मालदीव के राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार की जीत भारत में निरंकुश शासन के पैरवीकारों के लिए कडा सबक है। लोकतंत्र में जनता की आवाज को कानून और सत्ता की ताकत से भी नहीं दबाया जा सकता। भारत के घुर विरोधी और चीन समर्थक निवर्तमान राष्ट्रपति अब्दुला यामीन (पूरा नाम अब्दुला यामीन अब्दुल गयूम) को विपक्ष के उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने परास्त कर दिया है। सोलिह को भारत समर्थक माना जाता है। इस रविवार को सपन्न हुए राष्ट्रपति चुनाव के लिए श्रीलंका और मलेशिया में मतदान केन्द्र बनाए गए थे। मालदीव हिंद महासागर में लगभग चार लाख की आबादी वाला एक छोटा सा मुल्क है। अपनी ब्लू लैगून और व्हाइट तटों (बीचिच) के लिए जाना जाता है। कुल मिलाकर 1190 द्वीप हैं मगर 198 में ही आबादी बसती है। मालदीव की पूरी अर्थव्यवस्था पर्यटन पर आश्रित है। इस देश का 28 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) और 60 फीसदी विदेशी मुद्रा पर्यटन से सृजित होती है। हिंद महासागर में स्थित होने के कारण यह छोटा सा मुल्क भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद अहम है। 1966 में फिरंगियों के शासन से आजाद होने के बाद से मालदीव के भारत के साथ प्रगाढ संबंध रह हें मगर 2013 में अब्दुला यामीन के सत्ता में आने के बाद से भारत के साथ रिश्ते बिगडते ही गए। यहां तक कि यामीन ने भारत द्वारा भेजे गए दो हेलिकॉप्टर भी लौटा दिए और मालदीव में भारतीय कंपनियों के कॉन्ट्रेक्ट भी रदद कर दिए । सता में आने के बाद यामीन ने ऐसे कानून बनाए जिनसे विरोधियों और आलोचकों को जेल में ठूंस दिया गया और अनेक देश छोडकर भाग गए। राष्ट्रपति का विरोध करने वाले सांसदों को भी गिरफ्तार कर लिया जाता। यामीन ने न्यायपालिका को भी अपनी मुठ्ठी में कर लिया। इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों को भी गिरफ्तार कर लिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति को राजनीतिक बंदियों को रिहा करने के आदेश दिए थे। इन आदेशों को मानने की बजाए यामीन ने देश में इमरजेंसी लगा दी और जजों को भी जेल में ठूंस दिया था। यामीन का झुकाव चीन की तरफ था, इसीलिए उन्होंने भारत की हर मदद को ठुकराया। 2011 तक माले (मालदीव की राजधानी) में चीनी दूतावास तक नहीं था मगर अब वहा बीजिंग के मिल्ट्री बेस बनाने की तैयारियां चल रही है। बहरहाल, जिस तरह से यामीन ने अधिकतर संस्थाओं पर अपना शिकंजा कस रखा था, उससे माना जा रहा था कि विपक्ष का साझा उम्मीदवार भी उन्ह हरा नहीं पाएगा, मगर जनता सबसे ज्यादा ताकतवर निकली और तानाशाह यामीन हार गया। यही लोकतंत्र है। मालदीव चुनाव भारत के लिए भी सबक है।
सोमवार, 24 सितंबर 2018
बुधवार, 19 सितंबर 2018
High Rate of Unemployment
Posted on 10:25 am by mnfaindia.blogspot.com/
Employment generation was one of BJP's major poll planks in 2014 Lok Sabha elections. Narendra Modi had promised to create 2 crore jobs annually if BJP was elected to power.But, the this poll promise has also remained, more or less, on paper. As on Feb. 2018, more than 30 million people were unemployed and looking for jobs while the job creation was limited to 6,00,000. much far less than required.
1.3 million employment seeking youth are adding every month,thereby meaning that India requires monthly job creation of 1.3 million failing which unemployment backlog will keep on swelling.
Surprisingly, higher the degree. more high is the level of unemployment. A report says, more than 60% of the eight lakh engineers graduating from technical institutions across the country every year remain unemployed, according to the All India Council for Technical Education.Unemployment among below primary and pre-primary literates in the age group of 18-29 years is just 4%. Those with degrees it is 28%. It is 4%. Among graduates but 14% among postgraduates. For illiterates it is 2%.
The situation is so grave that over a million job-seekers have applied for 700 jobs in Telangana. Among them hundreds are Ph.D and M.Phil degrees and lakhs are either postgraduates or graduate engineers. The qualification for the posts is just Class 12 pass.
Last year (2017), graduates, postgraduates and even PhD holders were among the 23 lakh job-seekers for 368 posts of peons in the Uttar Pradesh government secretariat.More than 250 held doctorates and 24,969 were postgraduates. The minimum qualifications for this peon post was school education and bicycle-riding skills with a monthly salary of about Rs 16,000.
In Himachal, more than 7000 dental doctors appeared for Public Service Commission test four years ago for just 30 posts.
Engineers, law graduates and MBAs were among 2.81 lakh applicants queuing up for tests and interviews in Madhya Pradesh for 738 peon posts earlier this year.
High rate of unemployment among youths drive them to unwanted areas, injurious for nation's integrity. Our political leaders are smart enough to get themselves as many monetary benefits including pension but care little for job creation. Where is country heading for?
मंगलवार, 18 सितंबर 2018
स्वच्छता का जनांदोलन
Posted on 10:22 am by mnfaindia.blogspot.com/
देश का प्रधानमंत्री झाडू लगाए और अपने हाथों से कचरा उठाए, तो यह अदभुत कार्य अवाम के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन जाता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके सहयोगी पिछले चार सालों से लगातार सडकों पर झाडू लगाकर और कचरा उठाकर स्वच्छता अभियान को संजीदगी से आगे बढा रहे हैं। इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। देश के नब्बे फीसदी से ज्यादा हिस्से में अब साफ-सफाई होने लगी है। शहरों और कस्बों को स्वच्छ बनने की होड लगी हुई है। मोदी सरकार के “स्वच्छ भारत“ अभियान के फलस्वरुप गांव-गांव, शहर-शहर शौचालय बनाए जा रहे हैं। खुले में शौच करने पर प्रतिबंध लगाया जा रहा है और लोग-बाग सार्वजनिक जगहों को स्वच्छ रखने के लिए आगे आ रहे हैं। स्वच्छता को प्रोत्साहित करना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सबसे बडी उपलब्धि है। उन्होंने न केवल देश को साफ-सुथरा बनाया है, अलबत्ता योगा को प्रोत्साहित करके लोगों के तन-मन को भी “स्वच्छ और सशक्त बनाया है। मगर वैश्विक मानकों के हिसाब से भारत “स्वच्छता“ में अभी भी काफी पीछे है। आजादी के सात दशक बाद भी बृहद भारत की स्वच्छ तस्वीर नजर नहीं आती है। सच कहा जाए तो स्वच्छता हमारी आदत में शुमार ही नहीं है। खुले में शौच करना, सडकों पर थूकना, सडकों-गलियों में कचरा फेंकना और घर को बेतरतीब तरीके से रखना हमारी आदत है। पान और तंबाकू सेवन करने वाले धडल्ले से यहां-वहां थूक कर गंदगी फैलाने से बाज नहीं आते हैं। सडकें, गली-नुक्क्ड और सार्वजनिक शौचालय पान-तबांकू पीक में रंगे होते हैं। यह जानते हुए भी कि थूक और नाक से निकलने वाले द्रव्य में सबसे हानिकारक संक्रमक कीटाणु होते हैं, इन्हें बीच सडक फर निकाल फेंक देना हमारी पुरानी आदत है। सार्वजनिक स्थलों पर थूक कर हम पूरे वातावरण को प्रदूषित करते हैं। देश के अधिकतर सार्वजनिक शौचालय आज भी इतने गंदे और बदबूदार होते हैं कि इनमें जाने से भी घिन्न आती है। बचपन से बच्चों को इन चीजों के बारे सिखाया जाना चाहिए मगर ऐसा होता नहीं है। यहां तक कि भोजन से पहले अच्छी तरह से हाथ धोना, हर रोज स्नान करना, दांतों की नियमित ब्रशिंग करना जैसी छोटी-छोटी आदतों को भी अक्सर टाल दिया जाता है क्योंकि ये सब हमारी आदतों में शुमार नहीं है। हमारी इन्हीं आदतों की वजह से पश्चिम में हमें “गंवार और असभ्य“ माना जाता है। