बुधवार, 30 नवंबर 2016

नाभा जेलब्रेकः शर्मनाक कांड

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के पंजाब दौरे के ठीक दो दिन बाद नाभा सेंट्रल जेल से खालिस्तान लिबरेशन फोर्स के  दुर्दांत आतंकी हरमिंदर सिंह मिंटू और  कश्मीर  सिंह के साथ-साथ चार गैंगस्टरों को दिन-दहाडे भगाने की घटना ने न केवल पंजाब को, अलबता पूरे देश  को शर्मसार किया है। इस घटना ने फिर पंजाब में कानून व्यवस्था की स्थिति का जनाजा निकाला दिया है। इससे यह संदेश  जाता है  कि आतंकी और गैंगस्टर जिस जेल से चाहें, कैदियों को भगा ले जा सकते हैं। पंजाब पुलिस की तो बात ही छोडिए! नाभा जेलब्रेक से पंजाब पुलिस की बची-खुची  विश्वसनीयता  भी जाती रही है। पंजाब पुलिस के बारे यह आम धारणा है कि पैसे दिए बिना इस फ़ोर्स   में पत्ता भी नहीं हिलता है। और मुठ्ठी  गर्म  करने पर कुछ भी करवाया जा सकता है। नाभा जेलब्रेक मामले में जिस तरह सुबह पुलिस की वर्दी पहन और दो कैदियों को लेकर गैंगस्टर अपने साथियों को छुडाने आते हैं, उससे साफ होता है कि इस कांड में पुलिस की मिलीभगत है। बगैर पुलिस की मदद के गैंगस्टर इस तरह  कांड कर ही नहीं सकते। जेल में कब और कहां से कैदी को लाया आना है, बगैर जेल सुपरिटेंडेंट की अनुमति के इस काम को अंजाम नहीं दिया जा सकता। जेल में सुरक्षागार्ड थे तो सही मगर गैंगस्टरों द्वारा धडाधड 100 से ज्यादा गोलियां दागने का मुकाबला तक नही कर पाए। नाभा सेट्रंल जेल में गैंगस्टर इतने धडल्ले और बेफिक्री से 6 कैदियों को भगा कर ले जाएं, और पुलिस देखती रह जाए, इसके क्या अर्थ लगाए जाएं? इससे साफ  है कि गैंगस्टरों को  जेल से कैदियों को भगाने में मदद की गई। पंजाब पुलिस का अमला जितना भारी-भरकम हे, उसकी कारगुजारी उतनी ही हल्की है। सात-सात डीजीपी, एक दर्जन से भी ज्यादा (एडीजीपी), लगभग तीन दर्जन आईजी और डीआईजी की लंबी चौडी फौज। अफसरों की फौज के रहते पुलिस जवानों को उनकी और  वीवीआईपीजी की सुरक्षा करने के अलावा न तो फुर्सत है और न ही  आमा जनता की सुरक्षा के लिए फोर्स ।  पंजाब पुलिस मुख्यालय में तैनात करीब 114 अफसरों की सुरक्षा के लिए ही 464 सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। एक रिपोर्ट  के अनुसार पंजाब में हर अति महत्वपूर्ण  व्यक्ति ( वीआईपी) की सुरक्षा के लिए कम-से-कम तीन पुलिसकर्मी तैनात है मगर 800 लोगों की सुरक्षा के लिए बमुश्किल एक पुलिसकर्मी उपलब्ध है। तीन साल पहले 2013 में सुप्रीम कोर्ट  में पेश  हलफनाामे में पंजाब सरकार ने माना था कि राज्य के करीब 1290 वीआईपीज की सुरक्षा के लिए पंजाब सरकार ने 4121 पुलिसकर्मी तैनात कर रखे हैं। पंजाब पुलिस के पास अफसरों समेत कुल मिलाकर 77, 583 की फोर्स है और इस तरह दो करोड 70 लाख जनता की हिफाजत के लिए बहुत कम पुलिस कर्मी है। इन्हीं कर्मचारियों मेंसे जेलों की सुरक्षा , यातायात व्यवस्था और अन्य  सुरक्षा संबंधी इंतजामों  के लिए  भी जुटाने पडते है।  पुलिसकर्मियों की भारी कमी से जूझ रही फोर्स के जवानों को डयूटी का बहुत ज्यादा द्बाव झेलना पडता है। न तो साप्ताहिक अवकाश  मिल पाता है और न ही आराम। एक अध्ययन के मुताबिक डयूटी का भारी दबाव पडने के कारण पुलिसकर्मी की मनोस्थिति, कुश लता, तत्परता और स्थिति विशेष  से निपटने की क्षमता पर खासा असर पडता है। पंजाब पुलिस की यही त्रासदी  है। एक तो काम का अत्याधिक बोझ और उस पर अफसरों की बगार। अक्सर  जेल के कर्मियों को अफसरों ं के घरेलू काम में भी लगाया जाता है। नाभा कांड से पता चलता है कि पंजाब का जेल प्रशासन कितना मुस्तैद ( प्लीज रीड  भ्रष्ट्र  ) है। नाभा जेल कांड ने प्रधानमंत्री द्वारा पंजाब सरकार को कानून-व्यवस्था पर दी गई  शाबसी की भी कलई खोल दी है। पंजाब में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे है। नाभा जेल जैसी घटनाएं बादल सरकार  की छवि और खराब कर सकती है। बादल सरकार को  सुरक्षा व्यवस्था और अधिक चाक-चौबंद करनी होगी।

मंगलवार, 29 नवंबर 2016

बंद टांय-टांय फुस्स

नोटबंदी पर संसद में एकजुट दिख रहा विपक्ष सोमवार को “भारत बंद“ पर पूरी तरह से बिखर गया। बंद पर वामपंथी अकेले पड गए और यह टांय-टांय फुस्स हो गया। और-तो-और नोटबंदी का सबसे मुखर विरोध कर रही पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी इस बंद मे हिस्सा नहीं लिया। इस बंद का आहवान वामपंथी दलों ने किया था, इसलिए ममता बनर्जी का इसमे हिस्सा लेने की कोई गुजांइश  नहीं थी। ममता को वामपंथी फूटी आंख भी नहीं सुहाते हैं। “बहन जी“ मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने भी बंद से कन्नी काट ली। कांग्रेस को आखिरी समय पर समझ में आ गया कि नोटबंदी से त्रस्त जनता को अगर “बंद“ से और ज्यादा परेशान  किया गया, तो 'लेने के देने' पड़ सकते   हैं । वैसे भी कर्नाटक को छोड़कर , हिमाचल,  उतराखंड और पुडुचेरी जैसे छोटे राज्यों में सिमटी ग्रांड ओल्ड पार्टी में अब  पूरे देश  में जनता को जुटाने का मादा बचा ही कहां है? जनता दल (यू) नीतिश  कुमार की प्रधानमंत्री से जुगलबंदी के कारण न पक्ष में है और न ही विपक्ष में। समाजवादी पार्टी का मायावती से छत्तीस का आंकडा है, इसलिए यह पार्टी उस मोर्चे का कतई साथ नहीं देगी जिसमें बसपा शामिल है। और न ही कांग्रेस  का साथ देगी। लालू प्रसाद यादव की आरजेडी, बीजू पटनायक की बीजेडी और तेलंगाना में सत्तारूढ टीआरएस जैसे क्षत्रप भी बंद में  शामिल नहीं हुए। केरल और त्रिपुरा को छोडकर भारत बंद का कहीं कोई असर नहीं रहा। इन दोनों राज्यों में वामपंथी सरकार है।   नोटबंदी पर संसद की कार्यवाही की बाधित करने के सिवा विपक्ष और कुछ भी करने की स्थिति मे नहीं है। एक-दूसरे की टांग खींचते-खींचते देश  का विपक्ष अपना वजूद ही खो चुका है। अब तक  विपक्ष की एकता के सारे-के-सारे प्रयोग टांय-टांय फुस्स होते रहे हैं। इस बार भी यही हुआ। टीवी चैनल्स पर जिस तरह से जनता को हजार अवरोधों के बावजूद नोटबंदी पर प्रधानमंत्री का समर्थन करते दिखाया जा रहा है, अगर विपक्ष इससे भी विश्वसनीय नहीं मानता है, तो खुद इस बात का पता लगाता कि जनता आखिर चाहती क्या है। नोटबंदी पर मारी-मारी फिर रही जनता के पहले से अस्त-व्यस्त जनजीवन  को और ज्यादा असहज करने का कोई औचित्य नहीं था। जनता नोटबंदी पर प्रधानमंत्री के साथ है, यह बात भाजपा की सहयोगी  शिवसेना को भी समझ में आ गई है। इसी कारण नोटबंदी की मुखर आलोचक  शिवसेना पैंतरा बदल कर अब इसकी भूरि-भूरि प्रंशसा कर रही है। सोमवार को भारत बंद की विफलता को लेकर सोशल साइट टवीटर पर इसका खूब मजाक उडाया गया। जमीनी हकीकत को दरकिनार करते हुए विपक्ष संसद को चलने नहीं दे रहा है। सोमवार को विपक्ष लोकसभा में प्रधानमंत्री की उपस्थिति पर अडा रहा । रविवार को प्रधानमंत्री ने नोटबंदी के खिलाफ विपक्ष के बंद को“ करप्शन बंद“ बताया था। इस पर भी विपक्ष तिलमिलाया हुआ है। सबसे बडा दुर्भाग्य यही है कि राज्यों में तो विपक्ष है मगर केन्द्र में नहीं है। और इन क्षत्रपों में अपने-अपने राज्यों में राश्ट्रीय दलों को रोकने का मादा है मगर केन्द्र में आते-आते क्षत्रप भी कमजोर पड जाते हैं। कांग्रेस ही नहीं, देश  का कोई भी राजनीतिक दल परिवर्तन की बयार को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। पूरी दुनिया में राजनीति के अस्त्र-शस्त्र और शास्त्र में तेजी से बदलाव आ रहा है। 2014 में राष्ट्रीय   राजनीति में नौसिखिए माने  जाने वाले नरेन्द्र मोदी को प्रचंड जनादेश  मिलना और अमेरिका में परंपरागत सियासी नेता की जगह  सफल कारोबारी और् पहली बार चुनावी अखाडे में उतरे डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना इस  बदलाव के संकेत नहीं है?  मगर देश  के राजनीतिक दल आज भी बीसवीं शताब्दी के युग में जी रहा है। घिसे-पिटे प्रयोग, बंद, संसद की कार्यवाही बाधित करना , जात-पात, ”तुष्टिकरण और  वोट की राजनीति- पर आश्रित रहना सियासी दलों की नीयति बन चुकी है। दीवारों पर लिखी इबादत साफ-साफ कह रही है कि जनता बदलाव चाहती है। विपक्ष अगर समय पर नहीं चेता तो उसी का नुकसान होगा। जनता अपना मन बना चुकी है।

