शुक्रवार, 29 अप्रैल 2016

कांग्रेस और घोटाले



लंबे समय तक देश  पर राज करने वाली कांग्रेस और घोटालों का चोली-दामन का साथ है। संप्रग-दो के पूरे कार्यकाल में घोटाला-दर-घोटाले का भांडाफोड होता रहा। और अब जब कांग्रेस लगभग दो साल से केन्द्र की सता से बाहर है, घोटाले उसका पीछा नहीं छोड रहे हैं। इटली के कोर्ट द्वारा अगस्ता वेस्टलैंड हैलिकाप्टर सौदे में घूसखोरी की  पुष्टि  किए जाने से सियासी गलियारों में भूचाल आ गया है। यह सौदा अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने  शुरु किया था मगर इस डील को अंतिम रुप संप्रग सरकार ने दिया। इस स्थिति में डील के छींटे कांग्रेस पर पडना स्वभाविक है।  इटली की अदालत में बताया गया है कि अगस्ता वेस्टलैंड हैलिकाप्टर सौदे से जुडे  दस्तावेजों में  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का उल्लेख  है। अदालत में पेश  दस्तावेजों में कहा गया है कि 3700 करोड रु के इस वीवीआईपी हेलिकॉप्टर सोदे में भारत के किसी शीर्ष  नेता को  120 करोड रु की  घूस दी गई है हालांकि नाम उजागर नहीं किया गया है। घूसखोरी में भारतीय वायुसेना के तत्कालीन अध्यक्ष की संलिप्तता के सबूत मिले हैं। इतना सब होने के बाद भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लपेटने का हथकंडा मिल गया है।  अभी तक मोदी सरकार को इटली कोर्ट  के आर्डर की अग्रेंजी कॉपी नहीं मिली है, इसलिए सरकार ज्यादा कुछ बोल नहीं रही है। सरकार इस आर्डर का अनुवाद करा रही है और इसमेम छह-सात दिन का समय लग सकता है।  कोर्ट  के आर्डर मिलने के बाद ही सरकार अगली कार्रवाई करेगी। बहरहाल, बगैर किसी ठोस प्रमाण के भी मामले को खासा सियासी रंग दे दिया जा रहा है। भाजपा के वरिष्ठ  सांसद डाक्टर सुब्रमनयम स्वामी द्वारा बुधवार को संसद में सोनिया गांधी का नाम लेकर घूसखोरी का उल्लेख किए जाने  पर कांग्रेस ने भारी हंगामा किया। वीरवार को स्वामी ने फिर राज्यसभा में यह मामला उठाया।  अलीगढ मुस्लिम यूनिवसर्टी के ताजा हिंसक घटनाक्रम पर  चर्चा के दौरान  डाक्टर सुब्रमनयम स्वामी का इटली का उल्लेख किए जाने पर फिर जोरदार हंगामा हुआ और सभापति को उनके भाषण  को सदन की कार्यवाही से हटाना पडा। स्वामी ने दो दिन पहले ही राज्यसभा सदस्यता की शपथ ली थी। कांग्रेस भी इस मामले में खासी आक्रामक तेवर अपनाए हुए है। राज्यसभा में कांग्रेस के नेता पूर्व मंत्री गुलाम नबी आजाद ने आशंका जाहिर की है कि इस मामले में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और इटली के प्रधानमंत्री के बीच सौदेबाजी हुई है।  इटली के दो नाविकों पर भारत में मछुआरों की हत्या का मुकदमा चल रहा है। बकौल आजाद घूसखोरी के आरोप लगने पर  संप्रग सरकार ने कंपनी को ही ब्लैकलिस्ट कर दिया था और पूरी डील ही  रद्द कर दी गई थी। एडवांस  में दिया गया पैसा वापस ले लिया गया। कंपनी ने जो तीन हेलिकॉप्टर सप्लाई किए थे, उन्हें भी वापस कर दिया गया।  कांग्रेस का आरोप है कि संप्रग सरकार कंपनी को ब्लैकलिस्ट कर चुकी थी मगर मोदी सरकार ने इसे हटाने की कोशिश  की। जाहिर है यह सब किसी खास रणनीति के तहत किया गया।   अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय  शुरु हुई  अगस्ता वेस्टलैंड हैलिकाप्टर डील को संप्रग सरकार ने  निरस्त कर दिया था। पूर्व  रक्षा मंत्री एके एंटनी ने 5 फरवरी  2014 को राज्यसभा में लिखित बयान में बताया था कि एक जनवरी  2014 से  अगस्ता वेस्टलैंड कंपनी के साथ सौदा रद्द कर दिया था।  मगर रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर का कहना है कि कंपनी को कब ब्लैक लिस्ट किया गया इसका कोई रिकार्ड नहीं है। पूरा मामला राजनीतिक ज्यादा लग रहा है। बहरहाल, वीरवार को यह मामला सुप्रीम कोर्ट  पहुंच गया है। न्यायालय में याची ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अहमद पटेल  पर इस मामले में एफआईआर दर्ज  करने की मांग की है।  कोर्ट  अगले सप्ताह इस याचिका पर सुनवाई करेगा। मामला न्यायालय के विचाराधीन है, इसलिए सियासी दलों को न्यायालय का आदेश  आने तक  अगस्ता वेस्टलैंड हैलिकाप्टर डील  उछालने से बाज आना चाहिए।

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

कानून का मखौल

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल एव़ भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकार में सात नए मुख्य संसदीय सचिव की नियुक्तियों से कानून का जबरदस्त मखौल उडा है। दुखद स्थिति यह है कि खुद कानून बनाने वाले ही संवैधानिक व्यवस्था अनुच्छेद 164(1) की मूल भावना का खून कर रहे है़। इस कानून के तहत मंत्रिमंडल का आकार कुल विधानसभा सदस्यों की संख्या का 15 से अधिक नहीं खींचा जा सकता है। तथापि देश  के सियासी नेताओं ने  संवैधानिक व्यवस्था  को तोडने का नायाब तरीका इजाद कर रखा  है। मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव की नियुक्ति करके मंत्रिमंडल का बेतहाशा  आकार बढाया जा रहा है।  वीरवार को पंजाब के मुख्यमंत्री ने छह  नए मुख्य संसदीय सचिवों को पद और गोपनीयता की  शपथ ढिलाई ।  विधायक परगट सिंह ने शपथ लेने से मन करा दिया   नए मुख्य ससदीय सचिवों के पदभार संभालने के बाद राज्य में  मुख्य संसदीय सचिवों की तादाद संख्या रिकॉर्ड 24  हो जाएगी। पंजाब में 17  मंत्री हैं  और 18 मुख्य संसदीय सचिव।  छह  नए मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति से मंत्रिमंडल का आकार  41  पहुंच जाएगा। विधानसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को मिलाकर यह संख्या 43  हो जाती है। 117  सदस्यीय विधानसभा में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के 72 विधायक हैं। इस तरह साठ फीसदी से भी ज्यादा विधायकों को मंत्रियों के पदों से नवाजा  गया है। भारत में संसदीय  सचिव अथवा मुख्य संसदीय सचिव पद की स्पष्ट  संवैधानिक व्याख्या नहीं होने की वजह से सियासी दलों को कानून का शॉर्टकट  मिला हुआ है। आश्चर्य   इस बात पर है कि नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा भी संवैधानिक व्यवस्था का मखौल उडाने में अकालियों का भरपूर साथ दे रही है। छह  नए मुख्य संसदीय सचिवों मेंसे दो पद भाजपा के हिस्से आए हैं। और-तो-और साफ-सुथरी और पारदर्शी  राजनीति का दम भरने वाले अरविंद केजरीवाल ने भी दिल्ली में 21 संसदीय सचिव नियुक्त कर  मंत्रिमंडल आकार को सीमित करने संबंधी कानून का मजाक उडाया है। हालांकि आम आदमी पार्टी का दावा है कि दिल्ली में संसदीय सचिवों को न तो मंत्री का वेतन दिया जा रहा है और न ही भत्ते। पंजाब में मुख्य संसदीय सचिब को राज्य मंत्री के बराबर का दर्जा दिया गया है। माहवार 1.21 लाख तनख्वाह के अलावा मंत्री समान भत्ते और सुविधाएं दी जाती हैं। नए मुख्य संसदीय सचिवों की नियुक्ति से भयंकर आर्थिक तंगी से जूझ रही सरकार पर लगभग 2.10 करोड रु का अतिरिक्त बोझ पडेगा। अकाली-भाजपा सरकार से पूछा जा सकता है कि अब जबकि विधानसभा चुनाव को मात्र कुछ माह रह गए हैं, छह  और मुख्य संसदीय सचिव को नियुक्त करने की क्या जरुरत आन पडी? जाहिर है यह सब राजनीतिक लाभ के लिए किया गया है। मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव को मुख्यमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ दिलाते हैं, राज्यपाल नहीं। उन्हें मंत्रिमंडल की बैठक में भी नहीं  बुलाया जाता । यही वजह है कि मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव को मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं माना जाता। देश  के कई उच्च न्यायालय मुख्य संसदीय सचिव अथवा संसदीय सचिव की नियुक्ति को लेकर स्पष्ट  व्यवस्था दे चुके है कि उनकी नियुक्ति असंवैधानिक है और यह संविधान के अनुच्छेद 164(1) की मूल भावना के खिलाफ है। हाल ही में दलबदल से सता में आए अरुणाचल प्रदेश  में मुख्यमंत्री ने 15 विधायकों को संसदीय सचिव नियुक्त किया है। इसके साथ ही करीब-करीब हर विधायक को लाभकारी पद दिया गया है। यह सब देश  के संविधान का घोर अपमान है। 2009 में बंबई उच्च न्यायालय ने गोवा में संसदीय सचिव की नियुक्ति पर साफ कहा था कि राज्य मंत्री के बराबर दर्जा  देकर संसदीय सचिव की नियुक्ति संविधान व्यवस्था का खुला उल्लंघन है। इससे पहले 2005 में हिमाचल प्रदेश  उच्च न्यायालय भी मुख्य संसदीय सचिव और संसदीय सचिव की नियुक्ति को अवैध करार दे चुका है क्योकि संविधान में ऐसे किसी पद का उल्लेख नही है। राजस्थान उच्च न्यायालय ने  हाल ही में राज्य सरकार से संसदीय सचिवों की नियुक्ति पर जबाव मांगा है। पंजाब  हरयाणा हाई कोर्ट में भी मामला विचाराधीन  है। अरुणाचल प्रदेश  और पंजाब में मुख्य संसदीय सचिवों की ताजा नियुक्तियों से देश  के समक्ष यक्ष प्रश्न  खडा कर दिया है कि आखिर कब तक सियासी नेता संवैधानिक व्यवस्था का मजाक उडाते रहेंगे। मंत्रिमंडल का आकार सीमित रखने के लिए और सख्त संवैधानिक व्यवस्था की जरुरत है और इसका अपमान करने वालों को दंड का प्रावधान होना चाहिए।     

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

जल के लिए “युद्ध“

इसे देश  का दुर्भाग्य ही माना जाएगा कि आजादी के लगभग सात दशक बीत जाने के बाद भी सरकार के पास कोई कारगर जल नीति नहीं है। गर्मियों में पीने के पानी की भारी किल्लत के बावजूद जल संसाधनों का कैसे सदुपयोग किया जाए, इस पर सरकार ने कभी सोचा ही नहीं। अभी तक जल संसाधनों के सदुपयोग पर कोई कारगर नीति नहीं है। और जल से जुडे मामलों का  प्रदूषण  कानून के तहत निपटारा किया जाता है।  जल  प्रदूषण को लेकर कानून है मगर जल के उपयोग को लेकर कोई कानून नहीं है। जल का कैसे उपयोग किया जाए,  किसी भी राज्य ने  इस पर आज तक  विचार ही नहीं किया जबकि जल संविधान की स्टेट लिस्ट में है। जल का कैसे उपयोग किया जाए, मौजूदा  भीषण  जल संकट की स्थिति में यह पहलू सबसे अहम है। पेयजल लोगों की बुनियादी जरुरत है और इसे मुहैया कराना सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए, सबसे पहले पीने के पानी को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। कृषि  और कमर्शियल  उपयोग इसके बाद आते हैं। देश  की न्यायपालिका ने भी जल के सदुपयोग को लेकर स्पष्ट  नीति बनाने पर जोर दिया है। देश  के कई भागों में एक ओर जहां पीने के पानी की भीषण किल्लत है, वही राज्यों की सरकारें इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के मैचों के लिए माकूल पानी मुहैया करा रही है। बंबई हाई कोर्ट  ने इस पर सख्त नाराजगी जताते हुए जल संकट से जूझ रहे  महाराष्ट्र  मे  मई माह के दौरान आईपीएल मैचों के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया है। सर्वोच्च न्यायालय  ने भी बंबई  हघ कोर्ट के फैसले से सहमति जताई है।  राजस्थान हाई कोर्ट  बुधवार (27 अप्रैल) को व्यवस्था देगा कि भीषण जल संकट से जूझ रहे राज्य में आईपीएल मैच खेलने के लिए पानी उपलब्ध है या नहीं। आयोजकों ने बंबई हाई कोर्ट में खुलासा किया था कि एक आईपीएल मैच के लिए कम-से-कम तीन लाख लीटर पानी की जरुरत पडती है। अब न्यायपालिका तय करेगी कि तीन लाख लीटर पानी चार घंटे के लिए मनोरंजन करने वाले आईपीएल मैच को दिया जाए या बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे प्यासे लोगों को। लोकतंत्र में “जनता द्वारा, जनता के लिए और जनता की“ सरकार भीषण सूखे की स्थिति में आईपीएल के लिए कैसे तैयार हो गई, यब बात भी चींकाने वाली है। न्यायपालिका अगर इस मामले में दखल नहीं देती, तो लोगो को इस बात की भनक तक नहीं लगती कि आईपीएल मैच में कितना अमूल्य  पानी जाया किया जा रहा है। मनोरंजन लोगों के जीवन से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। बहरहाल, उपलब्ध जल संसाधनों का कैसे वैज्ञानिक तरीके से सदुपयोग किया जए, इसके लिए राष्ट्रीय  नीति बननी ही चाहिए। मोदी सरकार ने इस मामले में भी पहल की है और प्रस्तावित मॉडल नीति का प्रारुप तैयार किया जा रहा है। राज्यों की सहमति के बाद राज्यों को इसे कानून बनाने को कहा जाएगा। इस समय जल से संबंधित मामले  1974 के (प्रिवेशन एंड कंट्रोल  अॅाफ पॉल्यूशन) एक्ट और इन्वायरमेट प्रोटेक्शन  एक्ट 1986 के तहत निपटाए जाते हैं मगर दोनों ही कानून प्रदूषण से संबधित हैं। केन्द्र सरकार ने 1987 में राष्ट्रीय  जल नीति बनाई थी और इसे 2002 और 2012 में अपडेट भी किया गया मगर यह नीति कारगर साबित नहीं हुई। अधिकतर राज्यों ने इसे नहीं माना। जल राज्य का मामला है। केद्र राज्यों को सिर्फ राय दे सकता है। तथापि, जल संसाधनों का बंटवारा राज्यों के बीच टकराव का सबसे बडा कारण है। भारत में दुनिया की 15 फीसदी आबादी बसती है मगर उसके पास मात्र 4 फीसदी जल संसाधन है। पानी के तर्कसंगत इस्तेमाल के लिए नदियों को जोडना एकमात्र पुख्ता विकल्प है मगर संबंधित राज्य इसमें अडंगा अडाते हैं। पंजाब और हरियाणा में सतलुज-यमुना लिंक का मामला इसकी ज्वलंत मिसाल है। भारत के पास इस समय लगभग 690 अरब क्यूुबिक मीटर (बीसीएम) जल भंडारण की क्षमता है मगर अमल में  253 बीसीएम क्षमता ही रह जाती है। लीकेज और अकुशलता से आधे से ज्यादा पानी बर्बाद हो जाता है। इस पर तपती गर्मी में अधिकांश  जल भंडार सूख जाते है और इससे पानी की भीषण किल्लत हो जाती है। भूमिगत जल स्तर (वाटर टेबल) निरंतर गिरता जा रहा है और 70 फीसदी पानी प्रदूषित है। इस स्थिति में भीषण  गर्मी में लोगों को पीने का पानी मुहैया कराना, सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती है। वैसे भी विज्ञानी चेता चुके हैं कि अगला युद्ध पानी के लिए लडा जाएगा। ताजा हालात यही संकेत दे रहे हैं।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