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में इंडो-जर्मन धौलाधार प्रोजेक्ट का एक कडवा अनुभव मुझे आज भी कचोटता है। इस प्रोजेक्ट में कार्यरत जर्मनी एक्सपर्ट्स के लिए कार्यालय में अलग से शौचालय बनाया गया था और हमें इसके प्रयोग की अनुमति तक नहीं थी। इसमें बाकायदा ताला लगा होता और इसकी चाबी जर्मनस के पास ही रहती थी। मुझे यह बात बहुत अखरती और मैने साहस करके जर्मनी टीम के मुखिया से पूछ ही लिया। जवाब था“ इंडियन अपने शौचालय को बहुत गंदा रखते हैं, उन्हें इसके इस्तेमाल का जरा भी सलीका नहीं है“। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने देशवासियों को स्वच्छता का पाठ पढाया था। महात्मा गांधी स्वच्छता को स्वतंत्रता से भी ज्यादा महत्वपूर्ण मानते थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने लोगों को स्वच्छता का पाठ पढाया था। बापू और उनके संगी-साथी खुद अपना शौचालय साफ करते, झाडू लगाकर अपने आसपास की जगह को साफ-सुथरा रखते। देश में लंबे समय तक सत्तारूढ रही कांग्रेस स्वंय को महात्मा गांधी का वारिस मानती है मगर अपने कार्यकाल में पार्टी ने महात्मा गांधी को केवल मात्र वोट के लिए भुनाया और “मजबूरी का नाम महात्मा गांधी“ जुमले को ही चरितार्थ किया। जो काम कांग्रेस सरकार को बहुत पहले सपन्न कर लेना चाहिए था, उसे सात दशक बाद अब मोदी सरकार पूरा कर रही है। हमारे आसपास की हगह, घर-बार, गांव-गांव,गली-मोहल्ला स्वच्छ है तो हम स्वस्थ हैं और अगर लोग-बाग मानसिक और शारीरिक रुप से स्वस्थ हैं तो देश भी स्वस्थ और समृद्ध है।
सोमवार, 17 सितंबर 2018
खतरनाक है मोबाइल की दीवानगी
Posted on 11:43 am by mnfaindia.blogspot.com/
मोबाइल ( वायरलेस टेलिफोन)) के प्रति लोगों, खासकर युवाओं की दीवानगी देखकर चिंता होने लगती है। बडे-तो-बडे, बच्चे भी दिन-रात सेल फोन से चिपके रहते हैं। यह प्रवृति बच्चों के समग्र विकास के लिए बेहद खतरनाक है। मोबाइल फोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। इसकी घंटी न भी बजे, तो भी हम मैसेज, रिमाइंडर,अलर्ट के लिए बार-बार मोबाइल का प्रयोग करते हैं। सेल फोन रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी (नॉन-आयोनाइजिंग रेडियन) उत्सर्जित करता है। इससे कैंसर हो सकता है। रेडियो वेवज शरीर के ऊतकों (टिस्सुस ) को नुकसान पहुंचाते हैं और यह अंत्तोगत्वा कैंसर का कारण बनता है। दुनिया में कैंसर का अभी तक कोई तसल्लीबख्श उपचार नहीं है। विभिन्न अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि मोबाइल के अत्याधिक प्रयोग से कैंसर के अलावा दिल की बीमारी, बहरापन, स्ट्रेस, सरदर्द, मेमॉरी लॉस जैसे गंभीर रोग हो सकते हैं। रेडियो फ्रीक्वेंसी एनर्जी को बार-बार कान के पास ले जाने से, जैसा कि अक्सर मोबाइल फोन प्रयोग करते समय होता है, चेहरे पर मुहांसे निकलना और खुजली होना तो आम बात है। अध्ययन मे यह भी पता चला है कि भारत में यूजर व्हटसप और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया ऐपस पर अपना 70 फीसदी समय व्यतीत करते हैं। भारत में हर रोज यूजर कम-से-कम 200 मिनट के लिए सेल फोन का प्रयोग जरुर करता है। भारत में पचास फीसदी बच्चे और टीनऐजर्स सेल फोन का अत्याधिक प्रयोग करते हैं। हैल्थ एक्सपेर्ट इसे बहुत ज्यादा मानते हैं। स्वीडन की गोथनबर्ग यूनिवर्सिटी में मोबाइल यूजर्स पर किए गए अध्ययन में बताया गया है कि सेल फोन की हाई फ्रीक्वेंसी का स्ट्रेस लेवल पर बहुत बुरा असर पडता है और इससे मानसिक रोग की समस्या खडी हो सकती है। भारत में स्मार्टफोन की लोकप्रियता बढने से युवाओं के पथभ्रष्ट होने का खतरा भी बढ रहा है। भारत पश्चिम की तरह उदार समाज नहीं है और हमारा सामाजिक ताना-बाना अभी भी यथावत है। इंटरनेट पर अश्लील वीडियो, सीन्स और सामग्री युवाओं को पथभ्रष्ट करने के लिए पर्याप्त है। युवाओं को इन सब से दूर रखने के लिए अभिभावक प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। भारत में युवाओं को संस्कारित शिक्षा-दीक्षा देने की जरुरत है। पश्चिम की अंधी नकल करना हमारे सुदृढ सामाजिक ताने-बाने को तहस-नहस कर रही है।
बुधवार, 12 सितंबर 2018
नेशनल हेराल्डः न मुख पत्र और न ही समाचार पत्र, कैसे चलता!
Posted on 1:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
नेहरु परिवार से संबंधित समाचार पत्र नेशनल हेराल्ड इन दिनों चर्चा में है। पेट्रोल-डीजल की बढती कीमतों की आग में कांग्रेस को राजनीतिक रोटियां सेंकने से रोकने के लिए भाजपा ने नेशनल हेराल्ड का मुद्दा उछाला है। “सास भी कभी बहू थी“ टीवी सीरियल कलाकार से केन्द्रीय कपडा मंत्री बनी स्मृति ईरानी ने मंगलवार को इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस पर जमकर प्रहार किए। सोमवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और “राजमाता“ सोनिया गांधी की आयकर निर्धारण मामले को चुनौती देने वाला याचिका खारिज कर दी। सोनिया और राहुल ने याचिका में 2011-12 में दायर आयकर रिटर्न की फाइल को दोबारा खोलने की आयकर विभागीय कार्रबाई को चुनौती दी थी। अदालत ने व्यवस्था दी है कि आयकर विभाग को किसी भी आयकर मामले की दोबारा जांच करने का पूरा हक है। राहुल गांधी ने अपनी रिटर्न में यह जानकारी छिपाई थी कि 2010 से वे 'यंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड' कंपनी के निदेशक भी थे। निदेशक बनने के कारण उनकी आय 154 करोड रु थी मगर रिटर्न में उन्होंने मात्र 68 लाख रु दिखाई थी। जाहिर है आयकर बचाने के लिए यह जानकारी छिपाई गई । स्मृति ईरानी ने इस पर कांग्रेस को काफी खरी-खोटी सुनाई। कहा“ जो शख्स देश का प्रधानमंत्री बनने का ख्याब देख रहा है, वह अगर अपनी आय छिपाए, तो कैसे चलेगा देश “। मामला भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रामनयम स्वामी ने उठाया था। स्वामी का आरोप था कि नेशनल हेराल्ड को चलाने वाली कंपनी एसोसिएटिड जनरल्स लिमिटेड (एजेएल) ने कांग्रेस पार्टी से 90.25 करोड रु का कर्जा लिया था जो कभी लौटाया ही नहीं गया। इतना ही नहीं नवंबर, 2010 में 50 लाख रु की पूंजी से यंग इडिया नाम की एक कंपनी खोली गई और इस कंपनी ने एजेएल के सारे शेयर्स खरीद लिए। एसोसिएटिड जनरल्स लिमिटेड के पास उस समय 5000 करोड रु की विशाल संपत्ति थी। अदालत ने माना कि मामला तो बनता है। बहरहाल, 1937 में बनाई गई एसोसिएटिड जनरल्स लिमिटेड कंपनी ने 1938 में अंग्रेंजी अखबार नेशनल हेराल्ड का प्रकाशन शुरु किया था । बाद में हिंदी में ”नवजीवन” और उर्दू में ”कौमी आवाज” अखबार भी निकाले गए। जवाहर लाल नेहरु नेशनल हेराल्ड के पहले संपादक थे। आजादी के बाद जब तक कांग्रेस का जलवा रहा, अखबार को बत्तेरे विज्ञापन मिलते रहे और तीनों चलते रहे। इसके बावजूद नेशनल हेराल्ड ने कई उतार-चढाव देखे। वित्तीय संकट के कारण अखबार् सबसे पहले 1940 में अखबार का प्रकाशन बंद करना पडा। फिर, 1977 में बंद हो गया। कांग्रेस नीत संप्रग सरकार के बावजूद 2008 में अखबार फिर बंद हो गया और आठ साल 2016 में इसका प्रकाशन फिर शुरु किया गया और जैसे-तैसे चल रहा है। आजादी से पहले की अवधि को छोडकर, सरकारी संरक्षण के बावजूद ये अखबार चले ही नहीं। यहां तक कि कांग्रेसी भी इस अखबार को नहीं पढते हैं। चटपटी, मसालेदार खबरों और रोचक साम्रगी से ही अखबार पठनीय बनता है। नेशनल हेराल्ड मूलतः कांग्रेस का मुख पत्र है। आजादी से पहले यह इसीलिए चला क्योंकि तब अखबार आजादी के लिए लडने वाले सेनानियों का मुख पत्र था। आजादी को लेकर कुछ भी छपता, तब पाठक इसे हाथों-हाथ ले लेते। आजादी के बाद कांग्रेस ने फिरंगियों का चोला ओढ लिया । पार्टी अब सेनानियों की बजाए बिचौलियों, ठेकेदारों और सता-लोलुप नेताओं का जमावडा बन गया। न तो कांग्रेस की कोई स्पष्ट विचारधारा थी और न ही राजनितिक दर्शन । इसी असमंजस में नेशनल हेराल्ड न तो कांग्रेस का मुख पत्र ही बन पाया और न ही लोकप्रिय सामाचार पत्र। आजादी के बाद से, खासकर सतहर के दशक के बाद यह सरकारी विज्ञापन बटोरने और नेहरु-गांधी परिवार के लिए संपत्ति जोडने का जरिया बन गया।
मंगलवार, 11 सितंबर 2018
लोग पस्त, सरकार मस्त