सोमवार, 28 नवंबर 2016

कमजोर रुपया

नोटबंदी से चौतरफा मचे हाहाकार के साथ-साथ डॉलर के मुकाबले कमजोर  भारतीय मुद्रा के लिए देश  की मौजूदा  वित्तीय हालात से कहीं ज्यादा  वैश्विक  हालात जिम्म्मेदार है। दुनिया में स्टॉक मार्केट्स की दिशा  और परीक्षा अमेरिका तय करता है। अमेरिका की ब्याज दरें पूरी दुनिया को नचाती हैं।  वीरवार को रुपया डॉलर के मुकाबले तीन साल के न्यूनतम स्तर 68.86 के स्तर पर पहुंव गया था। यानी एक डॉलर के लिए  68.86 रु की विनिमय दर। शुक्रवार को मुद्रा बाजार में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दखल के बाद रुपए में कुछ सुधार आया और यह डॉलर के मुकाबले 68.37 पर बंद हुआ।  शुक्रवार को सेसेक्स में हालांकि  459 अंकों का उछाल आया मगर अभी भी यह नवंबर 8 (अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव) से 1731 अंक पीछे है। तब से सेंसेक्स 6.27 फीसदी अंक गिर चुका है।  मौजूदा स्थिति में आरबीआई रुपए की डॉलर विनिमय दर को  68 और 69 के बीच रखने के पक्ष में है। मगर आरबीआई  ज्यादा देर तक कमजोर रुपए को सहारा नहीं दे सकता। अगर येन और युवान जैसी अग्रणी एशियाई करंसी का अवमूल्यन  लगातार जारी रहता है, तो अपनी अमूल्य विदेशी  मुद्रा भंडार को खर्च  करके रुपए का अपमूल्यन (एपरिसेएशन)  ज्यादा कारगर साबित नहीं  होगा। तीन साल पहले अगस्त 2013 को तत्कालीन आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन के पद ग्रहण से कुछ दिन पहले रुपए में भारी गिरावट आई थी। तब अमेरिकी सेंट्रल बैंक द्वारा बांडस की खरीद अचानक बंद कर देने से रुपया डॉलर के मुकाबले  68.86 के न्यूनतम स्तर में पहुंच गया था। तब जैसे-तैसे रघुराम राजन ने स्थिति संभाल ली थी। अब नए आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल को भी उसी तरह की स्थिति का सामना करना पड रहा है। अमेरिका में रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से डॉलर लगातार मजबूत होता जा रहा है। मजबूत अमेरिकी मुद्रा  एमरजिंग मार्केटस से निवेश  को सोख रही है। ट्रंप के राश्ट्रपति चुने जाने के बाद से अब तक विदेशी  निवेशक 28,190 करोड रु निकाल चुके है और 15,194  करोड रु की बिकवाली (डेट इक्विटी)  कर चुके हैं। दिसंबर में अमेरिकी सेंट्रल बैंक अगर ब्याज दरें बढा देता है, तो भारत समेत एमरजिंग मार्केटस से विदेशी  निवेश  का पलायन तय है। ट्रंप की जीत के बाद से पूरी दुनिया की स्टॉक मार्केटस इस आशंका से पीडित है कि नए  राष्ट्रपति की टैक्स कट्स और सख्त मौद्रिक नीतियां से अमेरिकी केन्द्रीय बैंक (फेडेरल रिजर्व) ब्याज दरें बढा सकता है। इसी संभावना के कारण अमेरिकी बांडस मार्केटस में हाथों-हाथ बिक रहे हैं। इस बात की पहले से ही आशंका थी कि ट्रंप की जीत से अमेरिका और विकसित देशों  के बांडस एमर्जिंग मार्केटस की तुलना में ज्यादा मुनाफा कमाने वाले हो जाएंगे। निवेशक अब सोना और बॉन्ड्स  जैसे सुरक्षित  इंस्ट्रूमेंटस में पैसा लगा रहे हैं।  वित्तीय विशेषज्ञों का आकलन है कि अगले 7-8 महीनों में रुपया  डॉलर के मुकाबले 70 को पार कर सकता है। अर्थव्यवस्था में अभी नोटबंदी का प्लवन प्रभाव (स्पिलओवर इफेक्टस)  नहीं देखा गया है मगर चौथी तिमाही में इसका साफ असर देखा जा सकता है। अर्थशास्त्रियों का आकलन है कि नोटबंदी के कारण आर्थिक गतिविधियों में खासी कमी आई है और अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई है। इससे  सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) में 2 फीसदी की गिरावट आ सकती है। स्टॉक मार्केटस की ताजा स्थिति मई, 2014 जैसी है। तब स्टॉक मार्केटस नव निर्वाचित प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों की प्रतीक्षा कर रही थीं और इस क्रम में मार्केट परिवर्तनशील  बनी हुई थी। और अब भारत समेत पूरी दुनिया की मार्केटस अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर ताक रही है। 20 जनवरी, 2017 को उनके पदग्रहण करने बाद ही मार्केट्स में ठ्हराव की उम्मीद की जा सकती है। 

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

युद्ध समस्या का हल नहीं

सितंबर मे जम्मू-काश्मीर  में  उडी सेना ब्रिगेड हेडक्वाटर्स पर आतंकी हमले के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच नियत्रंण रेखा पर जबरदस्त तनाव बना हुआ है। और यह तनाव कभी भी युद्ध विभीषिका में बदल सकता है। उडी आतंकी हमले में भारतीय सेना के 17 जवान शहीद हुए थे और 19 गंभीर रुप से घायल हो गए थे।  तब से भारत और पाकिस्तान की सेनाएं “जैसे-को-तैसा“ की सामरिक रणनीति से एक-दूसरे पर हमले कर रही हैं।  30 सितंबर से बाद से अब तक 18 भारतीय जवान मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान के तो कहीं ज्यादा सैनिक मारे गए हैं। मंगलवार को भारतीय सेना के तीन जवान मारे गए। हमला कश्मीर  घाटी के कुपवाडा के माछिल में घात लगाकर किया गया। हमलावरों ने एक सैनिक का सर कलम कर दिया गया और उसके शव को क्षत-विक्षत कर डाला। जेनेवा कन्वेशन के तहत ऐसा करना घोर अमानवीयता है मगर पाकिस्तान को मानवाधिकारों से कोई सरोकार नहीं है। 28 अक्टूबर के बाद आतंकियों  द्धारा भारतीय सैनिक का शव  क्षत-विक्षत करने  की यह दूसरी बर्बरतापूर्ण  घटना है ।  इस बर्बरता से क्षुब्ध भारतीय सेना ने इसका बदला लेने का संकल्प लिया है। भारतीय सेना ने बुधवार को पाकिस्तान के खिलाफ बडी सैन्य कार्रवाई  शुरू  भी कर दी है। ताजा सूचना के मुताबिक भारतीय सेना ने पूंछ, राजौरी और केल सेक्टर्स  में पाकिस्तान की चार चौकियों को निषाना बनाया । पाकिस्तान ने दावा किया गया कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में भारतीय सेना की गोलीबारी से 11 बस यात्री मारे गए और कप्तान समेत  तीन सैनिकों  के मरे जाने की   पुष्टि की है। पाकिस्तान के अग्रणी समाचार पत्र की खबर के अनुसार भारतीय सेना ने पाकिस्तान के तातापानी, लयात और नेकयाल में भारी फायरिंग की। इसी दौरान एक बस भी फायरिंग की चपेट में आ गई। पाकिस्तान के इन दावों पर विश्वास  करना कठिन है।  भारतीय सेना कई बार यह बात  स्पष्ट  कर चुकी है कि वह पाकिस्तान की तरह निर्दोष  लोगों पर फायरिंग नहीं करती। पाकिस्तान ने बुधवार को पांच जगह युद्ध विराम का उल्लघंन किया। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से अब तक पाकिस्तान 300 से भी अधिक बार युद्ध विराम का उल्लघंन कर चुका है।  बहरहाल, युद्ध किसी भी समस्या का हल नहीं। दोनों ही पडोसी देश  न्यूक्लियर हथियार से लैस हैं  और युद्ध की स्थिति में इसके भयावह परिणाम हो सकते है। 1965, 1971 और कारगिल युद्ध से दोनों देशों  को भारी जान-माल का नुकसान सहना पडा था। 1965 के युद्ध में पाकिस्तान के 20 से ज्यादा लडाकू जहाज, 200 टैंक और 3800 जवान मारे गए थे। भारत के भी 3000 जवान मारे गए थे। 1971 के युद्ध में तो पाकिस्तान का सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था और मुल्क दो हिस्सों में बंट गया था। कारगिल युद्ध के समय भारतीय वायुसेना पाकिस्तान पर बमबारी की पूरी तैयारियां कर चुकी थी और अगर ऐसा होता तो युद्ध और अधिक भीषण हो जाता।   भारत और पाकिस्तान इस  सच्चाई को भली-भांति जानते हैं कि युद्ध से दोनों देशों  की अवाम का ही नुकसान होता है। भारत से कहीं ज्यादा पाकिस्तान में गरीबी और भुखमरी है। इसीलिए, दोनों मुल्को के चरमपंथियो द्वारा अपनी-अपनी सरकार को युद्ध के लिए उकसाए जाने के बावजूद अब तक दोनों युद्ध से बचे हुए हैं।  मगर “जैसे- को तैसा“ रणनीति भी युद्ध जैसी है और दोनों पडोसी ज्यादा देर तक इस स्थिति में नहीं रह सकते। सीमा पर तनातनी और गोलीबारी नई बात नही हैं। कहते है, सैनिक हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते और हाथ खोलने के लिए दुश्मन पर अक्सर निशाना साधते हैं। भारत-पाकिस्तान सीमा पर हालात युद्ध जैसे हैं और जैसे-को-तैसे की चिंगारी के युद्ध विभीषिका में बदलते देर नहीं लग सकती। युद्ध से बचने और सीमा पर तनाव कम करने के लिए भारत और पाकिस्तान के पास द्धिपक्षीय बातचीत ही एकमात्र रास्ता है। 

बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोटबंदी महंगा सौदा ?

छह राज्यों एवं केन्द्र  शासित पुडुचेरी में 4 लोकसभाई और 10 विधानसभाई हलकों के लिए कराए गए चुनाव में सत्तारुढ दलों को ही कामयाबी मिली है। भाजपा इस पर फूल नहीं समा रही है और जीत का श्रेय प्रधानमंत्री की नोटबंदी कार्रवाई को दिया जा रहा है। मगर सच्चाई यह है कि इन उप-चुनाव में हर जगह सत्तारुढ दल ही जीता है। मध्य प्रदेश  और असम में भाजपा सत्तारुढ है, इसलिए इन दोनों राज्यों की लोकसभाई और विधानसभाई सीटें पार्टी ने जीती है। अरुणाचल प्रदेश  में भी भाजपा दल-बदलू सरकार को समर्थन दे रही है, इसलिए इस राज्य की विधानसभा सीट भाजपा के बट्टे-खाते में गई है। पश्चिम  बंगाल की दोनों लोकसभाई सींटें और एक विधानसभाई सीट सतारूढ दल तृणमूल कांग्रेस ने जीतीं है और तमिल नाडु की तीनों विधानसभा सीटें  सतारूढ  एआईएडीएमके के खाते में गई हैं। पुडुचेरी की एकमात्र सीट  सतारूढ कांग्रेस ने और त्रिपुरा की दोनों विधानसभाई सीटें वहां सतारूढ माकपा ने जीती हैं। कुल मिलाकर उप-चुनाव के परिणाम इस बार भी अलग नहीं है। अपवाद को छोडकर अब तक सतारूढ दल के  उप-चुनाव जीतने की परंपरा रही है। छह राज्यों के उपचुनाव में तीन में भाजपा जीती है तो चार में विपक्षी दल। इसके क्या मायने लगाए जाएं। बहरहाल, नोटबंदी निसंदेह  राष्ट्रहित में है मगर देशवासियों को इसकी बहुत बडी कीमत चुकानी पड रही है। अब तक 70 से ज्यादा लोग बेमौत मारे जा चुके हैं। 20,000 करोड रु  से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। तथापि,  बेंकों में अब तक 5,44,571 करोड रु जमा कराए गए हैं। इन मेंसे 33,006 करोड रु के नोट बदले गए हैं और 5, 11, 565 करोड रु जमा कराए गए हैं। आरबीआई के मुताबिक इस दौरान लोगों ने 1, 03,316 करोड रु की नगदी निकाली है। अनुमान है कि देश  में 500 और 1000 रु के लगभग 14 लाख करोड रु के अवैध नोट हैं। इसका अर्थ  है कि लगभग दस लाख करोड रु के अवैध नोट अभी भी बाहर नहीं आए है और अगर इन सब नोटों को बदला जाता है तो इसमें कम-से-कम 90 दिन का समय लग सकता है। इस हिसाब से देश  को सामान्य स्थिति में लौटने के लिए कम-से-कम चार माह का समय और लग सकता है। भारत जैसे विशाल देश  में जहां बेरोजगारों की लंबी कतार लगी है, इतना लंबा समय भारी पड सकता है। नगदी का संकट होने से लोगों की क्रय शक्ति (परचेजिंग पॉवर) काफी कमजोर हो गई हैं और इससे वाणिज्य और व्यापार जगत की 70 फीसदी से भी अधिक की ग्राहकी  कम हुई है। इससे मांग भी कमजोर पडती है। मांग के कमजोर पडने से अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी बढती है। देश  में असंगठित कामगारों की संख्या काफी ज्यादा है और अगर कामगारों को  15-20 दिन का रोजगार भी नहीं मिलता है, तो उनके भूखों मरने की नौबत आ सकती है। सबसे ज्यादा बुरी हाल रियल्टी सेक्टर का है। यह सेक्टर लंबे समय से मंदी से पीडित है और अब नगदी सकट से इस सेक्टर में और ज्यादा मंदी व्याप्त हो सकती है। इस  सेक्टर का अधिकतर कारोबार नगदी पर चलता है। 500 और 1000 के पुराने नोट बंद होने से इस सेक्टर की कमर टूट गई है। नोटबंदी का सबसे बुरा असर देश  की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड रहा है। देश  में 6.8 लाख देहातों में से अधिकांश  में बैंक नहीं है और इनमें सारा काम नगदी पर चलता है। नोटबंदी से सारा कामकाज ठप्प पड गया है। मौजूदा रबी फसल की बुआई पर  प्रतिकूल असर पडा है। पुराने नोट एकदम बंद होने से किसानों को बीज और खाद लेने के लाले पडे हुए हैं। इसी वजह सरकार ने सोमवार को किसानों को बीज और खाद खरीदने के लिए पुराने 500 रु के नोट चलाने की अनुमति दी है। निष्कर्ष  यह है कि नोटबंदी भले ही दीर्घकाल में अच्छे परिणाम लाए मगर फिलहाल इस कार्रवाई ने आम आदमी की कमर तोड कर रख दी है।

