीन वकील कपिल सिब्बल के अनुसार मामला चीफ जस्टिस से जुडा हुआ था, इसलिए मुख्य न्यायाधीश इस मामले में अपने “मास्टर ऑफ रोस्टर“ अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे। मुख्य न्यायाधीश ने सोमवार देर रात “मास्टर ऑफ रोस्टर“ अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इस मामले की सुनवाई को पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के सुपुर्द की था। कपिल सिब्बल का कथन है कि बगैर न्यायिक आर्डर के कोई भी मामला संविधान पीठ के सुपुर्द नहीं किया जा सकता। अवाम इसका जवाब तलाश रहा है। बहरहाल, देश के मुख्य न्यायाधीश का विवादों में घिरे रहना बेहद दुखद है और इससे न्यायपालिका की छवि पर असर पडना स्वभाविक है। चीफ जस्टिस बनने से पहले ही जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ विवादों का सिलसिला शुरु हो चुका था। ओडिशा के एक सामाजिक कार्यकर्ता ने राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिखकर उन पर गलत हलफनामा लेकर जमीन हासिल करने का आरोप लगाया था। मामला 70 के दशक के उस समय का है जब दीपक मिश्रा कटक में वकालत किया करते थे। उस समय इस मामले की सीबीआई जांच भी हुई थी। देश के सिनेमाघरों में फिल्म से पहले राष्ट्रगान बजाने का आदेश भी जस्टिस मिश्रा ने ही दिया था हालांकि बाद में सरकार ने खुद ही इसे वापस लेने का आग्रह किया था। जस्टिस दीपक मिश्रा बुलेट प्रूफ वाहन और जेड श्रेणी सुरक्षा में सफर करने वाले सुप्रीम कोर्ट के एकमात्र जज हैं। मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट के फैसले के बाद जस्टिस मिश्रा को धमकियां मिलने के कारण उनकी सुरक्षा व्यवस्था को और पुख्ता किया गया था। भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में जस्टिस मिश्रा पहले ऐसे मुख्य न्यायाधीश हैं जिनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों ने पत्रकार सम्मेलन बुलाकर सार्वजनिक तौर पर श अदालत के कामकाज पर सवाल उठाए थे। महाभियोग प्रस्ताव का सामना करने वाले जस्टिस मिश्रा पहले मुख्य न्यायाधीश हैं। जस्टिस मिश्रा ने ही गरीबों को मुफ्त कानूनी सलाह मुहैया कराने और एफआईआर को 24 घंटे के भीतर वेबसाइट पर डालने के महत्वपूर्ण फैसले भी दिए हैं। देश की न्यायपालिका इस समय विश्वसनीयता के संकट से गुजर रही है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट जजों की नियुक्ति को लेकर न्यायपालिका और सरकार आमने-सामने है। सरकार को जजों की नियुक्ति में दखल की दरकार है। इसीलिए मीजूदा कॉलेजियम सिस्टम सरकार को नागवार लग रहा है। इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता खतरे में है। कांग्रेस ने जस्टिस मिश्रा पर नहीं देश के सर्वोच्च न्यायिक पद को महाभियोग में लपेटने का जो काम किया है, इतिहास इसके लिए हमेशा पार्टी को याद रखेगा।
मंगलवार, 8 मई 2018
संवैधानिक व्यवस्था का दुरुपयोग !