Posted on 12:34 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कांग्रेसियों ने इन दिनों मोदी सरकार पर एक जुमला गढ रखा है, “लोग पस्त, सरकार मस्त“। कांग्रेस की यही नौटंकी विपक्ष में रहते हुए भाजपा भी किया करती थी। न तो कांग्रेस शासन में और न अब मोदी राज में लोगों के “अच्छे दिन“ लाने की किसी को फुर्सत है। सियासी दलों को सिर्फ और सिर्फ वोट की चिंता खाए रहती है, और उनकी सारी “फच्छकडियां" इसी मकसद से की जाती हैं। ्पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान को छू रही है। भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है और महंगाई बढ रही है। कमजोर रुपए के कारण सेंसेक्स-निफ्टी में पहली बार छह माह की सबसे बडी गिरावट दर्ज हुई है। लोगों के लगातार “बुरे दिन“ चल रहे हैं मगर केन्द्र और राज्य की सरकारें लोगों को लूटने में लगी हुई है। महानगर मुंबई में पेट्रोल की कीमत 90 रु लीटर के आसपास पहुंच गई है। मंगलवार को मुंबई में पेट्रोल 88.26 रु लीटर और दिल्ली में 80.87 रु लीटर बिक रहा था। पिछले कुछ दिनों से पेट्रोल-डीजल की कीमतें लगातार बढ रही है। कच्चे तेल की मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर तेल कंपनियों को कच्चे तेल की लागत लगभग 43 रु लीटर आ रही है। बाकी सब शुल्क (वैट समेत) के रुप में केन्द्र और राज्य सरकारों की जेब में जा रहा है। पेट्रोल-डीजल पर शुल्क-दर-शुल्क लगाकर सरकार तो मालामाल हो रही है पर लोग-बाग बेहाल हो रहे हैं। आखिर कब तक जनता सियासी नेताओं की खडमस्तियों का बोझ ढोती रहेगी? 2014 से अब तक मोदी सरकार 12 बार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क बढा चुकी है और 11 लाख करोड रु से ज्यादा कमा चुकी है। 2016 में कच्चे तेल की कीमतें न्यूनतम स्तर (29 डॉलर बैरल) तक गिरने के बावजूद सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं घटाए। तब लोगों को झांसा दिया गया कि जब कभी पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढेंगी, सरकार उत्पाद शुल्क घटा देगी। मगर अब सरकार मुकर रही है। कह रही है, ऐसा करना मुमकिन नहीं है क्योंकि इससे विकास के लिए पैसा कम पड जाएगा। मानो जैसे सरकारी खजाने की पाइ-पाई जन विकास पर खर्च की जा रही है। सच्चाई यह है कि अपने शाही खर्चे पूरे करने के लिए सरकार लोगों की जेब काटने का कोई मौका नहीं छोडती। इस मामले सब एक जैसे हैं। पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतें के लिए मोदी सरकार को घेरने वाली कांग्रेस सरकारें भी वही कर रही है जो भाजपा सरकारें कर रही हैं। कांग्रेस शासित पंजाब और कर्नाटक में भी वैट कम नहीं किया गया है। कांग्रेस को अगर लोगों की इतनी ही चिंता होती, तो पेट्रोल-डीजल पर कांग्रेस शासित राज्यों में वैट कम करती। उत्पाद शुल्क के साथ-साथ पेट्रोल पर 27 फीसदी और डीजल पर 16.75 फीसदी वैट (हर राज्य में अलग-अलग) लगता है। कुल मिलाकर राज्यों को एक लीटर पेट्रोल से 27.85 रु और डीजल से 10.41 रु (सोमवार की कीमत) मिल रहा है। न तो केन्द्र और न ही राज्य इस विषाल राजस्व को छोडने के लिए तैयार है। इसीलिए, पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के तहत नहीं ला जा रहा है क्योंकि ऐसा करने से केन्द्र से ज्यादा राज्यों को राजस्व का मुकसान हो सकता है। सब सियासी नौटंकीबाज हैं। लोगों की किसी को कोई चिंता नहीं है। मोदी सरकार मौका देख रही है और मुमकिन है लोकसभा चुनाव अथवा इस साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के अंर्तगत लाकर कुछ राहत दे। तब तक कुढते, झुंझलाते रहिए!
सोमवार, 10 सितंबर 2018
The 'Great' Looting Of Indian People Modi Govt Style
Posted on 7:52 pm by mnfaindia.blogspot.com/
BJP is lying when it says the govt has no role in fuel prices. Fuel prices were not hiked during Karnataka assembly elections. Earlier, during assembly elections in Uttar Pradesh petrol and diesel prices remained stagnated till the polling was over. The ground reality is petrol-diesel prices are manipulated by govt of the day for its political benefits. Moreover, high prices of petrol and diesel are end result of heavy doses of excise duty plus VAT.
Look at facts:
International Price of Crude Oil with Ocean Freight (as on 4th September 2018) is 79.93 $ or Rs 5700 per barrrel. One Barrel of Crude Oil contains 1159 litre. Accordingly, cost of Crude Oil per litre comes ti Rs 35.89. Even after adding Basic OMC Cost ( Entry Tax, Refinery Processing,OMC Margin, Cost of fuel comes to Rs 43.03 per litre.
In other words, a litre of crude oil costs oil companies 43.03 per litre and rest is duties which goes to govt's kitty.
Union govt charges Excise Duty + Road Cess of Rs 19.48 / litre on Petrol andRs 15.33 liitre on Diesel. Pricing Charged to dealers before VAT is Rs 58.82 per litre for petrol and Rs 58.36 per litre for diesel.
Adding Rs 3.63 per litre commission on petrol and Rs 2.53, the fuel Cost of petrol before VAT in Delhi comes to Rs 62.45 per litre and diesel Rs 60.89 per litre.
That's not all. Now comes VAT , varying from State to State. Its 27% on petrol and 16.75% on diesel plus 25p litre as Pollution Cess with Surcharge) in Delhi. It comes to Rs 16.86 per litre on petrol and Rs 10.45 per litre on diesel.
As such, final retail price of petrol as on 4th September 2018 is Rs 79.31 per litre and price of diesel is Rs 71.34 per litre in Delhi as against its basic price of 43.03 per litre. Price of crude oil was $ 107.09 per barrel in 2014 and its $ 73 in Sep, 2018. Isn't it a great loot?
What is shocking is Modi govt betraying the people. The BJP-led government has hiked excise duty 11 times since it came to power. It has pocketed Rs 11 lakh crore from the public by raising the duty. Since May 2014, excise duty on petrol has gone up by 211.7 per cent, on diesel by 443.06 per cent.
Govt has assured time and again assured the nation when it was hiking excise duty during low price of crude oil in 2016. Crude oil price fell below $28 a barrel in 2016. Even then govt didn't pass on the benefit of low crude price to consumers. It rather restored to hiking excise duty saying saving was for rainy days. Now Modi govt has backtracked and ruled out the roll back.
From 2017 onward 10% of Ethanol is being mixed with petrol. Ethanol is a natural Fuel (made from Sugar and starch) and carries no PM (Particulate Material) pollution. It can be very well mixed with petrol without any changes.
The catch is that Ethanol is priced at just Rs 40.85 per litre and after mixed in petrol sold at petrol price.
It means that if your car petrol tank is full with 30 litre, actually you get 27 litre petrol and 3 litre Ethanol - but the rate charged is the price of petrol only and you are charged 30 litre of petrol.
There is another danger If water comes in contact with petrol by any chance, it will lead to Ethanol breaking into separate layer against Petrol and this will end up giving Jerks making the car difficult to even start with.
Look at facts:
International Price of Crude Oil with Ocean Freight (as on 4th September 2018) is 79.93 $ or Rs 5700 per barrrel. One Barrel of Crude Oil contains 1159 litre. Accordingly, cost of Crude Oil per litre comes ti Rs 35.89. Even after adding Basic OMC Cost ( Entry Tax, Refinery Processing,OMC Margin, Cost of fuel comes to Rs 43.03 per litre.
In other words, a litre of crude oil costs oil companies 43.03 per litre and rest is duties which goes to govt's kitty.
Union govt charges Excise Duty + Road Cess of Rs 19.48 / litre on Petrol andRs 15.33 liitre on Diesel. Pricing Charged to dealers before VAT is Rs 58.82 per litre for petrol and Rs 58.36 per litre for diesel.
Adding Rs 3.63 per litre commission on petrol and Rs 2.53, the fuel Cost of petrol before VAT in Delhi comes to Rs 62.45 per litre and diesel Rs 60.89 per litre.