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

एक और रेल हादसा

एक और यात्री रेल दुर्घटना। रविवार तडके कानपुर के निकट इंदौर-पटना एक्सप्रैस ट्रेन की 14 बॉगियों के पटरी से उतर जाने के कारण 142 लोग मारे गए और 150 से ज्यादा गंभीर रुप से जख्मी हैं। शुक्र है बिजली लाइन ट्रिप हो गई, वरना पूरी ट्रेन में आग लग जाती। देश  में जितना पुराना रेल का इतिहास है, उतना ही पुरानी रेल दुर्गटनाओं का सिला भी। इस सदी में अब तक 20 बडे रेल हादसे हो चुके हैं और इनमें 900 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पडी है। जब भी रेल हादसा होता है, समकालीन सरकार जांच  कराकर खानापूर्ति कर लेती है। इस बार भी रेलवे मंत्री ने जांच के आदेश  दे दिए हैं। शुरुआती जांच से पता चलता है कि रेलवे ट्रैक में फेक्चर होने से यह हादसा हुआ। विशेषज्ञों के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त ट्रेन के बीच वाले कोच पटरी से उतरे हैं, इसलिए फ्रैक्चरड ट्रेक  को हादसे के लिए जिम्मेदार माना जा रहा है। इतना तय है कि कानपुर रेल हादसा मानवीय चूक की वजह से नही हुआ है। वैसे फ्रैक्चरड  ट्रैक का पता लगाने के लिए रेलवे के पास पुख्ता व्यवस्था है। रेलवे ट्रैक की नियमित  जांच होती है। ट्रंक रुट की हर मेन लाइन पर अल्ट्रासोनिक वॉल डिटेकशन लगाए गए हैं , जो पटरी की हर छोटी-बडी खामी को फौरन पकड लेते हैं। मेन लाइनों की हर माह नियमित जांच करना अनिवार्य है। इस स्थिति के दृष्टिगत कानपुर के निकट रेलवे ट्रैक का फ्रैक्चरड हो जाना घोर लापरवाही अथवा साजिश  की ओर संकेत कर रहा है। जांच के बाद ही इस बात का भी पता चलेगा है कि कानपुर के निकट रेलवे ट्रैक की आखिरी जांच कब हुई थी। रेलवे अधिकारी खुद मानते हैं कि देश  में रेलवे की जो स्थिति है, उसमें हर माह नियमित जांच कभी-कभार ही हो पाती है। इस बात की पूरी संभावना है कि रेलवे ट्रैक की  जांच के निर्धारित मानदंडों को दरकिनार किया गया था। भारत में अधिकतर एक्सप्रैस टैन्स खचाखच भरी रहती हैं और अक्सर औवरलोडिड हो जाती हैं। माल गाडियां तो बराबर ओवरलोडिड होती हैं। कई बार यह भी हादसे का कारण बनता है। अगर किसी मालगाडी की क्षमता 100 टन माल ढोने की है मगर उसमें 110 टन गुडस लोड किया गया है,  तो इससे ट्रैक का फेक्चर होना तय है। माना जा रहा है कि इंदौर-पटना एक्सप्रैस के दुर्घटनाग्रस्त स्थल से गुजरने से पहले ओवरलोडिड मालगाडी गुजर होगी, जिस वजह ट्रैक टूट गया।  ट्रेन के पटरी से उतरने के और भी कई कारण है। सामने किसी अवरोधक के आने अथवा किसी पार्ट  के गिरने से भी ट्रेन पटरी से उतर सकती है। इस बात का खुलासा भी हुआ है कि झांसी स्टेशन से रवाना होने के दो स्टेशन बाद ट्रेन चालक को इंजन में निर्धारित सीमा से ज्यादा लोड दिखा और इसकी सूचना तुरंत मंडल के अफसरों को दी गई मगर भारत में तो हर चीज के लिए “जुगाड“ है। मंडल अधिकारियों ने जैसे-तैसे जुगाड करके चालक को कानपुर तक पहुंचने के निर्देश  दिए। मगर अफसोस ट्रेन कानपुर पहुंचने से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त होे गई। तकनीकी कमियां भी रेल हादसों की प्रमुख वजह होती है। सुरक्षा मानदंडों के मुताबिक इंजन की  हैडलाइटस से कम-से-कम 200 की दूरी तक दिखना चाहिए मगर भारतीय रेलवे के इंजनों की हैडलाइटस बमुश्किल 10 मीटर आगे देख पाती हैं। सर्दियों में घनी धुंध में स्थिति और भी विकट हो जाती हैं। बहरहाल, हम बुलेट ट्रेन चलाने के सपने देख रहे हैं जबकि यह काफी महंगा काम है। 500 किमी पटरी बिछाने की लागत एक लाख करोड रु से भी अधिक है। रेलवे अभी भी मौजूदा रेल लाइनों की माकूल  सुरक्षा व्यवस्था का पूरा खर्चा  नहीं उठा पा रही है। बेहतर यही होगा कि हम रेलवे के बुनियादी ढांचे को मजबूत करें  ताकि आए दिन के रेल हादसे टाले जा सकें।    

रविवार, 20 नवंबर 2016

जनधन की बर्बादी

नोटबंदी पर संसद में तीन दिन से खूब हंगामा हो रहा है और यह स्वभाविक भी है। मोदी सरकार की नोटबंदी  कार्रवाई से जनता हलकान हो रखी है। पूरे देश  में नगदी का संकट है और सरकार ने लोगों पर अपना ही पैसा निकालने पर प्रतिबंध लगा रखा है। भला यह भी कोई बात हुई कि आयकर चुकाने के बाद अपना जमा पैसा निकालने के लिए आपको सरकार का मुंह ताकना पडे। यह कैसा लोकतंत्र है? इस स्थिति के मद्देनजर  जनता के नुमाइंदों का लाल-पीला होना बनता है। तथापि  संसद की कार्यवाही बाधित होने से सरकार का कुछ नहीं  बिगडेगा। इससे  जनता का  ही नुकसान होगा। शुक्रवार को  शीतकालीन सत्र के तीसरे दिन भी संसद कोई कामकाज नहीं निपटा सकी। राज्यसभा में कांग्रेस के वरिष्ठ  नेता गुलाम नबी आजाद के नोटबंदी पर विवादास्पद वक्तव्य से भडका सता पक्ष उनसे माफी मांगने पर अडा रहा और विपक्ष नोटबंदी के मुद्दे को उछालता रहा। नतीजतन, उपसभापति पीजी कुरियन को सदन की बैठक सोमवार तक के लिए स्थगित करनी पडी। लोकसभा में भी विपक्ष  नोटबंदी पर सदन में प्रधानमंत्री के वक्तव्य की मांग पर अडा रहा। सरकार ने इसे नहीं माना और विपक्ष ने सदन की कार्यवाही नहीं चलने दी और बेठक सोमवार तक के लिए स्थगित कर दी गई। लंबे समय से यही सिलसिला चलता आ रहा है।  जैसे ही जनहित से जुडा ज्वलंत मुद्दा विपक्ष के हाथ लगता है, उसका खामियाजा संसद को भुगतना पडता है। विपक्ष सदन की कार्यवाही नहीं चलने देता। यह सिला बोफोर तोप सौदे से लेकर, दूर-संचार घोटाला, तहलका, कॉमनवैल्थ स्कैम, 2जी स्कैम, कोलगेट और अब नोटबंदी तक बदस्तूर जारी है।  बोफोर्स  तोप स्कैम को लेकर विपक्ष ने 45 दिन तक संसद की कार्यवाही को बाधित रखा था। सरकार के पास प्रचंड बहुमत था, इसलिए सरकारी कामकाज बाधित नहीं हो पाया। और भाजपा इस लॉगजैम में सबसे आगे थी। नरसिंह राव सरकार के समय विपक्ष ने दूर-संचार घोटाले पर 15 दिन तक संसद को चलने नहीं दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय  तहलका पर दो सप्ताह तक संसद की कार्यवाही बाधित रही मगर सरकारी काम काज जैसे-तैसे निपटा लिया गया। 2जी स्कैम और कोलगैट पर विपक्ष ने संसद नहीं चलने दी और न ही सरकारी कामकाज हो पाया। एक अध्ययन के मुताबिक जब कभी संसद में किसी ज्वलंत नुद्दे पर सता पक्ष और विपक्ष में तनातनी होती है, तब लोकसभा का 77 फीसदी और राज्यसभा का 72 फीसदी कामकाजी समय जाया हो जाता है। सरकारी आंकडों के अनुसार संसद की एक मिनट की कार्यवाही पर 2. 5 लाख रु का खर्च आता है। यानी एक घंटे की कार्यवाही बाधित होने पर जनता की कमाई के 15 करोड रु जाया हो जाते हैं। 2जी स्कैम के समय तब संसद के शीतकालीन सत्र के शुरु में ही संसद की कार्यवाही के 114 घंटे ( 1710 करोड) हंगामे की भेंट चढे थे। पिछले तीन दिन से (लोकसभा दो दिन) से संसद की कार्यवाही बाधित करके सांसद जनता का 150 करोड रु से ज्यादा जाया कर चुके है। जनता के नुमाइंदों ने  जनहित के नाम पर संसद की कार्यवाही बाधित कर कितना पैसा बर्बाद करवाया है, इसका हिसाब लगाया जाए तो यह अपनेआप में देश  का सबसे बडा स्कैम साबित होगा। अब सवाल यह है कि आखिर जनता के नुमाइंदे यह सब किसके लिए करते हैं? संसद की कार्यवाही  बाधित करके करोडों रु स्वाह करके जनता का कौनसा भला हो रहा है? सांसद इस बात पर क्यों गंभीरता से विचार नहीं करते कि संसद की कार्यवाही बाधित करने के अलावा और भी बेहतर विकल्प है? सांसद सदन के भीतर कार्यवाही को बाधित करने की बजाए बाहर शांतिपूर्वक धरना देकर अपना विरोध जता सकते हैं। इससे जनता का पैसा बरबाद होने से बच जायगा और जनता के नुमाइदें  अपना विरोध प्रदर्शन भी करा पाएंगे। जनता के नुमाइंदों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

No End To Public Hardships After Modi Govt's Crackdown On Black Money

बुधवार (16 नवंबर) को संसद का  शीतकालीन सत्र  शुरु होते ही नोटबंदी का मुद्दा राज्यसभा में छाया रहा। मगर विभाजित विपक्ष में न तो जन समस्याओं को  शिद्दत  से उठाने का मादा नजर आ रहा है और न ही  सरकार को घेरने की संगठित रणनीति नजर आ रही है। परंपरा अनुसार लोकसभा की कार्यवाही दिवंगत सदस्यों को श्रंद्धाजलि देने के बाद दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। राज्य सभा ने अन्य सभी मामलों को दरकिनार करते हुए सबसे पहले नोटबंदी पर चर्चा की। और उम्मीद के मुताबिक सत्ता पक्ष ने सरकार की तारीफ के पुल बांधे और विपक्ष ने आम आदमी की असुविधा का हवाला देकर सरकार की खिंचाई की। उर्जा राज्य मंत्री और भाजपा के खजानची पीयूष  गोयल का कहना था कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी की कार्रवाई से ईमानदार आराम की नींद सो रहा हैै मगर भ्रष्ट  की नींद हराम हो रखी  है। कांग्रेस के आनंद शर्मा ने प्रधानमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि वे देशवासियों को बताएं, उनकी जान को किन लोगों से खतरा है, कौन उन्हें मारना चाहता है“। रविवार को गोवा में प्रधानमंत्री ने जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि “ कुछ लोग मेरी जान के पीछे पडे हैं और मुझे जान से मारना चाहते हैं क्योंकि उनकी 70 साल की लूट का भांडा फूट रहा है "। प्रधानमंत्री का इशारा कांग्रेस की ओर था और इसीलिए राज्यसभा में आनंद शर्मा  ने अपने भाषण में इसका उल्लेख किया। बुधवार को विपक्ष की एकता फिर तार-तार होती दिखी। पश्चिम  बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई में विपक्ष के सांसदों ने राष्ट्रपति भवन की ओर मार्च किया मगर इसमें न तो कांग्रेस और न ही वामपंथी दलों के  सांसद थे। राजग की सदस्य और  महाराष्ट्र  में भाजपा के सहयोगी दल  शिवसेना ने मार्च  में  शामिल होकर सत्तारुढ दल को असहज कर दिया है। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के सांसद ममता के साथ थे मगर केजरीवाल खुद नदारद रहे। एक दिन पहले कांग्रेस, वामपंथी, आप और तृणमूल कांग्रेस ने  शीतकालीन सत्र के दौरान मिलकर काम करने का दम भरा था। समकालीन भारतीय  सियासत की यही सबसे बडी विडंबना है। सियासी दलों का न तो कोई  स्पष्ट  स्टैंड है और न ही कोई  विचारधारा। सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। नोटबंदी के मुद्दे पर भी सियासी दलों को आम आदमी की परेशानी से कही ज्यादा वोट बैंक की चिंता है। आठ नवंबर को प्रधानमंत्री  द्धारा  पांच सौ और एक हजार रु के नोट बंद कर देने के ऐलान से स्तब्ध विपक्षी दलों ने  शुरु में इसे सराहा मगर जैसे ही लोगों को असुविधा होने लगी, विपक्ष ने इसे भुनाना  शुरु  कर दिया। माना कि नोटबंदी से लोगों को भारी असुविधा हो रही है मगर कोई भी सरकार जानबूझकर जनता की परेशानी का सबब नहीं बनना चाहती। पांच सौ और हजार रु की नोटबंदी आम लोगो के हित में उठाया गया कदम है पर नौकरशाही हर बार की तरह इस बार भी सरकार के सुधारात्मक कदम को ले डूबी। एक सप्ताह से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद स्थिति सामान्य नहीं हो पाई है। बुधवार से कुछ बैंको ने नोट बदलने वालों के अंगुली पर स्याही लगाने का काम शुरु  कर दिया। इस प्रकिया से बेंक कर्मियों का समय और जाया होगा और ग्राहकों की कतारें और लंबी होती जाएंगी। मोदी सरकार के समक्ष सबसे बडी चुनौती यह है कि जनमानस को नोटबंदी से उपजी परेशानी से कैसे निजात दिलाई जाए। बैंकों  द्धारा  ग्राहकों की अगुंलियों पर स्याही लाने से लोगों की परेशानी कम होने की बजाए बढेगी ही। सरकार का अब अपना पूरा ध्यान लोगों को “ कैश  क्रंच“ के चक्रब्यूह से बाहर निकालने पर होना चाहिए। देश  का कोई भी नागरिक ज्यादा देर तक अपने पैसे को निकालने पर लगाई गई रोक बर्दास्त नहीं करेगा।

