हैदराबाद में मंगलवार से शुरु हुई तीन दिवसीय ग्लोबल आंत्रप्रेन्योर समिट में अमेरिकी राष्ट्रपति की पुत्री इवांका ट्रंप का शरीक होना और उनके द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ के कसीदें पढना भारत और वाशिंगटन के बीच मधुर संबंधों को उजागर करता है। इवांका न केवल युवा उधमी है और इंटरनेशनल मार्केट में उनका बहुत नाम है, अलबत्ता वे अपने पिता राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक सलाहकार भी हैं । इस समय व्हाइट हाउस में इवांका की तूती बोलती है। भारत ने इवांका के सत्कार में कोई कसर नहीं छोडी। अमूमन, गडढों से भरी हैदराबाद की सडकों को शीशे की तरह चमकाया गया। इस पर हैदराबादियों ने टवीट किया “ काश इवांका हमारी गली में भी आती“। एक अन्य ने टवीट किया,“ हैदराबाद में दो तरह की सडकेँ हैं-एक इवांका ट्रंप रोड और दूसरी सामान्य रोड“। भिखारियों की तो जैसे शामत ही आ गई। पूरे शहर से भिखारियों को हटाया गया। ग्लोबल आंत्रप्रेन्योर समिट में उनके संबोधन को देश -विदेश में लाइव दिखाया गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हैदराबाद के मशहूर फलकनुमा पैलेस में इवांका के लिए रात्रिभोज की मेजबानी भी की। सम्मेलन में इवांका ट्रंप ने भारत में लिंग असमानता का उल्लेख करके अप्रत्यक्ष तौर पर भारतीय समाज पर तंज कसा है। इवांका का आकलन है कि अगर भारत में लिंग असमानता को कम किया जाता है, तो उसके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में अगले तीन सालों में 150 अरब डॉलर का इजाफा हो सकता है। निसंदेह, भारत में अभी भी लिंग असमानता है और महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमजोर समझने की मानसिकता व्याप्त है। संविधान में लिंग समानता की व्यवस्था के बावजूद आजादी के सात दशक बाद भी पुरुषों की तुलना में महिलाओं को समान अवसर मुहैया कराने से हाथ खींच लिए जाते हैं। इसका सबसे बडा प्रमाण दे श की संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाना है। पंचायतों और स्थानीय निकाओं में महिलाओं को माकूल प्रतिनिधित्व देने के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित हैं मगर संसद और विधानसभाओं में आज तक 33 फीसदी आरक्षण नहीं दिया जा सका है। बहरहाल, अमेरिका और भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था में काफी अंतर है मगर भारत की तरह अमेरिका में भी लिंग असमानता व्याप्त है। इवांका ने अपने संबोधन में यह कर इस बात को स्वीकार भी कि पुरुष प्रधान कारोबार में उन्होंने खुद महसूस किया कि बतौर महिला उन्हें अपनी काबलियत को प्रखरता से सिद्ध करना पडा। रोचक पहलू यह है कि इवांका ट्रंप के कारोबार को लेकर आज भी रहस्य बरकरार है। उनके ब्रांड के सप्लायर्स कौन है, इसकी आज तक पुख्ता जानकारी नहीं है। इसी माह अमेरिका के 23 स्वंयसेवी संस्थाओं ने राष्ट्रपति और इवांका की कंपनी से सप्लायर्स के नाम उजागर करने की मांग रखी थी। इस सितंबर को एक समाचार एजेंसी की खोजी खबर में बताया गया था कि इस साल व्हाइट हाउस में राजनीतिक सलाहकार बनने के बाद से इवांका का कारोबार और भी अपारदरर्शी हो गया है। उनकी कंपनी किन लोगों से कार्रोबार कर रही है, इसकी कोई जानकारी नहीं है। हैदराबाद के ग्लोबल आंत्रप्रेन्योर समिट में इवांका ट्रंप की मौजूदगी से अन्य उधमी अप्रसन्न है। इवांका के सम्मेलन में शामिल होने से पूरा आयोजन “इवांका मय“ हो गया है और इसमें राजनीति की “बू“ भी आ रही है। इस सम्मेलन का मूल मकसद “ महिला सबसे पहले, सभी के लिए स्मृद्धि“ है। और इस बात में दो राय नहीं हो सकती है कि महिलाओं की उधमशीलता को प्रोत्साहित करके ही समाज के हर तबके के लिए स्मृद्धि सुनिश्चित की जा सकती है। इसके लिए लिंग में समानता लान बेहद जरुरी है। इस मामले में हरियाणा की उपलब्धि काबिलेगौर है। लिंग असमानता के लिए बदनाम इस राज्य “ बेटी बचाओ, बेटी पढाओ“ योजना को संजीदगी से लागू करके बेहतरीन काम किया है।
गुरुवार, 30 नवंबर 2017
बुधवार, 29 नवंबर 2017
गुजरात का दंगल
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बाईस साल से भी अधिक समय से गुजरात में सत्तारूढ भारतीय जनता पार्टी ने इस बार गुजरात विधानसभा चुनाव में अपनी सारी ताकत झोंक दी है। गुजरात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदौ का गढ है। गुजरात के विधानसभा चुनाव 2019 के लोकसभा चुनाव के कर्टन रेजर माने जा रहे हैं। बतौर प्रधानमंत्री गुजरात में नरेन्द्र मोदी का पहला विधानसभा चुनाव है। पिछले विधानसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और तब भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था। 2012 में मोदी ने कुल मिलाकर 175 छोटी-बडी जनसभाओं को संबोधित किया था। तब वे पार्टी के एकमात्र स्टार प्रचारक थे। इस बार वे देश के प्रधानमंत्री हैं। पार्टी को उम्मीद है कि इस बार पहले से भी अधिक प्रचंड बहुमत मिलेगा। मगर जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और भाजपा के हिन्दुत्व “मुखौटा“ योगी आदित्यनाथ समेत एक दर्जन से ज्यादा मुख्यमंत्री और केन्द्रीय मंत्रियों की फौज पार्टी के लिए धुंआधार चुनाव प्रचार कर रहे हैं। पहली बार भाजपा ने मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए प्रचार में मौलवियों तक को भी झोंका हैं। मौलवियों को उत्तर प्रदेष से लाया जा रहा है। सूरत में मुस्लिम कार्यकर्ता भाजपा के लिए दिन-रात प्रचार कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने सोमवार (27 नवंबर) को कई रैलियां की और अब वे बुधवार (29 नवंबर) को फिर एक के बाद दूसरी जनसभा को संबोधित करेंगें। इन सब बातों से साफ है कि इस बार भाजपा की स्थिति वैसी नहीं है जैसी पहले हुआ करती थी। सोशल मीडिया और वीडियो के माध्यम से एक-दूसरे के आचरण पर प्रहार किए जा रहे हैं। भाजपा ने पाटीदार अनामत आंदोलन के युवा नेता हार्दिक पटेल को लेकर आपतिजनक वीडियो क्लिप्स जारी किए है। और अब भाजपा के विरोधियों ने दो वीडियो क्लिप्स जारी की हैं। एक वीडियो में दावा किया गया है कि सोमवार को प्रधानमंत्री की जनसभाओं में कई जगह खाली कुर्सियां दिखाई गई हैं। एक अन्य वीडियो में मुख्यमंत्री विजय रुपाणी को अपने हलके में पार्टी के बागी उम्मीदवार को मनाते यह कहते हुए दिखाया गया है कि उनकी हालत पतली है। आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। विकास का मुद्दा काफी पीछे छूट चुका है। विकास पगला गया है या नहीं मगर सियासी दल जरुर “पगला गए हैं। चुनाव मुद्दों पर लडे जाते हैं, खोखली बातों से नहीं। भाजपा भी विकास को चुनावी मुद्दा बनाने की बजाए कांग्रेस सरकार के घोटाले और वंशवाद को उछाल रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द मोदी की “चाय बेचने वाली“ पृष्ठभूमि को खूब भुनाया जा रहा है। युवा कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर मोदी की “चाय बेचने वाली“ पृष्ठभूमि का जो मजाक उडाया था, उसे बार-बार उछाला जा रहा है। राहुल गांधी के सॉफ्ट हिन्दुत्व से भी भाजपा तिलमिलाई हुई है। इससे कांग्रेस ने भाजपा की भगवा छवि में सेंध लगाने की सफल कोशिश की है। भाजपा को इस बात का अहसास हो गया है कि इस बार उसकी स्थिति पिछले चुनाव जैसी नहीं है। अब तक भाजपा के प्रबल समर्थक रहे पाटीदार बिदके हुए हैं; पाटीदार आंदोलन के दौरान 12,000 से ज्यादा पाटीदारों की गिरफ्तारी और उन पर किए गए अत्याचार समुदाय आज तक नहीं भूला पाया है। पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल भाजपा को सत्ता से हटाने पर आमादा है और उन्होंने कांग्रेस से हाथ मिला लिया है। ओबीसी नेता अल्पेश ठाकुर भी कांग्रेस में शामिल हो गए हैं। दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। कांग्रेस के समर्थन से वे निर्दलीय चुनाव लड रहे हैं। गुजरात में इन तीन युवा नेताओं ने हवा का रुख बदलने में खासी भूमिका निभाई है। बहरहाल, विकास और ठोस मुद्दों को दर किनार कर गुजरात चुनाव में एक-दूसरे पर जिस तरह से कीचड उछाला जा रहा है, उससे समकालीन राजनीति और बौनी हुई है।
मंगलवार, 28 नवंबर 2017
तख्ता पलट की फिराक में पाक सेना
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पाकिस्तान में सेना और निर्वाचित सरकार में हमेशा छत्तीस का आंकडा रहा है। सेना को जब भी मौका मिला जनता द्वारा चुनी गई सरकार का तख्ता पलट दिया। निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने के लिए कभी मुकदमों का सहारा लिया जाता है तो कभी इस्लामिक कटटरपंथियों को आगे किया जाता है। पाकिस्तान की ताजा महाभारत में सेना कटटरपंथियों को आगे करके फिर जनता द्वारा चुनी गई सरकार को चलता करने की फिराक में है। इस्लामिक कट्टरपंथी पिछले लगभग तीन सप्ताह से भी ज्यादा समय से कानून मंत्री जाहिद हामिद के इस्तीफे की मांग को लेकर इस्लामाबाद में धरने पर बैठे हुए थे। न्यायपालिक क आदेश के वावजूद प्रदर्शनकारी टस-से-मस नहीं हुए। शनिवार को प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक झडपों में छह लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा घायल हो गए थे। इसके बाद हिंसा कई शहरों में फैल गई और सरकार को सेना बुलानी पडी। सेना बैरक से बाहर तो आई मगर हिंसक प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच दंगल में तमाशबीन बनी रही। इससे साफ था कि इन इस्लामिक कट्टरपंथियों को सेना का मूक समर्थन था। सेना के दखल के बाद सोमवार को सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच समझौता हो गया और कानून मंत्री हामिद बलि का बकरा बन गे। उन्होंने फौरन प्रधानमंत्री शाहिद खाकान अब्बासी को अपना इस्तीफा सौंप दिया। इस्लामाबाद में प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व कर रही तहरीक-ए-लब्बैक (टीएलपी) नाम का कटटरपंथी संगठन कानून मंत्री को ईशनिंदा कानून में बदलाव के लिए जिम्मेदार मान रहा है। तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान का गठन 2015 में हुआ था और 2017 में के उतरार्ध में इसे चुनाव आयोग ने मान्यता देकर चुनाव चिंह भी आवंटित कर दिया। तहरीक-ए-लब्बैक शरीयत कानून के सख्त नियमों का पैरवीकार है और स्वंय को पैगम्बर मोहम्मद की सर्वोच्चता का रक्षक बताता है। इसके नेता अल्लामा खादिम हुसैन तेज तर्रार मौलवी हैं। 2 अक्टूबर को पाकिस्तान संसद ने चुनाव सुधार बिल पारित किया था। इस बिल में निर्वाचित नुमाइंदों की शपथ से पैगम्बर मोहम्मद वाला खंड हटा दिया था। इस पर क्ट्टरपंथी भडक गए और सरकार को मात्र दो दिन में फिर से शपथ से हटाए गए खंड को वापस जोडने के लिए बाध्य कर दिया। अपनी जगहंसाई से बचने के लिए सरकार को सफाई देनी पडी कि यह तो “क्लेरिकल मिस्टेक“ थी। मगर टीएलपी कानून मंत्री के इस्तीफे पर अडा हुआ था। इस्तीफे के लिए 5 नवंबर से टीएलपी और एक और कट्टरपंथी संगठन सुन्नी तहरीक ने इस्लामाबाद में धरना शुरु कर दिया। बीच में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए 25 दिसंबर का समय दिया था मगर वे नहीं हटे और पुलिस के साथ झडप के कारण हिंसा भडक गई। सरकार ने मीडिया पर भी पाबंदी लगाई मगर अतंत उसे झुकना ही पडा। ताजा समझौते से फिर स्पष्ट हो गया है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथियों की कितनी चलती है। अगले साल पाकिस्तान में आम चुनाव होने हैं मगर सेना किसी-न- किसी बहाने इससे पहले निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करने का मौका ढूंढ रही है। जुलाई में घूसखोरी के एक मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पद छोडना पडा था। नवाज शरीफ की पार्टी की पंजाब के दक्षिणपंथी महजबी मतदाताओं में अच्छी पकड है और अभी भी उनकी पकड बरकरार है। सेना पहले भी दो बार (1993 और 1999) नवाज शरीफ को अपदस्थ कर चुकी है। अगले साल के आम चुनाव में नवाज शरीफ की पार्टी का जनाधार तोडना आसान नहीं है। तहरीक-ए-लब्बैक के ताजा विरोध प्रदर्शन का असली मकसद नवाज शरीफ के महजबी जनाधार में सेंध लगाना है। सेना भी यही चाहती है और अगले साल आम चुनाव से पहले निर्वाचित सरकार को अपदस्थ करके चुनाव टालने की फिराक में है। बहरहाल पाकिस्तान में सैन्य शासन भारत की स्थिरता के लिए और भी ज्यादा खतरनाक है। कट्टरपंथियों की मदद से भारत को कमजोर और अस्थिर करना पाकिस्तानी सेना का प्रमुख लक्ष्य है।