That's not all. Now comes VAT , varying from State to State. Its 27% on petrol and 16.75% on diesel plus 25p litre as Pollution Cess with Surcharge) in Delhi. It comes to Rs 16.86 per litre on petrol and Rs 10.45 per litre on diesel.
As such, final retail price of petrol as on 4th September 2018 is Rs 79.31 per litre and price of diesel is Rs 71.34 per litre in Delhi as against its basic price of 43.03 per litre. Price of crude oil was $ 107.09 per barrel in 2014 and its $ 73 in Sep, 2018. Isn't it a great loot?
What is shocking is Modi govt betraying the people. The BJP-led government has hiked excise duty 11 times since it came to power. It has pocketed Rs 11 lakh crore from the public by raising the duty. Since May 2014, excise duty on petrol has gone up by 211.7 per cent, on diesel by 443.06 per cent.
Govt has assured time and again assured the nation when it was hiking excise duty during low price of crude oil in 2016. Crude oil price fell below $28 a barrel in 2016. Even then govt didn't pass on the benefit of low crude price to consumers. It rather restored to hiking excise duty saying saving was for rainy days. Now Modi govt has backtracked and ruled out the roll back.
From 2017 onward 10% of Ethanol is being mixed with petrol. Ethanol is a natural Fuel (made from Sugar and starch) and carries no PM (Particulate Material) pollution. It can be very well mixed with petrol without any changes.
The catch is that Ethanol is priced at just Rs 40.85 per litre and after mixed in petrol sold at petrol price.
It means that if your car petrol tank is full with 30 litre, actually you get 27 litre petrol and 3 litre Ethanol - but the rate charged is the price of petrol only and you are charged 30 litre of petrol.
There is another danger If water comes in contact with petrol by any chance, it will lead to Ethanol breaking into separate layer against Petrol and this will end up giving Jerks making the car difficult to even start with.
रविवार, 9 सितंबर 2018
ऐसे हो सकती है निर्भीक पत्रकारिता
Posted on 11:59 am by mnfaindia.blogspot.com/
पत्रकारिता के मौजूदा दौर को लेकर सोशल मीडिया, परिचर्चाओं और सार्वजनिक मंचों पर अक्सर यही सुनने को मिलता है कि इसका स्तर उत्तरोतर गिरता जा रहा है। पत्रकारों में अब पहले जैसा जज्बा नहीं रह गया है और न ही बीजी वर्गीज, इंद्र मल्होत्रा, एस निहाल सिंह, राजेन्द्र माथुर, कन्हैया लाल नंदन सरीखे दबंग पत्रकार रह गए हैं। अखबार अब ब्रांड बन गए हैं और संपादक नाम का प्राणी मालिकों का पीआरओ। न्यूज चैनल्स को बस टीआरपी की पडी रहती है। 'मुनाफे के पीर' अखबार मालिकों में सरकार से पंगा लेने की हिम्मत ही नहीं है। अगर विष्वास नहीं होता है तो एनडीटीवी और एबीपी के मालिकों से पूछ लें। जब तक समाचार पत्र और इलेक्ट्रानिक मीडिया पूंजीपतियों के चंगुल और विज्ञापन के लिए सरकारी नियंत्रण में रहेगें, निष्पक्ष और दबंग पत्रकारिता हो ही नहीं सकती। दबंग और निर्भीक पत्रकारिता से अखबार मालिकों के पेट में मरोड उठने लग जाते हैं। हर समाचार पत्र मालिक रामनाथ गोयनका नहीं हो सकता। गोयनका में निर्भीक पत्रकारिता को लेकर जबरदस्त जज्बा था और पत्रकारिता को छोड़कर उनका और कोई बड़ा व्यवसाय भी नहीं था। तरह-तरह के व्यापार से जुड़े समकालीन अखबार मालिकों में वैसा जज्बा हो ही नहीं सकता । अस्सी के दशक में इंडियन एक्सप्रैस ने जब रिलायंस इंड्स्ट्री बनाम बाम्बे डाइंग का मुददा उठाया था, तब चुनौती बतौर अंबानी ग्रुप ने अपना इग्लिश अखबार निकाला था। इस अखबार में एक्सप्रैस के खोजी पत्रकारों को मोटा वेतन देकर तोडा गया मगर यह अखबार चल ही नहीं पाया। इसकी प्रमुख वजह थी कि अंबानी का व्यापार बहुत ज्यादा फैला था और इसके मालिकों में सरकार से पंगा लेने का माद्दा ही नहीं था और रामनाथ गोयनका जैसी खोजी पत्रकारिता का जज्बा भी नहीं था। प्रणय राय, बरखा दत्त, एम जे अकबर, करण थापर राजदीप सरदेसाई जैसे नामी पत्रकारों ने तो पत्रकारिता के मायने ही बदल दिए हैं। दुनिया में निजी क्षेत्र में अखबार एकमात्र ऐसा उत्पाद है जो अपनी लागत से कहीं कम दाम पर बिकता। मौजूदा समय में कम-से-कम (16 पन्नों) के अखबार की एक प्रति की लागत 20 रुपए से कम नहीं है मगर इसे ज्यादा से ज्यादा तीन रुपए में बेचा जाता है। बाकी 17 रुपए विज्ञापन से आते हैं और विज्ञापन तब मिलते हैं जब अखबार की ज्यादा से ज्यादा प्रसार संख्या हो। जितनी ज्यादा प्रसार संख्या होगी, घाटा उतना ही बढेगा। घाटा पाटने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा विज्ञापन की दरकार होती है। अखबारों की आर्थिकी का यह ताना-बाना पूंजीपतियों के ही वश की बात है। और जब तक यह ताना-बाना रहेगा, अखबार आत्म-निर्भर नहीं बन सकता। अखबारों को पूंजीपतियों और मुक्त करने का एक ही विकल्प है। अखबार को उत्पादन लागत पर ही बेचा जाए। यानी अखबार की औसत कीमत 20 रुपए है तो इसे इतनी ही कीमत प्लस एजेंट की कमीशन (लगभग 25 रु) में बेचा जाए और अखबार पूरी तरह से विज्ञापन मुक्त हो जाए़ं। इसमें पाठकों का ही फायदा है । उन्हें विज्ञापनों से भरपूर पन्नों से मुक्ति मिल जाएगी और ज्यादा पठनीय सामग्री मिलेगी। निसंदेह, मार्केट और ताजातरीन उत्पादों की जानकारी भी उतनी ही जरुरी है, जितने ताजा समाचार मगर इसके लिए भ्रामक विज्ञापनों की जगह समाचार पत्रों की सामग्री ज्यादा विश्वसनीय होती है । देश के कई अखबारों में इन दिनों फैशन से लेकर नए उत्पाद, इनोवेशन और प्रोन्नत तकनीक की ऐसी ताजा जानकारी दी जा रही है जो विज्ञापनों नें भी नहीं होती है। मगर,कहना आसान है, करना बेहद मुश्किल । आजादी से पहले कुछ इस तरह का चलन था मगर यह कमर्सिअली फला-फूला नहीं। तब पत्रकारिता मिशन हुआ कराती थी, व्यापार नहीं और जिस व्यवसाय में प्रॉफिट न हो, वहां व्यापारी झांकते भी नहीं है। समकालीन भारत में पाठकों की मानसिकता में यह बात रच-बस गई है कि अखबार तो सस्ते में ही मिलते हैं और उन्हें महंगे दामों पर खरीदने की क्या जरुरत? पाठकों को इस मानसिकता बाहर निकलना होगा। बहरहाल, प्रबुद्ध पाठकों को इस पर मंथन करना चाहिए। मेरे इस ख्यालीपुलावी विचार से जो भाई लोग सहमत हैं, उन्हें इसे आगे बढाना चाहिए। जय भारत, जय निर्भीक-निष्पक्ष पत्रकारिता।
शुक्रवार, 7 सितंबर 2018
Will There Be A Nuclear War Between India And Pakistan?
Posted on 11:41 am by mnfaindia.blogspot.com/
A latest report on Pakistan currently having 140 to 150 nuclear warheads should worry India. Report also says Islamabad stockpile is expected to increase to 220 to 250 by 2025 if the current trend continues.
The current estimate of 140 to 150 nuclear weapons exceeds the projection made by the US Defense Intelligence Agency in 1999 that Pakistan would have 60 to 80 warheads by 2020. according to a latest report of Federation of American Scientists (FAS).
On the other hand India is having 120-130 Nuclear stockpile, while China has around 280.
Russia with 6,850 nuclear warheads is the World's largest followed by US with 6,450 nuclear arsenal.
India’s nuclear buildup has been relatively slow due to its "No First Use policy". It acts to slow escalation of any conventional conflict into a nuclear one..
India’s conventional capabilities are vastly superior to Pakistan’s but Islamabad has acquired tactical nuclear weapons to offset the India’s conventional superiority.
The situation is almost similar to cold war days. In the face of a numerically superior Soviet military, the United States turned to nuclear weapons to defend Western Europe from a Soviet attack.
Pakistan continues to expand its nuclear arsenal with more warheads, more delivery systems and a growing fissile materials production industry, said reports.
Nuclear stockpiles are called weapons of mass destruction and even their limited use can create havoc.
