रविवार, 28 फ़रवरी 2016

Economic Survey Depicts Rosy Picture

                                                  बजट पूर्व परिदृश्य

सोमवार को पेश  होने वाले मोदी सरकार के तीसरे बजट से पहले अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर आर्थिक सर्वेक्षण ने “गुलाबी (रोजी) तस्वीर पेश  की है। शुक्रवार को संसद में पेश  आर्थिक सर्वेक्षण का आकलन है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं।  2016-17 के दौरान अर्थव्यवस्था  7 और 7.75 फीसदी की दर से ग्रो करेगी। विश्व  बैंक और अंतरराष्ट्रीय  मुद्रा कोष  का भी यही आकलन है। यानी वैश्विक  मंदी का फिलहाल भारत पर कोई असर नहीं है। सर्वेक्षण का यह भी आकलन है कि बढती फूड सब्सिडी ओर वेतन आयोग की सिफारिशों  के बोझ के बावजूद राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का चार फीसदी से कम रहने का अनुमान है। वर्तमान वित्तीय वर्ष  (2015-16) के लिए सरकार ने राजकोषीय  घाटे को  जीडीपी के 3.99 फीसदी तक सीमिति रखने का लक्ष्य रखा है। वैसे अर्थव्यवस्था की तंदुरुस्ती के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का साढे तीन फीसदी से नीचे रहना चाहिए। तेल की कीमतें अगर इसी तरह गिरती रहीं, तो इस लक्ष्य को भी जल्द ही हासिल किया जा सकता है। राजकोषीय  घाटे  को जीडीपी से चार फीसदी से नीचे लाना वित्त मंत्री अरुण जेटली की बडी उपलब्धि मानी जा सकती है। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि घाटे को कम करने में वित्त मंत्री के वित्तीय कौशल से कहीं ज्यादा तेल की कीमतें में लगातार गिरावट की बहुत बडी भूमिका है। इससे एक तरफ सरकार का आयात बिल कम होने से चालू खाता सुधरा है, तो दूसरी तरफ सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर चार बार एक्साइज डयूटी बढाकर खासी कमाई की है। न्याय का तकाजा तो यह था कि सरकार तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ जनता को देती। कीमतें बढने पर अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी कम करने की बजाय, वृद्धि का बोझ सीधे-सीधे जनता पर डाल सकती है, तो कीमतें गिरने पर भी ऐसा ही होना वाहिए। यानी गिरावट का पूरा लाभ उपभोक्ताओं  को दिया जाना चाहिए। मगर सरकर ऐसा नहीं कर रही है। अंतरराष्ट्रीय  बाजार में इस समय तेल की कीमते 30 डॉलर बैरल के आसपास चल रही है। इस शताब्दी के शुरु में (2002-03) अंतराष्ट्रीय   बाजार में जब तेल 30 डॉलर बैरल से नीचे बिक रहा था, भारत में पेट्रोल 30 रु  और डीजल 18 रु लीटर  के आसपास बेचा जा रहा था। और अब जब तेल की कीमतें फिर  30 डॉलर बैरल के स्तर पर आ गई हैं, भारत में पेट्रोल 60 और डीजल 45 रु लीटर बिक रहा हे। साफ है बाकी सारा पैसा सरकार की जेब में जा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण ने 2015-16 में सरकार के राजस्व में अच्छी-खासी वृद्धि की संभावना जताई है। सरकार का चालू खाता (करंट आकाउंट) भी जीडीपी के 1-1.5 फीसदी के आसपास है। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि मुद्रा-स्फीति पूरी तरह नियंत्रण में है और अगर स्थिति यही रही तो मार्च 2017 तक मुद्रा-स्फीति को 5 फीसदी तक लाने का लक्ष्य हासिल हो सकता है। 2016-17 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) मुद्रा-स्फीति 4.5 से 5 फीसदी के आसपास रहने की उम्मीद है।  कमजोर रुपया थोडा चिंताजनक है मगर सकारात्मक मौद्रिक नीति से इसे मजबूत किया जा सकता है। सरकारी बैकों की खस्ता हालात को सुधारने के लिए वित्तीय सेक्टर में और ज्यादा लिक्विडिटी डालने की जरुरत है। आर्थिक सर्वेक्षण से वित्त मंत्री के बजट दर्शन  का  कुछ-कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण में व्यक्तिगत कर ढांचे के दायरे को  मौजूदा 5 फीसदी से 20 फीसदी तक बढाने और रियायतों  को फेज-आउट करने का सुझाव दिया गया है। कर ढांचे को सुदृढ और व्यापक बनाने के लिए जरुरी है कि रियायतों को सीमा में रखा जाए। आर्थिक सर्वेक्षण की खास बातों पर गौर करने के बाद यही निष्कर्ष  निकलता है कि वित्त ंमंत्री करों अथवा शुल्कों में रियायतें देने की बजाए करों के दायरे को और ज्यादा व्यापक करेंगे और बजट का फोक्स उत्पादन बढाने पर रहेगा। केन्द्रीय कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार ज्यादा वेतन और पेंशन देना और खाद्यान्न, रासायनिक और फ्यूल सब्सिडी के लिए पर्याप्त व्यवस्था करना वित्त मंत्री के लिए चुनौती हो सकती है। सरकार के पास अपार साधन हैं और अगर इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं है।  

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

रेलवे पर प्रभु कृपा ?

रेलमंत्री सुरेश  प्रभु की अभी भी रेलवे पर पूरी तरह से कृपा से नहीं हो पाई है। वीरवार को संसद में पेश  रेल बजट से साफ है कि दुनिया की विशाल तम रेल सेवाओं  में शुमार भारतीय रेलवे का उद्धार होते-होते कई साल लग सकते हैं। रेलों में सफर करने वाली आम जनता की माली हालत पर तरस खाते हुए रेल मंत्री ने इस बार भी यात्री किराया नहीं बढाया। तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ बजट में साफ दिख रहा है। रेलवे को यात्री किराये से लागत का बमुश्किल  50 फीसदी राजस्व ही मिल पाता है। रेलवे की कमाई का प्रमुख साधन भाडा (फ्रेट) है मगर रेलमंत्री ने इस बार के बजट में फ्रैट भी नहीं बढाया है। कमाई के अन्य कोई पुख्ता विकल्प भी नहीं है। रेलवे की अमूल्य जमीन बेचकर कुछ पैसा जुटाया जा सकता है।  रेलमंत्री ने बजट में यात्रियों को काफी सुविधाएं देने का ऐलान किया है। रेलवे को दुनिया की श्रेश्ठतम जनसेवक बनाने का संकल्प भी दोहराया गया है। इसके लिए रेलवे को अगले पांच सालों में 8.5 लाख करोड रुपयों की दरकार है। अब सवाल यह है कि रेल मंत्री इतनी विशाल  राशि  कहां से लाएंगे? सालों से रेलवे के उद्धार की बडी-बडी घोषणाएं की जा रही हैं और बडी-बडी बातें की जा रही हैं। देश  को आजाद हुए सात दशक होने जा रहे है मगर आज तक लावारिस मानवरहित (अनमैन्ड) फाटकों (क्रॉसिंग) को रेलवे समाप्त नहीं कर पाया है और इस तरह के फाटक लोंगों की सुरक्षा के लिए बडा खतरा बने हुए हैं। हर बार इन फाटकों को नियंत्रित करने का वायदा किया जाता है। इस बार के बजट में रेलमंत्री ने वायदा किया है कि 2020 तक ही मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग समाप्त हो पाएगी। इसी तरह यात्रियों को कंन्फर्म  टिकट सुविधा भी 2020 तक ही मुहैया हो पाएगी। यानी महत्वपूर्ण काम 2020 से पहले पूरे नहीं हो पाएंगेे। मोदी सरकार पांच साल के लिए चुनी गई है। 2019 में लोकसभा चुनाव होंगे और 2020 में नई सरकार होगी। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि अगली बार भी मोदी सरकार ही आएगी और सुरेश  प्रभु ही रेलमंत्री होंगे। इस बात का ख्याल करते हुए सरकार को अपने पांच साल के कार्यकाल के दौरान सभी काम पूरे कर लेने चाहिए़ और ऐसी परियोजनाएं बनानी चाहिए जिन्हें सरकार अपने कार्यकाल में पूरा कर सकें।  बहरहाल, रेलवे को आर्थिक बदहाली के दलदल से बाहर निकालना सुरेश  प्रभु की सबसे बडी चुनौती है। पिछले और अपने पहले बजट में सुरेश  प्रभु ने रेलवे के आधुनिकरण  के लिए डेढ लाख करोड रु जुटाने का प्रस्ताव रखा था और इस साल के बजट में भी रेलमंत्री ने 1.5 लाख करोड जुटाने का प्रस्ताव किया है। पिछले साल रेलमंत्री  इस विशाल पूंजी को जुटा पाए  या नहीं, इसका रेल मंत्री ने अपने भाषण में कोई उल्लेख नहीं किया है। इस बार भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) से रेलवे के लिए डेढ लाख का प्रबंध कर लिया गया है। देश  के वित्तीय विषेसज्ञों को भी इस बात का भरोसा नहीं है कि सरकार रेलवे के उद्धार के वास्ते पांच साल में साढे आठ लाख करोड रु जुटा लेगी। इसकी प्रमुख वजह है कि रेलवे इतनी विशाल  रकम को लौटाने की  स्थिति में ही नही  हैं। रेलवे ही क्या देश  के अधिकांश  सार्वजनिक उपक्रम कर्जा  लौटाने की स्थिति में नही है। पंजाब नेशनल बैंक द्वारा हाल में जारी डिफाल्टरों की सूची में सहकारिता क्षेत्र का अग्रणी उपक्रम नेफेड  बैंक का सबसे बडा डिफाल्टर है। कहते हैं अर्थशास्त्र और राजनीति का छत्तीस का आंकडा होता है। रेलवे जैसे सार्वजनिक उपक्रम भी सशक्त वित्तीय प्रबंध से ही चलाए जा सकते हैं। सरकार को अगर रेलवे को सुचारु रुप से चलाना है तो यात्री किराए और फ्रेट का युक्तिकरण करना होगा। सियासी हितों की खातिर सार्वजनिक उपक्रमों की बलि नहीं नहीं चढाई जानी चाहिए। रेलमंत्री का बजट इस मायने में काबिलेतारीफ है कि उन्होंने इसे यात्री  फ्रेंडली बनाने की कोशिश  की है मगर फोक्ट की सुविधाएं ज्यादा देर तक नहीं चलती। देश  के मध्यम और सभ्रांत तबके आज इस स्थिति में है कि वे सुरक्षित  और आरामदायक रेल यात्रा के लिए कोई भी कीमत दे सकते हैं। फ्यूल की कीमतें गिरने से रेलवे को बचत हो सकती है मगर इसका उपयोग रेलवे के आधुनिकरण के लिए कर सकता है । वित्तीय प्रबंध कहता है “ जो लोग समर्थ  हैं", उनकी जेब ढीली करने में कोई बुराई नहीं है। मगर सियासी स्वार्थ यह सब भुला देता है ।

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

Let There Be a More Vibrant President Address To Parliament

हर साल की तरह इस बार भी राष्ट्रपति के  अभिभाषण में सरकार की उपलब्धियों का ही बखान किया गया है। राष्ट्रपति  का अभिभाषण  सरकार द्वारा तैयार किया जाता है, जाहिर है  सरकार इसमें अपनी आलोचना करने से रही।  यही परंपरा है और देश  के प्रथम  नागरिक को इस परंपरा का ही निर्वहन करना होता है। मंगलवार को  राष्ट्रपति  प्रणब मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में इस बात पर जोर दिया कि संसद में “गतिरोध“(डिसरप्नश ) की बजाए “बहस (डिबेट) अथवा चर्चा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। संसद देश  की सर्वोच्च संस्था है और यह लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को परिलक्षित करती है। यानी विपक्ष को संसद में गतिरोध को छोडकर बहस अथवा चर्चा करनी चाहिए। जनमानस भी यही चाहता है। संसद में गतिरोध से जनता की कमाई जाया होती है और इससे सिवा विपक्षी सदस्यों की अहं संतुश्टि के कुछ भी हासिल नहीं होता है। जनता सांसदों को उनकी समस्याओं का निराकरण करने और दबे-कुचलों एवं असहायों की आवाज  संसद में  बुलंद करने के लिए चुनती है। और अगर सांसद ऐसा करने की बजाए संसद की कार्यवाही को बाधित करते हैं तो उनके चुने जाने के कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। इससे लोकतंत्र ही कमजोर होता है। यही बात उपराष्ट्रपति  और राज्यसभा के सभापति हामिद अंसारी ने सांसदो के साथ बैठक में कही। मगर संसद में सरकार के नीतियों और कार्यक्रमों की  आलोचना अथवा विरोध करना और ज्वलंत मुद्दों पर ध्यानाकर्षण  प्रस्ताव पेश  करना संसदीय व्यवस्था का अहम हिस्सा है। विपक्ष भी संसद की कार्यवाही को वाधित करने के पक्ष में नहीं होता है और उसे मजबूरन ऐसा करना पडता है। जीवंत (वाइब्रेंट) संसदीय व्यवस्था में चर्चा अथवा बहस के अलावा भी जनता की आवाज उठाने के तरीके अपनाए जाते हैं और हर लोकतांत्रिक देश  में यही होता है। तथापि भारतीय संसदीय व्यवस्था इग्लैंड के ”वेस्टमिनिस्टर“ की नकल है। इसी व्यवस्था में  राष्ट्रपति  को देश  का सर्वोच्च पद तो  माना गया है मगर सीमिति अधिकार दिए गए हैं।  राष्ट्रपति को वही करना पडता है जो मंत्रिमंडल उन्हें करने को कहती है। इस व्यवस्था में  राष्ट्रपति  की राय कोई मायने नहीं रखती। अगर सरकार के किसी फैसले से  राष्ट्रपति  सहमत नहीं है तो वे  ज्यादा से ज्यादा वह उस फैसले पर सरकार से पुनर्विचार करने को कह सकते हैं। इसके बात भी अगर सरकार वही फैसला लेती है, तो  राष्ट्रपति  को मानना ही पडता है। इग्लैंड में भी यही व्यवस्था है और वहां महारानी   नाममात्र (सेरेमोनियल) की मुखिया है। मगर इग्लैंड में महारानी लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए सतत प्रयासरत रहती है। भारत में  राष्ट्रपति भी ऐसा कर सकते हैं।  राष्ट्रपति पद की अपनी गरिमा है और उनका कहा हर शब्द सरकार के कानों में फौरन सुनाई देता है। भारत में हर साल संसद के पहले सत्र में  राष्ट्रपति  और राज्य विधानसभाओं में राज्यपाल के अभिभाषण की परंपरा है मगर यह कोई ज्यादा उपयोगी साबित नहीं हुई है। अधिकतर अभिभाषण नीरस होते हैं और  इसमें सरकार का गुणगान होता है। अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बहस भी अक्सर नीरस होती है। साल का पहला सत्र ज्यादातर मामलों में क्योंकि बजट सत्र होता है, इसलिए लोगों को बजट में अधिक रुचि रहती है। और बजट को पहले लीक नहीं किया जा सकता।  राष्ट्रपति  के अभिभाषण में भी बजट की कोई झलक तक दिखाई नहीं देती है। इस स्थिति में ऐसे अभिभाषण  की कोई ज्यादा प्रासंगिकता नहीं रह जाती। राश्ट्रपति देश  का प्रथम नागरिक होता है और उन्हें देश  की हर छोटी-बडी समस्या से अवगत होना चाहिए। इस बात के मद्देनजर  अभिभाषण में सरकार की उपलब्धियों की जगह  अगर  राष्ट्रपति  सरकार के समक्ष जनता का पूरा साल का एजेंडा पेश  करें और सरकार को उस पर संजीदगी से काम करने को कहें, तो यह ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है। बेशक यह एजेंडा सरकार की राय से तैयार किया जाए, मगर परंपरागत अभिभाषण की बजाए लोगों की आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को परिलक्षित करना संसदीय व्यवस्था को ज्यादा मजबूत कर सकता है।