असंवैधानिक कदम

अब इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस  शताब्दी के उतरार्ध  में पानी के लिए भीषण जंग छिड सकती है। और अगर हालात यही रहे तो देश  में इससे पहले ही पानी पर राज्यों में मारा-मारी हो सकती है। पंजाब ने नॉन राइपेरियन राज्यों से पानी की कीमत वसूलने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित करके इस बात के संकेत भी दे दिए हैं। ऐसा करके न केवल पंजाब ने देश  के संघीय ढांचे को कमजोर किया है, बल्कि न्यायपालिका की अवमानना भी की है। यह वही   शिरोमणि अकाली दल है, जो अब तक मजबूत संघीय (फेडेरलिज्म) का सबसे बडा पैरवीकार हुआ करता था। न्यायपालिका की अवमानना करके और असंवैधानिक प्रस्ताव पारित करके  संघीय ढांचा  मजबूत नहीं हो सकता है। यह स्थिति देश की अखंडता के लिए बेहद खतरनाक है।  स्वायत राज्य संघीय ढांचे की बुनियाद हैं मगर इस स्वायत्तता के यह कतई मायने नहीं हैं कि  राज्य सिर्फ अपने राजनीतिक हित साधे और देश  की अखंडता पर प्रहार करे। सतलुज-यमुना लिंक परियोजना (एसवाईएल) को लेकर पंजाब अपने छोटे भाई हरियाणा को जिस तरह से उसके वाजिब हक से महरुम कर रहा है, उससे सिर्फ  देश  का संघीय ढांचा कमजोर हो रहा है। पानी पर रायल्टी मांगने का किसी भी राज्य को कोई संवैधानिक अधिकार नहीं है।  लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी गई संसद और विधानसभा को सर्वोपरि माना जाता है। इसलिए संसद अथवा विधानसभा जनहित में कोई भी कानून अथवा प्रस्ताव पारित कर सकती है। विधानसभा चुनाव की बेला पर शिरोमणि अकाली दल ने हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली से पानी की कीमत (रायल्टी) वसूलने के लिए विधानसभा में प्रस्ताव पारित  कर सिर्फ  राजनीतिक “शिगूफा“ फेंका है। अकाली सरकार तो बिल लाना चाहती थी, मगर राज्यपाल ने इसकी अनुमति नहीं दी। यह मनी बिल था, इसलिए इसे विधानसभा में लाने के लिए राज्यपाल की अनुमति अनिवार्य  थी। बहरहाल, प्रस्ताव पारित करके पंजाब न तो पैसा वसूल कर सकता है और न ही हरियाणा और राजस्थान को दिया जा रहा नहरी पानी रोक सकता है। इसके विपरीत एसवाईएल पर कीमत वसूल और असहयोग का प्रस्ताच लाकर अकाली सरकार ने केन्द्र सरकार की मुश्किलें बढा दी है। अकाली दल खुद केद्र में सत्तारूढ भाजपा नीत राजग का हिस्सा है। पंजाब की देखादेखी हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली विधानसभाएं भी पानी पर हक जताने वाला प्रस्ताव पारित कर सकती हैं। इस तरह के प्रस्तावों के तब तक कोई मायने नहीं है, जब तक उन पर अमल न हो। वैसे भी संघीय ढांचे में  इंटर-स्टेट नदी जल बंटवारे के लिए राज्य विधानसभा में प्रस्ताव पारित कर विवाद निपटाने का किसी भी राज्य को कोई हक नहीं है।  1956 में  भाषाई  आधार पर राज्यों के पुनर्गतठन के बाद अंतरराज्यीय जल विवाद पर संसद ने बाकायदा इंटर-स्टेट वाटर्स डिस्पियुट एक्ट-1956 पारित कर रखा है और केन्द्र को इस एक्ट के तहत नदी जल बंटवारे पर दखल का पूरा  हक है। राज्यो में नदी जल  बंटवारे पर विवाद निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट , टिब्यूनल और केन्द्र सरकार संवैधानिक विकल्प है। 1966 में दोबारा राज्यों के पुनर्गठन और संयुक्त पंजाब के विभाजित किए जाने पर हरियाणा, पंजाब से अलग होकर स्वतंत्र राज्य बना था। इस स्थिति के दृष्टिगत अगर पंजाब का नदियों के पानी पर राइपेरियन हक है, तो हरियाणा का भी इसी बिला पर पूरा हक है। भाइयों की पुश्तेनी जमीन पर कानूनन बराबर का हक होता है। बडा भाई, छोटे भाई को इस बिला पर पुश्तेनी हक से वंचित नहीं कर सकता कि वह तो बहुत पहले ही परिवार से अलग हो गया था। अलग होने से उसका पुश्तेनी हक नहीं मारा जा सकता। सच यह है कि पंजाब के सियासी दल मतदाताओं को लुभाने के लिए पानी के मुद्दे को उछाल रहे हैं। इससे पहले कि स्थिति बद से बदतर हो जाए, केद्र को तुरंत दखल देना चाहिए।

बुधवार, 16 नवंबर 2016

पाकिस्तान का छल

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 500 और 1000 रु के नोट बंद कर देने के कदम से भले ही आम आदमी को परेशानी उठानी पड रही है, मगर इसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। पाकिस्तान के आतंकी संगठन हिजबुल से जुडे आतंकी बुरहान वानी की मौत के बाद से अलगावादी हिंसा में जल रही  कश्मीर  घाटी में व्याप्त मौजूदा अमन-चैन इस बात का गवाह है। 500 और 1000 रु के नोट बंद होते ही कश्मीर  घाटी में सुरक्षा बलों पर पथराव की घटनाएं अचानक बंद हो गई हैं। और  तो और  स्कूली  छात्र  भरी तादाद में परीक्षाएं  दे रहे हैं ।अलगाववादी संगठन भोले-भाले स्कूली  बच्चों और युवाओं को पैसे देकर  सुरक्षा बलों पर पथराव के लिए उकसाते थे। और अब जब 500 और 1000 के नोट बंद हो गए हैं,  पथराव कराने के लिए देशद्रोहियों  के पास पैसा ही नहीं है। यानी ”न रहा बांस, न बजेगी बांसुरी“। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सोमवार को इस बात की ताकीद भी कि कश्मीर  घाटी में विमुद्रीकरण के बाद से सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकने की घटनाए अचानक बंद हो गई है। इस  स्थिति  से पाकिस्तान बेहद बौखलाया हुआ है और अब उसने ने नया पैंतरा फेंका है। अब तक लगातार खंडन कर रही पाकिस्तानी आर्मी  ने सोमवार को माना कि भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा पर उसके सात सैनिक मार गिराए हैं। पाकिस्तानी विदेश  मंत्रालय ने सोमवार भारतीय उच्चायुक्त को तलब कर इस पर अपनी आपति जताई। इसके तुरंत बाद पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष जनरल राहील  शरीफ ने सेना को मुंहतोड जवाब देने के आदेश  दिए। इससे पहले 21 अक्टूबर को  भारतीय सेना की गोलीबारी में पाकिस्तान रेंजर्स  के 7 सैनिक मारे गए थे। तब पाकिस्तान ने सैनिकों के मारे जाने का खंडन किया था। पाकिस्तान ने 25 अक्टूबर को दावा किया था कि उसकी सेना ने 5 भारतीय सैनिकों को मार गिराया और 4 भारतीय  चौकियों को  नष्ट  कर दिया था। भारत ने इसका खंडन किया था। 28 अक्टूबर को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने पाकिस्तान के 15 सैनिकों को मार गिराने का दावा किया था जबकि पाकिस्तान ने इस दावे को नकार दिया था  । भारतीय सेना ने 29 अक्टूबर को  20 पाकिस्तान सैनिकों को मार गिराया ।  और भी कई झडपें हुईं हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान  सीमा पर लगातार गोलबारी कर रहा है और भारत इसका मुंहतोड जवाब दे रहा है। इस सच्चाई को दुनिया जानती है कि सीमा पर गोलीबारी होगी तो सैनिक और नागरिक दोनों ही मारे जाएंगे। पाकिस्तान पूरी दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि सीमा पर सीज फायर का उल्लघंन वह नहीं, भारत कर रहा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि सीमा पर जारी निरंतर गोलीबारी में पाकिस्तानी के सैनिक न मारे गए हों। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से अब तक पाकिस्तान 300 से भी ज्यादा  बार सीज फायर का उल्लघंन कर चुका है। और इस दौरान भारत के 10 से ज्यादा  और पाकिस्तान के 40 से ज्यादा  सैनिक मारे जा चुके हैं। हताहत सैनिकों की वास्तविक संख्या कहीं ज्यादा हो सकती है। जमीनी सच्चाई यह है कि सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान भारत को एक तरह से निरंतर युद्ध जैसे हालात में उलझाए हुए है। भारत के साथ परंपरागत युद्ध लडने की पाकिस्तान में हिम्मत नहीं है क्योंकि वह जानता है कि अगर युद्ध हुआ तो 1971 की तरह इस बार पाकिस्तान फिर टुकडे-टुकडे हो जाएगा। इन हालात में पाकिस्तान के पास एक ही विकल्प है कि वह भारत को  कश्मीर  में उलझाए रखे। घाटी की पर्वत श्रृंखलाएं जल्द ही भारी बर्फबारी के कारण दुर्गम हो जाएंगी। इस स्थिति में पाकिस्तान को अपने भाडे के आतकियों को घाटी में घुसपैठ करवाना करीब-करीब नामुकिन हो जाएगा । पाकिस्तान दिसंबर से पहले अधिकाधिक संख्या में आतंकियों को भारत में घुसपैठ कराने की फिराक में है। मगर भारतीय सेनाओं की चौकसी के रहते ऐसा मुमकिन नहीं है। इसीलिए, पाकिस्तानी सेना भारतीय गोलीबारी का “मुंहतोड जवाब' देने की आड में आतंकियों को कवर देने की फिराक में है मगर इस बार भारतीय सेना पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को नेस्तनाबूद करके रहेगी।

मंगलवार, 15 नवंबर 2016

यह तो वित्तीय आपातकाल है?

                                यह तो  वित्तीय आपातकाल है? 
पांच सौ और हजार रु के नोटों का प्रचलन अचानक बंद करने के मोदी सरकार के फैसले से पूरे देश  में अफरा-तफरी फैली हुई है। ऐसा लग रहा है जैसे देश  में वित्तीय आपातकाल है। पिछले मंगलवार की आधी रात से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश  में 500 और 1000 रु के नोटों का प्रचलन बंद करने की घोषणा की थी। रराष्ट्र  के नाम अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने देशवासियों को आश्वस्त किया था कि उनकी इस कार्रवाई से जनमानस को कोई असुविधा नहीं होगी। यह कार्रवाई काले धन का खात्मा करने की दिशा  में ठोस कदम माना जा रहा था। मगर एक सप्ताह बाद  मोदी सरकार के इस कदम ने आम आदमी का दम निकाल दिया है। सुबह से  शाम तक बेंकों और एटीएम (ऑटोमैटिक टेलर मषीन) पर कतार में खडे होते-होते अब तक देश  में चार वृद्धों की मौत हो चुकी है।  समय पर उपचार नहीं होने और अस्पतालों द्वारा 500 और 1000 रु के नोट लेने से मना करने पर अब तक 16  मासूम  बेमौत मारे जा चुके है।  लोगों को अपने ही जमाखाते से पैसे निकालने के लिए तरसना पड रहा है। सरकार ने एटीएम से एक दिन में एक कार्ड से ज्यादा से ज्यादा 2000 रु और बैंक में जमाखाते से सप्ताह में अधिततम 10,000 रु की सीमा बांध रखी है। रविवार को एटीएम  से एक दिन में एक बारगी 25,00 रु की सीमा बढाई  गई। बैकों से सप्ताह में पैसा निकालने की सीमा 25,000 रु कर दी गई है। राष्ट्रीय   राजमार्गों पर मुफ्त टोल टैक्स की सुविधा 18 नवंबर तक बढा दी गई है। अस्पतालों, पेट्रोल पंपों और टोल नाकाओं को दस दिन और प्रतिबंधित 500 और 1000 रु मुद्रा को स्वीकार करने को कहा गया है। यह बात दीगर है कि अधिकतर अस्पताल और पेट्रोल पंप प्रतिबंधित नोट लेने से साफ मुकर रहे हैं। इन बातों से साफ है कि देश  में स्थिति कितनी गंभीर है।  यह  स्थिति है  2015 में भारी कर्ज में डूबे यूनान से भी बदतर है। तब यूनान के पास मुद्रा का संकट था। भारत में इस समय मुद्रा प्रबंधन का संकट है। 500 रु और 1000 रु के विमुद्रीकरण से उपजी स्थिति से साफ लगता है कि सरकार ने स्थिति से निपटने  के लिए वित्तीय संस्थाओं को  तैयार् नहीं किया था। देश  में इस समय 2 लाख से ज्यादा एटीएम हैं और लोग-बाग इनका कहीं ज्यादा उपयोग करते हैं। लगभग हर एटीएम में 5 सौ और 1000 हजार रु के नोट रखे जाते है ताकि एटीएम में ज्यादा से ज्यादा नकदी रखी जा सके। एटीएम में 100 रु के ज्यादा से ज्यादा दस लाख नोट रखने की क्षमता है और अगर एक कार्ड  से अधिकतम 2500 भी निकाले जाएं, तो भी बमुश्किल 400 कस्टमर्स  की मांग पूरी की जा सकती है। और 2000 एव 500 रु के नए नोट आने से स्थिति और भी जटिल बनती दिख रही है। मौजूदा एटीएम इन नोटों के छोटे आकार के लिए बने ही नहीं है। नतीजतन, बैंको को अपने सभी एटीएम बदलने पडेंगे।  इन सब बातों से  साफ  है कि देश  मौजूदा विमुद्रीकरण के लिए तैयार नहीं था। भाजपा के वरिष्ठ  नेता एवं अर्थशास्त्री डाक्टर सुब्रमनयम स्वामी का भी यही कथन है कि वित्त मंत्रालय विमुद्रीकरण के लिए जरा भी तैयार नहीं था। आम तौर पर विमुद्रीकरण से  लोगों के लेन-देन और जमाखातों पर अकुंश  नहीं लगाया जाता। देष में इससे पहले भी विमुद्रीकरण की कार्रवाई की गई थी मगर इससे लोगों को कोई परेशानी नहीं हुई थी। निसंदेह, मौजूदा स्थिति पहले से काफी अलग है। अब देश  प्लास्टिक मनी की तरफ बढ रहा है और जैसे-जैसे इसका प्रचलन बढेगा, विमुद्रीकरण का ज्यादा असर नहीं होगा। मगर अभी मात्र दो फीसदी लोग प्लास्टिक मनी का उपयोग करते है। अमेरिका और विकसित देशों   में 98 फीसदी लोग इसका उपयोग करते है। बहरहाल, मोदी सरकार के विमुद्रीकरण से काला धन का खात्मा तो हुआ नहीं पर आम आदमी को भारी परेशानी हो रही है।