आंसू मेरी दिल की जुबां है

रविवार को राजधानी दिल्ली में न्यायपालिका की दुर्दशा  पर देश  के मुख्य न्यायाधीश  न्यायमूर्ति तीर्थ सिंह ठाकुर के साथ जनमानस के भी आंसू छलक आए। जजों पर अत्याधिक काम के बोझ से त्रस्त  देश  के मुख्य न्यायाधीश  प्रधानमंत्री के समक्ष आसूं नहीं रोक पाए। देश  के मुख्य न्यायाधीश  को भी अगर न्यायपालिका के सुधार के लिए प्रधानमंत्री के समक्ष भावुक होना पडे तो लानत है ऐसी व्यवस्था पर। आम आदमी अपनी दुर्दशा  पर रोए तो बात समझ में आती पर देश  का मुख्य न्यायाधीष आंसू छलकाए तो जाहिर है उनके अंदर लंबे समय से भावनाएं खौल रहीं थीं। भावुक हो जाना हर रहमदिल इंसान की कमजोरी होती है और बाद में न्यायमूर्ति ठाकुर ने स्वंय ही कहा कि “ भावुक हो जाना उनकी कमजोरी है। इससे पहले जम्मू यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह (कन्वोकेशन) में भी अपने पुराने दिन याद करते हुए जस्टिस ठाकुर रो पडे थे।  जस्टिस ठाकुर इस यूनिवर्सिटी के छात्र रह चुके हैं। मनोविज्ञानी कहते हैं कि हर इंसान के अंदर भावनाएं दबी रहती हैं और अवसर मिलते ही जाने-अनजाने बाहर आ जाती हैं। रविवार को नई दिल्ली में मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों  को संबोधित करते हुए न्यायमूर्ति तीर्थ  सिंह ठाकुर के साथ संभवतय यही हुआ। सम्मेलन में जस्टिस ठाकुर देश  की विभिन्न अदालतों में जजों की भारी कमी का जिक्र कर रहे थे। जस्टिस ठकुर ने भरे गले से साफ-साफ शब्दों में कहा कि पूरी जिम्मेदारी न्यायपालिका पर नहीं डाली जा सकती।  मुख्य न्यायाधीश  ने विधि आयोग की रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि 1987 में पेश  इस रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत में दस लाख लोगों  के लिए एक जज है जबकि होने पचास चाहिए। विधि आयोग के बाद सर्वोच्च न्यायालय की समिति ने भी 2002 में  जजों की संख्या बढाने की सिफारिश  की थी। इसके बाद प्रणब मुखर्जी (मौजूदा राष्ट्रपति ) की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने भी जजों की संख्या बढाने की सिफारिश  की थी । इसके बावजूद भी कुछ नहीं हुआ। नतीजतन, गरीब अपीलकर्ता सालों तक जेल मे सडते रहते हैं। जस्टिस ठाकुर ने स्कूल में अक्सर पूछे जाने वाले सवाल का हवाला देते हुए कहा कि किसी सडक को तय समय में बनाने के लिए कितने श्रमिक चाहिए, इसका गणित तो लगाया जाता है मगर देश  में अर्से से लंबित पडे 3.8 करोड  मुकदमों को निपटाने के लिए कितने जज चाहिए इसका हिसाब नहीं लगाया जाता। भारत में एक जज साल में कम-से-कम 2600 मुकदमे निपटाता है। इस बावजूद भी उससे अच्छे काम की उम्मीद की जाती है। क्या यह मुमकिन है? अमेरिका में एक जज ज्यादा से ज्यादा 81 मुकदमों की सुनवाई करता है। इन सब बातों के अलावा सरकार की  उदासीनता ने भी जस्टिस ठाकुर को खासा उद्धवेलित किया है। सरकार जजों की भर्ती के लिए तरह-तरह के बहाने बनाती है। उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों में जजों की भर्ती का जिम्मा राज्यों की सरकारों पर है मगर धन की कमी अथवा लांजिस्टिक समस्या का बहाना बनाकर  राज्य जजों  के पद सृजित करने में कोई दिलचस्पी नहीं लेते हैं। केन्द्र सरकार को भी सर्वोच्च न्यायालय में जजों की भर्ती पद्धति को बदलने की ज्यादा पडी है। मौजूदा कॉलेजियम चयन व्यवस्था में सरकार की नहीं चलती है। मोदी सरकार इसे अपने तरीके से चलाना चाहती है।  लॉमेकर्स अपने फायदे के लिए मामले में तमाम राजनीतिक मतभेद भुलाकर एक हो जाते हैं। सोमवार को दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार द्वारा लागू की जा रही सम-विषम (ऑड-ईवन) योजना पर संसद में सभी सदस्यों ने एक सुर में उन्हें इस योजना से बाहर रखने की मांग की। केजरीवाल सरकार ने सांसदों को संसद तक ले जाने के लिए विशेष  लक्जरी बसों का प्रबंध कर रखा था मगर अधिकतर सांसद बस में जाने की बजाए नियम तोडते हुए अपने निजी वाहनों से संसद पहुंचे। बहरहाल, जनमानस की राय ली जाए तो वे यही कहेंगे कि देश  की न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका से कहीं अच्छा  काम कर रही है। जो काम सरकार को करना चहिए, अब वह काम भी न्यायपालिका कर रही है। लोगों को न्यायपालिका पर कहीं ज्यादा भरोसा है। न्यायपालिका को भी संसद की ही तरह मजबूत और स्वायत होना चाहिए। ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चहिए कि भर्ती के लिए उसे सरकार पर आश्रित न रहना पडे।

रविवार, 24 अप्रैल 2016

आईपीएल और जलसंकट


देश  के कई भागों में भयंकर सूखा व्याप्त है। लोग-बाग बूंद-बूंद पानी को तरस रहे है मगर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को धन बटोरने वाले आयोजन इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की पडी है। क्या आईपीएल लोगों की प्यास बुझाने  से ज्यादा जरुरी है?  देश  की न्यायपालिका कई बार यह सवाल कर चुकी है। पिछले दिनों बंबई हाईकोर्ट ने  महाराष्ट्र में भीषण   सूखे की स्थिति के चलते राज्य में  मई माह में आईपीएल मैच खेले जाने पर रोक लगा दी थी। बुधवार को बीसीसीआई के विशेष  अनुरोध पर लॉजिस्टिग समस्याओं के मद्देनजर  हाई कोर्ट ने पहली मई को पुणे राइजिंग और मुंबई इंडियन के बीच मैच की अनुमति प्रदान कर दी। पिछले दिनों बंबई हाई कोर्ट को ही बताया गया था कि आईपीएल जैसे मैच के लिए पिच तैयार करने और उसे मेंटेन करने में एक बारगी तीन लाख लीटर पानी की जरुरत पडती है। महाराष्ट्र  में आईपीएल के बीस मैच कराए जाने थे। इस हिसाब से इन मैचों के लिए 60 लाख लीटर पानी की जरुरत थी। मुंबई के नामचीन वानखेडे स्टेडियम में ही  मात्र 8 मैचों के लिए 40 लाख लीटर पानी की दरकार थी। राज्य में व्याप्त भीषण  सूखे के कारण न्यायपालिका ने महाराष्ट्र में आईपीएल कराने की अनुमति नहीं दी और बीसीसीआई को 13 मैच महाराष्ट्र से बाहर शिफ्ट करने पडे । पूरे महाराष्ट्र में पीने के पानी की जबरदस्त किल्लत है। मराठवाडा में लोग पानी की एक-एक बूंद को सहेज कर रख रहे हैं और लातूर जैसे सूखाग्रस्त इलाकों में बीस दिन बाद पानी की सप्लाई की जा रही है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य में पानी कितना अनमोल है।  मराठवाडा  ही नहीं नवी मुंबई और थाणे जिले में भी सप्ताह में तीन दिन ही पीने का पानी मिल रहा है। जाहिर इस तरह की स्थिति में आईपीएल के आयोजनों के लिए 60 लाख लीटर पानी मुहैया कराने का मतलब था प्यासे लोगों से घोर अन्याय करना।   राज्य सरकार को जनता की भले ही चिंता न हो मगर देश  की न्यायपलिका को है। महाराष्ट्र के बाद अब राजस्थान हाई कोर्ट ने भी सूखा पीडित राज्य में आईपीएल मैच आयोजित करने पर तल्खी दिखाई है। राजस्थान में महाराश्ट्र से भी अधिक भीषण  सूखा है। सूखे की स्थिति से चिंतित हाई कोर्ट  ने राज्य सरकार से 27 अप्रैल तक जबाव मांगा है। 9 अप्रैल से  शुरु  हुआ इंडियन प्रीमियर लीग  का 29 मई को समापन है और इस दौरान कुल मिलाकर 60 मैच (56 आईपीएल और 4 प्ले ऑफ) खेले जाने हैं और कुछ खेले जा चुके  हैं । इन सब मैचों के आयोजन में दो करोड लीटर के करीब पानी बहा जाएगा। देश  के कई भागों में हर साल गर्मियों में भयंकर  सूखा पडता है और लोग-बाग बूंद-बूंद के लिए तरसते हैं। यह कहां का इंसाफ है कि आम आदमी पानी की एक-एक बूंद को तरसे और दूसरी ओर आईपीएल जैसे मनोरंजन में पानी को बर्बाद किया जाए । माना कि भारत में क्रिकेट के प्रति जुनून है और लोग-बाग भूखे-प्यासे रहकर भी क्रिकेट मैच देखते हैं मगर जिस गरीब के घर में पीने के लिए पानी की एक बूंद भी न हो, उसे क्रिकेट से कोई सरोकार नहीं है। पीने के पानी के लिए तरस रहे लोगों को पानी मुहैया कराना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी हे, भले ही इसके लिए आईपीएल को कुर्बान करना पडे। बीसीसीआई को भी यह बात समझनी होगी कि भीषण  गर्मी के मौसम में आईपीएल का आयोजन कोई हंसी-मजाक नहीं है। आजादी के लगभग सात दश क बाद भी सरकार अधिकतर लोगों को पर्याप्त स्वच्छ पेयजल की सुविधा मुहैया नहीं कर पाई है। हर साल गर्मियों में लोगों को पीने के पानी के लिए तरसना पडता है। पीने का पानी मूलभूत सुविधा है और सरकार यही सुविधा उपलब्ध नहीं करा पाई है। जनता से जुडे अहम मसलों पर बार-बार न्यायापालिका को हीं पहल करनी पडती है? जो काम सरकार का है, उसे न्यायपालिका को ही क्यों करना पड रहा है? इससे जनमानस में यह संदेश  जा रहा हे कि समकालीन सरकारें अपनी जिमेदारियां निभाने में पूरी तरह से विफल हो रही हैं। आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा? बहरहाल, बीसीसीआई अगले साल आईपीएल  देश  के बाहर आयोजित करने पर विचार कर रही है। पीने के पानी के भीषण  संकट से जूझ रहे देश  के लिए यही बेहतर होगा। पानी और सुरक्षा प्रबंधों के अलावा आईपीएल आयोजन से जुडे और भी सौ तरह के झंझट हैं और सरकार को इन सब में पडने की जरुरत नहीं है। भारत में कुश्ती  और कब्बडी जैसी स्थानीय खेल प्रतियिगिताएं ज्यादा प्रासंगिक हो सकती हैं।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