शनिवार, 25 नवंबर 2017
आधार पर “बेआधार“ स्टैंड
Posted on 5:17 pm by mnfaindia.blogspot.com/
भारत में आधार कार्ड क्या वाकई ही देशहित और जनहित में अनिवार्य है? और क्या आधार से राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को रोका जा सकता है? देश की अवाम इन सवालों का उत्तर तलाश रही है। मोदी सरकार ने तो साफ कह दिया है कि देश के हर नागरिक के लिए “आधार कार्ड “ जरुरी है। और इतना जरुरी कि अगले साल से आधार कार्ड के बगैर बैंकों में आपके खाते बंद कर दिए जाएंगें। अगर ऐसा होता है तो भारत दुनिया का पहला ऐसा देश होगा जहां मात्र एक औपचारिकता के लिए बेंकों के खाते न तो खोले जाएंगें और न ही जारी रह पाएंगें। आधार कार्ड अनिवार्य होना चाहिए या नहीं, इस पर देश की शीर्ष अदालत का फैसला आना अभी बाकी है। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ इस माह (नवंबर) के अंतिम सप्ताह इस मामले पर सुनवाई करेगी और साल खत्म होने से पहले फैसला आने की उम्मीद की जा सकती है। हर देश अपने नागरिकों का डेटा बेस तैयार करने के लिए पुख्ता व्यवस्था विकसित करता है। भारत में संप्रग सरकार के समय देश के सभी नागरिकों की विशिष्ट पहचान के लिए 12 अंकों के आधार कार्ड तैयार करने के वास्ते भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) का गठन किया गया था। तब भारतीय जनता पार्टी ने सरकार की इस पहल को “लोगों की जासूसी“ करने का कदम करार दिया था। देश के हर नागरिक का बायोमेट्रिक डेटा एकत्रित करके आधार कार्ड बनाना प्राधिकरण की प्रमुख जिम्मेदारी है। अब तक 118 करोड (118,92,73,436) से ज्यादा लोगों का डेटा एकत्रित करके आधार कार्ड बनाया जा चुका है। यूआईडीएआई की यह उपलब्धि वास्तव में काबिले तारीफ है। निसंदेह, आधार आर्ड आम आदमी के लिए काफी सुविधाजनक है। इससे पासपोर्ट बनाने, बैक खाता खोलने से लेकर डीबीटी जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ लेना काफी आसान हो गया है। प्रधानमंत्री ने वीरवार को इंटरनेशनल साइबर स्पेस सम्मेलन में आधार कार्ड से आम आदमी को मिलने वाली सुविधाएं गिनाईं और कहा कि आधार-मोबाइल ने लोगों के लिए नए रास्ते खोले हैं। बहरहाल, साइबर एक्सपर्ट भी इस बात को मानते है कि यूआईडीएआई का डेटा बेस कतई सुरक्षित नहीं है और इसके हैक किए जाने की पूरी संभावना है। दुनिया में याहू से लेकर टैक्सी ऑपरेटर्स उबर की ताजा डेटा हैकिंग के मामले साफ संकेत दे रहे हैं कि यूआईडीएआई का डेटा बेस भी चुराया जा सकता है। आधार कार्ड को क्योंकि बैंक खाते और अन्य महत्वपूर्ण लेनदेन से जोडा गया है, इसलिए लोगों के बैक खाते तक भी सुरक्षित नहीं है। सख्त नियमों के बावजूद मोबाइल नंबर और ईमेल आसानी से निजी हाथों में पहुंच जाते हैं और मोबाइल और ईमेल पर बेमतलब के संदेश आते हैं। और इस बात की पूरी संभावना है कि जिस तरह आपके मोबाइल नंबर और ईमेल निजी हाथों मे पहुंच जाते हैं, उसी तरह यूआईडीएआई में आपका बायोमेट्रिक डेटा भी निजी हाथों के पास पहुंच सकता है। इसी सप्ताह यह सनसनीखेजपूर्ण समाचार प्रकाशित हुआ है कि यूआईडीएआई ने आधार डेटा को प्राइवेट कंपननियों के साथ साझा किया है। यह नागरिक की निजता के अधिकार का घोर उल्लघंन है। आधार कार्ड से निजता के अधिकार का सरासर उल्लघंन हुआ है और अगर सरकार ही लोगों की निजता में तांक-झांक करे, तो लोकतंत्र और तानाशाही में क्या फर्क रह जाता है? इसी साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट व्यवस्था दी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत लोगों की निजता के मौलिक अधिकार से कोई छेडछाड नहीं की जा सकती। देश के प्रबुद्ध वर्ग का मानना है कि आधार कार्ड निजता के अधिकार में सरकार का खुला दखल है। बहरहाल, लोगों के काले करनामों पर नजर रखने के लिए पैन कार्ड प्रर्याप्त है। आधार कार्ड को कारोबारी लेनदेन के लिए अनिवार्य बनाना जनहित में नहीं है। सरकार अपनी सवा सौ करोड जनता की निजी जानकारी को खतरे में डाल रही है।
शुक्रवार, 24 नवंबर 2017
“ब्रम्होस“ से भारत का दुनिया मैं डंका
Posted on 7:15 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रम्होस का बुधवार को सुखोई लडाकू विमान से सफलतम परीक्षण करके भारत ने दुनिया में फिर अपना परचम लहराया है। एयर लॉन्च्ड क्रूज मिसाइल परीक्षण की सफलता से भारत की सामरिक क्षमता में खासी बढोतरी हुई है। इससे सीमा पर दूर से किसी भी लक्ष्य को निशाना बनाने की क्षमता में भी खासा इजाफा हुआ है। इस मिसाइल के जल और थल परीक्षण पहले ही हो चुके हैं। ब्रम्होस मिसाइल को भारत और रुस के साझा उपक्रम के तहत तैयार किया जा रहा है। सुखोई विमान आम तौर पर जमीन से तीन से साढे तीन किलोमीटर ऊपर उडता है। इस स्थिति मे अगर ब्रम्होस मिसाइल को सुखोई विमान से दागा जाता है तो इसकी रेंज, मारक क्षमता और ऊंचाई स्वभाविक तौर पर बढ जाती है। ब्रम्होस को दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक मिसाइल माना जाता है। इसकी स्पीड 2.8 मैक है। मैक ध्वनि के बराबर की रफ्तार की इकाई है। ब्रम्होस की रेंज 290 किलोमीटर है और यह 300 किलोग्राम भारी युद्धक सामग्री ले जा सकती है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार एयर लॉन्च्ड क्रूज मिसाइल तकनीक पाकिस्तान तो क्या, अभी चीन के पास भी नहीं है। सामान्य क्रूज मिसाइलें भारत, चीन और पाकिस्तान के पास पहले से है। मिसाइल क्षमता का ख्याल करते हुए इस बात की पूृरी संभावना है कि चीन भी भारत की देखा-देखी इस तकनीक को विकसित कर सकता है। भारत,चीन और पाकिस्तान तीनों ही परमाणू हथियार सपन्न देश हैं और यह स्थिति क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बडा खतरा है। युद्ध की स्थिति में दुनिया में भारी तबाही हो सकती है। पाकिस्तान जिस तरह से आतंक को पाल-पोस कर भारत को अस्थिर करने में लगा हुआ है और चीन उसका भरपूर साथ दे रहा है, उससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढी है और तीनों पडोसी देश युद्ध के मुहाने पर खडे है। इन हालात में तीनों पडोसी देशों को आपस में बातचीत कर इस बात पर सहमत होना चाहिए कि क्रूज मिसाइलों पर परमाणू हथियार नहीं लगाए जाएंगें। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह स्थिति तीनो के लिए बेहद खतरनाक हो सकती है। शीत युद्ध के जमाने में अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ में इस बात पर सहमति बनी थी कि दोनों देश क्रूज मिसाइलों पर परमाणू हथियार नहीं लगाएंगें। इस पर बाकायदा समझौता भी हुआ था। क्षेत्रीय स्थिरता के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच भी इस तरह के समझौते की जरुरत है। भारत और पाकिस्तान दोनों ही परमाणू अप्रसार संधि से बाहर है हालांकि चीन ने इस पर हस्ताक्षर कर रखे हैं। परमाणू अप्रसार संधि से बाहर रहने के कारण ही भारत और पाकिस्तान दोनों नाभिकीय आपूर्तिकर्ता समूह (न्यूुक्लियर सप्लाई गु्रप-एनएसजी) से भी बाहर हैं। बहरहाल, ब्रम्होस ने न केवल भारतीय वायु सेना की मारक क्षमता बढाई है, अलबत्ता भारत के लिए इसे अन्य देशों को बेचने के द्वार भी खोल दिए हैं। भारत अब तक दुनिया में हथियारों का सबसे बडा खरीदार रहा है। ब्रम्होस जैसी मारक मिसाइल की दुनिया में भारी मांग है। इसकी क्षमताओं को देखते हुए कई देशों ने ब्रम्होस मिसाइल में रुचि दिखाई है। ब्रम्होस मूलतः भारत और रुस का साझा उपक्रम है। इसलिए इसका नाम पूर्वोतर की नदी ब्रह्मपुत्र और रुस की मोस्कवा नदी पर रखा गया है। इस मिसाइल की मारक क्षमता सौ फीसदी है। लंबी दूरी से दागने के बावजूद ब्रम्होस मिसाइल अपने निशाने से कभी नहीं चूकती । इसे तैयार करने वाला ब्रम्होस एरोस्पेस अब 800 किलोमीटर की रेंज वाली मिसाइल बना रहा है। इतना ही नहीं ब्रम्होस एरोस्पेस हाइपरसोनिक 6 मैक (ध्वनि से 6 गुना तेज) स्पीड वाली मिसाइल विकसित कर रहा है। 6 मैक स्पीड वाली मिसाइल की मारक क्षमता सामान्य मिसाइल से 36 गुना अधिक होगा। इस मिसाइल के विकसित होने से भारत दुनिया का शहंशाह बन सकता है ।
गुरुवार, 23 नवंबर 2017
आतंकियों का सफाया
Posted on 6:44 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कश्मीर की पहाडियों पर बर्फ पडने से पहले पाकिस्तान को घाटी में भाडे के आतंकियों को भेजने की जल्दी रहती है मगर इस बार सुरक्षा एजेसिंयां ऐसा होने नही दे रही है। कश्मीर मैं आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों की सघन कार्रवाई के सकारात्मक नतीजे सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान के आतंकियों को भागने का मौका तक नहीं मिल रहा है। घाटी में घुसते ही आतंकियों को मार गिराया जा रहा है। सुरक्षा एजेंसियां कश्मीरी अवाम का भरोसा जीतने को प्राथमिकता दे रही है। सेना की जनता में नकारात्मक छवि काफी हद तक सुधरी है। कश्मीर में अलगाववादी और आतंकी संगठन अब तक युवकों को गुमराह कर भारत के खिलाफ भडकाते रहे हैं हालांकि इंटरनेट के जमाने में आतंकियों की राक्षसी मंशा को पूरी दुनिया भली-भांति जानती है। इराक और सीरिया मे इस्लामिक स्टेट के आतंकियों की अमानवीय कृत्यों को भला कैसे भुलाया जा सकता है। इस आतंकी संगठन के लिए मानवता के कोई मायने नहीं है। इस्लाम के नाम पर निर्दोष लोगों की नृशंस ह्त्या करना , बहू-बेटियों को अगवा कर उनका बलात्कार करना और बच्चों को आतंकी बनाकर उनके भविष्य को नष्ट करना कहां की इंसानियत है? पाकिस्तान के आतंकी संगठन भी यही कर रहे हैं। क्या युवकों को यह सब नजर नहीं आता? माना बेरोजगारी और गरीबी जीवन का सबसे बडा अभिशाप है और इनसे त्रस्त युवक किसी भी हद तक जा सकता है। पर यह इतनी भी अभिशप्त नहीं है कि इंसानियत को ही भुला दिया जाए । गरीबी, बेरोजगारी और लोगों से बार-बार के धोखे की विवशता ने कश्मीर के युवकों को आतंक की अंधी गली में धकेला है। 1987 के चुनाव में बडे पैमाने पर धाधलियों ने अवाम के भरोसे को तार-तार क्रर दिया था। नतीजतन, राष्ट्रीय राजनीतिक दलों की क्रेडिब्लिटी जाती रही और अलगाववादी उन पर भारी पडते गए। 1990 आते-आते कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद पनपने लग पडा। कश्मीर में अगर अलगाववाद और आतंक को पछाडना है तो केन्द्र और राज्य सरकार को सबसे पहले अलगाववाद को अलग-थलग कर राजनीतिक दलों को और सशक्त बनाना पडेगा। रोजगार के अवसर सृजित करने पडेंगें और भ्रष्टाचार को मिटाना होगा। कश्मीर को केन्द्र से बराबर उदार वित्तीय सहायता मिलती रही है और विशेष दर्जा भी मिला हुआ है। मगर भ्रष्ट व्यवस्था और दलाल अधिकांश मदद को बीच में ही खा गए। इससे स्थानीय लोग नाराज हुए सो हुए, पाकिस्तान के पिठ्ठुओं को युवकों को भडकाने का पूरा मौका मिल गया। बहरहाल, स्थानीय लोगों का विश्वास जीतने और भटके युवकों को फिर से राष्ट्रीय मुख्य धारा में जोडने के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने विशेष अभियान चला रखा है। सीआरपीएफ ने आत्म समर्पण करने वाले भटके युवकों के लिए एक विशेष कक्ष और नंबर (1441) स्थापित किया है। केन्द्र और राज्य सरकार मिलकर रोजगार परक योजनाएं चला रही हैं। युवाओं की विशेष भर्ती की जा रही है। सेना ने आतंकिओं के प्रति अपनी रणनीति में विशेष बदलाव किया है। आतंकियों को मार गिराने से पहले सुरक्षा एजेंसियों उन्हें आत्म समर्पण का अवसर देती है। युवकों के माता-पिता के माध्यम से भटके युवकों को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोडा जा रहा है। फुटबाल खिलाडी माजिद खान द्वारा आतंकी संगठन में शामिल होने के बाद घर लौट आना इसकी ताजा मिसाल है। सुरक्षा एजेसिंयों की कार्रवाई में अब तक 132 आतंकी मारे जा चुके हैं। इससे आतंकियों के हौसले पस्त हो चुके हैं और उनमें भगदड मची हुई है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में सरकार के खिलाफ विरोध और प्रखर होता जा रहा है। आए दिन वहां जबरदस्त प्रदर्शन हो रहे हैं। हताश पाकिस्तान भारत के खिलाफ ऐसी साजिश रच रहा है, जिससे उसकी अपनी ही जगहंसाई हो रही है। कश्मीर की अवाम भी अब पाकिस्तान की छिछौरी हरकतों को जान चुकी है। ताजा हालत भारत के पक्ष में है और इसका घाटी में शांति बहाली के लिए फायदा उठाया जा सकता है।