रविवार, 13 नवंबर 2016

स्टॉक मार्केट्स में भूचाल?

             
रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार एवं खरबपति कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति निर्वाचित होते ही दुनिया भर की स्टॉक मार्केटस में भूचाल सा आ गया है। भारतीय स्टॉक मार्केट को इस सप्ताह दो बडी घटनाओं ने हलकान कर रखा है। “सेक्सी“, “जातिवादी“, “घमंडी“ और “कर चोर“ डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिकी राष्ट्रपति चुना जाना दुनिया तो क्या, खुद अमेरिकी पचा नहीं पा रहे हैं और जगह-जगह उनके खिलाफ प्रदर्शन  हो रहे हैं।  मोदी सरकार द्वारा 8 नवंबर को अचानक 500 रु और 1000 रु के नोट बंद किए जाने से पूरे देश  में अफरा-तफरी फैली मची हुई है। भारतीय स्टॉक मार्केट भी इसे अछूता नही रहा। शुक्रवार को बीएसई सूचकांक में इस साल की दूसरी सबसे बडी 699 अंकों की गिरावट आई। भारतीय रुपया भी डॉलर के मुकाबले 67 पैसे कमजोर हुआ और तीन माह के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। बुधवार को सेंसेक्स बाजार खुलते ही 1700 अंक लुढक कर सत्र के अंत में जैसे-तैसे  1350 अंक सुधरा। मगर मार्केट अभी भी नए अमेरिकी राष्ट्रपति की संभावित ऊंचे ब्याज दर की नीति से संशक्ति है और इसलिए बिकवाली का दबदबा बना हुआ है। अमेरिकी सैट्रल बैंक फेडेरल रिजर्व  ने दिसंबर में ब्याज दरें बढाने का संकेत देकर आग में घी डालने का काम किया है। पूरी दुनिया को इस बात का डर सता रहा है कि अगर अमेरिकी में ब्याज दरें बढती हैं, तो संस्थागत निवेशक एमरजिंग मार्केटस को छोडकर अमेरिका पलायन कर जाएंगे। इस साल अब तक विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) भारतीय स्टॉक मार्केटस में 45, 000 करोड रु का निवेश  कर चुके हैं और इसी वजह भारतीय स्टॉक मार्केट में तेजी बनी रही । भारतीय स्टॉक मार्केट में विदेशी संस्थागत निवेशकों का दबदबा रहता है। स्टॉक मार्केटस में 80 फीसदी कारोबार  विदेशी  संस्थागत निवेशक करते है। इस स्थिति में अगर  विदेशी  संस्थागत निवेशक अमेरिका की ओर रुख करते हैं, तो बाजार में अफरा-तफरा मच सकती है। अमेरिका में अभी ब्याज निम्नतम स्तर पर है, इसलिए निवेशक एमरजिंग मार्केटस की ओर आकर्षित  होते हैं जहा ब्याज दरें काफी ऊंची है। मगर जैसे ही अमेरिका में ब्याज दरें बढेंगी,  विदेशी  संस्थागत निवेशक एमरजिंग मार्केटस छोड कर वहां चले जाएंगें। शुक्रवार को इसके संकेत भी मिले। एक ओर जहां जापान के निक्की को छोडकर अधिकतर एमरजिंग एवं एशिया  शेयरों में गिरावट आई, वही अमेरिकी और यूरोप के स्टॉक में सुधार आया।  300 यूरोपियन शेयरों के सूचकांक में अगर उछाल नही आया तो गिरावट भी नहीं आई। यह स्थिर बना रहा। ताजा हालात में यह बडी बात है।   अमेरिका का डाउ जोन्स वीरवार को रिकॉर्ड  उच्च स्तर पर बंद हुआ। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मंझे हुए कारोबारी हैं और उन्होंने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को फिर से बुलंदियों पर ले जाने का वायदा कर रखा है। उनके इसी संकल्प के  दृष्टिगत  एमरजिंग मार्केट्स  को लग रहा है कि ट्रंप निवशकों को  आकर्षित करने के लिए ऊंची ब्याज दरें एव  मुद्रा-स्फीति वाली नीतियां अपना सकते है। एमरजिंग मार्केटस इसी आशं का से सहमे हुए हैं । सबसे बुरी हालत मेक्सिको की मुद्रा पीसो की है। ट्रंप की जीत के बाद पीसो में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज  हुई है। ट्रंप ने अमेरिका-मेक्सिको की सीमा को बंद करने की धमकी दे रखी है। बहरहाल, एमरजिंग मार्केट्स के लिए  यह स्थिति थोडी राहत वाली हो सकती है कि अमेरिकी स्टॉक 80 फीसदी ओवरवेल्यूड है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इन हालात में 2017 में अमेरिकी स्टॉक मार्केट क्रेश  कर सकती है। नामी अर्थशास्त्री जिम रोजर्स  का आकलन है कि “ अमेरिका 68 खरब डॉलर वित्तीय पतन के मुहाने पर खडा है। और अगर ऐसा हुआ तो लाखों अमेरिकी सडक पर आ जाएंगें। यह स्थिति अमेरिका के लिए ही नहीं पूरी दुनिया में वित्तीय तबाही ला सकती है। अमेरिका दुनिया का हवलदार है। उसे छींक भी आ जाए तो दुनिया को जुकाम हो जाता है। इसी तरह की आशंकाएं दुनिया को भयभीत किए हुए है। स्टॉक मार्केट्स में व्याप्त अफरा-तफरी में इसकी झलक देखी जा सकती है।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

ट्रंप की जीत के अर्थ

अमेरिकी राष्ट्रपति  चुनाव में पहली बार राजनीतिक अखाडे में उतरे खरबपति कारोबारी डोनाल्ड ट्रंप की जीत से पूरी दुनिया स्तब्ध है। और जीत भी ऐसी दमदार कि बडे-बडे राजनीतिक पंडित, ओपिनियन पोल्स, चुनाव पूर्व सर्वेक्षण और प्रचारक  भारी अपमान का घुंट पी कर रह गए हैं। 8 नवंबर को मतदान खत्म होने तक खुद को ओपिनियन पोल्स के माहिर कहने वाले शर्तिया कह रहे थे कि डोनाल्ड ट्रंप किसी भी सूरत में जीत नहीं सकते और उनकी प्रमुख प्रतिद्धंदी हिलेरी क्लिंटन की जीत को कोई टाल नहीं सकता। इस साल के  शुरु में पार्टी टिकट की दौड से लेकर मतदान तक क्लिंटन की जीत पक्की  मानी जा रही थी। और वे लगातार किए जा रहे ओपिनियन पोल में हमेशा  ट्रंप से आगे चल रहीं थीं। हिलेरी क्लिंटन मंझी हुई राजनीतिज्ञ हैं। वे खुद लंबे समय से राजनीति में हैं। अमेरिका की विदेश  मंत्री रह चुकी है और उनके पति बिल क्लिंटन दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति रह चुके है। हिलेरी की तुलना में ट्रंप राजनीति में एकदम नए हैं। पहली बार राजनीति में आए। पहली बार रिपब्लिकन पार्टी के दिग्गजों को पछाड कर दादागिरी जताकर  पार्टी का टिकट हासिल किया और राष्ट्रपति  का पहला चुनाव भी जीत लिया। चुनाव प्रचार के दौरान ट्रंप पर यौन शोषण  से लेकर कारोबारी अनियमितताएं बरतने तक के गंभीर आरोप लगे। उनके यौन शोषण  की  शिकार महिलाएं मीडिया के समक्ष पेश  हुईं।   दुनिया भर का मीडिया कह रहा है कि ट्रंप की जीत 9/11 से भी खतरनाक है। 27 देशों  के मीडिया ने ट्रंप की जीत को खतरनाक बताया था। खरबपति होते हुए भी उन्होंने कोई कर नहीं दिया। इस पर उनके प्रतिद्द्धियों ने चुटकी ली थी कि जो आदमी कर चोरी कर सकता है, राष्ट्रपति  बनने पर वह इससे भी संगीन अपराध कर सकता है। अमेरिका सिनेमा हालीवुड की लेडी गागा,कैटी पारेे और  चेरी जैसे लोकप्रिय स्टार ट्रंप की जीत पर अमेरिका छोडकर कनाडा बसने की धमकी तक दे चुकीं हैं।  चेर वीरवार को न्यूयार्क में आयोजित ट्रंप विरोधी प्रदर्शन में  भी नजर आए।  वॉल स्ट्रीट समेत दुनिया भर की स्टॉक मार्केट और धन्ना सेठ ट्रंप के विरोध में खडे थे और अब  उनकी जीत पर मार्केट में जैसे भूचाल सा आ गया। अपनी ही पार्टी के दिग्गज नेताओं ने उनका मुखर विरोध कर हिलेरी क्लिंटन का गुणगान किया। तथापि  इतना सब होने के बावजूद ट्रंप ने न केवल हिलेरी को पराजित किया, बल्कि भारी अंतर से पराजित किया। इसके केवल एक ही अर्थ निकलते हैं कि मतदाताओं के मन में क्या है, इसे ओपिनियन पोला अथवा  मनोविज्ञान से भी नहीं जाना जा सकता। वैसे ट्रंप के चुनाव प्रचार की भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव प्रचार से तुलना की जा रही है। मोदी की तरह ट्रंप ने  श्वेत  और गैर-मुस्लिम  मतदाताओं का धु्रवीकरण कराया। अमेरिका का जनमानस भी हिलेरी क्लिंटन जैसे घाघ नेताओं से आजिज आ चुकी थी। हिलेरी पर  अमेरिकी  श्वेत  ज्यादा भरोसा नही करते हैं। जिस तरह ट्रंप पर आरोप है कि वे महिलाओं  को भोग की “वस्तु“ मानते है, उसी तरह हिलेरी के पति पूर्व राष्ट्रपति  बिल क्लंटन को भी ऐयाश  नेता माना जाता है। हिलेरी  ईमेल स्केंडल को लेकर चुनाव तक विवादास्पद रही। बतौर अमेरिकी विदेश  मंत्री, उन पर देश  के गोपनीय राज लीक करने के संगीन आरोप है। इसके लिए उन पर मुकदमा भी चल सकता है। बहरहाल, ट्रंप के मुस्लिम विरोध स्टैंड से इस्लामिक देश  चितित हैं। ट्रंप अमेरिका में मुसलमानो के प्रवेश  के सख्त खिलाफ हैं। इस्लामिक स्टेट जैसे खूंखार आतंकी संगठन का खात्मा करने का उन्होंने संकल्प ले रखा है। ट्रंप पाकिस्तानी को आतंकी देश  मानते हैं और भारत का सम्मान करते है। इस लिहाज से  ट्रंप का राष्ट्रपति बनना भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकता है। डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह चुनाव जीतकर दुनिया को हिला दिया है,उम्मीद की जानी चाहिए उसी तरह वे दुनिया से आतंक को खत्म करने में कोई कसर नहीं छोडेंगे।    