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

आरक्षण का जिन्न

आजाद भारत में अलगाववाद और आतंक के बाद आरक्षण के मुद्दे ने देश  की अखंडता और सामाजिक एकता पर सबसे ज्यादा कुठाराघात किया है। आरक्षण ने सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह से तहस-नहस कर डाला है। हरियाणा में  सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण की  मांग को लेकर जाटों का आंदोलन इस बात का ताजा प्रमाण है। इस आंदोलन ने राज्य को 35,000 करोड रु से ज्यादा का नुकसान तो किया ही है, समाज को भी बांट कर रख दिया है। हरियाणा खापों और चौपालों की सामाजिक न्यायिक व्यवस्था के लिए विख्यात रहा है और सामाजिक एकता की मिसाल भी रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में खापों की अनुमति के बगैर पत्ता भी नहीं हिलता है। मगर आरक्षण के मामले में खाप भी दो फाड हो गई है।  सियासी दलों ने अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए आरक्षण को जमकर भुनाया है।  समाज का हर वर्ग आरक्षण चाहता है। इससे आरक्षण का मूल मकसद राजनीतिक कुव्यवस्था में लुप्त हो गया है। आजादी के बाद माना गया था कि अगडे और पिछडे वर्ग  में समान आईक्यू वाले बच्चे में बराबरी नहीं हो सकती। अगडे तबके का बच्चा पिछडे की तुलना में बेहतर लालन-पालन और सुख-सुविधाओं के बलबूते आगे निकल जाता है। इसी बिला पर सामाजिक रुप से पिछडे तबकों को अगडों की बराबरी पर लाने के लिए तब सामाजिक तोर पर पिछड़े दलितों एवं कबालियों को  सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों के साथ-साथ संसद और विधानसभाओं- मंडलों में भी 27 फीसदी आरक्षण दिया गया। यह संवैधानिक व्यवस्था थी। इसलिए दलितों को अनुसूचित जाति एवं कबालियों का अधिकृत दर्जा दिया गया। तत्कालीन नेतृत्व का मकसद नेक और राष्ट्रीय  हित में था और समाज के हर वर्ग  ने खुशी -खुशी  इसे माना भी। शुरु  में यह भी माना गया कि पिछडों के अगडों के बराबर आते ही आरक्षण की व्यवस्था को समाप्त कर लिया जाएगा।  ऐसा समय कब आएगा, यह तय करना समकालीन सरकार का काम था।  आजादी के सात दशक बाद अगडे और पिछडे का तुलनात्मक आकलन सामाजिक पिछडेपन से नहीं किया जा सकता। आज स्थिति यह है कि अगडो में भी अधिकतर परिवार आर्थिक रुप से पिछडों की तुलना में अधिक कमजोर हैं। आरक्षण की चिंगारी के सुलगने की यही प्रमुख वजह है। दुखद स्थिति यह है कि राजनीतिक  दलों ने उतरोत्तर आरक्षण को सियासी हितों के लिए भुनाना शुरु  कर दिया और इसी वजह दलित और कबायली लंबे समय तक कांग्रेस का भरोसेमंद वोट बैंक भी रहा। आजादी के तीस साल बाद 1977 में पहली बार केन्द्र में गैर कांग्रेस जनता पार्टी की सरकार सता में आई थी । 1979 में इस सरकार ने “सामाजिक और शैक्षणिक“ तौर पर पिछडे तबकों की पहचान के लिए सांसद बीपी मंडल की अध्यक्षता में मंडल कमीशन नियुक्त किया। कमीशन ने कुल मिलाकर 3743 उप-जातियों की पहचान करके इन्हें सामाजिक और शैक्षणिक पिछडा बताया। कमीशन का आकलन था कि अनुसूचित एवं जनजातियों के अलावा देश  की 54 फीसदी आबादी सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर काफी पिछडी हुई हैं और इनके सामाजिक-आर्थिक उत्थान की जरुरत है। इससे पहले कि मंडल कमीशन की सिफारिषें लागू हो पातीं,  जनता सरकार ही गिर गई। तत्पश्चात  1989 में भाजपा के समर्थन से बनी विश्व्नाथ   प्रताप सिंह सरकार ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने का प्रयास किया पर देश  के कई क्षेत्रों में आरक्षण विरोधी आग भडक गई। तब भी मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू नहीं हो पाईं। बाद में कई राज्यों ने पिछडे तबकों को आरक्षण दिया मगर इसके पीछे पिछडेपन से कहीं ज्यादा राजनीतिक स्वार्थ  रहा है। हालांकि  आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं दिया जा सकता मगर  तमिल नाडु और सयुंक्त आंध्र प्रदेश  में आरक्षण 50 फीसदी सीमा को लांघ चुका है। इस बात में दो राय  नहीं है कि हरियाणा के जाट शैक्षणिक तौर पर अपेक्षाकृत पीछे हैं मगर आरक्षण का आधार  शैक्षणिक पिछडापन नहीं बनाया जा सकता। दलितों को लंबे समय से आरक्षण की सुविधा है मगर आंकडे गवाह हैं कि 90 फीसदी दलित आज भी  शैक्षणिक रुप सें काफी पिछडे हैं। आरक्षण का जिन्न बार-बार बोतल से बाहर निकल आता हे। इस जिन्न को बोतल मे बंद रखने के लिए एक विकल्प यह है कि आरक्षण को आर्थिक पिछडेपन के आधार पर दिया जाए।

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

Why Not Compulsory Participation of Legislators In House Proceedings?

मंगलवार (23 फरवरी) से  संसद का बजट सत्र  शुरु हो रहा है और इस बार भी सत्र के हंगामापूर्ण रहने की संभावना जताई जा रही है । विपक्ष के पास अरुणाचल प्रदेश  में दल-बदलुओं की सरकार का गठन, जाट  आंदोलन जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी  (जेएनयू), हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या और पठानकोट आतंकी हमले जैसे कुछ ज्वलंत मुद्दे हैं जिन्हें आगे करके वह लोकसभा में मोदी सरकार को घेरने की कोशिश  करेगी। गनीमत है कि राज्यसभा की कार्यवाही के सुचारु संचालन के लिए उपराष्ट्रपति  और सभापति हामिद  अंसारी की पहल पर सरकार और विपक्ष में “ गतिरोध   की जगह बहस “ पर सहमति हो गई है। गुडस एंड सर्विसस टैक्स (जीएसटी) और बैंकरप्सी एंड रियल एस्टेट  जैसे महत्वपूर्ण  बिल राज्यसभा द्वारा मौजूदा सत्र के पहले चरण में ही पारित कर लिए जाएंगे। बजट सत्र का पहला चरण 16 मार्च को खत्म हो जाएगा। सत्र का दूसरा चरण 25 अप्रैल से  शुरु होकर 13 मई तक चलेगा। राज्यसभा में 11 बिल और लोकसभा में पांच बिल पेंडिंग हैं। कुल मिलाकर इस सत्र में सरकार 73 बिल पेश  करेगी। इन मेंसे  26 बिल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है और इन्हें पारित करवाना  सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। लोकसभा में सरकार को कोई रुकावट आडे नहीं आएगी क्योंकि राजग के पास खासा बहुमत है। राज्यसभा में सरकार को विपक्ष की मदद लेनी पडेगी। सरकार राज्यसभा में जेएनयू और रोहित वेमूला मामले में चर्चा के लिए मान गई है। विपक्ष को यह बात समझ में आ गई है कि देश  का जनमानस बार-बार संसद की कार्यवाही को बाधित करने पर राजनीतिक दलों से खासा क्षुब्ध हो रहा है। उपराष्ट्रपति  ने बैठक में स्पष्ट  शब्दों में कहा कि सियासी दलों को  “डिस्रप्शन “ की जगह “डिबेट“ को प्राथमिकता देनी चाहिए। संसद की कार्यवाही को बाधित करके देश  को अच्छा-खासा नुकसान होता है। लोकसभा सचिवालय के आकलन अनुसार संसद के एक घंटे के संचालन पर सरकार को 25 लाख रु खर्च करने पडते हैं। इस हिसाब से अगर सत्र 8 घंटे चलता है तो सरकार को हर रोज 2 करोड रु का खर्चा वहन करना पडता है। जाहिर है अगर संसद की कार्यवाही चार घंटे भी बाधित रहती है, तो जनता की गाढी कमाई का एक करोड रु जाया हो जाते हैं। 2013 के बजट सत्र में विपक्षी भाजपा ने कोयला घोटाले (कोलगेट से कुख्यात), चीन की भारतीय सीमा में घुसपैठ और जेपीसी रिपोर्ट  पर संसद की कार्यवाही बार-बार बाधित की, जिससे लोकसभा का 51 फीसदी और राज्यसभा का 52 फीसदी समय जाया हो गया था । उस साल संसद के मॉनसून सत्र का 77 फीसदी हंगामे के कारण जाया हो गया था। 14वीं लोकसभा अपने पांच साल के कार्यकाल में कुल 200 दिन की सीटिंग भी नहीं कर पाई जबकि 300 सीटिंग तो होनी ही चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी माना है कि साल में कम-से-कम 60 सीटिंग तो होनी ही चाहिए मगर् मौजूदा 15वीं लोकसभा का रिकार्ड भी कोई ज्यादा बेहतर नहीं है। अब तक 12 सत्रों में लोकसभा के 643 घंटे हंगामे की भेंट चढ चुके हैं। यानी जनता के मौजूदा प्रतिनिधि भी जनता को अब तक 160 करोड रु से ज्यादा का नुकसान कर चुके हैं। देश  की जनता सांसदों और विधायकों को संसद अथवा विधानसभा की कार्यवाही को बाधित (डिस्रपट) करने के लिए नही, बल्कि ज्वलंत मुद्दे उठाने और उन पर विस्तार से चर्चा  करने के लिए चुनती है। दुखद स्थिति यह है कि सांसदों को चर्चा  में कोई रुचि नहीं रहती है। आंकडों के आनुसार संसद में बजट पर  25 फीसदी से ज्यादा समय तक चर्चा  हो ही नहीं पाई जबकि पश्चिम  देशों  की संसद बजट पर 80 फीसदी से भी ज्यादा समय तक चर्चा  करती है। इन हालात में प्रश्न  यह उठता है कि सांसदों अथवा विधायकों को  संसद अथवा विधानसभा/मंडल  की कार्यवाही बाधित करने की प्रवृति से  रोका जाना चाहिए। ऐसा करने के लिए सांसद अथवा विधायक को सदन की  कार्यवाही में हिस्सा लेना अनिवार्य किया जाना चाहिए। इस पर राष्ट्र व्यापी  बहस होनी चाहिए।

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

Crypto-Fascism Looming Large !

जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) मामले पर भाजपा और पार्टी समर्थकों द्वारा अदृश्य (क्रिप्टो) फासीवाद का नंगा नाच देश  के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। मोदी सरकार और भाजपाई जेएनयू से जुडी एक सामान्य घटना को “राष्ट्रीय अस्मिता“ का मुद्दा बनाकर “अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता“ को दफनाने पर आमादा है। भाजपा समर्थकों का अदालत परिसर में वामपंथियों को पीटना, विरोधियों को देशद्रोही साबित करना और अपने किए पर पछतावे की जगह इसकी शेखी बघारना आने वाले खतरे के प्रति आगाह करता है। जेएनयू में अफजल गुरु को शहीद बताने और भारत के खिलाफ नारे लगाने से कहीं ज्यादा खतरनाक फासीवादी मानसिकता है। क्रिप्टो फासीवाद से आज तक कोई भी देश  फूल-फूल नहीं पाया है। पिछले कुछ समय की घटनाएं   स्पष्ट संकेत  दे रही हैं कि  भाजपाा और उसके समर्थक फासीवाद को थोपने की हरसंभव कोशिश  कर रहे हैं। उतर प्रदेश  के दादरी में गोमांस की आड में मुसलमान को जिंदा जला डालना, कर्नाटक में प्रगतिशील लेखकों की हत्या, हैदराबाद सेंट्रल  यूनिवर्सिटी में दलित छात्र को आत्महत्या के लिए विवश  करना और देश  की राजधानी में छात्रों ओर पत्रकारों पर हमला जैसी घटनाएं क्रिप्टो फासीवाद का नंगा नाच है।  भाजपाई कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को गोली मारने की सार्वजनिक बात करते हैं । आलोचकों को पाकिस्तान जाने की नसीहत देते हैं। फासीवादी मानसिकता के कारण  पूरे देश  में असहिष्णुता   का माहौल व्याप्त है। क्या बोला जाए, क्या लिखा जाए और क्या खाया-पिया जाए, यह सब भाजपाईयों की पसंद का हो तो आप देशभक्त हैं वरना देशद्रोही। जेएनयू में आजाद कश्मीर  की आवाल बुलंद करना और अफजल गुरु को  शहीद बताना  अगर देशद्रोह है तो समूचा कश्मीर  राज्य देशद्रोही है। कश्मीर  में भारत के खिलाफ नारे लगाना और आजाद कश्मीर  की मांग करने वाले सालों से ऐसा कर रहे हैं और आज भी कर रहे है। मगर न तो भाजपा नीत अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और न ही मौजूदा मोदी सरकार भारत विरोधी नारों और आजाद कश्मीर  की आवाज को दबा पाई है। जम्मू-कश्मीर  में मुफ्ती मोहम्मद सईद की मौत होने तक भाजपा पीडीपी के साथ सत्ता का सुख भोग रही थी और अभी भी “अलगाववादियों“ की पैरवीकार पीडीपी के साथ राज्य में सता का सुख भोगने का सपना पाले हुए हैं। जेएनयू मामले में दिल्ली पुलिस की भूमिका भी खासी विवादास्पद रही है। पुलिस की पक्षपातपूर्ण  कार्यशैली ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इन आरोपों को पुष्ट  किया है कि दिल्ली पुलिस  मोदी सरकार के इशारे पर काम कर रही है। दिल्ली  पुलिस जेएनयू में देश  विरोधी नारे लगाने वाले प्रमुख आरोपियों को तो आज  तक पकड नहीं पाई है मगर जेएनयू के वामपंथी छात्र नेता को टीवी फुटेज पर गिरफ्तार कर लिया जाता है। पुलिस कमिशनर सुबह कहते हैं कि कन्हैया कुमार के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं और शाम को मुकर जाते हैं। जाहिर है यह सब केद्र सरकार के इशारे पर किया गया। निसंदेह, देशद्रोह करने वालों को कतई बख्शा नहीं जाना चाहिए और उन्हें कडी से कडी सजा मिलनी चाहिए। पूरा देश  यही चाहता है मगर कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, यह तय करना न्यायपालिका का काम है। कन्हैया कुमार और उन जैसे छात्र देशद्रोही है या नहीं, अब दिल्ली उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय इस बात का फैसला करेगी। भाजपा अथवा अन्य किसी को भी जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित  विश्वविधालय  ओर उसके छात्रों का कैरियर सियासी हितों के लिए बर्बाद करने का अधिकार नहीं है। भाजपा यह बात भूल गई है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था के कारण ही वह केन्द्र और राज्यों में सता में आ पाई है। अपनी दिली बात कहना और औरों की बात सुनना  लोकतंत्र का अहम हिस्सा होता है। कश्मीर  ही नहीं  पूर्वोत्तर भारत भी लंबे समय से अलगाववाद की आग में सुलग रहा है और सेना की तैनाती के बावजूद यह आग बुझ नहीं पाई है। इतिहास इस बात का गवाह है कि लाठी-गोलियों से किसी भी मुक्त आवाज को दबा नहीं जा सकता। इसके विपरीत दबाने से बगावत की चिंगारी और ज्यादा फैलती है। बीजेपी  केन्द्र और देश  के अधिकतर राज्यों में सता में है। इन हालात में लोकतांत्रिक और प्रगतिशीलल सियासी दलों के समक्ष सबसे बडी चुनौती फासीवादी मानसिकता से लडने की है। और यह लडाई मिलकर ही लडी जा सकती है। 

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

Hide And Seek Game In Arunachal Pradesh

पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश  में लोकप्रिय सरकार के गठन को लेकर लुका-छिपी का खेल वीरवार को सर्वोच्च न्यायालय की ताजा व्यवस्था के साथ ही समाप्त होने की उम्मीद की जा सकती है । सर्वोच्च न्यायालय ने वीरवार को अपने ही फैसले को निरस्त करते हुए अरुणाचल में लोकप्रिय सरकार के गठन का रास्ता प्रशस्त कर दिया। बुधवार को न्यायालय ने नई सरकार के गठन को रोक दिया था और यथा-स्थिति (स्टेटस क्वो) बनाए रखने के आदेश  दिए थे। बुधवार को ही केन्द्र सरकार ने अरुणाचल प्रदेश  से राष्ट्रपति  शासन को हटाकर नई सरकार के गठन के लिए द्धार खोल दिए थे। केन्द्र सरकार के इस कदम के बाद बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने नई सरकार के गठन पर रोक लगा थी। इससे पहले मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने अरुणाचल प्रदेश  में नई सरकार के गठन को रोकने में दखल देने से मना कर दिया था। वीरवार को सर्वोच्च न्यायालय ने 14 विधायकों के दल-बदल से संबंधित विधानसभा के रिकार्ड  का मुआयना करने के बाद अपने बुधवार के आर्डर को निरस्त करते हुए नई सरकार के गठन की अनुमति दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने गुवाहटी उच्च न्यायालय (अरुणाचल प्रदेष का उच्च न्यायालय भी) के 14 विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के फैसले में दखल देने से भी इंकार कर दिया। उच्च न्यायालय ने विधानसभा अध्यक्ष के 14 विधायकों को अयोग्य ठहराए जाने के आदेश  को रोक दिया था। उच्च न्यायालय की व्यवस्था थी कि इन विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष ने बगैर नोटिस दिए ही अयोग्य करार दे दिया था। पिछले कई दिनों से अरुणाचल प्रदेश  में नई सरकार के गठन को लेकर लुका-छिपी का खेल चल रहा था और न्यायपालिका की विरोधाभासी व्यवस्था ने स्थिति को और ज्यादा पेचीदा बना दिया था। दिसंबर माह में कांग्रेस के 21 विधायक पार्टी से बगावत करके भाजपा के साथ मिल गए थे और मुख्यमंत्री को हटाकर अपना मुख्यमंत्री नियुक्त कर लिया था। भाजपा के पास अरुणाचल प्रदेश  में 11 विधायक हैं। 60-सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के लिए 31 विधायकों के समर्थन की दरकार है। कांग्रेस के 21 बागी विधायकों के साथ भाजपा अब राज्य में सरकार बनाने की फिराक में है। इस पूरे प्रकरण ने मोदी सरकार की कलई खोल दी है। दल-बदल को रोकने के लिए संसद द्वारा कानून बनाए जाने के बावजूद समकालीन सियासी दल खुद इस कानून का मखौल उडाने में सबसे आगे रहते हैं। भाजपा अब यह बात भूल गई है कि अस्सी और नब्बे के दशक में वह कांग्रेस को दल-बदल के लिए जी भर कर कोसा करती थी। 1999 में अन्नाद्रमुक की मुखिया जयललिता द्वारा अटल बिहारी वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लेने पर भाजपा खूब लाल-पीली हुई थी और दल-बदल को रोकने का संकल्प लिया था। अब उसी भाजपा  को अरुणाचल प्रदेश  में कांग्रेस से दल-बदल करवाकर बागी विधायकों की मदद से सरकार बनाने में कोई शर्म नहीं आ रही है। अरुणाचल प्रदेश  के ताजा प्रकरण ने संघीय ढांचे को  कमजोर किया है। लोकप्रिय जनादेश  का इस तरह से अपमान किया जाने पर  लोकतंत्र  पर चोट है । दो-तिहाई बहुमत से चुनी गई पार्टी की सरकार की जगह दल-बदलुओं की सरकार बनाकर भाजपा देश  को क्या दिखाना चाहती है? केन्द्र सरकार के पास राज्य की सरकारों को अस्थिर करने के लिए  प्रत्यक्ष अधिकार नहीं होने के बावजूद वह राज्यपालों को अपने राजनीतिक हितों के लिए जमकर इस्तेमाल करती है। ताजा मामले में अरुणाचल प्रदेश  के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा का आचरण भी बेहद पक्षपाती रहा है। राज्यपाल  ने दिसंबर में विधानसभा का सत्र अपनी मर्जी से बुला लिया था जबकि उन्हें ऐसा करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं था। नबाम टूकी सरकार की सिफारिश  पर राज्यपाल पहले खुद सत्र को बुलाने की अधिसूचना तक जारी कर चुके थे। उच्च न्यायालय ने राज्यपाल की इस कार्रवाई को गैर-संवैधानिक बताया है।  सर्वोच्च न्यायालय भी  स्पष्ट  व्यवस्था दे चुका है कि राज्यपाल को बगैर मंत्रिमंडल की सिफारिश  से विधानसभा का सत्र बुलाने का कोई अधिकार नहीं है। अरुणाचल प्रदेश  चीन से सटा संवेदनशील राज्य है। दल-बदलुओं की मदद से सरकार बनाकर भाजपा कोई बहुत बडा काम नहीं कर रही है। इससे लोकतंत्र भी कमजोर  होगा और संघीय ढांचा भी।

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

उतेजित माहौल बजट सत्र

               उतेजित माहौल और  बजट सत्र

देश  में व्याप्त मौजूदा उतेजित माहौल ने 23 फरवरी से  सत्र शुरु हो  रहे संसद के बजट सत्र को ग्रहण लगा दिया है। विपक्ष के तीखे तेवरों से साफ लग रहा है कि  संसद की कार्यवाही इस बार भी बाधित की जा सकती है। 29 फरवरी को आम बजट पेश  किया जाएगा और उससे पहले 25 फरवरी को रेल बजट आएगा। जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी (जेएनयू) में संसद पर हमले के अपराधी अफजल गुरु को शहीद बताए जाने और कथित देश -विरोधी नारे लगाए जाने से राजनीतिक माहौल खासा गर्माया हुआ है। देशद्रोह के आरोप में जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तार से कांग्रेस और वामपंथी दल उबले हुए हैं। विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार ”अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता “ को देशद्रोह का मुद्दा बनाकर विपक्ष की आवाज दबाने पर आमादा है। देशद्रोह के इस मामले पर माहौल इस कद्र उतेजित है कि पिछले तीन दिन से दिल्ली में अदालत परिसर में भी हिंसक घटनाएं हो रही हैं। सोमवार को भाजपा के एक विधायक और उनके समर्थकों ने अदालत परिसर में वामपंथी समर्थक छात्र और पत्रकारों की पिटाई तक कर डाली। मंगलवार को भी ऐसा कुछ घटा और बुधवार को वकीलों ने दिल्ली की अदालत में कन्हैया लाल की पिटाई की कोशिश  की । वे वही लोग थे जिन्होंने सोमवार को भाजपा विधायक के साथ पत्रकारों की पिटाई की थी। पटियाला हाउस कोर्ट परिसर में एक पत्रकार को भी पीटा गया। इससे पहले वकीलों ने जेएनयू मामले से संबंधित सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय में ”वंदे मातरम” के नारे लगाए और  कार्यवाही बाधित की। पूरे देश  में छात्र कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के खिलाफ प्रर्दशन कर रहे हैं। हावर्ड, ऑक्सफोर्ड, कैम्बरिज, येल, लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स जैसी  नामी विदेशी  यूनिवर्सिटीज  भी कन्हैयालाल की गिरफ्तारी के खिलाफ छात्रों के आंदोलन के समर्थन में खुलकर सामने आ गई  हैं। अब यह मामला जेएनयू अथवा कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी तक ही सीमित नहीं रह गया है। भाजपा जेएनयू मामले पर “राष्ट्र  की अखंडता“ के मुद्दे को लेकर देश -व्यापी आंदोलन चलाने की योजना बना रही है। इस मामले को लेकर जमकर सियासत हो रही है। भाजपा और उसके समर्थक जेएनयू में अफजल गुरु से संबंधित आयोजन को देशद्रोह बता रहे हैं तो विपक्ष छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को “ मोदी सरकार की तानशाही“ और लोकतांत्रिक  अधिकारों का हनन बता रहे हैं। मंगलवार को प्रधानमंत्री की संसद में विपक्ष के नेताओं से मुलाकात के दौरान  भी जेएनयू का मामला छाया रहा हालांकि बैठक संसद के बजट सत्र पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। इन सब बातों से साफ हो रहा है कि संसद के बजट सत्र में भी मोदी सरकार को  शासकीय कामकाज (बिजनेस) निपटाने में बाधाएं खडी की जा सकती हैं। बजट सत्र में अहम विधयेक गुडस एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) को पारित कराना  सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। अप्रैल, 2016 से पूरे देश  में एकीकृत जीएसटी को लागू होना है मगर अभी तक यह बिल संसद में पारित नहीं हो पाया है। लोकसभा इसे पारित कर चुकी मगर राज्यसभा में यह बिल अभी भी अटका हुआ है। राज्यसभा में सरकार के पास स्पष्ट बहुमत  तक नहीं है जबकि इस संवैधानिक संशोधन बिल को पास करवाने के लिए सरकार को दो -तिहाई बहुमत की दरकार है। राज्यसभा में यह बिल विपक्ष के समर्थन के बगैर पारित नहीं हो सकता है। सरकार को उम्मीद है कि मौजूदा बजट सत्र में यह बिल विपक्ष के सहयोग से पारित हो जाएगा। सरकार ने  इस बिल पर काग्रेस के  कुछ संशोधन मान भी लिए हैं मगर ताजा हालात बता रहे हैं कि विपक्ष सरकार को आसानी से अपना समर्थन नहीं देगी। कांग्रेस पहले ही कह चुकी है कि जीएसटी से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण और भी कई बिल हैं जिनका पारित होना अपरिहार्य है। जेेएनयू मामले ने स्थिति और ज्यादा बिगाड दी है। जीएसटी के लागू होने पर पूरे देश  में एक समान कर व्यवस्था लागू होगी। विशेषज्ञों का आकलन है कि जीएसटी के लागू होने से देश  का सकल उत्पादन 2 फीसदी तक बढ सकता है। आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करने के लिए जीएसटी बिल का पारित होना निहायत जरुरी है।