बुधवार, 22 नवंबर 2017
मूडीज से बदल गया “मूड“
Posted on 7:11 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने रिफॉर्मस पर मोदी सरकार की पीठ थपथपा कर आलोचकों का मुंह बंद कर दिया है। मूडीज ने पिछले शुक्रवार को जारी रेटिंग में 14 साल बाद भारत की रेटिंग बढाई है। ताजा रेटिंग में भारत को “पॉजीटिव“ से “स्टेबल“ का दर्जा दिया गया है। स्टेबल रेटिंग से भारत में विदेशी निवेश और बढ सकता है और इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को गति मिल सकती है। मूडीज ने भारत की रेटिंग में सुधार के लिए चार कारण गिनाए हैं। मूडीज का आकलन है कि भारत में आर्थिक सुधार को गति मिलने से बिजनेस क्लाइमेट बेहतर हुआ है। विदेशी और घरेलू निवेश बढा है और उत्पादकता में तेजी आई है। इससे ग्रोथ और मजबूत हुई है। मूडीज ने अपने आकलन में नोटबंदी और जीएसटी के आलोचकों को भी माकूल जवाब दिया है। रेटिंग में कहा गया है कि नोटबंदी, जीएसटी, आधार और डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) जैसे कारगर उपायों से अर्थव्यवस्था को लांग टर्म में खासा फायदा होगा। इन उपायों से भले ही अल्पकाल में अर्थव्यवस्था को झटका लग सकता है मगर दीर्घकाल में इनसे ग्रोथ और तेज होगी। सरकार भी अब तक यही कह रही है। मूडीज ने सरकार के पक्ष को और मजबूत किया है। भारत की मजबूत सार्वजनिक ऋण व्यवस्था (स्टेबल पब्लिक इनडेटनेस) को मूडीज ने रेटिग बढाने का तीसरा कारण बताया है। नोटबंदी, जीएसटी, आधार और डीबीटी जैसे कारगर उपायों से भारत की सार्वजनिक ऋण व्यवस्था मजबूत हुई है। सरकार के घूसखोरी रोधी, काले धन के खिलाफ कार्रवाई और प्रभावी सरकारी टैक्स कलेक्शन जैसे स्ट्रक्चरल रिफॉर्मस ने संस्थागत क्रेडिब्लिटी में खासा इजाफा हुआ है। खराब ऋण की समस्या से जूझ रहे सरकारी बैंकों के लिए 2,11 खरब रु पुनर्पंूजीकरण योजना ने भी भारत की छवि को निखारा है। यह रेटिंग बढाने के लिए पर्याप्त है। इससे निजी निवेश को खासा प्रोत्साहन मिला है। मूडीज की रेटिंग से मोदी सरकार का आत्मविश्वास बढा है और पिछले सप्ताह इसका असर देखने को भी मिला। वीरवार को सरकार अर्थव्यवस्था में और जान फूंकने के लिए अपने बजटीय घाटे के लक्ष्य में ढील देने के लिए तैयार थी। मोदी सरकार ने बजटीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 3 फीसदी तक लाने का लक्ष्य रखा है। अगर 2018 तक इस लक्ष्य को हासिल करना है तो सरकार को अपने खर्चों और सब्सिडी में अविलंब कटौती करनी पडेगी। 200 वस्तुओं पर से जीएसटी घटाकर मोदी सरकार को 20,000 करोड रु के राजस्व का नुकसान उठाना पड रहा है। वीरवार तक सरकार के समक्ष समस्या यह थी कि इस नुकसान की भरपाई करे तो कैसेे? मोदी सरकार के पास बजटीय घाटे से पूरा करने के अलावा फिलहाल कोई चारा नहीं था मगर बजटीय घाटा नियंत्रण लक्ष्य आडे आ रहा था। शुक्रवार के बाद से सरकार बजटीय घाटे को लेकर ज्यादा उदार नजर आ रही है। 2008 की वैश्विक मंदी का सही आकलन करने में विफल रहने के बाद हालांकि मूडीज अथवा अन्य अंतरराष्ट्रिय रेटिंग एजेंसियों की विश्वसनीयता घटी है मगर अभी भी अंतरराष्ट्रीय कर्ज लेने और विदेशी निवेश आकर्षित करने में रेटिंग की अहम भूमिका रहती है। बहरहाल, गुजरात विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मूडीज की रेटिंग ने सतारूढ दल भाजपा को विपक्ष पर प्रहार करने का धारदार हथियार मिल गया है। काग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान नोटबंदी और जीएसटी को लेकर प्रधानमंत्री पर तीखे हमले कर रहे है़ं। जीएसटी को राहुल गांधी “गब्बर सिंह टैक्स“ बताकर इसे आम आदमी का दुश्मन बता रहे हैं। बहरहाल, एक जमीनी सच्चाई यह भी है कि ताजा रेटिंग से अगर सरकार की विष्वसनीयता बढी है तो जनता की अपेक्षाओं को 2019 से पहले पूरा करने का दबाव भी बढा है। विपक्ष में रहकर आरोप लगाना आसान है मगर जन अपेक्षाओं को समय रहते पूरा करने वाली सरकार चलाना बेहद कठिन ।
मंगलवार, 21 नवंबर 2017
राहुल गांधी की ताजपोशी
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नेहरु-इंदिरा गांधी परिवार के वारिस राहुल गांधी को माता सोनिया गाधी का उत्तराधिकार बनाने के लिए कांग्रेस ने 4 दिसंबर की तारीख मुकर्रर की है। कांग्रेस अपने अध्यक्ष को लोकतांत्रिक तरीके से चुनने का बाकायदा आडंबर करती है। यह बात दीगर है कि पिछले 19 साल से सोनिया गांधी निर्विरोध अध्यक्ष चुनी जाती रही हैं और अब राहुल गांधी का चुनाव भी सर्वसम्मति से होना निश्चित है। पार्टी में किसी की क्या मजाल कि गांधी परिवार के खिलाफ चुनाव लडे। बहरहाल, कांग्रेस ने पार्टी अध्यक्ष चुनाव के लिए नामांकन पर्चा दाखिल करने की तारीख 4 दिसंबर तय की है। और अगर जरुरी हुआ तो 15 दिसंबर को चुनाव होगा और 19 दिसंबर को परिणाम निकाले जाएंगें। मगर यह सब फिजूल की कवायद है। कांग्रेस का हर छोटा-बडा कार्यकर्ता और नेता अर्से से राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की पुरजोर मांग कर रहे हैं। इस बार पूरी तैयारी कर ली गई है। कांग्रेस चाहती है कि गुजरात में 9 दिसंबर को मतदान होने से पहले राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष चुन लिया जाए। राहुल गांधी जिस तरह से गुजरात में पार्टी के लिए प्रचंड चुनाव प्रचार कर रहे हैं और प्रधानमंत्री पर एक के बाद दूसरा तीखा हमला कर रहे हैं, उसके मद्देनजर पार्टी के आला नेताओं को लगता है कि वे पार्टी का नेतृत्व संभालने की अग्निपरीक्षा में पास हो गए हैं। पार्टी को इस बात की भी कोई परवाह नही है कि दुनिया के सबसे विशाल लोकतंत्र और देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी में आखिर परिवारवाद का बोलबाला ही क्यों? क्या कांग्रेस में नेहरु-गांधी परिवार के अलावा कोई भी दमदार नेता नहीं है? सच कहा जाए तो राहुल गांधी नेहरु परिवार के वंशज तो है मगर गांधी परिवार के नहीं। राहुल के दादा फिरोज गांधी मूलतः पारसी थे और उनका असली नाम फिरोज जहांगीर “घांदी“ था। मुंबई के पारसी परिवार में जन्मे फिरोज “घांदी “ 1930 में पढाई छोडकर स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पडे। महात्मा गांधी से प्रेरित होकर उन्होंने 1930 में अपना उपनाम “घांदी“ से बदलकर “गांधी“ रख लिया था। इंदिरा गांधी से उनका ब्याह 1942 में हुआ था। बहुत से लोग आज भी इस मुगालते में है कि फिरोज गांधी ने इंदिरा गांधी से ब्याह के बाद पत्नी के कहने पर अपना उपनाम “घांदी “ से बदलकर “गांधी“ रखा था। बहरहाल, राहुल गांधी की ताजपोशी से कांग्रेस को और कुछ मिले या न मिले मगर युवा नेतृत्व मिलने से पार्टी में नया रक्त संचार हो सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस पंजाब को छोडकर लगातार एक के बाद दूसरा चुनाव हारती रही है। इससे कांग्रेस के आम कार्यकर्ता्ओं का मनोबल निरंतर गिरा है। पार्टी कार्यकर्ताओं की सक्रियता के बगैर कांग्रेस न तो काडॅर-मजबूत भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं और न ही फिर से सत्ता में आ सकती है। भारत की 75 फीसदी आबादी अपेक्षाकृत युवा है और इसी युवा शक्ति के समर्थन से भाजपा और नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में बडा जनादेश मिला था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में युवाओं से दस करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा किया था। मगर साढे तीन साल में भी यह वायदा पूरा नहीं हुआ है। यही वजह है कि देश के विभिन्न समुदायों में सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मंाग बढ रही है। गुजरात में पाटीदार और हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग पर अडे हुए हैं। भाजपा जब विपक्ष में थी, तब पार्टी ने इस मांग को खूब हवा दी थी मगर अब पीछे हट गई है। नोटबंदी और आनन-फानन में लागू किए गए जीएसटी ने बेरोजगारी को और बढाया है। ताजा हालात में राहुल गांधी की ताजपोषी ग्रांड ओल्ड पार्टी के लिए संजीवनी बुटि साबित हो सकती है। पार्टी पहले से ही लोकप्रियता के निम्न पायदान पर है और कांग्रेस को वाकई ही “तारणहार“ की अविलंब जरुरत है।
सोमवार, 20 नवंबर 2017
पदमावती पर घमासान
Posted on 6:50 pm by mnfaindia.blogspot.com/
फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली और विवाद का “चोली-दामन“ का साथ है। मगर इस बार उनकी ऐतिहासिक कलाकृति “पद्मावती “ पर रिलीज होने से पहले उठा विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। राजपूत वीरांगनाओं, करणी सेना से लेकर उत्तर प्रदेश और अन्य भाजपा शासित राज्य और भाजपाई नेता फिल्म को रिलीज होने से पहले ही बडे पर्दे पर से उतारने पर आमादा है। राजपूत संगठन अखंड राजपूताना सेवासंघ ने इस फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है । राजपूत आन-बान की रक्षा करने का दम भरने वाली ”करणी सेना” ने तो “पद्मावती “ की मुख्य किरदार मशहूर अभिनेत्री दीपिका पादुकोन का नाक काटने और भंसाली का सिर कलम करने की धमकी तक दे डाली है। मार्च में फिल्म की शूटिंग के दौरान भी राजपूत संगठनों ने अपना विरोध जताते हुए सेट को आग लगा दी थी और संजय लीला भंसाली को थप्पड तक जडे थे। बाद में जैसे-तैसे इस विरोध को शांत कर दिया गया लेकिन सितंबर में फिल्म का पहला लुक सामने आने के बाद विरोध फिर भडक उठा। और अब फिल्म को लेकर जिस तरह के उदगार व्यक्त किए जा रहे हैं, उससे भारतीय सभ्याचार भी शर्मसार हो गया है। उज्जैन के भाजपा सांसद चिंतामणी मालवीय ने फेसबुक पर पोस्ट में कहा है, “ जिनकी औरतें हर रोज शौहर बदलती हैं, वो जौहर को क्या जाने“। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज धर्म निभाने की बजाए “कानून एवं व्यवस्था“ का हवाला देकर फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग कर रहे हैं। रोचक बात यह है कि अभी न तो फिल्म रिलीज हुई है और न ही यह फिल्म सेंसर बोर्ड ही पहुंची है। विरोध करने वाले किसी ने भी फिल्म नहीं देखी है और सुनी-सुनाई बातों पर फिल्म का विरोध किया जा रहा है। राजपूतों को फिल्म में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी (फिल्म में यह यह किरदार रणबीर सिंह का है) के बीच कथित तौर पर दर्षाय प्रेम प्रसंगों पर सख्त ऐतराज हैं। खिलजी को आला दर्जे का ऐय्याश और लंपट माना जाता है। इसी ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में खिलजी और पद्मावती के प्रेम संबंधों को अपमानजनक माना जा रहा है। राजपूत संगठनों को फिल्म में ऐतिहासिक घटनाओं को तोड-मरोड कर पेश करने पर भी ऐतराज है। फिल्म में दीपिका के “घूमर“ डांस को राजपूत महिलाओं ने उनकी आन-बान के खिलाफ बताया है। उनका कहना है कि महारानियां दीपिका की तरह नाचती नहीं थी। और ऐतिहसिक सच्चाई भी यही है कि शाही घराने की महिलाएं पर्दे में रहती थीं और इस तरह नाचा नहीं करती थी। “घूमर“ में दीपिका के भडकीले वस्त्रों को भी राजपूताना महिलाओं का घोर अपमान बताया जा रहा है। फिल्म निर्माता संजय भंसाली ने वीडियो जारी करके राजपूतों की इन आशंकाओं को दूर करने की कोशिश की है और स्पष्ट किया है कि फिल्म में खिलजी और पद्मावती के बीच कोई प्रेम प्रसंग नहीं है। फिल्म में पद्मावती का किरदार 15वीं शताब्दी के कवि मलिक मोहम्मद जायसी के काव्य संग्रह “पदमावत“ से प्रेरित है। रानी पदमावती का उल्लेख साहित्य में तो है मगर इतिहास में चितौडगढ की महारानी का कोई उल्लेख नहीं है। मगर भारतीय जनमानस में रानी पद्मावती अथवा पद्मिनी की छवि एक ऐसी वीरागंना की है जिन्होंने खिलजी जैसे कामुक शासक की बुरी नजर से बचने के लिए आत्म-दाह कर लिया था। भंसाली की फिल्म में इस तरह का चित्रण नहीं है। इसीलिए इसका मुखर विरोध किया जा रहा है। बहरहाल, विरोध जताने पर किसी को ऐतराज नहीं है मगर नाक काटने और सर कलम करने जैसी अमानवीय धमकियां भारतीय सभ्याचार का हिस्सा नहीं है। भगवा पार्टी के शासन में असहिषुणता चरम पर है। सरकार ने दो फिल्मों- “न्यूड“ और मलयालम फिल्म एस दुर्गा- को गोवा फिल्म उत्सव से ड्रॉप करके वही किया है जो पद्मावती का विरोध करने वाले कर रहे हैं। कलात्मक आजादी को दबाकर देश का कोई भला नही होने जा रहा है।
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
मोदी की बढती लोकप्रियता !