There are fears in both countries' people mind what will happen if Pakistani launches a nuke against India . It is said by the time the nuke enters the trajectory and starts the ballistic approach , India would have launched a full scale retaliation against Pakistan.
There could a massive loss of life seen never before in history. The big question is how long can we remain away from the nuclear war?
The current estimate of 140 to 150 nuclear weapons exceeds the projection made by the US Defense Intelligence Agency in 1999 that Pakistan would have 60 to 80 warheads by 2020. according to a latest report of Federation of American Scientists (FAS).
On the other hand India is having 120-130 Nuclear stockpile, while China has around 280.
Russia with 6,850 nuclear warheads is the World's largest followed by US with 6,450 nuclear arsenal.
India’s nuclear buildup has been relatively slow due to its "No First Use policy". It acts to slow escalation of any conventional conflict into a nuclear one..
India’s conventional capabilities are vastly superior to Pakistan’s but Islamabad has acquired tactical nuclear weapons to offset the India’s conventional superiority.
The situation is almost similar to cold war days. In the face of a numerically superior Soviet military, the United States turned to nuclear weapons to defend Western Europe from a Soviet attack.
Pakistan continues to expand its nuclear arsenal with more warheads, more delivery systems and a growing fissile materials production industry, said reports.
Nuclear stockpiles are called weapons of mass destruction and even their limited use can create havoc.
The danger of a nuclear conflict between India and Pakistan is greater . The two nations have engaged in four wars starting since their partition . A fifth could be drastically more deadly as two neighbors continue to stockpile weapons of mass destruction.
There are fears in both countries' people mind what will happen if Pakistani launches a nuke against India . It is said by the time the nuke enters the trajectory and starts the ballistic approach , India would have launched a full scale retaliation against Pakistan.
There could a massive loss of life seen never before in history. The big question is how long can we remain away from the nuclear war?
जेंडर न्यूट्रल कानून
Posted on 11:35 am by mnfaindia.blogspot.com/
कानून को जेंडर न्यूट्रल होना चाहिए और इसका इस्तेमाल लिंग भेदभाव के लिए नहीं किया जाना चाहिए। कानून सबके लिए एक बराबर होता है। सुप्रीम कोर्ट ने यौन शोषण से जुडे मामले में बुधवार को अहम व्यवस्था दी। जस्टिस मदन बी लोकुर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा है कि यौन शोषण से पीडित बालकों को भी ठीक वही मुआवजा दिया जाए, जैस पीडित बच्चियों को दिया जाता है। अदालत ने कहा है कि “जीवन अनमोल है और कोई भी अदालत रुपए-पैसे की दृष्टि से उसका आकलन नहीं कर सकती“। यौन शोषण के शिकार पीडितों के मुआवजे पर बनी योजना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यह व्यवस्था दी। अदालत ने नेशनल लीगल सर्विस ऑथॉरिटी (नाल्सा-एनएएलएसए) की मुआवजा योजना को पूरे देश में दो अक्टूबर से लागू करने के आदेश भी दिए हैं। इस साल मई माह में नाल्सा द्वारा यौन शोषण और एसिड अटैक के पीडितों को मुआवजा योजना को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस मदन लोकुर वाली खंडपीठ ने स्वीकार कर लिया था। जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने यौन शोषण से पीडित बालकों को नाल्सा स्कीम में लाने के लिए जरुरी संशोधन के आदेश दिए थे। नेशनल लीगल सर्विस ऑथॉरिटी ने सामूहिक बलात्कार की शिकार पीडिता को कम-से-कम पांच लाख और अधिकतम दस लाख रु मुआवजा निर्धारित किया है। बलात्कार और अप्राकृतिक यौन शोषण की शिकार पीडिता को कम-से-कम चार और अधिकतम सात लाख रु मुआवजा दिया जाएगा। एसिड अटैक से पूरी तरह से झुलसी महिला को सात से आठ लाख रु और 50 फीसदी पीडित महिला को कम से कम पांच और अधिकतम आठ लाख का मुआवजा तय किया गया है। आम तौर पर यौन शोषण और एसिड अटैक की शिकार महिलाएं होती हैं, इसलिए नाल्सा मुआवजा योजना में बालकों और पुरुषों का कोई उल्लेख नहीं है। मगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनएएलएसए मुआवजा योजना को पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसिस) के तहत चल रहे सभी मामलों के लिए अनिवार्य कर दिया है, इसलिए यौन शोषण से पीडित बालक भी मुआवजे के हकदार होंगे। अदालत ने कहा है कि मुआवजा योजना जेंडर न्यूट्रल होनी चाहिए। पोक्सो कानून में चूंकि व्यस्क पुरुष नहीं आते हैं, इसलिए एसिड अटैक से पीडित पुरुषों को अभी भी मुआवजा योजना से बाहर हैं। हालांकि पिछले कुछ समय से पुरुषों पर भी एसिड अटैक हो रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 30 से 40 फीसदी एसिड अटैक पुरुषों पर होते हैं। एसिड सरवावर्स ऑफ इंडिया के अनुसार 35 फीसदी एसिड अटैक पुरुषों पर होते हैं। ्इस स्थिति में व्यस्क पुरुषों को नाल्सा मुआवजे से बाहर रखना लिंग तट्स्थ (जेंडर न्यूट्रल) योजना नहीं मानी जा सकती। 2013 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एसिड की खुली बिक्री पर रोक लगाए जाने के बावजूद एसिड अटैक रुके नहीं है। 2014 में देश भर में 225, 2015 में 247 और 2016 में 307 एसिड अटैक किए गए हैं। 1 जनवरी से अब तक पुरुषों पर 18 एसिड अटैक हो चुके हैं। एसिड अटैक से पीडित पुरुशों को भी नाल्सा जैसा मुआवजा दिलाने के लिए एसिड अटैक से पीडित व्यक्ति ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर रखी है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस साल फरवरी में इस पर सुनवाई करते हुए संबंधित पक्षों को नोटिस भी जारी किए थे। इस जुलाई में अदालत ने इस याचिका को मुआवजे पर् चुनौती देने वाली याचिका के साथ ही जोड दिया था। बुधवार को अदालत ने नाल्सा योजना को जेंडर न्यूट्रल बताते हुए व्यवस्था दी कि यय योजना पुरूश और महिला दोमों पर एक समान लागू होती है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा दिषा-निर्देष तक तक लागू रहेंगे जब तक केन्द्र यौन पीडितों और एसिड अटैक के लिए मुआवजे पर स्पश्ट नीति नहीं बनाती।
गुरुवार, 6 सितंबर 2018
पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप
Posted on 1:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत में उदारीकरण के बाद से विकास की रफ्तार को तेज करने में पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की अहम भूमिका रही है। सार्वजनिक पार्किंग से लेकर मेट्रो रेल तक, लगभग हर बडे क्षेत्र में सरकार ने वित्तीय संसाधन जुटाने के लिए पीपीपी मॉडल को तवज्जो दी है। शुरु में भारत को पीपीपी मॉडल के लिए काफी रिस्की माना गया मगर जैसे-जैसे उदारीकरण ने अपने पंख फैलाए, पीपीपी मॉडल ने भी उडान भरनी शुरू कर दी। 2018 में अब सरकार ने नागरिक उडडयन (सिविल एविएशन) क्षेत्र में भी पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरषिप मॉडल को अपनाने का फैसला लिया है। देश में करीब सौ हवाई अडडे (एयरपोर्ट) बनाने के लिए अगले दस-पंद्रह सालों में 4.2 लाख करोड रु की जरुरत है और इतने विशाल निवेश के लिए पीपीपी ही एकमात्र विकल्प है। ज्यादा हवाई अडडे होंगे, तो अधिक हवाई सेवाएं उपलब्ध होंगी और हवाई सफर करने वालों की तादाद भी बढेगी। इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (आईएटीए) का आकलन है कि 2037 तक भारत में हर साल 520 मिलियन भारतीय यात्री हवाई सेवाओं का इस्तेमाल करेंगे। 2010 में हर साल 79 मिलियन यात्री हवाई सफर करते थे। 