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक

   
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक करके पूरी दुनिया को चौंका दिया है। प्रधानमंत्री की यह कार्रवाई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर  में आतंकियों को मार गिराने की सर्जिकल स्ट्राइक से भी ज्यादा धारदार है। कर चोरी करके काले धन से देश  में समानांतर अर्थव्यवस्था चलाने वाले देश  के सबसे बडे  दुश्मन  हैं। और यह काला धन न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को ही खोखला कर रहा है, अलबत्ता लोकतंत्र को भी कमजोर कर रहा है। लोकसभा से लेकर पंचायत तक के चुनाव  काले धन के बलबूते लडे जाते है। प्रधानमंत्री मोदी इस बात के लिए बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने काले धन से पनपती समानांतर अर्थव्यवस्था को धराषायी करने के लिए 10 नवंबर से 500 और 1000 रु के नोट बंद कर दिए हैं। आंकडें बताते हैं कि काला धन बडे नोटों में ही जमा रखा जाता है।  सरकार का अनुमान है कि 500 और 1000 रु के नोट बंद किए जाने से लगभग सवा  लाख  करोड रु की काली कमाई का खात्मा हो सकता है। आरबीआई के आंकडों अनुसार देश में इस समय लगभग 1,642,000 करोड नगदी का प्रचलन है और इसमें 86 फीसदी हिस्सा 500 और 1000 रु के नोटों का है। भारत सरकार के आर्थिक मामलों की सचिव के अनुसार 2011 से 2016 के दौरान जहां देश  की अर्थव्यवस्था में 30 फीसदी का इजाफा हुआ, वहीं मुद्रा प्रसार (सर्कुलेशन) में 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। इस दौरान 500 रु के नोटों के प्रसार में 76 फीसदी और 1000 रु में 109 फीसदी का इजाफा हुआ है। इससे  स्पष्ट होता है कि देश  में छोटी मुद्रा की जगह बडी मुद्रा का प्रचलन कहीं ज्यादा है। जाहिर है कि 500 रु और 1000 रु के पुराने नोट बंद होने से काली कमाई करने वालों को जबरदस्त झटका लगा है। 36 साल बाद सरकार ने 500 रु और 1000 रु के पुराने नोटों का प्रचलन बंद किया है।  और ताजा कदम से कर चोरी करके छिपाए गई काली कमाई अब किसी काम की नहीं रह गई है।  सरकार के इस कदम से आम आदमी को कुछ परेशानी हो सकती है। सबसे ज्यादा परेशानी  शादी-ब्याह में मशगूल परिवारों को झेलनी पड सकती है।  स्थिति सामान्य होने में कई दिन लग सकते हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी सरकार 10, 5 और 1 हजार के नोटों को बंद कर चुकी है। आजादी से पहले 1936 में पहली बार दस हजार रु के नोट प्रचलन में आए थे। 1946  में दस, पांच और एक हजार रु के नोटों का प्रचलन बंद कर दिया गया था । मगर 1953 में फिर दस हजार, पांच हजार और एक हजार के नोट छापे गए। 1978 में फिर बंद कर दिए गए थे। दस हजार रु के नोट का उपयोग काली कमाई में ज्यादा होता था, इसलिए सरकार ने दोबारा इन्हें नहीं छापा। निसंदेह, काली कमाई से न केवल  भष्टाचार बढता है, बल्कि हवाला, सट्टा, नशे  का कारोबार भी  पनपता हैं। और देश  की अखंडता पर प्रहार करने वालों को भी काली कमाई अथवा बडे नोटों की जाली करंसी से मदद की जाती है। पाकिस्तान पर आरोप है कि वह  500 और 1000 के जाली नोट छापकर भारतीय अर्थव्यवस्था को तबाह करने पर आमादा है। लगभग 400 करोड रु के 500 और 1000 रु के जाली नोट बाजार में है। तथपि पुराने बडे नोटों के बंद करने के बावजूद काली कमाई करने वाले सोना और चल संपति खरीद कर इसे जारी रख सकते हैं। बुधवार को सोना तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था। रियल्टी सेक्टर तो काली कमाई के दमखम पर ही फल-फूलता है। सरकार ने कानून बनाकर इस सेक्टर पर नकेल डाली तो है मगर अभी भी यह पूरी तरह से नियंत्रित नही हो पाया है। सरकार ने अच्छी पहल की है और इसके सकारात्मक परिंणाम आ सकते हैं।  

बुधवार, 9 नवंबर 2016

थेरेसा मे की भारत यात्रा

           
भारत पर दो सदी से भी ज्यादा समय तक निरंकुश  राज करने वाले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने अपनी पहली विदेश  यात्रा के लिए भारत को यूं ही नहीं चुना है। भारत, चीन के बाद दुनिया की विशालतम मार्केट है। चीन की तुलना में भारत के साथ व्यापार करना और भी ज्यादा सुविधाजनक है। ब्रिटेन को इस समय अविलंब विष्वसनीय ट्रेड पार्टनर की जरुरत है। थेरेसा मे ने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री का पदभार ऐसे नाजुक समय में सभाला है जब  मंदी से पीडित वैश्विक  अर्थव्यवस्था में  ब्रिटेन को यूरोपियन यूनियन से बाहर आकर अपना अलग वजूद स्थापित करना पड रहा है। 1973 में ब्रिटेन यूरोपियन यूनियन  की  पूर्वज यूरोपियन इक्नॉमिक कम्युनिटी (ईईसी) में शामिल हुआ था। 1975 में 67 फीसदी जनमत संग्रह के साथ ब्रिटेन का जनमानस  ईईसी में  शामिल होने के पक्ष में था। 2015 तक ब्रिटेन की जनता ईईसी अथवा यूरोपियन यूनियन (ईयू) में बने रहने के पक्ष में थी हालांकि लेबर पार्टी और विभिन्न श्रमिक संगठन इसके पक्ष में नहीं थे। लेबर पार्टी  शुरु से ही ब्रिटेन के  यूरोपियन यूनियन में  शामिल होने की विरोधी रही है। 2016 आते-आते ब्रितानवी जनमानस में यूरोपियन यूनियन से मोह भंग हो चुका था। संभवतय, यूनान के आर्थिक संकट ने ब्रितानवी जनमानस को झकझोर  कार रख दिया। जून 2016 के जनमत संग्रह में 52 फीसदी ब्रितानवी जनता ने ब्रिटेन को  यूरोपियन यूनियन से बाहर आने (ब्रिक्जिट) के पक्ष में फतवा दिया। इससे पहले एक बार 1980 में 65 फीसदी ब्रितानवी जनता ने ईयू को नकारा था। यह मारगेट थैचर के प्रधानमंत्रित्व का पहला साल था। 1957 में यूरोपियन इक्नॉमिक कम्युनिटी की स्थापना हुई थी मगर ब्रिटेन  1973 तक इसका सदस्य नहीं बना। सदस्य बनने के लिए ब्रिटेन को नाक रगडने पडे। 1963 औरा 1967 में ब्रिटेन ने ईईसी की सदस्यता के लिए आवेदन किया मगर दोनों ही बार फ्रांस के कडे विरोध से इसे नामंजूर कर दिया। तब फ्रांस के राश्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल का कथन था कि ब्रिटेन की काफी सारी आर्थिक गतिविधियां और प्रणालियां यूरोप से मेल नहीं खाती है। इसी कारण ब्रिटेन को यूरोपियन संघ की सदस्यता पाने के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को यूरोप मुताबिक एडजस्ट भी करना पडा।  1979 में ब्रिटेन यूरोपियन एक्सचेंज रेट व्यवस्था (ईआरएम) से बाहर आ गया था मगर 1990 आते-आते फिर ईआरएम से जुड गया और उसकी करंसी को ड्यूश -मार्क  से जोड दिया गया। इससे पाउंड कमजोर हो गया और 1992 में ब्रिटेन फिर ईआरएम से बाहर आ गया। तब करंसी सटटे के कारण ब्रिटेन को 3 अरब पाउंड का नुकसान उठाना पडा था। और अब यूरोपियन यूनियन से बाहर आकर 2019 तक ब्रिटेन को गैर-यूरोपियन यूनियन व्यवस्था कायम करनी पडेगी। ब्रिटेन अभी पूरी तरह स ईयू से बाहर नहीं आया है, इस कारण वह अभी स्वतंत्र ट्रेड करार नहीं कर सकता मगर 2019 के बाद के ले जमीन तैयार कर सकता है। इसी कडी में प्रधानमंत्री थेरेसा मे भारत की यात्रा पर आईं हैं। यूरोपियन यूनियन के साथ 2007 में आखिर व्यापार वार्ता हुई थी मगर यह सिरे नहीं चढ पाई। यूरोपियन संघ (ईयू)  27 सदस्यों का ताकतवर संगठन है  और इसके अधिकतर सदस्य ब्रिटेन से खफा है। यूरोपियन संघ का साझा व्यापार है। यूरोप में ब्रिटेन करीब-करीब अकेला पड चुका है। उसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं से सहयोग की जरुरत है। ब्रिटेन के कारोबारी डरे हुए हैं और उन्हें भी मार्केटस की दरकार है। भारत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है और ब्रिटेन की तरह लोकतांत्रिक देश  भी। उसके पास बहुत बडा बाजार तो है ही, साथ में दुनिया का सबसे बडा  मानव संसाधन  खजाना भी है। अगर ब्रिटेन भारत में बाजार तलाष रहा है, तो भारत को भी ब्रिटेन में मुक्त आवाजाही की दरकार है और वीजा से जुडी सख्ती को नरम  करने की मांग कर रहा है। स्वदेश  लौटने से पहले ब्रिटेन की प्रधानमंत्री को अगर भारत से इस हाथ कुछ लेना है, तो उस हाथ देना भी होगा।

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

अपने किए की सजा

दीपावली के एक सप्ताह बाद भी राजधानी दिल्ली में प्रदूशण का कहर जारी है। दिल्ली में प्रदूशण इस कद्र बढ गया है कि दिल्ली सरकार को स्कूल तीन दिन के लिए बंद करने पडे  हैं। कंस्ट्रक्षन और डेमोलिशन भी लंबे समय  तक के लिए प्रतिबंधित है। कारोबारी और उधोगपति अपने कर्मचारियों से कह रहे हैं “ दफ्तर मत आओ, घर पर बैठकर काम करो“।  अमूमन, ट्रैफिक जाम से पीडित राजधानी की व्यस्ततम सडकें अपेक्षाकृत सूनसान पडी है। गलियों और कॉलोनियों में भारी भूरी धुंध, राख एवं जहरीले प्रदूषको से लोगों को सांस लेने में भी दिक्कत हो रही है। आंखों में भारी जलन हो रही है। सोमवार को भी दिल्ली के कई क्षेत्रों में फेफडों तक पहुंचने वाले सुक्ष्म वायु कणों की मात्रा (पीएम 2.5) 700 माइक्रोग्राम से भी ज्यादा थी जबकि यह सुरक्षित स्तर 60 से कम होनी चाहिए। पीएम 10 का स्तर भी सोमवार को सुरक्षित स्तर से 15 गुना ज्यादा था। विगत दो दशक में दिल्ली पर इस समय प्रदूषण का सबसे बडा खतरा मंडरा रहा है। खतरा इतना बढ गया है कि स्कूली बच्चे मास्क पहनकर सडकों पर प्रर्दशन कर रहे हैं।  दिल्ली की आज वही स्थिति है जो पिछली सदी के पचास के दशक मे लंदन की थी। 1952 में जहरीली हवा ने लंदन में 4,000 से ज्यादा लोगों को बेमौत काल की गर्त में धकेल दिया था। तब लंदन की हवा में औसतन पीएम लेवल 500 माइक्रोग्राम के आसपास था और सल्फर डाइऑक्साइड (एसओ2) बेहद खतरनाक। दिल्ली के लिए राहत की बात यह है कि फिलहाल सल्फर डाइऑक्साइड लंदन की तरह खतरनाक स्तर पर नहीं है पर अगर हालात यही रहे तो दिल्ली भी 1952 की लंदन बन सकती है।   यह सब हमारे अपने किए का परिणाम है। पिछल कई सालों से पर्यावरण विशेषज्ञ बार-बार हमें सतर्क  कर रहे थे मगर हम नहीं चेते। पर्यावरण को प्रदूषित करने का हम कोई मौका नहीं चूकते।  पर्यावरण विद सुनीता नारायण अरसे से दिल्ली वालों को प्रदूषण के गंभीर खतरों से आगाह कर रही है। हर साल दिल्ली में प्रदूषण से करीब 30,000 लोग मर रहे हैं। पिछले एक सप्ताह से ज्यादा समय से राजधानी दिल्ली भीषण स्मॉग से पीडित है मगर केन्द्र और दिल्ली सरकार समस्या का अविलंब हल ढूंढने की बजाय एक-दूसरे पर दोषारोपण कर रहे हैं। सोमवार  को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने दिल्ली सरकार को इस बात के लिए कडी फटकार लगाई कि लोगो को राहत देए के लिए सडकों पर पानी का छिडकाव क्यों नहीं किया और हेलिकॉप्टर से कृत्रिम बारिश  क्यों नहीं करवाई गई? क्या हेलीकाप्टर वीवीआईपीके लिए ही हैं। आखिर सरकार किस बात का इंतजार कर रही है। लोगों को स्मॉग से बचाने के लिए फौरी तौर यही एकमात्र उपाय था। ट्रिब्यूनल ने सरकार से यह भी पूछा कि पंजाब और हरियाणा में फसलों (पराली) को जलाने से दिल्ली में जो प्रदूषण फैल रहा है, उसके लिए दिल्ली सरकार ने  क्या उपाय किए हैं। वैसे पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली के प्रदूषण में पंजाब और हरियाणा में फसलें जलाने का 20 फीसदी ही हाथ है। 80 फीसदी प्रदूषण खुद दिल्ली वाले फैला रहे हैं।  मंगलवार को इस मामले की सुप्रीम कोर्ट  में सुनवाई होनी है और हमेशा  की तरह इस बार भी न्यायपालिका ही लोगों को राहत दे सकती है। प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही सरकार को कई निर्देश  दे चुका है मगर इन्हें संजीदगी से लागू नहीं किया गया है। दिल्ली में प्रदूषण के लिए सरकार से लेकर नागरिक सभी जिम्मेदार हैं मगर यह समय एक-दूसरे पर दोषारोपण का नहीं है। प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सब को मिलकर काम करने की जरुरत है। इस मामले में “मेरे करने से क्या होगा“ वाला एटीट्युट नहीं चलेगा। प्रदूषण से बचने के लिए हर छोटे-बडे को अपना योगदान देना होगा।  