Posted on 7:08 pm by mnfaindia.blogspot.com/
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के समकालीन नेताओं में सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। इतने कि कोई भी दूसरा नेता उनकी लोकप्रियता की सानी नहीं रखता। यह निष्कर्ष अमेरिकी के थिंक टैंक प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा कराए गए ताजा सर्वेक्षण का है। बुधवार को जारी इस सर्वेक्षण के अनुसार 88 फीसदी भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अन्य सभी नेताओं से बेहतर मानते हैं और उनके कामकाज से संतुष्ट हैं। अन्य कोई भी नेता मोदी की लोकप्रियता के आसपास नहीं है। राहुल गांधी 58 फीसदी लोगों की पसंद है। नोटबंदी से भी प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता में कोई फर्क नहीं पडा है। प्यू रिसर्च सेंटर ने यह सर्वे इस साल 21 फरवरी और 10 मार्च के बीच कराया था। यही वह समय है जब नोटबंदी के कारण नगदी का संकट अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ था। सर्वे के अनुसार दस में से आठ का कहना था कि देश के आर्थिक हालात काफी अच्छे हैं। सर्वेक्षण के मुताबिक दक्षिण भारत- तमिल नाडु, आंध्र प्रदेश , कर्नाटक और तेलगांना- और पश्चिम भारत- महाराष्ट्र , गुजरात और छतीसगढ- में मोदी की लोकप्रियता और बढी है। इन राज्यों में द्स मेंसे 9 लोग प्रधानमंत्री की कार्यशैली के कायल हैं। भाजपा के लिए ये सकारात्मक निष्कर्ष हैं। गुजरात में अगले माह और छतीसगढ में अगले साल विधनसभा चुनाव होने हैं। कुल मिलाकर 70 फीसदी (10 मेंसे 7) लोग मौजूदा हालात और सरकार के काम से पूरी तरह से संतुष्ट हैं । दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल की छवि को सबसे ज्यादा धक्का लगा है। केवल 38 फीसदी ने केजरीवाल को बेहतर माना है। इस मामले में वे राहुल गांधी और सोनिया गांधी से भी पीछे हैं। सोनिया को 57 फीसदी और राहुल गांधी को 58 फीसदी लोगों ने बेहतर माना है। कांग्रेस के लिए यह खुशखबरी है कि राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री मोदी से 30 फीसदी ही पीछे हैं। बहरहाल, प्यू रिसर्च सेंटर की ताजा रिपोर्ट और इंडिया टुडे द्वारा मोदी के तीन साल का कार्यकाल पूरा होने पर कराए गए सर्वे के निष्कर्षों में काफी अंतर है। इंडिया टुडे ने मई माह के बाद सर्वेक्षण कराया था और प्यू रिसर्च सेंटर ने मई से पहले। इंडिया टुडे के सर्वेक्षण में 63 फीसदी लोगों ने प्रधानमंत्री के कामकाज को बेहतर बताया था और उन्हें बेहतरीन नेता। इन सर्वेक्षणों का एक कॉमन निष्कर्ष यह है कि दोनों ने समकालीन नेताओं में राहुल गांधी को ही मोदी का बेहतर विकल्प बताया है। प्यू रिसर्च सेंटर ने 58 फीसदी लोगों ने मोदी का निकटतम विकल्प बताया है। इंडिया टुडे के सर्वे में 22 फीसदी लोगों ने राहुल गांधी को मोदी का उम्दा विकल्प बताया है। इस सर्वेक्षण में राहुल गांधी को मोदी से लोकप्रियता में 41 फीसदी पीछे बताया है तो प्यू रिसर्च सेंटर ने 30 फीसदी पीछे । यानी दोनों में लोकप्रियता का फासला उतरोतर कम होता जा रहा है। इसके यह मायने निकाले जा सकते हैं कि देश का अवाम अब राहुल गांधी के नेतृत्व को स्वीकार करने लग पडा है। भाजपा अभी भी राहुल गांधी को “पप्पू“ कहकर उनकी नेतृत्व क्षमता का मखौल उडाती है। यहां तक कि राहुल गांधी को “पप्पू“ बताने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के विज्ञापनों पर चुनाव आयोग को प्रतिबंध लगाना पडा। गुजरात विधानसभा चुनाव में अपने प्रचंड चुनाव प्रचार से राहुल गांधी ने यह सिद्ध भी कर दिया है। चुनाव में हार-जीत तो चलती रहती है। भाजपा इस सच्चाई को जानती है। 1980 में अस्तित्व में आने के बाद से भाजपा को 2014 तक लोकसभा में अपने बूते स्पष्ट बहुमत लेने के लिए लंबा सफर करना पडा है। राहुल गांधी को भी अभी लंबा सफर तय करना है। फिलहाल, नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता चरम पर है और राहुल को छोडकर समकालीन नेताओं में किसी में भी उन्हें चुनौती देने का दमखम नहीं है। राकांपा के अध्यक्ष शरद पवार ने भी इस बात को माना है।
गुरुवार, 16 नवंबर 2017
फिर महंगाई मार गई
Posted on 7:01 pm by mnfaindia.blogspot.com/
मोदी सरकार को सत्ता में आए तीन साल से ज्यादा का समय हो गया है मगर आम आदमी के अच्छे दिन आने तो क्या, बुरे दिनों का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। किचन किंग प्याज फिर रुलाने लग पडा है। एक साल में प्याज के दामों में 127 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हुई है। प्याज को लेकर अजीब सी स्थिति है। आंकडों के अनुसार अप्रैल से जुलाई के दौरान भारत ने 59 फीसदी ज्यादा प्याज का निर्यात किया है। इसी वजह मंडियों में प्याज की किल्लत हो गई है। अब सरकार चीन और मिस्त्र से प्याज का आयात करने जा रही है। सब्जियों के दामों में अक्टूबर माह में ही दोगुना इजाफा हुआ है। ताजा आंकडों के अनुसार सितंबर में 15.48 फीसदी की तुलना में अक्टूबर में सब्जियों की मुद्रा-स्फीति बढकर 36.61 फीसदी हो गई थी। अक्टूबर में थोक महंगाई छह माह के उच्च स्तर 3.59 फीसदी पर पहुंच गई है। अक्टूबर में रिटेल महंगाई भी सात माह के उच्च स्तर पर थी। टमाटर के दाम भी आसमान को छू रहे हैं। किसानों को दलहनों के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं और आढती औने-पौने दामों में खरीद कर खुदरा में ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं। सरकार का सर्मथन मूल्य मंडियों में कोई मायने नहीं रखता। मध्य प्रदेश में दमोह जिले के एक किसान ने उडद के वाजिब दाम नहीं मिलने से आत्मह्त्या करने की कोशिश तक की। सरकार ने दलहन का समर्थन मूल्य 5400 रु क्विंटल तय कर रखा था मगर मंडी में किसानों को 1200 रु क्विंटल दिया जा रहा था। मध्य प्रदेश की मंडियों में उडद, तुअर और मूंग न्यूनतम समर्थन मूल्य से काफी नीचे बिक रही है। थोक मंडियों में उडद औसतन 15 रु किलो बिक रही है और खुदरा बाजार में टमाटर 75 रु किलो। यानी एक किलो टमाटर के लिए पांच किलो उडद बेचनी पडती है। इन हालात में बेचारा किसान करे तो क्या करे़? मध्य प्रदेश ही नहीं, पूरे देश की मंडियों का यही सूरत-ए-हाल है। बेरोजगारों की संख्या में भी खासी वृद्धि हुई है। 2013 में आगरा की रैली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक करोड रोजगार के अवसर सृजित करने का वायदा किया था। आंकडों के अनुसार 2013-14 में 4.9 फीसदी की तुलना में 2015-16 में बेरोजगारी 5 फीसदी थी। 2016-17 के आर्थिक सर्वेक्षण में भी साफ कहा गया है कि रोजगार के बहुत ज्यादा अवसर सृजित नहीं हो पाए है़ं। भाजपा नीत संप्रग सरकार के सत्ता में आने के बाद से गुलजार रहे शेयर बाजार में इन दिनों मंदी व्याप्त है। चौतरफा बिकवाली से बुधवार को शेयर बाजार में मायूसी छाई रही। गला काट प्रतिस्पर्धा से टेलिकॉम सेक्टर का बुरा हाल है। नगदी के संकट और लगातार घाटे से जूझ रहे ऑप्रेरेटरों को अपनी संपत्तियां बेचने पर विवश होना पड रहा है। इस सोमवार को अनिल अंबानी का रिलांयसकॉम पहली बार अपने अंतराष्ट्रीय कर्जे की किस्त तक नहीं चुका पाया। यह कंपनी करीब-करीब दिवालिया होने की कगार पर है। आरकॉम के शेयर दस रु से भी कम दाम पर बिक रहे हैं। एक जमाने में बुलंदियां छू रहा रियल्टी सेक्टर मंदी की चपेट में है और इससे उभर नहीं पा रहा है। सरकारी बैकों का बुरा हाल है। सरकार द्वारा भारी पूंजी निवेश के बावजूद बैको की नॉन परफार्मिंग एसेटस उत्तरोतर बढती जा रही है। बाजार में अभी भी नगदी का संकट है। इन सब का असर रोजगार पर पडा है। आर्थिक गतिविधियां सिमटने से बेरोजगारी और बढी है। निष्कर्ष यह है कि महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड कर रखी दी है। किसान बेहाल है और रोजगार नहीं मिलने से देश में मांग नहीं उठ रही है। इसके बावजूद भी अगर कोई कहे कि सब-कुछ ठीक-ठाक है, तो वह भारी मुगालते में है। जमीनी हकीकत से आंखें मूदना कोई बुद्धिमता नही है। आम आदमी का धैर्य कभी भी जवाब दे सकता है।
बुधवार, 15 नवंबर 2017
आसियान और भारत
Posted on 7:09 pm by mnfaindia.blogspot.com/
फिलीपींस की राजधानी मनीला में मंगलवार को सपन्न दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के समूह “आसियान“ में भारत का दबदबा और बढा है। दस एशियाई देशों के इस समूह में भारत भी अमेरिका चीन और जापान की तरह पर्यवेक्षक है, सदस्य नहीं। ठीक पचास साल पूर्व 1967 में इंडोनेशिया, मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड और फिलीपींस ने जब “आसियान“ बनाया था, तब किसी को उम्मीद नहीं थी कि यह समूह इतना लंबा सफर सफलतापूर्वक तय कर लेगा। 50 साल के सफर के दौरान इस समूह में विएतनाम, बू्रनी, लाओस, कंबोडिया और म्यांमार भी जुड़ चुके हैं और आज यह समूह एशिया प्रशांत का ताकतवर संगठन है। आसियान की सबसे बडी सफलता यह है कि समूह ने आपसी मसलों को मिल-बैठकर सुलझाया है और इससे समूह और मजबूत हुआ है। समूह की एकता भी काबिलेतारीफ है। आसियान भले ही विकासशील देशों का समूह है मगर अमेरिका, जापान और चीन जैसे बडे मुल्क इसमें खासी रुचि रखते हैं। और हकीकत भी यही है कि अमेरिका और चीन की रुचि के कारण इस समूह का मह्त्व बडा है। भारत पिछले 25 सालों से आसियान से लगातार बातचीत का क्रम जारी रखे हुए हैं । इससे भारत का आसियान देशों के साथ व्यापार बढा है। चीन के दबदबे को संतुलित करने के लिए आसियान में भारत की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। आासियान देश भारत को अधिकाधिक जिम्मेदारी देना चाहते हैं। इसीलिए हर सम्मेलन में भारत को न्यौता दिया जाता है। अमेरीका भी आसियान में भारत की अहम भूमिका को स्वीकार करने लग पडा है और वह अब एशिया प्रशांत को भारत प्रशांत कहने लग पडा है। एक जमाने में आसियान में अमेरिका का दबदबा था और करीब-करीब हर देश मे उसके सैन्य अड्डे हुआ करते थे। मगर अब स्थिति काफी बदल गई है और अमेरिका की जगह चीन का आसियान मे ज्यादा दबदबा है। आसियान देश व्यापार के लिए काफी हद तक चीन पर निर्भर हैं। अमेरिका को यह गवारा नहीं है और वह भारत को आगे करके चीन को कमजोर करना चाहता है। दक्षिण चीन सागर (साउथ चाइना सी) में चीन का बढता प्रभाव और उसकी विस्तारवादी भूख आसियान देशों के लिए सबसे बडा खतरा है। बीजिग दक्षिण चीन सागर को अपने प्रभाव में लाना चाहता है जबकि अमेरिका और आसियान देश इसे मुक्त व्यापार क्षेत्र बना कर रखना चाहता है। इस क्षेत्र से लगभग पाच अरब डॉलर का वैश्विक व्यापार किया जाता है। दक्षिण चीन सागर में अमेरिका और कई आसियान देश “ नेविगन ऑपरेशन“ भी चलाते हैं। चीन को इस पर ऐतराज है। अमेरिका ने कई बार आसियान सम्मेलन में दक्षिण चीन सागर से जुडे मुद्दों को उठाने के प्रयास किए मगर चीन ने ऐसा नहीं होने दिया। भारत का भी काफी बडा व्यापार दक्षिण चीन सागर से होकर गुजरता है। इस स्थिति में भारत भी इस मामले में दखल देता रहता है। बहरहाल, मनीला के आसियान सम्मेलन में भारत को पहली बार खासी तवज्जो मिली है। इसकी प्रमुख वजह है: भारत प्रशांत को मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने के लिए भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के समूह को पुर्नजीवित करना। इसका प्रमुख मकसद दक्षिण चीन सागर में बीजिंग की संभावित बडी कार्रवाई के लिए तैयार रहना है। आसियान देश इस पहल को सकारात्मक मानते हैं। आसियान मुल्क चीन को अजगर मानते हैं जो उन्हें कभी भी निगल सकता है। आसियान देश चीन से कितना डरते है, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि आज तक आसियान सम्मेलन में दक्षिण चीन सागर में चीन के अतिक्रमण के खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला गया है। दक्षिण चीन सागर में चीन के घिरने से ड्रेगन भारत के साथ सीमा पर तनाव उत्पन करने से भी बाज आएगा। चीन, भारत को घेरने के लिए खुलकर पाकिस्तान को आगे कर रहा है। भारत आसियान के सहयोग से चीन पर बाजी पलट सकता है।