2017 में यह संख्या बढकर 158 मिलियन को पार कर गई थी। जाहिर है जैसे-जैसे हवाई सफर की सुविधाएं बढ रही है, यात्रियों की संख्या में भी अप्रत्याशित वृद्धि हो रही है। अगले दस सालों में भारत एयर ट्रेवल में दुनिया का तीसरा सबसे बडा मुल्क बन जाएगा और जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड और स्पेन को भी पीछे छोड देगा। भारत में अभी इंफरास्ट्रक्चर की भारी कमी है और कोई भी देश मजबूत बुनियादी सुविधाओं के बगैर आगे नहीं बढ सकता। देश में सुढृढ़ इंफरास्ट्रक्चर तैयार करने के लिए ही 70 खरब रुपयों (एक खरब डॉलर) की दरकार है। सरकार के पास इतने वित्तीय संसाधन नहीं है। नब्बे के दशक में उदारीकरण के बाद इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर में भी निजी निवेश का रास्ता खुल गया था। भारत सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत कई मह्त्वपूर्ण मॉडल अपनाए हैं। इनमें यूजर-फ्री आधारित बीओटी (बिल्ड एंड ट्रांसफर), परफोर्मेंस बेस्ड मैनेजमेंट एंड मेनटेंनेंस और मोडिफाइड डिजाइन-बिल्ड कांट्रटेक्ट शा मिल है। केन्द्र सरकार ने पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरषिप मॉडल को प्रोत्साहित करने के लिए कई कारगर कदम भी उठाए हैं। इंफरास्ट्रक्चर सेक्टर में पीपीपी के लिए वाइबिलिटी गैप फंडिंग स्कीम को लागू किया गया है। इसके तहत इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस को बीस फीसदी तक वित्तीय मदद दी जाती है। 2006 में इंफरास्ट्रक्चर फाइनेंस कंपनी (आईआईएफसीएल) का गठन किया गया। यह संस्था इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस को लंबी अवधि के लिए ऋण मुहैया कराती है। 2007 में इंडिया इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट डवलपमेंट फंड स्थापित किया गया। यह संस्था इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स का 75 फीसदी डवलपमेंट खर्च वहन करती है। 2012 में भारत सरकार ने इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस के लिए जमीन खरीद को और आसान बना दिया। सरकारी जमीन के निजी क्षेत्र आवंटन पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया गया। भूमि ट्रांसफर को और सरल बनाया गया। इंफरास्ट्रक्चर प्रोजेक्टस के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी की शर्त भी हटा ली गई। नतीजतन, इंफरास्ट्रक्चर में निवेश बढा है और विकास तेज हुआ है। 1990 के बाद से अब तक देश में 824 पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप प्रोजेक्टस सफलतापूर्वक पूरे किए जा चुके हैं। इनमें मुंबई मेट्रो, कोलकता का द्धितीय स्वामी विवेकानंद ( अब सिस्टर निवोदिता) ब्रिज और भूमिगत पार्किंग प्रमुख हैं। मगर पीपीपी मॉडल कुछ जगह पूरी तरह से विफल रहा है। दिल्ली-गुरुग्राम एक्सप्रैस मार्ग, वडोदरा-हलोल टोल प्राजेक्ट, दिल्ली एयरपोर्ट मेट्रो एक्सप्रैस प्रमुख है। इनके अलावा वाटर और सेनिटेशन में भी पीपीपी मॉडल कामयाब नहीं रहा है जबकि इन क्षेत्रों में पीपीपी की सबसे ज्यादा जरुरत है। गलतियों से सबक सीख कर पीपीपी मॉडल का दायरा और ज्यादा बढाने की जरुरत है।
मंगलवार, 4 सितंबर 2018
A Bad Move
Posted on 7:17 pm by mnfaindia.blogspot.com/
It sickening to note Congress leaders' political utterances over section 118 that bans outsiders and even local agriculturists to purchase land n Himachal. More disgusting is how "babus' made an abortive attempt to twist the rule in their favour and get a notification issued. The red faced Jairam Thakur Govt had to beat the retreat and had to cancel the notification. Under the dumped notification. outsider govt employees working in state for last thirty years were given the benefits to buy agriculture land up to 500 sq, meters for housing. So far, so good but why for govt employees only. Why not local non-agriculturists, being denied the legitimate rights since long.
Babus were smart enough to seize the opportunity as BJP appeared soft on the issue. Chief Minister Jairam Thakur had earlier expressed his desire to relax the section 118 as to facilitate investment in tourism and other sectors. It was, indeed, a genuine initiative. Himachal, is in dire need of employment generating activities and investment in tourism could open the door. But as is the politicians' wont, they look hot political issues for "vested interests" and are least concerned with people's interests. The utterly disgusting statements of leader of opposition, Mukesh Agnihotri, bears the testimony. He has threatened to launch agitation if there is any attempt to relax the rules. He is not bothered how sickening is his "wild" utterances to the non-agriculturists ( I am a agriculturist local). They have been rendered as refugee in their own homeland. High Court had come to their rescue two years back, but there is no relief as yet.
The section 118 is highly biased towards locals and has. so far, served the interests of influential people. Two days before, a retired senior bureaucrat has exposed the hollow claim of Congress over protecting state's interests. Congress hasn't yet replied. It will be more in people's interest to examine the issue on merits than on political considerations.
गुरुओं को सलाम
Posted on 6:39 pm by mnfaindia.blogspot.com/
“अध्यापक मोमबती की तरह होता है, जो ज्ञान की रोषनी फैलाने के लिए खुद ही पिघलता रहता है“, आधुनिक तुर्की के निर्माता कमाल अतातुर्क उर्फ मुस्तफा कमाल पाशा का यह कथन हमेशा प्रासंगिक रहेगा। अध्यापक देश के निर्माता होते हैं और जितना उनका सम्मान होगा, देश का भविष्य उतना ही उज्जवल होगा। कहते हैं “गुरु बिना ज्ञान नहीं“ अथवा “गुरु बिन ज्ञान अधूरा“। दुनिया की शीर्ष हस्तियां भी इस बात को स्वीकारती हैं। युग पुरुष महात्मा गांधी के जीवन और सोच पर उनके आध्यात्मिक गुरु श्रीमद्य राजचन्द्र का गहरा प्रभाव रहा है। अहिंसा और सत्याग्रह के मूल्यों का आदर करना महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरु से ही सीखा था। माइक्रोसोफ्ट कंपनी के संस्थापक और दुनिया के सफलतम कारोबारी बिल गेटस ने अपनी माता, नानी के साथ-साथ अपनी टीचर ब्लांश कैफीरे को उन्हें टॉप मुकाम तक पहुंचाने का श्रेय दिया हे। बिल गेटस के मुताबिक अगर उनकी टीचर कैफीरे उन्हें प्रेरणा नहीं देती, तो वे भी आम छात्र की तरह ही रह जाते। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु पर उनके बाल्यकाल के अध्यापक एफ टी ब्रुक्स और उनके राजनीतिक गुरु महात्मा गांधी का प्रभाव रहा है। चाणक्य से लेकर डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन और एपीजे कलाम तक भारत में दुनिया के सर्वोतम अध्यापक रहे हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विकेका नंद, सावित्री फुले आज भी भारत के प्रेरणास्त्रोत हैं। भारत को ऋषि -मुनियों एव प्रकांड विद्वानों का ज्ञान का सागर माना जाता है और अध्यापकों को यहां मां-बाप बराबर का दर्जा दिया जाता है। प्राचीन भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति का दुनिया भर में सिक्का चलता था। इस शिक्षा पद्धति के तहत छात्रों को घर-परिवार से बहुत दूर आश्रमों में रहकर शिक्षा दी जाती थी। 8 साल की आयु में छात्रों को गुरुकुल में प्रवेश दिया जाता और 25 साल की आयु तक उन्हें सख्त अनुशासन में कई विधाओं में पारंगत किया जाता। गुरुकुल के विख्यात प्राचार्यों से शिक्षा ग्रहण वाले छात्रों का देश -विदेश में सम्मान किया जाता था। मर्यादा पुरुषोतम राम ने ऋषि वशिष्ठ और पांडवों ने ऋशि द्रोणाचार्य से आश्रम में रहकर शिक्षा ग्रहण की थी। रामायण काल में ऋषि वशिष्ठ और भारद्वाज मुनि के बृहद आश्रम और इनके गुरुओं की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। प्राचीन भारत में जात-पात और वर्ण भेद का वर्चस्व के बावजूद गुरुकुल में हर छात्र को बराबर का दर्जा दिया जाता और राजकुमार से लेकर गरीब परिवार के छात्र को एक जैसा ज्ञान दिया जाता। तब गुरुकुल की पढाई निशुल्क हुआ करती थी और बडे गुरुकुल तो खुद कमाई करके काफी हद तक आत्म निर्भर होते थे। ग्रुरुकुल आश्रम के छात्र शास्त्रों से लेकर हथियार चलाने में भी पारंगत होते थे । कालांतर में शिक्षा के “व्यापारीकरण“ ने गुरुकुल पद्धति का भी वही हश्र किया जो अन्य शिक्षा पद्धतियों का हुआ है। यूनिवर्सिटीज और स्कूल-कॉलिजों को आत्म- निर्भर बनाना बुरी बात नहीं है मगर शैक्षणिक संस्थाओं को “ शिक्षा की दुकान“ बनाना बेहद खतरनाक है। दुखद स्थिति यह है कि पूंजीपति व्यवस्था में शिक्षक और शैक्षणिक संस्थाएं दोनों ही “धन कमाने“ के नित नए-नए तरीके ईजाद कर रहे हैं। एक जमाना था जब अध्यापक पढाई में कमजोर छात्रों को घर बुलाकर मुफ्त में पढाया करते मगर अब इसकी जगह ट्यूशन धंधा बन चुका है और इसके नाम पर बडी-बडी दुकानें चलाईं जा रही हैं। देश में कोचिंग का धंधा पूरी तरह से उधोग के रुप में स्थापित हो चुका है। बडे-बडे कोचिंग इंस्टीटयूट्स सालाना अरबों रुपए का कारोबार कार रहे हैं। मगर सुखद स्थिति यह है कि देश में आज भी इने-गिने अध्यापक जरुरतमंदों के लिए ज्ञान पुंज बनकर खडे हैं। ऐसे सच्चे, कर्मठ और समर्पित अध्यापकों को सलाम।