रविवार, 6 नवंबर 2016

जीएसटीः अच्छे दिन आएंगे

वस्तु एवं सेवा कर (गुडस एवं सर्विसिस टैक्स-जीएसटी) की दरें तय होने से अब इस बात की पूरी उम्मीद है कि अगले अप्रैल (2017) से पूरे देश में एक समान कर व्यवस्था लागू हो जाएगी। जीएसटी के लागू होने से आम आदमी से जुडी काफी वस्तुएं सस्ती हो सकती हैं और इससे जनमानस “अच्छे दिन“ की उम्मीद कर सकता है। गत वीरवार को जीएसटी परिषद ने लंबी जद्दोजेहद के बाद जीएसटी की चार दरों को अंतिम रुप दे दिया। न्यूनतम दर 5 फीसदी और अधिकतम 28 फीसदी तय की गई है। खाधान्न को जीएसटी से मुक्त रखा गया है। इससे  खाने-पीने की वस्तुओं का सस्ता होना तय है। किस वस्तु पर कितना कर लगाया जाएगा, ओर कर  असेसी कोन होगा हालांकि अभी यह तय नहीं है मगर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ  कह दिया है कि खाद्य एवं आवश्यक  वस्तुओं को 5 फीसदी के न्यूनतम दर के दायरे में रखा जाएगा और विलासिता वाली वस्तुओं पर अधिकतम 28 फीसदी जीएसटी लगाया जाएगा।  महंगाई पर काबू पाने के लिए मुद्रा स्फीति बास्केट में शरीक खाद्यान्न समेत सभी आवश्यक वस्तुओं को कर मुक्त रखा गया है। इन वस्तुओं के कर मुक्त रहने से मुद्रा स्फीति में खासी गिरावट आ सकती है। अभी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में 50 खाद्य वस्तुओं को  शामिल किया जाता है। चाय और मसाले को 5 फीसदी जीएसटी के दायरे में लाया जा सकता है। अभी  चाय पर 5 से 6 फीसदी कर लगाया जाता है। मसालों पर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग कर लगाए जाते हैं। आम आदमी के उपभोग की काफी सारी वस्तुओं पर अभी 30 फीसदी की दर से कर लगाए जाते हैं। इसी वजह एफएमसीजी (फॉस्ट मूविंग कंज्युमर गुडस)  काफी महंगे होते हैं। नई कर व्यवस्था मेॅ इन वस्तुओं पर अधिकतम 18 फीसदी जीएसटी लगाया जा सकता है। साबुन, षेविंग क्रीम, टूथपेस्ट और इस तरह की पर्सनल केयर वस्तुओं को 12 फीसदी दायरे में लाया जा सकता है। अभी इन सब वस्तुओं पर 30 फीसदी कर लगाया जा रहा है। इससे उपभोग की कई  वस्तुएं  सस्ती हो सकती हैं। इसी उम्मीद से शुक्रवार को कोलगेट एवं हिंदुस्तान युनिलीवर जैसी एफएमसीजी कंपनियों के  शेयरों में 2 से 4 फीसदी का उछाल दर्ज  हुआ। सिनेमा देखना सस्ता हो सकता है अगर सरकार इंटरटेंमेंट को सर्विस सेक्टर में  शामिल करती है तो। अभी मनोरंजन टैक्स 24 से 26 फीसदी के बीच है। सर्विस टैक्स 15 से बढाकर 18 फीसदी किया जा सकता है। सरकार इसे 12 फीसदी के स्लैब में लाने से रही। हां, आवश्यक  सेवाओं (अस्पताल जैसी)  पर 12 फीसदी जीएसटी लगाया जा सकता है। इलेक्ट्रानिक हाउसहोल्ड गुडस को भी 18 फीसदी जीएसटी के दायरे में लाया जा सकता है। अभी इन वस्तुओं पर भी 30 फीसदी कर है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वीरवार को यह भी  स्पष्ट  किया कि निम्न एवं मध्यम तबकों से जुडी उपभोग की वस्तुओं को  निम्न कर के दायरे में लाया जाएगा मगर धनाढ्य तबकों के उपभोग की वस्तुओं पर अधिकतम 28 फीसदी कर लगाया जा सकता है। छोटी कारें सस्ती हो सकती है।  इन पर 18 फीसदी जीएसटी लगाया जा सकता है। सबसे ज्यादा फायदा तंबाकू उत्पाद को हो रहा है। जीएसटी की अधिकतम दर 28 फीसदी है। इस स्थिति में तंबाकू उत्पाद पर भी 28 फीसदी जीएसटी ही लगेगा। अभी इन पर 60 फीसदी कर लगाया जाता है। बहरहाल, जीएसटी के लागू होते ही आम आदमी को महंगाई से राहत मिल सकती है बशर्ते उत्पादक कर में मिलने वाली राहत को उपभोक्ता तक पहुंचाए। अभी तक का अनुभव इस मामले में अच्छा नहीं है। उत्पादक कर रियायतों को उपभोक्ता तक पास ऑन करने में तरह-तरह के बहाने लगाता है। अगर जीएसटी के लागू होने पर कीमतों में कमी होती है, तो आम आदमी के लिए इससे अच्छी कोई बात नहीं हो सकती। अब अप्रैल 2017  का इंतजार रहेगा।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

मौत पर भी सियासत

देश  के  सियासी नेताओं को हर छोटी-बडी घटना पर राजनीति करने की तो जैसे लत पड गई हो। और-तो-और अब मौत पर भी जमकर सियासत की जा रही है।  अब इस बात पर बहस हो रही है कि क्या खुदकषी करने वाला शहीद होता है या नहीं ? मंगलवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर वन रैंक, वन पेंशन के लिए धरना दे रहे हरियाणा के पूर्व सैनिक द्वारा जहर खाकर आत्महत्या करने की दुखद घटना से कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने मौत पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का मौका लपक लिया। भिवानी के पूर्व सैनिक की मौत की खबर सुनते ही कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री दौडे-दौडे मृतक पूर्व सैनिक के परिजनों को सांत्वना देने अस्पताल पहुंचे मगर पुलिस ने  दोनों को मिलने नहीं दिया और एहतिहातन कस्टडी में ले लिया गया। पुलिस बारी-बारी नेताओं को गिरफ्तार करती और फिर छोड देती। बुधवार को दिनभर यह नौटंकी चलती  रही। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को दो बार हिरासत में लिया गया और फिर छोड दिया गया।  पुलिस ने मृतक के परिजनों को भी नहीं बख्शा  और उनके बेटों को दिनभर थाने में बैठाए रखा। परिजनों के पुलिस हिरासत में रहने से मृतक पूर्व  सैनिक का पोस्ट-मार्टम तक नहीं हो सका।  आधी रात पोस्ट-मार्टम के बाद पुलिस मृतक राम किश न के शव को हरियाणा लेकर गई। वीरवार को रामकिशन के अंतिम संस्कार में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल शामिल हुए मगर हरियाणा से ही संबंधित केन्द्रीय मंत्री और पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह नदारद रहे । हरियाणा के मुख्यमंत्री और अन्य शीर्ष   भाजपा नेता भी रामकिश्न को अंतिम श्रद्धाजंलि देने भिवानी जिले के गांव बामला नहीं पहुंचे। इन सब घटनाओं का एक ही मतलब है कि सरकार पूर्व सैनिक की अत्महत्या से डर गई थी। रामकिश्न सेना से सूबेदार पद से रिटायर हुए थे। उन्हें  इस बात का गुस्सा था कि वन रैंक, वन पैंशन की अधिसूचना जारी होने के बाद भी उन्हें माहवार 3,000 रु कम पेंशन मिल रही थी। पिछले कई दिनों से रामकिश्न इस मामले को लेकर परेशान थे और इस विसंगति को दूर करने के लिए संघर्ष   कर रहे थे। रामकिश्न की ही तरह अधिकांश  पूर्व सैनिक वन रैंक, वन पेंशन से खुश  नहीं है क्योंकि इससे उन्हें कोई फायदा नहीं हो रहा है। पूर्व  सैनिक पूरी पेंशन पाने के लिए 33 साल की  शर्त  को हटाने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा वन रैंक, वन पेंशन के तहत 2013 को बेस ईयर बनाया गया है। पूर्व  सैनिक 2014 के पक्ष में है। पूर्व  सैनिक पेंशन  समीक्षा पांच साल की जगह सालाना करने की मांग कर रहे हैं।  वन रैंक, वन पेंशन स्कीम के तहत स्वेच्छा से रिटायरमेंट लेने वालों को अधिक फायदा हो रहा है, अन्य को नहीं। पूर्व  सैनिक इस विसंगति को भी दूर करने की मांग कर रहे हैं। इन मांगों के लिए पूर्व  सैनिक आज भी दिल्ली में संघर्ष   कर रहे हैं। पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिह का यह बयान दुर्भाग्यपूर्ण है कि मौत के समय मृतक की मानसिक हालत की जांच की जानी चाहिए। मृतक को कांग्रेस का वर्कर बता कर पूर्व सेनाध्यक्ष ने लंबे समय से अपनी मांगों के लिए लड रहे पूर्व सैनिकों के जख्मों पर नमक छिडका है। जनरल वीके सिंह जैसे योद्धा से इस तरह के वक्तव्य की उम्मीद नहीं की जा सकती। सियासी दलों का इस मामले को राजनीतिक रंगत देना भी दुखद है। केजरीवाल ने मृतक रामकिश्न को शहीद का दर्जा और एक करोड रु की मदद देकर मामले को गर्मा दिया है। कांग्रेस एक कदम आगे बढते हुए रामकिश्न को भगत सिंह बता रही है। हर बार की तरह इस बार भी मूल मुददा पीछे छोड छूट गया है। इस तरह के मामले में संवेदना व्यक्त की जानी चाहिए, सियासत नहीं।  