मंगलवार, 14 नवंबर 2017
Kashmir Talks: The endless Futile Exercise
Posted on 7:06 pm by mnfaindia.blogspot.com/
कश्मीर लिए केन्द्र सरकार के वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा तीन दिन का दौरा पूरा कर दिल्ली लौट आए हैं। अपने दौरे के दौरान शर्मा ने घाटी में दर्जनों शिष्टमंडलों से मुलाकात की। इनमें मुख्यधारा से जुडे सियासी नेता भी शामिल थे। मगर अलगाववादी नेताओं ने उनसे दूरी बनाए रखी। अलगाववादी कैंप से कोई भी नेता उनसे मिलने नहीं गया। अलगाववादी नेताओं की तिकडी- सैयद अली गिलानी, यासीन मलिक और मीरवाइज उमर फारूक ने पहले ही साफ-साफ कह दिया था कि अलगाववादी वार्ताकार से नही मिलेंगे। अलगाववादियों के इस स्टैंड से कश्मीर में वार्ता की पहल शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई थी। राज्य के प्रमुख सियासी दल नेशनल कांफ्रेंस ने भी वार्ता की पहल को निरर्थक बताकर इसे तगडा झटका दिया था। वार्ताकार शर्मा की पहल से कुछ हासिल हो पाएगा, इसकी क्षीण संभावनाएं भी नजर नहीं आ रही हैं। अलगाववादियों को शामिल किए बगैर कश्मीर में वार्ता के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। और न ही अलगावावादियों को मुख्यधारा में शामिल किए बगैर कश्ममीर में शांति बहाल हो सकती है। अलगाववादी पाकिस्तान की स्वीकृति के बगैर कोई काम नहीं करते हैं। कश्मीर में अमन-चैन बहाल हो, पाकिस्तान ऐसा किसी भी सूरत में नहीं होने देगा। इन हालात में जो लोग अलगाववादियों के बगैर कश्मीर वार्ता के ठोस नतीजे आने की संभावनाएं तलाश रहे हैं, उन्हे अतीत में झांकना चाहिए। आज तक कश्मीर के लिए जितने भी वार्ताकार नियुक्त किए गए हैं, कोई भी समस्या का रत्ती भर हल नहीं ढूंढ पाया। और अगर समस्या को हल करने के किए गंभीरता से प्रयास हुए भी, केद्र ने उन पर पानी फेर दिया। 2001 में केसी पंत को वार्ताकार नियुक्त किए जाने पर पहली बार कश्मीर की अवाम मैं शान्ति बहाल होने की आशा जगी थी मगर इससे पहले की वार्ताकार कुछ कर पाते, दिसंबर 2001 में संसद पर आतंकी हमले ने दोनों देशों को युद्ध की कगार पर खडा कर दिया था। इस स्थिति में केन्द्र सरकार को वार्ता की पहल ही समाप्त करनी पडी। 2002 में नामचीन वकील एव राजनीतिज्ञ राम जेठामलानी के नेतृत्व में आठ सदस्यों की टीम घाटी में अमन-चैन बहाल करने के लिए पहुंची मगर कुछ हासिल नहीं हुआ। फिर 2003 में एन एन वोहरा को कश्मीर के लिए वार्ताकार बनाया गया। वोहरा पूरे पांच साल 2008 तक कोशिश करते रहे और फिर उन्हें जम्मू-कश्मीर का राज्यपाल भी बनाया गया मगर उनकी कोशिशों का भी कोई नतीजा नहीं निकला। वोहरा अभी भी जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं। 2010 में मशहूर पत्रकार दिलीप पड्गांवकर की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय वार्ताकार समिति बनाई गई। समिति ने 2012 को अपनी रिपोर्ट में 1953 से पहले की स्थिति की बहाली की मांग को नामंजूर करते हुए जम्मू-कश्मीर मैं लागू सभी विशेष व्यवस्थाओं की समीक्षा के लिए संवैधानिक समिति गठित करने की सिफारिश की थी। समिति ने आर्टिकल 370 को बरकरार रखने पर भी जोर दिया था। समिति की रिपोर्ट संबंधित मंत्रालय (नॉर्थ ब्लॉक) में आज तक धूल फांक रही है। इसके बाद भाजपा के सीनियर नेता यशवंत सिंहा ने भी कश्मीर पर पहल की। इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। निष्कर्ष यह है कि कश्मीर के लिए वार्ताकार तो नियुक्त कर लिया जाता है, मगर आगे कुछ नहीं किया जाता। कश्मीर की अवाम को लगता है कि नई दिल्ली के पास उनकी समस्या को हल करने की इच्छा शक्ति ही नहीं है। मौजूदा हालात में कश्मीर “वार्ता का विकल्प“ ही अप्रासंगिक हो चुका है। कश्मीरियों को लगता है कि केन्द्र सरकार सिर्फ वार्ता की पहल का ढोंग करती है। पूरी दुनिया जानती है कि अलगाववाद कश्मीर समस्या का केन्द्र बिंदू हैं। अलगाववादियों को कश्मीर के अवाम से अलग-थलग किए अथवा उन्हें वार्ता में शामिल किए बगैर राज्य में शांति बहाली के कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकते है। कश्मीर घाटी की दीवारों पर चिन्हित इबादत साफ-साफ यही कह रही है।
सोमवार, 13 नवंबर 2017
घुट-घुट कर मरती दिल्ली?
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राजधानी दिल्ली समेत उतर भारत (इंडो-गंगा का पूरा क्षेत्र) में बढते प्रदूषण के लिए कौन जिम्मेदार है? इस सवाल पर देश के सियासी दल एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में खरीफ फसल की कटाई के बाद किसानों द्वारा पराली जलाने से हर साल दिल्ली समेत उत्तर भारत में प्रदूशष खतरनाक स्तर को भी पार कर जाता है। नासा के ताजा डेटा के अनुसार 27, 29 और 31 अक्टूबर को पराली जलाने के काम में खासा इजाफा हुआ था और यह ज्यादातर पंजाब में केन्द्रित था। इसकी वजह से दिल्ली और उत्तर भारत की हवा में इस कद्र जहर घुल गया कि दिल्ली और पंजाब में स्कूलों को बंद करना पडा। बढते प्रदूषण के कारण राजधानी में लोगों का सुबह- शाम घुमना-फिरना तक बंद हो गया है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने की वजह से समूचे उत्तर भारत में इस सप्ताह प्रदूषण बढने से लोगों का सांस लेना भी दुर्भर हो गया है। मगर नासा की ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा भी किया गया है कि पराली का जलाया जाना ही दिल्ली और उत्तर भारत की हवा में जहर नही घोल रही है, अलबत्ता मध्य पूर्व के सउदी अरबिया, कतर और ईरान का भी दिल्ली में प्रदूषण बढाने में अहम योगदान है। भू-वैज्ञानियों के अनुसार हर साल इस समय वायुमंडल की ऊपरी परतों में तेज हवाएं भारत की ओर बहती हैं। उत्तर भारत तक पहुंचते-पहुंचते इन हवाओं में पाकिस्तान होते हुए रास्ते में धूल, धुंध की परतों का समावेश हो जाता है। इससे वायु के कण भारी हो जाते हैं और दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के वायुमंडल में जहरीली परतें जमा हो जाती हैं। प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्तर को पार कर जाता है। रात में तापमान गिरने से वायु में नमी की मात्रा बढ जाती है और इससे धुंध का प्रकोप बढ जाता है। दिल्ली की तुलना में चीन की राजधानी बीजिंग को भी प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझना पड रहा है मगर चीन ने इसका पूृरी शिद्दत से सामना किया है। इस सप्ताह अमेरिकी राष्ट्रपति चीन के दौरे पर थे। बुधवार को बीजिंग में नवंबर माह में पहली बर धुंध मुक्त साफ आसमान और सुहानी सुबह का नजारा देखा जबकि पर्यावरण मंत्रालय ने इस सप्ताह गहरी धुंध की चेतावनी दे रखी थी। चीन स्मॉग से निपटने के लिए चार स्तरीय चेतावनी लागू करता है और स्थिति के मुताबिक प्रदूषण निरोधी उपाय किए जाते हैं। भारत में हर समस्या को राजनीतिक चश्मे से देखने की रिवायत है। दिल्ली सरकार बढते प्रदूषण का दोष केन्द्र और पडोसी राज्यों के मथे मढ रही है और केन्द्र दिल्ली की आप सरकार पर दोषारोपण कर रही है। जबकि सच्चाई यह है कि लोगों के जीवन में जहर घोलने के लिए सभी जिम्मेवार है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने 2015 में ही पराली जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बावजूद पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में यह क्रिया आज तक बदस्तूर जारी है। पराली जलाने की क्रिया को रोकने के लिए राज्यों ने गंभीरता से प्रयास नहीं किए हैं हालांकि इसके लिए पुख्ता तकनीक और विकल्प उपलब्ध है। दिल्ली सरकार ने बढते प्रदूषण को रोकने के लिए 13 से 17 नवंबर तक पांच दिनों के लिए ऑड-ईवन लागू करने का फैसला लिया है। दिल्ली में यह सिस्टम तीसरी बार लागू किया जाएगा। 2016 में इसे दो बार लागू किया था। विशेषज्ञों का आकलन है कि इससे प्रदूषण में 20 फीसदी की गिरावट आएगी। इस साल 17 अक्टूबर से केन्द्र और दिल्ली सरकार ने कुछ ठोस कदम उठाए हैं। इनमें बदरपुर प्लांट बंद करना और डीजल जेनेरेटर के इस्तेमाल पर पाबंदी शामिल है। मगर यह सब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर किया गया है। हट-फिर कर वही यक्ष प्रश्न खड़ा हो जाता है। आखिर सरकार स्वंय पहल क्यों नहीं करती़? दिल्ली घुट-घुट कर मर रही है और नेता लोग सैर-सपाटे पर हैं।
शुक्रवार, 10 नवंबर 2017
गुजरात और पाटीदार
Posted on 6:41 pm by mnfaindia.blogspot.com/
