बजट पूर्व परिदृश्य
सोमवार को पेश होने वाले मोदी सरकार के तीसरे बजट से पहले अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर आर्थिक सर्वेक्षण ने “गुलाबी (रोजी) तस्वीर पेश की है। शुक्रवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण का आकलन है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं। 2016-17 के दौरान अर्थव्यवस्था 7 और 7.75 फीसदी की दर से ग्रो करेगी। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भी यही आकलन है। यानी वैश्विक मंदी का फिलहाल भारत पर कोई असर नहीं है। सर्वेक्षण का यह भी आकलन है कि बढती फूड सब्सिडी ओर वेतन आयोग की सिफारिशों के बोझ के बावजूद राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का चार फीसदी से कम रहने का अनुमान है। वर्तमान वित्तीय वर्ष (2015-16) के लिए सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.99 फीसदी तक सीमिति रखने का लक्ष्य रखा है। वैसे अर्थव्यवस्था की तंदुरुस्ती के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का साढे तीन फीसदी से नीचे रहना चाहिए। तेल की कीमतें अगर इसी तरह गिरती रहीं, तो इस लक्ष्य को भी जल्द ही हासिल किया जा सकता है। राजकोषीय घाटे को जीडीपी से चार फीसदी से नीचे लाना वित्त मंत्री अरुण जेटली की बडी उपलब्धि मानी जा सकती है। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि घाटे को कम करने में वित्त मंत्री के वित्तीय कौशल से कहीं ज्यादा तेल की कीमतें में लगातार गिरावट की बहुत बडी भूमिका है। इससे एक तरफ सरकार का आयात बिल कम होने से चालू खाता सुधरा है, तो दूसरी तरफ सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर चार बार एक्साइज डयूटी बढाकर खासी कमाई की है। न्याय का तकाजा तो यह था कि सरकार तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ जनता को देती। कीमतें बढने पर अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी कम करने की बजाय, वृद्धि का बोझ सीधे-सीधे जनता पर डाल सकती है, तो कीमतें गिरने पर भी ऐसा ही होना वाहिए। यानी गिरावट का पूरा लाभ उपभोक्ताओं को दिया जाना चाहिए। मगर सरकर ऐसा नहीं कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस समय तेल की कीमते 30 डॉलर बैरल के आसपास चल रही है। इस शताब्दी के शुरु में (2002-03) अंतराष्ट्रीय बाजार में जब तेल 30 डॉलर बैरल से नीचे बिक रहा था, भारत में पेट्रोल 30 रु और डीजल 18 रु लीटर के आसपास बेचा जा रहा था। और अब जब तेल की कीमतें फिर 30 डॉलर बैरल के स्तर पर आ गई हैं, भारत में पेट्रोल 60 और डीजल 45 रु लीटर बिक रहा हे। साफ है बाकी सारा पैसा सरकार की जेब में जा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण ने 2015-16 में सरकार के राजस्व में अच्छी-खासी वृद्धि की संभावना जताई है। सरकार का चालू खाता (करंट आकाउंट) भी जीडीपी के 1-1.5 फीसदी के आसपास है। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि मुद्रा-स्फीति पूरी तरह नियंत्रण में है और अगर स्थिति यही रही तो मार्च 2017 तक मुद्रा-स्फीति को 5 फीसदी तक लाने का लक्ष्य हासिल हो सकता है। 2016-17 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) मुद्रा-स्फीति 4.5 से 5 फीसदी के आसपास रहने की उम्मीद है। कमजोर रुपया थोडा चिंताजनक है मगर सकारात्मक मौद्रिक नीति से इसे मजबूत किया जा सकता है। सरकारी बैकों की खस्ता हालात को सुधारने के लिए वित्तीय सेक्टर में और ज्यादा लिक्विडिटी डालने की जरुरत है। आर्थिक सर्वेक्षण से वित्त मंत्री के बजट दर्शन का कुछ-कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण में व्यक्तिगत कर ढांचे के दायरे को मौजूदा 5 फीसदी से 20 फीसदी तक बढाने और रियायतों को फेज-आउट करने का सुझाव दिया गया है। कर ढांचे को सुदृढ और व्यापक बनाने के लिए जरुरी है कि रियायतों को सीमा में रखा जाए। आर्थिक सर्वेक्षण की खास बातों पर गौर करने के बाद यही निष्कर्ष निकलता है कि वित्त ंमंत्री करों अथवा शुल्कों में रियायतें देने की बजाए करों के दायरे को और ज्यादा व्यापक करेंगे और बजट का फोक्स उत्पादन बढाने पर रहेगा। केन्द्रीय कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार ज्यादा वेतन और पेंशन देना और खाद्यान्न, रासायनिक और फ्यूल सब्सिडी के लिए पर्याप्त व्यवस्था करना वित्त मंत्री के लिए चुनौती हो सकती है। सरकार के पास अपार साधन हैं और अगर इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं है।