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

Why Cleanest Chandigarh Hasn't Been Included in Smart City First List

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “स्वच्छ भारत मिशन“ का असर दिखाई देने लग पडा हैे और इसके सकारात्मक नतीजे सामने आ रहे हैं। चंडीगढ समेत 34   शहर इस बात के साक्षी हैं। सोमवार को सरकार द्वारा जारी “स्वच्छ सर्वेक्षण-2016“ के अनुसार चंडीगढ देश  का दूसरा सबसे स्वच्छतम शहर है। पिछली बार की तरह कर्नाटक राज्य का मैसूर इस बार भी पहले पायेदान पर है।  2014 में चंडीगढ  दसवें पायदान पर था। यह प्रधानमंत्री के “स्वच्छ भारत मिशन“ का ही परिणाम है कि सिटी व्यूटीफुल दसवें स्थान से महानगर ग्रेटर मुंबई को बेदखल कर  दूसरे स्थान पर पहुंच गया है। इस उपलब्धि ने चंडीगढ को स्मार्ट  सिटी की पहली सूची में  शामिल नही किए जाने के जख्म पर मलहम-पट्टी की है। प्रधानमंत्री के सपनों का शहर और उनका संसदीय हलका वाराणसी दस सबसे गंदे शहरों मेंसे है। प्रधानमंत्री को इस बात का मलाल हो सकता है, मगर उन्हें इस बात का सुकून होना चाहिए कि लोगो में स्वच्छता के प्रति जागरुकता बढी है। इसी कारण उत्तर भारत के 17 शहरों समेत 34 शहरों की रैंकिंग में सुधार आया है। उतर प्रदेश  की राजधानी लखनऊ 51 पायेदान से 25 पर, राजस्थान की राजधानी जयपुर 41 से 29 पर आ गया है।  इलाहाबाद ने कमाल कर दिखाया है। गंगा-यमुना की संगम स्थली इलाहाबाद इस बार 22वें पायेदान पर है जबकि 2014 में यह शहर 67वें पायेदान पर था। हरियाणा का मिलेनियम शहर गुडगांव 65वें पायेदान से 36, फरीदाबाद 69 से 51, पंजाब में अमृतसर 66 से 49वें पायेदान पर आ गया है। यह बात कितनी दुखदायी है कि  अमृतसर जैसी पावन नगरी अभी भी स्वच्छता से काफी दूर है और यही हाल मिलेनियन सिटी गुडगांव का है। अगर हम अपने धार्मिक नगरों को भी स्वच्छ नहीं रख पाते हैं तो ऐसी आस्था किस काम की। ताजा सर्वेक्षण में वाराणसी के अलावा अमृतसर, इलाहाबाद जैसे धार्मिक स्थल अभी भी निचले पायदान पर हैं हालांकि इलाहाबाद ने स्वच्छता में बेहतर काम किया है।  2014 की तुलना में इस बार के सर्वेक्षण में 22 राजधानियों समेत दस लाख से ज्यादा की आबादी वाले 73 शहर ही शामिल किए गए थे। इस कारण उत्तर भारत के शिमला, धर्मशाला और देहरादून जैसे लोकप्रिय  शहर  शामिल ही नहीं किए गए थे। 2014 में एक लाख और इससे ज्यादा आबादी वाले 476 शहरों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया था। बहरहाल,  मोदी सरकार के “स्वच्छ भारत मिशन“ और “स्मार्ट  सिटी“ योजनाओं ने राज्यों और स्थानीय निकाओं (लोकल बॉडीज) को, कमत्तर ही सही, मगर स्मार्ट  बना दिया है। कहते हैं प्रतिस्पर्धा  प्रतिभा और स्कील को निखारती है। स्मार्ट सिटी बनना भी प्रतिस्पर्धक चुनौती है और किसी भी शहर को “स्मार्ट“ बनने के लिए पहले उसे साफ-सुथरा रखना और लोगों में स्वच्छता की आदत डालना अपरिहार्य है। स्वच्छता शहर, गली अथवा  घर-परिवार को स्वच्छ रखने तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए। स्वच्छता से ही स्वच्छ रहन-सहन और स्वच्छ विचार उपजते हैं। वेदों और शास्त्रों में साफ-साफ अक्षरों में कहा गया है कि  स्वच्छ और स्वस्थ मानसिकता ही देश  और समाज को स्वस्थ और समृद्ध बना सकती है।  असहिष्णुता  के  मौजूदा माहौल में स्वच्छ एवं स्वस्थ मानसिकता की सख्त दरकार है। मोदी सरकार को इस बात का श्रेय जाता है कि दो साल से भी कम समय में देश  को स्वच्छ रखने और स्मार्ट बनाने की दिशा  में सकारात्मक पहल हुई है। “स्मार्ट सिटी“ चयन के लिए निधारित मानदंड पर  देष  का स्वच्छतम शहर चंडीगढ पहली सूची में क्यों शामिल नहीं हो पाया, इस पर जरुर हैरानी होती है। चंडीगढ पहली सूची में शामिल कई शहरों से ज्यादा “स्मार्ट“ है और इस बात की ताकीद प्रधानमंत्री खुद कर चुहे है। इस बार गणतंत्र दिवस के विदेशी  मेहनान फ्रांस के राष्ट्रपति  फ्रांकोस निकोलस ओलांदे की हाल ही की  चंडीगढ  यात्रा के दौरान मोदी ने चंडीगढ को देश  का स्मार्ट शहर बताया था। सिटी व्यूटीफुल का स्मार्ट सिटी की पहली सूची में  शामिल नहीं किए जाने से चयन प्रकिया की निष्पक्षता  पर संदेह उठता है। अगर ऐसा है तो यह योजना शुरु होने से पहले ही दम तोड देगी।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

Who Are We To Decide Who Is Patriot and Who's Not?

अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता को कुचलना और आलोचना को न सह पाना आजादी के लिए सबसे बडा खतरा होता है, महान विचारकों के दर्शन  का यही निचोड है। जवाहरलाल  यूनिवर्सिटी (जेएनयू ) में छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी  और छात्रों एवं अध्यापकों के मुक्त विचारों को दबाने की  मोदी सरकार  कार्रवाई यही संकेत दे रही है। मोदी सरकार आलोचना (डिसेंट)  को देशद्रोह बता कर देश की  सर्वोत्तम शैक्षणिक संस्था को तहस-नहस करने पर आमादा लग रही .है।   दुखद बात यह है कि  राष्ट्रीयता  की आड में संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है। जेएनयू देश  की  प्रतिष्ठित  यूनिवर्सिटी है। 2012 में नेशनल असेसमेंट  एंड  एक्रिडिशन काउंसिल ने जेएनयू को सबसे ज्यादा 4 मेंसे 3. 9 ग्रेड दिया था। देश  के अन्य किसी भी  यूनिवर्सिटी को यह ग्रेड नहीं मिला है। इंडिया टूडे पत्रिका ने जेएनयू को देश  की दूसरी सर्वोतम यूनिवर्सिटी माना है। इसके बावजूद मोदी सरकार को जेएनयू फूटी आंख नहीं सुहा रही है। इसकी वजह है कि इस यूनिवर्सिटी में वामपंथी विचारधारा का जोर है और भाजपा से सम्बद्ध अखिल भारतीय परिषद (एबीवीपी) का जेएनयू में मोदी सरकार के आने के बाद भी दबदबा नहीं बन पाया है। जिस तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी में आजतक अखिल भारतीय परिशद का दबदबा (कभी -कभी कांग्रेस से संबंद्ध एनएसयूआई भी) रहा है और वामपंथी  यहां फटक तक नहीं पाए हैं, उसी तरह जेएनयू में एबीवीपी भी वामपंथियो को रोक नहीं पाई है। यही वजह है कि मोदी सरकार वामपंथी छात्र संगठनों से जुडे नेताओं और अध्यापकों के पीछे पडी हुई है।  गृहमंत्री राजनाथ सिंह का बयान सााफ-साफ बताता है कि मोदी सरकार जेएनयू को लेकर कितनी संवेदनषील है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार जेएनयू में 9 फरवरी को आयोजित इवेंट में लश्कर के  आतंकी हाफिज सईद का हाथ है। अगर ऐसा है तो सरकार और उसकी खुफिया एजेंसियां आज तक कहां थी? समय रहते उन छात्रों को क्यों नहीं पकडा गया, जो हाफिज सईद के संपर्क  में थे।  सरकार ने 9 फरवरी तक क्यों हालात को हाथ से फिसलने दिया? क्या राजनाथ सिंह नहीं जानते है कि मौजूदा केबिनेट सचिव और इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) के निदेशक भी जेएनयू के छात्र रहें है। देश  के कई आला अधिकारी और राजनीतिज्ञ जेएनयू के छात्र रहे हैं। और ये सब जेएनयू को देशद्रोही गतिविधियों का मंच बताने के आरोप को सिरे से खारिज करेंगे।  पूरी दुनिया में यूनिवर्सिटीज  मुक्त विचार व्यक्त करने के मंच रहे हैं। पश्चिम   में आक्सफोर्ड, हावर्ड, लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स जैसी नामी यूनिवर्सिटीज बाकायदा मुक्त विचारों के लिए विख्यात है। आजादी से पहले आक्सफोर्ड  यूनिवर्सिटी में भारत की आजादी के संघर्ष   और गांधी-नेहरु  पर खासी चर्चा  हुआ करती थी। इसका यह मतलब नहीं था कि यह यूनिवर्सिटी देशद्रोही तत्व का मंच थी। यूनिवर्सिटीज को विभिन्न विचारधारओं को संगम माना जाता हैं। इनमें ज्वलंत विषयों पर शोध होता है, व्याख्यान दिए जाते हैं और मुक्त विचार व्यक्त किए जाते हैं। लोकतंत्र में हर नागरिक को अपनी बात कहने का पूरा-पूरा अधिकार होता है। इसे राष्ट्रीयता  अथवा राष्ट्र -विरोधी विचारधारा में नहीं बांधा जा सकता । कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, यह साबित करना कानून का काम है। राजनीतिक विरोधियों की आवाज दबाने और लोकतांत्रिक सस्थाओं को कुचलने से लोकतंत्र कभी भी फल-फूल नहीं सकता। इस बात को भाजपा से ज्यादा और कौन जानता है। आपातकाल में भाजपा कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री पर यही आरोप लगाती रही है। मोदी सरकार की मौजूदा कार्रवाई ने आपातकाल की यादों को तरोताजा कर दिया है। तब कांग्रेस सरकार विरोधियों को दबाने के लिए ऐसे ही हथकंडे अपनाया करती थी। युवा अक्सर भावनाओं में बह जाते हैं और अगर वे दिशा  भटक जाते हैं, उन्हें सही मार्ग दिखाना और राष्ट्रीय  मुख्यधारा से जोडना राष्ट्र  की जिम्मेदारी है। स्वतंत्र  विचार व्यक्त करने से कोई देशद्रोही नहीं बन जाता। भाजपा को यह खुशफहमी है कि केवल उससे जुडे लोग ही देशभक्त है। सच्चाई यह है कि मुक्त एवं स्वतंत्र आवाज को दबाकर लोकतंत्र का गला घोटना भी देशद्रोह जैसा है।

