बुधवार, 4 जुलाई 2018

लोकपाल पर लंगडी चाल ?

केन्द्र में भाजपा नीत राजग की सरकार हो अथवा कांग्रेस नीत संप्रग सरकार,  भ्रष्ट  व्यवस्था को नकेल डालने के प्रयासों को पूरी संजीदगी से लागू करने से हर सरकार बचती रही है। 2011 में समाजसेवी अन्ना हजारे और उनके समर्थकों  को लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए जितनी जद्दोजेहद करनी पडी थी, उससे कही ज्यादा मशक्कत समाज सुधारकों  को लोकपाल की नियुक्ति के लिए करनी पड रही है। 2011 के आंदोलन की बदौलत अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री तक बन गए हैं मगर अभी तक लोकपाल की नियुक्ति नहीं हो पाई है जबकि  लोकपाल बिल संसद में  2013 में ही पारित हो चुका है।  11 राज्यो में भी लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं हो पाई गै।  और दुखद स्थिति यह है कि लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति के लिए भी देश  की  शीर्ष  अदालत सुप्रीम कोर्ट को ही बार-बार निर्देश  देने पड रहे हैं। नामी वकील  प्रशांत  भूषण की एनजीओ “कॉमन काज“ 2014 से  लोकपाल की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट में लड रही है। कॉमन काज ने न्यायालय के निर्देश  के बावजूद लोकपाल की नियुक्ति नहीं करने के लिए केन्द्र सरकार के खिलाफ अवमानना कार्यवाही के लिए याचिका दायर कर रखी है।  सोमवार को इसी याचिका की सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को लोकपाल की नियुक्ति कब की जा रही है, इसकी संपूर्ण जानकारी दस दिन के भीतर देने के निर्देश  दिए। अप्रैल, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को विपक्ष के नेता की जगह किसी नामचीन विधिवेता नामजद करने का मार्ग  प्रषस्त कर दिया था। दरअसल, लोकपाल की नियुक्ति के लिए गठित पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, मुख्य न्यायाधीष के अलावा विपक्ष का नेता भी नामजद है। मौजूदा लोकसभा में विपक्ष का कोई अधिकृत नेता नहीं है। विपक्ष का अधिकृत नेता बनने के लिए संबंधित विपक्षी दल के पास लोकसभा की कुल 545 सदस्यों का कम-से-कम  10 फीसदी होना अनिवार्य है। मौजूदा लोकसभा में सबसे बडी पार्टी कांग्रेस के पास 44 सदस्य हैं और यह 10 फीसदी की अनिवार्यता को पूरी नहीं करती है। इसीलिए, कांग्रेस को अधिकृत विपक्षी दल नेता का दर्जा  नहीं मिल पाया है।  लोकपाल की नियुक्ति टालने के लिए  केन्द्र सरकार को अच्छा बहाना मिल गया था मगर सुप्रीप कोर्ट ने 2017 में साफ कर दिया था कि विपक्ष का अधिकृत नेता नहीं होने का बहाना बना कर लोकपाल की नियुक्ति टाली नहीं जा सकती। सरकार ने दस फीसदी की अनिवार्यता हटाने के लिए संषोधन का प्रस्ताव किया  तो  है मगर यह अभी संसद में लटका पडा है। इस स्थिति के  दृष्टिगत  न्यायालय ने ही सुझाव दिया था कि अधिकृत विपक्ष नेता नहीं होने  की स्थिति में किसी विधिवेता को नियुक्त किया जा सकता है। सरकार ने इसमें भी एक साल लगा   दिए। इस साल मई में केन्द्र ने न्यायालय को बताया कि नामचीन विधि विषेशज्ञ मुकुल रोहतगी को लोकपाल नियुक्ति पैनल का सदस्य बनाया गया है मगर इसके बावजूद अभी तक पैनल की बैठक नहीं हो पाई है। 2011 में अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन को भाजपा का भी समर्थन था और तब भगवा पार्टी अविलंब लोकपाल की नियुक्ति की सबसे बडी पैरवीकार थी। 2014 के लोकसभा चुनाव घोषणा पत्र में भी भाजपा ने लोकपाल की अविलंब नियुक्ति का वायदा किया था। यह बात पूरी दुनिया जानती है कि राजनीतिक दलों की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर होता है। चुनावी वायदों का क्या है, जितनी तेजी से किए जाते हैं, उतनी ही जल्दी भूला दिए जाते हैं मगर आज भी कुछ सच्चे एवं समर्पित नागरिक हैं, जो  देश  को गर्त में जाने से बचाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे है। इतिहास इस बात का गवाह है कि भारत ही नहीं, दुनिया का हर मुल्क ऐसे ही लोगों के समर्पण, दमखम और सच्ची  निष्ठा  से ही फलता-फूलता है।