मोदी सरकार को जोर का झटका

उत्तराखंड उच्च न्यायालय के फैसले से मोदी सरकार को जो जोरदार झटका लगा है, उससे कहीं ज्यादा इस ऐतिहासिक फैसले से लोकतंत्र की जबरदस्त जीत हुई है। केन्द्र सरकार भले ही सर्वोच्च न्यायालय जाए और खुदा-न-खास्ता अगर उच्च न्यायालय का फैसला पलट भी दिया जाता है, तब भी यह आने वाले समय में  केन्द्र को संविधान के अनुच्छेद 356 में प्रदत पॉवर का बेजा इस्तेमाल करने के लिए कचोटता रहेगा। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में साफ-साफ कहा है कि “जनता द्वारा चुनी गई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगाना लोगों से विश्वासघात  है“। वीरवार को उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन को निरस्त करते हुए हरीश  रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को पदस्थ करके लोकतंत्र  बहाल कर दिया। विधानसभा भी जीवंत हो गई है और उच्च न्यायालय ने हरीश  रावत को अगले  शुक्रवार ( 29 अप्रैल) को सदन में  विश्वास  मत हासिल करने को कहा है। लोकतंत्र में सताधारी दल के बहुमत साबित करने का यही एकमात्र संवैधानिक विकल्प है और राज्यपाल को इसे आजमाना चाहिए था। तथापि, समकालीन राज्यपाल अपने पद और गरिमा की मर्यादा भूल कर बतौर केन्द्र के एजेंट काम कर रहे हैं। उत्तराखंड से पहले पूर्वोतर राज्य अरुणाचल प्रदेश  में भी राज्यपाल ने वही किया था जो केन्द्र ने उनसे करने को कहा था। उत्तराखंड उच्च न्यायालय की तरह गुवाहटी हाई कोर्ट  ने भी अरुणाचल प्रदेश  के  राज्यपाल ज्योति प्रसाद राजखोवा की कार्यशैली पर तल्ख टिप्पणी की थी। राज्यपाल राजखोवा ने विधानसभा आहुत करने की अपनी ही अधिसूचना निरस्त कर दी थी और अपनी मर्जी से विधानसभा का सत्र पहले बुला लिया था। असम के मुख्य सचिव रह चुके राजखोवा को यह बात बखूबी मालूम थी कि मंत्रिमंडल की सिफारिश  के बगैर विधानसभा का सत्र बुलाया ही नहीं जा सकता। और केद्र चुपचाप यह तमाशा  देखता रहा। अरुणाचल प्रदेश  में भाजपा ने कांग्रेस से थोक में दल-बदल कराकर पहले सरकार गिरा दी, फिर राष्ट्रपति शासन लगा दिया और थोडे ही समय बाद दल-बदलुओं से मिलकर सरकार बना ली। भाजपा उत्तराखंड में भी अरुणाचल प्रदेश  कांड दोहराना चाहती थी। कांग्रेस के नौ विधायक पार्टी से बगावत करके भाजपा के साथ मिल गए और रावत सरकार को गिराने पर आमादा हो गए। नियमानुसार पार्टी के कम-से-कम एक तिहाई विधायक अगर बगावत करते हैं, तो वे दल-बदल कानून की जद में नहीं आते हैं। उत्तराखंड में ऐसा नहीं था। सियासी दलों ने मिलकर दल-बदल कानून में यह व्यवस्था की है और इससे दल-बदल कानून बनाने का मूल मकसद ही पराजित हो गया है। भाजपा को जब लगा कि वह दलबदलुओं के साथ सरकार नहीं बना सकती, उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। संवैधानिक व्यवस्था यह है कि इस तरह की स्थिति में सत्तारूढ दल को विधानसभा में बहुमत साबित करना का अवसर दिया जाना चाहिए था। उत्तराखंड में अगर हरीश  रावत को विधानसभा में विश्वास  मत लेने को कहा जाता, तो कोई पहाड नहीं टूट पडता। राज्यपाल को यही विकल्प चुनना चाहिए था मगर इस स्थिति में भाजपा के मंसूबे पूरे नहीं होते। बहरहाल, उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश  में सरकार गिराने में संबंधित राज्यपालों की भूमिका ने इस संवैधानिक पद की प्रासंगिकता पर ही सवाल खडा हो गया है। उत्तराखंड और इससे पहले गुवाहटी उच्च न्यायालय की राज्यपालों की “पक्षपाती“ भूमिका पर तल्ख टिप्पणियों का एक ही निष्कर्ष   है कि संवैधानिक पद की मर्यादा बुरी तरह से भंग हुई है। कहावत है “बाढ ही खेत को खाने लग जाए तो फसल की रखवाली कौन करेगा“। संविधान के रक्षक  राज्यपाल  ही अगर संविधान का अपमान करने लग जाए तो संघीय ढांचे को कौन बचाएगा“।  अब मोदी सरकार क्या करेगी? शुक्र है देश  की न्यायपालिक अपना काम बखूबी कर रही हैं। उत्तराखंड और अरुणाचल प्रदेश  के घटनाक्रमों से देश  का संघीय ढांचा कमजोर हुआ है पर  न्यायपालिका ने इसे संरक्षित रखने की हर संभव कोशिश   की है। 


गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

Why Not Pension To All After Sixty

प्रोविडेंट फंड से पैसा निकालने पर भी प्रतिबंध, भला यह भी कोई बात हुई। इस तरह के जनविरोधी फैसले के खिलाफ लोंगो का गुस्सा भडकना स्वभाविक है। बचत करना और जरुरत पडने पर उसे निकालना हर जमाकर्ता  का अधिकार होता है। फिर सरकार कौन होती है प्रॉवेडेंट फंड को निकालने पर रोक-टोक लगाने वाली? इस साल दस फरवरी को मोदी सरकार ने पीएफ से पैसा निकालने की नई व्यवस्था की अधिसूचना जारी की थी। इस व्यवस्था के तहत रिटायरमेंट से पहले पीएफ से नियोक्ता का अंशदान नहीं निकाला जा सकता था। भले ही आप नौकरी क्यों न छोड दें और आपको पैसे की सख्त जरुरत पड जाए।  आप बस अपना अंशदान निकाल सकते थे। वह भी तब अगर पीएफ जमाकर्ता  दो माह तक बेरोजगार रहता है, तो  वह अपना अंशदान और इस पर ब्याज को ही निकाल सकता है। नियोक्ता का अंशदान परिपक्वता पर ही निकाला जा सकता है। सरकार की नियोक्ताओं पर यह मेहरबानी  कामगारों को बुरी तरह  खल रही थी। अब इस बात का हिसाब कौन रखे कि जगह-जगह नौकरी के दौरान अमुक नियोक्ता ने  कितना अंशदान जमा कराया है और कितना नही़।  सरकारी  भ्रष्ट  तंत्र की मदद से नियोक्ताओं द्वारा कर्मचारियों का पैसा दबाने और समय पर समय जमा न कराने की  शिकायतें आम है। देश  में साठ फीसदी से ज्यादा नियोक्ता आज भी कर्मचारियों को  पीएफ की सुविधा देते हीं नही हैं और अगर देते भी हैं तो इसमे खासा गोलमाल किया जाता है।   सरकार ने दावों के निपटान की आयु सीमा भी 54 से बढाकर 58 कर दी थी। सरकार ने पीएफ की निरतंरता बरकरार रखने के लिए यह फैसला लिया था मगर जरुरत पडने पर पैसे की निकासी रोकना जनहित में नहीं माना जा सकता। प्राइवेट सेक्टर में एक नौकरी को छोडकर, दूसरी पकडना अथवा नौकरी छूट जाना  आम बात है। नौकरी छूट जाने पर पीडित को पैसे की सख्त जरुरत पडती है और इस स्थिति में अगर उसकी बचत काम न आए, तो यह किस काम की। देश  भर में इस फैसले के मुखर विरोध के मद्देनजर , सरकार ने इस अधिसूचना को 30 अप्रैल तक रोक दिया था। मंगलवार को बेंगलुरु में कपडा मिलों के कामगारों ने विरोहस्वरूप बसो तक को आग लगा दी और कर्नाटक की राजधानी में हिंसक घटनाओं से सरकार दबाव में आ गई। पहले पीएफ फैसले संबंधी अधिसूचना को जुलाई तक रोकने का ऐलान किया गया। इस पर भी जब कामगारों का विरोध  थमा नहीं , तीन घंटे के भीतर सरकार को झुकना पडा और अपना फैसला बदलना पडा। ताजा घोषणा के अनुसार  अब कर्मचारी जब चाहें अपना पैसा निकाल सकते हैं। एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड स्कीम ( ईएफपीओ)  देश  की विशालतम सामाजिक सुरक्षा योजना है और इस समय इसके पांच करोड सब्सक्राइाबर्स हैं।  18 मार्च, 2016 को ईएफपीओ के पास 8.5 लाख करोड की परिसंपत्तियां (असेट्स) थीं। नियमानुसार मूल वेतन (बेसिक वेज) का न्यूनतम 12 फीसदी कामगार को एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड स्कीम में जमा करना पडता है और इतना ही अंशदान नियोक्ता को कानूनन जमा कराना पडता है।  मगर बेसिक वेज की स्पष्ट  परिभाषा  नहीं होने के कारण नियोक्ता इसमें खेल करते हैं और कर्मचारियों को कम-से-कम अंशदान देने के लिए तिगडमें भिडाते हैं। इस मामले में न्यायपालिका ने भी अलग-अलग व्यवस्था दे रखी है। मद्रास और मध्य प्रदेश  हाई कोर्ट की व्यवस्था के अनुसार मूल वेतन में तमाम भत्तों को शामिल किया जाना चाहिए। मगर पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट इस व्यवस्था से सहमत नहीं है। सरकार ने भी बेसिक वेज की स्पष्ट परिभाषा  नहीं कर रखी है। इस बात में दो राय नहीं हो सकती की प्रोविडेंट फंड स्कीम कर्मचारियों के लिए सबसे बडी सामाजिक सुरक्षा है। इसकी निरतंरता कर्मचारियों के हित में है और पीएफ की निरतंरता बनाए रखना सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है। रिटायरमेंट के बाद पेंशन  सबसे बडी सामाजिक सुरक्षा है। हालांकि   एम्प्लाइज प्रोविडेंट फंड स्कीम के तहत पेंशन की व्यवस्था है मगर निरंतरता के अभाव में इसका कोई ज्यादा लाभ नहीं मिल रहा है। सामाजिक सुरक्षा की खातिर पीएफ के प्रत्येक सब्सक्राइाबर्स के लिए न्यूनतम पेंशन का प्रावधान होना चाहिए और इसके लिए बाकायदा एक अलग फंड कायम किया जाना चाहिए। ईपीएफओ के पास  27000 करोड रु अनक्लेमड पडा है। इस राशि  को पेंशन  फंड के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

यहां है रोजगार

                 
देश  के असंख्य बेरोजगारों के लिए यह अच्छी खबर है कि केद्र सरकार दो साल के भीतर दो लाख बीस हजार नौकरियों की भर्ती कर रही है।  लेकिन इससे भी अच्छी खबर यह है कि उभरता और मजबूत भारत निवेशकों की पहली पसंद है।  भारत में सरकारी नौकरियों के प्रति आज भी खासा आकर्षण  है और ग्रामीण इलाकों में तो सरकारी नौकरी प्रतिष्ठा  का  सवाल है। केन्द्र सरकार में छह लाख पद खाली रहने के बावजूद मौदी सरकार लगभग सवा दो लाख नौकरियां के लिए भर्ती करेगी। केन्द्र के अधिकांश  महकमे गु्रप बी और सी कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। सरकार उच्च पदों की भर्ती में तो कोई कसर नहीं छोडती है मगर निचली श्रेणी के पदों को भरने में कोताही की जाती है। ऐसा क्यों? प्रधान मंत्री की घोषणा  के मुताबिक पहली जनवरी 2016 के बाद से निचली श्रेणी  ग्रुप  डी और सी के साथ-साथ ग्रुप  बी के अराजपत्रित पदों के लिए भी  कोई इंटरव्यू नहीं लिए जाएंगे और भर्ती विशुद्ध योग्यता के आधार पर की जाएगी। प्रधानमंत्री का कहना है कि दुनिया में ऐसा कोई भी एक्सपर्ट नहीं है जो दो-तीन मिनट के इंटरव्यू में प्रत्याशी  की योग्यता परख ले। यह व्यवस्था भ्रष्टाचार  और भाई-भतीजावाद को ही जन्म देती है। बहरहाल, देश  में बेरोजगारों की बढती संख्या के मद्देनजर दो  लाख बीस हजार सरकारी नौकरियों की भर्ती से रोजगार के लिए मारे-मारे भटक रहे युवकों को काफी राहत मिल सकती है। देश  में इस समय एक करोड से भी अधिक स्नातक, स्नाकोतर (पोस्ट ग्रेजुएट) और टेक्निक्ल ग्रेजुएट एवं पोस्ट ग्रेजुएट रोजगार की तलाश  में है। भारत में  1983 से 2013 के दरम्यान बेरोजगार का औसत  7.32 फीसदी रहा है।  2009 में यह औसत सबसे ज्यादा  9.40 फीसदी था जबकि  2013 में बेरोजगारी की दर सबसे कम  4.90 फीसदी थी। आकंडों से यह जानकारी भी मिलती है कि जितनी अधिक शैक्षणिक योग्यता होगी, बेरोजगारी उतनी ही अधिक भीषण  होगी।  2011की जनगणना के मुताबिक निरक्षरों में बेरोजगारी की दर 7.23 फीसदी थी तो उच्च योग्यता वालों में बेरोजगारी की दर 15.78 फीसदी थी।  मैट्रिक से कम साक्षरों  में बेरोजगारी की दर 8.88 फीसदी थी तो मैट्रिक और स्नातक से कम पड़े-लिखों   में 14.55 फीसदी बेरोजगार थे।  तथापि  सुखद स्थिति यह है कि 2022 तक भारत के पास दुनिया में सबसे विशाल  एक अरब वर्कफोर्स  होगी और इस मेंसे पचास फीसदी 25 साल से कम उमर की होगी। और यही युवा फोर्स भारत को दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्था बनाएगी। जाहिर है, इतनी बडी वर्कफोर्स को रोजगार मुहैया कराने के लिए भी व्यापक स्तर पर प्रयास करने पडेंगे। आर्थिक सुधारों में  शिथिलता आने की वजह से रोजगार सृजन में कुछ गिरावट आई है मगर इसके बावजूद भारत में 2015 के दौरान चीन और अमेरिका से कहीं ज्यादा विदेशी  निवेश  आया है और इससे रोजगार का सृजन हुआ है। इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाली दुनिया की सबसे बडी कंपनी फोक्सकन महाराष्ट्र  में पांच अरब डॉलर का कारखाना स्थापित कर रही है। इस फैक्ट्री में पचास हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा। कंपनी के चेयरमैन का कहना है कि अगले एक दश क में  फॉक्सकन  हरा राज्य में एक-एक फैक्ट्री लगाकर दस लाख रोजगार के अवसर मुहैया करा सकती है। भारत में अभी भी मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर की क्षमता का पूरा-पूरा दोहन नहीं हो पाया है। भारत में  मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर का सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में केवल 15 फीसदी का ही योगदान है और इस सेक्टर में महज 12 फीसदी वर्कफोर्स  को रोजगार मिलता है। चीन में यह भारत से दोगुना 30 फीसदी है और 40 फीसदी को इस सेक्टर से रोजगार मिलता है। प्रधानमंत्री बार-बार  मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर की क्षमता बढाने पर जोर दे रहे हैं। प्रधानमंत्री की “मेक इन इंडिया“ योजना का मकसद भी मैन्युफेक्चरिंग उत्पादन को बढाना है। इसलिए वे देश -विदेश  के निवेशकों से भारत में कारखाने लगाने किए लिए प्रेरित कर रहे हैं। मैन्युफेक्चरिंग में प्रत्येक परसेंटेज ग्रोथ से लगभग तीन करोड रोजगार के अवसर सृजित होते हैं। इस तरह के प्रयासों से ही भारत की युवा वर्कफोर्स को रोजगार मुहैया कराया जा सकता है। हर बेरोजगार को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