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

Need to Put Banking Sector in Order

स्टॉक मार्केटस में इन दिनों चौतरफा अफरा-तफरी का माहौल है। निवेशक मार्केट्स से हाथ खींच रहे हैं और शेयर बाजार में मदंडिओं का दबदबा व्याप्त है। भारतीय स्टॉक मार्केट का ही नहीं, अलबत्ता पूरी दुनिया का यही हाल है। शुक्रवार को हालांकि सेंसेक्स और निफ्टी में मामूली सुधार दर्ज हुआ मगर जुलाई 2009 के बाद शेयर बाजार में अब तक की सबसे बडी साप्ताहिक गिरावट दर्ज हुई। शुक्रवार को 0.15 फीसदी की बढत के बावजूद इस सप्ताह सेंसेक्स में 6.62 फीसदी की गिरावट आई है। निफ्टी 0.07 फीसदी बढत के बावजूद इस सप्ताह  6.78 फीसदी गिरा है। वीरवार को चार दिन की लगातार गिरावट के कारण सेंसेक्स 23,000 के स्तर से भी नीचे चला और निफ्टी 23 माह के न्यूनतम स्तर 7000 के नीचे फिसल गया। चार दिनों की गिरावट के कारण शेयरधारकों को सात लाख करोड रु का फटका लग चुका था। एशिया की अन्य मार्कैटस का तो और भी बुरा हाल है। शुक्रवार को एशियन शेयर्स  में लगातार छठे दिन भी गिरावट जारी रही। अमेरिका और यूरोप की शेयर मार्केटस भी भीषण मंदी के दौर से गुजर रही है। यूरोपियन स्टॉक्स 2013 के बाद अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए हैं। डॉउ जांस बद से बदतर होता जा रहा है। मार्केटस के अभी मंदी से उभरने के कोई आसार नजर नहीं आ रहे हैं। मार्केटस में मंदी व्याप्त रहने के तीन प्रमुख कारण है। पहला और सबसे प्रमुख कारण है अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल की कीमतों में लगातार गिरावट। 110 डॉलर प्रति बैरल से गिरते-गिरते कच्चे तेल की कीमत बाजार में 30 डॉलर बैरल से भी नीचे आ गई है और जून तक इसके 20 डॉलर तक फिसल जाने की संभावना जताई जा रही है। मांग की तुलना में सप्लाई कहीं ज्यादा है मगर तेल उत्पादक देश  उत्पादन को नियंत्रित करने के लिए जरा भी तैयार नहीं है। तेल की कीमतें गिरने से तेल उत्पादक देशों  की कमाई में खासी कमी आई और इससे आमदन घटी है। नतीजतन, निवेश  भी गिरा है। उधर, यूरोप में ब्याज दरें  बेहद कम है और वहां लबे समय से मंदी व्याप्त रहने के कारण  निवे कों को  कोई रिटर्न  नहीं मिल रही है। जापान ने हाल ही में नेगेटिव ब्याज दर नीति अपनाई है। इसका मतलब है जापान का सेंट्रल बैंक अन्य बेंकों को बगैर ब्याज लिए कर्ज  दे रहा है। निवेशक अमेरिका की तरफ रुख करना चाहते हैं मगर अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेड रिजर्व भी ब्याज दरें दस साल से यथावत रखे हुए हैं। फेड रिजर्व की अध्यक्ष जेनेट येलेन ने स्पष्ट कहा  है कि फिलहाल ब्याज दरें नहीं बढेंगी। इन हालात में निवेशक इधर- उधर भटक रहे हैं। चीन में स्लोडाउन ने हालत और बिगाड दिए हैं। उभरती अर्थव्यवस्था में भारत एकमात्र ऐसा देश  हैं जो फिलहाल मंदी से बचा हुआ है मगर बैंकिग सेक्टर में बढती अव्यवस्था ने बाजार को निरुत्साहित कर रखा है। राष्ट्रीयकृत  बैंकों में सबसे बडे लैंडर स्टेट बैक ऑफ इंडिया का तिमाही मुनाफा पांच साल में पहली बार 67 फीसदी गिरा है। पंजाब नेशनल बैंक की इस बार की तिमाही रिपोर्ट भी काफी खराब है। इस बैंक का तीसरी तिमाही का मुनाफा 93 फीसदी गिरा है। इससे पहले सेंटल बैंक ऑफ इंडिया, इलाहाबाद और देना बैंक भी मुनाफे में जबरदस्त गिरावट रिपोर्ट  कर चुके हैं। इसके लिए बैड लोंस प्रमुख रुप से जिम्मेदार हैं। राष्ट्रीयकृत बैंक पर बैड लोंस का बोझ 2.5 लाख करोड रु को पार कर चुका है। यह राशि  2जी स्कैम से भी कहीं ज्यादा। पिछले तीन सालों में ही 27 राष्ट्रीयकृत बैंक 1.15 लाख करोड रु के बैड लोंस माफ कर चुके हैं। इससे बैंको के शेयर्स  लगातार गिर रहे हैं। बैंकों पर अब निवेशकों को जरा भी भरोसा नहीं रहा है। बाजार में लिक्विडी की भारी कमी तीसरी वजह है। शेयर बाजार में 70 फीसदी से ज्यादा कारोबार विदेशी  संस्थागत निवेशक (एफआईआई) करते हैं। पिछले एक माह में विदेशी निवेशक 11000 करोड रु की निकासी कर चुके हैं और गत तीन सेशन में 1100 करोड निकाल चुके हैं। इन हालात में शेयर बाजार का मंदी से उभरना आसान नहीं है। निवेशक इस माह की 29 तारीख को पेश  होने जा रहे बजट की प्रतीक्षा में है। बाजार को मंदी से उभारने के लिए बजट में निवेशकों को रियायतों की दरकार है।  

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

कब तक सियाचिन में सैनिक शहादत पाते रहेंगे?

सियाचीन में 35 फीट बर्फ में छह दिन तक मौत से लडता रहा, आखिरी सांस तक हारा नहीं, 125 घंटों तक जिंदगी और मौत के बीच झूलता रहा मगर दिल्ली के आर्मी अस्पताल में सैनिक हनुमनथप्पा जिंदगी की लडाई हार गया। देश  की करोडों दुआएं भी उसे बचा नहीं पाई और न ही अत्याधुनिक मेडिकल साइंस उसके किसी काम आई। इस योद्धा का बचना भी चमत्कार ही माना जा रहा था। डाक्टरों ने उनकी हालत को बेहद गंभीर बताया था।  वीरवार सुबह वीर सैनिक  हनुमनथप्पा ने आखिरी सांस ली। हनुमनथप्पा की मौत से पूरा देश  गमगीन है। बहादुरी की मिसाल सैनिक  हनुमनथप्पा को बचाने के लिए पूरा देश  दुआएं कर रहा था कि एक और चमत्कार हो जाए ओर बहादुर सैनिक  हनुमनथप्पा  बच जाए। हरिद्धार की गुरुकुल कांगडी यूनिवर्सिटी की यज्ञशाला में अध्यापकों और छात्रों ने हनुमनथप्पा की सलामती के लिए महामृत्युंजय मंत्रों का जाप तक किया। टीवी-रेडियो पर  हनुमनथप्पा की किडनी और लीवर के निष्क्रिय   होने की खबर पर लोग वीर सैनिक के अमूल्य जीचन को बचाने के लिए आगे आए। किसी ने अपने गुर्दे पेश  किए तो किसी ने लीवर और अन्य अंग। उत्तर प्रदेष की एक महिला ने जब सुना कि लांसनायक हनुमनथप्पा की किडनी खराब है, वह फौरन अपनी किडनी  देने आगे आई। मुंबई के एक पूर्व-सैनिक भी इसी तरह आगे आए और हनुमनथप्पा के लिए अपने किसी भी अंग देने को तैयार थे। पर मौत के आगे किसी की नहीं चलती। डाक्टरों की लाख कोशिशों  के बावजूद इस वीर सैनिक को बचाया नहीं जा सका। हनुमनथ्प्पा वीरगति पा गया और पीछे छोड गया बहादुरी और अदम्य साहस की बेमिसाल गाथा।  हनुमनथप्पा 2002 में सेना में भर्ती हुआ था और अपने 13 साल की सर्विस में 10 साल तक बार्डर पर तैनात रहा। 2003 से 2006 तक हनुमनथप्पा ने जम्मू-कश्मीर  में आतंकरोधी ऑपरेशन में सक्रिय भूमिका निभााई । 2008 से 2010 तक इस योद्धा ने स्वेच्छा से राष्ट्रीय  राइाफक्स में सेवाएं दी और इसके तुरंत बाद  हनुमनथ्प्पा ने 2012 तक पूर्वोत्तर सीमा पर स्वेच्छा से पोस्टिंग ले ली। दिसंबर 2015 से यह योद्धा 19600 फुट की ऊंचाई पर स्थित दुनिया की सबसे ऊंची चौकी पर तैनात था। सियाचीन में छह दिन तक 35 फीट बर्फ में दबे रहने के बाद सोमवार को हनुमनथप्पा को जिंदा पाकर पूरा देश  खुशी  से झूम उठा था। उसके नौ साथी बर्फ  में दबकर मारे गए थे। कहते हैं “ बहादुर मौत को भी चकमा दे जाते हैं“। हनुमनथप्पा ने भी 125 घंटों तक मौत को चकमा दिया। 35 फीट बर्फ  में दबकर माइनस 40 डिग्री तापमान में किसी का छह दिन तक जिंदा रहना किसी अलौकिक चमत्कार से कम नहीं था। और देशवासी फिर इसी चमत्कार की आस लगाए हुए थे। मगर चमत्कार बार-बार नहीं होते हैं।  अतंत, सियाचीन का योद्धा जिंदगी की लडाई हार गया। हनुमनथप्पा की शहादत ने देश  को उसका ऋणी बना दिया है। पूरा देश  जब चैन से सो रहा होता है,  हनुमनथप्पा जैसे हमारे बहादुर सैनिक सियाचीन में हड्डियों को कंपा देने वाली ठंड में ग्लेशियरों के इस  खतरनाक द्धीप की निगरानी करते हैं। सियाचीन हिमाच्छित क्षेत्र है जहां आस-पास आबादी का कोई नामो-निशान नहीं है। सियाचीन की रखवाली के लिए भारत ने वहां सेना की सात बटालियन तैनात कर रखी है। इन पर देश  को हर रोज लगभग 5 करोड और सालान 1800 करोड रु खर्च करने पडते हैं। इसकी तुलना में पाकिस्तान को अपने अधीन सियाचीन क्षेत्र में तैनात तीन बटालियन पर प्रतिदिन लगभग डेढ करोड रु अथवा सालाना 540 करोड रु खर्च करने पडते हैं। इस क्षेत्र में अक्सर एवालांच आते हैं और इनमें भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त कर जाते हैं। सवाल यह उठता है कि आखिर सियाचिन में ऐसा क्या है कि सैनिकों को बार-बार शहादत्त देनी पडती है। इस क्षेत्र की निगरानी के लिए वैकल्पिक व्यवस्था क्यों नहीं तैयार की जाती ? प्रोन्नत टकनॉलॉजी का जमाना  है और आजकल रोबोट हर काम करते हैं। ताजा जानकारी अनुसार अमेरिका में 2 लाख 60 हजार रोबोट फैक्ट्ररियों में कम कर रहे हैं। सियाचिन जैसे दुर्गम क्षेत्र की निगरानी की वैकल्पिक व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।  

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016

केन्द्र के एजेंट नहीं है राज्यपाल

देश में राज्यपाल पद को लेकर जब-तब विवाद उठता रहा है। कई बार राज्यपाल अपनी  शक्तियों का दुरुपयोग करके केन्द्र सरकार के राजनीतिक हितों को पोषित कर इस संवैधानिक पद की गरिमा पर प्रहार करते रहे हैं। दिल्ली में “आम  आदमी पार्टी“ की सरकार और उप-राज्यपाल नजीब जंग में जबरदस्त जंग छिडी हुई है। उप-राज्यपाल प्रचंड बहुमत से चुनी गई अरविंद  केजरीवाल सरकार को विफल करने में कोई कसर नहीं छोड रहे हैं। स्पष्ट  है यह सब केन्द्र के इशारे पर किया जा रहा ह। हाल ही में अरुणाचल प्रदेश  के राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा ने संवैधानिक व्यवस्था का निरादर करके कांग्रेस नीत सरकार को अपदस्थ करने की मंशा  से विधानसभा का सत्र काफी पहले (16 दिसंबर को) ही बुला लिया। इससे पहले राज्यपाल सरकार की सिफारिश  पर विधानसभा का सत्र 24 जनवरी को आहुत कर चुके थे और इसकी बाकायदा अधिसूचना जारी भी की गई थी। कांग्रेस के 21 विधायकों के दल बदल के बाद राज्यपाल ने यह कदम उठाया। जाहिर यह सब भी केद्र के इशारे पर किया गया। राज्यपाल को अपने तौर पर राज्य विधानसभा का सत्र बुलाने का कोई अधिकार नहीं हैै। संविधान में  स्पष्ट व्वयस्था  है कि राज्यपाल मंत्रिमंडल के परामर्श   के बगैर कोई काम नहीं कर सकते।  गुवाहटी उच्च न्यायालय ने राज्यपाल के इस कदम को  गैर-संवैधानिक करार देते हुए व्यवस्था दी कि यह संविधानिक शक्तियों का सरासर दुरुपयोग है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भी यही व्यवस्था दी है कि राज्यपाल को विधानसभा सत्र बुलाने का कोई अधिकार नहीं है। दिल्ली अथवा अरुणाचल प्रदेश  से पहले भी राज्यपाल केन्द्र के एजेंट की तरह काम करते रहे है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए  कांग्रेस द्वारा नियुक्त राज्यपाल कमला बेनिवाल से जबरदस्त टकराव रहा था। राज्यपाल ने 2013 में गुजरात विधानसभा द्वारा पारित लोकायुक्त बिल को मंजूरी देने की बजाय उसे लौटा दिया और खुद लोकायुक्त को नियुक्त कर दिया था ।  कमला बेनिवाल मोदी सरकार द्वारा महिलाओं को स्थानीय निकाओं (लोकल बॉडीज) मे 50 फीसदी आरक्षण देने वाले बिल समेत कई बिलों पर कुंडली मार कर बैठी रहीं। केन्द्र में मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही बेनिवाल को पहले स्थानांतरित करके त्रिपुरा भेजा गया और फिर उन्हें डिसमिस कर दिया गया। इससे पहले 15 अगस्त, 1984 को आन्ध्र प्रदेश  के तत्कालीन मुख्यमंत्री एनटी रामाराव को राज्यपाल राम लाल ठाकुर ने रातोंरात अपदस्थ करके एन भास्कर राव को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी थी। रामाराव उस समय अमेरिका में इलाज करवा रहे थे। रोचक बात यह है कि राज्यपाल ने संवैधानिक औपचारिकताओं को पूरा तक नहीं किया। विधानसभा चुनाव के समय  कांग्रेस से एनटीआर की पार्टी तेलुगू देशम में  शामिल हुए भास्कर राव को इस बिला पर मुख्यमंत्री बना दिया कि उन्हें टीडीपी के अधिकतर विधायकों का समर्थन प्राप्त है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। कहते हैं राम लाल ने यह सब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर किया था। राज्यपाल की शक्तियों के घोर दुरुपयोग का यह अनोखा मामला था। संविधान में राज्यपाल के अधिकारों और शक्तियों का साफ-साफ उल्लेख है। इसके बावजूद राज्यपाल संविधान का निरादर करने से बाज नहीं आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय से मंगलवार को  व्यवस्था दी कि राज्यपाल को संविधान में सीमित अधिकार दिए गए हैं और वे मुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल के फैसले को निरस्त नहीं कर सकते। अरुणाचल प्रदेश  के राज्यपाल की विधानसभा सत्र को पहले बुलाने की कार्यवाही पर  न्यायालय ने यह व्यवस्था दी। निष्कर्ष  यह है कि देश  में राज्यपाल पद की गरिमा उतरोतर गिरती जा रही है। इसकी वजह है समकालीन सरकार द्वारा अस्वीकृत राजनीतिक लोगों और सेवानिवृत नौकरशाहों को पुनर्वासित करने के लिए उनकी संवैधानिक पद पर नियुक्ति। इस स्थिति में राज्यपालों का केन्द्र सरकार के प्रति अहसानमंद रहना स्वभाविक है। देश  के संघीय ढांचे की सेहत के लिए यह स्थिति ठीक नहीं है। बेहतर यही होगा कि जजों की नियुक्ति की तरह राज्यपाल की नियुक्त के लिए भी निष्पक्ष  और तटस्थ व्यवस्था की जाए। मोदी सरकार आर्दशवादी होने का दावा करती है। इस मामले में पहल करके वह ऐसा साबित कर सकती है।





बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

हेडली की गवाही

                     
पाकिस्तानी-अमेरिकी नागरिक डेवडी कॉलमैन हैडली उर्फ सईद दाऊद गिलानी की गवाही ने पाकिस्तान की शैतानी फितरत को फिर बेनकाब किया है। सोमवार सुबह वीडियो  काँफ्रेसिंग के जरिए हेडली मुंबई कोर्ट  के समक्ष पेश  हुआ और उसने अपने कबूलनामे में कई खुलासे किए। मगर उसके खुलासे में कुछ भी नया नहीं है। यह सब वह अमेरिका  की अदालत में पहले भी बोल चुका है। हेडली ने मुंबई हमले के लिए  जकीउर रहमान लखवी सईद का नाम भी लिया। उसने यह भी कहा कि मुंबई में 26/11 हमले से पहले लश्कर  दो बार हमले के प्रयासकर चुका था मगर दोनों बार नाकाम रहा । हेडली के इस खुलासे से भारत की खुफिया एजेंसियों को  शर्मसार  होना चाहिए क्योंकि  इससे पता चलता है कि पाकिस्तानी आतंकी कितनी आसानी से भारत पर हमले के षडयंत्र रचते हैं मगर भारतीय खुफिया एजेंसिंयों को इसकी कानोकान भनक तक नहीं लगती । हेडली के अनुसार भारत के प्रति उसकी सख्त नफरत के कारण ही उसे 26/11मुंबई हमले में खास भूमिका दी गई थी और इसके लिए उसे लश्कर  के कमांडर जकीउर रहमान लखवी ने खुद एक साल तक प्रशिक्षण भी दिया था। भारत के प्रति नफरत के कारण हेडली 2009 में लश्कर  में  शामिल हुआ मगर अधेड उमर की वजह से उसे इस आतंकी संगठन में ज्यादा अहमियत नहीं दी गई। पर हेडली भारत से बदला लेना चाहता था और उसकी इस नफरत को देखते हुए उसे लश्कर  ने मुंबई हमले में सक्रिय भूमिका दी। हैडली  यह खुलासे मई 2011 में शिकागो की अदालत में कर चुका है। हेडली की गवाही भारत के लिए बडी कूटनीतिक कामयाबी है। अमेरिकी धरती से भारतीय कोर्ट  में 26/11 हमले के आरोपी का बयान भारत के लिए फायदेमंद हो सकता है। पाकिस्तान यह नहीं कह सकता की हेडली ने भारत के दवाब में बयान दिया है। अमेरिका के भारत के साथ बढते मैत्रीपूर्ण और पाकिस्तान के साथ बिगडते संबंधों के कारण यह  संभव हुआ है। पाकिस्तानी   तालिबान के अफगानिस्तान में बढते हमलों से अमेरिका पाकिस्तान से बेहद खफा है। अमेरिका अब यह बात अच्छी तरह जान गया है कि पाकिस्तान आतंक को पाल-पोस रहा है और अमेरिका के कहने के बावजूद वह रुक नहीं रहा है। हेडली के बयान से दुनिया की नजर में पाकिस्तान भी इस्लामिक श्टेट की तरह आतंकी राष्ट्र  साबित हो गया है। अगर पाकिस्तान के खूंखार आतंकी का निकटतम सहयोगी कह्ता है कि मुंबई हमले में सईद लखवी का हाथ है, तो पाकिस्तान इसे कैसे नकार सकता है। पाकिस्तान अब यह भी नहीं कह सकता कि वह भारतीय अदालत की कार्यवाही को नहीं मानता। इस बार की कार्यवाही में अमेरिका भी  शामिल है। लेकिन इतना सब होने के बावजूद पाकिस्तान मुंबई हमले के मास्टरमाइंड को गिरफ्तार करेगा, ऐसा सोचना भी भारी भूल होगी । पठानकोट हमले को लेकर भारत पाकिस्तान को ठोस सबूत दे चुका है मगर पाकिस्तान है कि मानता ही नहीं। बहरहाल, भारत को हेडली की गवाही पर ज्यादा इतराने की जरुरत नहीं है। इस गवाही की मात्र कूटनीतिक अहमियत है इससे ज्यादा कुछ नहीं। भारत को अस्थिर करना पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का प्रमुख मकसद है और यह सब पाकिस्तान सेना के कहने पर किया जाता है। मजबूत और ताकतवर भारत पाकिस्तान के लिए सबसे बडा खतरा है। इन हालात में पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने की हर मुमकिन कोशिश  करता रहेगा और इस काम में हेडली, लखवी जैसे भारत विरोधी तत्व उसकी सबसे बडी ढालें हैं। ताजा स्थिति में भारत और पाकिस्तान के बीच प्रस्तावित विदेश  सचिव स्तरीय वार्ता फिर टल सकती है। भारत पाकिस्तान से सईद को गिरफ्तार करने के लिए कहेगा, पाकिस्तान ऐसा नहीं करेगा।  सवाल यह है कि पाकिस्तान को रोकने  अथवा उसे सबक  के लिए भारत को क्या करना चाहिए? पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने के लिए उससे युद्ध करना कोई अच्छा विकल्प नहीं है। अगला युद्ध क्योंकि  परमाणु हथियारों से लडा जाएगा, यह सिर्फ तबाही ही लाएगा। भारत के पास एक ही विकल्प है कि कूटनीतिक स्तर पर पाकिस्तान को हाषिए पर लाए और आतंकी हमलों को रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था चाक-चौबंद करे।

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2016

नशे में डूबता पंजाब

पंजाब में नशीली  वस्तुओं की तस्करी रुके नहीं रुक रही है। सीमावर्ती फिरोजपुर जिले के खेमकरण सेक्टर में सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा रविवार अलसुबह चार तस्करो को घुसपैठ करते वक्त मार गिराने की घटना  यही साबित करती है। मारे गए तस्करों में दो पाकिस्तानी और दो भारतीय शामिल है। तस्करों से 10 किलो हेरोइन बरामद की गई है। तस्कर पाकिस्तान सीमा से  इस हेरोइन की डिलीवर करने के लिए भारत में घुसपैठ करने की कोशिश  कर रहे थे। दो दिन पहले ही सीमा सुरक्षा बल ने वाघा बार्डर पर दो भारतीय तस्करों से दो किलो हेरोइन जब्त करके दोनों को गिरफ्तार किया था।  सवाल उठता है कि सीमा पर कडी निगरानी और फ्लडलाइट्स के बावजूद नशीली वस्तुओं की तस्करी  क्योंकर  बदस्तूर जारी है? जाहिर है “ सुरक्षा बलों की संलिप्तता" के बगैर ऐसा मुमकिन नहीं है। पंजाब पुलिस के निलंबित डीएसपी जगदीश  सिंह भोला की गिरफ्तारी और उसकी ड्रग रेकेट में सक्रिय संलिप्तता ताजा मिसाल है। इतना ही नहीं इस  मामले में राज्य के रसूखदार मंत्री का नाम भी उछाला गया। यही वजह है कि लाख प्रयासों के बावजूद नशीली वस्तुओं की तस्करी रुक नहीं रही है। पंजाब में हर रोज हेरोइन के औसतन 355 पेकेट इधर से उधर किए जाते हैं। नशीली वस्तुओं का  सालाना कारोबार 2000 करोड को पहुंच गया है। राज्य के लगभग 74 फीसदी युवा  नशीली वस्तुओं का सेवन करते हैं। पंजाब में युवाओं को नशे  ने किस कद्र जकड रखा है,  आंकडे इस बात के गवाह हैं। 2014 में जून से दिंसबर के दौरान राज्य के नशा  मुक्ति केन्द्रों में तीन लाख तीस हजार नशेडिए पंजीकृत किए गए थे। पिछले कुछ सालों से पंजाब में अफीम और भूकी (पॉपी हस्क) की जगह हेरोइन की खपत में खासा इजाफा हुआ है। अफीम और भूकी को चोरी-छिपे राज्य में भी ही उगा लिया जाता था अथवा पडोसी राज्य राजस्थान से खरीदा जाता था। राजस्थान में भूकी के वेंड जगह-जगह मिलते हैं। राजस्थान उच्च न्यायालय ने जुलाई 2015 में राज्य में चलाए जा रहे भूकी बिक्रय केद्रों को बंद करवा दिया था। मगर बाद में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले पर स्थगन आदेश  जारी करने से भुकी बिक्रय केन्द्र फिर खुल गए। युवाओं में हेरोइन की लत पडने के बाद से इसकी तस्करी काफी ज्यादा बढी है। पंजाब की पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान के गोल्डन ट्राइएंगल से निकटता के कारण राज्य नशीली वस्तुओं की तस्करी का ट्रांजिट केन्द्र है। यह  ट्राइएंगल अफीम, गांजा और चरस के लिए भी कुख्यात रहा है और विदेशी  मार्केट में नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए भी भारतीय मार्ग  को अपनाया जाता रहा है। पिछले कुछ समय से इस  ट्राइएंगल में ईरान की जगह भारत का नाम आया है क्योंकि अफगानिस्तान और पाकिस्तान से विदेशों क़ो  नशीली वस्तुओं की तस्करी बरास्ता भारत से की जा रही है।  इसी वजह पंजाब में नशीली वस्तुओं की तस्करी बदस्तूर जारी रही है। शास्त्रों में कृष्ण  की द्धारका नगरी का शराब की लत से लुप्तप्राय हो जाने का वर्णन है। और जिस तरह पंजाब के युवा तेजी से नशे  की गर्त में जा रहे हैं, उसका ख्याल करते हुए वह दिन दूर नहीं जब पंजाब का भी द्धारका जैसा हश्र हो सकता है। पंजाब में नशे  को लेकर कुछ सनसनीखेज तथ्य भी सामने आए हैं। पहला और अहम तथ्य है कि ज्यादातर नशेडी ग्रामीण इलाकों से हैं और वे अपेक्षाकृत संभ्रात परिवार से संबंध रखते हैं। दूसरा यह कि नशा  अधिकतर इजेक्टेबल तरीकों से किया जा रहा है जो कि स्वास्थय के लिए और भी ज्यादा खतरनाक है। पंजाब को देश  का खुशाहल और प्रगतिशील राज्य  माना जाता है मगर नशे  की लत ने राज्य की जडें खोखली कर दी हैं। नशे  की समस्या आतंक से भी अधिक खतरनाक है। आतंकियों से लडा जा सकता है मगर नशे  में डूब रहे अपने युवाओं से नहीं लडा जा सकता। युवा शक्ति देश  की अमूल्य पूंजी होती है और इसे इस तरह जाया नहीं किया जा सकता। नशीली  वस्तुओं की तस्करी आतंकियों का प्रमुख फंडिंग स्त्रोत भी  है। बहरहाल, पंजाब में अगले साल  होने वाले विधानसभा चुनाव में नशे  की समस्या प्रमुख चुनाव मुददा होने जा रहा है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

Use Wonderful Homemade Toothpaste And Be Happy

We used to rub our teeth and gums with a desi paste made of turmeric mixed with salt and mustard oil . And believe me, this wonderful paste  took care of  my all dental problems. Ever since, the paste was replaced by tooth paste made of harmful chemicals, I had to face dental problem after problem.  Almost all tooth pastes carry  Sodium Fluoride, Triclosan, Sodium Lauryl Sulfate, Propylene Glycol and DEA. Dentists trumpet Fluoride  builds strong, healthy teeth. However, in reality sodium fluoride is also found in rat poisons and industrial pesticides. According to the Akron Regional Poison Center, ingesting 1/10 of an ounce of fluoride can kill  adult. Ingesting even a small amount of sodium fluoride may cause nausea, vomiting and diarrhea. Yet despite its dangers, sodium fluoride continues to be a staple in all leading brand of toothpaste. Again, the Triclosan supplements many toothpaste brands. Unfortunately, the United States Environmental Protection Agency (EPA) classifies triclosan as a pesticide, stating it poses a risk to both human health and the environment. Added as a detergent and cleansing agent, sodium laurel sulfate and its cousin sodium laureth sulfate pose a wide range of potential health risks.  And similarly, Propylene Glycol an active component in antifreeze acts as a wetting agent and surfactant in toothpaste. Consumers find diethanolamine, or DEA, in products that foam toothpaste disrupts hormones and forms cancer-causing nitrates., repeated skin exposure to DEA can lead to increased risk of liver and kidney cancers. All theses hazardous  effects of tooth paste have been pointed out  and listed in all health guides. Why not to warn users of harmful effects of chemicals used in tooth paste the way they are being statutory mandated in case of tobacco products? In India we not very health conscious and leave day-to-day serious problems to super power or  kismat-fate. The super qualities of   turmeric have been recognized World wide.  To take care of your dental problems mix one tea spoon  of turmeric with  half spoon of salt. Add mustard oil to make a paste. Rub the teeth and gums with this paste twice daily. It will work wonders to your dental problem. It also.brighten your teeth pearly whites.
Former Miss USA Susie Castillo swears by her recipe for homemade toothpaste, which includes turmeric powder. Although turmeric is known for its staining prowess, it is commonly  used to whiten teeth – presumably it’s not in contact with the enamel long enough to change the color.You can also sprinkle some on your commercial or other homemade toothpaste and brush as usual. A simple turmeric paste  can also heal mouth  ulcers. Here are some remedies:

Anemia: Everyday take a dose of 1 tsp of turmeric juice mixed with honey. Turmeric Ayurvedic Use

Asthma: Boil 1 cup of milk with 1 tsp of turmeric powder. Drink warm.