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

Enough. Rhetoric On Teaching Pakistan A lesson Wont Do. Its Tome For Action

  भारतीय सेना के सर्जिकल स्ट्राइक से बौखलाई पाकिस्तान सेना की लगातार गोलीबार से नियंत्रण रेखा और आसपास के इलाकों में स्थिति लगभग युद्ध जैसी बनी हुई है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से पाकिस्तान अब तक 61 बार युद्ध विराम का उल्लंघन कर चुका है।  आतंकियों को भारत में घुसपैठ को कवर देने के लिए पाकिस्तानी सेना जानबूझकर रिहायशी  इलाकों को गोलीबारी का निशाना बना रही है। 30 अक्टूबर को आतंकियों की घुसपैठ पर जारी वीडियो से साफ पता चलता है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बलों का ध्यान बंटाने के लिए फायरिंग करते हैं और इस दौरान आतंकी बार्डर क्रास कर जाते हैं। इस वीडियो में तीन आतंकी रेंगते हुए बार्डर क्रास करने का प्रयास कर रहे हैं।  मंगलवार को जम्मू के सांबा और राजौरी जिले की अंतरराष्ट्रीय  सीमा पर पाकिस्तानी सेना दिनभर फायरिंग करती रही। इससे दो मासूम बच्चों और चार महिलाओं समेत आठ लोग मारे गए, 24 घायल हो गए। सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने पाकिस्तान फायरिंग का करारा जवाब देते हुए पाकिस्तान सेना की 14 पोस्टें तबाह कर दी। बुधवार को बीएसएफ ने तबाह की गई पाकिस्तानी पोस्ट्स का वीडियो भी जारी किया। उधर, पाकिस्तान का दावा है कि भारतीय सेना की फायरिंग से उसके 6 नागरिक मारे गए। मगर भारतीय सेना का कथन है कि पाकिस्तान सफेद झूठ बोल रहा है क्योंकि  वह नागरिकों पर नहीं, अलबत्ता पाकिस्तानी पोस्टों पर फायरिंग करती है। दूसरी ओर पाकिस्तान रिहायशी इलाकों पर फायरिंग करता है। सीमा पर हालात युद्ध जैसे है। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद युद्ध  शुरु होने की आशंका से सरकार ने पंजाब और जम्मू-कश्मीर  समेत बार्डर के दस किलोमीटर में स्थित सभी रिहायशी  इलाकों को खाली करवा दिया था मगर कुछ समय बाद लोग-बाग अपने-अपने गांव लौट गए थे। जम्मू क्षेत्र में बार्डर के आस-पास रहने वालों लोगों को स्थानीय प्रशासन ने रात को बत्ती गुल रखने और  अनजान व्यक्ति को किसी भी तरह की जानकारी देने से मना कर रखा है और इसके लिए जगह-जगह नोटिस चस्पा किए गए है। अमूमन, युद्ध की स्थिति में बत्ती को गुल रखने के लिए कहा जाता है। निसंदेह, सीमा पर युद्ध जैसे हालात है और यह सिलसिला जितना लंबा चलेगा, हालात उतने ही बिगडते जाएंगें। पाकिस्तान प्रायोजित आतंक ने कश्मीर  घाटी को करीब-करीब तबाह कर रख दिया है। आए दिन के प्रदर्शन, बंद और हिंसक माहौल से घरेलू एव लघु उधोग बंद पडे हैं। पर्यट्न उधोग पूरी तरह लूट चुका है और लोगों को रोजी-रोटी के लाले पडे हुए हैं। आम तौर पर गुलजार रहने वाल बाजार सूने पडे हैं। चौतरफा, दहशत का माहौल है। सरकार और प्रशासन  नाम की  कोई चीज नहीं है। स्कूल-कॉलेजिज बंद पडे हैं और अगर स्कूल खुलते हैं तो आतंकी उनमें आग लगा देते हैं। पिछले दो माह में 25 से ज्यादा स्कूलों को फूंका जा चुका है। स्थिति इस कद्र खराब है कि सोमवार को उच्च न्यायालय को मंडलीय प्रशासन और पुलिस से पूछना पडा कि घाटी में स्कूल को कौन जला रहा है मगर प्रषासन कोई जवाब नहीं दे सका। राज्य के 15 लाख छात्रों का भविष्य दांव पर है मगर राज्य सरकार लाचार है। इसके यही अर्थ निकलते हैं कि जम्मू-कश्मीर  में आतंकी और अलगाववादियों सरकार से ज्यादा प्रभावी हैं और वे जो चाहें कर सकते हैं। मगर अब जनमानस का धैर्य  जवाब दे रहा है, वह सियासी नेताओं की “ पाकिस्तान से बदला लिया जाएगा“, अथवा “एक-एक सैनिक और नागरिक की मौत का हिसाब चूकता किया जाएगा“ जैसी गीदड-भभकियों से आजिज आ चुके हैं। भाजपा पाकिस्तान को माकूल जवाब नहीं देने के लिए पिछली सरकार पर  “नपुंसक और नामर्द“ जैसी फब्तियां कसा करती थी। तब भाजपा 56 इंच का सीना  फुलाकर शेघी बघारा करती थी कि अगर वह सत्ता में होती तो पाकिस्तान को करारा जवाव देती।  मोदी  जी, अब पाकिस्तान को करारा जवाब देने का समय आ गया है।

बुधवार, 2 नवंबर 2016

भोपाल जेल प्रकरण: खंडवा से भी सबक नहीं सीखा

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की जेल से दीवाली की रात भागे सभी 8 आतंकियों को चंद घंटों में मार गिराकर राज्य पुलिस भले ही अपनी पीठ थपपथाए मगर यह घटना अपने पीछे कई सवाल छोड गई है। भोपाल की जेल देश के सबसे सुरक्षित  कारागारों में  शुमार है। फिर भी, स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से संबंधित 8 आतंकी रविवार रात जेल के एक  सिपाही का गला रेतकर और दूसरे के हाथ-पांव बांधकर  30 फीट ऊंची दीवार फांदकर फरार हो गए ।  आठ घंटों के भीतर पुलिस की एंटी टेर्रिस्ट स्क्वैड (एटीएस) ने  सभी फरार आतंकियों को ढेर कर दिया। मारे गए आतकियों में दो तीन साल पहले के खंडवा जेल ब्रेक में भी संलिप्त थे । इन आतंकियों पर  हत्या, विध्वसंक गतिविधियों में संलिप्तता एव देशद्रोह जैसे संगीन मामले चल रहे थे। 1977 में स्थापित  स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी)  को सरकार ने 2001 में प्रतिबंधित कर दिया था। इस पूरे प्रकरण पर कई सवाल उठ रहे हैं। त्योहारी सीजन के  दृष्टिगत केन्द्र ने पूरे देश में हाई अलर्ट जारी किया था और दीवाली के पर्व पर खासतौर पर सतर्क रहने को कहा गया था। मगर भोपाल की जेल में मात्र दो सुरक्षाकर्मी ही तैनात थे जबकि  इस कारागार में दुर्दांत आतंकी बंद थे। जेल मैन्युलस के अनुसार किसी भी जेल में 8 से ज्यादा खूखांर अपराधियों को नहीं रखा जा सकता। इसके बावजूद भोपाल की जेल में  35 दुर्दांत आतंकी रखे गए थे। भोपाल के मुख्य जेलर एलकेस भदौरिया ने खुद माना है कि “यह तो होना ही था“। 35 आतंकियों को एक साथ एक ही जेल में रखा जाए, ऐसी घटना तो होगी ही। यह भारी सुरक्षा चूक है। जेल प्रशासन इस बारे सरकार को कई बार आगाह कर चुका था मगर उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया गया। जिस जेल में  35 दुर्दांत आतंकियों को रखा गया हो, वहां मात्र दो पुलिसकर्मी को तैनात किया जाए, इससे तो यही संदेश जाता है कि राज्य सरकार सिमी के आतंकियों को भागने का  अवसर देना चाहती थी हालांकि  इससे पहले सिमी के आतंकी 2013 में खंडवा जेल से भी फरार हो चुके थे। राज्य सरकार ने इस घटना से भी कोई सबक नहीं सीखा। इसके क्या अभिप्राय लगाए जाएं? राज्य पुलिस के आईजी का यह बयान भी काफी दिलचस्प है कि आतंकियों से सात हथियार मिले हैं। इससे पहले कहा गया था कोई हथियार नहीं मिले। यह विरोधाभास क्यों? इसने कई आशंकाओं को जन्म दिया है। सवाल किया जा रहा है कि सिमी के आतंकियों को हथियार कहां से मिले? जेल से फरार होते समय आतंकियों के पास हथियार के नाम पर केवल चमच थे, बाहर आते ही वे गन्स से कैसे लैस हो गए? यह बात भी काफी रहस्यपूर्ण है कि जेल से फरार होने के आठ घंटों तक आतंकी भोपाल के समीप ही जमे रहे जबकि इतने समय में वे काफी दूर निकल सकते थे। इस दौरान सोशल मीडिया पर कुछ वीडियो दिखाए गए हैं, जिनसे एटीएस के आतंकियों को मुठभेड में मार गिराने के दावों की  पुष्टि नहीं होती है। निसंदेह, देश में आतंक फैलाकर उसकी अखंडता पर प्रहार करने वाले देशद्रोही किसी भी तरह की दया के पात्र नहीं है और इन्हें सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। जेल के सुरक्षाकर्मियों की हत्या करके फरार होना और  भी संगीन अपराध है मगर लोकतंत्र और सभ्य समाज में अपराधियों के  फैसले सडकों पर मुठभेड से नहीं किए जाते। अपराधियों को सजा देना न्यायपालिका का काम है। सुरक्षा में हुई भारी चूक को  मध्य प्रदेश सरकार सिमी के आठ आतंकियों को मार गिराने का श्रेय लेकर पूरा नहीं कर सकती। और न ही इस चूक को यह कहकर छिपाया जा सकता है कि आतंक से जुडे मामलों पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।  आतंकियों को मार गिराना पुलिस की डयूटी है। ऐसे मामलों में बार-बार भारी चूक होना यही  दर्शाता है कि देश में पुलिस का भारी-भरकम अमला अब किसी काम नहीं रह गया है।  

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

पटाखे फोड़ कर हवा को प्रदूषित करना कहां की अकलमंदी

  प्रकाश  पर्व - दीपावली को हर साल भारत में हर घर को रोशनी में नहलाया जाता है। जमकर पटाखे फोडे जाते हैं और दोस्त हो या  दुश्मन , सबसे गले मिला जाता है और भरपूर खरीदारी की जाती है। युगों से यह सिलसिला चल रहा है। समय के साथ-साथ, बहुत कुछ बदला है। प्रकाश  पर्व का स्वरुप भी बदला गया हे। कुम्हार द्वारा बनाए गए मिट्टी के दीए अब कहीं-कहीं ही दिखते हैं। उनकी जगह सिंथेटिक दीओं ने ले ली है। बिजली की रोशनी  दीओं पर भारी पडती है। भारत समेत पूरी दुनिया अब कृत्रिम (सिंथेटिक) हो गई है। इसीलिए दीपावली और होली पर सिंथेटिक उत्पाद का ज्यादा चलन हो गया है। सिथेंटिक उत्पादों ने वातावरण को और ज्यादा खराब किया है।  भारत में अगर कुछ बदला नहीं, तो वह है पटाखे फोडने की परंपरा। और दीवाली तो होती ही पटाखे फोडने के लिए है।  फिर हम दीपावली पर खूब पटाखे फोडते हैं। धनतेरस से  शुरु होकर भाई दूज तक दीपावली का पर्व  चलता है और इन दिनों खूब पटाखे फोडे जाते हैं। इस क्रम में हवा बेहद जहरीली हो जाती है और प्रदूषण का स्तर खतरनाक मानक को भी पार कर जाता है। हमे इसकी जरा भी परवाह नहीं है। हमारी एक बहुत बुरी आदत है। हम सोचते हैं “मेरे करने से क्या होगा“। और इस तरह पूरा देश  यही सोवता है। नतीजतन, हम बदलाव नहीं कर पाते।  देश  की राजधानी दिल्ली में सोमवार अलसुबह हवा में जहरीली गैसों का मिश्रण 883 माइक्रोग्राम के स्तर को भी पार कर गया था जबकि यह सुरक्षित 60 माइक्रोग्राम से नीचे रहना चाहिए। इसी वजह सोमवार सुबह राजधानी में विजीबिल्टी बहुत कम रही। अगले दो दिनों में प्रदूषण का स्तर कम होने की बजाए और बढ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक पंजाब और हरियाणा में किसानों द्वारा लगातार धान की पराली जलाने से भी प्रदूषण में इजाफा हुआ है। चंडीगढ पंचकूला और मोहाली में इस बार प्रदूषण अपेक्षाकृत  कम रहा। चडीगढ में पिछले साल की तुलना में 50 फीसदी से भी कम पटाखे फोडे गए। इसकी वजह यह रही कि पटाखों की ज्यादा बिक्री नहीं हुई। आम तौर पर बच्चे और युवा ही अधिकतर पटाखों की खरीदारी करते हैं। इस बार बच्चों और युवाओं ने पटाखे खरीदने में ज्यादा रुचि नहीं दिखाई। चंडीगढ देश  के प्रगतिशील सोच वाला शहर है और इसके बाशिंदे हमेशा  आगे की सोचते हैं। पिछले कुछ सालों से शहर में ग्रीन दीवाली और ग्रीन होली मनाने का चलन बढा है। इस बार भी ट्राईसिटी की हवा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए “ग्रीन दीवाली“ मनाई गई। इस बार की दीवाली का एक और सुखद पहलू यह रहा कि चीन के पटाखों, लाइटस और दीओं के  राष्ट्रव्यापी  बहिष्कार के कारण स्वदेशी  दीओं और पटाखों की ब्रिकी कही ज्यादा रही। पिछले कुछ सालों से दीवाली पर चीन में निर्मित सस्ते उत्पाद स्थानीय उत्पाद पर भारी पड रहे थे। भारत में दीवाली का महत्व मात्र  पटाखे फोडना अथवा दीए जगमगाने तक ही सीमित नही है। दीपावली प्रकाश  का पर्व  है। जिस तरह दिया अपनी रोशनी से अंधेरे को दूर करता है, उसी तरह दीपावली पर्व पर हम  प्रेम, आदर्ष   आचरण, मर्यादा पालन और साम्प्रदायिक सदभाव के प्रकाश  से नफरत, द्धेश, अज्ञानता, बैेमन्सय जैसी बुराइयों को दूर भगाते हैं। देश  में व्याप्त मौजूदा असहिशष्णुता के माहौल में प्रकाश  पर्व  का महत्व और भी बढ जाता है। दीपावली सामाजिक उत्सव है और यह पर्व  हमें प्रेम और सदभाव से साथ-साथ रहने की सीख देता है। इस बार उडी आतंकी हमले और तदुपरांत सर्जिकल स्ट्राइक से उपजी कटुता के कारण  पडोसी देश  पाकिस्तान से हमारे संबंध बेहद खराब है और दोनों देश  लगभग युद्ध के मुहाने पर खडे हैं। सीमा पर लगातार जारी गोलीबार के कारण जवान शहीद हो रहे हैं। शोक संतप्त शहीदों के परिजनों के दुख को साझा करने के लिए कई जगह दीपावली नहीं मनाई गई। यही दीपावली का वास्तविक संदेश  है कि देश  के हर नागरिक को एक-दूसरे के सुख-दुख को बांटना है।