Posted on 6:55 pm by mnfaindia.blogspot.com/
खुद के लिए सरकारी बंगला, पेंशन और अन्य सुविधाएं जुटानी हो, तो तमाम कटुता, मतभेद-मनभेद और आलोचना- विवेचना भुला कर सियासी नेता एक हो जाते हैं। इस मामले में तब उन्हें न तो नैतिकता याद रहती है और न ही आदर्शवादी राजनीतिक आचरण। उत्तर प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगलों की सुविधाएं मुहैया कराने के लिए अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार द्वारा 2016 में संशोधित यूपी “मिनिस्टर सैलेरी, अलॉटमेंट फेसलिटी एक्ट 2016 इस बात का प्रमाण है। अपने “पिताश्री“ को लखनऊ में ताउम्र सरकारी बंगले की सुविधा जुटाने के लिए समाजवादी सरकार ने ऐसा कानून पारित किया जो न तो संविधान सम्मत था और न ही इसकी कोई तार्किक परीणिति थी। इससे पहले 1981 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार नेे कानून बनाया था जिसके तहत पद छोडने के 15 दिन के भीतर पूर्व मुख्यमंत्री को सरकारी बंगला खाली करना अनिवार्य था। समाजवादी सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को ताउम्र सरकारी बंगले की सुविधाएं देने के लिए इस कानून में संशोधन किया। योगी आदित्यनाथ सरकार ने भी इस कानून को निरस्त नहीं किया है क्योंकि भाजपाई भी इसकी मलाई चाट रहे हैं। भाजपा कितनी आदर्शवादी है, इसका पता इसी बात से चलता है कि केन्द्रीय गृह मंत्री, पूुर्व भाजपा अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के पास भी लखनऊ में दो-दो सरकारी बंगले हैं। राजस्थान के मौजूदा राज्यपाल कल्याण सिंह के पास 1992 से लखनऊ में एक बंगला है। कल्याण सिंह 1991-92 और 1997-99 में राज्य के मुख्यमंत्री थे। बसपा प्रमुख सुश्री मायावती और समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह के पास भी लखनऊ में दो-दो सरकारी बंगले हैं। राज्य के एक और पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव का परिवार अभी भी लखनऊ में सरकारी बंगले में रह रहा है। यादव 1977 में राज्य के मुख्यमंत्री थे और 2016 में वे स्वर्ग सिधार गए थे। पूर्व मुख्यमंत्री एनडी तिवारी के पास 1989 से लखनऊ में सरकारी बंगला है। तिवारी मूलत उत्तराखंड के नैनीताल से हैं और एक बार इस राज्य के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं। बहरहाल, अब सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को दो महीने के भीतर सरकारी बंगले खाली करने पडेंगे। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून को निरस्त कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि पूर्व मुख्यंत्रियों को जनता की संपत्ति, सरकारी बंगलों में रहने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने अखिलेश यादव सरकार द्वारा पारित संषोधित कानून को “ मनमाना और पक्षपाती“ करार दिया है। मुख्यमंत्री का पद छोडने पर उन्हें सुरक्षा और अन्य प्रोटोकोल संबंधी सुविधाएं तो दी जा सकती है मगर ताउम्र सरकारी बंगले की सुविधा देना संविधान का अपमान है। निसंदेह, कानून बनाना विधायिका का अधिकार है मगर कानून संविधान सम्मत, विवेकपूर्ण एवं तार्किक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में ही पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने के लिए कहा था। राज्य में उस समय अखिलेश यादव की सरकार थी और न्यायालय के आदेश से मुख्यंमंत्री के पिता ओर समाजवादी पार्टी नेता मुलायम सिंह यादव भी प्रभावित हो रहे थे। कहावत है “ सैंया भयो कोतवाल, फिर डर काहे का“। समाजवादी पार्टी की सरकार थी और बेटा राज्य का मुख्यमंत्री। फिर चिंता किस बात की। “नेता जी“ को सरकारी बंगले की सुविधा जारी रखने के लिए कानून में संशोधन करके पूर्व मुख्यमंत्रियों को उमर भर की सुविधा प्रदान कर दी गई। मगर सियासी नेता अक्सर भूल जाते हैं कि हमारे संविधान निर्माता दूरदर्शी थे और उन्होंने पहले ही इस तरह के संवैधानिक व्यवस्थागत दुरुपयोग के लिए न्यायपालिका को अधिकार संपन्न कर रखा है। स्वतंत्र न्यायपालिका के रहते देश की संवैधानिक व्यवस्था का गलत इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से राजनीतिक दलों को सीख लेने की जरुरत है।
