गुरुवार, 5 जुलाई 2018

जिंदगी भर रुलाती बरसात !

इस साल (2018) भारत में 17 दिन पहले आई मॉनसून आते ही अपना रौद्र रुप दिखा रही है। मंगलवार को समूचे उत्तर भारत में जमकर पानी बरसा। बुधवार को भी भारी बरसात जारी रही और उत्तराखंड मे स्थिति भयावह बनी हुई है। एक माह पहले बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे षिमला में सोमवार-मंगलवार को इतनी बारिष हुई कि 68 साल पुराना रिकॉर्ड ही टूट गया। 24 घंटों में षिमला में 118.6 मिमी (4.66 इंच) पानी बरसा। पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण  मंदिर परिसर में बाढ का पानी घुस आया। गुरु की नगरी में 77 मिमी बारिष रिकॉर्ड  की गई। लगातार बारिष ने बाढ के पुख्ता प्रबंध के सरकारी दावों की कलई खोल दी है। हर साल बरसात से पहले पुख्ता बाढ प्रबंधों का दावा किया जाता है मगर ज्यादा पानी बरसते ही तमाम दावे धराषायी हो जाते हैं। देष में हर साल औसतन  300 से 650 मिमी (11.8 से 25.6 इंच) पानी बरसता है और पूरा  जल प्रंबध- जलाषयों से भूमिगत जल -  बरसात के पानी पर आश्रित है। देष में सिंचित कृशि क्षेत्र का 60 फीसदी और ग्रामीण और षहरी क्षेत्रों की पेयजल सप्लाई का 80 फीसदी भूमिगत जल पर निर्भर है। इस स्थिति के दृश्टिगत बरसाती पानी देष के जल प्रबंध के लिए बेहद जरुरी है। मगर बाढ के पानी से हो रहे जलभराव को रोकने के लिए इसके निकासी की सटीक व्यवस्था भी उतने ही जरुरी है। छोटे षहरों की दुर्दषा तो दीगर रही, चंडीगढ जैसे आधुनिक षहर में भी समुचित निकासी नहीं होने के कारण ज्यादा बरसात होते ही सडकों पर पानी भर जाता है। बाढ की रोकथाम के लिए 14वें वित्त आयोग ने पांच साल के लिए करीब 9 अरब डालर आवंटित कर रखे हैं। इसके बावजूद देष में बाढ रोकने के पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाए हैं। वैसे 70 और 80 दषक की तुलना में से होने वाले नुकसान में कमी आई है। 70 के दषक में देष को बाढ से जीडीपी का 0.86 फीसदी नुकसान था, इस समय यह घटकर 0.01 फीसदी ही रह गया है। इन आंकडों से पता चलता है कि पचास साल में कुछ तो हुआ है।  भारत में बरसात का पानी ही जल के प्रमुख स्त्रोतों को रिचार्ज  करता है। मगर साल-दर- साल देष को बाढ से जान-माल का भारी नुकसान उठाना पड रहा है। सिंयुक्त राश्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार भारत को बाढ से हर साल 7 अरब डॉलर से भी ज्यादा का नुकसान उठाना पड रहा है। हिमाचल, उत्तराखंड और पूर्वोतर के पहाडी राज्यों को बाढ का ज्यादा खमियाजा भुगतना पडता है।  2011 से 2013 के बीच बाढ से  हिमाचल प्रदेष को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 1.86 फीसदी के बराबर का नुकसान उठाना पडा था। अरुणाचल प्रदेष को 2011 से 2014 के बीच बाढ से सबसे ज्यादा जीडीपी का 10 फीसदी नुकसान उठाना पडा था। इस दौरान बाढ से सिक्किम को 1.7 फीसदी और मेघालय को अपनी जीडीपी का 1.5 फीसदी के बराबर का नुकसान हुआ था। बहरहाल, बरसाती पानी का बेहतर प्रबंध देष के सामने सबसे बडी चुनौती है। बरसाती  पानी को संजोकर रखना और बाढ के पानी को भूमिगत जल स्तर को बढाने के वास्ते इस्तेमाल करने के लिए बृहद योजना की दरकार है। भारत में कुओं, तालाबों  और जलाषयों जैसे स्त्रोतों में पानी को संरक्षित जरने की पुरानी परंपरा है मगर भूमिगत जल स्तर लगातार गिरने से अधिकतर पंरपरागत जल स्त्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं। इसके लिए वृक्षों का बेदर्दी से कटान भी काफी हद तक जिम्मेदार है। वृक्ष पानी को संरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाते है। वक्त-बेवक्त बरसात का रौद्र रुप  इसी का नतीजा है। समय रहते संभलने में ही देष की भलाई है।