चुनाव के समय सियासत से जुडे लोग भाव न दिखाएं और मोल-तोल न करें, ऐसा हो नहीं सकता। गुजरात में पाटीदार आरक्षण आंदोलन से राज्य की सियासत के केन्द्रबिंदु बने हार्दिक पटेल इस सच्चाई को बखूबी जानते हैं कि चुनाव की गहमा-गहमी में इस समय राजनीतिक दलों से जो ले लिया, सो हासिल कर लिया। चुनाव खत्म होते ही उनकी अहमियत जाती रहेगी। इसीलिए, हार्दिक पटेल कांग्रेस से “लुका-छिपी“ खेल रहे हैं। कांग्रेस से मोल-तोल के लिए एक कदम आगे बढाते हैं, तो दूसरे कदम में पीछे हट जाते हैं। बुधवार रात को कांग्रेस नेताओ से मुलाकात तय थी मगर हार्दिक पटेल नहीं पहुंचे। इससे पहले कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात की बात को भी सिरे से खारिज कर चुके हैं हालांकि सीसीटीवी फुटेज में साफ-साफ दिख रहा है कि हार्दिक अहमदाबाद के एक होटल में राहुल से मिल चुके है। उनका यह सियासी मिजाज साफ संकेत दे रहा है कि पाटीदार नेता अधिकाधिक मोल-तोल की फिराक में है। कांग्रेस के लिए हार्दिक पटेल का समर्थन बहुत मायने रखता है। गुजरात में पाटीदार (पटेल समुदाय) की राजनीति मे बहुत अहम भूमिका रही है। सत्तारूढ दल भाजपा के 122 विधायकों मेंसे एक-तिहाई पाटीदार है। राज्य की करीब बीस फीसदी आबादी भी पटेलों की है। अब तक पाटीदार भाजपा के कट्टर समर्थक रहे हैं। मगर हार्दिक पटेल ने पहली बार राज्य में पाटीदारों को आरक्षण के लिए मंच पर लाकर भाजपा के इस ठोस जनाधार में सेंध लगाई है और भाजपा इससे बौखलाई हुई भी है। 2015 से हार्दिक पटेल ने पाटीदारों के लिए जो आरक्षण आंदोलन शुरु किया था, आज तक जारी है। इसके लिए हार्दिक पटेल को नौ माह में जेल में और छह माह तक ं राज्य से “तडी पार“ रहना पडा है। भाजपा के लिए सबसे बडा सरदर्द 24-वर्षीय हार्दिक पटेल की युवाओं में लोकप्रियता है। गुजरात की आबादी में 50 फीसदी युवा (35 साल से कम) हैं और इन्ही युवाओं के ठोस समर्थन से भाजपा अब तक गुजरात में सत्ता में आती रही है। पाटीदारों में कदव समुदाय हार्दिक पटेल के कट्टर समर्थक हैं। हार्दिक भी इसी समुदाय से संबंधित है। उत्तर गुजरात में कदव पाटीदारों का ज्यादा रसूख है। कदव पाटीदार मूलतः छोटे किसान और कृषि उपज के कारोबारी है। इस समुदाय को अब लगता है कि कृषि में कोई भविष्य नहीं है। इसलिए यह समुदाय सरकारी नौकरियों में पाटीदारों के लिए ओबीसी की तरह आरक्षण की मांग कर रहा है। पाटीदारों में लेहिया समुदाय अभी भी भाजपा के साथ है और यह समुदाय हार्दिक पटेल के साथ नहीं है। यह समुदाय अपेक्षाकृत आर्थिक रुप से सपन्न है और उनके लिए आरक्षण ज्यादा मायने नहीं रखता है। गुजरात में पाटीदारों की आरक्षण की मांग लंबे समय से चल रही है। 1981 में पाटीदारों ने दलितों और आदिवासियों को दिए जा रहे आरक्षण के खिलाफ हिंसक आंदोलन चलाया था। फिर 1985 में अन्य पिछडा वर्गों (ओबीसी) के आरक्षण के खिलाफ। पांच माह तक इस आंदोलन में सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। 2015 में पाटीदारों के विरोध प्रदर्शन पर पुलिस फायरिंग में 15 युवक मारे गए थे। इस घटना के बाद हुए पंचायती संस्थाओ के चुनाव में कांग्रेस को 31 जिला पंचायतों में से 22 और 230 ताल्लुक पंचायतों मेंसे 126 में प्रचंड जनादेश मिला था। चुनाव से पहले 31 जिला पंचायतों मेंसे 30 और 220 ताल्लुकों मेंसे 194 में भाजपा का परचम लहरा रहा था। कांग्रेस के लिए 22 साल में पहली बार जबरदस्त जनादेश मिला है। कांग्रेस इससे उत्साहित है। विधान सभा में भी पंचायतों जैसा जनादेश पाने के लिए कांग्रेस को हार्दिक पटेल का समर्थन बेहद जरुरी है। गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल ने पाटीदारों को दस फीसदी आरक्षण देने का प्रस्ताव किया था मगर पाटीदारों ने इसे नहीं माना। बहरहाल, हार्दिक पटेल को मनाना और पाटीदारों को आरक्षण देना कांग्रेस के लिए टेढी खीर साबित हो सकती है।
गुरुवार, 9 नवंबर 2017
नोटबंदी पर सियासी दंगल
Posted on 6:36 pm by mnfaindia.blogspot.com/
एक साल पहले आठ नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को नोटबंदी का तोहफा दिया था। और एक साल बाद सरकार और विपक्ष में नोटबंदी के नफे-नुकसान पर जबरदस्त बहस-मुहासिब हो रही है। विपक्ष नोटबंदी पर जनता की तकलीफों को राजनीतिक फायदे के लिए भुनाने की जी-तोड कोशिश कर रहा है और सत्तारूढ दल बचाव की मुद्रा में है। मगर जमीनी हकीकत यह है कि भारी तकलीफों और तंगी के बावजूद आम आदमी ने नोटबंदी पर प्रधानमंत्री का साथ दिया है। नोटबंदी के बाद देश के सबसे बडे प्रांत उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाज्पा को मिली अप्रत्याशित जीत इस बात का प्रमाण है। पंजाब को छोडकर चार राज्यों में भाजपा को शानदार जनादेश मिला है। उत्तर प्रदेश में मिले प्रचंड जनादेश ने आलोचकों की बोलती बंद कर दी। पंजाब में भाजपा को शिरोमणि अकाली दल ( शिअद) के कुशासन का खमियाजा भुगतना पडा हालांकि राज्य में भगवा पार्टी कुशासन के लिए उतनी ही जिम्मेदार है, जितना शिअद। बहरहाल, नोटबंदी से एक अरब से अधिक लोगों को प्रभावित किया है और इसे इतिहास में किसी भी देश के सबसे अधिक असर डालने वाले आर्थिक नीतिगत फैसले में शुमार किया जाएगा। तथापि, नोटबंदी को “सामूहिक लूट“ बताना भी एकदम गलत है। यह निष्क्रिय विरोध की पराकाष्ठा है। नोटबंदी के पक्ष और विरोध में तरह-तरह के तर्क दिए जा रहे हैं मगर कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो मोदी सरकार की इस कार्रवाई का सही-सही आकलन करते हैं। सबसे बडा शास्वत सत्य यह है कि भारत की 90 फीसदी से ज्यादा लेन-देन नगदी में किया जाता है। आंकडे इस बात के गवाह हैं कि नोटबंदी के फौरन बाद कम-से-कम तीन माह के लिए देश में 90 फीसदी से ज्यादा का लेन-देन करीब-करीब ठप्प हो गया था। इन्कलुसिव बैंकिग का सपना अभी पूरा नहीं हुआ है। नोटबंदी का सबसे ज्यादा खमियाजा छोटे कारोबारियों और कामगारों को भुगतना पडा । विपक्ष के इन आरोपों में भी वजन है कि बीस हजार करोड रु खर्च करके मात्र 16 हजार करोड रु बचाए गए हैं। नोटबंदी ने पहले से मंदी से जूझ रहे रियल्टी सेक्टर की कमर तोड दी है। इस सेक्टर में लेनदेन का बडा हिस्सा नगदी में किया जाता है और काले धन की प्रमुख भूमिका भी होती है मगर किसी भी लेनदेन में अगर काले धन का इस्तेमाल होता है, तो आयकर और प्रवर्तन निदेशालय जैसी सरकारी एजेंसियां काली भेडों को आसानी से पकड सकती हैं। नोटबंदी से आर्थिक सुस्ती और बेरोजगारी भी बढी है। नोटबंदी के बाद पिछले एक साल में ग्रोथ रेट में खासी गिरावट आई है। अप्रैल-जून तिमाही में ग्रोथ रेट सात फीसदी से गिरकर 5.7 ही रह गई थी। मगर नोटबंदी से कई फायदे भी हुए हैं। नोटबंदी के समय सिस्टम में 15.44 लाख की नगदी थी। इसमेंसे अधिकतर नगदी बैंकों में वापस आ गई है। इससे बैंकों की लिक्विडिटी में काफी इजाफा हुआ है। जाहिर है इससे निवेश बढेगा और रोजगार के अवसर सृजित होंगे। नोटबंदी के बाद तीन लाख फर्जी (शैल) कंपनियां) का पता चला है। डिजिटल लेन-देन बढा है और नोटबंदी के बाद इसमें 150 फीसदी का इजाफा हुआ है। भले ही अभी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कैषलैस नहीं हुई हो पर कुछ हद तक लैसकैश जरुर हुई है। आयकर रिटर्न भरने वालों में भी काफी इजाफा हुआ है। ताजा अंाकडों के अनुसार आयकर रिटर्न भरने वालों में 25 फीसदी की वृद्धि हुई है। भारत के लिए यह अच्छे संकेत है, जहां बहुत कम लोक आईटी रिटर्न भरते हैं। नोटबंदी का समग्र असर लांग रन में सामने आएगा। यह कार्रवाई वास्तव में देश के लिए इतनी भी बुरी नहीं है, जितनी विपक्ष इसे बता रहा है। विपक्ष की अपनी राजनीतिक विवशताएं हैं मगर उसे सियासी फायदे के लिए जनता को गुमराह करने का कोई अधिकार नहीं है।
बुधवार, 8 नवंबर 2017
गन कल्चर में तो ऐसा ही होगा !
Posted on 6:57 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अमेरिका के टेक्सस प्रांत के एक छोटे से कस्बे में रविवार कोे 26 साल के सिरफिरे बंदूकधारी ने चर्च में प्रार्थना कर रहे 20 लोगों को गोलियों से भून डाला। यह दुखद त्रासदी सदरलैंड में सिप्रंग्स के काउंटी इलाके में फर्स्ट बैपिस्ट चर्च में रविवार को प्रातः 11 बजे हुआ। रविवार को लोग-बाग चर्च में प्राार्थना करने आते हैं। हमलावर यह बात जानता था, इसलिए उसने यह समय और जगह को चुना। हमलावर दो साल अमेरिकी वायु सेना में काम कर चुका है मगर उसे अपनी पत्नी और बच्चों को प्रताडित करने के आरोप में नीकरी से निकाल दिया गया। यानी हमलावर आपराधिक मानसिकता वाला था। 26 लोगों का हत्यारा किसी चरमपंथी से जुडा है या नहीं, और उसका मकसद क्या था, अभी तक इसका पता नहीं चल पाया है। अमेरिका में अंधाधुंध गोलीबारी ( मॉस शूटिंग ) का सिला तो अब आम बात हो गई है। अमेरिका में पिछले 1735 दिनों में 1516 मॉंस शूटिंग के मामले सामने आ चुके हैं। यानी लगभग हर रोज एक मामला। 2017 में अब तक अंधाधुंध गोलीबारी से नरसंहार के 307 मामले हो चुके है और रविवार तक पिछले एक माह में 27 गोलीबारी के मामले सामने आ चुके हैं। 2016 में 483 मामले दर्ज हुए थे और मॉंस शूटिंग में 11,000 से ज्यादा लोग् मारे गए थे। सितंबर-अक्टूबर में ही छह बडे हमले हो चुके हैं। इसी साल एक अक्टूबर को लास वेगास के संगीत उत्सव में 58 लोगों का नर संहार अमेरिका में 9/11 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर हमले के बाद सबसे बडा हमला था। 9/11 के अल-कायदा आतंकी हमले में 2996 लोग मारे गए थे, 6,000 से ज्यादा जख्मी हो गए थे। इससे अमेरिका को 10 अरब (बिलियन) डालर का नुकसान सहना पडा था। इस हमले से तिलमिलाए अमेरिका ने 2011 में अल-कायदा के सरगना ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान में एबटाबाद स्थित उसके घर में घुसकर मार गिराया था। बहरहाल, अमेरिका में गन कल्चर के प्रचलन को मौजूदा हिंसक घटनाओं के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार माना जा रहा है। विशेषज्ञों का आकलन है कि अमेरिका को आतंकियों से कहीं अधिक गन कल्चर से खतरा है। अमेरिका में गन रखने और उसके इस्तेमाल की खुली छूट है। अमेरिकी अवाम को संवैधानिक व्यवस्था “बिल ऑफ राइटस“ के तहत गन रखने और उसका इस्तेमाल करने का मौलिक अधिकार है। गन कल्चर अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में प्रमुख मुददा भी रहा है। नवंबर, 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में गन कंट्रोल का मुद्दा छाया रहा। रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने तो यहां तक कह दिया था कि डेमोक्रेटिक पार्टी उम्मीदवार हैलरी क्लिंटन अगर राष्ट्रपति चुनी गई तो वे सेंकड अमेंडमेंड को ही खारिज कर देंगी। इसी संवैधानिक व्यवस्था के तहत अमेरिका नागरिकों को गन रखने और चलाने का अधिकार दिया गया है। हैलरी को इस पर सफाई देनी पडी और उन्हें वोटरों को आश्वत करना पडा कि वे ऐसा कतई नहीं करेगी। 323 मिलियन आबादी वाले अमेरिका में लगभग 310 मिलियन के पास गन हैं। दुनिया के विकसित देशों में ंसबसे ज्यादा गन संबंधी अपराध भी अमेरिका में होते हैं। 2016 में अमेरिका में कुल आपराधिक घटनाओं का 64 फीसदी गन से संबंधित थे। कनाडा में 30.5 फीसदी और आस्ट्रेलिया में 13 फीसदी। सबसे कम 4.5 फीसदी गन संबंधी अपराध इंग्लैंड और वेल्स में दर्ज हुए थे। प्रति व्यक्ति गन (पर कैपिटा) में अमेरिका सबसे आगे है। सौ मेंसे 90 लोगों के पास गन या फायरआर्म हैं। दूुसरे स्थान पर यमन अमेरिका से काफी पीछे है। कनाडा, इंग्लैंड और अन्य विकसित देश तो बहुत पीछे है। इस स्थिति में जाहिर है गन से संबंधित अपराध तो बढेंगें ही। मगर अमेरिकी नेतृत्व इस गंभीर समस्या के समाधान से अब तक बचता रहा है। अमेरिकी अवाम का गन के प्रति गहरा लगाव है और कोई भी पार्टी गन अधिकार छीन कर जनता की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती।
मंगलवार, 7 नवंबर 2017
नोटबंदी पास या फेल?