एशियाई गेम्सः अभी भी वहीं खडे हैं
Posted on 12:58 pm by mnfaindia.blogspot.com/
इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में रविवार को संपन्न हुई एशियाई खेलों में भारत का 1951 के बाद अब तक सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। जकार्ता में भारत ने 15 गोल्ड, 24 सिल्वर और 29 ब्राँज समेत कुल मिलाकर 69 पदक जीते हैं। इससे पहले 2010 में चीन के ग्वांगझु में 65 पदक जीत कर भारत ने उम्दा प्रदर्शन किया था। 67 पहले 1951 में दिल्ली में आयोजित पहले एशियाई खेलों में भी भारत ने 15 गोल्ड मेडल जीते थे। तब भारत कुल मिलाकर 41 मेडल जीतकर दूसरे स्थान पर रहा था। जापान 24 गोल्ड समेत 60 मेडल जीतकर पहले स्थान पर था। पहले एशियाई खेलों मेँ 11 देशों के 189 खिलाडियों ने हिस्सा लिया था। चीन ने इसमें हिस्सा नहीं लिया था। पाकिस्तान ने भी कश्मीर विवाद की आड लेकर पहली एशियाई खेलों में हिस्सा नहीं लिया था। 67 साल में बहुत कुछ बदल चुका है। भारत आज दुनिया में चीन से भी तेजी से आगे बढती अर्थव्यवस्था है मगर खेलों में अभी भी भारत की रफ्तार बहुत धीमी है। जकार्ता में आयोजित 18वीं एशियाई खेलों में 45 देशों के 10 हजार से भी ज्यादा खिलाडियों ने हिस्सा लिया। 15 दिन तक चली गेम्स में 40 खेलों के 465 इवेंट हुए और कुल मिलाकर 465 गोल्ड समेत 1,552 मेडल दांव पर थे। 132 गोल्ड समेत 289 मेडल जीतकर चीन पहले स्थान पर रहा है हालांकि पिछले 16 साल का यह इसका सबसे खराब प्रदर्शन है। 75 गोल्ड के साथ 205 मेडल लेकर जापान दूसरे और 49 गोल्ड समेत 177 मेडल लेकर दक्षिण कोरिया तीसरे स्थान पर है। भारत आठवें स्थान पर रहा है। मेजबान इंडोनेशिया, उजेबकिस्तान और ईरान भी भारत से आगे है। एशिया में भारत, चीन और जापान के बाद तीसरी सबसे बडी अर्थव्यवस्था है और आबादी के लिहाज से भारत जापान से कहीॅ विशाल है। हर मामले में भारत की बराबरी चीन अथवा जापान से होती है़। फिर भारत खेलों में चीन और जापान तो क्या दक्षिण कोरिया से भी पिछडा हुआ है़? जकार्ता एशियाई खेलों में भारत ने कुल गोल्ड मेडल्स का 3.22 फीसदी मेडल जीतकर कौनसा किला फतेह कर लिया ? भारत का इससे कहीं ज्यादा बेहतर प्रदर्शन 1951 की एशियाई खेलों में रहा था। उस समय भारत ने कुल 57 गोल्ड मेडल मेंसे 15 (26.31 फीसदी) सोने के तमगे जीते थे। इस बार कबड्डी तक में भी भारत गोल्ड मेडल नहीं जीत पाया। इसके अलावा हाकी, तीरंदाजी (अर्चरी) और स्क्वैश में भी भारत को गोल्ड मेडल से वंचित रहना पडा हालांकि 2014 में दक्षिण कोरिया के इंचियोन में हुई एशियाई खेलों में भारत ने इन खेलों में गोल्ड मेडल जीते थे। लगता है हाकी की तरह अब भारत को आगे भी कबड्डी में ईरान से कडी चुनौती मिलने जा रही है। मेडल के लिहाज से भारत इंचियोन में आठवें स्थान पर था और जकार्ता में भी। यानी भारत वहीं खडा है और पहली एशियाई खेलों के मुकाबले भारत का ग्राफ नीचे गिरा है। खेलों में बाकी देश जब आगे बढ रहे हों, भारत जैसे विशाल देश का ग्राफ गिरना निराशाजनक है। सवा सौ करोड से भी ज्यादा का आबादी वाला भारत खेलों में अगर अपने से कहीं छोट-छोटे देशों से पिछड जाए, यह बात शर्मनाक लगती है। बार-बार यह सवाल सामने आता है कि भारत खेलों में भी उसी तरह का बेहतर प्रदर्शन क्यों नहीं कर पा रहा है जैसे देश का जलवा अंतरिक्ष विज्ञान में है? किसान, औधोगिक श्रमिक, व्यवसायी, कारोबारी, जवान सब मिलकर देश की अर्थव्यवस्था को बुलंदियों पर पहुंचा रहे हैं, तो भारतीय खिलाडी ऐसा क्यों नहीं कर सकते़? निसंदेह, वे इससे भी बेहतर कर सकते हैं अगर देश के सियासी नेता खेल संगठनों और चयन प्रकिया में दखल देना छोड दें। जब तक देश के खेल संगठन सियासी दखल से मुक्त नहीं होंगे, भारत में खिलाडियों का जलव कायम नहीं हो पाएगा।
सोमवार, 3 सितंबर 2018
घर-द्वार बैंकिंग सुविधाएं
Posted on 10:19 am by mnfaindia.blogspot.com/
शनिवार को इंडियन पोस्ट पेमेंटस् बैंक (आईपीपीबी) के लांच होते ही गांव-गांव, घर-घर बैंकिंग सुविधाएं सुनिश्चित करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। इस बैंक के खुलने से देश श त प्रतिशत वित्तीय समावेशन (फाइनेशियल इन्क्लुजन) का लक्ष्य हासिल कर सकता है। देश के हर व्यक्ति, खासकर कमजोर तबकों को त्वरित वित्तीय सुविधाएं मुहैया कराना ही वित्तीय समावेशन कहलाता है। आईपीपीबी देश के उन क्षेत्रों को तवज्जो देगा, जहां अभी बैंक की शाखाएं नहीं हैं। 30 जनवरी, 2017 को पोस्ट पेमेंटस् बैंक बतौर पायलट प्रोजेक्ट लांच किया गया था। शुरु में झारखंड की राजधानी रांची और छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में आईपीपीबी की दो शाखाएं खोली गईं थी। इस साल 31 दिसंबर तक 650 शाखाओं और 3250 एक्सेस प्वाइंट के माध्यम से पोस्ट पेमेंटस बैंक सभी 1.55 लाख डाक घरों से जुड जाएगा और सभी 17 करोड डाक बचत खाते आईपीपीबी से जोड लिए जाएंगे। इस बैंक में साल में एक लाख से ज्यादा की राशि जमा नहीं की जा सकेगी। बचत पर चार फीसदी ब्याज मिलेगा। बैंक के खाताधारकों को मनी ट्रांसफर, बिल पेमेंट, खरीदारी की पेमेंट, बच्चों की फीस जैसी बचत और चालू खाते की सारी सुविधाएं मिलेंगी। पोस्टल विभाग के तीन लाख डाकिए और डाक सेवक मोबाइल और बायोमीट्रिक उपकरण की मदद से लोगों को घर द्वार बैंकिंग सुविधाएं मुहैया कराएंगें। आईपीपीबी खुद तो कर्ज देने के लिए अधिकृत नहीं है मगर यह अन्य वित्तीय संस्थाओं के उत्पाद और वित्तीय सेवाएं मुहैया करा सकता है। कर्ज देने के लिए आईपीपीबी पंजाब नेशनल बैंक के एजेंट बतौर काम करेगा। बैंकिंग सेवाओं को तेजी से विस्तार होने के बावजूद दूर-दराज क्षेत्रों में अभी भी बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध नहीं है। देष की 19 फीसदी आबादी अभी भी बैंकिंग सुविधाओं से महरुम है। आरबीआई के दिषा निर्देषों के अनुसार 25 फीसदी नई बैंक शाखाएं ग्रामीण क्षेत्रों में खोली जानी चाहिए। फाइनेशियल इन्क्लूजन का लक्ष्य हासिल करने के लिए इसे अनिवार्य माना गया है। मगर ग्रामीण क्षेत्रों की अधिकतर शाखाएं घाटे में रहने के कारण बैंक आगे नहीं आ रहे हैं। हरियाणा की मिसाल ली जाए। सितंबर, 2017 की बैंकर्स समिति रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में 194 छोटी (ब्रिक एंड मोर्टार) शाखाएं खोलना का लक्ष्य रखा था मगर मात्र 44 ही खुल पाईं। सरकारी पंजाब नेशनल बैंक को 5000 से ज्यादा आबादी वाले देहातों में 47 शाखाएं खोलनी थी मगर सितंबर, 2017 तक मात्र 9 ही खुल पाईं। इस मामले में अन्य बैंकों की स्थिति और भी खराब है। कई सरकारी बैंक तो एक भी शाखा नहीं खोल पाए। वैसे दुनिया में सबसे ज्यादा बैंकिंग सुविधाओं का विस्तार भी भारत में हुआ है। अतरराश्ट्रीय मुद्रा कोश (आईएमएफ) की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में भारत में सबसे ज्यादा 1.2 लाख बैंक की शाखाएं थीं। चीन में 95, 680 और कोलंबिया में 94, 074 शाखाएं थीं। भारत के 34 फीसदी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की शाखाएं है। यह संख्या श हरी क्षेत्रों की 38 फीसदी से कुछ ही कम है। बाकी 28 फीसदी षाखाएं अर्ध-षहरी क्षेत्रों अथवा कस्बों में है। मगर आबादी के लिहाज से ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकिग एसेसिबिलिटी काफी कम है। भारत में प्रति लाख वयस्क के लिए करीब 13.54 बैंक शाखाएं है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो और भी कम प्रति लाख वयस्क मात्र सात बैंक षाखाएं है। भारत से ज्यादा तो श्रीलंका में 18.58 प्रति लाख वयस्क (एडल्ट) बैंक षाखाएं हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा कोलंबिया में प्रति लाख वयस्क (एडल्ट) 257.69 षाखाएं हैं। इस मामले चीन और पाकिस्तान भारत से पीछे है। मोदी सरकार ने जमीनी हकीकत को भांपते हुए ही इंडियन पोस्ट पेमेंटस् बैंक की षुरुआत की है। इस बैंक का संचालन और प्रबंधन सरकार के अधीन है, इसलिए इस प्रकल्प में नफे-नुकसान का सवाल ही नहीं है। देष को अगर ग्रोथ को और तेज करना है, तो हर दूर-दराज गांव को वित्तीय सुविधाएं मुहैया करानी होगी। पोस्ट पेमेंटस् बैंक इस लक्ष्य को हासिल करने में मददगार साबित हो सकता है।
शनिवार, 1 सितंबर 2018
नारे, लफ्फाजी से अच्छे दिन नहीं आते !
