बारातियों की शाही मेजबानी करना और शादी-ब्याह पर दिल खोलकर खर्च करना, भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है। गरीब से गरीब परिवार भी शादी-ब्याह पर अपनी हैसियत से ज्यादा ही खर्च करता है। इसके लिए भले ही उसे कर्जा लेना पडे। इस परंपरा ने जिन कुृरीतियों को जन्म दिया, उन पर समाज का कभी ध्यान नहीं गया। मगर अब देश की शीर्ष अदालत ने सरकार को सलाह दी है कि शादी-ब्याह में होने वाले खर्चे का हिसाब-किताब रखा जाना चाहिए और इसे अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस तरह का कानून दहेज के लेन-देन और प्रताडना को रोकने में मददगार साबित होगा। वर और वधु दोनों पक्षों को शादी से जुडे सभी खर्चों का ब्यौरा मैरिज ऑफिस के पास जमा कराना अनिवार्य होना चाहिए। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने एक और क्रांतिकारी सलाह दी है कि शादी पर होने वाले तय खर्च का कुछ हिस्सा पत्नी के नाम बैंक खाते में भी जमा किया जाए ताकि जरुरत पडने पर इसका इस्तेमाल किया जा सके। सामाजिक कुरीतियां भारतीय संस्कृति के उज्जवल पक्ष को कमजोर करती रही हैं और इसके लिए दुनिया में भारत का उपहास भी होता रहा है। निसंदेह, दहेज प्रताडना जैसी अमानवीय घटना को रोकने के लिए सख्त से सख्त उपाय करने की जरुरत है। दहेज मांगना और देना कानूनन अपराध होने के बावजूद अभी इस पर पूरी तरह से लगाम नहीं लग पाई। आए दिन, बहू-बेटियों को दहेज के लिए प्रताडित किया जाता है, जलाया जाता है या घर से निकाल दिया जाता है। इंडियन नेशनल क्राइम रिकार्डस ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार भारत में हर दिन औसतन 21 महिलाओं को दहेज के लिए जलाया जाता है या उनकी हत्या कर दी जाती है मगर मात्र 35 फीसदी दोषियों को सजा मिल पाती है। 2015 में देश में 7,634 महिलाओं की दहेज के लिए हत्या कर दी गई थी। देश की राजधानी दिल्ली में पिछले पांच साल के दौरान 725 महिलाओं को दहेज के लिए मार दिया गया। 2016 में दिल्ली में दहेज प्रताडना की 3,877 शिकायतें दर्ज करवाई गईं थी। इन सब आंकडों से पता चलता है कि देश की राजधानी में ही महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं? महिलाओं के लिए लड रही स्वंयसेवी संस्थाओं का आकलन है कि अधिकतर दहेज हत्या के मामले दबा दिए जाते हैं, इसलिए दहेज से संबंधित हत्याएं काफी ज्यादा हैं। भारत में दहेज के खिलाफ सख्त कानून के लिए भी महिलाओं को आजादी के बाद 15 साल तक इंतजार करना पडा। 1961 में दहेज के खिलाफ पहली बार दहेज़ उन्मूलन एक्ट बना मगर इससे कोई बहुत ज्यादा फर्क नहीं पडा। दहेज निरोधी कानून के तहत शादी के बदले दहेज मांगना और देना अपराध करार दिया गया मगर इसमें एक बहुत बडी खामी भी रह गई। उपहार में दी गई चीजों को दहेज नहीं माना गया। जमीनी सच्चाई यह है कि देश में दहेज मांगा नहीं जाता बल्कि अधिकतर मामलों में बेटियों को स्वेच्छा से दिया जाता है। इसके पीछे मूल भावना यह थी कि भारत में पुश्तैनी संपत्ति में बेटी का कोई हक नहीं होता था, इसलिए उन्हें उपहार में दहेज दिया जाता था। कालांतर में इसका दुरुपयोग होने लग पडा और दहेज विवाहित महिलाओं के लिए श्राप बन गया। 1983 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए में संशोधन किया गया और फिर 2005 में प्रोटेक्शन ऑफ वूमैन फ्रॉम डोमेस्टिक वायलेंस एक्ट बनाया गया। इनका मकसद विवाहित महिलाओं को दहेज प्रताडना से बचाना था मगर इनसे भी दहेज प्रताडना थमी नहीं है। दहेज के लिए महिलाओं का जलाया जाना और महिलाओं से बलात्कार के बढते मामलों ने देश की छवि को काफी खराब किया है। सुप्रीम कोर्ट की सलाह मानकर अविलंब शादी-ब्याह के खर्चों का हिसाब-किताब अनिवार्य किया जाना चाहिए। इससे दहेज लोभी बेनकाब होंगे और उन्हें कुछ तो शर्म आएगी।
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