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प्रधानमंत्री द्वारा 8 नवंबर, 2016 को लागू नोटबंदी से देश को क्या मिला? एक साल बाद जनता इस सवाल का जवाब मांग रही है। नोटबंदी ने काले धन और धनाढय वर्ग की कमर तोड दी है और आम आदमी को इसका कोई प्रभाव नहीं पडा है, मोदी सरकार का यह दावा आंकडों से पुख्ता नहीं होता है। नोटबंदी के 45 दिन के भीतर बैकों के बाहर कतार में खडे-खडे 100 से अधिक लोगों को बेमौत मरना पडा। इन लोगों का क्या कसूर था? मृतकों में कोई धन्ना सेठ अथवा बडा आदमी शामिल नही था। मरने वाले सभी आम आदमी थे। मोदी सरकार ने मृतकों के परिजनों के लिए क्या किया। इस साल जुलाई में फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स् ऑफ कॉमस एंड इंडस्ट्री) का आकलन है कि नोटबंदी के कारण 15 लाख लोगों की नौकरियां चली गईं थी। देश में सबसे बडे रोजगार प्रदान करने वाले मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के 73 फीसदी उधोगों ने तीन महीने में एक भी रोजगार मुहैया कराया। अप्रैल, 2016 में जहां 401 मिलियन को रोजगार मुहैया कराए गया था, वहीं नवंबर 2016 में 406 मिलियन से अधिक लोगों को रोजगार मिला मगर जनवरी से अप्रैल 2017 के चार माह में 405 मिलियन रोजगार के अवसर सृजित हो पाए। नोटबंदी के पहले 34 दिनों में 35 फीसदी लोग बेरोजगार हो गए थे। मार्च 2017 में यह आंकडा 40 फीसदी पहुंच गया था। ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग आँर्गेनाइजेशन (एआईएमओ) का आकलन है कि मार्च, 2017 तक मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में 60 फीसदी रोजगार और 55 फीसदी आमदन का नुकसान हो चुका था। मध्यम और बडे उधोगों में 35 फीसदी रोजगार के अवसर कम हो गए थे और उन्हें 45 फीसदी राजस्व का नुकसान उठाना पडा । अप्रैल-मई तक कैश मैनेजमेंट एक्टिविटी सामान्य नहीं हो पाइं थी। अप्रैल माह में कैष मैनेजमेंट एक्टिविटी में 12 से 15 फीसदी की गिरावट बरकरार थी। नोटबंदी से पहले हर रोज देष के 30,000 एटीएम में प्रतिदिन कैश लोड किया जाता था। नोटबंदी के बाद तीन माह में मात्र 8,000 एटीएम में ही प्रतिदिन नगदी भरी जाती थी। नोटबंदी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। देहातों में 90 फीसदी से ज्यादा कारोबार और लेन-देन नगदी में किया जाता है। नोटबंदी से पूरी देहाती अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया। सिस्टम से अगर 86 फीसदी नगदी को अचानक सोख लिया जाए, अर्थव्यवस्था का पटरी से उतरना स्वभाविक है। इस कार्रवाई से देहातों में नगदी पर निर्भर कारोबार करीब-करीब ठप्प हो गया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भ्रष्टाचार , काला धन, जाली करंसी और आतंकवाद को खत्म करना नोटबंदी का प्रमुख मकसद बताया था। मगर अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी से न तो काला धन बाहर निकलता है और न ही भ्रष्टाचार ख्त्म होता है। काली कमाई का अधिकतर हिस्सा बेनामी संपत्ति और सोने अथवा गहनों में छिपाया जाता है। नोटबंदी से बेनामी संपत्ति अथवा सोने-गहनों पर कोई फर्क नहीं पडा है। नोटबंदी से आतंक की कमर तोडने का भी दावा किया जा रहा है। मगर आंकडे इसकी पुष्टि नहीं करते हैं। इस साल जून तक 12 महीनों के दौरान जाली करंसी के जब्त किए जाने का सिलसिला बढा तो है मगर यह अभी भी कुल नगदी का मात्र 0. 08 फीसदी है। इससे पहले यह 0.07 फीसदी थी। आरबीआई नए 2000 की जाली मुद्रा तक को रोक नहीं पाई है। सरकार का दावा था कि कुल 15.44 लाख करोड की नगदी में एक तिहाई काला धन था मगर 99 फीसदी प्रतिबंधित नोट सरकार बैंकों के पास वापस आ गए। इन नोटों को गिनते-गिनते आरबीआई के भी पसीने छूट रहे हैं। नोटबंदी से ग्रोथ भी रुक गई है। तथापि नोटबंदी पर प्रधानमंत्री की मंशा पर शक-सुबह की कोई गुजांइश नहीं है। फैसला जनहित मे लिया गया था। यह बात दीगर है कि यह उल्टा पड गया।
सोमवार, 6 नवंबर 2017
Delhi Status. Neither A Man Nor Woman?
Posted on 7:00 pm by mnfaindia.blogspot.com/
देश की राजधानी दिल्ली का स्टेट्स क्या है? सुप्रीम कोर्ट की ताजा व्यवस्था से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भ्रम दूर हो जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि दिल्ली में उप-राज्यपाल (एलजी) को निर्वाचित एव लोकप्रिय सरकार से ज्यादा पॉवर है। दिल्ली सरकार के हर फैसले पर एलजी की मुहर जरुरी है। संविधान के अनुच्छेद 239-एए के तहत यही व्यवस्था है कि उपराज्यपाल को निर्वाचित सरकार की अपेक्षा अधिमान (प्राइमेसी) दिया गया है। इससे पहले दिल्ली हाई कोर्ट भी यही व्यवस्था दे चुका है। इससे साफ है कि दिल्ली सरकार की हैसियत उस इंसान जैसी है जो न तो मर्द माना जाता है और न ही औरत। निर्वाचित सरकार को अगर पैन, स्याही खरीदने अथवा चपरासी की भर्ती के लिए भी एलजी के द्वार खटखटाने पडे तो ऐसी सरकार के कोई मायने नहीं रह जाते हैं। लोकतंत्र में जनता द्वारा चुने गए नुमाइंदे ही सर्वोपरि होते हैं। सरकार और विधायकों की जनता के प्रति जवाबदेही होती है। पर अगर सरकार और विधायकों को जनापेक्षाओं को पूरा करने का अवसर ही न मिले, उनका छटपटाना स्वभाविक है। यही छटपटाहट दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और आप नेताओं में साफ दिख रही है। राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार को सत्ता में आए लगभग अढाई साल हो गए हैं मगर अरविंद केजरीवाल इस दौरान ऐसा कोई काम नहीं कर पाएं है, जिससे उनकी सरकार अन्यों से अलग नजर आए। उनका उप राज्यपाल से छत्तीस का आंकडा रहा है। उप-राज्यपाल केन्द्र के अधीन काम करते हैं। दिल्ली पुलिस भी केन्द्र के अधीन काम करती है। केन्द्र में भाजपा की सरकार है। इस स्थिति में भाजपा भला क्यों चाहेगी कि आप सरकार लोक-लुभावने फैसले लेकर अपना जनाधार मजबूत करे। यही केजरीवाल की सबसे बडी पीडा है और दिल्ली की त्रासदी भी। दिल्ली अभी भी केन्द्र शासित क्षेत्र है हालांकि कहने को विधानसभा है और निर्वाचित सरकार भी। केन्द्र में भाजपा हो अथवा कांग्रेस या कोई और, कोई भी सरकार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देकर अपने लिए सरदर्द मोल नहीं लेना चाहेगी। बहरहाल, इस मामले में न्यायपालिका भी अरविंद केजरीवाल की मदद नहीं कर सकती। अदालत संवैधानिक व्यवस्था के दायरे में फैसले सुनाती है। संविधान में दिल्ली के उप-राज्यपाल को अधिमान दिया गया है। ऐसा केन्द्र सरकार की सुविधा के लिए किया गया है। दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिलने की पीडा झेलने वाले केजरीवाल अकेले सियासतदान नही है। इससे पहले पचास और साठ के दशक में हिमाचल प्रदेश को इस पीडा से दो चार होना पडा था हालांकि उस जमाने में केन्द्र और हिमाचल में कांग्रेस की ही सरकारें हुआ करती थी। बतौर केन्द्र शासित हिमाचल को तब केन्द्र से उदार वित्तीय सहायता मिलती थी मगर दिल्ली की तरह यहां भी उप-राज्यपाल को ज्यादा पॉवर थी। विधानसभा थी मगर दिल्ली की तरह सरकार को हर फैसले पर एलजी की मुहर लगानी पडती थी। इस विकट स्थिति से तत्कालीन मुख्यमंत्री डाक्टर वाई एस परमार खासे परेशान थे। उन्होंने हिमाचल को पूर्ण राज्य बनाने का संकल्प लिया। 1966 में राज्यों के पुर्नगठन पर पंजाब के पहाडों चेत्रों के हिमाचल प्रदेश में विलय होने पर इस केन्द्रीय शासित क्षेत्र का क्षेत्रफल और आबादी दोनों में इजाफा हुआ। नतीजतन, हिमाचल प्रदेश का पूर्ण राज्य के दावा और पुख्ता हो गया। अततः, 1971 में हिमाचल प्रदेश केन्द्र शासित से पूर्ण राज्य बन गया। दिल्ली को भी राज्य का दर्जा हासिल करने के लिए लंबी लडाई लडनी पडेगी। और यह जंग अदालत में नहीं जीती जा सकती। हिमाचल की तरह दिल्ली को भी अपने पक्ष में भारी समर्थन जुटाना पडेगा। 2012 से पहले भाजपा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की सबसे बडी पैरवीकार थी मगर केन्द्र में सत्तारूढ होते ही उसके सुर बदल गए। देश के संघीय ढांचे का भी यही तकाजा है कि दिल्ली को भी राज्य का दर्जा मिले। इससे केन्द्र के अधिकार कम होने वाले नहीं है।
शुक्रवार, 3 नवंबर 2017
हमाम में सब नंगे
Posted on 6:24 pm by mnfaindia.blogspot.com/
अर्थशास्त्र के रचनाकार, दार्शनिक और मार्गदर्शक कोटिल्य (चाणक्य) का एक प्रचलित उद्धरण है, “ शहद अथवा जहर का स्वाद न चखना जिस तरह लगभग नामुमकिन है, उसी तरह किसी मंत्री अथवा नौकरशाह का सरकारी खजाने पर हाथ साफ न करना भी अविश्नीय है“। कौटिल्य के ये उद्धरण आदि काल में भी प्रासंगिक थे और आज भी हैं। सच कहा जाए यो पहले से कहीं ज्यादा। घूसखोरी समकालीन भारत को दीमक तरह चाट रही है। लोकतंत्र की चुनावी राजनीति ने इस समस्या को और ज्यादा भयावह बना दिया है। चुनाव लडने के लिए अथाह पैसा चाहिए। खून-पसीना बहाकर कमाए गए धन से चुनाव नहीं जीता जा सकता। काली कमाई को ही पानी की तरह बहा जा सकता है। कानून में व्याप्त खामियों ने घूसखोरों को पूरी तरह से निडर बना डाला है। धडल्ले से जनता की गाढी खून-पसीने की कमाई हजम करने वालों पर मजाल है कानून भी हाथ डाल सके। राजनीति में अपराधी तत्वों की घुसपैठ ने इस सार्वजनिक लूट-खसोट को और बृहद बना दिया है। इससे चिंतित देश की शीर्ष अदालत सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से दागी नेताओं के मामलों की सुनवाई के लिए अलग से अदालतें बनाने को कहा है। सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने केन्द्र सरकार से कहा है कि फास्ट-ट्रेक कोर्ट की तरह दागी नेताओं के मामलों की सुनवाई के लिए इसी तरह की अदालतें स्थापित की जाएं। दागी नेताओं को ताउम्र चुनाव लडने से अयोग्य करार देने संबंधी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश जारी किए। कोर्ट ने केन्द्र सरकार को इस मामले में ठोस प्रस्ताव पेश करने के लिए छह सप्ताह का समय दिया है। बहरहाल, देश में दागी और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं का सियासत की मुख्य धारा में बने रहना लोकतंत्र के लिए अन्तोगत्वा घातक सिद्ध हो सकता है। तथ्य और आंकडे इस बात के गवाह हैं कि दागी नेताओं की किस हद तक राजनीतिक दलों में घुसपैठ है। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर)े द्वारा 2014 लोकसभा चुनाव के समय एकत्रित किए गए आंकडों के अनुसार मोदी मंत्रिमंडल के 20 मंत्रियों ने अपने-अपने हलफनामों में बताया था कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमेंसे 11 मंत्रियों पर हत्या के प्रयास और साम्प्रदायिक दुर्भावना जैसे संगीन मामले दर्ज थे। देश के एक तिहाई लॉमेकर्स-162 सांसदों और 1200 विधायकों- पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। ऐडीआर और इलेक्शन वाच की साझा रिपोर्ट के अनुसार सतारूढ भारतीय जनता पार्टी के 31 फीसदी तो समाजवादी पार्टी के 48 फीसदी नेता दागी हैं। लालू प्रसाद यादव की राजद में 64 फीसदी नेताओं पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। सबसे ज्यादा 82 फीसदी दागी नेता झारखंड मुक्ति मोर्चे में हैं। कांग्रेस में सबसे कम 21 फीसदी नेता दागी हैं। कांग्रेस नेता रसीद मसूद घूसखोरी के मामले में सजा मिलने पर अपनी राज्यसभा सीट गंवाने वाले पहले सांसद हैं। एडीआर के अनुसार 2014 के लोकसभा चुनाव लडने वाले 5390 उम्मीदवारों मेंसे 17 फीसदी पर आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमेंसे 10 फीसदी पर हत्या और बलात्कार जैसे संगीन आपराधिक मामले दर्ज थे। तमिल नाडु में कन्याकुमारी लोकसभाई सीट के आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार पर रिकॉर्ड 382 मामले दर्ज थे और इनमें 19 मामले बेहद संगीन थे। दार्शनिक रुसो लोकतंत्र के कद्रदान तो थे मगर उन्हें इस बात की पूरी-पूरी आशंका थी कि भ्रष्ट और दागी नेता व्यवस्था पर हॉवी होकर इसे जनहित में नहीं चलने देंगे। सियासी नेताओं और नौकरशाही के गठजोड को राजनीति के अपराधीकरण के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेदार माना जाता है। सियासी नेताओं को उनके इशारों पर चलने वाले अफसर चाहिए और नौकरशाहों को मनपंसद पोस्टिंग और जल्द से जल्द तरक्की। इससे भ्रष्टाचार पनपता है और यह अपराधियों को पालता है। दागी नेताओं और राजनीति का आपराधीकरण रोकना समय की मांग है। इसे जितनी जल्दी जड से उखाड कर फेंका जाए, देश के लिए उतना ही अच्छा है। बार-बार न्यायपालिका ही क्यों, सरकार स्वंय पहल क्यों नहीं करती?