Posted on 7:37 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अगर “लफ्फाजी“ और नारे लगाने से सुशासन और “अच्छे दिन लाए जा सकते, तो भारतीय जनता पार्टी कबका ऐसा कर चुकी होती। याद करें एक जमाने में “ चाल, चरित्र और् चेहरा“ भाजपा का खालिस देसी स्लोगन हुआ करता था और भाजपाई इस पर खूब इतराते थे। कांग्रेस के दागी नेताओं पर हमला करने के लिए इसका खुलकर उपयोग किया जाता था। सत्ता में आते ही यह काफूर हो गया। पिछले लोकसभा चुनाव में “ अच्छे दिन आएंगें“ से भाजपा ने लोगों को लुभाया और चुनाव भी जीत लिया। केन्द्र में सत्तारूढ होने पर मोदी सरकार ने “सबका साथ, सबका विकास“ का सहारा लिया और अब इससे मन भर गया है तो 2019 लोकसभा चुनाव के लिए “साफ नीयत, सही विकास“ नारा बुलंद किया गया है। हर चुनाव के लिए नए, नए नारे गढने में भाजपा को महारत हासिल है। पर सच्चाई यह है कि नारे लगाकर जनता को बेवकूफ तो बनाया जा सकता है मगर “अच्छे दिन“ नहीं लाए जा सकते। संप्रग सरकार के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह को “निक्कमा“ साबित करने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोडी। लेकिन इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री विकास की जरुरतों और अर्थव्यवस्था के फंडामेंटलस को बखूबी समझते थे। इसलिए घोटालों के बावजूद संप्रग सरकार के पहले कार्यकाल में औसतन जीडीपी ग्रोथ दर 8.3 फीसदी और संप्रग-दो में 7.68 फीसदी रही है। मोदी सरकार के में यह औसतन 7.33 फीसदी रही है। निसंदेह, अगर नोटबंदी नहीं होती तो भारत की ग्रोथ दर मोदी सरकार के कार्यकाल में भी आठ फीसदी से ज्यादा रहती। इस साल जून तिमाही (अप्रैल-जून) में जीडीपी की ग्रोथ दर 8.2 फीसदी रही है। विभिन्न अध्ययनों का निष्कर्ष है कि मोदी सरकार में विकास की दर और तेज हो सकती थी अगर देश का समय ऊल-जलूल मुद्दो पर बर्बाद नहीं होता। देश के समक्ष आज कुछ ऐसी जटिल समस्याएं मुंह फाडे खडी हैं जिनका अविलंब निदान जरुरी है। संप्रग सरकार और मोदी सरकार की कार्यशैली में कोई बहुत बडा फर्क नही है। घोटालों ने अगर संप्रग सरकार को जकड कर रखा तो, असहिष्णुता और नफरत के माहौल ने मोदी सरकार को पगु बनाकर रखा है। कोई भी देश ऐसे माहौल में तरक्की नहीं कर सकता। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही को खत्म करना मोदी सरकार की उच्च प्राथमिकता थी। न तो लालफीताशाही कम हुई और न ही भ्रष्टाचार घटा। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केन्द्रीय कर्मचारियों की भर्ती (एसएससी-2017) पर रोक लगाते हुए साफ शब्दों में कहा है कि पूरी व्यवस्था ही भ्रष्ट है ।
नोटबंदी : देश जो सजा देगा, मैं उसे भुगतने को तैयार हूं“
Posted on 10:18 am by mnfaindia.blogspot.com/
आठ नवंबर, 2016 को नोटबंदी का फैसला सुनाते समय प्रधानमंत्री मोदी ने अवाम से 30 दिसंबर तक 50 दिन का समय मांगा था और कहा था,“ भाइयों और बहनों अगर 30 दिसंबर के बाद कोई कमी रह जाए, मेरी कोई गलती रह जाए, मेरा कोई गलत इरादा निकल जाए, आप जिस चौराहे पर मुझे खडा करेंगे, मैं खडा होकर देश जो सजा देगा, मैं उसे भुगतने को तैयार हूं“। प्रधानमंत्री जी गलती तो निकल गई है। नवंबर 2016 में विमुदीकरण अथवा नोटबंदी (डेमोनिटेजेशन) का फैसला उल्टा पड गया है। 2016 के विमुद्रीकरण से काला धन तो बाहर निकला नहीं, सौ से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पडी। लाखों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पडा। नगदी पर आश्रति ग्रामीण व्यवस्था की कमर टूट गई और अर्थव्यवस्था की रफ्तार रुक गई । 500 और 2000 रुपए के नए नोट छापने के लिए सरकार खजाने पर खामख्वाह का बोझ पडा है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई)की ताजा रिपोर्ट से नोटबंदी पर सरकार के सारे दावों की हवा निकल गई है। आरबीआई के अनुसार नवंबर 2016 की नोटबंदी की 99.3 फीसदी मुद्रा आरबीआई के पास वापस पहुंच गई है और पुराने 500 और 1000 रुपयों के मात्र 10,270 करोड रु लौटाए नहीं गए हैं। जाहिर है सरकार को नोटबंदी से काला धन बाहर निकालने की जितनी उम्मीद थी, उसकी तुलना में 10,270 करोड रु “ऊंट के मुंह में जीरा“ जैसा है। नोटबंदी से कहीं ज्यादा असरदार जून, 2016 में शुरु की गई स्वेच्छा से काला धन घोशित करने की योजना सफल रही है। इसके तहत जून से अक्टूबर, 2016 तक 65,250 करोड रु का काला धन बाहर आ गया था। यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है कि इस योजना के फौरन बाद नवंबर, 2016 में नोटबंदी करने का क्या औचित्य था? सरकार को 500 और 2000 रु के नए नोट छापने के लिए 12877 करोड रु (2016-17 में 7,965 करोड, 2017-18 में 4,912 करोड रु) खर्च करने पडे। बहरहाल, जमीनी हकीकत यह है कि नोटबंदी अब काला धन बाहर निकालने का कारगर उपाय नहीं रह गया है। काले धन में नगदी का अंश ज्यादा से ज्यादा एक फीसदी रहता है। अधिकांश काला धन देश -विदेश में संपत्ति खरीदने, सोना और आभूषणों और हवाला के जरिए विदेशी बैंकों में छिपा कर रखा जाता है। देश में पहली बार 1946 में 1000 और 10,000 रुपए की नोटबंदी की गई थी। तब फिरंगियों का शासन था, इसलिए इसका अच्छा असर हुआ था। आठ साल बाद 1954 में 1000, 5000 और 10,000 रु के नोट निकाले गए थे। 1978 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता सरकार ने 1000, 5000 और 10,000 रु का विमुद्रीकरण करके इनके चलन को बंद कर दिया। तब देश में कुल मुद्रा का दस फीसदी 5000 और 10,000 रु के नोटों में जमा हो रखा था और इस धन को काला धन माना गया था। नोटबंदी का असर भी हुआ और यह काला धन (दस फीसदी) बेकार हो गया था। 1978 की तुलना में 2016 की स्थिति में जमीन आसमान का अंतर है। 2016 में कुल मुद्रा का 87 फीसदी 500 और 1000 रुपयों में जमा था। यह नगदी देश के 25 करोड मध्यम और निम्न मध्यम के पास नगदी के रुप में खर्च के लिए जमा थी। और उनकी गाढी कमाई का हिस्सा था। नतीजतन, इन तबकों को सबसे ज्यादा कष्ट सहने पडे। अब जनता को फैसला करना है।
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