सात दशक से भी ज्यादा समय से तानाशाही (सैन्य शासन) और अर्ध लोकतंत्र के बीच झूल रहे पाकिस्तान में संसद (नेश नल असेंबली) और प्रांतीय असेंबलियों के चुनाव में इस बार सेना का भारी दखल रहा है। पाकिस्तान में 70 सालों मेंसे अधिकतर समय सैन्य शासन रहा है। इस बार चुनाव की घोषणा से लेकर मतदान और मतगणना तक भारी धांधलियों और गडबडी के नजारे सामने आए हैं। पाकिस्तान की 342 सदस्यीय नेशनल असेंबली की 272 सीटों के लिए चुनाव कराए जाते हैं। बाकी 60 सीटें महिलाओं और धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित है। भारतीय संसद की ही तरह पाकिस्तान में ऊपरी सदन सीनेट सदस्यों को प्रांतीय असेंबलियों द्वारा चुना जाता है। ताजा चुनाव परिणामों के अनुसार किक्रेटर से राजनीति में आए इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) 120 सीटें जीत कर प्रतिद्धद्धियों से कहीं आगे है। पूर्ण बहुमत के लिए 137 सीटों की जरुरत है। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज षरीफ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग 61 सीटें लेकर पीटीआई से काफी पीछे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के पुत्र विलावल भुट्टो 40 सीटों पर आगे हैं। ताजा स्थिति में नवाज षरीफ और विलावल भुट्टो की पार्टी मिलकर भी इमरान खान की पार्टी का मुकाबला नहीं कर सकती। इमरान खान का प्रधानमंत्री बनना तय लग रहा है ।पाकिस्तान की सेना और इसकी बदनाम खुफिया एजेंसी आईएसआई भी यही चाहती है। पाकिस्तान में सेना की विशेष शक्तियों के कम होने के बाद से तख्ता पलट आसान नहीं रहा है, इसलिए सेना अपनी पसंद के प्रधानंमत्री को पदस्थ करने के लिए इस बार रात-दिन एक करती रही है। नवाज शरीफ और उनकी पार्टी सेना को फूटी आंख भी नहीं सुहाती है। सेना और आईएसआई का इमरान खान की पार्टी पीटीआई को खुला समर्थन रहा है। इमरान की पार्टी को मुंबई नरसंहार के मास्टरमाइंड और आतंकी संगठनों के सरगना हाफिज सईद का भी समर्थन है। नवाज शरीफ को सत्ता से बाहर रखने के लिए सेना और आईएसआई ने हर तरह के हथकंडे अपनाए। नवाज शरीफ के मामले की सुनवाई को तेज करते हुए चुनाव से पहलेे उन्हें जेल भेज दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री के विश्वासपात्र हनीफ अब्बासी के नारकोटिक्स मामले की सुनवाई अगस्त में होनी थी। मगर इसे मतदान से चार दिन पहले 21 जुलाई को करवाकर उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। इससे वे चुनाव से ही बाहर हो गए। मीडिया पर कडा पहरा लगा दिया गया। नवाज शरीफ के स्वदेश लौटने पर लोगों के भारी हजूम ने उनका स्वागत किया। जगह-जगह विरोध -प्रदर्शन हुए मगर मीडिया में एक शब्द भी नहीं छपा। पाकिस्तान के तटस्थ लोकप्रिय जियो टीवी चैनल को अप्रैल में बंद कर दिया गया था। बाद में जब खुला तो चैनल को आत्म-सेंसर लगाने और सरकार की आवाज बनाने के लिए विवश होना पडा। पाकिस्तान के प्रमुख समाचार पत्र “डान“ भी अछूता नही रहा है। मई से इसका वितरण बाधित किया जा रहा है। मतदान के दिन लगभग 10 से 15 प्रतिशत मतदाताओं को मतदान करने ही नहीं दिया गया। उम्मीदवारों के आग्रह के बावजूद मतदान का समय नहीं बढाया गया हालांकि मतदान केन्द्रों पर मतदातओं की लंबी कतारें थी। मतगणना रुक-रुक कराई गई । पूरा चुनाव दहशत के माहौल में संपन्न हुआ है। निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव ही लोकतंत्र की रीढ की हड्डी होती है। जिस तरह रीढ की हड्डी टूटने पर इंसान पंगु हो जाता है, उसी तरह निष्पक्ष और भयमुक्त स्वंतत्र चुनाव के बगैर लोकतंत्र कोई मायने नहीं रखता। इमरान खान ने अपने पहले मीडिया इंटरव्यू में भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढाया है मगर यह सब दिखावा है। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने भारत के खिलाफ जहर उगलने में कोई कसर नहीं छोडी। पाकिस्तान में सेना और आईएसआई के रिमोट कंट्रोल से संचालित प्रधानमंत्री भारत के लिए सबसे बडा खतरा है।
यह ब्लॉग खोजें
ब्लॉग आर्काइव
- अप्रैल (2)
- मार्च (1)
- सितंबर (2)
- अगस्त (2)
- जुलाई (3)
- जून (2)
- मई (2)
- अप्रैल (4)
- मार्च (9)
- फ़रवरी (7)
- जनवरी (6)
- दिसंबर (11)
- नवंबर (7)
- अक्टूबर (4)
- सितंबर (10)
- अगस्त (22)
- जुलाई (2)
- जून (11)
- मई (12)
- अप्रैल (7)
- मार्च (6)
- फ़रवरी (1)
- दिसंबर (5)
- नवंबर (4)
- अक्टूबर (5)
- सितंबर (17)
- अगस्त (33)
- जुलाई (28)
- जून (21)
- मई (30)
- अप्रैल (20)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (23)
- जनवरी (23)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (22)
- अक्टूबर (22)
- सितंबर (19)
- अगस्त (22)
- जुलाई (21)
- जून (19)
- मई (20)
- अप्रैल (19)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (20)
- जनवरी (19)
- दिसंबर (22)
- नवंबर (21)
- अक्टूबर (21)
- सितंबर (21)
- अगस्त (16)
- जुलाई (15)
- जून (20)
- मई (18)
- अप्रैल (21)
- मार्च (20)
- फ़रवरी (21)
- जनवरी (24)
- दिसंबर (25)
- नवंबर (27)
- अक्टूबर (23)
- सितंबर (27)
- अगस्त (35)
- जुलाई (22)
Copyright 2015 | Chander M Sharma . Blogger द्वारा संचालित.