विस चुनावः बदलाव के संकेत

 चार राज्यों तथा एक केन्द्र शासित में विधानसभा चुनाव के लिए इन दिनों वोट डाले जा रहे हैं। अप्रैल माह की चार तारीख से  शुरु हुई मतदान प्रकिया 19 मई को वोटों की गिनती के साथ ही पूरी हो जाएगी। पूर्वोतर राज्य असम और पश्चिम  बंगाल के अलावा दक्षिण भारत में केरल, तमिल नाडु एवं केन्द्र शासित पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव कराए जा रहे हैं। असम में दो चरणों का मतदान 11 अप्रैल को पूरा हो गया और अब उम्मीदवारों को  19 मई तक का लंबा इंतजार करना पडेगा। तमिल नाडु, केरल और पुडुचेरी में 16 मई को एक दिन का मतदान कराया जा रहा है। पश्चिम बंगाल को छह चरणों की सबसे लंबी मतदान प्रकिया से गुजरना पड रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और उनकी पार्टी के लिए ये विधानसभा चुनाव  काफी अहम है। भाजपा के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है।  कुल मिलाकर इन राज्यों से राज्यसभा की 51 सीटें हैं और इस बात के मद्देनजर , इन राज्यों में भाजपा को जितनी ज्यादा से ज्यादा विधानसभा सीटें मिलेंगी, राज्यसभा में उसके लिए उतना ही बेहतर होगा। राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव विधानसभा सदस्यों द्वारा किया जाता है।  असम को छोडकर, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु-पुडुचेरी और केरल ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा का ठोस जनाधार नहीं है। पूर्वोतर असम में भाजपा सता की प्रमुख दावेदार है। इस राज्य में तरुण गोगई के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार दस साल से सत्ता में है। 2011 के  चुनाव में कुल 126  विधानसभा सीटों मेंसे कांग्रेस ने  39.39 फीसदी वोट लेकर 78 सीटें जीती थीं। भाजपा 11.47 फीसदी वोट लेकर मात्र  5 सीटें ही जीत पाई थी। मगर 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 14 लोकसभाई सीटों मेंसे 36.9 फीसदी वोट लेकर 7 सीटें जीती थीं। कांग्रेस 29.9 फीसदी वोट लेकर केवल तीन सीटें ही जीत पाईं थी। लोकसभा चुनाव नतीजों से भाजपा काफी उत्साहित है और असम में  स्पस्ट बहुमत  पाने के प्रति काफी आशावान है। अगर कांग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इंकूबेंसी फैक्टर सक्रिय हो गया तो भाजपा को सता में आने से कोई नहीं रोक पाएगा। पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु और केरल में चुनावी गणित असम की तरह फिलहाल भाजपा के माफिक नहीं है। 2011 में कुल 294 सदस्यीय विधानसभा में ममता बनर्जी की तृण्मूल ने 39.8 फीसदी जनादेश  से 184 सीटें जीतकर लगभग दो-तिहाई बहुमत हासिल किया था। सता का  दूसरी प्रमुख दावेदारी माकपा नीत वाम फ्रंट  30.08 फीसदी वोट लेकर केवल 40 सीटें ही जीत पाया था जबकि कांग्रेस ने 8.91 फीसदी वोट लेकर 42 सीटें जीती थीं। लोकसभा चुनाव में न तो माकपा और न ही भाजपा ममता बनर्जी के वोट बैंक में सेंध लगा पाई। मोदी लहर के बावजूद तृणमूल कांग्रेस 39.2 फीसदी वोट से 34 सीटों पर विजयी रही थी। कांग्रेस को 9.4 फीसदी वोटों से 4 और माकपा (वामपंथी फ्रंट) 22.7 फीसदी वोट लेकर मात्र 2 सीटे जीत पाई थी। भाजपा 16.6 फीसदी वोट लेकर 2 सीटें निकाल पाईं थी। राज्य में पहली बार भाजपा का प्रदर्शन   शानदार रहा था। इसी के बलबूते भाजपा पश्चिम बंगाल में बेहतर  नत्तीजों की उम्मीद कर रही है। केरल में भाजपा का कोई जनाधार नहीं है। केरल में इस बार भी मुख्य मुकाबला कांग्रेस नीत यूनाइटेड डेमोक्रेटिक (यूडीएफ)  और माकपा नीत लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ)  के बीच है।  2011 के विधानसभा चुनाव में  140 विधानसभा सीटों मेंसे यूडीएफ को 46.3 फीसदी वोटों से 74 और एलडीएफ को 45.4 फीसदी जनादेश  से 66 सीटें मिली थी। लोकसभा चुनाव में भी लगभग यही स्थिति रही थी। 20 लोकसभाई सीटों मेंसे यूडीएफ 42.6 मत लेकर 12 और एलडीएफ 40.17 फीसदी जनादेश  लेकर 8 सीटें जीत पाया था। इस विधानसभा चुनाव में भी मुख्य मुकाबला यूडीएफ और एलडीएफ के बीच ही है। तमिल नाडु में मुख्य मुकाबला जयाललिता की अनाद्रमुक और करुणानिधि की द्रमुक के बीच है मगर लोकसभा चुनाव में राजग ने 18.5 फीसदी वोट से 2 सीट जीतकर सभी को चौंका दिया था। लोकसभा चुनाव में द्रमुक और कांग्रेस का राज्य में सफाया हो गया था। भाजपा को विधानसभा में भी इसी तरह के चमत्कार की उम्मीद है। बहरहाल अभी तक हुए भारी मतदान बदलाव के संकेत दे रहा है। जब  कभी  भी भारी मतदान होता है, कुछ न कुछ बदलाव जरुर होता है।

सोमवार, 18 अप्रैल 2016

उबलती कश्मीर घाटी


कश्मीर  घाटी की ताजा घटनाएं बेहद निराशाजनक हैं। उत्तरी कश्मीर  के हंदवारा में जो कुछ भी हुआ, उसने घाटी में  शांति बहाली के प्रयासों पर पानी फेर दिया है। पिछले कई  दिनों से उत्तरी कश्मीर  में कर्फ्यू  जैसे प्रतिबंध लगाए गए हैं। बाजार बंद पडे हैं और यात्री बसें एवं ऑटो-रिक्षा भी नहीं चल रहे हैं। यह कोई नई बात नही है। कश्मीर  घाटी में आए रोज अलगाववादी उपद्रव मचाकर बाजार बंद कराते  हैं और तनावपूर्ण  माहौल बनाते हैं। यह सब  पाकिस्तानी पिठ्ठुओं की साजिश  होती है। कश्मीर  में  शांति  और स्थिरता अलगाववादियों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर देती हैं। इसलिए अलगाववादी घाटी में हर समय अस्थिरता पैदा करने की फिराक में रहते है। घाटी में सेना की मौजूदगी अलगाववादियों को फूटी आंख नहीं सुहाती। सेना की मौजूदगी में उनके नापाक इरादें कामयाब नहीं हो रहे हैं। इसलिए अलगाववाद  सेना को बदनाम करने का कोई मौका नहीं  चूकते।  हंदवारा के  ताजा घटनाक्रम यही दर्शाते हैं  कि अलगाववादी किस तरह सेना को बदनाम कर उसे घाटी से बाहर रखना चाहते हैं। राज्य में सतारूढ पीडीपी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती भी कश्मीर  से सेना हटाने और आर्म्ड  फोर्सिस स्पेशल पावर्स  एक्ट (एएफएसपीए) को निरस्त करने की पुरजोर मांग करती रही है।  (एएफएसपीए) के तहत सुरक्षा बलों को बगैर किसी सर्च  वारंट के किसी भी जगह पर छापा मारने, तलाशी लेने अथवा शक पर किसी को भी गिरफ्तार करने के अधिकार दिए गए हैं। बहरहाल, हंदवारा घटना यह भी  दर्शाती  हैं कि घाटी में अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक आतंकी किस तरह प्रशासन और सुरक्षा बलों पर भारी पड रहे है। हंदवारा घटना की  शुरुआत एक अफवाह से हुई।पिछले  मंगलवार को  एक युवती ने आरोप लगाया था कि फौज के बंकर के निकट स्थित सार्वजनिक शौचालय में एक सैनिक ने उससे छेडछाड की। इस पर कुछ स्थानीय युवक भडक गए। हालांकि बाद में युवती ने  शिकायत वापस लेते हुए आरोप लगाया कि उसने यह सब कुछ स्थानीय युवकों  के कहने पर किया था। इससे पहले ही स्थिति काफी बिगड चुकी थी। युवकों द्वारा सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी किए जाने से सैनिकों को उपद्रवियों पर फायरिंग करनी पडी और इसमें तीन लोगों मारे गए। बस फिर क्या था। अलगाववादियों ने स्थिति को खूब भुनाया और पूरी घाटी में उपद्रव मचाना शुरू  कर दिया । नतीजतन, प्रशासन को हिंसा और उपद्रव रोकने के लिए कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध लगाने पडे । अलगाववादी यही चाहते थे। कश्मीर  जितना अस्थिर रहेगा, अलगाववादी इससे फलते-फूलते रहेंगे। राज्य सरकार और सेना प्रशासन दोनों ही  हंदवारा घटनाक्रम की  जांच करवा रही हैं। इस तरह की जांच कितनी भी निष्पक्ष  क्यों न हो, अलगववादी रिपोर्ट  को मानने से रहे़। अब यह बात सरकार और सेना पर निर्भर है कि रिपोर्ट के निष्कर्षों कों  लेकर  वे जनमानस को कितना संतुष्ट  कर पाते हैं। अब तक की जाच रिपोर्टस को जनमानस नकारती रही है। राज्य में हाल ही में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में पीडीपी-भाजपा की सरकार बनी है और राज्य की पहली मुख्यमंत्री को सत्ता संभालते ही पहले श्रीनगर एनआईटी (नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ टेकनोलॉजी) में देशद्रोही नारे लगने के मामले से  और अब हंदवारा घटनाक्रम से  जूझना पड रहा है। अलगाववादी महबूबा मुफ्ती पर दिल्ली का साथ छोडने के लिए दबाव बनाना चाहते हैं। महबूबा पर जब तक प्रधानमंत्री का वरदहस्त रहेगा, राज्य को उदार वितीय मदद मिलती रहेगी और कश्मीर  में  शांति  बहाली के भरसक प्रयास होते रहेंगे। इस स्थिति में अलगाववाद और पाकिस्तान प्रायोजित आतंक कमजोर होता है।  पाकिस्तानी आतंकी और अलगाववादी इस स्थिति को बिगाडने की हरसंभव कोशिश  करेंगे और वे अब तक इसमें कामयाब रहे हैं। श्रीनगर एनआईटी में गत 30 मार्च को भारत-वेस्ट इंडीज मैच के दौरान भारत विरोधी नारे लगाने पर छात्रों को “स्थानीय और बाहरी“ में बांटकर टकराव पैदा कर और हंदवारा में सेना के खिलाफ माहौल बनाकर शांति  भंग करके अलगाववादियों ने अपने नापाक इरादे साफ कर दिए हैं। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के समक्ष इससे निपटना सबसे बडी चुनौती है।

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

गरीब पर मार,अमीर की मौज?

    गरीब पर मार,अमीर की  मौज?