Burns: Mix 1 tsp of turmeric with 1 tsp of aloe gel and apply to burnt area.

Conjunctivitis: Mix 1 tbsp of crushed, raw turmeric in 1/3 cup of water. Boil and sieve. 2–3 drops of this mixture may be used in each eye up to 3 times per day.

Diabetes: ½–1 tsp of turmeric should be taken 3 times a day.

Diarrhea: Take ½ tsp of turmeric powder or juice in water, 3 times per day.

Pain :Mix 1 tsp of turmeric and 2 tsp of ginger with water to make a paste. Spread over a cloth, place on the affected area and bandage. Add 1 tsp of turmeric to 1 cup of warm milk and drink before bed.

















शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

अब होगा क्रिकेट का उद्धार ?

                                               अब होगा क्रिकेट का उद्धार ?

अततः दुनिया के समृद्धतम भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड(बीसीसीआई) का काया पलट साफ-साफ नजर आ रहा है। और इस बार भी यह क्रांतिकारी पहल न्यायपालिका को ही करनी पडी है। जो काम सरकार और क्रिकेट के धुरंधर खिलाडी लबे समय से नहीं कर पाए, सर्वोच्च न्यायालय ने वह कुछ ही महीनों में कर दिखाया है।  वीरवार को सर्वोच्च न्यायालय ने बीसीसीआई दो टूक शब्दों में निर्देश  दिए कि लोढा समिति की सिफारिशों  को अविलंब लागू किया जाए। न्यायालय ने इसके लिए बीसीसीआई को 3 मार्च तक का समय दिया है। इस दिन इस मामले की अगली सुनवाई होनी है, इसलिए तब तक बीसीसीआई को  लोढा समिति की सिफारिशों  को लागू करने वाले एक्शन  प्लान को अदालत में पेश  करना होगा। वीरवार को बीसीसीआई के वकील ने मामले को लटकाने की पूरी कोशिश  की और बीसीसीआई की लीगल कमेटी की सात फरवरी को प्रस्तावित बैठक तक इंतजार करने की गुहार लगाई। मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस टी एस ठाकुर और जस्टिस फकीर मोहम्मद इब्राहीम कलीफुल्ला की पीठ नहीं मानी और कहा कि लोढा समिति की रिपोर्ट  एकदम सटीक एवं सुधारवादी है। रिपोर्ट  को देश  के सर्वाधिक प्रतिष्टित  न्यायाधीश  की अध्यक्षता में तैयार किया गया है और सर्वोच्च न्यायालय चाहता है कि बीसीसीआई इस पर अक्षरश : अमल करे। देश  की सर्वोच्च न्यायालय का आदेश  है, इसलिए बीसीसीआई को मानना ही पडेगा और अगर सिफारिशे  लागू हो जातीं हैं तो भारत में क्रिकेट के खेल में क्रांतिकारी बदलाव आना तय हैं। देश  में क्रिकेट के खेल को कंट्रोल करने के लिए बनाई गई बीसीसीआई में गैर क्रिकेट सियासी लोगों, अफसरों और उधोगपतियों का दबदबा रहने के कारण यह खुद ही कंट्रोल से बाहर हो गई थी। जिन लोगों ने जीवन में कभी बल्ला तक नहीं पकडा, वे बीसीसीआई को चला रहे हैं। बार-बार वही लोग बीसीसीआई पर कुंडली मार कर बैठे हुए हैं। जाहिर है इन हालात में क्रिकेट का सुधार होने से रहा। हालात से तंग आकर मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा। न्यायालय ने बीसीसीआई में सुधारात्मक उपाय सुझाने के लिए देष के पूर्व मुख्य न्यायाधीश  जस्टिस आर एम लोढा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति का गठन किया। 4 जनवरी को लोढा समिति ने न्यायालय को अपनी रिपोर्ट दी। लोढा समिति ने बीसीसीआई में आमूल-चूल परिवर्तन के सुझाव दिए हैं। समिति की अहम सिफारिषों में बीसीसीआई को आरटीआई के अंर्तगत लाना शामिल है। इससे बीसीसीआई की कार्यशैली में पारदर्शिता  आएगी। मंत्रियों और अफसरों को बीसीसीआई से बाहर रखकर समिति ने क्रिकेट से जुडे अनुभवी खिलाडियों के लिए मार्ग  प्रशस्त किया है। अपने पद और रसूख का इस्तेमाल करके मंत्री-नौकरशाहों ने देश  के खेल संगठन को सियासी अखाडा बना रखा है।  अध्यक्ष के लिए अधिकतम दो साल की टर्म तय किए जाने से बीसीसीआई पर व्यक्ति विशेष  का एकाधिकार नहीं रहेगा। बीसीसीआई के पदाधिकारियों के लिए अधिकतम दो टर्म  रखने  से सालों से धमा-चौकडी मचाने वालों पर अकुंश  लगेगा। सट्टे को वैध बनाने की सिफारिष पर कुछ हलकों में असहमति हो सकती है मगर समिति ने सभी पहलुओं पर गौर करने की बाद ही ऐसी सिफारिश  की है। कानूनन प्रतिबंध और पुलिस की सख्ती के बावजूद देश  मे क्रिकेट सट्टा धडल्ले से खेला जाता है। इस स्थिति में सट्टे को वैध बनाने से इस अवैध धंधे से जुडे नकारात्मक परिणामों से बचा जा सकता है। आईपीएल के लिए अलग गर्वनिंग बॉडी बनाए जाने से इस मनी-मिंटिंग प्रतियोगता को और ज्यादा कमाऊ बनाया जा सकता है। कुल मिलाकर, लोढा समिति की सिफारिशे  क्रिकेट के लिए रामबाण साबित हो सकती है। भारत में गांव-गांव, गल्ल-गल्ली क्रिकेट का जनून है और हर बच्चा, युवक सचिन तेंडुलकर और विराट कोहली बनने का सपना पालता है।  इस सपने को साकार कराने के लिए  क्रिकेट को फिर से “भद्र लोगों“  की गेम बनाया जाना अनिवार्य  है।

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

Modi Govt Move To Alter FSA May Boomerang

 राष्ट्रीय  खाद्य सुरक्षा कानून में मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित  बदलाव से संप्रग सरकार का महताकांक्षी कार्यक्रम अपने मूल मकसद से भटक सकता है। राष्ट्रीय  खाद्य सुरक्षा कानून एक्ट (एफएसए) बनाकर मनमोहन सिंह सरकार ने देश  के हर व्यक्ति को दो वक्त के भरपेट भोजन की व्यवस्था की थी। तीन साल पहले पारित राष्ट्रीय  खाद्य सुरक्षा एक्ट जुलाई 2013 से लागू भी हो गया था। इस एक्ट के तहत देश  की लगभग दो-तिहाई आबादी को सस्ते में खाद्यान्न मुहैया कराना था। एफएसए के तहत सार्वजनिक वितरण व्यवस्था (पीडीएस) से हर परिवार को प्रति सदस्य 5 किलो ग्राम खाद्यान्न सस्ती दरों पर दिया जा रहा   है। चावल तीन रु किलो, गेंहूं 2 रु किलो और दाले एक रु किलो के दाम पर बेचा जा रहा है। गर्भवती महिलाओं और कुपोषित बच्चों को अलग से सस्ते में तीन वक्त का खाद्यान्न दिया जाता है । दुनिया की विशालतम गरीबी उन्मूलन इस योजना पर सरकार को 1. 25 लाख करोड रु अथवा सकल घरेलू उत्पाद का 1.5 फीसदी और सरकार के बजट का 8 फीसदी  खर्च  करना पड रहा  है।  कांग्रेस शासित असम सरकार ने 14 दिसंबर, 2015 से इस एक्ट को लागू कर दिया है। ओडीशा  की बीजू जनता दल सरकार 17 नवंबर, 2015 से ही खाद्य सुरक्षा एक्ट को लागू कर चुकी है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और छतीसगढ एफएसए को संजीदगी से लागू कर चुकी है।  लेकिन लगभग 20  राज्य इस योजना को लागू नहीं कर पाए हैं । गत सोमवार को सुप्रीम कोर्ट  ने गुजरात को  एफएसए लागू नहीं करने पर फटकार भी लगाई। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस  राष्ट्रीय  सुरक्षा कार्यक्रम  का आकलन करने के लिए वाजपेयी सरकार में खाद्य मंत्री रहे शांता कुमार की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। शांता कुमार समिति ने 21 जनवरी को अपनी रिपोर्ट  सरकार को सौंपी थी। समिति ने देश  के फूड बाउल राज्यों में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) आधारित  दोषपूर्ण वितरण व्यवस्था को बदलने और गरीबतम परिवारों को छोडकर अन्यों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से आधे दाम पर खाद्यान्न मुहैया कराने की सिफारिश  की है। सब्सिडी को रसोई गैस की तरह सीधे पात्र व्यकित के बैंक खाते में जमा करने की सिफारिश भी की गई है । बतौर केन्द्रीय खाद्य मंत्री  शांता  कुमार एफसीआई में व्याप्त भ्रष्टाचार  के खिलाफ जंग लड चुके हैं और वे इस सरकारी उपक्रम की कार्यशैली से खासे नाखुश  भी  थे।  अगर इन सिफारिशों  को लागू किया जाता है, तो इस योजना पर  होने वाले खर्च में काफी बचत हो सकती है। मोदी सरकार भी यही चाहती है। बदलाव के लिए सरकार को मौजूदा कानून में संशोधन करना पडेगा और इसके लिए संसद में बिल लाना पडेगा। ताजा संकेत यही हैं कि सरकार 2013 के खाद्य सुरक्षा एक्ट में संशोधन के लिए जमीन तैयार कर रही है। बढते राजकोशीय घाटे के मद्देनजर  मोदी सरकार विभिन्न सब्सिडियों पर होने वाले खर्च  को कम करना चाहती है और फूड सब्सिडी पर होने वाला खर्च सभी परिव्ययों में सर्वाधिक है। सरकार के राजकोषीय घाटे में 18 फीसदी हिस्सा फूड सब्सिडी का है।  अंतरराष्ट्रीय  रेंटिग एजेंसी मूडी का आकलन है कि पिछले आठ सालों में सरकार का फूड सब्सिडी खर्चा हर साल 20 फीसदी बढा है। मोदी सरकार ने सब्सिडी का बोझ घटाने के लिए भी एक समिति बना रखी है। यह समिति भी फूड सब्सिडी को कम करने की सिफारिश  कर सकती है। तथापि, मोदी सरकार के लिए खाद्य सुरक्षा एक्ट में संशोधन करना इतना आसान नहीं है। कांग्रेस इस तरह के किसी भी संशोधन का जमकर विरोध कर सकती है। मोदी सरकार को 2013 में पारित भूमि अधिग्रहण बिल में  प्रस्तावित संशोधनों  को भी कांग्रेस के मुखर विरोध के कारण वापस लेना पडा था। फूड सब्सिडी एक्ट में संशोधनों को गरीब विरोधी माना जा सकता है। असम में अप्रैल-मई माह में विधानसभा चुनाव होने है और इस राज्य में खाद्य सुरक्षा एक्ट लागू है। कांग्रेस शासित असम में भाजपा बदलाव की उम्मीद कर रही है और सत्ता की प्रमुख दावेदार है। इन बात का ख्याल करते हुए खाद्य  सुरक्षा एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव उलटा भी पड सकता है। भाजपा इस सच्चाई से बखूबी परिचित है कि समकालीन सरकार व्यावहारिक से नहीं बल्कि  वोट आधारित राजनीतिक फैसलों से ही  चलाई जाती है।