शनिवार, 5 मई 2018
एन्क्रोचमेंट: सरकार ही बढ़ावा देती है
Posted on 10:14 am by mnfaindia.blogspot.com/
हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल कसौली में अतिक्रमण हटाने गई महिला अधिकारी की निर्मम हत्या ने देश में उस सच को उजागर किया है जिससे आज तक हर सरकार आंख फेरती है। और यह सच हैः सियासी नेताओं और भ्रष्ट नौकरशाही की छत्रछाया में फलता-फूलता अवैध निर्माण और अतिक्रमण। सरकारीकर्मी अथवा पुलिस की एक अदद जान की कीमत “ रसूखदार“ अतिक्रमणकारियों के लिए कोई मायने नहीं रखती है। भारत में कहीं भी धडल्ले से अवैध निर्माण अथवा अतिक्रमण किया जा सकता है। गली-गली, बाजार-बाजार जहां भी खाली जगह पर अतिक्रमण करना आसान है। ज्यादा से ज्यादा क्या होगा। निकाय या निगम कर्मचारी आएगा, अतिक्रमण हटाने अथवा गिराने की धौंस जमाएगा और अंत में मोल-तोल करके घूस में मोटी रकम ऐंठ कर खिसक लेगा। यही स्थिति अवैध निर्माण को लेकर है। जिस समय अवैध निर्माण किया जाता है, कोई भी निगरानी निकाय अधिकारी अथवा कर्मचारी इसे बंद करवाने नहीं आएगा मगर निर्माण पूरा होते ही इसे नियमित करने की आड में मोटी घूस लेकर मामला रफा-दफा कर लेगा। यह सिला लंबे समय से जारी है और दिल्ली से लेकर श्रीनगर-कन्याकुमारी, गुवाहटी-सिल्लीगुडी तक हर पालिका-नगर निगम क्षेत्र में धडल्ले से चल रहा है। दिल्ली में प्रमुख राजमार्गों पर अतिक्रमण इस कद्र बढ गया है कि सुप्रीम कोर्ट को एमसीडी और एनएमसीडी को स्पेशल अतिक्रमण हटाओ मुहिम चलाने के निर्देश देने पडे । हिमाचल प्रदेश में कसौली ही नहीं, शिमला, धर्मशाला, डलहौजी, कुल्लू-मनाली भी अपवाद नहीं है। पूर देश में अतिक्रमण का आलम यह है कि हर छोटा-बडा शहर इस मामले में एक-दूसरे को पीछे छोडता नजर आता है। इसी साल 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राजधानी दिल्ली में अतिक्रमण हटाने के लिए केन्द्र सरकार को स्पेषल टास्क फोर्स (एसटीएफ) गठित करने के निर्देश दिए थे । पंजाब में अरबों रु मूल्य की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा है। सरकार के पास अवैध कब्जाधरियों की पुख्ता जानकारी तक नहीं है। सरकारी जमीन पर से अवैध कब्जा हटाने के लिए राज्य सरकार को एक केबिनेट सब-कमेटी का गठन करना पड़ा । कानून भी अतिक्रमण का मददगार है। कानून की नजर में निजी जमीन पर अतिक्रमण करना अपराध नहीं है और इसे छुडाने के लिए मालिक को अदालतों के चक्कर लगाने पडते हैं। राजस्वकर्मियों को घूस देकर सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करना तो और भी आसान है। कब्जा छुडाने वालों को भी घूस देकर पटाया जाता है। हिमाचल प्रदेश में विशाल जंगलाती जमीन पर अवैध अतिक्रमण हो रखा है और इससे हटाने के लिए भी न्यायपालिका को ही दखल देना पडा है। सरकार कुछ नहीं करती और न ही करेगी। दरअसल, निहित स्वार्थी राजनीति और भ्रष्ट व्यवस्था ने पूरे सिस्टम को पंगु बना डाला है। लोगों को लुभाने के लिए सरकार खुद ही अतिक्रमण को बढावा दे रही है। हिमाचल में राज्य सरकार की रिटेशन पॉलिसी इसकी मिसाल है। इस पॉलिसी के तहत शत प्रतिषत अवैध निर्माण को नियमित किए जाने का प्रावधान। कांग्रेस हो या भाजपा, चुनावों से कुछ समय पहले हर सरकार मतदाताओं को पटाने के लिए यह पॉलिसी अपनाती है। अतिक्रमणकारियों को यह बात भली-भांति मालूम है कि अतिक्रमण करके बनाए गए निर्माण को गिराने का किसी भी सरकार में साहस नहीं है। हिमाचल प्रदेश हो या दिल्ली अतिक्रमण हटाने का काम न्यायपालिका के निर्देशों पर किया जाता है। कसौली का अतिक्रमण प्रकरण भी इसी “मनौती (अपीजमेंट) का नतीजा है। सरकार और भ्रष्ट नौकरशाही की छत्रछाया में फलते-फूलते अतिक्रमणकारियों को न्यायपालिका से भी डर नहीं लगता है। कसौली प्रकरण ने हिमाचल प्रदेश की “ दिशाहीन" पर्यटन नीति के कडवे सच को भी उजागर किया है। अतिक्रमण करके बेतरतीब विकसित किए गए पर्यटक स्थलों से हिमाचल का उद्धार होने से रहा। इस तरह की नीति सिर्फ लोगों को संवेदनहीन बना सकती है।
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