किंगफिशर एयरलाइंस का दिवाला निकलने से  भारी कर्ज में डूबे शराब कारोबारी विजय माल्या के मामले ने पूरे देश  का ध्यान बेंकों का कर्ज  नहीं चुकाने वाले रसूखदार डफाल्टर्स  की ओर आकृष्ट  किया है। विजय माल्या को  चौदह बैंको का  लगभग नौ हजार करोड रु देना है और इस समय वे विदेश  में मौज-मस्ती कर रहे है।  मंगलवार को सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में बैंकों के  हैडमास्टर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “यह कैसी व्यवस्था है कि कुछ हजार रुपए कर्ज  लेने वाले किसानों से वसूली के लिए हर तरह के उपाय किए जाते हैं, किसानों की जमीन तक बेच दी जाती है, मगर हजारों करोड रु डकारने वाली कंपनी को बीमार बताकर मौज करने के लिए छोड दिया जाता है। आरबीआई की खिंचाई करते हुए न्यायालय ने कहा कि बैंकिंग रेगुलेटर होते हुए भी वह (आरबीआई) वाचडॉग की तरह काम नहीं कर रहा है। वस्तु स्थिति भी यही है। देश  में अमीर आराम से करोडों का कर्ज  लेकर कानून के शिकंजे से बच निकलते हैं मगर गरीब चंद रुपए नहीं लौटाने पर भी हर तरह से प्रताडित किया जाता है।  हताश , बेबस कर्ज  में डूबे किसान और गरीबों को खुदकुशी करने पर विवश  होना पडता है। पिछले महीने तमिल नाडु के एक किसान द्वारा कर्ज  नहीं लौटाने पर एजेटों ने पुलिस की मौजूदगी में उसका ट्रैक्टर जब्त कर लिया जबकि वह सात लाख के कर्ज का पांच लाख से ज्यादा लौटा चुका था। बाद में इस किसान ने खुदकुशी  कर ली। पूरे देश  में किसानों और कमजोर तबकों द्वारा कर्ज समय पर नहीं चुकाने की स्थिति में उनकी संपत्ति कुर्क कर ली जाती है मगर अमीरों के मामले में ऐसा नहीं किया जाता। अमीर लोग कितने रसूखदार होते हैं और कानून को किस तरह अपनी जेब में लेकर घूमते है, देश  के अग्रणी बैंक स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की चेयरमैन ने खुद इस बात का खुलासा किया है। बैंक को उसके पास गिरवी रखे गए माल्या के गोवा स्थित किंगफिशर हाउस का कब्जा लेने के लिए तरह-तरह के पापड बेलने पडे। उच्च न्यायालय ने उत्तरी गोवा के डीसी को तीन माह के भीतर इस विला का कब्जा  एसबीआई के सुपुर्द करने के आदेश  दिए थे। मगर डीसी बार-बार सुनवाई करके मामले को टालता रहा और फिर छुट्टी पर चल गया। माल्या की किंगफिशर कंपनी कबकी बंद हो चुकी है। उन्होंने अपनी शराब बनाने की कंपनी भी  दी है और वे पैसा लेकर विदेश  चले गए हैं। प्रवर्तन निदेशालय ने माल्या पर मनी लांड्रिग का मामला दर्ज कर रखा है मगर विभाग उन्हें रोक नहीं पाया।  माल्या को पूछताछ के लिए तलब किया जा रहा है। माल्या तीन बार नहीं आए मगर  प्रवर्तन निदेशालय इस पर भी  कुछ नहीं कर सका। अब कहीं जाकर  प्रवर्तन निदेशालय ने सरकार से माल्या  के पासपोर्ट को जब्त करने की सिफारिश की है। माल्या  ही क्यों ऐसी और भी कई मिसालें हैं। ताजा आंकडों के अनुसार सरकारी बैंकों की नॉन-परफॉर्मिंग असेटस लगातार बढती जा रही है। हाल ही में जारी रिपोर्ट के अनुसार सरकारी बैंकों (पीएसयू) के बैड लोसं और एनपीए आठ लाख करोड को भी पार कर चुके हैं जो कि बैंकों की मार्केट वैल्युएशन से पांच गुना ज्यादा है। सरकारी बैंकों की हालत इस कद्र खराब है कि उनके  हर  100 रुपए के शेयर  पर निवेशकों को 150 रु के बैड लोन्स का बोझ उठाना पड रहा है। सरकारी बैंकों की तुलना में प्राइवेट बैंकों की एनपीए काफी कम है।  स्पष्ट  है कि भरष्टाचार  और राजनीतिक दखलादांजी ने सरकारी बैंकों को दिवालियापन की कगार पर ला खडा कर दिया है।  आरबीआई ने बैंकों को 2017 तक तमाम बैड लोंस एव एनपीए से मुक्त करने को कहा है। मगर बैंक ऐसा कर पाएंगें, इस पर संदेह है।लगभग चार लाख करोड रु के बैड लोंस इतने कम समय में रिकवर करना नामुमकिन है।  बहरहाल, सरकारी बैंक भले ही आरबीआई को  नजरअंदाज  कर लें मगर देश  की सर्वोच्च अदालत के आदेश   की बेअदबी नहीं कर पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय ने बैंको को डिफाल्टर्स के नाम सावर्जनिक करने और उनकी कलई खोलकर उनका सच जनता के सामने लाने को कहा है। यही एक तरीका हे जिससे अमीरों पर दबाव पड सकता है। माल्या का मामला मीडिया में  उछलने के बाद उन्होंने जैसे-ऐसे बैकों का चार हजार करोड रु लौटाने की पेशकश  थी। सरकारी बैंकों में जनता का पैसा लगा है और इस गाढी कमाई को यूं जाया नहीं किया जा सकता। हर बार की तरह इस बार भी जनमानस को न्यायपालिका से न्याय की उम्मीद है।

लैंड लीजिंग एक्ट

खेती योग्य जमीन को लीज पर देने के लिए मोदी सरकार द्वारा कानून बनाने की पहल से उन भू-स्वामियों को राहत मिलेगी जो खुद खेती नहीं कर पा रहे हैं। इससे कृषि  क्षेत्र में निवेश  भी बढेगा। मौजूदा कानून के मुताबिक जमीन उसकी जो उस पर खेती करे। इस व्यवस्था से मालिक अपनी जमीन को लीज पर नहीं दे पा रहे थे। और इस वजह काफी जमीन बगैर खेती के ही रह जाती है। पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र , गुजरात और असम में हालांकि अभी भी खेती को लीज पर देने की अनुमति है, मगर कुछ समय बाद मुजारे अथवा टेनेंट को इस जमीन को खरीदने का हक मिलने से भू-स्वामी लीज पर देने से कतराते हैं। उत्तर प्रदेश , मध्य प्रदेश , तेलंगाना, बिहार और कर्नाटक में खेती की लीज पर पूरी तरह से प्रतिबंध है। अभी  आंध्र प्रदेश , पश्चिम बंगाल , तमिल नाडु और राजस्थान ही ऐसे राज्य हैं जहां जमीन को लीज पर दिया जा सकता है। इस तरह इस समय राज्यों में अलग-अलग कानून है। कानून बनाने की तमाम प्रकिया पूरी करने के बाद मोदी सरकार ने नया कानून तैयार किया है। सभी राज्यों ने इस कानून पर अपनी सहमति व्यक्त की है। मॅाडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 के प्रभावी होने के बाद लैंड लीज पर पूरे देश  में एक जैसा कानून लागू होगा और तमाम पुराने कानून स्वतः खत्म हो जाएंगे। इस कानून के बनने से अब भू-मालिक खेती योग्य जमीन को कानूनी तौर पर लीज पर दे सकेंगे। नीति आयोग द्वारा पिछले साल गठित टी हक समिति ने इस कानून को तैयार किया है। नए कानून में कृषि  संबंधी कामों का भी  स्पष्ट   उल्लेख है। इसके तहत जमीन मालिक अपनी खेती योग्य जमीन को कृषि , बागवानी, वानिकी, मत्स्य पालन ,एग्रो-प्रोसेसिंग अथवा खेती से जुडे अन्य कामों के लिए कानूनन कॉन्ट्रैक्ट पर दे सकते हैं। कानून में भू-स्वामी और टेनेंट दोनों के हितों का ध्यान रखा गया है। मौजूदा कानून में प्रतिकूल परिस्थितियां बनने पर भू-स्वामी के हितों के लिए कोई प्रावधान नहीं था। जमीन के मालिक और टेनेंट के बीच लीज को लेकर  कॉन्ट्रैक्ट होने के बाद टेनेंट को क्रॉप इन्शुरन्स  और अन्य बैंक क्रेडिट लेने का पूरा हक होगा। बहरहाल, माना जा रहा है कि संशोधित भू-अधिग्रहण बिल (लैंड एक्वीजीशन एक्ट-2013)  पर कांग्रेस से मुंह की खाने के बाद मोदी सरकार ने मॅाडल एग्रीकल्चर लैंड लीजिंग एक्ट, 2016 को वैकल्पिक तौर पर तैयार किया है। इस एक्ट से हालांकि बडे उधोगपतियों को उधोग लगाने के लिए कोई छूट नहीं मिलेगी मगर बागवानी, कृषि , एग्रो-फॉरेस्ट्री, एग्रो-प्रोसिंग, फिशरी, डेयरी-पॉल्ट्री फार्मिंग और स्टॉक ब्रीडिंग से जुडे कामों को नए कानून से जरुर खासी राहत मिलेगी। नए कानून से कृषि  निर्यात को भी खासा प्रोत्साहन मिल सकता है। अभी तक कृषि  उत्पादों का कुल निर्यात में 18 फीसदी योगदान है। भारत दुनिया में सर्वाधिक कृषि उत्पादन करने वाला दूसरा बडा देश है। देश  के कुल सकल उत्पाद में कृषि का करीब चौदह फीसदी योगदान रहता है जबकि 2007 में यह 16 फीसदी था। देश  का आर्थिक दायरा बढने के कारण कृषि  क्षेत्र का दायरा सिकुड रहा है। इसकी प्रमुख वजह इस क्षेत्र में भू-स्वामित्व को लेकर पुराने कानून है। कृषि  सेक्टर  में निवेश  बढाने के लिए भू-अधिग्रहण कानून को उधोग-फ्रेंडली बनाने की जरुरत है।  2013 में संप्रग सरकार ने बाबा आदम के जमाने के  भू-अधिग्रहण कानून  में काफी बदलाव किए थे। मोदी सरकार ने इस कानून को उधोग फ्रेंडली बनाने की कोशिश  की थी मगर कांग्रेस समेत विपक्ष ने ऐसा नहीं होने दिया। इससे आर्थिक सुधारों की गति अभी भी सुस्त पडी है और अपेक्षित निवेश  नहीं आ रहा है। उधोग-धंधे स्थापित करने के लिए जमीन चाहिए मगर मौजूदा कानून इसकी अनुमति नहीं देता है। इससे निवेश  रुक गया है। निवेश  के नहीं आने से अपेक्षित रोजगार सृजन भी नहीं हो पाया है।  कृषि  क्षेत्र से जुडे कामों में निवेश  बढने से निर्यात बढ सकता है यद्यपि भारत अभी भी दुनिया में कृषि उत्पादों का सातवां बडा निर्यातक देश  है। भारत में पचास फीसदी वर्कफोर्स  आज भी खेती के कामों से जुडी है। इस सेक्टर में निवेश  बढने  से रोजगार के और अधिक अवसर सृजित हो सकते हैं। मोदी सरकार की ताजा पहल से कृषि  सेक्टर में निवेश  बढ सकता है। और ऐसा हुआ तो यह देश  की आर्थिक सेहत के लिए अच्छी बात होगी ।

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

अच्छी बरसात की उम्मीद

                              अच्छी बरसात की उम्मीद


लगातार दो सूखे के बाद अबकी बार बरसात के दौरान पर्याप्त पानी बरसने की भविष्यवाणी  से किसानों के चेहरे खिल उठना स्वभाविक है। खुदा करे मौसम विज्ञानियों की यह भविष्यवाणी  सौ फीसदी सही साबित हो। लगातार सूखे ने  किसानों की कमर तोड दी है और अब वह और ज्यादा नुकसान सहने की स्थिति में नहीं है। उसे इस बार हर हाल में अच्छी फसल की दरकार है। उम्मीद के मुताबिक फसल तभी हो सकती है जब झमाझम पानी बरसे। मौसम का आकलन करने वाली एजेंसी स्काईनेट ने सोमवार को अच्छी बरसात की भविष्यवाणी की । स्काईनेट के अनुसार इस बार सामान्य से 35 फीसदी ज्यादा बारिश  हो सकती है। मॉनसूनी औसत बारिश  भी  105 से 110 फीसदी रहने का अनुमान है।  इसकी वजह अल नीनो का खत्म होना बताया गया है। अल नीनो के सक्रिय रहने के कारण पिछले दो बरसातों के दौरान प्रर्याप्त पानी नहीं बरसा था। अल नीनो सूखे का प्रमुख कारण है। नासा और आस्ट्रेलियाई एजेंसियों ने भी अल नीनो के निष्क्रिय  होने की पुष्टि  की है।  मंगलवार को देश  के मौसम विभाग ने भी स्काईनेट के आकलन की ताकीद कर दी। मौसम विभाग ने मानसून पर अपना आकलन जारी करते हुए कहा है कि इस बार मानसूनी बारिश सामान्य से अधिक रहेगी और काफी पानी बरसेगा। मानसून में  बारिश  का औसत (लाँग टर्म  एवरेज)  106 फीसदी रह सकता है और कहीं-कहीं इससे ज्यादा पानी बरस सकता है। भारत में कुल सालाना बारिश  का 70 से भी अधिक पानी जून से सितंबर के दौरान मानसून में  ही बरसता है। इसी बारिश  से धान, दालें, कपास, गन्ना और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलें उगाई जाती हैं। प्रर्याप्त पानी नहीं बरसने से इन फसलों की उपज गिरती है और इससे देश  में खाद्यान्न का संकट पैदा हो जाता है। भारत में अभी भी 54 फीसदी फसली क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा नहीं है। इस जमीन पर उगाई जानी वाली फसलें बरसाती पानी पर आश्रित है।  सिंचाई के परंपरागत स्त्रोतों के उतरोत्तर सूख जाने से भारत में ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में खाद्यान्न का संकट साल-दर-साल बढ्ता जा रहा है। भारत और दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों  में धान की फसल बरसाती पानी पर आश्रित है। दक्षिण एशिया में चावल लोगों का प्रमुख आहार है। भारत में भी दक्षिण भारत और पूर्वोतर राज्यों में चावल प्रमुख आहार है। लगातार सूखे की स्थिति और कम बरसाती पानी बरसने से दक्षिण एशिया के कई देषों में खाद्यान्न, खासकर, चावल की भीषण किल्लत बनी हुई है। हालात इस कद्र खराब हैं कि मार्च माह में थाईलैंड का  पांच-फीसदी  (ब्रोकन) टोटा चावल 378.50 डालर ( लगभग 25000 हजार रु) टन बिक रहा था। वियतनाम में यही चावल 385 डॉलर प्रति टन बिक रहा था। भारत दुनिया में चावल निर्यात करने वाला अग्रणी देश  है मगर इस साल चावल के भंडारण में खासी गिरावट आई है। ताजा आंकडे बताते हैं कि भारत और दुनिया के दूसरे अग्रणी चावल निर्यातक देश  थाईलैंड के पास इस समय करीब 160 लाख टन चावल का स्टॉक है जो कि 2013 के स्टॉक से 70 फीसदी कम है। इससे साफ  होता है कि इस समय चावल का संकट है।  2013 के बाद से यह संकट लगातार बढता जा रहा है। इस बार भी अगर पर्याप्त पानी नहीं बरसता है तो 2008 का “चावल संकट“ लौट सकता है। तब भारत ने चावल के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था और इससे दक्षिण एशिया के कई देशों  में चावल के दाम आसमान को छू रहे  थे। तब फिलिपिंस में चावल 1000 डॉलर प्रति टन (लगभग 66000 रु टन) से भी अधिक रेट पर बिक रहा था। निष्कर्ष , यह है कि अच्छी बरसात से न केवल भारत के किसानों को ही उम्मीद बंधी है, अलबत्ता भारत से चावल खरीदने (आयात) करने वालों देशों  ने भी राहत की सांस ली है। तथापि मौसम विभाग का आकलन अक्सर गलत साबित होता है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के जमाने में मौसम की तुनकमिजाजी कोई नई बात नहीं है।  इस बार  दुआ कीजिए मौसम विभाग की भविष्यवाणी सही साबित हो।   

