रविवार, 22 जुलाई 2018

सात दशक में एक अदद सडक भी नहीं मिली

सडकें हिमाचल प्रदेश  की जीवन रेखा है। सडक नहीं तो जीना  दुश्वार  हो जाता है। मगर बाबुओं को यह बात समझ में नहीं आती है। और दुखद स्थिति यह है कि स्वंय को “विकास पुरुष “ कहने वाले नेता भी नौकरशाही के समक्ष बेबस है। दस साल से ज्यादा समय से हम अपने गांव नावी के लिए सडक मार्ग  से जोडने के लिए जूझ रहे हैं। यह गांव  शिमला ग्रामीण हलके में पडता है। पिछली बार मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह इस हलके के नुमाइंदे थे और अब  उनके पुत्र विक्रमादित्य इस हलके से चुने गए हैं। दस साल गुजर गए हैं मगर इस सडक को लेकर बाबुओं की फाइलों में ऑब्जेक्शन दर   ऑब्जेक्शन    लग रहे हैं। 2008 में हमने अपने पैसे से चार किलोमीटर कच्ची का निर्माण किया था। गांववालों मे जमीन दी। मगर इससे ज्यादा कुछ नहीं हुआ। सरकार ने आगे के गांच को जोडकर एक योजना तो बनाई है मगर यह कागजों की धूल फांक रही है। वीरभद्र सिंह अक्सर कहते कि विकास कार्य  के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं मगर उन्होंने पांच साल गुजार लिए न तो कभी इस गांव का दौरा किया और न ही इस सडक के  लिए कुछ किया। कई चिठ्ठियां लिखीं। जवाब तक नहीं आया। एक बार दो साल बाद एक चिठठी आई जिसके टॉप पर लिखा था “ दस दिन के भीतर  शिकायतों का समाधान“ और इस  चिठठी में लिखा था, मामला अगली कार्रवाई के लिए प्रेषित किया जा रहा है।  आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। आजादी के सात दशक बाद भी नावी गांव को सडक तक नहीं मिल पाई है। लोग तो यही कहेंगे लानत है ऐसी आजादी पर और ऐसी सरकार पर जो सात दशकों में भी सडक की सुविधा नहीं दे पाए ?  नई सरकार को भी छह महीने से ज्यादा का समय हो  गया है मगर फाइल तक नहीं हिली। लोगों को यह बात कब समझ में आएगी कि सरकार बदलने से कुछ नहीं होगा। सचिवालय और विधानसभा में सीटों की अदला-बदली सिस्टम को नहीं बदल सकती। वही नौकरशाही और वही लालफीताशाही। जयराम ठाकुर मुख्यमंत्री बन गए और अब वीरभद्र सिंह की जगह  सुरक्षाकर्मियों और बाबुओं ने इन्हे  घेर लिया है। आम आदमी अब वीरभद्र से आसानी  से मिल सकता है, जयराम से नहीं।  मुख्यमंत्री वही करेंगे और सुनेगें जो उनके नौकरशाह सलाहकार कहेंगे। कर्ज  लेकर पांच साल गुजार लेंगे। और कर्ज  में डुबे बेहाल राज्य को अगली सरकार के लिए छोड देंगे। साहिब सिंह वर्मा  जब नब्बे के दशक में दिल्ली के मुख्यमंत्री थे, उन्होंने खुद नौकरशाही के इशारों पर काम करने की  विवशता स्वीकारी की थी। नौकरशाह कितने ताकतवर होते है जनाब अरविंद केजरीवाल इसके भुगतभोगी है। सिस्टम में बदलाव एक पार्टी की सरकार को नकार और दूसरी को  चुनकर नहीं होगा। समकालीन राजनीति में सभी दल एक ही थैली के चटटे-बट्टे हैं। सिस्टम को ही बदलना होगा , वरना जलते-भुनते, पिसते रहिएगा।