गुरुवार, 2 नवंबर 2017
कमल में खिले “धूमल”
Posted on 6:25 pm by mnfaindia.blogspot.com/
दूरदर्शी और लोकप्रिय नेतृत्व के बगैर चुनाव बिसात सफलतापूर्वक नहीं बिछाई जा सकती। हिमाचल के परिपेक्ष्य में भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को यह बात समझ तो आई मगर विलंब से। हिमाचल प्रदेश में आधा चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व को अपने संभावित मुख्यमंत्री का नाम घोषित करना ही पडा। अपेक्षा के अनुरुप पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल को हिमाचल प्रदेश का नेतृत्व सौंपा गया है। धूमल इस समय हिमाचल में भाजपा के सबसे कद्दावर और कार्यकर्ताओं के चेहते नेता हैं। धूमल औरों से अपेक्षाकृत कहीं अधिक सुलझे हुए, अनुभवी और परिपक्व हैँ । दो बार पहले भी राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। 1998 के बाद इस पहाडी राज्य में नेतृत्व का केन्द्र वीरभद्र सिंह और प्रेम कुमार धूमल तक ही सिमट कर रह गया है। अब तक चार मुकाबलों में दो बार (2003, 2013) वीरभद्र सिंह और दो ही बार प्रेम कुमार धूमल ( 1998, 2008) जीते हैं। वीरभद्र सिंह 1983 से लगातार कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री बने हुए हैं। मतदान के ठीक नौ दिन पहले प्रेम कुमार धूमल को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करना साफ दर्शाता है कि भाजपा का नेतृत्व हरियाणा और उत्तर प्रदेश की तरह जो रिवायत शुरू करने की सोच रही थी, वह हिमाचल में काम नहीं आई। मुख्यमंत्री के नाम पर संस्पेंस रखकर भाजपा को खासा नुकसान हो रहा था और कार्यकर्ताओं में वह जोश नहीं दिख रहा था, जो प्रचंड चुनाव प्रचार के लिए अपरिहार्य माना जाता है। विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लडे जाते हैं और प्रादेशिक नेतृत्व जिस तरह से कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में सक्षम होता है, राष्ट्रीय नेतृत्व ऐसा नहीं कर पाता। स्थानीय नेतृत्व की पहुंच और दायरा राष्ट्रीय नेतृत्व की तुलना में कहीं ज्यादा व्यापक होता है। मुख्यमंत्री का प्रत्याशी घोषित नहीं होने से हिमाचल प्रदेश में अब तक मुकाबला वीरभद्र सिंह बनाम नरेद्र मोदी के बीच सिमट कर रह गया था। भाजपा ऐसा कतई नहीं चाहती थी। पहले ऐसी संभावना जताई जा रही थी कि प्रधानमंत्री 2 नवंबर को अपने हिमाचल दौरे के समय मुख्यमंत्री का नाम घोषित करेंगे मगर चुनाव की नजाकत के दृष्टिगत भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को 2 नवंबर से पहले ही प्रेम कुमार धूमल को बतौर मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करना पडा। नामचीन अमेरिकी लेखक और मोटिवेशनल वक्ता जिम रोहन ने सफल एवं दूरदर्शी नेता की खूबियां बताईं है। रोहन के अनुसार नेतृत्व मृदभाषी और दयालू हो, कठोर नहीं। बोल्ड हो मगर धमकाने वाला न हो। विचारशील हो, आलसी न हो। विनम्र हो डरावना न हो। गर्व करे मगर अभिमानी न हो। विनोदी स्वभाव का हो मगर, मूर्ख न हो। यद्यपि इतनी सारी खूबियां समकालीन नेताओं में ढूंढे नहीं मिलती है। तथापि, शुरुआती कैरियर में अध्यापन से जुडे प्रोफेसर प्रेम कुमार धूमल में कई ऐसी खुबियां हैं, जो उन्हें समकालीन नेताओं से अलग करती है। संभवतय, उनकी इन खूबियों के कारण ही भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने हिमाचल प्रदेश में पार्टी की सरकार बनने की स्थिति में प्रोफेसर धूमल को तीसरी बार मुख्यमंत्री चुना है। 73 वर्शीय धूमल की यह आखिरी पारी मानी जा रही है, बशर्ते भाजपा अपनी मौजूदा नीति में बदलाव न करे। भाजपा ने बाकायदा अपने नेताओं के लिए 75 वर्ष की रिटायरमेंट ऐज तय कर रखी है। वैसे दे के नेताओं के लिए कोई रिटायरमेंट ऐज नहीं है। मगर भाजपा में प्रधानमंत्री मोदी ने इस मानदंड को तय किया है। इसी कट ऑफ ऐज की वजह से 83- वर्षीय पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता शांता कुमार रेस से बाहर हो गए और केन्द्रीय मंत्रिमंडल से भी बाहर रखे गए। खेल हो या राजनीति आखिरी पारी खेलना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। भाजपा अगर सत्ता में आती है, तो प्रेम कुमार धूमल की यह पारी काफी चुनौतीपूर्ण होगी।
बुधवार, 1 नवंबर 2017
डिजिटल इंडिया से “जय श्री राम“
Posted on 8:38 pm by mnfaindia.blogspot.com/
केन्द्र में सत्ता संभालते ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपन पूरा ध्यान “स्मार्ट सिटी“, “ डिजिटल इंडिया“, “स्किल इंडिया” और “मेक इन इंडिया“ पर फोक्स किया था। मगर अब जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, मोदी सरकार यह सब पीछे छोडकर फिर “जय श्री राम“ और हिंदू धर्म की प्रधान संरक्षक और सेवक के रुप में अपनी छवि बनाने में जी-जान से लगी हुई है। वजह साफ हैः विकास के नाम पर वोट मांगने के लिए तथ्य और आंकडे, तर्क-वितर्क पेश करने पडते हैं मगर धार्मिक मुद्दे उछालने के लिए आंकडों की जरुरत ही नहीं पडती। वैसे भी भारत की जनता धर्मभीरु मानी-जाती है और वह जल्द ही पाखंड से गुमराह हो जाती है। देश में पाखंडी स्वंय-भू बाबाओं का मकडजाल भी इसी कारण पनप रहा है। इन दिनों भाजपा की हर जनसभा में पूरी ताकत से “जय श्री राम“ के नारे बुलंद किए जा रहे हैं। जाहिर यह सब मतदाताओं के धुव्रीकरण के मकसद से किया जा रहा है। गुजरात और हिमाचल प्रदेश में जल्द विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इसके बाद मई, 2018 में कर्नाटक और फिर मध्य प्रदेश , राजस्थान, छतीसगढ, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और त्रिपुरा में विधानसभा के चुनाव होने हैं। मई 2019 में लोकसभा चुनाव। इस स्थिति में मई 2019 तक राजनीतिक दलों को एक के बाद-दूसरे चुनाव के लिए कमर कसनी पडेगी। अगले कुछ महीनों में राजनीतिक दलों के स्टार प्रचारकों को दम भरने की फुर्सत नहीं मिलेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी भाजपा के स्टार प्रचारक के तौर पर उभरे हैं। गुजरात के अलावा योगी हिमाचल प्रदेश में भी चुनावी जनसभाएं संबोधित कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनते ही उत्तर प्रदेश के भगवाकरण की कवायद षुरु हो गई है। यहां तक कि ऐतिहासिक धरोहरों और षैक्षणिक माहौल का भी भगवाकरण किया जा रहा है। उत्तर प्रदेष में योगी सरकार मदरसों को षैक्षणिक जगत की राश्ट्रीय मुख्य धारा में लाने की जी-तोड कोषिष कर रही है। राज्य सरकार ने मदरसों के पाठयक्रम में बदलाव करते हुए अब एनसीआरटी की किताबें पढाने का निर्णय लिया है और मदरसों में गणित और विज्ञान के विशय भी पढाए जाएंगें। य्ोगी सरकार ने यह भी स्पश्ट कर दिया है कि एनसीआरटी पाठयक्रम के बाद कुरान और महजबी पुस्तकों के साथ-साथ आधुनिक षिक्षा की पुस्तकें मदरसों में उपलब्ध होंगी। उत्तर प्रदेष में लगभग 19000 मान्यता प्राप्त और 560 एडिड मदरसे हैं और इनमें एनसीआरटी की जगह मदरसा बोर्ड द्वारा निर्धारित किताबें और पाठयक्रम पढाए जाते हैं। इससे मदरसों में षिक्षा ग्रहण कर रहे छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं में पिछड रहे थे। योगी सरकार का यह कदम काबिलेतारीफ है। देष के अधिकतर स्कूलों में एनसीआरटी की किताबें पढाई जाती है। एनसीआरटी की किताबों का स्तर अन्यों से काफी बेहतर माना जाता है। बहरहाल, सवाल यह है कि अब तक मदरसों में एनसीआरटी की किताबें क्यों नहीं पढाई गई? पूर्व की सरकारें इस मामले में क्यों बेबस या निश्क्रिय रहीं? राज्य में एक बार पहले भी भाजपा सरकार सतारूढ रह चुकी है। मदरसों में एनसीआरटी की किताबें पढाने पर किसी कि ऐतराज नहीं होना चाहिए मगर भगवा पार्टी का मुसलमानों के प्रति जो नजरिया है, इसके दृश्टिगत योगी सरकार की नीयत पर सवाल किया जा रहा है। अल्पसंख्यंकों को आषंका है कि एससीआरटी की किताबें के माध्यम भगवा पार्टी ऐतिहासिक घटनाओं को तोड-मरोड कर पेष करने की कोषिष कर सकती है। पहले भी ऐसे प्रयास हो चुके हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेष और छतीसगढ में ऐसे प्रयास हो चुके हैं। केन्द्र में भाजपा की सरकार है और एनसीआरटी मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन काम करता है। षिक्षा में क्रांतिकारी बदलाव लाना, निसंदेह, राश्ट्रहित में है मगर इसका सियासी हित के लिए भुनाना बेहद दुखद है।
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