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

Its Sheer Administrative Negligence

                                         सरासर लापरवाही

केरल में कोल्लम जिले के सौ साल पुराने पुतिंगल मंदिर के भीषण अग्निकांड में 108 लोगों की मौत के लिए सरासर प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार है। मंदिर परिसर में आयोजित आतिशबाजी प्रतियोगिता के दौरान पटाखों के गोदाम में आग लग गई। देखते-देखते  108 लोग बेमौत मारे गए और चार सौ से ज्यादा घायल हो गए। मंदिर में आतिशबाजी प्रतियोगिता कराने की कोई अधिकृत अनुमति नहीं दी गई थी। इतना ही नही मंदिर के निकट रहने वाले परिवार ने स्थानीय प्रशासन को लिखित शिकायत भी दी थी। इस  शिकायत पर कलेक्टर कार्यालय ने लिखित में मंदिर परिसर में आतिशबाजी प्रतिबंधित कराने की बात भी कही थी पर ऐसा हुआ नहीं। भारत में धार्मिक आयोजन और आस्था से जुडे मसले लोगों की जिंदगी से कहीं ज्यादा अहम माने जाते हैं। सच यह है कि लोगों की सुरक्षा के प्रति सरकार कभी संजीदा नहीं रही है और न ही प्रशासन के लिए जनसुरक्षा कोई ज्यादा मायने रखती है। प्रशासन को अति विशिष्ठ  लोगों की सुरक्षा से ही फुर्सत नहीं मिलती है। आए रोज देश  में जहां-तहां इस तरह के हादसे होते रहते हैं और लोग-बाग कीडे-मकोडों की तरह  बेमौत मारे जाते हैं। कहीं आग में जिंदा जल जाने से, कहीं भगदड मचने से और यदा-कदा आतंकी हमलों में। बेमौत मरना तो जैसे आम आदमी की नियति बन गई है। हर हादसे के बाद जनसुरक्षा को लेकर फौरी तौर पर गहरी चिंता व्यक्त की जाती है। हादसे की जांच  कराकर मामले पर लीपा-पोती की जाती है और थोडे ही समय में सब कुछ भूल-भुलाकर वही “ढाक के तीन पात“ वाली स्थिति बन जाती है। देश  में “सांप  निकल जाने के बाद, लाठी पीटने“ की रिवायत है। हादसा हो जाएगा, उसके बाद बडी-बडी बातें की जाएंगी  मगर हादसे से पहले गंभीर से गंभीर चेतावनी को भी हल्के में लिया जाएगा। आतंकी हमले से लेकर मंदिर-मस्जिद के धार्मिक आयोजन तक , सबकी एक ही व्यथा है। घोर लापरवही। पुतिंगल मंदिर के ताजा मामले को ही ले लीजिए। यह बात बच्चा भी जानता है कि जिस जगह पटाखों को स्टोर किया जाता है, उसके आसपास आतिशबाजी नहीं की जानी चाहिए। इसके बावजूद भी गोदाम के निकट पटाखे फोडे गए। मंदिर के गोदाम में पटाखे अनाधिकृत तौर पर रखे गए थे। सोमवार को एक और सनसनीखेज सूचना आई कि मंदिर के निकट पटाखों से लदी तीन लावारिस कारें बरामद की गईं। जाहिर है पटाखों का यह जखीरा मंदिर की आतिशबाजी प्रतियोगिता के लिए लाया गया था मगर हादसा होने के बाद कार में पटाखे लाने वाले भाग गए। नियमानुसार पटाखे बनाने और उन्हें बेचने के लिए प्रशासन से अनुमति ली जानी चाहिए। मगर अधिकतर मामलों में एसा होता नहीं है। देश  में आतिशबाजी तो छोडिए, अक्सर शादी-विवाह, जीत का जश्न और विभिन्न आयोजनों पर बंदूक से गोलियां तक चलाने का प्रचलन है जबकि कानूनन ऐसा करना संगीन अपराध है। नियमों को तोडना तो  कोई हमसे सीखे। कानून तोड कर इसका “पालन” करना हमारी शान है। पिछले एक दशक में अब तक धार्मिक स्थलों में पांच बडे हादसे हो चुके हैं। अक्टूबर  2013 में मध्य प्रदेश  में दतिया जिले के रतनगढ मंदिर में पुल के टूटने की अफवाह फैलने से मची भगदड में 91 लोग मारे गए थे। जनवरी,  2005 में महाराष्ट्र  में सतारा जिले के मंढेर देवी मंदिर में श्रद्धालुओं में भगदड मचने से  350 लोग मारे गए थे और  200 से ज्यादा घायल हो गए थे। यह इस सदी का सबसे बडा हादसा था। अगस्त 2008 में हिमाचल प्रदेश  के प्रसिद्ध नयनादेवी मंदिर में भगदड मचने से 150 लोग मारे गए थे। मृतकों में अधिकतर बच्चे और महिलाएं थीं।  2008 में ही राजस्थान के जोधपुर में बम की अफवाह से मची भगदड में 200 लोग मारे गए थे। जनवरी, 2011 में दक्षिण भारत के महशूर  साबरमाला मंदिर में भगदड से 104 लोग मारे गए थे। जुलाई, 2015 में आंध्र प्रदेश  के राजासमुद्री में गोदावरी नदी में पवित्र स्नान के समय भगदड मचने से 27 वृद्ध महिलाएं मारीं गईं थी। भगदड मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडु के कारण मची थी।  और भी कई हादसे हुए हैं और अधिकांश  हादसों में भगदड प्रमुख वजह रही है। इन घटनाओं से संबंधित सरकार और प्रशासन ने कोई सबक नहीं सीखा। लगभग सभी में प्रशासन की लापरवाही सामने आई है। अब तो सरकार को चेत जाना चाहिए।

रविवार, 10 अप्रैल 2016

सांप को दूध पिलाना......

कहावत है,“सांप को कितना भी दूध पिलाओ, वह डसना नहीं छोडेगा“। भारत के पडोसी देश  पाकिस्तान पर यह कहावत सौ फीसदी चरितार्थ होती है। भारत  पाकिस्तान को कितना भी सर चढा ले, उसे बार-बार गले लगा ले अथवा दूध पिला ले, वह डंक मारना , दगा देना  नहीं छोडेगा और पीठ में छूरा घोपने से बाज नहीं आएगा  । पठानकोट हमले को लेकर पाकिस्तान की जांच टीम को भारत आने की अनुमति देकर मोदी सरकार ने, निसंदेह, द्धिपक्षीय संबंधों को सुधारने की ओर सार्थक कदम बढाया था मगर पाकिस्तान ने अपना वचन नहीं निभाया। सच बात यह है कि पाकिस्तान से ऐसी उम्मीद भी नहीं थी। ऐन वक्त पर अपनी बात से पलट जाना और दगा देना पाकिस्तान की फितरत है। मोदी सरकार ने पाकिस्तान की पांच सदस्यीय जांच टीम को पठानकोट एयरबेस का दौरा करने की अनुमति इस बिला पर दी थी कि पाकिस्तान भी ऐसा ही करेगा। पाकिस्तान के साथ तय हुआ था कि जांच टीम के पठानकोट दौरे के बदले में वह भारत की जांच टीम को पाकिस्तान में जैश -ए-मोहम्मद के सरगना मौलाना अजहर मसूद अजहर से पूछताछ की अनुमति देगा।  पाकिस्तानी की दगाबाजी फितरत के बावजूद मोदी सरकार ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बातों पर भरोसा किया और जांच टीम को पठानकोट में वर्जित क्षेत्र भारतीय वायु सेना के एयरबेस में प्रवेश  की अनुमति दी। यह बहुत बडी बात थी। इस टीम में पाकिस्तान की बदनाम मिल्ट्री इंटेलीजेंस एजेंसी आईएसआई का नुमाइंदा भी था। भारत में पाकिस्तान की इस ऐजेंसी के प्रति सिर्फ  नफरत भरी पडी है और अगर जनता का वश  चलता वे आईएसआई के नुमाइंदे को भारत की ओर झांकने तक नहीं देते। भारत में विध्वंसक कार्रवाइयां करने, आतंक फैलाने, बम फोडकर निर्दोष  लोगों की हत्या करने और देश  को अस्थिर करने में पाकिस्तान की आईएसआई की अहम भूमिका रहती है। खुफिया सूचनाओं के अनुसार  आईएसआई भारत में  विध्वंसक कार्रवाइयां कराने और आतंक फैलाने के लिए   अंतरराष्ट्रीय  सीमा के निकट पाकिस्तान आधिपत्य वाले क्षेत्रों में बाकायदा आतंकियों के लिए प्रशिक्षण शिविर लगती  है और उन्हें असलाह और हथियार मुहैया कराती  है। यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है। दरअसल, ताकतवर भारत पाकिस्तान की सेना और आईएसआई को फूटी आंख भी नहीं सुहाता है। पाकिस्तान की सियासत में सेना का बहुत बडा दखल है और सेना कई बातों के लिए आईएसआई पर आश्रित है। पाकिस्तान के हुक्मरान सेना और आईएसआई की बात टाल ही नहीं सकते। पाकिस्तान में जैश -ए-मोहम्मद,लश्कर  जैसे संगठन मूलतः आईएसआई की ही देन है और इन संगठनों को भारत को अस्थिर करने के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है। मुंबई हमला हो या पठानकोट अथवा दीनानगर हमला, इन सभी में आईएसआई का बडा हाथ रहा है। इस स्थिति के मद्देनजर  पाकिस्तान  भारत की जांच टीम को मौलाना मसूद अजहर और हाफिज सईद जैसे आतंकी सरगनाओं के निकट फटकने भी देगा,  इस बात पर विश्वाश  करना ही बेफिजूल की बात है। सेना और आईएसआई पाकिस्तान की सरकार को ऐसा कभी नहीं करने देते और न ही करने देंगे। हाफिज सईद के मामले में भारत पहले ही पाकिस्तान द्वारा छला जा चुका है। बहरहाल, मोदी सरकार और राष्ट्रीय  सुरक्षा सलाहकार जमीनी सच्चाई से बखूबी परिचित थे। अब सवाल है कि इसके बावजूद मोदी सरकार ने पाकिस्तान पर भरोसा क्यों किया? कूटनीति का तकाजा हे कि दुश्मन  की दगाबाजी फितरत को बेनकाब किया जाना चाहिए ताकि वह पूरी दुनिया के सामने एक्जपोज हो सके। अगर मोदी सरकार की जगह संप्रग या कोई और सरकार होती, वह भी यही करती। भारत की जांच टीम को  पाकिस्तान अगर अपने यहां आने की अनुमति देता भी है, तो भी इससे कोई ज्यादा फर्क  नहीं पडता। भारत लाख सबूत दे, पाकिस्तान कभी नहीं मानेगा, भारत पर आतंकी हमलों में पाकिस्तानी आकाओं का हाथ है। पाकिस्तान को एक्सपोज करना ज्यादा अहम है। पाकिस्तान को दुनिया की नजरों में जितना गिराया जाए, भारत के लिए उतना ही बेहतर होगा। 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

देशप्रेम बनाम देशद्रोह?

जम्मू-कश्मीर  की ग्रीष्मकालीन  राजधानी श्रीनगर का नेशनल इंस्टीट्युट ऑफ टेकनोलोजी (एनआईटी) इन दिनों भीषण  राजनीति का  अखाडा बना हआ है। एनआईटी कैंपस में भारी उपद्रव के बाद पिछले  शुक्रवार  से संस्थान बद है, छात्रों से होस्टल्स खाली करवाकर  उन्हें घर भेज दिया गया है। जबकि इन दिनों परीक्षाएं चल रहीं थी। श्रीनगर एनआईटी में 2500 के करीब छात्र और चार सौ प्राध्यापक हैं। हैदराबाद की सेंट्रल यूनिवर्सिटी एवं जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के बाद श्रीनगर की एनआईटी  केन्द्र सरकार द्वारा संचालित तीसरी ऐसी शैक्षणिक संस्था है जहां कौन देशभक्त है और कौन देशद्रोही, इस बात को लेकर छात्रों में गुटीय संघर्ष जारी  है। संघर्ष  की जड तीस मार्च  को वर्ल्ड कप ट्वेंटी20 के सेमीफाइनल में भारत और वेस्ट इंडीज मैच में भारत की हार पर जश्न  मनाने की घटना है। बताया जाता है कि भारत के खिलाफ आग उगलने वाले अलगाववादी संगठनों के हिमायतियों ने  मैच हारने पर   भारत के खिलाफ नारे लगाए। इस स्थिति में देशभक्त छात्रों का  खून खौलना स्वभाविक था। इस पर देशभक्त और देश द्रोही छात्रों के बीच उपद्रव  होना ही था। श्रीनगर एनआईटी में चूंकि बाहरी छात्रों की संख्या काफी ज्यादा है, इसलिए उपद्रव भडकने पर पुलिस ने उनकी ज्यादा पिटाई की। गैर-कश्मीरी  छात्रो को इस बात का गिला है कि देशभक्त होने पर भी पुलिस ने देशद्रोही नारे लगाने वालों की बजाय उनकी पिटाई की जबकि उनका कोई  कसूर नहीं था। पुलिस की इस कार्रवाई से केन्द्र में सत्तारूढ मोदी सरकार की काफी थू-थू हुई है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कांग्रेस ने यहां तक कह दिया है कि भाजपा का राष्ट्रप्रेम  सिर्फ  दिखावा है। जम्मू-कश्मीर  में भाजपा समर्थक भी इस बात पर मोदी सरकार से खफा हे।  हमेशा  की तरह इस बार भी राजनीतिक दल छात्र-छात्राओं का राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। श्रीनगर एनआईटी की ताजा घटना ने फिर दर्शा   दिया है कि कश्मीर  घाटी में देसी राजनीतिक दलों की जगह पाकिस्तान के पिठ्ठू अलगाववादियों की तूती बोलती है। प्रतिभाशाली  छात्र राजनीति लफडों से हमेशा  कन्नी काटते रहे हैं मगर राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए उनका इस्तेमाल करने से बाज नहीं आते। एनआईटी जैसी प्रतिश्ठित शैक्षणिक संस्था मे राजनीति के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। एनआईटी में गलाकाट प्रतियोगी परीक्षा के बाद ही दाखिला मिलता है और पढाकू छात्र-छात्राएं देशद्रोही नारे नहीं लगाते। दुखद स्थिति यह है कि ताजा विवाद ने एनआईटी के छात्रों को ही स्थानीय और बाहरी श्रेणी में बांट दिया है। कहा जा रहा है को भारत की हार का जश्न  मनाने वाले स्थानीय छात्र थे। इसलिए उन्हें देशद्रोही करार दिया जा रहा है। गैर-कश्मीरी  छात्रों को बाहरी बताया जा रहा है। इनमें राज्य के जम्मू प्रभाग के छात्र भी  शामिल है। कश्मीर  घाटी में अलगाववादी आवाज उठना कोई नई बात नहीं है। आए दिन घाटी में पाकिस्तान के पिठ्ठू एवं अलगाववादी भारत के खिलाफ आग उगलते रहते हैं। अलगाववादियों की रैलियों में पाकिस्तान और अब इस्लामिक स्टेट के झंडे फहराए जाते है। और अगर श्रीनगर में भारत और पाकिस्तान के बीच मैच खेला जाए, तो ज्यादातर  दर्शक  भारत की बनिस्बत पाकिस्तान का समर्थन करेंगे। इस बात के ही  मद्देनजर  श्रीनगर में कोई मैच नहीं कराया जाता है। श्रीनगर एनआईटी प्रकरण का दुखद पहलू यह है कि एक छोटे से मुद्दे को इतना बडा बना दिया गया कि इसकी चिंगारी पूरे देश  में फैल गई। ठीक उसी तर्ज  पर जिस तरह जवाहर लाल यूनिवर्सिटी के छात्र नेता कन्हैया कुमार और हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या के मामले को भाजपा समेत सभी राजनीतिक दलों ने खूब भुनाया। श्रीनगर एनआईटी प्रकरण से यह सवाल भी उठता है कि स्मृति ईरानी के केन्द्र मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा संचालित यूनिवर्सिटीज  अथवा भाजपा  शासित राज्यों में ही  ”देशभक्त बनाम देशद्रोह“ का मुद्दा बार-बार क्यों उछाला जा रहा है? क्या यह भाजपा के “हिंदुवादी“ एजेंडे का हिस्सा तो नहीं है?  असहिष्णुता और बैमन्सय का माहौल   एनआईटी जैसी प्रतिश्ठित  शैक्षणिक संस्था के लिए कतई शुभ नहीं है।


गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

“हे राजन, यह कैसा न्याय ?