सोमवार को पेश होने वाले मोदी सरकार के तीसरे बजट से पहले अर्थव्यवस्था की सेहत को लेकर आर्थिक सर्वेक्षण ने “गुलाबी (रोजी) तस्वीर पेश की है। शुक्रवार को संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण का आकलन है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स काफी मजबूत हैं। 2016-17 के दौरान अर्थव्यवस्था 7 और 7.75 फीसदी की दर से ग्रो करेगी। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का भी यही आकलन है। यानी वैश्विक मंदी का फिलहाल भारत पर कोई असर नहीं है। सर्वेक्षण का यह भी आकलन है कि बढती फूड सब्सिडी ओर वेतन आयोग की सिफारिशों के बोझ के बावजूद राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का चार फीसदी से कम रहने का अनुमान है। वर्तमान वित्तीय वर्ष (2015-16) के लिए सरकार ने राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.99 फीसदी तक सीमिति रखने का लक्ष्य रखा है। वैसे अर्थव्यवस्था की तंदुरुस्ती के लिए राजकोषीय घाटा जीडीपी का साढे तीन फीसदी से नीचे रहना चाहिए। तेल की कीमतें अगर इसी तरह गिरती रहीं, तो इस लक्ष्य को भी जल्द ही हासिल किया जा सकता है। राजकोषीय घाटे को जीडीपी से चार फीसदी से नीचे लाना वित्त मंत्री अरुण जेटली की बडी उपलब्धि मानी जा सकती है। मगर जमीनी सच्चाई यह है कि घाटे को कम करने में वित्त मंत्री के वित्तीय कौशल से कहीं ज्यादा तेल की कीमतें में लगातार गिरावट की बहुत बडी भूमिका है। इससे एक तरफ सरकार का आयात बिल कम होने से चालू खाता सुधरा है, तो दूसरी तरफ सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर चार बार एक्साइज डयूटी बढाकर खासी कमाई की है। न्याय का तकाजा तो यह था कि सरकार तेल की कीमतों में गिरावट का लाभ जनता को देती। कीमतें बढने पर अगर सरकार एक्साइज ड्यूटी कम करने की बजाय, वृद्धि का बोझ सीधे-सीधे जनता पर डाल सकती है, तो कीमतें गिरने पर भी ऐसा ही होना वाहिए। यानी गिरावट का पूरा लाभ उपभोक्ताओं को दिया जाना चाहिए। मगर सरकर ऐसा नहीं कर रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस समय तेल की कीमते 30 डॉलर बैरल के आसपास चल रही है। इस शताब्दी के शुरु में (2002-03) अंतराष्ट्रीय बाजार में जब तेल 30 डॉलर बैरल से नीचे बिक रहा था, भारत में पेट्रोल 30 रु और डीजल 18 रु लीटर के आसपास बेचा जा रहा था। और अब जब तेल की कीमतें फिर 30 डॉलर बैरल के स्तर पर आ गई हैं, भारत में पेट्रोल 60 और डीजल 45 रु लीटर बिक रहा हे। साफ है बाकी सारा पैसा सरकार की जेब में जा रहा है। आर्थिक सर्वेक्षण ने 2015-16 में सरकार के राजस्व में अच्छी-खासी वृद्धि की संभावना जताई है। सरकार का चालू खाता (करंट आकाउंट) भी जीडीपी के 1-1.5 फीसदी के आसपास है। आर्थिक सर्वेक्षण में यह भी बताया गया है कि मुद्रा-स्फीति पूरी तरह नियंत्रण में है और अगर स्थिति यही रही तो मार्च 2017 तक मुद्रा-स्फीति को 5 फीसदी तक लाने का लक्ष्य हासिल हो सकता है। 2016-17 में कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) मुद्रा-स्फीति 4.5 से 5 फीसदी के आसपास रहने की उम्मीद है। कमजोर रुपया थोडा चिंताजनक है मगर सकारात्मक मौद्रिक नीति से इसे मजबूत किया जा सकता है। सरकारी बैकों की खस्ता हालात को सुधारने के लिए वित्तीय सेक्टर में और ज्यादा लिक्विडिटी डालने की जरुरत है। आर्थिक सर्वेक्षण से वित्त मंत्री के बजट दर्शन का कुछ-कुछ अंदाजा लगाया जा सकता है। आर्थिक सर्वेक्षण में व्यक्तिगत कर ढांचे के दायरे को मौजूदा 5 फीसदी से 20 फीसदी तक बढाने और रियायतों को फेज-आउट करने का सुझाव दिया गया है। कर ढांचे को सुदृढ और व्यापक बनाने के लिए जरुरी है कि रियायतों को सीमा में रखा जाए। आर्थिक सर्वेक्षण की खास बातों पर गौर करने के बाद यही निष्कर्ष निकलता है कि वित्त ंमंत्री करों अथवा शुल्कों में रियायतें देने की बजाए करों के दायरे को और ज्यादा व्यापक करेंगे और बजट का फोक्स उत्पादन बढाने पर रहेगा। केन्द्रीय कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग के अनुसार ज्यादा वेतन और पेंशन देना और खाद्यान्न, रासायनिक और फ्यूल सब्सिडी के लिए पर्याप्त व्यवस्था करना वित्त मंत्री के लिए चुनौती हो सकती है। सरकार के पास अपार साधन हैं और अगर इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं है।