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

जीका संक्रमण का खतरा

                                             जीका संक्रमण का खतरा

एडस, एबोला, स्वाइन एवं बर्ड फ्लू जैसी घातक रोगों से जूझने के बाद अब जीका वायरस ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। बेहतरीन स्वास्थय सेवाओं और उपचार के लिए विख्यात अमेरिका के टेक्सास में मंगलवार को पहला जीका संक्रमण का मामला सामने आया। दल्लास काउंटी के एक अधिकारी के अनुसार महिला से यौन संबंध बनाने पर पीडित व्यक्ति जीका से संक्रमणित हुआ है। अभी तक यह माना जा रहा था कि जीका केवल मच्छर (डेंगू फैलाने वाला  एडस एजिप्ती) के काटने से ही फैलता है। अमेरिका में यौन संबंध (सेक्सुअली ट्रांसमेटिड) से जीका संक्रमण का यह पहला मामला है। जीका मूलतः  जन्म से मस्तिश्क संबंधी विकार ( न्यूरोलॉजिकल बर्थ डिसआर्डर) रोग है। जीका से संक्रमणित ( मिक्रोसिफेली) बच्चे का जन्म से ही सर का आकार सामान्य से छोटा होता है और उसके ब्रेन का विकास भी अपेक्षाकृत कम होता है। जीका जन्म से बच्चे की विकलांग बना देता है । यौन संबंधों के माध्यम से  व्यस्कों मे जीका के फैलने से वैज्ञानियों एवं चिकित्सकों के समक्ष एक नया पहलू सामने आया है। जीका का मच्छरो के अलावा यौन संबंधों के माध्यम से फैलना चिंता का विषय  है। एडस भी इसी तरह से फैला था। वैसे अब तक के मामलों से यह भी पता चलता है कि जीका वायरस मच्छर के काटने से संक्रमणित पुरुश अथवा महिला से यौन संबंध बनाने के बाद ही फैलता है। वेन्जुअला की रहने वाली एक महिला से यौन संबंध बनाने पर  टेक्सास का व्यक्ति जीका से संक्रमणित हुआ। महिला  जीका से पीडित थी। दक्षिण अमेरिकी देश   वेनेजुअला पहले से ही जीका से पीडित है। 2015 में ब्राजील में जीका ने अपना कहर ढाया था। पहली बार ब्राजील में जीका वायरस से नवजात शिशुओं के संक्रमणित पाए जाने पर वहां दहशत फैल गई। सरकार ने  जीका वायरस के प्रकोप से बचाने के लिए 2 लाख सुरक्षा कर्मियों को घर-घर भेजकर लोगों को सजग किया। चार लाख गर्भवती महिलाओं को जीका फैलाने वाले मच्छरों से बचाने के लिए मच्छर-मार दवाएं (मोस्किवटो रेपेलेंट) बांटी गई। तब ब्राजील से जीका का वायरस आस्ट्रेलिया पहुंच गया लेकिन सरकार द्वारा तुरंत एतिहातन उपाय किए जाने से यह उत्तरी कवींसलैंड तक ही सीमित रहा। पिछले साल जीका के इटली में चार, ब्रिटेन में तीन और स्पेन में दो मामले पाए गए।  अब तक जीका लगभग  तीस देशों  को अपनी चपेट में ले चुका है। मंगलवार को  विश्व स्वास्थ्य  संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने जीका पर चेताया  कि महाअमेरिकी को चपेट में लेने के बाद यह वायरस अफ्रीका और एशिया में भी फैल सकता है। डब्ल्यूएचओ  को आशंका है कि महाअमेरिका (उत्तरी और दक्षिण) में जीका 40 लाख लोगों को सक्रमणित कर सकता है। गरीब और विकासशील देशों  में जीका वायरस के प्रकोप का अधिक खतरा है। गरीब देशों  में मच्छरों का प्रकोप कहीं ज्यादा रहता है और एबोला की तरह अफ्रीका इसकी चपेट में आ सकता है।  मार्च 2014 से एबोला ने पश्चिम  अफ्रीका को बुरी तरह से जकड रखा है। इस जनवरी की 12 तारीख को सिएरा लियोन में दो महिलाओं की एबोला से मौत हो गई थी।   अफ्रीका में लोगों के एबोला से मारे जाने का सिलसिला रुके नहीं रुक रहा है जबकि  (डब्ल्यूएचओ) स्थानीय सरकार के साथ हर संभव एतिहातन उपाय कर रहा है। बहरहाल, भारत अभी जीका के प्रकोप से बचा हुआ है और सुखद समाचार यह है कि हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक इंटरनेषनल के वैज्ञानियों ने जीका वायरस का तोड निकाल लिया है। इस संस्था के पास जीका वायरस का एक नहीं, बल्कि दो वेक्सिन है और कंपनी ने इनका पेंटेट भी कर लिया है। लेकिन अभी जीका के वेक्सिन का पूरी तरह से ट्रायल होना बाकी है और इसमें काफी समय लग सकता है। कंपनी का दावा है कि अगर सरकार अनुमति दे तो वह चार माह में इस वेक्सिन की दस लाख खुराक तैयार कर सकती है।  कंपनी के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। अमूमन, निजी क्षेत्र ऐसे वेक्सिन तैयार करने में आगे नहीं आता जिनमें मोटे लाभ की ज्यादा गुजाइंश  न हो। यह उम्मीद ही पर्याप्त है कि देश  के पास जीका का तोड है।



बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

कश्मीर में अनिश्चतता के बादल

                                         

लोकप्रिय सियासी नेता के राजनीतिक क्षितिज से चले जाने पर सियासी हालात कैसे बदल सकते हैं, जम्मू-कश्मीर  में करीब एक माह से व्याप्त राजनीतिक  अनिश्चतता इस बात का प्रमाण है। एक माह पहले तक राज्य में लोकप्रिय सरकार थी मगर अब राज्यपाल  शासन है। जम्मू-कश्मीर  देश  का अति संवेदनशील और सीमावर्ती राज्य  है। राजनीतिक शू न्यता राज्य के नाजुक हालात को और ज्यादा बिगाड सकते हैं। 2015 में सपन्न विधानसभा चुनाव में अलगाववादियों की धमकी के बावजूद राज्य की जनता ने चुनाव में बढचढ कर हिस्सा लिया था और लोकप्रिय सरकार के पक्ष में फतवा दिया था। त्रिशंकू जनादेश  के कारण पीडीपी और भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई। इस जनवरी की 7 तारीख को मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का अकस्मात निधन होने के बाद से सत्तारूढ दल पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी)  भाजपा से  गठबंधन जारी रखने पर खासी दुविधा में है। पार्टी तय नही कर पा रही है कि सरकार बनाने के लिए भाजपा का सहयोग लिया जाए या नहीं। पीडीपी के अधिकांश  विधायक और सांसद भाजपा से गठबंधन के सख्त खिलाफ हैं। मुफ्ती के निधन के बाद राज्य में नई सरकार बन ही नहीं पाई हालांकि भाजपा गठबंधन जारी रखने के पक्ष में थी और पार्टी  महबूबा मुफ्ती को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तैयार थी। मुफ्ती के निधन के बाद अब पार्टी का सारा दारोमदार  महबूबा मुफ्ती पर है और पार्टी के सभी विधायक उन्हें ही मुफ्ती असली वारिस  मानते हैं। पर महबूबा अपने पिता की तरह राजनीति की मंझी हुई खिलाडी नहीं है। राज्य में व्याप्त अलगाववादी और हिंसक माहौल उन्हें जल्दबाजी में कदम उठाने की इजाजत भी नहीं देते हैं। अपनी पिता से अलग महबूबा को सत्ता की बयार के संग बहना गवारा नहीं लग रहा है।  मुफ्ती मोहम्मद सईद इस कौशल में माहिर थे। 2015 में सपन्न विधानसभा चुनाव में त्रिशंकू जनादेश  के कारण  मुफ्ती ने भाजपा के साथ सरकार बनाने में जरा भी देरी नहीं की। चुनाव में मुफ्ती की पीडीपी को सबसे अधिक सीटें मिलीं थी। मुफ्ती अस्सी के दशक में  भाजपा के समर्थन वाली वीपी सिंह सरकार में काम कर चुके हैं। 1989 में वीपी सिंह की जनता दल सरकार में वे गृहंमत्री थे। वीपी सिंह सरकार को भाजपा का बाहरी समर्थन था। इस दौरान उनकी बेटी रुबैया सईद का आतंकवादियों ने कश्मीर  मे अपहरण कर लिया था। रुबैया की रिहाई के बदले तत्कालीन सरकार को पांच खूंखार आतंकियों को रिहा करना फ्डा था। भाजपा ने इसका का जबरदस्त विरोध किया था।  1999 में मुफ्ती ने अपनी अलग पार्टी पीडीपी बनाई और 2002 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटें हासिल करने के बाद कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। मुफ्ती की पार्टी का गठन ही अलगाववादियों को राष्ट्रीय  मुख्यधारा में  जोडने के मकसद से किया गया और पार्टी आज भी इस स्टैंड पर कायम है। इसके उलट भाजपा अलगाववादियों से सख्ती से निपटने के पक्ष में है, उनसे बातचीत करना तो दीगर रहा। पीडीपी राज्य को विशेषतौर पर मिले संवैधानिक दर्जे (अनुच्छेद 370) क़ो बनाए रखने की प्रबल पैरवीकार है जबकि भाजपा इस अनुच्छेद को निरस्त करने के पक्ष में है। भाजपा को मुस्लिम विरोधी माना जाता है और भाजपाई अक्सर मुसलमानों के खिलाफ आग उागलते है। पीडीपी कश्मीर  घाटी में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व करती है। और भी कई मुद्दे हैं जिन पर दोनों दलों में खासा मतभेद है। नीतियों ओर विचारधारा में भारी मतभेद के बावजूद भाजपा के साथ सरकार बनाने पर पीडीपी को “अवसरवादी“ माना गया। यही चिंता महबूबा मुफ्ती को सताए जा रही है। भाजपा के साथ सरकार बनाने से पीडीपी का ज्यादा नुकसान हो रहा है। मौजूदा स्थिति में अगर पीडीपी भाजपा के साथ सरकार बनाती है, तो पार्टी का घाटी में जनाधार सिकुड सकता है। महबूबा मुफ्ती अभी युवा हैं और राजनीति में उन्हें लंबा सफर तय करना है। अवसरवादिता और सत्ता की भूख उनके लंबे राजनीतिक कैरियर को लकवा मार सकती है। मध्यावधि चुनाव एक विकल्प हो सकता है और इस स्थिति में पीडीपी को मुफ्ती के निधन से उपजी सहानुभूति का लाभ भी मिल सकता है। मगर इससे राज्य पर चुनाव का खामखवाह का बोझ पडेगा। फिर से त्रिशंकू जनादेश  भी मिल सकता है।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

Prime Minister's "Man Ki Baat"

                                                               मन की बात                     


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को इस साल पहली बार देश  के जनमानस से “मन की बात“ की और देश  के समक्ष मुंह फैलाए खडी समस्याओं की चर्चा  की।  प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेन्द्र मोदी लगातार आकाशवाणी से प्रसारित कार्यक्रम में लोगों से “मन की बात“ कह रहे हैं। देश  का प्रधानमंत्री अगर अपने देशवासियों से “ज्वलंत मुद्दों“ पर “मन की बात“ साझा करते हैं, तो उसका असर होना निश्चित  है।   आकाशवाणी षहरी क्षेत्रों में भले ही अधिक नहीं सुना जाता हो मगर दूर-सदूर और देहातों में आज भी  यह खासी  लोकप्रिय है। “मन की बात“ को शहर और देहातों दोनों में बराबर सुना जा रहा है। मुंबई और चेन्नई समेत छह बडे शहरों में इस कार्यक्रम की लोकप्रियता के आकलन के लिए कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार 67 फीसदी लोग प्रधानमंत्री की “मन की बात“ को पूरी  शिद्दत से सुनते हैं। आकाशवाणी से “मन की बात“ कार्यक्रम शुरु होने के बाद  इसके राजस्व (विज्ञापन) में भी खासा इजाफा हुआ है। कार्यक्रम की लोकप्रियता का आलम यह है कि “मन की बात“ विज्ञापन के मामले में आकाशवाणी पर क्रिकेट के ”आंखों देखा“ (लाइव कमेंट्री)“ जैसे लोकप्रिय कार्यक्रमों से कही अधिक महंगा है।  27 जनवरी 2015 को प्रसारित  35 मिनट के “मन  की बात“ कार्यक्रम को 14.70 करोड लोगों ने सुना था। तब इस कार्यक्रम में अमेरिका के राष्ट्रपति  बराक ओबामा भी शरीक हुए थे।  यह अपनेआप में एक रिकार्ड  है। आकाशवाणी के अलावा दूरदर्शन  नेशनल और दूरदर्शन  न्यूज भी “मन  की बात“ का लाइव प्रसारण करते हैं। 3 अक्टूबर, 2014 को दशहरे पर प्रधानमंत्री के “मन की बात“ का पहली बार प्रसारण हुआ था। अब तक “मन की बात“ के 15 प्रसारण हो चुके हैं और इसकी वेबसाइट पर 61,000 से ज्यादा आइडियाज मिल चुके हैं। इसके लिए 1.43 लाख ऑडियो  भी मिल चुके हैं। मगर वेब साइट बहुत अच्छा रिसपांस का न आना कार्यक्रम के लिए थोडा चिंता का विषय हो सकता  है। आकाशवाणी का पोस्ट बॉक्स 111 इस कार्यक्रम पर मिलने वाली चिठठियों के लिए खास तौर पर आरक्षित है। मगर इस मामले में कोई अच्छा रिसपांस नहीं है। दिसंबर, 2014 को  “मन की बात“ कार्यक्रम को सबसे ज्यादा 5972 चिठ्ठियां मिलीं थीं। उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट आ रही है। आनलाइन रिसपांस कहीं ज्यादा है। बहरहाल, देश  के प्रधानमंत्री ने पहली बार सकारात्मक पहल शुरु की है और इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रधानमंत्री लोगों को सरकारी कार्यक्रमों से जोडने का प्रयास कर रहे  हैं। इसके परिणाम भले ही बडे पैमाने पर न हों मगर कहते हैं हर नेक काम की  शुरुआत कितनी भी छोटी क्यों न हो, इसका अंजाम बहुत बडा होता है। देश  को आज जिस तरह से गंभीर समस्या-दर-समस्या से दो चार होना पड रहा है और समकालीन सियासी नेताओं की क्रेडिबिलिटी  जिस कद्र खराब है, उसका ख्याल करते हुए प्रधानमंत्री का यह प्रयास सराहनीय है और इसके शर्तिया अच्छे परिणाम सामने आने वाले हैं। “मन की बात“ कार्यक्रम में जनमानस से जुडे मुद्दों पर चर्चा की जाती है। “मन की बात“ में अब तक मोदी  स्वच्छता, ड्रग, किसानों की समस्याएं जैसी ज्वलंत मुद्दों की चर्चा  कर चुके हैं। इस कार्यक्रम का जनता पर काफी असर भी पडता है। यह प्रधानमंत्री के मन की बात कार्यक्रम का ही असर है कि पूरे देश  में लोग-बाग अब आस-पास  सफाई का खास ख्याल रख रहे हैं। “मेक इन इंडिया“ को सफल बनाने के लिए प्रधानमंत्री का खाद्दी को मुख्य मुद्दा बनाया है। दोनों ही कार्यक्रम राष्ट्रपिता  महात्मा गांधी से प्रेरित हैं।  स्वच्छता और खाद्दी (स्वदेषी वस्त्र) महात्मा गांधी की स्वत्रंतता आंदोलन के केन्द्रबिंदु रहे हैं। शुरू में महात्मा  गांधी के स्वच्छता और स्वदेशी  कार्यक्रमों  का फिरंगियों ने मजाक उड़ाया था मगर बाद में पूरी दुनिया में इनकी सराहना  की गई।  देश  को सामाजिक-आर्थिक प्रगति के पथ पर आगे ले जाने के लिए प्रधानमंत्री की “मन की बात“ बदलाव लाने में अहम भूमिका निभा सकता  है।