भारतीय रिजर्व बैंक ने मंगलवार को ब्याज दर (रेपो रेट) घटाकर महंगे कर्ज की मार झेल रहे लोगों को थोडी राहत देने की कोशिश  की हैं बशर्ते मोटा मुनाफा कमा रहे बैंक सस्ता कर्ज देने के लिए आगे आएं। मंगलवार को आरबीआई ने रेपो रेट में 0.25 फीसदी की कटौती करके बैंकों को दिया जा रहा कर्जा  काफी सस्ता कर दिया। ताजा कट के बाद अब बैंकों को आरबीआई से साढे छह फीसदी (6.5) पर कर्ज मिला करेगा। इसकी तुलना में बैंक 9.75 फीसदी अथवा इससे भी ज्यादा ब्याज ग्राहकों से वसूल रहे हैं। पिछले करीब सवा साल में आरबीआई रेपो रेट डेढ फीसदी घटा चुका है मगर अधिकांश  बैंक अपने ग्राहकों के ब्याज में  बमुश्किल   आधा फीसदी कट का लाभ दे पाए हैं। सितंबर 2015 में आरबीआई ने रेपो रेट में आधा फीसदी की कमी की थी मगर देश  के अधिकतर बैंकों ने ग्राहकों को ज्यादा-से-ज्यादा 0.25 फीसदी का ही लाभ दिया। इसमें भी बैंक बडा खेल करते है और बडी चतुराई से ईएमआई कम करने की बजाय कर्ज की अवधि को घटाकर ग्राहकों को मूर्ख बना रहे हैं। मगर अब बैंक ऐसा नहीं कर पाएंगे। आरबीआई ने प्राइम लैंडिंग रेट तय करने के लिए नई व्यवस्था लागू की है। इसके अनुसार कर्ज की ब्याज दरें फडिंग की मार्जिनल कॉस्ट पर तय की जाएंगी। इसमें रिजर्व बैंक से लिए गए कर्ज  की ब्याज दर और डेपोजिट पर ब्याज दरों को ध्यान में रखा जाएगा। अब तक बैंक अपनी मनमर्जी से फडिंग कॉस्ट तय कर रहे हैं। इस माह की पहली तारीख से लागू नई व्यवस्था से रेपो रेट घटाए जाने पर बैंकों को ब्याज दरं भी घटानी ही पडेगी। बहरहाल, उदारीकरण के बाद बैंकिंग सेक्टर का निजीकरण होने से कर्ज अपेक्षाकृत महंगा हो गया है। निजी बैंकों की ही तर्ज पर सरकारी बैंक भी तरह-तरह की सर्विस चार्जेज वसूल कर मोटी कमाई कर रहे हैं। भारत में अभी भी कर्ज काफी महंगा है। सरकार का दावा है कि मुद्रा स्फीति पर काबू पा लिया गया है और मुद्रा-स्फीति उत्तरोतर कम हो रही है। फरवरी में थोक मूल्य सूचकांक (डब्लयूपीआई) सालाना 0.91 फीसदी के स्तर पर आ चुका था। पिछले सोलह महीनों में यह लगातार गिर रहा है। तथापि, आम आदमी के लिए इसका कोई लाभ नहीं मिल पाया है। महंगाई लगातार बढती जा रही है और खाद्य वस्तुओं की कीमतें आसमान को छू रही हैं। दालें इतनी महंगी हैं कि गरीब आदमी के पहुंच से बाहर हो गई हैं। मौसमी फल और सब्जियां भी आम आदमी की पहुंच से बाहर हो रही हैं। इसकी प्रमुख वजह है कि सस्ते पेट्रोल-डीजल का लाभ सरकार ने अपनी जेब में डाल लिया है और आम आदमी को इसका कोई लाभ नहीं मिला है। पिछले डेढ साल के दौरान अंतरराष्ट्रीय  बाजार में तेल की कीमतें लगातार गिर रहीं हैं मगर न तो सरकार ने और न ही ट्रांसर्पोटर्स  ने सस्ते तेल का लाभ लोगों तक पहुंचने दिया। न्याय का तकाजा है कि अगर कीमतें बढने पर उसी अनुपात में कर्ज  से लेकर खाने-पीने की हर वस्तु अथवा सर्विस के दाम बढाए जाते हैं, तो कम होने पर ऐसा ही होना चाहिए। मगर  ऐसा  होता नहीं है। ट्रांसर्पोटर्स तो छोडिए सरकार ने खुद सस्ते फ्यूल का पूरा फायदा लोगों तक नहीं पहुंचाया है। बैंकों ने भी यही किया है। कर्ज को सस्ता करने की बजाय बैंकों ने मुनाफा कमाने में अपनी भलाई समझी है। बहरहाल, रेपो रेट के ताजा कट से लोगों को कोई बहुत ज्यादा फायदा नहीं होने जा रहा है। बैकों पूरा का पूरा डेढ फीसदी कट का लाभ ग्राहकों को देने से रहे। अगर इस बार सस्ते ब्याज का पूरा फायदा भी दिया जाता है, तो भी ज्यादा से ज्यादा बीस लाख के होम लोन पर मात्र मात्र 325रु की राहत मिलेगी। महंगाई के इस जमाने में यह राहत “ ऊंट के मुंह में जीरा समान लगती है। इस स्थिति में मोदी सरकार और रिजर्व बैंक के गवर्नर से पूछा जा सकता है, “हे राजन यह कैसा न्याय“?

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

काले धन का “पंचनामा“

                                             काले धन का “पंचनामा“

धन्नासेठों , सेलेब्रिटीज एवं सियासी नेताओं के गोरखधंधे क्या-क्या गुल खिलाते हैं, पनामा के अखबारों में प्रकाशित दस्तावेजों ने पूरी दुनिया को इस कडवी सच्चाई से फिर अवगत कराया  है। पनामा की लॉ फर्म फोनसेका मोसैक ने काले धन पर विकीलीक्स से भी कहीं बडा सनसनीखेज खुलासा किया है और इसमें खोजी पत्रकारों के अंतरराष्ट्रीय  संगठन आईसीआईजे की दस्तावेज जुटाने में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।  आईसीआईजे वाकई ही बधाई की पात्र है कि  उसकी खोजी पत्रकारिता से 600 डीवीडी (2.6 टेराबाइट डेटा) वाले “पनामा पेपर्स“ नाम के खुलासे से दुनिया के सामने पूंजीवादी व्यवस्था का काला चेहरा बेनकाब हुआ है। भारत  के इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के प्राय इंडियन एक्सप्रेस  समेत 109 मीडिया संस्थानों के सैंकडों पत्रकारों ने  इस काम को अंजाम दिया। 1977 से 2015 के दौरान चालीस साल का डेटा खोज निकालना आसान काम नहीं था। फिर भी खोजी पत्रकारों ने जान-जोखिम में डालकर   1.15 करोड दस्तावेज जुटाए और पनामा की लॉ फर्म की मदद से इन्हें सार्वजनिक किया। पत्रकारों ने पूरी दुनिया को यह संदेश  भी दिया है कि कॉपोरेट पूंजी से सीचिंत होने के बावजूद मीडिया में अभी भी खोजी पत्रकारिता का दमखम है और धन-बल उनके पराकर्म को  परास्त नहीं कर सकता। पत्रकारिता जगत के अब तक के सबसे बडे खुलासे ने दो सौ से ज्यादा राष्ट्राध्यक्षों , सियासी नेताओं, फिल्म हस्तियों, बिजनेसमैन, खिलाडियों और अधिकारियों की काली कमाई का कच्चा चिठ्ठा खोला है। इनमें चीन और रुस के  राष्ट्रपतियों  के करीबी  रिश्तेदारों   समेत पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ परिवार, भारत की नामचीन फिल्म हस्तियां अमिताभ बच्चन और उनकी पुत्रवधु ऐश्वर्या   राय बच्चन भी शामिल है। “पनामा पेपर्स“ में बताया गया है कि दुनिया भर के बडे लोग कर चोरी करके अपनी काली कमाई छिपाने के लिए कैसी-कैसी तिगडमें  भिडाते हैं। जाहिर है काली कमाई को छिपाने के लिए  टैक्स मुक्त देशों  की तलाश  रहती है। एक जमाने में स्विटरजलैंड को काले धन छिपाने के लिए सबसे सुरक्षित माना जाता था। मगर जैसे-जैसे इस  देश की करमुक्त  व्यवस्था  दुनिया की नजर में  चढ़ती  गईं , काली कमाई करने वालों ने   स्विटरजलैंड से भी अधिक सुरक्षित जगह तलाश  ली। और पनामा, सिसली, बह्यमाज और ब्रिटिश  वर्जिन आइलैंड जैसे देश  काले धन को छिपाने के लिए अधिक सुरक्षित पाए गए। पनामा पेपर्स खुलासे ने इस सच्चाई को फिर उजागर किया है कि पूंजीवादी व्यवस्था में कर चोरी, कायदे-कानून का उल्लघंन, अपराध और आतंक का ही डंका बजता है। इस खुलासे से यह भी पता चलता है कि विकासशील देशों  का काफी सारा धन काले धन के रुप में विकसित देशों  में पूंजी निर्माण भी कर रहा है। यही वजह है कि सत्ता से पदच्युत किए जाने के बाद विकासशील  देशों  के अधिकतर सियासी नेता विकसित देशों  में शरण लेते हैं ? आतंक और हिंसा के मौजूदा माहौल  में यह स्थिति खतरनाक है। इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि काले धन के बलबूते ही दुनिया में आतंक फल-फूल रगा है। पनाम खुलासे के बाद संबंधित देशों  की सरकारों को हरकत में आना पडा। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलेंड और भारत समेत कई देशों  को  कर चोरी करने वालों के खिलाफ जांच कराने के लिए बाध्य होना पडा। भारत की  पांच सौ बडी हस्तियों का नाम आने पर वितमंत्री अरुण जेटली ने भी  नियमानुसार सख्त कार्रवाई करने का आश्वासन  दिया है। तथापि, वस्तुस्थिति यह है कि सरकार की लाख कोशिशों  के बावजूद काली कमाई कर विदेशों  में धन छिपाने वालों  के खिलाफ आज तक कोई सख्त कार्रवाई नहीं हो पाई है। मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव के दौरान अपने इलेक्षन मेनिफेस्टो में सत्ता में आने के सौ दिन के भीतर विदेषों में छिपाए गए काले धन को स्वदेश  लाने का वायदा किया था। मोदी सरकार को अगले माह सत्ता में आए दो साल हो जाएंगें मगर विदेशों  में छिपाए गए काले धन का एक धेला भी अभी तक स्वदेश  नहीं लाया जा सका है। ताजा खुलासे से सरकार के काला धन को स्वदेश  लाने के प्रयासों पर सवालिया निशान  लगा दिया है। अगर पत्रकार विदेशों  में छिपाए गए काले धन का कच्चा चिठ्ठा खोल सकते है, तो सरकार क्यों नहीं? सरकार के पास अपार साधन और शक्तिशाली तंत्र है और अगर दृढ इच्छा शक्ति हो तो कर चुराने वालों को पकडा जा सकता है।

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

शुक्र है सरकार बन गई !


शुक्र  है अततः जम्मू-कश्मीर  में लोकप्रिय सरकार बन ही गई। दिवंगत मुफ्ती मोहम्मद सईद की सुपुत्री महबूबा मुफ्ती ने तीन माह तक राज्य में राजनीतिक अस्थिरता बनाए रखने के बाद अततः सोमवार को  मुख्यमंत्री पद  की शपथ ग्रहण कर ही ली। महबूबा  राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री होंगी। देश  में मुख्यमंत्री का पदभार संभालने वाली वे दूसरी मुसलमान मुख्यमंत्री होंगी। इससे पहले 1980 में सईदा अनवर तैमूर असम में देश  की पहली मुस्लिम मुख्यमंत्री बनी थीं। वे चार साल तक इस पद पर आसीन रहीं  थी। महबूबा के साथ  23 सदस्यीय मंत्रिमंडल को भी शपथ दिलाई गई। मुफ्ती मोहम्मद सईद मंत्रिमंडल में शामिल चार “असतुंष्टों " को महबूबा  मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है। इनमें मुफ्ती मंत्रिमंडल के ताकतवर नेता ओर बिजनेसमैन अलताफ बुखारी भी  शामिल है। महबूबा मुफ्ती द्वारा भाजपा के साथ सरकार बनाने में विलंब किए जाने पर  बुखारी ने तीन और विधायकों को साथ लेकर बगावत की थी और भाजपा के  साथ  सरकार बनाने के लिए जोड-तोड की थी। बुखारी की इस हिमाकत से महबूबा खासी नाराज हैं। इसी कारण बुखारी के साथ तीन अन्य “असतुंष्टों "- जावेद मुस्तफा मीर, मोहम्मद अशरफ मीर तथा माजिद पद्दर- को महबूबा ने अपने मंत्रिमंडल में  शामिल नहीं किया है। मुख्यमंत्री को मिलाकर 24 सदस्यीय मंत्रिमंडल का आकार संतुलित लगता है। 87 सदस्यीय विधान सभा में महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी के 27 विधायक हैं और भाजपा के 25। सज्जाद गनी लोन की पीपुल्स कॉफ्रेस के दो विधायक और दो निर्दलीय भी पीडीपी-भाजपा गठबंधन के साथ हैं। इस तरह सतारूढ गठबंधन को 56 विधायकों का समर्थन है और यह गठबंधन सरकार आराम से चल सकता  है। महबूबा को केन्द्र सरकार का भरपूर समर्थन भी है और इसका राज्य को काफी लाभ भी मिल सकता है। केन्द्र सरकार से राज्य को पहले से उदार वित्त्तीय मदद मिल रही है। जम्मू-कश्मीर  देश  का एकमात्र मुसलमान बहुल राज्य है। मुस्लिम महिला का मुख्यमंत्री बनना  इस संवेदनशील राज्य के लिए सुखद बात है।  जम्मू-कश्मीर  लंबे समय से आतंक और हिंसा से पीडित है। इस स्थिति में राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की अवाम का अहित हो रहा था। सात जनवरी को मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद राजनीतिक अस्थिरता के चलते जम्मू-कश्मीर  में राज्यपाल शासन ( जम्मू-कश्मीर  में राष्ट्रपति  की जगह राज्यपाल  शासन लगाने की संवैधानिक व्यवस्था है)  लगाना पडा था।  राजनीतिक अस्थिरता से राज्य की अवाम का अहित हो रहा था। महबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ सरकार बनाने के लिए तैयार नहीं थी। इसकी प्रमुख वजह है कश्मीर  की स्वायत्तता  को सुनिश्चित्त  करनी वाली संवैधानिक व्यवस्था (अनुच्छेद 370) के खिलाफ भाजपाइयों का  जब-तब आग उगलना। जम्मू के भाजपाई नेता अभी भी इस व्यवस्था को निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। अनुच्छेद  370 के तहत जम्मू-कश्मीर  में बाहर का कोई भी व्यक्ति जमीन-जायदाद नहीं खरीद सकता और न ही राज्य में स्थायी तौर पर सैटल हो सकता है। देश  के आजाद होने पर तत्कालीन रियासतों के विलय पर कश्मीर  की अवाम के साथ यह संवैधानिक समझौता हुआ था। देश  के एकमात्र मुसलमान बहुल आबादी वाले राज्य में बहुसंख्यकों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए यह व्यवस्था की गई थी और इसे किसी भी सूरत में निरस्त नहीं किया जा सकता। मगर भाजपा इसे निरस्त करने पर आमाद है। पार्टी के संस्थापक डाक्टर श्यामा  प्रसाद मुखर्जी ने इसके लिए अपने जीवन का  वलिदान तक दे दिया था। भाजपा को लगता है कि अगर पार्टी अपने इस स्टैंड से पीछे हटती है तो जम्मू में उसका जनाधार खिसक सकता है।  महबूबा को सरकार बनाने बाद भी यही चिंता सताती रहेगी कि भाजपा कभी भी इस दबी मांग को उछाल सकती है। वैसे भी  पीडीपी और भाजपा में खासे वैचारिक मतभेद हैं। सत्ता की खातिर वैचारिक मतभेदों को दबाने से दोनों दलों का जनाधार सिकुड सक्कता है।  “ कहीं की ईंट कहीं का रोडा, भानुमति ने कुनबा जोडा“  जैसे गठबंधन से सरकार तो बनाई जा सकती है मगर चलाई नहीं जा सकती। यह गठबंधन कब तक बना रहता है और इस संवेदनशील  राज्य में क्या गुल खिलाता है, इस पर सब की नजर रहेगी।

शनिवार, 2 अप्रैल 2016

यह शर्मनाक हार है

टी20 वर्ल्ड कप के सेमी-फाइनल में टीम ईंडिया की हार ने फटाफट क्रिकेट के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा है। खेल में हार-जीत तो चलती रहती है मगर जीता हुआ मैच हार जाना बेहद शर्मनाक  होता है और  ऐसी हार की टीस सालों तक नहीं जाती। पहली बार  टी20 के इतिहास में “दो नो बाल“ ने गेम का पासा ही पलट दिया। और अब "कैचिच विंस मैचिच“ के साथ-साथ यह भी कहा जाएगा “ नो बाल कैन आल्सो विन ए मैच"। वीरवार को मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में भारत और वेस्ट इंडीज के  बीच खेले गए  टी20 वर्ल्ड कप के दूसरे सेमी-फाइनल में कैरेबियाई क्रिकेटरों ने वह करिश्मा  कर दिखाया, जिसकी काफी कम उम्मीद थी। टॉस हार जाने के बाद पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने कोहली की “विराट“ पारी की बदौलत बीस ओवर्स में 192 का विशाल  स्कोर खडा कर दिया। इस  वर्ल्ड कप  में पहली बार भारत की  शुरुआत (ओपनिंग) भी अच्छी रही। शिखर धवन की जगह ओपनिंग करने आए अजिंके रहाणे ने रोहित शर्मा  के साथ 50 रन जोडे। रोहित के आउट होने पर विराट कोहली आए और तीन बार रन आउट और दो बार कैच आउट होने से बचते-बचाते 47 गेंदों में 89 रनों की नाबाद पारी खेली। पहली ही बार  इस  वर्ल्ड कप में पहली, दूसरी और तीसरी विकेट की साझेदारी पचास रनों को पार कर गई। विशाल स्कोर खडा करने के बाद भारत को   क्रिस गेल से सबसे बडा खतरा था मगर  बुमराह ने उन्हें पांच रनों के स्कोर पर क्लीन बोल्ड करके इस खतरे को भी टाल दिया।  सेमुअल्स  भी जल्द आउट हो गए। सब कुछ भारत के पक्ष में चल रहा था। लेकिन इसके बाद ऐसा कुछ हुआ कि जीतते-जीतते भारत मैच हार गया। भारतीय गेंदबाजों के कदम बहक गए। तेज गेंदबाज अगर नो बाल फेंके बात समझ में आती है मगर फिरकी गेंदबाज ऐसा करे, तो टीम को झटका लगना तय है। वीरवार को वानखेडे स्टेडियम में भी यही हुआ। भारत के प्रमुख  फिरकी गेंदबाज रविचन्द्रन अश्विन  ने सातवें ओवर में लैंडल सिमंस को बुमराह के हाथों आउट तो कराया मगर “नो बाल“ के कारण सेंमस को जीवनदान मिल गया। 15वें ओवर में हार्दिक पंड्या की गेंद में सिंमस को नो  बाल के कारण फिर जीवनदान मिला। 17वें ओवर में जडेजा ने सेंमस का बाउंड्री पर जबरदस्त कैच लपका मगर बचते-बचाते भी पैर रस्सी को टच कर गया। पूरे मैच में ऐसा ही  रोमांच बना रहा। दर्शकों  में अंत तक भारत की जीत की उम्मीद बंधी रही मगर अंततः भारत हार गया। दो नो बाल्स ने भारत से वर्ल्ड कप छीन लिया? वैसे वीरवार को अगर भारत जीतता तो वानखेडे में एक नया अध्याय लिखा जाता। वानखेडे का इतिहास रहा है कि टॉस जीतने वाली टीम ही यहां जीतती है। वानखेडे में ओस के बीच गेंदबाजी करना आसान नहीं होता है। वीरवार को भी ओस ने भारतीय गेंदबाजों को लय और लेंथ बिगाड कर रख दी। इसी वजह वेस्ट इंडीज ने टॉस जीतकर भारत से पहले बल्लेबाजी कराई। और जैसा कि हार के बाद अक्सर होता है, टीम इंडिया की रणनीति में भी कई कमियां गिनाईं जा रही हैं। धोनी और टीम इंडिया के रणनीति बनाने वालों का पूरा फोक्स क्रिस गेल पर ही रहा। लैंडल सिंमस, चार्ल्स और रसल को लेकर कोई रणनीति नहीं थी। टीम इंडिया और इसके निदेशक रवि शास्त्री को मुंबई पिच का बखूबी अंदाजा था मगर फिर भी आखिरी ओवर्स में गेंदबाजों का रोटेशन पूरी तरह से गडबडा गया। डैथ ओवर्स में सधी हुई गेंदबाजी कर रन रोकने वाले गेंदबाज थे ही नहीं। नतीजतन, आखिरी ओवर विराट कोहली से कराना पडा। 19वां ओवर रवीद्र जडेजा से कराया गया जबकि धोनी जानते थे कि इस मैच में न जडेजा चले और न ही  अश्विन । सेमी-फाइनल में अगर टीम के पास आखिरी ओवरों मे गेंदबाजों का टोटा हो तो अनुमान लगाया जा सकता है कि टीम इंडिया की रणनीति कैसी रही होगी। वैसे टीम इंडिया सेमी-फाइनल तक पहुंची यह भी अपने आप में कम करिश्माई नहीं है। पहला मैच न्यूजीलैंड से हार गए। फिर बांग्लादेश  से हारते-हारते बच गए। यह स्थिति यही साबित करती है कि मजबूत और फेवरट टीम इंडिया सिर्फ हौव्वा ही था। आखिर, हार तो हार ही होती है और इस कडवी सव्चाई को सहज में गले नहीं उतारा जा सकता।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

...और अब नुक्लेअर आतंक का खतरा

बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में यूरोपियन यूनियन के नेताओं से बातचीत के बाद  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी नुक्लेअर आतंक के शिखर सम्मलेन (  नुक्लेअर सिक्योरिटी समिट) में शरीक होने  वाशिंगटन  पहुंच गए हैं।।  ब्रसेल्स में  यूरोपियन यूनियन के नेताओं से  शिखर वार्ता सार्थक रही है। भारत-यूरोपियन की 13वीं  शिखर वार्ता  लगभग चार साल बाद सपन्न हुई है। पिछली बार  वार्ता 2012 में नई दिल्ली में आयोजित की गई थी। भारतीय मछुआरों की हत्या को लेकर इटली से जारी विवाद के कारण पिछले चार साल से  भारत-यूरोपियन यूनियन  शिखर वार्ता टलती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने हत्या के एक आरोपी इटली नाविक को अप्रैल तक भारत लौटने का समय दे रखा  है। इटली की सरकार आरोपी को भारत को सौपने को तैयार नहीं है। इस्लामिक स्टेट के आंतकी हमलों से पीडित बेल्जियम एव़ यूरोपियन यूनियन की राजधानी ब्रसेल्स के ताजा घावों पर मोदी ने महलम-पट्टी करने की भरपूर कोशिश  की। मगर  ब्रसेल्स में सपन्न  शिखर वार्ता में  यूरोपियन यूनियन के नेता इटली  मामले में कन्नी काटते रहे। भारत के लिए मछुआरों के हत्यारे इटली नाविकों को कानून के अनुसार दंड दिलाना सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।  27 देशों  की यूरोपियन यूनियन भारत की सबसे बडी ट्रेडिंग पार्टनर है। भारत में सबसे ज्यादा विदेशी निवेश , लगभग 26 फीसदी, भी   ईयू  से ही आता है। ब्रसेल्स पर आतंकी हमले करके इस्लामिक स्टेट ने समूचे यूरोप को हिला दिया है। ब्रसेल्स सम्मेलन में इटली मैरीन मुद्दे के नहीं सुलझने पाने से भारत को थोडी निराशा  हुई है।  ब्रसेल्स के बाद प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका की राजधानी में  सिक्योरिटी पर वैश्विक  नेताओं से वार्ता करेंगे। इस सम्मेलन में भारत के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया भी भाग ले रहे हैं। इस्लामिक स्टेट प्रायोजित आतंक के साथ-साथ उतरी कोरिया की अमेरिका पर नुक्लेअर  हमले की आए रोज की धमकी और चीन एवं जापान के बीच साउथ चाइना समुद्र को लेकर जारी खींचतान ऐसे ज्वलंत मुद्दे हैं, जो विश्व  शांति प्रयासों पर पानी फेर रहे हैं। उतर कोरिया पर चीन का हाथ है तो दक्षिण कोरिया अमरिका का अंतरंग सहयोगी है। इसी वजह उतरी कोरिया के तानाशाह  शासक किम जॉन्ग उन अमेरिका को तबाह करने की धमकी देते रहते हैं। 2014 में हेग में सपन्न न्यूक्लियर सिक्योरिटी समिट  के दौरान  अमेरिकी राष्ट्रपति  बराक ओबामा, जापान के प्रधानमंत्री शिन्जों अबे और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति   पार्क ग्यून-हाय के बीच कोरियाई प्रायद्धीप पर जापान के औपनिवेशिक कब्जे को लेकर  हुई बातचीत के फलस्वरुप इस दिशा  में कुछ प्रगति हुई है। जापान और दक्षिण  कोरिया  दोनों ही अमेरिका के सहयोगी हैं। पिछले साल दिसंबर में जापान और दक्षिण कोरिया के बीच इस संबंध में करार भी हुआ। जापान के प्रधानमंत्री ने कब्जे के लिए माफी भी मांगी और कोरियाई पीडितों के पुनर्वास को एक अरब येन की मदद देने का वायदा भी किया। इस करार के बाद  जापान और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव कम हुआ है। मगर चीन समर्थक उतर कोरिया अभी भी कोरियाई प्रायद्धीप में तनाव बनाए हुए है। वाशिंगटन  में न्यूक्लियर सम्मेलन में ओबामा इस तनाव को कम करने के लिए चीन को मनाने की कोशिश करेंगे। पाकिस्तान की  नुक्लेअर हथियारों की भूख भारतीय उपमहाद्धीप में तनाव का कारण बनी हुई है। पाकिस्तान को रोकना आसान नहीं है पर चीन उसे रोक सकता है। शिखर सम्मेलन में इस विषय पर भी बातचीत हो सकती है। नुक्लेअर हथियारों को ग्रहण करने की होड दुनिया में अमन-चैन के लिए सबसे बडा खतरा है। ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि इस्लामिक स्टेट नुक्लेअर हथियार बना रहा है और जैसे ही आईएस घातक परमाणु  हथियार हासिल कर लेगा, यह दुर्दांत आतंकी संगठन दुनिया में तबाही मचाने में देर नहीं लगाएगा। बहरहाल, वाशिंगटन जैसे न्यूक्लियर सिक्योरिटी  शिखर सम्मलेन की तब तक कोई उपयोगिता नहीं है जब तक अमेरिका यह साबित नहीं कर देता कि ताकतवर कौन हैः अमेरिका और उसके सहयोगी देश  या इस्लामिक स्टेट?